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| Rigveda | Gyan Dhyan Sanskar |
सूक्त-१
| उषाकाल में जाग्रत् गौओं की तरह याजकों की समिधाओं (श्रद्धा ) से जाग्रत्-प्रज्वलित इस (दिव्य) अग्नि की ज्वालाएँ, फैली हुई वृक्ष की डालियों के समान (अपनी किरणों से) द्युलोक तक फैल जाती हैं ॥१॥ |
| यज्ञ के आधार अग्निदेव, यजन कार्य के निमित्त देवों द्वारा प्रदीप्त होते हैं। वे अग्निदेव प्रातःकाल श्रेष्ठ मानसिकता से ऊर्ध्वगामी होते हैं। उस समय इनका तेजस्वी रूप प्रत्य हो उठता है । ये महान् देव, जगत् को तम से मुक्त कर देते हैं ॥२॥ |
| जब ये अग्निदेव बाधा डालने वाले अन्धकार को हर लेते हैं, तो शुभ किरणों से तेजस्वी बने अग्निदेव जगत् को प्रकाशित कर देते हैं। इन्हें बल देने के लिए जब घृतधारा यज्ञ पात्र में प्रवाहित होती है, तो अग्निदेव ऊँचे उठकर जिह्वाओं (ज्वालाओं) से घृतधारा का पान करते हैं ॥३॥ |
| लोगों की आँखें जैसे सूर्योदय की प्रतीक्षा में निरत रहती हैं, वैसे ही दे-याजकों के मन अग्नि की कामना से सब ओर घूमते हैं। आकाश और पृथिवी, विचित्र रूप वाली उषा के साथ जिन अग्निदेव को प्रकट करते हैं; वे अग्निदेव उज्ज्वल कान्तियुक्त और बलयुक्त हैं ॥४॥ |
| उत्पादित होने योग्य ये अग्निदेव उषाकाल में उत्पन्न होते हैं। वनों के काष्ठों में हितकारी अग्निदेव प्रदीप्त होते हैं। ये प्रत्येक घर में सात रत्न रूपी दीप्तियाँ धारण कर यज्ञ के योग्य होता' रूप में अधिष्ठित होते हैं ॥५॥ |
| यज्ञ के योग्य होता' रूप में प्रतिष्ठित ये अग्निदेव, माता (पृथ्वी) की गोद में सुरभित वेदी पर विराजित होते हैं । ये तरुण, विद्वान्, अति निष्ठावान्, सत्यस्वरूप और धारण करने योग्य अग्निदेव, मनुष्यों के मध्य प्रदीप्त होते हैं ॥६॥ |
| ये अग्निदेव अपनी सामर्थ्य से द्यावा-पृथिवीं को परिपूर्ण करते हैं। यजमान उन ज्ञानी, यज्ञ कार्य सिद्ध करने वाले, ‘होता' रूप अग्निदेव का स्तोत्रों से स्तवन करते हैं । यजमान अन्न के स्वामी अग्निदेव का घृत-आहुतियों द्वारा नित्य यजन करते हैं ॥७॥ |
| सबको पवित्र करने वाले, विकारों का शमन करने वाले, ज्ञानियों द्वारा प्रशंसित, अतिथि सदृश पूजनीय, हम सबका कल्याण करने वाले ओजस्वी ये अग्निदेव अपने स्थान पर पूजे जाते हैं । हे अग्ने ! आप अपनी सामर्थ्य से सबको पूर्ण करते हैं ॥८॥ |
| हे अग्ने ! आप यज्ञ में उत्पन्न सुन्दर रूप में प्रकट होते हैं। आप शीघ्र ही अन्यों को पार कर आगे बढ़ते हैं। आप मनुष्यों में अत्यन्त स्तुत्य, सुन्दर रूपवान्, प्रकाशवान् और प्रिय हैं। आप प्रजाओं में अतिथि रूप हैं ॥९॥ |
| हे युवा (सामर्थ्यवान्) अग्ने ! आपके उपासक लोग दूर से अथवा पास से आपके लिए भोज्य पदार्थ अर्पित करते हैं। आप शुद्ध उच्चारणयुक्त स्तुति करने वाले की श्रेष्ठ बुद्धि को जानें । हे अग्निदेव ! आपको महान् आश्रय अति कल्याणकारी है ॥१०॥ |
| हे तेजस्वी अग्निदेव ! आप तेजस्वी और सुन्दर रथ पर पूज्य देवों के साथ बैठकर आयें । सबै देवों को जानने वाले आप उन्हें हविष्यान्न ग्रहण करने के लिए व्यापक अन्तरिक्ष के सुगम मार्गों से यहाँ इस यज्ञ में लायें ॥११॥ |
| त्रिकालदशी, शक्तिशाली तथा सेचन (प्राण तत्त्व प्रदान करने में समर्थ यज्ञाग्नि का स्तोत्र पाठ से हम स्तवन करते हैं । वाणी में स्थिर, हविदाता, आवाहित अग्नि में मंत्रोच्चारणपूर्वक हविष्यान्न उसी प्रकार समर्पित करते हैं, जिस प्रकार द्युलोक में प्रकाशमान आदित्य को संध्योपासना के समय कहीं गई विशिष्ट महिमायुक्त प्रार्थनाएँ समर्पित की जाती हैं ॥१२॥ |
सूक्त-२
| तरुणी माता (काष्ठ अरणियाँ) अपने पुत्र (अग्नि) को गर्भ में भली प्रकार गुप्त रखती हैं। इसका पोषण स्वयं करती हैं, पिता को नहीं देती हैं। प्रकट होने पर इस गुप्त शिशु को लोग साक्षात् देखते हैं, तब इसके तेज को लोग विनष्ट नहीं कर सकते ॥१॥ |
| हे महान् तरुणी ! आप बालक (अग्नि) को गर्भ में धारण करती हैं, उत्पन्न करती हैं और उसका भली प्रकार पोषण करती हैं। गर्भ में यह बालक पूर्व के अनेक वर्षों तक पुष्ट होता है। जब आपने इसे उत्पन्न किया, तब इस उत्पन्न बालक को सबने देखा ॥२॥ |
| हमने निकटस्थ स्थान से स्वर्ण सदृश ज्वाला वाले, उज्ज्वल वर्ण वाले, आयुध रूप दीप्तियों वाले अग्निदेव को देखा। हमने उन्हें अमृतमय स्तोत्रं निवेदित किया। वे इन्द्रदेव को न मानने वाले और स्तुति न करने वाले भला हमारा क्या करेंगे? ॥३॥ |
| पशुओं के झुण्ड के समान, अपने स्थान (अरणि) में गुप्त अग्नि को विचरते हुए हमने देखा है। अग्निदेव जब उत्पन्न होते हैं, तो उनकी दीप्त ज्वालाओं का स्पर्श नहीं कर सकते । युवतियों के वृद्धा होने के समान क्षीण होती ज्वालाएँ हविष्यान्न प्राप्त कर जरावस्था से पुन: युवतियों के समान पुष्ट होती जाती हैं ॥४॥ |
| जो कोई राष्ट्र के स्वामी और भूमिपति नहीं हैं, वे कौन हैं, जो मुझे भूमि से पृथक् कर सकते हैं? जो इस भूमि पर अतिक्रमण करते हैं, उनसे हमें मुक्त करें । वे ज्ञानवान् अग्निदेव हमारे पशुओं के समीप रक्षक रूप में उपस्थित हों ॥५॥ |
| ये अग्निदेव सब प्राणियों के स्वामी और सबको आश्रय देने वाले हैं। शत्रुओं ने इन अग्निदेव को मर्त्यलोक में छिपा कर रखा । अत्रि वंशजों ने मंत्र युक्त स्तोत्रों से उन्हें मुक्त किया। उन अग्निदेव की निन्दा करने वाले निन्दा के पात्र हों ॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! शुन: शेष ऋषि के स्तुति करने पर आपने उन्हें सहस्रों यूप (स्तम्भों) के बंधन से मुक्त किया। है मेधावी अग्निदेव ! आप होता' रूप में इस यज्ञ में अधिष्ठित हों और हमें भी बंधनों से मुक्त करें ॥७॥ |
| हे अग्निदेव ! आप जब क्रुद्ध होते हैं, तब हमसे दूर हो जाते हैं। नियमों के पालक इन्द्रदेव ने यह उपदेश हमें किया था। विद्वान् इन्द्रदेव ने आपको देखा है और उनके द्वारा प्रेरित होकर हम आपके सम्मुख उपस्थित हैं ॥८॥ |
| वे अग्निदेव अपने महान् तेजों से प्रकाशित होते हैं । वे अपनी महत्ता से सब पदार्थों को प्रकट करते हैं । वे अपनी सामर्थ्य से असुरों की दुःखप्रद माया को विनष्ट करते हैं। राक्षसों के विनाश के निमित्त अपनी ज्वालाओं को तीक्ष्ण करते हैं ॥९॥ |
| अग्नि की शब्द करने वाली ज्वालाएँ तीक्ष्ण आयुधों के समान राक्षसों का विनाश करने के लिए द्युलोक में प्रकट होती हैं । (हव्यादि से) पुष्ट होकर ज्वालाएँ अति विकराल रूप धारण कर राक्षसां को मंतप्त करती हैं। आसुरी बाधाएँ अग्निदेव की सीमा को प्रतिबन्धित नहीं कर सकतीं ॥१०॥ |
| अनेक रूपों में उत्पन्न हे अग्निदेव ! आप धैर्यवान्, ज्ञानी और उत्तम कार्य करने वाले हैं। रथ के निर्माण के सदृश मनोयोगपूर्वक हमने आपके निमित्त स्तोत्रों को तैयार किया है । हे अग्निदेव ! आप इन स्तोत्रों से हर्षित होकर विजय प्राप्त करने वाले स्वर्गिक सुख से युक्त हों ॥११॥ |
| असंख्यों ज्वालाओं वाले, अभीष्ट वर्षक, अबाध वृद्धि-युक्त, शत्रुरहित अग्निदेव श्रेष्ठ पुरुषों को धन देते हैं। अतएव अमर देवगण इन अग्निदेव से कहते हैं-'आप कुशा के आसन बिछाने वाले तथा हवि देने वाले याजक को निश्चय ही सुख प्रदान करें ॥१२॥ |
सूक्त-३
| हे अग्निदेव ! जब आप प्रकट होते हैं, तो वरुण के सदृश गुण वाले होते हैं और जब आप प्रदीप्त होते हैं, तो मित्र के सदृश होते हैं। आप में ही सम्पूर्ण देवगण स्थित हैं। हे बल के पुत्र अग्निदेव ! आप हविदाता यजमान के लिए इन्द्रदेव के सदृश पूज्य हैं ॥१॥ |
| हे स्वधावान् अग्निदेव ! गुप्त नाम से आप कन्याओं के अर्यमा (नियंत्रक) रहते हैं ।जब आप पति-पत्नी द्वारा गो (गौओं अथवा इन्द्रियों) के रस से सिञ्चित किये जाते हैं, तब आप उन्हें समान मन वाले बनाकर सुख देते हैं ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आपकी शोभा बढ़ाने के लिए मरुद्गण शोधन प्रक्रिया चलाते हैं । हे रुद्ररूप ! आपका जन्म सुन्दर और विलक्षण है । विष्णुदेव आपके निमित्त उपमा योग्य पद निर्धारित करते हैं। आप देवों के इन गुह्य अनुग्रहों को संरक्षित करें ॥३॥ |
| हे तेजस्वी अग्निदेव ! आपकी समृद्धि से ही सभी देवगण सुन्दर रूप और अत्यन्त तेज को धारण करते हुए अमृत तत्त्व की प्राप्ति करते हैं । कामना करने वाले मनुष्य स्तुतियों के साथ घृत की हवियाँ देते हुए होता रूप अग्निदेव की सेवा करते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आपसे पूर्व अन्य कोई होता नहीं था। यज्ञ करने वाला भी अन्य कोई नहीं था। हे अन्न अभिपूरित अग्निदेव ! भविष्य में भी आपके सदृश अन्य कोई काव्य स्तोत्रों द्वारा स्तुत्य नहीं होगा। आप जिसके यहाँ अतिथि रूप होते हैं, वह यजमान यज्ञ के द्वारा पुत्र-पौत्रादि प्रजाओं को प्राप्त करता है ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! धन की कामना करने वाले हम आपको प्रज्वलित कर हवियों से प्रदीप्त करते हैं। आपके अनुग्रह से हम धनों से युक्त होकर आपसे संरक्षित हों । हम सभी छोटे-बड़े युद्धों में नित्य विजय हस्तगत करें । हे बल के पुत्र अग्निदेव ! हम धनों से और सन्तानों से युक्त होकर सुखी हों ॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! जो मनुष्य हमारे प्रति अपराध या पापपूर्ण व्यवहार करता है, उस पाप को आप उस पापी में ही विस्थापित कर दें । हे ज्ञानी अग्निदेव ! जो हमें पाप या अपराध से प्रताड़ित करता है, आप उस पापी को मार डालें ॥७॥ |
| हे अग्ने !रात्रि की समाप्ति अर्थात् उषा की प्राकट्य वेला में पुरातन लोग आपको देवों का दूत बनाकर हवियों से यजन करते हैं ।उन श्रेष्ठ मनुष्यों द्वारा प्रज्वलित होकर आप धनों औरयोग्य धामों से संपन्न करते हैं ॥८॥ |
| हे बल के द्वारा उत्पन्न अग्निदेव ! पुत्र द्वारा पिता की सेवा करने के समान जो विद्वान् आपकी सेवा करता है, उसे आप संकटों से पार करें और पापों से मुक्त करें । हे ज्ञानी और यज्ञपालक अग्निदेव ! आप हम पर अपनी कृपा दृष्टि कब करेंगे? और हमें कब श्रेष्ठ मार्ग पर प्रेरित करेंगे? ॥९॥ |
| हे आश्रयदाता अग्निदेव ! आप पिता रूप में सबके पालनकर्ता हैं । स्तुतियों के साथ वि देने वाले यजमान की वियों से संतुष्ट होकर आप उन्हें बहुत यश प्रदान करते हैं । वृद्धि को प्राप्त होते हुए, तेजयुक्त शोभा और अतीव बलों से संयुक्त ये अग्निदेव उपासक को अत्यन्त सुख देते हैं ॥१०॥ |
| हे प्रिय युवा अग्निदेव ! जो आपको चोर दिखाई देते हैं तथा जो कुटिल शत्रु अनजान मनुष्यों को प्रताड़ित करते हैं, ऐसे सम्पूर्ण आगत संकटों से आप हम स्तोताओं को पार लगायें ॥११॥ |
| हे अग्निदेव ! स्तुति करने वाले हम उपासक अब आपकी ओर अभिमुख हुए हैं। हमें अपने अपराधों को आपके सम्मुख निवेदन कर आपके आश्रय की कामना करते हैं । हमारी स्तुतियों से प्रवृद्ध ये अग्निदेव हमें निन्दकों की ओर और हिंसकों की ओर जाने से बचायें ॥१२॥ |
सूक्त-४
| हे तेजस्वी अग्निदेव ! आप धनों के अधीश्वर हैं। हम यज्ञों में आपकी स्तुति करते हैं । बल प्राप्ति की कामना वाले हम आपके द्वारा बलों को प्राप्त करें । शत्रु सेनाओं को मार भगाकर हम विजय प्राप्त करें ॥१॥ |
| हव्यादि का हवन करने वाले अग्निदेव सदैव अजर रूप में स्थित हैं। वे पिता रूप में हमारे पालनकर्ता हैं। सर्वव्यापक रूप में सर्वत्र प्रकाशित होते हुए अति दर्शनीय होते हैं । हे उत्तम गार्हपत्य अग्निदेव ! हमारे निमित्त उत्तम अन्न प्रदान करें। हमारी ओर कीर्ति भी प्रेरित करें ॥२॥ |
| हे अत्विजो ! आप मनुष्यों के अधीश्वर, ज्ञानी, स्वयं पवित्र रहकर मनुष्यों को पवित्र करने वाले, दीप्तिमान् शरीर वाले, सर्वभूत-ज्ञाता इन अग्निदेव को यज्ञ में होता रूप में धारण करें । वे देवों द्वारा धारण करने योग्य धन हमें प्रदान करें ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! वेदी में प्रतिष्ठित होकर प्रज्वलित हुए आप, सूर्यरश्मियों के साथ हमारी स्तुतियों को स्वीकार करें । हे सर्वभूत-ज्ञाता अग्निदेव ! आप हमारी समिधाओं को ग्रहण करते हुए देवों को यहाँ हवि भक्षण के निमित्त ले आयें ॥४॥ |
| घर में आये प्रिय और विनयशील अतिथि के समान पूज्य आप हमारे इस यज्ञ में आयें। सभी आक्रामक शत्रुओं का हनन कर शत्रुवत् व्यवहार करने वालों का धन हमारे पास ले आयें ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! अपने शरीर के लिए अन्न ग्रहण करते हुए आप हमारे शत्रुओं का आयुधों से नाश करें । हे बल के पुत्र अग्निदेव ! आप देवों को तृप्त करते हैं। हे मनुष्यों में अग्रणी स्तुत्य अग्निदेव ! संग्राम में आप हमारी रक्षा करें ॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! हम आपकी श्रेष्ठ वचनों और हवियों से सेवा करते हैं। हे पवित्रकर्ता, कल्याणकारी तेज संयुक्त अग्निदेव ! आप हमें सबके द्वारा वरणीय श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें । हमें सब प्रकार के धनों को धारण करायें ॥७॥ |
| हे बल के पुत्र अग्निदेव ! जल, थल और पर्वत इन तीन सदनों में निवास करने वाले आप हमारे यज्ञ में प्रतिष्ठित होकर हविष्यान्न का सेवन करें । हम देवों के निमित्त श्रेष्ठ कर्म करने वाले हों । आप तीनों (कायिक वाचिक, मानसिक) पापों से हमारी रक्षा करें । उत्तम आश्रय स्थान देकर हमें सुख करें ॥८॥ |
| हे सर्वभूत-ज्ञाता अग्निदेव ! जैसे नाविक नाव द्वारा लोगों को नदी के पार करता है, वैसे ही आप आगत सम्पूर्ण संकटों से हमें पार करें । अत्रि के समान अभिवादन योग्य स्तुतियाँ हम आपको निवेदित करते हैं; आप हमारे इस निवेदन को जानें, हमारे शरीरों की आप ही रक्षा करें ॥९॥ |
| हे अग्निदेव ! आप अविनाशी हैं और हम मरणधर्मा हैं। हम स्तुतिपूर्ण हृदय से आपको नमस्कार करते हुए बुलाते हैं । हे ऐश्वर्यों के स्वामी अग्निदेव ! हमें यश प्रदान करें । हम आपके अविनाशी रूप में स्थित होकर सन्तानों से युक्त हों ॥१०॥ |
| हे ऐश्वर्यों के स्वामी अग्निदेव ! आप श्रेष्ठ कर्म करने वाले जिस यजमान पर अनुग्रह करते हैं; वह यजमान अश्वों, पुत्रों, वीरों और गौओं से युक्त कल्याणकारी ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ॥११॥ |
सूक्त-५
| (हे यजमान !} श्रेष्ठ, भली-भाँति प्रज्वलित, जाज्वल्यमान, सर्वज्ञ (जातवेदा), देदीप्यमान यज्ञाग्नि में शुद्ध पिघले हुए घृत की आहुतियाँ प्रदान करें ॥१॥ |
| मनुष्यों द्वारा अति प्रशंसित ये अग्निदेव इस यज्ञ को भली प्रकार सम्पन्न करें। वे अग्निदेव अडिग, ज्ञान-सम्पन्न और मधुर रश्मियुक्त हैं ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आप सबके द्वारा स्तुत्य हैं । आप हमारी रक्षा के निमित्त प्रिय और विलक्षण शक्ति सम्पन्न इन्द्रदेव को यहाँ सुखकारी रथों से ले आयें ॥३॥ |
| हे मनुष्यो ! आप ऊन के समान मृदु एवं सुखप्रद आसनों को बिछायें, क्योंकि स्तोताओं ने स्तुतियाँ आरम्भ कर दी हैं। हे शुभ्र अग्निदेव ! स्तुतियों से वृद्धि को प्राप्त हुए आप हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों ॥४॥ |
| हे हवियों ! आप उत्तम गुणों वाली, दिव्य द्वारों को खोलने वाली और श्रेष्ठ कर्म वाली हैं। आप हमारी रक्षा के निमित्त यज्ञ को परिपूर्ण करें ॥५॥ |
| सुन्दर रूप वाली, आयु बढ़ाने वाली, महान् कर्मों को सम्पन्न कराने वाली, यज्ञ कर्मों की निर्मात्री रात्रि और उषा देवियों की हम उत्तम स्तुति करते हैं ॥६॥ |
| हे अग्नि और आदित्य रूप दिव्य होताओ ! आप दोनों हम मनुष्यों के इस यज्ञ में स्तुति से प्रेरित होकर वायु की गति से आयें ॥७॥ |
| इला, सरस्वती और मही (महान् भारती) तीनों देवियाँ सुखकारक हैं । ये मार्ग में अबाधित होकर हमारे यज्ञ में अधिष्ठित हों ॥८॥ |
| हे त्वष्टादेव ! आप व्यापक सामर्थ्य सम्पन्न और कल्याणकारी कर्म करने वाले हैं। आप हमारे यज्ञ में आगमन करें । हमारे प्रत्येक यज्ञ कर्म के उत्तम पद में प्रतिष्ठित होकर हमारे रक्षक हों ॥९॥ |
| हे वनस्पते ! जहाँ-जहाँ आप देवों के गुप्त स्थानों को जानते हैं, वहाँ-वहाँ इन हव्यादि साधनों को पहुँचायें ॥१०॥ |
| यह हवि अग्नि और वरुण देवों के लिए समर्पित हैं । यह हवि इन्द्रदेव और मरुद्गणों के लिए समर्पित है ॥११॥ |
सूक्त-६
| सबके आश्रय स्थल उन अग्निदेव से हम परिचित हैं, जिन अग्निदेव को प्रदीप्त जानकर गौएँ गोधूलि वेला में अपने-अपने बाड़े में वापिस लौटती हैं तथा तीव्रगामी अश्व नित्य ही उन अग्निदेव को प्रदीप्त देखकर अश्वशाला में लौटते हैं । हे अग्निदेव ! ऐसे आप याजकों के लिए प्रचुर धन-धान्य प्रदान करें ॥१॥ |
| जो सबके आश्रयरूप एवं सहायक हैं, उन्हीं अग्निदेव की हम प्रार्थना करते हैं। जिनके समीप गौएँ आती हैं और शीघ्र गतिमान् अश्व भी जिनके समीप आते हैं, ऐसे अग्निदेव की श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न होकर सुसंस्कार सम्पन्न विद्वान् पुरुष उपासना करते हैं। इन गुणों से युक्त हे अग्निदेव ! याजकों के लिए आप प्रचुर धन-धान्य प्रदान करें ॥२॥ |
| ये अग्निदेव निश्चय ही यजमान को अन्न देने वाले, पूज्य और सब पर दृष्टि रखने वाले हैं। वे प्रसन्न होकर यज्ञ में सबको ऐश्वर्य प्रदान करने में किञ्चित् मात्र संकोच नहीं करते । हे अग्निदेव !आप स्तोताओं को पर्याप्त पोषण दें ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! प्रकाशयुक्त एवं जरारहित (नित्य युवा) आपको हम प्रज्वलित करते हैं। आपकी श्रेष्ठ ज्योति द्युलोक में प्रकाशित होती हैं । आप स्तोताओं को अन्न (पोषण) से परिपूर्ण कर दें ॥४॥ |
| विश्व का पोषण करने वाले, शत्रुओं का विनाश करने वाले, देवताओं को हवि पहुँचाने वाले, आनन्दवर्द्धक, स्वप्रकाशित हे अग्निदेव ! ऋचाओं का उच्चारण करते हुए, याजकगण आपकी ज्वालाओं में आहुति दे रहे हैं; उन स्तोताओं को आप ऐश्वर्य प्रदान करें ॥५॥ |
| ये अग्निदेव अन्य सब अग्नियों में वरण करने योग्य, सब धनों को पुष्ट करते हैं । वे आनन्द प्रदायक अग्निदेव सबको श्रेष्ठ मार्ग में प्रेरित करते हैं। वे हविष्यान्न की कामना करते हैं, ऐसे हे अग्निदेव ! आप स्तोताओं को अभीष्ट अन्नादि से समृद्ध करें ॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! आपकी किरणें आहुतियों से युक्त होकर वृद्धि पाती हैं। आपकी तेजस्वी किरणे शब्दवान् होकर हवि की कामना करती हैं । हे अग्निदेव ! स्तोताओं को अन्नादि से पूर्ण करें ॥७॥ |
| हे अग्निदेव ! हम स्तोताओं को नवीन अन्नों से युक्त उत्तम आवास प्रदान करें, जिससे हम घर-घर में आपकी पूजा करें और आपको दूत रूप में पाकर सुखी हों । हे अग्निदेव ! स्तोताओं को अभीष्ट अन्नादि से अभिपूरित करें ॥८॥ |
| प्रजा का पालन करने वाले, शक्ति-सम्पन्न, देदीप्यमान हे अग्निदेव ! आहुति प्रदान करते समय दोनों पात्र आपके मुख तक पहुँचते हैं । हविष्यान्न द्वारा आपको प्रसन्न करने वाले स्तोताओं को महान् ऐश्वर्य प्रदान करें ॥९॥ |
| हम लोग यज्ञों में उत्तम वाणियों के द्वारा अग्निदेव का पूजन करते हैं। वे अग्निदेव हमें उत्तम, वीर पुत्र-पौत्रादि और बलशाली अप्वों को प्रदान करें । स्तोताओं को अभीष्ट अन्नादि से समृद्ध करें ॥१०॥ |
सूक्त-७
| हे मित्र ऋत्विजो ! जल के पौत्र रूप ये वरिष्ठ अग्निदेव, श्रेष्ठ बलों को प्रदान करने वाले हैं। आप इनके निमित्त श्रेष्ठ स्तवनों का गान करते हुए हविष्यान्न समर्पित करें ॥१॥ |
| जिनके प्रकट होने पर मनुष्य प्रसन्न होते हैं, जिनकी स्तुतियाँ कर ऋत्विग्गण यज्ञ स्थान में उन्हें प्रज्वलित करते हैं। सभी प्राणी भी जिनका दर्शन करने के लिए प्रकट हो जाते हैं, वे अग्निदेव कहाँ हैं ? ॥२॥ |
| जब हम अन्न प्राप्ति की कामना करते हैं और हम मनुष्यों के द्वारा अग्निदेव को हवियाँ दी जाती हैं, तब वे (अग्निदेव) अपनी सामर्थ्य से देदीप्यमान होकर ऊत (सत्य) रूप रश्मियों को धारण करते हैं ॥३॥ |
| ये जरारहित और पवित्र करने वाले अग्निदेव जब वनस्पतियों को जलाने लगते हैं, तब वे रात्रि में भी गहन तमिस्रा को दूर करते हुए अपनी ज्वालाओं को फैलाते हैं ॥४॥ |
| यज्ञ-मार्गों के पथिक ऋत्विग्गण, अग्नि की परिचर्या करते हुए घृत की आहुतियाँ देते हैं। तब वे घृत धारायें ज्वालाओं में उसी प्रकार आरूढ़ होती हैं, जैसे पुत्र पिता की पीठ पर आरूढ़ होते हैं ॥५॥ |
| अग्निदेव अनेकों द्वारा चाहे जाने वाले, सबको धारण करने वाले, अन्नों का स्वाद लेने वाले और यजमानों को उत्तम आश्रय देने वाले हैं। यजमान उनके गुणों को जानते हैं ॥६॥ |
| तृणों को उखाड़कर खाने वाले पशु की तरह वे अग्निदेव निर्जन प्रदेश में स्थित शुष्क काष्ठों को पृथक् कर भस्मीभूत करते हैं। वे अग्निदेव स्वर्णिम मूंछ (ज्वाला) वाले और शुभ दाँतों वाले, बड़े विस्तृत और अपराजित सामर्थ्य वाले हैं ॥७॥ |
| जिन अग्निदेव की अंत्वग्गण अत्रि ऋषि के समान परिचर्या करते हैं, जो कुल्हाड़ी के समान काष्ठों को विनष्ट करते हैं, जो हविष्यान्न का उपभोग करते हैं; उन दीप्तिमान् अग्निदेव को अरणि स्वेच्छा से उत्पन्न करती है ॥८॥ |
| हे अग्निदेव !आप हव्य पदार्थों का भक्षण करने वाले हैं। आप सम्पूर्ण जगत् के धारणकर्ता हैं। हमारी स्तुतियाँ आपको सुख देने वाली हों । मरणधर्मा स्तोताओं को आप तेजस्वी अन्नों और उत्तम मन(स्नेह) प्रदान करें ॥९॥ |
| हे अग्ने !मन्यु को धारण करने वाले ऋषिगण आपके द्वारा प्रदत्त पशु (हवनीय पदार्थों को प्राप्त करते हैं। आप हवि न देने वाले कृपण को अत्रिऋषि के वशीभूत करें और अन्नों को चुराने वाले दस्युओं को वशीभूत करें ॥१०॥ |
सूक्त-८
| हे बल से उत्पन्न अग्निदेव ! यज्ञ कर्म करने वाले पुरातन श्रेषगण अपने संरक्षण के निमित्त आपको भली प्रकार प्रज्वलित करते हैं ।आप चिर पुरातन, आनन्ददायक, जगत् को धारण करने वाले, पूज्य, श्रेष्ठ गृह-पालक हैं ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! यजमानों ने आपको यज्ञ-वेदी में स्थापित किया है । आप अतिथि के समान पूजनीय और गृह स्वामी हैं । आप दीप्तिमान् ज्वालाओं वाले, उच्च केतु रूप ज्वालाओं वाले, अनेक रूप वाले, धन देने वाले, अतीव सुखकारी, समिधाओं को जलाने वाले और हमें सब प्रकार से उत्तम संरक्षण देने वाले हैं ॥२॥ |
| हे उत्तम धनों के स्वामी अग्निदेव ! मनुष्यगण आपकी स्तुति करते हैं। आप यज्ञ-कर्मों को जानने वाले, सत्य-विवेचक, रत्न-दान करने वालों में श्रेष्ठ, गुह्य रूप में रहने वाले, सबके लिए दर्शनीय, अति शब्दवान्, उत्तम रूप से पूजनीय और घृत-सिञ्चन से अति शोभायमान होते हैं ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! आप सबको धारण करने वाले हैं। हम प्रचुर स्तोत्रों से स्तुति करते हुए, नमस्कारपूर्वक अभिवादन करते हुए आपके सम्मुख आते हैं । हे अंगिराओं में श्रेष्ठ देव ! आप भली प्रकार प्रदीप्त होकर उत्तम दीप्तिमान् ज्वालाओं से हमारी वियों को ग्रहण करें । हम मनुष्यों को कीर्ति प्रदान करें ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! विविध रूपों वाले आप सभी यजमानों को पहले के समान अन्नों से अभिपूरित करते हैं। आप बारम्बार सभी कर्मों में पूजित होते हैं । आप अपनी सामर्थ्य से विविध अन्नों के स्वामी हैं । आपकी तेजस्वी दीप्तियों को कोई दबा सकने में समर्थ नहीं है ॥५॥ |
| हे युवा अग्निदेव ! आप उत्तम प्रकार से प्रज्वलित होने वाले हैं। देवों ने आपको हवि वहन करने वाले दूत रूप में प्रतिष्ठित किया है । घृत आधार से प्रदीप्त होकर हवि ग्रहण करने वाले हे अग्निदेव ! अत्यन्त वेगवान् और तेजस्वीरूप आपको लोगों ने बुद्धि का प्रेरक और चक्षुरूप मानकर धारण किया है ॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! सुख की अभिलाषा करने वाले पुरातन यजमान आपको उत्तम समिधाओं से, आहुतियों और घृत से प्रदीप्त करते हैं । ओषधियों आदि से सिञ्चित होकर वृद्धि को प्राप्त हुए, आप पृथ्वी की सतहों पर अन्नों में व्याप्त होकर अवस्थित हैं ॥७॥ |
सूक्त-९
| हे तेजस्वी अग्निदेव ! हम मनुष्य हवि पदार्थों से युक्त होकर आपकी उत्तम स्तुति करते हैं। आप सम्पूर्ण उत्पन्न जीवों को जानने वाले हैं। आप हमारी हवियों को देवों तक पहुँचाने वाले हैं ॥१॥ |
| सभी यज्ञ जिन अग्निदेव का अनुगमन करते हैं ।अन्न और यश की कामना करने वाले यजमानों के हव्य जिन्हें प्राप्त होते हैं, वे अग्निदेव हविदाताओं और कुश उच्छेदक यजमानों के घर, ‘होता' रूप में प्रतिष्ठित होते हैं ॥२॥ |
| मनुष्यों का पोषण करने वाले अग्निदेव उत्तम रीति से यज्ञ-सम्पन्न करने वाले हैं । दो अरणियाँ इन अग्निदेव । को नये शिशु की तरह उत्पन्न करती हैं ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! कुटिल गति वाले सर्प या अश्व के शिशु के समान आप अति दुर्गमता से धारण किए जाने वाले हैं । जौ के खेत में प्रविष्ट हुआ पशु जैसे जौ को खा जाता है, उसी प्रकार वनों में प्रविष्ट हुए आप वनों को भस्म कर देते हैं ॥४॥ |
