सप्तम मंडल सूक्त १ - १०४ (ऋग्वेद)

 

Rigveda | Gyan Dhyan Sanskar

सूक्त-१

प्रशंसनीय, गतिमान्, दूर से परिलक्षित होने वाले गृहपति अग्नि को नर श्रेष्ठों ने हाथों और अँगुलियों की कुशलता से प्राप्त किया॥१॥
घर में प्रज्वलित किये जाने योग्य, नित्य दर्शनीय, सदैव ज्वालायुक्त जो अग्निदेव हैं, उन्हें याजकों ने अपने रक्षण हेतु यज्ञ-स्थल में स्थापित किया है॥२॥
हे शक्तिशाली अग्निदेव ! भली प्रकार से प्रज्वलित हुए आप प्रचण्ड ज्वालाओं से हमारे निकट प्रदीप्त हो । ये आहुतियाँ निरन्तर आपको समर्पित की जा रही हैं॥३॥
जिनके पास सुन्दर जन्म झाले (मानव जीवन को सार्थक करने वाले याजक) बैठते हैं, वे अग्नियों में श्रेष्ठ अग्निदेव प्रकाशित होते हैं । अति तेजस्वी वे अग्निदेव हमारा कल्याण करते एवं सन्तान प्रदान करते हैं॥४॥
शत्रुओं को जीतने वाले हे अग्निदेव ! आप हमें वीर, बुद्धिमान् एवं श्रेष्ठ पुत्रों सहित प्रशंसित धन प्रदान करें, जिसका हिंसक शत्रु अपहरण न कर सकें॥५॥
आहुति के योग्य, घृत धारण करने वाली जो नित्य सम्बद्ध (यज्ञ पात्र जुहू अथवा स्थूल-सूक्ष्म सामग्री) सुदक्ष श्रेष्ठ-कुशल (यज्ञाग्नि) के पास पहुँचती हैं, वह अपने ही धन से दीप्ति प्राप्त करती हैं॥६॥
हे अग्निदेव ! जिन तेजस्वी ज्वालाओं से आपने कटुभाषी असुरों का नाश किया, उसीं तेज से समस्त शत्रुओं का नाश करें । आप हमारे रोगों को जड़ से मिटाएँ ॥७॥
हे पवित्र करने वाले अग्निदेव ! आपकी प्रदीप्त ज्वालाएँ धवल हैं । जिस प्रकार आप अपने याजक के पास रहते हैं, वैसे ही हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर इस यज्ञ में रहें॥८॥
हे अग्निदेव ! आपके तेज को पितरों के हितैषी मनुष्यों ने विभिन्न स्थानों-देशों में फैलाया है। हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर आप हमारे यज्ञ में निवास करें॥९॥
(अग्निदेव का कथन है-) जो मनुष्य हमारे उत्तम कर्मों को जानते हैं । वे संग्राम में शत्रु-असुरों की माया को दूर करके विजयी होते हैं॥१०॥
हे अग्निदेव ! वीरतारहित पुत्र-पौत्रादि रहित घरों में हमें न रहना पड़े। घर के हितैषी हे अग्निदेव ! पुत्र-पौत्रादि से भरे-पूरे घर में हम आपकी उपासना करते हुए निवास करें॥११॥
अश्वारूढ़, पूजनीय अग्निदेव की जहाँ नित्य उपासना की जाती हो (अर्थात् यज्ञ किया जाता हो), वैसा प्रजा से परिपूर्ण, सुसंतति को बढ़ाने वाला, घर में प्राप्त हो॥१२॥
हे अग्निदेव ! असम्बद्ध, दुष्ट असुरों से आप हमारी रक्षा करें। सेना सहित आक्रमण करने वाले दुष्ट शत्रुओं से आप हमें बचाएँ। आपकी सहायता से हम उन्हें जीत लें॥१३॥
दृढ़ भुजाओं वाला बलवान्-पुत्र अक्षय स्तोत्रों (अनश्वर- सनातन मंत्रों- सूत्रा) से जिन अग्निदेव की निकटती प्राप्त करता है, वे अग्निदेव अन्य अग्नियों को जाग्रत् करें॥१४॥
जो अग्निदेव अपने को प्रदीप्त करने वाले की, हिंसकों से एवं पापा से रक्षा करते हैं और जिनकी उपासना मनुष्य को उत्तम औरस पुत्र प्रदान करती है, वहीं अग्निदेव श्रेष्ठ हैं॥१५॥
जिन अग्निदेव को याजक, हवि प्रदान करके अच्छी तरह से प्रदीप्त करते हैं, याज्ञक आदि जिनको परिक्रमा करते हैं, वे ही श्रेष्ठ अग्निदेव हैं। इन्हें अनेकों बार आहुतियाँ अर्पित की गई हैं॥१६॥
हे अग्निदेव ! हुम प्रतिदिन दोनों प्रकार के कर्म (स्तुति एवं यजन) आपके निमित्त करते हैं । आप कृपा करके हमें धन के स्वामी बनाते हैं॥१७॥
हे अग्निदेव ! आप हमारी इन सदेव प्रिय लगने वाली हवियों को समस्त देवताओं तक पहुँचाएँ । हमारे द्वारा अर्पित यह सुगन्धित आहुतियाँ देवताओं को बहुत प्रिय है॥१८॥
हे अग्निदेव ! आपकी कृपा से हम बुद्धिहीन न हों और न हमें भूखे रहना पड़े । हे देव ! हम कभी वस्त्र और संतान बिना न रहें । हे अग्निदेव ! हमें असुर शत्रु न मिले। हमे घर या जंगल के मार्ग में मृत्यु प्राप्त न हो॥१९॥
हे अग्ने ! आप हमारे लिए उत्तम अन्न प्रदान करें आप अपने याजकों को अन्न देते हैं । हम दोना (स्तोता एवं हविदाता) आपके द्वारा दिये जाने वाले अनुदानों को प्राप्त करें । आप हमें सुरक्षित रखते हुए हमारा कल्याण करे॥२०॥
हे बल से उत्पन्न अग्निदेव ! उत्तम प्रकार (हवनीय) आहूत किये जाने वाले आप, रमणीय ज्वालाओं सहित प्रकट हो । आप हमारे पुत्र को दग्ध न करे । सदा उसकी रक्षा करते हुए, उस वीर पुत्र को दीर्घायु प्रदान करें॥२१॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे सहायक बने । देवों-त्विजों द्वारा प्रवृद्ध अग्निदेव हमारा पर्याप्त पोषण करें। हे बल के पुत्र अग्ने ! आपकी निग्रहात्मक (दण्डात्मक) बुद्धि और माया विभ्रम हमें व्याप्त न कर सकें॥२२॥
हे अग्निदेव ! आप तेजस्वी एवं अमर हैं । आपके निमित्त जो याजक हवि अर्पित करता है, वह धनवान् हो जाता है । स्तोतागणों द्वारा गाये गये स्तोत्र, जिसके आश्रय में जाते हैं, वे अग्निदेव याजक की सदा रक्षा करें॥२३॥
हे अग्निदेव ! आप सर्वज्ञ हैं । अत: आप हमें उत्तम एवं कल्याणकारी कार्यों में प्रेरित करें । हम स्तोतागण आपकी स्तुति करते हैं । हे बल द्वारा रक्षा करने वाले अग्निदेव ! आप हमें महान् ऐश्वर्य प्रदान करें, जिससे हम वीर पुत्र-पौत्रादि सहित पूर्ण आयु वाले होकर सुख से रहें॥२४॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे निमित्त अन्न को पवित्र करें । जो हवि देते हैं, आप उन्हें अन्न-धन प्रदान करें। हम दोनों (स्तोतागण एवं याजकगण) आपके द्वारा दिये जा रहे दिव्य दान को प्राप्त करें। आप कृपा करके कल्याणकारी रक्षण साधनों से हमारी रक्षा करें॥२५॥

सूक्त-२

हे अग्निदेव !आप आज हमारी समिधाओं को अंगीकार करें । यज्ञीय धूम्र को फैलाते हुएअच्छी तरह प्रदीप्त हों । आपकी दिव्य, कान्तियुक्त, स्तुत्य किरणें (ऊर्जा) अन्तरिक्ष का स्पर्श कर, सूर्य की किरणों के साथ मिल जाएँ॥१॥
उत्तम कर्म करने वाले जो देवगण दोनों प्रकार की (सोमरूप एवं अन्नरूप) हवियों का आस्वादन करते हैं, उनके बीच प्रशंसनीय एवं पूजनीय अग्निदेव को हवियाँ प्रदान करते हुए, हम उनकी महिमा वर्णित करते हैं॥२॥
हे यजमानो ! आप उन अग्निदेव का सदैव पूजन (यजन) करते रहें, जो बलवान्, स्तुति के योग्य, सुदक्ष (कुशल) एवं द्यावा-पृथिवी के मध्य दूत के समान कार्य करते हैं॥३॥
हे अध्वर्युगण ! आप घृत से भीगी कुशा अर्पित करते हुए यजन करें । याजकगण सेवा भाव से घुटने टेक कर (अर्थात् नम्र होकर) पात्र को भरते हैं एवं हविर्द्रव्य अर्पित करते हैं॥४॥
देवत्व चाहने वाले, रथ प्राप्ति की इच्छा वाले, श्रेष्ठ कर्म करने वाले मनुष्य यज्ञ का आश्रय लें । यज्ञों में अग्नि को घृत से वैसे ही सींचें, जिस प्रकार नदियाँ समीपवर्ती क्षेत्र को सिंचित करती हैं। यज्ञाग्नि को याजक वैसा हीं प्यार करें, जैसा कि गौ माता अपने बछड़े को करती हैं॥५॥
जो कुशा के आसन पर विराजमान होने वाली, बहुतों से प्रशंसित, धन-ऐश्वर्य प्रदायिनी हैं, वे दोनों दिव्य रूप वाली, यजन करने योग्य उषा और रात्रि देवी स्वेच्छा से श्रेष्ठ दुग्ध देने वाली (अर्थात् कामधेनु) के समान हमारा कल्याण करें, हमें आश्रय प्रदान करें॥६॥
हे होता ! आप यज्ञ करें, हम आपसे यह प्रार्थना करते हैं। आप हमारी स्तुति सुनकर इस यज्ञ को ऊर्ध्वगामी बनाकर देवताओं तक पहुँचाएँ । देवगण प्रसन्न होकर हमें धन प्रदान करें॥७॥
भारतीगणों (सौर्य प्रवाहों ) के साथ देवी भारती पधारें, देवताओं और मनुष्यों के साथ देवी इला (इळा) आएँ एवं सारस्वतों के साथ माँ सरस्वती पधारें और इन कुशाओं के आसन पर विराजें॥८॥
हे त्वष्टादेव ! प्रसन्न होकर आए हमें स्फूर्तियुक्त वीर्यवान् बनाएँ, जिससे देवताओं की कामना करने वाला, वीर, उत्तम दक्षता से कर्म (यज्ञ-कर्म) करने वाला पुत्र उत्पन्न किया जा सके॥९॥
हे वनस्पते ! आप प्रज्वलित हों, अग्निरूप से समस्त देवगणों का आवाहन करें । अग्निदेव ही शान्तिदायक हवि को देवताओं के लिए अर्पित करते हैं। वे अग्निदेव ही देवगणों को बुलाने वाला सत्यनिष्ठ यज्ञ करें । (क्योंकि) अग्निदेव हो, वास्तव में देवों की उत्पत्ति के ज्ञाता हैं॥१०॥
हे अग्निदेव ! आप प्रदीप्त होकर, इन्द्र और त्वष्टादि देवगणों सहित रथारूढ़ होकर हमारे निकट आएँ । सुपुत्रों की माता अदिति इस कुशा के आसन पर बैठे तथा प्रदत्त आहुतियों से अमर-देवगण हर्षित हों॥११॥

सूक्त-३

हे देवताओं ! आप उन अनेक अग्नियों में पूज्य यज्ञाग्नि को दूत बनाकर प्रयुक्त करें, जो देवता होकर भी मनुष्य के साथी हैं जो यज्ञवान् या सत्यवान हैं, घृत जिनका आहार है, जिनका तप-तेज विकारनाशक एवं पवित्रता प्रदान करने वाला है ॥ १॥
हिनहिनाते घोड़े जिस प्रकार घास को चरते चले जाते हैं, उसी प्रकार दावानल वृक्षों को उदरस्थ करता हुआ चलता है । इस अवस्था में वायु के प्रभाव से जिस ओर काला धुआँ जाता है, वहीं मार्ग अग्निदेव का होता है॥२॥
हे यज्ञाग्ने ! आपकी नवीन ज्वालाएँ वृष्टि करने में समर्थ हैं । हे प्रकाशित यज्ञाग्ने ! आप नष्ट न होने वाली अपनी ऊर्जा सहित द्युलोक में पहुँचकर, देवों को तुष्ट करते हैं॥३॥
हे अग्निदेव ! आप जों की तरह काष्ठादि का भी भक्षण करते हैं। जब आप अपने ज्वालारूपी दाँतों से कानुरूप अन्नों का भक्षण करते हैं, तब पृथ्वीलोक में आपका तेज शीघ्रता से फैलता है॥४॥
इच्छाओं की पूर्ति करने में समर्थ अग्निदेव की ज्वालाएँ तेजस्वी होती हैं । निशि-वासर गनिमान् अश्व के समान याजक, अग्निदेव की उपासना करते हैं । ये अति तरुण अग्निदेव अतिथि की तरह पूजय हैं॥५॥
हे तेजस्वी अग्निदेव ! उस समय आपका स्वरूप अति शोभनीय हो जाता है, जब आप सूर्यदेव जैसे देदीप्यमान होते हैं। आपका तेज विद्युत्वत् अन्तरिक्ष में फैलता है । दर्शनीय सूर्यदेव के समान आप भी प्रकाशित होते हैं॥६॥
हे अग्निदेव ! हम आपके निमित्त गो- घृत से युक्त हवि पदार्थ अर्पित करते हैं तथा आपकी सेवा करते हैं । आप भी प्रसन्न होकर अपने अपरिमित तेज से उसी प्रकार हमारी रक्षा करें, जैसे लोहे के सुदृढ़ सौ किले मनुष्यों की रक्षा करते हैं॥७॥
हे बल के पुत्र जातवेदा अग्निदेव ! आपकी प्रदीप्त शिखाएँ हविदाता का कल्याण करती हैं । आप तेजस्वी वाणी और ज्वालाओं से सुपुत्रवान् प्रजा का रक्षण करते हैं॥८॥
माता स्वरूपिणी अरणियों के गर्भ से उत्पन्न तीक्ष्णशस्त्रवत् अग्निदेव यज्ञकर्म करने में समर्थ होते हैं वे इस कामना योग्य प्रिय कर्म (यज्ञ) को करने में तब समर्थ होते हैं, जब वे अपनी पवित्र ज्वालाओं को प्रदीप्त करते हैं॥९॥
हे अग्निदेव ! आप हमें उत्तमकर्म करने के लिए श्रेष्ठ धन प्रदान करें । यज्ञ करने वाले एवं श्रेष्ठ बुद्धि वाले पुत्र सहित समस्त प्रकार के धन-ऐश्वर्य हम उद्गाताओं एवं स्तोताओं को प्राप्त हों । आप सभी प्रकार से हमारा कल्याण करें॥१०॥

सूक्त-४

हे याजको ! आप सभी शुद्ध-पवित्र अग्निदेव को उत्तम वि एवं श्रेष्ठ स्तोत्र प्रेषित करें । वे अग्निदेव समस्त देवताओं, मनुष्यों एवं समस्त प्राणियों के अन्त:करण में विद्यमान रहते हैं॥१॥
वे अग्निदेव महान् ज्ञानी, उत्साही एवं तरुण हैं । माता स्वरूपिणी दोनों अरणियों से उत्पन्न होते ही तेजस्वी और युवा हो जाते हैं । वे वनों में संव्याप्त होकर काष्ठ एवं प्रचुर अन्न का शीघ्र ही भक्षण करने में समर्थ हैं॥२॥
देवों की तेजस्वी यज्ञशाला में जिन तेजस्वी अग्निदेव को प्रतिष्ठित करके मानवों ने सेवा की, वे सेवा से प्रसन्न होकर आहुतियाँ ग्रहण करके तीव्रता से तेजोमय हो जाते हैं। वह तेज मनुष्यों के लिए असहनीय होता है॥३॥
अमर, ज्ञानवान् एवं तेजस्वी अग्निदेव अज्ञानी मनुष्यों के बीच रहते हैं । हे बलवान् अग्निदेव ! हम आपके ( तेजस्वी अमर ज्ञान को धारण करने के निमित्त अपनी बुद्धि निरन्तर सचेष्ट रखेंगे। आप हमारी रक्षा करे॥४॥
वे अग्निदेव देवताओं द्वारा निर्मित स्थान-विशेष (यज्ञकुण्ड) में स्थापित होते हैं। वे अग्निदेव अपने प्रखर कर्मों द्वारा अमर देवताओं को सुरक्षित रखते हैं। सबको पोषण द्वारा धारण करने वाले अग्निदेव को पृथ्वी, ओषधियाँ एवं वृक्ष भी अपने अन्दर धारण करते हैं ॥५॥
अग्निदेव उत्तम अमरत्व का दान देने में समर्थ हैं। हे अग्निदेव ! हम सदा आपकी सेवा करते रहें। आपकी कृपा से हम कभी भी वीर पुत्र एवं सुन्दर रूप से हीन न हों॥६॥
हम अज्ञानी पुरुष के बताए गये मार्ग पर चलकर णग्रस्त न हों, क्योंकि दूसरे के पुत्र को लेकर कोई पुत्रवान् नहीं हो सकता । (अग्निदेव) हमें सदा विद्यमान रहने वाले धन का स्वामी बनाएँ॥५७॥
दत्तक पुत्र भले ही सेवा करने वाला एवं ऋण न लेने वाला हो, फिर भी उसका मन अपने जनक के पास जायेगा ही । दत्तक पुत्र से सन्तोष नहीं होता, अत: हे देव ! हमें शत्रुओं को जीतने वाला पुत्र प्रदान करें॥८॥
हे अग्निदेव ! आप हमें पापों और हिंसा करने वालों से सुरक्षित रखें । हम आपके लिए पवित्र हविष्यान्न अर्पित करते हैं । आपकी कृपा से हमें इच्छित धन की प्राप्ति हो॥९॥
हे अग्निदेव ! हमें सभी तरह के धन-ऐश्वर्य प्राप्त हों तथा यजन ( यज्ञादि सत्कर्म करने वाला यशस्वी पुत्र प्राप्त हो। हम स्तोताओं को सभी प्रकार के धन मिलें । अपने आश्रय में स्थित हमारा आप सभी प्रकार कल्याण करें॥१०॥

सूक्त-५

जिन वैश्वानर अग्निदेव को समस्त देवताओं की उपस्थिति में प्रज्वलित कर बढ़ाया (प्रदीप्त किया) जाता है, वे बढ़े हुए अग्निदेव द्युलोक और पृथ्वीलोक में विचरण करते हैं । (हे मनुष्यो !) उन अग्निदेव की स्तुति करो॥१॥
जो वैश्वानर अग्निदेव मनुष्यों के बीच प्रकाशित हैं, वे ही श्रेष्ठ हवि द्वारा वर्धमान होकर द्युलोक एवं भूलक में स्थापित हुए हैं। वे अच्छी प्रकार पूजित, सर्व कल्याणकारी अग्निदेव ही प्रसन्न होकर जल बरसाते और नदियों को जल से भरकर प्रवाहित करते हैं॥२॥
हे अग्निदेव ! आपने जब अपने प्रदीप्त तेज से 'राजा पुरु' के शत्रुओं के नगरों को ध्वस्त किया था, तब दुष्ट कर्म वाले लोग भोजनादि त्यागकर तितर-बितर हो गये थे॥३॥
हे अग्निदेव ! आप विशिष्ट आभा से प्रकाशित होकर अपने तेज से द्युलोक एवं पृथ्वी को विस्तृत करते हैं । तीनों लोकों के निवासी आपके व्रत का पालन करते हैं॥४॥
हे अग्निदेव ! आप कृषकों के स्वामी, धन के संचालक एवं उषाओं सहित दिवस के ध्वज के समान हैं। आपके घोड़े आपकी सेवा करते हैं । पापनाशक वाणियाँ और घृत की आहुतियाँ आपकी सेवा करती हैं॥५॥
हे अग्निदेव ! आपको वसुओं ने विलक्षण बल प्रदान कर बलवान् बनाया है। आप मित्रों के सहायक होते हैं । श्रेष्ठकर्म (यज्ञ) करने वाले आर्यजनों (सज्जनो) की रक्षा करने के लिए आपने प्रखर तेज द्वारा भयभीत करके दस्युओं को भगा दिया॥६॥
हे अग्निदेव ! आप अंतरिक्ष में सूर्यरूप से प्रकट होकर सोमरस को वाष्पीकृत कर सर्वप्रथम ग्रहण करते हैं । हे ज्ञान स्वरूप अग्निदेव ! आप भुवनों में जल (मेघ) को प्रकट करते हैं। आपका विद्युत् रूप देखकर एवं गड़गड़ाहट (मेघ गर्जना) को सुनकर अन्न की कामना वाले व्यक्ति आशान्वित होते हैं॥७॥
हो जातवेदा अग्निदेव ! आप समस्त मानवों द्वारा वरणीय हैं । आप उन्हें यश प्रदान करते हैं। आप वह विद्युत्मयी बरसात हमारे लिए प्रेरित करें, जिससे अन्न एवं धन की वृद्धि हो॥८॥
हे समस्त मनुष्यों के हितैषी अग्निदेव ! रुद्रगणों तथा वसुओं के साथ आप हमारा कल्याण करें । हम याजक आपके लिए हवि अर्पित करते हैं। आप हमें यशवर्धक अन्न, धन एवं बल प्रदान करें॥९॥

सूक्त-६

(शत्रु की) नगरियों को विध्वंस करने वाले वीर (अग्नि) की हम वन्दना करते हैं। असुर एवं वीर मनुष्यों द्वारा स्तुत्य, सम्राट् इन्द्र के समान बलवान् (अग्नि) की स्तुति करते हुए, हम उनके कार्यों का वर्णन करते हैं॥१॥
अग्निदेव कवि (विद्वान्), केतुरूप (प्रदर्शक) मेघों को धारण करने वाले और सबका कल्याण करने वाले हैं। द्यावा-पृथिवीं के सुशासक अग्निदेव ही हैं। परम पुरुषार्थी, शत्रुओं के किलों को ध्वस्त करने वाले पुरातन अग्निदेव का हम यशोगान करते हैं॥२॥
अकर्मी, बकवादी, कटुवक्ता, पणि, श्रद्धाशून्य, यज्ञ न करने वाले एवं पतित आदि को अग्निदेव प्रगतिहीन बनाकर दूर करें । प्रमुख देव (अग्निदेव) यज्ञ न करने वाले को कनिष्ठ (प्रगतिहीन) बना देते हैं॥३॥
अन्धकार से घिरे मानवों को अग्निदेव ने प्रकाशरूप प्रज्ञा (बुद्धि) से श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। हम ऐसे शत्रुनाशक, धन के स्वामी, अग्निदेव की स्तुति करते हैं॥४॥
जिन (अग्निदेव) ने अपने आयुधों से आसुरी माया को झुकाया (काबू में किया) और पूर्व पत्नी उषा का उत्पन्न किया, उन्हीं ने अपनी प्रतिरोधक शक्ति से प्रजाओं को निरुद्ध करके, उन्हें (प्रज्ञाओं का ) नहुष का 'कर' (टेक्स) देने वाली बनाया॥५॥
अपने सत्कर्मों सहित विदाता सद्बुद्धि की कामना से वैश्वानर अग्निदेव के निकट उपस्थित होने हैं। समस्त प्राणियों के हितैषी वे अग्निदेव द्यावा-पृथिवी के मध्य प्रकट होते हैं॥६॥
वैश्वानर अग्निदेव सूर्यरूप में प्रकट होकर अन्धकार का नाश करते हैं । अन्तरक्ष एवं द्यावा-पृथिवी से अन्धकार को समाप्त करते हैं॥७॥

सूक्त-७

हे अग्निदेव ! आप देवताओं में, वृक्षों को जलाने वाले के रूप में ख्याति प्राप्त हैं । आप यज्ञ में सर्वज्ञ होकर, अश्व की तरह तीव्र गति से असुरादि को खदेड़ (भगा) देते हैं॥१॥
हे अग्निदेव ! आप अति आनन्दित होते हुए देवताओं से मित्रता करें । आप पृथ्वी के ऊपरी भागों को अपने शोषक तेज से ध्वनित करते हुए एवं वनों को ज्वालाओं द्वारा भस्म करते हुए अपने मार्ग से आएं॥२॥
यज्ञ के पूर्व में कुशा अच्छी प्रकार स्थापित करें । विश्व के माता-पिता का आवाहन करें । यज्ञाग्नि की अच्छी प्रकार सेवा करके, उन्हें युवा (प्रज्वलित) बना करके हविदाता प्रसन्न मन से आहुति समर्पित करके अग्निदेव को तृप्त करें॥३॥
विशेषज्ञ जन रथारूढ़ अग्निदेव को शीघ्रता से उत्पन्न कर लेते हैं, तब सत्यनिष्ठ एवं मधुरभाषी अग्निदेव प्रजाओं के घर में रहकर हवि ग्रहण करते हैं और प्रसन्न होकर सभी को आनन्द प्रदान करते हैं॥४॥
प्रजाओं के घरों में रहने वाले, जो अग्निदेव होता द्वारा पूजित होते हैं, जिन्हें द्युलोक और भूलोक बढ़ाते हैं; वे अग्निदेव हविदाता के हव्य को वहन कर ब्रह्मादि देवों तक पहुँचाते हैं॥५॥
जो मनुष्य यज्ञ के निमित्त अग्निदेव को प्रज्वलित कर उन्हें मन्त्रों से संस्कारित करते हैं, वे अग्निदेव अन्न से हमारा सब प्रकार पोषण करते हैं॥६॥
हे अग्ने ! आप बल से समुत्पन्न एवं वसुओं के ईश हैं । हम सब वसिष्ठ गोत्रीय होतागण, आपके निमित्त हवि समर्पित करते हैं । आप विदाता एवं स्तोताओं को सुरक्षा प्रदान करते हुए उन्हें अन्नादि से परिपूरित करें॥७॥

सूक्त-८

श्रेष्ठ शासक अग्निदेव को वन्दनापूर्वक प्रज्वलित किया जा रहा है । मनुष्य अबाध आहुतियों द्वारा जिनका यजन करते हैं, घृत द्वारा जिनका संवर्धन होता हैं, वे अग्निदेव (सूर्यरूप में) उषाओं से पूर्व प्रकाशित होते हैं॥१॥
ये अग्निदेव महान् हैं । प्रसन्न हुए विस्तृत अग्निदेव अपनी दीप्ति फैलाते हैं । कृष्णमार्ग गामी (धूम्रमार्गगामी) अग्निदेव पृथ्वी पर ओषधियों (काष्ठ) द्वारा वृद्धि को प्राप्त होते हैं॥२॥
हे अग्निदेव ! आप हमारी स्तुति को, कौन सा हवि-द्रव्य अर्पित करने पर स्वीकार करेंगे ? हे उत्तम दानदाता अग्निदेव ! हमको कब अलभ्य धन प्राप्त होगा और कब हम उसको बॉटने (दान-देने) में समर्थ होंगे?॥३॥
हविष्य प्रदान करने वाले याजक के आमंत्रण को स्वीकार कर, देवों के अतिथि अग्निदेव अति तेजस्वी होकर सूर्यदेव के समान ही प्रकाश फैलाते हैं । 'पूरु’ को पराजित करने वाले अग्निदेव हमारे लिए कल्याणकारी भावों से युक्त होकर प्रज्वलित होते हैं॥४॥
हे अग्निदेव ! आपका जन्म भली प्रकार हुआ है । आप तेजस्विता धारण कर प्रसन्न हों । पर्याप्त आहुतियों को ग्रहण कर आपका शरीर विस्तृत हो। आप स्तुतियों को सुनकर हर्षित हों॥५॥
हजारों गौओं के स्वामी तथा सैकड़ों गौओं के दानदाता, कर्म के मर्म को जानने वाले, विशिष्ट विद्याओं के ज्ञानी, महान् अघि वसिष्ठ ने अग्निदेव की इस स्तोत्र से स्तुति की॥६॥
हे अग्निदेव ! आप बल से उत्पन्न एवं वसुओं के ईश हैं। हम सब वसिष्ठ गोत्रीय होता आपके निमित्त हवि अर्पित करते हैं। आप हविदाता एवं स्तोताओं को सुरक्षा प्रदान करते हुए उन्हें अन्नादि से परिपूरित करें॥७॥

सूक्त-९

जार (अन्धकार या पापों को जीर्ण कर देने वाले), होता, हर्ष प्रदायक, विद्वान्, पवित्र करने वाले अग्निदेव उषाकाल में जाग गये हैं। ये अग्निदेव देवों एवं मनुष्यों, दोनों को प्रज्ञावान् बनाते हैं। देवों के लिए हवि प्रदान करने वालों और सत्कर्म करने वालों को धन देते हैं॥१॥
जिन श्रेष्ठ कर्मा अग्निदेव ने पणियों के द्वार को खोलकर गौओं को मुक्त कराया था, वे पूजनीय, दुधारू गौओं के समूह को ढूँढ़ने वाले, देवों को आनन्द प्रदान करने वाले, मन से संयमित रहने वाले अग्निदेव रात्रि के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं॥२॥
जो मूढ़ नहीं हैं । जो ज्ञानी, अदीन, मित्र, पूज्य, तेजस्वी, मंगलकारी, विशेष रूप से प्रकाशित अग्निदेव उषाओं के पूर्व प्रकाशित होते हैं, वे अग्निदेव जल के गर्भ से उत्पन्न होकर ओषधियों में प्रवेश करते हैं॥३॥
हे अग्ने ! जब मनुष्य यज्ञ कर्म करते हैं, उस समय आपकी स्तुति की जाती है । जातवेदा अग्निदेव संग्राम के समय प्रदीप्त होते हैं । वे दर्शनीय आभा से सुशोभित होते हैं। स्तुतियाँ समिद्ध अग्नि को प्रेरित करती हैं॥४॥
हे अग्निदेव ! आप दौत्य कर्म के निमित्त देवताओं के पास गमन करें । हे देव ! संघ में रहने वाले हम स्तोताओं को न मारें । हमें रनों का दान देने के लिए, आप सरस्वती, मरुद्गण एवं सभी देवताओं का यजन करें॥५॥
हे अग्निदेव ! वसिष्ठ गोत्रीय होता आपके लिए समिधा अर्पित करते हैं। आप कटुभाषी असुरों का संहार करें । हे ज्ञातवेदा अग्निदेव ! आप उनके स्तोत्रों द्वारा देवों को तुष्ट करें और हमारा कल्याण एवं पोषण करें॥६॥

सूक्त-१०

उषा के जार (उषा के प्रभाव को जीर्ण करने वाले) सूर्यदेव के समान अग्निदेव तेज का आश्रय लेकर विस्तृत होते हैं । विद्युत् के समान चमक वाले, देदीप्यमान, शोभनीय, कामनाओं के पूरक, दुःखहारी, पावन अग्निदेव कर्मों को प्रेरित करते हैं और अपनी आभा से प्रकाशित होते हैं॥१॥
उषाओं के आगे अग्निदेव, दिन में सूर्यदेव के समान सुशोभित होते हैं । सुख की कामना वाले ऋत्विग्गण मननीय स्तोत्रों का गान करते हुए, यज्ञ का विस्तार करते हैं। विद्वान्, देवताओं के दूतरूप अग्निदेव देवताओं के पास जाते हैं और प्राणियों को द्रवित करते हैं॥२॥
देवत्व प्राप्ति की इच्छा वाली बुद्धियाँ और धन की याचना करने वाली वाणी (स्तुति) उन अग्निदेव तक पहुँचती हैं। अग्निदेव, हवि को ले जाने वाले, सुन्दर दर्शनीय हैं और मनुष्यों के स्वामी हैं॥३॥
हे अग्निदेव ! आप वसुओं के साथ इन्द्रदेव का, आदित्यों के साथ विश्व की माता अदिति का, स्तुत्य अंगिरा के साथ श्रेष्ठ बृहस्पतिदेव का और रुद्रों के साथ मिलकर महान् रुद्रदेव का आवाहन करें॥४॥
धन की कामना करने वाले मनुष्य स्तुति योग्य, होता और युवा अग्निदेव की यज्ञ में स्तुति करते हैं। वे अग्निदेव रात्रि में भी प्रकाशित होते हैं और देव यज्ञ में हविर्दान के लिए देवताओं के तन्द्रारहित (स्फूर्तिवान्) दूत हैं॥५॥

सूक्त-११

हे अग्निदेव ! आप यज्ञ का, ध्वजा के समान ज्ञापन करने वाले हैं। आप महान् हैं। आप समस्त देवगणों सहित रथ पर आरूढ़ होकर आएँ एवं प्रथम होता के रूप में कुश का आसन ग्रहण करें । आपके बिना देवगण हर्षित नहीं होते॥१॥
हे अग्निदेव ! आप प्रगतिशील हैं । हविर्दान करने वाले मनुष्य दूतकर्म के लिए सदैव आपसे याचना करते हैं। आप देवताओं के साथ जिस याजक के कुश-आसन पर विराजते हैं, उसके आने वाले दिन शुभप्रद होते हैं॥२॥
है अग्निदेव ! त्वग्गण मनुष्य के निमित्त दिन में तीन बार आपको हवि अर्पित करते हैं। जैसे आप मनु के यज्ञ में दूत बने थे, वैसे ही हमारे इस यज्ञ में दूत बनकर, हमें शत्रुओं (दुष्कृत्यों) से बचाएँ॥३॥
अग्निदेव यज्ञ एवं समस्त आहुतियों के पति हैं । देवताओं ने अग्निदेव को हवि वहन करने वाला बनाया हैं। इन्हीं अग्निदेव की वसुगण सेवा करते हैं॥४॥
हे अग्निदेव ! आप हविष्यान्न ग्रहण करने के लिए देवताओं का आवाहन करें। आप इस यज्ञ को स्वर्गलोक तक वहन कर, वहाँ देवताओं तक पहुँचाएँ। इस यज्ञ के मुख्य देव (इन्द्रदेव) हर्षित हों । आप सब देवगण हमारा रक्षण करके कल्याण करें॥५॥

