प्रथम मंडल सूक्त १ - १९१ (ऋग्वेद)

Rigveda | Gyan Dhyan Sanskar


सूक्त - १

हम अग्निदेव की स्तुति करते हैं । (कैसे अग्निदेव ?) जो यज्ञ (श्रेष्ठतम पारमार्थिक कर्म) के पुरोहित (आगे बढ़ाने वाले), देवता (अनुदान देने वाले), ऋत्विज् (समयानुकूल यज्ञ का सम्पादन करने वाले), होता (देवों का आवाहन करने वाले) और याजकों को रत्नों से (यज्ञ के लाभों से) विभूषित करने वाले हैं॥१॥
जो अग्निदेव पूर्वकालीन ऋषियों (भृगु, अंगिरादि) द्वारा प्रशंसित हैं । जो आधुनिक काल में भी ऋषि कल्प वेदज्ञ विद्वानों द्वारा स्तुत्य हैं, वे अग्निदेव इस यज्ञ में देवों का आवाहन करें॥२॥
(स्तोता द्वारा स्तुति किये जाने पर) ये बढ़ाने वाले अग्निदेव मनुष्यों (यजमानों को प्रतिदिन विवर्धमान (बढ़ने वाला) धन, यश एवं पुत्र-पौत्रादि वीर पुरुष प्रदान करने वाले हैं॥३॥
हे अग्निदेव ! आप सबका रक्षण करने में समर्थ हैं । आप जिस अध्वर (हिंसारहित यज्ञ) को सभी ओर से आवृत किये रहते हैं, वही यज्ञ देवताओं तक पहुँचता है॥४॥
हे अग्निदेव ! आप हवि -प्रदाता, ज्ञान और कर्म की संयुक्त शक्ति के प्रेरक, सत्यरूप एवं विलक्षण रूप युक्त हैं । आप देवों के साथ इस यज्ञ में पधारें॥५॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ करने वाले यजमान का धन, आवास, संतान एवं पशुओं की समृद्धि करके जो भी कल्याण करते हैं, वह भविष्य में किये जाने वाले यज्ञों के माध्यम से आपको ही प्राप्त होता है॥६॥
हे जाज्वल्यमान अग्निदेव ! हम आपके सच्चे उपासक हैं । श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा आपकी स्तुति करते हैं और दिन-रात, आपका सतत गुणगान करते हैं । हे देव ! हमें आपका सान्निध्य प्राप्त हो॥७॥
हम गृहस्थ लोग दीप्तिमान्, यज्ञों के रक्षक, सत्यवचनरूप व्रत को आलोकित करने वाले, यज्ञस्थल में वृद्धि को प्राप्त करने वाले अग्निदेव के निकट स्तुतिपूर्वक आते हैं॥८॥
हे गार्हपत्य अग्ने ! जिस प्रकार पुत्र को पिता (बिना बाधा के) सहज ही प्राप्त होता है, उसी प्रकार आप भी (हम यजमानों के लिये) बाधारहित होकर सुखपूर्वक प्राप्त हों। आप हमारे कल्याण के लिये हमारे निकट रहें॥९॥

सूक्त - २

हे प्रियदर्शी वायुदेव ! हमारी प्रार्थना को सुनकर आप यज्ञस्थल पर आयें । आपके निमित्त सोमरस प्रस्तुत है, इसका पान करें॥१॥
हे वायुदेव ! सोमरस तैयार करके रखने वाले, उसके गुणों को जानने वाले स्तोतागण स्तोत्रों से आपकी उत्तम प्रकार से स्तुति करते हैं॥२॥
हे वायुदेव ! आपकी प्रभावोत्पादक वाणी, सोमयाग करने वाले सभी यजमानों की प्रशंसा करती हुई एवं सोमरस का विशेष गुणगान करती हुई, सोमरस पान करने की अभिलाषा से दाता (यजमान ) के पास पहुँचती है॥३॥
हे इन्द्रदेव ! हे वायुदेव ! यह सोमरस आपके लिये अभिषुत किया (निचोड़ा) गया है। आप अन्नादि पदार्थों के साथ यहाँ पधारें, क्योंकि यह सोमरस आप दोनों की कामना करता है॥४॥
हे वायुदेव ! हे इन्द्रदेव ! आप दोनों अन्नादि पदार्थों और धन से परिपूर्ण हैं एवं अभिषुत सोमरस की विशेषता को जानते हैं। अत: आप दोनों शीघ्र ही इस यज्ञ में पदार्पण करें॥५॥
हे वायुदेव ! हे इन्द्रदेव ! आप दोनों बड़े सामर्थ्यशाली हैं। आप यजमान द्वारा बुद्धिपूर्वक निष्पादित सोम के पास अति शीघ्र पधारें॥६॥
घृत के समान प्राणप्रद वृष्टि-सम्पन्न कराने वाले मित्र और वरुण देवों का हम आवाहन करते हैं। मित्र हमें बलशाली बनायें तथा वरुणदेव हमारे हिंसक शत्रुओं का नाश करें॥७॥
सत्य को फलितार्थ करने वाले सत्ययज्ञ के पुष्टिकारक देव मित्रावरुणो ! आप दोनों हमारे पुण्यदायी कार्यों (प्रवर्त्तमान सोमयाग) को सत्य से परिपूर्ण करें॥८॥
अनेक कर्मों को सम्पन्न कराने वाले विवेकशील तथा अनेक स्थलों में निवास करने वाले मित्रावरुण हमारी क्षमताओं और कार्यों को पुष्ट बनाते हैं॥९॥

सूक्त - ३

हे विशालबाहो ! शुभ कर्मपालक, द्रुतगति से कार्य सम्पन्न करने वाले अश्विनीकुमारो ! हमारे द्वारा समर्पित हविष्यान्नों से आप भली प्रकार सन्तुष्ट हों॥१॥
असंख्य कर्मों को सम्पादित करने वाले,धैर्य धारण करने वाले, बुद्धिमान् हे अश्विनीकुमारो ! आप अपनी उत्तम बुद्धि से हमारी वाणियों (प्रार्थनाओं) को स्वीकार करें॥२॥
रोगों को विनष्ट करने वाले, सदा सत्य बोलने वाले रुद्रदेव के समान (शत्रु संहारक) प्रवृत्ति वाले, दर्शनीय हे अश्विनीकुमारो ! आप यहाँ आयें और बिछी हुई कुशाओं पर विराजमान होकर प्रस्तुत संस्कारित सोमरस का पान करें॥३॥
हे अद्भुत दीप्तिमान् इन्द्रदेव ! अँगुलियों द्वारा स्रवित, श्रेष्ठ पवित्रतायुक्त यह सोमरस आपके निमित्त है । आप आयें और सोमरस का पान करें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा जानने योग्य आप, सोमरस प्रस्तुत करते हुये ऋत्विजोंं के द्वारा बुलाये गये हैं। उनकी स्तुति के आधार पर आप यज्ञशाला में पधारें॥५॥
हे अश्वयुक्त इन्द्रदेव ! आप स्तवनों के श्रवणार्थ एवं इस यज्ञ में हमारे द्वारा प्रदत्त हवियों का सेवन करने के लिये यज्ञशाला में शीघ्र ही पधारें॥६॥
हे विश्वेदेवो! आप सबकी रक्षा करने वाले, सभी प्राणियों के आधारभूत और सभी को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। अत: आप इस सोम युक्त हवि देने वाले यजमान के यज्ञ में पधारें॥७॥
समय-समय पर वर्षा करने वाले हे विश्वेदेवो ! आप कर्म - कुशल और द्रुतगति से कार्य करने वाले हैं । आप सूर्य-रश्मियों के सदृश गतिशील होकर हमें प्राप्त हों॥८॥
हे विश्वेदेवो! आप किसी के द्वारा बध न किये जाने वाले, कर्म-कुशल, द्रोहरहित और सुखप्रद हैं। आप हमारे यज्ञ में उपस्थित होकर हवि का सेवन करें॥९॥
पवित्र बनाने वाली, पोषण देने वाली, बुद्धिमत्तापूर्वक ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी सरस्वती ज्ञान और कर्म से हमारे यज्ञ को सफल बनायें॥१०॥
सत्यप्रिय (वचन) बोलने की प्रेरणा देने वाली, मेधावी जनों को यज्ञानुष्ठान की प्रेरणा (मति) प्रदान करने वाली देवी सरस्वती हमारे इस यज्ञ को स्वीकार करके हमें अभीष्ट वैभव प्रदान करें॥११॥
जो देवी सरस्वती नदी-रूप में प्रभूत जल को प्रवाहित करती हैं। वे सुमति को जगाने वाली देवी सरस्वती सभी याजकों की प्रज्ञा को प्रखर बनाती हैं॥१२॥

सूक्त - ४

(गो दोहन करने वाले के द्वारा प्रतिदिन मधुर दूध प्रदान करने वाली गाय को जिस प्रकार बुलाया जाता है, उसी प्रकार हम अपने संरक्षण के लिये सौन्दर्यपूर्ण यज्ञकर्म सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं॥१॥
सोमरस का पान करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप सोम ग्रहण करने हेतु हमारे सवन-यज्ञों में पधार कर, सोमरस पीने के बाद प्रसन्न होकर याजकों को यश, वैभव और गौएँ प्रदान करें॥२॥
सोमपान कर लेने के अनन्तर हे इन्द्रदेव ! हम आपके अत्यन्त समीपवर्ती श्रेष्ठ प्रज्ञावान् पुरुषों की उपस्थिति में रहकर आपके विषय में अधिक ज्ञान प्राप्त करें । आप भी हमारे अतिरिक्त अन्य किसी के समक्ष अपना स्वरूप प्रकट न करें (अर्थात् अपने विषय में न बताएँ॥३॥
हे ज्ञानवानो ! आप उन विशिष्ट बुद्धि वाले, अपराजेय इन्द्रदेव के पास जाकर मित्रों-बन्धुओं के लिये धन-ऐश्वर्य के निमित्त प्रार्थना करें॥४॥
इन्द्रदेव की उपासना करने वाले उपासक उन (इन्द्रदेव) के निन्दकों को यहाँ से अन्यत्र निकल जाने को कहें, ताकि वे यहाँ से दूर हो जायें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपके अनुग्रह से समस्त वैभव प्राप्त करें, जिससे देखने वाले सभी शत्रु और मित्र हमें सौभाग्यशाली समझें॥६॥
(हे याजको !) यज्ञ को श्रीसम्पन्न बनाने वाले, प्रसन्नता प्रदान करने वाले, मित्रों को आनन्द देने वाले इस सोमरस को शीघ्रगामी इन्द्रदेव के लिये भरें (अर्पित करें)॥७॥
हे सैकड़ों यज्ञ सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव ! इस सोमरस को पीकर आप वृत्र-प्रमुख शत्रुओं के संहारक सिद्ध हुए हैं, अतः आप संग्राम-भूमि में वीर योद्धाओं की रक्षा करें॥८॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! युद्धों में बल प्रदान करने वाले आपको हम धनों की प्राप्ति के लिये श्रेष्ठ हविष्यान्न अर्पित करते हैं॥९॥
हे याजको ! आप उन इन्द्रदेव के लिये स्तोत्रों का गान करें, जो धनों के महान् रक्षक, दुःखों को दूर करने वाले और याज्ञिकों से मित्रवत् भाव रखने वाले हैं॥१०॥

सूक्त - ५

हे याज्ञिक मित्रो ! इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिये प्रार्थना करने हेतु शीघ्र आकर बैठो और हर प्रकार से उनकी स्तुति करो॥१॥
(हे याजक मित्रो ! सोम के अभिषुत होने पर) एकत्रित होकर संयुक्तरूप से सोमयज्ञ में शत्रुओं को पराजित करने वाले ऐश्वर्य के स्वामी इन्द्रदेव की अभ्यर्थना करो॥२॥
वे इन्द्रदेव हमारे पुरुषार्थ को प्रखर बनाने में सहायक हों, धन-धान्य से हमें परिपूर्ण करें तथा ज्ञान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हुये पोषक अन्न सहित हमारे निकट आयें॥३॥
(हे याजको !} संग्राम में जिनके अश्वों से युक्त रथों के सम्मुख शत्रु टिक नहीं सकते, उन इन्द्रदेव के गुणों का आप गान करें॥४॥
यह निचोड़ा और शुद्ध किया हुआ दही मिश्रित सोमरस, सोमपान की इच्छा करने वाले इन्द्रदेव के निमित्त प्राप्त हो॥५॥
हे उत्तम कर्मवाले इन्द्रदेव ! आप सोमरस पीने के लिये देवताओं में सर्वश्रेष्ठ होने के लिये तत्काल वृद्ध रूप हो जाते हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! तीनों सवनों में व्याप्त रहने वाला यह सोम, आपके सम्मुख उपस्थित रहे एवं आपके ज्ञान को सुखपूर्वक समृद्ध करे॥७॥
हे सैकड़ों यज्ञ करने वाले इन्द्रदेव ! स्तोत्र आपकी वृद्धि करें । यह उक्थ (स्तोत्र) वचने और हमारी वाणी आपकी महत्ता बढ़ायें॥८॥
रक्षणीय की सर्वथा रक्षा करने वाले इन्द्रदेव बल-पराक्रम प्रदान करने वाले विविध रूपों में विद्यमान सोम रूप अन्न का सेवन करें॥९॥
हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! हमारे शरीर को कोई भी शत्रु क्षति न पहुँचाये । हमें कोई भी हिसित न करे, आप हमारे संरक्षक रहें॥१०॥

सूक्त - ६

( वे इन्द्रदेव) द्युलोक में आदित्य रूप में, भूमि पर अहिंसक अग्नि रूप में, अन्तरिक्ष में सर्वत्र प्रसरणशील वायु रूप में उपस्थित हैं। उन्हें उक्त तीनों लोकों के प्राणी अपने कार्यों में देवत्वरूप से सम्बद्ध मानते हैं । द्युलोक में प्रकाशित होने वाले नक्षत्र-ग्रह आदि उन्हीं (इन्द्रदेव) के ही स्वरूपांश हैं । (अर्थात् तीनों लोकों की प्रकाशमयी- प्राणमयी शक्तियों के वे ही एक मात्र संगठक हैं ।)॥१॥
इन्द्रदेव के रथ में दोनों ओर रक्तवर्ण, संघर्षशील, मनुष्यों को गति देने वाले दो घोड़े नियोजित रहते हैं॥२॥
है मनुष्यो ! तुम रात्रि में निद्राभिभूत होकर, संज्ञा शून्य निश्चेष्ट होकरे, प्रातः पुनः सचेत एवं सचेष्ट होकर मानों प्रतिदिन नवजीवन प्राप्त करते हो । (प्रति-दिन जन्म लेते हो)॥३॥
यज्ञीय नाम वाले,धारण करने में समर्थ मरुत् वास्तव में अन्न की (वृद्धि की) कामना से बार-बार (मेघ आदि) गर्भ को प्राप्त होते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! सुदृढ़ किले बन्दी को ध्वस्त करने में समर्थ, तेजस्वी मरुद्गणों के सहयोग से आपने गुफा में अवरुद्ध गौओं (किरणों) को खोजकर प्राप्त किया॥५॥
देवत्व प्राप्ति की कामना वाले ज्ञानी ऋत्विज् , महान् यशस्वी, ऐश्वर्यवान् वीर मरुद्गणों की बुद्धिपूर्वक स्तुति करते हैं॥६॥
सदा प्रसन्न रहने वाले, समान तेज वाले मरुद्गण निर्भय रहने वाले इन्द्रदेव के साथ (संगठित हुए) अच्छे लगते हैं॥७॥
इस यज्ञ में निर्दोष, दीप्तिमान् , इष्ट प्रदायक, सामर्थ्यवान् मरुद्गणों के साथी इन्द्रदेव के सामर्थ्य की पूजा की जाती है॥८॥
हे सर्वत्र गमनशील मरुद्गणो ! आप अन्तरिक्ष से, आकाश से अथवा प्रकाशमान द्युलोक से यहाँ पर आयें, क्योंकि इस यज्ञ में हमारी वाणियाँ आपकी स्तुति कर रहीं हैं॥९॥
इस पृथ्वी लोक, अन्तरिक्ष लोक अथवा द्युलोक से - कहीं से भी प्रभूत धन प्राप्त कराने के लिये, हम इन्द्रदेव की प्रार्थना करते हैं॥१०॥

सूक्त - ७

सामगान के साधकों ने गाये जाने योग्य बृहत्साम की स्तुतियों (गाथा) से देवराज इन्द्र को प्रसन्न किया है। इसी तरह याज्ञिकों ने भी मन्त्रोच्चारण के द्वारा इन्द्रदेव की प्रार्थना की है॥१॥
संयुक्त करने की क्षमता वाले, वज्रधारी, स्वर्ण-मण्डित इन्द्रदेव , वचन मात्र के इशारे से जुड़ जाने वाले अश्वों के साथ हैं॥२॥
(देवशक्तियों के संगठक ) इन्द्रदेव ने विश्व को प्रकाशित करने के महान् उद्देश्य से सूर्यदेव को उच्चाकाश में स्थापित किया, जिनने अपनी किरणों से पर्वत आदि समस्त विश्व को दर्शनार्थ प्रेरित किया॥३॥
हे वीर इन्द्रदेव ! आप सहस्रों प्रकार के धन - लाभ वाले छोटे-बड़े संग्रामों में वीरतापूर्वक हमारी रक्षा करें॥४॥
हम छोटे-बड़े सभी (जीवन) संग्रामों में वृत्रासुर के संहारके, वज्रपाणि इन्द्रदेव को सहायतार्थ बुलाते हैं॥५॥
सतत दानशील, सदैव अपराजित हे इन्द्रदेव ! आप हमारे लिये मेघ से जल की वृष्टि करें॥६॥
प्रत्येक दान के समय, वज्रधारी इन्द्रदेव के सदृश दान की (दानी की) उपमा कहीं अन्यत्र नहीं मिलती । इन्द्रदेव की इससे अधिक उत्तम स्तुति करने में हम समर्थ नहीं हैं॥७॥
सबके स्वामी, हमारे विरुद्ध कार्य न करने वाले, शक्तिमान् इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य के अनुसार, अनुदान बाँटने के लिये मनुष्यों के पास उसी प्रकार जाते हैं, जैसे वृषभ गायों के समूह में जाता है॥८॥
इन्द्रदेव पाँचों श्रेणियों के मनुष्यों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद) और सब ऐश्वर्यो- सम्पदाओं के अद्वितीय स्वामी हैं॥९॥
हे ऋत्विजों ! हे यजमानों ! सभी लोगों में उत्तम, इन्द्रदेव को, आप सब के कल्याण के लिये हमें आमंत्रित करते हैं, वे हमारे ऊपर विशेष कृपा करें॥१०॥

सूक्त - ८

हे इन्द्रदेव ! आप हमारे जीवन संरक्षण के लिये तथा शत्रुओं को पराभूत करने के निमित्त हमें ऐश्वर्य स पूर्ण करें॥१॥
उस ऐश्वर्य के प्रभाव और आपके द्वारा रक्षित अश्वों के सहयोग से हम मुक्के का प्रहार करके (शक्ति प्रयोग द्वारा) शत्रुओं को भगा दें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित होकर तीक्ष्ण वज्रों को धारण कर हम युद्ध में स्पर्धा करने वाले शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित कुशल शस्त्र-चालक वीरों के साथ हम अपने शत्रुओं को पराजित करें॥४॥
हमारे इन्द्रदेव श्रेष्ठ और महान् हैं । वज्रधारी इन्द्रदेव का यश द्युलोक के समान व्यापक होकर फैले तथा इनके बल की प्रशंसा चतुर्दिक् हो॥५॥
जो संग्राम में जुटते हैं, जो पुत्र के निर्माण में जुटते हैं और बुद्धिपूर्वक ज्ञान-प्राप्ति के लिए यत्न करते हैं, वे सब इन्द्रदेव की स्तुति से इष्टफल पाते हैं॥६॥
अत्यधिक सोमपान करने वाले इन्द्रदेव का उदर समुद्र की तरह विशाल हो जाता है । वह (सोमरस) जीभ से प्रवाहित होने वाले रसों की तरह सतत द्रवित होता रहता है । (सदा आई बनाये रहता है ।)॥७॥
इन्द्रदेव की अति मधुर और सत्यवाणी उसी प्रकार सुख देती है, जिस प्रकार गो धन के दाता और पके फल वाली शाखाओं से युक्त वृक्ष यजमानों (हविदाता) को सुख देते हैं॥८॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे लिये इष्टदात्री और संरक्षण प्रदान करने वाली जो आपकी विभूतियाँ हैं, वे सभी दान देने (श्रेष्ठ कार्य में नियोजन करने वालों को भी तत्काल प्राप्त होती हैं॥९॥
दाता की स्तुतियाँ और उक्थ वचन अति मनोरम एवं प्रशंसनीय हैं। ये सब सोमपान करने वाले इन्द्रदेव के लिये हैं॥१०॥

सूक्त - ९

हे इन्द्रदेव ! सोमरूपी अन्नों से आप प्रफुल्लित होते हैं, अत: अपनी शक्ति से दुर्दान्त शत्रुओं पर विजय श्री वरण करने की क्षमता प्राप्त करने हेतु आप ( यज्ञशाला में) पधारें॥१॥
(हे याजको !) प्रसन्नता देने वाले सोमरस को (निचोड़कर) तैयार करो तथा सम्पूर्ण कार्यों के कर्ता इन्द्र देव के लिये सामर्थ्य बढ़ाने वाले इस सोम को अर्पित करो॥२॥
हे उत्तम शस्त्रों से सुसज्जित ( अथवा शोभन नासिका वाले), सर्वद्रष्टा इन्द्रदेव ! हमारे इन यज्ञों में आकर प्रफुल्लता प्रदान करने वाले स्तोत्रों से आप आनन्दित हों॥३॥
है इन्द्रदेव ! आपकी स्तुति के लिये हमने स्तोत्रों की रचना की है । हे बलशाली और पालनकर्ता इन्द्रदेव ! इन स्तुतियों द्वारा की गई प्रार्थना को आप स्वीकार करें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप ही विपुल ऐश्वर्यों के अधिपति हैं, अतः विविध प्रकार के श्रेष्ठ ऐश्वर्यों को हमारे पास प्रेरित करें, अर्थात् हमें श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें॥५॥
हे प्रभूत ऐश्वर्य सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप वैभव की प्राप्ति के लिये हमें श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित करें, जिससे हम परिश्रमी और यशस्वी हो सकें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें गौओं, धन-धान्यों से युक्त अपार वैभव एवं अक्षय पूर्णायु प्रदान करें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें प्रभूत यश एवं विपुल ऐश्वर्य प्रदान करें तथा बहुत से रथों में भरकर अन्नादि प्रदान करें॥८॥
धनों के अधिपति, ऐश्वर्यों के स्वामी, ऋचाओं से स्तुत्य इन्द्रदेव का हम स्तुतिपूर्वक आवाहन करते हैं । वे हमारे यज्ञ में पधार कर, हमारे ऐश्वर्य की रक्षा करें॥९॥
सोम को सिद्ध (तैयार) करने के स्थान यज्ञस्थल पर यज्ञकर्ता, इन्द्रदेव के पराक्रम की प्रशंसा करते हैं॥१०॥

सूक्त - १०

हे शतक्रतो (सौ यज्ञ या श्रेष्ठ कर्म करने वाले) इन्द्रदेव ! उद्गातागण (उच्च स्वर से गान करने वाले) आपका आवाहन करते हैं। स्तोतागण पूज्य इन्द्रदेव का मंत्रोच्चारण द्वारा आदर करते हैं। बाँस के ऊपर कला प्रदर्शन करने वाले नट के समान , ब्रह्मा नामक ऋत्विज् श्रेष्ठ स्तुतियों द्वारा इन्द्रदेव को प्रोत्साहित करते हैं॥१॥
जब यजमान सोमवल्ली, समिधादि के निमित्त एक पर्वत शिखर से दूसरे पर्वत शिखर पर जाते हैं और यजन कर्म करते हैं, तब उनके मनोरथ को जानने वाले इष्टप्रदायक इन्द्रदेव यज्ञ में जाने को उद्यत होते हैं॥२॥
हे सोमरस ग्रहीता इन्द्रदेव ! आप लम्बे केशयुक्त, शक्तिमान्, गन्तव्ये तक ले जाने वाले दोनों घोड़ों को रथ में नियोजित करें । तत्पश्चात् सोमपान से तृप्त होकर हमारे द्वारा की गई प्रार्थनाएँ सुनें॥३॥
हे सर्वनिवासक इन्द्रदेव ! हमारी स्तुतियों का श्रवण कर आप उद्गाताओं, होताओं एवं अध्वर्युवों को प्रशंसा से प्रोत्साहित करें॥४॥
हे स्तोताओं ! आप शत्रुसंहारक, सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव के लिये (उनके) यश को बढ़ाने वाले उत्तम स्तोत्रों का पाठ करें, जिससे उनकी कृपा हमारी सन्तानों एवं मित्रों पर सदैव बनी रहे॥५॥
हम उन इन्द्रदेव के पास मित्रता के लिये, धन प्राप्ति और उत्तमबल - वृद्धि के लिये स्तुति करने जाते हैं । वे इन्द्रदेव बल एवं धन प्रदान करते हुए हमें संरक्षित करते हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा प्रदत्त यश सब दिशाओं में सुविस्तृत हुआ है । हे वज्रधारक इन्द्रदेव ! गौओं को बाड़े से छोड़ने के समान हमारे लिये धन को प्रसारित करें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! युद्ध के समय आप के यश का विस्तार पृथ्वी और द्युलोक तक होता है । दिव्य जल- प्रवाहों पर आपका ही अधिकार हैं । उनसे अभिषिक्त कर हमें तृप्त करें॥८॥
भक्तों की स्तुति सुनने वाले हे इन्द्रदेव ! हमारे आवाहन को सुनें । हमारी वाणियों को चित्त में धारण करें । हमारे स्तोत्रों को अपने मित्र के वचनों से भी अधिक प्रीतिपूर्वक धारण करें॥९॥
हे इन्द्रदेव ! हम जानते हैं कि आप बल - सम्पन हैं तथा युद्धों में हमारे आवाहन को आप सुनते हैं । हे बलशाली इन्द्रदेव ! आपके सहस्रों प्रकार के धन के साथ हम आपका संरक्षण भी चाहते हैं॥१०॥
हे कुशिक के पुत्र इन्द्रदेव ! आप इस निष्पादित सोम का पान करने के लिये हमारे पास शीघ्र आयें । हमें कर्म करने की सामर्थ्य के साथ नवीन आयु भी दें । इस ऋषि को सहस्र धनों से पूर्ण करें॥११॥
हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा की गई स्तुतियाँ सब ओर से आपकी आयु को बढ़ाती हुई आपको यशस्वी बनायें । आपके द्वारा स्वीकृत ये (स्तुतियाँ) हमारे आनन्द को बढ़ाने वाली सिद्ध हों॥१२॥

सूक्त - ११

समुद्र के तुल्य व्यापक, सब रथियों में महानतम, अन्नों के स्वामी और सत्प्रवृत्तियों के पालक इन्द्रदेव को समस्त स्तुतियाँ अभिवृद्धि प्रदान करती हैं॥१॥
हे बलरक्षक इन्द्रदेव ! आपकी मित्रता से हम बलशाली होकर किसी से न डरें । हे अपराजेय - विजयी इन्द्रदेव ! हम साधकगण आपको प्रणाम करते हैं॥२॥
देवराज इन्द्र की दानशीलता सनातन हैं। ऐसी स्थिति में आज के यजमान भी यदि स्तोताओं को गवादि सहित अन्न दान करते हैं, तो इन्द्रदेव द्वारा की गई सुरक्षा अक्षुण्ण रहती है॥३॥
शत्रु के नगरों को विनष्ट करने वाले वे इन्द्रदेव युवा, ज्ञाता, अतिशक्तिशाली, शुभ कार्यों के आश्रयदाता तथा सर्वाधिक कीर्ति -युक्त होकर विविधगुण सम्पन्न हुए हैं॥४॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने गौओं (सूर्य-किरणा) को चुराने वाले असुरों के व्यूह को नष्ट किया, तब असुरों से पराजित हुए देवगण आपके साथ आकर संगठित हुए॥५॥
संग्रामशूर हे इन्द्रदेव ! आपकी दानशीलता से आकृष्ट होकर हम होतागण पुनः आपके पास आये हैं । हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! सोमयाग में आपकी प्रशंसा करते हुए ये ऋत्विज़ एवं यजमान आपकी दानशीलता को जानते हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! अपनी माया द्वारा आपने 'शुष्ण' (एक राक्षस) को पराजित किया। जो बुद्धिमान् आपकी इस माया को जानते हैं, उन्हें यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें॥७॥
स्तोतागण, असंख्यों अनुदान देने वाले , ओजस् (बल-पराक्रम) के कारण जगत् के नियन्ता इन्द्रदेव की स्तुति करने लगे॥८॥

सूक्त - १२

हे सर्वज्ञाता अग्निदेव ! आप यज्ञ के विधाता हैं, समस्त देवशक्तियों को तुष्ट करने की सामर्थ्य रखते हैं । आप यज्ञ की विधि-व्यवस्था के स्वामी हैं। ऐसे समर्थ आपको हम देव-दूत रूप में स्वीकार करते हैं॥१॥
प्रजापालक, देवों तक हवि पहुँचाने वाले, परमप्रिय, कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले हे अग्निदेव ! हम याजकगण हवनीय मंत्रों से आपको सदा बुलाते हैं॥२॥
हे स्तुत्य अग्निदेव ! आप अरणि मन्थन से उत्पन्न हुए हैं। आस्तीर्ण (बिछे हुए) कुशाओं पर बैठे हुए यजमान पर अनुग्रह करने हेतु आप (यज्ञ की) हवि ग्रहण करने वाले देवताओं को इस यज्ञ में बुलाएँ॥३॥
हे अग्निदेव ! आप हवि की कामना करने वाले देवों को यहाँ बुलाएँ और इन कुशा के आसनों पर देवों के साथ प्रतिष्ठित हों॥४॥
घृत आहुतियों से प्रदीप्त हे अग्निदेव ! आप राक्षसी प्रवृत्तियों वाले शत्रुओं को सम्यक् रूप से भस्म करें॥५॥
यज्ञ स्थल के रक्षक, दूरदर्शी, चिरयुवा, आहुतियों को देवों तक पहुँचाने वाले, ज्वालायुक्त आहवनीय यज्ञाग्नि को अरणि मन्थन द्वारा उत्पन्न अग्नि से प्रज्वलित किया जाता हैं॥६॥
हे विजो ! लोक हितकारी यज्ञ में रोगों को नष्ट करने वाले, ज्ञानवान् अग्निदेव की स्तुति आप सब विशेष रूप से करें॥७॥
देवगणों तक हविष्यान्न पहुँचाने वाले हे अग्निदेव ! जो याजक, आप (देवदूत) की उत्तम विधि से अर्चना करते हैं, आप उनकी भली-भाँति रक्षा करें॥८॥
है शोधक अग्निदेवे ! देवों के लिए हवि प्रदान करने वाले जो यजमान आपकी प्रार्थना करते हैं, आप उन्हें सुखी बनायें॥९॥
हे पवित्र, दीप्तिमान् अग्निदेव ! आप देवों को हमारे यज्ञ में हवि ग्रहण करने के निमित्त ले आएँ॥१०॥
हे अग्निदेव ! नवीनतम गायत्री छन्द वाले सूक्त से स्तुति किये जाते हुए आप हमारे लिए पुत्रादि ऐश्वर्य और बलयुक्त अन्नों को भरपूर प्रदान करें॥११॥
हे अग्निदेव ! अपनी कान्तिमान् दीप्तियों से देवों को बुलाने के निमित्त हमारी स्तुतियों को स्वीकार करें॥१२॥

