षष्ठ मंडल सूक्त १ - ७५ (ऋग्वेद)

 

Rigveda | Gyan Dhyan Sanskar

सूक्त-१

हे अग्निदेव ! आप देवताओं में श्रेष्ठ हैं, उन्हें आप अपनी ओर आकर्षित करने वाले हैं। इस जगत् में आप ही दर्शन के योग्य हैं। होता द्वारा किये जा रहे इस बुद्धिपूर्ण कार्य (यज्ञ काय) को सम्पन्न करने में आप ही सह्योगी हैं । हे बलवान् देव ! हमें अपरिमित बल प्रदान करें, जिससे हम बलिष्ठ शत्रुओं को जीतने में समर्थ हों ॥१॥
हे अग्निदेव ! आप यजन करने योग्य, हवि ग्रहण करने वाले एवं स्तुति करने योग्य हैं। देवों में प्रथम पूज्य हे अग्निदेव ! दिव्य धन की इच्छा से यज्ञानुष्ठान करने वाले प्रत्वग्गण आपको ही सर्वप्रथम आहूत करते हैं। आप यज्ञ वेदी पर प्रतिष्ठित हों ॥२॥
तेजस्वी, दर्शनीय है अग्निदेव ! आप सर्वदा ज्योतित रहते एवं आहुतियों को ग्रहण करते हैं। आप वसुओं के मार्ग से गमन करते हैं । ऐश्वर्य के इच्छुक साधक ही आपका अनुगमन करते हैं ॥३॥
यश-वैभव प्राप्ति की कामना करने वाले याजक, स्तोत्रों से अग्निदेव को प्रसन्न करते हुए यज्ञशाला में उनका आवाहन करते हैं। हे अग्निदेव ! वे आपका दर्शन पाकर, आनन्दित होकर, स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं और इच्छित पदार्थ प्राप्त करते हैं ॥४॥
हे अग्निदेव ! यज्ञ वेदी पर प्रतिष्ठित करके यजमान आपको अच्छी तरह प्रज्वलित करते हैं । अध्वर्युगण भी दोनों (लौकिक एवं दैवी) सम्पदाओं को प्राप्त करने की इच्छा से आपको बढ़ाते (प्रज्वलित करते हैं। हे। दुःखनाशक अग्निदेव ! आप स्तुतियों से प्रसन्न होकर माता एवं पिता की तरह अनुदान एवं संरक्षण प्रदान करें ॥५॥
प्रजाजनों के हित में यज्ञ कर्म सम्पन्न करने वाले, दान देने में समर्थ, पूज्य, यजनीय अग्निदेव को हम वेदी पर स्थापित करते हैं। हे अग्निदेव ! आप घर को देदीप्यमान करने वाले हैं। हम स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते हुए वन्दना करते हैं ॥६॥
हे अग्निदेव ! हम सद्बुद्धि सम्पन्न सुख की कामना से आपकी स्तुति करते हैं। हे अग्निदेवे ! आप तेज को धारण करने वाले हैं। आप सूर्यदेव के समान देदीप्यमान होकर हमें दिव्यलोक तक ले चलें ॥७॥
प्रजापालक, ज्ञानी, शत्रुहन्ता, परम बलशाली, कामनाओं की पूर्ति करने वाले, अन्न दान करने वाले तथा प्रज्ञाजनों के पास जाने वाले हे तेजस्वी अग्निदेव ! हम आपकी स्तुति करते हैं। आप हमें अन्न, धन एवं तेजस्विता प्रदान करें ॥८॥
हे अग्निदेव ! याजकगण स्तुति करते हुए आपके निमित्त हवि प्रदान करते हुए यजन करते हैं। वे आपकी कृपा के द्वारा इच्छानुसार धन प्राप्त करें ॥९॥
हे अग्निदेव ! आप महान् हैं । हम आपको नमस्कार करते हैं, आपका स्तवन करते हैं और आपके निमित्त हवि प्रदान करते हैं। यज्ञ स्थल पर अपनी वाणियों तथा स्तोत्रों द्वारा हम आपका पूजन करते हैं । आपकी कृपा से हम सुमति को धारण करें, जिससे हमारी प्रगति हो ॥१०॥
हे अग्निदेव ! आपने अपनी दीप्ति को द्यावा-पृथिवी में विशेष रूप से विस्तृत किया है। आप तारक हैं, हम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। आप समीपस्थ वेदों पर प्रदीप्त होकर हमारे लिए अन्न और धन के प्रदाता बनें ॥११॥
हे अग्निदेव ! हमारा घर पुत्र-पौत्रों और परिजनों से परिपूर्ण रहे । आप ऐश्वर्यवान् से प्राप्त ऐश्वर्य द्वारा हमारे पुत्र-पौत्रों तथा परिजनों का पोषण एवं कल्याण करें तथा हमें ऐसी शक्ति प्रदान करें, जिससे हम निष्पाप और कल्याण के मार्ग पर चलते हुए यशस्वी बने ॥१२॥
हे ज्योतिस्वरूप अग्निदेव ! हमें आप अश्व , गौ सहित धन प्रदान करें । हे अग्निदेव ! आप ऐश्वर्यवान् , रमणीय एवं वरणीय हैं । आप प्रचुर धन के स्वामी हैं ॥१३॥

सूक्त-२

हे अग्निदेव ! आप सभी के मित्र हैं, अन्न और तेज के अधिपति हैं । हे अग्निदेव ! आप सर्वद्रष्टा हैं, पोषक पदार्थों से हमें पुष्ट बनाएँ ॥१॥
हे अग्निदेव ! हव्य और स्तोत्रों द्वारा याजकगण आपकी ही पूजा करते हैं । कुटिलता रहित, लोकों को तारने वाले, विश्वद्रष्टा (सूर्य) आपको ही प्राप्त करते हैं ॥२॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ के शिरोमणि ध्वज की तरह हैं। मनु पुत्र सुख-समृद्धि की इच्छा से, बिना किसी पारस्परिक द्वेष के यज्ञशाला में आपका आवाहन करते हैं। आप अपने दिव्य तेज सहित प्रदीप्त होने की कृपा करें ॥३॥
उदार मन वाले हे अग्निदेव ! जो मनुष्य बुद्धिपूर्वक आपकी स्तुति करते हैं, वे सम्पन्न बनते हैं । हे तेजस्वी अग्निदेव ! आपके संरक्षण एवं साधनों को प्राप्त कर साधक पापों के समान द्वेष करने वालों को नष्ट करके, उन्नतिशील होता है ॥४॥
हे अग्निदेव ! जो याजक समिधा सहित पवित्र आहुतियाँ आपके प्रति निवेदित करता है, वह सुसंतति से भरे-पूरे परिवार में आनन्दपूर्वक रहते हुए शतायु होता है ॥५॥
प्रदीप्त होने के पश्चात् अग्नि का धवल धूम्र अंतरिक्ष में फैलकर दृष्टिगोचर होता है । हे पावन अग्निदेव ! स्तुति के प्रभाव से आप प्रकाशित होते हैं ॥६॥
हे अग्निदेव ! आप स्तुत्य हैं । आप अतिथि की तरह परम प्रिय हैं। नगरवासी, हितैषी, उपदेशक वृद्ध की तरह आश्रय योग्य हैं एवं पुत्रवत् पालनीय हैं ॥७॥
हे अग्निदेव ! हम आपको अरणिमन्थन क्रिया द्वारा प्राप्त करते हैं । आप वायु के समान सर्वत्रगमनशील हैं। आप अश्वरूप होकर हवि को लक्ष्य तक पहुँचाते हैं । बालवत् पवित्र स्वभाव वाले हे अग्निदेव ! आप हमें अन्न और निवास प्रदान करें ॥८॥
हे अग्निदेव ! आप कठिन काष्ठों को उसी प्रकार आत्मसात् कर लेते हैं, जैसे अश्व आदि पशु घास का भक्षण कर लेते हैं। हे तेजस्वी अग्निदेव ! आपकी तेजस्वी शिखाएँ वन (समूहों) को भस्म करने में समर्थ हैं ॥९॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ करने के इच्छुक याजक के घर होता रूप में प्रवेश करते हैं। हे अग्निदेव ! आप हमारी आहुतियों को ग्रहण करें । आप पालक हैं, हमें समृद्धिशाली बनाएँ ॥१०॥
हे दिव्यगुण सम्पन्न अग्निदेव ! शांत और विकराल दोनों गुणों वाले आप, द्यावा-पृथिवी में संव्याप्त हैं । आप हमारी वाणी (स्तुतियों ) और आहुतियों को देवताओं तक पहुँचाएँ । हम स्तुतिकर्ताओं को सुव्यवस्थित आवास तथा सौभाग्य प्रदान करें। हमें शत्रुओं, संकटों और पापों से बचाएँ । हे अग्निदेव ! आप द्वारा रक्षित हम निर्विघ्न जीवनयापन करें ॥११॥

सूक्त-३

हे अग्निदेव ! आप उनको दीर्घायुष्य प्रदान करें, जो यज्ञ से उत्पन्न और यज्ञपालक याजक हैं। आप मित्र और वरुण जैसी प्रीति करने वाले हैं। देवत्व प्राप्ति की कामना वाले याजक को, आप अपने तेज के द्वारा पापों से बचाते हैं और उनकी सब प्रकार रक्षा करते हैं ॥१॥
श्रेष्ठ वैभवशाली अग्निदेव के निमित्त आहुति देने वाले याजक को पुत्रादि प्राप्त होते हैं। वह पापरहित और निरभिमानी होकर श्रेष्ठ जीवनयापन करता है ॥२॥
जिन (अग्निदेव) का दर्शन सूर्यदेव की तरह दोष मुक्त करने वाला है, उनकी प्रज्वलित (प्रखर) धी (मेधा अथवा ऊर्जा) सब ओर (दोषों-पापों के लिए भयानक होकर फैलती है। रात्रि में शोक (अथवा अंधकार) रोधक गंभीर शब्द करते हुए वे सबको आवास देने वाले अग्निदेव वनों में अथवा कहीं भी शोभा पाते हैं ॥३॥
इन (अग्निदेव) का मार्ग (कार्य करने का ढंग) तीक्ष्ण है और स्वरूप तेजस्वी है । वे कुठार की तरह अपनी जिह्वा (ज्वालाओं) को दारु (कठोर वस्तुओं) पर प्रयुक्त करते हैं । गलाई करने वाले (धातु कर्मी) की तरह ( पदार्थों को ) गला देती हैं ॥४॥
बाण चलाने वाला जैसे प्रतिघात करता है, वैसे ही अग्निदेव भी, परशु की तरह तीक्ष्ण ज्वालाओं द्वारा लक्ष्य वेधन करते हैं। तीवगामी पक्षी जैसे शीघ्रता से वृक्ष की शाखा, पर बैठ जाता है, वैसे ही शीघ्रता से अग्नि भी लकड़ी (समिधा) पर बैठ, लकड़ी को जलाती है और प्रदीप्त होकर रात्रि के अन्धकार का नाश करती हैं ॥५॥
स्तुति करने योग्य अग्निदेव भी सूर्यदेव के समान अपनी ज्वालाओं की दीप्ति फैलाते हैं । मित्रवत् प्रकाश को फैलाते हुए शब्द भी करते हैं । वे अमर अग्निदेव प्रदीप्त ज्वालाओं सहित प्रज्वलित रहें ॥६॥
सूर्य के समान तेजस्वी, बलवान् अग्निदेव, प्रदीप्त होकर ओषधियुक्त काष्ठादि को जलाते समय विशेष शब्द करते हैं। जो धधकते हुए तेज के साथ इधर-उधर तथा ऊर्ध्वगमन करते हैं, वे हमारे शत्रुओं को पराजित करते हुए द्यावा-पृथिवी को धन से समृद्ध करें ॥७॥
जो अग्निदेव, हविवाहक एवं रथ-नियोजित अश्व के समान कान्तियुक्त (शक्तियुक्त) हैं, वे स्वयं के तेज से विद्युत् के समान देदीप्यमान होने वाले तथा मरुद्गणों से भी अधिक बलशाली हैं। ऐसे सूर्यदेव के समान कान्ति युक्त अग्निदेव वेग से प्रदीप्त होते है ॥८॥

सूक्त-४

हे अग्निदेव ! आप देवगणों को आहूत करने में समर्थ, बल के पुत्र हैं । इस यज्ञ में अपने समान बलशाली इन्द्रादि देवगणों का हवि द्वारा वैसे ही यजन करें, जैसे कि विज्ञजनों के यज्ञ में करते हैं ॥१॥
वे अग्निदेव हमें यशस्वी एवं धन-सम्पन्न बनाएँ, जो सूर्यदेव के समान तेजस्वी, प्रकाशक, अमर, बुद्धि से जानने योग्य, अतिथिरूप एवं उषा के समय प्रदीप्त होते हैं ॥२॥
जो सूर्यदेव के समान उज्ज्वल प्रकाश के विस्तार करने वाले, पवन बनाने वाले, अपने अजर (सदैव प्रखर) प्रकाश के द्वारा समस्त पदार्थों को दृष्टिगोचर करने वाले, शत्रु को पराजित करने वाले एवं शत्रु नगरों को ध्वस्त करने वाले हैं, उन्हीं अग्निदेव के महान् कर्मों का यशोगान स्तोतागण करते हैं ॥३॥
सर्वप्रेरक है अग्निदेव ! आप स्तुति करने योग्य हैं। आप याजक द्वारा प्रदत्त आहुतियों से प्रसन्न होकर उन्हें अन्न और आवास प्रदान करते हैं । हे अन्नदाता अग्निदेव ! आप यज्ञ वेदी पर प्रतिष्ठित होकर हमें अन्न प्रदान करें और शत्रुओं का संहार करें ॥४॥
जो अग्निदेव अपने तमोनाशक तेजस्वी प्रकाश को और प्रखर करते हैं, वे अग्निदेव रात्रि को भी पार करते हैं। वे हवि ग्रहण करने वाले हैं। वायुदेव प्राणरूप हो, जैसे सब पर शासन करते हैं, वैसे ही अग्निदेव सभी पर शासन करें । यज्ञीय अनुशासन को न मानने वालों पर हम विजय प्राप्त करें ( अर्थात् प्रेरणा देकर यज्ञीय अनुशासन में चलाएँ । हे अग्निदेव ! आप तीव्रगामी अश्व के समान आक्रामकों का संहार करें ॥५॥
हे अग्निदेव ! आप द्यावा-पृथिवी में अपनी कान्ति से उसी तरह व्याप्त होते हैं, जिस प्रकार सूर्यदेव अपनी तेजस्वी किरणों से व्याप्त हैं। आकाश मार्गगामी सूर्यदेव जैसे अन्धकार को नष्ट करते हैं, वैसे ही तेजस्वी अद्भुत अग्निदेव अन्धकार को दूर करते हैं ॥६॥
हे आनन्ददायक, पूजनीय अग्निदेव ! हम आपकी स्तुति करते हैं। आप हमारे श्रेष्ठ स्तोत्रों को सुनें । नेतृत्व करने में समर्थ आपको (याजक) हव्य द्वारा वायु एवं इन्द्रदेवों की भाँति ही तुष्ट करते हैं ॥७॥
हे अग्निदेव ! हम आपकी कृपा से अहिंसापूर्वक उत्तम मार्गों से सुख एवं धन-सम्पदा प्राप्त करें। हमें पाप कर्मों से बचाएँ। आप विज्ञजनों को जो सुख देते हैं, वहीं सुख हम स्तोताओं को प्रदान करें । हम सौ वर्षों तक सुसन्तति सहित आनन्दपूर्वक रहें ॥८॥

सूक्त-५

हे अग्निदेव ! आप बल के पुत्र, द्रोह शून्य, चिरयुवा, मेधावी एवं स्तुति करने योग्य हैं । ऐसे गुण-सम्पन्न अग्निदेव का स्तोत्रों द्वारा हम आवाहन करते हैं। वे अग्निदेव स्तुति करने वाले मनु पुत्रों को इच्छित धन और यश प्रदान करते हैं ॥१॥
हे अग्निदेव ! आप बहुत सी ज्वालाओं वाले और देवताओं को आहूत करने में समर्थ हैं । यज्ञकर्ता यजमान रात और दिन आपके लिए ही हविष्यान्न प्रदान करते रहते हैं। जिस तरह पृथ्वी पर सभी प्राणी स्थित हैं, उसी तरह अग्निदेव समस्त धन-ऐश्वर्य धारण करते हैं ॥२॥
हे अग्निदेव ! आप अपनी सामर्थ्य से श्रेष्ठ इच्छाओं की पूर्ति करते हैं। आप उत्तम सम्पत्तिवानों में प्रमुख हैं। हे ज्ञान स्वरूप देव ! आप अपने याजकों को सदैव ऐश्वर्य प्रदान करें ॥३॥
हे अग्निदेव ! आप उन दोनों प्रकार के शत्रुओं का संहार करें, जो छिपकर अथवा अन्दर प्रविष्ट होकर हमारा नाश करना चाहते हैं । आपका तेज चिरयुवा एवं पर्जन्य को कारण रूप हैं ॥४॥
हे अग्निदेव ! जो याजक हव्य पदार्थों द्वारा यज्ञ करके आपकी सेवा करता है एवं स्तोत्रों से स्तवन करता है, वह यजमान श्रेष्ठ ज्ञान, अन्न एवं धन प्राप्त कर मनु पुत्रों में सुशोभित होता हैं ॥५॥
हे अग्निदेव ! आप प्रकाशमान तेज से युक्त एवं शक्तिशाली हैं। अतएव अपनी उस शक्ति के द्वारा हमारे शत्रुओं का नाश करें । श्रेष्ठ वाणियों द्वारा की जा रही स्तुति को स्वीकार करें। आप कृपा करके, उस कार्य को पूर्ण करें, जिसके निमित्त आप नियुक्त किये गये हैं ॥६॥
हे अग्निदेव ! आपकी कृपा से हमारी कामनाएँ पूर्ण हों । ऐश्वर्यों के स्वामी हे अग्निदेव ! हम सुसंतति से युक्त एवं ऐश्वर्यवान् हों । हे अन्नदाता ! हमें अन्न प्रदान करें । हे अग्निदेव ! आप अजर हैं, अपने तेजस्वी अमर यश से हमें यशस्वी बनायें ॥७॥

सूक्त-६

सुरक्षा की कामना करने वाले याजक, यज्ञीय जीवनयापन करते हुए, स्तुति के योग्य एवं बल-पुत्र अग्निदेव के निकट जाते हैं। वे अग्निदेव, कृष्ण (धूम्रो मार्ग वाले, तेजस्वी, वनों को भस्म करने में समर्थ तथा दिव्य होता हैं ॥१॥
अग्निदेव, श्वेत (उज्ज्वल) वर्ण वाले, अनेक किरणों वाले तेजस्वी, प्रकाश फैलाने वाले तथा, चिरयुवा हैं। बहुत शब्द करते हुए वे पवित्र अग्निदेव बड़ी समिधाओं का भक्षण करते हुए गमन करते हैं ॥२॥
हे अग्निदेव ! आपकी ज्वालाएँ वायु से और अधिक प्रखर होकर काष्ठों को जलाती हैं। वे वनों को भी भस्म करने में समर्थ होती हैं । प्रज्वलित अग्नि शिखाएँ गति करती हुईं सर्वत्र व्याप्त होती हैं ॥३॥
हे अग्निदेव ! आपकी ज्वालाएँ छोड़े गये अश्वों जैसी सर्वत्र गति करती हुईं पृथ्वी पर क्रीड़ा करती हैं। वे वनों को भी जलाने में समर्थ हैं ॥४॥
बलशाली अग्निदेव की लपलपाती अग्नि शिखाएँ ऐसे प्रतीत होती हैं, जैसे कि इन्द्रदेव अपने वज्र को बार-बार उठा रहे हों। शूरवीर के द्वारा फेंके गये पाश के समान निर्वाध गति करती हुई अग्नि की ज्वालाएँ वनों को जला डालती हैं ॥५॥
हे अग्निदेव ! आप अपने प्रकाश की प्रेरक किरणों द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी को आच्छादित करें और हमसे (अर्थात् यज्ञकर्ता देव वृत्तिवालों से) द्वेष करने वाले शत्रुओं को अपनी शक्ति से नष्ट करें ॥६॥
हे अग्निदेव ! हम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। आप अद्भुत रूप वाले, यशदाता तथा अन्न को देने वाले हैं। आप हमें पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य प्रदान करें ॥७॥

सूक्त-७

सर्वोपरि द्युलोकवासी, भूलोक के स्वामी, वैश्वानर अग्निदेव सभी प्राणियों में स्थित हैं । वे ज्ञानी अतिथि तुल्य एवं पूज्य देवों के मुख रूप अग्निदेव, देवों द्वारा प्रकट किये गये हैं ॥१॥
यज्ञ के केन्द्रस्थल, धन के भण्डार, महान् आहुतियों से युक्त, समस्त विश्व के नेता, अहिंसक यज्ञ के संचालक, यज्ञ की पताकारूपी अग्नि को याज्ञिकों ने मन्थन द्वारा उत्पन्न किया। उसकी हम सभी वन्दना करते हैं ॥२॥
हे तेजस्वी वैश्वानर अग्निदेव ! आप हमें पर्याप्त धन दें । हे देव ! हविष्यान्न से यजन करने वाले को आप दिव्य ज्ञान देते हैं और योद्धा आपकी कृपा से ही प्राप्त सामर्थ्य द्वारा शत्रुओं को पराजित करते हैं ॥३॥
हे अमृतस्वरूप अग्निदेव ! समस्त देवमानव उत्पन्न होते हुए आपको, बालक के समान आदरणीय मानते हैं। हे विश्व के नायक ! जब द्युलोक और भूलोक के मध्य आप दीप्तिमान् हुए, तब यजमानों ने आपके द्वारा सम्पादित यज्ञ से देवत्व (अमरत्व) को प्राप्त किया ॥४॥
हे वैश्वानर (विश्व के नेता) अग्निदेव ! आपने जब पितरों (द्यावा-पृथिवी अथवा दो अरणियों) के मध्य जन्म लिया, तब यज्ञकर्म में प्रतिष्ठित होकर दिन के केतु (सूर्य अथवा ज्वालाओं) को प्राप्त किया। आपके इन महान् कर्मों में कोई बाधा नहीं डाल सकता ॥५॥
सर्वहितकारी अथवा प्रकाशक वैश्वानर के अमृत केतु से द्युलोक के शिखर प्रकाशित होते हैं। उसके मूर्धा भाग से ही शाखाओं की भाँति सप्त धाराएँ प्रवाहित होती हैं ॥६॥
श्रेष्ठ कर्मों के सम्पादक ये अग्निदेव समस्त भुवनों के निर्माता हैं । द्युलोक से भी परे नक्षत्रों को भी उन्होंने ही प्रकाशित किया है। समस्त भुवनों के विस्तारकर्ता, अजेय और अमृत के संरक्षक ये अग्निदेव ही हैं ॥७॥

सूक्त-८

दीप्तिमान् , तेजस्वी, सर्वव्यापी अग्निदेव की हम स्तुति करते हैं। याज्ञिक कृत्यों में अग्नि के लिए बोले जाने वाले ये पवित्र और सुन्दर स्तोत्र, सभी होताओं के हितकारक अग्निदेव के समीप उसी प्रकार जाते हैं, जैसे यज्ञ के समीप सोम पहुँचता है ॥१॥
वे सर्वव्यापी, जगत्-हितकारी, व्रत-पालक अग्निदेव दिव्य आकाश में प्रकाशित होकर दैवी और लौकिक दोनों प्रकार के सत्कर्मों (यज्ञ कर्मों) के रक्षक एवं पालक हैं । अन्तरिक्ष के पदार्थों को बनाने वाले ये देव ही हैं। वे अपनी महिमा से स्वर्ग का स्पर्श करते हैं ॥२॥
इन अद्भुत मित्ररूप वैश्वानरदेव ने द्युलोक एवं पृथ्वी को यथा स्थान स्थापित किया तथा अपने तेज से अन्धकार को नष्ट किया। उन्होंने पृथ्वी की त्वचा के रूप में अन्तरिक्ष को फैलाया। उन वैश्वानरदेव ने ही विश्व के समस्त बलों (अथवा वर्षण क्षमताओं ) को धारण कर रखा है ॥३॥
दूत के रूप में मातरिश्वा (वायु) दूरस्थ आदित्य मण्डल से वैश्वानर अग्निदेव को इस लोक में ले आयें ।महान् कर्मवाले मरुद्गणों ने उन्हें अन्तरिक्ष में जल के बीच धारण किया। विज्ञमनुष्यों ने उन श्रेष्ठ स्वामी की स्तुति की ॥४॥
हे अग्निदेव ! आप उन्हें यशस्वी सन्तान एवं धन-ऐश्वर्य प्रदान करें, जो यज्ञ करते समय नवीन स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। हे अजर (सदैव-प्रखर) तेजस्वी अग्निदेव ! आप हमारे शत्रु को उसी प्रकार नष्ट करें, जैसे वज्र वृक्ष को नष्ट कर देता हैं ॥५॥
हे अग्निदेव !आप हविष्यान्न एवं धन-ऐश्वर्य से समृद्ध जनों में कभी न झुकने वाला, चिर-युवा श्रेष्ठ बल, वीर्ययुक्त क्षात्रबल स्थापित करें । हे वैश्वानर अग्निदेव ! आपके संरक्षण में हम हजार गुना अधिक सामर्थ्य-ऐश्वर्य आदि प्राप्त करें ॥६॥
हे त्रिलोक में स्थित अग्निदेव ! आप अविनाशी हैं। हे वैश्वानर अग्निदेव ! आप स्तोताओं और याजकों की, अपने संरक्षक बल द्वारा रक्षा करें और कृपा कर हमारे दुःखों को दूर करें ॥७॥

सूक्त-९

कृष्ण वर्ण रात्रि एवं शुक्ल वर्ण दिवस अपने वर्षों से संसार को नियमित रूप से रंगते रहते हैं । हे वैश्वानर अग्निदेव ! आप तेजस्वी स्वामी के तुल्य प्रकट होकर अन्धकार को नष्ट करते हैं ॥१॥
हम सीधे अथवा तिरछे (तिर्यक) तन्तुओं (ताने-बाने) को नहीं जानते हैं। सतत प्रयत्नशीलों द्वारा बुने गए वस्त्रों के सम्बन्ध में भी अज्ञानी हैं । इस लोक में किसका पुत्र श्रेष्ठ होकर, अपने पिता से मिलकर इस अव्यक्त (विश्व एवं जीवन के ताने-बाने) के सम्बन्ध में सुनिश्चित ढंग से कह सकता है? ॥२॥
वे वैश्वानर अग्निदेव सीधा (ताना) और तिरछा (बाना) दोनों को जानते हैं । ऋतु के अनुसार कर्मों का उपदेश वहीं करते हैं। जो अग्निदेव अमरता के रक्षक होकर भूलोक में विचरण करते हैं, वे ही दूर आकाश में रहकर आदित्यरूप से सबके द्रष्टा हैं ॥३॥
ये वैश्वानर अग्निदेव ही प्रथम होता हैं । हे मनु पुत्रो ! इन्हें भली-भाँति जानो । वे अग्निदेव अविनाशी, स्थिर, सर्वत्र व्याप्त एवं शरीर से नित्य बढ़ने वाले हैं। वे ही मरणधर्मा प्राणियों के बीच अमर-ज्योति स्वरूप हैं ॥४॥
स्थिर रहते हुए भी मन की अपेक्षा तीव्रगामी वैश्वानर अग्निदेव, समस्त प्राणियों में आनन्ददायक मार्गों को दिखाने के निमित्त निवास करते हैं। समस्त देवगण, एक मन एवं समान प्रज्ञा वाले होकर, श्रेष्ठं कर्म करने वाले वैश्वानरदेव के सम्मुख आते हैं ॥५॥
हे वैश्वानर अग्निदेव ! हमारे कान आपके गुणों को सुनने के लिए एवं हमारे नेत्र आपके दिव्य दर्शन के निमित्त लालायित हैं । अन्तः स्थित ज्योति, बुद्धि आपके स्वरूप को जानने की कामना करती हैं। दूरस्थ ज्योति का विचार करने वाला यह मन इधर-उधर फिरता है । हम और अधिक क्या सोचें और क्या कहें ? ॥६॥
हे वैश्वानर अग्निदेव ! अन्धकार में (ज्योति की तरह) निवास करने वाले आपको समस्त देवगण प्रणाम करते हैं। अन्धकार से डरे हुए हम सबकी रक्षा ये अमर वैश्वानर अग्निदेव करें ॥७॥