सूक्त-१२

जो अपने स्थान ( यज्ञ वेदिका) में प्रदीप्त और आकाश एवं पृथ्वी के मध्य विशेष रूप से दीप्तिमान् हैं, उन उत्तम आहुति युक्त, सर्वत्र व्याप्त, चिर युवा अग्निदेव को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए, हम उनका आश्रय प्राप्त करते हैं॥१॥
अपने महान् तेज से समस्त पापों को नष्ट करने वाले, ज्ञानरूपी प्रकाश के विस्तारक अग्निदेव, यज्ञशाला में प्रतिष्ठित होते हैं । वे स्तुत्य अग्निदेव हमें दोषपूर्ण एवं निन्दित कर्मों से बचाते हैं और आहुतियाँ स्वीकार करके, हमारे योग-क्षेम का वहन करते हैं॥२॥
हे अग्निदेव ! आप वरुण (कामनाओं) की पूर्ति करने वाले और मित्र (स्नेहपूर्वक सहयोग देनेवाले) हैं। विशिष्ट ऋत्विग्गण श्रेष्ठ स्तुतियों से आपको गौरवान्वित करते हैं। आप श्रेष्ठ धन एवं कल्याणकारी साधनों से हमारी रक्षा करें॥३॥

सूक्त-१३

सबको प्रेरणा देने वाले, (यज्ञ) कर्म को धारण करने वाले, असुरों का संहार करने वाले अग्निदेव के निमित्त हम स्तुति सहित यज्ञ कर रहे हैं। वे प्रसन्न होकर हमारी मनोकामनाओं को पूर्ण करें॥१॥
हे अग्निदेव ! आप उत्पन्न होते ही प्रदीप्त होकर सम्पूर्ण द्युलोक एवं पृथ्वीलोक को प्रकाश से भर देते हैं। हे जातवेदा वैश्वानर अग्निदेव ! आपने अपनी महिमा द्वारा शत्रुओं से देवगणों की रक्षा की॥२॥
हे वैश्वानर अग्निदेव ! उत्पन्न होते ही आप सर्वप्रेरक एवं सर्वत्रगामी होकर पशुओं की सुरक्षा करते हैं। आप ज्ञान दान के लिए मार्ग खोजते एवं भुवनों का निरीक्षण करते हैं। आप सदा हमारा पालन करें, कल्याण करें॥३॥

सूक्त-१४

हम विदाता, जातवेदा अग्निदेव की सेवा, समिधाओं से करते हैं । हम हविर्द्रव्य द्वारा एवं स्तोत्रों के गान द्वारा शुभ-आभायुक्त अग्निदेव की सेवा करते हैं॥१॥
हे अग्निदेव ! हम समिधाओं से आपकी सेवा करेंगे। हे पूजनीय अग्निदेव ! उत्तम स्तुति द्वारा हम आपकी पूजा करेंगे। हे यज्ञ के होता अग्निदेव ! हम घृत से आपकी सेवा करेंगे । हे मंगलकारी प्रदीप्त ज्वालाओं वाले अग्निदेव ! हविर्द्रव्य द्वारा हम आपकी सेवा करेंगे॥२॥
हे अग्निदेव ! वषट्कार से दिये गये अन्नरूप हवि को स्वीकार करते हुए, आप देवगणों सहित हमारे यज्ञ में पधारें । हे देव ! हम आपकी सेवा करने वाले बनें । आप सदा हमारा कल्याण करें, पालन करें॥३॥

सूक्त-१५

हे ऋत्विजो ! जो अग्निदेव हमारे अत्यधिक निकट रहने वाले मित्र हैं, ऐसे समीपस्थ अग्निदेव के निमित्त उनके मुख में हवि अर्पित करें॥१॥
हे ज्ञानी, गृहपति अग्निदेव ! आप तरुण हैं । आप पञ्चजनों (पाँच वर्षों या पंच प्राणों) के समक्ष घर-घर में प्रतिष्ठित हैं॥२॥
अत्यन्त कल्याणकारी वे अग्निदेव हमारे धन की रक्षा में सहायक हों और हमें पापों से दूर करें॥३॥
द्युलोक में शीघ्रगामी श्येन पक्षी के तुल्य अग्निदेव के निमित्त, हम स्तोतागण नया स्तोत्र प्रस्तुत करते हैं । वे हमें पर्याप्त धन प्रदान करें॥४॥
देदीप्यमान अग्नि शिखाएँ यज्ञ के अग्रभाग में वैसे ही सुशोभित दिखती हैं, जैसे पुत्रवान् याजक का धन शोभनीय होता है॥५॥
यजनीय हविर्द्रव्यों का वहन करने वाले अग्निदेव, हमारे द्वारा अर्पित वषट्कृति (स्तोत्रयुक्त आहुतियाँ) स्वीकार करें एवं हमारी प्रार्थना सुनें॥६॥
हे आभायुक्त, सुवीर अग्निदेव ! हम आपको यहाँ प्रतिष्ठित करते हैं । हे उपास्य जगत्पते ! आप याजकों द्वारा आहूत किये गये हैं॥७॥
आप रात्रि और दिन में प्रदीप्त हों । हे अग्निदेव ! आपसे ही हम उत्तम अग्नि वाले बनेंगे। आप हमारे शोभन (सुन्दर) स्तोत्रों के द्वारा प्रसन्न हों॥८॥
आपके पास विप्रजन बुद्धिपूर्वक किये गये कर्मों द्वारा धन पाने के लिए पहुँचते हैं। सहस्रों अक्षरों वाली वाणी (स्तुति) भी आपके पास पहुँचती है॥९॥
धवल, आभायुक्त, अमर, पावन और शुद्ध करने वाले अग्निदेव असुरों का नाश करते हैं। वे देव स्तुति करने योग्य हैं॥१०॥
हे बल के पुत्र अग्निदेव ! आप समस्त विश्व के अधिपति होकर हमें उत्तम धन प्रदान करें। भगदेव भी हमें धन प्रदान करें॥११॥
हे अग्निदेव ! युद्ध में आप हमसे विपरीत न हों, जिस प्रकार भारवाहक भार को उठा लाता है, उसी प्रकार शत्रु से जीती हुई, संगृहीत सम्पदा को लाकर हमें प्रदान करें॥१२॥
हे अग्निदेव ! पाप से हमें बचाएँ । हमारी रक्षा कर आप अपने अजर-अमर तथा प्रखर तेज से हिंसक शत्रुओं की कामनाओं को भस्मीभूत करें॥१३॥
हे शत्रुओं द्वारा आक्रान्त न होने वाले अग्निदेव ! आप हम मनुष्यों की सुरक्षा के लिए सैकड़ों विशेषताओं से सम्पन्न लौहवत् एक सुदृढ़ नगर बनाएँ॥१४॥
हे अदम्य अग्निदेव ! आप हमें दिन-रात पापों से बचाएँ और दिन एवं रात के समय दुष्ट शत्रुओं से आप हमारी रक्षा करें॥१५॥


सूक्त-१६

शक्ति क्षीण न होने देने वाले, चेतना एवं स्नेह प्रदाता, उत्तम यज्ञ के आधाररूप, ज्ञानदाता, सनातन अग्निदेव का आवाहन करते हुए हम उनकी वन्दना करते हैं॥१॥
वे अग्निदेव विश्व के प्राणियों का पोषण करने में समर्थ तेज को नियोजित करते हैं । वे उत्तम ज्ञानी, संयमी, पवित्र अग्निदेव श्रेष्ठ आहुतियों से प्रदीप्त होकर गतिमान होते हैं । ये अग्निदेव ही विद्वानों के श्रेष्ठ धन हैं॥२॥
कामनाओं की पूर्ति करने वाले अग्निदेव को लोग प्रदीप्त कर रहे हैं। उसमें (अग्नि में ) हवि अर्पित करने पर, अग्निदेव का तेज ऊर्ध्वगामी होता है । तेजवान् एवं दिविस्पर्शी (स्वर्ग लोक तक पहुँचने वाला) धूम्र ऊर्ध्वगमन कर रहा है॥३॥
हे बल से उत्पन्न यशस्वी अग्निदेव ! आपको हम अपना दूत स्वीकार करते हैं। हे देव ! हवि ग्रहण करने के लिए आप समस्त देवताओं का आवाहन करें । जब हम आपसे याचना करें, तब आप हमें मानवोचित भोग्य (उपयोगी) धन प्रदान करें॥४॥
हे अग्निदेव ! आप इस यज्ञ के होतारूप और गृहपति हैं । आप सभी के द्वारा स्वीकार करने योग्य हैं तथा सभी को पवित्र करने वाले हैं। आप श्रेष्ठ ज्ञानी हैं और धनादि प्राप्त करके उसे वितरित भी करते हैं॥५॥
हे श्रेष्ठकर्मा अग्निदेव ! आप याजकों को रत्न प्रदान करें । रत्नदाता आप हमारे यज्ञ में सभी ऋत्विजों को तेजस्वी बनाएँ । जो प्रशंसनीय हैं, उन्हें कुशलतापूर्वक आगे बढ़ाएँ॥६॥
हे अग्निदेव ! उत्तम अग्नि कार्य (यज्ञ) करने वाले विद्वज्जन, धन का नियोजन करने वाले, प्रजा की व्यवस्था बनाने वाले तथा गौओं का पालन करने वाले आपकी कृपा के पात्र बनें॥७॥
यज्ञ के निमित्त जिन घरों में घृत और हविष्यान्न से पूर्ण पात्र लिए हुए देवीस्वरूपा स्त्रियाँ निवास करती हैं, हे बलेवान् अग्निदेव ! आप निन्दकों एवं शत्रुओं से उनकी रक्षा करें । हम आपकी स्तुति करते रहें॥८॥
हे अग्निदेव ! आप, हविर्द्रव्य प्रेषित करने वाले हम सबको श्रेष्ठ कर्म में प्रेरित करें। आप हवि वाहक हैं । आनन्द देने वाली जिह्वा से हवि का वहन करने वाले हे देव ! आप हमें धन प्रदान करें॥९॥
हे अतितरुण अग्निदेव ! जो लोग यश प्राप्ति की कामना से साधना करते हैं एवं अश्वात्मक (गतिशील) हुवि अर्पित करते हैं, उन्हें आप पापों से बचाएँ; अपने संरक्षण साधनों तथा सैकड़ों नगरियों (किलों ) द्वारा उनको सुरक्षित करें॥१०॥
(हे याजको !) धन प्रदाता अग्निदेव आपसे पूर्ण पात्र या पूर्ण भाव युक्त आहुति की अपेक्षा करते हैं। आप उन्हें सिंचित करें अथवा (पात्र को) परिपूर्ण करें, तब वे देवता आपके कार्यों (यज्ञादि अथवा काम्य कर्मों) का वहन करेंगे॥११॥
देवों ने श्रेष्ठ प्रज्ञावान् उन अग्निदेव को अपना सहायक बनाया है, जो हवि के वाहक हैं । वे यज्ञ करने वालों तथा दान देने वालों के लिए पराक्रम आदि श्रेष्ठतम विभूतियाँ प्रदान करते हैं॥१२॥

सूक्त-१७

हे अग्निदेव ! आप भली प्रकार प्रज्वलित हों । याजक अच्छी तरह से कुश का आसन बिछाएँ ॥१॥
हे अग्निदेव ! देवताओं की कामना करने वाली (नारियों अथवा वाणियों) को आप आश्रय प्रदान करें एवं यज्ञ (आहुतियों ) की अभिलाषा करने वाले देवताओं को आप इस यज्ञ में आवाहन करें॥२॥
हे ज्ञातवेदा अग्निदेव ! आप देवताओं के पास पहुँचकर, वि द्वारा देवताओं का यजन करें। उन्हें शोभन यज्ञकर्ता बनाएँ॥३॥
हे जातवेदा अग्निदेव ! आप अमर्त्य देवताओं का यजन करें। आप स्तोत्रों द्वारा उनको प्रसन्न करें॥४॥
हे प्रज्ञावान् अग्निदेव ! आप हमें सभी प्रकार का श्रेष्ठ धन प्रदान करें । (आपकी कृपा से) आज हमारे (प्रति प्रदान किए गये) आशीर्वाद सत्य (फलित) हों॥५॥
हे बल के पुत्र अग्निदेव ! आपको देवताओं ने ह-िवाहक के रूप में धारण (स्वीकार किया है॥६॥
हे अग्निदेव ! आप प्रकाशस्वरूप, महान् एवं उपास्य हैं। हम आपके निमित्त आहुतियाँ अर्पित करेंगे। आप हमें रल (धन या विभूतियाँ) प्रदान करें॥७॥

सूक्त-१८

हे इन्द्रदेव ! प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज स्तुति द्वारा आपको प्रसन्न करके धन को प्राप्त करते थे । आप उत्तम घोड़ों एवं दुधारू गौओं के स्वामी हैं । आप, देवत्व-प्राप्ति की कामना वाले हम सभी को प्रभूत धन प्रदान करते हैं॥१॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार रानियों के मध्य राजा सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार आप भी द्युलोक में सुशोभित होते हैं । हे इन्द्रदेव ! आप ज्ञानी और कवि होकर स्तुति करने वालों को रूप प्रदान करें एवं अश्वों द्वारा उनकी रक्षा करें । हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमें संस्कारवान् बनाएँ, जिससे धन हमारे पास आये॥२॥
हे इन्द्रदेव ! इस यज्ञ में हम स्तोता, स्तोत्रों द्वारा आपको यशोगान करते हैं। स्पर्धा करने वाली, हर्षित करने वाली एवं देवत्व की कामना वाली हमारी ये वाणियाँ आपके समीप पहुँचती हैं । हम, आप द्वारा प्रेषित सद्बुद्धि से सत्कर्म करते हुए सुख पायें एवं धन भी प्राप्त करें॥३॥
वसिष्ठ आपके (अनुदान रूप दुग्ध) दोहन के निमित्त, बछड़ा रूपी स्तोत्रों की रचना करके उसी तरह दुह लेते हैं, जिस तरह उत्तम घास वाली गोशाला की गाय को (बछड़े के सहारे से) गोपालक दुह लेता है । विश्व में आप ही गौओं (इन्द्रियों एवं किरणों) के पतिरूप में प्रसिद्ध हैं। हे इन्द्रदेव ! हम वसिष्ठ गोत्रीय होता की स्तुति सुनकर आप हमारे निकट आएँ॥४॥
स्तुति से प्रसन्न होकर इन्द्रदेव ने राजा ‘सुदास' (श्रेष्ठ भक्त) को उत्ताल तरंगों वाली, कठिन, पार न की जा सकने वाली नदी ‘परुष्णी' को सहजता से पार करा दिया। स्तुति करने वालों को अपने तरंगित नदियों के शाप से मुक्त किया ॥५॥
"तुर्वश' (राजा तुर्वश अथवा कामना युक्त जल्दबाज व्यक्ति) यज्ञ द्वारा प्रगति चाहते थे, मत्स्यों (मत्स्य वंशियों अथवा मछलियों) की तरह धन-ऐश्वर्य के लिए प्रयलरत थे, ‘भृगु (वेदज्ञ, यजनशील ज्ञानी) तथा 'द्रुह' (द्वेषपूर्वक रहने वाले) धन के लिए स्पर्धारत थे; इस स्पर्धा में मित्र (इन्द्र) ने ‘तुर्वश' आदि को नष्ट किया। मित्र सुदास (सदाशय सम्पन्न भृगु आदि) को तार दिया॥६॥
हविष्यान्न पकाने में कुशल, तपोनिष्ठ, भद्रमुख (प्रसन्नचित्त), विषाण धारक (दीक्षित) स्तोतागण सबके कल्याण की इच्छा से उन इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं, जिन इन्द्रदेव ने साथ-साथ रहने वाले उत्तम पुरुषों की गौओं को वापस लाने के लिए, युद्ध में गौओं को चुराने वालों का संहार किया॥७॥
दुष्ट बुद्धि वाले मूढ़ शत्रुओं ने ‘परुष्णी नदी के तटों को तोड़ डाला। इन्द्रदेव की कृपा से 'सुदास' ने ‘चयमान' के पुत्र को, पाले गये पशु के समान सहज ही धराशायी कर दिया, जिससे ‘सुदास' का यश विश्वव्यापी हुआ ॥८॥
इन्द्रदेव ने ‘परुष्णी नदी के तटों को सुधरवा कर जल-प्रवाह को व्यवस्थित किया । ‘सुदास' का घोड़ा भी अपने गन्तव्य स्थान को गया । इन्द्रदेव ने सुदास के उन शत्रुओं का संहार कर दिया, जो बकवादी तथा बहुत संतान युक्त थे॥९॥
गोपालक के बिना भी जिस प्रकार गौएँ जौ के निमित्त जाती हैं, वैसे ही माता के द्वारा प्रेरित, चैतन्य, विभिन्न वर्गों की गौओं वाले (मरुद्गण) पूर्व निश्चयानुसार अपने मित्र इन्द्रदेव के सहयोग के लिए जाते हैं । मरुद्गणों के अश्व भी चपलता से गतिमान होते हैं॥१०॥
वीर इन्द्रदेव ने सुदास (उत्तम जनों) की सहायता के लिए मरुतों को उत्पन्न किया । ये मरुद्गण संग्राम में शत्रुओं को उसी तरह काटते हैं, जैसे युवक दर्शों को काटता है । इन्द्रदेव ने सुदास की रक्षा के लिए इक्कीस वैकर्णो (विकर्ण क्षेत्रवासी, अथवा ने सुनने वाले अथवा निर्देश की उपेक्षा करने वाले) का वध किया॥११॥
इसके अतिरिक्त हाथ में वज्र धारण करने वाले इन्द्रदेव ने श्रुत, कवष तथा वृद्ध द्रोही जनों को जल में डुबाकर मार डाला । हे इन्द्रदेव ! उस समय जिन्होंने आपके अनुकूल आनन्दवर्धक कार्य किये, वे आपके मित्र कहलाए॥१२॥
इन्द्रदेव ने स्वयं की सामर्थ्य से शत्रुओं की सैन्य शक्ति एवं सुदृढ़ किलों को ध्वस्त किया। ‘अनु” के पुत्र के गय (घरं या प्राण) को ‘तृत्सु' के लिए प्रदान किया। हे इन्द्रदेव ! आप हम पर ऐसी कृपा करें, ताकि हम कटुभाषी पर विजय प्राप्त कर सकें॥१३॥
हे इन्द्रदेव ! 'अनु’ और ‘दुह' के अनुयायी छासठ हजार छासठ वीरों का, आपने सुदास के हित के लिए वध किया था, ये समस्त कार्य आपके पराक्रम के ही द्योतक हैं॥१४॥
संग्राम भूमि में अज्ञानी, दुष्ट सहयोगियों वाले ‘तृत्सु', इन्द्र के समक्ष टिक न सके और निम्न प्रवाही जल की तरह तीव्रगति से भाग खड़े हुए। छोड़ी गयी भोग्य सामग्री सुदास को प्राप्त हुई॥१५॥
विनाश करने वाले वीरों, दुष्ट, विरन्न के भक्षक, विनाशक शत्रुओं एवं शत्रुओं के क्रोध को इन्द्रदेव ने धराशायी कर दिया। भगोड़े शत्रु को पलायन-मार्ग से भागने को विवश किया॥१६॥
इन्द्रदेव ने सुदास द्वारा जो कार्य करवाये, वे वैसे ही चमत्कारपूर्ण लगे, जैसे कोई दरिद्र बड़ा दान करे, बकरा सिंहराज को मार डाले अथवा सुई से कोई यूप काट डाले । इस प्रकार इन्द्रदेव ने सुदास को ही समस्त प्रकार के भोग्य-ऐश्वर्य प्रदान किये॥१७॥
हे इन्द्रदेव ! समस्त वीर शत्रुगण आपके वश में हो गये हैं । हे देव । सुकर्मियों का अहित करने वाले 'भेद (इस नाम के असुर या भेद वृत्ति) को भी वशीभूत करके, उस पर वज्र प्रहार करें॥१८॥
इस सर्वव्यापी युद्ध में इन्द्रदेव ने भेद' (आदि) शत्रुओं का संहार किया था । यमुना और तृत्सुओं ने इन्द्रदेव को सन्तुष्ट किया था। ‘अजा', 'शिमु’ और ‘यक्षु' जनों ने इन्द्रदेव के निमित्त अनके अश्व उपहार में दिये थे॥१९॥
हे इन्द्रदेव ! आपने पहले भी कृपा करके जो धनादि प्रदान किये, वे सब उषाओं की भाँति ही अवर्णनीय हैं। आपके नूतन उपकारों का भी वर्णन नहीं किया जा सकता है । आपने ‘मान्यमान' के पुत्र 'देवक' का संहार किया एवं आपने बड़ी शिला के द्वारा शम्बर असुर को स्वयं वध किया॥२०॥
हे इन्द्रदेव ! जिन्हें असुर मारना चाहते थे, ऐसे पराशर, वसिष्ठ आदि ऋषियों ने भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति की है । आप उनके पालक हैं। अत: वे आपकी मित्रता को नहीं भूले । आपकी कृपा से इन अषयों को श्रेष्ठ दिवस (शुभ अवसर प्राप्त हों॥२१॥
हे अग्निदेव ! देववान् के पौत्र एवं पिजवन के पुत्र राजा सुदास ने दो सौ गौएँ और भारवाही दो रथों को दान में दिया, हम इस दान की प्रशंसा करते हुए, होता की ही भाँति1 गृह में यज्ञ सम्पन्न करने हेतु जाते हैं॥२३॥
पिजवन पुत्र राजा सुदास ने सोने के आभूषणों से सजे हुए एवं कठिन मार्गों में भी सहजता से गमन करने वाले, पुत्रवत् पाले गये चार-अश्व (वसिष्ठ ऋषि को) श्रद्धा सहित दान दिए । पृथ्वी पर प्रसिद्ध वे घोड़े वसिष्ठ ऋषि को पुत्र के समान (संरक्षित रखते हुए) पुत्र एवं यश (प्राप्ति के लिए ले जाते हैं॥२३॥
'राजा सुदास' का यश दान-दाता के रूप में पृथ्वी से स्वर्गलोक तक फैला हैं । सातों लोक इस महान् दानी की उसी तरह प्रशंसा करते हैं, जिस प्रकार इन्द्रदेव की । इनके युध्यामधि नामक शत्रु को नदियों द्वारा (डुबाकर)मार डाला गया॥२४॥
हे नेतृत्व क्षमता सम्पन्न मरुतो ! ये राजा सुदास हैं, इनके पिता पिजवन हैं । आप दिवोदास के समान ही सुदास के निवास की रक्षा करें। इनका क्षात्रबल बढ़ता ही जाये, कम न हो॥२५॥

सूक्त-१९

जो इन्द्रदेव तीक्ष्ण सींग वाले वृषभ के समान भयंकर हैं, वे अकेले ही समस्त शत्रुओं को अपने स्थान से पतित कर देते हैं । जो यजन नहीं करते, ऐसे लोगों के निवास छीन लेने वाले हे इन्द्रदेव ! आप हम याजकों को धन-ऐश्वर्य प्रदान करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! जब संग्राम काल में आपने 'कुत्स’ की सुरक्षा, स्वयं शुश्रूषा करके की थी, तब अर्जुन के पुत्र कुत्स को धन दिया था एवं दास 'शुष्ण’ और ‘कुयव' का संहार किया था॥२॥
हे अदम्य इन्द्रदेव ! आप हवि पदार्थ अर्पित करने वाले राजा सुदास की सुरक्षा, अपनी रक्षण शक्ति सहित वज्र द्वारा करते हैं। आपने शत्रु का संहार करने के समय एवं भूमि के बँटवारे के समय, पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु एवं पूरू का संरक्षण किया था ॥३॥
मनुष्यों के हितैषी मनवाले हे इन्द्रदेव ! आपने युद्ध भूमि में मरुद्गणों की सहायता से उनके शत्रुओं का विनाश किया था। हे हरित वर्ण के अश्व वाले इन्द्रदेव ! आपने ही दभीति की सुरक्षा के लिए दस्यु चुमुरि एवं धुनि को मारा॥४॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने अपने प्रसिद्ध बल के द्वारा शत्रुओं के निन्यानवे नगरों को बहुत कम समय में ही ध्वस्त कर दिया। अपने निवास के लिए सौवें नगर में प्रवेश कर आपने वृत्रासुर एवं नमुच को मारा॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आपने हविदाता राजा सुदास के लिए सदा रहने वाली धन-सम्पदा प्रदान की । हे बहुकर्मा इन्द्रदेव ! आप कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं। हम आपके लिए दो बलशाली अश्वों को रथ में नियोजित करते हैं। आप बलवान् के पास हमारे स्तोत्र पहुँचें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप बलवान् हैं और अश्वों के स्वामी हैं। आपके इस यज्ञ में हम दूसरों से सहायता प्राप्त करने का पाप न करें । आप अपने रक्षण साधनों से हमारी रक्षा करें । हम आपकी स्तुति करने वाले विशेष प्रिय पात्र बनें॥७॥
हे धनपति इन्द्रदेव ! आपकी स्तुति करने वाले हम परस्पर प्रेमपूर्वक मित्रभाव से घर में प्रसन्न होकर रहें । आप अतिथि-सत्कार में निपुण सुदास को सुख प्रदान करते हुए, तुर्वश एवं यदुवंशी को परास्त करें॥८॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! आपके यज्ञ में हम स्तोता ही उक्थ(स्तोत्रों) का उच्चारण करते हैं। आपको हवि अर्पित करके, उक्थों के उच्चारण द्वारा पणियों (लोभियों) को भी धन दान करने की प्रेरणा दी । हम सबको आप मित्रवत् स्वीकार करें॥९॥
हे नेतृत्व करने वालों में श्रेष्ठ इन्द्रदेव ! स्तोत्रों और हवि द्वारा आपका यजन करने वालों ने आपको हम सबका हितैषी बना दिया है। आप युद्ध के समय इन्हीं स्तोताओं की रक्षा करें॥१०॥
हे शूरवीर इन्द्रदेव ! स्तुत्य होकर और ज्ञान से प्रेरित होकर आपके शरीर और रक्षण शक्तियों में वृद्धि हो । हम सबको आप अपनी कल्याणकारी शक्तियों द्वारा सुरक्षित कर, अन्न एवं आवास (घर) प्रदान करें॥११॥

सूक्त-२०

धारणशक्ति युक्त पराक्रमी इन्द्रदेव वीरतापूर्ण कार्य करने के लिए ही उत्पन्न हुए हैं। वे उस कार्य को अवश्य ही पूर्ण करते हैं, जो उन्हें मनुष्यों के हित के लिए उचित लगता है । यज्ञशाला की ओर जाने वाले तरुण एवं संरक्षक, इन्द्रदेव महापातक से हमारी रक्षा करें॥१॥
वृद्धि को प्राप्त होकर इन्द्रदेव वृत्र का संहार करते हैं । स्तोताओं को आश्रय प्रदान करके, वे वीर उनकी रक्षा करते हैं। वे सुदास राजा के लिए क्षेत्र का निर्माण करते हैं । वे याजक को बार-बार धन प्रदान करते हैं॥२॥
युद्ध कला में कुशल, युद्धरत रहने वाले, योद्धा, संग्राम के लिए सदा तत्पर, शूरवीर एवं सहज स्वभाव से ही अनेक शत्रुओं को जीतने वाले, स्वयं कभी न हारने वाले, इन्द्रदेव ने शत्रु सैन्य दल को अस्त-व्यस्त करते हुए शत्रुओं का वध किया॥३॥
हे परम ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आप अपने बल एवं महिमा द्वारा, द्यावा-पृथिवीं दोनों लोकों को परिपूरित करते हैं। वे इन्द्रदेव अश्व वाले और शत्रुओं पर वज्र से आघात करने वाले हैं। उन देव की यज्ञ में सोमरस द्वारा सेवा की जाती है॥४॥
बलवती माता एवं बलवान् पिता ने मनुष्यों के हित में युद्ध करने के लिए पुत्र इन्द्रदेव को उत्पन्न किया। जो मनुष्यों के हितकारी सेनानायक होकर प्रभावी स्वामी बन जाते हैं, वे शत्रुनाशक इन्द्रदेव गौओं (किरणों) की खोज करने वाले एवं शत्रुओं का दमन करने वाले हैं॥५॥
जो मनुष्य इन शूरवीर इन्द्रदेव के मन को, यज्ञ द्वारा सेवा करके प्रसन्न करते हैं, वे पतित नहीं होते हैं और न क्षीण होते हैं । यज्ञोत्पन्न और यज्ञ रक्षक इन्द्रदेव, स्तोताओं को धन प्रदान करते हैं॥६॥
हे विचित्र इन्द्रदेव ! जो धन पूर्वज अपने वंशजों को देते हैं । जो श्रेष्ठ से कनिष्ठ को प्राप्त होता है तथा जो अक्षय धन दूर देश जाकर प्राप्त किया जाता है। वे तीनों प्रकार के धन आप हमें प्रदान करें॥७॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! जो प्रिय मित्र आपके लिए हवि प्रदान करता है, उसे आपके द्वारा प्रदत्त दान प्राप्त हो । आपकी कृपा से हम धनवान्, अन्नवान् एवं अहिंसक वृत्ति वाले बनें । मनुष्यों के निवास योग्य सुरक्षित घर में हम रहें॥८॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! आपका बलवर्धक यह सोम, शब्द करता है एवं स्तोतागण स्तुति करते हैं । हे इन्द्रदेव ! हम आपके स्तोतागण हैं, हमें धन की इच्छा है, अतएव आप हम लोगों को धन सहित निवास प्रदान करें॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें धारण कर सुरक्षित रखें; ताकि आपके द्वारा प्रदत्त अन्न के उपभोग करने की शक्ति हमारे अन्दर रहे । जो धनवान् स्वेच्छा से हवि प्रदान करते हैं, उन्हें भी सुरक्षित करें । स्तोताओं में स्तुति करने की शक्ति रहे । आप कल्याणकारी रक्षण-साधनों से हम सबकी सुरक्षा करें॥१०॥

सूक्त-२१

यह निचोड़ा गया दिव्य सोमरस गो दुग्ध के साथ मिश्रित हुआ है । इन्द्रदेव जन्म से ही इसके प्रति रुचि रखते हैं । हे हरि (नामक) अश्वों से युक्त (इन्द्र !) हम यज्ञों में आपको जाग्रत् करते हैं। सोम से आनन्दित होकर आप हमारे स्तोत्रों पर ध्यान दें॥१॥
याजक, यज्ञशाला में पहुँचकर कुशा के आसन बिछाते हैं और पत्थरों से सोम कूटते हैं। सोम कूटने से पत्थरों की टकराहट की कर्कश ध्वनि दूर से ही सुनाई पड़ती है । ऋत्विग्गण बलवर्धक सोम कूटने वाले पत्थर घर से ही लेकर आए थे॥२॥
हे शूरवीर इन्द्रदेव ! वृत्र के द्वारा आक्रान्त होकर स्तब्ध हुए बहुत से जल प्रवाहों को आपने प्रवाहित किया। आपने हीं नदियों को ऐसे प्रवाहित होने दिया, जैसे रथारूढ़ वीर जा रहे हों । आपके भय से भुवन कम्पित हो गये॥३॥
इन्द्रदेव मानवों के हितकारी एवं समस्त कार्य करने में कुशल हैं। आयुध धारण करके भयंकर प्रतीत होने वाले इन्द्रदेव हर्षित होकर वज्र धारण कर, शत्रुओं की सेना में प्रविष्ट होकर, शत्रुओं को भ-कम्पित करते हुए उनका वध करते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! असुरगण हमारे ऊपर घात न कर सकें । बलशाली (वे असुर) हमारे वन्दन एवं अध्ययन में भी (घात) नहीं करें । हे आर्य ! आप विषम (व्यक्तियों, जीवों या प्रवृत्तियों) को अपने नियंत्रण में रखें । हिंसक स्वभाव वाले या कामी वृत्ति के लोग हमारे यज्ञ के निकट भी न आने पायें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने पुरुषार्थ द्वारा भूलोक के समस्त शत्रु प्राणियों को पराभूत करते हैं। आपकी महिमा को समस्त लोक (चौदहों भुवन) नहीं जानते हैं । आप निज बल से वृत्र-शत्रु का संहार करते हैं। युद्ध में शत्रुगण आपका पार नहीं पा सकते॥६॥
हे इन्द्रदेव ! पूर्व देवों ने आपके बल एवं शत्रु मारने की शक्ति की तुलना में अपने को कमजोर ही माना था। आप शत्रुओं को जीतकर, (जीता हुआ) धन अपने भक्तों को प्रदान करते हैं। धन की इच्छा से याजक इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं॥७॥
हे शासनकर्ता इन्द्रदेव ! स्तोतागण आपकी स्तुति करते हुए अपनी सुरक्षा की कामना करते हैं। आप सैकड़ों रक्षण साधनों के द्वारा हमारे धन की सुरक्षा करें । आपसे जो स्पर्धा करते हैं, ऐसे शत्रु को आप नाश करें॥८॥
हे इन्द्रदेव ! हम सब आपका यशोवर्धन करने वाले सदैव आपके सखा रूप में रहें । महिमावान् - तारक हे इन्द्रदेव ! स्तोतागण आपके द्वारा सुरक्षित रहते हुए, आक्रमणकारियों को जीत लें॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें ऐसी धारण शक्ति प्रदान करें, जिससे हम आपके द्वारा दिये गये अन्न का भोग कर सकें । जो धनवान् स्वेच्छा से हवि प्रदान करते हैं, उन्हें भी सुरक्षित करें । हम स्तोताओं में स्तुति करने की शक्ति धारण करायें। अपने समस्त कल्याणकारी रक्षण साधनों से आप हम सबकी सुरक्षा करें॥१०॥