सूक्त - १३

पवित्रकर्ता, यज्ञ सम्पादनकर्ता हे अग्निदेव ! आप अच्छी तरह प्रज्वलित होकर यजमान के कल्याण के लिए देवताओं का आवाहन करें और उनको लक्ष्य करके यज्ञ सम्पन्न करें अर्थात् देवों के पोषण के लिए हविष्यान्न ग्रहण करें॥१॥
ऊर्ध्वगामी, मेधावी हे अग्निदेव ! हमारी रक्षा के लिए प्राणवर्द्धक-मधुर हवियों को देवों के निमित्त प्राप्त करें और उन तक पहुँचाएँ॥२॥
हम इस यज्ञ में देवताओं के प्रिय और आह्लादक (मधुजिह्व) अग्निदेव का आवाहन करते हैं। वह हमारी हवियों को देवताओं तक पहुँचाने वाले हैं, अस्तु, वे स्तुत्य हैं॥३॥
मानवमात्र के हितैषी हे अग्निदेव ! आप अपने श्रेष्ठ- सुखदायी रथ से देवताओं को लेकर (यज्ञस्थल पर) पधारें । हम आपकी वन्दना करते हैं॥४॥
हे मेधावी पुरुषो ! आप इस यज्ञ में कुशा के आसनों को परस्पर मिलाकर इस तरह बिछाएँ कि उस पर घृत-पात्र को भली प्रकार रखा जा सके, जिससे अमृततुल्य घृत का सम्यक् दर्शन हो सके॥५॥
आज यज्ञ करने के लिए निश्चित रूप से ऋत (यज्ञीय वातावरण) की वृद्धि करने वाले अविनाशी दिव्य-द्वार खुल जाएँ॥६॥
सुन्दर रूपवती रात्रि और उषा का हम इस यज्ञ में आवाहन करते हैं। हमारी ओर से आसन रूप में यह बर्हि (कुश) प्रस्तुत है॥७॥
उन उत्तम वचन वाले और मेधावी दोनों ( अग्नियों) दिव्य होताओं को यज्ञ में यजन के निमित्त हम बुलाते हैं॥८॥
इळा, सरस्वती और महीं ये तीनों देवियाँ सुखकारी और क्षयरहित हैं। ये तीनों बिछे हुए दीप्तिमान् कुश के आसनों पर विराजमान हों॥९॥
प्रथम पूज्य, विविध रूप वाले त्वष्टादेव का इस यज्ञ में आवाहन करते हैं, वे देव केवल हमारे ही हों॥१०॥
हे वनस्पतिदेव ! आप देवों के लिए नित्य हविष्यान्न प्रदान करने वाले दाता को प्राणरूप उत्साह प्रदान करें॥११॥
(हे अध्वर्यु !) आप याजकों के घर में इन्द्रदेव की तुष्टि के लिये आहुतियाँ समर्पित करें । हम होता वहाँ देवों को आमन्त्रित करते हैं॥१२॥

सूक्त - १४

हे अग्निदेव ! आप समस्त देवों के साथ इस यज्ञ में सोम पीने के लिए आएँ एवं हमारी परिचर्या और स्तुतियों को ग्रहण करके यज्ञ कार्य सम्पन्न करें॥१॥
हे मेधावी अग्निदेव ! कण्वऋषि आपको बुला रहे हैं, वे आपके कार्यों की प्रशंसा करते हैं । अत: आप देवों के साथ यहाँ पधारें॥२॥
यज्ञशाला में हम इन्द्र, वायु, बृहस्पति, मित्र, अग्नि, पूषा, भग, आदित्यगण और मरुद्गण आदि देवों का आवाहन करते हैं॥३॥
कूट-पीसकर तैयार किया हुआ, आनन्द और हर्ष बढ़ाने वाला यह मधुर सोमरस अग्निदेव के लिए चमसादि पात्रों में भरा हुआ है॥४॥
कण्व ऋषि के वंशज अपनी सुरक्षा की कामना से, कुश-आसन बिछाकर हविष्यान्न व अलंकारों से युक्त होकर अग्निदेव की स्तुति करते हैं॥५॥
अतिदीप्तिमान् पृष्ठ भाग वाले, मन के संकल्प मात्र से ही रथ में नियोजित हो जाने वाले अश्वों (से खींचे गये रथ) द्वारा आप सोमपान के निमित्त देवों को ले आएँ॥६॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ की समृद्धि एवं शोभा बढ़ाने वाले पूजनीय इन्द्रादि देव को सपत्नीक इस यज्ञ में बुलाएँ तथा उन्हें मधुर सोमरस का पान कराएँ॥७॥
हे अग्निदेव ! यज्ञन किये जाने योग्य और स्तुति किये जाने योग्य जो देवगण हैं, वे यज्ञ में आपकी जिह्वा से आनन्दपूर्वक मधुर सोमरस का पान करें॥८॥
हे मेधावी होतारूप अग्निदेव ! आप प्रात:काल में जागने वाले विश्वेदेवों को सूर्य-रश्मियों से युक्त करके हमारे पास लाते हैं॥९॥
हे अग्निदेव ! आप इन्द्र, वायु, मित्र आदि देवों के सम्पूर्ण तेजों के साथ मधुर सोमरस का पान करें॥१०॥
हे मनुष्यों के हितैषी अग्निदेव ! आप होता के रूप में यज्ञ में प्रतिष्ठित हों और हमारे इस हिंसारहित यज्ञ को सम्पन्न करें॥११॥
हे अग्निदेव ! आप रोहित नामक रथ को ले जाने में सक्षम, तेजगति वाली घोड़ियों को रथ में जोते एवं उनके द्वारा देवताओं को इस यज्ञ में लाएँ॥१२॥

सूक्त - १५

हे इन्द्रदेव ! ऋतुओं के अनुकूल सोमरस का पान करें, ये सोमरस आपके शरीर में प्रविष्ट हों; क्योंकि आपकी तृप्ति का आश्रयभूत साधन यहीं सोम है॥१॥
दानियों में श्रेष्ठ हे मरुतो ! आप पोता नामक अंत्वज् के पात्र से ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें एवं हमारे इस यज्ञ को पवित्रता प्रदान करें॥२॥
हे त्वष्टादेव ! आप पत्नी सहित हमारे यज्ञ की प्रशंसा करें, ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें। आप निश्चय ही रत्नों को देने वाले है॥३॥
हे अग्निदेव ! आप देवों को यहाँ बुलाकर उन्हें यज्ञ के तीनों सवनों (प्रातः, माध्यन्दिन एवं सायं) में आसीन करें। उन्हें विभूषित करके ऋतु के अनुकूल सोम का पान करें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप ब्रह्मा को जानने वाले साधक के पात्र से सोमरस का पान करें, क्योंकि उनके साथ आपकी अविच्छिन्न (अटूट) मित्रता है॥५॥
हे अटले व्रत वाले मित्रावरुण ! आप दोनों ऋतु के अनुसार बल प्रदान करने वाले हैं। आप कठिनाई से सिद्ध होने वाले इस यज्ञ को सम्पन्न करते हैं॥६॥
धन की कामना वाले याजक सोमरस तैयार करने के निमित्त हाथ में पत्थर धारण करके पवित्र यज्ञ में धनप्रदायक अग्निदेव की स्तुति करते हैं॥७॥
हे धनप्रदायक अग्निदेव ! हमें वे सभी धन प्रदान करें, जिनके विषय में हमने श्रवण किया है । वे समस्त धन हम देवगणों को ही अर्पित करते हैं॥८॥
धनप्रदायक अग्निदेव नेष्टापात्र (नेधिष्ण्या स्थान-यज्ञ कुण्ड) से ऋतु के अनुसार सोमरस पीने की इच्छा करते हैं। अतः हे याजकगण ! आप वहाँ जाकर यज्ञ करें और पुन: अपने निवास स्थान के लिये प्रस्थान करें॥९॥
हे धनप्रदायक अग्निदेव ! ऋतुओं के अनुगत होकर हम आपके निमित्त सोम के चौथे भाग को अर्पित करते हैं, इसलिए आप हमारे लिये धन प्रदान करने वाले हों॥१०॥
दीप्तिमान्, शुद्ध कर्म करने वाले, ऋतु के अनुसार यज्ञवाहक हे अश्विनीकुमारो ! आप इस मधुर सोमरस का पान करें॥११॥
हे इष्टप्रद अग्निदेव ! आप गार्हपत्य के नियमन में ऋतुओं के अनुगत यज्ञ का निर्वाह करने वाले हैं, अतः देवत्व प्राप्ति की कामना वाले याजकों के निमित्त देवों का यजन करें॥१२॥

सूक्त - १६

हे बलवान् इन्द्रदेव ! आपके तेजस्वी घोड़े सोमरस पीने के लिए आपको यज्ञस्थल पर लाएँ तथा सूर्य के समान प्रकाशयुक्त ऋत्विज् मन्त्रों द्वारा आपकी स्तुति करें॥१॥
अत्यन्त सुखकारी रथ में नियोजित इन्द्रदेव के दोनों हरि (घोड़े) उन्हें (इन्द्रदेव को) घृत से स्निग्ध हवि रूप धाना (भुने हुए जौ) ग्रहण करने के लिए यहाँ ले आएँ॥२॥
हम प्रात:काल यज्ञ प्रारम्भ करते समय मध्याह्नकालीन सोमयाग प्रारम्भ होने पर तथा सायंकाल यज्ञ की समाप्ति पर भी सोमरस पीने के निमित्त इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने केसर युक्त अश्वों से सोम के अभिषव स्थान के पास आएँ । सोम के अभिषुत होने पर हम आपका आवाहन करते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे स्तोत्रों का श्रवण कर आप यहाँ आएँ । प्यासे गौर मृग के सदृश व्याकुल मन से सोम के अभिषव स्थान के समीप आकर सोम का पान करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! यह दीप्तिमान् सोम निष्पादित होकर कुश-आसन पर सुशोभित है । शक्ति - वर्द्धन के निमित्त आप इसका पान करें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! यह स्तोत्र श्रेष्ठ, मर्मस्पर्शी और अत्यन्त सुखकारी है। अब आप इसे सुनकर अभिषुत सोमरस का पान करें॥७॥
सोम के सभी अभिषव स्थानों की ओर इन्द्रदेव अवश्य जाते हैं। दुष्टों का हनन करने वाले इन्द्रदेव सोमरस पीकर अपना हर्ष बढ़ाते हैं॥८॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आप हमारी गौओं और अश्वों सम्बन्धी कामनायें पूर्ण करें । हम मनोयोगपूर्वक आपकी स्तुति करते हैं॥९॥

सूक्त - १७

हम इन्द्र और वरुण दोनों प्रतापी देवों से अपनी सुरक्षा की कामना करते हैं । वे दोनों हम पर इस प्रकार अनुकम्पा करें, जिससे कि हम सुखी रहें॥१॥
हे इन्द्र और वरुणदेवो ! आप दोनों, मनुष्यों के सम्राट् , धारक एवं पोषक हैं। हम जैसे ब्राह्मणों के आवाहन पर सुरक्षा के लिए आप निश्चय ही आने को उद्यत रहते हैं॥२॥
हे इन्द्र और वरुणदेवो ! हमारी कामनाओं के अनुरूप धन देकर हमें संतुष्ट करें। आप दोनों के समीप पहुँचकर हम प्रार्थना करते हैं॥३॥
हमारे कर्म संगठित हों, हमारी सद्बुद्धियाँ संगठित हों, हम अग्रगण्य होकर दान करने वाले बनें॥४॥
इन्द्रदेव सहस्रों दाताओं में सर्वश्रेष्ठ और वरुणदेव सहस्रों प्रशंसनीय देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं॥५॥
आपके द्वारा सुरक्षित धन को प्राप्त कर हम उसका श्रेष्ठतम उपयोग करें । वह धन हमें विपुले मात्रा में प्राप्त हो॥६॥
है इन्द्रावरुण देवो ! विविध प्रकार के धन की कामना से हम आपका आवाहन करते हैं। आप हमें उत्तम विजय प्राप्त कराएँ॥७॥
हे इन्द्रावरुण देवो ! हमारी बुद्धियाँ सम्यक् रूप से आपकी सेवा करने की इच्छा करती हैं, अत: हमें शीघ्र ही निश्चयपूर्वक सुख प्रदान करें॥८॥
हे इन्द्रावरुण देवो ! जिन उत्तम स्तुतियों के लिए (प्रति) हम, आप दोनों का आवाहन करते हैं एवं जिन स्तुतियों को साथ-साथ प्राप्त करके आप दोनों पुष्ट होते हैं, वे स्तुतियाँ आपको प्राप्त हों॥९॥

सूक्त - १८

हे सम्पूर्ण ज्ञान के अधिपति ब्रह्मणस्पति देव ! सोम का सेवन करने वाले यजमान को आप उशि के पुत्र कक्षीवान् की तरह श्रेष्ठ प्रकाश से युक्त करें॥१॥
ऐश्वर्यवान्, रोगों का नाश करने वाले, धन प्रदाता और पुष्टिवर्धक तथा जो शीघ्र फलदायक हैं, वे ब्रह्मणस्पतिदेव, हम पर कृपा करें॥२॥
हे ब्रह्मणस्पतिदेव ! यज्ञ न करने वाले तथा अनिष्ट चिन्तन करने वाले दुष्ट शत्रु का हिंसक, दुष्ट प्रभाव हम पर न पड़े। आप हमारी रक्षा करें॥३॥
जिस मनुष्य को इन्द्रदेव, ब्रह्मणस्पतिदेव और सोमदेव प्रेरित करते हैं, वह वीर कभी नष्ट नहीं होता॥४॥
हे ब्रह्मणस्पते ! आप सोमदेव, इन्द्रदेव और दक्षिणादेवी के साथ मिलकर यज्ञादि अनुष्ठान करने वाले मनुष्य की पापों से रक्षा करें॥५॥
इन्द्रदेव के प्रिय मित्र, अभीष्ट पदार्थों को देने में समर्थ, लोकों का मर्म समझने में सक्षम सदसस्पतिदेव (सत्प्रवृत्तियों के स्वामी) से हम अद्भुत मेधा प्राप्त करना चाहते हैं॥६॥
जिनकी कृपा के बिना ज्ञानी का भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता, वे सदसस्पतिदेव हमारी बुद्धि को उत्तम प्रेरणाओं से युक्त करते हैं॥७॥
वे सदसस्पतिदेव हविष्यान्न तैयार करने वाले साधकों तथा यज्ञ को प्रवृद्ध करते हैं और वे ही हमारी स्तुतियों को देवों तक पहुँचाते हैं॥८॥
द्युलोक के सदृश अतिदीप्तिमान्, तेजवान्, यशस्वी और मुनष्यों द्वारा प्रशंसित सदसस्पतिदेव को हमने देखा है॥९॥

सूक्त - १९

हे अग्निदेव ! श्रेष्ठ यज्ञों की गरिमा के संरक्षण के लिए हम आपका आवाहन करते हैं, आपको मरुतों के साथ आमंत्रित करते हैं, अत: देवताओं के इस यज्ञ में आप पधारें॥१॥
हे अग्निदेव ऐसा न कोई देव है, न ही कोई मनुष्य, जो आपके द्वारा सम्पादित महान् कर्म को कर सके। ऐसे समर्थ आप मरुद्गणों के साथ इस यज्ञ में पधारें॥२॥
जो मरुद्गण पृथ्वी पर श्रेष्ठ जल वृष्टि करने की (विधि जानते हैं या) क्षमता से सम्पन्न हैं । हे अग्निदेव ! आप उन द्रोहरहित मरुद्गणों के साथ इस यज्ञ में पधारें॥३॥
हे अग्निदेव ! जो अति बलशाली, अजेय और अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य के सदृश प्रकाशक हैं । आप उन मरुद्गणों के साथ यहाँ पधारें॥४॥
जो शुभ्र तेजों से युक्त, तीक्ष्ण, वेधक रूप वाले, श्रेष्ठ बल - सम्पन्न और शत्रु का संहार करने वाले हैं। हे अग्निदेव ! आप उन मरुतों के साथ यहाँ पधारें॥५॥
हे अग्निदेव ! ये जो मरुद्गण सबके ऊपर अधिष्ठित, प्रकाशक, द्युलोक के निवासी हैं, आप उन मरुद्गणों के साथ पधारें॥६॥
हे अग्निदेव ! जो पर्वत सदृश विशाल मेघों को एक स्थान से सुदूरस्थ दूसरे स्थान पर ले जाते हैं तथा जो शान्त समुद्रों में भी ज्वार पैदा कर देते हैं (हलचल पैदा कर देते हैं), ऐसे उन मरुद्गणों के साथ आप यज्ञ में पधारें॥७॥
हे अग्निदेव ! जो सूर्य की रश्मियों के साथ संव्याप्त होकर समुद्र को अपने ओज से प्रभावित करते हैं, उन मरुतों के साथ आप यहाँ पधारें॥८॥
हे अग्निदेव ! सर्वप्रथम आपके सेवनार्थ यह मधुर सोमरस हम अर्पित करते हैं, अत: आप मरुतों के साथ यहाँ पधारें॥९॥

सूक्त - २०

ऋभुदेवों के निमित्त ज्ञानियों ने अपने मुख से इन रमणीय स्तोत्रों की रचना की तथा उनका पाठ किया॥१॥
जिन ऋभुदेवों ने अतिकुशलतापूर्वक इन्द्रदेव के लिए वचन मात्र से नियोजित होकर चलने वाले अश्वों की रचना की, वे शमी आदि (यज्ञ पात्र अथवा पाप शमन करने वाले देवों) के साथ यज्ञ में सुशोभित होते हैं॥२॥
उन ऋभुदेवों ने अश्विनीकुमारों के लिए अति सुखप्रद, सर्वत्र गमनशील रथ का निर्माण किया और गौओं को उत्तम दूध देने वालीं बनाया॥३॥
अमोघ मन्त्र सामर्थ्य से युक्त, सर्वत्र व्याप्त रहने वाले ऋभुदेवों ने माता-पिता में स्नेहभाव संचरित कर उन्हें पुन: जवान बनाया॥४॥
हे ऋभुदेवो ! यह हर्षप्रद सोमरस इन्द्रदेव, मरुतों और दीप्तिमान् आदित्यों के साथ आपको अर्पित किया जाता है॥५॥
त्वष्टादेव के द्वारा एक ही चमस तैयार किया गया था, ऋभुदेवों ने उसे चार प्रकार का बनाकर प्रयुक्त किया॥६॥
वे उत्तम स्तुतियों से प्रशंसित होने वाले ऋभुदेव ! सोमयाग करने वाले प्रत्येक याजक को तीनों कोटि के सप्तरलों अर्थात् इक्कीस प्रकार के रलों (विशिष्ट यज्ञ कर्मों) को प्रदान करें । (यज्ञ के तीन विभाग हैं- हविर्यज्ञ, पाकयज्ञ एवं सोमयज्ञ । तीनों के सात-सात प्रकार हैं । इस प्रकार यज्ञ के इक्कीस प्रकार कहे गये हैं )॥७॥
तेजस्वी ऋभुदेवों ने अपने उत्तम कर्मों से देवों के स्थान पर अधिष्ठित होकर यज्ञ के भाग को धारण कर उसका सेवन किया॥८॥

सूक्त - २१

इस यज्ञ स्थल पर हम इन्द्र एवं अग्निदेवों का आवाहन करते हैं, सोमपान के उन अभिलाषियों की स्तुति करते हुए सोमरस पीने का निवेदन करते हैं॥१॥
हे ऋत्विजों ! आप यज्ञानुष्ठान करते हुए इन्द्र एवं अग्निदेवों की शस्त्रों (स्तोत्र) से स्तुति करें, विविध अलंकारों से उन्हें विभूषित करें तथा गायत्री छन्दवाले सामगान (गायत्र साम) करते हुए उन्हें प्रसन्न करें॥२॥
सोमपान की इच्छा करने वाले मित्रता एवं प्रशंसा के योग्य उन इन्द्र एवं अग्निदेवों को हम सोमरस पीने के लिए बुलाते हैं॥३॥
अति उग्र देवगण इन्द्र एवं अग्निदेवों को सोम के अभिषव स्थान (यज्ञस्थल) पर आमन्त्रित करते हैं, वे यहाँ पधारें॥४॥
देवों में महान् वे इन्द्र-अग्निदेव सत्पुरुषों के स्वामी (रक्षकहैं। वे राक्षसों को वशीभूत कर सरल स्वभाव वाला बनाएँ और मनुष्य भक्षक राक्षसों को मित्र- बांधवों से रहित करके निर्बल बनाएँ॥५॥
हे इन्द्राग्ने ! सत्य और चैतन्यरूप यज्ञस्थान पर आप संरक्षक के रूप में जागते रहें और हमें सुख प्रदान करें॥६॥

सूक्त - २२

(हे अध्वर्युगण !) प्रात:काल चेतनता को प्राप्त होने वाले अश्विनीकुमारों को जगायें । वे हमारे इस यज्ञ में सोमपान करने के निमित्त पधारें॥१॥
ये दोनों अश्विनीकुमार सुसज्जित रथों से युक्त महान् रथी हैं । ये आकाश में गमन करते हैं। इन दोनों का हम आवाहन करते हैं॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपकी जो मधुर सत्यवचन युक्त कशा (चाबुक-वाणी) है, उससे यज्ञ को सिंचित करने की कृपा करें॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप रथ पर आरूढ़ होकर जिस मार्ग से जाते हैं, वहाँ से सोमयाग करने वाले याजक का घर दूर नहीं है॥४॥
यजमान को (प्रकाश-ऊर्जा आदि) देने वाले हिरण्यगर्भ (हाथ में सुवर्ण धारण करने वाले या सुनहरी किरणों वाले) सवितादेव का हम अपनी रक्षा के लिये आवाहन करते हैं। वे ही यजमान के द्वारा प्राप्तव्य (गन्तव्य) स्थान को विज्ञापित (प्रकाशित करने वाले हैं॥५॥
हे ऋत्विज् ! आप हमारी रक्षा के लिये सवितादेवता की स्तुति करें। हम उनके लिए सोमयागादि कर्म सम्पन्न करना चाहते हैं । वे सवितादेव जलों को सुखाकर पुनः सहस्रों गुना बरसाने वाले हैं॥६॥
समस्त प्राणियों के आश्रयभूत, विविध धनों के प्रदाता, मानवमात्र के प्रकाशक सूर्यदेव को हम आवाहन करते हैं॥७॥
हे मित्रो ! हम सब बैठकर सवितादेव की स्तुति करें। धन-ऐश्वर्य के दाता सूर्यदेव अत्यन्त शोभायमान हैं॥८॥
हे अग्निदेव ! यहाँ आने की अभिलाषा रखने वाली देवों की पत्नियों को यहाँ ले आएँ और त्वष्टादेव को भी सोमपान के निमित्त बुलाएँ॥९॥
हे अग्निदेव ! देवपत्नियों को हमारी सुरक्षा के निमित्त यहाँ ले आएँ । आप हमारी रक्षा के लिए अग्निपत्नी होत्रा, आदित्यपली भारती, वरणीय वाग्देवी धिषणा आदि देवियों को भी यहाँ ले आएँ॥१०॥
अनवरुद्ध मार्ग वाली देव-पलियाँ मनुष्यों को ऐश्वर्य देने में समर्थ हैं । वे महान् सुखों एवं रक्षण सामथ्र्यो से युक्त होकर हमारी ओर अभिमुख हों॥११॥
अपने कल्याण के लिए एवं सोमपान के लिए हम इन्द्राणी, वरुणपत्नी ( वरुणानी) और अग्निपत्नी (अग्नायी) का आवाहन करते हैं॥१२॥
अति विस्तारयुक्त पृथ्वी और द्युलोक हमारे इस यज्ञकर्म को अपने-अपने अंशों द्वारा परिपूर्ण करें । वे भरण-पोषण करने वाली सामग्रियों (सुख - साधनों) से हम सभी को तृप्त करें॥१३॥
गंधर्वलोक के ध्रुव स्थान में - आकाश और पृथ्वी के मध्य में अवस्थित घृत के समान ( सार रूप) जलों (पोषक प्रवाहों) को ज्ञानी जन अपने विवेकयुक्त कर्मों ( प्रयासों ) द्वारा प्राप्त करते हैं॥१४॥
हे पृथिवी देवि ! आप सुख देने वाली, बाधा हरने वाली और उत्तमवास देने वाली हैं। आप हमें विपुल परिमाण में सुख प्रदान करें॥१५॥
जहाँ से (यज्ञ स्थल अथवा पृथ्वी से) विष्णुदेव ने ( पोषण परक) पराक्रम दिखाया, वहाँ ( उस यज्ञीय क्रम में) पृथ्वी के सप्तधामों से देवतागण हमारी रक्षा करें॥१६॥
यह सब विष्णुदेव की पराक्रम है, तीन प्रकार के (त्रिविध-त्रियाम) उनके चरण हैं । इसका मर्म धूलि भरे प्रदेश में निहित है॥१७॥
विश्वरक्षक, अविनाशी विष्णुदेव तीनों लोकों में यज्ञादि कर्मों को पोषित करते हुए तीन चरणों से जगत् में व्याप्त हैं अर्थात् तीन शक्ति धाराओं (सृजन, पोषण और परिवर्तन) द्वारा विश्व का संचालन करते हैं॥१८॥
हे याजको ! सर्वव्यापक भगवान् विष्णु के सृष्टि संचालन सम्बन्धी कार्यों को ( प्रजनन, पोषण और परिवर्तन की प्रक्रिया को) ध्यान से देखो। इसमें अनेकानेक व्रतों (नियमों - अनुशासनों) का दर्शन किया जा सकता है। इन्द्र (आत्मा) के योग्य मित्र उस परम सत्ता के अनुकूल बनकर रहें ( ईश्वरीय अनुशासनों का पालन करें)॥१९॥
जिस प्रकार सामान्य नेत्रों से आकाश में स्थित सूर्यदेव को सहजता से देखा जाता है, उसी प्रकार विद्वज्जन अपने ज्ञान-चक्षुओं से विष्णुदेव के (देवत्व के परमपद को) श्रेष्ठ स्थान को देखते (प्राप्त करते हैं॥२०॥
जागरूक विद्वान् स्तोतागण विष्णुदेव के उस परमपद को प्रकाशित करते हैं । (अर्थात् जन सामान्य के लिए प्रकट करते है)॥२१॥

सूक्त - २३

हे वायुदेव ! अभिषुत सोमरस तीखा होने से दुग्ध मिश्रित करके तैयार किया गया है, आप आएँ और उत्तर वेदी के पास लाये गये इस सोमरस का पान करें॥१॥
जिनका यश दिव्यलोक तक विस्तृत है, ऐसे इन्द्र और वायु देवों को हम सोमरस पीने के लिए आमंत्रित करते हैं॥२॥
मन के तुल्य वेग वाले, सहस्र चक्षु वाले, बुद्धि के अधीश्वर इन्द्र एवं वायु देवों का ज्ञानीजन अपनी सुरक्षा के लिए आवाहन करते हैं॥३॥
सोमरस पीने के लिए यज्ञस्थल पर प्रकट होने वाले परमपवित्र एवं बलशाली मित्र और वरुणदेवों का हम आवाहन करते हैं॥४॥
सत्यमार्ग पर चलने वालों का उत्साह बढ़ाने वाले, तेजस्वी मित्रावरुणों का हम आवाहन करते हैं॥५॥
वरुण एवं मित्र देवता अपने समस्त रक्षा साधनों से हम सबकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं। वे हमें महान् वैभव सम्पन्न करें॥६॥
मरुद्गणों के सहित इन्द्रदेव को सोमरस पान के निमित्त बुलाते हैं । वे मरुद्गणों के साथ आकर तृप्त हों॥७॥
दानी पूषादेव के समान इन्द्रदेव दान देने में श्रेष्ठ हैं। वे सब मरुद्गणों के साथ हमारे आवाहन को सुनें॥८॥
हे उत्तम दानदाता मरुतो ! आप अपने उत्तम साथी और बलवान् इन्द्रदेव के साथ दुष्टों का हनन करें । दुष्टता हमारा अतिक्रमण न कर सके॥९॥
सभी मरुद्गणों को हम सोमपान के निमित्त बुलाते हैं। वे सभी अनेक रंगों वाली पृथ्वी के पुत्र महान् वीर एवं पराक्रमी हैं॥१०॥
वेग से प्रवाहित होने वाले मरुतों का शब्द विजयनाद के सदृश गुंजित होता है, उससे सभी मनुष्यों का मंगल होता है॥११॥
चमकने वाली विद्युत् से उत्पन्न हुए मरुद्गण हमारी रक्षा करें और प्रसन्नता प्रदान करें॥१२॥
हे दीप्तिमान् पूषादेव आप अद्भुत तेजों से युक्त एवं धारण - शक्ति से सम्पन्न हैं । अतः सोम को द्युलोक से वैसे हीं लाएँ, जैसे खोये हुए पशु को ढूंढकर लाते हैं॥१३॥
दीप्तिमान् पूषादेव ने अंतरिक्ष गुहा में छिपे हुए शुभ्र तेजों से युक्त सोमराजा को प्राप्त किया॥१४॥
वे पूषादेव हमारे लिए, याग के हेतुभूत सोमों के साथ वसंतादि घट्ऋतुओं को क्रमश: वैसे ही प्राप्त कराते हैं, जैसे यवों ( अनाजों) के लिए कृषक बार-बार खेत जोतता है॥१५॥
यज्ञ की इच्छा करने वालों के सहायक, मधुर रसरूप जल - प्रवाह, माताओं के सदृश पुष्टिप्रद हैं। वे दुग्ध को पुष्ट करते हुए यज्ञमार्ग से गमन करते हैं॥१६॥
जो ये जल सूर्य में (सूर्य किरणों में ) समाहित हैं अथवा जिन जलों के साथ सूर्य का सानिध्य है, ऐसे वे पवित्र जल हमारे यज्ञ को उपलब्ध हों॥१७॥
हमारी गायें जिस जल का सेवन करती हैं, उन जलों को हम स्तुतिगान करते हैं । (अन्तरिक्ष एवं भूमि पर) प्रवहमान उन जलों के निमित्त हम हवि अर्पित करते हैं॥१८॥
जल में अमृतोपम गुण हैं, जल में औषधीय गुण है । हे देवो ! ऐसे जल की प्रशंसा से आप उत्साह प्राप्त करें॥१९॥
मुझ (मंत्र द्रष्टा मुनि) से सोमदेव ने कहा है कि जल समूह में सभी ओषधियाँ समाहित हैं। जल में ही सर्व सुख प्रदायक अग्नितत्त्व समाहित है। सभी ओषधियाँ जलों से ही प्राप्त होती हैं॥२०॥
हे जल समूह ! जीवन रक्षक ओषधियों को हमारे शरीर में स्थित करें, जिससे हम नीरोग होकर चिरकाल तक सूर्यदेव का दर्शन करते रहें॥२१॥
हे जल देवो ! हम याजकों ने अज्ञानवश जो दुष्कृत्य किये हों, जान-बूझकर किसी से द्रोह किया हो, सत्पुरुषों पर आक्रोश किया है। या असत्य आचरण किया हो तथा इस प्रकार के मारे जो भी दोष हों, उन सबको बहाकर दूर करें॥२२॥
आज हमने जल में प्रविष्ट होकर अवभृथ स्नान किया है, इस प्रकार जल में प्रवेश करके हम रस से आप्लावित हुए हैं। हे पयस्वान् ! हे अग्निदेव ! आप हमें वर्चस्वी बनाएँ, हम आपका स्वागत करते हैं॥२३॥
हे अग्निदेव ! आप हमें तेजस्विता प्रदान करें । हमें प्रजा और दीर्घ आयु से युक्त करें । देवगण हमारे अनुष्ठान को जानें और इन्द्रदेव ऋषियों के साथ इसे जानें॥२४॥