सूक्त-१०

हे विज्ञजनो ! आप लोग इस यज्ञ को निर्दोष एवं निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिए स्तोत्रों का गान करते हुए कल्याणकारी अग्निदेव को अपने सम्मुख स्थापित करें । वे देदीप्यमान अग्निदेव हमारे यज्ञों को सफल बनाते हैं ॥१॥
अनेक देदीप्यमान ज्वालाओं वाले हे अग्निदेव ! आप देवगणों का आवाहन करने वाले हैं । हे अग्निदेव ! आप अन्य अग्नियों के सहित प्रज्वलित होकर, सुखकर, पवित्र एवं घी की भाँति बल बढ़ाने में समर्थ, परम श्रेष्ठ स्तोत्रको सुनें । इन स्तोत्रों का बुद्धिमान् स्तोताओं द्वारा आत्मीयतापूर्वक उच्चारण किया जाता है ॥२॥
अग्निदेव के निमित्त स्तोत्रगान सहित हवि अर्पित करने वाले मनुष्यों को अग्निदेव समृद्धि प्रदान करते हैं। वे अद्भुत रक्षा साधनों सहित गौओं (पोषक प्रवाहों अथवा इन्द्रियों ) के समूह हेतु सहायक बनते हैं ॥३॥
कृष्णमार्ग (धुएँ के साथ उत्पन्न होने वाले अग्निदेव प्रकट होकर दूर से दिखाई देने वाली कान्ति के द्वारा द्यावा-पृथिवी को आच्छादित करते हैं । वे अग्निदेव रात्रि के गहन अन्धकार को अपने प्रकाश से दूर करते दिखाई देते हैं ॥४॥
हे अग्निदेव ! हम हविष्यान्न सम्पदा वालों के लिए आप प्रचुर धन एवं संरक्षण प्रदान करें। अन्न, धन, यश एवं पराक्रमी पुत्र प्रदान करें, जो अन्य मनुष्यों से श्रेष्ठ हो ॥५॥
हे अग्निदेव ! हविष्यान्न आपको प्रिय है । आपके लिए याजक जो हविष्यान्न युक्त हवि अर्पित करते हैं, आप उसे ग्रहण करें । उन यजमानों पर कृपा करके उन्हें अनेकानेक अन्न प्रदान करें ॥६॥
हे अग्निदेव ! आप हमसे द्वेष करने वाले हमारे शत्रुओं को दूर करें । हमारे अन्न को बढ़ाये । हम उत्तम पराक्रमी पुत्र-पौत्रादि से युक्त होकर सौ हेमन्त तक आनन्द से रहें ॥७॥

सूक्त-११

हे देवगणों को बुलाने वाले तेजस्वी अग्निदेव ! आप हमारे द्वारा पूजित होकर मरुद्गणों को संगठित करें तथा मित्र, वरुण, ऋतदेवों, अश्विनीकुमारों तथा द्यावा-पृथिवी को हमारे यज्ञ में आहूत करें ॥१॥
हे अग्निदेव ! आप पूजनीय हैं, हम मनुष्यों के प्रति द्रोहरहित हैं। आप आहुतियों को ले जाने वाले एवं आनन्ददाता हैं। देवगणों के मुखरूपी हे अग्निदेव ! आप हविग्रहण करके अपने शरीर का भी पोषण करें ॥२॥
हे अग्निदेव ! धन की इच्छुक बुद्धि आपकी भक्ति करती है । इन्द्रादि देवों की प्रसन्नता के लिए किए जाने वाले यज्ञ आपके प्रसन्न (प्रज्वलित) होने पर ही सफल होते हैं। अङ्गिरा ऋषि, सर्वोत्तम प्रेकार से आपकी स्तुति करते हैं एवं विद्वान् भारद्वाज मधुर छन्दों का गान करते है ॥३॥
बुद्धिमान् और आभायुक्त अग्निदेव अति विशिष्ट प्रकार से शोभायुक्त हो रहे हैं। आप विस्तृत द्युलोक एवं भूलोक का आहुतियों द्वारा पोषण करते हैं । पाँचों वर्ण के लोग अतिथि जैसे सत्कार सहित, श्रेष्ठ हवि ग्रहण करने वाले अग्निदेव को हविष्यान्न द्वारा तृप्त करें ॥४॥
जब पृथ्वी पर यज्ञशाला में यज्ञवेदी की रचना करके श्रेष्ठ निर्दोष घृत से युक्त सुचा आदि साधन तैयार किये जाते हैं, तब अन्न की आहुतियाँ प्रदान की जाती हैं। जैसे सूर्य से नेत्र आश्रय पाते हैं (सूर्य प्रकाश में देखते हैं) जैसे ही याजक द्वारा किये गये यजन से यज्ञदेव वृद्धि प्राप्त करते हैं ॥५॥
अनेकानेक अग्नि शिखाओं वाले एवं देवताओं का आवाहन करने वाले हे. अग्निदेव ! आप विविधं दिव्य अग्नियों सहित प्रसन्न होकर हमें धन प्रदान करें । हे बल उत्पादक अग्निदेव ! आप हम हवि प्रदानकर्ताओं को शत्रुवत् पाप से भी बचाएँ ॥६॥

सूक्त-१२

देवताओं के आवाहनकर्ता एवं यज्ञपालक अग्निदेव द्यावा-पृथिवी को पुष्ट करने के लिए याजक के घर में प्रतिष्ठित होते हैं । वे बलोत्पादक यज्ञकर्ता अग्निदेव अपने तेज से सम्पूर्ण जगत को उसी तरह प्रकाशित करते हैं जिस तरह सूर्यदेव दूर से ही सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करते हैं ॥१॥
हे तेजस्वी पूज्य यज्ञशील अग्निदेव ! आप मनुष्यों द्वारा दिये गये हव्य पदार्थों को तीनों लोकों में तारक सूर्यदेव की तरह व्याप्त होकर देवताओं तक पहुँचाते हैं । (अतएव) हम सभी योजक श्रद्धा सहित हवि अर्पित करते हैं ॥३॥
वे अग्निदेवे दीप्ति के बढ़ने से सूर्यदेव के समान ही अपने मार्ग को प्रकाशित करते हैं। जो सर्वव्यापी अति-दीप्त ज्वालाओं के द्वारा वन में प्रज्वलित होते हैं, वे अमर, द्रोह रहित, न रोके जा सकें, ऐसे अग्निदेव सभी 'का कल्याण करते हुए समस्त जगत् को प्रकाशित करें ॥३॥
ये ज्ञानी अग्निदेव यज्ञकर्ताओं के द्वारा गाये गये गायन (स्तोत्र) से जिस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार हमारे द्वारा गाये जा रहे उत्तम स्तोत्रों से प्रसन्न होते हैं । बल में वृषभ के समान गति में अश्व के समान तथा वृक्षों को भस्म करने वाले अग्निदेव की यजनकर्ता मनुष्य स्तुति करते हैं ॥४॥
जब अग्निदेव सहज ही जङ्गलों को जलाकर पृथ्वी पर विचरते हैं, पृथ्वी पर प्रकाशित होने वाले अति वेग से व बिना प्रतिबन्ध के भ्रमण करते हैं, तब उन अग्निदेव की आभा की स्तुति इस लोक के स्तोता मनुष्य करते हैं ॥५॥
हे शत्रुनाशक अग्निदेव ! आप अपनी विविध अग्नियों सहित प्रकट होते हैं। आप निन्दाओं से हमारी रक्षा करें तथा हमें सम्पत्ति प्रदान करें। हम श्रेष्ठ योद्धा पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न होकर शत्रुओं की सेना का नाश कर, सौ हेमन्त ऋतुओं तक आनन्द सहित जीवन यापन करें ॥६॥

सूक्त-१३

हे श्रेष्ठ भाग्यवान् अग्निदेव ! आप समस्त ऐश्वर्यों के उत्पादक हैं । जैसे वृक्ष से विभिन्न शाखाएँ उत्पन्न होती है, वैसे ही शत्रु को जीतने वाला बल, धन एवं पर्जन्य की वर्षा आप से उत्पन्न होती है । आकाश से वर्षा के लिए पानी लाने वाले आप स्तुति करने योग्य हैं ॥१॥
हे भाग्यवान् अग्निदेव ! आप हमें सुन्दर धन प्रदान करें। आप वायु के समान सर्वव्यापी और मित्र के समान सन्मार्ग पर ले जाने वाले हैं। हे तेजस्वी ! आप हमें ऐश्वर्य प्रदान करें ॥२॥
श्रेष्ठ ज्ञान सम्पन्न, सत्पुरुषों के पालक हे अग्ने ! आप जिस ऋतजात (यज्ञ से उत्पन्न) ऐश्वर्य को जल न गिरने देने वाले मेघों से संयुक्त होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं, वहीं पणि (वर्षा में बाधक असुर तत्व) को नष्ट करता है ॥३॥
हे बल के के पुत्र, तेजस्वी अग्निदेव ! जो यज्ञ क्रिया एवं स्तुतियों द्वारा आप (यज्ञ भगवान्) की उपासना करते हुए आपके तेज (दर्शन एवं विज्ञान) को धारण करता है, वह अन्न, धन तथा ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ॥४॥
हे बल के पुत्र अग्निदेव ! आपने जो पशु और अन्न क्रूर, द्वेषकर्ता शत्रुओं (यज्ञ के विरोधी) को प्रदान किया हैं । हे अग्निदेव ! वह सब हम श्रेष्ठ शौर्यवानों के निमित्त प्रदान करें ॥५॥
हे बल के पुत्र एवं ज्ञानी अग्निदेव ! आप हमें हितकारी उपदेश करें । हमारी उत्तम कामनाओं की पूर्ति होती रहे । हम धन, अन्न, तथा ऐश्वर्य युक्त पुत्र-पौत्रादि सहित सौ हेमन्त पर्यन्त जीवनयापन करें ॥६॥

सूक्त-१४

जो मनुष्य स्तुति सहित यज्ञ करता है एवं सद्बुद्धि प्रेरित कर्म करता है, वह अग्रणी-यशस्वी होता है और सुरक्षा के निमित्त पर्याप्त धन-धान्य प्राप्त करता है ॥१॥
अग्निदेव ही श्रेष्ठ ज्ञानी एवं सत्कर्म प्रेरक सर्वद्रष्टा हैं । मनुष्य पुत्रादि सहित यज्ञ में इन्हीं की स्तुति करते हैं॥२॥
हे अग्निदेव ! जो आपका यजन करता है, वह यज्ञ न करने वालों को पराजित करता है एवं शत्रुओं का धन, ऐश्वर्य उनसे पृथक् होकर (याजको स्तुतिकर्ता को प्राप्त होता हैं ॥३॥
अग्निदेव स्तुति करने वाले स्तोताओं के लिए सन्मार्गगामी, सत्कर्म रक्षक (यज्ञ की रक्षा करने वाले), शत्रुजयी, श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करते हैं, जिससे शत्रु भी भयभीत रहते हैं ॥४॥
अग्निदेव ही अपने तेजस्वी ज्ञान, बल के द्वारा निन्दा से याजक की रक्षा करते हैं एवं युद्धकाल में धन को सुरक्षित करते हैं ॥५॥
हे मित्र के समान रक्षा करने वाले, तेजस्वी, गुण-सम्पन्न अग्निदेव ! आप द्यावा-पृथिवी में संव्याप्त होकर स्तोताओं द्वारा की जाने वाली स्तुति को देवगणों तक पहुँचाते हैं। आप ही अपने रक्षा साधनों से, पापों से, कष्टों से एवं शत्रुओं से हमारी रक्षा करते हैं। हमें उत्तम आवासादि प्रदान करें ॥६॥

सूक्त-१५

जो अग्निदेव अतिथि जैसे पूज्य, प्रजापालक स्वभावतः पवित्र एवं उषाकाल में प्रज्वलित होने वाले हैं, वे-द्युलोक से उत्पन्न होकर द्यावा-पृथिवी के मध्य विचरते हुए निवेदित हवि को ग्रहण करते हैं। हे विज्ञज़न ! ऐसे अग्निदेव की स्तुति कर आप उन्हें प्रसन्न करें ॥१॥
हे अरणियों में व्याप्त, स्तुति योग्य, मित्रवत् अग्निदेव ! आपको भृगु आदि ऋषियों ने भी स्थापित किया है । हे अद्भुत अग्निदेव ! आप ऊर्ध्वगामी ज्वालाओं वाले हैं । विज्ञजन प्रतिदिन उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते हैं । हे अग्निदेव ! आप कृपा करने वाले हैं ॥२॥
हे अग्निदेव ! आप दयालु होकर चतुर मनुष्यों की सुरक्षा करते हैं। हे अग्निदेव ! आप महान् हैं । हे बल पुत्र ! आप भारद्वाज वंशीय को धन, अन्न एवं निवास प्रदान करें ॥३॥
हे विज्ञजनो ! आप देदीप्यमान, दिव्य-गुणयुक्त, हविवाहक, अतिथि के समान पूज्य, मनुष्य यज्ञ में देवगणों को बुलाने वाले, स्वर्ग तक पहुँचाने वाले, उत्तम यज्ञ करने वाले, विद्वानों जैसे कान्तिवान् अग्निदेव को श्रेष्ठ स्तुतियों द्वारा प्रसन्न करें ॥४॥
उषा के प्रकाश की आँति अग्निदेव पृथिवीं को पवित्रता एवं चेतना से युक्त करते हुए अपनी तेजस्विता से शोभायमान होते हैं । हे वीतहव्य ! आप उन अग्निदेव की अर्चना करें जो ऐतश ऋषि के रक्षार्थ रणभूमि में शीघ्र चैतन्य होने वाले, सर्वभक्षी तथा अजर हैं ॥५॥
हे स्तोताओ ! आप अतिथि के समान पूज्य एवं अत्यन्त प्रिय अग्निदेव की समिधाओं द्वारा सेवा करें । वे अमर अग्निदेव, देवों में वरणीय सम्पत्ति धारण करते हैं और हमारी अर्चना स्वीकार करते हैं । अस्तु उन अविनाशी अग्निदेव की सेवा वाणी (स्तोत्रों द्वारा करें ॥६॥
समिधाओं द्वारा प्रकट अग्निदेव की हम वाणी (स्तुतियों) से अर्चना करते हैं । शुद्ध स्थिर और पावन बनाने वाले अग्निदेव को यज्ञ में अग्निम स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं । (विप्र) विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न तथा विदाता सभी द्वारा धारण करने योग्य, द्रोह मुक्त, ज्ञानवान् और सर्वज्ञाता अग्निदेव की ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए हम स्तुति करते हैं ॥७॥
हे अग्निदेव ! अमर देवता और मनुष्य प्रत्येक शुभ यज्ञ में, हविदाता, रक्षक और स्तुति योग्य आपको दूतरूप में नियुक्त करते हैं तथा जागृति प्रधान, विस्तारशील और प्रजाजनों की रक्षा में सहायक मानकर मनुष्यगण आप को प्रणाम करते हुए उपासना करते हैं ॥८॥
देव एवं मनुष्य दोनों को महिमा-मण्डित करते हुए अनुशासन प्रिय व्रतशील देवों के दूत बनकर दिव्यलोक एवं इस लोक में हवि ले जाने वाले हे अग्निदेव ! हम आपकी स्तुतियाँ करते हैं। तीनों स्थानों (पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक) में विचरणशील आप हमें सुख प्रदान करें ॥९॥
मनोहर रूप वाले, गमनशील, सर्वज्ञ एवं शोभनाङ्ग अग्निदेव का हम अल्पज्ञ मानव यजन करें । वे सर्वकर्म ज्ञाता हमारी हवियों का वर्णन देवताओं से करें एवं देवगणों के निमित्त यज्ञ सम्पन्न करें ॥१०॥
हे शौर्यवान् अग्निदेव ! जो बुद्धिमान मनुष्य आपके निमित्त कर्म करते हैं, आप उनकी रक्षा करते हुए उनकी श्रेष्ठ कामनाओं की पूर्ति करें । जो याजक संस्कारवान् रहकर प्रगति करते हुए यज्ञ करते हैं, उन्हें आप प्रचुर बल प्रदान करें ॥११॥
हे पराक्रमी अग्निदेव ! आप हमारी शत्रुओं एवं पापों से रक्षा करें, हमारे द्वारा अर्पित हवि को ग्रहण करें एवं स्तुति करने वालों को स्पृहा करने योग्य सहस्र प्रकार का ऐश्वर्य प्रदान करें ॥१२॥
तेजस्वी, सर्वज्ञ, देवगणों का आवाहन करने वाले, सब प्राणियों के ज्ञाता अग्निदेव हमारे घरों के स्वामी हैं। जो अग्निदेव मनुष्यों और देवताओं में श्रेष्ठ याजक हैं, वे सत्यवान् अग्निदेव सविधि यज्ञ करें ॥१३॥
हे पावन ज्वालाओं वाले यज्ञकर्ता अग्निदेव ! आप देवताओं के निमित्त यज्ञ करने वाले हैं। आप इस यज्ञ में देवताओं का यज्ञ करें एवं इस समय याजक जिस इच्छा से यज्ञ करता है उसकी इच्छा पूर्ण करें। हे चिरयुवा अग्निदेव ! आप स्वयं की महानता के कारण ही मह्मन् हैं । आप हमारी हवियों को ग्रहण करें ॥१४॥
है अग्निदेव ! याजक ने द्यावा-पृथिवी के निमित्त यज्ञ करने के लिए आपको प्रतिष्ठित किया है । आप वेदी पर अच्छी तरह से रखे गये हवि को देखें । हे अग्निदेव ! संग्राम में आप हमारी रक्षा करें ताकि समस्त दु:खों से हम बच जायें ॥१५॥
ये अग्निदेव समस्त देवगणों में अग्रणी हैं । है सुन्दर ज्वालाओं वाले अग्निदेव ! आप ऊन के आसन एवं घृतयुक्त यज्ञ वेदी पर विराजमान होकर हवि देने वाले यजमान के यज्ञ को उत्तम प्रकार से देवताओं तक पहुँचाएँ ॥१६॥
कर्म (यज्ञ) कर्ता, ज्ञान, ऋत्विग्गण अथर्वा अषि के जैसा मंथन करके अग्नि को उत्पन्न करते हैं । इधर-उधर भ्रमणशील ज्ञानी अग्निदेव को उस अंधेरे स्थान से लाकर, यहाँ (यज्ञवेदी) पर स्थापित करते हैं ॥१७॥
हे अग्निदेव ! आप अरणिर्मथन द्वारा प्रकट होकर देवताओं की कामना वाले यजमान के कल्याण को सुस्थिर करें । आप यज्ञवर्धक अमर देवगणों का यज्ञ में आवाहन करें और हमारे यज्ञ को देवताओं तक पहुँचाएँ ॥१८॥
हे यज्ञरक्षक अग्निदेव ! हम समिधाओं द्वारा प्राणियों के मध्य आपको प्रदीप्त करते हैं । गार्हपत्य अग्निदेव हमें पुत्र, पशु और अनेक ऐश्वर्य प्रदान करें। आप हमें तेजस्विता प्रदान करें ॥१९॥


सूक्त-१६

हे अग्निदेव ! आप होता और देवगणों के आवाहनकर्ता हैं । आप मनुष्यों के यज्ञ में देवताओं द्वारा होता निर्धारित किये गये हैं ॥१॥
हे अग्निदेव ! आप अपनी महान् ज्वालाओं सहित इस यज्ञ में देवगणों की स्तुति करें एवं इन्द्रादि देवताओं का आवाहन करके उन्हें हवि प्रदान करें ॥२॥
हे नियन्ता, श्रेष्ठकर्मा अग्निदेव ! आप यज्ञ के निकटस्थ एवं दूरस्थ (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष) सभी मार्गों के ज्ञाता हैं। आप याजकों को उचित मार्गदर्शन करें ॥३॥
हे तेजरूप अग्निदेव ! भरत अनेक ऋत्विजों के साथ मिलकर लौकिक एवं अलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त करने के लिए आपकी स्तुति करते हैं। हे यजनीय ! आपके द्वारा ही अनिष्टों का शमन एवं इच्छाओं की पूर्ति होती है। हम आपकी स्तुति और यज्ञ करते हैं ॥४॥
हे अग्निदेव ! आपने सोम सिद्धकर्ता 'दिवोदास' को बहुत सा ऐश्वर्य प्रदान किया था, उसी प्रकार 'भरद्वाज (हवि देने वाले को भी धन-ऐश्वर्य प्रदान करें ॥५॥
हे अग्निदेव ! आप अमर हैं, आप दूत हैं ; ( अतः) विद्वान् भरद्वाज द्वारा की जा रही स्तुति को सुनने के लिए देवगणों का हमारे यज्ञ में आवाहन करें ॥६॥
वल अर्थात् घर्षण से प्रकट होने वाले सौन्दर्यवान् हे अग्निदेव ! हम याजकगण धन-धान्य एवं आपका सान्निध्य प्राप्त करने की कामना से वन्दना करते हैं ॥७॥
स्वर्ण सदृश जाज्वल्यमान हे अग्निदेव ! छाया में मिलने वाली शीतलता की तरह हम आपके संरक्षण में रहकर सुख प्राप्त करें ॥८॥
बैल के सींग की भाँति तेजस्वी ज्वालाओं वाले, वीर धनुर्धर के समान पराक्रमी हे अग्निदेव ! आपने दुष्टों के आश्रय-स्थलों को नष्ट किया है ॥९॥
हे अग्निदेव ! हे प्रकाशक एवं सर्वव्यापक देव ! हवि को गति देने (वीति के लिए आप पधारें। सब आपकी स्तुति करते हैं । यज्ञ में हम आपका आवाहन करते हैं, क्योंकि आप सब पदार्थों को प्रदान करने वाले हैं ॥१०॥
हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! हम आपको समिधाओं तथा घृत द्वारा प्रदीप्त करते हैं। अतः हे सामर्थ्यवान् ! आप अधिक प्रखर हों ॥११॥
हे अग्निदेव ! आप ऐसी कृपा करें कि हम महान् पराक्रम और श्रेष्ठ यशस्वी सामर्थ्य प्राप्त हो ॥१२॥
परम श्रेष्ठ, अखिल विश्व के धारणकर्ता हे अग्निदेव ! अथर्वा (विज्ञानवेत्ता अथवा प्रधान पुरोहित) ने आपको विश्व के महानतम आधार के रूप में अरणि मन्थन द्वारा प्रकट किया ॥१३॥
हे अग्निदेव ! 'अथर्वा' के पुत्र ‘दध्यङ्' ऋषि ने आपको प्रथम प्रदीप्त किया। आप शत्रुसंहारक एवं उनके नगरों को नष्ट करने वाले हैं ॥१४॥
हे अग्निदेव !"पाथ्य वृषा" (इस नाम के अंष अथवा सन्मार्गगामी बलवान्) ने आपको प्रदीप्त किया । आप असुर संहारक तथा युद्ध में जीतने वाले हैं ॥१५॥
हम आपके लिए ही स्तुति करते हैं। आप इन्हें सुनकर प्रकट हों और इस सोमरस से अपनी महानता का विस्तार करें ॥१६॥
हे अग्निदेव ! आप जिस क्षेत्र एवं याजक से प्रसन्न होते हैं, वहाँ अधिकाधिक बल धारण कराते हैं और वहीं आवास भी बनाते हैं ॥१७॥
हे अग्निदेव ! आपका तेज़ चक्षुओं के लिए हानिकारक नहीं है । हे व्रतपालक मानवो के स्वामी ! आप हमारी प्रार्थना स्वीकार करें ॥१८॥
वे अग्निदेव आहुतियों के अधिपति और वे ही दिवोदास के शत्रुओं के संहारक हैं । हे याजको ! वे अग्निदेव रक्षक एवं सर्वज्ञ हैं । हम स्तुतियों द्वारा अग्निदेव का आवाहन करते हैं ॥१९॥
जो अग्निदेव अपराजित, शत्रुनाशक और अहिंसित हैं। वे अग्निदेव ही अपनी सामर्थ्य से हमें पृथ्वी पर श्रेष्ठ धन-ऐश्वर्य प्रदान करते हैं ॥२०॥
हे अग्निदेव ! आप इस विस्तार वाले अन्तरिक्ष को अपने संयमित एवं नवीन तेज से वैसे ही प्रकाशित कर रहे हैं, जैसे कि पहले प्रकाशित करते थे ॥२१॥
हे ऋत्विजो ! आप ईश्वर के समान शक्तिमान् और शत्रुविनाशक अग्निदेव को आहुतियों एवं उत्तम स्तुतियों द्वारा प्रसन्न करें ॥२२॥
जो अग्निदेव मेधावी, हविवाहक एवं यज्ञकर्म में देवदूत और देवों का आवाहन करते हैं, वे अग्निदेव हमारे इस यज्ञ में कुशाओं पर प्रतिष्ठित हों ॥२३॥
हे अग्निदेव ! आप इस यज्ञ में आएँ और प्रसिद्ध, शुभकर्म करने वाले मित्रावरुण, मरुत् एवं द्यावा-पृथिवी के लिए यजन करें। आप श्रेष्ठ निवास प्रदान करते हैं ॥२४॥
हे अग्निदेव ! आप अमर एवं बलशाली हैं। आप की सतेज दृष्टि (कृपा) अन्न की इच्छा वाले याजकों को अन्न-धन प्रदान कराती है ॥२५॥
हे अग्निदेव ! आज याजक आपकी सेवा (यज्ञ) करने वाले एवं श्रेष्ठकर्म करने वाले बनें वे सदैव ही उत्तम सम्भाषण करें ॥२६॥
हे अग्निदेव ! आपकी स्तुति करने वाले आपकी सुरक्षा में रहकर, शत्रुओं की सेना को जीतकर, शत्रुओं का नाश करते हैं एवं पूर्ण आयु तक अन्नादि सहित सुखों से पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं ॥२७॥
हे अग्निदेव ! आप अपनी प्रज्वलित, तीक्ष्ण ज्वालाओं से विघ्नकारक तत्त्वों (शत्रुओं) को नष्ट करें और जो आपकी उपासना तथा स्तुति करते हैं, उनको बल एवं ऐश्वर्य प्रदान करें ॥२८॥
हे सर्वज्ञाता अग्निदेवे ! आप दुष्टों का संहारकर , हमें श्रेष्ठ सन्तानयुक्त ऐश्वर्य प्रदान करें ॥२९॥
हे ज्ञानी अग्निदेव ! आप ज्ञान के द्रष्टा हैं । आप पाप और पापी शत्रुओं से हमारी रक्षा करें ॥३०॥
हे अग्निदेव ! आप हमें उस मनुष्य से बचाएँ, जो दुर्भावनापूर्वक हमें मारने के लिए प्रयत्न करता है । पापों से भी हमारी रक्षा करें ॥३१॥
हे अग्निदेव !आप अपनी तेजस्विता बढ़ाकर उनका संहार करें, जो दुष्ट हमें मारने का अभिप्राय रखते हैं ॥३२॥
हे अग्निदेव !आप तेजस्वी हैं, आप भरद्वाज को सबै प्रकार का यशस्वी निवास प्रदान करें तथा श्रेष्ठ धन दें ॥३३॥
सत्प्रयासों से प्रसन्न होकर याजकों को प्रसन्नता प्रदान करने वाले हे प्रदीप्त अग्निदेव ! हमें बन्धन में रखने वाली दुष्ट वृत्तियों का विनाश करें ॥३४॥
पृथ्वी माता के गर्भ में विशेष रूप से देदीप्यमान एवं अन्तरिक्ष में संरक्षक की भूमिका में नियुक्त अग्निदेव यज्ञवेदी पर विराजमान हैं ॥३५॥
सब जानने वाले दिव्य-द्रष्टा, हे अग्निदेव ! अन्तरिक्षलोक में देवों को प्राप्त सुख, ऐश्वर्य एवं सन्तान आदि से हमें भी सम्पन्न करें ॥३६॥
हे बल-पुत्र अग्निदेव !आप रमणीय दिखाई देते हैं। हम हविष्यान्न अर्पित करते हुए आपकी स्तुति करते हैं ॥३७॥
हे अग्निदेव ! आप स्वर्णमयी आभा वाले हैं। आपके सामीप्य से हमें वैसा ही सुख मिलता है, जैसा कि थके हुए प्राणियों को छाया में मिलता है ॥३८॥
हे अग्निदेव ! आप महान योद्धा के बाणों एवं बैल के तीक्ष्ण सींगों के समान शत्रुओं का संहार करते हैं। हे देव ! आपने ही असुरों के तीन नगरों को नष्ट किया है ॥३९॥
(अरणि मन्थन से उत्पन्न) अग्नि को अध्वर्युगण नवजात शिशु की तरह (प्रेमभाव से) हाथ में धारण करते हैं । हे ऋत्विजो ! आप हिंसक पशु की भाँति सावधानी से अग्नि की परिचर्या करें ॥४०॥
हे अध्वर्यो ! आप देवगणों के निमित्त, इन तेजस्वी एवं ऐश्वर्यवान् अग्निदेव को यज्ञवेदी पर स्थापित करते हुए हव्य अर्पित करें ॥४१॥
हे अध्वर्यो ! आप अतिथि जैसे पूज्य, गृहपति अग्निदेव को यज्ञवेदी पर स्थापित कर, ज्ञानी, सुखकर अग्निदेव को उत्तम हवि अर्पित करें ॥४२॥
हे ज्योतिर्मान् अग्निदेव ! आप उन समस्त श्रेष्ठ एवं कुशल अश्वों (ऊर्जा धाराओं) को नियोजित करें, जो आपको यज्ञ हेतु वहन करते हैं ॥४३॥
हे अग्निदेव ! हवि ग्रहण करने और सोमपान करने के निमित्त आप हमारी ओर उन्मुख हों और देवों को भी प्रकट करें ॥४४॥
संसार का भरण-पोषण करने वाले हे अग्निदेव ! आप प्रज्वलित होकर उन्नत हों, कभी क्षीण न होने वाले अपने तेज से प्रकाशित हों और जगत् में प्रकाश फैलाएँ ॥४५॥
हव्य पदार्थ से युक्त इन अग्निदेव को हवि अर्पित कर इष्ट (किसी भी) देव का यजन करते हैं, जो अग्निदेव सत्य रूप हवि से यजन करने योग्य , द्युलोक एवं भूलोक के देवगणों का आवाहन करने वाले हैं, याजक उन अग्निदेव की हाथ उठाकर नमस्कारपूर्वक सेवा करें ॥४६॥
हे अग्निदेव ! हम मन्त्रों सहित संस्कारित हवि को आपके निमित्त हृदय से अर्पित करते हैं । यह (हवि) समर्थ बैल, गौ के रूप में प्राप्त हो ॥४७॥
जो अग्निदेव, यज्ञ में बाधक राक्षसों को मारने वाले, दुष्टों के धन का हरण करने वाले हैं, उन वृत्रासुर संहारक अनिदेव को मेधावीजन प्रदीप्त करें ॥४८॥