| अग्नि की धूम्रयुक्त शिखायें सर्वत्र व्याप्त होती हैं । लोहार अस्त्रादि द्वारा अग्नि को प्रवृद्ध करते हैं । यह संवर्द्धित अग्नि तीनों लोकों में व्याप्त होती है । कर्मकार (लुहार आदि) जिस प्रकारे धौंकनी (धमने यन्त्र) द्वारा अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, ये अग्निदेव उसी प्रकार स्वयं तेजस्वी बन जाते हैं ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! हम आपके मित्र भाव से युक्त होकर आपके निमित्त प्रशंसात्मक स्तोत्रों से आपका स्तवन करते हैं। आप अपने रक्षण सामथ्र्यों से संरक्षित कर हमें पाप कर्मों से पार करें और द्वेष करने वाले बाहरी शत्रुओं से भी पार करें ॥६॥ |
| हे बलवान् अग्निदेव ! आप हम मनुष्यों को उत्तम ऐश्वर्य से सम्पन्न बनायें । आप हमारे शत्रुओं को विनष्ट करें और हमें सब प्रकार से पोषण प्रदान करें । अन्नों की प्राप्ति हमारे निमित्त सुगम हो । हे आग्ने ! युद्धों में हमें अग्रणी बनाने का यत्न करें ॥७॥ |
सूक्त-१०
| हे निर्बाध गति वाले अग्निदेव ! ओजस्विता प्रदान करने वाली सम्पदा हमें प्रदान करें । हे देव ! हमें प्रशंसनीय धन और शक्ति प्राप्ति के मार्ग का दिग्दर्शन करायें ॥१॥ |
| हे अग्ने ! आप अत्यन्त विलक्षण कर्मों का सम्पादन करने वाले हैं। हमारे उत्तम यज्ञादि कर्मों से प्रसन्न होकर आप हमें श्रेष्ठ बल प्रदान करें ।आप असुरों को पराभूत करने में समर्थ हैं ।आप सूर्य सदृश चारों ओर व्याप्त हों ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति करने वाले मनुष्यों को आप श्रेष्ठ धनादि प्राप्त कराते हैं। आपकी स्तुति करने वाले हम भी उत्तम धनादि की वृद्धि करते हुए पुष्टि को प्राप्त हों ॥३॥ |
| हे आह्लाद प्रदायक अग्निदेव ! जो मनुष्य उत्तम वाणियों से आपका स्तवन करते हैं, वे अश्वयुक्त ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं। आपके उत्तम बलों से वे बलवान् होते हैं। उनकी उत्तम कीर्ति स्वर्ग से भी अधिक विस्तृत होती है, ऐसे लोगों को आप निश्चय ही जानते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आपकी अत्यन्त चंचल और दीप्तिमती रश्मियाँ सर्वत्र व्याप्त होती हैं। वे विद्युत् के समान शब्द करती और अन्न की कामना से गमनशील मनुष्यों और वेगवान् रथ के समान सर्वत्र संचरित होती हैं ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! आप शीघ्र ही हमारी रक्षा करें । हमें धनादि ऐश्वर्य से युक्त करके हमारी आपत्तियों का निवारण करें । हमारे पुत्र-बन्धु आदि आपकी स्तुतियाँ करते हुए सम्पूर्ण अभिलाषाओं को प्राप्त करने वाले हों ॥६॥ |
| हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्निदेव ! पुरातन ऋषियों ने आपकी स्तुतियाँ की हैं, आप उपास्य रहे हैं । वैभवशाली शत्रुओं का ऐश्वर्य आप हमें प्रदान करें। हम यज्ञादि कार्यों में होता रूप में आपकी स्तुति करने वाले हैं। हमारी स्तुतियों को बल दें । युद्ध में भी अपने बलों से हमारी वृद्धि करें ॥७॥ |
सूक्त-११
| प्रजा की रक्षा करने वाले, जागृति एवं दक्षता प्रदान करने वाले अग्निदेव याजकों को प्रगति का नवीन पथ प्रशस्त करने के लिए प्रकट हुए हैं । घृत की आहुतियों से अधिक प्रदीप्त होकर विराट् आकाश का स्पर्श करने में समर्थ, तेज से युक्त पवित्रता प्रदान करने वाले आप साधकों के लिए (अनुदान देने हेतु) चमकते हैं ॥१॥ |
| यज्ञ की पताका वाले रथ पर देवताओं के साथ बैठने वाले पुरोहित अग्निदेव को, याजक तीन स्थानों (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक) में भली-भाँति प्रज्वलित करते हैं। सत्कर्म में निरत यज्ञ करने के इच्छुक अग्निदेव अपने स्थान पर (यज्ञकुण्ड में) यज्ञ करने के लिए स्थित होते हैं ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आप मातृ रूप दो अरणियों से निर्विघ्न रूप से जन्म लेते हैं। आप मेधावी, पवित्र करने वाले और स्तुत्य हैं। आपको यजमान अपनी.हितकामना से प्रज्वलित करते हैं। पूर्वकालीन ऋषियों ने आपको घृत से प्रवृद्ध किया था । आहुतियों से प्रवृद्ध आपका धूम्र, केतु रूप में आकाश तक व्याप्त होता है ॥३॥ |
| सब श्रेष्ठ कार्यों को सिद्ध करने वाले अग्निदेव हमारे यज्ञ में अधिष्ठित हों । सभी मनुष्य घर-घर में अग्निदेव की स्थापना करते हैं । वे हव्यवाहक अग्निदेव देवों के दूत रूप में प्रतिष्ठित होते हैं । स्तोतागण ज्ञान-सम्पन्न यज्ञ कर्म में अग्निदेव की सम्यक् स्तुतियाँ करते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! हमारे अतिशय मधुर वचन आपके निमित्त निवेदित हैं। ये स्तोत्र आपके हृदय में सुख प्रदायक हों। जैसे नदियाँ समुद्र को पूर्ण कर उसका बल बढ़ाती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियाँ आपको पूर्ण कर आपका बल बढ़ाने वाली हों ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! अंगिरावंशी ऋषियों ने गहन स्थलों में स्थित और विभिन्न वनस्पतियों में व्याप्त आपको, अन्वेषण करके प्राप्त किया। आप अत्याधिक बलपूर्वक घर्षण करने के उपरान्त अरणियों से उत्पन्न होते हैं । अतएव मनीषीगण आपको शक्ति के पुत्र कहकर सम्बोधित करते हैं ॥६॥ |
सूक्त-१२
| ये अग्निदेव अपनी सामर्थ्य से अतिशय महान्, यज्ञ-योग्य, जल की वृष्टि करने वाले, प्राणों के आधार और अभीष्टवर्धक हैं। यज्ञ के मुख में सिञ्चित घृत धारा के सदृश हमारी स्तुतियाँ अग्निदेव के लिए प्रीतिकारक हों ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! हमारी स्तुतियों को आप जानने वाले हैं, हमारी स्तुतियों का अनुमोदन करें । प्रचुर जल-वृष्टि के लिए हमारे अनुकूल हों । हम बल-संयुक्त होकर यज्ञ में कोई विघ्न उत्पन्न नहीं करते और न ही वैदिक कार्य के विधान को भंग करते हैं। आप अत्यन्त दीप्तिमान् हैं और कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं । आपका हम स्तवन करते हैं ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आप जल-वृष्टि करने वाले हैं। आप हमारे किस श्रेष्ठ यज्ञ-कर्म द्वारा हमारे नवीन स्तोत्रों को जानने वाले होंगे ? ऋतुओं का संरक्षण करने वाले अग्निदेव हमें जानें । सर्वदा येजन करने वाले हम, क्या धनों के अधीश्वर अग्निदेव को नहीं जानते ? (अर्थात् निश्चित ही जानते हैं ।) ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! कौन शत्रुओं को बाँधने वाले हैं ? कौन लोगों का पोषण करते हैं? कौन अति दीप्तिमान् और दानशील हैं ? कौन असत्य-धारकों की रक्षा करते हैं? असत्य वचनयुक्तों की रक्षा कौन कर सकता है ? (अर्थात् आपके कृपा पात्र व्यक्ति ही ऐसा कर सकते हैं) ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! सर्वत्र व्याप्त आपके ये मित्रजन आपकी उपासना न करने से दु:खी हुए थे, तदनन्तर आपकी उपासना करके वे सुखों से युक्त हुए। हम आपके निमित्त सरल आचरण करते हैं, फिर भी जो हमारे साथ कुटिल वचनों से युक्त व्यवहार करते हैं, वे शत्रु स्वयं अपना अनिष्ट करके नष्ट होते हैं ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! आप दीप्तिमान् और इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। जो यजमान हृदय से नमस्कारयुक्त स्तोत्रों से आपका स्तवन करते हैं और यज्ञ का सम्यक् पालन करते हैं, उनका घर विस्तीर्ण हो। आपकी भली प्रकार परिचर्या करने वाले वे यजमान कामनाओं को सिद्ध करने वाले पुत्रादि प्राप्त करते हैं ॥६॥ |
सूक्त-१३
| हे अग्निदेव ! हम स्तोता अर्चन करते हुए आपका आवाहन करते हैं एवं स्तुति करते हुए हम अपनी रक्षा के निमित्त आपको प्रज्वलित करते हैं ॥१॥ |
| द्रव्य लाभ की कामना से हम आकाशव्यापी, तेजस्वी अग्निदेव के सिद्धि प्रदान करने वाले स्तोत्रों से स्तवन करते हैं ॥२॥ |
| यज्ञ के साधन रूप और मनुष्यों के सहायक, अग्निदेव हमारी स्तुतियों को सुनें और देवताओं तक हमारे हव्य को पहुँचाएँ ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! हर्ष प्रदायक, वरणीय और यज्ञ साधक आप महान् हैं। सब यजमान आपको प्रतिष्ठित कर यज्ञ अनुष्ठान पूर्ण करते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आप अन्नों को प्रदान करने वाले और उत्तम स्तोत्रों से स्तुति किये जाने योग्य हैं। मेधावी स्तोतागण सम्यक् स्तुतियों से आपको प्रवृद्ध करते हैं । हे अग्निदेव ! आप हमें उत्तम पराक्रमयुक्त तेजस्वी बलों को प्रदान करें ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! जिस प्रकार चक्र की नाभि के चारों ओर ‘आरे' लगे होते हैं, उसी प्रकार आप देवों के सब ओर व्याप्त होते हैं। आप हमें विविध प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त करें ॥६॥ |
सूक्त-१४
| हे मनुष्यो ! इन अविनाशी अग्निदेव को उत्तम स्तोत्रों से प्रवृद्ध करें । भली प्रकार प्रज्वलित होने पर वे हमारे हव्य पदार्थों को देवों तक पहुँचाएँ ॥१॥ |
| साधकगण यज्ञों में दिव्य गुण-सम्पन्न, अमर और मनुष्यों के मध्य में परम पूजनीय उन अग्निदेव की उत्तम स्तुतियाँ करते हैं ॥२॥ |
| अनेकों स्तोतागण यज्ञ में सूक् के साथ घृत-धारा बहाते हुए देवों के लिए हवियाँ वहन करने के उद्देश्य से दिव्य गुण-सम्पन्न अग्निदेव का स्तवन करते हैं ॥३॥ |
| अरणि-मंथन से उत्पन्न अग्निदेव अपने तेज से अन्धकार और राक्षसों को विनष्ट करते हुए प्रकाशित होते हैं । इन अग्निदेव से ही किरण, जल और सूर्यदेव प्रकट होते हैं ॥४॥ |
| हे मनुष्यो ! आप स्तुति किये जाने योग्य और ज्ञानी अग्निदेव का पूजन करें। वे घृत की आहुतियों से प्रदीप्त ज्वालाओं वाले हैं। वे अग्निदेव हमारे आवाहन को सुनें और जानें ॥५॥ |
| ऋत्विग्गण स्तोत्रों के साथ घृत की आहुतियों द्वारा, स्तुति की कामना वाले ध्यानगम्य देवों के साथ सर्वद्रष्टा अग्निदेव को प्रवृद्ध करते हैं ॥६॥ |
सूक्त-१५
| ये अग्निदेव हविरूप घृत से प्रसन्न होते हैं। ये अतिशय बलशाली, अत्यन्त सुखकारी, धनों के अधीश्वर, हव्यवाहक, गृहप्रदाता, विधाता, क्रान्तदर्शी, यशस्वी, श्रेष्ठ, जानने योग्य और मेधावी हैं। ऐसे अग्निदेव के लिए हम स्तुतियों की रचना करते हैं ॥१॥ |
| जो यजमान ऋत्विजों द्वारा स्वर्ग को धारण करने वाले, यज्ञ में आसीन, नेतृत्वकर्ता, देवों को आवाहित कर प्रतिष्ठित करते हैं, वे (यजमान) यज्ञ के धारक, सत्यस्वरूप प्रतिष्ठित अग्निदेव को स्तोत्रों द्वारा प्रसन्न करते हैं ॥२॥ |
| जो यजमान श्रेष्ठ अग्नि के निमित्त दुष्टों द्वारा दुष्प्य हविष्यान्न अर्पित करते हैं, वे यजमान निष्पाप शरीर से युक्त होकर वृद्धि पाते हैं। वे नवजात अग्निदेव क्रुद्ध सिंह की भाँति हमारे सभी संगठित शत्रुओं को विनष्ट करें और वर्तमान शत्रुओं को हमसे दूर स्थित करें ॥३॥ |
| सर्वत्र प्रख्यात ये अग्निदेव माता के सदृश सभी जीवों का पोषण करते हैं। ये जन-जन को धारण करने और सबके द्रष्टा रूप होने के कारण स्तुत्य है । प्रज्वलित होकर ये सभी अन्नों को जीर्ण (पक्व) कर देते हैं और विविध रूपों में ये अपनी शक्ति से परिव्याप्त होते हैं ॥४॥ |
| विस्तीर्ण कामनाओं की पूर्ति करने वाले, धन के धारक हे दिव्य अग्निदेव ! हविष्यान्न आपके सम्पूर्ण बलों की उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे तस्कर अपहृत धन को गुफा में छिपाकर उसकी रक्षा करता है । हे अग्निदेव ! हमें विपुल धन-प्राप्ति का उत्तम मार्ग प्रदर्शित करें; अत्रि मुनि को प्रसन्न करें ॥५॥ |
सूक्त-१६
| याजकगण मित्र के समान, तेजस्वी अग्निदेव को स्तुति के लिए अपने सम्मुख स्थापित करके उसमें प्रचुर मात्रा में हविष्यान्न की आहुति प्रदान करते हैं ॥१॥ |
| जो अग्निदेव देवताओं के लिए अनुकूल मार्गों से हव्यादि पदार्थों को पहुँचाते हैं, जो बाहुबल की दीप्तियों से प्रकाशित होते हैं, वे अग्निदेव यजमानों के लिए देवों का आह्वान करने वाले हैं। वे सूर्यदेव के सदृश सम्पूर्ण वरणीय धनों को प्रदान करने वाले हैं ॥२॥ |
| सब ऋत्विग्गण हव्य पदार्थों और उत्तम स्तोत्रों द्वारा बहुत शब्द युक्त विशिष्ट अग्निदेव में बलों को भली-भाँति स्थापित करते हैं । हम सब इस प्रवृद्ध, तेजस् सम्पन्न और ऐश्वर्यवान् अग्निदेव के साथ मित्र, भाव में रहकर स्तुतियाँ करते हैं ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! हमें अभिलषित, श्रेष्ठ, पराक्रमयुक्त बलों से युक्त करें । जैसे पृथ्वी और आकाश महान् सूर्यदेव के आश्रय पर अवस्थित हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण अन्न और धन आपके आश्रय से हम प्राप्त करते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! हम यजमान आपकी स्तुति करते हैं। आप शीघ्र ही हमारे यज्ञ में अधिष्ठित हों और हमारे निमित्त वरणीय धन को धारण करें । हम स्तोतागण आपकी स्तुति करते हैं। आप युद्ध में हमें रक्षण-साधनों से समृद्ध करें ॥५॥ |
सूक्त-१७
| हे अग्निदेव ! जिस प्रकार पूरु ऋषि ने अपने द्वारा सम्पादित उत्तम यज्ञ में अपनी रक्षा की कामना से आपकी स्तुति की, उसी प्रकार मनुष्यगण भी अपने यज्ञ में अपनी रक्षा के लिए उत्तम स्तुतियों के साथ आपका आवाहन करते हैं ॥१॥ |
| हे धर्मानुयायी स्तोताओ ! आप अत्यन्त श्रेष्ठ और यशस्वी कर्म वाले हैं। जो स्तुत्य हैं, जिनका तेज अति विलक्षण है और जो दुःखरहित हैं, ऐसे उन अग्निदेव की आप (स्तोतागण) अपनी श्रेष्ठ बुद्धियुक्त वाणियों से स्तुति करें ॥२॥ |
| जो अग्निदेव अपने बल और स्तुतियों से सामर्थ्ययुक्त हैं, जो सूर्यदेव की भाँति दीप्तिमान् हैं, जिनकी विस्तीर्ण ज्वालाओं और तेजों से सम्पूर्ण जगत् प्रकाशयुक्त होता है, इनके वर्चस् से सूर्यदेव भी प्रकाशयुक्त हुए हैं ॥३॥ |
| श्रेष्ठ बुद्धि-सम्पन्न ऋत्विग्गण उन दर्शनीय अग्निदेव का यजन करके धन-संयुक्त रथ प्राप्त करते हैं। हव्यवाहक वे अग्निदेव सम्पूर्ण प्रजाओं द्वारा सम्यक् रूप से प्रशंसित होते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! जिस धन को स्तोतागण आपकी स्तुतियों द्वारा प्राप्त करते हैं, वह वरणीय धन हमें शीघ्र प्राप्त कराये । हे बल संयुक्त अग्निदेव ! हमें अभीष्ट अन्नों को देकर रक्षित करें । हमें कल्याणकारी पशुधन से संयुक्त करें और संग्राम में हमारी वृद्धि का यत्न करें ॥५॥ |
सूक्त-१८
| ये अग्निदेव बहु प्रिय (सभी के प्रिय) हैं । ये प्रातः सवन में-प्रजाओं में अतिथि के तुल्य पूजनीय और स्तुत्य हैं। ये अविनाशी अग्निदेव यजमानों के मध्य सम्पूर्ण हव्य-पदार्थों की कामना करते हैं ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! अत्रि पुत्र द्वित अंष आपके निमित्त पवित्र हव्य लेकर पहुँचते हैं। उन्हें आप अपने बल से महत्ता प्रदान करें, क्योंकि वे आपके निमित्त सर्वदा ही सोमरस और स्तुतियाँ प्रस्तुत करते हैं ॥२॥ |
| हे अश्वदाता अग्निदेव ! आप दीर्घ आयु वाले और तेजस्वी स्वरूप वाले हैं । हम अपने धनी यजमानों के लिए आपका उत्तम स्तुतियों से आवाहन करते हैं, जिससे उन धनिकों का रथ जीवन-संग्राम में निर्बाधित होकर गमन करता रहे ॥३॥ |
| जो अत्वग्गण अनेक प्रकार से यज्ञादि कार्यों को सम्पादन करते रहते हैं, जो उत्तम स्तोत्रों का उच्चारण करते हुए यज्ञादि कर्मों की रक्षा कर इन्हें चैतन्य बनाये रखते हैं, वे ऋत्विग्गण अपने यजमानों को स्वर्ग प्राप्त कराने वाले यज्ञ में, विस्तृत कुशाओं पर विपुल हविष्यान्न स्थापित करते हैं ॥४॥ |
| हे अविनाशी अग्निदेव ! आपकी स्तुति करने के बाद जो धनिक यजमान हमें पचास अश्व प्रदान करता हैं । आप उस यजमान को दीप्तिमान् और बहुत सेवकों से युक्त महान् अन्न प्रदान करें ॥५॥ |
सूक्त-१९
| वे अग्निदेव माता रूप पृथ्वी की गोद में प्रकट होकर सबको देखते हैं। वे अग्निदेव वव्रि अषि की स्थिति के अनुरूप उनकी हवियाँ ग्रहण करें, अथवा शरीर धारियों के शरीर की स्थिति के अनुरूप उनका पोषण करें ॥१॥ |
| हे अग्निदेब ! आपके प्रभाव को जानकर जो याज्ञिक सर्वदा आपका आवाहन करते हैं और हवि तथा स्तोत्रों द्वारा आपके बलों की रक्षा करते हैं, वे शत्रुओं के दुर्गम नगरों को तोड़कर उसमें प्रवेश कर जाते हैं ॥२॥ |
| महान् स्तोत्रों का उच्चारण करने वाले, अन्नों को चाहने वाले, कण्ठ में स्वर्ण-अलंकारों को धारण करने वाले और जन्म लेने वाले मनुष्य अति मधुर स्तोत्रों द्वारा अग्नि की दीप्तियों को प्रवृद्ध करते हैं ॥३॥ |
| यज्ञ के समान हविष्यान्न को अपने जठर में रखने वाले, शत्रुओं द्वारा अहिंसित रहकर शत्रुओं के हिंसक वे अग्निदेव आकाश और पृथ्वी के सहायक रूप में हैं। वे अग्निदेव दूध के समान-कामनायोग्य और निर्दोष होकर हमारे प्रीतिकर स्तोत्रों का श्रवण करें ॥४॥ |
| हे प्रदीप्त अग्निदेव ! काष्ठों में क्रीड़ा करते हुए वायु द्वारा प्रेरित, भस्म द्वारा भासित होने वाले आप हमारी ओर उन्मुख हों । काष्ठों के वक्ष में स्थित आपकी ज्वालाएँ अत्यन्त तीक्ष्ण और शत्रुविनाशक हैं। वे ज्वालाएँ हमारे निमित्त तीक्ष्ण (कष्टदायक) न हों ॥५॥ |
सूक्त-२०
| हे अन्न प्रदायक अग्निदेव ! हम लोगों द्वारा प्रदत्त हव्यरूप जिस धन को आप स्वीकार करते हैं, हमारी स्तुतियों के साथ उस व्य रूप धन को, देवों तक पहुँचाएँ ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! जो व्यक्ति पशु आदि धन से संयुक्त होकर भी आपको हवि प्रदान नहीं करता, वह व्यक्ति आपके उग्र बलों का सामना कर बल-विहीन हो जाता है । जो अन्यान्य वैदिक कर्मों से द्वेष या विरोध-भाव रखता है; वह भी आपके द्वारा हिँसित होता हैं ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आप देवों के आह्वानकर्ता, बलों को प्रदान करने वाले और अन्नों से सम्पन्न हैं। हम आपका वरण करते हैं । यज्ञों में श्रेष्ठ आपकी हम उत्तम स्तुतियाँ करते हैं ॥३॥ |
| हे बलवान् अग्निदेव ! हम प्रतिदिन आपके आश्रय में संरक्षित हों । हे उत्तम कर्म वाले अग्निदेव ! हम लोग यज्ञादि कार्यों के निमित्त धन-प्राप्ति का पुरुषार्थ करें । (जिससे) हम लोग गवादि पशु धन और उत्तम वीर पुत्रों को पाकर सुखी हों, आप ऐसा ही करें ॥४॥ |
सूक्त-२१
| हे अग्निदेव ! हम मनु के सदृश आपको स्थापित करते और मनु के सदृश ही प्रज्वलित करते हैं । हे अंगिरा अग्निदेव ! मनु के सदृश ही देवों के अभिलाषी यजमानों के निमित्त आप देवों का यज़न करें ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! स्तोत्रों द्वारा भली प्रकार प्रसन्न होकर आप मनुष्यों के लिए प्रदीप्त होते हैं। भली प्रकार उत्पन्न हे अग्निदेव ! घृतयुक्त हवियों से भरे पात्र आपको निरन्तर प्राप्त होते हैं ॥२॥ |
| हे क्रान्तदर्शी अग्निदेव ! सब देवों ने प्रसन्न होकर, आपको देवों के दूत रूप में नियुक्त किया है। अत: यज्ञों में यजमान आपकी परिचर्या करते हुए देवों को बुलाने के लिए आपकी स्तुति करते हैं ॥३॥ |
| हे तेजस्वी अग्निदेव ! मनुष्यगण देवों का यजन करने के निमित्त आपकी स्तुति करते हैं । आप हवियों द्वारा प्रवृद्ध होकर दीप्तिमान् होते हैं। आप 'सस' अष के यज्ञ की वेदों में प्रतिष्ठित हों अथवा कृषि-हरीतिमा के रूप में प्रकट हों ॥४॥ |
सूक्त-२२
| हे विश्वसामा ऋषे ! आप पवित्र दीप्ति युक्त उन अग्निदेव का अत्रि ऋषि के समान पूजन करें। ये अग्निदेव सब ऋषियों द्वारा स्तुत्य हैं । ये देवों के आवाहक और अत्यन्त पूजनीय हैं ॥१॥ |
| है यजमानो ! सब प्राणियों को जानने वाले, दिव्य यज्ञकर्ता अग्निदेव को आप स्थापित करें, जिससे देवों के लिए प्रीतिकर और यज्ञ के साधन रूप हवि-पदार्थ हम अग्निदेव के निमित्त प्रदान करें ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आप ज्ञान से सम्पन्न और मन से दीप्तिमान् हैं। अपनी रक्षा के निमित्त हम सब मनुष्य आपके सम्मुख उपस्थित होते हैं और आपको श्रेष्ठ वियों से सन्तुष्ट करते हुए स्तुति करते हैं ॥३॥ |
| हे बलपुत्र अग्निदेव ! आप हमारे इन उत्तम वचनों को जानें । हे सुन्दर हुनु (ठोड़ी) और नासिका वाले गृहपालक अग्निदेव ! अत्रि वंशज आपको उत्तम स्तोत्रों द्वारा प्रवृद्ध करते हैं और उत्तम वाणियों द्वारा सुशोभित करते हैं ॥४॥ |
सूक्त-२३
| हे अग्निदेव ! 'द्युम्न' ऋषि के लिए शत्रुओं का ऐश्वर्य जीतकर लाने वाला एक वीर पुत्र प्रदान करें; जो स्तोत्रों से युक्त होकर युद्धों में सम्पूर्ण शत्रुओं को पराभूत कर सके ॥१॥ |
| हे बलशाली अग्निदेव ! आप सत्यस्वरूप, अद्भुत और गवादियुक्त अन्नों को देने वाले हैं। आप हमारे निमित्त शत्रुओं की सेना का ऐश्वर्य जीतकर हमें प्रदान करें ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आप देवों का आह्वान करने वाले ‘होता’ रूप और सबके हितकारी हैं। ये सम्यक् प्रीति रखने वाले और यज्ञार्थ कुश लाने वाले ऋत्विग्गण आपसे वरणीय धनों की याचना करते हैं ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! वे विश्वचर्षणि ऋषि शत्रुओं के संघर्षक बल को धारण करें । हे तेजस्वी अग्निदेव ! हमारे घरों में धनों का प्रकाश विस्तीर्ण करें । हे पापशोधक अग्निदेव ! आप उत्तम तेजों से युक्त होकर देदीप्यमान हों ॥४॥ |
सूक्त-२४
| हे अग्निदेव ! आप हमारे अति निकट रहने वाले हों, हमारे श्रेष्ठ संरक्षक और मंगलकारी हों ॥१॥ |
| सभी को आश्रय देने वाले, धनवानों में अग्रगण्य हे अग्निदेव ! आप हमारे पास सहजता से आएँ और तेजस्वितायुक्त होकर हमें धन प्रदान करें ॥२॥ |
| हे अग्निदेव !हम लोगों को आप जानें । हमारे आवाहन को सुनें और समस्त पापाचारियों से हमें रक्षित करें ॥३॥ |
| हे तेजस्वी और प्रकाशवान् अग्निदेव ! मित्र आदि स्नेही परिजनों के लिए सुख की कामना करते हुए निश्चित ही हम आपकी प्रार्थना करते हैं ॥४॥ |
सूक्त-२५
| हे यजमानो ! अपनी रक्षा की कामना से आप दिव्य अग्निदेव का स्तवन करें। वे अग्निदेव हमें आश्रय-स्थान प्राप्त करायें। ऋषियों द्वारा पुत्र रूप में पोषित, सत्य-स्वरूप वे अग्निदेव हमें शत्रुओं से पार लगायें ॥१॥ |
| पूर्वकाल के ऋषियों और देवों ने जिन अग्निदेव को प्रज्वलित किया था। जो अग्निदेव देवों के आह्वानकर्ता, प्रसन्नतादायी जिह्वा (ज्वाला) वाले, उत्तम दीप्तियों वाले तथा शुभ प्रभा वाले हैं। वे अग्निदेव सत्य-संकल्पों से अटल हैं ॥२॥ |
| है अग्निदेव ! आप उत्तम स्तोत्रों द्वारा स्तुति किये जाने वाले और वरणीय हैं। आप अपनी श्रेष्ठ धारणायुक्त और उत्कृष्ट बुद्धि से हमारे हव्यादियुक्त स्तोत्र से संतुष्ट होकर हमें ऐश्वर्य प्रदान करें ॥३॥ |
| जो अग्निदेव, देवों में प्रतिष्ठित हैं और मनुष्यों के आवाहन से उनके बीच भी प्रविष्ट हैं । जो देवों के लिए हव्यादि पदार्थ वहन करने वाले हैं । हे यजमानो ! उने अग्निदेव की आप बुद्धिपूर्वक स्तुतियों द्वारा सेवा करें ॥४॥ |
| अग्निदेव हविदाता यजमानों को ऐसा पुत्र दें, जो विविध अन्नों से युक्त, बहुत स्तोत्र करने वाला, उत्तम, अवध्य और उत्तम कर्मों से पूर्वनों का यश बढ़ाने वाला हो ॥५॥ |
| अग्निदेव हम लोगों को ऐसा पुत्र हैं, जो हमारा साथ देने वाला, शत्रुओं को परास्त करने वाला और सत्यपालक हो । साथ ही अग्निदेव हमें शत्रु-विजेता, अपराजेय, द्रुतगामी अश्व भी प्रदान करें ॥६॥ |
| अग्निदेव की शीघ्र प्रभावकारी स्तोत्रों से स्तुति की जाती हैं। वे दीप्तिमान् अग्निदेव, हमें अपरिमित धन-धान्य प्रदान करने की कृपा करें ॥७॥ |
| हे अग्निदेव ! आपकी शिखायें सर्वत्र दीप्ति से युक्त हैं । आप सोमलता कूटने वाले पाषाण की तरह महत्ता से युक्त हैं । आप स्वयं प्रकाश से युक्त हैं । आप मेघ-गर्जन के सदृश शब्द से युक्त हैं ॥८॥ |
| हम धन के अभिलाषी मनुष्य बलवान् अग्निदेव की स्तोत्रों से भली प्रकार स्तुति करते हैं। ये उत्तमकर्मा अग्निदेव हम लोगों को शत्रुओं से वैसे ही पार करें, जैसे नाव नदी से पार कर देती है ॥९॥ |
सूक्त-२६
| हे पवित्रता प्रदान करने वाले अग्निदेव ! देवताओं को प्रसन्न करने वाली ज्वालारूपी जिह्वा द्वारा, देवताओं को आमंत्रित करें और उनके निमित्त यज्ञ सम्पन्न करें ॥१॥ |
| घृत से उत्पन्न होने वाले, अद्भुत तेजस्वी, सबको देखने वाले हे अग्ने ! आपकी हमें प्रार्थना करते हैं । हवि के सेवन के लिए आप देवों को यहाँ बुलायें ॥२॥ |
| हे ज्ञानी अग्ने ! यज्ञानुरागी, तेजस्वी तथा महान् आपको हम यज्ञ में प्रज्वलित करते हैं ॥३॥ |
| हे अग्ने ! आप सम्पूर्ण देवों के साथ हविदाता यज्ञमान के लिए यज्ञ में आकर अधिष्ठित हों । हम देवों का आवाहन करने वाले होतारूप में आपका वरण करते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आप सोम-सवन करने वाले यजमान के लिए श्रेष्ठ पराक्रम को धारण करें और आप देवों के साथ यज्ञ में बिछाये कुशाओं पर विराजमान हों ॥५॥ |