सूक्त - २४

हम अमर देवों में से किस देव के सुन्दर नाम का स्मरण करें ? कौन से देव हमें महती अदिति - पृथिवी को प्राप्त करायेंगे ? जिससे हम अपने पिता और माता को देख सकेंगे॥१॥
हम अमर देवों में प्रथम अग्निदेव के सुन्दर नाम का मनन करें । वह हमें महती अदिति को प्राप्त करायेंगे, जिससे हम अपने माता-पिता को देख सकेंगे॥२॥
हे सर्वदा रक्षणशील सवितादेव ! आप वरण करने योग्य धनों के स्वामी हैं, अत: हम आपसे ऐश्वर्यों के उत्तम भाग को माँगते हैं॥३॥
हे सवितादेव ! आप तेजस्विता युक्त, निन्दा रहित, द्वेष रहित, वरण करने योग्य धनों को दोनों हाथों से धारण करने वाले हैं॥४॥
हे सवितादेव ! हम आपके ऐश्वर्य की छाया में रहकर संरक्षण को प्राप्त करें। उन्नति करते हुए सफलताओं के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचकर भी अपने कर्तव्यों को पूरा करते रहें॥५॥
हे वरुणदेव ! ये उड़ने वाले पक्षी आपके पराक्रम, आपके बल और सुनीति युक्त क्रोध (मन्यु) को नहीं जान पाते । सतत गमनशील जलप्रवाह आपकी गति को नहीं जान सकते और प्रबल वायु के वेग भी आपको नहीं रोक सकते॥६॥
पवित्र पराक्रम युक्त राजा वरुण (सबको आच्छादित करने वाले) दिव्य तेज पुञ्ज (सूर्यदेव) को, आधारहित आकाश में धारण करते हैं । इस तेज पुञ्ज (सूर्यदेव) का मुख नीचे की ओर और मूल ऊपर की ओर है। इसके मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं॥७॥
राजा वरुणदेव ने सूर्यगमन के लिए विस्तृत मार्ग निर्धारित किया है, जहाँ पैर भी स्थापित न हो, वे ऐसे अन्तरिक्ष स्थान पर भी चलने के लिए मार्ग विनिर्मित कर देते हैं और वे हृदय की पीड़ा का निवारण करने वाले हैं॥८॥
हे वरुणदेव ! आपके पास असंख्य उपाय हैं। आपकी उत्तम बुद्धि अत्यन्त व्यापक और गम्भीर है। आप हमारी पाप वृत्तियों को हमसे दूर करें । किये हुए पापों से हमें विमुक्त करें॥९॥
ये नक्षत्रगण आकाश में रात्रि के समय दीखते हैं, परन्तु ये दिन में कहाँ विलीन होते हैं ? विशेष प्रकाशित चन्द्रमा रात्रि में आता है । वरुणराजा के ये नियम कभी नष्ट नहीं होते॥१०॥
हे वरुणदेव ! मन्त्ररूप वाणी से आपकी स्तुति करते हुए आपसे याचना करते हैं। यजमान हविष्यान्न अर्पित करते हुए कहते हैं - हे बहु प्रशंसित देव ! हमारी उपेक्षा न करें, हमारी स्तुतियों को जानें । हमारी आयु को क्षीण न करें॥११॥
रात-दिन में (अनवरत) ज्ञानियों के कहे अनुसार यही ज्ञान (चिन्तन) हमारे हृदय में होता रहा है कि बन्धन में पड़े शुन:शेप ने जिस वरुणदेव को बुलाकर मुक्ति को प्राप्त किया, वहीं वरुणदेव हमें भी बन्धनों से मुक्त करें॥१२॥
तीन स्तम्भों में बँधे हुए शुन:शेप ने अदिति पुत्र वरुणेदव का आवाहन करके उनसे निवेदन किया कि वे ज्ञानी और अटल वरुणदेव हमारे पाशों को काटकर हमें मुक्त करें॥१३॥
हे वरुणदेव ! आपके क्रोध को शान्त करने के लिए हम स्तुति रूप वचनों को सुनाते हैं। विर्द्रव्यों के द्वारा यज्ञ में सन्तुष्ट होकर हे प्रखर बुद्धि वाले राजन् ! आप हमारे यहाँ वास करते हुए हमें पापों के बन्धन से मुक्त करें॥१४॥
हे वरुणदेव ! आप तीनों तापों रूपी बन्धनों से हमें मुक्त करें । आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाश हमसे दूर हों तथा मध्य के एवं नीचे के बन्धन अलग करें । हे सूर्य पुत्र ! पापों से रहित होकर हम आपके कर्मफल सिद्धान्त में अनुशासित हों, दयनीय स्थिति में हम न रहें॥१५॥

सूक्त - २५

हे वरुणदेव ! जैसे अन्य मनुष्य आपके व्रत-अनुष्ठान में प्रमाद करते हैं, वैसे ही हमसे भी आपके नियमों आदि में कभी-कभी प्रमाद हो जाता है । (कृपया इसे क्षमा करें )॥१॥
हे वरुणदेव ! आप अपने निरादर करने वाले का वध करने के लिए धारण किये गये शस्त्र के सम्मुख हमें प्रस्तुत न करें । अपनी क्रुद्ध अवस्था में भी हम पर कृपा करके क्रोध न करें॥२॥
हे वरुणदेव ! जिस प्रकार रथी वीर अपने थके घोड़ों की परिचर्या करते हैं, उसी प्रकार आपके मन को हर्षित करने के लिए हम स्तुतियों का गान करते हैं॥३॥
(हे वरुणदेव !) जिस प्रकार पक्षी अपने घोसलों की ओर दौड़ते हुए गमन करते हैं, उसी प्रकार हमारी चंचल बुद्धियाँ धन प्राप्ति के लिए दूर-दूर दौड़ती हैं॥४॥
बल-ऐश्वर्य के अधिपति सर्वद्रष्टा वरुणदेव को कल्याण के निमित्त हम यहाँ (यज्ञस्थल में ) कब बुलायेंगे ? (अर्थात् यह अवसर कब मिलेगा ?)॥५॥
व्रत धारण करने वाले (हविष्यान्न) दाता यजमान के मंगल के निमित्त ये मित्र और वरुण देव हविष्यान्न की इच्छा करते हैं, वे कभी उसका त्याग नहीं करते । वे हमें बन्धन से मुक्त करें॥६॥
हे वरुणदेव ! अन्तरिक्ष में उड़ने वाले पक्षियों के मार्ग को और समुद्र में संचार करने वाली नौकाओं के मार्ग को भी आप जानते हैं॥७॥
नियमधारक वरुणदेव प्रजा के उपयोगी बारह महीमों को जानते हैं और तेरहवें माह (अधिक मास) को भी जानते हैं॥८॥
वे वरुणदेव अत्यन्त विस्तृत, दर्शनीय और अधिक गुणवान् वायु के मार्ग को जानते हैं। वे ऊपर द्युलोक में रहने वाले देवों को भी जानते हैं॥९॥
प्रकृति के नियमों का विधिवत् पालन कराने वाले, श्रेष्ठ कर्मों में सदैव निरत रहने वाले वरुणदेव प्रजाओं में साम्राज्य स्थापित करने के लिए बैठते हैं॥१०॥
सब अद्भुत कर्मों की क्रिया-विधि जानने वाले वरुणदेव, जो कर्म सम्पादित हो चुके हैं और जो किये जाने हैं, उन सबको भली-भाँति देखते हैं॥११॥
वे उत्तम कर्मशील अदिति पुत्र वरुणदेव हमें सदा श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी आयु को बढ़ाएँ॥१२॥
सुवर्णमय कवच धारण करके वरुणदेव अपने हृष्ट-पुष्ट शरीर को सुसज्जित करते हैं। शुभ्र प्रकाश किरणें उनके चारों ओर विस्तीर्ण होती हैं॥१३॥
हिंसा करने की इच्छा वाले शत्रु-जन(भयाक्रान्त होकर ) जिनकी हिंसा नहीं कर पाते, लोगों के प्रति द्वेष रखने वाले, जिनसे द्वेष नहीं कर पाते- ऐसे (वरुणो देव को पापीजन स्पर्श तक नहीं कर पाते॥१४॥
जिन वरुणदेव ने मनुष्यों के लिए विपुल अन्न - भंडार उत्पन्न किया है, उन्होंने ही हमारे उदर में पाचन सामर्थ्य भी स्थापित की है॥१५॥
उस सर्वद्रष्टा वरुणदेव की कामना करने वाली हमारी बुद्धियाँ, वैसे ही उन तक पहुँचती हैं, जैसे गौएँ गोष्ठ । (बाड़े) की ओर जाती हैं॥१६॥
होता (अग्निदेव) के समान हमारे द्वारा लाकर समर्पित की गई हवियों का आप अग्निदेव के समान भक्षण करें, फिर हम दोनों वार्ता करेंगे॥१७॥
दर्शन योग्य वरुणदेव को उनके रथ के साथ हमने भूमि पर देखा है । उन्होंने हमारी स्तुतियाँ स्वीकारी हैं॥१८॥
हे वरुणदेव ! आप हमारी प्रार्थना पर ध्यान दें, हमें सुखी बनायें । अपनी रक्षा के लिए हम आपकी स्तुति करते हैं॥१९॥
हे मेधावीं वरुणदेव ! आप द्युलोक, भूलोक और सारे विश्वपर आधिपत्य रखते हैं, आप हमारे आवाहन को स्वीकार कर 'हम रक्षा करेंगे- ऐसा प्रत्युत्तर प्रदान करें॥२०॥
हे वरुणदेव ! हमारे उत्तम (ऊपर के) पाश को खोल दें, हमारे मध्यम पाश को काट दें और हमारे नीचे के पाश को हटाकर हमें उत्तम जीवन प्रदान करें॥२१॥

सूक्त - २६

हे यज्ञ योग्य, (हवियोग्य) अन्नों के पालक अग्निदेव ! आप अपने तेज़रूप वस्त्रों को पहनकर हमारे यज्ञ को सम्पादित करें॥१॥
सदा तरुण रहने वाले हे अग्निदेव ! आप सर्वोत्तम होता (यज्ञ सम्पन्न कर्ता) के रूप में यज्ञकुण्ड में स्थापित होकर यजमान के स्तुति वचनों का श्रवण करें॥२॥
हे वरण करने योग्य अग्निदेव ! जैसे पिता अपने पुत्र के, भाई अपने भाई के और मित्र अपने मित्र के सहायक होते हैं, वैसे ही आप हमारी सहायता करें॥३॥
जिस प्रकार प्रजापति के यज्ञ में “मनु” आकर शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार शत्रुनाशक वरुणदेव, मित्र- देव एवं अर्यमादेव हमारे यज्ञ में आकर विराजमान हों॥४॥
पुरातन होता हे अग्निदेव ! आप हमारे इस यज्ञ से और हमारे मित्रभाव से प्रसन्न हों और हमारी स्तुतियों को भली प्रकार सुनें॥५॥
हे अग्निदेव ! इन्द्र, वरुण आदि अन्य देवताओं के लिए प्रतिदिन विस्तृत आहुतियाँ अर्पित करने पर भी सभी हविष्यान्न आपको ही प्राप्त होते हैं॥६॥
यज्ञ सम्पन्न करने वाले प्रज्ञापालक, आनन्दवर्धक, वरण करने योग्य हे अग्निदेव ! आप हमें प्रिय हों तथा श्रेष्ठ विधि से यज्ञाग्नि की रक्षा करते हुए हम सदैव आपके प्रिय रहें॥७॥
उत्तम अग्नि से युक्त होकर देदीप्यमान विजों ने हमारे लिए ऐश्वर्य को धारण किया है, वैसे ही हम उत्तम अग्नि से युक्त होकर इनका (ऋत्विज् का ) स्मरण करते हैं॥८॥
अमरत्व को धारण करने वाले हे अग्निदेव ! आपके और हम मरणशील मनुष्यों के बीच स्नेहयुक्त, प्रशंसनीय वाणियों का आदान- प्रदान होता रहे॥९॥
बल के पुत्र (अरणि मन्थन रूप शक्ति से उत्पन्न) हे अग्निदेव ! आप (आहवनीयादि) अग्नियों के साथ यज्ञ में पधारें और स्तुतियों को सुनते हुए हमें अन्न (पोषण) प्रदान करें॥१०॥

सूक्त - २७

तमोनाशक, यज्ञों के सम्राट् स्वरूप हे अग्निदेव ! हम स्तुतियों के द्वारा आपकी वन्दना करते हैं। जिस प्रकार अश्व अपनी पूँछ के बालों से मक्खी - मच्छरों को दूर भगाता है, उसी प्रकार आप भी अपनी ज्वालाओं से हमारे विरोधियों को दूर भगायें॥१॥
हम इन अग्निदेव की उत्तम विधि से उपासना करते हैं। वे बल से उत्पन्न, शीघ्र गतिशील अग्निदेव हमें अभीष्ट सुखों को प्रदान करें॥२॥
हे अग्निदेव ! सब मनुष्यों के हितचिंतक आप दूर से और निकट से, अनिष्ट चिन्तकों से सदैव हमारी रक्षा करें॥३॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे गायत्री परक प्राण-पोषक स्तोत्रों एवं नवीन अन्न (हव्य) को देवों तक (देव वृत्तियों के पोषण हेतु) पहुँचायें॥४॥
हे अग्निदेव ! आप हमें श्रेष्ठ(आध्यात्मिक), मध्यम (आधिदैविक) एवं कनिष्ठ (आधिभौतिक) अर्थात् सभी प्रकार की धन-सम्पदा प्रदान करें॥५॥
सात ज्वालाओं से दीप्तिमान् हे अग्निदेव ! आप धनदायक हैं। नदी के पास आने वाली जल तरंगों के सदृश आप हविष्यान्न-दाता को तत्क्षण (श्रेष्ठ) कर्मफल प्रदान करते हैं॥६॥
हे अग्नि देव ! आप जीवन - संग्राम में जिस पुरुष को प्रेरित करते हैं, उनकी रक्षा आप स्वयं करते हैं। साथ ही उनके लिए पोषक अन्नों की पूर्ति भी करते हैं॥७॥
हे शत्रु विजेता अग्निदेव ! आपके उपासक को कोई पराजित नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी (आपके द्वारा प्रदत्त) तेजस्विता प्रसिद्ध है॥८॥
सब मनुष्यों के कल्याणकारक वे अग्निदेव जीवन - संग्राम में अश्व रूपी इन्द्रियों द्वारा विजयी बनाने वाले हों । मेधावीं पुरुषों द्वारा प्रशंसित वे अग्निदेव हमें अभीष्ट फल प्रदान करें॥९॥
स्तुतियों से देवों को प्रबोधित करने वाले हे अग्निदेव ! ये यजमान, पुनीत यज्ञ स्थल पर दुष्टता विनाश हेतु आपका आवाहन करते हैं॥१०॥
अपरिमित धूम-ध्वजा से युक्त, आनन्दप्रद, महान् वे अग्निदेव हमें ज्ञान और वैभव की ओर प्रेरित करें॥११॥
विश्वपालक, अत्यन्त तेजस्वी और ध्वजा सदृश गुणों से युक्त दूरदर्शी वे अग्निदेव वैभवशाली राजा के समान हमारी स्तवन रूपी वाणियों को ग्रहण करें॥१२॥
बड़ों, छोटों, युवकों और वृद्धों को हम नमस्कार करते हैं। सामर्थ्य के अनुसार हम देवों का यजन करें। हे देवो ! अपने से बड़ों के सम्मान में हमारे द्वारा कोई त्रुटि न हो॥१३॥

सूक्त - २८

हे इन्द्रदेव ! जहाँ (सोमवल्ली) कूटने के लिए बड़ा मूसल उठाया जाता है (अर्थात् सोमरस तैयार किया जाता है), वहाँ ( यज्ञशाला में ) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! जहाँ दो जंधाओं के समान विस्तृत, सोम कूटने के दो फलक रखे हैं, वहाँ ( यज्ञशाला में) उलूखल से निष्पन्न सोम का पान करें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! जहाँ गृहिणी सोमरस तैयार करने के लिए कूटने (मूसल चलाने) का अभ्यास करती है, वहाँ ( यज्ञशाला में ) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! जहाँ सारथी द्वारा घोड़े को लगाम लगाने के समान (मथानी को) रस्सी से बाँधकर मन्थन करते हैं, वहाँ ( यज्ञशाला में ) उलूखल से निष्पन्न हुए सोमरस का पान करें॥४॥
हे उलूखल ! यद्यपि घर-घर में तुमसे काम लिया जाता है, फिर भी हमारे घर में विजय-दुन्दुभि के समान उच्च शब्द करो॥५॥
हे उलूखल- मूसल रूप वनस्पते ! तुम्हारे सामने वायु विशेष गति से बहती है । हे उलूखल ! अब इन्द्रदेव के सेवनार्थ सोमरस का निष्पादन करो॥६॥
यज्ञ के साधन रूप पूजन-योग्य वे उलूखल और मूसल दोनों, अन्न (चने) खाते हुए इन्द्रदेव के दोनों अश्वों के समान उच्च स्वर से शब्द करते हैं॥७॥
दर्शनीय उलूखल एवं मूसल रूप हे वनस्पते ! आप दोनों सोमयाग करने वालों के साथ इन्द्रदेव के लिए मधुर सोमरस का निष्पादन करें॥८॥
उलूखले और मूसल द्वारा निष्पादित सोम को पात्र से निकालकर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और अवशिष्ट को छानने के लिए पवित्र चर्म पर रखें॥९॥

सूक्त - २९

हे सत्य स्वरूप सोमपायी इन्द्रदेव ! यद्यपि हम प्रशंसा पाने के पात्र तो नहीं हैं, तथापि हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों श्रेष्ठ गौएँ और घोड़े प्रदान करके सम्पन्न बनायें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप शक्तिशाली, शिरस्त्राण धारण करने वाले, बलों के अधीश्वर और ऐश्वर्यशाली हैं। आपका सदैव हम पर अनुग्रह बना रहे॥२॥
हे इन्द्रदेव ! दोनों दुर्गतियाँ (विपत्ति और दरिद्रता) परस्पर एक दूसरे को देखती हुई सो जायें । वे कभी न जागें, वे अचेत पड़ी रहें । हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों श्रेष्ठ गौएँ और अश्व प्रदान करके सम्पन्न बनायें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे शत्रु सोते रहें और हमारे वीर मित्र जागते रहें । हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों श्रेष्ठ गौएँ और अश्व प्रदान करके सम्पन्न बनायें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! कपटपूर्ण वाणी बोलने वाले शत्रु रूप गधे को मार डालें । हे ऐश्वर्यशालिन् इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों पुष्ट गौएँ और अश्व देकर सम्पन्न बनायें॥५॥
है इन्द्रदेव ! विध्वंसकारी बवंडर वनों से दूर जाकर गिरें । हे ऐश्वर्यशालिन् इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों पुष्ट गौएँ और अश्व देकर सम्पन्न बनायें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! हम पर आक्रोश करने वाले सब शत्रुओं को विनष्ट करें । हिंसकों का नाश करें । हे ऐश्वर्यशालिन् इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों पुष्ट गौएँ और अश्व देकर सम्पन्न बनायें॥७॥

सूक्त - ३०

जिस प्रकार अन्न की इच्छा वाले, खेत में पानी सींचते हैं, उसी तरह हम बल की कामना वाले साधक उन महान् इन्द्रदेव को सोमरस से सींचते हैं॥१॥
नीचे की ओर जाने वाले जल के समान सैकड़ों कलश सोमरस, सहस्रों कलश दूध में मिश्रित होकर इन्द्रदेव को प्राप्त होता है॥२॥
समुद्र में एकत्र हुए जल के सदृश सोमरस इन्द्रदेव के पेट में एकत्र होकर उन्हें हर्ष प्रदान करता है॥३॥
हे इन्द्रदेव ! कपोत जिस स्नेह के साथ गर्भवती कपोती के पास रहता है, उसी प्रकार (स्नेहपूर्वक) यह सोमरस भआपके लिये प्रस्तुत है । आप हमारे निवेदन को स्वीकार करें॥४॥
जो (स्तोतागण), हे इन्द्र ! हे धनाधिपति ! हे स्तुतियों के आश्रयभूत ! हे वीर ! (इत्यादि) स्तुतियाँ करते हैं, उनके लिये आपकी विभूतियाँ प्रिय एवं सत्य सिद्ध हों॥५॥
सैकड़ों यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यों को सम्पन्न करने वाले है इन्द्रदेव ! संघर्षों (जीवन - संग्राम में हमारे संरक्षण के लिये आप प्रयत्नशील रहें । हम आप से अन्य (श्रेष्ठ) कार्यों के विषय में भी परस्पर विचार-विनिमय करते रहें॥६॥
सत्कर्मों के शुभारम्भ में एवं हर प्रकार के संग्राम में बलशाली इन्द्रदेव का हम अपने संरक्षण के लिये मित्रवत् आवाहन करते हैं॥७॥
हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर वे इन्द्रदेव निश्चित ही सहस्रों रक्षा - साधनों तथा अन्न, ऐश्वर्य आदि सहित हमारे पास आयेंगे॥८॥
हम सहायता के लिये स्वर्गधाम के वासी, बहुतों के पास पहुँचकर उन्हें नेतृत्व प्रदान करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं। हमारे पिता ने भी ऐसा ही किया था॥९॥
हे विश्ववरणीय इन्द्रदेव ! बहुतों द्वारा आवाहित किये जाने वाले आप स्तोताओं के आश्रय दाता और मित्र हैं। हम (ऋत्विग्गण) आप से उन (स्तोताओं) को अनुगृहीत करने की प्रार्थना करते हैं॥१०॥
हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव ! सोम पीने के योग्य हमारे प्रियजनों और मित्रजनों में आप ही श्रेष्ठ सामर्थ्य वाले हैं॥११॥
हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव ! हमारी इच्छा पूर्ण करें । हम इष्ट-प्राप्ति के निमित्त आपकी कामना करें और वह पूर्ण हो॥१२॥
जिन (इन्द्रदेव) की कृपा से हम धन-धान्य से परिपूर्ण होकर प्रफुल्लित होते हैं। उन इन्द्रदेव के प्रभाव से हमारी गौएँ (भी) प्रचुर मात्रा में दुग्ध-घृतादि देने की सामर्थ्य वाली हों॥१३॥
हे धैर्यशाली इन्द्रदेव ! आप कल्याणकारी बुद्धि से स्तुति करने वाले स्तोताओं को अभीष्ट पदार्थ अवश्य प्रदान करें । आषस्तोताओं को धन देने के लिए रथ के चक्रों को मिलाने वाली धुरी के समान ही सहायक हैं॥१४॥
है इन्द्रदेव ! आप स्तोताओं द्वारा इच्छित धन उन्हें प्रदान करें। जिस प्रकार रथ की गति से उसके अक्ष (धुरे के आधार) को भी गति मिलती है, उसी प्रकार स्तुतिकर्ताओं को धन की प्राप्ति हो॥१५॥
सदैव स्फूर्तिवान्, सदैव (शब्दवान् हिनहिनाते हुए तीव्र गतिशील अश्वों के द्वारा जो इन्द्रदेव शत्रुओं के धन को जीतते हैं, उन पराक्रमशील इन्द्रदेव ने अपने स्नेह से हमें सोने का रथ (अकूत-वैभव) दिया है॥१६॥
हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो ! आप बलशाली अश्वों के साथ अन्नों, गौओं और स्वर्णादि धनों को लेकर यहाँ पधारें॥१७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के लिए जुतने वाला एक ही रथ आकाश मार्ग से जाता है। उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता॥१८॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप के रथ (पोषण प्रक्रिया) का एक चक्र पृथ्वी के मूर्धा भाग में (पर्यावरण चक्र के रूप में) स्थित हैं और दूसरा चक्र द्युलोक में सर्वत्र गतिशील है॥१९॥
हे स्तुति-प्रिय, अमर, तेजोमयी उषे ! कौन मनुष्य आपका अनुदान प्राप्त करता है ? किसे आप प्राप्त होती हैं ? (अर्थात् प्राय: सभी मनुष्य आलस्यादि दोषों के कारण आप का लाभ पूर्णतया नहीं प्राप्त कर पाते )॥२०॥
हे अश्व (किरणों) युक्त चित्र-विचित्र प्रकाश वाली उषे ! हम दूर अथवा पास से आपकी महिमा समझने में समर्थ नहीं हैं॥२१॥
हे द्युलोक की पुत्री उषे ! आप उन (दिव्य) बलों के साथ यहाँ आयें और हमें उत्तम ऐश्वर्य धारण करायें॥२२॥

सूक्त - ३१

हे अग्निदेव ! आप सर्वप्रथम अंगिरा ऋषि के रूप में प्रकट हुए, तदनन्तर सर्वद्रष्टा, दिव्यतायुक्त, कल्याणकारी और देवों के सर्वश्रेष्ठ मित्र के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आप के व्रतानुशासन से मरुद्गण क्रान्तदश कर्मों के ज्ञाता और श्रेष्ठ तेज आयुधों से युक्त हुए हैं॥१॥
हे अग्निदेव ! आप अंगिराओं में आद्य और शिरोमणि हैं। आप देवताओं के नियमों को सुशोभित करते हैं। आप संसार में व्याप्त तथा दो माताओं वाले दो अरणियों से समुद्भूत होने से बुद्धिमान् हैं । आप मनुष्यों के हितार्थ सर्वत्र विद्यमान रहते हैं॥२॥
हे अग्निदेव! आप ज्योतिर्मय सूर्यदेव के पूर्व और वायु के भी पूर्व आविर्भूत हुए। आपके बल से आकाश और पृथ्वी काँप गये । होता रूप में वरण किये जाने पर आपने यज्ञ के कार्य का सम्पादन किया । देवों का यजनकार्य पूर्ण करने के लिए आप यज्ञ वेदी पर स्थापित हुए॥३॥
हे अग्निदेव! आप अत्यन्त श्रेष्ठ कर्म वाले हैं। आपने मनु और सुकर्मा-पुरूरवा को स्वर्ग के आशय से अवगत कराया। जब आप मातृ-पितृ रूप दो काष्ठों के मंथन से उत्पन्न हुए, तो सूर्यदेव की तरह पूर्व से पश्चिम तक व्याप्त हो गये॥४॥
हे अग्निदेव! आप बड़े बलिष्ठ और पुष्टिवर्धक हैं । हविदाता, सुवा हाथ में लिये स्तुति को उद्यत हैं, जो वषट्कार युक्त आहुति देता है, उस याजक को आप अग्रणी पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं॥५॥
हे विशिष्ट द्रष्टा अग्निदेव! आप पापकर्मयों का भी उद्धार करते हैं। बहुसंख्यक शत्रुओं का सब ओर से आक्रमण होने पर भी थोड़े से वीर पुरुषों को लेकर सब शत्रुओं को मार गिराते हैं॥६॥
हे अग्निदेव! आप अपने अनुचर मनुष्यों को दिन-प्रतिदिन अमरपद का अधिकारी बनाते हैं, जिसे पाने की उत्कट अभिलाषा देवगण और मनुष्य दोनों ही करते रहते हैं। वीर पुरुषों को अन्न और धन द्वारा सुखी बनाते हैं॥७॥
हे अग्निदेव! प्रशंसित होने वाले आप हमें धन प्राप्त करने की सामर्थ्य दें । हमें यशस्वी पुत्र प्रदान करें । नये उत्साह के साथ हम यज्ञादि कर्म करें । द्यावा, पृथिवी और देवगण हमारी सब प्रकार से रक्षा करें॥८॥
हे निर्दोष अग्निदेव! सब देवों में चैतन्य रूप आप हमारे मातृ-पितृ रूप (उत्पन्न करने वाले हैं। आप ने हमें बोध प्राप्त करने की सामर्थ्य दी, कर्म को प्रेरित करने वाली बुद्धि विकसित की । हे कल्याणरूप अग्निदेव ! हमें आप सम्पूर्ण ऐश्वर्य भी प्रदान करें॥९॥
हे अग्निदेव ! आप विशिष्ट बुद्धि-सम्पन्न, हमारे पिता रूप, आयु प्रदाता और बन्धु रूप हैं । आप उत्तमवीर, अटलगुण-सम्पन्न, नियम-पालक और असंख्यों धनों से सम्पन्न हैं॥१०॥
हे अग्निदेव ! देवताओं ने सर्वप्रथम आपको मनुष्यों के हित के लिये राजा रूप में स्थापित किया। तत्पश्चात् जब हमारे (हिरण्यस्तूप श्रेष) पिता अंगिरा ऋषि ने आपको पुत्र रूप में आविर्भूत किया, तब देवताओं ने मनु की पुत्री इळा को शासन-अनुशासन (धर्मोपदेश) कत्र बनाया॥११॥
हे अग्निदेव ! आप वन्दना के योग्य हैं। अपने रक्षण साधनों से धनयुक्त हमारी रक्षा करें । हमारी शारीरिक क्षमता को अपनी सामर्थ्य से पोषित करें । शीघ्रतापूर्वक संरक्षित करने वाले आप हमारे पुत्र-पौत्रादि और गवादि पशुओं के संरक्षक हों॥१२॥
हे अग्निदेव ! आप याजकों के पोषक हैं, जो सज्जन विदाता आपको श्रेष्ठ, पोषक हविष्यान्न देते हैं, आप उनकी सभी प्रकार से रक्षा करते हैं । आप साधकों (उपासकों) की स्तुति हृदय से स्वीकार करते हैं॥१३॥
हे अग्निदेव ! आप स्तुति करने वाले ऋत्विजोंं को धन प्रदान करते हैं। आप दुर्बलों को पिता रूप में पोषण देने वाले और अज्ञानी जनों को विशिष्ट ज्ञान प्रदान करने वाले मेधावी हैं॥१४॥
हे अग्निदेव ! आप पुरुषार्थी यजमानों की कवच के रूप में सुरक्षा करते हैं । जो अपने घर में मधुर हविष्यान्न देकर सुखप्रद यज्ञ करता है, वह घर स्वर्ग की उपमा के योग्य होता है॥१५॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ कर्म करते समय हुई हमारी भूलों को क्षमा करें, जो लोग यज्ञ मार्ग से भटक गये हैं, उन्हें भी क्षमा करें। आप सोमयाग करने वाले याजकों के बन्धु और पिता हैं। सद्बुद्धि प्रदान करने वाले और प्रष-कर्म के कुशल प्रणेता हैं॥१६॥
हे पवित्र अंगिरा अग्निदेव ! (अंगों में संव्याप्त अग्नि) आप मनु, अंगिरा (अषि), ययाति जैसे पुरुषों के साथ देवों को ले जाकर यज्ञ स्थल पर सुशोभित हों। उन्हें कुश के आसन पर प्रतिष्ठित करते हुए सम्मानित करें॥१७॥
हे अग्निदेव ! इन मंत्र रूप स्तुतियों से आप वृद्धि को प्राप्त करें। अपनी शक्ति या ज्ञान से हमने जो यजन किया है, उससे हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । बल बढ़ाने वाले अन्नों के साथ शुभ मति से हमें सम्पन्न करें॥१८॥