सूक्त-१७

हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आपने पराक्रम द्वारा शत्रुओं का संहार किया । हे वज्रिन् ! आपने चोरी गई मौओं को खोज लिया। अंगिरा ने आपकी स्तुति की एवं सोम प्रेषित किया । हे इन्द्रदेव ! आप सोमपान करें ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप पहाड़ों को तोड़ने वाले तथा अश्वों के संयोजक हैं । आप शत्रुओं से रक्षा करने वाले हैं। हे सोमपान करने वाले देव ! आप सोमपान करें एवं स्तुति करने वालों को श्रेष्ठ धन प्रदान करें ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप स्तुति सुनकर हमारी वृद्धि करें आपने जैसे पहले सोमपान किया था, वैसे ही सोमरस का पान करें। यह आपको पुष्ट करे । आप सूर्यदेव को प्रकट करके हमें अन्न प्रदान करें । पणियों द्वारा चुराई गई गौओं को खोजें एवं शत्रुओं का नाश करें ॥३॥
है इन्द्रदेव ! आप तेजस्वी एवं अन्न से युक्त हैं; सोमरस पान कर आप आनन्दित हों। आप अत्यन्त गुणवान् एवं महान् हैं। आप हमारे शत्रुओं का नाश करें ॥४॥
सोमरस से तृप्त हुए हे इन्द्रदेव ! आपने सूर्य और उषा के द्वारा अन्धकार का नाश किया। आपने अति स्थिर रक्षक गिरि को तोड़कर पणियों द्वारा चुराई गई गौएँ पायीं ॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आपने बुद्धि-कौशल, कर्म-कौशल एवं पराक्रम से गौओं को निकलने के लिए मार्ग बनाया है। आपने ही उन्हें दुग्धवती बनाया। अंगिराओं के सहयोग से आपने ही गौओं को छुड़ाया ॥६॥
हे इन्द्रदेव !आप महान् हैं ।आपने कर्म करके पृथ्वी के विस्तृत क्षेत्र को और विस्तृत किया । आपने दिव्यलोक को गिरने से बचाने के लिए स्तब्ध किया।देवता जिनके पुत्र हैं, उन द्यावा-पृथिवी को आपने धारण किया ॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आपने मरुद्गणों की युद्ध के समय सहायता की थी । वृत्रासुर से जब युद्ध हुआ था, तब आप ही देवगणों में नायक थे। आप महान् पराक्रमी हैं ॥८॥
जब इन्द्रदेव ने सब शक्तियों से सम्पन्न होकर, वृत्रासुर को सोई अवस्था में ही पूर्णत: नष्ट कर दिया, तब इन्द्रदेव के क्रोध, वज्रयुक्त पराक्रम को देखकर द्युलोक भी भय से स्तब्ध रह गया ॥९॥
हे सोमपायी पराक्रमी इन्द्रदेव ! त्वष्टादेव द्वारा निर्मित शत सन्धि एवं सहस्रधारयुक्त वज्र से ही आपने वृत्रासुर का संहार किया ॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी वृद्धि के लिए, मरुद्गण श्रेष्ठ स्तुति करते हैं। पूषादेव आपके लिए बलवर्धक अन्न पकाते हैं एवं विष्णुदेव तीन पात्रों में वृत्रासुर के मारने की शक्ति बढ़ाने वाला सोमरस भरते हैं ॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आपने उन नदियों के जल को प्रवाहित किया, जिनको वृत्रासुर अवरुद्ध किये था । समुद्र की ओर जाकर मिलने वाली नदियों के वेगवान् जल की तरङ्गों को स्वतन्त्र किया ॥१२॥
है इन्द्रदेव ! आप चिर युवा, बलशाली, ऐश्वर्यवान् , ओजस्वी, श्रेष्ठ कर्म के सम्पादक एवं वज्रधारी हैं । हमारे नवीन स्तोत्र से प्रसन्न होकर प्रवर्धमान हों और हमारी रक्षा करें ॥१३॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे निमित्त अन्न, बल एवं धन को धारण करें, ताकि हमें अन्न, बल एवं धन प्राप्त हो । हमें सेवकों से युक्त करें । हम ज्ञानी हैं; हमें भविष्य में भी पुत्र-पौत्रादि सहित सुख-सम्पन्न बनायें ॥१४॥
हे इन्द्रदेव ! आप हम स्तोताओं को अन्नादि से युक्त करें । हम वीर पुत्र-पौत्रों से युक्त होकर शतायु हों तथा सुखमय जीवनयापन करें ॥१५॥

सूक्त-१८

हे भरद्वाज ! आप शत्रुनाशक, तेजस्वी एवं आहूत इन्द्रदेव की श्रेष्ठ स्तुति करें । आप उन इन्द्रदेव को बढ़ायें, जो स्तुति से प्रसन्न होकर मनुष्यों की इच्छा को पूर्ण करते हैं ॥१॥
बलशाली, दानी, सोमरस पान करने वाले, सहयोगी एवं सदैव युद्ध कर्म करने वाले इन्द्रदेव मनुष्यों की रक्षा करते हैं ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप याजकों को पुत्र एवं सेवक प्रदान करते हैं। जो यज्ञ नहीं करते उन्हें जीत लें । हे इन्द्रदेव ! अपने बल का परिचय देने के लिए कभी-कभी अपना पराक्रम प्रकट करें ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप पराक्रमी, ओजस्वी, बली, अजेय तथा शत्रुहन्ता हैं । आप अनेक यज्ञों में उपस्थित हुए हैं। आप हमारे शत्रुओं का संहार करें ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपने स्तुतिकर्ता अंगिराओं के शत्रु 'वल' नामक असुर का संहार किया और नगरों के द्वारों को खोल दिया था । हे इन्द्रदेव ! हमारा सखा भाव सुदृढ़ बने ॥५॥
स्तुति करने वालों ने, सामर्थ्य बढ़ाने वाले इन्द्रदेव की स्तुति द्वारा आवाहन किया। उनका आवाहन पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है, वे वज्रधारी इन्द्रदेव रणभूमि में नमस्कार के योग्य हैं ॥६॥
वे इन्द्रदेव शत्रुओं को बल से झुकाने वाले, यश, धन, बले और वीर्य में सर्वश्रेष्ठ हैं । वे मनुष्यों में श्रेष्ठ और सर्वोत्तम पद तथा स्थान को प्राप्त करें ॥७॥
जो व्यर्थ की वस्तुओं को पैदा नहीं करते, वे सुमन्त नाम वाले वीर इन्द्रदेव युद्ध क्षेत्र में कुशल योद्धा के रूप में प्रसिद्ध हैं । वे इन्द्रदेव, उन राक्षसों का संहार करने को सदैव तत्पर रह कर क्रियाशील होते हैं, जो राक्षस सर्वभक्षी, सबके धन का हरण करने वाले, जल को रोकने वाले तथा शोषण करने वाले हैं ॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप ऊर्ध्वगति वाले हैं। रक्षक एवं शत्रुओं का संहार करने वाले हैं। आप शत्रु के संहार के लिए प्रशंसनीय बलयुक्त अपने रथ पर आरूढ़ होते हैं ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं का वैसे हीं संहार करें, जैसे कि अग्नि शुष्क वनों को भस्म करती है । गर्जन करने वाले, दुष्टों को छिन्न-भिन्न करने वाले, हे इन्द्रदेव ! आप वज्र से, बिजली की तरह राक्षसों को जलायें (नष्ट करें) ॥१०॥
है इन्द्रदेव आपको असुर बलहीन नहीं कर सकते हैं। आपका, अनेकों द्वारा आवाहन किया जाता है। आप सहस्रों प्रकार के मार्गों से ऐश्वर्ययुक्त होकर हमारे समक्ष आएँ ॥११॥
इन्द्रदेव की महिमा द्युलोक और भूलोक से भी बड़ी है । वे इन्द्रदेव अति तेजोमय,धनवान्, श्रेष्ठ एवं शत्रु का नाश करने वाले हैं। प्रज्ञावान् एवं शान्ति, सुखदायक, पराक्रमी इन्द्रदेव का कोई शत्रु नहीं है । इनकी बराबरी का भी अन्य कोई नहीं है ॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आपने वज्र के द्वारा 'शम्बर' का वध करके, 'शम्बर' का बहुत-सा धन “अतिथिग्व” को प्रदान किया। ‘कुत्स’ की ‘शुष्ण' से रक्षा की तथा शत्रुओं से 'आयु’ और ‘दिवोदास' की रक्षा की। भूमि पर तीव्रगामी ‘दिवोदास' को कष्टों से सुरक्षित किया ॥१३॥
हे प्रकाशमान इन्द्रदेव !'अहि असुर को मारने वाले सभी देवगण आज आपके अनुकूल हैं एवं प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। आप सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी हैं। आप स्तोताओं से प्रसन्न होकर तेजस्वी यजमानों एवं पुत्रों को धन आदि देकर सुखी बनाएँ ॥१४॥
हे इन्द्रदेव ! आपके बल का अमर देवगण तथी द्यावा-पृथिवी अनुसरण करते हैं। हे कर्मवीर इन्द्रदेव ! आप नवीन यज्ञ कर्म करें तथा अभिनव स्तोत्रों को प्रकट करें ॥१५॥

सूक्त-१९

स्तोताओं एवं प्रजाओं का पालन करने वाले हे महान् इन्द्रदेव ! आप हमारे पास आएँ। दोनों लोकों में अनेक शक्तियों के कारण अहिंसित पराक्रमी, वीरता के कार्य करके बड़ी सामर्थ्य वाले इन्द्रदेव हमारे सामने आएँ । विशाल शरीर एवं उत्तम गुण-सम्पन्न इन्द्रदेव कर्म करने की अपनी सामर्थ्य के कारण ही पूजनीय हैं ॥१॥
जो प्रगतिशील, महान् दाता, अजर, चिरयुवा तथा अपरिमित बलशाली हैं एवं जो इन्द्रदेव तत्काल प्रवर्धमान होने वाले (सामर्थ्य को शीघ्र बढ़ाने वाले हैं, ऐसे इन्द्रदेव को हमारी बुद्धि धारण करती है ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आष शान्त मन वाले हैं। आप उत्तम कर्म में कुशल एवं बहुत दान देने वाले अपने हाथों को, हमारे कल्याण के लिए (अभय मुद्रा में) , हमारे सामने लाएँ। जिस प्रकार पशु पालन करने वाला पशुओं को प्रेरित करता है, वैसे ही संग्राम में आप हमें प्रेरित करें ॥३॥
अन्न के इच्छुक हम स्तोता, शत्रुहन्ता इन्द्रदेव का इस यज्ञ में सहायक मरुद्गणों सहित आवाहन करते हैं। हे इन्द्रदेव ! जैसे पुरातन काल में स्तोतागण, पापमुक्त, अनिन्द्य और अहिंमत स्थिति में थे, वैसे ही हम भी बने ॥४॥
स्तुतिकर्ताओं का अन्न एवं धन इन्द्रदेव के निमित्त वैसे ही पहुँचता है, जैसे नदियों का जल समुद्र में गिरता है । वे इन्द्रदेव सोमपायी, ऐश्वर्यवान् एवं कर्म कुशल हैं ॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं। आप हमें उत्तम बल एवं तेजस्विता प्रदान करें । हमें शक्ति, तेज एवं मनुष्योपयोगीं ऐश्वर्य प्रदान करें ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं को जीतने वाला बल हमें प्रदान करें, ताकि आपके द्वारा प्रदत्त रक्षा साधनों से हम शत्रु को जीतें । जीतने पर हमें वही सुख प्राप्त हो, जो पुत्र-प्राप्ति पर मिलता हैं ॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें बल बढ़ाने वाला, धन देने वाला कुशल पराक्रम प्रदान करें। आपकी सुरक्षा से सुरक्षित हम युद्ध स्थल में उसी बल से शत्रुओं का नाश करें ॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें सामर्थ्य बढ़ाने वाला बल, पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों ओर से प्रदान करें । हे इन्द्रदेव ! आप हमें सुखयुक्त धन प्रदान करें ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! यशस्वी, प्रशंसनीय वीरों से युक्त धन का आपके आश्रय में हम उपयोग करें दोनों (लौकिक एवं पारलौकिक) धनों के स्वामी हे इन्द्रदेव ! आप हमें प्रचुर धन प्रदान करें ॥१०॥
इस यज्ञ में हम याजक अभिनव रक्षा के निमित्त इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं। वे इन्द्रदेव मरुद्गणों के सहयोग से अतिबलशाली, तेजस्वी, वर्धमान, शत्रुजयी और दिव्य शासक हैं ॥११॥
हे वजिन् ! हम मनुष्यों में से मिथ्याभिमानी (अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने वाले मनुष्य) को आप वश में करें । हम संग्राम काल में तथा पशु, पुत्र एवं जल प्राप्ति के निमित्त आपका आवाहन करते हैं ॥१२॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आपके आश्रय में रहकर हम धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न एवं सुखी हों । हे इन्द्रदेव ! आप अनेकों द्वारा आहूत हैं। हम स्तुति जैसे मित्रतापूर्ण कार्य सम्पादित करके आपकी सहायता से शत्रुओं का नाश करें । हम शत्रुओं से अधिक बल-सम्पन्न बनें ॥१३॥

सूक्त-२०

हे संघर्ष के लिए विख्यात इन्द्रदेव ! आप हमें सूर्यदेव की तरह कान्तियुक्त , शत्रुओं पर आक्रमण करने वाला, डटकर मुकाबला करने वाला, सहस्रों प्रकार के ऐश्वर्य (धन) वाला एवं भूमि को उर्वरक बनाने वाला पुत्र प्रदान करें ॥१॥
हे सोमपायी ! आपने विष्णुदेव के साथ मिलकर जल अवरोधक असुर वृत्र' का नाश किया था । हे इन्द्रदेव ! स्तोताओं ने प्राणशक्ति एवं बल बढ़ाने वाले स्तोत्रों को आपके निमित्त भेंट किया ॥२॥
जब इन्द्रदेव ने समस्त पुरों को नष्ट करने वाला वज्र पाया, तभी उन्होंने मधुर सोमरस भी प्राप्त किया था। वे इन्द्रदेव हिंसकों के हिंसक, पराक्रमी, अन्नदाता, ओजस्वी एवं तेजस्वी हैं ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपके सहायक, अन्नदाता 'कुत्स' से युद्ध में भयभीत होकर 'पणि' सेनाओं सहित भाग गया। आपने शुष्ण की (आसुरी) माया को नष्ट कर उसके अन्न का हरण किया ॥४॥
जब 'शुष्ण' वज्र गिरने से मर गया, तब द्रोही 'शुष्ण' के समस्त बलों को नष्ट करने वाले इन्द्रदेव ने सूर्योपासना के निमित्त सारथिरूप कुत्स को रथारूढ़ होने के लिए कहा ॥५॥
श्येन पक्षी द्वारा लाये गये, सोम को पीकर तृप्त हुए इन्द्रदेव ने दुष्ट नमुचि के सिर को काट डाला । उन्होंने सोये हुए साप्य (सप के पुत्र अथवा संधि-सहमतिपूर्वक रहने वालों की रक्षा करके उन्हें पशु, धन एवं अन्न प्रदान किया ॥६॥
है वज्रिन् ! आपने मायावी ‘पित्रु' के किले को ध्वस्त किया । हे उत्तम दानदाता ! 'ऋजिश्वा' को आपने धन प्रदान किया। उन्होंने हविरन्न अर्पित किया था ॥७॥
इष्ट सुखदाता इन्द्रदेव ने वेतसु आदि असुरों को द्योतमान' के पास जाने के लिए एवं सदा उन्हीं के अधीन रहने के लिए उसी तरह विवश किया, जिस तरह माता पुत्र को वश में करती है ॥८॥
शत्रु-विनाशक, वज्र को हाथ में धारण करने वाले इन्द्रदेव स्पर्धा करने वाले शत्रुओं का संहार करते हैं। वे शूरवीर रथ पर चढ़ते हैं। उनके अश्व वचन मात्र से जुत जाने वाले एवं संकेत मात्र से इन्द्रदेव को गन्तव्य तक ले जाने वाले हैं ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! हम उपासक आपके द्वारा सुरक्षित होकर नवीन धन पाने के लिए उपासना करते हैं । यज्ञ करते समय याजक आपकी स्तुतियाँ करते हैं ॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! धन के इच्छुक 'उशना' का आप कल्याण करें । आपने 'नववास्त्व' नामक असुर को संहार किया था और शक्ति-सम्पन्न 'उशना' के समक्ष देयपुत्र को उपस्थित किया था ॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं को भयभीत करते हैं। रुके जल को प्रवाहित करते हैं । हे पराक्रमी ! जब आप समुद्र को पार करते हैं, तब 'तुर्वश' तथा 'यदु' को कल्याणपूर्वक पार कर दें ॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आपने ‘धुनी' और 'चुमुरी' नाम के असुरों को युद्ध में मार गिराया । यह सब युद्ध में करना आपकी ही सामर्थ्य से सम्भव है। आपके निमित्त अन्न को पकाने वाले, सोमरस बनाने वाले एवं समिधावान् ‘दभीति' ने हवि प्रदान कर आपका सत्कार किया था ॥१३॥

सूक्त-२१

हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप रथारूढ़, अजर और नूतन स्वरूप वाले हैं । हवियाँ आपको प्राप्त होती हैं। बहुत कार्य करने की इच्छा वाले भरद्वाज की उत्तम स्तुतियाँ आपका आवाहन करती हैं ॥१॥
प्रज्ञावान् इन्द्रदेव की महिमा द्युलोक एवं पृथ्वी से भी महान् हैं । वे सर्वज्ञ और यज्ञ से विवर्धमान हैं, ऐसे स्तुति द्वारा आवाहनीय इन्द्रदेव की हम वन्दना करते हैं ॥२॥
इन्द्रदेव ने सघन अन्धकार को सूर्यदेव के प्रकाश से दूर किया । हे स्वधारक शक्तियुक्त इन्द्रदेव ! आपके अमर स्थान की कामना करने वाले मनुष्य अवध्य (सुरक्षित) रहते हैं ॥३॥
जिन्होंने वृत्रादि असुरों का संहार किया, वे इन्द्रदेव अभी कहाँ हैं ? किस लोक और किन प्रजाओं के बीच वे विचरण करते हैं? आपके लिए सुखदायी यज्ञ कौन सा है? आपको वरण करने हेतु समर्थ मन्त्र कौन सा है? कौन सा होता आपको बुलाने में समर्थ है ? ॥४॥
बहुकर्मा एवं अनेकों द्वारा प्रार्थित हे इन्द्रदेव !प्राचीन काल तथा वर्तमान काल में उत्पन्न साधक आपके मित्र बनकर रहें । मध्यकाल में भी आपके स्तोता उत्पन्न हुए परन्तु हे इन्द्रदेव ! आप हमारी इस समय की स्तुति को सुनें ॥५॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आज के मनुष्य आपसे ही पूछते हैं । आपके पूर्व के श्रेष्ठ कार्यों को सुनकर उनका वर्णन करते हैं। जितना हमें विदित है, उसी आधार पर ही हम आपका सत्कार करते हैं ॥६॥
हे शत्रुओं के उत्पीड़क इन्द्रदेव ! आप अपने पुराने, सुयोग्य, सदा सहायक वज्र से शत्रु सेना को दूर करें । हे इन्द्रदेव ! असुरों का बल चारों ओर बढ़ता हुआ आपके समक्ष है, आप भी शत्रु के बल का अनुमान करके उससे अधिक बल से प्रतिरोध करें ॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप प्राचीन, श्रेष्ठ आवाहनकर्ता अंगिराओं के मित्र हैं। आप स्तोताओं के पालक हैं। हम आज के स्तोतागण नवीन स्तोत्र के इच्छुक हैं । आप हम लोगों की प्रार्थना सुनें ॥८॥
हे भरद्वाज ! आप हम सबकी रक्षा एवं इच्छापूर्ति के लिए वरुण, मित्र, इन्द्र, मरुत्, पूषा, विष्णु, अग्नि, सविता, ओषधियों और पर्वतादि देवों की स्तुति करें ॥९॥
हे अति पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप जैसा अन्य कोई देव नहीं हैं, अतः हम स्तोता श्रेष्ठ स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। आप हमारी स्तुति को सुनें ॥१०॥
हे बल पुत्र इन्द्रदेव ! आप सर्वज्ञ हैं । जो देवगण अग्निरूपी जिह्वा वाले सत्य के उपासक हैं, और जो यज्ञाहुति ग्रहण करते हैं, शत्रुओं का नाश करने के निमित्त राजर्षि मनु ने, जिन्हें सर्वोपरि स्थापित किया था, आप उन्हीं के साथ यहाँ पधारें ॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप मेधावी हैं। आप मार्ग नियन्ता हैं । अत: सुगम एवं दुर्गम मार्गों में हमारे मार्गदर्शक बने । आप अपने न थकने वाले एवं तीव्रगामी घोड़ों के द्वारा हमारे लिए बल बढ़ाने वाला अन्न लाएँ ॥१२॥

सूक्त-२२

इन्द्रदेव संकट काल में मनुष्यों द्वारा आवाहन करने योग्य हैं । वे स्तुतियाँ करने पर आते हैं । इच्छा पूर्ति करने वाले पराक्रमी, ज्ञानी, सत्यवादी एवं शत्रुओं को पीड़ा देने वाले इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं ॥१॥
अङ्गिरा आदि प्राचीन ऋषियों ने इन्द्रदेव को पराक्रमी और प्रवर्द्धमान बनाने के लिए नौं मासीय यज्ञानुष्ठान किया तथा स्तुति की । वे इन्द्रदेव सभी के शासक, तीव्रगामी एवं शत्रुओं के संहारकर्ता हैं ॥२॥
हे अश्वपति इन्द्रदेव ! हम पुत्र-पौत्रादि स्वजनों, सेवकों, पशुओं एवं प्रसन्नतादायक धन की आप से याचना करते हैं। आप हमें सुखकारी ऐश्वर्य प्रदान करने यहाँ आएँ ॥३॥
हे शत्रुजयी, पराक्रमी अनेकों द्वारा आहूत ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आप दुष्ट असुरों का नाश करने की सामर्थ्य वाले हैं। आपको यज्ञ में कौन सा भाग मिला है ? हे इन्द्रदेव ! आप हमें वहीं सुख प्रदान करें, जो आपने पहले भी स्तोताओं को दिया है ॥४॥
हाथ में वज्र धारण करने वाले, रथारूढ़, बहुकर्मा, अनेक शत्रुओं को एक साथ पकड़ने वाले इन्द्रदेव की गुण-गाथा का गान करते हुए, जो यजमान् यज्ञकर्म और स्तुति करता है, वह शत्रुओं को हराने वाला एवं सुख प्राप्त करने वाला होता है ॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप स्वयं के बल से युक्त हैं। आपने अपने मनोवेगी वज्र से उस बढ़ते हुए मायावी वृत्रासुर का संहार किया है । हे तेजस्वी इन्द्रदेव ! आपने अचल, सुदृढ़ एवं शक्तिशाली पुरियों को नष्ट किया है ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप प्राचीन एवं पराक्रमी हैं। प्राचीनकालीन ऋषयों के समान हम भी नवीन स्तोत्रों से आपको प्रवर्धमान करते हैं-ऐसे शोभनीय इन्द्रदेव हमारी रक्षा करें ॥७॥
है इन्द्रदेव ! आप अभीष्ट की वर्षा करने वाले हैं । द्युलोक, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष में सर्वत्र व्याप्त होकर अपने तीव्र तेज से तृप्त करके सज्जनों के शत्रुओं (दुष्टों) को भस्म करें ॥८॥
हे तेजस्वी, अजर इन्द्रदेव ! आप देवलोकवासी एवं पृथ्वीवासी सभी लोगों के राजा हैं । आप दाहिने हाथ में वज्र को धारण करके विश्व के मायावियों का नाश करें ॥९॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं का संहार करने के लिए अक्षुण्ण, संयमित एवं कल्याणकारी धन प्रचुर मात्रा में हमें प्रदान करें। जिससे दासों (इन्द्रियों के दास, कुमार्गगामियों) को आर्य (श्रेष्ठ मार्गगामी) बनाया जा सके और मनुष्य के शत्रुओं का नाश हो सके ॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप पूजनीय एवं अनेकों द्वारा आहूत हैं । आप सभी लोगों द्वारा प्रशंसा किये गये घोड़ों से हमारे पास आएँ । जिन अश्वों की गति को देवता एवं असुर भी नहीं रोक सकते हैं, उन अश्वों के साथ आप हमारे पास आएँ ॥११॥

सूक्त-२३

हे इन्द्रदेव ! सोमरस निकालने पर, उत्तम स्तोत्रों का ज्ञान होने पर, स्तुतियाँ सुनकर आप अश्वों को (रथ में) नियोजित करते हैं। आप हाथ में वज्र धारण करके आगमन करते हैं ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप भयभीत यजमानों के कर्म (यज्ञ) विरोधी असुरों को जीतकर एवं युद्ध क्षेत्र में स्तोता-याजक के सहयोगी होकर, उनकी रक्षा करके उन्हें धैर्यवान् बनाएँ ॥२॥
वे इन्द्रदेव सोमरस पीकर, सोमरस तैयार करने वाले को अच्छा निवास(गृह प्रदान करते हैं। वे ही इन्द्रदेव स्तोताओं से प्रसन्न होकर, उन्हें सहज मार्ग एवं धन प्रदान करते हैं ॥३॥
वे इन्द्रदेव वज्र को धारण करते हैं। वे अभिषुत सोमरस का पान करते हैं। वे इन्द्रदेव दोनों अश्वों के साथ तीनों सवनों में पहुँचते हैं । वे गोदानकर्ता को पुत्र प्रदान करते हैं तथा स्तोताओं की स्तुति का श्रवण करते हैं ॥४॥
हम उन प्राचीन इन्द्रदेव को प्रिय लगने वाले स्तोत्रों का गायन करते हैं, वे हमारी रक्षा करें । सोमरस अभिषवण के पश्चात् हम इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं। स्तुति करते हुए याजक इन्द्रदेव को प्रवृद्ध करने के लिए हवि प्रदान करें ॥५॥
हे सोमपायी इन्द्रदेव ! आपके लिए सोम तैयार करने के पश्चात् अब हम हवियों सहित स्तुति करते हैं। आपके निमित्त हम उन स्तोत्रों को मनोयोगपूर्वक अर्पित करते हैं । ये स्तोत्र इन्द्रदेव के उत्कर्ष के कारक हैं ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप आनन्दित होकर हमारे द्वारा प्रेषित पुरोडाश को ग्रहण करें । गौ के दूध-दही मिले सोमरस का पान करें। यजमान द्वारा बिछाये गए आसन पर आप विराजें एवं आपके अनुगामी हम लोगों के स्थान का विस्तार करें ॥७॥
हे उग्र बल-सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप निज इच्छानुसार प्रसन्न होकर सोमरस का पान करें। आप बहुतों द्वारा बुलाये गये हैं। हमारे द्वारा की जाने वाली स्तुति आप तक पहुँचे । इससे प्रसन्न होकर आप हमारी रक्षा करें ॥८॥
हे मित्रो ! सोमरस अभिषुत करके, अन्नदाता इन्द्रदेव को सोमरस से तृप्त करें। उन इन्द्रदेव को अपनी सहायता के लिए प्रसन्न करने का यह अच्छा साधन है । वे इन्द्रदेव हमारा पोषण करें एवं हमारी सुरक्षा करें ॥९॥
हविरन्नयुक्त यजमान के स्वामी इन्द्रदेव सोमरस के तैयार होने से (प्रसन्न होकर) सर्वाधिक प्रशंसा के योग्य धन प्रदान करते हैं । जो स्तोताओं को ज्ञानी बनाते हैं, ऐसे इन्द्रदेव की भरद्वाजों द्वारा स्तुति की गई है ॥१०॥