| हे सहस्रों शत्रु-जेता अग्निदेव ! आप हव्य-पदार्थों से प्रदीप्त होकर, स्तोत्रों से प्रशंसित होकर, देवों के दूत रूप में सभी धर्म-अनुष्ठानों को सम्यक्रूप से पुष्ट करते हैं ॥६॥ |
| है यजमानो ! आप सब अग्निदेव को भली प्रकार स्थापित करें । वे अग्निदेव प्राणिमात्र को जानने वाले, यज्ञ-सम्पादक, अति युवा तथा दीप्तिमान् हैं ॥७॥ |
| हे ऋत्विजो ! आप अग्निदेव के विराजमान होने के लिए कुश बिछायें, जिससे तेजस्वी स्तोताओं द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न आज देवों को भली प्रकार प्राप्त हो ॥८॥ |
| मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार, मित्रदेव, वरुणदेव और अन्यान्य सभी देवगण अपनी प्रजाओं के साथ हमारे यज्ञ-स्थान में अधिष्ठित हों ॥९॥ |
सूक्त-२७
| हे अग्ने ! हे वैश्वानर ! आप सज्जनों के स्वामी, ज्ञानवान्, बलशाली और ऐश्वर्यवान् हैं । त्रिवृष्ण के पुत्र त्र्यरुण ने शकट सहित दो वृषभ और दस सहस्र सुवर्णमुद्रा प्रदान करके प्रसिद्धि प्राप्त की थी ॥१॥ |
| जिनने हमें सैकड़ों गौएँ (पोषक-प्रवाह) तथा बीसियों श्रेष्ठ धुरों (प्रयोजना) से योजित अश्च (शक्ति-प्रवाह) प्रदान किये हैं; हे वैश्वानर अग्ने ! आप श्रेष्ठ मंत्रों से वर्धित होकर ऐसेयरुण को सुखप्रद आश्रय प्रदान करें ॥२॥ |
| पूर्वकाल में हमारी वाणी से (अनेक स्तुतियों से युक्त (प्रभावित होकर 'त्र्यरुण' ने (हमें अनुदान देते हुए) कहा था-'यह लो'। उसी प्रकार हे अग्ने ! हमारी नवीन स्तुतियों से युक्त (प्रसन्न होकर, आपसे सुमति चाहने वाले हम (साधकों) से त्रसदस्यु' ने भी (हमें अनुदान देते हुए कहा-'यह लो' ॥३॥ |
| हे अग्नि-परमेश्वर ! जब कोई विद्वान् पुरुष 'अश्वमेध' को लक्ष्य करके कहता है 'यह मेरा है, तब आप उस यलशील को ऋत (सत्य अथवा यज्ञ) के लिए चारूप में दिव्य सम्पदा एवं श्रेष्ठ मेधा प्रदान करते हैं ॥४॥ |
| जिस अश्वमेध से प्राप्त सौ (सैकड़ों) उक्षण (वृषभ या सेचन प्रवाह) हमें हर्षित करते हैं, उस अश्वमेध (दिव्य मेधा प्रवाह या राष्ट्र) के दान न्याशिर (तीन को मिलाकर एकाकार किये गये) सोम (पोषक तत्त्व) की भाँति हमें आनन्दित करें ॥५॥ |
| हे इन्द्राग्ने ! सैकड़ों प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने वाले अश्वमेध को आप श्रेष्ठ पौरुष एवं क्षात्रबल के साथ सूर्य के समान विशालती एवं अजरती प्रदान करें ॥६॥ |
सूक्त-२८
| सम्यक् प्रकार से प्रदीप्त अग्निदेव दीप्तिमान् अन्तरिक्ष में अपने तेजों से प्रकाशित होते हैं और उषा के सम्मुख विस्तीर्ण होकर विशेष प्रभायुक्त होते है। उस समय इन्द्रादि देवों का स्तवन करती हुई पुरोडाश आदि और घृतादि से युक्त सुक् को लेकर विश्ववारा पूर्व की ओर से झाँकती हुई अग्नि की ओर बढ़ती हैं ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! आप भली-भाँति प्रज्वलित होकर अमृततत्त्व को प्रकाशित करते हैं । हव्यदाता यज्ञमान को आप कल्याण से युक्त करते हैं। आप जिस यजमान के समीप जाते हैं, वह सम्पूर्ण ऐश्वर्य को धारण करता है । हे अग्निदेव ! आपके आतिथ्य के अनुकूल हव्यादि पदार्थों को वह यजमान आपके सम्मुख स्थापित करता है ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आप हम लोगों के उत्तम सौभाग्य (विपुल ऐश्वर्य) के लिए शत्रुओं को पराभूत करें ।आपका तेज श्रेष्ठतम हो । आप दाम्पत्य सम्बन्ध को सुखी और सुनियमित करें और शत्रुओं के तेज़ को दबा दें ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! जब आप प्रज्वलित होकर दीप्तिमान् होते हैं, तो आपकी शोभा का हम स्तवन करते हैं। आप अभीष्ट प्रदाता और तेजस्वी हैं तथा यज्ञों में भली प्रकार प्रदीप्त होते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आप यजमानों द्वारा आहूत होते हैं। आप शोभायुक्त यज्ञ के सम्पादक हैं । आप सम्यक् प्रदीप्त होकर इन्द्रादि देवों का यजन करें, क्योंकि आप ही हव्यादि पदार्थों को वहन करने वाले हैं ॥५॥ |
| हे अंत्वजो ! आप लोग हमारे यज्ञ में प्रवृत्त होकर हव्य वहन करने वाले अग्निदेव को आहुतियाँ अर्पित करें । स्तुतियों द्वारा उनकी परिचर्या करें और देवों के दूतरूप में उनका वरण करें ॥६॥ |
सूक्त-२९
| हे इन्द्रदेव मनु के यज्ञ में जो तीन गुण हैं और अन्तरिक्ष में उत्पन्न तीन दिव्य तेज हैं, उन्हें मरुद्गणों ने धारण किया है । हे इन्द्रदेव ! पवित्र बलों से युक्त मरुद्गण आपकी स्तुति करते हैं । आप इन मरुतों के द्रष्टा हैं ॥१॥ |
| जब मरुद्गणों ने अभिषुत सोम के पान से हर्षित इन्द्रदेव की स्तुति की, तब इन्द्रदेव ने वज्र हाथ में धारण करके वृत्र को मारा और उसके द्वारा रोके गये बृहद् जल-प्रवाहों को बहने के लिए मुक्त किया ॥२॥ |
| हे महान् मरुतो !इन्द्रदेव सहित आप सब भली प्रकार अभिषुत हुए इस सोमरस का पान करें । इस सोम युक्त हवि को पान करते हुएआप यजमानों को गौएँ प्राप्त करायें । इसी सोम को पीकर इन्द्रदेव ने वृत्र को मारा था॥३॥ |
| सोमपान करने के बाद इन्द्रदेव ने द्यावा-पृथिवी को निश्चल किया तथा आक्रामक मुद्रा में इन्द्रदेव ने मृगवत् माया करने वाले वृत्र को भयभीत किया। भय से छिपकर वह वृत्र लम्बी श्वास ले रहा था, तब इन्द्रदेव ने उसके प्रपंच को नष्ट कर उसे मार डाला ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! सूर्य की आगे बढ़ने वाली घोड़ियों (किरणों ) को आपने एतश (अश्व संज्ञक शक्तिशाली प्रवाह) के साथ संयुक्त किया। आपके कार्य से हर्षित होकर विश्वेदेवों ने आपके पान के लिए सोम प्रस्तुत किया ॥५॥ |
| महान् इन्द्रदेव ने शत्रु के निन्यानवे नगरों को एक ही क्षण में वज्र से ध्वस्त कर दिया और द्युलोक को थामकर स्थित किया, तब मरुद्गणों ने संग्राम-स्थल में त्रिष्टुप् छन्द युक्त ऋचाओं से इन्द्रदेव की स्तुतियाँ सम्पन्न की ॥६॥ |
| इन्द्रदेव के मित्ररूप अग्नि ने इन्द्र की कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए तीन सौ महिषों (प्राणधाराओं) को पकाया (परिपक्व किया) । वृत्र को मारने के लिए इन्द्रदेव ने मनुष्यों द्वारा निष्पन्न सोम के तीन पात्रों का एक साथ पान किया ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जब आपने तीन सौ महिषों (प्राण-प्रवाहों ) को स्वीकार किया और सोम के तीन पात्रों का पान किया, तब आपने वृत्र को मारा । देवों ने कुशल कर्मकार की भाँति इन्द्रदेव का आवाहन किया ॥८॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जब आप और ‘उशना' (कवि-दूरदर्शी) दोनों संघर्षक और वेगवान् अश्वों के द्वारा घर गए, तब आपने शत्रुओं को मारा तथा कुत्स और देवों के साथ रथ पर आरूढ़ हुए। हे इन्द्रदेव ! आपने 'शुष्ण' असुर का भी हनन किया ॥९॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने सूर्य के चक्रों में एक चक्र को पृथक् कर दिया और अन्य चक्र ‘कुत्स' को प्रतिष्ठा देने के लिए तैयार किया। आप नाकरहित (स्वर्गच्युत) और उच्च शब्द करने वाले दस्युओं को वज्र से मारकर संग्राम में विजयी हुए ॥१०॥ |
| हे इन्द्रदेव ! गौरिवीति के स्तोत्रों ने आपको प्रवर्द्धत किया, तो आपने विथि पुत्र जिश्व के लिए 'पिपु’ (असुर) को मारा । तब ऋजिश्वा ने आपको मित्रता के पूरक रूप में आपके निमित्त पुरोडाश पकाकर निवेदित किया और उनके द्वारा निवेदित सोम का भी आपने पान किया ॥११॥ |
| सौमों का अभिषवण करने वाले 'नवग्वा' और 'दशग्वा' ने इन्द्रदेव के अभिमुख अर्चनीय स्तोत्रों से स्तुतियाँ कीं। तब प्रशंसित इन्द्रदेव ने अपने सहायक मरुद्गणों द्वारा असुरों को मारकर छिपे हुए गौ-समूहों को मुक्त किया ॥१२॥ |
| हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपने जो पराक्रमयुक्त कार्य प्रकट किया है, उन्हें जानने वाले हम आपकी परिचर्या किस प्रकार करें ? हे बलशाली इन्द्रदेव ! आपने जो नये पराक्रम के कार्य सम्पादित किये हैं, आपके उन पराक्रमों का हम अपने यज्ञों में सम्यक् वर्णन करेंगे ॥१३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं में अटल (अड़िग) संघर्षक हैं । आपने जन्म लेकर अपने बल से सम्पूर्ण भुवनों को बनायो । हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने शत्रुओं को मारते हुए जिन पराक्रमों को किया है, आपके उस बल का निवारण करने वाला अन्य कोई नहीं है ॥१४॥ |
| हे अतीव बलशाली इन्द्रदेव ! हमने आपके निमित्त जिन नवीन स्तोत्रों की रचना की हैं, हम लोगों द्वारा निवेदित उन स्तोत्रों को आप ग्रहण करें । हम स्तोता उत्तम कर्म करने वाले, बुद्धिमान् और धनाभिलाषी हैं । हम उत्तम वस्त्रों और उत्तम रथ के निर्माण की तरह इन स्तोत्रों का निर्माण करते हैं ॥१५॥ |
सूक्त-३०
| असंख्यों द्वारा आवाहित किये जाने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव, धन से युक्त होकर संरक्षण-साधनों के साथ, अभिघुत सोम की इच्छा से यजमान के घर जाते हैं। वे पराक्रमी इन्द्रदेव कहाँ हैं? अपने दोनों अश्वों से सुसज्जित, सुखदायक रथ पर जाने वाले इन्द्रदेव को किसने देखा है ? ॥१॥ |
| हमने इन्द्रदेव के गुह्य और उग्र स्थान को देखा है । दर्शन की अभिलाषा से हम इन्द्रदेव के आश्रय स्थल में गये । हमने अन्यों से भी पूछा, तब उन्होंने बताया कि उत्तम ज्ञान के अभिलाषी मनुष्य ही इन्द्रदेव को प्राप्त करते हैं ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने जिन कार्यों को किया है, उनका हम सोम-सवन वाले स्थानों में वर्णन करते हैं । हे इन्द्रदेव ! आपने हमारे निमित्त जिन कर्मों को प्रयुक्त किया है, उन्हें सभी जान लें । जानने वाले साधक अनजान लोगों को सुनायें। सब सेनाओं से युक्त ये ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव अश्वों पर आरूढ़ होकर उन जानने वालों और सुनने वालों की ओर गमन करें ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! उत्पन्न होते ही आपने शत्रु-विजयी होने के लिए मन को संकल्प से स्थिर किया । आपने युद्ध में अकेले ही अनेक शत्रुओं को नष्ट किया तथा दृढ़ पर्वत के आवरण को विदीर्ण कर बन्द दुधारू गौओं के समूह को विमुक्त किया ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप सबमें प्रमुख और श्रेष्ठतम हैं । आप जब अत्यन्त दूर तक श्रवणीय नाम को धारण करे प्रकट हुए, तो सभी देवगण भयभीत हुए । इन्द्रदेव ने वृत्र द्वारा प्रभुत्व स्थापित किये हुए जल को जीत लिया ॥५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! उत्तम सेवा करने वाले ये मरुद्गण स्तोत्रों से आपकी ही अर्चना करते हैं और सोम निवेदित करते हैं । इन्द्रदेव ने जल को बन्द करने वाले और देवों को पीड़ित करने वाले मायावी 'अहि' को नष्ट कर दिया ॥६॥ |
| है ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आप सबके द्वारा प्रशंसित किये जाते हैं। आपने जन्म लेते ही 'दान' असुर को मारा और अन्यान्य हिंसक शत्रुओं को भी मारा । हे इन्द्रदेव ! इस युद्ध में मनु के लिए मार्ग बनाने की इच्छा से युक्त होकर 'नमुचि' नामक दस्यु के सिर को आप काट डालें ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने गर्जनशील मेघ के समान गर्जना करने वाले दास नमुचि के सिर को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, फिर हमें मित्र बनाया। उस समय मरुतों की सहायता से आपने आकाश-पृथिवी को चक्र की तरह परिभ्रमणशील बनाया ॥८॥ |
| दास 'नमुचि' ने ज्ञब स्त्रियों को युद्ध का साधन बनाया, तब इसकी यह निर्बल सेना मेरा क्या कर लेगी? यह सोचकर इन्द्रदेव ने उसकी दो प्रमुख स्त्रियों को बन्दी बना लिया और नमुचि से लड़ने के लिए अग्रसर हुए ॥९॥ |
| 'नमुचि' असुर द्वारा बभु ऋषि की अपक्ष गौएँ (किरणे) बछड़ों (प्राणियों) से विलग होकर इधर-उधर भटक रही थीं, तब अभिषुत सोम ने इन्द्रदेव को हर्षित किया और इन्द्रदेव ने अपने सहायक मरुतों के द्वारा गौओं को बछड़ों से युक्त किया ॥१०॥ |
| जब बभु (भरण-पोषण करने वाले) के अभिषुत सोम ने इन्द्रदेव को प्रफुल्लित किया, तब बलवान् इन्द्रदेव ने संग्राम में घोर गर्जना की । शत्रु नगरों के विध्वंसक इन्द्रदेव ने सोम पान किया और बधु (ऋषि या अग्नि) को दुधारू गौएँ पुनः प्राप्त करायीं ॥११॥ |
| हे अग्निदेव ! ऋणञ्चय राजा के अधीनस्थ रुशमवासियों ने हमें चार सहस्र गौएँ देकर कल्याणकारी काम किया। मनुष्यों के नेतृत्वकर्ता श्रेष्ठ ऋणञ्चय (धनसंग्रह करने वालों) द्वारा प्रदत्त ऐश्वर्थी को भी हमने ग्रहण किया ॥१२॥ |
| हे अग्निदेव ! रुशमवासियों ने सहस्रों गौओं से युक्त और सुन्दर सुशोभित गृह हमें प्रदान किया है । रात्रि के अवसान काल (उष: कालो में हमने अभिषुत हुए तीक्ष्ण सोम को निवेदित कर इन्द्रदेव को हर्षित किया ॥१३॥ |
| रुशमवासियों के राजा ऋणञ्चय के पास जाने पर अन्धकारयुक्त रात्रि जो उपस्थित थी, उसके बीत जाने पर बभु ऋषि ने निरंतर गतिमान् अश्वों की तरह द्रुतगामिनी चार सहस्र गौओं को प्राप्त किया ॥१४॥ |
| हे अग्निदेव ! हम मेधावी हैं। हमने रुशमवासियों से चार सहस्र गौ रूप पशुओं को प्राप्त किया और यज्ञ में पशुओं के दुग्ध दुहने के निमित्त अधिक तपाये हुए(अधिक शुद्ध) स्वर्णमय कलश को भी प्राप्त किया ॥१५॥ |
सूक्त-३१
| ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव जिस रथ पर अधिष्ठित होते हैं, उसे वे अतिवेग से संचालित करते हैं। ग्वाला जिस प्रकार अपने पशुओं को प्रेरित करता है, उसी प्रकार आप अपनी सेना को प्रेरित करते हैं । युद्ध में अहिंसित रहते हुए आप शत्रुओं के धन की कामना करते हैं ॥१॥ |
| हे हरि नामक अश्व वाले इन्द्रदेव ! आप हमारे पास शीघ्र आएँ, हमें निराश न करें । हे धनवान् इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा निवेदित पदार्थों को स्वीकार करें । हे इन्द्रदेव ! आप से श्रेष्ठ अन्य कोई नहीं हैं । आप भार्याहीनों को पत्नी प्रदान करते हैं ॥२॥ |
| जब सूर्यदेव के तेज से उषा का तेज फैला, तब इन्द्रदेव ने लोगों को सभी इन्द्रियाँ देकर सक्रिय किया ।पर्वत के आवरण में छिपी दुधारूगौओं को विमुक्त किया और सर्वत्र आच्छादित तमिस्रा को अपने तेजस से दूर किया ॥३॥ |
| बहुतों द्वारा आवाहनीय हे इन्द्रदेव ! भुओं ने आपके रथ को अश्वों से योजित करने के योग्य बनाया। त्वष्टादेव ने आपके निमित्त तीक्ष्ण वज्र बनाया । मन्त्रयुक्त स्तोत्रों से यजन (पूजा) करने वालों ने आपको वृत्र-वध के निमित्त स्तोत्रों से प्रवर्द्धित किया ॥४॥ |
| हे अभीष्टवर्षक इन्द्रदेव ! उन बलवान् मरुतों ने जब स्तोत्रों से आपकी स्तुति की; उस समय दृढ़ पाषाण सोम अभिषवण के लिए संयुक्त हुए थे। आपके द्वारा प्रेरित होने पर अश्वहीन और रथहीन मरुतों ने पलायन करने वाले शत्रुओं को पराभूत किया ॥५॥ |
| हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपने अपने बलों से जिन कर्मों को सम्पादित किया है; उन नये और पुराने कर्मों का हमें वर्णन करते हैं। हे इन्द्रदेव ! आपने मनुष्यों के लिए अद्भुत विविध जल (रसों) को धारण किया ॥६॥ |
| हे दर्शनीय और ज्ञानी इन्द्रदेव ! आपने वृत्र को मारकर जो अपने बल को इस लोक में प्रकाशित किया; वह आपका ही कर्म है। आपने 'शुष्ण' असुर की माया को जानकर उसे पकड़ा और युद्धस्थल में जाकर असुरों का संहार किया ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! विपत्तियों से पार करने वाले आपने 'यदु' और 'तुर्वश' के लिए वनस्पतियों को बढ़ाने वाले जले को प्रवाहित किया । आपने ‘कुत्स' पर आक्रमण करने वाले 'शुष्ण' असुर से 'कुत्स' की रक्षा की; तब उशना कवि तथा देवों ने आपकी स्तुति की ॥८॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हे कुत्स ! आप दोनों एक रथ पर आरूढ़ होकर द्रुतगामी अश्वों द्वारा यजमानों के समीप आएँ । आपने ‘शुष्ण' असुर को उसके आश्रय स्थान जल से निकालकर मारा था। आपने सम्पन्न यजमानों के हृदयों से (पाप रूप) तमिस्रा को दूर किया था ॥९॥ |
| हे इन्द्रदेव ! इस क्रान्तदर्शी 'अवस्यु' ने वायु के समान वेगवान् और रथ में उत्तम प्रकार से योजित होने वाले अश्वों को प्राप्त किया । हे इन्द्रदेव ! आपके सब मित्ररूप मरुतों ने स्तोत्रों से आपके बल को प्रवर्धित किया ॥१०॥ |
| पूर्व में जब ‘एतश' का सूर्य के साथ संग्राम हुआ था, तब इन्द्रदेव ने सूर्यदेव के अंति वेगवान् रथ को भी गतिहीन कर दिया था। तत्पश्चात् इन्द्रदेव ने सूर्य के रथ के एक चक्र का हरण कर उसी से शत्रुओं का संहार किया था-ऐसे वे इन्द्रदेव हमारे स्तोत्रों से वृद्धि को प्राप्त होते हुए हमारे यज्ञ का सेवन करें ॥११॥ |
| हे यजमानो ! आप लोगों को देखने के लिए और मित्ररूप आप यजमानों द्वारा अभिषुत सोम की इच्छा करते हुए इन्द्रदेव यहाँ आये हैं। अध्वर्युगण शब्द करते हुए सोम अभिषवण के पाषाण को तेजी से चलाते हैं, अनन्तर अभिषुत सोम वेदी पर लाया जाता है ॥१२॥ |
| हे अविनाशी इन्द्रदेव ! हम मनुष्य आपके आश्रय में सुखी हैं और सुखी ही रहें । हम कभी अनिष्टों से युक्त न हों । आप हम यजमानों की सेवा स्वीकार करें । मनुष्यों के बीच में हम आपके हैं, आप हममें बल स्थापित करें ॥१३॥ |
सूक्त-३२
| हे इन्द्रदेव !आपने बादलों को भेदकर जल धाराओं को प्रकट करने के लिए बाधाओं को दूर किया और ऊँची तरंगों वाले समुद्र को अधिक जल प्रदान करके प्रसन्न किया । आपने ही राक्षसों का संहार किया ॥१॥ |
| हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप वर्षाकाल में अवरुद्ध मेघों के बन्धनों को तोड़कर मेघों के बल को नष्ट करने वाले हैं । हे उग्र इन्द्रदेव ! आपने सोये हुए बलवान् वृत्र को मारकर अपने बल को विख्यात किया ॥२॥ |
| एक मात्र इन्द्रदेव ही अतुलनीय हैं। उन्होंने वृत्र के पृथ्वी पर चलने (प्रयोग किये जाने) वाले अस्त्रों को नष्ट कर दिया। उससे (वृत्र के प्रभाव से) एक अन्य बलशाली (असुर) प्रकट हुआ ॥३॥ |
| वर्षणशील मेघ पर प्रहार कर गिराने वाले और वज्र धारण करने वाले इन्द्रदेव ने उस 'शुष्ण' असुर को वज्र से मार गिराया, जो वृत्रासुर के क्रोध से उत्पन्न होकर तम से आच्छादित करता था। मेघों को अवरुद्ध कर गिरने (बरसने) नहीं देता था और प्राणियों के अन्नों को स्वयं खाकर हर्षित होता था ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जिसके मर्म को कोई नहीं जान सकता, उस वृत्र के गुह्य मर्म को आपने अपने कर्मो (पुरुषार्थ) से जान लिया । उत्तम बल सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! सोमपान से प्रमुदित होकर आपने युद्धाभिलाषी वृत्र को तमिस्रा पूर्ण स्थान में भी खोज लिया ॥५॥ |
| वृत्र सुखकारी जल में सोते हुए, गहन तमिस्रा में पुष्ट होता था। अभिषुत सोमपान से प्रमुदित होकर अतीव बलशाली इन्द्रदेव ने वज्र को ऊँचा उठाकर उस वृत्र को मारा ॥६॥ |
| जब इन्द्रदेव ने उस भीमकाय दानव को मारने के लिए अजेय वज्र को उठाया और जब वृत्र पर उसके द्वारा प्रचण्ड प्रहार किया; तब उसे सब प्राणियों की अपेक्षा निम्नतम स्थिति में पहुँचा दिया ॥७॥ |
| उग्रवीर इन्द्रदेव ने, विकराल मेघों को घेरकर सोने वाले, शत्रुओं का संहार करने वाले और सबको आच्छादित करने वाले उसे असुर वृत्र को पकड़ लिया। संग्राम में इन्द्रदेव ने उस पादरहित, परिमाणरहित, दुष्ट वचन बोलने वाले वृत्र को क्षत-विक्षत किया ॥८॥ |
| इन्द्रदेव के शोषक बल का निवारण कौन कर सकता है ? अप्रतिद्वन्द्वी इन्द्रदेव अकेले ही शत्रुओं के धन का हरण कर लेते हैं। दीप्तिमती द्यावा-पृथिवीं भी वेगवान् इन्द्रदेव के बल से भयभीत होकर चलती हैं ॥९॥ |
| यह दीप्तिमान् , स्वयं धारणशील आकाश भी इन इन्द्रदेव के लिए नम्र होकर रहता है। जिस प्रकार कामना करने वाली स्त्रियाँ पति को आत्मसमर्पण कर देती हैं, उसी प्रकार पृथ्वी इन्द्रदेव के आगे आत्मसमर्पण कर देती है । जब ये इन्द्रदेव अपने सम्पूर्ण बल को प्रजाओं के मध्य स्थापित करते हैं, तब प्रजाएँ इन बलवान् इन्द्रदेव को नमन करती हैं ॥१०॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हम मनुष्यों से सुनते हैं कि आप सज्जनों के पालक, पंचजनों के हितैषी और अतिशय यशस्वी हैं । एक मात्र आप ही इस वरीयता के साथ उत्पन्न हुए हैं। दिन-रात स्तुतियों के साथ वि देने वाली और कामना करने वाली हमारी सन्ताने अतिशय स्तुत्य इन्द्रदेव को प्राप्त करें ॥११॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हम सुनते हैं कि आप समय-समय पर प्राणियों के प्रेरक बनते हैं। आप ज्ञानियों को धनादि दान करने वाले हैं । हे इन्द्रदेव ! जो स्तोतागण आपमें अपनी कामनाओं को स्थापित करते हैं, आपके वे ज्ञानी मित्र आपसे क्या पाते हैं ? ॥१२॥ |
सूक्त-३३
| ये इन्द्रदेव युद्धों में वीर पुरुषों से युक्त होकर अतिशय प्रकृष्ट पराक्रमों वाले जाने जाते हैं और अपनी उत्तम बुद्धि से सब मनुष्यों पर प्रभुत्व रखते और स्तुत्य होते हैं। हम निर्बल स्तोतागण मनुष्यों को बल सम्पन्न बनाने के लिए बलशाली इन्द्रदेव की प्रचुर स्तुतियाँ करते हैं ॥१॥ |
| हे इष्टवर्षक इन्द्रदेव ! आप हमारी स्तुतियों पर ध्यान देकर प्रीतिपूर्वक रथ में योजित अश्वों की लगाम हाथ में धारण करें । हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आप हमारे शत्रुओं को भी उसी प्रकार वशीभूत करें ॥२॥ |
| हे तेजस्वी इन्द्रदेव ! जो मनुष्य आपके भक्तों से भिन्न हैं और आपके साथ नहीं रहते हैं, जो ब्रह्म कर्मों से रहित हैं, वह आपके भक्त नहीं हो सकते । हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप हमारे यज्ञ में दीप्तिमान् और उत्तम अश्वों से युक्त उस रथ से पधारें, जिसे आप स्वयं नियंत्रित करते हैं ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपके अनेक वर्णनीय स्तोत्र हैं। आपने जल अवरोधकों को नष्ट कर उपजाऊ भूमि में जल वर्षण के लिए मार्ग बनाया है और हे बलवान् इन्द्रदेव ! आपने युद्ध में 'नमुचि' दास के नाम को भी विनष्ट कर दिया ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हम सब ऋत्विज् और यजमान आपके हैं । यज्ञ द्वारा आपके बल को प्रवर्धित करते हैं और आहुतियाँ प्रदान करने आपके सम्मुख उपस्थित होते हैं । हे इन्द्रदेव ! आपकी शक्ति सर्वत्र संचरित है। युद्धों (जीवन समर) में भगरूप सेवक हमें आपके अनुग्रह से प्राप्त हों ॥५॥ |
| आपके सम्पूर्ण बल अत्यन्त पूजनीय हैं। आप मनुष्यों में व्याप्त होकर भी अविनाशी (अमरणशील) हैं। आप अपनी सामर्थ्य से जगत् के आश्रयदाता हैं। आप हमें उज्ज्वल वर्ण के धनों. को प्रदान करें। आप अत्यन्त धन-सम्पन्न और श्रेष्ठ दाता हैं । आपके दान की हम सम्यक् स्तुति करते हैं ॥६॥ |
| हे शूरवीर इन्द्रदेव ! हम यजमान आपकी स्तुति करते हैं और आपका यजन करते हैं। अपनी रक्षण-सामथ्र्यों से आप हमारी रक्षा करें । संग्रामों में आप आवरण (कवच) रूप में हमारी रक्षा करें । हमारे द्वारा भली प्रकार अभिषुत मधुर सोमरस को प्राप्त कर आप तृप्त हों ॥७॥ |
| गिरिक्षित गोत्र में उत्पन्न 'पुरुकुत्स' के विद्वान् पुत्र ‘त्रसदस्यु' स्वर्ण सम्पदाओं से युक्त हैं । उनके द्वारा प्रदत्त दस श्वेत वर्ण वाले अश्व हमें वहन करें । हम भी श्रेष्ठ कर्तव्यों से युक्त रहें ॥८॥ |
| ‘मरुताव' के पुत्र 'विदथ' के यज्ञ में हमें उन्होंने रक्तवर्ण वाले द्रुतगामी अश्व प्रदान किये और सहस्रों प्रकार के धन देकर हमारे श्रेष्ठ शरीर को अलंकारों से युक्त किया ॥९॥ |
| ‘लक्ष्मण' के पुत्र 'ध्वन्य' ने जो हमें उत्तम दीप्तियुक्त और पराक्रमी अश्व प्रदान किये, वे हमने स्वीकार किये । जैसे गौएँ चरने के स्थान को जाती हैं, वैसे उनके द्वारा प्रदत्त प्रभूत (विपुल) धन ‘सम्वरण' अषि के स्थान में गया है ॥१०॥ |
सूक्त-३४
| जिनके शत्रु उत्पन्न ही नहीं हुए हैं, ऐसे दर्शनीय इन्द्रदेव को क्षीण न होने वाले, सुखप्रद और अपरिमित हविष्यान्न प्राप्त होते हैं । वे इन्द्रदेव बहुतों द्वारा स्तुत एवं स्तोत्रों को धारण करने वाले हैं । हे ऋत्विजो ! उन इन्द्रदेव के निमित्त लोग पुरोडाश पकायें और श्रेष्ठ यज्ञादि कर्म सम्पादित करें ॥१॥ |
| इन्द्रदेव ने सोमरस द्वारा अपने पेट को भर लिया और मधुर हविष्यान्न द्वारा हर्ष से युक्त हुए, तब ‘मृग' नामक असुर को मारने की इच्छा करते हुए महावधी इन्द्रदेव ने सहस्रधार वाले वज्र को हाथ में उठाया ॥२॥ |
| जो यजमान इन्द्रदेव के लिए दिन और रात सोम अभिषवण करते हैं, वे दीप्तिमान् होते हैं । जो यज्ञादि कार्य का आडंबर कर सन्तति की कामना करते हैं; जो अपने शरीर को सजाने वाले, आडम्बर करने वाले और बुरे आचरण करने वालों के मित्र होते हैं, ऐसों को इन्द्रदेव छोड़ देते हैं ॥३॥ |