सूक्त - ३२

मेघों को विदीर्ण कर पानी बरसाने वाले, पर्वतीय नदियों के तटों को निर्मित करने वाले, वज्रधारी, पराक्रमी इन्द्रदेव के कार्य वर्णनीय हैं। उन्होंने जो प्रमुख वीरतापूर्ण कार्य किये, वे ये ही हैं॥१॥
इन्द्रदेव के लिये त्वष्टादेव ने शब्द चालित वज्र का निर्माण किया, उसी से इन्द्रदेव ने मेघों को विदीर्ण कर जल बरसाया। रंभाती हुई गौओं के समान वे जलप्रवाह वेग से समुद्र की ओर चले गये॥२॥
अतिबलशाली इन्द्रदेव ने सोम को ग्रहण किया । यज्ञ में तीन विशिष्ट पात्रों में अभिषव किये हुए सोम का पान किया। ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ने बाण और वज्र को धारण कर मेघों में प्रमुख मेघ को विदीर्ण किया॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने मेघों में प्रथम उत्पन्न मेघ को बेध दिया। मेघरूप में छाए धुन्ध (मायावियों ) को दूर किया, फिर आकाश में उषा और सूर्य को प्रकट किया। अब कोई भी अवरोधक शत्रु शेष न रहा॥४॥
इन्द्रदेव ने घातक दिव्य वज्र से वृत्रासुर का वध किया । वृक्ष की शाखाओं को कुल्हाड़े से काटने के समान उसकी भुजाओं को काटा और तने की तरह उसे काटकर भूमि पर गिरा दिया॥५॥
अपने को अप्रतिम योद्धा मानने वाले मिथ्या अभिमानी वृत्र ने महाबली, शत्रुबेधक, शत्रुनाशक इन्द्रदेव को ललकारा और इन्द्रदेव के आघातों को सहन न कर, गिरते हुए, नदियों के किनारों को तोड़ दिया॥६॥
हाथ और पाँव के कट जाने पर भी वृत्र ने इन्द्रदेव से युद्ध करने का प्रयास किया। इन्द्रदेव ने उसके पर्वत सदृश कन्धों पर वज्र का प्रहार किया। इतने पर भी वर्षा करने में समर्थ इन्द्रदेव के सम्मुख वह इटा रहा । अन्ततः इन्द्रदेव के आघातों से ध्वस्त होकर वह भूमि पर गिर पड़ा॥७॥
जैसे नदी की बाढ़ तटों को लाँघ जाती है, वैसे ही मन को प्रसन्न करने वाले जल (जल अवरोधक) वृत्र को लाँघ जाते हैं। जिन जलों को ‘वृत्र' ने अपने बल से आबद्ध किया था, उन्हीं के नीचे 'वृत्र' मृत्यु-शैय्या पर पड़ा सो रहा है॥८॥
वृत्र की माता झुककर वृत्र का संरक्षण करने लगीं, इन्द्रदेव के प्रहार से बचाव के लिये वह वृत्र पर सो गयी, फिर भी इन्द्रदेव ने नीचे से उस पर प्रहार किया। उस समय माता ऊपर और पुत्र नीचे था, जैसे गाये अपने बछड़े के साथ सोती है॥९॥
एक स्थान पर न रुकने वाले अविश्रान्त (मेघरूप) जल-प्रवाहों के मध्य वृत्र का अनाम शरीर छिपा रहता है। वह दीर्घ निद्रा में पड़ा रहता है, उसके ऊपर जल प्रवाह बना रहता हैं॥१०॥
‘पणि' नामक असुर ने जिस प्रकार गौओं अथवा किरणों को अवरुद्ध कर रखा था, उसी प्रकार जल-प्रवाहों को अगतिशील वृत्र ने रोक रखा था। वृत्र का वध करके वे प्रवाह खोल दिये गये॥११॥
हे इन्द्रदेव ! जब कुशल योद्धा वृत्र ने वज्र पर प्रहार किया, तब घोड़े की पूँछ हिलाने की तरह, बहुत आसानी से आपने अविचलित भाव से उसे दूर कर दिया। हे महाबली इन्द्रदेव ! सोम और गौओं को जीतकर अपने (वृत्र के अवरोध को नष्ट करके) गंगादि सातों सरिताओं को प्रवाहित किया॥१२॥
युद्ध में वृत्रद्वारा प्रेरित भीषण विद्युत्, भयंकर मेघ गर्जन, जल और हिम वर्षा भी इन्द्रदेव को नहीं रोक सके। वृत्र के प्रचण्ड घातक प्रयोग भी निरर्थक हुए। उस युद्ध में असुर के हर प्रहार को इन्द्रदेव ने निरस्त करके उसे जीत लिया॥१३॥
है इन्द्रदेव ! वृत्र का वध करते समय यदि आपके हृदय में भय उत्पन्न होता, तो किस दूसरे वीर को असुर वध के लिये देखते ?(अर्थात् कोई दूसरा न मिलता) । (ऐसा करके) आपने निन्यानवे (लगभग सम्पूर्ण) जल - प्रवाहों को बाज पक्षी की तरह सहज ही पार कर लिया॥१४॥
हाथों में वज्रधारण करने वाले इन्द्रदेव मनुष्य, पशु आदि सभी स्थावर-जंगम प्राणियों के राजा हैं । शान्त एवं क्रूर प्रकृति के सभी प्राणी उनके चारों ओर उसी प्रकार रहते हैं, जैसे चक्र की नेमि के चारों ओर उसके 'अरे होते हैं॥१५॥

सूक्त - ३३

गौओं को प्राप्त करने की कामना से युक्त मनुष्य इन्द्रदेव के पास जायें । ये अपराजेय इन्द्रदेव हमारे लिए गोरूप धनों को बढ़ाने की उत्तम बुद्धि देंगे । वे गौओं की प्राप्ति का उत्तम उपाय करेंगे॥१॥
श्येन पक्षी के वेगपूर्वक घोंसले में जाने के समान हम उन धन दाता इन्द्रदेव के समीप पहुँचकर, स्तोत्रों से उनका पूजन करते हैं । युद्ध में सहायता के लिए स्तोताओं द्वारा बुलाये जाने पर अपराजेय इन्द्रदेव अविलम्ब पहुँचते हैं॥२॥
सब सेनाओं के सेनापति इन्द्रदेव तरकसों को धारण कर गौओं एवं धन को जीतते हैं। हे स्वामी इन्द्रदेव ! हमारी धन-प्राप्ति की इच्छा पूरी करने में आप वैश्य की तरह विनिमय जैसा व्यवहार न करें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अकेले ही अपने प्रचण्ड वज्र से धनवान् दस्यु ‘वृत्र' का वध किया । जब उसके अनुचरों ने आप के ऊपर आक्रमण किया, तब यज्ञ विरोधी उन दानवों को आपने (दृढ़तापूर्वक) नष्ट कर दिया॥४॥
हे इन्द्रदेव ! याजकों से स्पर्धा करने वाले अयाज्ञिक मुँह छिपाकर भाग गये। हे अश्व-अधिष्ठत इन्द्रदेव ! आप युद्ध में अटल और प्रचण्ड सामर्थ्य वाले हैं। आपने आकाश, अन्तरिक्ष और पृथ्वी से धर्म-व्रतहीनों को हटा दिया है॥५॥
उन शत्रुओं ने इन्द्रदेव की निर्दोष सेना पर पूरी शक्ति के साथ प्रहार किया, फिर भी हार गये । उनकी वही स्थिति हो गयी, जो शक्तिशाली वीर से युद्ध करने पर नपुंसक की होती है। अपनी निर्बलता स्वीकार करते हुए वे सब इन्द्रदेव से दूर चले गये॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आपने रोने या हँसने वाले इन शत्रुओं को युद्ध करके मार दिया, दस्यु वृत्र को ऊँचा उठाकर आकाश से नीचे गिराकर जला दिया। आपने सोमयज्ञ करने वालों और प्रशंसक स्तोताओं की रक्षा की॥७॥
उन शत्रुओं ने पृथ्वी के ऊपर अपना आधिपत्य स्थापित किया और स्वर्ण-रत्नादि से सम्पन्न हो गये, परन्तु वे इन्द्रदेव के साथ युद्ध में न ठहर सके। सूर्यदेव के द्वारा उन्हें दूर कर दिया गया॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपनी सामर्थ्य से द्युलोक और भूलोक का चारों ओर से उपयोग किया । हे इन्द्रदेव ! आपने अपने अनुचरों द्वारा विरोधियों पर विजय प्राप्त की। आपने मन्त्र-शक्ति से (ज्ञानपूर्वक किये गये प्रयासों से) शत्रु पर विजय प्राप्त की॥९॥
मेघ रूप वृत्र के द्वारा रोक लिये जाने के कारण जो जल द्युलोक से पृथ्वी पर नहीं बरस सके एवं जलों के अभाव से भूमि शस्यश्यामला न हो सकी, तब इन्द्रदेव ने अपने जाज्वल्यमान वज्र से अन्धकार रूपों मेघ को भेदकर गौ के समान जल का दोहन किया॥१०॥
जल इन ब्रीहि यवादि रूप अन्न वृद्धि के लिए (मेघों से) बरसने लगे। उस समय नौकाओं के मार्ग पर (जलों में) वृत्र बढ़ता रहा । इन्द्रदेव ने अपने शक्ति-साधनों द्वारा एकाग्र मन से अल्प समयावधि में ही उस वृत्र को मार गिराया॥११॥
इन्द्रदेव ने गुफा में सोये हुए वृत्र के किलों को ध्वस्त करके उस सींगवाले शोषक वृत्र को क्षत-विक्षत कर दिया। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आपने सम्पूर्ण वेग और बल से शत्रु सेना का विनाश किया॥१२॥
इन्द्रदेव का तीक्ष्ण और शक्तिशाली वज्र शत्रुओं को लक्ष्य बनाकर उनके किलों को ध्वस्त करता है । शत्रुओं को वज्र से मारकर इन्द्रदेव स्वयं अतीव उत्साहित हुए॥१३॥
हे इन्द्रदेव ! ‘कुत्स ऋषि के प्रति स्नेह होने से आपने उनकी रक्षा की और अपने शत्रुओं के साथ युद्ध करने वाले श्रेष्ठ गुणवान् ‘दशद्यु' अर्घष की भी आपने रक्षा की । उस समय अश्वों के खुरों से धूल आकाश तक फैल गई, तब शत्रुभय से जल में छिपने वाले ‘श्वैत्रेय' नामक पुरुष की रक्षाकर आपने उसे जल से बाहर निकाला॥१४॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! क्षेत्र प्राप्ति की इच्छा से सशक्त जल - प्रवाहों में घिरने वाले ‘श्वित्र्य' (व्यक्तिविशेष) की आपने रक्षा की । वहाँ जलों में ठहरकर अधिक समय तक आप शत्रुओं से युद्ध करते रहे । उन शत्रुओं को जलों के नीचे गिराकर आपने मार्मिक पीड़ा पहुँचायी॥१५॥

सूक्त - ३४

हे ज्ञानी अश्विनीकुमारो ! आज आप दोनों यहाँ तीन बार (प्रातः, मध्याह्न,सायं) आयें। आप के रथ और दान बड़े महान् हैं। सर्दी की रात एवं आतपयुक्त दिन के समान आप दोनों का परस्पर नित्य सम्बन्ध है । विद्वानों के माध्यम से आप हमें प्राप्त हों॥१॥
मधुर सोम को वहन करने वाले रथ में वज्र के समान सुदृढ़ तीन पहिये लगे हैं। सभी लोग आपकी सोम के प्रति तीव्र उत्कंठा को जानते हैं। आपके रथ में अवलम्बन के लिये तीन खम्भे लगे हैं। हे अश्विनीकुमारो ! आप उस रथ से तीन बार रात्रि में और तीन बार दिन में गमन करते हैं॥२॥
हे दोषों को ढूंकने वाले अश्विनीकुमारो ! आज हमारे यज्ञ में दिन में तीन बार मधुर रसों से सिंचन करें । प्रातः, मध्याह्न एवं सायं तीन प्रकार के पुष्टिवर्धक अन्न हमें प्रदान करें॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! हमारे घर आप तीन बार आयें । अनुयायी जनों को तीन बार सुरक्षित करें, उन्हें तीन बार तीन विशिष्ट ज्ञान करायें। सुखप्रद पदार्थों को तीन बार इधर हमारी ओर पहुँचायें । बलप्रदायक अन्नों को प्रचुर परिमाण में देकर हमें सम्पन्न करें॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमारे लिए तीन बार धन इधर लायें । हमारी बुद्धि को तीन बार देवों की स्तुति में प्रेरित करें । हमें तीन बार सौभाग्य और तीन बार यश प्रदान करें। आपके रथ में सूर्य-पुत्री (उषा) विराजमान हैं॥५॥
हे शुभ कर्मपालक अश्विनीकुमारो ! आपने तीन बार हमें (द्युस्थानीय) दिव्य ओषधियाँ, तीन बार पार्थिव ओषधियाँ तथा तीन बार जलौषधियाँ प्रदान की हैं। हमारे पुत्र को श्रेष्ठ सुख एवं संरक्षण दिया है और तीन धातुओं (वात-पित्त-कफ) से मिलने वाला सुख, आरोग्य एवं ऐश्वर्य भी प्रदान किया है॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप नित्य तीन बार यजन योग्य हैं । पृथ्वी पर स्थापित वेदी के तीन ओर आसनों पर बैठे। हे असत्यरहित रथारूढ़ देवो ! प्राणवायु और आत्मा के समान दूर स्थान से हमारे यज्ञों में तीन बार आयें॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! सात मातृभूत नदियों के जलों से तीन बार तीन पत्र भर दिये हैं । हवियों को भी तीन भागों में विभाजित किया है । आकाश में ऊपर गमन करते हुए आप तीनों लोकों की दिन और रात्रि में रक्षा करते हैं॥८॥
अश्विनीकुमारों के रहस्यमय रथ - यान का वर्णन करते हुए कहा गया है हे सत्यनिष्ठ अश्विनीकुमारो ! आप जिस रथ द्वारा यज्ञ-स्थल में पहुँचते हैं, उस तीन छोर वाले रथ के तीन चक्र कहाँ हैं? एक ही आधार पर स्थापित होने वाले तीन स्तम्भ कहाँ हैं और अति शब्द करने वाले बलशाली (अश्व या संचालक यंत्र) को रथ के साथ कब जोड़ा गया था ?॥९॥
हे सत्यशील अश्विनीकुमारो ! आप यहाँ आएँ । यहाँ हवि की आहुतियाँ दी जा रही हैं । मधु पीने वाले मुखों से मधुर रसों का पान करें। आप के विचित्र पुष्ट रथ को सूर्यदेव उषाकाल से पूर्व, यज्ञ के लिये प्रेरित करते हैं॥१०॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों तैतीस देवताओं सहित हमारे इस यज्ञ में मधुपान के लिये पधारें । हमारी आयु बढ़ायें और हमारे पापों को भली-भाँति विनष्ट करें । हमारे प्रति द्वेष की भावना को समाप्त करके सभी कार्यों में सहायक बने॥११॥
हे अश्विनीकुमारो ! त्रिकोण रथ से हमारे लिये उत्तम धन-सामथ्र्यों को वहन करें । हमारी रक्षा के लिए आवाहनों को आप सुनें । युद्ध के अवसरों पर हमारी बल-वृद्धि का प्रयास करें॥१२॥

सूक्त - ३५

कल्याण की कामना से हमें सर्वप्रथम अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं। अपनी रक्षा के लिए हम मित्र और वरुण देवों को बुलाते हैं । जगत् को विश्राम देने वाली रात्रि और सूर्यदेव का हम अपनी रक्षा के लिए आवाहन करते हैं॥१॥
सवितादेव गहन तमिस्रा युक्त अन्तरिक्ष पथ में भ्रमण करते हुए, देवों और मनुष्यों को यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों में नियोजित करते हैं। वे समस्त लोकों को देखते (प्रकाशित करते हुए स्वर्णिम (किरणों से युक्त ) रथ से आते हैं॥२॥
स्तुत्य सवितादेव ऊपर चढ़ते हुए और फिर नीचे उतरते हुए निरन्तर गतिशील रहते हैं। वे सविता देव तमरूपी पापों को नष्ट करते हुए अतिदूर से इस यज्ञशाला में श्वेत अश्वों के रथ पर आसीन होकर आते हैं॥३॥
सतत परिभ्रमणशील, विविध रूपों में सुशोभित, पूजनीय, अद्भुत रश्मि-युक्त सवितादेव गहन तमिस्रा को नष्ट करने के निमित्त प्रचण्ड सामर्थ्य को धारण करते हैं तथा स्वर्णिम रश्मियों से युक्त रथ पर प्रतिष्ठित होकर आते हैं॥४॥
सूर्यदेव के अश्व श्वेत पैर वाले हैं, वे स्वर्णरथ को वहन करते हैं और मानवों को प्रकाश देते हैं । सर्वदा सभी लोकों के प्राणी सवितादेव के अंक में स्थित हैं, अर्थात् उन्हीं पर आश्रित हैं॥५॥
तीनों लोकों में द्यावा और पृथिवीं ये दोनों लोक सूर्य के समीप हैं, अर्थात् सूर्य से प्रकाशित हैं। एक अंतरिक्ष लोक यमदेव का विशिष्ट द्वार रूप है। रथ के धुरे की कील के समान सूर्यदेव पर ही सब लोक (नक्षत्रादि) अवलम्बित हैं । जो यह रहस्य जानें, वे सबको बतायें॥६॥
गम्भीर, गतियुक्त, प्राणरूप, उत्तम प्रेरक, सुन्दर, दीप्तिमान् सूर्यदेव अन्तरिक्षादि को प्रकाशित करते हैं। ये सूर्यदेव कहाँ रहते हैं ? उनकी रश्मियाँ किस आकाश में होंगी? यह रहस्य कौन जानता है ?॥७॥
हिरण्य दृष्टि युक्त (सुनहली किरणों से युक्त) सवितादेव पृथ्वी की आठों दिशाओं, उनसे युक्त तीनों लोकों, सप्त सागरों आदि को आलोकित करते हुए दाता (हविदाता) के लिए वरणीय विभूतियाँ लेकर यहाँ आएँ॥८॥
स्वर्णिम रश्मियों रूपीं हाथों से युक्त विलक्षण द्रष्टा सवितादेव द्यावा और पृथ्वी के बीच संचरित होते हैं । वे रोगादि बाधाओं को नष्ट कर अन्धकारनाशक दीप्तियों से आकाश को प्रकाशित करते हैं॥९॥
हिरण्य हस्त (स्वर्णिम तेजस्वी किरणों से युक्त) प्राणदाता, कल्याणकारक, उत्तम सुखदायक, दिव्यगुण सम्पन्न सूर्यदेव, सम्पूर्ण मनुष्यों के समस्त दोषों को, असुरों और दुष्कर्मयों को नष्ट करते (दूर भगाते हुए उदित होते हैं। ऐसे सूर्यदेव हमारे लिये अनुकूल हों॥१०॥
हे सवितादेव ! आकाश में आपके ये धूलरहित मार्ग पूर्व निश्चित हैं। उन सुगम मार्गों से आकर आज आप हमारी रक्षा करें तथा हम (यज्ञानुष्ठान करने वालों) को देवत्व से युक्त करें॥११॥

सूक्त - ३६

हम ऋत्विज् अपने सूक्ष्म वाक्यों (मंत्र शक्ति) से व्यक्तियों में देवत्व का विकास करने वाली महानता का वर्णन करते हैं, जिस महानता का वर्णन (स्तवन) ऋषियों ने भली प्रकार किया था॥१॥
मनुष्यों ने बलवर्धक अग्निदेव का वरण किया । हम उन्हें हवियों से प्रवृद्ध करते हैं। अन्नों के दाता है। अग्निदेव ! आज आप प्रसन्न मन से हमारी रक्षा करें॥२॥
देवों के दूत, होतारूप, सर्वज्ञ हे अग्निदेव ! आपका हम वरण करते हैं, आप महान् और सत्यरूप हैं । आपकी ज्वालाओं की दीप्ति फैलती हुई आकाश तक पहुँचती है॥३॥
हे अग्निदेव ! मित्र, वरुण और अर्यमा ये तीनों देव आप जैसे पुरातन देवदूत को प्रदीप्त करते हैं । जो याजक आपके निमित्त हवि समर्पित करते हैं, वे आपकी कृपा से समस्त धनों को उपलब्ध करते हैं॥४॥
हे अग्निदेव ! आप प्रमुदित करने वाले, प्रजाओं के पालक, होतारूप, गृहस्वामी और देवदूत हैं । देवों के द्वारा सम्पादित सभी शुभ कर्म आपसे सम्पादित होते हैं॥५॥
है चिरयुवा अग्निदेव ! यह आपका उत्तम सौभाग्य है कि सब हवियाँ आपके अन्दर अर्पित की जाती हैं। आप प्रसन्न होकर हमारे निमित्त आज और आगे भी सामर्थ्यवान् देवों का यजन किया करें । (अर्थात् देवों को हमारे अनुकूल बनायें ।)॥६॥
नमस्कार करने वाले उपासक स्वप्रकाशित इन अग्निदेव की उपासना करते हैं । शत्रुओं को जीतने वाले मनुष्य हवन-साधनों और स्तुतियों से अग्नि को प्रदीप्त करते हैं॥७॥
देवों ने प्रहार कर वृत्र का वध किया। प्राणियों के निवासार्थ उन्होंने द्यावा-पृथिवी और अन्तरिक्ष का बहुत विस्तार किया। गौ, अश्व आदि की कामना से कण्व ने अग्नि को प्रकाशित कर आहुतियों द्वारा उन्हें बलिष्ठ बनाया॥८॥
यज्ञीय गुणों से युक्त प्रशंसनीय हे अग्निदेव ! आप देवताओं के प्रीतिपात्र और महान् गुणों के प्रेरक हैं। यहाँ उपयुक्त स्थान पर पधारें और प्रज्वलित हों । घृत की आहुतियों द्वारा दर्शन योग्य तेजस्वी होते हुए सघन धूम्र को विसर्जित करें॥९॥
हे हविवाहक अग्निदेव ! सभी देवों ने पूजने योग्य आपको मानव मात्र के कल्याण के लिए इस यज्ञ में धारण किया। मेध्यातिथि और कण्व ने तथा वृषा (इन्द्र) और उपस्तुत (अन्य यजमान) ने धन से संतुष्ट करने वाले आपका वरण किया॥१०॥
जिन अग्निदेव को मेध्यातिथि और कण्व ने सत्यरूप कर्मों से प्रदीप्त किया, वे अग्निदेव देदीप्यमान हैं। उन्हीं को हमारी ऋचायें भी प्रवृद्ध करती हैं। हम भी उन अग्निदेव को संवर्धित करते हैं॥११॥
हे अन्नवान् अग्ने ! आप हमें अन्न - सम्पदा से अभिपूरित करें । आप देवों के मित्र और प्रशंसनीय बलों के स्वामी हैं। आप महान् हैं । आप हमें सुखी बनाएँ॥१२॥
है काष्ठ स्थित अग्निदेव ! सर्वोत्पादक सवितादेव जिस प्रकार अन्तरिक्ष से हम सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी ऊँचे उठकर, अन्न आदि पोषक पदार्थ देकर हमारे जीवन की रक्षा करें । मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवि प्रदान करने वाले याजक आपके उत्कृष्ट स्वरूप का आवाहन करते हैं॥१३॥
हे यूपस्थ अग्ने ! आप ऊँचे उठकर अपने श्रेष्ठ ज्ञान द्वारा पापों से हमारी रक्षा करें, मानवता के शत्रुओं का दहन करें, जीवन में प्रगति के लिए हमें ऊँचा उठाएँ तथा हमारी प्रार्थना देवों तक पहुँचाएँ॥१४॥
हे महान् दीप्तिवाले, चिरयुवा अग्निदेव ! आप हमें राक्षसों से रक्षित करें, कृपण धूर्ती से रक्षित करें तथा हिंसकों और जघन्यों से रक्षित करें॥१५॥
अपने ताप से रोगादि कष्टों को मिटाने वाले हे अग्ने ! आप कृपणों को गदा से विनष्ट करें। जो हमसे द्रोह करते हैं, जो रात्रि में जागकर हमारे नाश का यत्न करते हैं, वे शत्रु हम पर आधिपत्य न कर पाएँ॥१६॥
उत्तम पराक्रमी ये अग्निदेव, जिन्होंने कण्व को सौभाग्य प्रदान किया, हमारे मित्रों की रक्षा की तथा 'मेध्यातिथि' और 'उपस्तुत' (यजमान) की भी रक्षा की है॥१७॥
अग्निदेव के साथ हम ‘तुर्वश''यद्' और 'उग्रदेव' को बुलाते हैं। वे अग्निदेव 'नववास्तु', 'बृहद्रथ और 'तुर्वीति' (आदि राजर्षियों ) को भी ले चलें, जिससे हम दुष्टों के साथ संघर्ष कर सकें॥१८॥
हे अग्निदेव ! विचारवान् व्यक्ति आपका वरण करते हैं। अनादिकाल से ही मानव जाति के लिए आपकी ज्योति प्रकाशित है । आपका प्रकाश आश्रमों के ज्ञानवान् ऋषियों में उत्पन्न होता है । यज्ञ में ही आपका प्रज्वलित स्वरूप प्रकट होता है । उस समय सभी मनुष्य आपको नमन-वन्दन करते हैं॥१९॥
अग्निदेव की ज्वालाएँ प्रदीप्त होकर अत्यन्त बलवती और प्रचण्ड हुई हैं । कोई उनका सामना नहीं कर सकता । हे अग्ने ! आप समस्त राक्षसों, आतताइयों और मानवता के शत्रुओं को नष्ट करें॥२०॥

सूक्त - ३७

हे कण्व गोत्रीय ऋषियो ! क्रीड़ा युक्त, बल सम्पन्न, अहिंसक वृत्तियों वाले मरुद्गण रथ पर शोभायमान हैं। आप उनके निमित्त स्तुतिगान करें॥१॥
ये मरुद्गण स्वदीप्ति से युक्त धब्बों वाले मृगों (वाहनों) सहित और आभूषणों से अलंकृत होकर गर्जना करते हुए प्रकट हुए हैं॥२॥
मरुद्गणों के हाथों में स्थित चाबुकों से होने वाली ध्वनियाँ हमें सुनाई देती हैं, जैसे वे यहीं हो रही हों । वे ध्वनियाँ संघर्ष के समय असामान्य शक्ति प्रदर्शित करती हैं॥३॥
(हे याजको ! आप) बल बढ़ाने वाले, शत्रु नाशक, दीप्तिमान् मरुद्गणों की सामर्थ्य और यश का मंत्रों से विशिष्ट गान करें॥४॥
(हे याजको ! आप) किरणों द्वारा संचरित दिव्य रसों का पर्याप्त सेवन कर बलिष्ठ हुए उन मरुद्गणों के अविनाशी बल की प्रशंसा करें॥५॥
चुलोक और भूलोक को कम्पित करने वाले हे मरुतो ! आप में वरिष्ठ कौन है ? जो सदा वृक्ष के अग्रभाग को हिलाने के समान शत्रुओं को प्रकम्पित कर दे॥६॥
हे मरुद्गणो ! आपके प्रचण्ड संघर्षक आवेश से भयभीत मनुष्य सुदृढ़ सहारा हूँढ़ता है, क्योंकि आप बड़े पर्वतों और टीलों को भी कैंपा देते हैं॥७॥
उन मरुद्गणों के आक्रमणकारी बलों से यह पृथ्वी जरा-जीर्ण नृपति की भाँति भयभीत होकर प्रकम्पित हो उठती है॥८॥
इन वीर मरुतों की मातृभूमि आकाश स्थिर है । ये मातृभूमि से पक्षी के वेग के समान निर्बाधित होकर चलते हैं । उनका बल दुगुना होकर व्याप्त होता है॥९॥
शब्द नाद करने वाले मरुतों ने यज्ञार्थ जलों को नि: सृत किया। प्रवाहित जल का पान करने के लिये भाती हुई गौएँ घुटने तक पानी में जाने के लिए बाध्य होती हैं॥१०॥
विशाल और व्यापक, न बिधे सकने वाले, जल वृष्टि न करने वाले मेघों को भी वीर मरुद्गण अपनी तेजगति से उड़ा ले जाते हैं॥११॥
हे मरुतो ! आप अपने बल से लोगों को विचलित करते हैं, आप पर्वतों को भी विचलित करने में समर्थ हैं॥१२॥
जिस समय मरुद्गण गमन करते हैं, तब वे मध्य मार्ग में ही परस्पर वार्ता करने लगते हैं। उनके शब्द को भला कौन नहीं सुन लेता है ? (सभी सुन लेते हैं॥१३॥
हे मरुतो ! आप तीव्र वेग वाले वाहन से शीघ्र आएँ । कण्ववंशी आपके सत्कार के लिए उपस्थित हैं । वहाँ आप उत्साह के साथ तृप्ति को प्राप्त हों॥१४॥
हे मरुतो ! आपकी प्रसन्नता के लिए यह वि- द्रव्य तैयार है। हम सम्पूर्ण आयु सुखद जीवन प्राप्त करने के लिए आपका स्मरण करते हैं॥१५॥