सूक्त-२४

सोमपान के पश्चात् हर्षित होने से इन्द्रदेव का बल बढ़ता है । सोमपान के समय सामगान से वे इन्द्रदेव प्रसन्न होते हैं। सोमपायी, धनवान् एवं तीव्रगामी इन्द्रदेव मनुष्यों द्वारा स्तुतिपूर्वक अर्चना करने योग्य हैं। ये द्युलोक निवासी स्तुतियों के स्वामी इन्द्रदेव सदैव (याजकों की रक्षा करते हैं ॥१॥
वे ज्ञानी, बलशाली, शत्रु-संहारक, भक्त की प्रार्थना सुनने वाले, अच्छे निवास देने वाले, स्तोताओं के संरक्षक, शिल्पकलाविदों के पोषक एवं यशस्वी अन्नदाता इन्द्रदेव हमें प्रसन्न होकर अन्न प्रदान करें ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप बहुतों द्वारा आहूत हैं । चक्कों (पहियों, चक्रों) की धुरी जिस प्रकार चक्कों को सुस्थिर किये रहती है, उसी प्रकार आपकी महिमा से द्युलोक एवं भूलोक स्थिर हैं । वृक्ष की अनेक शाखाओं की तरह आपकी रक्षक शक्तियों फैलती हैं ॥३॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! सर्व संचारी गो-मार्ग की तरह आपकी शक्तियाँ भी सर्वत्र कर्म करने में समर्थ हैं। हे उत्तम दानदाता इन्द्रदेव ! आपकी शक्तियाँ बछड़ों की (बाँधने वाली) डोरियों की भाँति अनेक शत्रुओं को बाँध लेती हैं ॥४॥
इन्द्रदेव प्रतिदिन, उत्तरोत्तर नवीन अद्भुत कार्य करते हैं। वे सत् एवं असत् (स्थायीं और अस्थायी कर्मों) को बार-बार करते हैं । इन्द्र, वरुण, मित्र, पूषा एवं सवितादेव हमारे मनोरथों को पूर्ण करें ॥५॥
है इन्द्रदेव ! पर्वत के पृष्ठभाग से जिस प्रकारे जल प्रवाहित होता है, वैसे ही यज्ञ कर्म एवं स्तुति करने से मनुष्यों को आपके द्वारा मनोवांछित फल प्राप्त होता है । हे स्तुतियों से पूजनीय इन्द्रदेव ! जिस प्रकार युद्ध क्षेत्र में अश्व तीव्र वेग से जाते हैं, उसी प्रकार अन्न प्राप्ति की इच्छा वाले भरद्वाज आदि आपके पास पहुँचते हैं ॥६॥
जो इन्द्रदेव संवत्सर, महीनों एवं दिनों के द्वारा क्षीण नहीं होते । ऐसे इन्द्रदेव की काया स्तुतियों द्वारा पूजित होकर विकसित हो ॥७॥
स्तुति किये जाने पर भी इन्द्रदेव दस्युओं (क्रूर पुरुषों) के वशीभूत नहीं होते । सुदृढ़ शरीर वाले इन्द्रदेव जब गमन करते हैं, तो ऊँचे-ऊँचे पहाड़ भी सुगम हो जाते हैं । अगाध (गहरे) स्थान भी सहज हो जाते हैं ॥८॥
हे सोमपायी एवं पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप गम्भीर और महान् हृदय से बल एवं अन्न प्रदान करें । हे इन्द्रदेव ! आप दिन-रात तत्पर रहकर हमारी सुरक्षा करें ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आप पास रहें या दूर रहें । यहाँ या वहाँ, जहाँ भी रहें, वहाँ से स्तुति करने वालों की रक्षा रण क्षेत्र में, घर में, जंगल में सब जगह करें। हमें वीर पुत्रादि प्रदान करके शतायु बनाये ॥१०॥

सूक्त-२५

हे बलवान् इन्द्रदेव !आपके पास जो भी सुरक्षा के उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ साधन हैं, उन सभी रक्षा साधनों से संग्राम में हमारी अच्छी प्रकार रक्षा करें । आप स्वयं महान् होकर हमें भी महान् बनाएँ एवं अन्न प्रदान करें ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप इनसे (उत्तम, मध्यम एवं कनिष्ठ रक्षा साधनों के द्वारा) शत्रु सेना का संहार करने वाली हमारी सेना की रक्षा करते हुए शत्रु की सेना के मन्यु को नष्ट करें एवं यज्ञ जैसे श्रेष्ठ कर्म करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं को भी नष्ट करें ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे उन शत्रुओं का संहार करें, जो सन्मुख प्रकट होकर, निकट या दूर रहकर हमें मारना चाहते हैं। अपने बल से इनके बल को पराजित करके, इन्हें हमसे दूर हटा दें ॥३॥
जब पुत्र, पौत्र, गौ, जल एवं उर्वर भूमि के लिए परस्पर विवाद हो जाता हैं और युद्ध होते हैं, तब युद्धरत उन योद्धाओं में से आपके कृपा पात्र की विजय होती है ॥४॥
आज तक जो भी, जितने भी सामर्थ्यशाली पैदा हुए हैं, उन्हें युद्ध में इन्द्रदेव ने जीता हैं; अतः कोई भी धर्षक एवं घमण्डी, शूरवीर जिसने भले ही शत्रुओं का नाश किया हो, आपसे युद्ध नहीं करता । आप सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं ॥५॥
शत्रुओं को रोकने वाले, युद्ध या दास युक्त उत्तम घर के लिए युद्ध में परस्पर दो योद्धाओं में वही विजयी होगा, जिसके लिए ऋत्विग्गणों ने यज्ञ में इन्द्रदेव के निमित्त आहुति प्रदान की हो ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! अपनी भयभीत प्रजा की आप रक्षा करें । हे इन्द्रदेव ! आप उन उत्तम व्यक्तियों की दुःखों से रक्षा करें, जो आपको प्राप्त करते हैं । हे देव ! जिन स्तोताओं ने हमें अग्रिम स्थान प्रदान किया है; आप उन सबकी भी रक्षा करें ॥७॥
है इन्द्रदेव ! आप महान् वीर हैं । शत्रुनाशक समस्त सामर्थ्य आप में स्थित है । हे इन्द्रदेव ! देवगणों ने आपको उत्तम बल प्रदान किया है, जिसके द्वारा आप संसार में शत्रुओं को पराजित कर सकें ॥८॥
हे इन्द्रदेव ! इस प्रकार आप शत्रु-सेना का नाश करने की प्रेरणा हमारी सेना को प्रदान करें एवं हमारे हित साधन के निमित्त दुष्ट हिंसक आसुरी सेना का नाश करें । हे इन्द्रदेव !हम (भरद्वाज) स्तोता अन्न सहित आवास प्राप्त करें ॥९॥

सूक्त-२६

हे इन्द्रदेव ! (सोम से) सिंचन करते हुए बहुत अन्न की कामना वाले हम आपका आवाहन करते हैं, आप हम सबकी इस प्रार्थना को सुनें । जब वीर योद्धा संग्राम क्षेत्रों में जाते हैं, तब उन निर्णायक दिनों में उन्हें संरक्षण एवं शक्ति प्रदान करें, जिससे शत्रु भयभीत हो जाएँ ॥१॥
है इन्द्रदेव ! आप दुर्जनों के नाशक एवं सज्जनों के पोषक हैं । हे देव ! श्रेष्ठ अन्न प्राप्ति के निमित्त, अन्नवान् भरद्वाज, स्तुतियों द्वारा आपका आवाहन करते हैं। गौओं के लिए युद्ध करते समय आपकी कृपा (शक्ति) से वे मुष्टिका से ही शत्रु का विनाश कर देते हैं ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! अन्न की कामना के लिये ‘भार्गव ऋषि' को आप प्रेरणा दें । आपने हविदाता 'कुत्स' के लिए शुष्ण' असुर का संहार किया तथा 'अतिथिग्व' को सुख देने हेतु इस 'शम्बरासुर' का शिरच्छेद किया, जो अपने को अमर मानता था ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने राजा 'वृषभ' को युद्ध-सिद्धि में परम उपयोगी रथ देकर, दस दिन तक होने वाले युद्ध में शत्रुओं से उनकी रक्षा की । 'वेतस' की सहायता करते हुए 'तुग्रासुर' को मार डाला । तुज' नामक राजा को स्तुति करने पर प्रवृद्ध किया ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप शत्रुनाशक हैं । हे वीर इन्द्रदेव ! आपने ‘शम्बर' असुर की सौ-सौ एवं सहस्रों सेनाओं को नष्ट किया। यज्ञ के दुश्मन 'शम्बरासुर' को मार करके तथा 'दिवोदास' की रक्षा करके आपने बहुत प्रशंसनीय कार्य किया ॥५॥
हे इन्द्रदेव ! श्रद्धा सहित यज्ञानुष्ठान करके प्राप्त सोमपान से प्रसन्न होकर, आपने राजा ‘दभीति' की सुरक्षा के लिए चुमुरि' का नाश किया । हे इन्द्रदेव ! आपने वीर ‘पिठीनस' को राज्य देकर शत्रु के साठ हजार वीरों को युद्ध-कौशल से मार डाला ॥६॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप शत्रुजयी एवं त्रिलोक के रक्षक हैं । स्तोतागण सुख एवं सामर्थ्य के निमित्त आपसे प्रार्थना करते हैं । हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा प्रदत्त सुख-सामर्थ्य को स्तोताओं के साथ हम (भरद्वाज) भी प्राप्त करें ॥७॥
हे पूजनीय इन्द्रदेव ! हम सखा भाव से आपकी स्तुति करते हैं। धन-प्राप्ति के निमित्त की जा रही इन स्तुतियों के कारण हम आपके प्रिय पात्र बने । “प्रातर्दन" के पुत्र क्षत्रश्री' को सर्वाधिक ऐश्वर्य प्रदान करें । वे शत्रुओं को मारकर धन प्राप्त करें ॥८॥

सूक्त-२७

सोम से हर्षित इन्द्रदेव ने क्या किया? सोमरस पीकर क्या किया? सोमरस से मित्रता करके क्या किया? प्राचीन एवं नये स्तुति करने वालों ने आपसे क्या प्राप्त किया ? ॥१॥
सोमपान से हर्षित हुए इन्द्रदेव ने श्रेष्ठ कर्म किए । सोमपान के बाद सत्कार्य । इसके साथ मित्रता करने पर भी सत्कार्य ही किए जो प्राचीन और नवीन स्तुति करने वाले हैं, उन्होंने आपके द्वारा सत्कार्य ही प्राप्त किया॥२॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! हम यह नहीं जानते कि आपसे बड़ा अन्य कोई महमा वाला या ऐश्वर्यशाली होगा। आपकी सम्पूर्ण प्रशंसनीय सिद्धि और सामर्थ्य को भी हम नहीं जानते है ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपके उस पराक्रम को क्या हम नहीं जानते, जिसके द्वारा आपने 'वरक्खि ' नामक अमुर के पुत्रों का संहार किया था? हे इन्द्रदेव ! उसी पराक्रम से प्रहार के निमित्त उद्यत वज्र की घोर ध्वनि से ही शत्रु ('वरशिख' के पुत्र) विदीर्ण हो गये थे ॥४॥
इन्द्रदेव ने चायमान (चय की क्रिया में संलग्न रहने वाले के सहयोगी) के पुत्र अभ्यार्वर्ती (सतत आवर्तनशील), को उपयुक्त शिक्षा (परामर्श-कौशल) प्रदान करके 'वरशिख' (तेजस्वी) असुर के पुत्रों का वध किया। जब उन्होंने हरियूपिया (नगर या क्षेत्र) के पूर्व भाग में वृचीवान् (अवरोध उत्पन्न करने वाले) को मारा, तो दूसरा (असुर पुत्र) भय से विदीर्ण हो गया ॥५॥
हे बहुतों द्वारा आहूत इन्द्रदेव ! यश एवं अन्न प्राप्त करने के लिए आपसे युद्ध करने वाले, यज्ञ के पात्रों को नष्ट करने वाले एवं कवचधारी ‘वरशिख' के एक सौ तीस पुत्रों को आपने युद्ध में एक समय ही मार डाला ॥६॥
घास खोजती गौओं की तरह जिन इन्द्रदेव के दो कान्तिवान् अश्व अन्तरिक्ष में विचरते हैं। उन्हीं इन्द्रदेव ने ‘वृचीवान' के पुत्र ‘दैववात’ को प्रसन्न करते हुए ‘तुर्वश’ को ‘सृञ्जय' के अधीन कर दिया ॥७॥
हे अग्निदेव ! राजसूय यज्ञ करने वाले, बहुत दान देने वाले, 'चायमान' के पुत्र अभ्यावत' ने हमें बीस गौएँ एवं रथ के साथ अनेक सेविकायें प्रदान की थी । पृथु वंश के राजा 'अभ्यावर्ती ' की यह दक्षिणा अनश्वर है ॥८॥

सूक्त-२८

गौएँ हमारे घर आकर हमारा कल्याण करें । वे (गौएँ) गोशाला में रहकर हमें आनन्दित करें । इन गौओं में अनेक रंग-रूप वाली गौएँ बछड़ों से युक्त होकर, उषाकाल में इन्द्रदेव के निमित्त दुग्ध प्रदान करें ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप याजक एवं स्तोताओं के लिए अभिलषित अन्न-धन प्रदान करते हैं। उनके धन का कभी हरण नहीं करते; वरन् उसे निरन्तर बढ़ाते हैं। देवत्व को प्राप्त करने की इच्छा वालों को अखण्डित एवं सुरक्षित निवास देते हैं ॥२॥
वे गौएँ नष्ट नहीं होतीं, तस्कर उन्हें हानि नहीं पहुँचा पाते । शत्रु के अस्त्र उन गौओं को क्षति नहीं पहुँचा पाते । गौओं के पालक जिन गौओं से देवों का वजन करते हैं, उन्हीं गौओं के साथ चिरकाल तक सुखी रहें ॥३॥
रेणुका (धूल) उड़ाने वाले द्रुतगामी अश्व भी उन गौओं को नहीं पा सकेंगे। इन गौओं पर वध करने के लिए आघात न करें । याजक की वे गौएँ विस्तृत क्षेत्र में निर्भय होकर विचरण करें ॥४॥
गौएँ हमें धन देने वाली हों । हे इन्द्रदेव ! आप हमें गौएँ प्रदान करें । गोदुग्ध प्रथम सोमरस में मिलाया जाता है। हे मनुष्यो ! ये गौएँ ही इन्द्र रूप हैं। उन्हीं इन्द्रदेव को हम श्रद्धा के साथ पाना चाहते हैं ॥५॥
हे गौओ !आप हमें बलवान् बनाएँ। आप हमारे रुग्ण एवं कृश शरीरों को सुन्दर-स्वस्थ बनाएँ ।आप अपनी कल्याणकारी ध्वनि से हमारे घरों को पवित्र करें । यज्ञ मण्डप में आपके द्वारा प्राप्त अन्न का ही यशोगान होता है ॥६॥
हे गौओ ! आप बछड़ों से युक्त हों । उत्तम घास एवं सुखकारक स्वच्छ जल का पान करें। आपका पालक चोरी करने वाला न हो। हिंसक पशु आपको कष्ट न दें । परमेश्वर का कालरूप अस्त्र आपके पास ही न आए ॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आपके वीर्य (पराक्रम) में बलशाली का ओज संयुक्त हो । इन गौओं के उत्पादक (किरणों के प्रवाहों) के साथ उत्प्रेरक (केटेलैटिक एजेन्ट या शक्तिवर्धक तत्त्व) संयुक्त हों ॥८॥

सूक्त-२९

हे मनुष्यो ! आपके नेता (यज्ञ के ऋत्विक् अथवा समाज के अग्रणी) श्रेष्ठ बुद्धि वाले एवं उदार हैं । वे स्तोत्रों का गायन करते हुए, सखा भाव से इन्द्रदेव की सेवा करते हैं। वज्रधारी इन्द्रदेव बहुत धन देते हैं, अतएव रमणीय एवं महान् इन्द्रदेव का, अपनी रक्षा के लिए पूजन करें ॥१॥
जिन इन्द्रदेव के पास मनुष्यों का हितकारी धन है, जो स्वर्ण-रथ पर चढ़ते हैं एवं जिनके पुष्ट हाथों में घोड़ों की (नियंत्रक) लगाम है, जिन्हें रथ में जुते हुए अश्व मार्ग पर ले जाते हैं, ऐसे इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप वज्रधारण करके शत्रुओं को परास्त करते हैं । ऐश्वर्य की कामना से हम (भरद्वाज) आपके चरणों में सेवा समर्पित करते हैं । हे सर्वप्रधान इन्द्रदेव ! आप सुरभित आवरण धारण करते हैं। सबके लिए दर्शनीय आप सूर्यदेव की तरह सबका उत्साह बढ़ाते हैं ॥३॥
इस समय पकाने योग्य पुरोड़ाश पकाये जाते हैं । लाजा तैयार किया जाता है । विगण इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं। सोमरस निकालकर उसमें दुग्धादि श्रेष्ठ पदार्थ मिलाये जाते हैं । वे स्तुति करते हुए इन्द्रदेव का सामीप्य प्राप्त करते हैं ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपका बल अनन्त हैं। द्यावा-पृथिवी आपके बल से भयभीत हो काँपते हैं। जिस तरह गो पालक गौओं को तृप्त करता है, वैसे ही हम, स्तुति करते हुए इस यज्ञ में, आपको तृप्त करने के लिए उत्तम आहुतियाँ समर्पित करते हैं ॥५॥
श्रेष्ठ नासिका अथवा सुन्दर मुकुट धारण करने वाले महान् इन्द्रदेव सुखपूर्वक आहूत किये जा सकते हैं। वे स्वयं आयें अथवा न आयें, स्तोताओं को धन प्रदान करते ही हैं। इस प्रकार पराक्रमी महावीर इन्द्रदेव अनुपम तेज एवं बल से बहुत से वृत्रासुर जैसे असुरों तथा शत्रुओं का नाश करते हैं ॥६॥

सूक्त-३०

पराक्रम करने के लिए पुनः वे महावीर (इन्द्रदेव) तत्पर हैं । वे श्रेष्ठ एवं अजर इन्द्रदेव धन देते हैं। वे द्यावा-पृथिवी से भी बड़े हैं । द्यावा-पृथिवी इन्द्रदेव के आधे भाग के तुल्य हैं ॥१॥
इन इन्द्रदेव के बल के महत्त्व को हम मानते हैं । जो कार्य इन्द्रदेव करते हैं, उनको नष्ट करने में कोई समर्थ नहीं है। उत्तम कर्म करने वाले इन्द्रदेव ने भुवनों का विस्तार किया है । इन्द्रदेव के प्रभाव से ही सूर्यदेव प्रतिदिन उदित होते हैं ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपने ही आज भी और पहले भी नदियों के जल को प्रवाहित होने के लिए मार्गों का निर्माण किया। जिस तरह भोजन के निमित्त बैठा मनुष्य स्थिर होकर बैठता है, वैसे ही ये पर्वत आपने स्थिर किये हैं। हे श्रेष्ठ कर्म करने वाले इन्द्रदेव ! आपने सब लोक सुदृढ़ किए हैं ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपके समान अन्य कोई देव नहीं है, यह सत्य ही है । आपके समान मनुष्य भी नहीं है। मनुष्यों में तथा देवगणों में आपसे बढ़कर कोई नहीं हैं। जल को ढंककर सोने वाले वृत्रासुर का आपने ही नाश किया था और समुद्र की ओर जल प्रवाहित किया था ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपने जलराशि के मार्ग चारों ओर खोलकर जल प्रवाहित किया। आपने मेघ के बन्धन खोल दिए। सूर्य, उषा एवं स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले आप सम्पूर्ण विश्व के स्वामी बनें ॥५॥


सूक्त-३१

हे धनपति इन्द्रदेव ! आप ही सम्पूर्ण धनों के स्वामी हैं । आप ही स्वयं अपने बाहुबल से प्रजाओं का धारण करते हैं। मनुष्यगण शत्रुओं को परास्त करने तथा पुत्र-पौत्रादि एवं वर्षा के निमित्त आपकी स्तुति करते हैं ॥१॥
हे. इन्द्रदेव ! अन्तरिक्ष में उत्पन्न मेघ, गिराने योग्य जल न होने पर भी आपके भय से जल बरसाने लगते हैं। अन्तरिक्ष, भूलोक, पर्वत, वन तथा समस्त चराचर जगत् आपके आगमन से भयभीत हा जाते हैं ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपने उस अति बलवान् , उग्रवीर असुर "शुष्ण" को पराजित किया। गौओं को बचाने के लिए संग्राम में कुयव का संहार किया। आपने सूर्यदेव के रथ को चक्र हर लिया और पापी राक्षसों का नाश किया ॥३॥
हे बुद्धिमान इन्द्रदेव ! आपने सोमरस अर्पित करने वाले 'दिवोदास' को एवं स्तोता ‘भरद्वाज' को प्रज्ञा सहित धन प्रदान किया । आपने 'शम्बर' असुर की सौ पुरियों को ध्वस्त किया ॥४॥
हे अक्षुण्ण सत्य-बल के धनी इन्द्रदेव ! आप महायुद्ध के लिए अपने भयंकर रथ पर चढ़े। हे सन्मार्गगामी इन्द्रदेव ! आप अपने रक्षा-साधनों सहित हमारे पास आकर, हमें यशस्वी बनायें ॥५॥

सूक्त-३२

शत्रुनाशक, तीव्रगामी, वज्रधारी, स्तुति के योग्य, महान् इन्द्रदेव के लिए हमने अपने सुख से अपूर्व, सुखदायी एवं विस्तृत स्तोत्रों का उच्चारण किया ॥१॥
वे इन्द्रदेव, ज्ञानवानों अथवा माता-पिता (द्यावा-पृथिवी) के हित के लिए मेघों को छिन्न-भिन्न करके द्यावा-पृथिवी को सूर्यदेव से प्रकाशित करते हैं। स्तुत किए जाने पर वे गौओं (किरणों) को मेघों से मुक्त करते हैं ॥२॥
उन बहुकर्मा इन्द्रदेव नै, यज्ञकर्ता एवं स्तुति करने वाले प्रषगणों (अंगिराओं) के सहयोग से गौओं की प्राप्ति के निमित्त राक्षसों को पराजित किया। कवियों (दूरदर्शियों) के साथ मिलकर शत्रुओं के नगरों को ध्वस्त किया ॥३॥
स्तुति द्वारा उपासना के योग्य है बलवान् इन्द्रदेव ! आप महान् अन्नों और बलों से युक्त होकर, नवीन बल बढ़ाने वाले सखाओं के साथ, सुख प्राप्ति के निमित्त आयें ॥४॥
हिंसकों को वश में करने वाले इन्द्रदेव सदा ही अपने स्वयं के बलों से निरन्तर गमनशील तेजस्वी घोड़ों से युक्त होकर, जल-राशि को क्षोभरहित समुद्र की ओर प्रवाहित होने के लिए प्रेरित करते हैं ॥५॥

सूक्त-३३

हे बलवान् इन्द्रदेव ! आप हमें अति बलशाली, स्तुति करने वाला, यज्ञ करने वाला एवं हव्यदाता पुत्र दें । वह पुत्र घोड़े पर बैठकर युद्ध में सुन्दर अश्वों वाले विरुद्धाचारी शत्रुओं को पराजित करे ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! विभिन्न प्रकार से स्तुति करने वाले मनुष्य, संग्राम में रक्षा के लिए आपको आहूत करते हैं। आपने अङ्गिराओं के साथ मिलकर पणियों को मारा था। आपकी उपासना करने वाला आपकी सुरक्षा में रहता हुआ अन्न प्राप्त करता है ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! दस्युओं एवं आर्यों दोनों में जो शत्रु थे, उनका आपने वृत्रासुर की तरह वध किया। जिस प्रकार कुल्हाड़ी वृक्षों को काटती है, उसी प्रकार संग्राम में तीक्ष्ण आयुधों से आपने शत्रुओं को काटा ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप सर्वत्र गमन करने वाले हैं। हम, धन पाने की अभिलाषा से आपका आवाहन करते हैं । आप मित्ररूप होकर हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । वीरपुरुषों सहित संग्राम करने वाले हम रक्षा साधनों के लिए आपका आवाहन करते हैं ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आज और अन्य किसी समय भी आप हम सबके ही रहें । हमारे पास आकर हर समय आप हमें सुख देने वाले हों । गोसेवा की इच्छा वाले, स्तुति करने वाले, हमारा (याजक का), सुख और दुःख दोनों स्थितियों में आपसे सम्बन्ध बना रहे ॥५॥

सूक्त-३४

हे इन्द्रदेव ! आपकी प्राचीन काल में भी अगणित स्तोत्रों से स्तुति की जा चुकी है। आपके स्तोताओं की प्रशंसा होती है । (प्राचीन एवं नूतन) अषियों की स्तुतियाँ परस्पर मानो स्पर्धा सी करती हैं ॥१॥
वे इन्द्रदेव बहुतों द्वारा आवाहित किये गये, अद्वितीय, बहुतों से प्रशंसित, महान् एवं यजमानों द्वारा पूजित हैं। रथ (इच्छित वस्तुएँ लाने वाले) की तरह बल लाभ के निमित्त इन्द्रदेव हम सबके लिए स्तुत्य हैं ॥२॥
जिन इन्द्रदेव के कार्यों में, यज्ञ कर्म एवं स्तोत्रादि बाधक नहीं हैं, वे इन्द्रदेव (की सामर्थ्य व कर्मों) को बढ़ाते हैं। स्तुति द्वारा सेवा के योग्य इन्द्रदेव की सैकड़ों एवं हजारों लोग वन्दना करते हैं। ये स्तोत्र इन्द्रदेव के लिए सुखकर होते हैं ॥३॥
इस यज्ञ के दिन, अर्चना सहित, स्तोत्रों के समान (प्रिय) यह मिश्रित सोमरस इन्द्रदेव के लिए प्रस्तुत किया जाता है । जैसे मरुस्थल में प्रवाहित जल मनुष्यों को आनन्दित करता है, वैसे ही हवियों के साथ अर्पित स्तोत्र भी इन्द्रदेव को आनन्दित करते हैं ॥४॥
सब जगह जाने वाले इन्द्रदेव बड़े युद्ध में हम सबके रक्षक एवं हमें बढ़ाने वाले हैं, इसीलिए स्तोतागण इन्द्रदेव के लिए ही आग्रहपूर्वक स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं ॥५॥

सूक्त-३५

हे रथारूढ़ इन्द्रदेव ! हमारे स्तोत्र कब आप तक पहुँचने योग्य होंगे? कब आप कृपा करके सैकड़ों लोगों का पोषण करने वाला पुत्र एवं धन हमें देंगे? हमारे यज्ञ कर्मों को अन्न से रमणीय कब बनायेंगे ? ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे वीर पुरुषों से शत्रुओं के वीर पुरुषों को एवं हमारे वीर पुत्रों से शत्रुओं के वीर पुत्रों को (संग्राम-क्षेत्र में कब मिलायेंगे ? आप भगोड़े शत्रुओं से दूध-दही और घी देने वाली गौएँ कब जीतेंगे ? हे इन्द्रदेव ! हमें धन की प्राप्ति कब करायेंगे? ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप स्तोताओं को कब अनेकों प्रकार के अन्न प्रदान करेंगे? आप स्तोताओं को गौएँ कब प्रदान करेंगे? और आप कब हमारे कर्मों यज्ञों) और स्तुतियों को अपने से संयुक्त करेंगे ? ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप स्तुति करने वालों को गौएँ, घोड़े एवं बल देने वाला प्रसिद्ध अन्न प्रदान करें। आप अन्न और सुन्दर दुग्ध देने वाली गौओं को पुष्टि प्रदान करें । वे गौएँ और अन्न कान्तियुक्त हों, आप ऐसी कृपा करें ॥४॥
हे इन्द्रदेव !आप अत्यन्त पराक्रमी हैं । आप विभिन्न योजनाएँ बनाकर शत्रु का संहार करें । हे इन्द्रदेव ! आप श्रेष्ठ पदार्थों के देने वाले हैं हम स्तोता उत्तम स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं । हे देव !अङ्गिराओं को अन्न प्रदान करें ॥५॥

सूक्त-३६

हे इन्द्रदेव ! सोम पीकर आपका हर्षित होना हम लोगों का हित करने वाला होता है। देवों के मध्य आप सर्वाधिक बलसम्पन्न हैं। आप अन्नदाता हैं । हे इन्द्रदेव ! पृथ्वी आदि में आपके समस्त धन वास्तव में सबके हित करने वाले हैं ॥१॥
इन्द्रदेव के बल के कारण यजमान हमेशा इन्द्रदेव को पहले पूजते हैं। वे इन्द्रदेव शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले, उन्हें पकड़ने वाले और उनको मारने वाले हैं। शुभकर्मकर्ता इन्द्रदेव वृत्र का वध करने वाले हैं, इसी कारण योजक इन्द्रदेव की सेवा करते हैं ॥२॥
बल एवं शौर्य-पराक्रमयुक्त संरक्षक मरुद्गण और रथ में जुतने वाले घोड़े आदि इन्द्रदेव की सेवा करते हैं । जैसे समस्त नदियाँ अन्तत: सहज ही समुद्र में पहुँचती (गिरती) हैं, वैसे समस्त बलयुक्त स्तुतियाँ इन्द्रदेव तक पहुँचती हैं ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! स्तुति से प्रसन्न होकर, आप बहुतों को अन्न सहित घर देने वाले हैं। हमें भी अन्न प्रदान करें। आप समस्त श्रेष्ठ प्राणियों के स्वामी हैं, सभी भुवनों के आप अधिपति हैं ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे श्रेष्ठ प्रशंसनीय स्तोत्रों को सुनें । हमारे द्वारा पूजा कराने के इच्छुक आप सूर्यदेव के समान शत्रुओं को जीतकर, हमारे लिए पहले के समान ही (हितकारी) रहें ॥५॥

सूक्त-३७

है इन्द्रदेव ! आपके रथ में जुते हुए घोड़े हमारे पास आएँ । वे विश्ववन्द्य रथ साथ लाएँ । आत्मज्ञानी ऋषि आपकी स्तुति करते हैं। वे आपकी कृपा से आनन्द प्राप्त करते हुए सिद्धि प्राप्त करें ॥१॥
हमारे यज्ञ में प्रवाहित होने वाला सोमरस, द्रोण कलशों में भरा जाता है । आनन्द के स्वामी इन्द्रदेव इस सोम का पान करें ॥२॥
सर्वत्रगामी रथ में जुते घोड़े ऋजुमार्गगामी हैं। वे सुन्दर रथ में बलशाली इन्द्रदेव को यज्ञ में लाएँ। इस अमृत रस (सोम को वायु विकृत न करे ॥३॥
अति शीघ्र श्रेष्ठ कर्म करने वाले इन्द्रदेव, हविदाता यजमान को धनवानों में श्रेष्ठ धनवान् बनाते हैं। हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप पापनाशक एवं पापियों को दण्डित करने वाले हैं। यह धन ज्ञानियों के लिए विशेषतः कल्याणकारी होता है ॥४॥
इन्द्रदेव हमारी स्तुतियों के द्वारा प्रवृद्ध होकर हमें उत्तम बल और अन्न प्रदान करें । शत्रु संहारक इन्द्रदेव शत्रुओं का नाश करके हमें जल्दी ही उन धनों को दें ॥५॥