| जो मनुष्य यजमान के पिता-माता और भ्राता का वध करता है, सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव उस दुष्ट के पास नहीं जाते । उसके द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न को भी स्वीकार नहीं करते । वे धनों के अधीश्वर और सर्व-नियामक इन्द्रदेव पाप से दूर रहते हैं ॥४॥ |
| युद्ध में इन्द्रदेव पाँच या दस मित्रों की सहायता की कामना नहीं करते । जो सोम सवन नहीं करता और बन्धुओं का पोषण नहीं करता, इन्द्रदेव उनकी संगति नहीं करते । शत्रुओं को कॅपाने वाले इन्द्रदेव अयाज्ञिक को जीतकर उसे मारते हैं और याज्ञिकों को गौओं से युक्त गृह प्रदान करते हैं ॥५॥ |
| संग्राम में शत्रु-सामर्थ्य को क्षीण करने वाले इन्द्रदेव रथचक्र को वेग से चलाने वाले हैं । वे सोमयाग न करने वालों से दूर रहते और सोमयाग करने वालों को प्रवर्धित करते हैं । सम्पूर्ण विश्व के नियामक, शत्रुओं के लिए भयंकर वे श्रेष्ठ इन्द्रदेव ‘नमुचि' दास को अपने वश में कर लेते हैं ॥६॥ |
| इन्द्रदेव कृपण बनिये के धन का हरण कर लेते हैं और उस धन को विदाता यजमान को देकर उसे शोभावान् बनाते हैं । जो मनुष्य इन्द्रदेव के बल को कुपित करता है, इन्द्रदेव उसे विपदाओं के दुर्ग में कैद कर देते हैं ॥७॥ |
| उत्तम धन वाले, अत्यन्त बलशाली दो मनुष्य जब शुभ गौओं के लिए परस्पर संघर्ष करते हैं, तो ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव उनमें से याज्ञिक की ही सहायता करते हैं। अपने बलों से शत्रुओं को कैंपाने वाले इन्द्रदेव इस याज्ञिक को गौओं का समूह दान करते हैं ॥८॥ |
| हे तेजस्वी गुण-सम्पन्न इन्द्रदेव ! हम सहस्रों प्रकार के धन-दाता, ‘अग्निवेशि' के पुत्र ‘शत्रि' ऋषि की स्तुति करते हैं; जो ध्वज के सदृश शिरोमणि रूप और श्रेष्ठ उपमा योग्य हैं। संयत जल-प्रवाह उन्हें सम्यक् रूप से तृप्त करें । आपको धन बलयुक्त और तेजोयुक्त हो ॥९॥ |
सूक्त-३५
| हे इन्द्रदेव ! आपका जो विशिष्ट प्रभायुक्त कर्म हैं, उसे हमारे संरक्षण के लिए प्रयुक्त करें। आपका कर्म शत्रुओं को पराभूत करने वाला अति शुद्ध और संग्राम में कठिनता से पार पाये जाने वाला है ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपके जो चार वर्षों में रक्षण साधन हैं। तीनों लोकों में जो रक्षण-साधन स्थित हैं अथवा पंचजनों के निमित्त जो रक्षण साधन हैं, उन सभी रक्षण साधनों से हमें अभिपूरित करें ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप इष्ट-फलों के प्रदाता, वृष्टिकर्ता और शत्रुओं के शीघ्र संहारक हैं । आपके सम्पूर्ण रक्षण साधनों की हम कामना करते हैं। आप सर्वत्र विद्यमान एवं सहायक मरुतों के साथ मिलकर हमारे लिए श्रेष्ठ दाता सिद्ध हों ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप इष्ट-प्रदायक हैं। यजमानों को धन-ऐश्वर्य देने के लिए ही आप उत्पन्न हुए हैं। आपका बल इष्टवर्धक हैं । आपका मन संघर्ष शक्ति से युक्त हैं । आपका बल शत्रुओं को वश में करने वाला हैं । आपका पौरुष शत्रु-संहारक है ॥४॥ |
| हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप सैकड़ों यज्ञादि कर्मों के सम्पादक हैं । आपका रथ सर्वत्र अबाधगति से जाता है । जो मनुष्य आपके प्रति शत्रुवत् व्यवहार करते हैं, आप उनके विरुद्ध चलते हैं ॥५॥ |
| हे वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ! यज्ञों में कुश के आसन बिछाकर अभिवादन करने वाले मनुष्य, जीवन-संग्राम में आपका आवाहन करते हैं। आप उग्र, वीर और सम्पूर्ण प्रजाओं में चिर पुरातन हैं ॥६॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप हमारे रथ की रक्षा करें । यह रथ युद्धों में ऐश्वर्य की कामना करने वाला है। यह अनुचरों के साथ अग्रगमन करने वाला और दुस्तर है ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप हमारे निकट आएँ । अपनी प्रकृष्ट बुद्धि से हमारे रथ की रक्षा करें । आप अत्यन्त बलशाली हैं । आपके निमित्त हम ग्रहणीय एवं दीप्तिमान् अन्नों को हवि द्वारा स्थापित करते हैं और दिव्य स्तुतियों का उच्चारण करते हैं ॥८॥ |
सूक्त-३६
| जो धनों को देना जानते हैं, जो धनों के अनुपम दाता हैं; ऐसे इन्द्रदेव हमारे यज्ञ में आएँ। जैसे धनुर्धारी वीर शिकार की कामना करता है, वैसे ही तृषित इन्द्रदेव सोम की कामना करते हुए दुग्ध मिश्रित सोमरस का पान करे ॥१॥ |
| हे अश्वयुक्त शूर इन्द्रदेव ! जैसे सोम पर्वत के पृष्ठ भाग पर रहता है, वैसे यह सोम आपके सुन्दर होंठ पर चढ़े। बहुतों के द्वारा आवाहन किए जाने वाले दीप्तिमान् हे इन्द्रदेव ! जैसे अश्व तृण खाकर तृप्त होता है, वैसे आप हमारी स्तुतियों को पाकर तृप्त हों, जिससे हम भी प्रमुदित हों ॥२॥ |
| बहुतों के द्वारा स्तुत, वज्रधारण करने वाले है इन्द्रदेव ! जैसे गोल चक्र घूमते हुए काँपता है, उसी प्रकार हमारा मन बुद्धिहीनता के कारण भय से काँपता है । हे सर्वदा वर्धमान इन्द्रदेव ! आप असंख्यों धनों के अधीश्वर और अत्यन्त ऐश्वर्यशाली हैं । हम स्तोतागण बारम्बार आपका स्तवन करते हैं । आप धन से युक्त रथ पर आरूढ़ होकर हमारे पास आएँ ॥३॥ |
| जैसे सोम अभिषव करने वाला पाषाण शब्द करता है, वैसे हम स्तोता स्तुति करते हुए शब्द करते हैं। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आप विपुल धन-सम्पन्न हैं। आप बाँयें और दायें दोनों हाथों से धन दान करने वाले हैं, हे दो अश्वों वाले इन्द्रदेव ! आप हमारी कामनाओं को विफल न करें ॥४॥ |
| हे बलशाली इन्द्रदेव ! बल-संयुक्त आकाश आपके बलों को संवर्धित करे । बल-सम्पन्न आप अति बलवान् अश्वों द्वारा वहन किये जाते हैं । उत्तम शिरस्त्राण और वज्र धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप अतीव बल-सम्पन्न कर्म करने वाले हैं । अत्यन्त बलशाली रथ पर अधिष्ठित होने वाले आप संग्राम में भली-भाँति हमारी रक्षा करें ॥५॥ |
| इन्द्रदेव के सहायक हे मरुतो ! अन्नवान् श्रुतरथ राजा ने समान गति वाले एवं रोहित वर्ण वाले दो अश्व और तीन सौ गौएँ हमें प्रदान की । ऐसे तरुण श्रुतरथ के लिए उनकी समस्त प्रज्ञाएँ सेवा भाव से युक्त होकर नमन करती हैं ॥६॥ |
सूक्त-३७
| उत्तम रूप से आवाहित और घृत आहुतियों से दीप्तिमान् अग्नि की ज्वालाएँ सूर्यरश्मियों से सुसंगत होकर चलती हैं । उस समय जो यजमान “इन्द्रदेव के लिए सोम-सवन करें"-ऐसा कहता है, उसके निमित्त उषा अत्यन्त सुखकारी होकर प्रकाशित होती है ॥१॥ |
| अध्वर्यु अग्नि को प्रज्वलित करके, आसन विस्तीर्ण कर यजन कार्य में प्रवृत्त होता है । वह सोम अभिषवण के पाषाण से युक्त होकर स्तुति करते हुए पाषाण से तीव्र शब्द करता है । वह अध्वर्यु सोमयुक्त हविष्यान्न लेकर नदी तट पर यज्ञन कार्य सम्पन्न करता है ॥२॥ |
| जिस प्रकार श्रेष्ठ कामनाएँ करती हुई पली यज्ञ में पति की अनुगामिनी होती है, उसी प्रकार इन्द्रदेव भी अपनी अनुगामिनी रानी को यज्ञ में वहन करते हैं। प्रभूत ऐश्वर्ययुक्त इन्द्रदेव के रथ की कीर्ति चतुर्दिक फैलकर गुंजरित हो । वे इन्द्रदेव सहस्रों विपुल धनों को चारों ओर से हमारे पास लायें ॥३॥ |
| जिसके राज्य में इन्द्रदेव सर्वदा गो-दुग्ध मिश्रित सोमरस का पान करते हैं, वे राजा कभी व्यर्थित नहीं होते । अपने सत्य सेवकों के साथ सर्वत्र विचरते हैं। अपने शत्रुओं को मारते हैं। प्रजाओं को सुरक्षित रखते हैं । वे अपने सौभाग्य और नाम-यश को पुष्ट करते हैं ॥४॥ |
| जो इन्द्रदेव के निमित्त सोम अभिषवण कर उन्हें शुद्ध सोम प्रदान करता है। वह अपने बन्धुओं और सन्तानों का सम्यक् पोषण करता हुआ प्राप्त धन की रक्षा करने और अप्राप्त धन को प्राप्त करने में समर्थ होता है ।वहू सभी जीवन-संग्रामों के उपस्थित होने पर विजयी होता है ।वह सूर्यदेव और अग्निदेव के लिए प्रिय होता है॥५॥ |
सूक्त-३८
| सर्वज्ञ, श्रेष्ठदानी, सौ अश्वमेध (सैकड़ों यज्ञादि सत्कर्म करने वाले हैं इन्द्रदेव ! आप महिमाशाली धन प्रदान कर हमें भी ऐश्वर्य-सम्पन्न बनायें ॥१॥ |
| हे अत्यन्त बलशाली इन्द्रदेव ! आप स्वर्ण सदृश कान्ति से युक्त हैं । आप अत्यन्त यशस्वी अन्नों को धारण करने वाले हैं। वह आपका यश दुर्गमता से पार पाने (अनिवारणीय) योग्य है और दीर्घकाल तक अबाधित गति से फैलने वाला है ॥२॥ |
| हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप अत्यन्त पूजनीय, सर्वत्र व्याप्त, प्रभूत बल-सम्पन्न तथा सहायकरूप मरुतों के साथ द्युलोक और पृथ्वीलोक में स्वेच्छा से विचरण करते हुए सब पर शासन करते हैं ॥३॥ |
| वृत्रनामक असुर का विनाश करने वाले हे इन्द्रदेव ! हम आपके बल-सामर्थ्य का वर्णन करते हैं । आप हमें किसी भी बल-सम्पन्न शत्रु का धन लाकर देते हैं; क्योंकि आप हम सबको धनवान् बनाने के अभिलाषी हैं ॥४॥ |
| सौ यज्ञ (सैकड़ों सत्कर्म करने वाले हे इन्द्रदेव ! हम सब आपकी शरण में रहते हुए आपकी रक्षण-सामथ्र्यो द्वारा भली प्रकार सुरक्षित हों । हे शूरवीर इन्द्रदेव ! हम सब भली प्रकार संरक्षित हों ॥५॥ |
सूक्त-३९
| अद्भुत वज्र को धारण करने वाले ऐश्वर्यशाली हे इन्द्रदेव ! हमारे पास आपके समर्पण योग्यं धन का अभाव है । अतएव मुक्त हस्त से हमें प्रचुर धन प्रदान करें ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप जिस धन-सामर्थ्य को श्रेष्ठ और तेजस्वितायुक्त मानते हैं, वह धन हमें भरपूर मात्रा में प्रदान करें । हम उस धन को (लोक कल्याणार्थ) दान देने की स्थिति में भी रहें ॥२॥ |
| हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप अपने सब दिशाओं में स्तुत्य, प्रसिद्ध और व्यापक मन (आन्तरिक शक्ति-इच्छा शक्ति) से हमें स्थिर धन और सामर्थ्य प्रदान करें ॥३॥ |
| इन्द्रदेव धनवानों में अनुपम शिरोमणि रूप हैं। वे मनुष्यों के अधीश्वर हैं। स्तोतागण प्राचीन स्तोत्रों से उनकी प्रशंसा के लिए सर्वदा उद्यत होकर सम्यक् सेवा करते हैं ॥४॥ |
| इन्द्रदेव के लिए ही यह काव्य, स्तुति वचन और उक्थ वचन कहने योग्य हैं। उन स्तोत्रों को वहन करने वाले इन्द्रदेव के यज्ञ को अत्रि वंशज अंष स्तुतियों से संवर्धित करते हुए शुभ (उज्ज्वल) बनाते हैं ॥५॥ |
सूक्त-४०
| हे सोमपालक इन्द्रदेव ! पाषाण से कूटकर निष्पन्न इस सोमरस का आप पान करें । हे इन्द्रदेव ! आप इष्टवर्षक मरुतों के साथ वृत्र का हनन कर वृष्टि करने वाले हैं ॥१॥ |
| सोम-अभिषव में प्रयुक्त पाषाण (दोनों) वर्षणशील हैं । सोम से उत्पन्न हर्ष भी वर्षणशील है। यह अभिषुत किया हुआ सोम भी वर्षणशील है । इष्टवर्षक, वृत्रहन्ता हे इन्द्रदेव ! आप वर्षणकारी मरुतों के साथ सोमरस का पान करें ॥२॥ |
| हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप सोम के सिंचनकर्ता और वृष्टिकर्ता हैं। आपके संरक्षण साधनों से रक्षित होने के लिए हम आपका आवाहन करते हैं । इष्टवर्धक, वृत्रहन्ता है इन्द्रदेव ! आप वर्षणकारी मरुतों के साथ सोमपान करें ॥३॥ |
| इन्द्रदेव सोम धारणकर्ता, वज्रधारी, अभीष्टवर्षक, शत्रु-संहारक, शत्रुबलों के शोषक, सर्व अधीश्वर, वृत्रहन्ता और सोमपानकर्ता हैं । ऐसे इन्द्रदेव अपने अश्वों को रथ से युक्त करके हमारे समीप आये और माध्यन्दिन सवन में सोमपान कर हर्षित हों ॥४॥ |
| हे सूर्यदेव ! जब आपको स्वर्भानु (राहु ) ने तमिस्रा से आच्छादित कर दिया था, तब जैसे मनुष्य अन्धकार में अपने क्षेत्र को न जानकर भ्रमित हो जाता है, वैसे ही सभी लोक तमिस्रा में सम्मोहित हो गये ॥५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने आकाश के नीचे विद्यमान स्वर्भानु की मायाओं को दूर कर दिया । तमिस्रा से आच्छादित सूर्य को अत्रि ऋषि ने अत्यन्त प्रकृष्ट मंत्रों द्वारा प्रकाशित किया ॥६॥ |
| (सूर्य का कथन) हे अग्ने ! आपके विद्यमान रहते यह द्रोहकारक, असुररूप, भयोत्पादक तमिस्रा में निगल न जाए। आप सत्यपालक और मित्र स्वरूप हैं । आप और तेजोमय वरुण दोनों मिलकर हमें संरक्षित करें ॥७॥ |
| ऋत्विज् अत्रि ऋषि ने पाषाणों को संयुक्त कर इन्द्रदेव के निमित्त सोम निष्पादित किया । स्तोत्रों से देवों का पूजन-अर्चन किया और वियों से उन्हें तृप्त किया । द्युलोक में सूर्यदेव को उपदेश देकर उनके चक्षु को स्थापित किया और स्वर्भानु की माया को दूर कर दिया ॥८॥ |
| जिन सूर्यदेव को स्वर्भानु ने तमिस्रा से आच्छादित किया था, अत्रि वंशजों ने उनको मुक्त किया । अन्य कोई ऐसा करने में समर्थ नहीं हुए॥९॥ |
सूक्त-४१
| हे मित्रावरुण देव ! कौन यजमान आपके यजन में समर्थ होता है ? हम आपका यजन करने वाले हैं । आप द्युलोक, पृथिवी लोक और अन्तरिक्ष लोक के स्थान से हमारी रक्षा करें । हमें पशु, अन्न, धन आदि से युक्त करें ॥१॥ |
| हे मित्र, वरुण, अर्यमा, आयु (वायु), इन्द्र, ऋभुक्षा और मरुत् देवो ! आप सब देवगण हमारे शुभ्र स्तोत्रों को ग्रहण करें । आप सब मंगलकारी रुद्रदेव के साथ मिलकर हमारे नमस्कार और अभिवादन युक्त स्तोत्रों को प्रीतियुक्त मन से स्वीकार करें ॥२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! वायु के सदृश वेगवान् अश्वों को रथ के मजबूत स्थान से आप भली प्रकार नियंत्रित करते हैं। आपका हम यज्ञ-सेवनार्थ आवाहन करते हैं । हे अंत्वजो ! आप दीप्तिमान् , अतिशय पूज्य और प्राण-प्रदाता रुद्रदेव के लिए उत्तम स्तोत्र और हविष्यान्न प्रस्तुत करें ॥३॥ |
| मेधावी जन जिनका आवाहन करते हैं, जो अत्यन्त दिव्य हैं, शत्रुविनाशक हैं, वे वायु, अग्नि, पूषा और भगदेव सम्मिलित होकर तीनों लोकों में व्याप्त होने वाले सूर्यदेव के साथ मिलकर प्रीतिपूर्वक यज्ञ में आएँ । सभी देवगण यज्ञ में सम्पूर्ण हविरूप भोज्य पदार्थ ग्रहण करने के लिए युद्ध क्षेत्र में जाते हुए वेगवान् अश्व की भाँति अतिशीघ्र आगमन करें ॥४॥ |
| हे मरुतो ! उत्तम अश्वों से युक्त ऐश्वर्य को हमारे निमित्त स्थापित करें । हम स्तोतो धन प्राप्ति के निमित्त और रक्षा के निमित्त उत्तम बुद्धि से आपका स्तवन करते हैं । हे मरुतो ! आपके जो वेगवान् अश्व हैं, उन अश्वों को पाकर 'औशिज' के होतागण सुखी हों ॥५॥ |
| हे ऋत्विजो ! आप अत्यन्त द्युतिमान् , ज्ञानी, स्तुति योग्य वायुदेव को अर्चनीय स्तोत्रों द्वारा रथ से संयुक्त करें । सर्वत्र गमन करने वाली , यज्ञ ग्रहण करने वाली रूपवती देवपलियाँ हमारी स्तुतियों को धारण कर यज्ञ में आगमन करें ॥६॥ |
| हे उषा और रात्रि देवियो ! आप दोनों अत्यन्त महान् हैं। हम वन्दनीय स्वर्ग के देवों के साथ आप दोनों को श्रेष्ठ हवि प्रदान करते हैं । आप दोनों विदुषियों की तरह मनुष्य को सम्पूर्ण यज्ञादि कर्मों में प्रेरित करती हैं ॥७॥ |
| धन प्राप्ति के लिए हम मनुष्यों के पोषक वास्तोष्पति और त्वष्टा देव की उत्तम स्तोत्रों द्वारा अर्चना करते हैं। हव्यादि द्वारा उन्हें संतुष्ट करते हैं। धन देने वाली, आनन्द देने वाली धिषणा (वाणी) की स्तुति करते हैं । वनस्पतियों और ओषधियों की हम स्तुति करते हैं ॥८॥ |
| वीरों के सदृश जगत् के आश्रय-भूत मेघ, स्वेच्छा से सर्वत्र विहार करते हैं। वे विपुल दान के विषय में हमारे प्रति अनुकूल हों। वे हमारे द्वारा स्तुत्य, ज्ञानी, यजनीय और मनुष्यों के हितैषी हैं । वे हम लोगों की स्तुति से तुष्ट होकर अभीष्ट फल प्रदान कर हमें समृद्ध करें ॥९॥ |
| वृष्टि द्वारा भूमि को सींचने में समर्थ मेघ के गर्भ में स्थित जल के रक्षक अग्निदेव की हम उत्तम स्तोत्रों द्वारा स्तुति करते हैं। तीनों लोकों में व्याप्त होने वाले वे अग्निदेव जाते हुए अपनी सुखकर रश्मियों से हमें प्रताड़ित नहीं करते; किन्तु अपनी प्रदीप्त ज्वालाओं रूपी केशों से वनों को जलाकर भस्मीभूत कर देते हैं ॥१०॥ |
| हम महान् रुद्र-पुत्र मरुद्गणों की किस प्रकार स्तुति करें ? धन प्राप्त करने की आकांक्षा से ज्ञान सम्पन्न भगदेव का स्तवन कैसे करें ? जलदेव, ओषधियाँ, आकाशदेव, वन और वृक्ष रूप केश वाले पर्वतदेव हमारी सब प्रकार से रक्षा करें ॥११॥ |
| अन्तरिक्ष में सर्वत्र संचरित होने वाले, पृथ्वी के चतुर्दिक परिभ्रमणशील, बलों के अधिपति वायुदेव हमारी स्तुतियों का श्रवण करें । नगरों के सदृश उज्ज्वल, विशाल पर्वत के चतुर्दिक निस्सृत जल-धारा हमारे वचनों का श्रवण करे ॥१२॥ |
| हे महान् मरुतो ! आप हमारे स्तोत्रों को जानें । हे दर्शनीय मरुतो ! हम लोग वरणीय हविष्यान्न को धारण करते हुए उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते हैं । आप क्षुब्ध होकर आने वाले शत्रुओं को आयुधों से मारकर हम लोगों के सम्मुख आयें ॥१३॥ |
| हम द्युलोक और पृथिवी लोक से जल की उत्तम स्तुतियाँ करके यज्ञ को भली प्रकार सम्पादित करते हैं। सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह-नक्षत्र भी हमारी स्तुतियों को प्रवृद्ध करें । जल से परिपूर्ण नदियाँ जल से हमें संवर्द्धित करें ॥१४॥ |
| माता भूमि के प्रति प्रत्येक पद में हमारी स्तुतियाँ समाहित हैं। वे माता अपने रक्षण-साधनों और सामथ्र्यो से हमारी रक्षा करने वाली हों। वे हमारी स्तुतियों को प्रीतिपूर्वक ग्रहण करें और प्रसन्न होकर अनुकूल हाथों से कल्याणकारी दान करने वाली हों । वे माता अपने दिव्य रसों से हमारा सिंचन करें ॥१५॥ |
| हम लोग उत्तम दानशील मरुतों का स्तवन किस प्रकार करें ? स्तोत्रों के उच्चारण द्वारा हम किस प्रकार मरुतों की सेवा करें ? हविष्यान्न देकर हम किस प्रकार मरुतों की सेवा करें ? हे अहिर्बुध्न्य देव ! हमें हिंसकजन अपने वश में न कर सकें। आप हमारे शत्रुओं को विनष्ट करने वाले हों ॥१६॥ |
| हे देवो ! यजमान, सन्तान और पशुओं की प्राप्ति के लिए हम आपकी उपासना करते हैं । हे देवो ! सभी मनुष्य आपकी उपासना करते हैं । निर्वातिदेव कल्याणकारी अन्न देकर हमारे शरीर का पोषण करें और हमारे बुढ़ापे को निगलकर दूर करें ॥१७॥ |
| हे प्रकाशवान् वसुओ ! हम उत्तम स्तुतियों द्वारा आपकी सुमतिरूप गौ से बल प्रदायक अन्न (पोषण) प्राप्त करें । वे दानवती, सुखदायिनी देवी हमें सुख देती हुई हमारे पास आएँ ॥१८॥ |
| गौ समूह की पोषणकत्र इला और उर्वशी, नदियों की गर्जना से संयुक्त होती हमारी स्तुतियों को सुनें । अत्यन्त दीप्तिमती उर्वशी हमारी स्तुतियों से प्रशंसित होकर हमारे यज्ञादि कर्म को सम्यक्रूप से आच्छादित कर हमारी हवियों को ग्रहण करें ॥१९॥ |
| बल वृद्धि और सम्यक् पोषण के लिए देवगण हमारी स्तुतियों को स्वीकार करें ॥२०॥ |
सूक्त-४२
| हमारी सुखकर स्तुतियाँ हव्यादि पदार्थों के साथ वरुण, मित्र, भग और अदिति को निश्चय ही प्राप्त हों । पंच प्राणों के आधार भूत, विचित्र वर्ण वाले, अन्तरिक्ष में उत्पन्न होने वाले, अबाधितगति वाले, प्राण-प्रदाता और सुखदाता वायुदेव हमारी स्तुतियाँ सुनें ॥१॥ |
| जैसे माता अपने पुत्र को प्रीतिपूर्वक धारण करती है, वैसे ही अदिति हमारे इन स्तोत्रों को हृदय से धारण करें ।देवों के प्रिय और हितकारी हमारे जो स्तोत्र हैं, उन्हें हम मित्र और वरुणदेव के निमित्त अर्पित करते हैं ॥२॥ |
| हे ऋत्विज़ो ! आप लोग ज्ञानियों में अति श्रेष्ठ इन सवितादेव को प्रमुदित करें । इन देव को मधुर सोमरस और घृतादि द्वारा अभिषिक्त कर तृप्त करें । सवितादेव हमें शुद्ध, हितकारी, आह्लादक और जीवन को प्रकाशित करने वाला ऐश्वर्य प्रदान करें ॥३॥ |
| हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! हमें श्रेष्ठ मन, गौओं, अश्वों, ज्ञानीजनों तथा श्रेष्ठ, कल्याणकारी भावनाओं से युक्त करें । देवों का हित करने वाला जो ज्ञान हैं, उससे तथा यज्ञीय (सत्कर्मशील) देवों की सुमति से हमें जोड़े ॥४॥ |
| दीप्तिमान् भगदेव, सर्वप्रेरक सवितादेव, धन के स्वामी त्वष्टादेव, वृत्रहन्ता इन्द्रदेव और धनों के विजेता ऋभुक्षा, वाज और पुरन्धि आदि समस्त अमरदेव शीघ्र ही हमारे यज्ञ में उपस्थित होकर हम लोगों की रक्षा करें ॥५॥ |
| हम यजमान मरुतों की सहायता पाने वाले इन्द्रदेव के महान् कार्यों का वर्णन करते हैं। ये इन्द्रदेव युद्ध से कभी पलायन नहीं करते। ये सर्वदा विजयशील और ज़रारहित है । हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आपके पराक्रम को न तो पूर्वकाल में किसी पुरुष ने पाया है, न आगे कोई प्राप्त करने वाला है, न ही किसी नवीन ने भी आपके पराक्रम को प्राप्त किया है ॥६॥ |
| हे ऋत्विजो ! आप सर्वश्रेष्ठ, रत्न धारणकर्ता और धनों के प्रदाता बृहस्पतिदेव की स्तुति करें । वे हवि प्रदाताओं को प्रभूत धनों से युक्त करने के लिए आगमन करते हैं। वे प्रशंसा करने वालों और स्तुति करने वालों को अतिशय सुख प्रदान करते हैं ॥७॥ |
| हे बृहस्पतिदेव ! आपके द्वारा संरक्षित होकर हम मनुष्य हिंसा से मुक्त, ऐश्वर्यवान् और उत्तम वीर पुत्रों से युक्त होते हैं । आपके अनुग्रह से जो मनुष्य उत्तम अश्वों, गौओं और वस्त्रों का दान करने वाला होता है, उनमें सौभाग्यशाली ऐश्वर्य स्थापित होता है ॥८॥ |
| हे बृहस्पतिदेव ! जो धनवान् स्तुति करने वालों को धन दान न करके उसका स्वयं ही उपभोग करता है, ऐसे मनुष्यों के धन को नष्ट हो जाने वाला करें । जो व्रत धारण नहीं करता और मन्त्र से द्वेष करता है, अमर्यादित सन्तान उत्पत्ति द्वारा वृद्धि को प्राप्त होता है, ऐसे लोगों को आप सूर्यदेव से दूर करें ॥९॥ |
| हे मरुतो ! जो मनुष्य यज्ञ में राक्षसी वृत्तियों से युक्त होता है, जो आपके लिए स्तुति करने वाले की निन्दा करता है; जो अन्न, पशु आदि कामनाओं की पूर्ति के लिए तुच्छता को अपनाता है, ऐसे मनुष्यों को आप चक्रविहीन रथ द्वारा अन्धकूप में निमग्न करें ॥१०॥ |
| हे ऋत्विज् ! आप रुद्रदेव की सम्यक् स्तुतियाँ करें, जो उत्तम बाण और धनुष से युक्त हैं, जो सम्पूर्ण ओषधियों द्वारा रोग निवारक हैं, उन रुद्रदेव का यजन करें । महान् मंगलकारी जीवन के लिए दीप्तिमान् और प्राणप्रदाता रुद्रदेव की नमनपूर्वक सेवा करें ॥११॥ |
| उदार मन वाले, निर्माण कार्य में कुशल हाथ वाले ऋभुदेव, विभुओं द्वारा निर्मित मार्ग वाली सरस्वती, वर्षणशील इन्द्रदेव की पत्नी रूप नदियाँ, तेजोयुक्त रात्रि आदि समस्त देवशक्तियाँ साधकों की मनोकामना पूर्ण करने वाली हैं। आप सब हमें धन प्रदान करें ॥१२॥ |
| महान् और उत्तम रक्षक अनेक रूपों में स्तुत्य इन्द्रदेव को हम नवीन रचनाएँ (स्तुतियाँ) बुद्धिपूर्वक समर्पित करते हैं। वर्षणकर्ता इन्द्रदेव ने कन्या रूपिणी पृथ्वी के हितार्थ नदियों में जल उत्पन्न कर उन्हें प्रवहमान बनाया ॥१३॥ |
| हे स्तोताओ ! आपकी उत्तम स्तुतियाँ उन गर्जनकारी, शब्दकारी, जल के स्वामी मेघों को निश्चय ही प्राप्त हों । वे मेघ जल से अभिपूरित हैं, वर्षणशील हैं और विद्युत् आलोक से सम्पूर्ण द्यावा-पृथिवीं को आलोकित करते हुए गमन करते हैं ॥१४॥ |
| हमारे ये स्तोत्र रुद्रदेव के पुत्र रूप तरुण मरुतों को प्राप्त हों । कल्याणप्रद धन प्राप्ति की इच्छा हमें निरन्तर प्रेरित करती है । बिन्दुदार चिह्नित अश्वों वाले मरुद्गण, जो यज्ञ की ओर गमन करते हैं, उनकी हम स्तुति करते हैं ॥१५॥ |
| धन-प्राप्ति की अभिलाषा से हमारे द्वारा निवेदित ये स्तोत्र पृथ्वी, अन्तरिक्ष, वनस्पति और ओषधियों को प्राप्त हों । हमारे यज्ञ में सम्पूर्ण दीप्तिमान् देवों का उत्तम आवाहन हो।माता पृथ्वी हमें दुर्मति में स्थापित न करें ॥१६॥ |
| हे देवो ! हम सब आपके अनुग्रह से निर्विघ्न होकर अतिशय सुख में निमग्न हों ॥१७॥ |
| हम अश्विनीकुमारों के मंगलकारी, सुखकारी अनुग्रहों और उन रक्षण साधनों से संयुक्त हों, जो नूतन हों । हे अमर अश्विनीकुमारो ! आप हमें उत्तम ऐश्वर्य, वीर पुत्रों और सम्पूर्ण सौभाग्यों को प्रदान करें ॥१८॥ |
सूक्त-४३
| द्रुत वेग से प्रवाहित होने वाली, (जल से परिपूर्ण) नदियाँ अनुकूल होकर हमारे निकट आगमन करें । ज्ञान सम्पन्न स्तोतागण धन प्राप्ति की कामना से सुखदायिनी सप्त महानदियों का आवाहन करते हैं ॥१॥ |
| हम अन्न प्राप्ति के लिए उत्तम स्तुतियों और नमन-अभिवादन द्वारा अहिंसक आकाश और पृथिवी का आवाहन करते हैं। वे मधुर वचन वाले, कुशल हाथों वाले और यशस्वी पिता रूप आकाश और माता पृथिवी प्रत्येक युद्ध में हमारी रक्षा करें ॥२॥ |
| हे अध्वर्युगण ! आप मधुर सोमरस का अभिषव करते हुए सुन्दर और दीप्तिमान् रस सर्वप्रथम वायुदेव को अर्पित करें । हे वायुदेव ! आप होता रूप में हमारे द्वारा प्रदत्त सोमरस का सर्वप्रथम पान करें । हम आपको हर्षित करने के लिए यह मधुर सोमरस निवेदित करते हैं ॥३॥ |