सूक्त-२२

हे अश्वयुक्त इन्द्रदेव ! आप आनन्ददायक सोमरस का पान करें । संचालक के बाहुओं से सुनियंत्रित घोड़े के समान (यज्ञशाला में सुरक्षित रखे गये पत्थर के द्वारा (कूटकर) आपके लिए सोमरस निकाला जाता है॥१॥
घोड़ों के स्वामी हे समृद्धिशाली इन्द्रदेव ! जिस सोमरस के उत्साह द्वारा आप वृत्रासुर (दुष्टों) का हनन करते हैं, वह श्रेष्ठ रस आपको आनन्द प्रदान करे॥२॥
हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! विशिष्ट याजक (वसिष्ठ) गुणगान करते हुए, जिस श्रेष्ठ वाणी से आपकी अर्चना कर रहे हैं, उसे आप भली-भाँति विचारपूर्वक स्वीकार करें । यज्ञस्थल पर इस (ज्ञानरूपी) हविष्य को ग्रहण करें॥३॥
सोमरस पीने वाले हे इन्द्रदेव ! आप हमारे आवाहन पर ध्यान दें । अर्चना करने वाले ज्ञानियों की प्रार्थना सुनें । हमारी सेवाओं को अपने सच्चे मित्र की सेवाएँ मानकर ग्रहण करें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपके असाधारण बल को जानने वाले हम आपकी स्तुति को छोड़ नहीं सकते । यश को बढ़ाने वाले आपके स्तोत्रों का हम पाठ करते हैं॥५॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! हम मनुष्यों द्वारा आपके निमित्त सोम-यज्ञ होते रहे हैं । आपके निमित्त हवन भी सम्पादित होते हैं, अत: आप हमसे दूर कभी न रहें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आपके लिए ये अनेक सवन हैं। ये स्तोत्र भी आपका यश बढ़ाने के लिए हैं। आप ही मनुष्यों द्वारा हवि प्रदान करने योग्य हैं॥७॥
हे दर्शनीय इन्द्रदेव ! आपको ऐसी सम्माननीय महिमा का कोई पार नहीं पा सकता हैं । हे शूरवीर ! आपके पराक्रम एवं धन का पार भी कोई नहीं पा सकता है॥८॥
हे इन्द्रदेव ! प्राचीन एवं नवीन ऋषियों द्वारा रचे गये स्तोत्रों से स्तुत्य होकर आपने जिस प्रकार उनका कल्याण किया, वैसे ही हम स्तोताओं का भी मित्रवत् कल्याण करें । आप कृपा करके कल्याणकारी साधनों से हम सबकी सुरक्षा करें॥९॥

सूक्त-२३

हे इन्द्रियजित् (वसिष्ठ ऋषे ! आपकी शक्ति से सम्पूर्ण भुवनों को विस्तृत करने वाले तथा अन्न (पोषक आहार) प्राप्ति की कामना से यज्ञ में आप यश के संवर्धक उपासकों की प्रार्थना सुनने वाले इन्द्रदेव की महिमा का वर्णन करने वाले स्तोत्रों का पाठ करें॥१॥
उस समय शोक को रोकने वाली ओषधियाँ बढ़ती हैं, जिस समय देवों की स्तुतियाँ की जाती हैं। है इन्द्रदेव ! मनुष्यों में अपनी आयु को जानने वाला कोई नहीं है। आप हमें सारे पापों से पार ले जाएँ॥२॥
गौ (किरणों अथवा इन्द्रियों) के आविष्कर्ता इन्द्रदेव के रथ में हरितवर्ण के दोनों अश्वों को (स्तोत्रों द्वारा हम वसिष्ठ) नियोजित करते हैं । स्तोत्र उन इन्द्रदेव की सेवा करते हैं, जो हमारे उपास्य हैं । ये इन्द्रदेव अपनी महिमा से द्यावा-पृथिवी को व्याप्त किए हैं । इन्द्रदेव अनुपम ढंग से वृत्र का वध करते हैं॥३॥
है इन्द्रदेव ! आपकी कृपा से अप्रसूता गौओं की पुष्टि की तरह जल प्रवाह बढ़ते जाएँ। आपके स्तोतागण यज्ञ करते रहें । अश्व वायु के समान हमारे पास (आपको लेकर) आएँ। आप, स्तोतागणों को बुद्धि-बल और अन्न प्रदान करते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! देवों में एकमात्र आप ही हम पर बड़ी दया करते हैं। आप इस यज्ञ में सोमरस पीकर आनन्दित हों । शूरवीर हे देव !आप अपने उपासकों को ऐसा पुत्र प्रदान करें, जो बलशाली एवं अनेक विद्याओं में निपुण हो॥५॥
वसिष्ठ लोग बलवान्, वज्रधारी इन्द्रदेव की पूजा स्तोत्रों द्वारा करते हैं । वे स्तुति द्वारा प्रसन्न होकर स्तोताओं को वीरों और गौओं सहित धन प्रदान करते हैं। वे कल्याणकारी साधनों से हमारी रक्षा करें॥६॥

सूक्त-२४

अनेक लोगों द्वारा स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! यज्ञ वेदिका पर (निर्धारित स्थान पर) आप अपने सहयोगियों के साथ प्रतिष्ठित होने की कृपा करें । रक्षक, पोषणकर्ता तथा धनदाता आप सोमरस पान से आनन्द की अनुभूति करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप दोनों स्थानों में रहने वाले पूज्य हैं। सोमरस तैयार करके उसमें मधु मिलाया गया है। हम आपका ध्यानाकर्षण करते हुए आपके निमित्त मनन करने योग्य स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप द्युलोक या भूलोक में जहाँ भी हों, वहाँ से आएँ । हमने आपके लिए आसन बिछाया है। आपके घोड़े आपको वहाँ ले जाएँ, जहाँ आप के निमित्त स्तुतियों की जा रही हैं। आप यहाँ आकर, बिछे हुए आसन पर बैठकर, सोमपान करके आनन्दित हों॥३॥
हे हरिताश्वों वाले एवं श्रेष्ठ शिरस्त्राण वाले इन्द्रदेव ! आप समस्त रक्षण-साधनों सहित मरुद्गणों के सहयोग से शत्रुओं का वध करते हैं। हे इन्द्रदेव ! आप हमें बलवान् और सामर्थ्यवान् पुत्र प्रदान करें। आप हमारे पास आएँ॥४॥
यह रथ के अश्व जैसा बलशाली स्तोत्र उन इन्द्रदेव के निमित्त प्रस्तुत किया गया है, जो महान् वीर और विश्व के संचालक हैं। हे इन्द्रदेव ! स्तोत्र गान करने वाला आपसे दिव्य सम्पदा की कामना करता हैं । जो स्वर्ग में भी यशस्वी हों, आप हमें ऐसा धन और पुत्र प्रदान करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें कृपा करके श्रेष्ठ धन प्रदान करें । हम आपके द्वारा प्रेरित सुमति को प्राप्त करें। आप, हम हव्ययुक्तों (याजकों ) को वीर पुत्र सहित अन्न-धन प्रदान करें। आप हमारा पालन तथा रक्षण करें॥६॥

सूक्त-२५

जिस समय उत्साहित हुई सेनाएँ संग्राम करती हैं, उस समय हे मनुष्यों के हितैषी, हे वज्रधारी, पराक्रमी वीर इन्द्रदेव ! आपके बाहुओं में रहने वाला वज्र शत्रुओं पर गिरकर हमारी रक्षा करे । आपका सर्वतोगामी मन अविचलित रहे और आप हमारे लिए हितकारी कार्य करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! जो मनुष्य हमें जीतने की इच्छा से संग्राम भूमि में हमारे समक्ष डटे हैं, आप उन शत्रुओं का संहार करें । निंदकों को हम से दूर ले जाएँ। हमें पर्याप्त धन प्रदान करें॥२॥
हम आपके उत्तम भक्त हैं। आप सैकड़ों रक्षण-साधनों से हमारी रक्षा करें । आपके द्वारा प्रदत्त धन हमारा हो । जो हिंसक वृत्ति वाले हैं, उनके अस्त्र - शस्त्रों को आप नष्ट कर दें । आप हमें यश और दीप्ति वाले रत्न दें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपके निमित्त किये जाने वाले शुभ कर्मों में नियुक्त रहते हैं। आपके अनुकूल रहकर आपका संरक्षण हमें प्राप्त हो । हे बलवान् एवं ओजस्वी इन्द्रदेव ! आप हमारे लिए सब दिनों के लिए उपयुक्त आवास बनाएँ, हम पर क्रोध न करें॥४॥
हरित वर्ण अश्वों वाले इन्द्रदेव के निमित्त हम सब स्तोता सुखकर स्तोत्रों का गान करते हैं । इन्द्रदेव से हमें देव प्रेरित बल की कामना करते हैं । हे शूरवीर इन्द्रदेव ! सारे दु:खों से पार होकर हम ऐसा बल प्राप्त करें, जिस बल से हम शत्रुओं का सहज ही विनाश कर सकें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! हमें संरक्षणीय धन से परिपूर्ण करें । आपके द्वारा प्रेरित श्रेष्ठ सुमति हम प्राप्त करें । हम हविदाताओं को आप वीर पुत्र सहित अन्न प्रदान करें। आप कल्याणकारी साधनों के द्वारा हमें सुरक्षा प्रदान करें॥६॥

सूक्त-२६

जो सोमरस बिना स्तोत्र पाठ के निकाला गया हो और जो इन्द्रदेव के लिए न निकाला गया हो, ऐसा सोम आनन्ददायक नहीं होता। हम ऐसे श्रेष्ठ नवीन स्तोत्र की रचना करते हैं, जिसे मनुष्यों के मध्य एवं इन्द्रदेव के द्वारा सुनना स्वीकार किया जायेगा॥१॥
स्तोत्र पाठ के साथ तैयार किया गया सोमरस इन्द्रदेव को हर्षित करता है । सोमरस अर्पित करते समय धनवान् इन्द्रदेव की स्तुति करने से वे प्रसन्न होते हैं। जिस प्रकार पुत्रगण एक साथ मिलकर पिता को बुलाते हैं, उसी प्रकार हम सब अपने कार्यों में प्रवीण लोग इन्द्रदेव को अपनी सुरक्षा के लिए बुलाते हैं॥२॥
सोमरस तैयार करते हुए स्तोत्रों में जिन ( कार्यो) का वर्णन है, वे इन्द्रदेव ने पूर्वकाल में किये थे । इस समय भी वे श्रेष्ठ कर्म करते हैं । इन्द्रदेव शत्रुओं के नगरों को अपने वश में वैसे ही) रखते हैं, जैसे पति, पत्नी को॥३॥
इन्द्रदेव के पास परस्पर सहयोगी अनेक शक्तियाँ हैं। उन्हीं के द्वारा वे हम सबकी रक्षा करते हैं । स्तोतागण उन्हीं का वर्णन करके सुनाते हैं । ऐसे इन्द्रदेव धन बाँटने वाले एवं तारक हैं । वे देव ही हमारा कल्याण करें॥४॥
वसिष्ठ ऋषि प्रजाजनों की कामनाओं की पूर्ति एवं सुरक्षा के निमित्त सोम तैयार करते हैं । हे इन्द्रदेव ! आप हमें अनेकानेक प्रकार के कल्याणकारी भोग्य पदार्थ प्रदान करते हुए हमारा कल्याण करें॥५॥

सूक्त-२७

सेनानायकगण भी अपनी सहायता के लिए इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं। है इन्द्रदेव ! आप पुरुषों के धन-दाता एवं बलवर्द्धक हैं। आप हमें गौओं से लाभ प्राप्त करने के लिए गोष्ठ में पहुँचाने की कृपा करें॥१॥
हे पुरुहूत इन्द्रदेव ! आप स्तोताओं को अपना बल प्रदान करें। हे मघवन् इन्द्रदेव ! आप सुदृढ़ बन्धनों को तोड़ने वाले हैं । अत: आप हमारे लिए (प्रज्ञा रूपी) गुप्त धन प्रकट कर दें॥२॥
इन्द्रदेव समस्त जीवधारियों के स्वामी तथा सभी पदार्थपरक वसुओं (धन ) के राजा हैं, इसलिए दानवृत्ति वालों को वे जीवनोपयोगी वस्तुएँ प्रदान करते हैं। वे श्रेष्ठ (लौकिक एवं दैवी) सम्पदा हमारी ओर भेजें॥३॥
हम अपनी रक्षा और अन्न प्राप्ति के लिए धनवान् - दाता इन्द्रदेव को बलवान् मरुद्गणों के साथ बुलाते हैं। वे अपने सखाओं (मरुतों या अन्य देवों) के लिए जो सर्वव्यापी, पूर्ण दान देते हैं, वहीं दान श्रेष्ठ मनुष्यों के लिए प्रकट करते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप गौ, अश्व, रथ आदि धन के स्वामी हैं । पूजनीय स्तोत्रों द्वारा हम आपका आवाहन करते हैं । आप हमें ऐश्वर्यवान् बनाने के लिए पर्याप्त धन प्रदान करें । सदा हमारी सुरक्षा एवं पालन करते हुए हमारा कल्याण करें॥५॥

सूक्त-२८

हे इन्द्रदेव !आप सर्वज्ञ हैं, आप हमारी स्तुति सुनकर अश्वारूढ़ होकर हमारे पास आएँ । हे समस्त विश्व को सन्तोष देने वाले इन्द्रदेव !आपको अलग-अलग कई लोग बुलाते हैं, फिर भी कृपा करके आप हमारी प्रार्थना सुने॥१॥
हे बलवान् इन्द्रदेव ! आपकी महिमा से ऋषियों के स्तोत्र सुरक्षित रहते हैं। हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप उद्भट शूरवीर एवं सदैव अजेय हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव !जो स्तोता, आपके द्वारा प्रणीत पद्धति के अनुसार स्तुति करता है, वह द्युलोक एवं भूलोक में आनन्दसहित प्रतिष्ठित होता है । आप क्षात्र बल एवं धन बल द्वारा श्रेष्ठ कार्य करने के लिए ही उत्पन्न हुए हैं॥३॥
है इन्द्रदेव ! आप हम पर आक्रमण करने वाले दुष्टजनों का धन सदैव के लिए हमें प्रदान करें । निष्पाप वरुणदेव हमारे अन्दर के असत्य को खोज कर दोनों प्रकार से (प्रेरणा देकर अथवा बलपूर्वक) दूर करें॥४॥
जो इन्द्रदेव हमें महान् धन-ऐश्वर्य प्रदान करते हैं एवं स्तोताओं की रक्षा करते हैं, उन्हीं इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं। वे धनवान् इन्द्रदेव सदैव हमारा पालन करें-हमारा कल्याण करें॥५॥

सूक्त-२९

हे हरित वर्ण अश्व वाले इन्द्रदेव ! आप शीघ्र आएँ । हम आपके लिए सोमरस निकालते हैं, आप आकर उसका पान करें एवं याचकों को धन प्रदान करें॥१॥
हे ज्ञानी वीर इन्द्रदेव ! आप हमारे उत्तम स्तोत्रों को सुनकर तथा अश्वारूढ़ होकर हमारी ओर शीघ्रता से आएँ । इन स्तोत्रों का श्रवण कर आप इस सोमयज्ञ में प्रसन्न हों॥२॥
हे धनपति इन्द्रदेव ! हम वास्तव में आपको कैसे प्रसन्न करें ? हम आपके लिए ही स्तोत्र रचते हैं, आप हमारे स्तोत्रों को सुनें । हमारे मन में एक ही अभिलाषा है कि ये सूक्त कब आपको अलंकृत करें ?॥३॥
हे इन्द्रदेव ! प्राचीन काल के मानवों के हितैषी, ऋषियों द्वारा रचित स्तोत्रों को आपने सुना है । हम भी आपकी बार-बार स्तुति करते हैं। आप उत्तम बुद्धिवाले पिता के समान हैं॥४॥
जो इन्द्रदेव हमें श्रेष्ठ धन-ऐश्वर्य प्रदान करते हैं एवं स्तोताओं की रचना - स्तोत्रों की रक्षा करते हैं। ऐसे इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं । वे धनवान् इन्द्रदेव सदैव हमारा पालन एवं कल्याण करें॥५॥

सूक्त-३०

हे बलशाली - आभावान् इन्द्रदेव ! आप हमारे पास आएँ एवं कृपा करके हमारे धन को बढ़ाएँ । हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप महान् क्षात्र बल सम्पन्न अपने पुरुषार्थ को बढ़ाएँ ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप आवाहनीय हैं। आपको विवाद के समय लोग बुलाते हैं। सूर्यदेव की प्राप्ति हेतु लोग आपका आवाहन करते हैं। समस्त मानवी सेना के लिए आप अनुकरणीय हैं । आप सुहन्त (सुगमता से संहार करने वाला) नामक वज्र के द्वारा शत्रुओं को पराभूत करके हमारे अधीन करें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे दिन अच्छे ढंग से व्यतीत होते चलें और युद्ध में भी हमारा (विवेक) ज्ञान स्थिर बना रहें, इस उद्देश्य से तथा शोभन धन की प्राप्ति के लिए पराक्रमी होता (अग्निदेव) देवो का आवाहन करते हुए इस यज्ञ में प्रतिष्ठित हों॥३॥
हे शूरवीर इन्द्रदेव ! हम सब आपके ही हैं । हम आपके निमित्त हवि प्रदान करते एवं स्तुति करते हैं । विद्वानों को आप श्रेष्ठ निवास प्रदान करें । उत्तम ऐश्वर्य-सम्पन्न होकर वे वृद्धावस्था में सुख से रहें॥४॥
जो इन्द्रदेव हमें सिद्धिदायक महान् ऐश्वर्य प्रदान करते हैं एवं स्तुतिकर्ताओं द्वारा बनाये स्तोत्रों की सुरक्षा करते हैं; ऐसे इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं। वे धनपति इन्द्रदेव हमारा सदैव पालन करते हुए कल्याण करें॥५॥

सूक्त-३१

हे साधको ! अश्वों के स्वामी, सोमपायी इन्द्रदेव को आनन्द प्रदान करने वाले स्तोत्रों का गान करो ॥१॥
हे ऋत्विजो ! उत्तम दानदाता, न्यायोपार्जित सम्पत्ति वाले इन्द्रदेव की प्रार्थना करो। हम भी उत्तम विधि से उनकी अभ्यर्थना करते हैं॥२॥
हे शतकर्मा (सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाले ) इन्द्रदेव ! आप हमें अन्न, गौ तथा स्वर्ण प्रदान करें॥३॥
हे श्रेान वीर इन्द्रदेव ! हम आपकी कामना करते हुए बारम्बार नमन करते हैं। सबको आश्रय देने वाले आप हमारी प्रार्थनाओं को सुनें और इस पर ध्यान देने की कृपा करें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे स्वामी हैं । आपसे हम लोग प्रार्थना करते हैं कि हमें कटुभाषी, निंदक और कंजूस के वश में न रहना पड़े॥५॥
हे इन्द्रदेव ! युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं के सम्मुख पहुँचकर उनका नाश करने के लिए आप विश्व-विख्यात हैं। आप कवच के समान रक्षा करने वाले हैं। आपकी सहायता पाकर हम शत्रुओं का वध करने में समर्थ होते हैं॥६॥
अन्न-सम्पन्न द्यावा-पृथिवी भी जिन के महान् बल को नमन करती है, वे महान् इन्द्रदेव आप ही हैं॥७॥
हे इन्द्रदेव ! साथ जाने वाली, तेजस् सहित विस्तीर्ण होने वाली, वीरों द्वारा की गई स्तुतियाँ आप तक पहुँचे॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप स्वर्ग के समीप स्थित हैं और दर्शनीय हैं । आपके लिए सोम प्रस्तुत है। सभी लोग आपको नमन करते हैं॥९॥
हे मनुष्यो ! महान् कार्य सम्पन्न करने वाले, प्रख्यात इन्द्रदेव के लिए, सोम प्रदान करते हुए श्रेष्ठ स्तोत्रों से उनकी स्तुति करो । है इन्द्रदेव ! आप भी हविदाता प्रजाओं की कामना पूर्ण करते हुए उनका कल्याण करें॥१०॥
अत्यन्त विशाल इन महान् इन्द्रदेव को अत्विग्गण उत्तम स्तुतियाँ और हविष्यान्न अर्पित कर' हैं। धीर पुरुष उन इन्द्रदेव के व्रतों को डिगाते नहीं हैं॥११॥
सबके राजा रूप इन्द्रदेव का मन्यु अतुलनीय हैं । ऐसे इन्द्रदेव के प्रति की गई स्तुतियाँ उनके शत्रु के पराभव का कारण बनती हैं । हे स्तोताओ ! आप अपने स्वजनों को इन्द्रदेव की स्तुति की प्रेरणा दें॥१२॥

सूक्त-३२

हे इन्द्रदेव ! यजमान आपको हमसे दूर न कर सकें । आप हमारे यज्ञ में शीघ्रता से आएँ और हमारे पास रहकर हमारी स्तुतियों को ध्यान से सुनें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी तृप्ति के लिए सोमरस तैयार करके, सभी ऋत्विज् मधुमक्खियों की भाँति एकत्रित होकर बैठते हैं । ऐश्वर्य की कामना से वे रथारूढ़ होने की तरह, आपको स्तुतियाँ समर्पित करते हैं॥२॥
जिस प्रकार पिता को पुत्र बुलाता है, वैसे ही धन प्राप्ति की इच्छा वाले हम लोग श्रेष्ठ दानदाता इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं॥३॥
हे वज्रधारक, तेजस्वी इन्द्रदेव ! दही मिले हुए, आनन्ददायक, विशेषरूप से तैयार किए गए इस सोमरस का पान करने के लिए आप यज्ञ स्थल पर पधारें॥४॥
जो इन्द्रदेव प्रार्थना सुनने के लिए समर्थ हैं, उनसे हम धन माँगते हैं । वे हमारी वाणी को अनसुना न करें । सैकड़ों - हजारों प्रकार के दान तत्काल देने को तत्पर इन्द्रदेव को कोई धन देने से रोक नहीं सकता॥५॥
हे वृत्र को मारने वाले इन्द्रदेव ! जो आपके लिए प्रचुर मात्रा में सोम तैयार करते हैं, उस वीर के प्रति आप अनुकूल होते हैं, जिससे वे मानवों में सम्मान पाते हैं॥६॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप कवच के समान हविदाताओं की सुरक्षा करें एवं शत्रुओं का विनाश करके प्राप्त धन हम सबको बाँट दें । आप हमें अविनाशी धन प्रदान करें॥७॥
हे याजको ! वज्रधारी सोमपायी इन्द्रदेव के लिए सोमाभिषव करो । इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिए पुरोडाश पकाओ तथा यज्ञ करो। यजमान को सुखी बनाने के लिए इन्द्रदेव स्वयं हविष्यान्न ग्रहण करते हैं॥८॥
सोमयाग को दक्षतापूर्वक पूरा करें, पीछे न हटें । शत्रुनाशक इन्द्रदेव के निमित्त धन प्राप्ति की इच्छा से शुभ कर्म (यज्ञादि) करें । शीघ्रता से कार्य करने वाला अवश्य ही विजय प्राप्त करता है एवं पुष्ट होकर उत्तम घर में निवास करता है । कुत्सित कर्म करने में देवगण सहायक नहीं होते॥९॥
सुदास ( उत्तम हवि दाता) के रक्षक इन्द्रदेव और मरुद्गण हैं, अत: उनके रथ को पहुँचाने अथवा उनको रोकने में कोई समर्थ नहीं हो सकता है। उन्हें गौओं के गोष्त प्राप्त हों (प्रचुर मात्रा में गोधन की । प्राप्ति हो । ॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप जिसकी रक्षा करते हैं, वह आपका यशोगान करते हुए अन्न आदि प्राप्त करता है । हे शूरवीर ! आप हमारे पुत्र-पौत्रादि एवं रथ की रक्षा करें॥११॥
जो यजमान हरि (अश्व) युक्त इन्द्रदेव के लिए सोमरस तैयार कर अर्पित करते हैं, वे इन्द्रदेव की कृपा से प्राप्त बल द्वारा शत्रु को जीतते हैं॥१२॥
(हे स्तोतागण !) यजनीय देवताओं में इन्द्रदेव के लिए बड़े-सुगढ़ एवं सुन्दर-शोभनीय स्तोत्र अर्पित करो। जिसके स्तोत्रों को इन्द्रदेव मन से स्वीकार कर लेते हैं, उसे कोई, किसी प्रकार का बन्धन, कष्ट नहीं दे सकता॥१३॥
हे सबके आश्रयदाता इन्द्रदेव ! भला आपको कौन अपमानित कर सकता है ? हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपके प्रति श्रद्धा रखने वाले जन बलशाली होते हैं। वे दुःखों से पार होने के समय भी अनुदान प्राप्त करते हैं॥१४॥
हे वैभवशाली इन्द्रदेव ! हविष्यान्न समर्पित करने वाले याजकों को दुष्ट-दुराचारियों से संघर्ष की शक्ति प्रदान करें । हे अश्वपति ! आपकी प्रेरणा से ज्ञानी जन पापों से छुटकारा पायें॥१५॥
हे इन्द्रदेव ! निम्नकोटि, मध्यम कोटि तथा उत्तम कोटि के धन के आप एक मात्र स्वामी हैं । आप जब गवादि धन का दान करते हैं, तो आपको कोई भी नहीं रोक सकता॥१६॥
हे इन्द्रदेव ! आप समस्त धन के दान करने वाले हैं। सभी युद्धों में भी आपकी प्रसिद्ध है। अनेकों द्वारा प्रशंसित हे वीर इन्द्रदेव ! भूलोक के सभी मनुष्य आपसे रक्षा और अन्न की याचना करते हैं॥१७॥
हे सम्पत्तिशाली इन्द्रदेव ! हम आपके समान सम्पदाओं के अधिपति होने की कामना करते हैं। स्तोताओं को धन प्रदान करने की हमारी अभिलाषा हैं, परन्तु पापियों को नहीं॥१८॥
कहीं भी रहकर हम आपके यजन के लिए धन निकालते हैं । हे इन्द्रदेव ! मेरा तो आपके सिवाय और कोई भाई नहीं, कोई पिता तुल्य रक्षक भी नहीं हैं॥१९॥
तत्परता से कार्य करने वाला ही प्रगतिशील होकर अन्न एवं बल प्राप्त करता हैं । तष्टा (बढ़ई) द्वारा चक्र-नेमि को झुकाने (गोलाई देने) की तरह हम अपने स्तोत्रों से इन्द्रदेव को (अपनी ओर) झुकायेंगे॥२०॥
मनुष्य दुष्ट वाणी से धन नहीं पा सकता। हिंसकों के पास भी ऐश्वर्य नहीं जाता । हे मववन् ! मेरे जैसे (साधक) को पार होने के लिए दिये जाने योग्य धन को आपसे कोई उत्तम कर्म करने वाला ही पा सकता है॥२१॥
हे शूरवीर इन्द्रदेव ! आप इस स्थावर एवं जंगम जगत् के स्वामी हैं । दिव्य दृष्टि-सम्पन्न आपके लिए हम उसी तरह लालायित रहते हैं, जैसे न दुहीं हुई गौएँ अपने बछड़े के पास जाने के लिए लालायित रहती हैं॥२२॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव !आपके समान इस पृथ्वीलोक या दिव्यलोक में न कोई है, न कभी हुआ है और न कभी होगा । हे देव !अश्व, गौ तथा धन-धान्य की कामना वाले हम, (स्तोतागण) आपकी प्रार्थना करते हैं॥२३॥
हे वैभव-सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप अभीष्ट ऐश्वर्य को हम जैसे अकिंचन को प्रदान करने की कृपा करें । आप संग्रामों (जीवन-संग्राम में सहायता करने के लिए आवाहन करने योग्य हैं॥२४॥
हे मघवन् (इन्द्रदेव) ! आप शत्रुओं को पराङ्मुख करते हुए हमसे दूर करें एवं हमें पर्याप्त धन दें । हे देव ! आप ही हमारे शरण-स्थल हैं । आप हमारी रक्षा करते हुए, हमें बढ़ने वाला धन प्रदान करें॥२५॥
है इन्द्रदेव ! हमें उत्तम कर्मों (यज्ञों ) का फल प्राप्त हो । जैसे पिता, पुत्रों को धन आदि प्रदान करके पोषण करता है, वैसे ही आप हमें पोषित करें । अनेकों द्वारा सहायता के लिए पुकारे गये हे इन्द्रदेव ! यज्ञ में आप हमें दिव्य तेज प्रदान करें॥२६॥
हे इन्द्रदेव ! अज्ञात पापी, दुष्ट, कुटिल, अमंगलकारी लोग हम पर आक्रमण न करें । हे श्रेष्ठ वीर ! आपके संरक्षण में हम विघ्नों-अवरोधों के प्रवाहों से पार हों॥२७॥

सूक्त-३३

(इन्द्रदेव का कथन) गौरवर्ण वाले, सिर के दक्षिण भाग में शिखा (जटा) रखने वाले, बुद्धिसंगत कार्य करने वाले वसिष्ठ गोत्रीय में अति प्रसन्न करते हैं । बर्हि (यज्ञ या कुश-आसन) से ऊपर उठते हुए हम यहीं कहते हैं। कि ऐसे वसिष्ठ वंशज (शिष्य या पुत्रगण) हमसे दूर न जाएँ ॥१॥
वसिष्ठ वंशीय साधकगण उग्र इन्द्रदेव को 'पाशद्युम्न' द्वारा तैयार सोम का अतिक्रमण कराकर, इस (अपने द्वारा तैयार) सोम के लिए दूर से ले आये । इन्द्रदेव ने भी 'वयत' (वेगवान्) के पुत्र पाशद्युम्न को छोड़कर वसिष्ठ वंशियों का वरण कर लिया॥२॥
इसी प्रकार वसिष्ठ पुत्रों ने सहजता से सिन्धु (नदी, समुद्र या बादलों) को पार किया एवं इसी प्रकार भेद का नाश किया तथा प्रसिद्ध “दाशराज युद्ध में आप (वसिष्ठ पुत्रो) के ब्रह्मबल से इन्द्रदेव ने सुदास को रक्षा को॥३॥
हे मनुष्यो ! अपने लक्ष्य के प्रति हम सक्रिय हैं । आप सब बलवान् बने तथा ‘शक्वरी' ऋचाओं और ‘बृहत् (श्रेष्ठ) स्तुति-गान के द्वारा इन्द्रदेव का भी बलवर्धन करें । आपके स्तोत्रों से पितरगण भी तृप्त होते हैं॥४॥
‘तृष्णज' (तृष्ण वंशीय राजाओं अथवा कामनायुक्तों ) से घिरे वासियों ने दाशराज युद्ध में इन्द्र को तेजस्वी सूर्य की तरह धारण किया (उन्नत किया) । इन्द्रदेव ने उनके स्तोत्रों को सुनकर 'तृत्सुओं' (राजाओं अथवा वसप्ट समर्थित श्रेष्ठ इच्छा करने वाले साधको) को विस्तृत लोक (स्थान या क्षेत्र) प्रदान किया॥५॥
गो प्रेरक टण्डा (अथवा इन्द्रियों को सही दिशा देने में समर्थ संकल्पों) की तरह भरत (भरण-पोषण में समर्थ संकल्प) कम और छोटे-छोटे थे; किन्तु जब वसाळगण (ब्रह्मबल सम्पन्न ऋषि) उनके पुरोहित (प्रगति-प्रेरक) हुए, तो उनकी संख्या-क्षमता बढ़ने लगी॥६॥
भुवनों (उत्पन्न हुए लोकों) में तीन (सूर्य या अग्नि, वायु एवं जल) रेतस् (उत्पादक तेज़) भरने वाले हैं। ज्योति की ओर बढ़ने वाली तीन (भावयुक्त, विचारयुक्त एवं कर्मयुक्त) श्रेष्ठ प्रजाएँ है। तीनों ही उष्णतायुक्त (जीवन या उत्साहयुक्त प्रजाएँ) उषा (प्रकाश के प्रारम्भिक प्रवाहों) का सेवन करने वाली हैं । वसिष्ठ वंशज (ब्रह्मबल-सम्पन्न पुरोहित) यह सब (तथ्य या रहस्य) भली-भाँति समझते हैं॥७॥
हे वसिष्ठ पुत्रो ! आपकी महिमा सूर्य की ज्योति के समान प्रकाशित है और समुद्र के समान गम्भीर हैं । वायु जैसे तीव्रगामी आपके स्तोत्र अद्वितीय हैं॥८॥
वे वसिष्टगण हृदयस्थ गूढ़ ज्ञान को प्रकट करते हुए सहस्रों शाखाओं से युक्त (जगत् में) सम्यक् रूप से विचरण करते हैं। वे यम (नियामक सत्ता) द्वारा फैलाये गये ताने-बाने को बुनते हुए (मातृरूपा) अप्सराओं के समीप पहुँचते हैं॥९॥
हे वसिष्ठ ! विद्युत् ज्योति से पृथक् होते हुए, जब आपको मित्रावरुण ने देखा, जब अगस्त्य आपको प्रजाओं (प्रकृति-प्रवाहों) से बाहर लाये, तब आपका एक (प्रथम) जन्म हुआ था॥१०॥
हे ऋषि वसिष्ठ ! आप मित्र-वरुण के पुत्र हैं । हे ब्रह्मन् ! आप उर्वशी के मन से उत्पन्न हुए हैं। (इस प्रकारे उत्पन्न हुए) आपको दिव्य मन्त्रों के साथ, विश्वेदेवों ने पुष्कर (पुष्टिकारक पदार्थों या विशाल क्षेत्र) में धारण किया था॥११॥
ये वसिष्ठ दोनों लोकों के समस्त विषयों के विशेष विद्वान् हैं, सहस्रों प्रकार के दान देने वाले हैं। सर्व नियामक द्वारा विस्तारित ताने-बाने (सृजन के ताने-बाने) को बुनने की इच्छा से ये उर्वशी से उत्पन्न हुए॥१२॥
दोनों ( मित्र - वरुण ने) उस सत्र ( अभियान या यज्ञ) में एक साथ रेतस् ( उत्पादक तेज ) कुंभ (पात्र अथवा विश्वघट) में स्थापित किया। उससे मान (अगस्त्य) उत्पन्न हुए। उसी (प्रक्रिया) से वसिष्ठ भी उत्पन्न कहे जाते हैं॥१३॥
हे भरत लोगो ! वसिष्ठ ऋषि आप लोगों के पास आ रहे हैं। आप सब प्रसन्न मन से इन माननीय का सत्कार करें । वसिष्ठ ऋषि उक्थ एवं साम गान करने वालों एवं सोमरस तैयार करने वालों का उचित नेतृत्व करेंगे॥१४॥