सूक्त-३८

आश्चर्यजनक इन्द्रदेव इस पात्र से सोमरस का पान करें । महान् तेजस्वी इन्द्रदेव इस आवाहन का श्रवण करें । सुबुद्धिपूर्वक की गई याजक की दिव्य स्तुतियों और आहुतियों को ग्रहण करें ॥१॥
इन इन्द्रदेव के श्रोत्र, अति दूर से भी किये जाने वाले स्तोत्रों को सुनने में समर्थ हैं । स्तोता उच्च स्वर से स्तुति करते हैं । ये स्तुतियाँ इन्द्रदेव को आकर्षित करके हमारे समीप लाएँ ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप अजर, पुरातन हैं । हम आपकी उपासना करते हैं। इन्द्रदेव में ही स्तुतियाँ और आहुतियाँ लीन होती हैं। यह महान् यज्ञ भी इनके द्वारा ही बढ़ता है ॥३॥
जिन इन्द्रदेव को यज्ञ, सोम वर्धित करते हैं, (उन्हें ही) ज्ञान, स्तोत्र, प्रहर, उषा, रात्रि, दिवस, मास एवं संवत्सर आदि भी बढ़ाते हैं ॥४॥
हे अति महान् बलशाली इन्द्रदेव ! धन, यश, सुरक्षा (की प्राप्ति) एवं शत्रुओं को पराजित करने के लिए हम आपकी सेवा करते हैं ॥५॥

सूक्त-३९

हे इन्द्रदेव ! यह सोमरस, फलदायक, हर्षित करने वाला, दिव्य ज्ञान बढ़ाने वाला और मधुर है, आप इसका पान करें । हे देव ! स्तोताओं को आप गो दुग्धादि एवं अन्न प्रदान करें ॥१॥
इन्द्रदेव ने गौओं को मुक्त कराने के निमित्त अङ्गिराओं के सहयोग से पणियों को पराजित किया ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! यह सोमरस दिन-रात और वर्ष को प्रकाशित करता है । देवगणों ने इसी सोमरस को दिवसों के ध्वज रूप में स्थापित किया है । सोम ने ही उषाओं को तेजस्वी बनाया है ॥३॥
ये इन्द्रदेव याजकों को वाञ्छित फल प्रदान करते हैं ।इन्हीं इन्द्रदेव ने अश्वों वाले रथ पर धनयुक्त होकर गमन । किया ।सूर्यदेव के समान तेजस्वी इन्द्रदेव ने अपने प्रकाश से अन्धकार युक्त लोकों और उषा को प्रकाशित किया ॥४॥
है इन्द्रदेव ! आप स्तोताओं से स्तुत्य होकर उन्हें उत्तम धन एवं अन्न दें । उपासकों को आप जल, अन्न, बिना विष वाले वृक्ष, गौएँ, अश्व, बल एवं जनशक्ति प्रदान करें ॥५॥

सूक्त-४०

हे इन्द्रदेव ! यह सोमरस आपके आनन्द के निमित्त है। आप अपने मित्रवत् अश्वों कों रथ से खोलकर छोड़ दें और हम सबको स्तुति गान की प्रेरणा दें । स्तोताओं को अन्न प्रदान करें ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आपने उत्पन्न होते ही हर्षित होकर वीरता के कार्य करने के लिए जिस सोमरस का पान किया था, उसी प्रकार अब भी इसका पान करें । गौएँ (दुग्ध के लिए), ऋत्विज (कूटने वाले), पहाड़ के पत्थर (कूटने पीसने के उपरकण), जल (मिलाने के लिए) की सहायता से यह सोमरस बनाया गया है ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! अग्नि प्रदीप्त है एवं सोमरस तैयार हैं। अब आपके रथ में युक्त घोड़े आपको यज्ञशाला में लाएँ । हम मनोयोगपूर्वक आपका आवाहन करते हैं। आप आएँ और हमारा कल्याण करें ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप सोमरस पीने के लिए बार-बार आये हैं। आप हमारी स्तुति को सुनकर यज्ञ में पधारें । याजक आपको पुष्ट करने के लिए यह सोम अर्पित करता है । आप सोम ग्रहण करें ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपका आवाहन करते हैं। आप दूरस्थ द्युलोक में हों अथवा घर में या जहाँ कहीं भी हों, वहीं से हमारी स्तुति को सुनकर मरुद्गणों सहित पधारकर हमारी रक्षा करें ॥५॥

सूक्त-४१

हे इन्द्रदेव ! शान्त होकर हमारे यज्ञ में पधारें । यह सोमरस आपके निमित्त है । जैसे गौएँ गोष्टों में जाती हैं, वैसे ही यह सोमरस कलशों में जाता है। यजनीय देवगणों में प्रमुख हे इन्द्रदेव ! आप हमारे निकट आएँ ॥१॥
है इन्द्रदेव ! आप उत्तम जिह्वा से मधुर रस की तरंगों को सदैव ग्रहण करते हैं। उसी से इस सोमरस की पान कर हमारी रक्षा करें । अध्वर्यु आपके निकट उपस्थित हो रहे हैं । गौओं के रक्षक हे इन्द्रदेव ! आप वज्र से शत्रुओं का संहार करें ॥२॥
इन्द्रदेव के निमित्त यह द्रवरूप, बलवर्धक तथा सभी प्रकार से अभीष्ट-वर्षक सोमरस तैयार हैं । हे पराक्रमी, युद्धजयी इन्द्रदेव ! जिसके आप स्वामी हैं, जो आपका अन्न है, उस सोमरस का आप पान करें ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! शोधित सोम अशोधित सेम से श्रेष्ठ है। यह आपको आनन्द देने वाला है । आप सोमरस के समीप पधारें । हे शत्रु का संहार करने वाले इन्द्रदेव ! आप इसका पान कर समस्त बलों का विकास करें ॥४॥
है इन्द्रदेव ! हम आपका आवाहन करते हैं, यह सोमरस आपके लिए पुष्टिकारक हैं । आप यहाँ पधारें। आप इस सोमरस का पान कर आनन्दित हों तथा संग्राम में हमारी एवं प्रजाओं की रक्षा करें ॥५॥

सूक्त-४२

है ऋत्विजों ! इन्द्रदेव के लिए सोमरस प्रेषित करें । वे इन्द्रदेव सर्वत्र गमन करने वाले, सर्वज्ञ एवं यज्ञ के प्रधान हैं ॥१॥
हे ऋत्विजो ! आप सोम के पात्रों सहित संस्कारित , रसयुक्त, दीप्तिमान् सोमरस को रुचिपूर्वक पीने वाले इन इन्द्रदेव के पास जाकर प्रार्थना करें ॥२॥
हे ऋत्विजो ! रसयुक्त, दीप्तिमान् सोम को लेकर मनोरथों को जानने वाले इन्द्रदेव की शरण में जाने पर , वे विघ्नों को दूर करते हुए आपकी सभी इच्छाओं को पूर्ण कर देंगे ॥३॥
हे अध्वयों ! इन इन्द्रदेव के लिए प्राणरूप सोमरस भरपूर मात्रा में प्रदान करें । वे इन्द्रदेव स्पर्धा योग्य तथा जीतने योग्य शत्रुओं को विनष्ट करके आपकी रक्षा करेंगे ॥४॥

सूक्त-४३

है इन्द्रदेव ! जिस सोमरस को पी करके मदोन्मत्त आपने दिवोदास के कल्याण के लिए शम्बरासुर का हनन किया, उस शोधित सोमरस को आप पुनः सेवन करें ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! अति उत्साहवर्धक सोमरस, प्रातः, मध्याह्न और सायं-तीनों कालों में तैयार होता है, उसे आप ही ग्रहण करते हैं । इस अभिषुत सोमरस का आप पान करें ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! जिस सोमरस का पान करके आपने गौओं को मुक्त कराया था। तैयार किये गये उसी प्रकार के इस सोमरस का आप पान करें ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप अन्नरूप से जिस सोमरस को पीकर हर्षित होते हैं एवं विशिष्ट बल युक्त होते हैं, वैसा ही सोमरस आपके लिए तैयार है। आप इसे ग्रहण करें ॥४॥

सूक्त-४४

है शक्ति-सम्पन्न इन्द्रदेव ! शोभायमान, अति देदीप्यमान उपासकों को धन देने वाला यह सोमरस आपको आनन्द देने वाला है ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप बल को बढ़ाने वाले सोम के रक्षक हैं। आपको हर्ष प्रदान करने वाला यह सोम, स्तुति करने वालों को वैभव प्रदान करता है ॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप अन्नरूप सोम की रक्षा करते हैं। उसी सोमरस का पान करके आप मरुद्गणों के सहयोग से शत्रुओं का संहार करते हैं । वह सोमरस आपको आनन्दित करता है ॥३॥
यजमानों के हित के लिए कल्याणकारी बल एवं अन्न के अधिपति, शत्रुओं को पराजित करने वाले, यज्ञ के नायक, श्रेष्ठ दाता, सर्वज्ञ इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं ॥४॥
हमारे द्वारा की जा रही स्तुतियों से इन्द्रदेव का वह बल विवर्धमान होता है, जिसके द्वारा वे शत्रुओं को पराजित करके धन प्राप्त करते हैं । इन्द्रदेव के उस बल की सराहना द्यावा-पृथिवीं भी करते हैं ॥५॥
हे स्तोताओ ! आप इन्द्रदेव की स्तुति के लिए स्तोत्रों को प्रसारित करें । बुद्धिमानों के समान सामर्थ्ययुक्त इन्द्रदेव हमारे रक्षक हैं ॥६॥
यज्ञकर्म करने में कुशल याजकों को वे इन्द्रदेव जानते हैं। सोमरसपायी इन्द्रदेव स्तुति करने वालों को उत्तम धन प्रदान करते हैं। द्यावा-पृथिवी को कम्पित करने वाले अश्वों के साथ इन्द्रदेव सखा भाव वालों की रक्षा करते हैं ॥७॥
ऋत्विग्गण इन्द्रदेव का आवाहन उसी सोमरस के लिए करते हैं, जो यज्ञ में पिया जाता है। वे विशाल शरीर वाले, शत्रुओं को पराजित करने वाले इन्द्रदेव हम स्तोताओं के स्तोत्रों को सुनकर हमारे पास आएँ ॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें तेज, बल एवं प्रचुर अन्न प्रदान करें। अपने शत्रुओं को भगाएँ एवं हमारी रक्षा करें; ताकि हम सब धन और अन्न के सहित सुख से रह सकें ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमसे अप्रसन्न न हों, इसीलिए हम आपको आहुति प्रदान करते हैं । आपसे श्रेष्ठ अन्य कोई हमारा मित्र नहीं हैं। यदि आपकी ऐसी महिमा न होतीं, तो आप रत्नों (श्रेष्ठ सम्पदाओं) के प्रेरक न कहलाते ॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप महान् बलवान् हैं, हमें हिंसक असुरों से बचाएँ । आप धनवान् हैं । हम आपके मित्र बनकर रहें एवं दुःख न पायें । आपके निमित्त जो सोमरस तैयार नहीं करते एवं हवि प्रदान नहीं करते तथा आपके कार्यों में उत्पात मचाने वाले शत्रु हैं, आप उनका विनाश करें ॥११॥
मेघ जिस तरह गर्जना (ध्वनि) उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार इन्द्रदेव स्तुतिकर्ताओं के लिए घोड़े, गौएँ उत्पन्न करते हैं । धनवान् (धन का दुरुपयोग करके) आपको कष्ट न पहुँचाएँ ॥१२॥
हे त्विजो ! आप महत्त्वपूर्ण कर्म करने वाले इन्द्रदेव के लिए सोमरस तैयार करें । वे इन्द्रदेव ही सोमाधिपति हैं। ये इन्द्रदेव पुरातन एवं नवीन स्तोत्रों द्वारा वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥१३॥
सोमरस पान कर उत्साहित ज्ञानी इन्द्रदेव ने विपरीत योजना बनाने वाले शत्रुओं का संहार किया था। इन वीर इन्द्रदेव के लिए सोमरस प्रस्तुत करें । सोमपान करके वे इन्द्रदेव, कपटपूर्ण ढंग से घेरकर कष्ट देने वाले शत्रुओं का संहार करें ॥१४॥
इस तैयार सोमरस का पान करके वे रक्षक, निवास दाता इन्द्रदेव वज्र द्वारा वृत्रासुर का वध करें। वे इन्द्रदेव दूर हों, तो भी इस यज्ञ में आएँ ॥१५॥
यह सोमरस इन्द्रदेव को अति प्रिय पेय पदार्थ है । वे योग्य पात्र से इसका पान कर प्रसन्न और हर्षित हों । उनकी कृपा से शत्रु और पाप हमसे दूर हों ॥१६॥
हे शूरवीर, धनवान् इन्द्रदेव ! सोमरस का पान कर आप हमारे विरोधी शत्रुओं का आयुधों सहित विनाश करें तथा उन्हें पराजित करके हमसे दूर भगायें ॥१७॥
हे इन्द्रदेव ! आप धनवान् हैं। इन संग्रामों में हमें सुखदायी बहुत सा धन प्राप्त कराएँ। आप हमें विजय प्राप्ति के योग्य सामर्थ्य प्रदान करें तथा पुत्र-पौत्रों एवं जल-वृष्टि से हमें समृद्ध बनाएँ ॥१८॥
हे इन्द्रदेव ! आपके अश्व बलवान्, कामनाओं की पूर्ति में सहायक, रथ में स्वयं युक्त होने वाले, वेगवान्, तथा प्रचुर वज्र जैसे तीक्ष्ण भार वहन करने वाले हैं। वे सोमपान करके आनन्दित होने के लिए आपको इस यज्ञ में लाएँ ॥१९॥
हे इन्द्रदेव ! आप कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं। समुद्र की लहरों के समान आनन्दित करने वाला यह सोमरस आपके पात्र में है । ऋत्विग्गण आपके लिए अभिषुत सोमरस प्रेषित करते हैं ॥२०॥
हे इन्द्रदेव ! यह मधुर, सरस सोम आपके लिए प्रस्तुत है । आप ही नदियों के जल को प्रवाहित करने वाले एवं प्राणियों को अभीष्ट प्राप्ति हेतु बलवान् बनाने वाले हैं ॥२१॥
इस तेजस्वी सोम ने इन्द्रदेव से युक्त होकर ‘पणि' असुर को बल से रोका । इसी सप्रेम ने धनों के पालक के अशिव (अकल्याणकारी) आयुधों एवं माया ( प्रपंचों) को नष्ट किया ॥२२॥
इसी (तेजस्वी सोम) ने उषाकाल को सूर्य से युक्त किया। इसी ने सूर्यदेव को तेजस्वी बनाया। तीन प्रकार ( तीनों सवनों ) वाले इसी (सोम) ने तीसरे स्थान पर छिपे अमृत को प्राप्त किया ॥२३॥
इसी (सोम) ने द्यावा-पृथिवीं को सुस्थिर किया है । इसी ने सूर्यदेव के रथ में सात किरणों को युक्तं किया है । इसी ने गौओं में परिपक्व दुग्ध को स्थापित किया है। इसी सोम ने दुग्ध को शक्ति से भरपूर किया है, जो इस दस इन्द्रियों वाले शरीर को पुष्ट करता है ॥२४॥

सूक्त-४५

शत्रुओं के द्वारा तुर्वश और यदु (पराक्रमी राजाओं) को बहुत दूर फेंका गया था। वहाँ से इन्द्रदेव ही उन्हें उत्तम नीति से सरलतापूर्वक लौटाकर लाए थे। वे युवा (स्फूर्तिवान्) इन्द्रदेव हमारे मित्र हैं ॥१॥
इन्द्रदेव अज्ञानी को अन्न प्रदान करते हैं। धीरे-धीरे चलने वाले अश्वों से भी शत्रुओं को परास्त कर उनका धन हर लेते हैं ॥२॥
इन्द्रदेव की संचालक शक्तियाँ अनेक हैं । इन्द्रदेव की स्तुतियाँ भी अनेक प्रकार की हैं। उनकी रक्षा करने वाली शक्ति भी कमजोर नहीं पड़ती ॥३॥
हे मित्रो ! आप सब इन्द्रदेव की प्रार्थना करें। आप उन्हीं का पूजन करें, वे इन्द्रदेव ही हमें श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं ॥४॥
हे वृत्रासुर को मारने वाले इन्द्रदेव ! आप स्तुति करने वालों के रक्षक हैं । आप हम सबकी रक्षा करें ॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे शत्रुओं को हमसे दूर भगाते हैं । हम आपकी प्रशंसा करते हैं। आप श्रेष्ठ वीर कहलाते हैं ॥६॥
इन्द्रदेव ज्ञानी हैं, अत: ज्ञानपूर्वक स्तुत्य हैं । वे मित्र हैं, प्रशंसा के योग्य हैं, ऐसे इन्द्रदेव को हम स्तुति करके वैसे ही बुलाते हैं, जैसे दोहन के लिए गौओं को बुलाया जाता है ॥७॥
शत्रुओं को पराजित करने वाले इन्द्रदेव के दोनों हाथों में दोनों प्रकार की (दिव्य एवं पार्थिव सम्पत्तियाँ) हैं, ऐसा ऋषियों ने कहा है ॥८॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप सर्वशक्तिमान् हैं। आप शत्रुओं के किलों, नगरों एवं बलों को ध्वस्त करने वाले हैं। हे अनानत् (न झुकने वाले) इन्द्रदेव ! आप उनकी माया को नष्ट करें ॥९॥
हे सोमरस पीकर आनन्दित हुए इन्द्रदेव ! हम अन्न प्राप्ति की इच्छा से आपका आवाहन करते हैं ॥१०॥
युद्ध में सहायता के लिए प्राचीनकाल में आपको ही बुलाया गया था, भविष्य में भी आपको ही बुलाया जायेगा । जो संग्राम के समय बुलाए जाते हैं। जिनकी सहायता से शत्रु द्वारा धन प्राप्त होता है। उन इन्द्रदेव को हम बुलाते हैं । वे हमारे आवाहन को सुनें ॥११॥
हे इन्द्रदेव !आप हमारी स्तुति से प्रसन्न हों । हम आपके अनुकूल होकर, शत्रु को जीतकर धन प्राप्त करें ॥१२॥
हे इन्द्रदेव !आप वीर एवं स्तुति के योग्य हैं। आपने शत्रुओं के धन को प्राप्त करने के लिए उन्हें जीता ॥१३॥
हे इन्द्रदेव !आप तीव्रगामी हैं । शत्रु को जीतने के लिए आप उसी वेग से हमारे रथ को चलने की प्रेरणा दें ॥१४॥
हे इन्द्रदेव ! आप महारथी हैं। आप अपने शत्रुओं को जीतने वाले रथ से शत्रुओं की सम्पत्ति को जीतें ॥१५॥
जो इन्द्रदेव प्रजाओं के स्वामी हैं, बल से होने वाले कार्यों को करने वाले एवं सबको विशेष दृष्टि से देखन वाले हैं, उन इन्द्रदेव की स्तुति करें ॥१६॥
हे इन्द्रदेव ! आप सबकी रक्षा करने वाले मित्र रूप हैं । आप सुखदाता एवं स्तोताओं के बन्धु सदृश हैं। आप हमें सुख प्रदान करें ॥१७॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप असुरों का संहार करने के लिए वज्र को धारण करें और स्पर्धा करने वाले शत्रुओं को पराजित करें ॥१८॥
जो इन्द्रदेव मित्ररूप, स्तुति करने वालों के प्रेरक, धन देने वाले एवं आवाहन करने योग्य हैं। हम उन इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं ॥१९॥
जो इन्द्रदेव अतिशय स्तुत्य एवं तीव्रगामी हैं, वे इन्द्रदेव समस्त पार्थिव धनों के एक मात्र स्वामी हैं ॥२०॥
हे गोपते इन्द्रदेव ! आप बहुत सी गौएँ एवं घोड़े प्रदान करके हमारी इच्छाओं की पूर्ति करें ॥२१॥
है स्तुतिरत स्तोताओ ! आप शत्रु को जीतने वाले इन्द्रदेव का यशोगान करें । जैसे गाय उत्तम घास से प्रसन्न होती है, वैसे ही तैयार सोम सहित स्तुति से इन्द्रदेव सुख पाते हैं ॥२२॥
सभी के आश्रयदाता वे इन्द्रदेव हमारी स्तुतियों को सुनने के बाद हमें धन-धान्य के रूप में अपार वैभव देने से नहीं रुकते हैं ॥२३॥
हे इन्द्रदेव ! हिंसा करने वालों, गोशाला से गौएँ चुराने और उन्हें छिपा देने वालों को आप शीघ्रता से हूँढ़ कर दण्डित करें और गौओं को मुक्त कराएँ ॥२४॥
हे इन्द्रदेव ! गौएँ जिस तरह बछड़ों की पुकार पर उनकी ओर भागती हैं, वैसे ही वे स्तुतियाँ आपकी ओर ही गमन करती हैं ॥२५॥
हे इन्द्रदेव ! आप गाय एवं घोड़ों की इच्छा करने वालों की इच्छा को पूर्ण करते हैं। आपकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती है ॥२६॥
हे इन्द्रदेव !आप अपने लिए प्रदत्त अन्नरूप सोम से हृष्ट-पुष्ट हों । स्तोताओं को निन्दक के अधीन न होने दें॥२७॥
हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! जिस प्रकार दुधारू गौएँ बछड़ों के पास स्वयं ही जा पहुँचती हैं, उसी प्रकार सोम निष्पादन के समय स्तुतियाँ आपके पास स्वत: पहुँचती हैं ॥२८॥
हमारी श्रेष्ठतम स्तुतियाँ आपको प्राप्त होती हैं । हविष्यान्न के साथ (संयुक्त होकर) वे आपको बलवान् बनायें ॥२९॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे स्तोत्र आप तक पहुँचें, उनसे प्रसन्न होकर आप हमें श्रेष्ठ धन प्रदान करें ॥३०॥
'बृबु' ने पणियों (व्यापारियों अथवा असुरों) के बीच ऊँचा स्थान प्राप्त किया । गंगा के ऊँचे तटों के समान वे महान् हुए ॥३१॥
वायु की तरह शीघ्रगामी बुबु की हजारों दान देने की कल्याणकारिणी प्रवृत्ति, धन की कामना से स्तुति करने वाले मुझ स्तोता को अपेक्षित धन प्रदान करती हैं ॥३२॥
सहस्रों गौओं के दान करने वाले दानी बुबु की प्रशंसा के लिए हम उनकी स्तुति करते हैं ॥३३॥


सूक्त-४६

-हे इन्द्रदेव ! हम स्तोतागण आपका आवाहन अन्न प्राप्ति की इच्छा से करते हैं। आप सज्जनों के रक्षक हैं । शत्रु को जीतने के निमित्त आपका आवाहन करते हैं ॥१॥
विपुल पराक्रमी, वज्रधारी, बलधारक, हे इन्द्रदेव ! अपनी असुरजयी शक्ति से महान् हुए आप हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर, हम साधकों को पशुधन तथा ऐश्वर्य प्रदान करें ॥२॥
जो इन्द्रदेव एक साथ शत्रुनाशक तथा सर्वद्रष्टा हैं, उन इन्द्रदेव का हम आवाहन करते हैं। मन्यु से युक्त, धन-सम्पन्न, सज्जनों के प्रतिपालक हे इन्द्रदेव ! आप रणक्षेत्र (जीवन-संग्राम) में तथा ऐश्वर्य की वृद्धि में हमारे सहायक बनें ॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप ऋचा में कहे अनुसार कर्म करने वाले हैं। आप संग्राम में शत्रुओं पर वृषभ की तरह आक्रमण करें । महान् धन प्राप्ति के संग्राम में आप हमारी रक्षा करें । ताकि हम शरीर उदक और सूर्य का भोग करते रहें अर्थात् दीर्घायुः हों ॥४॥
हे वज्रपाणि देवेन्द्र ! हमें ओज एवं बल प्रदान करने वाले अन्न (पोषक तत्व) प्रदान करें । जो पोषक अन्न द्युलोक एवं पृथ्वी दोनों को पोषण देते हैं, उन्हें हम अपने पास रखने की कामना करते हैं ॥५॥
हे इन्द्रदेव ! हम अपनी रक्षा के लिए आपका आवाहन करते हैं । आप महाबलशाली और शत्रुओं के विजेता हैं। आप सभी असुरों से हमारी रक्षा करें । संग्राम में हम जीत सकें, आप ऐसी कृपा करें ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! संगठित प्रजा में जो पराक्रम है, पाँच जनों (समाज के पाँच वर्गों, पंचतत्वों अथवा पंचवर्गों) में जो धन है वैसा ही ऐश्वर्य आप हमें प्रदान करें । एकता से उत्पन्न होने वाली शक्ति हमें प्राप्त हो ॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें तक्षु (समर्थों) द्राह्य (द्रोह करने वालों) एवं पुरु (पालन करने वालों) का समय बल प्रदान करें । बलवान् होकर युद्ध में शत्रुओं पर हम विजय प्राप्त करें ॥८॥
हे इन्द्रदेव ! ऐश्वर्य सम्पन्नों जैसा त्रिधातुयुक्त तीनों ऋतुओं में हितकारी आश्रय (घर या शरीर) हमें भी प्रदान करें। इससे चमक (भापक, चकाचौंध) दूर करें ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! जो शत्रु गौओं को छीनने के लिए आते है उन पर आप घर्षण शक्ति से प्रहार करते हैं। हे धनवान् प्रशंसनीय इन्द्रदेव ! आप समीपवर्ती शत्रुओं से हमारी रक्षा करें । हमारे शरीर की रक्षा करें ॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे सम्वर्धन करने वाले हैं । युद्ध में शत्रुओं द्वारा छोड़े गये पंख वाले पैने और तेजस्वी वाण अन्तरिक्ष मार्ग से जब हमारे ऊपर बरसते हैं, तब उनसे आप हमारी रक्षा करते हैं ॥११॥
जिस समय अनीति प्रतिरोध के लिए शूरवीर अपना शरीर अर्पित करते हैं, तब पितरों को परमप्रिय सुख (सन्तोष) होता है। ऐसे समय में हे इन्द्रदेव ! आप हमारे शरीर और पुत्रों की रक्षा के लिए सुरक्षित निवास दें तथा शत्रुओं को मार भगायें ॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! जब युद्ध हो, तब आप हमारे घोड़ों को तीव्रगामी श्येन पक्षी की तरह, विषम मार्गों से भी होते हुए रणक्षेत्र में ले जाने की प्रेरणा प्रदान करें ॥१३॥
युद्ध के समय घोड़े भय से हिनहिनाते हैं, किन्तु वीरों के घोड़े ऊपर से नीचे की ओर तीव्र गति से बहने वाली नदियों की तरह एवं बाज पक्षी के झपट्टे की तरह अति वेगपूर्वक दौड़ते हैं और विजय प्राप्त करते हैं ॥१४॥