| ऋत्विजों की दसों अँगुलियाँ और दोनों भुजाएँ पाषाण से युक्त होकर सोमरस-अभिषव में प्रयुक्त होती हैं। कुशल हाथों वाले ऋत्विज् अत्यन्त हर्षयुक्त मन से पर्वत पर उत्पन्न सोम वल्ली से रसों का दोहन करते हैं, जिससे दीप्तिमान् सोमरस की धारा बहती है ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपकी परिचर्या के लिए, पराक्रमयुक्त कार्य के लिए, बल के लिए और महान् हर्ष के लिए हम सोमाभिषव करते हैं। है इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा आवाहन किये जाने पर आप उत्तम धुरी वाले रथ से योजित प्रिय अश्वों के साथ हमारे यज्ञ में आएँ ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! हमारे द्वारा प्रीतिपूर्वक सेवित होकर आप सर्वत्र व्याप्त, यज्ञ को जानने वाली महान् तेजस्विनी 'ग्ना' देवी को देवों द्वारा गन्तव्य मार्ग से हमारे पास लाएँ। वह देवी हमारे द्वारा नम्रतापूर्वक निवेदित हव्य पदार्थों और मधुर सोमरस को ग्रहण करके हर्षित हों ॥६॥ |
| रूपवान् शरीर को अलंकारों से पूर्ण करने के समान ज्ञानी पुरुष यज्ञ कुण्ड को यज्ञ-साधन व्यादि से पूर्ण करते और अग्नि से तपाते हैं । यह यज्ञकुण्ड यज्ञ सम्पन्न करने के लिए अपने भीतर अग्नि को उसी प्रकार धारण करता है, जिस प्रकार पिता अपने प्रिय पुत्र को गोद में धारण करता है ॥७॥ |
| पूज्य, महान् और सुखप्रद हमारी वाणी अश्विनीकुमारों को इस यज्ञ-स्थल पर बुलाने के लिए दूत रूप में सीधी गमन करे हे सुखदायक अश्विनीकुमारो !गमनशील रथ की धुरी की नाभि में लगी हुई कील के समान आप हमारे यज्ञ के मुख्य आधार हैं ।अतएव आप रथ पर आरूढ़ होकर हमारे यज्ञ में निधि के रूप में दर्शनीय हों ॥८॥ |
| अत्यन्त बलशाली और वेगपूर्वक गमन करने वाले पूषा और वायुदेव के लिए हम नमस्कारपूर्वक स्तुति वचनों को कहते हैं । ये पूषा और वायुदेव आराधना किए जाने पर बुद्धि को प्रेरित करते हैं और आराधक को उत्तम अन्न एवं बल से युक्त करते हैं ॥९॥ |
| प्राणिमात्र को जानने वाले हे अग्निदेव ! हमारे आवाहन किये जाने पर आप विभिन्न नामों वाले और विभिन्न रूपों वाले मरुतों के साथ उपस्थित हों । हे मरुतो ! आप सब स्तोताओं की वाणी युक्त उत्तम स्तुतियों को श्रवण कर उत्तम रक्षण-साधनों सहित हमारे यज्ञस्थल पर पधारें ॥१०॥ |
| हम सभी लोगों द्वारा पूजनीय सरस्वती देवी द्युलोक से और पर्वतों से हमारे यज्ञ में पहुँचे । घृत सदृश कान्तिमती वे देवी हमारी हवियों को स्वीकार करती हुई स्वेच्छा से हमारे सुखकारी वचनों का श्रवण करें ॥११॥ |
| अत्यन्त मेधावी, नील वर्ण प्रभायुक्त शरीर वाले, महान् बृहस्पतिदेव हमारे यज्ञगृह में अधिष्ठित हों। यज्ञगृह के मध्य श्रेष्ठ स्थान में प्रतिष्ठित दीप्तिमान, स्वर्णिम आभा सम्पन्न, प्रकाशक देव बृहस्पति की हम सब सेवा करें ॥१२॥ |
| सम्पूर्ण जगत् को धारण करने वाले अग्निदेव, सम्पूर्ण रक्षण साधनों के साथ हमारे यज्ञस्थल पर आगमन करें । वे अत्यन्त दीप्तिमान् , आनन्दप्रद और सबके द्वारा आवाहन किये जाने वाले हैं। वे अग्निदेव प्रज्वलित शिखावाले, ओषधि से आच्छादित होने वाले, अबाधगति वाले, त्रिवर्ण (रोहित, शुक्ल और कृष्ण वर्ण) ज्वालाओं वाले हैं। वे अभीष्टवर्धक और अन्नों के धारणकर्ता हैं ॥१३॥ |
| सम्पूर्ण होता और ऋत्विग्गण मातृरूप पृथ्वी के शुभ और अत्यन्त उच्च स्थान (उत्तर वेदी) पर गमन करते हैं। जैसे कोमल शिशु को वस्त्रों से आच्छादित करते हैं, वैसे हीं नवजात सुखकारक अग्नि पर हविदाता यजमान स्तुतियों के साथ हविष्यान्न का आवरण बनाते हैं ॥१४॥ |
| हे अग्निदेव ! आप अत्यन्त महान् स्वरूप वाले हैं। आपकी स्तुति करते हुए बुढ़ापे को प्राप्त ये दम्पती (पति-पत्नी) एक साथ आपको विपुल अन्न देते रहे हैं । हे देवों के देव अग्निदेव ! आप हमारे उत्तम आवाहन से बुलाए जाते हैं। मातृरूप पृथ्वी हमें दुर्बुद्धि में स्थापित न करे ॥१५॥ |
| हे देवो ! हम आपके अनुग्रह से निर्बाधित रहकर अतिशय विस्तृत सुखों में निमग्न रहें ॥१६॥ |
| हम लोग अश्विनीकुमारों के मंगलकारी, सुखकारी अनुग्रहों और उनके रक्षण-साधनों से संयुक्त हों, जो अतिशय नूतन हों ।हे अविनाशी अश्विनीकुमारो !आप हमें उत्तम ऐश्वर्य, वीर सन्तान और सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करें ॥१७॥ |
सूक्त-४४
| पुरातन समय के याजकों, हमारे पुरखों तथा इस काल के सभी प्राणियों की भाँति हमें भी इन्द्रदेव की स्तुतियाँ करके अपने मनोरथ पूर्ण करें । वे इन्द्रदेव देवताओं में ज्येष्ठ सर्वज्ञाता, हम सबके सामने कुशासन, बली, गतिमान् और विजयशील हैं। उन्हें स्तुतियों द्वारा प्रसन्न करें ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप स्वर्गलोक में अपनी आभा से प्रकाशित होते हैं। आप अवृष्टिकारक मेघों के मध्य स्थित सुन्दर जलराशि को बहाते हैं और सम्पूर्ण दिशाओं को शोभा से युक्त करते हैं । आप वृष्टि आदि उत्तम कर्मों द्वारा प्रजाओं के रक्षक हैं। आप प्राणियों की हिंसा न करने वाले और प्रपंचों को दूर करने वाले हैं; इसीलिए आपका नाम सत्यलोक में चिरकाल से विद्यमान है ॥२॥ |
| वे अग्निदेव अबाध गति वाले, अरणि मंथन से बलपूर्वक उत्पन्न होने वाले और यज्ञ-सम्पादक हैं। वे स्थिर और अस्थिर सत्यरूप हवियों को प्राप्त करते हैं। प्रारम्भ में वे अग्निदेव कुश पर बैठकर शिशु रूप होते हैं, तदनन्तर समिधाओं के मध्य विराजित होकर अत्यन्त तरुण और अजर अवस्था को प्राप्त होते हैं ॥३॥ |
| सूर्यदेव की ये किरणें यज्ञ को बढ़ाने वाली, याज्ञिक को धन-ऐश्वर्य देने वाली, यज्ञ में गमन करने की कामना करती हुई अवतीर्ण होती हैं । सूर्यदेव से उत्पन्न ये रश्मियाँ उत्तम वेग से अवतीर्ण होने वाली, सब पर शासन करने वाली और अन्तरिक्ष मार्ग से जल राशि का शोषण करने वाली हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आप अत्यन्त सरल पथ से गमन करने वाले हैं । समिधाओं से प्रदीप्त होकर आप आयुवर्द्धक अभिघुत सोमरस का पान करने वाले हैं। विद्वान् साधकों की हृदय गुहा में स्थापित होकर अत्यन्त शोभायमान होते हैं । यज्ञ में चैतन्य होकर आप पत्नीरूप ज्वालाओं को प्रवर्धित करें ॥५॥ |
| ये देवगण जिस प्रकार दृष्टिगत होते हैं, वैसे ही वर्णित भी होते हैं । इन देवों ने अपने सिद्ध तेजों से जल के आवरण में समायी पृथ्वी को धारण किया । ये देवगण हमें महान् विजय, उत्तम वीर पुत्र, अक्षय धन और विराट् बल प्रदान करें ॥६॥ |
| सर्व उत्पादक, श्रेष्ठ क्रान्तदर्शी सूर्यदेव अपने उत्कंटित मन के कारण सभी स्पर्धावान् ग्रह-नक्षत्रों से अग्रणी रहते हैं । सम्पूर्ण विश्व की चारों ओर से रक्षा करने वाले तेजस्वी सूर्यदेव की हम सम्यक् रूप से स्तुतियाँ करें । सूर्यदेव हमें दीप्तिमान् एवं श्रेष्ठ ऐश्वर्य और अतिशय सुख प्रदान करें॥७॥ |
| श्रेष्ठ यज्ञ सम्पादक हे अग्निदेव ! ऋषियों की स्तुतिपरक वाणीं आपके निकट ही गमन करती है। इन स्तुतियों से आपका नाम (यश) संवर्द्धित होता है। वे ऋषिगण जिसकी कामना करते हैं; उसे अपने पराक्रम से प्राप्त कर लेते हैं। जिस कार्यभार को स्वयं वहन करते हैं, उसे सिद्ध भी कर लेते हैं ॥८॥ |
| इन स्तोत्रों में सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र (प्रकाश के ) समुद्र के समान, सूर्यदेव तक पहुँचकर प्रतिष्ठित हों । जिन यज्ञों में इन स्तोत्रों का विस्तार होता है, वे कभी नष्ट नहीं होते हैं। जहाँ पवित्र भावों से बँधी हुई बुद्धि रहती है, वहाँ याज्ञिकों के हृदयगत मनोरथ कभी विफल नहीं होते ॥९॥ |
| वे सवितादेव हम सबके द्वारा अत्यन्त रमणीय स्तोत्रों से स्तुति किये जाने योग्य हैं । सम्पूर्ण विद्वानों द्वारा भी अतिशय पूज्य हैं। हम क्षत्र, मनस, अवद, यजत, सधि और अवत्सार नामक ऋषिगण सूर्यदेव की स्तुतियों द्वारा श्रेष्ठ बलों और अन्नों की कामना करते हैं ॥१०॥ |
| यह सोमरस जनित हर्ष कक्षा (उदर) को परिपूर्ण करने वाला, श्येन के सदृश सर्वत्र गमनशील और अदिति की तरह व्यापक है। यह सोमरस विश्ववार, यजत और मायी ऋषियों द्वारा अभिषुत होता है । ये सभी इसका पान करके हर्षित और पुष्ट होने की कामना करते हैं ॥११॥ |
| जो देवगणों की उत्तम स्तुतियाँ करने वाले हैं, वे सदापृण, यजत, बाहुवृक्त, श्रुतवित् और तर्य ऋषिगण सब मिलकर अपने शत्रुओं का संहार करें। वे ऋषिगण दोनों लोकों-इस लोक और परलोक के मनोरथों को प्राप्त करते हुए तेजस्विता से दीप्तिमान् हों; क्योंकि वे विश्वेदेवों की विशेष स्तुतियाँ करते हैं ॥१२॥ |
| यजमान अवत्सार के यज्ञ में सुतम्भर ऋषि, सत्यधर्म (यज्ञादि) कार्यों के पालक हैं । वे सम्पूर्ण यज्ञादि कार्यों में स्तुतियों के स्रोत स्वरूप हैं । इस यज्ञ में गौएँ रसरूष पेय पदार्थों को प्रदान करती हैं। सभी स्तोतागण इस यज्ञ के सारभूत फलों को प्राप्त करते हैं, अन्य सोने वाले व्यक्ति नहीं ॥१३॥ |
| जो जाग्रत् हैं, उन्हीं से रुचाएँ अपेक्षा रखती हैं। जाग्रतों को ही सामगान का लाभ मिलता हैं । जाग्रतों से ही सोम कहता है कि “ मैं तुम्हारे मित्र भाव में ही रहता हूँ " ॥१४॥ |
| अग्निदेव जाग्रत् रहते हैं, इसीलिए वह ऋचाओं द्वारा चाहे जाते हैं । अग्निदेव चैतन्यवान् हैं, अत: साम उसका गान करते हैं। चैतन्य (प्रज्वलित) अग्नि से ही सोम कहता है-" मैं सदा आपके मित्रभाव में आश्रय स्थान प्राप्त करू * ॥१५॥ |
सूक्त-४५
| अंगिराओं की स्तुतियों से इन्द्रदेव ने स्वर्ग से वज्र द्वारा मेघों पर संघात किया, जिससे आने वाली उषा की रश्मियों का द्वार खुला और किरणे सर्वत्र व्याप्त हो गयीं । घनीभूत तमिस्रा विनष्ट हुई और सूर्यदेव प्रकट हुए। उन सूर्यदेव ने सब मनुष्यों के द्वारों को खोला ॥१॥ |
| जैसे मनुष्य आकर्षक वस्त्रालंकारों से सुन्दर रूप पाता है, वैसे ही सूर्यदेव विभिन्न वर्ण वाली दीप्तियों से शोभायमान होते हैं। प्रकाशक रश्मियों की मातृरूप उषा, सूर्योदय का दर्शन करते हुए विशाल आकाश से अवतीर्ण होती हैं। तट से तीव्र संघात करती हुई प्रवहमान नदियाँ अतिवेग से प्रवाहित होती हैं। घर में स्थित सुदृढ़ स्तम्भ की भाँति द्युलोक तीव्र प्रकाश से सुदृढ़ हुआ है ॥२॥ |
| इन चिर-पुरातन स्तोत्रों द्वारा भूमि को उत्पादनशील बनाने के लिए मेघ का गर्भ रूप वृष्टि जल बरसता है । आकाश वृष्टि कार्य में साधन रूप में प्रयुक्त होता हैं । निरन्तर कर्मशील मनुष्य अधिक परिश्रम में उद्यत होते हैं ॥३॥ |
| हे इन्द्र और अग्निदेवो ! हम अपनी रक्षा के लिए देवों द्वारा सेवनीयसूक्तरूप वचनों से आप दोनों का आवाहन करते हैं । उत्तम प्रकार से आपका यज्ञ सम्पादन करने वाले मरुतों के सदृश आपकी परिचर्या करने वाले ज्ञानीजन आपकी पूजा करते हैं ॥४॥ |
| (हे देवो !) आप हमारे इस यज्ञ में शीघ्र आगमन करें । हम उत्तम कर्मों को करने वाले हों । आप हमारे शत्रुओं का विनाश करें । प्रच्छन्न शत्रुओं को अतिशय दूर ही रखें और यज्ञ के निमित्त यजमानों की ओर गमन करें ॥५॥ |
| हे मित्रो ! आओ हम स्तुतियाँ करें, जिसके द्वारा मातृरूप उषा ने विस्तृत किरण समूह को उत्पन्न किया; जिसके द्वारा मनु ने विशिशिप्र (वृत्र) को जीता था, और वंकु वणिक् ने विस्तृत जल-राशियों को प्राप्त किया था ॥६॥ |
| जिस पाषाण से सोमरस का अभिषवण करके नवग्वों ने दस मास तक पूजा-अर्चना की, वहीं पत्थर इस यज्ञ में हाथों से संयुक्त होकर निनादित होता है । यज्ञ के अभिमुख होकर सरमा ने स्तुतियों को प्राप्त किया; तदनन्तर अङ्गिरा ने सभी कर्म सफल कर दिखाये ॥७॥ |
| इन पूजनीय उषा के प्रकट होने पर सभी अंगिराओं ने अपनी गौओं से दुग्ध प्राप्त किया। गौओं के दूध को उन्होंने यज्ञस्थल के उच्च-स्थान में स्थापित किया। सरमा ने यज्ञ मार्ग से गमन करते हुए उनकी स्तुतियों को जाना॥८॥ |
| सात अश्वों से संयुक्त होकर सूर्यदेव हमारे सम्मुख आएँ, क्योंकि उन्हें दीर्घ प्रवास के लिए अत्यन्त दूर स्थित गंतव्य की ओर जाना है। वे श्येन पक्षी की तरह द्रुतगामी होकर हमारे द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न प्राप्त करने के लिए अवतीर्ण हों । वे अत्यन्त युवा और क्रान्तदर्शी सूर्य किरणों के मध्य अवस्थित होकर देदीप्यमान हों ॥९॥ |
| जब सूर्यदेव ने कान्तिमान् शरीर वाले अश्वों को रथ से युक्त किया, तब सूर्यदेव अन्तरिक्षव्यापी जल पर आरूढ़ हुए । तदनन्तर जैसे जल में डूबी नाव को बाहर निकालते हैं, वैसे ही विद्वानों ने स्तोत्रों से सूर्यदेव को बाहर निकाला। उनकी स्तुतियों से जल राशि भी नीचे अवतीर्ण हुई ॥१०॥ |
| हे देवो ! जिन स्तुतियों से नवग्वों ने दस मास तक साध्य यज्ञ-अनुष्ठान किया था । जल प्राप्त कराने वाली, उत्तम ऐश्वर्य देने वाली उन स्तुतियों को हम धारण करते हैं। इन स्तुतियों से हम देवों द्वारा रक्षित हों और पाप-कर्मों से भी संरक्षित हों ॥११॥ |
सूक्त-४६
| अश्व जिस प्रकार रथ के जुए में जुड़ जाता है, उसी प्रकार विद्वान् (प्रतिक्षत्र) धुरी (यज्ञ) के साथ स्वयं योजित हो जाते हैं। हम भी उस विघ्नहर्ता और रक्षणकर्ता यज्ञ के भार को वहन करते हैं । इस भार-वहन से विमुक्त होने की इच्छा हम नहीं करते, बल्कि बारम्बार भार को धारण करने की कामना करते हैं। हे मार्ग जानने वाले देव ! आप हमारे मार्ग में अग्रगामी होकर सरल मार्ग द्वारा हमें ले चलें ॥१॥ |
| हे अग्नि, इन्द्र, वरुण, मित्र , मरुत् और विष्णु आदि देवताओ ! आप हमें सामर्थ्य प्रदान करें । दोनों अश्विनीकुमार, रुद्र, देवपलियाँ, पूषा, भग, सरस्वती हमारी हवियाँ ग्रहण करें ॥२॥ |
| इन्द्र, अग्नि, मित्र, वरुण, अदिति, पृथ्वी, द्युलोक, आदित्य, मरुत्, पर्वत समूह, जल, विष्णु, पूषा, ब्रह्मणस्पति, भगदेव और सविता आदि देवों का हम आवाहन करते हैं, वे इस यज्ञशाला में शीघ्र पधारें एवं हमारी रक्षा करें ॥३॥ |
| विष्णुदेव और अहिंसक वायुदेव तथा धन प्रदाता सोमदेव हमें सर्व सुख प्रदान करें। ऋभुगण, दोनों अश्विनीकुमार, त्वष्टा और विभुगण; ये सभी देव हमें ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए अनुकूल प्रेरणा प्रदान करें ॥४॥ |
| वे स्वर्ग में रहने वाले एवं पूजनीय मरुद्गण हमारे यज्ञ में कुशाओं पर बैठने के लिए आगमन करें । बृहस्पति, पूषा, वरुण, मित्र और अर्यमादेव हमें गृह सम्बन्धी सभी सुख प्रदान करें ॥५॥ |
| वे उत्तम स्तुति के योग्य और दान देने वाली नदियाँ, हमारे परित्राण के लिए उद्यत हों । वे धनों को बाँटने वाले भगदेव अपने बल और संरक्षण साधनों के साथ हमारे निकट आगमन करें । व्यापक प्रभायुक्त अदिति देवी हमारे आवाहन को सुनें ॥६॥ |
| इन्द्रादि देवों की पत्नियाँ (स्तुतियों से ) उत्साहित होकर हमारी रक्षा करें । उनके संरक्षण में हम पुत्रों और अन्न आदि के लाभ प्राप्त करें । ये देवियाँ चाहे पृथ्वी पर हों या अन्तरिक्ष और द्युलोक में हों; हमारे उत्तम आवाहन को सुनकर हमें सभी सुख प्रदान करने हेतु पधारें ॥७॥ |
| सभी देवियाँ, देवपलियाँ भली प्रकार हमारी रक्षा करें । इन्द्राणी, अग्नायी, दीप्तिमती, अश्विनी, रोदसी, वरुणानी हमें परिरक्षित करें । इनके मध्य जो ऋतुओं की जन्मदात्री देवी हैं, वे भी हमारी स्तुतियाँ श्रवण करें ॥८॥ |
सूक्त-४७
| ये स्तुत्य, अत्यन्त विस्तृत मातृरूप उषादेवी अपनी पुत्री पृथ्वी को चैतन्य करती हैं। प्राणियों को अपने कर्मों में योजित करती हुई ये आकाश से प्रकाशित होती हैं । सबकी परिचर्या करने वाली ये तरुणी उषा बुद्धिपूर्वक स्तोत्रों से आवाहित होने पर यज्ञ-गृह में पितृ रूप देवों के साथ आगमन करती हैं ॥१॥ |
| सतत गमनशील, प्रकाशित होकर कर्मों को सम्पादित करती हुई अमृत रूप सूर्यदेव की नाभि में स्थित रश्मियाँ सर्वत्र व्याप्त होकर अनन्त पथों से द्यावा और पृथिवी का परिभ्रमण करती हैं ॥२॥ |
| समुद्र में जल को सिंचित करने वाले दीप्तिमान्, सुन्दर रश्मियों से युक्त ये सूर्यदेव अपने पितृ रूप आकाश के पूर्व स्थान में समाविष्ट हुए हैं। विविध दीप्तियुक्त उल्का के सदृश ये सूर्यदेव आकाश के मध्य में स्थापित होकर परिभ्रमण करते हैं और अन्तरिक्ष जगत् की सीमाओं की रक्षा करते हैं ॥३॥ |
| अपने कल्याण की कामना करते हुए चार ऋत्विग्गण हव्यादि देकर इन सूर्यदेव को धारण करते हैं । दसों दिशाएँ अपने गर्भ से उत्पन्न सूर्यदेव को गति के लिए प्रेरित करती हैं। तीनों लोकों में गमनशील सूर्यदेव की श्रेष्ठ किरणे द्रुतवेग से आकाश के सीमा प्रदेशों में भी परिभ्रमण करती हैं ॥४॥ |
| हे मनुष्यो ! जिनके कारण ये नदियाँ प्रवाहशील हैं और जल स्थिर रहते हैं, उन सूर्यदेव का शरीर स्तुत्य हैं। माता पृथ्वी के स्वयं उत्पादक उन सूर्यदेव को विश्व-नियामक और बंधुत्व युक्त दो लोक धारण करते हैं ॥५॥ |
| जैसे माताएँ अपने पुत्रों के वस्त्र बुनती हैं, वैसे यजमान इन सूर्यदेव के लिए स्तुतियां और यज्ञादि कर्म की रचना करते हैं। इन वर्षणशील सूर्यदेव के प्रकट होने पर इनकी पत्नीरूप रश्मियाँ हर्षित होती हुई आकाश-पथ से होकर हमारे पास आती हैं ॥६॥ |
| हे मित्रावरुण देवो ! यह स्तोत्र आपके निमित्त है । हे अग्निदेव ! यह स्तोत्र हमारे सुख प्राप्ति के लिए आपके निमित्त है । हमें उत्तम स्थान एवं प्रतिष्ठा की प्राप्ति हो । सभी को श्रेष्ठ आश्रय प्रदान करने वाले सूर्यदेव को हम नमस्कार करते हैं ॥७॥ |
सूक्त-४८
| हम अपने बल के निमित्त, अपने यश के लिए और प्रीतिकर महान् तेज के लिए किस तरह की अर्चना करें ? यह माया रूप आच्छादन विस्तृत करने वाली शक्ति अपरिमित अन्तरिक्ष में मेघों के ऊपर जल राशि को फेलाती हैं ॥१॥ |
| उन उषाओं ने वीर पुरुषों के कर्मों में उत्साह को विस्तारित किया । एक समान प्रकाशक आवरण से सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त किया। देवत्व की अभिलाषा वाले मनुष्य अवतीर्ण होने वाली एवं निवर्तमान उषाओं को त्यागकर वर्तमान उषा के सामने ही अपने कर्मों (यज्ञादि) का विस्तार करते हैं ॥२॥ |
| सम्पूर्ण दिन और रात्रि में लगातार पत्थरों से अभिषुत सोम द्वारा हर्षित होकर इन्द्रदेव ने उस मायावी वृत्र के ऊपर अपने उत्कृष्ट वज्र का संघात किया । इन्द्र रूप सूर्यदेव की सैकड़ों किरणे दिनों के चक्र में प्रवृत्त और निवृत्त होती हुई अपने गृह-आकाश में परिभ्रमण करती रहती हैं ॥३॥ |
| परशु के समान तीक्ष्ण उन अग्निदेव के स्वभाव को हम जानते हैं । रूपवान् , आदित्यरूप अग्निदेव के किरण समूह की स्तुति हम ऐश्वर्य के उपयोग के लिए करते हैं । ये अग्निदेव सहायक होकर यज्ञ-स्थान में यजमाने को अन्नों से अभिपूरित गृह और उत्तम रत्न प्रदान करते हैं ॥४॥ |
| रमणीय तेजरूपी आच्छादन धारण कर अग्निदेव अन्धकार रूप शत्रु को मारते हैं। वे चारों ओर ज्वालाओं को विस्तृत कर जिह्वा रूप ज्वाला से घृतादि का पान करते हैं। जिसके माध्यम से भग और सवितादेव वरणीय धनों को प्रदान करते हैं। उन अग्निदेव के धनैश्वर्य-दान के पराक्रमों का ज्ञान हमें नहीं हैं ॥५॥ |
सूक्त-४९
| यजमानों के लिए आज हम सवितादेव को और भगदेव को आवाहित करते हैं; क्योंकि वे दानशीलों को रन बाँटने वाले हैं । हे बहुत पदार्थों के उपभोगकर्ता, नेतृत्वकर्ता अश्विनीकुमारो ! हम आपसे मैत्री की अभिलाषा करते हुए प्रतिदिन आप दोनों का आवाहन करते हैं ॥१॥ |
| हे स्तोताओ ! आप सब उन प्राण-प्रदायक सवितादेव के प्रत्यागमन को जानकर उत्तम वचनों से उनकी स्तुति करें । यजमानों को श्रेष्ठ रत्न बाँटने वाले उन सवितादेव को जानकर नमस्कारपूर्वक उनकी स्तुतियाँ करें ॥२॥ |
| पूषा, भग और अदिति-ये देव वरण करने योग्य हविष्यान्न को ग्रहण करते और वरणीय अन्न को यजमानों को देते हैं । इन्द्र, विष्णु, वरुण, मित्र और अग्नि आदि दर्शनीय देव कल्याणकारी दिवस को उत्पन्न करते हैं ॥३॥ |
| हम यज्ञ के सम्पादनकर्ता देव की स्तुतियाँ करते हैं। वे अपराजित सवितादेव हमें अहणीय धन दें । प्रवाहशील नदियाँ भी उस धन को प्रदान करें । हम ऐश्वर्यों के अधिपति होकर अन्न-रत्नों के अधिपति बनें ॥४॥ |
| जो यजमान वसुओं को हवियाँ प्रदान करते हैं, मित्र और वरुण देव के निमित्त उत्तमसूक्तवचनों द्वारा स्तुतियों करते हैं । हे देवगणो उन्हें ऐश्वर्य से युक्त करें ।हम द्युलोक और पृथिवीं लोक का संरक्षण प्राप्त कर हर्षित हों ॥५॥ |
सूक्त-५०
| सभी मनुष्य सर्वप्रेरक सवितादेव की मित्रता का वरण करते हैं। वे मनुष्य अपने पोषण के लिए दीप्तिमान् धनों को प्राप्त करते हैं और ऐश्वर्यं के अधिपति होते हैं ॥१॥ |
| हे अग्रणी देव ! जो मनुष्य आपकी और अन्य देवों की उपासना करते हैं, वे सब आपके ही हैं। वे सब धनों से युक्त होकर पूर्णकाम हों ॥२॥ |
| हे ऋत्विजो ! आप हमारे इस यज्ञ में अतिथि के समान पूज्य देवों की सेवा करें । उन देवों की पत्नियों की भी सेवा करें। वे विघ्नविनाशक सवितादेव हमारे सम्पूर्ण पथों के विघ्नों और शत्रुओं को दूर करें ॥३॥ |
| जहाँ अग्नि स्थापित होने के अनन्तर यूप योग्य पशु, यूप के निकट स्तुत्य होता है; वहाँ यजमान सवितादेव के अनुग्रह से उत्साहपूर्ण मन और पुत्र-पौत्रादि एवं भार्यायुक्त गृह प्राप्त करता है ॥४॥ |
| हे सर्वनियामक सवितादेव ! आपका यह रथ ऐश्वर्य प्रदाता, सुखदाता और पालन करने वाला है। हम स्तोता सुखकर ऐश्वर्य और सुखकर कल्याण के लिए आपकी स्तुति करते हैं। देवों की स्तुतियों के साथ आपकी भी बारम्बार स्तुति करते हैं ॥५॥ |
सूक्त-५१
| हे अग्निदेव ! आप सोमरस का पान करने के निमित्त सभी संरक्षक देवों के साथ हव्य-प्रदाता यजमान के पास आयें ॥१॥ |
| हे सत्य स्तुति योग्य देवो ! हे सत्य धारणकर्ता देवो ! आप सब हमारे यज्ञ में आयें । अग्नि की जिह्वा रूप ज्वालाओं द्वारा सोमरस अथवा घृतादि का पान करें ॥२॥ |
| हे मेधावी सेव्य (सेवा के योग्य) अग्निदेव ! आप प्रातः काल में आने वाले ज्ञानियों और देवों के साथ सोमपान के निमित्त यहाँ आये ॥३॥ |
| पाषाणों द्वारा कूटकर अभिषुत हुआ सोम पात्रों में छानकर भरा जाता है । यह सोम इन्द्र और वायुदेवों के लिए अत्यन्त प्रीतिकर है ॥४॥ |
| हे वायुदेव ! सोम पान करने के लिए और विदाता यजमान की प्रीति के लिए आप हव्य प्राप्त करने पधारें; हविष्यान्न ग्रहण करें और अभिषुत सोम को पान करें ॥५॥ |
| हे वायुदेव ! आप और इन्द्रदेव इस अभिषुत हुए सोम का पान करने योग्य हैं । अहिंसक होकर आप आयें और हव्य रूप सोम का सेवन करें ॥६॥ |
| इन्द्र और वायु देवों के लिए दधि मिश्रित सोमरस अभिषुत हुआ है । हे इन्द्र और वायुदेवो ! नीचे की ओर प्रवाहित नदियों के समान यह हविष्यान्न आपकी ओर ही जाता है ॥७॥ |
| हे अग्निदेव ! सम्पूर्ण देवों के साथ अश्विनीकुमारों और उषा के साथ समान प्रीतियुक्त होकर इस यज्ञ में आगमन करें । जैसे अत्रि ऋषि यज्ञ में हर्षित होते हैं, वैसे आप हमारे अभिषुत सोम से हर्षित हों ॥८॥ |
| हे अग्निदेव ! आप मित्र और वरुण के साथ तथा विष्णु और सोम के साथ हमारे यज्ञ में आगमन करें। जैसे अत्रि ऋषि यज्ञ में प्रमुदित होते हैं, वैसे ही आप भी हमारे अभिषुत सोम से प्रमुदित हों ॥९॥ |
| हे अग्निदेव ! आप आदित्य और वसुओं के साथ तथा इन्द्र और वायु के साथ समान प्रीति युक्त होकर हमारे यज्ञ में आगमन करें । जैसे अत्रि ऋषि यज्ञ में हर्षित होते हैं, वैसे आप हमारे अभिषुत सोम से हर्षित हों ॥१०॥ |
| दोनों अश्विनीकुमार हमारे निमित्त कल्याण करें। भगदेवता और देवी अदिति हमारा कल्याण करें। अपराजित और प्राण दाता पूषादेव हमारा कल्याण करें । उत्तम ज्ञानी (प्रचेता) द्यावा-पृथिवी हमारा कल्याण करें ॥११॥ |
| हम अपने कल्याण के लिए वायुदेव का स्तवन करते हैं । सम्पूर्ण भुवनों के अधिपति सोम की स्तुति हम कल्याण के लिए करते हैं । सर्वगणों के अधीश्वर बृहस्पतिदेव की स्तुति हम कल्याण के लिए करते हैं । देवरूप आदित्य के पुत्र, देवरूप अरुणादि द्वादशदेव हमारे लिए कल्याणकारी हों ॥१२॥ |
| इस यज्ञ में सम्पूर्ण देवगण हमारे कल्याण के रक्षक हों । सम्पूर्ण विश्व के नियामक और आश्रयदाता अग्निदेव हमारे कल्याण के रक्षक हों । दीप्तिमान् ऋभुगण हमारी रक्षा करते हुए कल्याणकारी हों । रुद्रदेव हमें पापों से रक्षित कर कल्याणकारी हों ॥१३॥ |
| हे मित्रावरुण देवो ! आप हमारा कल्याण करें । हे मार्गप्रदर्शिका और धनवती देवि ! आप हमारा कल्याण करें । इन्द्र और अग्निदेव हमारा कल्याण करें । हे अदिति देवि ! आप हमारा कल्याण करें ॥१४॥ |
| सूर्य और चन्द्रमा के सदृश हम बाधारहित पथों के अनुगामी हों । निरन्तर दान से युक्त होकर, ज्ञान से युक्त होकर, परस्पर टकराव या हिंसा से रहित होकर हम सुखपूर्वक सहगमन करें ॥१५॥ |
सूक्त-५२
| हे श्यावाश्व ऋषे ! आप संघर्षक शक्ति-सम्पन्न, स्तुत्य मरुतों की प्रकृष्ट अर्चना करें । ये यज्ञ के योग्य मरुद्गण अहिंसक हविरूप अन्नों को धारण कर हर्षित होते हैं ॥१॥ |
| वे स्थायी बलों के सहायक रूप हैं। वे शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले हैं। वे भ्रमण करते हुए हमारे वीर पुत्रों को विजयशील सामर्थ्य देकर उन्हें परिरक्षित करते हैं ॥२॥ |
| ये स्पन्दनयुक्त और वृष्टिकारक मरुद्गण रात्रि का अतिक्रमण करके आगे बढ़ते हैं। इसलिए अब हम मरुतों के आकाश और भूमि में व्याप्त तेजों की स्तुति करते हैं॥३॥ |