सूक्त-३४

बलवान् अश्वों द्वारा संचालित सुगढ़ रथ की तरह देवी मनीषा हमारे समीप पधारें॥१॥
नीचे की ओर क्षरणशील जल (वृष्टि जल अथवा जीवन प्रवाह) द्यावा-पृथिवी के उत्पत्ति को जानने वाला है । वे (वह प्रवाह) सुनते भी हैं॥२॥
पृथ्वी पर जो जल विद्यमान है, वह इन्द्रदेव को पुष्टि प्रदान करता है । शत्रुओं के आक्रमण पर विद्वान् इन्हीं शूरवीर इन्द्रदेव को बुलाते हैं ॥३॥
वज्रधारी और स्वर्ण पाणि इन्द्रदेव को यहाँ लाने के लिए, उनके रथ में अश्वों को नियोजित करें॥४॥
हे मनुष्यो ! यज्ञ करने के लिए स्वयं की इच्छा से, सहर्ष, तीव्र वेग से अवश्य ही आगे बढ़े॥५॥
हे मनुष्यो ! संग्राम में स्वयं जाएँ एवं वीर पुरुषों को भी प्रेरित करें । लोगों के हित के लिए यज्ञ करें॥६॥
इस (यज्ञ) के बल से ही सूर्यदेव उगते हैं। जैसे पृथ्वी समस्त भूतों (प्राणियों) का भार वहन करती हैं; वैसे ही यज्ञ सबका आधार है ॥७॥
हे अहिंसक अग्निदेव ! हम साधनापूर्वक यज्ञ के देवों का आवाहन करते हैं और बुद्धि को देवों की परिचर्या में प्रयुक्त करते हैं (अर्थात् यज्ञीय अनुशासन में विचारों एवं कर्मों को नियोजित करते हैं)॥८॥
हे मनुष्यो ! आप लोग देवताओं के निमित्त बुद्धि का प्रयोग करें एवं देवों की स्तुति करें॥९॥
सहस्रों नेत्रों वाले ओजस्वी वरुणदेव नदियों के जल का निरीक्षण करते रहते हैं॥१०॥
ये वरुण देवता राष्ट्रों के राजा के समान नदियों के रूप में अपने बल से सब जगह गमन करने वाले हैं॥११॥
हे देवताओ ! आप कृपा करके हमारी रक्षा करें, हमारी निन्दा करने वाले शत्रुओं की तेजस्विता को नष्ट करें॥१२॥
हे देवताओ ! आप सब हमारा अमंगल करने को तत्पर, शत्रुओं के आयुधों को चारों ओर से निवारण करें । हमारे कायिक पापों को भी दूर ले जाएँ॥१३॥
हमने अग्निदेव के प्रति विनम्रतापूर्वक स्तोत्रों का गान किया है । वे अन्न का भक्षण करने वाले, प्रिय अग्निदेव प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करें॥१४॥
अग्निदेव जल को ऊपर उठाते हैं, वे सखा भाव से हमारी रक्षा करें॥१५॥
नदियों के समीपस्थ क्षेत्र में स्थापित अग्निदेव की स्तोत्रों द्वारा स्तुति करें । वे अग्निदेव जल के उत्पादक एवं शत्रुओं को मारने वाले हैं॥१६॥
मेघों में स्थित (विद्युत् रूप) अग्निदेव हमारे ऊपर घात न करें । सत्यमय जीवन जीने वाले का यज्ञ क्षीण नहीं होता है॥१७॥
धनैश्वर्य प्राप्ति में हमारे प्रतिस्पर्धी (शत्रु) हमसे दूर चले जाएँ । हम सब पर्याप्त मात्रा में धन, यश एवं अन्न प्राप्त करें॥१८॥
विशाल सेना से युक्त राजा अपने शत्रुओं को देवताओं की शक्ति से सूर्य की भाँति संतप्त करते हैं॥१९॥
जब पत्नियाँ हमारे निकट आती हैं, उस समय त्वष्टा (देवशिल्पी) श्रेष्ठ बाहुओं से वीरों को धारण करें॥२०॥
उत्तम बुद्धि वाले त्वष्टा देव हमारे यज्ञ को स्वीकार करें एवं प्रसन्न होकर हमें पर्याप्त धन प्रदान करें॥२१॥
हमें अभीष्ट धन देने वाली दिव्य शक्तियाँ प्रदान करें । द्यावा-पृथिवीं और वरुणदेव की शक्ति हम लोगों द्वारा गाये जा रहे स्तोत्रों को सुने । श्रेष्ठ दानदाता त्वष्टादेव विघ्ननिवारक शक्तियों सहित हमारे लिए शरणदाता बने एवं हमें ऐश्वर्य प्रदान करें॥२२॥
पर्वत, जल, ओषधियाँ और द्युलोक, वनस्पतियों सहित अन्तरिक्ष एवं देवशक्तियाँ हमारे उस (प्राण रूप) धन का संरक्षण करें॥२३॥
विशाल द्यावा-पृथिवीं, शत्रुओं को हराने वाले मरुद्गण, तेजस्वी इन्द्रदेव एवं उनके मित्र वरुणदेव आदि देवतागण हमारे सहयोगी हों । इनकी कृपा से हम धारण करने योग्य धन को प्राप्त करें॥२४॥
इन्द्रदेव, मित्रदेव, वरुणदेव, अग्निदेव, ओषधियाँ, जल एवं वन के वृक्षों के निमित्त हम स्तोत्र पाठ करते हैं। हमें मरुद्गणों के साथ मंगलकारी स्थान प्राप्त हों । आप सब हमें कल्याणकारी रक्षण-साधनों द्वारा सुरक्षित रखें॥२५॥

सूक्त-३५

दिन और रात्रि हम सबके लिए मंगलकारी हों । इन्द्र और अग्निदेव तथा इन्द्र और वरुणदेव हम सभी का कल्याण करें । इन्द्र और पूषादेव मंगलकारी अन्न और ऐश्वर्य प्रदान करें । इन्द्र और सोमदेव सुसन्तति प्राप्ति के लिए तथा रोगों के शमन और भय दूर करने के लिए, हमारे लिए मंगलमय हों॥१॥
भग देवता हमें शान्ति प्रदान करें। यह शान्ति मनुष्यों द्वारा प्रशंसित हो । बुद्धि एवं धन हमें शान्ति प्रदान करे । श्रेष्ठ एवं शिष्ट बोले गये वचन हमें शान्ति देने वाले हों । अर्यमादेव हमें शान्ति देने वाले हों॥२॥
धाता ( आधार प्रदान करने वाले), धर्ता (धारण करने वाले), द्यावा-पृथिवी, पृथ्वी का अन्न, पर्वत, देवताओं की उपासना- ये सभी हम सबके लिए शान्तिदायक-कल्याणप्रद हों॥३॥
तेजस्वी अग्निदेव, मित्रावरुणदेव, सूर्यदेव, चन्द्रदेव, दोनों अश्विनीकुमार, सत्कर्मा एवं गमनशील वायुदेव हमें शान्ति प्रदान करें॥४॥
द्यावा-पृथिवी हमें प्रथमबार प्रार्थना में शान्ति प्रदान करें । श्रेष्ठ दर्शन के निमित्त अंतरिक्ष में शान्ति प्रदान करें । वनस्पति एवं ओषधियाँ हमें शान्ति प्रदान करें । विजयशील लोकपाल भी हमें शान्ति प्रदान करें॥५॥
इन्द्र देवता वसुगणों के सहित हमें शान्ति प्रदान करें। आदित्यों के सहित वरुणदेव, रुद्रगणों सहित जलदेव हमें शान्ति प्रदान करें । त्वष्टा देव, देवपलियों सहित हमें शान्ति दें । (सभी देवगण) हमारी विनय सुनें॥६॥
सोम एवं मावा (सोम कूटने वाला पत्थर) हमें शान्ति दें । ब्रह्म एवं यज्ञदेव हमें शान्ति प्रदान करें । यूपों का प्रमाण, ओषधियाँ, वेदिका आदि सभी हमें शान्ति प्रदान करे॥७॥
विशाल तेजधारी सूर्यदेव हमें शान्ति प्रदान करने के लिए उदित हों। चारों दिशाएँ हमें शान्ति दें, स्थिर पर्वत, जल एवं समुद्र में शान्ति प्रदान करें॥८॥
अदिति अपने व्रतों द्वारा हमें शान्ति प्रदान करें । उत्तम तेजस्वी मरुद्गण हमें शान्ति प्रदान करें । विष्णुदेव, पूषादेव, अन्तरिक्ष एवं वायुदेव हमें शान्ति प्रदान करें॥९॥
त्राण प्रदाता सवितादेव हमें शान्ति प्रदान करें। तेजस्वी उषाएँ हमें शान्ति प्रदान करें । पर्जन्य एवं क्षेत्रों के कल्याणकारी अधिपति हमारी प्रजा के लिए शान्ति प्रदायक-मंगलकारी हों॥१०॥
विश्वदेव (समस्त देवगण) हमें शान्ति प्रदान करें । सद्बुद्धि देने वाली देवी सरस्वती हमें शान्ति प्रदान करें । यज्ञकर्ता, दानदाता, द्युलोक, पृथ्वी और जल के देवगण हमें शान्ति प्रदान करें॥११॥
सत्य के अधिपति, अश्व एवं गौएँ हमें सुख-शान्ति प्रदान करें । श्रेष्ठ कर्म करने वाले एवं श्रेष्ठ भुजाओं वाले ऋभुगण हमें शान्ति प्रदान करें । हमारे पितरगण हमारी प्रार्थना सुनकर हमें शान्ति प्रदान करें॥१२॥
एक पाद अजदेव हमारा कल्याण करें । अहिर्बुध्य और समुद्रदेव हमें शान्ति प्रदान करें । अपांनपात्देव शान्ति दें । देवताओं से संरक्षित गौ (किरणे या प्रकृति) हमें शान्ति प्रदान करें॥१३॥
नवरचित स्तोत्रों को आदित्यगण, वसुगण एवं रुद्रगण ग्रहण करें । द्युलोक, पृथ्वी एवं स्वर्ग में उत्पन्न देवगण और भी जो यजनीय देव आदि हैं, वे सब हमारी स्तुति स्वीकार करें॥१४॥
यजनीय देवताओं के लिए भी जो पूज्य हैं एवं मनुष्य के लिए भी जो पूज्य हैं, ऐसे अमर, तज्ञदेव आज प्रसन्न होकर हमें यशस्वी पुत्र दें तथा हमारा पालन एवं कल्याण करें॥१५॥

सूक्त-३६

त्रत के गृह (यज्ञशाला) से ब्रह्मज्ञान स्तोत्रादि प्रसरित होकर सूर्य आदि देवों तक पहुँचते हैं। सूर्यदेव अपनी किरणों से जल वृष्टि करते हैं। पर्वतादि सहित विस्तार वाली पृथ्वी पर अग्निदेव प्रदीप्त होते हैं॥१॥
हे बलशाली वरुण और मित्रदेव ! आपके निमित्त इस नवीन स्तोत्र की रचना करते हैं। आप दोनों में एक वरुणदेव प्रभुता-सम्पन्न हैं। वे निष्पक्षरूप से धर्माधर्म का निर्णय करके सुनिश्चित स्थान (पद) प्रदान करते हैं। दूसरे देव "मित्र' प्रशंसा किये जाने पर धर्ममार्ग में प्रेरणा प्रदान करते हैं॥२॥
वायुदेव गतिपूर्वक चारों दिशाओं में विचरण करते हैं, अन्तरिक्ष में गर्जते हुए मेघ सुशोभित होते हैं और बरसते हैं। इससे (जल वृष्टि से) दूध देने वाली गौएँ बढ़ती हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! जो यजमान स्तुतिपाठ करते हुए आपके बलवान् अश्वों को रथ में नियोजित करता है, आप उस (यजमान की) यज्ञशाला में अवश्य जाते हैं । जो देव शत्रुओं की हिंसक वृत्ति नष्ट कर देते हैं, हम उन अर्यमादेव का आवाहन करते हैं॥४॥
याजक अन्न-प्राप्ति के लिए, यज्ञ द्वारा रुद्रदेव को स्तुतियों से प्रसन्न करते हैं, उन रुद्रदेव को हम सब नमस्कार करते हैं॥५॥
मातृवत् स्नेह सलिला सिन्धु एवं सप्तम सरस्वती आदि नदियाँ पर्याप्त जलराशि से युक्त होकर प्रवहमान रहें । वे अपने जल से परिपूर्ण अन्न एवं दुग्धादि बढ़ाती हुई साथ-साथ प्रवहमान रहें॥६॥
आनन्दवर्धक पराक्रमी मरुद्गण हमारे पुत्रों को और सद्बुद्धि प्रेरित कर्मों को सुरक्षित रखें । वाक् के अधिपति देव हम पर सदैव प्रसन्न रहें । वे हम लोगों के धन को बढ़ाते हैं॥७॥
हे स्तोतागण ! आप इस विशाल एवं महान् पृथ्वी (देवी) का आवाहन करें । यजनीय, योद्धा, पराक्रमी पूषादेव का आवाहन करें । बुद्धिसंगत कर्म करने के प्रेरक भगदेव ऐवं पुरातन, दानवीर वाजदेव का यज्ञ में आवाहन करें॥८॥
हे मरुद्गणो ! आप तक एवं गर्भ संरक्षक, आश्रये प्रदान करने वाले विष्णुदेव के पास तक हमारे ये स्तोत्र पहुँचे । वे हम स्तोताओं को पुत्र एवं अन्न प्रदान करें । आप सदैव हमारा पालन करते हुए कल्याण करें॥९॥

सूक्त-३७

हे तेजस्वी त्राभुगणो ! आप श्रेष्ठ एवं निरापद रथ पर आरूढ़ होकर गमन करें । हे सुन्दर हुनु वाले ऋभुगण ! आप सब दूध, दही और सत्तू मिले सोमरस का पान करके आनन्दित हों॥१॥
हे ऋभुगणो ! आप स्वदर्शी हैं, बलवान् हैं; आप सोमपायी होकर हम विदाताओं को विशेष रत्नादि प्रदान करें । बुद्धियों सहित सिद्धिदायक ऐश्वर्य हमें दें॥२॥
हे धनपति ! महाधन एवं अल्पधन के विभाग के समय आप भी अपना भाग ग्रहण करते हैं । हे देव ! आपके दोनों हाथों में पर्याप्त धन हैं । आप निर्विघ्न दान देते हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप यशस्वी हैं, आप श्रेष्ठ साधक एवं ऋभुओं के स्वामी, हम स्तोताओं के घर में आएँ । हे हरितवर्ण वाले अश्व से युक्त पराक्रमी देव ! हम वसिष्ठगण आपकी स्तुति करते हुए, आप के निमित्त हवि अर्पित करते हैं॥४॥
हरित वर्ण अश्व वाले हे देव ! आप हमारी स्तुतियों को सुनें । आप हवि-दाता याजक को उत्तम धन प्रदान करें । आप कब धन प्रदान करेंगे? आज तक हम आपके संरक्षण में सुरक्षित रहते हुए आपका भजन (ध्यान) करते हैं॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप कब हमारे बचनों एवं प्रार्थनाओं पर ध्यान देंगे ? आप हमारे आश्रयदाता हैं । स्तुति से प्रसन्न होकर आप अपने बलवान् एवं तीव्रगामी अश्वों के द्वारा हमारे पास पराक्रमी पुत्र, धन एवं अन्न भेजे॥६॥
पृथ्वी जिसे ईश मानती है, समस्त अन्नयुक्त संवत्सर जिन्हें सुख प्रदान करते हैं, मनुष्य जिन्हें अपने घरों में प्रतिष्ठित करते हैं; वे त्रिलोक-बन्धु इन्द्रदेव हमें विशाल बल प्रदान करें॥७॥
हे सवितादेव ! आप हमें अपना धन प्रदान करें । पर्वत प्रदत्त धन भी हमें प्राप्त हो । इन्द्रदेव अपनी संरक्षण शक्तियों से सदैव हमारी रक्षा करें तथा हम सबका पालन करें॥८॥

सूक्त-३८

हे सवितादेव ! आप अपने आश्रित सुवर्ण आभा' को प्रकट करते हैं। मनुष्य सवितादेव की स्तुति करते हैं । वे अनेकों धनों के स्वामी स्तोताओं को श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं॥१॥
हे सवितादेव ! आप उदित हों । हे स्वर्णमयी बाह वाले देव ! आप व्यापक आभा, मानवों के उपयोग-योग्य धन एवं अन्न देते हैं॥२॥
हम सवितादेव की स्तुति करते हैं। जो सवितादेव सब देवों द्वारा स्तुत्य हैं, वे पूजनीय सवितादेव स्तोत्र एवं अन्न स्वीकार करें । हे देव ! आप अपनी समस्त रक्षण शक्तियों द्वारा स्तोताओं का पालन करें !॥३॥
अदिति देवी जिन सवितादेव की स्तुति करती हैं एवं जिन देव की प्रेरणा का पालन करती हैं। उन्हीं सवितादेव की स्तुति मित्रावरुण देव एवं अर्यमादेव भी करते हैं॥४॥
समस्त दानी भक्तगण आपस में मिलकर द्युलोक एवं पृथ्वीलोक के सखारूप सवितादेव की सेवा करते हैं; वे अहिर्बुध्य ( विद्युत्रूप) देव हमारी स्तुति सुनें । वाग्देवी विशेष धेनुओं ( वाणियों) सहित हम सबका पालन करें॥५॥
प्रजाओं का पालन करने वाले सवितादेवता हमारी प्रार्थना सुनकर हमें रत्नादि प्रदान करें । पराक्रमी स्तोता भग देवता से सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं। जो पराक्रमी नहीं हैं, वे केवल धन माँगते हैं॥६॥
संतुलित गति वाले, स्तुत्य, वाजी (अन्न या बल देने वाले ) देव यज्ञीय प्रार्थनाओं से (प्रसन्न होकर) हम सबको सुख प्रदान करें । ये देव अदानशील और दुष्टों का संहार करें । समस्त जीर्ण रोगों से हम मुक्त हो॥७॥
हे वाजी (बलशाली) देवगण ! आप अदर, ऋतज्ञ एवं विद्वान् हैं। आप धन के निमित्त होने वाले युद्धों में हमारी रक्षा करें। आप इस यज्ञ में आकर, सोमरस पीकर आनन्दित हों एवं तृप्त हुए आप देवयान मार्ग से प्रस्थान करें॥८॥

सूक्त-३९

हे ऊर्ध्वगामी अग्निदेव ! आप अपने याजकों की स्तुति को सुनें । पूर्व दिशा वाली उषादेवी इस यज्ञ में आएँ । आदरणीय याजक पति और पत्नी, रथी के समान, यज्ञ-मार्ग का आश्रय लेते हैं । होता यज्ञ करते हैं॥१॥
समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए नियुत संज्ञा वाले वाहन में आरूढ़ वायुदेव और पूषादेव, रात्रि के अन्त में, उषाकाल के पूर्व मनुष्यों द्वारा बुलाये जाने पर राजाओं की भाँति आते हैं। इन दोनों देवों के लिए यज्ञशाला में उत्तम प्रकार से कुश के आसन प्रयुक्त किये जाते हैं॥२॥
इस यज्ञ में वसुगण भूमि पर विचरण करते हैं । विशाल अन्तरिक्ष में रहने वाले मरुद्गणों की सेवा इस यज्ञ से की जाती हैं । हे वसुगणो एवं मरुतो ! आप हमारे दूत की प्रार्थना पर ध्यान देकर हमारी ओर आएँ॥३॥
रक्षा करने वाले यजनीय विश्वेदेवा यज्ञ में आये हैं ! हे अग्निदेव ! आप यज्ञ में उपस्थित देवों के निमित्त यजन करें । हे भगदेव ! आप अश्विनीकुमारों एवं इन्द्रदेव का सत्कार करें॥४॥
हे अग्निदेव ! द्युलोक एवं पृथ्वी के स्तुति करने योग्य मित्र, वरुण, इन्द्र, अग्नि, अर्यमा, अदिति, विष्णु आदि देवताओं को आप हमारे इस यज्ञ में आवाहित करें । देवी सरस्वती और मरुद्गण (यहाँ आकर) आनन्दित हों॥५॥
यजनीय देवताओं के निमित्त हम स्तोत्र एवं हवि अर्पित करते हैं । मानवों की प्रगति की कामना से अग्निदेव यजन करें । हम आपके सहित समस्त सहायक देवताओं का आवाहन करते हैं । प्रसन्न होकर सब देवता हमें स्थायी एवं अक्षय धन प्रदान करें॥६॥
आज वसिष्ठों ने द्यावा-पृथिवी की सुनिश्चित स्तुति की । यजनीय वरुण, इन्द्र और अग्निदेव की स्तुति की गयीं । आनन्ददाता देवता हमें पूजा में प्रयुक्त किये जाने योग्य श्रेष्ठतम अन्न एवं धन प्रदान करें॥७॥

सूक्त-४०

हम वेगवान् देवताओं के लिए स्तोत्रों का पाठ करते हैं। हमें वे सुख मिले; जो ‘सहकारिता' के आधार पर प्राप्त होते हैं । रत्नों के स्वामी सविता देव जिस समय अपना धन बाँटते हैं, उस समय उपस्थित रहकर हम भी वह धन प्राप्त करे॥१॥
मित्र, वरुण, द्यावा-पृथिवी, इन्द्र, अर्यमा, वायु, भगदेव एवं अदिति देवी सहित समस्त देवता हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर हमें वह श्रेष्ठ धन प्रदान करें, जो तेजस्वियों के लिए सेवनीय है॥२॥
हे पृषत् (चित्तीदार अथवा वायुवेग) घोड़े वाले मरुद्गणो ! आप महान् पराक्रमी एवं बलवान् मनुष्य की सुरक्षा करते हैं । उस मनुष्य को अग्निदेव, देवी सरस्वती तथा अन्य देवगण प्रेरणा देकर सत्कर्म में नियोजित करते हैं। ऐसे मनुष्य के धन का नाश नहीं होता है॥३॥
वे सत्य मार्ग में नेतृत्व करने वाले शासक देवता, वरुण, मित्र, अर्यमा आदि देव हमारे द्वारा किये जाने वाले श्रेष्ठ कार्यों को धारण करते हैं। विस्तृत तेजस्वी देवी अदिति स्तुवनीय हैं । ये समस्त देवगण, हमारे श्रेष्ठ कम को निर्विघ्न सम्पन्न होने में सहायक होकर हमें पाप कर्मों से बचाएँ॥४॥
देवगण यज्ञ में हवि द्वारा उपासनीय एवं कामनाओं की पूर्ति करने वाले विष्णुदेव के अंश हैं । रुद्रदेव अपनी महत्त्वपूर्ण शक्ति हमें प्रदान करें। हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे अन्नपूरित घर में आएँ॥५॥
हे तेजस्वी पूषन्देव ! सर्वश्रेष्ठ देवी सरस्वती और दानशील दिव्यशक्तियों से धन प्राप्त कराने में आप हमारे सहायक हों । सर्वत्रगामी वायुदेव जल वृष्टि में सहयोग करें एवं प्रगतिशील तथा सुखदायक देवता हमारा कल्याण करें-पोषण करें॥६॥
आप वसिष्ठों ने द्यावा-पृथिवी की सुनिश्चित स्तोत्रों से स्तुति की। यज़न करने योग्य वरुण, इन्द्र एवं अग्निदेव की स्तुति भी की गयी । आनन्ददाता देवता हमें पूजा (श्रेष्ठ कार्यो) में प्रयुक्त किए जाने योग्य श्रेष्ठतम अन्न एवं धन प्रदान करें॥७॥

सूक्त-४१

प्रभातकाल में (यज्ञार्थ) हम अग्निदेव का आवाहन करते हैं । प्रभात में ही यज्ञ की सफलता के निमित्त इन्द्रदेव, मित्रावरुण, अश्विनीकुमारों, भग, पूषा, ब्रह्मणस्पति, सोम और रुद्रदेव का भी आवाहन करते हैं॥१॥
हम उन भगदेवता का आवाहन करते हैं, जो जगत् को धारण करने वाले, उग्रवीर एवं विजयशील हैं । वे अदिति पुत्र हैं, जिनकी स्तुति करने से दरिद्र भी धनवाने हो जाता हैं । राजा भी उनसे धन की याचना करते हैं॥२॥
है भगदेवता ! आप हीं वास्तविक धन हैं । शाश्वत-सत्य ही धन है । हे भगदेव ! आप हमारी स्तुति से प्रसन्न होकर हमें इच्छित सत्य-धन प्रदान करें । हे देव ! हमें गौएँ, घोड़े, पुत्रादि प्रदान कर, श्रेष्ठ मानवों के समाज वाला बनाएँ॥३॥
हे देव ! आपकी कृपा से हम भाग्यवान् बने । दिन के प्रारम्भ और मध्य में भी हम भाग्यवान् रहें । हे धनवान् भगदेवता ! हम सूर्योदय के समय, समस्त देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करें॥४॥
हे देवताओ ! भग देवता ही ऐश्वर्यवान् हों । वे कृपा कर हमें धनवान् बनायें ! हे भगदेवता ! समस्त मानव समुदाय आपका आवाहन करता है, आप हमारे यज्ञ में आएँ॥५॥
दधिक्रावा की तरह पवित्र पद की प्राप्ति के लिए उषाकाल में (देवगण) यज्ञ में पधारें । जिस प्रकार तीव्रगामी अश्व रथ को लाते हैं, वैसे ही वे धनवान् भगदेव को हमारे पास लाएँ॥६॥
समस्त गुणों से युक्त अश्वों, गौओं, वीरों से युक्त एवं घृत का सिंचन करने वाली कल्याणकारी उषाएँ हमारे घरों को प्रकाशित करें। आप सदैव हमारा पालन करते हुए कल्याण करें॥७॥

सूक्त-४२

अंगिरस के मन्त्र (स्तोत्र) सर्वव्यापी हों । पर्जन्य हमारे स्तोत्रों के लिए इच्छुक रहें । प्रसन्नता देने वाली नदियाँ जल का सिंचन करती हुई प्रवाहित हों । आदरणीय यजमान सपत्नीक यज्ञ के स्वरूप को और श्रेष्ठ बनाएँ॥१॥
हे अग्निदेव ! आपका चिरपुरातन गमनयोग्य मार्ग सुगम बने । श्यामवर्ण एवं लाल वर्ण के अश्व यज्ञशाला में वीरों को लाते हैं। ऐसे तेजस्वी घोड़ों वाले रथं पर आरूढ़ हो, आप यज्ञ में आएँ । देवों के प्रकट होने के निमित्त हम स्तोत्रों का गान करते हैं॥२॥
हे देवताओ ! नमस्कार करने वाले ये स्तोता, आपके यज्ञ की महिमा को बढ़ाते हैं। श्रेष्ठ यज्ञ के उपासक होता" सर्वोत्तम माने जाते हैं । हे परम तेजस्वी अग्निदेव ! आप प्रदीप्त होकर, देवों का उत्तम प्रकार से यजन करें॥३॥
धनवान् वीर के घर में जिस समय आदरणीय अग्निदेव सुखपूर्वक प्रतिष्ठित होकर प्रदीप्त होते हैं, उस समय समीपस्थ जनों ( अर्थात् याजकों ) को श्रेष्ठ धन प्राप्त होता है॥४॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे यज्ञ का सेवन करें । मरुद्गणों एवं इन्द्रदेव के बीच हमें यशस्वी बनाये । इस यज्ञ में मित्रावरुण का यजन करें । रात्रि और उषाकाल में भी कुशाओं पर विराजें॥५॥
ऐश्वर्य के इच्छुक वसिष्ठ ने सब प्रकार के धन हेतु बल के पुत्र अग्निदेव की स्तुति की। अग्निदेव हमें अन्न, बल और धन प्रदान करें । हे देवगणो ! आप हमारी पालन करें, कल्याण करें॥६॥

सूक्त-४३

विद्वान् स्तोताओं के स्तोत्र वृक्ष की शाखाओं के समान समस्त दिशाओं में गमन करते हैं । वे स्तोतागण देवत्व प्राप्ति के निमित्त नमस्कारों सहित आपकी तथा द्युलोक एवं पृथिवीलोक की भी स्तुति करते हैं॥१॥
हमारा यह यज्ञ देवताओं की ओर तीव्रगामी अश्व के समान गमन करे । समान मन वाले आप घृत अर्पित करने वाले सुक् को उठाएँ । यज्ञ में देवों के लिए कुशाएँ बिछाएँ । हे अग्निदेव ! देवताओं की ओर जाने वाली आपकी ज्वालाएँ ऊर्ध्वगामी हों॥२॥
भरण-पोषण के योग्य बालक जिस प्रकार माता की गोद में बैठते हैं, उसी प्रकार देवगण कुशा के आसनों पर विराजें । हे अग्निदेव ! आपकी ज्वालाओं पर “जुहू" घृत का सिंचन करे । हे देव ! आप युद्ध में हमारे शत्रुओं को परास्त करें॥३॥
यजन के योग्य देवता जल वृष्टि करते हुए हमारी सेवा स्वीकार करें। हे देवताओ ! आप सब समान मन से हमारे यज्ञ में पधारें एवं आज हमें श्रेष्ठ धन प्रदान करें॥४॥
हे अग्निदेव ! आप प्रजाजनों में हमें धन प्रदान करें । हे बलवान् अग्निदेव ! हम सदा आपके आश्रय में रहकर धनवान्, हृष्ट-पुष्ट एवं अहिंसक वृत्ति वाले बनें । आप हमारा पालन एवं कल्याण करें॥५॥

सूक्त-४४

आपकी सुरक्षा के निमित्त हम सर्वप्रथम दधिक्रादेव का आवाहन करते हैं । तत्पश्चात् दोनों अश्विनीकुमारों, उषा, समिद्ध अग्नि और भगदेव का आवाहन करते हैं । इन्द्र, पूषा, ब्रह्मणस्पति, आदित्यगण, द्यावा-पृथिवी, जलदेवता और सूर्यदेव की स्तुति भी करते हैं॥१॥
हम दधिक्रादेव को नमस्कारों द्वारा प्रवर्तित एवं प्रबोधित करते हुए, यज्ञ के निकट पहुँचते हैं । यज्ञ में इळा देवी की प्रतिष्ठा करके श्रेष्ठ, प्रार्थनीय विद्वज्जन, अश्विनीकुमारों को आवाहित करते हैं॥२॥
हम दधिक्रावा को संबोधित करते हुए अग्नि, उषी, सूर्य और भूमि अथवा गौ की स्तुति करते हैं । अहंकारी शत्रुओं के संहारक वरुणदेव के भूरे वर्ण वाले अश्व का स्तवन करते हैं । ये समस्त देवगण हमें सब प्रकार के पापों से बचाएँ॥३॥
सर्वप्रधान, तीव्रगामी दधिक्रा, मंतव्य को जानकर उषा, आदित्यगण, वसुगण और अंगिरा एवं सूर्यदेव से सहमत होकर स्वयं ही रथ के अग्रभाग में नियोजित हो जाते हैं॥४॥
यजन मार्ग से गमन के लिए दधिक्रादेव हमारे मार्ग को जल से सीचें । दिव्य रूप वाले वे अग्निदेव एवं समस्त बलवान् विद्वान् हमारी प्रार्थना सुनें॥५॥

सूक्त-४५

जो देव उत्तम धन को धारण करते हैं, अपने तेज से अन्तरिक्ष को प्रकाशित करते हैं एवं हरित अश्व जिनके रथ को खींचते हैं, वे सवितादेव हमारे यज्ञ में पधारे । सवितादेव मनुष्य के हितसाधक धन को अपने हाथों ( किरणों ) में धारण किये रहते हैं। ये देव प्राणियों को धारण करते हैं एवं उन्हें कर्म की प्रेरणा प्रदान करते हैं॥१॥
ये स्वर्णपाणि, दानशील सवितादेव द्युलोक में अन्त तक संव्याप्त हैं। इन देव की इस महिमा का हम गान करते हैं। ये सवितादेव मनुष्यों को शुभ कर्म करने की प्रेरणा प्रदान करें॥२॥
धन के स्वामी, तेजस्वी सवितादेव हमें धन प्रदान करें । वे अति विशाल स्वरूप वाले देव हम मानवोचित भोग्य सामग्री एवं धन प्रदान करें॥३॥
उत्तम जिह्वा वाले, समस्त धन से सम्पन्न, उत्तम हाथो (किरणा) वाले सवितादेव की हम इन स्तोत्री द्वारा स्तुति करते हैं॥४॥

सूक्त-४६

ये स्तोत्र सुदृढ़ धनुषधारी, शीघ्रगामी बाण छोड़ने वाले, अजेय, तीक्ष्णास्रधारी एवं अन्न से पूर्ण रुद्रदेव को तुष्ट करे । वे इन्हे (हमारे स्तोत्रों को) सुने॥१॥
हे रुद्रदेव ! आपको भौतिक एवं दिव्य विभूतियों के द्वारा जाना जाता है। आप सबको सुखी-सम्पन्न बनाते हुए, हमें नीरोग बनाकर हमारे घर में निवास करें॥२॥
है स्वपिवात् (वायु के समान संचरणशील) रुद्रदेव ! आपके द्वारा संचरित अंतरिक्षीय विद्युत् हमें कष्ट न पहुँचाए। आपकी सहस्रों ओषधियाँ (रोगनाशक प्रवाह) हमारे बच्चों को क्षीण न करे॥३॥
हे (रुद्र) देव ! ने हमें मारें और न हमारा त्याग करें । आपके क्रोध के बन्धन हमें ग्रसित न करें । प्राणियों द्वारा प्रशंसित कार्य में हमें भागीदार बनायें । कल्याणप्रद साधनों से हमारी रक्षा करें॥४॥