सूक्त-४७

सोमरस तीक्ष्ण, मधुर एवं रुचिकर स्वाद वाला होता है । इस सोम के पीने वाले इन्द्रदेव को युद्ध में कोई जीत नहीं सकता ॥१॥
यह सोम हर्षित करने वाला है, अत: इसको पीकर इन्द्रदेव ने 'वृत्रासुर' का नाश किया तथा शम्बर के अनेक किलों को ध्वस्त किया ॥२॥
सोमरस बुद्धि और वाणी को तेजस्वी और गम्भीर बनाता है । इसी सोम ने स्वर्ग, पृथ्वी, जल, ओषधि, दिन एवं रात्रि बनाये हैं ॥३॥
इस सोम ने ही अन्तरिक्ष, पृथ्वी, और द्युलोक को सुविस्तृत एवं सुदृढ़ किया है। इसी ने जल, ओषधियों एवं गो-दुग्ध में अमृत स्थापित किया है ॥४॥
अन्तरिक्ष में स्थित विभिन्न उषाएँ सोम की विचित्र ज्योति से ज्योतित हैं । यह सोम बहुत बलशाली, महान् और उत्साहयुक्त द्युलोक में स्थित है ॥५॥
हे शूरवीर इन्द्रदेव ! आप धन प्राप्ति हेतु हो रहे संग्रामों में, सोमरस पीकर शत्रुओं का संहार करें । हे धन के स्वामी ! आप हमें धन प्रदान करें ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप नीति-निपुण हैं । आप हमारे मार्गदर्शक बनें, श्रेष्ठ धनवान् आप हमें सुगमतापूर्वक धन प्राप्त कराकर दु:खों एवं शत्रुओं से बचाएँ ॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप ज्ञानवान् हैं, सर्वज्ञ हैं, अत: आप हमें इस बड़े क्षेत्र की बाधाओं से निकाल कर सरलता पूर्वक लक्ष्य तक ले चलें । आपका अभय, सुखद, कल्याणकारी तेज, हमें आपके वरदहस्त के आश्रय में मिले ॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें उत्तम, तीव्रगामी अश्वों से युक्त विशाल रथ पर बिठाएँ। आप हमें अन्नों में श्रेष्ठ अन्न प्रदान करें। आपकी कृपा से शत्रु हमारा धन क्षीण न कर सकें ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें श्रेष्ठ कर्म करने वाले तीक्ष्ण बुद्धि एवं सुखमय दीर्घजीवन प्रदान करें। इस प्रार्थना को सुनकर आपकी कृपा से देवगण हमारी रक्षा करें ॥१०॥
हम कल्याणकारी कामना से संरक्षक, सहायक, युद्ध में आवाहन योग्य, पराक्रमी, सक्षम तथा अनेक स्तोताओं द्वारा स्तुत्य इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यवान् वे इन्द्रदेव हमारा कल्याण करें ॥११॥
वे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव स्वयं की रक्षणशक्ति के द्वारा हमारी रक्षा कर, हमें सुखी बनाएँ । वे इन्द्रदेव ही हमारे शत्रुओं का संहार कर, हमें अभय करते हैं। वे देव हमसे प्रसन्न हों , हमें बलवान् बनाएँ ॥१२॥
वे इन्द्रदेव पूज्य हैं, वे हमें बुद्धि और पालन करने वाला धन देकर हमारा कल्याण करें। वे दूरस्थ छिपे हुए (अप्रकट) शत्रुओं को हमसे दूर ले जाएँ ॥१३॥
जैसे जल-प्रवाह नीचे की ओर तीव्र गति से प्रवाहित होता है, वैसे ही ये स्तोत्र एवं सोम वज्रधारी इन्द्रदेव की ओर गमन करते हैं। वे इन्द्रदेव (सोम में) जल, गाय का दूध, दही आदि मिश्रित करते हैं ॥१४॥
इन्द्रदेव को यजन एवं स्तुति द्वारा प्रसन्न करने में कौन मनुष्य समर्थ हैं? वे इन्द्रदेव सदा अपनी शक्ति को जानते हैं। वे सदैव हमारी रक्षा एवं उन्नति करें । वे उसी प्रकार एक के बाद दूसरी उन्नति प्रदान करते हैं, जैसे रागीर एक के बाद दूसरा कदम बढ़ाता चलता है ॥१५॥
इन्द्रदेव शत्रुओं का दमन करते और स्तोताओं को स्थान बदलते हुए उन्हें आगे बढ़ाते हैं। इन्द्रदेव का पराक्रम सर्वविदित है । ये सबके राजा इन्द्रदेव याजकों का सब प्रकार से संरक्षण करते हैं ॥१६॥
जो पहले मित्रवत् रहकर अनुभवी एवं पुराने हो गये हैं, उनकी अपेक्षा इन्द्रदेव नवीन याजकों का अधिक ध्यान रखते हैं । इन्द्रदेव उपासना न करने वालों का त्याग कर, उपासकों का कल्याण करते हैं ॥१७॥
इन्द्रदेव विभिन्न शक्तियों द्वारा अनेक रूप बनाकर यजमान के पास प्रकट होते हैं। इन्द्रदेव के रथ में उनकी अनेक शक्तियों के रूप में सहस्रों घोड़े जुते हैं ॥१८॥
इन्द्रदेव स्वर्णिम आभायुक्त अश्वों को अपने रथ में जोड़कर त्रिलोक में प्रकाशित होते हैं। स्तोताओं के बीच पहुँचकर अन्य कौन उनकी रक्षा करता है? ॥१९॥
हे इन्द्रदेव ! गौओं से हीन इस क्षेत्र में हम आ गये हैं। इस विस्तृत भूमण्डल में दस्यु भी निवास करते हैं। हे बृहस्पते !आप हमें गौएँ खोजने की प्रेरणा दें । हे इन्द्रदेव ! पथ से भटके मनुष्यों को आप श्रेष्ठ मार्ग पर लाएँ ॥२०॥
इन्द्रदेव सूर्यरूप से प्रकट होकर अन्धकार को समाप्त करते हैं । इन्द्रदेव ने ही शम्बर (शक्तिनाशक) तथा वर्ची (तेजस्वीं) असुरों का अपने तेज से नाश किया था ॥२१॥
हे इन्द्रदेव ! प्रस्तोक ने स्तोताओं को सोने के खजाने एवं दस घोड़े प्रदान किए। शम्बर के धन को 'अतिथिग्व' ने जीता था और उसी धन को 'दिवोदास द्वारा हमने प्राप्त किया ॥२२॥
दिवोदास ने दस अश्व, दस खजाने, वस्त्र, भोजन एवं सोने के दस पिण्ड हमें प्रदान किये ॥२३॥
अश्वत्थ ने पायु के लिए घोड़ों सहित दस रथ एवं सौ गौएँ अथर्वाओं को प्रदान कीं ॥२४॥
भरद्वाज के पुत्र ने मनुष्यों के हितकारी धन को ग्रहण किया ।सृञ्जय के पुत्र ने धन प्रदान कर सबका सत्कार किया ॥२५॥
वनस्पति-काष्ठ निर्मित हो रथ ! आप हमारे मित्र होकर मजबूत अंग तथा श्रेष्ठ योद्धाओं से सम्पन्न होकर संकटों से हमें पार लगाएँ। आप श्रेष्ठकर्म द्वारा बँधे हुए हैं, इसलिए वीरतापूर्ण कार्य करें । हे रथ ! आपका सवार जीतने योग्य समस्त वैभव को जीतने में समर्थ हो ॥२६॥
हे अध्वर्यो ! आप पृथ्वी और सूर्यलोक से ग्रहण किये गये तेज को, वनस्पतियों से प्राप्त बल को, जल से प्राप्त पराक्रम वाले रस को सब तरफ से नियोजित करें । सूर्य किरणों से आलोकित वज्र के समान सुदृढ़ रथ को यजन कार्य में समर्पित करें ॥२७॥
हे दिव्य रथ ! आप इन्द्रदेव के वज्र तथा मरुतों की सैन्य शक्ति के समान सुदृढ़ एवं मित्रदेव के गर्भरूप आत्मा तथा वरुणदेव की नाभि के समान हैं। हमारे द्वारा समर्पित हविष्यान्न को प्राप्त कर तृप्त हों ॥२८॥
हे दुंदुभे !आप अपनी ध्वनि से भू तथा द्युलोक को गुंजायमान करें, जिससे जंगम तथा स्थावर जगत् के प्राणी आपको जानें ।आप इन्द्र तथा दूसरे देवगणों से प्रेम करने वाले हैं, अत: हमारे रिपुओं को हमसे दूर हटाएँ ॥२९॥
हे दुंदुभे ! आपकी आवाज को सुनकर शत्रु-सैनिक रोने लगें। आप हमें तेज प्रदान करके हमारे पापों को नष्ट करें । आप इन्द्रदेव की मुष्टि के समान सुदृढ़ होकर हमें मजबूत करें तथा हमारी सेना के समीप स्थित दुष्ट शत्रुओं का पूर्णरूपेण विनाश करें ॥३०॥
हे इन्द्रदेव ! उद्घोष करके आप दुष्टों की सेनाओं को भली प्रकार दूर भगाएँ । हमारी सेना विजय उद्घोष करती हुई लौटे। हमारे द्रुतगामी अश्वों के साथ वीर रथारोही घूमते हैं, वे सब विजयश्री का वरण करें ॥३१॥

सूक्त-४८

हम सर्वज्ञ, अमर, हितकारी, मित्रवत् अग्निदेव की प्रशंसा करते हैं । हे उद्गाताओ ! आप भी प्रत्येक स्तुति एवं यज्ञायोजन में उन बलशाली अग्निदेव की स्तुति करें ॥१॥
ऊर्जा को सतत बनाये रखने वाले अग्निदेव की हम प्रार्थना करते हैं। वे निश्चय ही हमारे लिए हितकारी हैं। उन हव्यवाहक को हम हृव्य प्रदान करते हैं। वे हमारी रक्षा करें, हमारे पुत्रों की रक्षा करें ॥२॥
हे अग्निदेव ! आप तेजस्वी हैं, महान् हैं। आप हमारी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। आप अतिदीप्तिमान् हैं, हमें भी श्रेष्ठ कान्ति से कान्तिमान् बनायें ॥३॥
हे अग्निदेव ! आप महान् देवगणों का यजन करते हैं। आप हमारे यज्ञ में भी देवों के निमित्त यजन करें । आप हमारे द्वारा अर्पित आहुतियों को ग्रहण करें और हमें अन्न प्रदान करें। अपनी बुद्धि और कर्म से रक्षक देवताओं को हमारे अनुकूल करें ॥४॥
हे अग्निदेव !अरणि, अभिषवण प्रस्तर एवं जल मिलाया हुआ सोमरस आपको पुष्ट करता है ।त्विजों ने अरणि मन्थन से आपको उत्पन्न किया ।पृथ्वी के स्थल यज्ञ में आप प्रतिष्ठित होते हैं ।यज्ञ के गर्भरूप आप ही हैं ॥५॥
जो अग्निदेव, अपनी कान्ति से सम्पूर्ण द्यावा-पृथिवी को एवं अन्तरिक्ष को धूम्र से परिपूर्ण कर देते हैं, वे तेजस्वी अग्निदेव, काली रात्रि के घोर अन्धकार को दूर करते हैं । वे कामनानुसार वर्षा करने वाले हैं ॥६॥
हे बड़ी ज्वालाओं से युक्त तरुण अग्ने ! सम्पन्नता एवं पवित्रता प्रदान करने वाले आप महान् हैं ।आप अपने प्रखर तेज से भरद्वाज (पूर्ण ज्ञानी ऋषि) के लिये अत्यन्त तेजस्वीरूप में प्रज्वलित हों और ऐश्वर्य प्रदान करें ॥७॥
हे अग्निदेव ! आप सभी मानवी प्रजाओं के घर के स्वामीरूप हैं, हम आपको सौ वर्षों के लिए प्रदीप्त करेंगे। आप सैकड़ों उपायों द्वारा पापों एवं शत्रुओं से हमारी रक्षा करें तथा उस यजमान की भी रक्षा करें, जो आपके तोता को अन्न प्रदान करता है ॥८॥
है सबके आश्रयदाता अग्निदेव ! आपकी शक्ति अद्भुत है, अपार है। आप अपनी क्षमता से वैभव लाने में समर्थ हैं । आप समृद्धि को हमारे पास आने दें तथा हमारी सन्तानों को भी प्रतिष्ठा प्रदान करें ॥९॥
हे अग्निदेव ! विरोधमुक्त, सहयोगयुक्त, पराभूत न होने वाले आप अपने संरक्षण-साधनों से हमारे पुत्र-पौत्रों का पालन करें । दैवी प्रकोपों से हमें बचायें, मानुषी-राक्षसी वृत्तियों से भी हमारी रक्षा करें ॥१०॥
हे मित्रो !नवीन स्तुति द्वारा पोषक दुग्ध देने वाली गौ को ले आएँ ।बिना हानि पहुँचाए, उसे बन्धन-मुक्त करें ॥११॥
जिस गौं ने बलयुक्त स्वप्रकाशित मरुद्गणों को अमर अन्नरूपी दुग्ध प्रदान किया, जो द्रुतगामी मरुतों को सुख प्रदान करती है, वह (दिव्य गौ) श्रेष्ठ कार्यों द्वारा ही प्राप्त होती है ॥१२॥
हे मरुद्गणो ! भरद्वाजों को अपने दो वस्तुएँ प्रदान कीं, विश्वदोहस (सबके निमित्त दुहीं जाने वाली) गौ, तथा विश्वभोजस (सबको भोजन देने वाला) अन्न ॥१३॥
हे मरुद्गण ! आप वरुण के समान स्तुति-योग्य हैं । इन्द्रदेव के कार्यों में सहयोग करने वाले हैं । विष्णुदेव की तरह सुखदायी, उत्तम भोजन देने वाले हैं। धन के लिए हम आपकी स्तुति करते हैं ॥१४॥
तेजस्वी, बहुशः प्रशंसित, पोषण करने वाले, बलवान् मरुद्गण गुप्त धन प्रकट करके हमें सुखपूर्वक उपलब्ध कराएँ ॥१५॥
हे पूषन्देव ! हम आपका यशोगान करते हैं। हम गुप्तरूप से यह प्रार्थना करते हैं कि आप हमारी रक्षा के लिए हमारे पास आयें, ताकि कंजूस, पापी शत्रु हमसे दूर रहें ॥१६॥
है पूषन्देव ! आप हमारी निन्दा करने वालों को मारें । जैसे व्याध और शिकारी पक्षियों को पकड़ कर उनका हरण करते हैं, वैसे शत्रु हमारा हरण न कर सकें । हे देव ! आप "काकम्बीर" वनस्पति को नष्ट न होने दें ॥१७॥
हे पूषन्देव ! आप से हमारी मित्रता छिद्ररहति दधि पात्र के समान निर्बाध एवं अविच्छिन्न बनी रहे ॥१८॥
हे पृषादेव ! आप मानवों से श्रेष्ठ एवं अन्य देवों के समान धनवान हैं । आप हमारी प्राचीनकाल की तरह ही रक्षा करें ॥१९॥
हे शत्रु को कम्पित करने वाले, पूजनीय मरुद्गणो ! आपकी तरह वाणी की सत्यता, हमें भी प्राप्त हो । यज्ञ करने वाले देव अथवा मनुष्यों की वाणी प्रशंसनीय एवं इच्छित धन देने वाली हो ॥२०॥
मरुद्गण शत्रुओं को नष्ट करने की सामर्थ्य वाले हैं। वे पूजनीय हैं । वे अपने कर्म-कौशल से सूर्यदेव की तरह अन्तरिक्ष में एवं सर्वत्र व्याप्त हो जाते हैं ॥२१॥
द्युलोक एक ही उत्पन्न हुआ, पृथ्वीं भी एक ही उत्पन्न हुई है, गो-दुग्ध भी एक ही उत्पन्न हुआ है। अन्य कोई पदार्थ उत्पन्न नहीं हुए ॥२२॥

सूक्त-४९

श्रेष्ठ कर्म करने वाले मित्रावरुणदेव की हम नये स्तोत्रों द्वारा स्तुति करते हैं। वे हमारा सुख बढ़ायें । श्रेउ पराक्रमी मित्रावरुणदेव और अग्निदेव यहाँ आकर हमारी रक्षा करें ॥१॥
ये तेजस्वी अग्निदेव सभी यज्ञों में प्रजाओं द्वारा स्तुति करने योग्य हैं। ये निरहंकारी कर्म करने वाले हैं। स्वर्ग और पृथ्वी में गमन करने वाले, बल के पुत्र अग्निदेव यज्ञ की ध्वजारूप हैं। ऐसे तेजस्वी अग्निदेव को हम यज्ञ करने के लिए स्तुति करते हैं ॥२॥
एक दूसरे से विपरीत रूप वाली सूर्य की दो पुत्रियाँ, कृष्ण रात्रि और शुक्ल दिवसरूपा हैं ।नक्षत्रों के साथ रात्रि एवं सूर्य के साथ दिवस रूपा रहती हैं ।सतत गतिशील, पवित्र बनाने वाली ये दोनों हमारे स्तोत्रों को सुनें ॥३॥
हे अध्वयों ! आप व्यापक बुद्धि से सम्पन्न यज्ञादि कार्यों में नियुक्त हों । महान् ऐश्वर्य-सम्पन्न, क्रान्तदशी, सबमें व्याप्त, रथों से सम्पन्न, तेजस्वी अग्नि को आप प्रज्वलित करें तथा उत्तम बुद्धि द्वारा वायुदेव की स्तुति करें ॥४॥
दोनों अश्विनीकुमारों का रथ उत्तम दीप्ति वाला है, उसमें मन के इशारे से ही अश्व नियोजित होते हैं, ( हे अश्विनीकुमारो !) आप, ऐसे रथ पर चढ़कर, पर्याप्त धन भरकर स्तोताओं और उनके पुत्रों की इच्छाओं की पूर्ति हेतु पधारें ॥५॥
हे पर्जन्य और वायुदेव ! आप पृथ्वी के अन्न की वृद्धि के लिए अन्तरिक्ष से जल वृष्टि करें । हे मरुद्गणो ! हम सब आपकी स्तुति करते हैं। आपकी कृपा से समस्त प्रजा समृद्ध होती है ॥६॥
जो सरस्वती देवी, सुन्दर, उत्तम अन्न देने वाली, वीरों का पालन करने वाली, पवित्र करने वाली हैं, वे हमारे यज्ञ अनुष्ठान को धारण करें । देवांगनाओं सहित प्रसन्न होकर वे स्तोताओं को छिद्ररहित निवास प्रदान करें तथा उनका कल्याण करें ॥७॥
उत्तम स्तोत्रों द्वारा प्रार्थना किए जाने पर जो पूषा देवता हमें सत्यमार्ग की प्रेरणा प्रदान करते हैं, वहीं हमें । आह्लादप्रद और संतापनाशक साधनों को प्रदान करें वे हमारी बुद्धियों को सिद्धि प्रदान करें-सत्प्रयोजनों में लगायें॥८॥
तेजस्वी अग्निदेव उन त्वष्टादेव का यजन करें, जो त्वष्टादेव देवताओं में प्रथम भजनीय, यशस्वी, सुन्दर हाथ एवं भुजाओं वाले, महान् और आवाहन करने योग्य हैं ॥९॥
इन उत्तम स्तुतियों से दिन एवं रात्रि में भुवन के पिता रुद्रदेव का यशोगान करें । हम दर्शनीय, जरारहित, सुखदाता, प्रभु की सदैव स्तुति करते हैं ॥१०॥
हे युवा, ज्ञानी, यजनीय, मरुद्गणो ! आप स्तोताओं के पास आयें। आप अग्नि के सहयोग से अन्तरिक्ष में वृद्धि को प्राप्त होकर जल वृष्टि करते हैं। आप ओषधियों से रहित देशों को भी तृप्त करते हैं ॥११॥
पालक जिस प्रकार गौओं के झुण्ड को घर की ओर तीव्र गति से चलने को प्रेरित करता है, वैसे ही स्तोतागण मरुद्गण की ओर जाने के लिए अपने स्तोत्रों को प्रेरित करें । स्तोताओं की स्तुतियाँ मरुद्गणों के मन एवं शरीर को स्पर्श करती हैं और उनकी वैसे ही शोभा बढ़ाती हैं, जैसे नक्षत्रों से अन्तरिक्ष सुशोभित होता है ॥१२॥
विष्णुदेव ने मनुदेव के दु:ख को दूर करने के लिए तीन चरणों में पराक्रम किया । हे देव ! आपके द्वारा दिये गये घर, धन, शरीर और पुत्रों सहित हम आनन्द से रहें ॥१३॥
हमारे अनेक प्रकार के स्तोत्रों द्वारा स्तुत अहिर्बुध्न्य (मेघ), पर्वत और सवितादेव हमें अन्न तथा जल दें, भगदेव हमें धन दें तथा विश्वदेवो हमें अन्न प्रदान करें ॥१४॥
हे विश्वदेवा ! आप हमें न टूटने वाला रथ एवं घर, मानवों को तृप्ति देने वाला अन्न, पुत्र तथा अनुचर प्रदान करें, ताकि हम शत्रुओं को आक्रमण करके जीत सकें । आप देवताओं के उपासकों को संरक्षण दे ॥१५॥

सूक्त-५०

हे देवगणो ! सुख की कामना से हम देवमाता अदिति, वरुण, मित्र, अग्नि, शत्रु संहारक एवं सेवनीय अर्यमा, सविता, भग तथा रक्षा करने वाले समस्त देवगणों के प्रति नमन करते हुए इन सबकी उपासना करते हैं ॥१॥
हे सर्वप्रेरक सूर्यदेव ! श्रेष्ठ कान्ति वाले देवों को आप हमारे अनुकूल बनाएँ। जो द्विज सदाचारी, सत्यवादी, आत्मवान् तथा पूजनीय हैं, ऐसे अग्नि रूपी जिह्वा वाले देवों को हमारे अनुकूल करें ॥२॥
हे द्यावा-पृथिवि ! आप हमें व्यापक क्षेत्र वाला विशाल निवास दें । हम बलवान् एवं ऐश्वर्यवान् हों । हमें निष्पाप घर मिले ॥३॥
सबको निवास देने वाले, रुद्र के पुत्र, हे अहिंसक मरुद्गण ! हम आपकी आवाहन करते हैं। आप छोटे या बड़े संग्राम में हमारा कल्याण करें ॥४॥
तेजस्वी द्यावा-पृथिवीं जिनके साथ हैं, उपासकों को समृद्ध करने वाले पूषन्देव जिनकी सेवा करते हैं, उन मरुद्गणों का हम आवाहन करते हैं। उनके आगमन पर उनके वेग से सभी प्राणी काँपने लगते हैं ॥५॥
हे स्तोतागण ! आप उन पराक्रमी प्रशंसनीय इन्द्रदेव की अभिनव स्तोत्रों द्वारा स्तुति करें । हमारी स्तुति सुनकर प्रसन्न हुए वे इन्द्रदेव हमें बल और अन्न प्रदान करें ॥६॥
है जल देवता ! आप समस्त स्थावर-जंगम को उत्पन्न करने वाले हैं । आप मनुष्यों के हितैषी हैं । आप हमारे पुत्र-पौत्रादि की रक्षा के निमित्त अन्न प्रदान करें । आप माताओं से भी श्रेष्ठ चिकित्सक हैं, अतएव आप हमारे समस्त विकारों को नष्ट करें ॥७॥
जो सवितादेव, रक्षक, स्वर्णिमरश्मियों वाले, उषा के समान प्रकाशमान , पूजनीय, धनवान् एवं मनुष्यों को अभीष्ट धन देते हैं, वे सवितादेव हमारे पास आएँ ॥८॥
हे बल पुत्र अग्निदेव ! आज आप हमारे इस यज्ञ में देवगणों को लाएँ । हम आपकी अनुकूलता को सदैव याद रखें और पुत्र-पौत्रादि सहित आपकी कृपा से सुरक्षित रहकर आनन्द से रहें ॥९॥
हे दोनों अश्विनीकुमारो ! आप बुद्धिमान् हैं। आप अपने श्रेष्ठ कर्मों सहित हमारे पास आएँ । जिस प्रकार आपने अत्रि ऋषि को अन्धकार से छुड़ाया था, वैसे ही हमें भी इस (जीवन) संग्राम में पापों से बचाएँ ॥१०॥
हे देवगणो ! आप पुत्रादि से युक्त धन देने वाले हैं । आदित्य, वसु, मरुद्गण आदि देव हमारी इच्छाओं की पूर्ति करें एवं हमें सुखी बनाएँ ॥११॥
रुद्र, सरस्वती, विष्णु, वायु, ऋभुक्षा, दिव्य अन्न और विधाता हमें सुखी बनायें । पर्जन्य एवं वायुदेव हमें अन्न प्रदान करें ॥१२॥
वे प्रसिद्ध सवितादेव, भगदेव एवं पर्याप्त धन दान करने वाले अग्निदेव हमारी रक्षा करें । सबसे प्रेम करने वाले त्वष्टा देव, द्युलोक और समुद्र सहित पृथ्वी आदि हमारी रक्षा करें ॥१३॥
अहिर्बुध्न्य, अज, एकपाद, पृथ्वी एवं समुद्र आदि देव हमारी प्रार्थना सुनें । यज्ञ को बढ़ाने वाले स्तोत्रों एवं ऋषियों द्वारा स्तुत देवता हमारी रक्षा करें ॥१४॥
हे देवगणो ! आप शत्रुओं द्वारा अर्हिसित हैं, आप सबको निवास देने वाले हैं। आप अपनी शक्तियों (देव-पलियों) सहित सर्वत्र पूजनीय हैं । हम भरद्वाज वंशीय ऋषि आप सब देवगणों की स्तुति करते हैं ॥१५॥

सूक्त-५१

महान् मित्रावरुण की प्रिय, निर्मल, दर्शनीय, अदम्य, तेजयुक्त ऋत की सेना (प्रकाश किरणे) प्रकट होकर दृष्टिगोचर हो रही हैं। प्रकाशित होकर यह तेज द्युलोक के अलंकार की तरह शोभा पाता है ॥१॥
ज्ञानवान्, तीनों भुवनों के ज्ञाता, दुर्जय देवों के जन्म के भी जानकार सूर्यदेव मनुष्यों के शुभाशुभ कर्मों को देखते हैं। वे स्वामी (मनुष्यों के) अर्थों (सार्थक प्रयोजनों) की पूर्ति करते हैं ॥२॥
अदिति, मित्र, वरुण, भग एवं अर्यमा आदि यज्ञ की रक्षा करने वाले देवों की हम स्तुति करते हैं। देवगणों के कर्म से यह सब पवित्र होता है ॥३॥
हे अदिति पुत्र देवगणो ! आप दयालु, चिरयुवा, महाराजा एवं महाबली हैं । आप दुष्टों का नाश करने वाले हैं ।आप ऐश्वर्यवान् एवं श्रेष्ठ निवास देने वाले हैं । (हे अदिति पुत्रो !) हम माता अदिति के आश्रय में जाते हैं ॥४॥
हे वसुगण ! द्यावा-पृथिवी एवं अग्निदेव सहित आप हमारा कल्याण करें । हे अदिति एवं समस्त आदित्यो ! आप सब परस्पर प्रीतिपूर्वक रहकर हमें और अधिक सुख प्रदान करें ॥५॥
हे पूजनीय देवताओ ! आप हमें वृक (भेड़िया या क्रूरकर्मी) तथा वृक्य (क्रूरता-कुटिलता) से बचाएँ । आप हमारे शरीर, बल एवं वाक् को श्रेष्ठता की ओर बढ़ने की प्रेरणा दें ॥६॥
हे देवताओ ! दूसरों के द्वारा किए गये पाप-कर्मों को दुष्परिणाम हमें भोगना न पड़े । हम दण्डनीय पाप कर्म न करें । हे विश्व के स्वामी देव ! आपकी कृपा से शत्रु अपने शरीर को स्वयं ही नष्ट कर लें ॥७॥
नमन वास्तव में ही महान् है, इसलिए हम उसका सेवन करते (उसे व्यवहार में लाते हैं । नमन ही द्युलोक एवं पृथ्वी का धारणकर्ता है । हम देवगणों को नमन करते हैं, नमन ही उन्हें प्रभावित करने वाला है। किये गये (कर्मों के भोगों) को नष्ट करने के लिए हम नमन करते हैं ॥८॥
हे देवगण ! आप यज्ञ के नेतृत्व करने वाले, बलवान् यज्ञशाला में निवास करने वाले, अपराजित एवं महिमावान् हैं। हम नमस्कारों द्वारा आपको नमन करते हैं ॥९॥
वे देवता हमारे पापों को दूर करने वाले तथा तेजस्वी हैं। सत्यवादी, सदाचारी एवं सत्यबल वाले (साधक), वरुण, मित्र एवं अग्नि आदि सभी देवों के आश्रय में रहते हैं ॥१०॥
बढ़ने वाले इन्द्रदेव, पूषा, भग, अदिति और पञ्चजन हमारे उत्तम घरों की रक्षा करें । वे अन्न प्रदान करने वाले, सुखदायक, आश्रय प्रदान करने वाले देव हमारी रक्षा करें ॥११॥
आहुति अर्पित करने वाले ऋषि एवं यजमान धन प्राप्ति की इच्छा से देवताओं की स्तुति करते हैं । वे देवता प्रसन्न होकर हम भारद्वाजों को भव्य निवास प्रदान करें ॥१२॥
हे अग्निदेव ! आप उन दुष्ट शत्रुओं को दूर भगायें, जो चोर एवं पापी हैं। इनके स्वभाव को बदलें । इनसे हमारी रक्षा करें एवं हमारा सर्वतोभावेन मंगल करें ॥१३॥
है सोम ! आप भेड़िये की तरह स्वभाव वाले दण्डनीय ‘पणि' का संहार करें । आपकी मित्रता की इच्छा से हम इस प्राव (सोमवल्ली कूटने के पत्थर अथवा दमन की सामर्थ्य) सहित प्रस्तुत हैं ॥१४॥
हें देवगणो ! आप उत्तम दानवीरों में श्रेष्ठ, तेजस्वी इन्द्रदेव सहित हमारे मार्ग को सुगम करें एवं हमारी रक्षा करें ॥१५॥
जिस मार्ग पर गमन करने से शत्रु दूर रहते हैं एवं पर्याप्त धन लाभ होता है, हम उसी निष्पाप-सुखद मार्ग से गमन करें ॥१६॥