| आक्रामक सामर्थ्य से युक्त मरुतों के लिए हम स्तुति और यज्ञ के साधन हव्यादि अर्पित करते हैं । ये मरुद्गण मानव युगों में हिंसकों से, मरणशील मनुष्यों की रक्षा करते हैं ॥४॥ |
| हे ऋत्विजो ! जो पूजनीय, उत्तम दानशील, असीम बल सम्पन्न, नेतृत्वकर्ता वीर हैं, उन यज्ञ योग्य और प्रकाशक मरुद्गणों के लिए यज्ञ के साधन हविष्यान्न अर्पित कर विशिष्ट अर्चना करें ॥५॥ |
| दीप्तिमान् , अलंकारों से विभूषित , आयुधों से युक्त होकर महान् नेतृत्वकर्ता मरुद्गण विशेष शोभायमान होते हैं। ये अपने विशेष आयुधों द्वारा मेघों पर संघात करते हैं । विशेष शब्द करती हुई प्रवाहित नदियों के समान विद्युत् , मरुतों की अनुगामिनी होती है । दीप्तिमान् मरुद्गणों का तेज स्वयं ही निस्सृत होता है ॥६॥ |
| पृथ्वी पर अवस्थित, विस्तीर्ण अन्तरिक्ष में अवस्थित, नदियों के प्रवाह में अवस्थित, संग्राम क्षेत्रों में और महान् द्युलोक के मध्य में अवस्थित ये मरुद्गण सब प्रकार से प्रवर्धित होते हैं ॥७॥ |
| सत्य बल से निरन्तर विवर्धमान मरुतों के उत्कृष्ट बल की स्तुति करें । ये स्पंदनशील और नेतृत्वकर्ता मरुद्गण प्रत्येक शुभकार्य में स्वयं योजित होते हैं ॥८॥ |
| वे मरुद्गण परुष्णी नामक नदी में अवस्थित रहते हैं। सबको शुद्ध करने वाली दीप्ति द्वारा स्वयं को आच्छादित करते हैं । वे अपने बल से रथ चक्रों ( चक्रवातों) को प्रक्षिप्त कर पर्वती (मेघों) का भी भेदन करते हैं ॥९॥ |
| जो मरुद्गण 'आपथय:' (सामने के मार्गों से गमन करने वाले), 'विपथय:' (विविध मार्गों से गमन करने वाले), 'अन्त: पथा:' (गुह्य मार्गों से गमन करने वाले) और 'अनुपथा:' (अनुकूल मार्गों से गमन करने वाले)-इन चारों नामों से विख्यात हुए हैं, वे मरुद्गण हमारे लिए यज्ञ के हविष्यान्न वहन करते है ॥१०॥ |
| (ये मरुद्गण) कभी अग्रणी होकर, कभी नियुक्त (सह्योगी) होकर, कभी दूर रहकर ही (संसार को) धारण करते हैं। इस प्रकार इनके विभिन्न स्वरूप विचित्र और दर्शनीय होते हैं ॥११॥ |
| छन्दों द्वारा स्तुति करने वाले और जल की इच्छा करने वाले स्तोताओं के निमित्त मरुतों ने जल-प्रवाह प्रेरित किया। उनमें कुछ मरुद्गणों ने तस्करों की भाँति अदृश्य होकर रक्षा की थी और कुछ साक्षात् दृष्टिगत होकर उन्हें तेजस्वी बल प्रदान करते थे ॥१२॥ |
| हे षिगण ! जो मरुद्गण विद्युत्रूपी आयुधों से दीप्तिमान् होते हैं, जो महान्, क्रान्तदर्शी और मेधा-सम्पन्न हैं; उन मरुद्गणों का हर्षप्रद स्तुतियों से अभिवादन करें ॥१३॥ |
| हे ऋषिगण ! प्रिय मित्र के पास जाने की तरह आप हविष्यान्न लेकर मरुतों के पास उपस्थित हों । हे आक्रामक बल से पराभव करने वाले मरुतो ! आप लोग द्युलोक या अन्य लोकों से हमारे यज्ञ में पधारें और स्तुतियाँ ग्रहण करें ॥१४॥ |
| स्तोतागण मरुतों की स्तुति करके अन्य देवों की स्तुति करने की इच्छा नहीं करते। वे ज्ञान सम्पन्न, शीघ्रगमनकारी, प्रसिद्ध तथा श्रेष्ठफलदाता मरुतों से ही अभीष्ट दान प्राप्त कर लेते हैं ॥१५॥ |
| उन ज्ञानी मरुतों ने बंधुओं के जानने की इच्छा से यह वचन कहा कि-"गौएँ (किरणें) और पृथ्वी हमारी माताएँ हैं " और सामर्थ्यवान् मरुतों ने यह भी कहा कि-"वेगवान् रुद्र हमारे पिता हैं " ॥१६॥ |
| सात-सात संख्यक समर्थ मरुद्गण एक होकर हमें सौ (सैकड़ो) गौओं और अश्व (पोषक एवं शक्तिवर्द्धक प्रवाह) प्रदान करें । उनके द्वारा प्रदत्त प्रसिद्ध गौओं के समूह को हम यमुना नदी के किनारे पवित्र करते हैं और अश्व रूप धन को भी वहीं पवित्र करते हैं ॥१७॥ |
सूक्त-५३
| मरुतों ने जब बिन्दुदार (चिह्नित) मृगों को अपने रथ में नियोजित किया, तब इनकी उत्पत्ति को कौन जानता था? कौन भला पहले मरुतों के सुख में आसीन था ? ॥१॥ |
| ये मरुद्गण रथ पर अधिष्ठित हैं-यह कौन जानता है ? ये किस प्रकार गमन करते हैं? इनके रथ की ध्वनि को किसने सुना है ?ये मित्ररूप हितैषी, वृष्टिकारक मरुद्गण किस यजमान के लिए बहुत अन्नों के साथ अवतीर्ण होंगे? ॥२॥ |
| तेजस्वी सोमपान से उत्पन्न हर्ष के लिए वे मरुद्गण हमारे निकट उपस्थित हुए तथा कहा-“हम नेतृत्वकर्ता मनुष्यों के हितैषी और निर्दोष मरुद्गण हैं ।” स्तोतागण (ऐसे मरुतों की) स्तुतियाँ करें ॥३॥ |
| ये मरुद्गण जिन दीप्तियों से स्वयं अति प्रकाशमान होते हैं, वे दीप्तियाँ अलंकारों में, मालाओं में, आयुधों में, स्वर्णिम हारों में, कंगनों में, रथों में तथा धनुषों में आश्रयभूत हैं । हम उनकी वन्दना करते हैं ॥४॥ |
| हे शीघ्र दानशील मरुतो ! वृष्टि के सदृश वेगपूर्वक सर्वत्र गमनशील दीप्तिमान् आपके रथ को देखकर हम हर्षित होते हैं और आपका स्तवन करते हैं ॥५॥ |
| वे नेतृत्वकर्ता और उत्तम दानशील, दीप्तिमान् हविदाता यजमान के लिए जिस खजाने को सञ्चित कर धारण करते हैं, उसे वे वृष्टि के समान उनमें बाँट देते हैं । वे मरुद्गण द्यावा-पृथिवीं में व्यापक जल के साथ मेघों के समान संचरित होते और वृष्टि करते हैं ॥६॥ |
| जैसे धेनु दुग्ध सिंचन करती है; वैसे उदक के साथ मेघों को फोड़ती हुई जलराशि अन्तरिक्ष में प्रसारित होती हुई सिंचित होती है । द्रुतगामी अश्व की भाँति वेगपूर्वक प्रवाहित नदियाँ अपने मार्गों को विमुक्त करती जाती हैं ॥७॥ |
| हे मरुतो ! आप सब द्युलोक से, अन्तरिक्ष लोक से या इसी लोक से यहाँ आगमन करें । दूरस्थ प्रदेशों में आप रुके न रहें ॥८॥ |
| हे मरुतो ! रसा, अनितभा, कुभा नदियाँ और वेगपूर्वक गमनशील सिन्धु नदी हमें अवरुद्ध न करें। जल से परिपूर्ण सरयू नदी हमें सीमित न करें । हम आपसे रक्षित होकर सुख में स्थित हों ॥९॥ |
| रथों के बल से युक्त तेजस्वी मरुद्गणों का स्तवन हुम करते हैं । मरुद्गणों के साथ वृष्टि वेगपूर्वक गमन करती है ॥१०॥ |
| हे मरुतो ! हम आपके प्रत्येक बल का, प्रत्येक समुदाय का और प्रत्येक गण का उत्तम स्तुतियों द्वारा बुद्धिपूर्वक अनुसरण करते हैं ॥११॥ |
| आज मरुद्गण इस रथ द्वारा किस हविदाता यजमान और किस उत्तम मानव की ओर गमन करेंगे ? ॥१२॥ |
| जिस सहृदयता से आप पुत्र-पौत्रों के लिए अक्षय धान्य-बीज वहन करते हैं, उसी हृदय से वह हमें भी दें । हम आपसे सम्पूर्ण आयु और सौभाग्यपूर्ण ऐश्वर्य की याचना करते हैं ॥१३॥ |
| हे मरुतो ! हम कल्याण द्वारा पाप वृत्तियों को विनष्ट कर अपने शत्रुओं और गुप्त निंदकों का पराभव करें । हमें सम्पूर्ण शक्तियुक्त सुख, जल और दीप्तियुक्त ओषधि संयुक्त रूप से प्राप्त हो ॥१४॥ |
| हे नेतृत्वकर्ता मरुतो ! जिसकी आप रक्षा करते हैं, वह मनुष्य उत्तम तेजवान् , महिमायुक्त और उत्तम पुत्र-पौत्रादि से युक्त होता है, हम भी वैसे ही अनुगृहीत हों ॥१५॥ |
| हे स्तोताओ ! तृणादि खाने के लिए जाती हुई गौओं के समान यजमान के यज्ञ में भोजन के लिए जाते हुए हर्षित हुए मरुतों की आप स्तुति करें, क्योंकि वे पूर्व परिचित प्रिय मित्रों के समान प्रीतिकर हैं। उन्हें समीप बुलाकर स्तुतियों से प्रशंसित करें ॥१६॥ |
सूक्त-५४
| हे यजमानो ! इन स्वयंप्रकाशित, पर्वतों को कैंपा देने वाले मरुतों के बल की प्रशंसा के लिए प्रयुक्त अपनी वाणी (स्तोत्र) को सुशोभित करे । इन अतिशय तेजसम्पन्न, सूर्यरूप, दीप्तिमान् यश वाले मरुतों की, याजक प्रभूत हविष्यान्न प्रदान कर अर्चना करें ॥१॥ |
| हे मरुतो ! आपके गण बलशाली, संसार के पोषणरूप जल देने वाले, अन्न बढ़ाने वाले, अश्वों को रथ में जोड़ने वाले और चतुर्दिक् गमनशील हैं। जब आप विद्युत् के साथ सम्मिलित होते हैं, तो तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं और गर्जना करते हुए पृथ्वी पर चतुर्दिक् गमनशील जलराशि बरसाते हैं ॥२॥ |
| विद्युत् के सदृश तेजसम्पन्न, नेतृत्वकर्ता, आयुधयुक्त, द्युतिमान् , वेगवान् पर्वतों के प्रकंपक, वज्र-प्रक्षेपक, गर्जनशक्ति से युक्त तथा उग्र बल वाले मरुद्गण बारम्बार जल प्रदान करने के लिए आविर्भूत होते हैं ॥३॥ |
| हे समर्थ, रुद्र पुत्र मरुतो ! आप रात्रि और दिन सतत परिभ्रमण करें । अन्तरिक्ष के सब लोकों में गमन करें । नौकाएँ जैसे नदियों में गमन करती हैं, वैसे आप विभिन्न प्रदेशों में गमन करें । हे शत्रुओं को कैंपाने वाले मरुतो ! हमारी हिंसा न करें ॥४॥ |
| हे मरुतो ! सूर्यदेव जिस प्रकार अपनी दीप्ति को बहुत दूर तक विस्तारित करते हैं । अश्व जिस प्रकार पर्वतों पर भी दूर तक विस्तारित होते हैं, उसी प्रकार आपकी महत्ता और शक्ति को स्तोतागण दूर तक विस्तारित करते हैं ॥५॥ |
| हे विधातारूप मरुतो ! आपका बल प्रखरता को प्राप्त हुआ है। भयंकर आँधी के समान आप वृक्षों को मरोड़ कर गिरा देते हैं । हे प्रसन्नचेता मरुतो ! आँख जैसे राहीं का पथ-प्रदर्शन करती है, वैसे आप हमारे मार्ग प्रदर्शक रूप में अनुकूल पथ से हमें चलाएँ ॥६॥ |
| हे मरुद्गणो ! आप जिसे ऋषि या राजा को सत्कार्य में प्रेरित करते हैं, वह किसी से पराजित नहीं होता, वह न हिसित होता है, न क्षीण होता है, न व्यथित होता है और न बाधित होता है । उसके ऐश्वर्य और संरक्षण सामर्थ्य कभी नष्ट नहीं होते ॥७॥ |
| नियुक्त संज्ञक अश्वों से युक्त, ग्राम विजेता, नेतृत्वकर्ता, जल धारक, मरुद्गण जब अर्यमा के समान वेग से गमन करते हैं, तो शब्दवान होते हैं। वे वृष्टि आदि से जल प्रवाहों को परिपूर्ण करते हैं और भूमि पर मधुर अन्नों को प्रवृद्ध करते हैं ॥८॥ |
| यह भूमि मरुद्गणों के लिए विस्तीर्ण पथ वाली हैं । द्युलोक भी वेगपूर्वक गमनशील मरुतों के लिए विस्तीर्ण पथ बनाते हैं । अन्तरिक्ष के सम्पूर्ण पथ भी मरुद्गणों के लिए विस्तृत होते हैं। मेघ भी मरुतों के लिए विस्तृत होकर शीघ वर्षा करने वाले होते हैं ॥९॥ |
| हे मरुद्गणो ! आप, समान भारवाहक और द्युलोक के नियामक हैं । हे तेजस्वी नेतृत्वकर्ता मरुतो ! आप सूर्यदेव के उदित होने पर अत्यन्त हर्षित होते हैं । सतत गमनशील आपके ये अश्व शिथिल नहीं होते, आप तीनों लोकों के सभी मार्गों को पार कर जाते हैं ॥१०॥ |
| हे रथों में शोभायमान मरुतो ! आप कन्धों पर आयुध, पैरों में कड़े (कटक), वक्षस्थल पर रमणीक हार, भुजाओं पर अग्नि सदृश प्रकाशमान वज्र और शीर्ष पर स्वर्णिम शिरस्त्राण धारण किये हुए हैं ॥११॥ |
| हे पूजनीय मरुद्गणो ! गमन करते हुए आप उस दीप्तिमान् अबाधित आकाश को और तेजस्वी जल को प्रकम्पित करते हैं। आप अपने बलों को संगठित कर अति तेजस्विता से युक्त हों। आप जलवर्षण की इच्छा करने हुए भयंकर गर्जना द्वारा वृष्टि का उद्घोष करते हैं ॥१२॥ |
| हे विशिष्ट ज्ञानी मरुतो ! हम आपके द्वारा प्रदत्त अन्नों से युक्त हों, हम रथों एवं ऐश्वर्य के स्वामी हों । हे मरुतो ! हमें आकाश में वर्तमान नक्षत्रों के सदृश नष्ट न होने वाले सहस्रों धनों से हर्षित करें ॥१३॥ |
| हे मरुद्गणो ! आप हमें स्पृहणीय धन और पुत्रादि प्रदान करें। आप सामगान करने वाले विप्र का रक्षण करते हैं। आप प्रजा का भरण-पोषण करने वाले राजा को अश्व, अन्न और ऐश्वर्य से उसे भली प्रकार पुष्ट करते हैं ॥१४॥ |
| हे शीघ्र रक्षणशील मरुतो ! हम आपके उस धन-ऐश्वर्य की याचना करते हैं, जिसे हम सूर्य-रश्मियों के समान वितरित करें । हे मरुतो ! हमारे इन उत्तम स्तोत्रों को ग्रहण करें, जिसके बल से हम सौ वर्ष के पूर्ण जीवन का उपयोग करें ॥१५॥ |
सूक्त-५५
| प्रकृष्ट यजनीय, दीप्तिमान् आयुध वाले, वक्षस्थल पर रमणीक हार धारण करने वाले मरुद्गण महान् बलों को धारण करते हैं। ये उत्तम नियामक मरुद्गण वेगवान् अश्वों द्वारा गमन करते हैं । जल वृष्टि आदि कल्याण युक्त कार्यों में इन ' रने वाले मरुतों के रथादि भी उके अनुगामी होते हैं ॥१॥ |
| हे मरुतो ! जैसा आप का ज्ञान है, उसी के अनुरूप आप स्वत: बल भी धारण करते हैं। भूमि को उर्वर बनाने को आपकी सामर्थ्य अति महान् है और अतिशय प्रकाशमान हैं । आप अपने बल से अन्तरिक्ष को परिपूर्ण करते हैं। जल वृष्टि आदि कल्याणकारी कार्यों में गतिशील मरुतों के रथ साधन भी उनके अनुगामी होते हैं ॥२॥ |
| ये मरुद्गण एक साथ उत्पन्न हुए और एक साथ जलवर्धक हैं, एक साथ बल-उत्पादक और नेतृत्वकर्ता हैं । अतिशय शोभा के लिए ये अत्यन्त प्रवर्धित होते हैं । सूर्य रश्मियों की भाँति विशिष्ट आभा से संयुक्त हैं। जल वृष्टि आदि कल्याणकारी कार्यों के निमित्त गमनशील मरुतों के रथादि भी इनके अनुगामी होते हैं ॥३॥ |
| हे मरुतो ! आपकी विशिष्ट महत्ता स्तोत्रों आदि द्वारा विभूषित होती हैं। वह सूर्य के रूप सदृश दर्शनीय है । आप हमें अमरता प्रदान करें। जल वृष्टि आदि कल्याणकारी कार्यों के निमित्त गमनशील आपके रथादि साधन भी आपके अनुगामी होते हैं ॥४॥ |
| हे जल सम्पन्न मरुतो ! आप अन्तरिक्ष से समुद्र के जल को प्रेरित करते हैं और जल वर्षण प्रारम्भ करते हैं। हे शत्रु संहारक मरुतो ! आपके निमित्त स्तुतियाँ कभी नष्ट नहीं होतीं । जल वृष्टि आदि कल्याणकारी कार्यों के निमित्त गमनशील, आपके रथादि भी आपके अनुगामी होते हैं ॥५॥ |
| हे मरुद्गणो ! जब आप बिन्दुदार (चिह्नित) अश्वों को अपने रथ से योजित करते हैं और स्वर्णमय कवच को धारण करते हैं, तब स्पर्धा रखने वाले सभी शत्रुओं को क्षत-विक्षत कर देते हैं । जल वृष्टि आदि कल्याणकारी कार्यों के निमित्त गमनशील आपके रथादि भी आपके अनुगामी होते हैं ॥६॥ |
| हे मरुतो ! पर्वत और नदियाँ आपके मार्ग को अवरुद्ध न करें । आप जहाँ जाने की इच्छा करें, वहाँ जाएँ। द्यावा-पृथिवी में सर्वत्र गमन करें । जल वृष्टि आदि कल्याणकारी कार्यों के निमित्त गमनशील आपके रथादि साधन आपके अनुगामी होते हैं ॥७॥ |
| हे सर्व निवासक मरुतो ! जो यज्ञादि अनुष्ठान पहले सम्पादित किये गये हैं, जो नूतन यज्ञ हो रहे हैं, उनके जो मन्त्रगान और स्तोत्रपाठ होते हैं, उन्हें आप जानने वाले हों । जल वृष्टि आदि कल्याणकारी कार्यों के निमित्त गमनशील रथादि आपके अनुगामी होते हैं ॥८॥ |
| हे मरुतो ! हमें सुखी बनायें, अपने क्रोध से नष्ट न करें, सुख प्रदान करें । हमारे मित्र भाव से युक्त स्तोत्रों से अवगत हों। जल-वृष्टि आदि कल्याणकारी कार्यों के निमित्त गमनशील रथादि साधन आपके अनुगामी होते हैं ॥९॥ |
| हे स्तुत्य मरुद्गणो ! आप हमें पापों से विमुक्त करें और ऐश्वर्ययुक्त स्थान की ओर ले चले । हे यजनीय, मरुतो ! हमारे द्वारा प्रदत्त हव्यादि पदार्थ को ग्रहण करें, जिससे हम विविध ऐश्वर्यों के स्वामी हों ॥१०॥ |
सूक्त-५६
| हे अग्ने ! आज आप दीप्तिमान् अलंकारों से विभूषित, शत्रु संहारक वीर मरुद्गणों और उनकी प्रजाओं को आहूत करें । हम देदीप्यमान द्युलोक से उनका आवाहन करते हैं ॥१॥ |
| हे अग्ने ! जिस प्रकार आप मरुद्गणों को हृदय से पूज्य मानते हैं, उसी प्रकार के हमारे सम्मानित भावों से वे हमारे निकट आगमन करें । ये जब हमारे हवनों के निकट आगमन करें, तब उन विकराल स्वरूप वाले मरुतों को आप हव्य द्वारा प्रवृद्ध करें ॥२॥ |
| पृथ्वी पर प्रभावित होकर व्यक्ति समर्थों के पास जाते हैं, उसी प्रकार हर्षित मरुतों की सेना हमारे निकट आ रही है । हे मरुतो ! आप वृषभ के सदृश सेचन में समर्थ (उत्पादन में समर्थ) और विशिष्ट सामर्थ्यवान् हैं ॥३॥ |
| दुर्धर्ष बैल के समान ये मरुद्गण अपने बल से सुगमतापूर्वक शत्रुओं का विनाश करते हैं। गर्जना करते हुए गमनशील ये मरुद्गण अपने आघात से मेघों को खण्ड-खण्ड कर वृष्टि करते हैं ॥४॥ |
| हे मरुतो ! आप उठें। स्तोत्रों से निश्चय ही समृद्ध हुए आप मरुद्गणों के सर्वश्रेष्ठ और अपूर्व बलों की हम वन्दना करते हैं ॥५॥ |
| हे मरुतो ! आप अपने रथ में अरुणिम मृगों को योजित करें अथवा रोहित वर्ण मृग को योजित करें अथवा वेगवान्, वहन कार्य में समर्थ अश्वों को भ्रमणशील धुरी को खींचने के लिए योजित करें ॥६॥ |
| हे मरुतो ! उन अरुणिम आभा से युक्त, बड़े शब्दकारी, दर्शनीय अश्वों को रथ से योजित कर इस प्रकार प्रेरित करें कि वे आपकी यात्राओं में विलम्ब न करें ॥७॥ |
| हम मरुतों के अन्नों से अभिपूरित, उस रथ का आह्वान करते हैं, जिसमें उत्तम रमणीय द्रव्यों की धारणकर्जी मरुतों की माता अधिष्ठित हैं ॥८॥ |
| हम मरुतों के रथ में शोभायमान, उस तेजस्वी और स्तुत्य संघ शक्ति का आह्वान करते हैं, जिसमें सुजाता और सौभाग्यवती कल्याणकारिणी देवी मरुद्गणों के साथ महत्ता को प्राप्त होती हैं ॥९॥ |
सूक्त-५७
| इन्द्र के अनुचर, समान प्रीति वाले, स्वर्णिम रथों पर आरूढ़ होने वाले, रुद्रों के पुत्ररूप हे मरुतो ! आप हमारे इस उद्देश्यपूर्ण यज्ञ में आगमन करें । हम आपके निमित्त बुद्धिपूर्वक स्तवन करते हैं। हे तेजस्वी मरुतो ! तृषित और जल अभिलाषी गौतम के निमित्त आपने जैसे जल प्रवाह प्रदान किया, उसी प्रकार हमें भी अनुगृहीत करें ॥१॥ |
| हे मेधावी मरुतो ! आप कुठारों से युक्त, भालों से युक्त, उत्तम धनुषों से युक्त, बाणों से युक्त, तूणीर धारक, उत्तम अश्वों तथा रथों से युक्त और उत्तम आयुधों से युक्त हैं । आप हमारे कल्याण के निमित्त आगमन करें ॥२॥ |
| हे मरुतो ! आप अन्तरिक्ष में मेघों को कम्पित करें । उस हविदाता यजमान को धन प्रदान करें। आपके आगमन के भय से वन भी प्रकम्पित होते हैं । हे मातृरूप पृथ्वी के पुत्रो ! जल वृष्टि आदि शुभ कार्य के निमित्त बिन्दुदार (चिह्नित) मृगों को रथ से योजित कर जब आप उम्रता को धारण करते हैं, तो आपके क्रोध से पृथ्वी भी क्षुब्ध हो जाती है ॥३॥ |
| ये वीर मरुद्गण अत्यन्त तेजस्वी, वृष्टिजल के आच्छादक, जुड़वाँ के तुल्य (समानरूप वाले), उत्तम दर्शनीय और अति रूपवान् हैं । ये बभु वर्ण और अरुणिम वर्ण अश्वों से युक्त, निष्पाप, शत्रुओं के महाविनाशक हैं। अपनी महत्ता से ये आकाश के सदृश विस्तृत हैं ॥४॥ |
| विपुल जलवर्षक, अलंकारों से विभूषित, दानशील, तेजोयुक्त मूर्तिमान्, अक्षय धन से संयुक्त, जन्म से सुजन्मा हार से सुशोभित वक्षस्थल वाले, पूजनीय दीप्तिमान् मरुद्गण अपने शुभ कार्यों से अमर कीर्ति पाते हैं ॥५॥ |
| हे मरुतो ! आपके कन्धों पर भाले रखे हैं। आपकी दोनों भुजाओं में शत्रु-संघर्षक बल सन्निहित है । शीर्षों पर शिरस्त्राण और रथों में सम्पूर्ण आयुध वर्तमान हैं। आपके शरीर विशिष्ट कान्ति से युक्त हैं ॥६॥ |
| हे मरुतो ! आप हमें गौओं से युक्त, अश्वों से युक्त, रथों से युक्त, उत्तम पुत्रों और स्वर्णादि से युक्त अन्नों को प्रदान करें । हे रुद्र पुत्रो ! हमारी समृद्धि बढ़ायें। आपकी दिव्य संरक्षण शक्ति का हम उपभोग करें ॥७॥ |
| हे मरुतो ! आप हमें सुख से परिपूर्ण करें । आप नेतृत्वकर्ता, प्रभूत धन-सम्पन्न, अविनाशी, यज्ञ के ज्ञाता, वास्तविक ख्याति सम्पन्न, क्रान्तदर्शी, युवा, प्रचण्ड बलवान् और सर्वत्र स्तुति किये जाने योग्य हैं ॥८॥ |
सूक्त-५८
| हम निश्चय ही उन बल-सम्पन्न, स्तुत्य मरुद्गणों की स्तुति करें। वे मरुद्गण द्रुतगामी अश्वों के स्वामीं, वेगपूर्वक गमन करने वाले तथा अमृत के शासक हैं ॥१॥ |
| हे ज्ञानी पुरुष ! उन तेजस्वी, बल-सम्पन्न, हाथ में कड़े धारण करने वाले, शत्रुओं को कैंपाने वाले, कुशल वीर, धन प्रदाता मरुतों की स्तुति करें। जो अत्यन्त सुखदायक हैं, महत्ता से परिपूर्ण हैं, अत्यन्त सामर्थ्यवान् और विपुल ऐश्वर्य के स्वामी हैं, उनकी वन्दना करें ॥२॥ |
| ये सभी मरुद्गण जो वृष्टि को प्रेरित करते हैं, जल को वन करते हैं, आज हमारे अभिमुख आगमन करें। हे तरुण और ज्ञानी मरुतो ! आपके निमित्त जो अग्नि प्रज्वलित है; उससे हव्यादि का प्रीतिपूर्वक सेवन करें ॥३॥ |
| हे यजनीय मरुतो ! आप जनकल्याण के लिए यजमान को पुत्र प्राप्त कराते हैं, जो तेजस्वी, शत्रु संहारक और क्षमतावान् हों । हे मरुतो ! आपसे ही लोग मुष्टि युद्धों में बाहुबल प्राप्त करते हैं और आपसे ही लोग अश्वों के नियन्ता उत्तम वीर पुत्र प्राप्त करते हैं ॥४॥ |
| -पहिये के आरों के सदृश सभी मरुद्गण एक समान दीखते हैं। ये अवर्णनीय मरुद्गण दिवस के सदृश अति महान् तेजों से संयुक्त होकर एक समान प्रकट होते हैं। भूमि-पुत्र ये मरुद्गण समान मास में जन्मे हैं । अतिशय वेगवान् ये मरुद्गण सम्मिलित होकर स्वयं प्रवृत्त होकर वृष्टि आदि कार्यों का सम्पादन करते हैं ॥५॥ |
| हे मरुतो ! जब बिन्दुदार अश्वों और सुदृढ़ चक्रों से योजित रथों द्वारा आप आगमन करते हैं, तब जलराशि क्षुब्ध होकर बरसने लगती है । वनों का नाश होता है और सूर्य रश्मि संयुक्त वर्षणकारी मेघों से आकाश भी भीषण शब्द से गुंजायमान होता है ॥६॥ |
| मरुद्गणों के आगमन से पृथ्वी उर्वरता को प्राप्त होती हैं। पति द्वारा गर्भ की स्थापना करने के समान ये मरुद्गण अपने बल से वृष्टि जल को भूमि में प्रस्थापित करते हैं। ये रुद्रपुत्र मरुद्गण अपने द्रुतगामी अश्वों को रथ के अग्रभाग में नियोजित कर पराक्रमपूर्वक वृष्टि कार्य सम्पादित करते हैं ॥७॥ |
| हे मरुतो ! हमें सुख से परिपूर्ण करें । आप नेतृत्वकर्ता, प्रभूत धन-सम्पन्न, अविनाशी, सत्य ज्ञाता, सत्ययशा, क्रान्तदर्शी, युवा, प्रचण्ड-बलवान् और सर्वत्र स्तुति किये जाने योग्य हैं ॥८॥ |
सूक्त-५९
| हे मरुतो ! अपने कल्याण के लिए विदाता यजमान यजन कर्म प्रारम्भ कर रहा है । हे याजक ! आप प्रकाशक द्युलोक की पूजा करें । हम पृथ्वी माता के लिए स्तोत्रों का गान करते हैं। ये मरुद्गण अपने अश्वों को प्रेरित करते हैं और अन्तरिक्ष में दूर तक गमन करते हैं। वे अपने तेज से मेघों को विद्युत् को विस्तारित करते हैं ॥१॥ |
| जैसे मनुष्यों से पूर्ण नौका नदी के मध्य कम्पित होकर गमन करती है, वैसे इन मरुद्गणों के बल से भयभीत पृथ्वी प्रकम्पित हो उठती है । वे मरुद्गण दूर से दृश्यमान होने पर भी अपनी गतियों से जाने जाते हैं । ये नेतृत्वकर्ता मरुद्गण अन्तरिक्ष के मध्य अधिक हव्यादि ग्रहण करने के लिए यत्न करते हैं ॥२॥ |
| हे मरुतो ! आप गौओं के श्रृंग के सदृश शोभायमान शिरोभूषण धारण करते हैं । तमिस्रा दूर करने वाले सूर्य की रश्मियों के समान आप निज़ किरणें विकीर्ण करते हैं। आप द्रुतगामी अश्वों के सदृश वेगवान् और उत्तम आभा से युक्त होकर दर्शनीय हैं । आप भी मनुष्यों की भाँति यज्ञादि कर्मों के ज्ञाता हैं ॥३॥ |
| हे मरुतो ! आपकी महत्ता की समानता कौन कर सकता है? कौन आपके निमित्त स्तोत्र रचना कर सकता है ? कौन आपके समान पोषण सामर्थ्य से परिपूर्ण हुआ हैं ? हे मरुतो ! जब आप श्रेष्ठ हविदाता यजमान के हविष्यान्न से पूर्ण होते हैं, तब आप वृष्टिपात करके किरण के समान भूमि को प्रकम्पित करते हैं ॥४॥ |
| ये मरुद्गण अश्वों के समान तेजस्वी हैं। ये बन्धु-बान्धवों से प्रीतिपूर्वक संयुक्त हैं। ये विशिष्ट योद्धा वीरों के समान वृष्टि आदि कार्य में प्रकृष्ट युद्ध करने वाले हैं। मनुष्यों के समान ही ये मरुद्गण भली प्रकार प्रवर्द्धमान हैं। वे वृष्टि आदि से सूर्य के तेज़ को भी क्षीण कर देते हैं ॥५॥ |
| उन मरुद्गणों में कोई ज्येष्ठ नहीं है, कोई कनिष्ठ नहीं है और न कोई मध्यम श्रेणी का है । वे सभी समान तेज से युक्त हैं। वे मेघों का भेदन करने वाले हैं। वे सुजन्मा, मातृरूप पृथ्वी के पुत्र और मानवों के हितैषी हैं। वे दीप्तिमान् मरुद्गण हमारे अभिमुख आगमन करें ॥६॥ |
| हे मरुद्गणो ! आप पंक्तिबद्ध होकर उड़ने वाले पक्षियों के समान सम्मिलित होकर बलपूर्वक आकाश की सीमाओं तक और विस्तृत पर्वत शिखरों पर परिगमन करते हैं। आपके अश्च मेघों को खण्ड-खण्ड़ करके वृष्टि पात करते हैं । आपके ये कर्म सभी देवगण और मनुष्यगण जानते हैं ॥७॥ |
| द्युलोक और पृथ्वी हमारे पोषण के लिए संलग्न हों । विविध दान देने वाली देवी उषा हमारे कल्याण के निमित्त यत्न करें ।हे ऋषगण !ये रुद्रपुत्र मरुद्गण आपकी स्तुतियों से प्रसन्न होकर जल की वर्षा करते हैं ॥८॥ |
सूक्त-६०
| हम श्यावाश्व ऋषि इस यज्ञ में भली प्रकार रक्षा करने वाले अग्निदेव की स्तोत्रों से नमनपूर्वक स्तुति करते हैं। वे हम पर प्रसन्न होकर हमारे स्तुति आदि कर्मों को जानें । लक्ष्य तक पहुँचने वाले रथों के समान हम भी स्तोत्रों द्वारा अभीष्ट अन्नादि से अभिपूरित हों । प्रदक्षिणा के साथ हम मरुतों का स्तोत्रपाठ करके प्रवृद्ध हों ॥१॥ |
| हे रुद्रपुत्र मरुतो ! जब आप बिन्दुदार अश्वों से युक्त, प्रसिद्ध और सुखदायक रथों में अधिष्ठित होते हैं, तो आपके भय से वन भी कम्पित होते हैं । मेघों के कम्पन के साथ पृथ्वीं भी कम्पायमान होती है ॥२॥ |
| हे मरुतो ! आपके द्वारा किये गये भीषण शब्द से अत्यन्त पुराने और महान् पर्वत भी भययुक्त होकर कम्पित हो उठते हैं । द्युलोक का शिखर भी प्रकम्पित होता है । हे मरुतो ! विशिष्ट आयुधों को धारण कर जब आप क्रीड़ा करते हैं, तो मेघों के समान सम्मिलित होकर विशेष दौड़ लगाते हैं ॥३॥ |
| धनवान् वर जैसे अपने शरीर को अलंकारों से सुसज्जित करते हैं, वैसे ये मरुद्गण अपनी शोभा के लिए स्वर्ण अलंकारों और उदक से अपने शरीरों को विभूषित करते हैं। ये कल्याणभेद और बलशाली मरुद्गण रथ में संयुक्त बैठकर अपने शरीरों में तेज को धारण करते हैं ॥४॥ |