सूक्त-४७

हे जलदेव ! देवत्व के इच्छुकों के द्वारा इन्द्रदेव के पीने के लिए भूमि पर प्रवाहित शुद्ध जल को मिलाकर सोमरस बनाया गया है । शुद्ध पापरहित, मधुर रसयुक्त सोम का हम भी पान करेंगे॥१॥
हे जलदेवता ! आपका मधुर प्रवाह सोमरस में मिला है। उसे शीघ्रगामी अपांनपात् (अग्निदेव) सुरक्षित रखें उसी सोम के पान से वसुओं के साथ इन्द्रदेव मत्त होते हैं । हम देवत्व की इच्छावाले आज उसे प्राप्त करेंगे॥२॥
ये जल देवता हर प्रकार से पवित्र करके तृप्ति सहित (प्राणियों में ) प्रसन्नता भरते हैं। वे (जलदेव) यज्ञ में पधारते हैं, परन्तु विघ्न नहीं डालते । इसलिए नदियों के निरन्तर प्रवाह के लिए यज्ञ करते रहें॥३॥
जिस जल को सूर्यदेव अपनी रश्मियों के द्वारा बढ़ाते हैं एवं इन्द्रदेव के द्वारा जिन्हें प्रवाहित होने का मार्ग दिया गया है । हे सिन्धो (जल प्रवाहो) ! आप उन जलधाराओं से हमें धन-धान्य से परिपूर्ण करें तथा कल्याणप्रद साधनों से हमारी रक्षा करें॥४॥

सूक्त-४८

हे कर्मकुशल धनवान् भुओ ! आप हमारे सोमरस से प्रसन्न हों । आपके कर्मकुशल समर्थ अश्व मनुष्यों के लिए हितकर मार्ग प्रशस्त करें॥१॥
हम आपके साथ रहकर कर्म-कुशल, ऐश्वर्यवान् एवं बलवान् होंगे । वाज नामक प्रभुदेव युद्ध में हमारी रक्षा करें । इन्द्रदेव का सहयोग प्राप्त कर हम वृत्र से बच सकेंगे॥२॥
वे वीर शत्रु की बड़ी सेना को उत्तम अस्त्र-शस्त्रों से युद्ध भूमि में पराजित करते हैं। ऐश्वर्यवान् श्रेष्ठ शिल्पियों-विश्वकर्मा आदि से सेवित, बलवान् शत्रु को पराभूत करने वाले आर्य इन्द्र और त्रभुदेव शत्रुओं का विनाश करते हैं॥३॥
हे देवो ! हमें धन प्रदान करें तथा सभी एक विचार वाले ऋभुगण हमारी सुरक्षा करें । हमें अन्न प्रदान करके कल्याणकारी साधनों से सुरक्षित करें॥४॥

सूक्त-४९

समुद्र जिनमें ज्येष्ठ हैं, वे जल-प्रवाह सदा अंतरिक्ष से आने वाले हैं। इन्द्रदेव ने जिनका मार्ग प्रशस्त किया था, वे जलदेव यहाँ हमारी रक्षा करें॥१॥
जो दिव्य जल आकाश से (वृष्टि के द्वारा प्राप्त होते हैं, जो नदियों में सदा गमनशील हैं, खोदकर जो (कुएँ आदि से) निकाले जाते हैं और जो स्वयं स्रोतों के द्वारा प्रवाहित होकर पवित्रता बिखेरते हुए समुद्र की ओर जाते हैं, वे दिव्यतायुक्त पवित्र जल हमारी रक्षा करें॥२॥
सर्वत्र व्याप्त होकर सत्य और मिथ्या के साक्षी वरुणदेव जिनके स्वामी हैं, वे ही रसयुक्ता, दीप्तिमती, शोधिका जल देवियाँ हमारी रक्षा करें॥३॥
राजा वरुण और सोम जिस जल में निवास करते हैं, जिसमें विद्यमान सभी देवगण अन्न से आनन्दित होते हैं, विश्व-व्यवस्थापक अग्निदेव जिसमें निवास करते हैं। वे दिव्य जलदेव हमारी रक्षा करें॥४॥

सूक्त-५०

हे मित्रावरुण ! आप यहाँ (संसार में) हमारी रक्षा करें । कुलायत (एक स्थान पर घर बनाकर रहने वाले) अथवा विश्वयत (सर्वत्र फैलने वाले विष या विषैले जन्तु) हमारे निकट न आएँ । अजकाय (पशुओं के आकार वाले) अथवी कठिनाई से दिखने वाले (सूक्ष्म) छद्म से आघात करने वाले सपदि हमारे पदचाप को न पहचानें, हमसे दूर ही रहें॥१॥
हे अग्निदेव ! वंदन नाम का (जकड़न पैदा करने वाला) जो विष सन्धि स्थानों में रुक जाता है, जो विष "जानु” और “पैरों" की ग्रन्थियो को फुला देता है; हम सबसे उस विष को दूर रखें । हमारे पद चाप से छद्मगामी सर्प हमें न पहचान सकें॥२॥
हे विश्वेदेवागण ! जो विष शाल्मली वृक्ष पर होता हैं, जो विष नदी जल एवं ओषधियों से उत्पन्न होता है, उसे दूर करें । छिपकर चलने वाले सर्पो से हमारी रक्षा करें॥३॥
जो नदियाँ प्रवण देश (प्रवाह की दिशा में प्रवहमान हैं, जो उच्च और निम्न प्रदेशों में होकर बहती हैं, जो जल-शून्य अथवा आप्लावित होकर संसार को तृप्त करती हैं। वे सभी दिव्य नदियाँ शिपद रोग से बचाकर कल्याणकारी बने । सभी नदियाँ हमारी रक्षा करें॥४॥

सूक्त-५१

हे आदित्यो ! आपकी कृपा से हमें नवीन एवं सदा सुख देने वाला घर प्राप्त हो । हमारी प्रार्थना सुनकर यज्ञ और यजमान को पापरहित दरिद्रता से मुक्त करें॥१॥
हे वेगवान् देव आदित्य, अदिति, वरुण, अर्यमा और मित्र ! आप प्रसन्न हों । आप समस्त विश्व के रक्षक हैं, आप हमारा हित करें । आप आज हमारे हित-साधन के लिए सोमपान करें॥२॥
हमने समस्त देवगणों, समस्त मरुद्गणों, सभी आदित्यों, सभी ऋभुओं, अश्विनीकुमारों, इन्द्र और अग्नि देवों की प्रार्थना की है । कल्याणकारी साधनों द्वारा वे सदा हमारी रक्षा करें॥३॥

सूक्त-५२

हे आदित्यगण ! हम आपके अपने हैं, आप हमें दुःखों से मुक्त रखें । हे वसुओ !देवों की शक्ति से मानवमात्र का कल्याण हो । हे मित्रावरुण देवो !आपके यजन से हम धन प्राप्त करें । हे द्यावा-पृथिवि !हम शक्तिशाली हों॥१॥
मित्र और वरुण आदि देवगण में उत्तम ऐश्वर्य प्रदान करें और हमारी सन्तानों को भी सुख देने वाले हों। हम आपके आत्मीय बनें, दूसरों के पापों का फल न भोगें । हे वसुदेवो ! जिस (कर्म) के कारण आप विनाश करते हैं, वह कर्म हम न करें॥२॥
त्वरित गति से कार्य करने वाले अंगिरा ने सवितादेव की उपासना करके जिस दिव्य धन को प्राप्त किया था, उसी ऐश्वर्य को प्रजापति और देवगण हमें प्रदान करें॥३॥

सूक्त-५३

जिन विशाल देव-जननी द्यौ और पृथ्वी की पूर्व काल में ऋषियों ने स्तुति की थी, उनसे हम यज्ञ और अन्न के द्वारा कष्ट दूर करने की प्रार्थना करते हैं॥१॥
हे याजको ! मातृ-पितृ रूपा द्यावा-पृथिवीं को यज्ञ के अग्र भाग में स्थापित नवीन स्तोत्रों द्वारा सुपूजित करो। हे द्यावा-पृथिवि ! देवों के साथ दिव्य ऐश्वर्य देने के लिए आप हमारे पास पधारें॥२॥
हे द्यावा-पृथिवि ! आपके पास जो अनेक प्रकार का दिव्य, रमणीय और अक्षय धन है, वह हमें प्रदान कर तथा कल्याण के साथ हमारा पालन करें॥३॥

सूक्त-५४

हे वास्तोष्पत (गृह-पालक देव) ! आप हमें जगाएँ । हमारे घर में पुत्र-पौत्र आदि द्विपदों, गौ, अश्व आदि चतुष्पदा को नीरोग एवं सुखी करें । जो धन हम आपसे माँगे, वह हमें प्रदान करे॥१॥
हे वास्तोपते ! आप हमारे लिए कल्याणकारी धन का विस्तार करें । हे सोम ! हम आपकी कृपा से गौओ और घोड़ा के साथ नीरोग रहें । आप हमारा पुत्रवत् पालन करें॥२॥
हे वास्तोष्यते ! हम आपसे सुखकर, रमणीय एवं ऐश्वर्य-सम्पन्न स्थान प्राप्त करें । हमें प्राप्त हुए और प्राप्त होने वाले श्रेष्ठ धन की आप रक्षा करें । हमें सदा कल्याणकारी साधनों में सुरक्षित रखें॥३॥

सूक्त-५५

हे वास्तोष्पते (गृहपालको ! आप हमारे हर प्रकार से मित्र हैं, हमारे हरे प्रकार के रोगों का नाश करें॥१॥
श्वेत सरमा (देव-कुक्कुरी) के वंशधर पीले वर्ण वाले हे वास्तोपति देव !जब आप दाँत दिखाते हैं, तो वे शस्त्रों की तरह चमकते हैं । आहार के समय वे विशेष शोभा पाते हैं ऐसे (दाँतों वाले) देव आप सुख से सो जाएँ॥२॥
हे सरमा के पुत्र ! आप चोरों-तस्करों के पास पुन:-पुन: जाएँ। आप इन्द्रदेव के भक्तों के निकट क्यों जाते है ? हमारे कार्यों में व्यवधान क्यों डालते हैं ? अभी आप भली प्रकार सो जाएँ॥३॥
(श्वान के प्रति) तुम शूकर को इराओं, शूकर तुम्हें डराये । इन्द्र के भक्तों (श्रेष्ठ कर्मियों) की ओर क्यों दौड़ते हो ? हमें परेशान ने करो, जाकर सो जाओ॥४॥
(श्वान के प्रति) तुम्हारी माँ शयन करे । तुम्हारे पिता सोएँ । स्वयं (श्वान) तुम भी सो जाओ । गृहस्वामी, सभी बान्धव एवं परिकर के सब लोग सो जाएँ॥५॥
जो यहाँ ठहरता एवं आता-जाता रहता है और हमारी ओर देखता है, उनकी दृष्टि को हम राज-प्रासाद की तरह निश्चल बनाएँ॥६॥
सहस्र श्रृंगो (रश्मियों) वाला वृषभ (वर्षा करने वाला सूर्य) समुद्र से ऊपर आ गया है । शत्रु का पराभव करने वाले उन (सूर्य) के बल से हम (स्तोतागण) सबको सुख़ से शयन करा देते हैं॥३॥
जो नारियाँ घर के आँगन में शयन करती हैं । जो राह चलते वाहन पर सोने वाला है, जो बिछाने पर माता हैं, जो उत्तम गंध से सुवासित होकर श्रेष्ठ शय्याओं पर सोती हैं । हम उन्हीं की तरह से सभी स्त्रियों को सुखपूर्वक मुला देते हैं॥८॥

सूक्त-५६

एक ही तरह के गृह में रहने वाले, कान्तियुक्त, उत्तम घोड़ों से युक्त, सबके हितेषी ये रुद्रगण कोन हैं ?॥१॥
अपने जन्म के बारे में ये (मरुद्गण) स्वयं जानते हैं। दूसरा कोई नहीं जानता॥२॥
अपने दिव्य साधनों को साथ लेकर जब ये मिलते हैं, उस समय श्येन (बाज़) पक्षी की तरह आपस में । प्रतिस्पर्धा करते हैं॥३॥
बुद्धिमान् मनुष्य इन श्वेतवर्ण वाले मरुतों को जानते हैं । मरुतों की माता ने इन्हें अंतरिक्ष में अथवा अपने उदर में धारण कर रखा था॥४॥
वीर मरुतों के कारण वे मानवी शक्ति को बढ़ाने वाली और शत्रुहन्ता वीर पुत्र वाली हैं॥५॥
वे वीर मरुद्गण आवश्यकता पड़ने पर (शत्रु पर) प्राण-घातक हमला करने वाले हैं। श्रेष्ठ अलंकारों से युक्त एवं तेजस्वी हैं॥६॥
हे मरुतो ! आप बुद्धिमान् हैं । आपके कारण यह ( देव) संगठन बलवान् हुआ । आपका बल स्थिर एवं तेज उग्र है॥७॥
हे मरुद्गणो ! आप शोभायमान बल वाले हैं। आप मन से (शत्रुहनन के निमित्त) क्रोध (भी) करते हैं और आपका दूसरों को अभिभूत करने वाला वेग वृक्षादिकों को कम्पित करके उसी तरह शब्दायमान कर देता है, जैसे (मननशील) मुनिगण (स्तोत्रादि पाठ के समय) शब्दोच्चार करते हैं॥८॥
हे मरुद्गणो ! आपके शत्रु-विनाशक, क्रूर-चिन्तन से हमारा अहित न हो। हमें श्रेष्ठ शक्ति दें । आपके तेजस्वी शस्त्र का हम पर आघात न हो॥९॥
हे वीर मरुत् ! आप वेगपूर्वक कार्य करने वाले हैं। हम प्रिय वाणी से आपके श्रेष्ठ नामों को लेकर पुकारते हैं, जिससे आप प्रसन्न हों॥१०॥
गतिमान्, श्रेष्ठ वीर मरुत् अस्त्र-शस्त्रों और आभूषणों को धारण करके अतिशय सुशोभित हो रहे हैं॥११॥
हे वीर मरुतो ! आप पवित्र अन्न से पोषित, पवित्र जीवन वाले हैं। आपके लिए हम हिंसारहित यज्ञ करते हैं, क्योंकि आप सत्य के व्यवहार से सत्यमय जीवन जीकर अन्यों को भी श्रेष्ठ बनाते हैं॥१२॥
हे मरुत् वीरो ! आपके कंधों पर आभूषण एवं वक्ष पर सोने के हार सुशोभित हैं। वर्षा के समय आप बिजली की तरह चमकीले अस्रों की वर्षा करके अपनी स्वधा शक्ति का परिचय देते हैं। जिस प्रकार वर्षा के समय बिजली शोभा पाती है, उसी प्रकार (शत्रुओं पर) आयुधों की वर्षा करके आप अपनी स्वधा शक्ति का परिचय देते हैं॥१३॥
हे पूज्य मरुतो ! आपका प्रखर तेज अन्तरिक्ष में प्रवाहित रहता है । आप जल की वृष्टि करें । हजारों गृहो के गृहस्वामियों द्वारा प्रदत्त इस यज्ञ भाग को ग्रहण करें॥१४॥
हे मरुत् वीर ! यदि आप तेजस्वी, ज्ञानी मनुष्यों के द्वारा यज्ञ में की गई स्तुति को भली प्रकार जानते हों, तो श्रेष्ठ पुत्रयुक्त ऐसा धन प्रदान करें, जो शत्रु के द्वारा विनष्ट न हो॥१५॥
मरुद्गण तीव्रगामी अश्व की तरह निरन्तर गमनशील हैं । वे यज्ञ दर्शक की तरह पवित्र मन वाले, राजकुमारों जैसे सुन्दर एवं खेलने वाले शिशु की तरह हैं । वे जल के धारक हैं॥१६॥
शत्रुओं का संहार कर द्युलोक एवं पृथिवी लोक को संरक्षण देने वाले मरुद्गण हमें सुखी बनाएँ। आपके गो (मेघ स्थित जल) एवं मनुष्यों के लिए घातक शस्त्र हमारे पास न आएँ । हमें सुख के साधन प्रदान करें॥१७॥
हे वीर मरुतो ! यज्ञशाला में बैठे हुए याजक आपकी दानवीरता की प्रशंसा करके बार-बार आपका आवाहन करते हैं। हे वर्षणशील (कामनाओं की पूर्ति करने वाले) ! जो याजक कर्मनिष्ठ एवं यजमान का संरक्षक हैं, वह माया-मुक्त होकर आपकी स्तुति करता है॥१८॥
ये मरुद्गण त्वरित गति से कार्य करने वाले यजमान से प्रसन्न होते हैं, अपने पराक्रम से दूसरे बलवानों को झुका देते हैं (अभिभूत कर देते हैं), स्तोतागणों की हिंसकों (व्यक्तियों-प्राणियों) से रक्षा करते हैं तथा यज्ञ न करने वालों से अत्यधिक रुष्ट हो जाते हैं॥१९॥
ये मरुद्गृण धनी और दरिद्र दोनों को समान रूप से संरक्षण प्रदान करते हैं। मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाले हे वीरो ! आप हमें अंधकार से दूर कर पुत्र-पौत्रादि सहित सब प्रकार के सुख प्रदान करें॥२०॥
हे रथारूढ़ मरुतो ! अपनी सम्पत्ति-दान के समय आप हमें अलग न करें। अपनी दिव्य सम्पत्ति में हमें भी भागीदार बनाएँ॥२१॥
हे रुद्रपुत्र मरुतो ! जिस समय विक्रमशाली योद्धा उत्साहित होकर नदियों में, ओषधि क्षेत्रों एवं प्रज्ञाओं में शत्रुओं की तरह क्रोधसहित आक्रमण करें, तब उस संग्राम में आप हमें संरक्षण प्रदान करें॥२२॥
हे मरुतो !हमारे पूर्वजों के लिए आपने अनेक कार्य किए हैं । पहले भी अपने प्रशंसित कार्य किए हैं। ओजस्वी व्यक्ति आपसे सहयोग पाकर शत्रुजयी होता हैं । आपकी कृपा से स्तोतागण अन्नादि प्राप्त करते हैं॥२३॥
हे मरुतो ! हमें (ऐसी) बलवान् संतति प्राप्त हो, जो बुद्धिमान् और शत्रुओं का विनाश करने वाली हो । जिस की सहायता से हम शत्रुओं का विनाश कर सकें और आपकी कृपा से अपने अभीष्ट स्थान पर प्रतिष्ठित हो सकें॥२४॥
इन्द्र, वरुण, मित्र, अग्नि, जल, ओषधि और वृक्षदेव हमारी प्रार्थना स्वीकार करें । मरुतों की छत्रछाया में हम सुखी रहें । आप सब हमें कल्याणकारी साधनों से सुरक्षित रखें॥२५॥

सूक्त-५७

हे यजनीय मरुतो ! आपके सुन्दर नामों से स्तोतागण प्रार्थना करते हैं। आप पृथिवी और अंतरिक्ष को कम्पायमान कर सर्वत्र गमनशील हैं । आपकी कृपा से सर्वत्र जल वृष्टि होती हैं॥१॥
हे मरुतो ! आप अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें ढूंढकर उनकी मनोकामना पूरी करते हैं। आप हम पर प्रसन्न होकर, हमारी यज्ञशाला में कुशों के बने आसन पर विराजमान होकर सोमपान करें॥२॥
ये मरुद्गण जितने उदारचेता हैं, वैसा कोई नहीं है। ये वीर आभूषण, वस्त्र एवं आयुधों से अपने तेज को प्रदीप्त करते हैं। आकाश और पृथिवी को सुशोभित करते हैं॥३॥
हे पूज्य वीरो ! आपके निमित्त हमसे जो गलतियाँ हुई हों, उन्हें क्षमा करे । हम आपको कोपभाजन न बने । आप हमें अन्नदान करने वाली बुद्धि प्रदान करें॥४॥
हे अनिन्दनीय पवित्र मरुतो ! हमारी यज्ञशाला में आप विहरण करें । हे पृज्य वीरो ! आपकी श्रन युद्ध हमारे कल्याण में लगी रहे । हमें आपकी सुन्दर स्तुति करते हैं । हमें अन्न के द्वारा पाषा प्रदान करे ॥५॥
नेतृत्व प्रदान करने वाले मरुद्गण अनेक नामों से प्रशंसित होकर हमारे द्वारा हमारी प्रज्ञा (मंगानो) । अमृत प्रदान करें तथा याजकों को सन्मार्ग से प्राप्त होनेवाली महान् धन प्रदान करें॥६॥
हे प्रशंसनीय मरुतो ! आप सर्वत्र व्याप्त होने वाले यज्ञ में ज्ञानियों की ओर अभिमुख हो । स्तानाओं का सदा कल्याण करें । ये स्वयं ही यजमान को संतानादि से परिपूर्ण बना देत है । आप कल्याणकारी साधनों से हमें सुरक्षा प्रदान करें॥७॥

सूक्त-५८

हे स्तोताओ ! आप देवस्थान में निवास करने वाले मरुतों की पूजा करो। जो अपने दिव्य प्रभाव से विनाशकारी आपदाओं से बचाते हैं और पृथिवीं तथा अन्तरिक्ष में स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनाते हैं॥१॥
हे विकराल रूप वाले मरुतो ! आपका जन्म रुद्रदेव से हुआ है । आपका बल और तेज दिग्टिगत में व्याप्त है । आपके प्रवाहित होने पर सूर्यदेव पर दृष्टि रखने वाला (सारा) जगत् भयभीत हो जाता है॥२॥
है मरुद्गण ! आप यज्ञ करने वाले को धन-धान्य से परिपूर्ण करे । हमारी स्तुतियों से आप प्रसन्न हो । जिस मार्ग से आप जाते हैं, उसका अनुसरण करने पर प्राणी समुदाय विनष्ट नहीं होता। आप हमें मनोभिलषित ऐश्वर्य प्रदान करें॥३॥
हे मरुत् वीरो ! आपके द्वारा रक्षित स्तोता (ज्ञानी) सहस्रों धनों का स्वामी होता है। आपके द्वारा संरक्षित चंचल (अश्व) शत्रुजयी होता है । आपसे संरक्षण प्राप्त कर राजा भी शत्रुओं का विनाश करता है। आपके द्वारा दिया गया धन वृद्धि को प्राप्त हो॥४॥
मनोभिलषित ऐश्वर्य प्रदान करने वाले रुद्रपुत्र मरुतों की हम उपासना करते हैं। बार-बार हमें आपका संरक्षण प्राप्त होता है । शीघ्रता में हुए ज्ञाताज्ञात पाषों को हम आपकी प्रार्थना से धो देंगे॥५॥
हम ऐश्वर्यवान् मरुतों की स्तुति करते हैं। वे हमारी प्रार्थना से प्रसन्न हों । हमारे शत्रुओं को दूर से ही हटा दे । हमें सदा श्रेष्ठ साधनों से सुरक्षित रखें॥६॥

सूक्त-५९

हे अग्नि, वरुण, मित्र, अर्यमा और मरुत् देवो ! आप जिन्हें श्रेष्ठ मार्ग पर चलाते हों, उन्हें सुख भी प्रदान करें । अपने उपासकों को भय से मुक्त करें॥१॥
हे देवो ! आपसे संरक्षित होकर शुभ दिवस में जो यज्ञ करता है, वह शत्रुओं को पराजित करता है । जो बहुत सा द्रव्य प्रदान करता है, वह अपनी हर तरह से वृद्धि (उन्नति) करता हैं॥२॥
हे मरुतो ! आपमें जो कनिष्ठ (मन्द) हैं, उनकी भी स्तुति वसिष्ठ ऋषि करते हैं। आज इ. इस यज्ञ में एक साथ बैठकर आप सभी (उनचासों मरुत्) सोमरस का पान करे॥३॥
हे नेतृत्व क्षमता-सम्पन्न मरुद्गण ! आपसे संरक्षित व्यक्ति युद्ध में आपके . रनों से सुरक्षित रहता है। आपका नित-नव संरक्षण में प्राप्त हो । यथेच्छ सोम पान के लिए आप हमारे३-३॥
हे मरुद्गण ! आपकी शक्ति संगठित हैं । हव्य ग्रहण करने के लिए आप यहाँ पधारे, अन्यत्र कहीं न ज्ञाएँ॥५॥
आप हमारे बिछाये हुए कुशाओं पर विराजमान हो और मनोभिलषित सम्पत्ति प्रदान करें । किसी को कष्ट न देने वाले हे वीरो ! इस यज्ञ में आप अपना सोमरस रूपी स्वाहुति भाग स्वीकार करें और आनन्दित हों॥६॥
अविज्ञात रूप से रहने वाले मरुद्गण नील वर्ण वाले हंसों की तरह अलंकारों से सुसज्जित होकर सोमपान कर आनन्दित होते हैं । रमणीय पुरुषों की तरह मरुद्गण हमारे चारों ओर बैठे॥७॥
हे वीर मरुतो ! जो अशिष्ट, तिरस्कृत करने वाले व्यक्ति हमारे मन को व्यग्र करना चाहते हैं, जो लोग पापा से द्रोह करने वाले वरुण के पशि में हमें बाँधना चाहते हैं, उन्हें आप अपने तीक्ष्ण आयुधों से नष्ट कर दें॥८॥
शत्रुओं को संताप देने वाले तथा उनका नाश करने वाले हे मरुतो ! आप इस हव्य को ग्रहण करके हमें संरक्षण प्रदान करें॥९॥
गृहस्थ धर्मपालक, दानवीर हे मरुतो ! आप अपने रक्षा-साधनों के साथ यहाँ पधारें तथा हमसे दूर न जाएँ॥१०॥
सूर्य के समान तेजस्वी, स्वयं प्रवृद्ध- बल से युक्त, ज्ञानी है मरुतो ! यहाँ यज्ञ में हम आपका आवाहन करते हैं॥११॥
हम सुरभित पुण्य, कीर्ति एवं पुष्टिवर्धक (पोषण साधनों को बढ़ाने वाले) तथा तीन प्रकार से संरक्षण देने वाले (त्र्यम्बक) भगवान् की उपासना करते हैं। वे रुद्रदेव हमें उर्वारुक फल (ककड़ी-खरबूजा आदि) की तरह मृत्युबन्धन से मुक्त करें, (परन्तु) अमरता के सूत्रों से दूर न करें॥१२॥

सूक्त-६०

हे सूर्यदेव ! आज उदय होते ही अनुष्ठान के समय आप हमें निष्पाप बना दें । हे अदिते ! हम मित्रावरुण देवों के प्रिय पात्र हों । हे अर्यमन ! हम आपकी कृपा के प्रिय पात्र हों । हे अर्यमन ! आपकी कृपा पाने के लिए हम प्रार्थना करते हैं॥१॥
हे मित्र और वरुण देवों ! ये सूर्यदेव पृथ्वी और अन्तरिक्ष में उदय होकर सवका पोषण करते हुए मनुष्यों के अच्छे बुरे कर्मों को देखते हैं॥२॥
हे मित्रावरुण देवों ! जलदाता, हरणशील, सात घोड़ों द्वारा सूर्यदेव का रथ चलता है । वे आप दोनों को सन्तुष्ट करके गोपालन करने वाले की तरह प्राणिजगत् का पालन करते हैं॥३॥
ॐ मित्रावरुण देवों ! पवित्र हव्यादि अन्न आपको समर्पित है। मित्र, वरुण और अर्यमा देव के बनाए रास्ते से सूर्य भगवान् अन्तरिक्ष में गमन करते हैं॥४॥
ये आदित्य, मित्र, वरुण, अर्यमा देवगण पापनाशक एवं सर्वत्र मंगल करने वाले हैं । ये अदितिपुत्र किसी से डरने वाले नहीं हैं । सदैव सुख प्रदान करने वाले ये यज्ञ द्वारा वृद्धि पाते हैं॥५॥
ये मित्र, वरुण और अर्यमादेव किसी से दबाये नहीं जा सकते । ये मूर्खों को भी ज्ञानवान बनाते हैं। बुद्धिमान कर्मनिष्ठ व्यक्ति को आगे बढ़ाते और पापियों को दण्ड देते हैं॥६॥
ये आकाश और पृथ्वीलोक की साड़ी जानकारियाँ रखने वाले अज्ञानी को भी ज्ञानवान बनाकर श्रेष्ठ कर्मों में लगा देते हैं। इनकी प्रबल सामर्थ्य से गहरी नदियों में भी भूतल (ठोस आधार) मिल जाता है। ऐसे देव हमें कर्मों से पार लगायें॥७॥
मित्र, अर्यमा और वरुणदेव याजकों को जो कल्याणकारी और स्तुत्य सुख प्रदान करते हैं, वही सुख हमारी संततियों के लिए प्राप्त हो । शीघ्रता से कार्य करते समय हम कोई भूल करें॥८॥
यज्ञ वेदी पर बैठकर जो देवों की प्रार्थना नहीं करता, वह वरुणदेव द्वारा मारा जाता है । मित्रावरुणदेव श्रेष्ठ दान करने वालों को सद्गति प्रदान करें तथा राक्षसों से बचाएँ॥९॥
इन वीरों की संगति गूढ़ तथा तेजस्वी कही गई है। ये अपने गुप्त बल से शत्रु को पराजित करते हैं तथा भय से कंपाते हैं। ऐसे देव हमें उसी बल से सुखी बनाएँ॥१०॥
जा यजमान अन्न-धन दान के समय श्रेष्ठ स्तुति करता है, उसे मित्रादि देवगण ध्यानपूर्वक श्रवण करते हैं तथा स्तोतागणों को विशाल निवास प्रदान करते हैं॥११॥
हे मित्रावरुण देवों ! यह उपासना, यज्ञादि कर्म आपको प्रसन्न करने के लिए हैं । आप सभी आपत्तियों से बचाकर, श्रेष्ठ साधनों से हमारा पालन करें॥१२॥


सूक्त-६१

हे मित्रावरुण देवों ! आप तेजस्वी हैं । आप देवों के नेत्रवत सूर्यदेव जैसा सुन्दर प्रकाश फैलाते हुए आकाश में गमन करते हैं तथा सारे भुवनों को देखते हुए लोगों के कर्मों एवं मनोभावों को जानते हैं॥१॥
है मित्रावरुणो ! वे सत्यनिष्ठ, बहुश्रुतज्ञानी (वसिष्ठ) यज्ञकर्ता आपके स्तोत्र का पाठ करते हैं । उन ब्राह्मण की आप दोनों रक्षा करते हैं। आप अनन्तकाल से श्रेष्ठकर्मा उन (वसिष्ठ) की सुरक्षा करते हैं ॥२॥
हे मित्रावरुणो ! आपने द्युलोक के साथ अति विस्तृत पृथ्वी की परिक्रमा की है । हे उत्तम दान देने वाले ! वनस्पतियों और प्रजाओं में आपका ही सौन्दर्य झलकता है । यज्ञ करने वालों की आप विशेष सुरक्षा करते हैं॥३॥
हे ऋषे ! आप तेजस्वी मित्र और वरुण देवों की स्तुति करें । वे अपने पराक्रम से द्युलोक एवं पृथ्वीलोक को संतुलित रखे हुए हैं। यज्ञरहित व्यक्ति सन्तान रहित हों तथा यज्ञ करने वाले अपने बुद्धि-बल को बढ़ाएँ॥४॥
है प्राज्ञदेवो ! आपकी ये जो स्तुतियाँ की गई हैं, इनमें अतिशयोक्ति कुछ भी नहीं हैं। झूठी प्रशंसा करने वाले लोग जनद्रोही होते हैं। इसलिए आपके ये स्तोत्र भ्रम में डालने वाले नहीं होते॥५॥
हैं मित्रावरुणो ! आपके यज्ञ को स्तुतियों के साथ सम्पन्न कर रहे हैं। हम बाधाग्रसित हैं, इसलिए आपको बुलाते हैं । आपकी प्रसन्नता के लिए नये स्तोत्रों का पाठ कर रहे हैं॥६॥
हे देवो ! यज्ञ के द्वारा की गई यह उपासना आप दोनों के लिए है । आप हमें समस्त विपत्तियों से मुक्त करे । सदैव कल्याणकारी साधनों से हमारी रक्षा करें॥७॥

सूक्त-६२

ये सूर्यदेव ऊपर उठकर प्रभूत तेजस् को प्राप्त करते हुए सबके आश्रयदाता बनते हैं। दिन में प्रकाशित होने पर सबको एक जैसे दिखाई देते हैं । यज्ञकर्ताओं द्वारा पूज्य वे सूर्यदेव सबके निर्माता हैं, जिन्हें परमात्मा ने स्वयं बनाया है॥१॥
हे सूर्यदेव ! आप हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर, अपने गमनशील अश्वों पर चढ़कर आकाशमार्ग से गमन करे । मित्र, वरुण, अर्यमा एवं अग्निदेवों को हमारी निर्दोष भावना की जानकारी दें॥२॥
मानव मात्र को दुःख से मुक्त करने वाले, सत्यव्रती मित्र, वरुण और अग्निदेव हमें सहस्री प्रकार के आनन्ददायक एवं प्रशंसनीय धन दें । प्रार्थना से प्रसन्न होकर वे हमारी मनोकामनाएँ पूर्ण करें॥३॥
हे विशाल द्यावा-पृथिवि ! हे अदिते ! आप हमें संरक्षण प्रदान करें । हम श्रेष्ठ जन्म वाले आपको जानते हैं। हमें वायु, वरुण और श्रेष्ठ मानवों के क्रोध से बचाएँ ॥४॥
हे चिरयुवा मित्रावरुणदेवो ! आप हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर, भुजाएँ फैलाकर, उदारतापूर्वक हमें दीर्घजीवन प्रदान करें । हमारे जाने योग्य क्षेत्रों को घृत (पोषक रस) से सिंचित करें । हमें ख्याति प्रदान करें तथा हमारे आवाहन को सुनें॥५॥
हे मित्र, वरुण, अर्यमा देवो ! आप हमारी संततियों के लिए पवित्र धन दें । हमारे सभी गन्तव्य मार्ग सरल हों। आप श्रेष्ठ साधनों से हमारा पालन करें॥६॥