सूक्त-५२

(ऋषि कहते हैं) हमारी सुनिश्चित मान्यता है कि वह अतियाज(यज्ञीय मर्यादाओं के अनुशासन का अतिक्रमण करने वाला यजनपरक कर्मकाण्ड) न तो द्युलोक के अनुकूल है और न पृथ्वी के । न (कर्मकाण्ड परक) यज्ञीय परिपाटी के अनुरूप है और न शान्तिपूर्ण कर्मानुष्ठानों के अनुकूल है। अस्तु, महान् पर्वत उसे प्रताड़ित करें और उसके ऋत्विग्गण हीनता को प्राप्त हों ॥१॥
हे मरुद्गणो ! जो हमारे मन्त्रपाठ का अतिक्रमण अथवा अनादर करे, उसको अग्नि की ज्वालाएँ जलाने वाली हों । स्वर्ग लोक भी उस ज्ञान से द्वेष करने वाले को संतप्त करे ॥२॥
हे सोमदेव ! आपको मन्त्र की रक्षा करने वाला क्यों कहते हैं ? हे प्रिय सोमदेव ! आपको निन्दा से बचाने वाला क्यों कहा जाता है ? आप निन्दा करने वाले को देखते हैं। ज्ञान से द्वेष करने वाले को आप अपने आयुध द्वारा व्यथित करें ॥३॥
जल से भरी नदियाँ, उषाएँ, दृढ़ पर्वत, पितर, यज्ञ में आहूत-उपस्थित देवशक्तियाँ हमारी रक्षा करें ॥४॥
हम सदैव उत्तम विचार करें । हम सदैव सूर्यदेव का दर्शन करें । देवताओं के निमित्त आहुति को वहन करने वाले एवं धनों के अधिपति अग्निदेव हमें सुरक्षा प्रदान करें ॥५॥
इन्द्रदेव अपने रक्षण साधनों सहित हमारी रक्षा करें । जल से उमड़ती सरस्वती हमारी रक्षा करें । पर्जन्य से उत्पन्न ओषधियों एवं पिता के समान अग्निदेव को हम रक्षा के लिए आवाहित करते हैं ॥६॥
हे विश्वेदेव ! आप हमारी प्रार्थना सुनकर आएँ और बिछाये हुए कुशाओं पर विराजमान हों ॥७॥
हे देवगणो ! जो याजक घृत सहित आपके निमित्त आहुतियाँ अर्पित करते हैं। आप उनका कल्याण करने के निमित्त उनके पास आएँ ॥८॥
जो अमरपुत्र देव हैं, वे हमारी इस प्रार्थना को सुनकर हमारे पास आएँ एवं हमें सुख प्रदान करें ॥९॥
आप समस्त देवगण सत्य (यज्ञीय) मार्ग को बढ़ाते हैं । आप तुओं के अनुसार हवन करने के लिए सर्वविदित हैं । आप योग्य दुग्ध को स्वीकार करें ॥१०॥
मरुद्गण के साथ इन्द्रदेव त्वष्टादेव, मित्र, अर्यमा आदि सब देव हमारी आहुतियों को एवं स्तोत्रों को स्वीकार करें ॥११॥
हे होता अग्निदेव ! आप हमारे इस यज्ञ में प्रमुख देवताओं के लिए उनके अनुरूप यजन क़रें ॥१२॥
हे विश्वेदेवगणो ! आप अन्तरिक्ष में अथवा द्युलोक में (जहाँ भी) हैं, हमारी प्रार्थना सुनकर आएँ और इन कुशाओं पर बैठकर सोम का पान करके आनन्दित हों ॥१३॥
पृथ्वी, अन्तरिक्ष एवं अग्नि सहित समस्त देवशक्तियाँ हमारे द्वारा प्रस्तुत, श्रेष्ठ स्तोत्रों का श्रवण करें । हम कभी भी देवों को अप्रिय लगने वाले वचन न बोलें एवं देवों द्वारा प्रदत्त अनुदानों से ही प्रमुदित हों ॥१४॥
द्युलोक, पृथ्वीलोक और अन्तरिक्ष में अपने महान् कर्मकौशल से युक्त देव प्रकट हों और हमारे पुत्रादि को अन्न एवं पूर्ण आयुष्य प्रदान करें ॥१५॥
हे अग्निदेव और पर्जन्य ! आप हमारी बुद्धि की सुरक्षा करें । हे आवाहन करने योग्य ! आप स्तुति सहित हमारा आवाहन सुनें । आप में से एक अन्नदाता और दूसरे सन्तानदाता हैं। आप प्रसन्न होकर हमें अन्न सहित सन्तान प्रदान करें ॥१६॥
हे देवताओ ! हम कुश के आसन बिछाते हैं और अग्नि प्रदीप्त करते हैं। जब हम मनोयोगपूर्वक मंत्र पाठ करें, तब आप सब देव हमारी आहुतियों एवं नमस्कारों से तृप्त हों ॥१७॥

सूक्त-५३

हे पूषन्देव ! आप हमें मार्ग में सुरक्षित करें । जैसे अन्न के लिए रथ नियोजित करते हैं, वैसे ही हम बुद्धि पूर्वक कर्म करने के लिए आपके सम्मुख उपस्थित होते हैं ॥१॥
हे पूषन्देव ! आप हमें मनुष्यों के हितैषी, पर्याप्त धन दान करने वाले दानवीर और प्रशंसनीय गृहस्थ के समीप ले चलें ॥२॥
हे प्रकाशमान पूषन्देव ! आप कंजूस को दान देने की प्रेरणा दें । (कृपण) व्यापारी के कठोर हृदय को कोमल बनाएँ ॥३॥
हे पूषन्देव ! आप हमारे घातक शत्रुओं का नाश करें । हमें धन प्राप्त करने का मार्ग बताएँ ॥४॥
हे पूषन्देव ! आप ज्ञानी हैं । आप (ज्ञानरूपी) शस्त्र से इन प्राणियों के कठोर हृदयों को चीर कर (परिवर्तित कर) हमारे अनुकूल कर दें ॥५॥
हे पूषन्देव ! आप आरे से प्राणियों के हृदय को चीरकर (परिवर्तित कर) उनके हृदय में प्रिय भाव भरें और हमारे वशीभूत कर दें ॥६॥
हे पूषन्देव ! आप प्राणियों के हृदयों की कठोरता को खाली करें और उन्हें हमारे अधीन करें ॥७॥
हे पूषन्देव ! आप ज्ञान से प्रेरित आरे से कृपणों के हृदयों को अच्छी तरह खाली कर समभाव से भरें ॥८॥
हे तेजस्वी वीर पूषन्देव ! आप अपने जिस अस्त्र से पशुओं को प्रेरित कर सही मार्ग में चलाते हैं, उसी से हम भी अपने कल्याण की कामना करते हैं ॥९॥
हे पूषन् देव ! आप हमारे यज्ञादि कार्य की सफलता के लिए गौ, अश्व, सेवक एवं अन्न प्रदान करें ॥१०॥

सूक्त-५४

हे पूषन्देव ! आप हमें ऐसे श्रेष्ठ मार्गदर्शक के पास पहुँचाएँ, जो हमें उत्तम मार्ग एवं धन प्राप्त करने का मार्ग बताएँ ॥१॥
हे पूषन्देव ! आप हमें ऐसे पुरुष से मिलाएँ, जो घर को अनुशासित रखने का मार्गदर्शन दे ॥२॥
पूषन्देव का चक्र कभी भी दूषित नहीं होता है। इसकी धार सदैव तीक्ष्ण रहती है ॥३॥
जो याजक ऐसे पूषन्देव के लिए आहुति प्रदान करता है । उसे कोई कष्ट नहीं होता है एवं उसे पूषादेव कृपा करके प्रथम (श्रेष्ठ) धन प्रदान करते हैं ॥४॥
पूषन्देव हमारी गौओं की, घोड़ों की रक्षा करें एवं हमें अन्न एवं धन प्रदान करें ॥५॥
हे पूषन्देव ! यज्ञ कर्म करने वालों को तथा हम स्तोताओं को अनुकूल गौएँ प्राप्त हों ॥६॥
हे पूषन्देव ! आप हमारी गौओं को नष्ट न करें, कुएँ में गिरकर या अन्य प्रकार से नष्ट न होने दें । आपसे सुरक्षित गौएँ सायंकाल हमारे पास लौट आएँ॥७॥
जिनका धन अविनाशी हैं, ऐसे पूषन्देव से हम धन की याचना करते हैं। वे प्रार्थना सुनकर हमारी दरिद्रता को दूर कर दें॥८॥
है पूषन्देव ! आपका यजन करते हुए, आपकी स्तुति करने वाले हम सब कभी नष्ट न हों, प्रत्युत पहले की तरह ही सुरक्षित रहें ॥९॥
हे पूषन्देव ! आप हमारे गो-धन को कुमार्गगामी होकर नष्ट होने से बचाएँ और अपहत हुए गो-धन को पुनः प्राप्त कराएँ ॥१०॥

सूक्त-५५

हे पूषन्देव ! आपकी स्तुति करने वाले स्तोता और आपका वजन करने वाले हम, दोनों मिलकर रहेंगे। आप हमारे पास आएँ और यज्ञ कर्म का नेतृत्व करें ॥१॥
मस्तक पर केश हैं जिनके, ऐसे महारथी योद्धा, धन के स्वामी, जो हमारे सखा हैं, उन पूषन्देव से हम धन की याचना करते हैं ॥२॥
हे अजरूपी अश्व वाले देव ! आप धन के प्रवाह एवं ऐश्वर्य की राशि हैं । आप स्तुति करने वाले स्तोताओं के मित्र हैं ॥३॥
अश्व एवं छाग (बकरी) जिनके वाहन हैं, उन पूषादेव की हम स्तुति करते हैं । वे पूषादेव उषा के स्वामी कहलाते हैं ॥४॥
वे पूषादेव, जो उषा के पति सूर्यदेव एवं इन्द्रदेव के भाई और हमारे सखा हैं, उन रात्रि माता के सहचर की हम स्तुति करते हैं ॥५॥
लोगों को वैभवशाली बनाने वाले पूषादेव को, रथ में जुते छाग, रथ को खींचकर यहाँ (यज्ञशाला में) लाएँ ॥६॥

सूक्त-५६

जो करम्भ (दहीं, घृतयुक्त अन्न विशेष अथवा करों-किरणों से जल) का सेवन करने वाले पूषादेव की स्तुति करता है, उसे अन्य देवताओं की स्तुति करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है ॥१॥
वास्तव में जो श्रेष्ठ रथी हैं, उन पूषादेव की मित्रवत् सहायता से सज्जनों के रक्षक इन्द्रदेव शत्रुओं का संहार करते हैं ॥२॥
वे श्रेष्ठ रथी पूषादेव सूर्यदेव के हिरण्यमय रथ चक्र को उत्तम रीति से घुमाते हैं ॥३॥
हे पूषादेव ! आप बहुतों द्वारा प्रशंसित, दर्शनीय और माननीय हैं। हम जिस धन की इच्छा से आपकी स्तुति करते हैं, वह आप हमें दिलाएँ ॥४॥
हे पूषन्देव ! आप समीप से और दूर से भी प्रसिद्ध हैं, अर्थात् आप सर्वव्यापक हैं। आप गौओं के खोजने वालों को धन प्रदान करें ॥५॥
हैं पूषन्देव ! हम आपकी स्तुति करते हैं, जिससे हमारा आज और कल (सर्वदा) कल्याणकारी हो । आप हमें धन प्रदान करें और पाप से बचाएँ ॥६॥

सूक्त-५७

हम अन्न प्राप्ति की कामना से, अपने कल्याण के लिए मित्रस्वरूप इन्द्र और पूषा देवताओं को स्तुतियों के द्वारा बुलाते हैं ॥१॥
आसन पर बैठे देवों में इन्द्रदेव अभिषुत सोमरस को पीने की इच्छा करते हैं एवं पूषादेव करम्भ (सत्तू युक्त खाद्य पदार्थ) की इच्छा करते हैं ॥२॥
इन्द्रदेव के रथ में घोड़े एवं पूषादेव के रथ में छाग (बकरी) युक्त (जुते) हैं। ये दोनों मिलकर वृत्रों (शत्रुओं) का नाश करते हैं ॥३॥
जब महाबली इन्द्रदेव घनघोर जलवृष्टि के रूप में जल को प्रवाहित करते हैं, तब पोषण करने में समर्थ (पूषा) भी उनके सहयोगी होते हैं ॥४॥
हम सुदृढ़ वृक्ष की शाखा की तरह इन्द्रदेव और पूषन्देव के आश्रय में सुरक्षित रह सकते हैं ॥५॥
जैसे लगाम को सारथी पकड़कर (रथ को बिना क्षति के) ले चलता है, वैसे अपने महान् कल्याण के लिए हम पूषन्देव और इन्द्रदेव को पकड़कर (जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं ॥६॥

सूक्त-५८

हे पूषादेव ! आपका एक शुभरूप, दिन है तथा अन्यरूप रात्रि है । यह दोनों आपकी महिमा से ही भासित होते हैं । हे पोषणकर्ता पूषन्देवता ! द्युलोक के समान आभामय आप सम्पूर्ण जीव-जगत् की रक्षा करने वाले हैं । आपका कल्याणकारी अनुदान हमें प्राप्त हो ॥१॥
जो छाग वाहने वाले पूषन्देव पशुओं के पोषक हैं एवं अन्नदाता, बुद्धि को प्रखर बनाने वाले, ज्ञानी, समस्त भुवनों में स्थित हैं, वे पूषादेव सूर्यरूप से समस्त प्राणियों को प्राण-प्रकाश देते हुए अन्तरिक्ष में गमन करते हैं ॥२॥
हे पूषन्देव ! अन्तरिक्षरूपी समुद्र में (सूर्य रश्मिरूपी) आपकी सुनहरी नौकाएँ चल रहीं हैं। आप स्वेच्छा से यशस्वी कर्म करते हैं । आप सूर्यदेव के दूत हैं । हम आपकी प्रसन्नता के लिए स्तुति करते हैं ॥३॥
द्युलोक से पृथ्वीलोक तक के समस्त प्राणियों के उत्तम बन्धुरूप पूषादेव अन्न-धन के स्वामी हैं। वे पूषादेव, ऐश्वर्यवान् हैं। वे ही उषा को प्रकट करने वाले हैं। वे समस्त विश्व को प्रकाशित करते हुए गमन करते हैं ॥४॥

सूक्त-५९

हे इन्द्राग्निदेव ! आप अमर हैं। आप रक्षक हैं; आपने देखें से द्वेष करने वाले असुरों को अपने पराक्रम से नष्ट किया है। सोम तैयार करके हम आपके पराक्रम का गान करते हैं ॥१॥
हे इन्द्राग्निदेव ! आपकी महिमा वास्तव में सत्य है । आप दोनों के एक ही पिता हैं, आप दोनों जुड़वा भाई हैं और यहीं आपकी एक माता (अदिति) हैं ॥२॥
है इन्द्राग्ने ! घोड़ा जिस प्रकार घास मिलने पर हर्षित होता है, उसी प्रकार तैयार सोमरस से युक्त होकर आप आनन्दित होते हैं । इस यज्ञ में हम अपनी रक्षा के निमित्त आपका आवाहन करते हैं ॥३॥
हे ऋत वृध (सत्य के उन्नायक) इन्द्राग्ने ! सोम तैयार होने पर जो लोग कुत्सित भावों या स्नेहरहित स्तोत्रों का प्रयोग करते हैं, आप उनका सोम नहीं पीते हैं ॥४॥
हे इन्द्राग्निदेव ! जब आप एक ही रथ पर आरूढ़ हों, घोड़ों को जोतकर, विभिन्न दिशाओं को जाते हैं, तब कौन ऐसा मानव है, जो आपके इस कार्य के रहस्य को पूर्णतया समझ सके? ॥५॥
हे इन्द्रदेव और अग्निदेव ! बिना पैर की उषा, पैर वाली प्रजा से पूर्व हीं आती है और शिर न होते हुए भी जीभ से (जाग्रत् जीवों की वाणी से) प्रेरणा देती हुई, एक दिन में तीस कदम (मुहूर्त) चलती है ॥६॥
हे इन्द्राग्ने ! वीर पुरुष अपने हाथ धनुष पर रखते हैं अर्थात् युद्ध के लिए सदा ही तत्पर रहते हैं। ऐसे वीर गौओं को खोजने में हमारा सहयोग करें ॥७॥
हे इन्द्राग्ने ! जो शत्रु हमें दुःख दे रहे हैं, उन्हें आप हमसे दूर रखें। उन दुष्टों को सूर्य के प्रकाश से वंचित करके दण्डित करें ॥८॥
हे इन्द्रदेव और अग्निदेव ! जो भी धन स्वर्ग और पृथ्वी पर है, वह सब आपके अधीन है। जिस धन से सबका पोषण हो, ऐसा धन आप हमें प्रदान करें ॥६॥
हे इन्द्रदेव और अग्निदेव ! आप सामगान एवं स्तोत्रों को सुनकर प्रसन्न होने वाले हैं । आप हमारी स्तुतियों को सुनकर इस सोमरस का पान करने के लिए आएँ ॥१०॥

सूक्त-६०

सूर्योदय के समय जो साधक इन्द्र और अग्निदेवों की उपासना करते हैं, वे इन दोनों सामर्थ्यवान् देवों की कृपा से शत्रु का नाश करके अन्न और धन प्राप्त करते हैं ॥१॥
हे इन्द्र और अग्निदेवो ! आप गौओं, जल प्रवाह, प्रकाश एवं उषा को उठाकर दूर ले जाने वालों से संग्राम करके उन्हें नष्ट करें। आप अपने भक्तों को, श्रेष्ठ प्रकाश, गौएँ एवं उत्तम प्रकार का जल प्रदान करें ॥२॥
हे वृत्रहन्ता इन्द्र और अग्निदेवो ! शत्रु को नष्ट करने वाले सामर्थ्य के साथ अन्न लेकर आप हमारे निकट आएँ। आप दोनों अनिन्द्य एवं श्रेष्ठ धन सहित हमारे पास पधारें ॥३॥
इन्द्रदेव और अग्निदेव का विश्व निर्माण में पहले से सहयोग रहा है । इस कारण उनकी प्रशंसा करते हुए हम उनका आवाहन करते हैं। वे इन्द्र और अग्निदेव स्तोता और याजकों की रक्षा करते हैं ॥४॥
उग्र शत्रु को संग्राम में विदीर्ण करने वाले, जो इन्द्र और अग्निदेव हैं, उनका हम आवाहन करते हैं । वे दोनों देव हमें सफल और सुखी बनाएँ ॥५॥
जो इन्द्रदेव और अग्निदेव दुष्ट असुरों की दुष्टता का संहार करते हैं एवं सज्जनों की रक्षा करते हैं, उन्हीं देवों ने सब शत्रुओं का विनाश किया है ॥६॥
हे सुखप्रदाता इन्द्रदेव और अग्निदेव ! ये स्तोतागण आप दोनों की वन्दना करते हैं। आप दोनों सोमरस का पान करें ॥७॥
जगत् के नायक हे इन्द्रदेव और अग्निदेवे ! याजकों द्वारा प्रशंसा किये जाते हुए, आप दोनों उनसे प्रदत्त हविष्यान्न के लिए यज्ञशाला में अपने द्रुतगामी वाहन (अश्व) की सहायता से पधारें तथा दानदाताओं की सहायता करें ॥८॥
हे सृष्टि के नायक इन्द्रदेव और अग्निदेव ! विधिपूर्वक पवित्रता को प्राप्त, इस सोमरस के पास, इसका पान करने के लिए अपने वाहनों के साथ पधारें ॥९॥
जिन अग्निदेव की प्रचण्ड ज्वालाएँ सब वनों को अपनी चपेट में लेकर ज्वालारूप जिह्वा से काला कर देती हैं; उन शक्तिशाली अग्निदेव की हम स्तुति करते हैं ॥१०॥
जो मनुष्य प्रज्वलित अग्नि में इन्द्रदेव के लिए आनन्दप्रद आहुति अर्पित करते हैं, उनकी तेजस्विता एवं अन्न वृद्धि के लिए इन्द्रदेव जल-वर्षा करते हैं ॥११॥
हे इन्द्र और अग्निदेवो ! आप दोनों (यजमान की) उन्नति के लिए शक्तिवर्धक अन्न और शीघ्र गतिशील अश्व प्रदान करें ॥१२॥
है इन्द्राग्ने ! हम, आप दोनों का (यज्ञ में) आवाहन करते हैं। आपको (हविष्यान्नरूपी) धन प्रदान करके प्रसन्न करते हैं। अन्न एवं धन प्राप्ति के लिए हम आप दोनों को यज्ञ में आवाहित करते हैं ॥१३॥
हे इन्द्र और अग्निदेवो ! हम मित्रता के लिए आपका आवाहन करते हैं। आप दोनों मित्ररूप में हमारे पास गौएँ, घोड़े और धन सहित आएँ ॥१४॥
हे इन्द्र और अग्निदेवो ! आप सोमरस तैयार करने वाले एवं यज्ञकर्ता की स्तुति सुनकर हवि की इच्छा से आएँ और सोमरस का पान करें ॥१५॥

सूक्त-६१

सरस्वती देवी ने आहुति देने वाले 'वझ्यश्व को, धैर्यवान्, ऋणमुक्त होने वाला पुत्र ‘दिवोदास' प्रदान किया, जिसने 'पणि' नामक कष्ट देने वाले कंजूस का नाश किया । हे सरस्वती देवि ! आपके दान महान् हैं ॥१॥
जो सरस्वती देवी अपने बलवान् वेग से कमलनाल की तरह पर्वत के तटों को तोड़ देती हैं, हम उन सरस्वती देवी की भक्ति और सेवा करते हैं, वे हमारी रक्षा करें ॥२॥
हे सरस्वती देवि ! आपने देवताओं की निन्दा करने वाले को नष्ट किया। आप उसी तरह कपटी-दुष्टों का नाश करें । मानवों के लाभ के लिए अपने संरक्षित भू-भाग प्रदान किए हैं। हे वाजिनीवति ! आपने ही मनुष्यों के लिए जल प्रवाहित किया है ॥३॥
सरस्वती देवी अनेक प्रकार के अन्न देने से अन्नवाली कहलाती हैं। वे रक्षा करती हैं। वे देवि हमें उत्तम प्रकार से तृप्त करें ॥४॥
जिस प्रकार इन्द्रदेव को युद्ध में शत्रुओं से रक्षा करने के निमित्त बुलाते हैं, उसी प्रकार युद्ध के प्रारम्भ के समय जो आपका आवाहन करता है, आप उसकी रक्षा करती हैं ॥५॥
हे सरस्वती देवि ! आप बल से युक्त हैं। आप संग्राम के समय हमारी रक्षा करें एवं पूषनुदेव की तरह हमें धन प्रदान करें ॥६॥
स्वर्णिम रथ पर आरूढ़, प्रचण्ड वीरता धारण करने वाली देवी सरस्वती शत्रुओं का नाश करती हैं और स्तोताओं की रक्षा करती हैं ॥७॥
उन (सरस्वती) का निरन्तर प्रवाहित जल, वेग से गमन करता हुआ, गर्जन (शब्द) करता है ॥८॥
जिस प्रकार सूर्यदेव प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही देवी सरस्वतीं शत्रुओं को परास्त करती हुई बहिनों सहित आती हैं ॥९॥
प्रियजनों में अतिप्रिय, सप्त बहिनों (सात छन्दों अथवा सहायक धाराओं) से युक्त देवी सरस्वती हमारे लिए स्तुत्य हैं ॥१०॥
जिन देवी सरस्वती ने स्वर्ग और पृथ्वी को अपने तेज से भर दिया है, वे हमें निन्दा करने वालों से बचाएँ ॥११॥
जो देवी सरस्वती तीन स्थानों (प्रदेशों) में रहने वाली (बहने वाली), सप्त धारक शक्तियों से युक्त, पाँचों वर्ण के मनुष्यों को बढ़ाने वाली हैं, वे संग्राम के समये आवाहन करने योग्य हैं ॥१२॥
जो देवी सरस्वती अपने महत्त्व और तेज के प्रभाव के कारण अन्य नदियों में श्रेष्ठ हैं। अन्य नदियों के प्रवाहों की अपेक्षा इनका प्रवाह अधिक तीव्र गति वाले रथ के वेग के समान है; वे गुणवती देवी सरस्वती विद्वान् स्तोताओं द्वारा स्तुत्य हैं ॥१३॥
हे सरस्वती देवि ! आप हमें उत्तम धन प्रदान करें । हमें आपके प्रवाह कष्ट न दें । आप हमारे बन्धुत्व को स्वीकार करें । म निकृष्ट स्थान को न जाएँ ॥१४॥

सूक्त-६२

हम उन दोनों अश्विनीकुमारों की उत्तम स्तोत्रों से स्तुति करते हैं, जो अश्विनीकुमार इस दृश्य जगत् को प्रकाशित करते हैं। वे बलवान् शत्रुओं का नाश करते हैं ॥१॥
जब दोनों अश्विनीकुमार अपने तेज़ को बढ़ाते हुए यज्ञशाला में आते हैं, उस समय उनके तेज से रथ भी प्रदीप्त हो उठता है । वे मरुभूमि को छोड़कर अपने अश्वों को जल के निकट ले जाते हैं ॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप मन जैसे तीव्रगामी, इशारे पर चलने वाले अश्वों के द्वारा अपने स्तोताओं को स्वर्ग तक पहुँचाते हैं । आहुति देने वाले याजक को कष्ट पहुँचाने वाले को चिर निद्रा (मृत्यु) में सुला देते हैं ॥३॥
अद्रोही होकर प्राचीन होता अग्निदेव तथा दोनों अश्विनीकुमारों के लिए हवि अर्पित करने हैं। वे दोनों अश्विनीकुमार स्तोताओं के नवीन, मनन करने योग्य स्तोत्रों को सुनकर पुष्टिकारक एवं बलवर्धक उत्तम अन्न को, अश्वों के द्वारा लेकर स्तोताओं के समीप पहुँचे ॥४॥
विस्तृत स्तुति करने वाले स्तोताओं को जो धन एवं सुख देते हैं, ऐसे सुन्दर, शत्रुनाशक, सामर्थ्यवान् पुरातन अश्विनीकुमारों की हम नवीन स्तोत्रों से स्तुति करते हैं ॥५॥
रक्षा करने वाले वे (दोनों अश्विनीकुमार) तुग्र (इस नाम के राजा अथवा लेन-देन करने वाले के पात्र भुज्य (नामक व्यक्ति अथवा भोज्य-उपयोगी) को पक्षी के समान वेगवान् रथ (यान) द्वारा जल की गोद में उठाकर धन्न रहित मार्ग से समुद्र (सागर अथवा आकाश) के पार लाने में समर्थ हुए ॥६॥
बलवान् दोनों अश्विनीकुमार विजय रथ पर आरूढ़ होकर, पर्वतों (या मेघा) को भी लांघ जाते हैं। आप उत्तम मत वाले की प्रार्थना को सुनें एवं शयु के लिए गौ को पयस्विनी बनाएँ ॥७॥
द्यावा-पृथिवी, आदित्यगण, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमारों, वसुओं आदि देवगणों एवं मनुष्यों में जो भीषण रोष है, वह असुरों का संहार करने में प्रयुक्त हो ॥८॥
जो याजक इन अश्विनीकुमारों की स्तुति करते हैं, उनके ऐसे पावन यज्ञ कर्म को मित्रावरुणदेव जानते हैं । ऐसे याजक असुरों का, अपने अस्त्रों द्वारा संहार करने में समर्थ होते हैं ॥६॥
हे देव अश्विनीकुमारो ! आप रथ पर चढ़ कर सन्तान को सुख देने के लिए घर आएँ । मानवों को कष्ट पहुँचाने वाले दुष्टों का सिर, अपने उग्र क्रोध के द्वारा तिरस्कार करते हुए काट डालें ॥१०॥
हे देव अश्विनीकुमारो ! हम आपकी स्तुति करते हैं। आप स्तुति सुनकर हमारे पास आएँ। हमें गौओं से भरा गोष्ठ एवं दिव्य धन प्रदान करें ॥११॥

सूक्त-६३

दोनों अश्विनीकुमार देव जहाँ भी हों, वहीं यह आहुति सहित हमारे आकर्षक स्तोत्र, उन्हें दूत की तरह बुलाने के लिए पहुँचे । वे दोनों स्तुत्यदेव हमारी ओर आएँ एवं स्तुति से आनन्दित हों ॥१॥
हे अश्विनीकुमारदेवो ! आप हमारी स्तुति से प्रसन्न होकर हमारे घर आएँ एवं सोमपान करें। समीपस्थ एवं दूरस्थ शत्रुओं से हमारे इस घर की रक्षा करें ॥२॥
हे अश्विद्वय सोमरस तैयार है ।कुश के आसन बिछे हुए हैं । हम स्तोतागण आपको स्तुति करके बुलाते हैं ॥३॥
हे अश्विनीकुमारदेवो ! यज्ञशाला में अग्नि आपके निमित्त प्रदीप्त हैं । घृत से भरा पात्र आगे स्थित हैं। अनेकों विशेष कार्य करने में समर्थ, दानी होता मनोयोगपूर्वक आपके लिए आहुति अर्पित करते हैं ॥४॥
हे आजानुबाहु अश्विद्वय ! सूर्यपुत्री अर्थात् उषा आपके अनेक प्रकार से सुरक्षित रथ पर आरूढ़ होती हैं । आप देवों की प्रजाओं का नेतृत्व करें ॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों सूर्या ( उषा) की शोभा के लिए पुष्ट हों । आप अपनी एवं उनकी शोभा और कल्याण के लिए रथ पर पुष्टिकारक अन्न रखते हैं। आप तक हमारी उत्तम स्तुतियाँ पहुँचें ॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपका तीव्रगामी रथ अन्न के लिए गमन करता है । मन की गति वाले आपके अश्व आप दोनों को अन्न के साथ हमारे निकट लाएँ ॥७॥
हे दोनों अश्विनीकुमारो ! आप बड़ी भुजाओं वाले हैं। आपके पास अपरिमित धन है । आप हमें स्थिर मन वाली गौएँ एवं अन्न दें । आपके लिए मधुर सोमरस तैयार है । स्तोतागण आपकी स्तुति करते हैं ॥८॥
‘पुरय’ (नगर के नियन्ता) की दो द्रुतगामी अश्वाएँ, ‘सुमीळ्ह' (धन-धान्य युक्त अथवा सेचनकर्ता) की सौ गौएँ तथा 'पेरुक' (आदित्य) द्वारा पकाये गये फल (पदार्थ) हमें प्राप्त हैं। 'शाण्ड' (शान्ति या कल्याणप्रद) द्वारा प्रदत्त स्वर्णालंकृत, दर्शनीय, शत्रुजयी दस रथ हमारे पास हैं ॥९॥
हे दोनों अश्विनीकुमारदेवो ! आपके स्तोता को ‘पुरूपन्था' राजा ने सैकड़ों-हजारों घोड़े दिये । हे देवो ! यह सब आप भरद्वाज को भी प्रदान करें और असुरों का नाश करें ॥१०॥
हे दोनों अश्विनीकुमारो ! आपकी कृपा से हम श्रेष्ठ विद्वानों के साथ सुखपूर्वक रहें ॥११॥