सूक्त - ३८

हे स्तुति प्रिय मरुतो ! आप कुश के आसनों पर विराजमान हों । पुत्र को पिता द्वारा स्नेहपूर्वक गोद में उठाने के समान, आप हमें कब धारण करेंगे?॥१॥
हे मरुतो ! आप कहाँ हैं ? किस उद्देश्य से आप द्युलोक में गमन करते हैं? पृथ्वी में क्यों नहीं घूमते ? आपकी गौएँ आपके लिए नहीं भाती क्या ? (अर्थात् आप पृथ्वी रूपी गौ के समीप ही रहें ।)॥२॥
हे मरुद्गणो ! आपके नवीन संरक्षण साधन कहाँ हैं? आपके सुख - ऐश्वर्य के साधन कहाँ हैं? आपके सौभाग्यप्रद साधन कहाँ हैं? आप अपने समस्त वैभव के साथ इस यज्ञ में आएँ॥३॥
हे मातृभूमि की सेवा करने वाले आकाशपुत्र मरुतो ! यद्यपि आर्ष मरणशील हैं, फिर भी आपकी स्तुति करने वाला अमरता को प्राप्त करता है॥४॥
जैसे मृग, तृण को असेव्य नहीं समझता, उसी प्रकार आपकी स्तुति करने वाला आपके लिये अप्रिय न हो (अर्थात् उस पर कृपालु रहें), जिससे उसे यमलोक के मार्ग पर न जाना पड़े॥५॥
अति बलिष्ठ पापवृत्तियाँ हमारी दुर्दशा कर हमारा विनाश न करें, प्यास (अतृप्ति) से वे ही नष्ट हो जायें॥६॥
यह सत्य ही है कि कान्तिमान् , बलिष्ठ रुद्रदेव के पुत्र वे मरुद्गण, मरुभूमि में भी अवात (वायु शून्य) स्थिति से वर्षा करते हैं॥७॥
जब वह मरुद्गण वर्षा का सृजन करते हैं, तो विद्युत् इँभाने वाली गाय की तरह शब्द करती है (और जिस प्रकार) गाय बछड़ों को पोषण देती है, उसी प्रकार ) वह विद्युत् सिंचन करती हैं॥८॥
मरुद्गण जल प्रवाहक मेघों द्वारा दिन में भी अँधेरा कर देते हैं, तब वे वर्षा द्वारा भूमि को आई करते हैं॥९॥
मरुतों की गर्जना से पृथ्वी के निम्न भाग में अवस्थित सम्पूर्ण स्थान प्रकम्पित हो उठते हैं। उस कम्पन से समस्त मानव भी प्रभावित होते हैं॥१०॥
हे मरुतो ! (अश्वों को नियन्त्रित करने वाले) आप बलशाली बाहुओं से, अविच्छिन्न गति से शुभ नदियों की ओर गमन करें॥११॥
हे मरुतो ! आपके रथ बलिष्ठ घोड़ों, उत्तम धुरी और चंचल लगाम से भली प्रकार अलंकृत हों॥१२॥
हे याजको ! आप दर्शनीय मित्र के समान ज्ञान के अधिपति अग्निदेव की, स्तुति युक्त वाणियों द्वारा प्रशंसा करें॥१३॥
हे याजको ! आप अपने मुख से श्लोक रचना कर मेघ के समान इसे विस्तारित करें । गायत्री छन्द में रचे हुए काव्य का गायन करें॥१४॥
हे ऋत्विज़ो ! आप कान्तिमान्, स्तुत्य, अर्चन योग्य मरुद्गणों का अभिवादन करें । यहाँ हमारे पास इनका वास रहे॥१५॥

सूक्त - ३९

हे कॅपाने वाले मरुतो ! आप अपना बल दूरस्थ स्थान से विद्युत् के समान यहाँ पर फेंकते हैं, तो आप ( किसके यज्ञ की ओर ) किसके पास जाते हैं ?किस उद्देश्य से आप कहाँ जाना चाहते हैं ? उस समय आपका क्या लक्ष्य होता है ?॥१॥
आपके हथियार शत्रु को हटाने में नियोजित हों। आप अपनी दृढ़ शक्ति से उनका प्रतिरोध करें । आपकी शक्ति प्रशंसनीय हो । आप छद्म वेषधारी मनुष्यों को आगे न बढ़ाये॥२॥
हे मरुतो ! आप स्थिर वृक्षों को गिराते, दृढ़ चट्टानों को प्रकम्पित करते, भूमि के वनों को जड़ विहीन करते हुए पर्वतों के पार निकल जाते हैं॥३॥
हे शत्रुनाशक मरुतो ! न द्युलोक में और न पृथ्वी पर ही, आपके शत्रुओं का अस्तित्व है। हे रुद्र पुत्रो ! शत्रुओं को क्षत-विक्षत करने के लिए आप सब मिलकर अपनी शक्ति विस्तृत करें॥४॥
हे मरुतो ! मदमत्त हुए लोगों के समान आप पर्वतों को प्रकम्पित करते हैं और पेड़ों को उखाड़ कर फेंकते हैं, अत: आप प्रजाओं के आगे-आगे उन्नति करते हुए चलें॥५॥
हे मरुतो ! आपके रथ को चित्र-विचित्र चिह्नों युक्त (पशु आदि) गति देते हैं, उनमें) लाल रंग वाला अश्व धुरी को खींचता है। तुम्हारी गति से उत्पन्न शब्द भूमि सुनती है, मनुष्यगण उस ध्वनि से भयभीत हो जाते हैं॥६॥
हे रुद्रपुत्रो ! अपनी संतानों की रक्षा के लिए हम आपकी स्तुति करते हैं। जैसे पूर्व समय में आप भययुक्त कण्वों की ओर रक्षा के निमित्त शीघ्र गये थे, उसी प्रकार आप हमारी रक्षा के निमित्त शीघ्र पधारें॥७॥
है मरुतो ! आपके द्वारा प्रेरित या अन्य किसी मनुष्य द्वारा प्रेरित शत्रु हम पर प्रभुत्व जमाने आयें, तो आप अपने बल से, अपने तेज से और रक्षण साधनों से उन्हें दूर हटा दें॥८॥
हे विशिष्ट पूज्य, ज्ञाता मरुतो ! कण्व को जैसे आपने सम्पूर्ण आश्रय दिया था, वैसे ही चमकने वाली बिजलियों के साथ वेग से आने वाली वृष्टि की तरह आप सम्पूर्ण रक्षा साधनों को लेकर हमारे पास आयें॥९॥
हे उत्तम दानशील भरुतो ! आप सम्पूर्ण पराक्रम और सम्पूर्ण बलों को धारण करते हैं। हे शत्रु को प्रकम्पित करने वाले मरुद्गणो !ऋषियों से द्वेष करने वाले शत्रुओं को नष्ट करने वाले बाण के समान आप शत्रुघातक ( शक्ति ) का सृजन करें॥१०॥

सूक्त - ४०

हे ब्रह्मणस्पते ! आप उठे, देवों की कामना करने वाले हम आप की स्तुति करते हैं। कल्याणकारी मरुद्गण हमारे पास आयें । हे इन्द्रदेव ! आप ब्रह्मणस्पति के साथ मिलकर सोमपान करें॥१॥
साहसिक कार्यों के लिये समर्पित हे ब्रह्मणस्पते ! युद्ध में मनुष्य आपका आवाहन करते हैं। हे मरुतो! जो धनार्थी मनुष्य ब्रह्मणस्पति सहित आपकी स्तुति करता है, वह उत्तम अश्वों के साथ श्रेष्ठ पराक्रम एवं वैभव से सम्पन्न हो॥२॥
ब्रह्मणस्पति हमारे अनुकूल होकर यज्ञ में आगमन करें। हमें सत्यरूप दिव्यवाणी प्राप्त हो । मनुष्यों के हितकारी देवगण हमारे यज्ञ में पंक्तिबद्ध होकर अधिष्ठित हों तथा शत्रुओं का विनाश करें॥३॥
जो यजमान विजों को उत्तम धन देते हैं, वे अक्षय यश को पाते हैं। उनके निमित्त हम (त्विग्गण) उत्तम पराक्रमी, शत्रु-नाशक, अपराजेय मातृभूमि की वन्दना करते हैं॥४॥
ब्रह्मणस्पति निश्चय ही स्तुति योग्य (उन) मंत्रों को विधि से उच्चारित कराते हैं, जिन मंत्रों में इन्द्र, वरुण, मित्र और अर्यमा आदि देवगण निवास करते हैं॥५॥
हे नेतृत्व करने वालो ! (देवताओ !) हम सुखप्रद, विघ्ननाशक मंत्र का यज्ञ में उच्चारण करते हैं । हे नेतृत्व करने वाले देवो ! यदि आप इस मन्त्र रूप वाणी की कामना करते हैं, (सम्मानपूर्वक अपनाते हैं तो ये सभी सुन्दर स्तोत्र आपको निश्चय ही प्राप्त हों॥६॥
देवत्व की कामना करने वालों के पास भला कौन आयेंगे ? ( ब्रह्मणस्पति आयेंगे ।) कुश-आसन बिछाने वाले के पास कौन आयेंगे ? ( ब्रह्मणस्पति आयेंगे ।) आपके द्वारा हविदाता याजक अपनी संतानों, पशुओं आदि के निमित्त उत्तम घर का आश्रय पाते हैं॥७॥
ब्रह्मणस्पतिदेव, क्षात्रबल की अभिवृद्धि कर राजाओं की सहायता से शत्रुओं को मारते हैं । भय के सम्मुख वे उत्तम धैर्य को धारण करते हैं । ये वज्रधारी बड़े युद्धों या छोटे युद्धों में किसी से पराजित नहीं होते॥८॥

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सूक्त - ४१

जिस याजक को, ज्ञान सम्पन्न वरुण, मित्र और अर्यमा आदि देवों का संरक्षण प्राप्त है, उसे कोई भी नहीं दबा सकता॥१॥
अपने बाहुओं से विविध धनों को देते हुए वरुणादि देवगण जिस मनुष्य की रक्षा करते हैं, शत्रुओं से अहिंसित होता हुआ वह वृद्धि पाता है॥२॥
राजा के सदृश वरुणादि देवगण, शत्रुओं के नगरों और किलों को विशेष रूप से नष्ट करते हैं। वे याजको को दुःख के मूलभूत कारणों (पापों ) से दूर ले जाते हैं॥३॥
हे आदित्यो ! आप के यज्ञ में आने के मार्ग अतिसुगम और कण्ट्रकहीन हैं । इस यज्ञ में आपके लिए श्रेष्ठ हविष्यान्न समर्पित है॥४॥
हे आदित्यो ! जिस यज्ञ को आप सरल मार्ग से सम्पादित करते हैं, वह यज्ञ आपके ध्यान में विशेष रूप से रहता है। वह भला कैसे विस्मृत हो सकता है ?॥५॥
हे आदित्यो ! आपका याजक किसी से पराजित नहीं होता । वह धनादि रत्न और सन्तानों को प्राप्त करता हुआ प्रगति करता है॥६॥
हे मित्रो ! मित्र, अर्यमा और वरुण देवों के महान् ऐश्वर्य साधनों का किस प्रकार वर्णन करे ? अर्थात् इनकी महिमा अपार है॥७॥
हे देवो ! देवत्व प्राप्ति की कामना वाले साधकों को कोई कटुवचनों से और क्रोधयुक्त वचनों से प्रताड़ित न करने पाये । हम स्तुति वचनों द्वारा आपको प्रसन्न करते हैं॥८॥
जैसे जुआ खेलने में चार पाँसे गिरने तक हार-जीत का भय रहता है, उसी प्रकार बुर वचन कहने से भी डरना चाहिये । उससे स्नेह नहीं करना चाहिए॥९॥

सूक्त - ४२

हे पूषादेव ! हम पर सुखों को न्योछावर करें । पाप मार्गों से हमें पार लगाएँ । हे देव ! हमें आगे बढ़ाएँ॥१॥
हे पूषादेव ! जो हिंसक, चोर, जुआ खेलने वाले हम पर शासन करना चाहते हैं, उन्हें हम से दूर करें॥२॥
उस मार्ग-प्रतिबन्धक, चोर और कपटी को मार्ग से दूर भगा दो॥३॥
जो कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष-दोनों प्रकार से हरण करता और अनिष्ट-साधन करता है। हे देव ! उसकी पर-पीड़क देह को अपने पैरों से रौंद डालो॥४॥
अरि-मर्दन और ज्ञानी-पूषन् ! तुमने जिस रक्षा-शक्ति से पितरों को उत्साहित किया था, तुम्हारी उसी रक्षा-शक्ति के लिए हम प्रार्थना करते हैं॥५॥
सर्व-सम्पत्शाली और विविध-स्वर्णास्त्र-सन्युक्त पूषन् ! हमारी प्रार्थना के अनन्तर हमारे निमित्त धन-समूह दान में परिणत करो॥६॥
बाधक शत्रुओं का अतिक्रम करके हमें ले जाओ । सुख-गम्य और सुन्दर मार्ग से हमें ले जाओ । पूषन् ! तुम इस मार्ग में हमारी रक्षा का उपाय करो॥७॥
सुन्दर और तृण-युक्त देश में हमें ले जाओ। रास्ते में नया सन्ताप न होने पावे। पूषन् ! तुम इस मार्ग में हमारी रक्षा का उपाय करो॥८॥
हमारे ऊपर अनुग्रह करो । हमारा घर धन-धान्य से पूर्ण करो। अन्य अभीष्ट वस्तु भी हमें दान करो। हमें उग्र-तेजा करो। हमारी उदर-पूर्ति करो। पूषन् ! तुम इस मार्ग से हमारी रक्षा का उपाय करो॥९॥
हम पूषा की निन्दा नहीं कर सकते; उनकी स्तुति करते हैं। हम दर्शनीय पूषा के पास धन की याचना करते हैं॥१०॥

सूक्त - ४३

उत्कृष्ट ज्ञान से युक्त, अभीष्ट-वर्षी और अत्यन्त महान् रुद्र | हमारे हृदय में अवस्थान्त करते हैं। कब हम उनको लक्ष्य करके सुखकर पाठ करेंगे ?॥१॥
जैसे व जिस प्रकार भूमि-देवता हमारे लिए, पशु के लिए, मनुष्य के लिए, गायों के लिए और हमारे अपत्य के लिए रुद्र-सम्बन्धी औषध प्रदान करें॥२॥
मित्र, वरुण और रुद्रदेव जिस प्रकार हमारे हितार्थ प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार अन्य समस्त देवगण भी हमारा कल्याण करें॥३॥
हम सुखद जल एवं ओषधियों से युक्त, स्तुतियों के स्वामी तथा यज्ञ के स्वामी, रुद्रदेव से आरोग्य सुख की कामना करते हैं॥४॥
सूर्य सदृश सामर्थ्यवान् और स्वर्ण सदृश दीप्तिमान् रुद्रदेव सभी देवों में श्रेष्ठ और ऐश्वर्यवान् हैं॥५॥
हमारे अश्वों, मेढ़ों, भेड़ों, पुरुषों, नारियों और गौओं के लिये वे रुद्रदेव सब प्रकार से मंगलकारी हैं॥६॥
हे सोमदेव ! हम मनुष्यों को सैकड़ों प्रकार का ऐश्वर्य, तेजयुक्त अन्न, बल और महान् यश प्रदान करें॥७॥
सोमयाग में बाधा देने वाले शत्रु हमें प्रताड़ित न करें। कृपण और दुष्टों से हम पीड़ित न हों । हे सोमदेव ! आप हमारे बल में वृद्धि करें॥८॥
हे सोमदेव ! यज्ञ के श्रेष्ठ स्थान में प्रतिष्ठित आप अमृत से युक्त हैं। यजन कार्य में सर्वोच्च स्थान पर विभूषित प्रजा को आप जानें॥९॥

सूक्त - ४४

हे अमर अग्निदेव ! उषा काल में विलक्षण शक्तियाँ प्रवाहित होती हैं, यह दैवी सम्पदा नित्यदान करने वाले व्यक्ति को दें । हे सर्वज्ञ ! उषाकाल में जाग्रत् हुए देवताओं को भी यहाँ लायें॥१॥
हे अग्निदेव ! आप सेवा के योग्य देवों तक हवि पहुँचाने वाले दूत और यज्ञ में देवों को लाने वाले रथ के समान हैं । आप अश्विनीकुमारों और देवी उषा के साथ हमें श्रेष्ठ पराक्रमी एवं यशस्वी बनायें॥२॥
उषाकाल में सम्पन्न होने वाले यज्ञ, जो धूम्र की पताका एवं ज्वालाओं से सुशोभित हैं, ऐसे सर्वप्रिय देवदूत, सबके आश्रय एवं महान् अग्निदेव को हम ग्रहण करते हैं और श्री सम्पन्न बनते हैं॥३॥
हम सर्वश्रेष्ठ, अतियुवा, अतिथिरूप, वन्दनीय, हविदाता, यजमान द्वारा पूजनीय, आहवनीय, सर्वज्ञ अग्निदेव की प्रतिदिन स्तुति करते हैं। वे हमें देवत्व की ओर ले चलें॥४॥
अविनाशी, सबको जीवन (भोजन) देने वाले, विवाहक, विश्व का वाण करने वाले, सबके आराध्य, युवा हे अग्निदेव ! हम आपकी स्तुति करते हैं॥५॥
मधुर जिह्वावाले, याजकों की स्तुति के पात्र, हे तरुण अग्निदेव ! भली प्रकार आहुतियाँ प्राप्त करते हुए आप याजकों की आकांक्षा को जानें । प्रस्कण्व (ज्ञानियों) को दीर्घ जीवन प्रदान करते हुए आप देवगणों को सम्मानित करें॥६॥
होता रूप सर्वभूतों के ज्ञाता, हे अग्निदेव !आपको मनुष्यगण सम्यक् रूप से प्रज्वलित करते हैं। बहुतों द्वारा आहूत किये जाने वाले हे अग्निदेव ! प्रकृष्ट ज्ञान सम्पन्न देवों को तीव्र गति से यज्ञ में लायें॥७॥
श्रेष्ठ यज्ञों को सम्पन्न करने वाले हे अग्निदेव ! रात्रि के पश्चात् उषाकाल में आप सविता, उषा, दोनों अश्विनीकुमारों, भग और अन्य देवों के साथ यहाँ आयें। सोम को अभिषुत करने वाले तथा हवियों को पहुँचाने वाले विग्गण आपको प्रज्वलित करते हैं॥८॥
हे अग्निदेव ! आप साधकों द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञों के अधिपति और देवों के दूत हैं । उषाकाल में जाग्रत् देव आत्माओं को आज सोमपान के निमित्त यहाँ यज्ञस्थल पर लायें॥९॥
हे विशिष्ट दीप्तिमान् अग्निदेव ! विश्वदर्शनीय आप उषाकाल के पूर्व ही प्रदीप्त होते हैं । आप ग्रामों की रक्षा करने वाले तथा यज्ञों, मानवों के अग्रणी नेता के समान पूजनीय हैं॥१०॥
है अग्निदेव ! हम मनुष्यों की भाँति आप को यज्ञ के साधन रूप, होता रूप, ऋत्विज् रूप, प्रकृष्ट ज्ञानी रूप, चिर-पुरातन और अविनाशी रूप में स्थापित करते हैं॥११॥
हे मित्रों में महान् अग्निदेव ! आप जब यज्ञ के पुरोहित रूप में देवों के बीच दूत कर्म के निमित्त जाते हैं, तब आपकी ज्वालायें समुद्र की प्रचण्ड लहरों के समान शब्द करती हुई प्रदीप्त होती हैं॥१२॥
प्रार्थना पर ध्यान देने वाले हे अग्निदेव ! आप हमारी स्तुति स्वीकार करें । दिव्य अग्निदेव के साथ समान गति से चलने वाले, मित्र और अर्यमा आदि देवगण भी प्रात:कालीन यज्ञ में आसीन हों॥१३॥
उत्तम दानशील, अग्निरूप जिह्वा से यज्ञ को प्रवृद्ध करने वाले मरुद्गण इन स्तोत्रों का श्रवण करें । नियमपालक वरुणदेव, अश्विनीकुमारों और देवी उषा के साथ सोम -रस का पान करें॥१४॥

सूक्त - ४५

वसु, रुद्र और आदित्य आदि देवताओं की प्रसन्नता के निमित्त यज्ञ करने वाले हे अग्निदेव ! आप घृताहुति से श्रेष्ठ यज्ञ सम्पन्न करने वाले मनु - संतानों (मनुष्यों) का (अनुदानादि द्वारा) सत्कार करें॥१॥
हे अग्निदेव ! विशिष्ट ज्ञान - सम्पन्न देवगण, हविदाता के लिए उत्तम सुख देते हैं । हे रोहित वर्ण अश्व वाले (अर्थात् रक्तवर्ण की ज्वालाओं से सुशोभित) स्तुत्य अग्निदेव ! उन तैतीस कोटि देवों को यहाँ यज्ञस्थल पर लेकर आयें॥२॥
हे श्रेष्ठकर्मा, ज्ञान - सम्पन्न अग्निदेव ! जैसे आपने प्रियमेधा, अत्रि, विरूप और अंगिरा के आवाहनों को सुना था, वैसे ही अब प्रस्कण्व के आवाहन को भी सुनें॥३॥
दिव्य प्रकाश से युक्त अग्निदेव यज्ञ में तेजस्वी रूप में प्रदीप्त हुए। महान् कर्मवाले प्रियमेधा ऋषियों ने अपनी रक्षा के निमित्त अग्निदेव का आवाहन किया॥४॥
घृत - आहुति - भक्षक हेअग्निदेव ! कण्व के वंशज, अपनी रक्षा के लिये जो स्तुतियाँ करते हैं, उन्हीं स्तुतियों को आप सम्यक् प्रकार से सुनें॥५॥
प्रेमपूर्वक हविष्य को ग्रहण करने वाले हे यशस्वी अग्निदेव ! आप आश्चर्यजनक वैभव से सम्पन्न हैं। सम्पूर्ण मनुष्य एवं ऋत्विग्गण यज्ञ सम्पादन के निमित्त आपका आवाहन करते हुए हवि समर्पित करते हैं॥६॥
हे अग्निदेव ! होती रूप, त्वरूप, धन को धारण करने वाले, स्तुति सुनने वाले, महान् यशस्वी आपको विद्वज्जन स्वर्ग की कामना से, यज्ञों में स्थापित करते हैं॥७॥
हे अग्निदेव ! हविष्यान्न और सोम को तैयार करके रखने वाले विद्वान् , दानशील याजक के लिये महान् तेजस्वी आपको स्थापित करते हैं॥८॥
हे बल उत्पादक अग्निदेव ! आप धनों के स्वामी और दानशील हैं। आज प्रात:काल सोमपान के निमित्त यहाँ यज्ञस्थल पर आने को उद्यत देवों को बुलाकर कुश के आसनों पर बिठायें॥९॥
हे अग्निदेव ! यज्ञ के समक्ष प्रत्यक्ष उपस्थित देवगणों का उत्तम वचनों से अभिवादन कर यजन करें । हे श्रेष्ठ देवो ! यह सोम आपके लिए प्रस्तुत है, इसका पान करें॥१०॥


सूक्त - ४६

यह प्रिय अपूर्व (अलौकिक) देवी उषा आकाश के तम का नाश करती हैं। देवी उषा के कार्य में सहयोगी हे अश्विनीकुमारो ! हम महान् स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप शत्रुओं के नाशक एवं नदियों के उत्पत्तिकर्ता हैं । आप विवेकपूर्वक कर्म करने वालों को अपार सम्पत्ति देने वाले हैं॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! जब आपका रथ पक्षियों की तरह आकाश में पहुँचता है, तब प्रशंसनीय स्वर्गलोक में भी आप के लिये स्तोत्रों का पाठ किया जाता है॥३॥
हे देवपुरुषो ! जलों को सुखाने वाले, पिता रूप, पोषणकर्ता, कार्यद्रष्टा सूर्यदेव (हमारे द्वारा प्रदत्त) हवि से आपको संतुष्ट करते हैं, अर्थात् सूर्यदेव प्राणिमात्र के पोषण के लिये अन्नादि पदार्थ उत्पन्न करके प्रकृति के विराट् यज्ञ में आहुति दे रहे हैं॥४॥
असत्यहीन, मननपूर्वक वचन बोलने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप अपनी बुद्धि को प्रेरित करने वाले एवं संघर्ष शक्ति बढ़ाने वाले इस सोमरस का पान करें॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! जो पोषक अन्न हमारे जीवन के अन्धकार को दूर कर प्रकाशित करने वाला हो, वह हमें प्रदान करें॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों अपना रथ नियोजितकर हमारे पास आयें । अपनी श्रेष्ठ बुद्धि से हमें दु:खों के सागर से पार ले चलें॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपके आवागमन के साधन द्युलोक (की सीमा) से भी विस्तृत हैं। (तीनों लोकों में आपकी गति है ) नदियों, तीर्थ प्रदेशों में भी आपके साधन हैं, (पृथ्वी पर भी) आपके लिये रथ तैयार है । (आप किसी भी साधन से पहुँचने में समर्थ हैं। आप के लिये यहाँ विचारयुक्त कर्म द्वारा सोमरस तैयार किया गया है॥८॥
कण्व वंशजों द्वारा तैयार सोम दिव्यता से परिपूर्ण है। नदियों के तट पर ऐश्वर्य रखा है । हे अश्विनीकुमारो ! अब आप अपना स्वरूप कहाँ प्रदर्शित करना चाहते हैं ?॥९॥
अमृतमयी किरणों वाले ये सूर्यदेव ! अपनी आभा से स्वर्णतुल्य प्रकट हो रहे हैं । इसी समय श्यामल अग्निदेव, ज्वालारूप जिह्वा से विशेष प्रकाशित हो चुके हैं। हे अश्विनीकुमारो ! यहीं आपके शुभागमन का समय है॥१०॥
द्युलोक से अंधकार को पार करती हुई, विशिष्ट प्रभा प्रकट होने लगी है, जिससे यज्ञ के मार्ग अच्छी तरह से प्रकाशित हुए हैं । अतः हे अश्विनीकुमारो ! आपको आना चाहिये॥११॥
सोम के हर्ष से पूर्ण होने वाले अश्विनीकुमारों के उत्तम संरक्षण का स्तोतागण भली प्रकार वर्णन करते हैं॥१२॥
हे दीप्तिमान् (यजमानों के) मनों में निवास करने वाले, सुखदायक अश्विनीकुमारो ! मनु के समान श्रेष्ठ परिचर्या करने वाले यजमान के समीप निवास करने वाले (सुखप्रदान करने वाले हे अश्विनीकुमारो !) आप दोनों सोमपान के निमित्त एवं स्तुतियों के निमित्त इस योग में पधारें॥१३॥
हे अश्विनीकुमारो ! चारों ओर गमन करने वाले आप दोनों की शोभा के पीछे-पीछे देवी उषा अनुगमन कर रही हैं। आप रात्रि में भी यज्ञों का सेवन करते हैं॥१४॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों सोमरस का पान करें । आलस्य न करते हुए हमारी रक्षा करें तथा हमें सुख प्रदान करें॥१५॥

सूक्त - ४७

हे यज्ञ कर्म का विस्तार करने वाले अश्विनीकुमारो ! अपने इस यज्ञ में अत्यन्त मधुर तथा एक दिन पूर्व शोधित सोमरस का आप सेवन करें । यज्ञकर्ता यजमान को रत्न एवं ऐश्वर्य प्रदान करें॥१॥
हे अश्विनीकुमारों ! तीन वृत्त युक्त (त्रिकोण), तीन अवलम्बनवालेअति सुशोभित रथ से यहाँ आयें । यज्ञ में कण्व वंशज आप दोनों के लिये मंत्र-युक्त स्तुतियाँ करते हैं, उनके आवाहन को सुनें॥२॥
हे शत्रुनाशक, यज्ञ-वर्द्धक अश्विनीकुमारो ! अत्यन्तै मीठे सोमरस का पान करें । आज रथ में धनों को धारण कर विदाता यजमान के समीप आयें॥३॥
हे सर्वज्ञ अश्विनीकुमारो ! तीन स्थानों पर रखे हुए कुश-आसन पर अधिष्ठित होकर आप यज्ञ का सिंचन करें। स्वर्ग की कामना वाले कण्व वंशज सोम को अभिषुत कर आप दोनों को बुलाते हैं॥४॥
यज्ञ को बढ़ाने वाले शुभ कर्मों के पोषक हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने जिन इच्छित रक्षण-साधनों से कण्व की भली प्रकार रक्षा की, उन साधनों से हमारी भी भली प्रकार रक्षा करें और प्रस्तुत सोमरस का पान करें॥५॥
शत्रुओं के लिए उग्ररूप धारण करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! रथ में धनों को धारण कर आपने सुदास को अन्न पहुँचाया । उसी प्रकार अन्तरिक्ष या सागरों से लाकर बहुतों द्वारा वाञ्छित धन हमारे लिए प्रदान करें॥६॥
हे सत्य-समर्थक अश्विनीकुमारो ! आप दूर हों या पास हों, वहाँ से उत्तम गतिमान् रथ से सूर्य रश्मियों के साथ हमारे पास आयें॥७॥
हे देवपुरुषो अश्विनीकुमारो ! यज्ञ की शोभा बढ़ाने वाले आपके अश्व आप दोनों को सोमयाग के समीप ले आयें । उत्तम कर्म करने वाले और दान देने वाले याजकों के लिये अन्नों की पूर्ति करते हुए आप दोनों कुश के आसनों पर बैठे॥८॥
हे सत्य - समर्थक अश्विनीकुमारो ! सूर्य सदृश तेजस्वी जिस रथ से दाता याजकों के लिए सदैव धन लाकर देते रहे हैं, उसी रथ से आप मीठे सोमरस पान के लिये पधारें॥९॥
हे विपुल धन वाले अश्विनीकुमारौ ! अपनी रक्षा के निमित्त हम स्तोत्रों और पूजा-अर्चनाओं से बार-बार आपका आवाहन करते हैं । कण्व वंशजों की यज्ञ सभा में आप सर्वदा सोमपान करते रहे हैं॥१०॥