सूक्त-६३

मित्रावरुण की आँख की तरह सुन्दर भाग्य वाले, समद्रष्टा सूर्यदेव चमड़े (बिछावन) की तरह अंधकार को समेटते हुए उदित हो रहे हैं॥१॥
मानवी सृष्टि करने वाले, सबके ज्ञानदाता एवं जीवन देने वाले, ये सूर्यदेव सबके समय-चक्र को बदलने की इच्छा से उदित होकर हरि (हरित वर्ण अथवा हरि संज्ञक) अश्वों से जुते हुए रथ में चलते हैं॥२॥
अत्यन्त प्रकाशमान सूर्यदेव अपने भक्तों की स्तुति सुनते हुए उषाओं के बीच में उदित होते हैं । ये हमारी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं और अपने तेज को कभी कम नहीं होने देते॥३॥
ये विशेष तेजस्वी सूर्यदेव दूर विराजमान होकर भी द्युलोक की शोभा बढ़ाते हुए उदित होते हैं । निश्चित हीं, सूर्यदेव को प्रेरणा से लोग कर्म में प्रवृत्त होते हैं॥४॥
देवताओं ने इन सूर्यदेव के लिए जिस मार्ग को बनाया है, वह (मार्ग) श्येन पक्षी की तरह अन्तरिक्ष से होकर जाता है । हे मित्रावरुण ! सूर्योदय होने पर यज्ञ और स्तोत्रों द्वारा हम आपका यजन करेंगे॥५॥
हे मित्र, वरुण और अर्यमा देवो ! आप हमें तथा हमारी संततियों को पवित्र धन प्रदान करें । हमारी प्रगति के सारे रास्ते निर्वाध हो । हमें कल्याणकारी साधनों से सुरक्षित रखें॥६॥

सूक्त-६४

हे मित्रावरुणदेवे ! आप द्यावा-पृथिवीं में जल के संचारकर्ता हैं । मित्र, सुजन्मा अर्यमा और बलवान् राजा वहण हमारे इस हव्य का सेवन करे॥१॥
हे मित्र और वरुणदेवो ! आप सत्यरूपी यज्ञ के रक्षक, नदियों में जल के संचारकर्ता और क्षत्रिय (रक्षक वीर) हैं। हमारे लिए अन्तरिक्ष से जलरूपी अन्न प्रेषित करें॥२॥
भित्र, वरुण, अर्यमा देवगण उदारदाता ( व्यक्ति, यज्ञ या परमात्मा) से हमारी कथा कहें । साधनों से सम्पन्न राजा के द्वारा हमे वहाँ पहुँचा दें । हम आप देव की कृपा से पुत्र-पौत्रादिकों के साथ अन्न द्वारा पोषन हो॥३॥
हे मित्रावरुणदेव ! उच्च धारणा शक्तिवाला व्यक्ति पूर्ण मनोयोग के साथ आपके रथ का निर्माण करता हैं । हे राजाओ ! आपकी कृपा से उसे सुन्दर निवास प्राप्त हो । उसे जल से सिंचित कर तृप्त करें॥४॥
मित्र, वरुण और वायु के लिए हमने सोमरस के समान आनन्द देने वाली यह स्तुति की है। आप हमारी बुद्धि और कर्म को संरक्षित करें । प्रज्ञा जाग्रत् करें तथा कल्याणकारी साधनों द्वारा हमारा कल्याण करें॥५॥

सूक्त-६५

कभी नष्ट न होने वाला जिन (मित्रावरुण) का श्रेष्ठ बल प्राप्त होने पर व्यक्ति सर्वत्र विजयी होता है, उन सूर्योदय के समय पवित्र बल वाले वरुण और मित्रदेवों की सूक्तों से प्रार्थना करते हैं॥१॥
हे मित्रावरुणो ! आप बलशाली हैं। हम आपकी प्रार्थना करते हैं। आप हमारी संततियों की वृद्धि करें । हम आपका सर्वत्र यशोगान करेंगे॥२॥
हे मित्रावरुण ! आप यज्ञ से विमुख व्यक्ति को अपने दृढ़ बन्धनों से बाँधते हैं। जैसे नाव से (नदी) जल पार किया जाता है, हे देव ! उसी प्रकार यज्ञ मार्ग से हम दुःखों से पार हो जाएँ॥३॥
हे मित्रावरुणो ! आप हमारे यज्ञ में पधारकर हव्य ग्रहण करें और अन्न एवं जल से हमारी गोचर भूमि का सिंचन करें । अमृत के समान मधुर जल से लोगों को तृप्ति प्रदान करें॥४॥
मित्र, वरुण और वायु देवों के लिए हमने सोम रस के समान आनन्द देने वाली स्तुति की हैं। आप हमारे बुद्धि और कर्म को संरक्षित करें । प्रज्ञा जाग्रत् कर कल्याणकारी साधनों द्वारा हमारा कल्याण करें॥५॥

सूक्त-६६

हमारे स्तोत्र बार-बार आविर्भूत होने वाले मित्रावरुणदेव का अनुगमन करें॥१॥
मित्रावरुणदेव आप श्रेष्ठ बल वाले और तेजस्वी हैं । शान्ति प्राप्त करने के लिए देवों ने आपको धारण किया था॥२॥
मित्र और वरुणदेव, गृह एवं शरीरों को संरक्षण प्रदान करते हैं । आप उपासकों के स्तोत्रों को स्वीकार करें॥३॥
सूर्योदय होने पर निष्पाप मित्र, अर्यमा, भग, सवितादेव हमारी ओर अभीष्ट धन को प्रेरित करें॥४॥
हे कल्याणकारी देवो ! आपके आगमन से हमारा वह आवास सुरक्षित बने । आप हमें पापों से मुक्त कराएँ ॥५॥
मित्रादि देवगण अपनी माता अदिति सहित हमारे संकल्पों के अधिष्ठाता हैं। हमारा अभीष्ट पूर्ण करने में समर्थ हैं, अत: वे शासक हैं॥६॥
(हे मित्र और वरुणदेव !) हम सूर्योदय के अवसर पर आप दोनों तथा शत्रुसंहारक अर्यमा के साथ-साथ समस्त देवताओं की स्तुति करते हैं॥७॥
हे विद्वान् मित्र और वरुणदेव ! कल्याणकारी श्रेष्ठ धन तथा दुष्टतारहित बल एवं सद्बुद्धि पाने के लिए हम आपकी वन्दना करते हैं। आप इसे स्वीकार करें॥८॥
हे वरुणदेव ! ज्ञानवानों के साथ आपकी स्तुति करते हुए हम वैभवयुक्त हों । हे मित्र ! आपकी स्तुति से हम अन्न-धन और स्वर्गापम सुखों को उपलब्ध करें॥९॥
अनेकों सूर्य की तरह तेजस्वी, अग्नि रूप जिह्वा वाले, यज्ञ के विस्तारक ये (मित्रादि देव) विश्व के तीनों स्थानों (द्यु, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी) को श्रेष्ठ विभूतियों द्वारा सुनियंत्रित रखते हैं॥१०॥
वर्ष, मास, दिन, रात्रि को बनाकर यज्ञ और मन्त्र को धारण करने वाले वीर मित्रावरुण और अर्यमा देव ने दूसरों की भलाई के लिए अप्राप्य शक्ति पायी थी॥११॥
हम आज सूर्योदय के समय वह धन माँगेंगे, जिसे सन्मार्ग दर्शक वीर मित्रावरुण और अर्यमा आदि देवगण धारण करते हैं॥१२॥
आप सत्य को धारण करके यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म करते हैं तथा सत्य से विमुख रहने वालों के शत्रु हैं। ऋत्विजों के साथ हम आपकी श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करें॥१३॥
आज सूर्य उदित होने पर पापरहित हुए हमको मित्र, सविता, भग और अर्यमा देव उत्तम प्रेरणा देकर श्रेष्ठ कर्म में प्रेरित करें॥१४॥
सबके शीर्षभाग में स्थित, सबके वन्दनीय, रथारूढ़ सूर्यदेव को संसार के कल्याण के लिए गतिमान् सप्त हर्याश्व सारे विश्व में ले जाते हैं॥१५॥
विश्व का कल्याण करने वाले, अंधकार को दूर करने वाले, सबके नेत्र स्वरूप ये सूर्यदेव हमारे सामने उदित हो रहे हैं । हे देव ! हम सौ वर्षों तक देखें, सौ वर्षों तक जिएँ॥१६॥
हे मित्र और वरुणदेव ! आप तेजस्वी और निडर हैं। आप स्तोता के पास सोमपान के लिए पधारें॥१७॥
हे सत्य की वृद्धि करने वाले मित्र और वरुणदेव ! आप द्रोह रहित हैं। आप अपने लोक से सोमपान के निमित्त पधारें॥१८॥
सत्यवती, नेतृत्व की क्षमता से सम्पन्न हे मित्रावरुणदेव !आप हमारी आहुति ग्रहण करके सोमरस का पान करें॥१९॥

सूक्त-६७

हे बुद्धिसम्पन्न स्वामी दोनों अश्विनीकुमारो ! हम उदार एवं पवित्र मन से आपके रथ का आवाहन करते हैं। पिता जैसे पुत्र को जगाता है, आपका रथ उसी तरह सबको सतर्क रखे॥१॥
हमारे लिए अग्निदेव प्रदीप्त हो रहे हैं, अंधकार का अन्त दिख रहा है । द्युलोक की पुत्री (उषा) के सम्मुख प्रकट होने वाले ये सूर्यदेव शोभा का बोध कराने वाले हैं॥२॥
हे सत्यव्रती अश्विदेवो ! सुन्दर अभिव्यक्ति वाले श्रेष्ठ होता स्तोत्रों के द्वारा आपकी प्रार्थना करते हैं। आप ऐश्वर्ययुक्त रथ पर आरूढ़ होकर प्राची दिशा से पधारें॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप रक्षक और मृदुभाषी हैं। हम ऐश्वर्य की कामना से इस सोमयाग में आपका आवाहन करते हैं। अपने प्रौढ़ अश्वों से आप सोमपान के लिए पधारें॥४॥
हे शक्ति के स्वामी अश्विदेवो ! आप हमारी धनाभिलाषी बुद्धि को सरल एवं अहिंसक बनाएँ, उसे लाभ के योग्य बनायें । युद्ध में हमारी बुद्धि को संरक्षण दें। आप हमें शक्तियों से सम्पन्न बनाएँ ॥५॥
हे अश्विनीकुमारो । श्रेष्ठकर्म के लिए आप हमारी बुद्धि का रक्षण करें । हमारी सन्तानोत्पादन की शक्ति समाप्त न हो। आपकी कृपा से संतानों को यथेच्छ धन देकर, रत्नों (सद्गुणों से अलंकृत होकर हम दिव्य पवित्रता प्राप्ति हेतु यज्ञीय जीवन जिएँ॥६॥
हे मधुर भाषी अश्विदेवो ! हमने आपके द्वारा प्रदत्त सम्पत्ति आपको समर्पित की है। प्रसन्न होकर आप हमारे सामने पधारें और प्रजाओं द्वारा दिया हुआ हव्य ग्रहण करें॥७॥
हे पोषक अश्विदेवो ! आपका रथ बहने वाली सात नदियों को लाँघ जाता है । देवों द्वारा नियोजित हुए सुजन्मा अश्व कभी नहीं थकते॥८॥
जो मधुर भाषी होकर गौ-अश्वों से युक्त ऐश्वर्य दान करते हुए दूसरों को प्रेरणा देते हैं, आप ऐसे लोगों से दूर न रहें, उनके घर पधारें॥९॥
हे युवा अश्विद्य ! आप हमारी स्तुति सुनें । जहाँ से आपको हव्य मिलता है, वहाँ पधारें और उन्हें रत्न देकर सुखी करें तथा सदा कल्याणकारी साधनों से हमारी सुरक्षा करें॥१०॥

सूक्त-६८

हे सुन्दर घोड़ों से युक्त शत्रुहन्ता अश्विदेवो ! हम स्तोताओं की प्रार्थना सुनते ही आप यहाँ पधार कर, हमारे हव्य को ग्रहण करें॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपके लिए यह श्रेष्ठ हवि समर्पित है । इस हव्य को ग्रहण करने के लिए हमारी प्रार्थना सुनकर आप यहाँ पधारें तथा हमारे शत्रुओं का विनाश करें॥२॥
हे देवो ! आप सूर्यदेव के साथ सहस्रों साधनों से युक्त, मन के समान वेगवान् रथ पर आरूढ़ होकर, अन्य लोकों को लाँघते हुए हमारे यज्ञ में आते हैं॥३॥
हे अश्विदेवो ! जब हम यज्ञ में आपको बुलाने के लिए सोमाभिषव करते हैं, तब यह सोम निचोड़ने वाला पत्थर घोर शब्द करता हैं; तब ज्ञानी होतागण हविष्यान्न से आपका आवाहन करते हैं॥४॥
(हे अश्विदेवो !) आपका जो विलक्षण भोजन है, वह महिष्वन्त (सबल बनाने वाला भोज्य पदार्थ) अत्रि के लिए अलग निकाला गया था। वे (अत्रि) आपके प्रिय होने के कारण आपके आश्रय में रहते हैं॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! ढ्य प्रदान करने वाले तथा जीर्ण हुए च्यवन ऋषि को आपके द्वारा वह मृत्यु से संरक्षित करने वाला जो रूप दिया गया, वह (कर्म) प्रसिद्ध हुआ॥६॥
हे अश्विदेवो ! राजपुत्र भुज्यु को उसके दुष्ट मित्रों ने समुद्र में छोड़ दिया था। आपकी प्रार्थना करने वाले उस भुज्यु को आपने पार लगाया था॥७॥
हे देवो ! आपने क्षीणकाय वृक को शक्ति देकर शक्तिमान् बनाया था तथा शयु का हित करने के लिए भी आप पधारे थे । आपने दोनों की प्रार्थना सुनी थी । आप दोनों ने बन्ध्या गौ को भी दूध देने में समर्थ बनाया था॥८॥
श्रेष्ठ विचारों वाले स्तोता (वसिष्ठ) उषाकाल से प्रथम उठकर प्रार्थना करते हैं। आप उन्हें अन्न दुग्ध आदि से सुखी करें तथा कल्याणकारी साधनों द्वारा उनका पालन करें॥९॥

सूक्त-६९

बलवान् अश्वों से खींचा जाने वाला, आपका रथ पृथ्वी-आकाश में हर जगह पहुँचता है जिसके पहिए में जल हैं, जो अन्नवाहक घृत आदि ओषधियों से युक्त एवं प्रजाओं का स्वामी है, वह रथ यहाँ आगमन करे॥१॥
(हे अश्विद्य !) पाँचों (पंचभूतों अथवा पंचप्राणों) को व्यापक स्थान देने वाले तीन वन्धुरों (सारथी के बैठने वाले आसनों) से युक्त, मन के अनुसार चलने वाले रथ से, कहीं भी जाने के इच्छुक आप यहाँ अवश्य आएँ॥२॥
हे शत्रुहन्ता अश्विदेवो ! आप श्रेष्ठ घोड़ों से जुते रथ पर बैठकर , अन्न के सहित यहाँ पधारें और मधुरस का पान करें । सूर्या के साथ गमन करने वाला आपका रथ गतिशील चक्रों से द्युलोक के अन्तिम छोर को भी आन्दोलित करता है॥३॥
सूर्य पुत्री उषा, आपके सुन्दर रथ पर बैठ गई हैं । जब आप स्तोता की सुरक्षा करते हैं, उस समय अन्नादि साधन आपके पास आते हैं॥४॥
हे रथारूढ़ वीरो। आपको वह रथ तेज से आच्छादित होकर, अश्वों से नियोजित होकर स्वमार्ग से जाता हैं । (इसलिए) हे अश्विनीकुमारो ! आप प्रात: काल होने पर पापों के शमन और सुख-शान्ति प्रदान करने के लिए उसी रथ से हमारे इस यज्ञ में पधारें॥५॥
हे नेतृत्व क्षमता-सम्पन्न अश्विद्य ! गौर मृग की तरह शीघ्रतापूर्वक सोमपान की कामना वाले आप दोनों हमारे यज्ञ में पधारें । देवत्व की कामना वाले अनेक लोग स्तुति करके आपको बुलाते हैं । आप (अन्यत्र) न रुकें॥६॥
हे अश्विद्य ! समुद्र में फंसे भुज्यु को आपने, पक्षी के समान गतिशील, कभी जीर्ण न होने वाले, अश्रान्त, द्रुतगामी (अश्वों या विमान द्वारा) कुशल क्रियाओं द्वारा निकाला था॥७॥
हे युवा अश्विद्वय ! आप हमारी प्रार्थना सुनें और जहाँ से आपको हव्य मिलता है, वहाँ पधारें । स्तोताओं को रत्न देकर सुखी करें । सदा कल्याणकारी साधनों से हमारी सुरक्षा करें॥८॥

सूक्त-७०

हे सर्वश्रेष्ठ अश्विदेवो ! आप हमारे यहाँ आएँ और अपने बैठने के सुखकर स्थान की तरह, मजबूत घोड़े की पीठ के समान इस स्थान पर बैठे । पृथ्वी पर यह स्थान (यज्ञस्थल) प्रशंसनीय हैं॥१॥
हे अश्विदेवो ! बुद्धिमान् स्तोता आपकी प्रार्थना कर रहे हैं। मनुष्य के गृह (यज्ञशाला) में उष्णता देने वाला (धूप या यज्ञाग्नि) सक्रिय है। उसके प्रभाव से (जल-वृष्टि से) नदी-समुद्र भर रहे हैं । जिस प्रकार से अश्व रथ को खीचते हैं, उसी प्रकार यज्ञ आप दोनों से युक्त होता है॥२॥
हे अश्विदेवो ! द्युलोक से अवतरित होकर आप पर्वत शिखरों, सोमादि ओषधियों में विराजते हैं। वह सब अन्नादि (पोषण) आप यज्ञस्थल पर दानशील प्रजाजनों को प्रदान करें॥३॥
हे अश्विद्वय ! आप अषयों द्वारा प्रदत्त अन्न (हव्य), जल आदि प्राप्त करते हैं, इसलिए हमारे द्वारा ओषधि (चरु-पुरोडाश) और जल (सोमरस) ग्रहण करें । जैसे पहले के युग में आप दोनों ने दम्पतियों को रत्नादि से पूर्ण बनाया था, उसी प्रकार इस समय में भी बना दें॥४॥
हे अश्विदेवो ! ऋषियों द्वारा स्तुत्य होकर आप सदा से सबका कल्याण करते आ रहे हैं। इस मनुष्य (यजमान) के यज्ञ में आप दोनों पधारें तथा आपकी अनुकम्पा (सुमति) हमें भी प्राप्त हो ॥५॥
हे सत्यव्रती अश्विदेवो ! स्तुति मंत्रों का निर्माण कर हविष्यान्न से विश्वकल्याणार्थ यज्ञ करने वाले वसिष्ठ के पास आप जाते हैं, क्योंकि वे आपकी ही प्रार्थना करते हैं॥६॥
हे बलवान् अश्विदेवो ! हमने अपनी इच्छा से वाणी द्वारा यह स्तुति आपकी प्रसन्नता के लिए की है। आप इसे स्वीकार करें तथा कल्याणकारी साधनों से हमें सुरक्षित रखें॥७॥

सूक्त-७१

रात्रि अपनी भगिनी उषा से अलग होकर लाल बिम्ब वाले सूर्यदेव का रास्ता खोल देती है । गोधन-वाजिधन के रूप में ऐश्वर्य देने वाले (हे देवो !) आपका हम आवाहन करते हैं । आप दिन या रात्रि के शत्रुओं को दूर करें॥१॥
मधुर स्वभाव वाले अश्विदेव हविदाता के लिए अपने रथ से सुन्दर पदार्थ लेकर पधारें और हमारे रोग तथा दारिद्र्य को दूर करते हुए दिन-रात हमारी सुरक्षा करें॥२॥
हे अश्विदेवो ! उषाकाल होने पर बलिष्ठ और स्वेच्छा से चलने वाले अश्व आपको लेकर हमारे पास आएँ तथा हमें तेजस्विता एवं उत्तम सम्पत्ति प्रदान करें॥३॥
हे याजकों के रक्षक देवो ! आपका शीघ्रगामी रथ ऐश्वर्य-सम्पन्न, तीन वन्धुरों (बैठने के स्थान) वाला, दिन के लिए व्यापक होकर चलने वाला है । आप रथ से हमारी ओर बढ़े॥४॥
हे देवो! आपने च्यवन ऋष को जरा मुक्त किया था । (युद्ध में) राजा पेदु पास द्रुतगामी अश्व भेजा था, अत्रि को पापान्धकार से मुक्त किया था और राज्य-च्युत हुए “जाहुष” को पुन: राज्य दिलाया था ॥५॥
हे बलशाली अश्विदेवों ! हमने अपनी इच्छा से, वाणी के द्वारा यह स्तुति आपकी प्रसन्नता के लिए की है। आप इसे स्वीकार करें तथा कल्याणकारी साधनों से हमारी सुरक्षा करें॥६॥

सूक्त-७२

हे सत्यवती अश्विदेवो ! गौ और अश्वादि ऐश्वर्य से सम्पन्न रथ से आप यहाँ पधारें । आप श्रेष्ठ तेज से शोभायमान हों । स्तोता अनेक स्तुतियों से आपकी स्तुति कर रहे हैं॥१॥
हे सत्यव्रती अश्विदेवो ! आप दोनों देवों के साथ प्रेमपूर्वक रथारूढ़ होकर हमारे यहाँ आएँ। आपके साथ हमारे पूर्वजों का सम्बन्ध भी था । हमारे और आपके पूर्वज तथा उनका धन एक ही है॥२॥
अश्विनीकुमारों को (ये) स्तुतियाँ जगाती हैं । सब लोग उत्तम कर्म से उषाकाल को चैतन्य करते हैं । वसिष्ठ, घु और पृथ्वी लोकों की सेवा करते हुए अश्विद्य की स्तुति करते हैं॥३॥
हे अश्विद्वय ! उषा के द्वारा अन्धकार हटाने पर स्तोता आपकी प्रार्थना करते हैं। सूर्यदेवता ऊर्ध्वगामी होते हुए तेजस्विता धारण कर रहे हैं । यज्ञ में समिधाओं के द्वारा अग्नि प्रज्वलित हो रही है॥४॥
हे सत्यव्रती अश्विदेवो ! पंचजनों (सभी) का हित करने के लिए ऊपर-नीचे, आगे-पीछे, चारों तरफ से धन लेकर आएँ। आप सदैव कल्याणकारी साधनों से हमारी रक्षा करें॥५॥

सूक्त-७३

हे अश्विद्य ! हम देवत्व प्राप्ति की इच्छा से प्रार्थना करते हुए अज्ञानान्धकार से पार हो जायें । बहुकर्मा, पूर्वकाल से अमर कीर्ति वाले हे अश्विदेवो ! स्तोतागण आपका आवाहन करते हैं॥१॥
हे सत्यपालक अश्विदेवो ! यज्ञ और प्रणाम करने वाला याजक यज्ञशाला में बैठ गया है, आप उसके पास जाकर मधुर सोमरस की पान करें। यज्ञ में हव्य समर्पित करके हम आपकी प्रार्थना करते हैं॥२॥
हे बलशाली ( अश्विदेवो) ! स्तोता वसिष्ठ आपको जाग्रत् करने के लिए शीघ्रगामी दूतों की तरह स्तोत्र संप्रेषित कर रहे हैं। आप स्तुतियों से प्रसन्न हों। हम आपके मार्गों का अनुसरण करने के लिए यज्ञ सम्पन्न करते हैं॥३॥
दोनों राक्षस हन्ता, दृढ़पाणि (अश्विनीकुमार) हमारी संतानों के पास आएँ । आप हमारा कष्ट न बढ़ाएँ, आनन्द देने वाले सोमपान के लिए मंगलपूर्वक यहाँ पधारें॥४॥
हे सत्यव्रती अश्विदेवो ! पंचजनों (सभी) का हित करने के लिए ऊपर-नीचे, आगे-पीछे, चारों तरफ से धन लेकर आएँ। आप सदैव कल्याणकारी साधनों से हमारी रक्षा करें॥५॥

सूक्त-७४

हे सम्पूर्ण प्राणियों के आश्रय-स्थल अश्विन देवो ! प्रकाश की कामना करने वाले प्रजाजन आपका आवाहन करते हैं । सम्पूर्ण मानवों के निकट जाने वाले तथा पराक्रम से धनार्जन करने वाले अपने संरक्षण के निमित्त आपका आवाहन करते हैं॥१॥
हे नेतृत्व प्रदान करने वाले अश्विनीकुमारो ! आप दिव्य आहार देने वाले हैं। स्तुति करने वालों के प्रेरक हे देव ! आप रथ रोककर मनोयोगपूर्वक यहाँ मधुर रस का पान करें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमारे यज्ञ में आएँ और शोभा बढ़ाएँ । यहाँ आकर मधुर रसों का पान करें। हे वषर्णशील देवो और धन के स्वामियो ! आप हमें दुग्धादि पेयों से अभिपूरित करते हुए आगमन करें । हमें पीड़ित न करें॥३॥
हे नेतृत्व क्षमता-सम्पन्न अश्विदेवो ! आपको धारण करके अश्व हव्यदाता के घर तक पहुँचाते हैं । आप शीघ्रगामी घोड़ों से यहाँ पधारें॥४॥
हे सत्यव्रती अश्विदेवो ! स्तोतागण (आप से) अन्नादि प्राप्त करते हैं। आप हमें अविचल यश और उत्तम घर प्राप्त कराएँ । हम आपकी कृपा से मघवान् (धन-सम्पन्न) हैं॥५॥
जो प्रजा का पालक और अहिंसक होकर रथ की तरह (गतिशील होकर) आपके पास आते हैं, वे नेतृत्व कर्ता अपनी शक्ति से आगे बढ़ते और रहने के अच्छे स्थान प्राप्त करते हैं॥६॥

सूक्त-७५

देवी उषा अंतरिक्ष से प्रादर्भूत होकर, प्रकाश मलाती हुई, तेज से अपनी महत्ता प्रकट करती हुई आ रही हैं । उनने शत्रुओं और अन्धकार को दूर कर गंतव्य पथ को प्रकाशित किया हैं॥१॥
हे उषा देवि ! आज आप हमारे सुख-संवर्धन के लिए चैतन्य होकर सौभाग्य प्रदान करें तथा हमारे लिए विशेष यश युक्त धन धारण करें। मनुष्यों का हिन करने वाली देवी उषा अन्न सहित पुत्र प्रदान करे॥२॥
देवा उघा की ये किरणें, दर्शनीय, विचित्र और अविनाशी हैं। ये दिव्य व्रतों (क) का उत्पादन कर, समस्त अंतरिक्ष को पूर्ण करके, सब तरफ फैल जाती हैं॥३॥
ये नहीं द्युलोक की पुत्री उषा हैं, शो पंच मानवों (सभी वर्गों ) को उद्योग (कर्म) में लगाती हुई, उनके पास पहुँचकर भुवनों का पालन करती हैं॥४॥
सूर्यगृहिणी उषा अन्नवती विचित्र धन और वैभवों को स्वामिनी हैं । ऋषियों द्वारा स्तुत्य, (रात्रि एवं अंधकार को) जर्जरित करने वाली, धन देने वाली देवी उपा स्नोता द्वारा प्रशंसित होकर सबेरा (उष: काल प्रकट) करती हैं॥५॥
दीप्तिमती उषा को ले जाने वाले विलक्षण, सुशोभित अश्व दिखाई पड़ रहे हैं । शुभ्रवर्णा उषा सुन्दर रथ से सर्वत्र गमन करती हैं तथा कर्मठ लोगों को ऐश्वर्य प्रदान करती हैं॥६॥
सत्यस्वरूपा, पूज्या देवी उषा सत्यपालक महान देवों के साथ घने अन्धकार को समाप्त करती हैं तथा गौओं को प्रकाश देती हैं, इसलिए गौएँ उषा को चाहती हैं॥७॥
हे उषादेवि ! हम सबके लिए गौ, अश्व और वीर पुत्र से युक्त धन प्रदान करे । मनुष्यों के समाज में हमारा यज्ञ निन्दित न हो। हमें सदा कल्याणकारी साधनों से सुरक्षित रखें॥८॥

सूक्त-७६

विश्व नेता (मार्गदर्शन करने वाले) सविता देवता ने अमृत सदृश सर्वहितैषी ज्योति (प्रकाश) को धारण किया हैं। देव- नेत्र स्वरूप सूर्य देवकार्य के लिए प्रकट हुए हैं। देवी उषा सभी भुवनों को प्रकाश से भर देती हैं॥१॥
हमने संस्कारित किये हुए स्थिर तेज और बिना कष्ट वाले देवों के आने-जाने के मार्ग को देख लिया है। उषा का केतु (तेज रूपी ध्वज) पूर्व दिशा में फहरने लगा है एवं उषा हमारे सामने ऊर्ध्वलोक से आती हैं॥२॥
हे उषादेवि ! सूर्योदय से पहले ही आपका तेज प्रकाशित होता है, क्योंकि आप पतिव्रता स्त्री की तरह सूर्यदेव की सेवा करती हैं, कुलटा की तरह नहीं॥३॥
प्राचीन काल के अंगिरागण सत्यव्रती, कवि, मन्त्रों को सिद्ध करने वाले और पालक थे । उन्होंने गुप्त तेज़ प्राप्त किया था एवं देवताओं के साथ सोमरस ग्रहण किया था। उन्होंने ही मंत्रों के बल से उषा को प्रादुर्भूत किया॥४॥
वे ऋषि गौ, यज्ञ आदि कार्यों के लिए संगठित होकर, एक विचार वाले हुए हैं। वे सदैव देवों की मर्यादा का पालन करते हुए आपस में हिंसा और कलह कभी भी नहीं करते, इसीलिए वे धन-ऐश्वर्य के स्वामी हुए॥५॥
हे सुभगा उषादेवि ! उष:काल में जाग कर वसिष्ठगण स्तोत्रों से आपकी प्रार्थना करते हैं। आप गौओं को प्राप्त करने वाली और अन्नों की सुरक्षा करने वाली हैं । सुजाता उषा, सबको प्रकाश देने के कारण देवों में प्रशंसित हैं॥६॥
अंधकार को मिटाने वाली एवं वसिष्ठों द्वारा प्रशंसित होने वाली ये देवी उषा स्तुतियों की प्रेरक हैं । ऐसी हे उषादेवि ! आप हमें प्रसिद्ध, श्रेष्ठ धन प्रदान करके हमारा पालन एवं कल्याण करें॥७॥

सूक्त-७७

उषादेवी तरुण पत्नी की तरह सूर्यदेव रूपी पति के प्रकट होने के पहले ही जगत् के जीवों में कर्म करने की प्रेरणा भरने की शक्ति सूर्यदेव से ही पाती हैं। ऐसे समय में मनुष्य अग्निदेव को प्रदीप्त (प्रसन्न करें । अग्निदेव प्रसन्न होकर तम को नष्ट करने वाली ज्योति प्रकट करते हैं॥१॥
सर्व प्रसिद्ध देवी उषा जगत् के सम्मुख उदित होकर, तेजपूरित श्वेत वस्त्रों को धारण करके बढ़ रही हैं। स्वर्ण के रंग के तेज वाली, सुन्दर किरणों की माता एवं दिन की नेतृत्वकर्जी देवी उषा अत्यधिक सुशोभित हो रही हैं॥२॥
देवताओं की नेत्र-ज्योति को धारण करने वाली, सौभाग्यशालिनी, विलक्षण धनवाली, सुन्दर श्वेत वर्ण-किरणों द्वारा बढ़ती हुई (देवी उषा) विश्व में और अधिक प्रभापूर्ण हो रही हैं॥३॥
हे उषादेवि ! आप प्रकाशित होकर, हमसे द्वेष करने वाले शत्रुओं को दूर करें । आप हमारी गो (इन्द्रियों) के उपयोग के क्षेत्र को भयरहित बनाएँ । हे धन-सम्पन्न उषादेवि ! आप धन लाकर स्तोताओं को प्रदान करें॥४॥
हे उषादेवि ! आप हमारे लिए हितकारी सूर्य-रश्मियों सहित प्रकाशित होकर, हमारी आयु को बढ़ाएँ । हम सबको गौ, अश्व एवं रथों सहित पर्याप्त धन प्रदान करें॥५॥
हे उषादेवि ! आप द्युलोक की कुलीन पुत्री हैं। आपकी, वसिष्ठ ऋषिगण स्तुति करते हैं। आप हमें उपयोगी और महत्वपूर्ण धन प्रदान करें। आप हमारा पालन करें, कल्याण करें॥६॥

सूक्त-७८

इन (देवी उषा) के प्रथम केतु (किरण पुंज) दिख रहे हैं। उनकी वे गतिशील (किरणें ) ऊँचे भागों का आश्रय लेती हैं। हे उषादेवि ! आप हमारे लिए तेजोयुक्त रथ पर धन लेकर पधारें॥१॥
(उषाकाल में) सर्वत्र अग्निदेव समिधाओं द्वारा प्रदीप्त होते हैं। ज्ञानी जन स्तोत्रों से स्तुति करते हुए देवत्व (की ओर) प्रगति करते हैं। देवी उषा सब अन्धकारों एवं पापों को क्षीण करती हुई जाती हैं॥२॥
आभामयी एवं तेजोमयी इन समस्त उषाओं का प्रथम दर्शन पूर्व में ही होता हैं । उषा काल में ही सूर्यदेव, अग्निदेव एवं यज्ञदेव प्रकट होते हैं। इनके तेज से निम्नगामी (गहरे स्थानों में परिव्याप्त) एवं अप्रिय अन्धकार नष्ट होता है॥३॥
हे धनवती उषादेवि ! आप द्युलोक की पुत्री के रूप में प्रसिद्ध हैं । अन्न से भरपूर रथ पर आरूढ़ देवी उषा को समस्त लोग देखते हैं। नियोजित-सुशिक्षित घोड़े उस रथ को ले जाते हैं॥४॥
हे उषादेवि ! धनी एवं बुद्धिमान् जन तथा हम सब आपको जानते हैं । हे उषादेवि ! आप प्रकाशित होकर जगत् को स्नेहयुक्त करें । आप कल्याणकारी साधनों से सदैव हमारी रक्षा करें॥५॥