| इन मरुद्गणों में कोई ज्येष्ठ नहीं है, कोई कनिष्ठ नहीं हैं । ये परस्पर भ्रातृ भाव से संयुक्त रहते हैं । ये सौभाग्य प्राप्ति के लिए सतत प्रवृद्ध होते हैं । नित्य तरुण और उत्तम-कर्मा मरुद्गणों के पिता रुद्र और मातृ स्वरूपा दोहन योग्या पृथ्वी हैं, जो मरुतों के लिए उत्तम दिनों की निर्मात्री हैं ॥५॥ |
| हे सौभाग्यशाली मरुतो ! आप सब द्युलोक के उत्कृष्ट भाग, मध्यम भाग या अधोभाग में अवस्थित होते हैं । हे शत्रु-संहारक मरुतो ( रुद्र रूप मरुतो) ! आप इन तीनों भागों से हमारी रक्षा के निमित्त आगमन करें । हे अग्निदेव ! हमारी आहुतियों को आप जानें ॥६॥ |
| हे सर्वज्ञ मरुतो ! आप और अग्निदेव द्युलोक के उच्चतम स्थान से अधों पर विराजित होकर इसे सोमयाग में आगमन करें । सोमपान से हर्षित होकर हमारे शत्रुओं को प्रकम्पित करें, उनकी हिंसा करें और सोमयाग वाले यज्ञमान के लिए वाञ्छित धन प्रदान करें ॥७॥ |
| हे सम्पूर्ण विश्व के नियन्ता अग्निदेव ! आप अपनी तेजस्वी ज्वालाओं से युक्त होकर अत्यन्त शोभनीय, तेजों से युक्त, गणों का आश्रय लेकर रहने वाले (समूह में रहने वाले) , पवित्रकर्ता, सबके तृप्तिकारक, आयुवर्द्धक मरुद्गणों के साथ सोमपान कर प्रमुदित हों ॥८॥ |
सूक्त-६१
| हे श्रेष्ठ नेतृत्व कर्ता ! आप सब कौन हैं ? जो अतिशय सुदूरवर्ती आकाश प्रदेशों से यहाँ आगमन करते हैं ॥१॥ |
| हे मरुतो ! आपके अश्व कहाँ हैं ? उनके लगाम कहाँ हैं? कैसे गमन में समर्थ होते हैं? कैसे गमन करते हैं ? उनकी पीठ पर की जीन और नथुने में डाली जाने वाली रस्सी कहाँ स्थित है ? ॥२॥ |
| अश्व नियामक मरुद्गण जब इन घोड़ों की जाँघों पर चाबुक लगाते हैं, तो घोड़े अपनी जाँघों को प्रसूति के समय नारियों की भाँति फैला लेते (गतिशील हो जाते हैं ॥३॥ |
| हे वीर मरुद्गणो ! आप मनुष्यों के हितैषी, कल्याणरूप जन्म वाले, अग्नि में तपाये गये के सदृश तेजोमय हैं। आप जैसे स्थित हैं, वैसे ही हमारे अभिमुख आगमन करें ॥४॥ |
| श्यावाश्व के द्वारा स्तुत उन वीरों (मरुद्गणों) के अभिवादन के लिए उन तरन्त महिषी शशीयसी देवी ने अपनी दोनों भुजाओं को फैलाया । उस देवी ने (मुझ श्यावाश्व को) अश्व, गौ और सौ भेड़े (अवि) प्रदान कीं ॥५॥ |
| जो पुरुष देव की उपासना नहीं करता है, धनादि दान नहीं करता है, उसकी अपेक्षा स्त्री शशीयसी सब प्रकार से श्रेष्ठ है ॥६॥ |
| वे शशीयसी देवी प्रताड़ितों को जानती हैं, प्यासों को भी जानती हैं, धन की कामना वालों को जानती हैं और वे चिरन्तन देव पूजा में अपने चित्त को लगाती हैं ॥७॥ |
| उन शशीयसी के अर्धाग पुरुष तरत की स्तुति करके भी हम कहते हैं कि स्तुति ठीक प्रकार नहीं हुई, क्योंकि दान के क्रम में वे सदैव समान हैं ॥८॥ |
| सर्वदा प्रमुदित रहने वाली युवती शशीयसी ने श्यावाश्व का मार्ग प्रदर्शित किया था। उनके रोहित वर्णवाले अश्व उन्हें बहुप्रशंसित, महान् यशस्वी विप्र के मार्ग की ओर वहन करते हैं ॥९॥ |
| विददश्व के पुत्र ने भी हमें तरन्त के समान सौं गाय और तेजस्वी धन प्रदान किया ॥१०॥ |
| वे मरुद्गण द्रुतगामी अश्वों पर अधिष्ठित होकर अत्यन्त हर्षप्रद मधुर सोमपान करने के निमित्त आते हैं। और हमें विपुल अन्न प्रदान करते हैं ॥११॥ |
| जिन मरुतों की शोभा से द्यावा-पृथिवी भी परिव्याप्त होती हैं । वे मरुद्गण ऊपर आकाश में प्रकाशमान सूर्यदेव के सदृश रथों में विशिष्ट आभा विस्तारित करते हैं ॥१२॥ |
| यह मरुद्गणों का समुदाय सदा तरुण और अनिन्दनीय हैं । ये तेजस्वी रथ में विराजित होकर वृष्टि आदि शुभ कार्य के निमित्त अबाधगति से गमन करते हैं ॥१३॥ |
| यज्ञादि कर्मों से उत्पन्न हुए ये मरुद्गण शत्रुओं को कॅपाने वाले और पाप रहित हैं। ये जहाँ हर्षित होते हैं, उस स्थान को कौन जानता है ? ॥१४॥ |
| हे स्तुतियोग्य मरुतो ! आप मनुष्यों के प्रकृष्ट नियन्ता हैं । उनके बुद्धिपूर्वक किये गये आवाहन को सुनकर आप शीघ्र आगमन करते हैं ॥१५॥ |
| विविध प्रकाशक धनों के स्वामी, शत्रुसंहारक, पूजनीय हे मरुतो ! हमें वाञ्छित धनादि प्रदान करें ॥१६॥ |
| हे रात्रिदेवि ! हमारे इन स्तोत्ररूप वाणियों को उन मरुद्गणों के निमित्त उसी प्रकार वहन करें, जैसे कोई रथी अपने गन्तव्य स्थान तक जाते हैं ॥१७॥ |
| हे रात्रि देवि ! रथवीति द्वारा सम्पादित सोमयाग में हमारी कामनाएँ विफल नहीं हुईं, ऐसे मेरे वचन उनसे कहें ॥१८॥ |
| यह धनवान् रथवीति गोमती नदी के किनारे निवास करते हैं और पर्वतों में भी उनका निवास है ॥१९॥ |
सूक्त-६२
| हे मित्रावरुण ! आप सबके अटल आश्रय स्थान हैं, जहाँ सूर्यदेव के अश्वों (रश्मियों) को विमुक्त किया जाता हैं । सूर्यदेव का ऊत (सत्य) रूप, ऋत (यज्ञ) से हुँका हुआ है । वहाँ सहस्र संख्यक अश्व (रश्मियाँ) स्थित हैं। उन सुन्दर रूपवान् देवों के श्रेष्ठ सौन्दर्य का दर्शन हमने किया है ॥१॥ |
| हे मित्र ! हे वरुण ! आप दोनों का महत्त्व बहुत विख्यात है । आप में से एक सतत परिभ्रमणशील सूर्यदेव के साथ दिन में स्थावर का रस दोहन करते हैं । आप स्वयं भ्रमणशील सूर्यदेव की सम्पूर्ण दीप्तियों को प्रवर्धित करते हैं। आपमें से एक का चक्र सर्वत्र गतिशील रहता है ॥२॥ |
| हे दीप्तिमान् मित्रावरुण ! आप अपने तेजों से द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं। हे शीघ्र दानकर्तादव !. आप ओषधियों को प्रवर्धित करते हैं और गौओं को पुष्ट करते हैं। आपने हमारे निमित्त वृष्टि को प्रवाहित किया है ॥३॥ |
| हे मित्रावरुणदेवो ! उत्तम प्रकार से प्रयोजित अश्व आप दोनों को वहन करें । सारथी लगाम से उन्हें नियन्त्रित करें । यज्ञ में घृतधारा के प्रवाहित होने के समान आपके द्वारा द्युलोक से नदियाँ प्रवाहित होती हैं ॥४॥ |
| हे बलसम्पन्न मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों शरीर की कान्ति को और भी प्रवर्धित करते हैं । यजुर्वेद के मंत्रों से जैसे यज्ञों की रक्षा होती हैं, उसी प्रकार आप पृथ्वी की रक्षा करें । हे अन्नवान् ! आप दोनों रथ पर विराजित होकर हमारे यज्ञ स्थान के मध्य आकर अधिष्ठित हों ॥५॥ |
| है मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों सिद्धहस्त, अदृश्य रक्षक और हिंसा न करने वाले हैं। हे तेजस्वीदेवो ! आप दोनों जिस उत्तमकर्मा यजमान के यज्ञों में उसकी रक्षा करते हैं, उसे धनादि से पूर्ण सहस्र स्तंभोंयुक्त गृह भी प्रदान करते हैं ॥६॥ |
| इन मित्र और वरुणदेवों का रथ स्वर्णमय है, इनके स्तम्भ भी स्वर्णिम हैं । इससे यह रथ आकाश में विद्युत् के सदृश विशिष्ट आभा विकीर्ण करता है । इस (रथ) के कल्याणकारी स्थान में अवस्थित यह रस पात्र, रस से भरा है । हम इस रथ में रखे मधुर रस को प्राप्त करें ॥७॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप उषा के प्रकाशित होने तथा सूर्यदेव के उदित होने पर स्वर्णिम स्तम्भों वाले रथ पर आरोहण करते हैं और उस रथं से आप पृथ्वी और पृथ्वी के प्राणियों को देखते हैं ॥८॥ |
| हे उत्तम दानशील, लोकरक्षक मित्र और वरुणदेवो ! आपका जो घर अत्यन्त विशाल, आघातों से मुक्त और अखण्डित है, उसी घर से हमारी रक्षा करें । हम अभीष्ट धन प्राप्त करें और शत्रुजेता हों ॥९॥ |
सूक्त-६३
| हे जल-रक्षक, सत्य-धर्मपालक मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों हमारे यज्ञ में आने के लिए परम आकाश में रथ पर अधिष्ठित होते हैं। आप दोनों इस यज्ञ में जिस यजमान की रक्षा करते हैं, उसे आकाश से मधुर जल की वृष्टि कर पुष्ट करते हैं ॥१॥ |
| हे स्वर्ग के द्रष्टा मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों इस लोक के सम्राट् हैं। आप यज्ञ में दीप्तिमान् होते हैं। हम आप दोनों से अनुकूल वृष्टि, ऐश्वर्य और अमरता की याचना करते हैं। आपकी प्रकाशमान किरणे आकाश और पृथ्वी में विचरण करती हैं ॥२॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों अत्यन्त प्रकाशमान, उग्र बल-सम्पन्न और वृष्टिकर्ता हैं । आप द्युलोक और पृथ्वीलोक के अधिपति और विशिष्ट द्रष्टारूप हैं । आप विलक्षण मेघों के साथ गर्जनशील होकर अधिष्ठित हैं । अपने भयंकर बल से कुशलतापूर्वक आप द्युलोक से वृष्टि करते हैं ॥३॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों की माया (सामर्थ्य) द्युलोक में आश्रित है, जिससे सूर्यदेव का विलक्षण आयुधरूप प्रकाश सर्वत्र विचरता हैं । तब आप दोनों उन सूर्यदेव को वर्षणशील मेघों से आच्छादित करते हैं । हे पर्जन्य ! इन देवों से प्रेरित होकर आपसे मधुर जल राशि क्षरित होती हैं ॥४॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! युद्धों में जाने की अभिलाषा वाले वीर जैसे अपने रथ को सुसज्जित करते हैं, उसी प्रकार मरुद्गण आपसे प्रेरित होकर वृष्टि के लिए सुखकर रथ को नियोजित करते हैं। आकाश-निवासक वे मेरुद्गण विविध लोकों में वृष्टि के लिए विचरते हैं । हे अत्यन्त प्रकाशक देवो ! मरुतों के सहयोग से आप उत्तम जल वृष्टि से हमें सिञ्चित करें ॥५॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आपके द्वारा मेघ अन्नोत्पादक, तेजोमयी, विचित्र गर्जनायुक्त वाणी कहता है । ये मरुद्गण अपनी सामर्थ्य से मेघों को भली प्रकार विस्तारित करते हैं। आप दोनों अरुणिम वर्ण और निर्मल आकाश से वृष्टि करते हैं ॥६॥ |
| हे मेधावान् मित्रावरुण देवो ! आप दोनों जगत्-कल्याणकारी वृष्टि आदि कर्मों से यज्ञादि व्रतों की रक्षा करते हैं। जल वर्षक मेघों की सामर्थ्य द्वारा आप यज्ञों से सम्पूर्ण लोकों को विशेष प्रकाशित करते हैं। आप पूजनीय और वेगवान् सूर्यदेव को द्युलोक में स्थापित करते हैं ॥७॥ |
सूक्त-६४
| जिस प्रकार गौएँ अपने गोचर स्थान में जाती हैं, उसी प्रकार सर्वत्र गमनशील, मित्र और वरुणदेवों को हम ऋचाओं से आवाहित करते हैं। ये मित्र और वरुणदेव अपनी सामर्थ्य से सर्वत्र गमन करते हैं। ये स्वर्णधन देने वाले और शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं ॥१॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! म उत्साहपूर्ण मन से आपका पूजन करते हैं । हम पूजकों को आप दोनों हाथ फेलाकर (उदारतापूर्वक) प्रशंसित सुख प्रदान करें । हम आपकी प्रशस्ति का गान सभी लोकों में करें ॥२॥ |
| हम मित्रदेव के पथों का अनुगमन करते हुए निश्चित गति प्राप्त करें । हमारे प्रिय और अहिंसक मित्रदेव के सुख हमें प्राप्त हों ॥३॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! हम आपके उस धन को धारण करें, जो धनिक स्तोताओं के घर में परस्पर स्पर्धा का कारण बनता हो ॥४॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों उत्तम तेजों से युक्त होकर हमारे घर आगमन करें । आप निश्चित ही आये और धनिक मित्रों को समृद्धियुक्त करें ॥५॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप यज्ञों में जो अति व्यापक बल धारण करते हैं, उस बल से हमारे अन्न, धन और कल्याण में वृद्धि करें ॥६॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवों ! आप नेतृत्वकर्ता और पूजनीय हैं । उषाकाल में स्वर्णिम रश्मियों के प्रकाशित होने पर उपासकों को दोनों हाथों में धनादि धारण कराते हैं । यज्ञ में हमारे द्वारा अभिषुत सोम को ग्रहण करने के लिए आप शकटरूपी हाथों और चक्ररूपी पैरों वाले रथों से दौड़ते हुए आयें ॥७॥ |
सूक्त-६५
| जो स्तोता देवों के मध्य में इन मित्र और वरुणदेवों की स्तुति जानता है और उत्तम कर्म करते हुए स्तुतियाँ करता है, ये देवगण उनकी स्तुतियाँ ग्रहण करते हैं। वे स्तोतागण हमें उपदेश करें ॥१॥ |
| ये मित्र और वरुणदेव प्रभूत तेज-सम्पन्न, अधिष्ठातारूप और दूरस्थ प्रदेशों से भी आवाहन को सुनने वाले हैं । ये सत्यशील यजमानों के अधिपति, यज्ञ को बढ़ाने वाले और प्रत्येक मनुष्य में सत्य के स्थापनकर्ता हैं ॥२॥ |
| पुरातन, उत्तम ज्ञान सम्पन्न हे मित्रावरुणदेवो ! हम आपके सम्मुख उपस्थित होकर अपनी रक्षा के लिए आपकी स्तुतियाँ करते हैं। उत्तम अश्वों के स्वामी हम अन्नों के दान के लिए आपकी प्रकृष्ट स्तुति करते हैं ॥३॥ |
| मित्रदेव पापी स्तोता को भी संरक्षण के लिए महान् आश्रय प्राप्ति का उपाय बताते हैं । हिंसक भक्त के लिए भी मित्रदेव की उत्तम बुद्धि रहती है ॥४॥ |
| हम मित्रदेव के अत्यन्त व्यापक संरक्षण में स्थित हों । वरुणदेव के सन्तानरूप हम लोग आप से रक्षित होकर तथा निष्पाप होकर संयुक्तरूप से रहें ॥५॥ |
| हे मित्रावरुण देवो ! जो मनुष्य आप दोनों का स्तवन करते हैं, उन्हें आप उत्तम मार्ग से ले जाते हैं। हे ऐश्वर्यशालीदेवो ! हम यजमानों का त्याग न करें, ऋषियों की संतानों का त्याग न करें । सोमदेव यज्ञादि कार्य में हमारी रक्षा करें ॥६॥ |
सूक्त-६६
| हे ज्ञान-सम्पन्न मनुष्य ! आप शत्रुओं के हिंसक और उत्तम कर्म करने वाले दोनों देवों मित्र और वरुण को आवाहित करें । उदकरूप वाले, अन्न-उत्पादक, महान् वरुणदेव के लिए जल प्रदान करें ॥१॥ |
| आप दोनों देवों का बल सज्जनों के लिए अहिंसक और असुरों के लिए विनाशक है । आप दोनों सम्पूर्ण बलों के अधिष्ठाता हैं। जैसे मनुष्यों में कर्म-सामर्थ्य और सूर्यदेव में प्रकाश स्थापित होकर दर्शनीय होता है, उसी प्रकार आप में बल स्थापित होकर दर्शनीय होता है ॥२॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों रातहव्ये (हव्य प्रदाता) की उत्तम स्तुतियों से स्तुत होते हैं और आवाहित होने पर अत्यन्त विस्तृत मार्गों से भी गमन करते हैं ॥३॥ |
| हे अद्भुत कार्य करने वाले, बेल-सम्पन्न मित्र और वरुणदेवो ! हम कुशल साधकों की स्तुतियों से आप दोनों प्रशंसित होते हैं । आप दोनों अनुकूल मन से यजमानों के स्तोत्रों को जानें ॥४॥ |
| हे पृथिवीदेवि ! हम ऋषियों की, अन्न की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए आप विपुल जल-राशि से परिपूर्ण हैं । ये मित्र और वरुणदेव अपने गमनशील साधनों से वह विपुल जल-वर्षण करते हैं ॥५॥ |
| हे दूरद्रष्टा मित्र और वरुणदेवों ! हम स्तोताजन आप दोनों का आवाहन करते हैं, जिससे हम आपके अत्यन्त विस्तीर्ण और बहुतों द्वारा संरक्षित राज्य में आवागमन करें ॥६॥ |
सूक्त-६७
| हे दीप्तिमान् आदित्य पुत्र मित्र, वरुण और अर्यमादेवो ! आप निश्चय ही अपराजेय, पूजनीय और अत्यन्त महान् बल को धारण करते हैं ॥१॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! जब आप अत्यन्त रमणीय यज्ञभूमि में आकर अधिष्ठित होते हैं, तब हमें सुख प्रदान करें ॥२॥ |
| सर्वज्ञाता वरुण, मित्र और अर्यमा-ये सभी देव हमारे यज्ञों में अपने स्थान के अनुरूप सुशोभित होते हैं और हिंसकों से मनुष्यों की रक्षा करते हैं ॥३॥ |
| वे देवगण (वरुण, मित्र और अर्यमा) सत्यस्वरूपवान्, यज्ञ-व्रतावलम्बी और यज्ञ-रक्षक हैं । वे प्रत्येक यजमान । को सत्पथ पर प्रेरित करने वाले और उत्तम-दानशील हैं । वे वरुणादि देवगण पापी स्तोताओं को भी (शुद्ध करके) ऐश्वर्य देने वाले हैं ॥४॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों के मध्य ऐसे कौन हैं, जो मनुष्यों में स्तुत नहीं होते ? हमारी बुद्धि आपकी स्तुति में नियोजित होती है। अत्रि वंशजों की बुद्धि भी अपकी स्तुति में नियोजित होती है ॥५॥ |
सूक्त-६८
| हे मंत्विजो ! आप मित्र और वरुणदेव हेतु तेज ध्वनि से गायन करें । महानतायुक्त, क्षात्रबल से सम्पन्न वे दोनों यज्ञ-स्थल पर विस्तृत स्तोत्रगान-श्रवण हेतु उपस्थित हों ॥१॥ |
| तेजस्विता के उत्पत्ति केन्द्र, मित्र और वरुण दोनों अधिपतियों की देवगणों के बीच प्रशंसा होती है ॥२॥ |
| देवताओं में प्रसिद्ध, पराक्रमी, हे मित्र और वरुणदेवो ! आप हमें पृथ्वी एवं द्युलोक की अपार वैभव प्रदान करें, हम आपका स्तवन करते हैं ॥३॥ |
| सत्य से सत्य का पालन करने वाले अभीष्ट बल प्राप्त करते हैं । द्रोह न करने वाले मित्र और वरुणदेव अपनी सामर्थ्य से वृद्धि पाते हैं ॥४॥ |
| वर्षा के लिए जिनकी वंदना की जाती हैं, नियमानुसार सब कुछ प्राप्त करने वाले, दान की प्रवृत्ति वाले, अन्नों के अधिपति वे मित्र और वरुणदेव श्रेष्ठ स्थान में प्रतिष्ठित हैं ॥५॥ |
सूक्त-६९
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप तीन विशिष्ट तेजों, तीन द्युलोकों और तीन अन्तरिक्ष लोकों को धारण करते हैं । आप दोनों, क्षत्रियों की सामर्थ्य को प्रवर्द्धत करते हैं और अक्षय कर्मों की रक्षा करते हैं ॥१॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों की अनुकम्पा से गौएँ दुधारू होती हैं और नदियाँ मधुर जल का दोहन करती हैं । आप दोनों के साथ संयुक्त होकर जल-वर्षक, उदक-धारक और दीप्तिमान् तीन देव (अग्नि, वायु और आदित्य), तीन लोकों (पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक) के अधिपति रूप में स्थित हैं ॥२॥ |
| हम प्रात: सवन में देवी अदिति का आवाहन करते हैं और माध्यन्दिन सवन में सूर्यदेव का स्तवन करते हैं । हे मित्रावरुण देवो !हम धन-प्राप्ति के लिए, पुत्र और पौत्रों के कल्याण के लिए यज्ञ में आपकी स्तुति करते हैं ॥३॥ |
| हे आदित्य-पुत्र मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों द्युलोक और तेजस्वी पृथ्वीलोक को धारण करने वाले हैं । आप दोनों के अटल नियमों की अवहेलना इन्द्रादि अमरदेव भी नहीं करते हैं ॥४॥ |
सूक्त-७०
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों के पास प्रचुर मात्रा में उपयोगी साधन उपलब्ध हैं । आपकी श्रेष्ठ बुद्धि की अनुकूलता हमें सदैव प्राप्त होती रहे ॥१॥ |
| द्वेष न करने वाले आप दोनों (मित्र और वरुण) की हम भली-भाँति वन्दना करते हैं। हमें आपकी मित्रता का लाभ मिले तथा धन-धाम की प्राप्ति हो ॥२॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! श्रेष्ठ संरक्षक के रूप में अपने साधनों से हमारी संरक्षण एवं पालन करें । उस सामर्थ्य के बल पर हम भी शत्रुओं को पराजित कर सके ॥३॥ |
| हे अद्भुतकर्मा मित्र और वरुणदेवो ! हम अपने शरीर द्वारा किसी अन्य के धन का उपभोग न करें। अपने सम्बन्धियों द्वारा भी किसी अन्य के धन का उपभोग न करें ॥४॥ |
सूक्त-७१
| हे मित्र और वरुणदेवो ! आप दोनों शत्रु-हिंसक और शत्रु-नाशक हैं। आप दोनों हमारे अत्यन्त निर्मल यज्ञ में पधारने की कृपा करें ॥१॥ |
| हे प्रकृष्ट ज्ञानसम्पन्न मित्र और वरुणदेवो ! आप सम्पूर्ण विश्व के प्रशासक हैं और सब पर प्रभुत्व रखने वाले हैं । आप हमारी अभिलषित बुद्धि को तृप्त करें ॥२॥ |
| हे मित्र और वरुणदेवो ! हम अभिषुत-सोम युक्त हव्यादि देने वाले हैं। आप हमारे द्वारा अभिषुत सोम का पान करने के लिए हमारे पास आगमन करें ॥३॥ |
सूक्त-७२
| अत्रि वंशजों की तरह हम भी मित्र और वरुणदेवों का स्तुतियों द्वारा आवाहन करते हैं । हे देवो ! सोमपान के निमित्त कुशाओं पर अधिष्ठित हों ॥१॥ |
| हे शत्रुविनाशक मित्र और वरुणदेवो ! आप अपने धर्मयुक्त नियमों के कारण अटल-आश्रय में स्थित हैं । आप सोमपान के निमित्त कुश के आसन पर अधिष्ठित हों ॥२॥ |
| हे मित्रावरुणो !हमारे यज्ञ को स्वेच्छापूर्वक ग्रहण करें । आप सोमपान के निमित्त कुशाओं पर आसीन हों ॥३॥ |
सूक्त-७३
| हे अनेक स्थानों (यज्ञो) में भोज्य पदार्थ पाने वाले अश्विनीकुमारो ! आप दूरस्थ देश में हो अथवा निकटवर्ती बहुत प्रदेशों में हों अथवा अन्तरिक्ष में हों, आप जहाँ भी हों, उन स्थानों से हमारे पास पधारें ॥१॥ |
| इन अश्विनीकुमारों का सम्बन्ध अनेक यजमानों से है, जो विविध रूपों को धारण करने वाले और वरणीय हैं । ये अबाधित गति वाले और सर्वोत्कृष्ट बलों वाले हैं। इन्हें उत्तम आहुतियों के निमित्त हम आवाहित करते हैं ॥२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने रथ के एक चक्र को सूर्य की शोभा बढ़ाने के लिए नियमित किया तथा अन्य (दूसरे) चक्र से मनुष्यों के युगों (काल) को प्रकट करने के लिए आप सब ओर विचरते हैं ॥३॥ |
| हे सर्वत्र व्याप्त अश्विनीकुमारो !हम जिन स्तोत्रों द्वारा आप दोनों के अनुकूल स्तुति करते हैं, वे भली प्रकार सम्पादित हों । हे निष्पाप और विभिन्न कर्मों के लिए प्रसिद्ध देवो !आप हमारे साथ बन्धुभाव में ही संयुक्त हों ॥४॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! जब आप दोनों के रथ पर सूर्या (उषा) आरोहित होती हैं, तब अत्यन्त दीप्त अरुणिम रश्मियाँ आपको चारों ओर से घेर लेती हैं ॥५॥ |
| हे नेतृत्ववान् अश्विनीकुमारो ! अत्रि ऋषि ने जब आप दोनों की स्तुति करते हुए अग्नि के सुखप्रद रूप को जाना था, तब उन्होंने कृतज्ञ चित्त से आपका स्मरण किया था ॥६॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप जब गमन करते हैं, तो आपके सुदृढ़, ऊँचे, सतत गमनशील रथ का शब्द सुनायी पड़ता है, तब अत्रि ऋषि अपने कार्यों से आप दोनों को आकृष्ट करते हैं ॥७॥ |
| हे मधु मिश्रित करने वाले रुद्रपुत्र अश्विनीकुमारो ! हमारी सुमधुर स्तुतियाँ आपमें मधुरता का सिंचन करती हैं। आप दोनों अन्तरिक्ष की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं और पके हुए हविष्यान्नों से परिपूर्ण होते हैं ॥८॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! विद्वज्जन आप दोनों को अत्यन्त सुखदायक बताते हैं, वह (कथन) निश्चय ही सत्य है। यज्ञ में आगमन के निमित्त आप आवाहित होते हैं, अतएव यहाँ आगमन कर हमारे निमित्त सुखप्रदायक हों ॥९॥ |
| रथों के समान निर्मित ये मन्त्रादि स्तोत्र अश्विनीकुमारों के निमित्त विरचित किये गये हैं। ये स्तोत्र उनके निमित्त सुखकारी और प्रीतिवर्द्धक हों । नमनयुक्त स्तोत्र भी उनके निमित्त निवेदित हैं ॥१०॥ |
सूक्त-७४
| हे उत्कृष्ट मन-सम्पन्न अश्विनीकुमारो ! आप दोनों द्युलोक से आगमन कर यज्ञ-भूमि पर स्थित हों । हे धनवर्षक देवो ! आप अत्रि ऋषि के उन स्तोत्रों का श्रवण करें, जो आपके निमित्त निवेदित किये गये हैं ॥१॥ |
| हे असत्यरहित दीप्तिमान् अश्विनीकुमारो ! आप दोनों कहाँ हैं? द्युलोक में किस स्थान में आप सुने जाते हैं ? किस यजमान के गृह आप आगमन करते हैं ? तथा किस स्तोता की स्तुतियों के साथ आप संयुक्त होते हैं ?॥२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप किस यजमान के लिए गमन करते हैं? किसके पास संयुक्त होते हैं ? किसके अभिमुख गमन करने के लिए रथ नियोजित करते हैं ? किसके स्तोत्रों से प्रसन्नचित्त होते हैं? हम आप दोनों की प्राप्ति की कामना करते हैं ॥३॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप पौर ष के लिए जलयुक्त मेघों को प्रेरित करें । जैसे वन में व्याध सिंह के प्रताड़ित करता है, वैसे आप इन मेघों को प्रताड़ित करें ॥४॥ |
| हे अश्विनीकमारो ! आपने ज्ञराजीर्ण हुए च्यवन ऋषि की कुरूपता को कवच के सदृश उतार दिया और उन्हें पुनः युवक रूप बना दिया, तब वे वधू के द्वारा कामना योग्य सुन्दर रूप से युक्त हुए ॥५॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आपके स्तोतागण इस यज्ञ-स्थल में विद्यमान हैं। इस समृद्धि के लिए आपके दृष्टि क्षेत्र में अविस्थत हों । हे सेनारूप धनों से युक्त अश्विनीकुमारो ! हमारी पुकार सुनें । अपने संरक्षण साधनों के साथ यहाँ आगमन करें ॥६॥ |
| हे ज्ञानियों द्वारा वन्दनीय और विपुल सेनारूप धन वाले अश्विनीकुमारो ! अनेकों प्रजाओं में से कौन ज्ञानी आपको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करता है ? कौन यजमान आपको यज्ञों द्वारा सम्यक् रूप से तृप्त करता है? ॥७॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! अन्य देवों के रथों के मध्य सर्वाधिक वेगवान आपका रथ इधर आगमन करे । मानवों में हमारी कामना करने वाला, अनेकों शत्रुओं का संहार और यजमानों द्वारा प्रशंसित यह रथ इधर आगमन करे ॥८॥ |
| हे मधुयुक्त अश्विनीकुमारो ! आपके निमित्त निवेदित स्तोत्र हमारे लिए सुखदायक हों । हे विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न देवो ! श्येन पक्षी के समान वेगवान् अश्वों से हमारे सम्मुख आगमन करें ॥९॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! हमारे आवाहन का श्रवण करें । चाहे जहाँ आप स्थित हों, सुनें । हम यज्ञ में आपके निमित्त उत्तम अन्नों को भली प्रकार मिश्रित कर हविरूप प्रशंसित भोज्य-पदार्थ निवेदित करते हैं ॥१०॥ |
सूक्त-७५
| हे अश्विनीकुमारो ! आपके अत्यन्त प्रिय बलयुक्त, धनवाहक रथ को स्तोता ऋषि अपने स्तोत्रों से विभूषित करते हैं। हे मधुविद्या के ज्ञाताओ ! आप हमारे आवाहन का श्रवण करें ॥१॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप अन्यों को लाँघकर हमारे निकट आएँ । हम अपने शत्रुओं पर विजय पाने में सफल हों । शत्रुनाशक, स्वर्ण रथयुक्त, उत्तम धनसम्पन्न, नदियों की भाँति प्रवहमान, हे मधुविद्याविद् ! आप हमारे आवाहन का श्रवण करें ॥२॥ |