सूक्त - ४८

हे आकाशपुत्री उषे ! उत्तम तेजस्वी, दान देने वाली, धनों और महान् ऐश्वर्यों से युक्त होकर आप हमारे सम्मुख प्रकट हों, अर्थात् हमें आपका अनुदान - अनुग्रह प्राप्त होता रहे॥१॥
अश्व, गौ आदि (पशुओं अथवा संचरित होने वाली एवं पोषक किरणों से सम्पन्न धन-धान्यों को प्रदान करने वाली उषाएँ प्राणिमात्र के कल्याण के लिए प्रकाशित हुई हैं । हे उषे ! कल्याणकारी वचनों के साथ आप हमारे लिए उपयुक्त धन - वैभव प्रदान करें॥२॥
जो देवी उषा पहले भी निवास कर चुकी हैं, वह रथों को चलाती हुई अब भी प्रकट हों । जैसे रनों की कामना वाले मनुष्य समुद्र की ओर मन लगाये रहते हैं, वैसे ही हम देवी उषा के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं॥३॥
हे उषे ! आपके आने के समय जो स्तोता अपना मन, धनादि दान करने में लगाते हैं, उसी समय अत्यन्त मेधावी कण्व उन मनुष्यों के प्रशंसात्मक स्तोत्र गाते हैं॥४॥
उत्तम गृहिणी स्त्री के समान सभी का भलीप्रकार पालन करने वाली देवी उषा जब आती हैं, तो निर्बलों को शक्तिशाली बना देती हैं, पाँव वाले जीवों को कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं और पक्षियों को सक्रिय होने की प्रेरणा देती हैं॥५॥
देवी उषा सबके मन को कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं तथा धन-इच्छुकों को पुरुषार्थ के लिए भी प्रेरणा देती हैं । ये जीवन दात्री देवी उषा निरन्तर गतिशील रहती हैं । हे अन्नदात्री उषे ! आपके प्रकाशित होने पर पक्षी अपने घोंसलों में बैठे नहीं रहते (अर्थात् वे भी सक्रिय होकर गतिशील हो जाते हैं)॥६॥
ये देवी उषा सूर्य के उदयस्थान से दूरस्थ देशों को भी जोड़ देती हैं। ये सौभाग्यशालिनी देवी उषा मनुष्य लोक की ओर सैकड़ों रथों द्वारा गमन करती हैं॥७॥
सम्पूर्ण जगत् इन देवी उषा के दर्शन करके झुककर उन्हें नमन करता हैं । प्रकाशिका, उत्तम मार्गदर्शिका, ऐश्वर्य - सम्पन्न आकाश पुत्री देवी उषा, पीड़ा पहुँचाने वाले हमारे बैरियों को दूर हटाती हैं॥८॥
हे आकाशपुत्री उषे ! आप आह्लादप्रद दीप्ति से सर्वत्र प्रकाशित हों । हमारे इच्छित स्वर्ग-सुख युक्त उत्तम सौभाग्य को ले आयें और दुर्भाग्य रूपी तमिस्रा को दूर करें॥९॥
हे सुमार्ग प्रेरक उषे ! उदित होने पर आप ही विश्व के प्राणियों का जीवन आधार बनती हैं। विलक्षण धन वाली, कान्तिमती हे उषे ! आप अपने बृहत् रथ से आकर हमारा आवाहन सुनें॥१०॥
हे उषादेवि ! मनुष्यों के लिये विविध अन्न-साधनों की वृद्धि करें । जो याजक आपकी स्तुतियाँ करते हैं, उनके इन उत्तम कर्मों से संतुष्ट होकर उन्हें यज्ञीय कर्मों की ओर प्रेरित करें॥११॥
है उषे ! सोमपान के लिए अंतरिक्ष से सब देवों को यहाँ ले आयें आप हमें अश्वों, गौओं से युक्त धन और पुष्टिप्रद अन्न प्रदान करें॥१२॥
जिन देवी उषा की दीप्तिमान् किरणें मंगलकारी प्रतिलक्षित होती हैं, वे देवी उषा हम सबके लिए वरणीय, श्रेष्ठ, सुखप्रद धनों को प्राप्त करायें॥१३॥
हे श्रेष्ठ उषादेवि ! प्राचीन ब्रष आपको अन्न और संरक्षण प्राप्ति के लिये बुलाते थे। आप यश और तेजस्विता से युक्त होकर हमारे स्तोत्रों को स्वीकार करें॥१४॥
हे देवी उषे ! आपने अपने प्रकाश से आकाश के दोनों द्वारों को खोल दिया है। अब आप हमें हिंसकों से रक्षित, विशाल आवास और दुग्धादि युक्त अन्नों को प्रदान करें॥१५॥
हे देवी उषे ! आप हमें सम्पूर्ण पुष्टिप्रद महान् धनों से युक्त करें, गौओं से युक्त करें। अन प्रदान करने वाली, श्रेष्ठ हे देवी उषे ! आप हमें शत्रुओं का संहार करने वाला बल देकर अन्नों से संयुक्त करें॥१६॥

सूक्त - ४९

हे देवी उषे ! द्युलोक के दीप्तिमान् स्थान से कल्याणकारी मार्गों द्वारा आप यहाँ आयें । अरुणिम वर्ण के अश्व आपको सोमयाग करने वाले के घर पहुँचाएँ॥१॥
हे आकाशपुत्री उषे ! आप जिस सुन्दर सुखप्रद रथ पर आरूढ़ हैं, उसी रथ से उत्तम हवि देने वाले याजक की सब प्रकार से रक्षा करें॥२॥
हे देदीप्यमान उषादेवि ! आपके (आकाशमण्डल पर) उदित होने के बाद मानव, पशु एवं पक्षी अन्तरिक्ष में दूर-दूर तक स्वेच्छानुसार विचरण करते हुए दिखाई देते हैं॥३॥
हे उषादेवी ! उदित होते हुए आप अपनी किरणों से सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करती हैं। धन की कामना करने वाले कण्व वंशज आपका आवाहन करते हैं॥४॥

सूक्त - ५०

ये ज्योतिर्मयो रश्मियाँ सम्पूर्ण प्राणियों के ज्ञाता सूर्यदेव को एवं समस्त विश्व को दृष्टि प्रदान करने के लिए विशेष रूप से प्रकाशित होती हैं॥१॥
सबको प्रकाश देने वाले सूर्यदेव के उदित होते ही रात्रि के साथ तारा मण्डल वैसे ही छिप जाते हैं, जैसे चोर छिप जाते हैं॥२॥
प्रज्वलित हुई अग्नि की किरणों के समान सूर्यदेव की प्रकाश रश्मियाँ सम्पूर्ण जीव - जगत् को प्रकाशित करती हैं॥३॥
हे सूर्यदेव ! आप साधकों का उद्धार करने वाले हैं, समस्त संसार में एक मात्र दर्शनीय प्रकाशक हैं तथा आप ही विस्तृत अन्तरिक्ष को सभी ओर से प्रकाशित करते हैं॥४॥
हे सूर्यदेव ! मरुद्गणों, देवगणों, मनुष्यों और स्वर्गलोक वासियों के सामने आप नियमित रूप से उदित होते हैं, ताकि तीनों लोकों के निवासी आपका दर्शन कर सकें॥५॥
जिस दृष्टि अर्थात् प्रकाश से आप प्राणियों को धारण-पोषण करने वाले इस लोक को प्रकाशित करते हैं, हम उस प्रकाश की स्तुति करते हैं॥६॥
हे सूर्यदेव ! आप दिन एवं रात में समय को विभाजित करते हुए अन्तरिक्ष एवं द्युलोक में भ्रमण करते हैं, जिससे सभी प्राणियों को लाभ प्राप्त होता है॥७॥
हे सर्वद्रष्टा सूर्यदेव ! आप तेजस्वी ज्वालाओं से युक्त दिव्यता को धारण करते हुये सप्तवर्णी किरणोंरूपी अश्वों के रथ में सुशोभित होते हैं॥८॥
पवित्रता प्रदान करने वाले ज्ञानसम्पन्न ऊर्ध्वगामी सूर्यदेव अपने सप्तवर्णी अश्वों से (किरणों से) सुशोभित रथ में शोभायमान होते हैं॥९॥
तमिस्रा से दूर श्रेष्ठतम ज्योति को देखते हुए हम ज्योति स्वरूप और देवों में उत्कृष्टतम ज्योति (सूर्य) को प्राप्त हों॥१०॥
हे मित्रों के मित्र सूर्यदेव !आप उदित होकर आकाश में उठते हुए हृदयरोग, शरीर की कान्ति का हरण करने वाले रोगों को नष्ट करें॥११॥
हम अपने हरिमाण (शरीर को क्षीण करने वाले रोग) को शुकों (तोतों), रोपणाका (वृक्षों) एवं हरिद्रवों (हरी वनस्पतियों) में स्थापित करते हैं॥१२॥
ये सूर्यदेव अपने सम्पूर्ण तेजों से उदित होकर हमारे सभी रोगों को वशवर्ती करें । हम उन रोगों के वश में कभी न आयें॥१३॥

सूक्त - ५१

हे याजको ! शत्रु को पराजित करने वाले, अनेकों द्वारा प्रशंसित, वैदिक ऋचाओं से स्तुति किये जाने योग्य, धन के सागर इन्द्रदेव की प्रार्थना करो। द्युलोक के विस्तार के समान जिनके कल्याणकारी कार्य चतुर्दिक् संव्याप्त हैं, ऐसे ज्ञानवान् इन्द्रदेव की सुखों की प्राप्ति के लिए अर्चना करो॥१॥
सहायता करने वाले कर्मों में कुशल मरुत्देवों ने शत्रु के मद को चूर करने वाले, शतकर्मा, अभीष्ट पदार्थ देने वाले, अंतरिक्ष को तेज से पूर्ण करने वाले तथा अत्यन्त बलवान् इन्द्रदेव की स्तुति की । स्तोताओं की मधुर वाणी से इन्द्रदेव के उत्साह में अभिवृद्धि हुई॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अंगिरा ऋषि के लिए गौ समूह को छुड़ाया । अत्रि ऋषि के लिए शतद्वार वाली गुफा से मार्ग ढूंढ़ निकाला । विमद ऋषि के लिए अन्न से युक्त धन प्राप्त कराया और वज्र के द्वारा युद्धों में लोगों की रक्षा की, अत: आपकी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है ?॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने जलों से भरे हुए मेघों को मुक्त कराया। पर्वत के दस्यु वृत्र से धन को (अपहृत करके) धारण किया। बल से वृत्र और अहिरूप मेघों को विदीर्ण किया, जिससे सूर्यदेव आकाश में स्पष्ट दृष्टिगत होकर प्रकाशित हो सकें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! जो राक्षस यज्ञ की वियों को अपने मुँह में डाल लेते थे, उन प्रपंचियों को आपने अपनी माया से मार गिराया । हे मनुष्यों द्वारा स्तुत्य इन्द्रदेव ! आपने अपना ही पेट भरने वाले पित्रु नामक राक्षस के नगरों को ध्वस्त करके युद्ध में राक्षसों को विनष्ट करके 'अंजश्वा' ऋषि की रक्षा की॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आपने युद्ध में ‘शुष्ण' का नाश कर ‘कुत्स' की रक्षा की । ‘अतिथिग्व' अषि के लिये शम्बरासुर को पराजित किया । महान् बलशाली अर्बुद को अपने पैरों से कुचल डाला । आप चिरकाल से ही असुरों का नाश करने के लिए उत्पन्न हुए हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आपमें सम्पूर्ण बल समाविष्ट हैं। आपका मन सोमपान करने के लिए सदा हर्षित रहता है । आपकी बाहों में धारण किया हुआ वज्र सर्वत्र प्रसिद्ध है, जिससे आप शत्रुओं के सम्पूर्ण बलों को काट डालते हैं॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप आर्यों को जाने और अनार्यों को भी जानें । व्रतहीनों को वशीभूत करके यज्ञ कर्म करने वालों के लिये उन्हें नष्ट करें । हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! आप सभी यज्ञों में यजमान को प्रेरणा प्रदान करे, ऐसा हम चाहते हैं॥८॥
ये इन्द्रदेव व्रतवानों के निमित्त व्रतहीनों को प्रताड़ित करने तथा आस्तिकों के निमित्त नास्तिकों को विनष्ट करते हैं । वे द्युलोक को क्षति पहुँचाने वाले असुरों को मार डालते हैं। ऐसे प्राचीन पुरुष इन्द्रदेव के बढ़ते हुए यश की ‘वम्रषि' ने स्तुति की॥९॥
हे इन्द्रदेव ! ‘उशना' अघ ने अपनी स्तुतियों से आपके बल को तीक्ष्ण किया। आपके उस बल की प्रचण्डता से द्युलोक और पृथ्वी भय से युक्त हुए । मनुष्यों से स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! इच्छा मात्र से योजित होने वाले अश्वों द्वारा हमारे निमित्त अन्नादि से पूर्ण होकर यशस्वी होने यहाँ आएँ॥१०॥
'उशना' की स्तुति से प्रसन्न होकर इन्द्रदेव अति वेग वाले अश्वों पर आरूढ़ हुए । तदनन्तर मेघ से जलप्रवाहों को बहाया और शुष्ण' (शोषण करने वाले) असुर के दृढ़ नगरों को ध्वस्त किया॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप सोमरसों को पीने के निमित्त रथ पर अधिष्ठित होकर जाते हैं । जिन सोमरसों से आप प्रसन्न होते हैं, वे शायत द्वारा निष्पन्न हुए थे । आप जैसे ही सोमयज्ञों की कामना करते हैं, वैसे ही आपका उज्ज्वल यश वृद्धि को प्राप्त करता है॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आपने महान् स्तुति करने एवं सोम अभिषव करने वाले कक्षीवान् राजा के लिए अल्प विवेचन योग्य विद्याओं को अभिव्यक्त किया । हे उत्तम कर्मा इन्द्रदेव ! आपने वृषणश्व राजा के निमित्त प्रेरक वाणियाँ प्रकट कीं । आपके ये सभी कर्म सोम सवनों में बताने योग्य हैं॥१३॥
निराश्रितों के लिए एकमात्र इन्द्रदेव ही आश्रय देने वाले हैं । द्वार में स्थिर स्तम्भ की भाँति इन्द्रदेव के आश्रय के लिए प्रजाओं में इन्द्रदेव की स्तुति अनवरत स्थिर रहती हैं। अश्वों, गायों, रथों और धनों के शासक इन्द्रदेव ही प्रजाओं को अभीष्ट ऐश्वर्य प्रदान करते रहते हैं॥१४॥
हम बलशाली, स्वप्रकाशित, सत्यरूप सामर्थ्यवाले, श्रेष्ठ इन्द्रदेव का स्तुतियों सहित अभिवादन करते हैं । हे इन्द्रदेव ! इस संग्राम में हम सभी शूरवीरों सहित आपके आश्रय में उपस्थित हैं॥१५॥

सूक्त - ५२

हे अध्वर्यु ! उन शत्रुओं से स्पर्धा करने वाले, धनदान के निमित्त अभीष्ट स्थल पर जाने वाले इन्द्रदेव का विधिवत् पूजन करो । अश्व के समान शीघ्रता से यज्ञ स्थल पर पहुँचने वाले इन्द्रदेव के श्रेष्ठ यश की, अपनी रक्षा के लिए स्तुति करते हुए हम उन्हें रथ की ओर लौटा रहे हैं॥१॥
सोमयुक्त हविष्यान्न पाकर हर्षित होते हुए इन्द्रदेव ने जल प्रवाहों के अवरोधक वृत्र को मारकर पानी में बहाया । जल प्रवाहों को संरक्षण प्रदान करने के निमित्त इन्द्रदेव अपने बलों को बढ़ाकर जलों में पर्वत की भाँति अविचल स्थिर हो गये॥२॥
वे इन्द्रदेव शत्रुओं के लिए विकराल शत्रुरूप हैं। वे आकाश में व्याप्त आह्वादरूप हैं। विद्वानों द्वारा प्रदत्त सोम से वृद्धि को पाते हैं। महान् ऐश्वर्यदाता इन्द्रदेव को हविष्यान्न से तृप्त करने के निमित्त हम उत्तम स्तुतिरूपी वाणी द्वारा बुलाते हैं॥३॥
जैसे नदियाँ समुद्र को पूर्ण करती हैं, वैसे ही कुश के आसन पर प्रतिष्ठित हुए द्युलोक निवासक इन्द्रदेव को तृप्त करते हैं। अपनी इच्छा से सुखपूर्वक, बलवान्, संरक्षक, शत्रुरहित, शुभ्र कान्ति वाले मरुद्गण वृत्र हनन करने में उन इन्द्रदेव की सहायता करते हैं॥४॥
सोमपान से हर्षित हुए इन्द्रदेव उत्तम वृष्टि न करने वाले असुर से युद्ध हेतु उद्यत हुए । संरक्षक मरुद्गण भी नदियों के प्रवाह की तरह उनकी ओर अभिमुख हुए। सोम से वृद्धि पाने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव ने उस असुर को बलपूर्वक मारकर तीनों सीमाओं को मुक्त किया॥५॥
जब वृत्र - असुर जलों को बाधित कर अंतरिक्ष के गर्भ में सो गया था, तब जलों को मुक्त करने के लिए हे इन्द्रदेव ! आपने कठिनता से वश में आने वाले वृत्र की ठोड़ी पर वज्र से प्रहार किया। इससे आपकी कीर्ति सर्वत्र फैली और बल प्रकाशित हुआ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! जैसे जलप्रवाह जलाशय को प्राप्त होते हैं, वैसे आपकी वृद्धि करने वाले हमारे मन्त्र रूप स्तोत्र आपको प्राप्त होते हैं। त्वष्टादेव ने अपने बल को नियोजित कर आपके बल को बढ़ाया और शत्रु को पराभूत करने में समर्थ आपके वज्र को तीक्ष्ण किया॥७॥
हे श्रेष्ठ कर्म सम्पादक इन्द्रदेव ! आपने घोड़ों पर चढ़कर, फौलादी वज्र को बाहुओं में धारण कर मनुष्यों के हितों के लिए वृत्र को मारा,जल मार्गों को खोला और दर्शन के लिए सूर्यदेव को द्युलोक में प्रतिष्ठित किया॥८॥
वृत्र के भय से मनुष्यों ने आनन्ददायक, बलप्रद, आह्लादक और स्वर्गक उक्तियों की रचना की । तब मनुष्यों के हितार्थ युद्ध करने वाले, उनके निमित्त श्रेष्ठ कर्म करने वाले, आकाश - रक्षक इन्द्रदेव की मरुद्गणों ने आकर सहायता कीं॥९॥
हे इन्द्रदेव ! सोमपान जनित हुर्ष से आपने द्युलोक और पृथ्वी को प्रताड़ित करने वाले वृत्र के सिर को अपने वज्र के बलपूर्वक आघात द्वारा काट दिया। व्यापक आकाश भी उस वृत्र के विकराल शब्द से प्रकम्पित हुआ॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! जब पृथ्वी दस गुने साधनों से युक्त हो जाय और मनुष्य भी दिनों-दिन वृद्धि को प्राप्त होते रहें, तब हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आपका बल और पराक्रम भी पृथ्वी से द्युलोक तक सर्वत्र फैलकर प्रसिद्ध हो॥११॥
हे संघर्षक मनवाले इन्द्रदेव ! इस अंतरिक्ष के ऊपर रहते हुए आपने अपने ज्योतिर्मय स्वरूप के संरक्षण के लिए इस पृथ्वी को बनाया । स्वयं अन्तरिक्ष और द्युलोक को व्याप्त करके बल की प्रतिमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आप विस्तृत भूमि के प्रतिरूप हैं । आप महान् बलों से युक्त व्यापक आकाश लोक के भी स्वामी हैं और अपनी महत्ता से सम्पूर्ण अन्तरिक्ष को पूर्ण करते हैं। नि:सन्देह आपके समान अन्य कोई नहीं है॥१३॥
जिनके विस्तार को द्यावा और पृथिवीं नहीं पा सकते । अन्तरिक्ष का जल भी जिनके अन्त को नहीं पा सकते । उत्तम वृष्टि में बाधक वृत्र के साथ युद्ध करते हुए जिनके उत्साह की तुलना नहीं की जा सकती, ऐसे हे इन्द्रदेव ! आप अकेले ही सब में व्याप्त होकर अन्यान्य विश्वों को भी प्रकट करते हैं॥१४॥
हे इन्द्रदेव ! वृत्र के साथ सभी युद्धों में मरुतों ने आपकी अर्चना की तथा सभी देवों ने आपको उत्साहित किया, तब आपने वृत्र के मुख पर, दुष्ट बुद्धि वालों को मारने वाले वज्र का प्रहार किया॥१५॥

सूक्त - ५३

हम विवस्वान् के यज्ञ में महान् इन्द्रदेव की उत्तम वचनों से स्तुति करते हैं। जिस प्रकार सोने वालों का धन चोर सहजता से ले जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रदेव ने (असुरों के) रत्नों को प्राप्त किया। धन दान करने वालों की निन्दा करना सराहनीय नहीं है॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप अश्वों, गौवों, धन-धान्यों के देने वाले हैं। आप, सबका पालन-पोषण करते हुए उन्हें उत्तम कर्म की प्रेरणा प्रदान करने वाले तेजस्वी वीर हैं। आप संकल्पों को नष्ट न करने वाले तथा मित्रों के भी मित्र हैं । इस प्रकार हम आपकी स्तुति करते हैं॥२॥
शंक्तिशाली, बहु-कर्मा, दीप्तिमान् हे इन्द्रदेव ! सम्पूर्ण धन आपका ही है - यह सर्वज्ञात है । वृत्र का पराभव करके उसका धन लेकर, हमें उससे अभिपूरित करें। आप अपने प्रशंसकों की कामना को अवश्य पूर्ण करें॥३॥
इन तेजस्वी हवियों और तेजस्वी सोमरसों द्वारा तृप्त होकर हे इन्द्रदेव ! हमें गौओं और घोड़ों (पोषण और प्रगति) से युक्त धनों को देकर हमारी दरिद्रता का निवारण करें । सोमरसों से तृप्त होने वाले, उत्तम मन वाले, इन्द्रदेव के द्वारा हम शत्रुओं को नष्ट करते हुए द्वेषरहित होकर अन्नों से सम्यक् रूप से हर्षित हों॥४॥
है इन्द्रदेव ! हम धन-धान्यों से सम्पन्न हों, बहुतों को हर्ष प्रदान करने वाली सम्पूर्ण तेजस्विता तथा बलों से सम्पन्न हों । हम वीर पुत्रों, श्रेष्ठ गौवों एवं अश्वों को प्राप्त करने की उत्तम बुद्धि से युक्त हों॥५॥
हे सज्जनों के पालक इन्द्रदेव ! वृत्र को मारने वाले संग्राम में आपने बलवर्द्धक सोमरस का पान करके आनन्द एवं उत्साह को प्राप्त किया और तब आपने संकल्प लेकर याजकों के निमित्त दस हज़ार असुरों का संहार किया॥६॥
हे संघर्षशील शक्ति -सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप शत्रु योद्धाओं से सर्वदा युद्ध करते रहे हैं, उनके अनेकों नगरों को आपने अपने बल से ध्वस्त किया है। उन नमनशील, योग्य मित्र, मरुतों के सहयोग से आपने प्रपंची असुर ‘नमुचि' को मार दिया है॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आपने ‘अतिथिग्व' को प्रताड़ित करने वाले 'करंज' और 'पर्णय' नामक असुरों का तेजस्वी अस्त्रों से वध किया। सहायकों के बिना ही 'वंगृद' के सैकड़ों नगरों को गिराकर घिरे हुए ज़िश्वा' को मुक्त किया॥८॥
हे प्रसिद्ध इन्द्रदेव ! आपने बन्धु-रहित ‘सुश्रवस' राजा के सम्मुख लड़ने के लिये खड़े हुए बीस राजाओं को तथा उनके साठ हजार निन्यानवे सैनिकों को अपने दुषाप्य चक्र (व्यूह- अथवा गतिशील प्रक्रिया) द्वारा नष्ट कर दिया॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपने रक्षण - साधनों से ‘सुश्रवस' की और पोषण साधनों से ‘तूर्वयाण' की रक्षा की। आपने इस महान् तरुण राजा के लिये ‘कुत्स'' अतिथिग्व' और 'आयु' नामक राजाओं को वश में किया॥१०॥
यज्ञ में स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! देवों द्वारा रक्षित , हम आपके मित्र हैं। हमें सर्वदा सुखी हों। आपकी कृपा से हम उत्तम बलों से युक्त दीर्घ आयु को भली प्रकार धारण करते हैं तथा आपकी स्तुति करते हैं॥११॥

सूक्त - ५४

जल एवं नदियों को गतिशील बनाने वाले हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आप महान् शक्ति सम्पन्न हैं। हमें युद्ध जन्य दुःखों से बचायें एवं हम सबको भय मुक्त करें॥१॥
हे मनुष्यो ! सर्वशक्तिमान्, साधनों से सम्पन्न, तेजस्वी इन्द्रदेव को आप पूजन करें । स्तुतियों को सुनने वाले इन्द्रदेव की महत्ता का गान करें । प्रचण्ड शक्ति से वर्षा करने वाले इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य से युक्त होकर सबके अभीष्ट की वर्षा करते हैं। अपने बल से ‘पृथ्वी ' और 'द्युलोक' को समायोजित करते हैं॥२॥
इन्द्रदेव शत्रुओं के विनाश के लिये शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से सम्पन्न हैं। ऐसे तेजस्वी और महान् आत्मबल सम्पन्न इन्द्रदेव को आदरयुक्त वचनों द्वारा पूजन करें । वे इन्द्रदेव महान् यशस्वी प्राणशक्ति को बढ़ाने वाले शत्रु-नाशक, अश्वयोजित रथ पर अधिष्ठित हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने प्रपंची असुर के सैन्य दल को उत्साहपूर्वक तीक्ष्ण वज्र के प्रहार से नष्ट कर दिया है। आप विशाल द्युलोक के उच्च स्थान को प्रकम्पित करते हैं और अपने बल से असुर 'शम्बर को मार गिराते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपने गर्जना करते हुए, जलों को वृष्टि के लिये प्रेरित करने के निमित्त 'शुष्ण' का वध किया। प्राचीन काल से आज तक आप सामर्थ्यवान् मन से यहीं काम करते आये हैं। आपके ऊपर कौन है, जो आप को रोक सके ?॥५॥
सैकड़ों यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म सम्पन्न करने वाले हे इन्द्रदेव ! आपने युद्ध जन्य कठिन परिस्थितियों में नर्य, तुर्वश, युद्ध तथा वय्य कुलोत्पन्न तुर्वीति की रक्षा की । आपने शत्रुओं के निन्यानवे (अर्थात् अनेकों) नगरों को ध्वस्त करके रथ और एतश नामक ऋषि को संरक्षित किया है॥६॥
जो राजा सत्कर्मों का पोषक और समृद्धिशाली है, उसके शासन में रहने वाले मनुष्य उत्तम हवि को देने वाले होते हैं। वे हविष्यान्न के साथ उत्तम वचनों द्वारा स्तुतियाँ करते हैं । उसी राज्य के लिये दानशील इन्द्रदेव द्युलोक से मेघों द्वारा वृष्टि करते हैं॥७॥
सोम पान करने वाले है इन्द्रदेव ! आपके बल की, बुद्धि की और हर्षदायक कर्मों की तुलना नहीं की जा सकती । हवि समर्पित करने वाले मनुष्यों को दिये गये आपके अनुदान, महान् पराक्रम की महत्ता और सामर्थ्य को बढ़ाने वाले हैं॥८॥
हे इन्द्रदेव! पाषाणों से कूटकर और छानकर बहुत से पात्रों में पेय सोम रखा हुआ है । यह सोम आपके निमित्त है। आप इसे पानकर अपनी इच्छा को तृप्त करें, तत्पश्चात् उत्साहपूर्वक हमें अपार धन-वैभव प्रदान करें॥९॥
जल - प्रवाहों को रोकने वाले पर्वत रूप वृत्र ने अपने उदर में जलों को स्थिर कर लिया, जिससे तमिस्रा व्याप्त हुई, तब इन्द्रदेव ने वृत्र द्वारा रोके हुए जल-प्रवाहों को मुक्त करके नीचे की ओर बहाया॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप सुख, यश, सभी लोगों को वशीभूत करने वाला राज्य और प्रशंसित सामर्थ्य हममें स्थापित करें । हमारे धनों की रक्षा करते हुए हमें उत्तम संतान एवं अधिकाधिक धन-धान्य प्रदान कर ऐश्वर्यवान् बनायें॥११॥

सूक्त - ५५

इन्द्रदेव की श्रेष्ठता पृथ्वी से द्युलोक तक विस्तृत है । अपने बल से उन्हें पराजित करने वाला कोई नहीं है । शत्रुओं के प्रति अत्यन्त विकराल, बलवान् शत्रुओं को संतप्त करने वाले इन्द्रदेव अपने वज्र का प्रहार करने के लिये उसे उसी प्रकार तीक्ष्ण करते हैं, जैसे बैल लड़ने के लिये अपने सींगों को तेज करता है॥१॥
वे इन्द्रदेव अपनी उत्कृष्टता से अन्तरिक्ष में व्याप्त जल - प्रवाहों को, समुद्र द्वारा नदियों को धारण करने के समान धारण करते हैं । वे इन्द्रदेव सोम पीने की तीव्र अभिलाषा रखते हैं । चिरकाल से वे युद्धों में अपनी सामर्थ्य के बल पर प्रशंसा को प्राप्त होते रहे हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप महान् बलों के धारणकर्ता हैं । अपने बल से पर्वत के समान दृढ़, शत्रुओं (मेघों) को विदीर्ण कर, प्रजाओं के भोग के लिये जल देकर उन पर शासन करते हैं। आप सभी कर्मों में अग्रणी और बलों के कारण देवों में श्रेष्ठ माने जाते हैं॥३॥
मनुष्यों में अपनी सामर्थ्य को प्रकट करते हुए सुन्दर रूप वाले वे धनवान् और बलवान् इन्द्रदेव, विनयशीलों की स्तुतियों को सुनकर प्रसन्न होते हैं तथा धनादि की कामना करने वालों को अभीष्ट पदार्थ प्रदान करते हैं॥४॥
वे वीर इन्द्रदेव मनुष्यों के हित के लिए अपने महान् बल से बड़े-बड़े युद्धों को जीतते हैं। अपने घातक वज्र से शत्रुओं का विनाश करते हैं, जिससे मनुष्य तेजस्वी इन्द्रदेव के आगे श्रद्धा से झुकते हैं॥५॥
वे यश की इच्छा वाले, उत्तमकर्मा इन्द्रदेव अपने तेजस्वी बलों से शत्रुओं के घरों को नष्ट करते हुए वृद्धि को प्राप्त हुए, सूर्यादि नक्षत्रों के प्रकाश को रोकने वाले आवरणों को दूर किया और याजक के लिए जलों के प्रवाह को खोल दिया॥६॥
सोमपान करने वाले हे इन्द्रदेव ! आपका मन दान के लिये प्रवृत्त हो । आप हमारी स्तुतियाँ सुनते हैं। अपने अश्वों को हमारे यज्ञ की और अभिमुख करें । हे इन्द्रदेव ! आपके ये सारथी नियंत्रण में पूर्ण कुशल हैं, जिससे ये प्रबल अवरोधों से भी विचलित नहीं होते॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने दोनों हाथों में अक्षय धन को धारण करते हैं । आपके शरीर में प्रचण्ड बल स्थापित है । स्तुति करने वालों ने आप के शरीरों को बढ़ाया है। मनुष्यों से घिरे कुएँ के समान आपके शरीर प्रसिद्ध कर्मों से घिरे हुए हैं॥८॥