सूक्त-७९

मानवों की हितैषी देवी उषा अन्धकार को नष्ट करती हुई पाँचों जनों को, सूर्याश्रित, उत्तम, तेजस्वी रश्मियों द्वारा जगाती हैं । सूर्य देव भी अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को भर देते हैं॥१॥
उषा देवियाँ अपने तेज को अन्तरिक्ष में फैलाती हैं एवं प्रजाओं की तरह परस्पर मिलकर, अन्धकार को विनष्ट करने का यत्न करती हैं। सूर्यदेव की भाँति ही वे (देवी उषा) ज्योतित बाहुओं (किरणों) को फैलाती हैं॥२॥
धन-ऐश्वर्य-सम्पन्न श्रेष्ठ स्वामिनी देवी उषा प्रकट हुई एवं सबके निमित्त हितकारी अन को उत्पन्न किया। द्युलोक की पुत्री देवी उषा तेजस्विनी होकर श्रेष्ठ कर्म करने वालों के लिए धन प्रदान करती हैं॥३॥
हे उषादेवि ! आपने जो धन पहले भी स्तोताओं को प्रदान किये हैं, प्रसन्न होकर वैसे ही धन हमें भी दें। वृषभ (प्रवृद्ध स्तोत्र) के रव (शब्द) को सुनकर हम सब आपको (आपकी उपस्थिति को) जानते हैं। आपने सुदृढ़ पर्वत के किले का द्वार (जिसमें पणियों द्वारा गौएँ बँधी थी ) खोल दिया हैं॥४॥
हे उषादेवि ! आप स्तोताओं को धन के लिए एवं हमें सत्यभाषण के लिए प्रेरित करती हैं। आप अन्धकार का नाश करती हैं। हमें धन प्रदान करने के लिए आप स्थिरमति हों । कल्याणकारी साधनों द्वारा आप हमारा पालन करें॥५॥

सूक्त-८०

वसिष्ठ गोत्र के ज्ञानी ऋषिगण सर्वप्रथम अपने स्तोत्रों द्वारा स्तुति करके, देवी उषा को जगाते हैं। देवी उषा समान क्षेत्रवाली द्यावा-पृथिवीं और सब प्राणियों को प्रकाश से भर देती हैं॥१॥
ये वहीं देवी उषा हैं, जो तरुण होती हुई अपने तेज से गहन अन्धकार को दूर करती हैं । संकोच न करने वाली नव युवती (पत्नी) की तरह देवी उषा अपने (पति) सूर्य के पहले ही आगमन करती हैं। वे, सूर्य, यज्ञ एवं अग्नि को प्रज्ञापित (सूचित) करती हैं॥२॥
अनेकों घोड़ों और गौओं वाली देवी उषा घृत एवं दुग्ध को सर्वत्र बढ़ाती हैं । हे उषादेवि ! आप हमारा कल्याणकारी साधनों से पालन करें॥३॥

सूक्त-८१

द्युलोक की पुत्री, अन्धकार को नष्ट करने वाली देवी उषा दिखाई दे रही हैं। वे अन्धकार को दूर करके प्रकाश फैलाती हैं, ताकि सब लोग सब कुछ देख सकें॥१॥
सूर्यदेव उदित होने के पूर्व नक्षत्रों को प्रकाशित करते हैं । सूर्यदेव रश्मियों को एक साथ विकीर्ण करते हैं। हे उषादेवि ! आपके एवं सूर्यदेव के प्रकाशित होने पर हमें श्रेष्ठ अन प्राप्त हो॥२॥
धुलोक की पुत्री हे उषादेवि ! हम शीघ्रतापूर्वक कर्म करके आपको जगायेंगे । हे धनवती देवि ! आप यजमान के सुख के लिए बहुत-सा श्रेष्ठ धन प्रदान करती हैं॥३॥
हे उषा देवि ! आप अन्धकार को नष्ट कर, अपना महत्त्व प्रकट करती हैं। रत्नों वाली आप जगत् के दर्शन के लिए प्रकाश करती हैं। जैसे माता, पुत्रों को पोषित करती है, उसी प्रकार आप हमें भी पोषित करें॥४॥
हे उषादेवि ! आप हमें वह धन प्रदान करें, जिससे यश बढ़े । हे स्वर्गलोक की पुत्री उषा देवि ! आप अपने पास के मानवोचित भोग्य अन्नों को हमें प्रदान करें॥५॥
हे उषादेवि ! आप अपने स्तुतिकर्ताओं को यश और अक्षय धन प्रदान करें । हम सबको गौओं के सहित अन्न प्रदान करें । सत्य भाषण एवं यज्ञीय कर्म करने की प्रेरिका हे उषादेवि ! आप शत्रुओं का नाश करें॥६॥

सूक्त-८२

हे इन्द्रदेव और वरुणदेव ! आप दोनों हमारे प्रजाजनों को यज्ञ कर्म करने के लिए विशाल गृह प्रदान करें । महान् यज्ञकर्ताओं को कष्ट देने वाले बलिष्ठ शत्रुओं को हम युद्ध में आपकी कृपा से जीत लें॥१॥
महत्त्वपूर्ण धन के स्वामी हे महान् इन्द्र और वरुणदेव ! आप में से एक स्वराट् तथा दूसरा सम्राट् है । कामनाओं की पूर्ति करने वाले आप दोनों को परमोच्च आकाश में विश्वेदेवों ने तेज और बल प्रदान किया है॥२॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप दोनों ने सर्वप्रेरक सवितादेव को आकाश में गमन के लिए प्रेरित किया । आपने अपनी सामर्थ्य से जल वृष्टि कराई । शक्तिवर्धक सोमपान करके अपने नदियों को जल से पूरित किया एवं हमारे सत्कर्मों को पूर्ण किया॥३॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! ज्ञानीजन घुटने टेक कर एवं योद्धा संग्राम के समय सुरक्षा की आशा से आपको पुकारते हैं । दिव्यलोक एवं पृथ्वीलोक के धन के स्वामी, सरलता से पुकार सुनने वाले आपको हम स्तोतागण सहायता के लिए पुकारते हैं॥४॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आपने जगत् के समस्त प्राणियों का सृजन किया है । लोक कल्याण के लिए सक्रिय वरुणदेव का सहयोग मित्रदेव करते हैं। दूसरे (इन्द्रदेव) मरुद्देवों के साथ तेजस्वी होकर सुशोभित होते हैं॥५॥
इन्द्र और वरुणदेव, महान् सम्पत्ति एवं स्वयं के स्थायी बल को बढ़ाते हुए तेजस्वी होते हैं। इनका यह बल नित्य और असामान्य है । वरुणदेव हिंसक शत्रुओं को भी पार कर जाते हैं एवं दूसरे (इन्द्रदेव) थोड़े साधनों के द्वारा ही अनेकानेक शत्रुओं को बाधित कर देते हैं॥६॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप जिसके यज्ञ में पहुँचते हैं एवं जिसका आप कल्याण करना चाहते हैं, उस मानव को पाप, संताप एवं दुष्टकर्म कष्ट नहीं पहुँचा सकते । वह आपकी कृपा से सुरक्षित रहता हैं॥७॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप हमारे स्तोत्रों को सुनें और यदि प्रसन्न हों, तो हमारे पास आकर हमें दिव्य संरक्षण प्रदान करें। आप दोनों मित्रता, बन्धुत्व एवं सुख के साधन, हमें प्रदान करें॥८॥
अपने बल से शत्रुओं को घसीटने वाले हे इन्द्रदेव और वरुणदेव ! आप संग्राम-भूमि में हमारा नेतृत्व करें। प्राचीन एवं अर्वाचीन दोनों समय के मनुष्य युद्ध में विजय, पुत्र-पौत्रादि एवं सुख प्राप्ति की कामना से आपका आवाहन करते हैं॥९॥
इन्द्रदेव, वरुणदेव, मित्रदेव और अर्यमादेव हमें विशाल तेजस्वी निवास, धन एवं सुख प्रदान करें । यज्ञ को बढ़ाने वाली देवी अदिति का तेज हमारा पालन करे । हम सब सविता देवता की स्तुति करते हैं॥१०॥

सूक्त-८३

हे इन्द्र और वरुणदेव ! जो गौओं को पाने की इच्छा से परशु को धारण करते हों एवं आपकी ओर बन्धुभाव से देखते हों, उन्हें आप उन्नति की ओर ले चलें । आप दास, वृत्र और सुदास के शत्रुओं का संहार करके अपने भक्तों का रक्षण करें॥१॥
जहाँ मनुष्य अपनी-अपनी ध्वज्ञाएँ उठाये युद्ध-संग्राम के निमित्त एकत्रित होते हैं, ऐसे युद्धों से मानवों का अहित ही होता है । हे इन्द्रदेव और वरुणदेव ! आप सुख-शान्ति जैसी स्वर्गीय स्थिति के पक्षधर हम सबको संग्राम में संरक्षण प्रदान करें॥२॥
युद्ध में पृथ्वी के सारे अन्न, सेना द्वारा नष्ट किये जाते हैं और संग्राम के लिए तत्पर सैनिकों का कोलाहल आकाश में गूंजता है । मानवों के शत्रु हमारे सम्मुख आ गये हैं, अत: आवाहन सुनने वाले हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप हमारे पास आये और सुरक्षा प्रदान करें॥३॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आपने अपने आयुधों के द्वारा ‘भेद' (शत्रु ) को मार डाला (विघटन दूर करके संगठित किया) तथा अपने भक्त 'सुदास' राजा की रक्षा की । युद्धकाल में ‘तृत्सुओं' का पौरोहित्य सफल रहा। क्योंकि आपने उनके स्तोत्रों को सुना॥४॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! शत्रुओं के हथियार एवं हिंसक शत्रु हमें अति कष्ट दे रहे हैं । दिव्य एवं पार्थिव दोनों धन के स्वामी हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप संग्राम के समय हमारी रक्षा करें॥५॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! युद्ध के समय दोनों (सुदास और तृत्सु) लोग धन प्राप्ति की कामना से आप दोनों का आवाहन करते हैं । इस युद्ध में दस राजाओं द्वारा पीड़ित ‘सुदास’ की ‘तृत्सुओं सहित आपने रक्षा की॥६॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप दोनों के संरक्षण में रहने वाले ‘सुदास' राजा को यज्ञ विहीन दस राजा मिलकर भी परास्त नहीं कर सके । हविर्दान कर्ताओं के स्तो-पाठ सफल हुए। इनके यज्ञ में सभी देवता उपस्थित थे॥७॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! दस राजाओं ने मिलकर 'सुदास' को चारों ओर से घेर लिया था, तब आपने बल प्रदान करके उनकी सुरक्षा की थी, क्योंकि उस देश में निर्मल जटाधारी, ज्ञानी तृत्सुजन, नमस्कारपूर्वक यज्ञकर्म में सेवा करते हैं॥८॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आपमें से इन्द्रदेव संग्राम में शत्रुओं के संहारक हैं एवं दूसरे वरुणदेव सदैव सत्कर्मों के रक्षक हैं। अभीष्ट कामनाओं की वर्षा करने वाले आप दोनों को हम स्तुति द्वारा आवाहन करते हैं। आप हमें सुखी बनाएँ॥९॥
इन्द्रदेव, वरुणदेव, मित्रदेव एवं अर्यमादेव हमें विशाल निवास, तेजस्वी धन एवं सुख प्रदान करें। यज्ञ को बढ़ाने वाली देवी अदिति का तेज हमारा पालन करे । हम सब सवितादेव की स्तुति करते हैं॥१०॥

सूक्त-८४

हे इन्द्र और वरुणदेव ! हम स्तुति एवं आहुतियों द्वारा इस यज्ञ में आपको बुलाते हैं। हाथों में धारण की गई विविध वि एवं घृत से आपूरित जुहू (पात्र) स्वयं आपकी ओर आती है॥१॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आपका द्युलोकरूपी विशाल राष्ट्र सबको प्रसन्न करता है। आप रज्जुरहित बन्धनों (रोगादि-मोहादि) के द्वारा पापियों को बाँध लें । वरुणदेव हमें सुरक्षित रखते हुए अन्यों (दुष्टों) पर क्रोध करें । इन्द्रदेव हमारे लिए क्षेत्र का विस्तार करें॥२॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप हमारे गृहों के यज्ञों को उत्तम बनाएँ एवं स्तोताओं के स्तोत्रों को प्रशंसित बनाएँ । देवताओं द्वारा प्रेरित धन हमें प्राप्त हो; प्रशंसनीय रक्षण-साधनों से वे हमें संवर्धित करें॥३॥
हे इन्द्र और वरुणदेव ! हम सबके लिए श्रेष्ठ घर, अन्न एवं धन प्रदान करें। जो आदित्य असत्य को नष्ट करते हैं, वे देव ही पराक्रमी जनों को धनवान् बनाते हैं॥४॥
इन्द्र और वरुणदेव तक हमारी स्तुतियाँ पहुँचें, जो पुत्र-पौत्रादि सहित हमारी रक्षा करें । हम श्रेष्ठ रत्न वाले होकर सप्त कर्मरूप यज्ञ करें । आप अपनी कल्याणकारी संरक्षक शक्तियों से हमारा पालन करें॥५॥

सूक्त-८५

हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप दोनों की अराक्षस मनीषा (दैवी विचार-प्रवाह) को हम (वसिष्ठ ऋषि), देवी उषा की भाँति पवित्र करते हैं । तेजस्वी स्तुति एवं सोम की आहुतियों से आप दोनों को प्रसन्न करते हैं, आप संग्राम के समय हमारी रक्षा करें॥१॥
शत्रु पक्ष एवं हमारे पक्ष के वीरों के परस्पर स्पर्धा वाले युद्ध में ध्वजाओं पर भी शस्त्र प्रहार होते हैं । हे इन्द्र और वरुणदेव ! आप दोनों हिंसक आयुधों द्वारा शत्रुओं का नाश करें॥२॥
दिव्य सोम, यज्ञ-गृहों में तेजस्वी होकर इन्द्र और वरुण आदि देवताओं को धारण किए हुए हैं। वरुणदेव प्रजाजनों को पृथक्-पृथक् धारण करते हैं एवं इन्द्रदेव दुर्धर्ष शत्रुओं को भी नाश करते हैं॥३॥
हे अदिति पुत्रो ! आप यज्ञ विधि के परम ज्ञाता हैं । जो नमस्कारपूर्वक आपकी सेवा करते हैं, जो हविष्यान्न से आहुति प्रदान करने के निमित्त आपका आवाहन करते हैं, वे अन्नसहित उत्तम फलों को प्राप्त करते हैं॥४॥
इन्द्र और वरुणदेव तक हमारी स्तुतियाँ पहुँचें । वे हमारी एवं हमारे पुत्र-पौत्रों की रक्षा करें । हम उत्तम रत्नयुक्त होकर सत्कर्मरूप यज्ञ सम्पन्न करें । आप अपनी कल्याणकारी संरक्षक शक्तियों से हमारा पालन करें॥५॥

सूक्त-८६

इन धैर्यवान् वरुणदेव का जन्म महिमायुक्त है। इन्हीं देव ने विस्तृत द्यावा-पृथिवी को स्थिर किया है । ये दोनों समय में (दिन में विशाल सूर्य एवं (रात्रि में) नक्षत्रों को प्रेरित करते हैं। इन्हीं देव ने भूमि को विस्तृत किया है॥१॥
क्या हम अपने इस शरीर के साथ वरुणदेव से बात करेंगे? कब वरुणदेव के साथ रहेंगे? क्या हमारी आहुति वरुणदेव शान्तिपूर्वक स्वीकार करेंगे? हम कब श्रेष्ठ विचारवान् होकर वरुणदेव के दर्शन करेंगे ?॥२॥
हे वरुणदेव ! हमने विभिन्न विद्वानों से पूछा है, सभी ने हमें बताया कि वरुणदेव क्रोधित हैं। " वह बात (क्रोध का कारण) हम आप से ही पूछते हैं॥३॥
हे वरुणदेव ! हमने ऐसा कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण आप हमारे मित्र स्तोता को मारते हैं । हे दुर्धर्ष तेजस्वी वरुणदेव ! आप हमारे द्वारा किया गया वह पाप बतायें, जिसका प्रायश्चित्त करके हम आपको (आपकी कृपा दृष्टि) प्राप्त करें॥४॥
हे वरुणदेव ! आप हमारे स्वकृत एवं वंशानुगत पापों का शमन करें । हे राजन् ! हे वरुणदेव ! चोर प्रायश्चित्त स्वरूप पशुओं को घासादि खिलाकर उन्हें तृप्त करके, चोरी के पाप से उसी तरह मुक्त हो जाते हैं, जैसे बँधा हुआ बछड़ा मुक्त हो जाता है। आप हमें भी इसी तरह पापों से मुक्त करें॥५॥
वह पाप स्वयं के दोष से नहीं होता है, बल्कि मद्यपान, क्रोध, जुआ (चूत-क्रीड़ा) और अज्ञान आदि से उत्पन्न होता है । पाप के क्षेत्र में जो ज्येष्ठ (कुशल) हैं, वे कनिष्ठ (अल्पज्ञ) को पाप में लगाते हैं। ऐसे लोग वृत्ति बिगड़ जाने के कारण स्वप्न में भी पाप में प्रवृत्त रहते हैं (तो जाग्रत् अवस्था का क्या कहना? जाग्रत् अवस्था में तो निरन्तर पाप में ही निरत रहते हैं । )॥६॥
हे कामनाओं की पूर्ति करने वाले, पालक वरुणदेव ! हम निष्पाप होकर आपकी भक्ति करते हैं। आप हम अज्ञानियों को ज्ञान प्रदान करें । हे ज्ञानी वरुणदेव ! आप स्तोताओं को धन की ओर प्रेरित करें॥७॥
हे अन्नवान् वरुणदेव ! हमारा यह स्तोत्र आपके हृदय में स्थान पाये। आप प्रसन्न होकर हमारे क्षेत्र और उपलब्धियों को कल्याणकारी बनाएँ। आप अपने कल्याणकारी रक्षण-साधनों द्वारा सदैव हमारा पालन करें॥८॥

सूक्त-८७

वरुणदेव ने सूर्यदेव के लिए पथ निर्धारित कर दिया है। समुद्र को प्राप्त होने वाली नदियों को जल से भर दिया है । गतिशील (अश्व या प्रवाहित जल) चञ्चला (अश्वा अथवा प्रवहमान नदियों) की ओर जाता है । द्रुतगामी (सूर्य) ने महती रात्रि को दिन से पृथक् कर दिया है॥१॥
हे वरुणदेव ! वायु आपकी आत्मा है । यह वायु जल को चारों और भेजता है । जैसे पशु घासादि (आहार) से अन्नोत्पादक होता है, वैसे ही जगत् का पोषक वायु भी (अन्नोत्पादक) है । हे वरुणदेव ! महान् और विस्तृत द्यावा-पृथिवी के मध्य आपके समस्त स्थान लोकप्रिय हैं॥२॥
वरुणदेव के सभी अनुचरगण प्रशंसनीय गति वाले हैं। वे सुन्दर द्यावा-पृथिवी के रूप में निरीक्षण करते हैं । वे सत्कर्म करने वालों , यज्ञ करने वालों एवं प्रज्ञावान् ऋषियों के स्तोत्रों का निरीक्षण करते तथा इष्ट तक पहुँचाते हैं॥३॥
वरुणदेव ने मुझ मेधावी (शिष्य यो ऋत्विक् ) से कहा “गौ (गाय, किरण, वाणी या पृथ्वी) के त्रि-सप्त (तीन४सात) नाम (भेद) हैं। पास आए (जिज्ञासु) शिष्य को शिक्षण देते हुए उन्होंने गुप्त पद प्रकट कर दिया॥४॥
वरुणदेव के अन्तर्गत (अधिकार क्षेत्र में) द्युलोक के तीन विभाग एवं भूलोक के तीन प्रकार के विभाग हैं। छ: प्रकार के विभाग अर्थात् छ: ऋतुएँ भी हैं। वरुण राजा ने स्वर्ण के समान वर्ण वाले सूर्यदेव को द्युलोक में सबके हितों की रक्षा के लिए दीप्तिमान् बनाया है॥५॥
वरुणदेव ने आकाश के समान ही समुद्र की स्थापना की है। वरुणदेव सोमरस के समान शुभवर्ण, गौर मृग की तरह बलवान हैं। वे अपने अति प्रशंसनीय बल के द्वारा अन्तरिक्ष का निर्माण करने वाले, दुःखों से पार ले जाने वाले एक मात्र राजा हैं॥६॥
जो वरुणदेव पापियों को भी प्रायश्चित्त करने पर, क्षमा करके सुख प्रदान करते हैं, उन्हीं धनवान् वरुणदेव के व्रतों का यथाक्रम संवर्धन करके, निष्पाप होकर हम उनके पास निवास करेंगे। आप (वरुणदेव) सदैव ही कल्याणकारी साधनों से हमारा पालन करें॥७॥

सूक्त-८८

हे वसिष्ठ ! आप कामनाओं की पूर्ति करने वाले वरुणदेव के निमित्त शुद्ध एवं प्रिय स्तुतियाँ करें । वरुणदेव महान्, धनवान्, बलवान् एवं यजन करने योग्य हैं । वरुणदेव की कृपा से सूर्यदेव हमारे लिए प्रकट होते हैं॥१॥
वरुणदेव जब सुन्दर पत्थर से निकले सोमरस का पान प्रचुर मात्रा में कर लेते हैं, तब वे अपने सुन्दर स्वरूप का हमें दर्शन कराते हैं। हम इन वरुणदेव के सुन्दर स्वरूप का दर्शन करके अग्निदेव की ज्वालाओं की स्तुति करते हैं॥२॥
जब हम नौका में वरुणदेव के साथ बैठे, नौका को समुद्र में चलाया एवं सागर में अन्य नौकाओं के साथ विचरण किया, तब हमने हितकारी झूले पर (मानों बैठे हुए) क्रीड़ा का आनन्द लिया॥३॥
मेधावीं वरुणदेव ने अपनी सामथ्र्यों से वसिष्ठ को नौका पर चढ़ाया। दिन और रात्रि का विस्तार करके स्तोता विप्र वसिष्ठ को शुभ दिन में ऋषि (द्रष्टा, श्रेष्ठकर्मा) बनाया॥४॥
हे वरुणदेव ! आपकी और हमारी मित्रता कहाँ हुई थी ? पूर्व समय की हिंसारहित मित्रता का हम निर्वाह करते चले आ रहे हैं। हे अन्नवान् वरुणदेव ! हम आपके विशाल परिमाण वाले और सहस्र द्वार वाले घर में जायेंगे ॥५॥
हे वरुणदेव ! आपके नित्य प्रिय बन्धु होकर भी जिन वसिष्ठ ने पूर्व समय में आपके प्रति अपराध किया था, वे (भी) आपके मित्र हों । हे पूजनीय वरुणदेव ! हम आपके हैं, इसलिए हमें पाप-मुक्त कर उत्तम सुखदायी आवास प्रदान करें॥६॥
हे वरुणदेव ! स्थायी भू-प्रदेश में रहते हुए हम आपकी स्तुति करते हैं। आप हमें बन्धन से छुड़ाएँ । हम अखण्ड सामर्थ्ययुक्त वरुण से रक्षा की कामना करते हैं। आप कल्याणकारी साधनों से हमारी सुरक्षा करें :७॥

सूक्त-८९

हे राजा वरुणदेव ! मुझे सुन्दर घर रहने को मिले, मिट्टी का नहीं । शोभन धन वाले वरुणदेव हमें सुखी बनाएँ॥१॥
हे सुदृढ़ किले में रहने वाले देव ! हम वायु से भरी हुई चमड़े की थैली की तरह चलते हैं, इसलिए हे शोभन धनवाले देव ! हमें सुखी बनाएँ॥२॥
हे धनवान् और पवित्र वरुणदेव ! हमने दीनता और असमर्थता के कारण श्रौत-स्मार्त कर्मों की अवहेलना की हैं, इसलिए हम दु:खी हैं । हे श्रेष्ठ क्षात्र स्वभाव वाले वरुणदेव ! आप हमें आनन्दित करें॥३॥
जल के सागर में रहकर भी हम (आपके भक्त) प्यासे हैं । हे क्षात्र तेज वाले देव ! आप हमें सुखी करें, आनन्दित करे॥४॥
हे वरुणदेव ! हम मनुष्यों द्वारा देव समूह के प्रति, जो अपकार, अज्ञानता के कारण अथवा असावधानी से हो गया है, उन पापों से आप हमें क्षीण न होने दें॥५॥

सूक्त-९०

हे वायुदेव ! आप वीर हैं, इसलिए आपको शुद्ध, मधुरतापूर्ण सोमरस अध्वर्युगण प्रदान करते हैं। आप रथ में अश्वों को नियोजित करें, हमारे पास आएँ और इस अन्न रूप सोमरस का पान करें॥१॥
हे वायो ! ईश्वररूप आपको जो आहुति देता है, शुद्ध सोम पीने वाले आपको जो शुद्ध सोमरस देता है, उसे मनुष्यों में श्रेष्ठ बैनाएँ। वह सर्वत्र ऐश्वर्य प्राप्त करे, कीर्ति प्राप्त करे॥२॥
जिन वायुदेव को द्यावा-पृथिवी ने ऐश्वर्य के लिए उत्पन्न किया, उन देव को प्रकाश स्वरूपिणी स्तुतियाँ धन के लिए धारण करती हैं। वे (वायुदेव) अश्वों द्वारा अपने धनहीन भक्त के पास तेजस्वी धन देने के लिए जाते हैं॥३॥
(उन देवों के लिए) पापरहित उषाएँ प्रकाशित हो गई हैं। उन्होंने देदीप्यमान होकर विशिष्ट ज्योति को प्राप्त किया है । अंगिराओं ने गो-धन प्राप्त किया तथा जल-प्रवाह ने उनका अनुसरण किया॥४॥
हे इन्द्रवायो ! आप ईश्वर हैं। यजमान लोग निष्पाप मन से, अपनी स्तुति के प्रभाव से यज्ञ में (रथ द्वारा) आपको बुलाते हैं। सभी अन्न आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं ॥५॥
हे इन्द्रवायो ! जो सामर्थ्यवान् लोग हमें गौ, अश्व एवं निवासादि ऐश्वर्य के साथ सुखीं करते हैं, वे दातागण हमारे सम्पूर्ण जीवन को अश्व और वीरों के द्वारा शत्रुओं के बीच में विजयी बनाते हैं॥६॥
अश्व के समान हवि वहन करने वाले, बल की इच्छा वाले वसिष्ठगणं उत्तम स्तुतियों के द्वारा हमारे संरक्षण के लिए इन्द्र और वायुदेव को बुलाते हैं। आप सदा कल्याणकारी साधनों द्वारा हमारी रक्षा करें॥७॥

सूक्त-९१

प्राचीनकाल में जो वृद्ध स्तोताजन वायुदेव की प्रिय स्तुति करने के कारण प्रशंसित हुए थे, वे कष्ट-पीड़ित मानवों के कल्याण के लिए, वायुदेव को हवि प्रदान करने के समय, सूर्यदेव के साथ उषा की प्रार्थना करते रहें॥१॥
हे इन्द्रवायो ! आप हमारी रक्षा करने वाले हैं, हमें कष्ट मत देना। आप महीनों और वर्षों तक हमें संरक्षण प्रदान करना । आप हमारी प्रार्थना सुनें और सुखदायक एवं सुविधाजनक धन प्रदान करें॥२॥
उत्तम मेधा वाले, अपने घोड़ों के आश्रयदाता, श्वेतवर्ण वायुदेव प्रचुर अन्न वाले समृद्ध जनों को तुष्ट करते हैं। वे नेतृत्व क्षमता वाले लोग भी समान मन होकर वायुदेव की यज्ञ के द्वारा उपासना करते हैं। उन (वायुदेव) ने सुन्दर प्रजाओं का निर्माण किया॥३॥
हे इन्द्रवायो ! आपके शरीर में जितना वेग एवं बल है, उसके प्रभाव से) जितने नेतृत्व क्षमता-सम्पन्न लोग (ज्ञान-बल से) प्रकाशित होते हैं; (उसी प्रमाण से) सोमपान करने वाले हे देव ! आप हमारे आसन पर बैठे और सोमपान करें॥४॥
हे स्पृहणीय वीर इन्द्रवायो ! आप अपने अश्वों को एक रथ में नियोजित करके हमारे पास आएँ। यह मधुर सोम का मुख्य भाग आपके लिए है। इसे ग्रहण कर, हमें पापमुक्त करें॥५॥
हे इन्द्रवायो ! जो शत संख्यक अश्व आपकी सेवा में हैं एवं जो सबके द्वारा वरण किये गए सहस्र संख्यक अश्व आपकी सेवा करते हैं, श्रेष्ठ धन देने वाले उन्हीं अश्वों के साथ आप हमारे पास आएँ । हे नेतृत्व प्रदान करने वाले (इन्द्र-वायुदेव) ! भर कर रखे हुए इस सोमरस का आप पान करें॥६॥
अश्व के समान हवि वहन करने वाले, बल की इच्छा वाले वसिष्ठगण उत्तम स्तुतियों के द्वारा हमारे संरक्षण के लिए इन्द्र और वायु को बुलाते हैं । (हे इन्द्रवायो !) आप सदा कल्याणकारी साधनों द्वारा हमारी रक्षा करें॥७॥

सूक्त-९२

हे पवित्र सोमपानकर्ता वायुदेव ! आप सबके वरणीय हैं, आपके पास हजार घोड़े हैं, उन्हीं से) आप हमारे पास आएँ । जिस रस का आप प्रथम पान करते हैं, हम आपके लिए प्रसन्नतादायक वह सोमरस पात्र में लाते हैं॥१॥
सोम का रस निकालने वाले श्रेष्ठ कर्मा अध्वर्युओं ने यज्ञ में इन्द्र और वायुदेव के पीने के लिए सोमरस रखा है । हे इन्द्रवायो ! देवत्व प्राप्ति की कामना से इस यज्ञ में कर्म द्वारा आपके लिए अध्वर्युओं ने सोम का अग्न भाग रखा है॥२॥
हे वायो ! आप यज्ञ स्थान में हव्यदाता के सम्मुख यज्ञ के लिए जिन अश्वों से जाते हैं, उसी तरह हमारे पास आएँ और हमें श्रेष्ठ अन्नयुक्त धन दें । वीरपुत्र, गौ, अश्व आदि हर तरह का ऐश्वर्य प्रदान करें॥३॥
जो स्तोता इन्द्र और वायु की उपासना करते हैं, वे देवानुग्रह प्राप्त कर शत्रुविनाशक होते हैं। उनके सहयोग से हम भी शत्रुदमन में समर्थ हों॥४॥
हे वायो ! हमारे इस अहिंसित यज्ञ में आप अपने शत-सहस्र अश्वों के साथ आएँ और सोमरस पीकर प्रमुदित हों। आप कल्याणकारी साधनों से हमारी रक्षा करें॥५॥

सूक्त-९३

हे वृत्रहन्ता इन्द्र और अग्निदेव ! आज आप अपना शुद्ध और नवीन स्तोत्र सुनें । श्रेष्ठ, प्रशंसा-योग्य आप देवों को हम यज्ञ में बार-बार बुलाते हैं । उन्नति की इच्छा करने वाले यजमान के लिए आप अन्न एवं बल-सामर्थ्य प्रदान करें॥१॥
हे इन्द्र और अग्निदेव ! आप दोनों बलशाली और यजन करने योग्य हैं। आप एक साथ प्रवृद्ध होकर शत्रुनाशक और प्रभावी बनें। आप अन्नाधिपति हैं, इसलिए हमें बहुत - सा अन्न एवं शत्रु - भंजक बल प्रदान करें॥२॥
श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्ति की इच्छावाले, अन्नवान् (आहुतियुक्त) विप्रगण जब यज्ञ के निमित्त जाते हैं, तो वे नेतृत्व क्षमता-सम्पन्न लोग काष्ठों (समिधाओं अथवा युद्धक्षेत्र) में प्रविष्ट चंचल (ज्वालाओं अथवा अश्वों की भाँति) इन्द्राग्नी का आवाहन करते हैं॥३॥
हे इन्द्र और अग्निदेव ! उत्तम बुद्धि की इच्छा वाले ज्ञानी पुरुष प्रथम उपभोग्य धन के लिए आपसे प्रार्थना करते हैं। शोभायमान आयुध वाले वृत्रहन्ता इन्द्र और अग्निदेव नवीन और देने योग्य धन हमें प्रदान करें॥४॥
परस्पर युद्ध में स्पर्धा करने वाली विशाल शत्रु सेनाओं के मध्य में वीर अपने तेज द्वारा यश के लिए युद्ध करते हैं। यज्ञ करने वाले और देवाभिलाषी स्तोता की सहायता से देव विरोधी व्यक्तियों को नष्ट करें॥५॥
हे इन्द्र और अग्निदेव ! मन के उत्तम भाव बढ़ाने के लिए इस सोम याग में पधारें । आप हमारे त्याग की बात सोचते भी नहीं, इसलिए बार-बार अन्न के लिए आपका आवाहन करते हैं॥६॥
हे अग्निदेव ! हविद्वारा प्रवृद्ध होकर इन्द्र, मित्र और वरुणदेव से हमारे अपराधों के क्षमा करने के लिए कहें । अर्यमा और अदिति से कहें कि हमें पापों से मुक्तकर सुखी करें॥७॥
हे अग्ने ! हम शीघ्र ही इन यज्ञों का आश्रय लेते हुए आपके द्वारा साथ-साथ अन्न-धन प्राप्त करें। विष्णु, इन्द्र और मरुद्गण हमें सुरक्षा प्रदान करें तथा कल्याणकारी साधनों से हमारी सुरक्षा करें॥८॥