| स्वर्णरथी, शत्रु उत्पीड़क, रत्नधारक, धन-धान्ययुक्त, यज्ञप्रेमी हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे यज्ञ में आकर प्रतिष्ठित हों । हे मधु विद्याविशारद ! आप हमारे आवाहन को श्रवण करें ॥३॥ |
| हे धनवर्षक अश्विनीकुमारो ! हम स्तोताजन आप दोनों की उत्तम स्तुति करते हैं। अपनी वाणी (मंत्रशक्ति) को आपके रथ में स्थापित किया हैं । आपका महान् अन्वेषक (साधक-याजक) आपके निमित्त हविष्यान्न तैयार करता हैं । हे मधुविद्याविद् देवो ! आप हमारे आवाहन को सुनें ॥४॥ |
| हे अश्विनीदेवो ! आप दोनों द्रुतगामी रथ पर आरूढ़ रहने वाले, बोधयुक्त मन वाले एवं स्तुतियाँ सुनने वाले हैं। आप निश्छल मन वाले च्यवन ऋषि के समीप अश्वों से पहुँचे थे । हे मधुविद्या के ज्ञातादेवो ! आप हमारे आवाहन को सुनें ॥५॥ |
| हे नेतृत्वकर्ता अश्विनीकुमारो ! मन के संकेत मात्र से योजित होने वाले, बिन्दुदार चिह्नों वाले, वेगवान् अश्व आप दोनों को सोमपान के निमित्त सम्पूर्ण सुखों के साथ हमारी ओर लायें । हे मधुविद्याविशारद देवो ! आप दोनों हमारा आवाहन सुनें ॥६॥ |
| हे अडिग, असत्यरहित अश्विनीकुमारों ! आप दोनों हमारे अभिमुख आगमन करें । हमारा निवेदन अस्वीकार न करें । हे सर्वदा विजयशील देवो ! आप दोनों अत्यन्त दूरस्थ प्रदेश से भी हमारे यज्ञगृह में आगमन करें । हे मधुविद्या के ज्ञाता देवो! आप दोनों हमारा आवाहन सुनें ॥७॥ |
| हे शुभ कर्मों के पालक, अडिग, अश्विनीकुमारो ! इस यज्ञ में आप दोनों, स्तुति करने वाले अवस्यु के समीप जाकर उन्हें आप दोनों विभूषित करें । हे मधुविद्याविद् देवो ! आप दोनों हमारा आवाहन सुनें ॥८॥ |
| हे धनवर्षक, शत्रुनाशक, अश्विनीकुमारो ! उषा प्रकाशित हुई है । ऋतु के अनुरूप तेजस्वी किरणों वाले अग्निदेव वेदी पर पूर्णतया संस्थापित हुए हैं । आपका अनश्वर रथ योजित किया गया है । हे मधु विद्याविद् देवो ! आप दोनों हमारा आवाहन सुनें ॥९॥ |
सूक्त-७६
| उषा के मुखरूप ये अग्निदेव दीप्तिमान् हो गये हैं (उषाकाल में अग्निहोत्र प्रारंभ हो गया हैं) तथा दिव्य स्तुतियाँ भी प्रारंभ हो गयी हैं। हे रथ में विराजित अश्विनीकुमारो ! हमें दर्शन देकर यज्ञ में पीने योग्य सोम के समीप उपस्थित होने की कृपा करें ॥१॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप संस्कारितों (प्राणियों, पदार्थों, क्रियाओं) को क्षति नहीं पहुँचाते हैं। इस यज्ञ में उपस्थित होने वाले, आपके निमित्त स्तुति की जाती हैं । दिन के प्रारंभ होते ही हुव्य पदार्थ लेकर आते हुए विदाता (याजक) को आप सुख प्रदान करने वाले हैं ॥२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! दिन में गाय दुहने (सायं गोधूलि वेला) के समय, प्रात: सूर्योदय के समय, मध्याह्न काले में, दिन के प्रखर रूप (अपराह्न काल) में अर्थात् सम्पूर्ण दिन-रात्रि में हमेशा सुखदायी, रक्षा करने के साधनों सहित पधारें । अभी सोमपान की क्रिया प्रारंभ नहीं हुई हैं। अत: आप शीघ्र पधारें ॥३॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के लिए यह उत्तर वेदी आपका पुरातन निवास योग्य स्थान है। ये सम्पूर्ण गृह और आश्रय-स्थान भी आपके ही हैं। आप उदक पूर्ण मेघों द्वारा अन्तरिक्ष से हमारे निमित्त अन्न और बल वहन करके यहाँ आएँ ॥४॥ |
| हम सब अश्विनीकुमारों के नूतन संरक्षण-सामथ्र्यो, सुखदायक अनुग्रहों और उत्तम नेतृत्व से संयुक्त हों । हे अविनाशी अश्विनीकुमारो ! हमारे निमित्त सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण सौभाग्य और वीर पुत्रों को प्रदान करें ॥५॥ |
सूक्त-७७
| हे ऋत्विजो ! प्रात: काल में सब देवों से पहले आने वाले अश्विनीकुमारों का आप पूजन करें। वे अदानशील और लोभी (राक्षसों) से पूर्व ही आकर सोमपान करते हैं। वे प्रातः यज्ञ को सम्यक् रूप से धारण करते हैं । पूर्वकालीन ऋषिगण उनकी प्रशंसा करते हैं ॥१॥ |
| है ऋत्विजो ! अश्विनीकुमारों के लिए प्रातः काल यजन करें। उन्हें हव्यादि प्रदान करें । सायंकालीन प्रदत्त हव्य देवों को सेवनीय नहीं होता। वह देवों के पास गमन करने वाला नहीं होता हुमसे अन्य जो कोई पूर्व में यजन करता है, वह सब देवों को तृप्त करता है । हमसे पहले जो यजन करने वाला होता है, वह देवों के लिए विशिष्ट प्रीतिकारक होता है ॥२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों का स्वर्ण से आच्छादित, मनोहरवर्ण, जलवर्षक, अन्नधारक, मन के तुल्य वेगवान्, वायु के सदृश गमनशील रथ हमारी ओर आगमन करता है । आप उस रथ द्वारा सम्पूर्ण बाधाओं का अतिक्रमण करते हुए आगमन करें ॥३॥ |
| ज़ों यजमान यज्ञ में हविर्विभाग करने के समय अश्विनीकुमारों को विपुल हव्यादि प्रदान करता है; वह अपने पुत्रों का शुभ कर्मों से पालन करता है । जो यज्ञादि कर्मों के निमित्त अग्नि उद्दीप्त नहीं करता; वह सर्बदा हिसित होता है ॥४॥ |
| हम सब अश्विनीकुमारों के नूतन संरक्षण सामथ्र्यो, सुखदायक अनुग्रहों और उत्तम नेतृत्व से संयुक्त हों । हे अविनाशी अश्विनीकुमारो ! हमारे निमित्त आप सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण सौभाग्य और वीर पुत्रों को प्रदान करें ॥५॥ |
सूक्त-७८
| हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे यज्ञ में पधारें । जैसे दो धवल हंस जल की ओर जाते हैं, वैसे आप दोनों सोम के निकट आएँ ॥१॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! जैसे हरिण और गौर मृग तृणादि के प्रति दौड़ते हैं और हंस जैसे उदक के प्रति अवतीर्ण होते हैं, उसी प्रकार आप दोनों अभिषुत सोम के निकट अवतीर्ण हों ॥२॥ |
| हे सेना एवं धन रखने वाले अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमारे इष्ट सिद्धि के लिए यज्ञ को ग्रहण करें । जैसे हंस उदक के प्रति अवतीर्ण होते हैं, उसी प्रकार आप दोनों अभिषुत सोम के निकट अवतीर्ण हों ॥३॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! निवेदन करती हुई स्त्री के समान अत्रि ऋषि ने गहन तमिस्रा से व्याप्त लोक से मुक्ति के लिए आपका आवाहन किया था। तब आप अपने सुखकारों और नूतन रथ से श्येन पक्षी के सदृश वेगपूर्वक आये थे ॥४॥ |
| हे वनस्पतिदेव ! आप प्रसवोन्मुख योनि की भाँति विस्तृत (नव जीवन प्रदायक के रूप में प्रकट-विकसित) हों । हे अश्विनीकुमारो ! हमारा आवाहन सुनकर आप आएँ और मुझ सप्तवधि (इस नाम के व्यक्ति अथवा सात स्थानों से बँधे हुए प्राणी) को मुक्त करें ॥५॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! सप्तवधि ने भयभीत होकर मुक्ति के लिए निवेदन किया, तो आप दोनों ने अपनी माया (कुशलता) से वनस्पति को विदीर्ण कर दिया ॥६॥ |
| वायु जिस प्रकार सरोवर को स्पन्दित करता है, उसी प्रकार आपको गर्भ दस मास का होकर, स्पन्दन युक्त होकर प्रकट हो ॥७॥ |
| जैसे वायु, वन और समुद्र प्रकम्पित होते रहते हैं, उसी प्रकारे दस मास का गर्भस्थ जीव जरायु के साथ बाहर प्रकट हो ॥८॥ |
| माता के गर्भ में दस मास पर्यन्त सोता हुआ बालक जीवित और क्षतिरहित अवस्था में जननी से सुखपूर्वक जन्म ग्रहण करे ॥९॥ |
सूक्त-७९
| हे सुप्रकाशित उषादेवि ! पूर्व की भाँति हमें ज्ञान युक्त बनायें, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए बोध दें । हे श्रेष्ठ कुल वाली, सत्य भाषिणी, वय्य के पुत्र सत्यश्रवा (सच्ची कीर्ति वाले) को अपनी कृपा का पात्र बनायें ॥१॥ |
| हे द्युलोक की पुत्री उषादेवि ! आप शुचद्रथ के पुत्र सुनीथ के लिए अन्धकार को दूर करके प्रकाशित (प्रकट) हुईं। ऐसी आप, वय्य के पुत्र सत्यश्रवा पर अनुग्रह (प्रकाश) वृष्टि करें ॥२॥ |
| हे आदित्य पुत्री उषादेवि ! आप हमें प्रचुर धन दें और आज हमारे अन्धकार को मिटायें । हे बलयुक्त , तमनाशक, प्रसिद्ध, सत्यरूपिणि उषादेवि ! वय्य के पुत्र सत्यश्रवा पर कृपा करें ॥३॥ |
| हे प्रकाशवती उषादेवि ! ये (स्तोतागण) दीप्तिमान् उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते हैं । वे ऐश्वर्य द्वारा उत्तम शोभावान् और उत्तम दानशील हैं । हे धनवती, जन्म से शोभावती उषादेवि ! स्तोतागण अश्व प्राप्ति के लिए आपको उत्तम स्तुतियाँ निवेदित करते हैं ॥४॥ |
| हे उषादेवि ! जो स्तोतागण धन-प्राप्ति के लिए आपका स्तवन करते हैं, वे निश्चय ही ऐश्वर्य धारण करते हैं। और अक्षय व्यादि रूप धन देते रहते हैं । हे जन्म से शोभावती उषादेवि ! अश्वप्राप्ति के लिए स्तोताजन आपको उत्तम स्तुतियाँ निवेदित करते हैं ॥५॥ |
| हे धनवती उषादेवि ! इन स्तोताओं को उत्तमवीर पुत्रों से युक्त अन्न प्रदान करें, जिससे वे धन-सम्पन्न होकर हमें विपुल धन दें । हे जन्म से शोभावती उषादेवि ! अश्व प्राप्ति के लिए स्तोताजन आपको उत्तम स्तुतियाँ निवेदित करते है ॥६॥ |
| हे धनवती उषादेवि ! जो यजमान-स्तोता हमें गौओं, अश्वों से युक्त धन प्रदान करते हैं, उनके लिए आप तेजस्वी धन और प्रभूत अन्न प्रदान करें । हे जन्म से शोभावती उषादेवि ! अश्व प्राप्ति के लिए स्तोताजन आपको उत्तम स्तुतियाँ निवेदित करते हैं ॥७॥ |
| हे सूर्य पुत्री उषादेवि ! सूर्य एवं अग्नि की शुभ, प्रदीप्त रश्मियों के साथ हमारी ओर आगमन करें । हमें गौओं से युक्त अन्न प्रदान करें। हे जन्म से शोभावती उषादेवि ! अश्व प्राप्ति के निमित्त स्तोताजन आपको उत्तम स्तुतियाँ निवेदित करते हैं ॥८॥ |
| हे सूर्य पुत्री प्रकाशवती उषादेवि ! हमारे कर्म के लिए विलम्ब न करें । जैसे राजा अपने शत्रु और चोर को सन्तप्त करते हैं, वैसे सूर्यदेव अपने तेज से आपको सन्तप्त न करें । हे जन्म से शोभावती उषादेवि ! अश्व प्राप्ति के निमित्त स्तोताजन आपको उत्तम स्तुतियाँ निवेदित करते हैं ॥९॥ |
| हे उषादेवि ! आप अभिलषित धन और अतिरिक्त धन भी प्रदान करने में समर्थ हैं । आप स्तोताओं का तम (अन्तर्तम) विनष्ट करने वाली हैं और उनका सन्ताप दूर करने वाली हैं । हे जन्म से शोभावती उषादेवि ! अश्व प्राप्ति के निमित्त स्तोताजन आपको उत्तम स्तुतियाँ निवेदित करते हैं ॥१०॥ |
सूक्त-८०
| दीप्तिमान् रथ पर आरोहित रहने वाली, सर्वव्यापिनी, यज्ञ द्वारा पूजनीय, अरुणिम वर्णयुक्त, दीप्तिमती तथा सूर्यदेव के आगे चलने वाली उषा देवी के प्रति ज्ञानीजन विचारपूर्वक श्रेष्ठ स्तुतियाँ निवेदित करते हैं ॥१॥ |
| ये दर्शनीय उषादेवी प्रसुप्तजनों को चैतन्य करती हैं और मार्गों को सुगम बनाती हुई अत्यन्त व्यापक रथों पर आरूढ़ होकर सूर्यदेव के आगे-आगे गमन करती हैं। महती और विश्वव्यापिनी उषादेवी दिन के आरम्भ में प्रकाश विस्तीर्ण करती हैं ॥२॥ |
| ये उषादेवीं अरुणाभ वृषभों (किरणों) को नियोजित करने वाली हैं और अक्षय धनों को स्थिर रखती हैं। ये अत्यन्त दीप्तिमती, बहुतों द्वारा स्तुत और सबके द्वारा वरण करने योग्य हैं, जो मार्गों को प्रकाशित करती हुई स्वयं प्रकाशमती हैं ॥३॥ |
| ये उषादेवी रात्रि और दिवस दोनों कालों में ऊर्ध्व और निम्न द्युलोक में गमन करती हुई पूर्व दिशा में प्रकट होती हैं ।ये सूर्यदेव के मार्ग का अनुवर्तन करती हैं ।ज्ञानवती स्त्री के सदृश ये दिशाओं का विस्मरण नहीं करतीं ॥४॥ |
| स्नान करके ऊपर (जल से बाहर निकलती हुई शुभवर्णा स्त्री की भाँति ये उषादेवी अपने शरीर को प्रकाशित करती हुई हमारे सम्मुख पूर्व से उदित होती हैं । ये सूर्यपुत्री उषादेवी द्वेषरूपी तमिस्रा को विदीर्ण करती हुई प्रकाश के साथ आगमन करती हैं ॥५॥ |
| पश्चिम की ओर गमन करतो ये सूर्य पुत्री उषादेवी कल्याणकारी रूप वाली स्त्री की भॉति अपने रूपों को प्रकट करती हैं। सर्वदा तरुणीं ये उषादेवी अपने ज्यातिरूप को पूर्व की भाँति प्रकाशित करती हैं। ये हविदाता यजमान को वरणीय धन प्रदान करती हैं ॥६॥ |
सूक्त-८१
| अकेले ही यज्ञ को धारण करने वाले, सभी मार्गों के ज्ञाता सवितादेव महान् स्तुतियों के पात्र हैं। महान् बुद्धिमान् एवं ज्ञानी जन अपने मन एवं बुद्धि को उन प्रेरक सविता के साथ नियोजित करते हैं ॥१॥ |
| वे अत्यन्त मेधावी सवितादेव अपने सम्पूर्ण रूपों को प्रकट करते हैं। वे मनुष्यों और पशुओं के लिए कल्याणकारी हैं। वे सबके द्वारा वरणीय सवितादेव द्युलोक को प्रकाशित करते हैं । उषादेवी के प्रयाण के अनन्तर वे प्रकाशित होते हैं ॥२॥ |
| अग्नि आदि सम्पूर्ण देवगण, जिन सवितादेव के महिमायुक्त मार्गों का अनुगमन करके ओज (बल) को धारण करते हैं, जिन सवितादेव ने अपनी महत्ता से पृथ्वी आदि लोकों को परिव्याप्त किया, वे देव अत्यन्त शोभायमान हैं ॥३॥ |
| हे सवितादेव ! आप तीनों प्रकाशित लोकों में गमन करते हैं और सूर्य रश्मियों से संयुक्त होते हैं। आप रात्रि के दोनों छोरों को प्रभावित करके परिगमन करते हैं । हे देव ! आप कल्याणकारी कर्मों से संसार के मित्र रूप होते हैं ॥४॥ |
| हे सवितादेव ! आप अकेले ही सम्पूर्ण उत्पन्न जगत् के अधीश्वर हैं। आप अपनी गमन-सामर्थ्य से जगत् के पोषक रूप हैं। आप सम्पूर्ण लोकों में विशिष्टरूप से देदीप्यमान हैं । तेजस्वी अश्वों-पराक्रमों से युक्त श्यावाश्व ऋषि आपके निमित्त स्तोत्रों को निवेदित करते हैं ॥५॥ |
सूक्त-८२
| हम सवितादेव के उस प्रसिद्ध और उपभोग योग्य ऐश्वर्य की याचना करते हैं तथा उन भगदेव के श्रेष्ठ सर्वधारक, शत्रुविनाशक ऐश्वर्य को भी धारण करें ॥१॥ |
| अपने यश को विस्तृत करने वाले इन सवितादेव के अत्यन्त प्रिय और प्रकाशित ऐश्वर्य को कोई भी नष्ट नहीं कर सकता ॥२॥ |
| वे सविता और भगदेव हविदाता यजमान को उत्तम वरणीय रत्नादि प्रदान करते हैं । हम भी उन देवों से उस विलक्षण ऐश्वर्य के भाग की याचना करते हैं ॥३॥ |
| हे सवितादेव ! आप आज हमें पुत्र-पौत्रों सहित पवित्र ऐश्वर्य प्रदान करें । दुःखदायी स्वप्नों की तरह दरिद्रता को हमसे दूर करें ॥४॥ |
| हे सवितादेव ! आप हमारे सम्पूर्ण दुःखों (पाप मूलक दुर्गुणों) को दूर करें और जो हमारे निमित्त कल्याणकारी हो, उसे हमारे अभिमुख प्रेरित करें ॥५॥ |
| हम सवितादेव की आज्ञा में रहकर माता अदिति (अखण्डु-भूमि) के लिए निरपराधी हों । हम सम्पूर्ण वाञ्छित धनों को धारण करें ॥६॥ |
| आज सबके देवस्वरूप, सत्यव्रतियों के पालक, सत्यव्रतों के रक्षक सवितादेव को यज्ञ मेंसूक्तों के माध्यम से बुलाते हैं ॥७॥ |
| जो सवितादेव उत्तम कर्म करते हुए दिन और रात्रि के सन्धि भाग में गमन करते हैं, हम उत्तम स्तोत्रों से उनका वरण करते हैं ॥८॥ |
| जो सवितादेव इन सम्पूर्ण प्राणियों को उत्तम कर्मों में प्रेरित करते हैं और उन्हें अपना यश सुनाते हैं (हम उन्हें आवाहित करते हैं) ॥९॥ |
सूक्त-८३
| हे यजमानो ! उन बलसम्पन्न पर्जन्यदेव के सम्मुख उनकी स्तुति करें । हव्यादिऔर उत्तम वाणियों द्वारा उनका स्तवन करें ये देव जलवर्षक, दानशील एवं गर्जनकारी हैं, जो ओषधिरूप वनस्पतियों में गर्भ स्थापित करते हैं ॥१॥ |
| ये पर्जन्यदेव (अनुपयुक्त) वृक्षों का विनाश करते हैं। राक्षसों को हनन करते हैं । अपने भयंकर आघातों से सम्पूर्ण लोकों को भयाक्रान्त कर देते हैं । गर्जना करते हुए ये पापियों को विनष्ट करते हैं और जल वृष्टि करके निरपराधियों की रक्षा करते हैं ॥२॥ |
| जिस प्रकार रथी अपने घोड़ों को चाबुक से उत्तेजित करता है, उसी प्रकार पर्जन्य, गर्जनकारी, शब्दों से मेघों को प्रेरित करते हैं ।जब मेघ जलराशिसे पूर्ण होते हैं, तब सिंह के सदृश गर्जना करते हैं, जो दूर तक सुनाई देता है ॥३॥ |
| जब पर्जन्यदेव जलराशि से युक्त होकर पृथ्वी की ओर अवतीर्ण होते हैं, तब वायु विशेष प्रवाहयुक्त होती है, विद्युत् चमकती है और ओषधिरूप वनस्पतियाँ वृद्धि पाती हैं, आकाश स्रवित होता है तथा यह पृथ्वी सम्पूर्ण जगत् के हितार्थ पुष्ट होती है ॥४॥ |
| हे पर्जन्यदेव !आपके कर्मों के कारण पृथ्वी उत्पादनशील होती है तथा सभी प्राणी पोषण प्राप्त करते हैं ।आपके कर्मों से ओषधिरूप वनस्पतियाँ नाना रूप धारण करती हैं । हे देव ! आप हमें महान् सुख प्रदान करें ॥५॥ |
| हे मरुद्गणो ! आप हमारे निमित्त वृष्टि करें । वर्षणशील मेघ की जलधाराएँ हमें पोषण प्रदान करें। हे पर्जन्यदेव ! आप गर्जनशील मेघों के साथ जल का सिंचन करते हुए हमारी ओर आगमन करें। आप प्राणवर्षक रूप में हमारे पिता स्वरूप पोषणकर्ता हैं ॥६॥ |
| हे पर्जन्यदेव ! गड़गड़ाहट की गर्जना से युक्त होकर ओषधिरूप वनस्पतियों में गर्भ स्थापित करें । उदक धारक रथ से गमन करें । उदकपूर्ण (जलपूर्ण ) मेघों के मुख को नीचे करें और इसे खाली करें, ताकि उच्च और निम्न प्रदेश समतल हो सकें ॥७॥ |
| हे पर्जन्यदेव ! अपने जलरूपी महान् कोश को विमुक्त करें और उसे नीचे बहायें, जिससे ये जल से परिपूर्ण नदियाँ अबाधित होकर पूर्व की ओर प्रवाहित हों । आप जल-राशि से द्यावा-पृथिवी को पृरिपूर्ण करें; ताकि हमारी गौओं को उत्तम पेय जल प्राप्त हो ॥८॥ |
| हे पर्जन्यदेव ! गड़गड़ाहट युक्त गर्जना करते हुए जब आप पापियों (मेघ) को विदीर्ण करते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् और इसमें अधिष्ठित प्राणी अत्यन्त प्रमुदित हो उठते हैं ॥९॥ |
| हे पर्जन्यदेव ! आपने बहुत वृष्टि की है। अभी वृष्टि को थाम लें । आपने मरुभूमि को भी जल से पूर्ण कर दिया है। आपने सुखकर उपभोग के लिए ओषधिरूप वनस्पतियाँ उत्पन्न की हैं। आपने प्रजाओं द्वारा उत्तम स्तुतियाँ भी प्राप्त की हैं ॥१०॥ |
सूक्त-८४
| हे प्रकृष्ट गुणवती और महिमावती पृथिवीदेवि ! आप भूमिचर प्राणियों को अपनी सामर्थ्य से पुष्ट करती हैं। और साथ ही अत्यन्त विस्तृत पर्वत-समूहों को भी धारण करती हैं ॥१॥ |
| हे विविध-विध विचरणशीला और शुभ वर्ण वाली पृथिवीदेवि ! आप जब अश्वों के समान भयंकर शब्द करने वाले मेघों को वर्षण के निमित्त प्रेरित करती हैं, तब स्तोतागण आपके प्रति उत्तम स्तोत्रों से स्तुतियाँ निवेदित करते हैं ॥२॥ |
| हे पृथिवी माता ! जब अन्तरिक्ष में स्थित मेघों से विद्युत् द्वारा वृष्टि होती हैं, तब आप अपनी दृढ़-सामर्थ्य से वनस्पतियों को धारण करती हैं ॥३॥ |
सूक्त-८५
| हे अत्रि वंशजो ! आप विशिष्ट प्रकाशमान, प्रसिद्ध वरुणदेव के लिए अत्यन्त विस्तृत, गंभीर और प्रीतिकर स्तुतियों करें । जैसे व्याध-पशुओं के चर्म को विस्तृत करता है, उसी तरह इन देव ने सूर्यदेव के परिभ्रमण के लिए आकाश को विस्तृत किया हैं ॥१॥ |
| वरुणदेव ने वन में वृक्षों के ऊपरी भाग पर (मूर्त पदार्थों के अभाव में) अन्तरिक्ष को विस्तृत किया। अश्वों या मनुष्यों में वीर्य-पराक्रम की वृद्धि की । गौओं में दुग्ध को प्रतिष्ठित किया । हृदय में संकल्पशक्ति युक्त मन को, प्राणियों में (पाचन के लिए) जठराग्नि को, द्युलोक में सूर्यदेव को तथा पर्वत पर सोम (आदि ओषधियों) को उत्पन्न किया ॥२॥ |
| वरुणदेव ने द्यावा-पृथिवी और अन्तरिक्ष लोकों के हितार्थ मेघों के मुख को नीचे करके विमुक्त किया । जैसे वृष्टि से यवादि अन्न पुष्ट होते हैं, वैसे उन देव ने वृष्टि से भूमि को उर्वर बनाया है ॥३॥ |
| वरुणदेव जब वृष्टिरूप जल की इच्छा करते हैं; तब वे पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश में जल-सिंचन कर देते हैं, अनन्तर पर्वत शिखर मेघों से आच्छादित होते हैं और मरुद्गण अपनी सामर्थ्य से उत्साहित होकर मेघों को शिथिल करते हैं ॥४॥ |
| जिन वरुणदेव ने मान-दण्ड के समान सूर्यदेव के द्वारा अन्तरिक्ष-पृथिवी को प्रभावित किया, उन प्राण-प्रदाता और प्रसिद्ध वरुणदेव की इस महती क्षमता की हम प्रशंसा करते हैं ॥५॥ |
| जिस प्रकार जल-सिंचन करने वाली प्रवहमान नदियाँ अपने जल से एक समुद्र को भी पूर्ण नहीं कर पाती, उसी प्रकार उन ज्ञान-सम्पन्न वरुणदेव की इस महती क्षमता का अतिक्रमण कोई नहीं कर सकता है ॥६॥ |
| हे सर्वदा वरणीय वरुणदेव ! यदि हमने कभी अपने दातापुरुष, मित्र, सखा, भ्राता, सर्वदा समीपस्थ पड़ोसी अथवा मूक के प्रति कोई अपराध किया हो, तो उस अपराध से हमें विमुक्त करें ॥७॥ |
| हे वरुणदेव ! द्यूतक्रीड़ा में (जुआ खेलने में) यदि हमने कोई प्रवंचना की हो अथवा जानकर या अज्ञानतावश अपराध किया हो, तो हे वरुणदेव ! बन्धनों को शिथिल करने के समान हमें उन सम्पूर्ण अपराधों से विमुक्त करें; ताकि हम आपके प्रिय-पात्र हों ॥८॥ |
सूक्त-८६
| हे इन्द्राग्नि देवो ! आप दोनों युद्धों में जिस मनुष्य की रक्षा करते हैं, वह मनुष्य वेदों की तीनों वाणियों का मर्म समझ लेता है और सुदृढ़ तथा दीप्तिमान् होकर शत्रु सेना को छिन्न-विच्छिन्न कर देता हैं ॥१॥ |
| जो युद्धों में अपराजेय हैं, जो यज्ञों में अत्यन्त पूज्य हैं, जो पंचजनों द्वारा स्तुत्य हैं, उन इन्द्राग्नि देवों का हम आवाहन करते हैं ॥२॥ |
| इन इन्द्राग्नि देवों का बल शत्रु संहारक है। ये देवगण स्तुतियों को प्राप्त करने, शत्रुओं का संहार करने के निमित्त द्रुतगति से रथ में गमन करते हैं । वे ऐश्वर्यवान् इन्द्राग्नि, अपने दोनों हाथों में तीक्ष्ण वज्र धारण करते हैं ॥३॥ |
| वेगवान् धनों के अधिपति, सर्वज्ञाती, अतिशय पूजनीय हे इन्द्राग्नि देवो ! हम युद्ध में रथों को प्रेरित करने के लिए आपका आवाहन करते हैं ॥४॥ |
| मनुष्यों के लिए प्रवर्धत हे इन्द्र और अग्निदेवो ! आप दोनों अहिंसनीय हैं। हम अश्वों की प्राप्ति के लिए आप दोनों को स्तुति करते हैं और सोमरस की भाँति आगे स्थापित करते हैं ॥५॥ |
| हमने बलकारक, घृत के समान तेजस्वी, पाषाण द्वारा कूटकर निष्पन्न सोम से युक्त हव को इन्द्र और अग्निदेवों के लिए निवेदित किया हैं । वे देवगण हम स्तोताओं को प्रभूत धन युक्त समृद्धि और विपुल अत्र प्रदान करें ॥६॥ |
सूक्त-८७
| 'एवया' नामक ऋषि द्वारा की गई स्तुतियाँ महान् इन्द्रदेव आपको तथा मरुत् सहित विष्णुदेव को प्राप्त हों । उत्तम आभूषणों से अलंकृत, कल्याणकारी याज्ञिक को उन्नतिशील मरुतों का बल प्राप्त हो ॥१॥ |
| जो मरुद्गण अपनी महत्ता से प्रकट हुए और अपनी विद्या से विख्यात हुए, उन मरुद्गणों का वर्णन एवया मरुत् ऋषि करते हैं । हे मरुतो ! आपका बल अनेक विशिष्ट कर्तृत्वों, दान आदि से युक्त होने के कारण महान् हैं । आप शत्रु द्वारा अपराभूत तथा पर्वत के सदृश अटल हैं ॥२॥ |
| अत्यन्त दीप्तिमान् और प्रभावान् ये मरुद्गण विस्तृत आकाश से गमन करते हुए भी प्रजाओं के आमन्त्रण को सुनें । एवयामरुत् ऋषि उन मरुतों का वर्णन अपनी वाणियों से करते हैं। इन्हें कोई अपने स्थान से विचलित नहीं कर सकता। वे अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशमान हैं और घोर शब्दवान् भयंकर शत्रुओं को भी स्पन्दित कर डालते हैं ॥३॥ |
| इन मरुद्गणों के स्वेच्छा से विचरणशील अश्व, जब इनके निवास के समीप रथ में नियोजित होते हैं, तब एवयामरुत् उनसे अपेक्षा रखते हैं। वे मरुत् अपने महान् संघ के साथ परस्पर स्पर्धारहित भाव से अपने समान निवास स्थान से बाहर आते हैं। वे विलक्षण तेजों से युक्त और सुखवर्द्धक हैं ॥४॥ |
| हे मरुद्गणो ! आपका वह बल-सम्पन्न जलवर्षक, तेजस्वी, ममनशील, प्रभावकारी शब्द एवयामरुत् ऋषि को भयभीत न करे, जिस शब्द से आप शत्रुओं को पराभूत कर, वश में कर लेते हैं । हे मरुतो ! आप स्वयं दीप्तिमान्, स्थिर रश्मियों वाले, स्वर्णमय अलंकृत, उत्तम आयुधों से सज्जित और अन्न प्रदाता हैं ॥५॥ |
| हे प्रवर्द्धमान शक्तिशाली मरुतो ! आपकी महिमा निश्चय ही अपार है। आपका तेजस्वी बल एवयामरुत् ऋषि की रक्षा करे । शत्रुओं के आक्रमणों में आप स्थिर स्थान में अविचलित हुए दीखते हैं। आप अग्निदेव के सदृश तेजस्वी हैं । हमें अपने निंदकों से रक्षित करें ॥६॥ |
| हे उत्तम पूजनीय, अग्निवत् अतिशय दीप्तिमान् , रुद्रपुत्र मरुद्गणो ! आप एवयामरुत् ऋषि को संरक्षित करें। आप अपने अत्यन्त दीर्घ और विस्तीर्ण निवास स्थान के कारण विख्यात हुए हैं । आप पापरहित हैं । गमन करते हुए महान् तेजों के साथ प्रकाशित होते हैं ॥७॥ |
| हे द्वेषरहित मरुद्गणो ! आपके निमित्त काव्य स्तोत्रों के गान के समय आप यहाँ आगमन करें । स्तुतिकर्ता एवयामरुत् अंघ के स्तोत्रों का श्रवण करें । हे उत्कंठित मन वाले मरुतो ! आप रथ से योजित होने वाले अश्वों के समान व्यापक विष्णुदेव की शक्तियों से प्रयोजित होकर हमारे स्तोत्रों से प्रशंसित हों । हे मरुतो ! अपने पराक्रमों से हमारे गुप्त शत्रुओं को दूर हटायें ॥८॥ |
| हे यजनीय मरुद्गणो ! हमारे यज्ञ की सिद्धि हेतु यज्ञ में आगमन करें । अरक्षित एवयामरुत् ऋषि की प्रार्थना सुनकर उन्हें संरक्षित करें । हमारे रक्षण कार्य में आप पर्वत की भाँति अडिग और महान् हैं । हे प्रकृष्ट ज्ञान-सम्पन्न मरुतो ! आप हमारे निन्दकों के मध्य अजेय होकर उनके शासक बने ॥९॥ |