सूक्त - ५६

जगत् का पोषण करने वाले इन्द्रदेव यजमान के बहुसंख्यक सोमपात्रों को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकारते हैं। वे यजमान, सुन्दर अश्वों से योजित, दीप्तिमान् स्वर्णिम रथ में घिरे बैठे महान् बलवान् इन्द्रदेव को सोम पिलाते है॥१॥
जिस प्रकार धन के इच्छुक समुद्र की ओर प्रस्थान करते हैं, उसी प्रकार हविदाता यजमान इन्द्रदेव की ओर हवि ले जाते हुए विचरण करते हैं । हे स्तोता ! जैसे नदियाँ पहाड़ को घेरती हुई चलती हैं, वैसे ही आपकी स्तुतियाँ महान् बलों के स्वामी, यज्ञ के स्वामी, संघर्षक इन्द्रदेव को अपनी तेजस्विता से आवृत कर लें॥२॥
वे महान् इन्द्रदेव शत्रुओं का नाश करने वाले और फौलादी कवच को धारण करने वाले हैं। वे मायावी असुर “शुष्ण” को कारागार में रस्सियों से बाँधकर रखते हैं। उनका निन्दारहित बल संग्राम में पर्वत-शिखर तुल्य प्रतिभासित होता है॥३॥
हे स्तोता ! सूर्यदेव के द्वारा देवी उषा को प्राप्त करने के समान आपके स्तवन द्वारा प्रवृद्ध बल इन्द्रदेव को प्राप्त होता है, तब वे अपने संघर्षशील बल से दुष्कर्म रूपी तमिस्रा का निवारण करते हैं । शत्रुओं को रुलाने में समर्थ इन्द्रदेव संग्राम में (सेना के माध्यम से) बहुत धूलि उड़ाते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपने बादलों द्वारा धारण किये हुए जलों को आकाश की दिशाओं में स्थापित किया। सोम से हर्षित होकर संघर्षक बल से वृत्र को युद्ध में मारा, तब वृत्र द्वारा ढके जलों को नीचे की ओर प्रवाहित किया॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपने महान् बल से जलों को अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर स्थापित किया। आपने सोम पीकर उत्साहपूर्वक संघर्षक बल से वृत्र को मारा और पृथ्वी के सब स्थानों को जलों से तृप्त किया॥६॥

सूक्त - ५७

अत्यन्त दानी, महान् ऐश्वर्यशाली, सत्य-स्वरूप, पराक्रमी इन्द्रदेव की हम बुद्धिपूर्वक स्तुति करते हैं । नीचे की ओर प्रवाहित ज्ञल - प्रवाहों के समान इनके बलों को कोई भी धारण नहीं कर सकता। जिस बल से प्राप्य ऐश्वर्य को मनुष्यों के लिये जीवन भर प्रदान करने का उनका व्रत खुला हुआ है॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आपका स्वर्ण सदृश दीप्तिमान् मारक वज्र मेघों को विदीर्ण करने में तत्पर हुआ, तब हे इन्द्रदेव ! सारा जगत् आपके लिए यज्ञ-कर्मों में संलग्न हुआ। जल के नीचे की ओर प्रवाहित होने के समान याजकों के द्वारा समर्पित सोम आपकी ओर प्रवाहित हुआ॥२॥
हे दीप्तिमति उषे ! शत्रुओं के प्रति विकराल और प्रशंसनीय उन इन्द्रदेव के लिये नमस्कार के साथ यज्ञ सम्पादन करें, जिनका धाम (स्थान) अन्नादि दान के लिये अत्यन्त प्रसिद्ध है, जिनकी सामर्थ्य और कीर्ति अश्व के सदृश सर्वत्र संचरित होती है॥३॥
हे सम्पत्तिवान् एवं बहुप्रशंसित इन्द्रदेव ! आपके संरक्षण में कार्य करते हुए, निष्ठापूर्वक रहते हुए, आपके समान अन्य स्तुत्य देवता के न रहने के कारण, हम आपकी स्तुति करते हैं। सभी पदार्थों को स्वीकार करने वाली पृथ्वी के समान आप भी हमारे स्तोत्रों को स्वीकार करें॥४॥
हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! स्तुति करने वाले इन साधकों की कामनायें पूर्ण करें। आप अत्यन्त बलवान् हैं। यह महान् द्युलोक भी आपके बल पर ही स्थित है और यह पृथ्वी भी आपके बल के आगे झुकती है॥५॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने महान् बलशाली मेघों को अपने वज्र से खण्ड-खण्ड किया और रुके जल-प्रवाहों को बहने के लिए मुक्त किया। केवल आप ही सब संघर्षक शक्तियों को धारण करते हैं, यही सत्य है॥६॥

सूक्त - ५८

निश्चित रूप से बलों से उत्पन्न (अरणि - मन्थन द्वारा उत्पन्न) यह अमर अग्निदेव कभी संतप्त नहीं होते। वे यजमान के दूत रूप में सहायक होते हैं । वे अपने उत्तम मार्गों से अन्तरिक्ष में प्रकाशित होते हुए गमन करते हैं। देवों को समर्पित हविष्यान्न उन तक पहुँचाकर सम्मानित करते हैं॥१॥
कभी जीर्णता को न प्राप्त होने वाले अग्निदेव, हवियों के साथ मिलकर इनका भक्षण करते हुए समिधाओं पर दीप्तिमान् होते हैं। घृत के सिंचन से ऊपर उठती हुई इनकी ज्वालायें सज्जित अश्व के सदृश सुशोभित होती हैं । ये आकाशस्थ मेघ के गर्जन के समान शब्द करते हुए वृद्धि को प्राप्त होते हैं॥२॥
यज्ञादि कर्मों के सम्पादन में कुशल, रुद्रों और वसुओं द्वारा अग्रिम रूप में स्थापित, होता रूप, अविनाशी, धन-प्रदाता, प्रतिष्ठित अग्निदेव, याजकों की स्तुतियों से, रथ के समान बढ़ती हुई प्रजाओं में क्रमश: वरण करने योग्य श्रेष्ठ धनों को स्थापित करते हैं॥३॥
वायु के संयोग से समिधाओं पर प्रज्वलित अग्निदेव तेजस्वी ज्वालाओं के साथ शब्दायमान होते हुए सुशोभित हो रहे हैं। हे अजर, दीप्तिमान् अग्निदेव ! आप अपनी प्रखर शक्ति से वनों को (समिधाओं को) प्रभावित करते हुए काले धूम्र के रूप में उठकर अपनी उपस्थिति का बोध करा रहे हैं॥४॥
वायु द्वारा प्रेरित, प्रज्वलित तेजस्वी झ्यालाओं रूपी दाढ़ वाले अग्निदेव वनों में गो समूह के बीच स्वच्छन्द बैल की तरह घूमते हैं । जब ये अनन्त अन्तरिक्ष में पक्षों के समान वेग से घूमते हैं, तो सारे स्थावर जंगम भयभीत हो उठते हैं॥५॥
हे अग्निदेव ! मनुष्यों द्वारा सुख प्राप्ति के निमित्त, आहवनीय, होतारूप, अतिथिरूप, पूज्य, वरण करने योग्य, मित्र तुल्य, सुखद, तेजस्वी, धन के सदृश सुन्दर रूप वाले आपको, भृगुओं ने मनुष्यों में देवत्व की प्राप्ति के लिए स्थापित किया॥६॥
आवाहन करने वाले सात ऋत्विज् और होतागण यज्ञों में श्रेष्ठ होता रूप अग्निदेव का वरण करते हैं। उन सम्पूर्ण धनों को देने वाले अग्निदेव की हविष्यान्न द्वारा सेवा करते हुए, हम उनसे रत्नों की याचना करते हैं॥७॥
बल के पुत्र, श्रेष्ठ मित्र रूप में अग्निदेव ! हम स्तोताओं को आज श्रेष्ठ सुख प्रदान करें । बलों को न क्षीण करने वाले हे अग्निदेव ! आप अपने फौलादी दुर्गों से जैसे हम स्तोताओं की रक्षा करते हैं, वैसे आप हमें पापों से रक्षित करें॥८॥
हे देदीप्यमान् अग्निदेव ! स्तोता के लिये आप आश्रयरूप हों । हे ऐश्वर्यंशालिन् अग्निदेव ! आप धन वाले याजक के लिये सुख प्रदायक हों । स्तोताओं को पापों से रक्षित करें । विचारपूर्वक वैभव देने वाले हैं। अग्निदेव ! आप प्रात:काल (यज्ञ में) शीघ्र पधारें॥९॥

सूक्त - ५९

हे अग्निदेव ! समस्त अग्नियाँ आपकी ज्वालाएँ हैं। सब देव आपसे आनन्द पाते हैं । हे वैश्वानर ! आप सब प्राणियों का पोषण करने वाले नाभि (केन्द्र) हैं। आप स्तम्भ (यूप) की तरह सभी लोगों के आधार रूप हैं॥१॥
ये अग्निदेव आकाश के शिर और पृथ्वी की नाभि हैं । (सूर्य रूप में आकाश के शीर्ष तथा यज्ञ रूप में पृथ्वी की नाभि हैं ।) ये आकाश-पृथ्वी के अधिपति हैं। इन देव को सभी देव प्रकट करते हैं। हे वैश्वानर अग्निदेव ! श्रेष्ठजनों के लिये भी आपने ज्योति रूप प्रकाश दिया है॥२॥
सूर्यदेव से सर्वदा प्रकाश किरणों के नि:सृत होने के समान वैश्वानर अग्निदेव से सभी धन प्राप्त होते हैं । हे अग्निदेव ! आप सभी पर्वतों, ओषधियों, जलों और मानवों में स्थित धनों के राजा हैं॥३॥
द्यावा-पृथिवी इस पु-रूप (गर्भ में रहने वाले) वैश्वानर अग्निदेव के लिये बृहत् स्वरूप को प्राप्त हुई हैं। मनुष्यों में श्रेष्ठ, ये होता प्रकाशित और सत्य बल से युक्त वैश्वानर अग्निदेव के लिये पुरातन स्तुतियों का गायन करते हैं॥४॥
हे प्राणियों के ज्ञाता, मनुष्यों में व्याप्त अग्निदेव ! आपकी महत्ता व्यापक एवं द्युलोक से भी अधिक बड़ी है । आप मानव मात्र के अधिपति हैं । संघर्षशील हमारा जीवन दैवी सम्पदाओं से अभिपूरित हो॥५॥
अब उन बलवान् अग्निदेव की महत्ता का वर्णन करते हैं । ये वैश्वानर अग्निदेव जलों के चोर वृत्र का वध करते हैं। सब मनुष्य उस वृत्र नाशक अग्निदेव का आश्रय लेते हैं । दिशाओं को कम्पित करने वाले वे 'शंबर' असुर का भेदन करते हैं॥६॥
ये वैश्वानर (विश्व पुरुष) अग्निदेव अपनी महिमा से सब मनुष्यों के स्वामी हैं । अन्नदाताओं में अतिपूजनीय और वैभवशाली हैं। ‘शतवन' के पुत्र ‘पुरुनीथ' के यज्ञ में सत्यवान् अग्निदेव की सैकड़ों स्तोत्रों से स्तुति की जाती है॥७॥

सूक्त - ६०

हुविवाहक, यशस्वी, यज्ञ पताका सदृश लहराने वाले, उत्तम रक्षक, शीघ्र धन प्रदायक, देवताओं तक हवि पहुँचाने वाले, द्विज (अरणि मंथन और मंत्ररूप विद्या इन दो के द्वारा उद्भूत), धन के समान प्रशंसित अग्निदेव को वायुदेव ने भृगु का मित्र बनाया॥१॥
देवों को हवि समर्पित करते हुए समुन्नत जीवन जीने वाले तथा सामान्य जीवन जीने वाले मनुष्य दोनों अग्निदेव के शासन में ही रहते हैं। पूजनीय, जलवर्षक, प्रजापालक, होतारूप अग्निदेव सूर्योदय से पहले ही (याजकों द्वारा यज्ञवेदी पर यज्ञाग्नि के रूप में) प्रकट होते हैं॥२॥
जीवन-संग्राम में विजयी होते हुए, उन्नति की आकांक्षा करने वाले मनुष्य जिन अग्निदेव को उत्पन्न करते हैं, उन, प्रत्येक हृदय में विराजमान, मधुर वाणी वाले, उत्तम, यशस्वी अग्निदेव को हमारी नवीन स्तुतियाँ प्राप्त हों॥३॥
धन-वैभव प्राप्त करने की कामना से पवित्रता प्रदान करने वाले ये अग्निदेव, याजकों द्वारा होतारूप में वरण किये जाते हैं । दोषों का दमन करने वाले, गृह पालक, श्रेष्ठ ऐश्वर्य के स्वामी, ये अग्निदेव यज्ञों में वेदी पर स्थापित किये जाते हैं॥४॥
हे अग्निदेव ! हम गौतम वंशज आपकी अपनी बुद्धि से प्रशंसा करते हैं। अन्न देने वाले, पवित्र करने वाले, अश्व की तरह बल, सम्पन्न आप, हमें धन प्राप्त करने का कौशल प्रदान करें और प्रात:काल (यज्ञ में ) शीघ्र ही पधारें॥५॥

सूक्त - ६१

शीघ्र कार्य करने वाले, मंत्रों द्वारा वर्णनीय, महान् कीर्ति वाले, अबाध गति वाले इन्द्रदेव के लिये हम प्रशंसात्मक मंत्रों का गान करते हुए हविष्यान्न अर्पित करते हैं॥१॥
हम उन इन्द्रदेव के निमित्त हविष्य के समान स्तोत्र अर्पित करते हैं। शत्रुनाशक इन्द्रदेव के लिए हम उत्तम स्तुति गान करते हैं । ऋषिगण उन पुरातन इन्द्रदेव के लिए हृदय, मन और बुद्धि के द्वारा पवित्र स्तुति करते हैं॥२॥
हम महान् विद्वान् इन्द्रदेव को आकृष्ट करने वाली, उनकी महिमा के अनुरूप उत्तम स्तुतियों को निर्मल बुद्धि से नादपूर्वक उच्चारित करते हैं॥३॥
जैसे त्वष्टादेव रथ का निर्माण करके इन्द्रदेव को प्रदान करते हैं, वैसे ही हम समस्त कामनाओं को सिद्ध करने वाले, स्तुत्य, मेधावी इन्द्रदेव के लिए अपनी वाणियों से सर्व प्रसिद्ध श्रेष्ठ स्तोत्रों का गान करते हैं॥४॥
अश्व को रथ से नियोजित करने के समान हम धन की कामना से इन्द्रदेव के निमित्त स्तोत्रों को वाणी से युक्त करते हैं । हम उन वीर, दानशील, विपुल यशस्वी, शत्रु के नगरों को ध्वस्त करने वाले इन्द्रदेव की वन्दना करते हैं॥५॥
लक्ष्य को भली प्रकार बेधने वाले, शक्तिशाली वज्र को त्वष्टादेव ने युद्ध के निमित्त इन्द्रदेव के लिए तैयार किया। उसी वज्र से शत्रुनाशक, अतिबलवान् इन्द्रदेव ने वृत्र के मर्म स्थान पर प्रहार करके उसे मारा॥६॥
वृष्टि के द्वारा माता की भाँति जगत् का श्रेष्ठ निर्माण करने वाले, महान् इन्द्रदेव ने यज्ञों में हवि का सेवन किया और सोम का शीघ्र पान किया । उन सर्व व्यापक इन्द्रदेव ने शत्रुओं के धन को जीता और वज्र का प्रहार करके मेघों का भेदन किया॥७॥
'अहि' (गति हीनों) का हनन करने पर देव-पत्नियों ने इन्द्रदेव की स्तुति की । इन्द्रदेव ने फिर पृथ्वीलोक और द्युलोक को वश में किया। दोनों लोकों में उनकी सामर्थ्य के सामने कोई ठहर नहीं सकता॥८॥
इन्द्रदेव की महत्ता आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष से भी विस्तृत है । स्वयं प्रकाशित, सर्वप्रिय, उत्तम योद्धा, असीमित बल वाले इन्द्रदेव युद्ध के लिए अपने वीरों को प्रेरित करते हैं॥९॥
इन्द्रदेव ने अपने बल से शोषक वृत्र को वज्र से काट दिया और अपहत गायों के समान रोके हुए जलों को मुक्त किया । हविदाताओं को अन्नों से पूर्ण किया॥१०॥
इन्द्रदेव के बल से ही नदियाँ प्रवाहित हुईं; क्योंकि इन्होंने ही वज्र से (पर्वतों- भूखण्ड़ों को काटकर, प्रवाह-पथ बनाकर) इन्हें मर्यादित कर दिया है । शत्रुओं को मारकर सभी पर शासन करने वाले इन्द्रदेव हविदाता को धन देते हुए ‘तुर्वणि' अर्थात् शत्रुओं से मोर्चा लेने वाले की सहायता करते हैं॥११॥
हे इन्द्रदेव ! अति वेगवान्, सबके स्वामी, महाबली आप इस वृत्र पर वज्र का प्रहार करें और इसके जोड़ों को तिरछे (वज्र के) प्रहार से भूमि के समान (समतल) काट दें । इस प्रकार जलों को मुक्त करके प्रवाहित करें॥१२॥
हे मनुष्य ! इन्द्रदेव के पुरातन कर्मों की आप प्रशंसा करें । युद्ध में वे शीघ्रता से शस्त्रों का प्रहार करके समाज को हानि पहुँचाने वाले शत्रुओं को विनष्ट करते हैं॥१३॥
इन इन्द्रदेव के भय से दृढ़ पर्वत, आकाश, पृथ्वी और सभी प्राणी काँपते हैं । नोधा ऋषि इन्द्रदेव के श्रेष्ठ रक्षण सामथ्र्यों का वर्णन करते हुए उनके अनुग्रह से बलशाली हुए थे॥१४॥
बहुत से धनों के एकमात्र स्वामी इन्द्रदेव जो इच्छा करते हैं, वही स्तोताओं के द्वारा अर्पित किया जाता है। इन्द्रदेव ने स्वश्व के पुत्र 'सूर्य' के साथ स्पर्धा करने वाले तथा सोमयाग करने वाले 'एतश' त्रग्रंप को सुरक्षा प्रदान की॥१५॥
हरे रंग के अश्वों से योजित रथ वाले हे इन्द्रदेव ! गौतम वंशजों ने आपके निमित्त आकर्षक मंत्रयुक्त स्तोत्र का गान किया है । इनका आप ध्यानपूर्वक श्रवण करें । विचारपूर्वक अपार धन वैभव प्रदान करने वाले इन्द्रदेव हमें प्रात: (यज्ञ में) शीघ्र प्राप्त हों॥१६॥

सूक्त - ६२

हम इन्द्रदेव के शक्ति संवर्धक स्तवन से परिचित हैं। शक्ति की आकांक्षा युक्त, श्रेष्ठ वाणियों से सम्पन्न, ज्ञानवान् , शक्ति - पराक्रम से विख्यात इन्द्रदेव की अंगिरा के सदृश स्तुति मंत्रों से अर्चना करते हैं॥१॥
हे ऋत्विजों ! आप महान् पराक्रमी इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए स्तुति एवं सामगान करते हुए उनको नमन करें । हमारे पूर्वज ऋषियों - अंगिरा आदि ने इसी प्रकार अर्चना द्वारा तेजस्विता को प्राप्त किया था॥२॥
इन्द्रदेव और अंगिराओं की इच्छा से 'सरमा' ने अपने पुत्र के निमित्त अन्नों को प्राप्त किया। महान् देवों के स्वामी इन्द्रदेव ने असुरों को मारा और जलधाराओं को मुक्त किया । जल प्रवाहों को पाकर सभी मनुष्य हर्षित हुए॥३॥
है शक्तिशाली इन्द्रदेव ! स्वर युक्त उत्तम स्तोत्रों से प्रशंसित, आपने तीव्र उत्कण्टा से की गई सप्तऋषियों की नवीन स्तुतियों को सुना। आपने ही बलशाली मेघों को मारा, जिससे देशों दिशाओं में घोर गर्जना हुई॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अंगिरा ऋषियों द्वारा वर्णित स्तुतियों को प्राप्त किया। आपने दर्शनीय देवी उषा और सूर्यदेव की दीप्तिमान् रश्मियों द्वारा तमिस्रा को दूर किया । भूमि प्रदेश को विस्तृत किया । द्युलोक और अन्तरिक्ष को स्थिर किया॥५॥
इन्द्रदेव के अति प्रशंसनीय, सुन्दरतम और दर्शनीय कर्मों में एक यह है कि उन्होंने भूमि के ऊपरी प्रदेश में प्रवाहित चार नदियों को मधुर जल से पूर्ण किया॥६॥
'अयास्य'षि के प्रशंसनीय स्तोत्रों से पूजित इन्द्रदेव ने समान रूप से मिले हुए द्युलोक को दो रूपों, पृथ्वी और आकाश में विभक्त किया । शतकर्मा इन्द्रदेव ने उत्तमरूप से व्याप्त आकाश द्वारा सूर्यदेव को धारण करने के सदृश पृथ्वी और आकाश को धारण किया॥७॥
विविध रूप वाली दो युवतियाँ उषा और रात्रि अपनी गतियों से आकाश में भूमि के चारों ओर सनातन काल से चलती आती हैं । ये कृष्ण वर्ण रात्रि और दीप्तिमती उषा पृथक्-पृथक् होकर चलती हैं, अर्थात् दोनों कभी एक साथ नहीं दिखाई देती हैं॥८॥
उत्तम वृष्टिकारक, बल के पुत्र, उत्तमकर्मा, स्तोताओं से सर्वदा मित्रता करने वाले है इन्द्रदेव ! आप अपरिपक्व गौओं में भी पौष्टिक दूध को स्थापित करते हैं। कृष्ण वर्णा, रोहित वर्ण गौओं में भी श्वेत दूध को स्थापित करते हैं॥९॥
सदैव साथ रहने वाली अंगुलियाँ अपने बल से अनेकों (सहस्रों) स्थिर और अविनाशी कर्मों को करती हैं। जैसे लोग पत्नी को इच्छा पूर्ण करते हैं, वैसी ही स्वयं संचालित अँगुलियाँ अबाधगति वाले इन्द्रदेव की इच्छा पूर्ति करती हैं॥१०॥
हे दर्शनीय इन्द्रदेव ! यज्ञ और वैभव की इच्छा से ज्ञानी जन स्तोत्रों द्वारा आपका पूजन और नमन करते हैं । हे बलवान् इन्द्रदेव ! जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पति को प्रसन्न रखती हैं, वैसे ही की गई स्तुतियाँ आपको प्रसन्नता प्रदान करती हैं॥११॥
हे दर्शनीय इन्द्रदेव ! सनातन काल से आप अपने हाथों में कभी नष्ट न होने वाले अक्षय ऐश्वर्य को धारण करते हैं । हे इन्द्रदेव ! आप दीप्तिमान्, कर्मवान्, धैर्यवान् और सामर्थ्यवान् हैं। अपनी सामथ्र्यों से हमें धन प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान करें॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आप सनातन काल से ही स्थित हैं, उत्तम मार्गों से गमन करने वाले तथा अश्वा को नियोजित करने वाले हैं। आपकी स्तुति के लिये गौतम ऋषि के पुत्र नोधा ऋषि ने नवीन स्तोत्रा की रचना की है। बलवान्, धन की प्रेरणा देने वाले हे इन्द्रदेव ! आप प्रातः काल हमारे पास शीघ्र ही आये॥१३॥

सूक्त - ६३

हे इन्द्रदेव ! आप महान् हैं। आपने उत्पन्न होते ही इस द्यावा-पृथिवी को अपने बल से धारण किया । आपके भय से सुदृढ़ पर्वतों के समूह भी किरणों के सदृश काँपते हैं॥१॥
निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्म करने वाले तथा बहुतों के द्वारा स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! आप जब अपने रथ से विविध कर्म वाले अखों द्वारा आते हैं, तब स्तोता आपके हाथों में वज्र को स्थापित करते हैं। आप उसी वज्र से शत्रुओं के असंख्य नगरों को ध्वस्त करते हैं॥२॥
हे सत्यवान् इन्द्रदेव ! आप ऋभुओं और मनुष्यों के कुशल नायक हैं। शत्रुओं को वश में करने वाले, विजेतारूप हैं । आपने महान् संग्राम में तेजस्वी, युवा कुत्स के सहायक होकर 'शुष्ण' को मारी॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने कुत्स की सहायता कर, प्रसिद्ध विजयरूपी धन प्राप्त किया। जल वर्षण करने वाले, शत्रु विनाशक, वज्रधारी हे इन्द्रदेव ! आपने संग्राम में जब कुत्स के विरोधी वृत्र तथा अन्य शत्रुओं को मार भगाया, तब कुत्स को सम्पूर्ण यश प्राप्त हुआ॥४॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! मनुष्यों पर क्रोध करने वाले सुदृढ़ शत्रु भी आप पर प्रहार नहीं कर पाते । हे इन्द्रदेव ! जैसे हथौड़े से लोहे को पीटते हैं, वैसे ही आप हमारे शत्रुओं पर आघात कर उन्हें मारे । हमारे अश्वों के मार्ग को मुक्त करें अर्थात् हमारी प्रगति का मार्ग बाधाओं से रहित हो॥५॥
हे इन्द्रदेव !धन-प्राप्ति और सुख-प्राप्ति के निमित्त किये जाने वाले युद्ध में मनुष्य अपनी सहायता के लिए आपका आवाहन करते हैं । हे बलों के धारक इन्द्रदेव !संग्राम में योद्धाओं को आपकी सामर्थ्य प्राप्त होती है॥६॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने ‘पुरुकुत्स' के लिए युद्ध करते हुये शत्रु के सात नगरों को तोड़ा और सुदास के लिए शत्रुओं को कुश के समान अनायास काट दिया। आपने ही पुरु के लिए धन प्रदान किया॥७॥
हे महान् बलशाली इन्द्रदेव ! जल को बढ़ाने के सदृश हमारी भूमि में चारों ओर अन्नों की वृद्धि करें । जलों को सर्वत्र बहाने के समान हमें अत्रों को प्रदान करें॥८॥
हे इन्द्रदेव ! गौतम वंशजों ने अश्वों से सम्पन्न आपके निमित्त स्तुति मंत्रों की रचना की । इन श्रेष्ठ स्तोत्रों को गाकर आपका सत्कार किया। हे इन्द्रदेव ! आप हमें श्रेष्ठ बल दें और धनों को प्राप्त करने की बुद्धि दें । प्रात: (यज्ञ की वेला में) हमें आप शीघ्र प्राप्त हों॥९॥

सूक्त - ६४

हे नोधा (शोधकर्ता) ऋषे ! बल पाने के लिए, बल वृद्धि के लिए, उत्तम यज्ञ - सम्पादन के निमित्त और मेधा प्राप्ति के निमित्त मरुद्गणों की श्रेष्ठ काव्यों से स्तुतियाँ करें । यज्ञों में हम होता हाथ जोड़कर हृदय से उनकी अभ्यर्थना करते हैं और जल सिंचन के सदृश उत्तम वाणियों से मंत्रों का गायन करते हैं॥१॥
वे महान् सामर्थ्यवान् प्राणों की रक्षा करने वाले, जीवन में पवित्रता का संचार करने वाले, सूर्य सदृश तेजस्वी, सोम पीने वाले, विकराल शरीरधारी मरुद्गण, रुद्रदेव के मरणधर्मा गणों के समान मानो दिव्य लोक से ही प्रकट हुए हैं॥२॥
युवा शत्रुओं के लिए रुद्ररूप, अजर, कृपणहन्ता, अबाधगति से चलने वाले मरुद्गण पर्वत के सदृश अभेद्य हैं । पृथ्वी और द्युलोक के सभी प्राणियों को अपने बल से ये विचलित कर देते हैं॥३॥
शरीर की शोभा बढ़ाने के उद्देश्य से विविध अलंकारों से सुसज्जित ये मरुद्गण विशेष रूप से आकर्षक हैं। वक्ष पर शोभा के निमित्त ये स्वर्णाभूषण धारण किये हैं। इन मरुतों के कन्धों पर रखे अस्त्रों की दीप्ति सर्वत्र प्रकाशित होती है । ये वीर पुरुष आकाश में अपने बल से उत्पन्न हुए हैं॥४॥
ऐश्वर्य देने वाले स्वामी, शत्रु को कम्पित करने वाले, हिंसकों का नाश करने वाले ये मरुद्गण अपनी सामर्थ्य द्वारा वायु और विद्युत् को उत्पन्न करते हैं । सर्वत्र गमन कर शत्रुओं पर आघात करने वाले ये वीर आकाशीय मेघों को दुहकर भूमि को वर्षा के जलों से तृप्त करते हैं॥५॥
उत्तम दानी, सामर्थ्यवान् मरुद्गण यज्ञों में घृत-दुग्ध आदि रसों और जलों का सिंचन करते हैं । अश्वों को घुमाने के समान वे बलशाली मेघों का सम्यक् रूप से दोहन करते हैं॥६॥
हे मरुद्गण ! आप महिमावान् , विभिन्न दीप्तियाँ छोड़ने वाले प्रपंची पर्वतों के समान अभेद्य बल से वेगपूर्वक गमन करने वाले हैं। आप हाथियों और मृगों के समान वनों को खा जाने वाले हैं, क्योंकि अपने बल से लाल वर्ण वाली घोड़ियों (अग्नि ज्वालाओं) को रथ में (यज्ञ में) नियोजित (प्रकट) करते हैं॥७॥
ये वीर मरुद्गण, सिंहों के समान गर्जनशील, प्रकृष्ट ज्ञानी, उत्तम बलवान् पुरुषों के समान सम्पूर्ण ऐश्वर्यो से सम्पन्न हैं। ये वीर शत्रु को क्षत-विक्षत करने वाले, पीड़ित जनों की रक्षा कर उन्हें सन्तुष्ट करने वाले धब्बेदार घोड़ियों और हथियारों से सुसज्जित होकर चलने वाले, अक्षय बल और उग्ररूप धारण करने वाले हैं॥८॥
सबकी रक्षा करने वाले, वीर, पराक्रमी, अक्षय उत्साह से सम्पन्न हे शोभायमान मरुद्गणो ! आप आकाश और पृथ्वी को अपनी गर्जना की गूंज से भर दें। रथ में विराजित होने से आपका तेजस्वी प्रकाश विद्युतवतु सर्वत्र फैल गया है॥९॥
अनेक धनों से युक्त, सम्पूर्ण धनों के स्वामी, समान स्थान से उद्भृत, विविध बलों से युक्त, विशिष्ट सामर्थ्य वाले, अस्त्र - प्रहारक, अनन्त सामर्थ्यवान् तथा पुष्ट अन्नों के भक्षक वीर मरुद्गण अपने बाहुओं में विशिष्ट बल धारण करते हैं॥१०॥
जलों को बढ़ाने वाले पूजनीय, द्रुतगति वाले, स्पन्दनयुक्त, अडग, पदार्थों को हिलाने वाले, अबाधगति वाले, तीक्ष्ण अस्त्र धारक वीर मरुद्गण, स्वर्णिम रथ के चक्रों से (वात्याचक्र से) मार्ग में आये हुए मेघों को उड़ा देते हैं॥११॥
संघर्ष शक्ति वाले, पवित्रकर्ता, वनों में संचरित होने वाले, विशेष चक्षुबाले, रुद्र के पुत्र रूप मरुद्गणों की हम स्तुति करते हैं। हम सब अति वेगवान् धूल उड़ाने वाले, बलवान्, वीर्यवान् तथा तीक्ष्ण बुद्धि वाले मरुद्गणों के आश्रय को प्राप्त करे॥१२॥
हे मरुद्गणो ! आपकी रक्षण-सामर्थ्य द्वारा रक्षित मनुष्य सब लोगों से अधिक बल पाकर स्थिर होता है। वह अश्वों द्वारा अन्न और मनुष्यों द्वारा धनों को प्राप्त कर उत्तम यज्ञ द्वारा प्रशंसित होता है॥१३॥
हे मरुद्गणो ! हम कार्यों में समर्थ युद्धों में अजेय, दीप्तिमान् , बलों से युक्त तथा वैभवशाली हों । हम श्रेष्ठ धन - वैभव से सम्पन्न सर्व-हितकारी होकर सौ वर्षों तक जीवित रहें तथा पुत्र और पत्रों के साथ सुख प्राप्त करें॥१४॥
हे मरुद्गणो ! आप हमें शत्रुओं को जीतने वाली वीरोचित स्थाई सामर्थ्य प्रदान करें । हममें असंख्या धना को स्थापित करें । प्रात: काल (यज्ञ में) आप हमें शीघ्र प्राप्त हों॥१५॥