सूक्त-९४

है इन्द्राग्ने ! जैसे मेघ जलवृष्टि करते हैं, उसी तरह इस मनन करने वाले स्तोता की यह प्रथम स्तुति सुनें॥१॥
हे इन्द्र और अग्निदेव ! उपासक की प्रार्थना सुने तथा उसकी वाणी को ध्यान में रखें। आप ईश्वर हैं, इसलिए अनुष्ठान किये हुए कार्य को सफल करें॥२॥
हे नेतृत्व क्षमता वाले इन्द्र और अग्निदेव ! पापकर्म के लिए, अभिशप्त होने के लिए अथवा निन्दा के लिए कभी पराधीन मत करना ॥३॥
हम अपनी सुरक्षा के लिए इन्द्र और अग्निदेव के पास प्रचुर हव्य तथा बुद्धिपूर्वक उत्तम वचनों से सुन्दर स्तुति-गान करते हैं॥४॥
रक्षण के इच्छुक उन इन्द्र और अग्निदेव की विद्वान् पुरुष प्रार्थना करते हैं। समान रूप से पीड़ित जन, धन-धान्य प्राप्ति के लिए उनकी प्रशंसा करते हैं॥५॥
विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न, प्रयासरत, धनाभिलाषी होकर हम लोग यज्ञ में आप दोनों की प्रार्थना करते हुए आपका आवाहन करते हैं॥६॥
हे शत्रु सैन्य-घातक इन्द्र और अग्निदेव ! आप अन्नादि संरक्षण के साधनों के साथ हमारे यहाँ आएँ । हम दुष्टों द्वारा शासित न हों॥७॥
हे इन्द्राग्निदेव ! हम शत्रुरूप मानव से पीड़ित न हों। हमें सुख मिले, हम सुखी हों॥८॥
हे इन्द्र और अग्निदेव ! हम आपसे जो गौ, अश्व, स्वर्णयुक्त धन माँगते हैं, उसे हम प्राप्त कर सकें॥९॥
सोमाभिषव होने पर याजक उत्तम अश्चों वाले इन्द्र और अग्निदेव की सेवा की कामना से बार-बार उनका आवाहन करते हैं॥१०॥
वृत्रासुर का हनन करने वाले, आनन्ददायी स्वभाव वाले इन्द्र और अग्निदेव की उत्तम स्तोत्रों द्वारा सम्यक् रूप से हम वन्दना करते हैं॥११॥
वे दोनों (इन्द्र और अग्नि) दुष्टों, दुर्गुणी विद्वानों, राक्षसी स्वभाव वाले अपहरणकर्ताओं को घातक शस्त्रों से मारें, उन्हें जल रोक कर रखने वालों (वृत्रादि) की तरह मारें॥१२॥

सूक्त-९५

यह सरस्वती लोहे के परकोटे की तरह (रक्षा करती हुई) रक्षा करने वाली होकर जल (पोषक-प्रवाहों ) के साथ बह रही है। यह (सरस्वती) रथ-वाहक सारथी की तरह अन्य (जल प्रवाहों, शब्द प्रवाहों ) को बाधित करती हुई गतिशील है॥१॥
पवित्र चेतनायुक्त प्रवाहों में एक यह सरस्वती गिरि (पर्वतों अथवा वाक् स्रोतों) से समुद्र (सागर या अन्तरिक्ष) तक जाती हैं । (यह इस लोक के बहुत श्रेष्ठ ऐश्वर्यों को सचेष्ट करती हुई नहुष (राजा नहुष की प्रजा अथवा सम्बन्ध बनाने वाले व्यक्तियों) को दुग्ध-घृत (पोषक शक्ति वर्धक तत्त्व) देती रही है॥२॥
मनुष्यों के हितार्थ वर्षण सामर्थ्ययुक्त यह बलवान् शिशु (सरस्वान्) यज्ञीय योषित् (सहधर्मिणी जल या छंद धाराओ) के मध्य वृद्धि प्राप्त करता है । यह यज्ञ कर्ताओं को वाजिन्-बलवान् (पुत्र अथवा उत्पाद) प्रदान करता है । सभी के लाभार्थ शरीर का विशेष शोधन भी करता है॥३॥
ये सौभाग्य प्रदायिनी सरस्वती इस यज्ञ में हमारी स्तुति सुनकर प्रसन्न हों । घुटने टेककर नमनकर्ता (देव या साधक) इनके पास जाते हैं। ये सरस्वती श्रेष्ठ धन वाली हैं और मित्रता की भावना वालों के लिए दयालु हैं॥४॥
हे सरस्वती देवि ! हम हव्य द्वारा यजन करके नमनपूर्वक आपसे अधिक धन-अन्न प्राप्त करते हैं। आप हमारी प्रार्थना सुनें । हम आपके अत्यन्त प्रिय आवास में आश्रयभूत वृक्ष की तरह (विकासमान तथा परोपकारी बनकर) रहें॥५॥
उत्तम भाग्यशाली हे सरस्वती देवि ! स्तोता वसिष्ठ ऋषि यज्ञ का द्वार आपके लिए खोलते हैं। हे शुभवर्णा देवि ! आप आगे बढ़ें और स्तोता को धन प्रदान करें। आप कल्याणकारी साधनों से हमारी सुरक्षा करें॥६॥

सूक्त-९६

हे वसिष्ठ ! आप प्रवाहों में शक्तिशाली सरस्वती के लिए महान् स्तोत्रों का गान करें । द्युलोक एवं पृथ्वी में निवास करने वाली सरस्वती की श्रेष्ठ स्तोत्रों से वन्दना करें॥१॥
हे शुभवर्णा सरस्वती देवि ! आपकी कृपा से मनुष्य दिव्य एवं पार्थिव दोनों प्रकार के अन्न प्राप्त करता हैं। आप हमारी रक्षा करें । मरुतों से मैत्री करने वाली नदी, हविदाताओं को धन से परिपूर्ण करें॥२॥
हितकारिणी सरस्वती निश्चितरूप से कल्याण करने वाली हैं। सुन्दर प्रवहमान और अन्न देने वाली सरस्वती देवी हमें चैतन्य बनाएँ। आप जिस प्रकार जमदग्नि ऋषि द्वारा पूजित हुई हैं, उसी तरह आप वसिष्ठ से भी स्तुत्य हैं॥३॥
स्त्री और पुत्र की प्राप्ति की इच्छा वाले हम लोग श्रेष्ठ दान दाताओं में अग्रसर होकर सरस्वान् का आवाहन करते हैं॥४॥
हे सरस्वान् ! आप मधुर एवं घृत सदृश तरंगों के द्वारा हमारी रक्षा करें॥५॥
विश्वदर्शी सरस्वान् देव के स्तनवत् रस धार का हम पान करें और श्रेष्ठ संतति एवं धन-धान्य प्राप्त करें॥६॥

सूक्त-९७

देवत्व की कामना वाले, नेतृत्व क्षमता से युक्त लोग जहाँ आनन्दित होते हैं, जिस यज्ञ में सोमरस इन्द्रदेव के लिए अभिषुत करते हैं; मानव मात्र का कल्याण करने वाले उस यज्ञ में सर्वप्रथम इन्द्रदेव शीघ्रगामी अश्वों के साथ अन्तरिक्ष से पधारें॥१॥
हे मित्रो ! हम देवों से संरक्षण के लिए स्तुति करते हैं । बृहस्पतिदेव हमारे हव्य को स्वीकारें । बृहस्पतिदेव हमें उसी प्रकार धन देते हैं, जैसे दूर देश से पिता धन लाकर पुत्र को देता है, इसलिए उन (बृहस्पतिदेव) के समक्ष निष्पाप होकर श्रेष्ठ आचरणपूर्वक जाएँ॥२॥
हम हव्य के साथ नमन करते हुए श्रेष्ठ एवं सेवनीय ब्रह्मणस्पतिदेव की प्रार्थना करते हैं। यह दिव्य मन्त्र महान् इन्द्रदेव की स्तुति करे । यह देवकृत स्तोत्र, स्तोत्रों का राजा है॥३॥
सबके वरण करने योग्य बृहस्पतिदेव ! इस यज्ञ में पधारें । हमारे श्रेष्ठ धन और शक्ति की इच्छा को पूर्ण करें । हमें बाधाओं से मुक्त करें, हमारे शत्रुओं को विनष्ट करें॥४॥
गृहस्थों के पूज्य, परम पवित्र, सदैव अग्रगामी बृहस्पतिदेव की हम प्रार्थना करते हैं । पूर्वकाल में उत्पन्न हुए अमर देवगण हमें अमरता प्राप्त करने योग्य अन्न प्रदान करें॥५॥
सुखकर, देदीप्यमान, साथ लेकर चलने वाले, सूर्य की तरह तेजस्वी घोड़े उन्हीं (बृहस्पतिदेव) को वहन करें, जिनका बल अनन्त तथा निवास उत्तम है॥६॥
वे बृहस्पतिदेव पवित्र, बहुत वाहन वाले, सभी को शुद्धता प्रदान करने वाले तथा स्वर्ण सदृश आयुधों वाले हैं । उनका आवास उत्तम और दर्शनीय है । वे अपने भक्तों को सर्वाधिक अन्न प्रदान करते हैं॥७॥
बृहस्पतिदेव की जननी देवी (दानादिगुणयुक्त) द्यावा-पृथिवी अपनी सामर्थ्य से उन्हें संवर्धित करती हैं । हे मित्रो ! कुशल बृहस्पतिदेव को कुशलता के साथ प्रवर्द्धित करें। वे ब्रह्मवृत्तियों के विकास के लिए ‘सुतरा' (जल अथवा तर जाने योग्य) श्रेष्ठ जीवन को ‘सुगाधा' (स्मान योग्य अथवा श्रेष्ठ गान-वेदवाणी) को उत्पन्न करते हैं॥८॥
हे ब्रह्मणस्पतिदेव ! हमने आपके लिए और वज्रधारी इन्द्रदेव के लिए यह स्तोत्र-पाठ किया है । आप हमारे बौद्धिक (बुद्धिवर्धक) अनुष्ठानों को संरक्षण दें, अनेक प्रार्थनाओं को सुनें और अपने भक्तों पर आक्रमण करने वाली सेनाओं का संहार करें॥९॥
हे बृहस्पति और इन्द्रदेव ! आप दोनों पृथ्वी और द्युलोक के ऐश्वर्य के स्वामी हैं, इसलिए स्तोताओं को ऐश्वर्य प्रदान करें तथा कल्याणकारी साधनों से हमारी सुरक्षा करें॥१०॥

सूक्त-९८

हे अध्वर्युगण ! मानवों में श्रेष्ठ इन्द्रदेव के लिए निचोड़े हुए रक्ताभ सोमरस का हवन करें । दूर स्थित, पीने योग्य सोम को दूर से जानकर वे गौर मृग सदृश तीव्रगति से सोमयाग करने वाले यजमान के पास सतत जाते हैं॥१॥
हे इन्द्रदेव ! प्राचीनकाल में आप जिस सुन्दर अन्न (सोम) को उदर में धारण करते थे, वहीं सोम आप प्रतिदिन पीने की इच्छा करें। हृदय और मन से हमारे कल्याण की इच्छा करते हुए सोमरस को पान करें॥२॥
है इन्द्रदेव ! जन्म के समय से ही आपने शक्ति प्राप्ति के लिए सोमपान किया था। आपकी महिमा का वर्णन आपकी माता अदिति ने किया। आपने अपने वर्चस् से विस्तृत अंतरिक्ष को पूर्ण किया और युद्ध के माध्यम से देवों या स्तोताओं के लिए धन एकत्र किया॥३॥
हे इन्द्रदेव ! अहंकारपूर्ण, अपने को बड़ा मानने वाले शत्रुओं से जब हमारा युद्ध हो, तब उस युद्ध में हम अपनी बाहुओं से ही हिंसक शत्रुओं का दमन कर सकें। आप यदि स्वयं अन्न अथवा यश के लिए युद्ध करें, तब हम आपके साथ रहकर उस युद्ध को जीतें॥४॥
प्राचीन और अर्वाचीन काल में इन्द्रदेव द्वारा किये हुए पराक्रमों का हम वर्णन करते हैं। इन्द्रदेव ने जब से कुटिल-कपटी असुरों को परास्त किया, तब से सोम केवल इन्द्रदेव के लिए ही (सुरक्षित) है॥५॥
हे इन्द्रदेव ! सूर्य के तेज (प्रकाश) से जिसे देखते हैं, वह पशुओं (प्राणियों) से युक्त विश्व आपका ही है। सभी गौओं (किरणों-इन्द्रियों) के स्वामी आप ही हैं। आप के द्वारा दिये धन का हम भोग करते हैं॥६॥
हे इन्द्र और बृहस्पतिदेव ! आप दोनों द्युलोक और पृथ्वी पर उत्पन्न धन के स्वामी हैं। आप दोनों स्तुति करने वाले स्तोता को धन प्रदान करें तथा कल्याणकारी साधनों से सदैव हमारी रक्षा करें॥७॥

सूक्त-९९

परी मात्राओं से शरीर को बढ़ाने वाले (तीनों लोकों की सीमा से अधिक अपनी काया बढ़ाने वाले अथवा इस विश्व की पकड़ से परे मात्राओं-पोषक इकाइयों द्वारा शरीरों का विकास करने वाले) हे विष्णुदेव ! आपकी महानता को कोई नहीं समझ सकता । (हम तो) आपके द्युलोक एवं पृथ्वी लोक को ही जानते हैं, आप तो (इनसे) परे (लोकों या तत्त्वों) को भी जानते हैं॥१॥
हे विष्णुदेव ! जो जन्म ले चुके तथा जो जन्म लेने वाले हैं, वे दोनों ही आपकी महिमा का अन्त नहीं जानते । दर्शन के योग्य विराट् द्युलोक को आपने ही अपने ऊपर धार किया है। पृथ्वी की पूर्व दिशा को भी आपने ही धारण कर रखा है॥२॥
हे द्यावा-पृथिवि मनुष्यों के कल्याण की आकांक्षा से हुए दोनों गौओं तथा अन्नों से परिपूर्ण हुई हैं। हे विष्णुदेव !आपने इन द्युलोक और पृथ्वीलोक को स्थिरता प्रदान की है तथा पर्वतों से पृथ्वी को स्थिर किया हैं॥३॥
सृष्टिरूपी यज्ञ को संचालित करने के लिए द्युलोक और रवालाक ने विस्तृत स्थान विनिर्मित किया । सूर्य, उषा और अग्नि को आप (विष्णु) उत्पन्न करते हैं ! हे नेतृत्व३, व इन्द्र और विष्णदेव ! आपने वृषशिप्र (नाम के शत्रु अथवा वर्षणशील जल को संगृहीत करने वाले की कुटिल और कपटपूर्ण आक्रामक योजनाओं को युद्धों में विनष्ट किया॥४॥
हे इन्द्र और विष्णुदेव ! आपने शंबर असुर की निन्याने पुढे नदियों को विध्वंस किया। आपने 'वार्च नाम के सैकड़ों और हजारों वीरों को असाधारण ढंग से दिन किं॥५॥
यह महती स्तुति महापराक्रमशाली और बलशाली इन्द्र एवं विष्णुदेव के यश को बढ़ाती हैं । हे इन्द्र और विष्णुदेवो ! यज्ञों में हम आपके निमित्त स्तोत्र प्रेषित करते हैं । युद्धों में आप हमारे अन्न की वृद्धि करें॥६॥
हे विष्णुदेव ! हमने स्तुतिगान करते हुए आपके निमित्त यह अन्न समर्पित किया हैं । हे तेजस्वी विष्णो ! आप हमारे द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न को स्वीकार करें ! हमारी श्रेष्ठ स्तुतियाँ-प्रार्थनाएँ आपके यश को संवर्धित करें। आप सभी देवों के साथ मिलकर हमारा संरक्षण करे ॥७॥

सूक्त-१००

जो मनुष्य अनेकों द्वारा शंसनीय विष्णुदेव को हविष्यात्र प्रदान करते हैं, वहीं मनुष्य धन की अभिलाषा होने पर शीघ्रता से उसे लुब्ध करते हैं। जो मनुष्यों के हितैषी विष्णुदेव की अर्चना करते हैं तथा साथ-साथ कहे जाने वाले मंत्री से विचारपूर्वक विष्णुदेव के लिएयज्ञ सम्पादित करते हैं, वे शीघ्र ही ऐश्वर्यशाली बनते हैं॥१॥
मनोरथपूर्ण करने वाले हे देव विष्णो । आए हमें विश्वहितकारी, दोषहीन, सविचारयुक्त बुद्धि प्रदान करें । आप ऐसा करें, जिससे हमें सुख से प्राप्त होने योग्य अश्न की तरह (लक्ष्य तक पहुँचाने वाला) आनन्ददायक, श्रेष्ठ पर्याप्त धन प्राप्त हो॥२॥
इन विष्णुदेव ने सहस्रों तेजों से युक्त इस पृथ्वी को अपनी महिमा से (वामन अवतार के समय) तीन चरणों में नापा अथवा तीन विशिष्ट प्रक्रियाओं से घोषित किया। सबसे विराट् भगवान् विष्णु हमारे सहायक हों। इन विराट् देव का नाम बहुत ही तेजस्वी है॥३॥
मनुष्यों को आवास देने की इच्छा करके, इन विष्णुदेव ने पृथ्वी पर विचक्रमण (पराक्रम) किया था। इन विष्णुदेव के भक्तगण यहाँ स्थिर होकर रहते हैं । श्रेष्ठ जन्म धारण करने वाले विष्णुदेव ने विस्तृत निवास (स्थान) बनाया है॥४॥
हे तेजस्वी विष्फो ! हम आपकी महानता और सब कर्मों को जानकर, आपके उस श्रेष्ठ नाम का कीर्तन करके श्रेष्ठ बनते हैं । हे देव अप महान् हैं, हम छोटे हैं इस कारण आपकी प्रार्थना करते हैं । आप इस लोक से परे हैं ॥५॥
हे विष्णो ! आपने अपना जो शिपिविष्ट (प्रकाशरूप) नाम बताया है, क्या यह त्याग करने योग्य हैं ? समय-समय पर आपने अनेक रूप धारण किये हैं, इसलिए आपका यह दिव्यरूप हमसे दूर न रहे॥६॥
हे विष्णुदेव ! आपके लिए हमने वषट्कार (मंत्रादि) बोलकर अन्न अर्पित किया है । हे तेजस्वी विष्णो ! हमारे द्वारा समर्पित हुविष्य को ग्रहण करें, हमारे द्वारा की हुई स्तुति आपके यश को बढ़ाए। आप सदैव कल्याणकारी साधनों से हमारी सुरक्षा करे॥७॥

सूक्त-१०१

जो वाणियाँ इस मधुर रस के स्रोत को दुहने में समर्थ हैं, ऐसी अग्रभाग में ज्योति धारण करने वाली तीनों वाणियों को उच्चारित करें । वह तुरंत उत्पन्न हुआ बलशाली-वर्षणशील (मेघ) वत्सों का एवं औषधियों के गर्भ का सृजन करता हुआ गर्जन करता है॥१॥
जो देव (पर्जन्य) जगत् के नियन्ता, ओषधियों एवं जल को (उनकी मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों को) बढ़ाने वाले हैं; वे (देव) हमें विधातु ( वात, पित्त, कफ आदि अथवा प्रकृतिगत ठोस, तरल एवं वायु रूपों में जीवन धारण करने योग्य शक्तियों) युक्त आश्रय तथा सुख प्रदान करें। तीनों ऋतुओं में अभीष्ट श्रेष्ठ ज्योति (प्राणशक्ति) हमें दें॥२॥
अपनी इच्छानुसार शरीर धारण करने वाले पर्जन्यदेव का एक रूप प्रसव न करने वाली गौ के समान, दूसरा रूप प्रसूता गौ जैसा (वर्षण करने वाला) होता है । पिता (पर्जन्य) के पय (पोषक दूध या जल) को पृथ्वी माता प्राप्त करती हैं । उसी से पिता (पर्जन्य) तथा पुत्र (जड़-जंगम प्राणी) दोनों बढ़ते (पुष्ट होते हैं॥३॥
सभी भुवन ( समस्त प्राणी) जिनमें निवास करते हैं, सभी लोक जिनमें अवस्थित हैं, जिनसे तीन तरह का जल वर्षण होता है, तीन प्रकार के कोशों द्वारा सिंचन करने वाले, मधुर रसों की सब तरफ से वर्षा करने वाले देवता, पर्जन्य देव ही हैं॥४॥
यह स्तुति स्वप्रकाशित पर्जन्य देव के लिये की जाती है। वे प्रार्थना स्वीकार करें । ये (स्तुतियाँ) उन्हें हृदयोल्लास प्रदान करें । देवों (पर्जन्य) द्वारा सुखदायी वृष्टि हम सबके लिए हो और वृष्टि-जल प्राप्त कर ओषधियाँ सुरक्षित होकर फले-फूलें॥५॥
अनन्त ओषधियों के लिए पर्जन्य देव, वृषभ की तरह (रेतस्) बल, वीर्य धारण करते हैं, इसलिये स्थावर-जंगम जगत् की आत्मा पर्जन्य में निवास करती हैं । पर्जन्य द्वारा प्रदत्त जल सौ वर्षों तक हमारे जीवन का कल्याण करें । हे पर्जन्यदेव ! आप सदा कल्याणकारी साधनों से हमारा पालन करें॥६॥

सूक्त-१०२

हे स्तोताओ ! अन्तरिक्ष के पुत्र और वृष्टि करने वाले पर्जन्य के लिए प्रार्थना करें, वे हमें अन्न, ओषधियाँ तथा वनस्पतियाँ प्रदान करें॥१॥
जो ओषधियों (आरोग्यदायकों) , गौओं (पोषण प्रदायकों) तथा अश्वों (शक्तिमानों) में गर्भ (प्राण) स्थापित करते हैं, वे पर्जन्यदेव ही मानवी स्त्रियों के लिए भी (उपयोगी) हैं॥२॥
उन्हीं पर्जन्यदेव के लिए देवमुख यज्ञ में सुमधुर हविष्यान्न का हवन करें । वे हमें भरपूर अन्न प्रदान करें॥३॥

सूक्त-१०३

वर्ष भर गुप्त स्थिति में बने रहने वाले, व्रतपालक ब्राह्मणों (तपस्वियों) की भाँति रहने वाले मण्डूकगण, पर्जन्य को प्रसन्न (जीवन्त) करने वाली वाणी बोलने लगे हैं॥१॥
सूखे सरोवर में, सूखे चमड़े के समान सुप्त मेढकों के पास जैसे ही अंतरिक्ष का जल पहुँचता है, वैसे ही सवत्सा धेनु की तरह वे कल-कल शब्द करने लगते हैं॥२॥
वर्षाकाल आने पर जब प्यासे मेढ़कों पर पर्जन्य (जल) बरसने लगता है, तब पिता जैसे पुत्र से बात करता हैं, उसी तरह “अक्खल” ऐसा शब्द करके (अथवा विनम्रतापूर्वक) मेढक एक दूसरों के पास जाते हैं॥३॥
पानी बरसने पर जब ये मेढक आनन्दित होकर उछलते हैं, तब चितकबरा मेढ़क हरित रंग के मेढ़क से बातें करने जैसा शब्द बोलता है । उस समय वे एक दूसरे पर अनुग्रह करते हैं॥४॥
जिस प्रकार शिष्य-गुरु के शब्दों का अनुसरण करके बोलता है, उसी तरह एक मेढक दूसरे के शब्द का अनुसरण करता है । हे मण्डूको ! जब पानी पर छलाँग लगाते हुए उत्तम शब्द बोलते हो, उस समय तुम्हारा शरीर पुष्ट हुआ सा दीखता है॥५॥
एक मेढ़क गौ जैसा बोलता है, दूसरा बकरे जैसा बोलता है । एक भूरे रंग का हैं, दूसरा हरित वर्ण का है । इस प्रकार अनेक रूपों वाले "मेढक" एक ही नाम से जाने जाते हैं तथा विभिन्न प्रकार के शब्द अनेक देशों (स्थानों) में करते हुए दिखाई देते हैं॥६॥
हे मण्डूको ! अतिरात्र नामक सोमयज्ञ के याजकों की तरह, शब्द करते हुए इस भरे हुए सरोवर में (जब खूब वर्षा होती हैं) प्रसन्नतापूर्वक विचरण करो । चारों ओर तुम्हारे घूमने के लिए पर्याप्त स्थान है॥७॥
वर्ष पर्यन्त चलने वाले सोमयुक्त यज्ञ में जैसे स्तोता मंत्र-ध्वनि करते हैं, वैसे ही शब्द मेढक भी करते हैं। जैसे याज्ञिक अध्वर्यु गुप्त स्थान में रहकर पसीने में भीगे रहते हैं, बाहर नहीं निकलते, उसी तरह मेढक भी (वर्षा आने तक) बिल से बाहर नहीं निकलते॥८॥
ये मण्डूक (साधना में डूबे रहने वाले) नेतृत्व-क्षमतः सम्पन्न लोगों की तरह ईश्वरीय अनुशासन का संरक्षण करते हैं। ये बारह महीने की तुओं का उल्लंघन नहीं करते। वर्षाकाल आने पर वर्षभर तपे हुए मेढ़क अपने बिलों से बाहर आ जाते हैं॥९॥
गौ और बकरे के समान ध्वनि करने वाले मेढ़क हमें धन दें । हरे और चितकबरे रंग वाले मेढ़क हमें धन दें । हजारों ओषधियों की वृद्धि करने वाले, वर्षा ऋतु में सैकड़ों गौएँ (पोषक-प्रवाह देने वाले ये मण्डूक (तपस्वीं) हमारी आयु को बढ़ाते हैं॥१०॥

सूक्त-१०४

है इन्द्र और सोमदेव ! आप राक्षसों को जलाकर मारें । हे अभीष्टवर्धक ! आप अज्ञानरूपी अंधकार में विकसित हुए राक्षसों का विनाश करें । ज्ञानहीन राक्षसों को तप्त करके मारकर फेंक दें, हमसे दूर कर दें । दूसरों का भक्षण करने वालों को जर्जरित करें॥१॥
हे इन्द्र और सोमदेव ! आप महापापी, प्रसिद्ध दुष्टों को नष्ट करें। (वे) आपके तेज से आग में डाले गये चरु के समान, तापित होकर विनष्ट हो जाएँ । ज्ञान से द्वेष रखने वाले, कच्चा मांस भक्षण करनेवाले, भयानक रूपधारी, सर्वभक्षी (दुष्टों ) के लिए निरन्तर द्वेष (वैर) भाव रखें॥२॥
हे इन्द्र और सोमदेव ! दुष्कर्मा राक्षसों को गहन अंधकार में दबा दें, जिससे वे पुनः निकल न सके । आप दोनों का शत्रु-भंजक बल, शत्रुओं को जीतने में समर्थ हो॥३॥
हे इन्द्र और सोमदेव ! आप अन्तरिक्ष से मारक हथियार उत्पन्न करें । राक्षसों के विनाश के लिए पृथ्वी से आयुध प्रकट करें । मेघ से राक्षसों का विध्वंसक, वज्र उत्पन्न करके बढ़ने वाले राक्षसों को मारें॥४॥
हे इन्द्र और सोमदेव ! आप अन्तरिक्ष से चारों ओर आयुध फेंकें। आप दोनों अग्नि की तरह तप्त करने वाले, पत्थरों जैसे मारक, तापक प्रहार वाले, अजर आयुधों से लूट-लूटकर खाने वाले राक्षसों को फाड़ डालें, जिससे वे चुप-चाप पलायन कर जाएँ॥५॥
हे इन्द्र और सोमदेव ! रस्सी जिस प्रकार से बगल में होकर घोड़े को चारों तरफ से बाँधती है, उसी तरह यह स्तुति आपको परिव्याप्त करे । आप बली हैं, अपनी मेधा शक्ति के बल से यह प्रार्थना हम आपके पास प्रेषित करते हैं। राजाओं की भाँति आप इन स्तुतियों को फलीभूत करें॥६॥
हे इन्द्र और सोमदेव ! आप शीघ्रगामी अश्वों के द्वारा शत्रुओं पर आक्रमण करें । द्रोह करने वाले, विनाशकारी राक्षसों का विनाश करें । दुष्कर्मी को (अपने कुकृत्य करने की) सुगमता न मिले । द्रोह करने वाला किसी भी समय हमें विनष्ट कर सकता है॥७॥
पवित्र मन से रहकर आचरण करने वाले मुझको, जो राक्षस असत्य वचनों द्वारा दोषी सिद्ध करता हैं, हे इन्द्रदेव ! वह असत्यभाषी (राक्षस) मुट्ठी में बँधे हुए जल के सदृश पूर्णरूपेण नष्ट हो जाए॥८॥
जो मुझ (वसिष्ठ) विशुद्ध मन से रहने वाले को, अपने स्वार्थ के लिए कष्ट देते हैं या अपने धन-साधनों से मुझ जैसे कल्याणवृत्ति वाले को दोषपूर्ण बनाते हैं, हे सोम ! आप उन्हें सर्प (विषैले जीव) के ऊपर फेंक दें अथवा दरिद्र बना दें॥९॥
हे अग्निदेव ! जो हमारे अन्न के सार तत्त्व को नष्ट करने की इच्छा करता हैं, जो गौओं, अओं और सन्ततियों का विनाश करता है; वह चोर, समाज का शत्रु विनष्ट हो । वह अपने शरीर और संततियों के सा, समाप्त हो जाए॥१०॥
वह दुष्ट-पातकी शरीर और संतानों के साथ विनष्ट हो । पृथ्वी आदि तीनों लोकों से उसका पतन हो जाए। हे देवो ! उसकी कीर्ति शुष्क होकर विनष्ट हो जाए। जो दुष्ट राक्षस हमें दिन-रात सताता है, उसका विनाश हो जाए॥११॥
विद्वान् मनुष्य यह जानता है कि सत्य और असत्य वचन परस्पर स्पर्धा करते हैं। उसमें जो सत्य और सरल होता है, सोमदेव उसकी सुरक्षा करते हैं तथा जो असत् होता है, उसका हनन करते हैं॥१२॥
सोम देवता पाप करने वाले, मिथ्याचारी और बलवान् को भी मारते हैं। वे राक्षसों का हनन करते और असत्य बोलने वाले को भी मारते हैं। वे मारे जाकर इन्द्रदेव के द्वारा बाँधे जाते हैं॥१३॥
यदि हम (भूलवश अनृतदेव के उपासक हैं, (अथवा) यदि हम बेकार में ही देवताओं के पास जाते हैं, तो भी हे अग्ने ! आप हम पर क्रोध न करें । द्रोही, मिथ्याभाषी ही आपके द्वारा हिसित हों॥१४॥
यदि हम (वसिष्ठ) राक्षस हैं, यदि हम किसी सज्जन पुरुष को हिसित करें, तो आज ही मर जाएँ, (अन्यथा) हमें जो व्यर्थ ही राक्षस कहकर सम्बोधित करते हैं, वे अपने दस वीरों (परिवारी जनों) के साथ नष्ट हो जाएँ॥१५॥
जो राक्षस मुझ दैवी स्वभाव वाले (वसिष्ठ) को राक्षस कहता है तथा जो राक्षस अपने को “शुद्ध” कहता है, उसे इन्द्रदेव महान् आयुधों से नष्ट करें । वह सभी से पतित होकर गिरे॥१६॥
जो राक्षसी निशाकाल में अपने शरीर को उल्लू की तरह छिपाकर चलती है, वह अधोमुखी होकर अनन्त गर्त में गिरे । पाषाण-खण्ड घोर शब्द करते हुए उन राक्षसों को विनष्ट करें॥१७॥
हे मरुत् वीरो ! आप प्रज्ञाओं के बीच रहकर राक्षसों को ढूंढने की इच्छा करें । जो राक्षस रात्रि समय में पक्षी बन कर आते हैं, जो यज्ञ में हिंसा करते हैं, उन्हें पकड़कर विनष्ट करें॥१८॥
हे इन्द्रदेव ! आप अन्तरिक्ष मार्ग से वज्र प्रहार करें । हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप अपने यजमान को सोम द्वारा संस्कारित करें । राक्षसों का पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चारों ओर से पर्ववान् (वज्र) द्वारा विनाश करें॥१९॥
जो राक्षस कुत्तों की तरह काटने दौड़ते हैं, जो राक्षस अहिंसनीय इन्द्रदेव की हिंसा करना चाहते हैं, इन्द्रदेव उन कपटियों को मारने के लिए वज्र को तेज करते हैं । इन्द्रदेव दुष्ट राक्षसों का वज्र से शीघ्र विनाश करें॥२०॥
इन्द्रदेव राक्षसों का दमन करने वाले हैं । हविष्य (यज्ञ) के विनाशको का इन्द्रदेव पराभव करते हैं । परशु जैसे वन काटता है, मुग्दर जैसे मिट्टी के बर्तन तोड़ता है, उसी तरह इन्द्रदेव सामने आये राक्षसों का संहार करते हैं॥२१॥
हे इन्द्रदेव ! आप उल्लू के समान (मोहवाले) को मारे । भेड़िये के समान (हिसक), कुत्ते की भाँति (मत्सरग्रस्त) चक्रवाक पक्षी की तरह (कामी), वाज़-गृधे की तरह (मांसभक्षी) राक्षसों को प्रस्तर (वज्र) से मारें तथा इन सबसे हमारी रक्षा करें॥२२॥
राक्षस हमारे लिए घातक न हों, कष्ट देने वाले स्त्री-पुरुष के युग्मों से (देवगण) हमें बचाएँ। आपस में विघटन कराने वाले घातक राक्षसों से भी हमें बचाएँ । पृथ्वी हमें भूलोक के पापों से बचाए, अन्तरिक्ष में आकाश के पापों से बचाए॥२३॥
इन्द्रदेव पुरुष राक्षस को विनष्ट करें और कपटी हिंसक स्त्री को भी विनाश करें । हिंसा करना जिनका खेल है, उन्हें छिन्नमस्तक करें । वे सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएँ॥२४॥
हे सोमदेव ! आप और इन्द्रदेव जाग्रत् रहकर सभी राक्षसों को देखते रहें । राक्षसों को मारने वाले अस्त्र उन पर फेंकें और कष्ट देने वालों का वज्र से संहार करें॥२५॥



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