सूक्त-६४

उषाएँ धवल वर्ण वाली हैं, ये जल की लहरों के समान चमक के साथ ऊपर को आ रहीं हैं। ये उषाएँ धन-ऐश्वर्यवान् हैं। वे सभी मार्गों को प्रकाशित करके सरलता से गमन करने योग्य बनाती हैं ॥१॥
हे उषा देवि ! आप कल्याणकारी दीखती हैं। आपकी किरणें आभामय होती हैं । हे दिव्य उषा देवि ! आप चमकती किरणों से सुशोभित अपने अन्त: स्थल को प्रकट कर, प्रकाश प्रदान कर सबका कल्याण करती हैं ॥२॥
हे उषादेवि ! लाल आभायुक्त तेजस्वी रश्मियाँ आपको वहन कर ऊपर लाती हैं । जैसे घोड़े पर सवार अचूक बाण चलाने वाला शूरवीर, शत्रु को दूर भगाता है, वैसे ही आप भी अन्धकार को दूर कर देती हैं ॥३॥
हे उषादेवि ! आप स्वयं प्रकाशित होकर अन्तरिक्ष में विचरण करती हैं, तब आपके लिए मार्ग विहीन पर्वतीय प्रदेश भी सुगम हो जाते हैं । हे स्वर्गलोक की कन्या ! आप बड़े रथ में हमारे लिए धन लाएँ ॥४॥
हे स्वर्ग की कन्या उषादेवि ! आप प्रथम हवन के समय दर्शनीय एवं पूजनीय हैं । आप तीव्रगामी, इच्छानुसार चलने वाले बैलों द्वारा खींचने वाले रथ में हमारे लिए श्रेष्ठ धन लाएँ ॥५॥
हे उषादेवि ! आपके प्रकाशित होने पर पक्षी अपने निवास से बाहर आते हैं एवं अन्नोपार्जन करने वाले भी जाग कर कर्म में उद्यत होते हैं । हे उषादेवि ! जो मनुष्य आपके प्राकट्य के साथ रहता हैं । (कर्म को उद्यत होता हैं) उसे पर्याप्त धन प्राप्त होता है ॥६॥

सूक्त-६५

यह स्वर्ग में उत्पन्न हुई दिव्य कन्या अर्थात् देवी उषा अपनी तेजस्वी-प्रकाशित रश्मियों के द्वारा अन्धकार को दूर करतीं एवं मानवों की प्रजा को जगाती हैं ॥१॥
अरुण वर्ण के अश्वों वाले विशाल चन्द्ररथ पर बैठी देवी उषा यज्ञ के पहले ही विशेष गति से अन्तरिक्ष में विचरण करती हैं। वे अपने विलक्षण प्रकाश से अन्धकार को नष्ट कर रही हैं ॥२॥
धनवान् एवं उत्तम प्रकार से गमन करने वाली उषाएँ, हव्य दान करने वाले को अन्न, बल, यश और रस प्रदान करती हैं । हे उषाओ ! आप हमें भी अन्न और सेवा करने वाले वीर पुत्रों से युक्त रत्न आज हीं प्रदान करें ॥३॥
है उषाओ ! जैसे आपने अपने स्तोताओं को पहले धन प्रदान किया है, वैसे ही इस समय भी आप हविदाता एवं स्तोताओं को वे रल प्रदान करें, जो आपके पास हैं ॥४॥
हे पर्वत शिखरों पर दर्शनीय उषादेवि ! आपकी कृपा से ही अंगिराओं ने गौओं के समूह को खोला है। मनुष्यों की ईश-प्रार्थना अब फलवती हुई है ॥५॥
हे सूर्य पुत्री उषा ! आप पूर्व की तरह अब भी अन्धकार को मिटाएँ । जैसे आपने भरद्वाज को धन दिया हैं, वैसे ही हम स्तोताओं को भी सुपुत्र सहित अन्न एवं धन प्रदान करें ॥६॥

सूक्त-६६

ज्ञानी जन उसे (भिन्न होते हुए भी) समान धेनु (धारण करने वाले) नाम से जानते हैं । एक को मनुष्यों के लिए दुहा जाता है तथा दूसरा तेजस्वी रूप अन्तरिक्ष से दूध की भाँति ही क्षरित होता है ॥१॥
जो इच्छा से बढ़ने वाले, अग्निदेव जैसे तेजस्वी एवं स्वर्णाभूषणों से अलंकृत मरुद्गण हैं, वे धन एवं बल के साथ प्रकट होते हैं ॥२॥
अन्तरिक्ष में रहने वाले मरुद्गणों के पिता रुद्र और माता महामहिमामयी पृथ्वी हैं। ये पृथ्वी ही सबके कल्याण के लिए जल, अन्न को अपने गर्भ में धारण करती हैं ॥३॥
जो लोगों से दूर न जाकर उनके अन्त:करण में निवास करते हैं और दोष को दूर कर पवित्र बनाते हैं, जो अपने तेज से इच्छानुसार शरीर को बलवान् बनाते हैं, वे पवित्र, वीर मरुत् इच्छानुकूल जल-वृष्टि करते हैं ॥४॥
जिन शूरवीरों का नाम मरुद्गण है, वे स्तोताओं के पोषण के लिए उत्तम धन प्रदान करते हैं। वे अपने उग्र क्रोध से चोरों और दस्युओं को परास्त कर नष्ट करते हैं ॥५॥
वे मरुद्गण महान् वीर हैं । द्यावा-पृथिवीं में उनकी साहसी सेना सुसज्जित रहती हैं । ये स्वदीप्ति से तेजस्वी हैं। इनके मार्ग में कोई बाधा नहीं डाल सकता ॥६॥
हे मरुद्गणो ! अश्वरहित, बिना सारथी वाला, बिना लगाम (रास) वाला (होकर भी), दोषरहित जल प्रदान करने वाला, आपका रथ द्यावा-पृथिवी एवं अन्तरिक्ष में विचरता है ॥७॥
हे मरुद्गणो ! संग्राम में जिनके आप रक्षक हैं, उन्हें कोई नहीं मार सकता । पुत्रों सहित जिसके आप रक्षक हैं, वह शत्रुओं की गौओं को भी जीत सकता है ॥८॥
हे अग्निदेव ! जो मरुद्गण अपने बल-पराक्रम से शत्रुओं को परास्त करते हैं; उनकी हलचल से पृथ्वी भी काँपने लगती है। उन्हीं तीव्रगामी, बलवान्, वीर मरुद्गणों के लिए ही स्तोता अद्भुत स्तोत्रों से स्तुति करते हैं ॥९॥
अग्नि सदृश प्रदीप्त रहने वाले, शत्रुओं को कैंपाने वाले एवं यज्ञ के समान तेजस्वी ये मरुद्गण कभी पराभूत नहीं होते ॥१०॥
हम शस्त्रधारी, पराक्रमी, रुद्र पुत्र मरुद्गणों की स्तुति करते हैं। ये स्तुतियाँ बलवान् होकर मरुद्गणों को और अधिक बल प्रदान करती हैं ॥११॥

सूक्त-६७

हे अतिश्रेष्ठ मित्रावरुणदेवो ! आपकी हम स्तुति करते हैं। आप अपने बाहुबल से सभी मनुष्यों को अनुशासित करते हैं ॥१॥
हे मित्रावरुणदेवो ! हम स्तोताओं द्वारा की जाने वाली ये स्तुतियाँ आपको प्रवृद्ध करती हैं। आपके लिए हमने कुश का आसन बिछाया है । आप प्रसन्न होकर हमें ऐसा निवास दें, जिससे हमारी रक्षा हो सके ॥२॥
हे मित्रावरुणदेवो ! आपका हम नमस्कारपूर्वक आवाहन करते हैं एवं आपकी स्तुति करते हैं। आप आएँ और जिस तरह आप सत्कर्मों में प्रवृत्त हैं, उसी तरह हमें भी धन एवं अन्न प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील करें और हमें सन्तुष्ट करें ॥३॥
माता अदिति ने गर्भ में धारण करके सत्य स्वरूप, बलवान्, पवित्र भाइयों के रूप में आपको पोषित किया है। इसलिए आप उत्पन्न होते ही शत्रुओं का संहार करने वाले एवं श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ बन गए ॥४॥
जब आपकी महानता के कारण आनन्दित होकर सभी देवगण प्रीतिपूर्वक क्षात्रबल धारण करते हैं, तब आप सब ओर से आकाश एवं पृथ्वी को घेर लेते हैं। आप किसी के द्वारा दमित नहीं होते हैं ॥५॥
वे (दोनों मित्रावरुण देव) अन्तरिक्ष को, सूर्य को एवं नक्षत्रों को दृढ़ता से धारण किये हैं। वे देव प्रतिदिन क्षात्र तेज को बढ़ाते हैं। मानवों को पर्याप्त अन्न मिले, इसलिए द्यावा-पृथिवी का विस्तार करते हैं ॥६॥
हे मित्रावरुण देवो ! जब याजक यज्ञशाला (की तैयारी ) पूर्ण कर लेते हैं, तब आप उदर पूर्ति के लिए ही आदरपूर्वक प्रेषित अन्न रूप सोम को धारण (ग्रहण) करते हैं। प्रसन्न होकर आप स्वभावत: हीं नदियों को जल से भर देते हैं, जिससे धूल नहीं उड़ती हैं ॥७॥
मेधावी जन वाणी द्वारा (स्तुति द्वारा आपसे जल की कामना करते हैं, जैसे आपके यजनकर्ता सत्य मार्ग पर आरूढ़ होते हैं, वैसे ही आप महिमावान् हवि देने वालों के पापों का नाश करें ॥८॥
जो आपके प्रिय धाम एवं नियम में बाधा उत्पन्न करते हैं एवं यज्ञ न करके द्वेष करते हैं, ऐसे स्तुति न करने वाले एवं यज्ञ न करने वाले लोग न तो मानव हैं, न देव हैं, उनका आप संहार करें ॥९॥
कोई स्तोता वाणों द्वारा, कोई विद्वान् मन द्वारा आपको प्रसन्न करते हैं। वास्तव में हम यह सत्य ही कहते हैं। कि आप की महिमा अतुलनीय है ॥१०॥
हे मित्रावरुण देवो ! जब हम स्तोतागण आपकी स्तुति करके आपके लिए सोमरस प्रस्तुत करते हैं, तब आप अपने आश्रय में रहने वाले भक्तों को गौओं से भरा गोष्ठ एवं सुरक्षित निवास प्रदान करते हैं ॥११॥

सूक्त-६८

हे इन्द्र और वरुण देवो ! जो यज्ञ उद्यमी मानवों द्वारा, बहुत से आसन बिछाकर महान् सुख की पूर्ति के लिये किया जाता है, उसी तरह की इच्छापूर्ति के लिए आज यह यज्ञ उत्साहपूर्वक आपके निमित्त किया जा रहा है ॥१॥
हे इन्द्र और वरुण देवो ! आप यज्ञ करने वाले देवों में श्रेष्ठ हैं । आप बल और महान् धन से युक्त हैं । आप सेनाओं एवं ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं । आप दाताओं में श्रेष्ठ एवं शत्रु का संहार करने वाले हैं ॥२॥
हे स्तोताओ ! आप इन्द्र और वरुण दोनों देवों की नमस्कारपूर्वक, बल-वर्धक स्तोत्रों से स्तुति करें । इन्द्रदेव वज्र फेंककर वृत्रासुर को मारने वाले हैं एवं वरुणदेव संकट के समय बल के द्वारा रक्षा करते हैं ॥३॥
समस्त स्त्रियाँ, पुरुष, देवगण एवं द्यावा-पृथिवी अपने उद्यम से कितने भी बढ़ गये हों, परन्तु इन्द्र और वरुण दोनों देव इन सबसे श्रेष्ठ हैं ॥४॥
हे इन्द्र और वरुणदेवो ! आपको हविप्रदान करने वाला याजक, दानदाता और धनवान् होता है । वह यज्ञ करने वाला आपकी कृपा से सुरक्षित रहकर, धन एवं ऐश्वर्ययुक्त पुत्र प्राप्त करता है ॥५॥
हे इन्द्र और वरुण देवो ! जैसा धन आप हविदाता को देते हैजो धन आपसे सुरक्षित है; वैसा ही धन सुरक्षा के लिए हमें प्रदान करें, जिससे हम अपने निन्दकों को दूर कर सकें ॥६॥
हे इन्द्र और वरुण देवो ! हम आपकी स्तुति करने वाले स्तोतागण हैं । आपका देवों द्वारा रक्षित धन हमें भी प्राप्त हो । हम उस सुरक्षित धन-बल से शत्रुओं को तिरस्कृत करके उन्हें जीत लें ॥७॥
हे इन्द्र और वरुणदेवो ! आप दोनों महान् बलवान् हैं । हम आपकी स्तुति करते हैं। आप हमें यश प्राप्त कराने वाला धन प्रदान करें । जैसे नौका द्वारा जल राशि को पार किया जाता है, वैसे ही हम आपकी कृपा से पापों से तर जायें ॥८॥
हे मनुष्यो ! वरुणदेव महान् , तेजस्वी, अजर और बड़े कार्य करने वाले हैं; जो वरुणदेव इस पृथ्वी को अपने प्रकाश से प्रकाशित करते हैं, उनकी मननीय स्तोत्रों द्वारा स्तुति करो ॥९॥
सोमपायों हे इन्द्र और वरुणदेवो ! आप दोनों इस हर्षित करने वाले सोमरस का पान करें। आपका रथ सोमपान एवं देवों की तुष्टि के लिए प्रत्येक यज्ञ में जाता है ॥१०॥
हे बलवान् इन्द्र और वरुणदेवो ! आप इस बलयुक्त अति मधुर आनन्दवर्धक सोमरस का पान करें । आप दोनों इस कुश के आसन पर बैठकर अपने लिए तैयार सोमरस को ग्रहण कर हर्षित हों ॥११॥

सूक्त-६९

हे इन्द्रदेव और विष्णुदेव ! हम आपके निमित्त हवि और उत्तम स्तोत्र प्रेषित करते हैं। आप प्रसन्न होकर यज्ञ में आएँ एवं हमें धन प्रदान करें ॥१॥
हे इन्द्रदेव और विष्णुदेव ! आप समस्त विश्व में सुमति के प्रेरक हैं। आपके लिए यह सोमरस से भरे पात्र रखे हैं। आपके लिए की गई स्तुतियाँ आपको प्रसन्न करें। आप हमारी रग करें ॥२॥
हे इन्द्रदेव और विष्णुदेव ! आप दोनों सोम के स्वामी हैं। आप हमारे लिए धन लेकर इस यज्ञ में आएँ । उक्थों (उच्चारित वचनों) सहित स्तोत्र आपको बढ़ाने वाले हों ॥३॥
हे इन्द्रदेव और विष्णुदेव ! हिंसकों को परास्त करने वाले घोड़े आपको ले आएँ । आप हमारी स्तुति को सुनकर, हमारी प्रार्थना पर ध्यान दें ॥४॥
हे इन्द्रदेव और विष्णुदेव ! सोमपान से हर्षित होकर आपने इस विस्तृत विश्व को आवृत किया और हमारे जीवन के लिए लोकों को प्रकाशित किया है ॥५॥
हे इन्द्रदेव और विष्णुदेव ! आप सोम पान से बढ़ते हैं। यजमान आपके लिए नमस्कार सहित हवि प्रदान करते हैं । आप हमें धन प्रदान करें । आप समुद्रवत् गंभीर हैं। जैसे यह कलश सोम से परिपूर्ण हैं, वैसे ही आप भी परिपूर्ण हों ॥६॥
है इन्द्रदेव और विष्णुदेव ! आप दोनों तृप्त होने तक इस सोमरस को उदरस्थ करें। यह हर्षित करने वाला सोम आपके पास तक पहुँचे । आप हमारी प्रार्थना एवं स्तोत्रों को ध्यानपूर्वक सुनें ॥७॥
हे इन्द्रदेव और विष्णुदेव ! आप दोनों कभी पराजित न होने वाले अजेय हैं, परन्तु जब आप आपस में ही स्पर्धा करते हैं, तो सारे भुवन भय से काँपने लगते हैं ॥८॥

सूक्त-७०

हे द्युलोक और पृथ्वीलोक ! आप जलयुक्त सुन्दर रूप वाले और भुवनों को आश्रय देने वाले, मधुर अन्न-रस देने वाले, अमर एवं बलवान् हैं। आप दोनों वरुणदेव द्वारा धारण किये गये हैं ॥१॥
ये द्यावा-पृथिवी बहुत से जल प्रवाहों से युक्त हैं। ये दोनों उत्तम कर्म करने वालों को तेजस्वी जल प्रदान करते हैं । हे द्यावा-पृथिवि ! आप दोनों इन भुवनों की अधिष्ठाता हैं । आप प्रसन्न होकर हमें हितकारी जल प्रदान करें ॥२॥
हे द्यावा-पृथिवि ! आपके निमित्त यजन कर्म करने वालों के सभी कार्य सफल-सिद्ध होते हैं। आपकी कृपा से धर्मारूढ़ मानवों को श्रेष्ठ सन्तान प्राप्त होती है ॥३॥
द्यावा और पृथिवी दोनों जल से युक्त हैं। वे जल से सुशोभित एवं जल वृष्टि करने वाले हैं । यज्ञ में यजमान उनकी स्तुति करते हुए सुख प्राप्ति की कामना करते हैं ॥४॥
हे मधुरता की वृद्धि करने वाले द्यावा-पृथिवि ! आप दोनों में मधुरता प्रदान करें । मधुरता आपका स्वभाव है । यज्ञ, धन एवं देवत्व धारण करने वाले आप हमें यश, बल और धन प्रदान करें ॥५॥
हे सबका कल्याण करने वाले द्यावा-पृथिवि ! आप हमारे माता-पिता हैं । आप सर्वज्ञ, तेजस्वी, ज्ञानी एवं सत्कर्म करने वाले हैं। आप हमें पुत्र-पौत्र युक्त, अन्न, बल, यश और धन प्रदान करें ॥६॥

सूक्त-७१

श्रेष्ठ कर्म करने वाले सवितादेव सुदक्ष, तरुण, पवित्र और यज्ञरूप हैं। वे देव अपनी स्वर्णिम बाहुओं को ऊपर उठाकर जगत् को सब प्रकार से कल्याण करते हैं ॥१॥
सवितादेव द्वारा सत्प्रेरणा और धन दान के समय हम उपस्थित हों । हे सवितादेव ! आप समस्त पशुओं और मनुष्यों को विश्राम तथा कर्म में नियोजित करने वाले हैं ॥२॥
हे सवितादेव ! आप न दबने वाले कल्याणकारी तेज से हमारे घरों की रक्षा करें । स्वर्ण जिह्वा वाले देव आप हमें नये-नये सुख देते हुए, हमारी रक्षा करें । हम पापियों के अधीन न हों ॥३॥
जो सवितादेव शान्त मन वाले, स्वर्णमयी बाहुओं वाले और यशस्वी हैं, वे रात्रि के समाप्त होने पर विधिपूर्वक आहुति प्रदान करने वाले को उत्तम अन्न-धन प्रदान करते हैं ॥४॥
जैसे वक्ता हाथ ऊपर उठाकर भाषण करता है, वैसे ही सविता देवता अपनी स्वर्णिम किरणों रूपी हाथों को ऊपर की ओर फैलाकर उदित होते हैं । उदित होकर पृथ्वी से उठकर स्वर्ग के शिखर पर स्थित होकर, सभी को पुष्ट और आनन्दित करते हैं ॥५॥
हे सर्व उत्पादक सवितादेव ! आज हमारे लिए श्रेष्ठ सुखों को प्रदान करें । अगला दिवस भी श्रेष्ठ सुख प्रदायक हो, इस प्रकार आप प्रतिदिन हमें उत्तम सुखों को प्रदान करें। आप विपुल धन एवं आश्रयों के अधिपति हैं। इस भावना के अनुसार हम श्रेष्ठ धनादि प्राप्त करें ॥६॥

सूक्त-७२

हे इन्द्रदेव और सोमदेव ! आप अत्यन्त महिमावान् हैं। आप दोनों ने श्रेष्ठ कर्म किये हैं। आपने सूर्य तथा जल को प्राप्त किया है। आपने अन्धकार और निन्दकों को दूर किया हैं ॥१॥
हे इन्द्रदेव और सोमदेव ! आपने उषा को बसाया एवं प्रकाशित सूर्य को ऊपर उठाया है । आपने आधार प्रदान कर द्युलोक को स्थिर किया एवं पृथ्वी माता को विस्तृत किया है ॥२॥
हे इन्द्रदेव और सोमदेव ! आपने जल प्रवाह को रोकने वाले वृत्र को नष्ट किया । द्युलोक ने आपको प्रवृद्ध किया। आपने नदियों की जल राशि को प्रवाहित कर समुद्र को भर दिया है ॥३॥
हे इन्द्रदेव और सोमदेव ! आपने कम आयु वाली गौओं के (थनों) दुग्धाशय में परिपक्व दूध को स्थापित किया है । उसी तरह विचित्र वर्ण वाली गौओं में आपने श्वेत वर्ण का दुग्ध धारण कराया हैं ॥४॥
हे इन्द्रदेव और सोमदेव ! आप दोनों में ऐसा धन प्रदान करें, जिससे हमारा कल्याण हो । आप हमें शत्रु सेना का पराभव करने वाला उग्र बल प्रदान करें ॥५॥

सूक्त-७३

जो बृहस्पति देव सबसे प्रथम उत्पन्न हुए, उन्होंने पर्वत को ध्वस्त किया । जो अङ्गिरसों में हविष्यान्न से युक्त हैं, जो स्वयं के तेज से तेजस्वी हैं, वे उत्तम गुणों से भूमि की सुरक्षा करने वाले, बलवान्, हमारे पालक बृहस्पति देव द्युलोक और भूलोक में गर्जना करते हैं ॥१॥
जो बृहस्पतिदेव स्तोताओं को स्थान देते हैं, वे बृहस्पतिदेव शत्रुओं को मारने वाले और शत्रुजयीं हैं । वे शत्रुओं को परास्त करके उनके नगरों को ध्वस्त करते हैं ॥२॥
बृहस्पतिदेव ने असुरों को परास्त करके गोधन जीता है। वे बृहस्पतिदेव स्वर्ग के शत्रुओं को मन्त्र द्वारा विनाश करते हैं ॥३॥

सूक्त-७४

हे सोमदेव और रुद्रदेव ! आप दोनों सामर्थ्यवान् हैं । हमारे समस्त यज्ञ आप तक पूर्णता से पहुँचें । प्रत्येक घर में सात रत्न (प्रत्येक शरीर में सप्त धातु) स्थापित कर, आप हमारा मंगल करें । हमारे द्विपादों (मानवों) एवं चतुष्पादों (पशुओं) को सुख प्रदान करें ॥१॥
हे सोमदेव और रुद्रदेव ! आप दोनों हमारे घरों में प्रविष्ट रोगों का विनाश करें । दरिद्रता हमसे दूर रहे। हम अन्नसहित सुख से रहें ॥२॥
हे सोमदेव और रुद्रदेव ! आप दोनों हमारे शरीर में सभी ओषधियाँ धारण करा दें। हमारे बन्धन खोलें और हमें मुक्त कर दें ॥३॥
तीक्ष्ण आयुधधारी, उत्तम विचारवान्, सुसेव्य, हे सोमदेव और रुद्रदेव ! आप हमें वरुण पाश से मुक्त करके, उत्तम प्रकार का सुख प्रदान करें ॥४॥

सूक्त-७५

कवच को धारण करके जब शूरवीर योद्धा संग्राम-स्थल के लिए जाते हैं, तब सेना का स्वरूप बादल के सदृश होता है । हे वीर पुरुष ! आप बिना आहत हुए विजय को प्राप्त करें; उस कवच की महान् शक्ति आपकी रक्षा करे ॥१॥
धनुष की शक्ति से युद्ध जीतकर गौएँ प्राप्त करेंगे । भीषण संग्राम में धनुष से शत्रु की कामनाएँ ध्वस्त करेंगे । हमारा धनुष शत्रु को पराजित करता है, ऐसे धनुष की महिमा से सभी दिशाओं को विजित करेंगे ॥२॥
संग्राम में विजय दिलाने वाला, धनुष पर चढ़कर अव्यक्त ध्वनि करती हुई, (प्रत्यंचा) प्रिय बाणरूप मित्र से मिलती है । वह योद्धा के कानों तक खिचती हुई ऐसी प्रतीत होती है, मानो कुछ कहना चाहती हैं । यह प्रत्यंचा संकटों से पार करने वाली है ॥३॥
ये दोनों (कोटियाँ) समान मन वाली स्त्रियों की तरह (एक ही प्रयोजन के लिए) आचरण करती हैं। माता की भाँति पुत्र (बाण) को गोद में लेकर एक साथ रहने वाली ये, शत्रुओं का वेधन करतीं तथा अमित्रों को बिखेर देती हैं ॥४॥
यह बहुतों का पिता है, इसके पुत्र बहुत हैं। समर में पहुँचकर यह चीं-चीं ध्वनि करता है । योद्धा के पृष्ठ भाग में आबद्ध यह अपने द्वारा प्रसूत (बाणों) से सभी संगठित शत्रुओं को जीत लेता है ॥५॥
उत्तम सारथी रथ पर स्थित होकर अश्वों को यहाँ-वहाँ इच्छानुसार आगे ले जाता हैं। हे स्तोताओ ! आप लगामों की महिमा का बखान करें । वे मन के अनुकूल (अश्वों को गति देने के लिए प्रवृत्त होती हैं ॥६॥
रथ के साथ गतिमान् , वृषभों से भी अधिक शक्तिशाली अश्व अमित्रों (शत्रुओं) को अपने पदों (चरणों) से आक्रान्त करते हैं । अपव्यय से बचकर शत्रुओं को नष्ट करते हैं ॥७॥
जहाँ इस रथ को बढ़ाने वाले हव्य, (रथी के) अस्त्र-शस्त्र एवं कवच आदि रखे होते हैं, हम प्रसन्न मन से उस रथ पर सदैव स्थित रहेंगे ॥८॥
(यह रक्षक) वयोधा (अवस्थाओं अथवा बल को धारण करने वाले), शत्रु के अन्नों को नष्ट करने वाले तथा स्वपक्ष को अन्न देने वाले हैं । संकट के समय आश्रय देने वाले, गंभीर, विचित्र सेना से युक्त यह महान् वीर स्वयं अहिसित रहकर शत्रुसेना को नष्ट करने में समर्थ है ॥९॥
ब्राह्मण, पितर, ऋत (सत्य या यज्ञ संवर्धक तथा सोम सिद्ध करने वाले-यह सब हमारी रक्षा करें। कल्याणप्रद द्यावा-पृथिवी एवं पूषादेव हमें पापों से बचाएँ । पापी-दुराचारी व्यक्ति हम पर शासन न करने पाएँ ॥१०॥
यह सुपर्णयुक्त (पक्षी की तरह) गतिशील, तीक्ष्ण दाँत (नोंक) वाले मन की तरह यह बाण गो (इन्द्रियों) द्वारा संधान किया गया, प्रसूत होते (प्रकट होते-छूटते) ही प्रहार करता है । जहाँ मनुष्य एकत्रित होकर या बिखर कर गतिशील होते हैं, वहाँ ये बाण हमारे शरणदाता या सुख प्रदायक हों ॥११॥
है ऋजुगामी (बाण) आप सब ओर से हमें संवर्धित करें । हमारे शरीर पत्थर जैसे (मजबूत) हो । सोमदेव हमें उत्साहित करें तथा माता अदिति हमें सुख प्रदान करें ॥१२॥
हे अश्व चलाने वाली कशा ! आप संग्राम में जागरूक अश्वों को प्रेरित-उत्तेजित करें । इनके उभरे हुए भागों पर अथवा निचले अंगों पर समीप से प्रहार करें ॥१३॥
सर्प की तरह लिपट कर प्रत्यंचा के आघात से यह (हस्तबन्ध) हाथ की रक्षा करता हैं । यह सभी कुशलताओं के ज्ञाता पुरुषों का सब ओर से संरक्षण करे ॥१४॥
जो विषयुक्त, लोहे के फल लगा, हिंसक अग्रभाग वाला यह बाण है, पर्जन्य से जिनका पराक्रम बढ़ता है, उन बाण देवता को हमारा नमस्कार है ॥१५॥
हे बाण रूपी अस्त्र ! मन्त्रों के प्रयोग से तीक्ष्ण किये हुए आप हमारे द्वारा छोड़े जाते हुए शत्रु सेना पर एक साथ प्रहार करें और उन्हें संतप्त करें । उनके शरीरों में प्रविष्ट होकर सभी का विनाश करें तथा किसी भी दुष्ट को जीवित न बचने दें ॥१६॥
जहाँ शिखारहित-बालकों (चंचल बालकों) के समान बाण गिरते हों, वहाँ ब्रह्मणस्पति और अदिति हमें सुख प्रदान करें और हमारा सदा कल्याण करें ॥१७॥
हे रथी ! आपके मर्मस्थलों को हम कवच से युक्त करते हैं। सोमदेव आपको अमृत से युक्त करें । वरुणदेव आपको सुख प्रदान करें । आपकी विजय से देवगण आनन्दित हों ॥१८॥
जो हमारे बन्धु होकर द्वेष करते हैं, गुप्त रूप से हमारे संहार की इच्छा रखते हैं, उन्हें सब देवगण नष्ट कर दें । वेदमन्त्र ही हमारे कवचरूप हैं, वे हमारा कल्याण करें ॥१९॥
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