सूक्त - ६५

हे अग्निदेव ! पशु चुराने वाले के पद चिह्नों के साथ जाने वाले मनुष्य के समान सभी बुद्धिमान् देवगण आपके अनुगामी हों । सभी याजकगण आपके चारों ओर बैठकर कुण्डरूप गुहा में स्तुतियों के साथ आपको प्रकट करते हैं। आप उनकी हवियों को देवों तक पहुँचाने वाले तथा देवों को उनसे नियोजित करने वाले के रूप में सम्मानित किये जाते हैं॥१-२॥
देवगणों ने अग्निदेव को भूमि में चारों और खोजा। अग्निदेव जल प्रवाहां के गर्भ से उत्पन्न हुए, उत्तम स्तोत्रों से उनकी सम्यक् प्रकार से वृद्धि हुई । देवों ने अग्निदेव के कर्मों का, उनकी प्रेरणाओं का अनुगमन किया और भूमि को स्वर्ग के समान सुखकारी बनाया॥३-४॥
ये अग्निदेव इष्ट फल प्राप्ति के समान रमणीय, भूमि के समान विस्तीर्ण, पर्वत के समान पोषक तत्त्व प्रदाता, जल के समान कल्याणकारी, अश्व के समान अग्रणी वाहक तथा समुद्र के समान विशाल हैं, इन्हें भला कौन रोक सकता है ?॥५-६॥
ये अग्निदेव बहिनों के लिए भाई के समान जलों के भ्राता रूप हैं। शत्रुओं का विनाश करने वाले राजा के समान ये वनों को नष्ट भी कर देते हैं। जब ये वायु से प्रेरित होकर वनों की ओर अभिमुख होते हैं, तो भूमि के बालों के सदृश वृक्ष वनस्पतियों का नाश कर देते हैं॥७-८॥
ये अग्निदेव जल में बैठकर हंस के समान प्राण को धारण करते हैं । ये उषाकाल में उठकर अपने कर्मो से प्रजाओं को चैतन्य करते हैं । ये सोम की भाँति वृद्धि करने वाले, शिशु के समान चंचल तथा यज्ञ से उत्पन्न होकर दर तक प्रकाश फैलाने वाले हैं॥९-१०॥

सूक्त - ६६

ये अग्निदेव स्मरणीय धन के समान विलक्षण, ज्ञानों के समान सम्यक् द्रष्टा, जीवन के समान प्राण प्रदाता, पुत्र के समान हितकारी, अश्व के समान द्रुतगामी तथा गाय के समान उपकारी हैं। ये वन के काष्ठों को जलाकर विशेष प्रकाशयुक्त होते हैं॥१-२॥
गृह के समान रमणीय, अन्न के समान परिपक्व, प्रजाजनों पर प्रभुत्व स्थापित करने वाले, ऋषि के समान स्तुत्य तथा प्रजाओं द्वारा प्रशंसित अग्निदेव लोगों के कल्याण के लिए जीवन धारण करते हैं। उत्साहपूर्ण होता के समान प्रजा के हित में ही जीवन समर्पित करते हैं॥३-४॥
असहनीय तेजों से युक्त, कर्मशील के समान नित्य शुभकर्मा, अद्भुत दीप्तियुक्त, शुभ्र प्रकाश से प्रकाशमान, प्रज्ञाओं में रथ के समान शोभायमान ये अग्निदेव स्त्रियों द्वारा घर में सुख देने के समान सबके सुखदाता हैं। यज्ञों में स्वर्णिम तेजों से संयुक्त होते हैं॥५-६॥
ये अग्निदेव आक्रामक सेना के समान बल धारक, विद्युत् अस्त्र के प्रहार के समान प्रचण्ड वेग और तेजों के धारक हैं । जो उत्पन्न हुए हैं या जो उत्पन्न होंगे, उनके नियन्ता अग्निदेव हैं। अग्निदेव कन्याओं का कौमार्य समाप्त करने वाले और विवाहिता के पति हैं॥७-८॥
जैसे गौएँ सूर्यास्त होने पर पुन: अपने घर को प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार हम सन्तानों और पशुओं से युक्त होकर अग्निदेव को प्राप्त होते हैं। जल के प्रवाहित होने के सदृश अग्नि ज्वालाओं को प्रवाहित करते हैं। उनकी दर्शनीय किरणें आकाश में ऊँची उठती हैं॥९-१०॥

सूक्त - ६७

जैसे राजा सर्वगुण-सम्पन्न वीर पुरुष का वरण करते हैं, वैसे ही अग्निदेव यजमान का वर करते हैं । जंगल में उत्पन्न, मनुष्यों के मित्र रूप, रक्षक सदृश कल्याण रूप, होता और विवाहूक ये अग्निदेव सम्यक रूप से कल्याणप्रद हैं॥१-२॥
ये अग्निदेव समस्त धनों को हाथ में धारण करते हैं। गुहा-प्रदेश (यज्ञ कुण्ड) में स्थित हुए इन्होंने देवों को शक्ति - सम्पन्न बनाया। मेधावी पुरुष हृदय से उत्पन्न मन्त्र युक्त स्तुतियों द्वारा इन अग्निदेव को प्रकट करते हैं॥३-४॥
ये अजन्मा अग्निदेव (सूर्य रूप में) पृथ्वी को धारण करते हैं। उन्होंने अन्तरिक्ष को धारण किया । अपने सत्संकल्पों से द्युलोक को भी स्तम्भ सदृश स्थिर किया है । हे अग्निदेव ! आप पशुओं के प्रिय स्थानों को संरक्षित करें। आप सम्पूर्ण प्राणियों के जीवन - आधार होकर गुह्य (अव्यक्त) प्रदेश में सुशोभित हैं॥५-६॥
जो गुह्य अग्निदेव को जानते हैं, जो यज्ञ में अग्निदेव को प्रज्वलित कर धारण करते हैं और स्तुति करते हैं, उन स्तोताओं को अग्निदेव धन प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं॥७-८॥
जो अग्निदेव ओषधियों में अपनी महत्ता स्थापित करते हैं और लताओं से पुष्प-फलादि को प्रकट करते हैं । ज्ञानी पुरुष जलों में अन्तः स्थापित उन अग्निदेव की पूजा कर घर में आश्रय लेने की तरह उनका आश्रय प्राप्त करते हैं॥९-१०॥

सूक्त - ६८

सर्वपालक अग्निदेव स्थावर और जंगम वस्तुओं को परिपक्व करने के लिए आकाश को प्राप्त हुए हैं। उन्होंने रात्रियों को अपनी रश्मियों से प्रकाशित किया और सम्पूर्ण देवों की महत्ता को प्राप्त करके वे अग्रणी हुए॥१-२॥
हे अग्निदेव जब आप सूखे काष्ठ के घर्षण से उत्पन्न हुए, तब सभी देवगणों ने यज्ञ कार्य सम्पन्न किये । हे अविनाशी देव ! आपका अनुगमन करके ही वे देवगण देवत्व को प्राप्त कर सके हैं॥३-४॥
ये अग्निदेव यज्ञ की प्रेरणा प्रदान करने वाले और यज्ञ के रक्षक हैं । ये अग्निदेव ही आयु हैं; इसीलिए सभी यज्ञ कर्म करते हैं। हे अग्निदेव ! जो आपको जानकर आपके निमित्त हवि देता है, उसे आप जानकर हवि प्रदान करें॥५-६॥
मनुष्य में होतारूप में विद्यमान ये अग्निदेव ही प्रजाओं और धनों के स्वामी हैं। शरीरस्थ अग्नि का वीर्य से सम्बन्ध जानकर मनुष्य ने सन्तानोत्पत्ति की इच्छा प्रकट की और उन अग्निदेव की सामर्थ्य से सन्तान को प्राप्त किया॥७-८॥
पिता का आदेश मानने वाले पुत्रों के सदृश जिन मनुष्यों ने इन अग्निदेव की आज्ञा को सुनकर शीघ्र ही पालन कर कार्य सम्पन्न किया, उनके लिए अग्निदेव ने विपुल अन्न और धन के भण्डार खोल दिये । यज्ञ कर्मों में, मर्यादित अग्निदेव ने नक्षत्रों से आकाश को अलङ्कृत किया॥९-१०॥

सूक्त - ६९

हे अग्निदेव ! आप उषा प्रेमी सूर्यदेव के समान दीप्तिमान् हैं। प्रकाशमान सूर्यदेव की ज्योति के समान तेजस्वी होकर अपने तेज़ से आकाश और पृथ्वी को पूर्ण करते हैं । हे अग्निदेव ! उत्पन्न होकर आपने अपने कर्म से सारे विश्व को व्याप्त किया । आप देवों द्वारा उत्पन्न पुत्र रूप होकर भी उन्हें हवि आदि देकर उनके पिता रूप हो जाते हैं॥१-२॥
अहंकाररहित बुद्धि से कर्तव्यों को जानने वाले, गौ दुग्ध के समान स्वादिष्ट अन्नों को देने वाले अग्निदेव यजमानों द्वारा बुलाने पर आकर, यज्ञ के मध्य में प्रतिष्ठित होकर शोभा पाते हैं और उन याजकों को सुख प्रदान करते हैं॥३-४॥
घर में उत्पन्न हुए पुत्र के समान सुखदायक अग्निदेव हर्षान्वित अश्वों की तरह मनुष्यों को दुःख से पार लगाते हैं । जब मनुष्यों के साथ हम, देवों का आवाहन करते हैं, तब ये अग्निदेव दिव्य प्रेरणाओं से समन्वित होकर दिव्यता को धारण करते हैं॥५-६॥
हे अग्निदेव ! जिन मनुष्यों के आप सहायक होते हैं, वे आपके नियमों को तोड़ नहीं सकते। आपने ही मनुष्यों से युक्त होकर पाप रूपी राक्षसों को मार गिराया, यह आपका श्रेष्ठ और प्रशंसनीय कार्य हैं॥७-८॥
उषा प्रेमी सूर्यदेव के समान देदीप्यमान्, प्रकाशित और प्रख्यात अग्निदेव इस हविदाता पुरुष को जानें । हवियुक्त होकर यज्ञ द्वार को खोलकर ये अग्निदेव सम्पूर्ण आकाश में, दशों-दिशाओं में व्याप्त होकर ऊर्ध्वगति प्राप्त करते हैं॥९-१०॥

सूक्त - ७०

हम अग्निदेव से अपार धन - वैभव की कामना करते हैं। उत्तम तथा प्रकाशित ये अग्निदेव देवों और मनुष्यों के कर्मों को तथा मनुष्य जन्म के रहस्य को जानकर सब में व्याप्त हैं॥१-२॥
ये अग्निदेव जलों के गर्भ में, वनों के गर्भ में, जंगम और स्थावरों के गर्भ में विद्यमान हैं। ये उत्तमकर्मा और अविनाशी अग्निदेव सभी प्रजाओं को राजा के समान आधार देते हैं। अत: लोग अग्निदेव को घर में और पर्वतों में भी हवि प्रदान करते हैं॥३-४॥
अग्निदेव की उत्तम मंत्रों से जो याजक स्तुति करते हैं, उन्हें वे निश्चय ही वैभव प्रदान करते हैं । हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! आप देवों और मनुष्यों के जीवन रहस्यों को जानने वाले हैं। आप समस्त प्राणियों की रक्षा करें॥५-६॥
विविध रूपों वाली देवी उघी और रात्रि जिन अग्निदेव को प्रवृद्ध करती हैं, स्थावर, वृक्षादि और जंगम मनुष्यादि भी यज्ञ रूप उन अग्निदेव को प्रवृद्ध करते हैं। अग्निदेव को होतारूप में प्रतिष्ठित कर लोग उन्हें यज्ञ-अनुष्ठानों द्वारा हवि समर्पित करके पूजते हैं॥७-८॥
हे अग्निदेव ! आप वनों और गौओं में पुष्टिकारक पदार्थों को भी स्थापित करें । सभी मनुष्यों को ग्रहण करने योग्य श्रेष्ठ अन्नों और धनों से पूर्ण करें । हम आपको विविध प्रकार से पूजते हैं। जैसे पिता पुत्र को धन से पूर्ण करता है, वैसे ही हम आपसे धन पाते रहे हैं॥९-१०॥
ये अग्निदेव उत्तम देव पुरुष के सदृश पूज्य, अस्त्रों का प्रहार करने वाले के सदृश वीर, आक्रान्ता के सदृश विकराल और संग्राम काल में तेजस्विता की प्रतिमूर्ति होते हैं॥११॥

सूक्त - ७१

पतिव्रता स्त्रियाँ जिस प्रकार अपने पति को प्राप्तकर उन्हें प्रसन्न करती हैं, वैसे ही हमारी अँगुलियाँ मिलकर अग्निदेव को सम्यक् प्रकार से प्रसन्न करती हैं । श्यामवर्ण, पुनः पीतवर्ण और अरुणिम वर्ण वाली विलक्षण उषा की किरणें जैसे सेवा करती हैं, वैसे ही हमारी अँगुलियाँ अग्निदेव की सेवा करती हैं॥१॥
हमारे पितर अंगिरा ने मंत्रों द्वारा विकराल और सुदृढ़ पर्वताकार अज्ञानान्धकार रूपी असुर को शब्द मात्र से नष्ट किया; तब आकाश मार्ग में ज्योति रूप सूर्य और ध्वज रूप प्रकाश किरणों से सम्पन्न दिवस को हुमने प्राप्त किया॥२॥
शाश्वत सत्यरूप यज्ञ को धारण करने वाले अंगिरा ने उसकी तेजस्विता को धन के सदृश धारण किया। अनन्तर धन को, तेज और पुष्टि को धारण करने की इच्छुक प्रज्ञाओं ने हवियों से देवों को पुष्ट करते हुए अग्निदेव को प्राप्त किया॥३॥
वायु के संयोग से उत्पन्न होने वाले अग्निदेव शुभ ज्योति के रूप में प्रत्येक गृह अर्थात् शरीर में प्रतिष्ठित हुए । पुन : भृगुवंशीय ऋषि ने देवों तक हवि पहुँचाने वाले दूत (देवत्व प्राप्ति के माध्यम) के रूप में माना, जैसे कोई राजा, मित्र राजा के दूत द्वारा सम्पर्क करता है॥४॥
महान् और पोषण प्रदान करने वाले देवों के निमित्त कौन सज्जन और कौन ज्ञानी हव्यरूप सोमरसों को अग्नि में देने से पलायन कर सकता है ? ये अस्त्र चलाने में कुशल अग्निदेव अपने धनुष से उन पर बाणों का प्रहार करते हैं और सूर्य रूप में अपनी पुत्री उषा को तेज धारण कराते हैं॥५॥
हे अग्निदेव ! जो याजक आपको घर में प्रदीप्त करता है और प्रतिदिन आपकी कामना करते हुए स्तुति युक्त हवि देता है, उसे आप दुगुने बल और आयु से बढ़ायें, जो आपकी प्रेरणा से रथ सहित युद्ध में जाता है। ( जीवन-संग्राम में संघर्ष करता है), वह धन से युक्त होता हैं॥६॥
जैसे सातों महान् नदियाँ समुद्र को प्राप्त होती हैं, वैसे ही हमारी सम्पूर्ण हविष्यान्न अग्निदेव को प्राप्त होता है। अन्य महान् देवों के लिए यह हविष्यान्न पर्याप्त हैं या नहीं-हम यह नहीं जानते । अत: आप अन्नादि वैभव हमें प्रदान करें॥५७॥
(अग्नि का) जो शुद्ध और प्रदीप्त तेज अन्नादि ( के पाचन) के लिए यजमान आदि में व्याप्त है, उस तेज से युक्त रेतस् को (प्रकृति रूपी) उत्पत्ति स्थल में स्थापित करके अग्निदेव अभीष्ट पोषण रूप सन्तानों को जन्म दें और उस बलवान् अनिन्द्य तरुण शोभन कर्मा (सन्तान) को यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित करें॥८॥
मन के सदृश गति वाले सूर्यरूप मेधावी अग्निदेव एक सुनिश्चित मार्ग से गमन करते हैं और विविध धनों पर आधिपत्य रखते हैं। सुन्दर भुजाओं वाले मित्रावरुण गौओं में उत्तम और अमृत तुल्य दूध की रक्षा करते हैं॥९॥
हे अग्निदेव ! मेधावी और सर्वज्ञ रूप आप हमारी पितरों के समय से चली आई मित्रता को विस्मरण न करें। जैसे सूर्य रश्मियाँ अन्तरिक्ष को ढूंक देती हैं, वैसे ही बुढ़ापा हमें नष्ट करना चाहता हैं, अत: है अग्निदेव ! वह बुढ़ापा हमारा विनाश करने के पूर्व ही समाप्त हो जाये ( हमें अमृतत्व की प्राप्ति हो)॥१०॥

सूक्त - ७२

मनुष्यों के हितैषी ये अग्निदेव बहुत से धनों को हाथ में धारण करते हैं । ये सदा काव्य रूप स्तोत्रों को प्राप्त होते हैं। धनों में श्रेष्ठ धन के स्वामी ये अग्निदेव स्तोताओं को सुखकारी सम्पूर्ण वैभव प्रदान करते हैं॥१॥
सम्पूर्ण मेधावी और अमर देवगण अग्नि की इच्छा करते हुए भी वे उन सर्वव्यापक अग्निदेव को नहीं पा सके । अन्त में वे बुद्धिमान् देवगण थके पैरों से अग्निदेव के उस सुन्दरतम स्थान को प्राप्त हुए॥२॥
हे पवित्र अग्निदेव ! जब तेजस्वी मनुष्यों ने तीन वर्षों से घृत द्वारा आपका पूजन किया, तब उन्होंने यज्ञ के उपयुक्त नामों को धारण किया। अपने शरीरों का शोधन कर वे देवरूप में उत्पन्न हुए॥३॥
याजकों ने महान् पृथिबी और आकाश का ज्ञान कराते हुए अग्निदेव के लिए उत्तम स्तोत्रों का पाठ किया। मनुष्यों ने उस सर्वोत्तम स्थान में अधिष्ठित अग्निदेव को जानकरे ज्ञान प्राप्त किया॥४॥
देव मानवों ने पलियों के साथ घुटनों के बल बैठकर उन अग्निदेव को भली प्रकार से जानकर पूजन तथा उनका अभिवादन किया। उन्होंने अपने शरीरों को सुरक्षित करते हुए पवित्र किया और सखा अग्निदेव का मित्र भाव से क्षणिक दर्शन प्राप्त किया॥५॥
हे अग्निदेव ! याजकों ने आपके इक्कीस प्रकार के रहस्यों अर्थात् यज्ञ की विधियों को जानकर उनका प्रयोग किया। यज्ञ से अपनी जीवनी-शक्ति की रक्षा की । आप प्राणिमात्र के प्रति स्नेहयुक्त होकर सबकी रक्षा करें॥६॥
हे अग्निदेव ! आप मुनष्यों के व्यवहारों को जानने वाले विद्वान् हैं । जीवन धारण के लिए पोषक अन्नों की व्यवस्था करें । देवगण जिस मार्ग से गमन करते हैं, उसे जानकर आलस्यहीन होकर दूत रूप में हविष्यान्न ग्रहण करें॥७॥
हे अग्निदेव ! ध्यान से सृष्टि के सत्य को जानने वाले ऋषियों ने आकाश से बहती हुई सप्त-नदियों से ऐश्वर्य के द्वारों को खोलने की विधि जानी । आपकी प्रेरणा से सरमा ने गायों को ढूंढ़ लिया, जिससे सभी मानवी प्रजाएँ सुखपूर्वक पोषण पाती हैं॥८॥
जो देवगण सम्पूर्ण श्रेष्ठ कर्मों का सम्पादन कर अमरत्व को प्राप्त करने का मार्ग बनाते हैं, उन सभी महान् कर्म करने वाले देवपुत्रों के सहित माता अदिति, सम्पूर्ण पृथ्वी (जग) को धारण - पोषण के लिए अपनी महिमा से अधिष्ठित हैं । हे अग्ने ! स्वयं आप उन देवगणों द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले याग की हवियों को ग्रहण करें॥९॥
द्युलोक के अमर देवों ने जब इस विश्व में श्रेष्ठ सुन्दर तेज स्थापित किया और दो आँखें बनाईं, तब प्रेरित नदियों के विस्तार की तरह अवतरित होती देवी उषा को मनुष्य जान सके॥१०॥

सूक्त - ७३

ये अग्निदेव पैतृक सम्पत्ति की तरह अन्न देने वाले तथा ज्ञानी पुरुष के उपदेश की तरह उत्तम प्रेरणा देने वाले हैं। घर में आए अतिथि के समान प्रिय और होता के समान यजमान को घर (आवास) प्रदान करने वाले हैं॥१॥
देदीप्यमान सूर्यदेव के सदृश सत्यदर्शी ये अग्निदेव अपने श्रेष्ठ कर्मों से सभी को पापों से रक्षित करते हैं। असंख्यों द्वारा प्रशंसित होने वाले ये उन्नति करते हुए सत्यमार्ग पर चलते हैं । ये आत्मा के सदृश आनन्दप्रद और सबके द्वारा धारण किये जाने योग्य हैं॥२॥
दीप्तिमान् सूर्यदेव के सदृश सम्पूर्ण संसार को धारण करने वाले, राजा के सदृश प्रजा के हितैषी, मित्र रूप अग्निदेव पृथिवी पर आसीन हैं । पिता के आश्रय में पुत्रों के रहने के समान लोग इनके आश्रय को पाते हैं। ये अग्निदेव पतिव्रता स्त्री की तरह पवित्र और वन्दनीय हैं॥३॥
हे अग्निदेव ! उपद्रवरहित घरों में लोग नित्य समिधायें प्रज्वलित कर आपकी परिचर्या करते हैं । आकाशीय देवों ने आपको प्रचण्ड तेज़ से अभिपूरित किया है । आप सबके प्राणरूप हैं, हमारे लिये आप धन-वैभव प्रदान करें॥४॥
हे अग्निदेव ! धन - सम्पन्न यजमान आपकी अनुकम्पा से अन्नों को प्राप्त करें । विद्वान् हविदाता दीर्घ आयु को प्राप्त करें । हम यश के निमित्त देवों को हवि का भाग देते हुए युद्धों में शत्रु के वैभव को जीतें॥५॥
सतत दूध (पोषण) देने वाली तेजस्वी गौएँ (किरणें ) यज्ञ को पयपान कराती हैं। सुदूर पर्वतों से प्रवाहित नदियाँ (रस प्रवाह) यज्ञ से सद्बुद्धि की याचना करती हैं॥६॥
हे अग्निदेव ! यज्ञ में कल्याणकारी बुद्धि की याचना करते हुए पूज्य देवों ने वि समर्पित करके अन्न को धारण किया। अनन्तर रात्रि और विभिन्न रूपों वाली देवी उषा को स्थापित किया। रात्रि में कृष्ण वर्ण को तथा उषा में अरुणिम वर्ण को धारण कराया॥७॥
हे अग्निदेव ! जिन मनुष्यों को आपने धन प्राप्ति के निमित्त प्रेरित किया हैं, वे और हम धनवान् हों । आपने आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष को प्रकाश से अभिपूरित किया है। समस्त जगत् छाया के सदृश आपके साथ संयुक्त है॥८॥
हे अग्निदेव ! आपके संरक्षण में रहते हुए हम अपने अश्यों से शत्रुओं के अश्वों को, अपने योद्धाओं से शत्रु योद्धाओं को, अपने पुत्रों से शत्रु पुत्रों को दूर करें । पैतृक सम्पदा को प्राप्त कर हम स्तोतागण शत वर्ष की आयु का पूर्ण उपयोग करें॥९॥
हे मेधावी अग्निदेव ! ये हमारे स्तोत्र आपके मन और हृदय को भली प्रकार सन्तुष्ट करें । हम देवों द्वारा प्रदत्त धन, वैभव और यश को धारण करते हुए सुख को प्राप्त करें॥१०॥

सूक्त - ७४

हमारे कथन (भाव) को सुनने वाले अग्निदेव के निमित्त हम यज्ञ के समीप तथा सुदूर स्थान से भी उपस्थित होते हुए स्तुति मंत्र समर्पित करते हैं॥१॥
सदैव जाज्वल्यमान वे अग्निदेव परस्पर स्नेह-सौजन्य युक्त प्रजाओं के एकत्र होने पर दाताओं के ऐश्वर्य की रक्षा करते हैं॥२॥
शत्रुनाशक, युद्ध में शत्रुओं को पराजित कर धन जीतने वाले अग्निदेव का प्राकट्य हुआ है, सभी लोग उनकी स्तुति करें॥३॥
हे अग्निदेव ! जिस यजमान के घर से दूत रूप में आप देवों के लिए हवि वहन करते हैं, उस घर (यज्ञशाला) को आप उत्तम प्रकार से दर्शनीय बनाते हैं॥४॥
हे बल के पुत्र ( अरणि मन्थन द्वारा बल पूर्वक उत्पन्न होने वाले) अग्निदेव ! आप यजमान को सुन्दर हवि द्रव्य से युक्त, सुन्दर देवों से और श्रेष्ठ यज्ञ से पूर्ण करते हैं, ऐसा लोगों का कथन है॥५॥
हे तेजस्वी अग्निदेव ! उन देवों को हमारे यज्ञ में स्तुतियाँ सुनने और हवि ग्रहण करने के लिए समीप ले आयें॥६॥
हे अग्निदेव ! आप जब कभी भी देवों के दूत बनकर जाते हैं, तब आपके गतिमान रथ के घोड़ों का कोई शब्द सुनाई नहीं पड़ता॥७॥
हे अग्निदेव ! पहले असुरक्षित रहने वाला हविदाता यजमान आपकी सामर्थ्य द्वारा रक्षित होकर बल सम्पन्न बना तथा हीनता से मुक्त हुआ॥८॥
हे महान् अग्निदेव ! आप देवों को हवि प्रदान करने वाले यजमान को अतिशय तेज और श्रेष्ठ बल प्राप्त कराते हैं॥९॥

सूक्त - ७५

हे अग्निदेव ! मुख में हवियों को ग्रहण करते हुए हमारे द्वारा देवों को अत्यन्त प्रसन्न करने वाले स्तुति वचनों को आप स्वीकार करें॥१॥
अंगिरा( अंगों में स्थापित देवों) में श्रेष्ठ, मेधावियों में उत्कृष्ट हे अग्निदेव ! अब हम आपके निमित्त अति प्रिय मंत्र युक्त स्तोत्रों का पाठ करते हैं॥२॥
हे अग्निदेवे ! मनुष्यों में आपका बन्धु कौन है ? श्रेष्ठ दान से कौन आपका यजन करता है? आपके स्वरूप को कौन जानता है? आपका आश्रय स्थल कहाँ है?॥३॥
हे अग्निदेव ! आप मनुष्यों से भ्रातृभाव रखने वाले, यजमानों की रक्षा करने वाले, स्तोताओं के लिए प्रिय मित्र के तुल्य हैं॥४॥
हे अग्निदेव ! हमारे निमित्त मित्र और वरुण का यजन करे । विशाल यज्ञ सम्पादित करे तथा यज्ञशाला में पूजा योग्य भाव से रहें॥५॥


सूक्त - ७६

हे अग्निदेव ! आपके मन को सन्तुष्ट करने का हम क्या उपाय करें ? किस यज्ञ से यजमान बल वृद्धि करें ? कौन सी स्तुति आपके लिए सुखप्रद हैं ? किस मन से हम आपको हवि प्रदान करें॥१॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे इस यज्ञ में आकर होता रूप में अधिष्ठित हों । आप अविचलित होकर इसमें अग्रणी हों । सर्वव्यापक आकाश और पृथ्वी आपकी रक्षा करें । हमारे लिए अभीष्ट फल- प्राप्ति के निमित्त आप देवकार्य (यज्ञ) सम्पन्न कराये॥२॥
हे अग्निदेव ! आप श्रेष्ठ कार्यों में बाधा डालने वाले सम्पूर्ण राक्षसों का भली प्रकार दहन करें । हमारे यज्ञ की हिंसा करने वालों से रक्षा करें । अनन्तर सोम पीने वाले इन्द्रदेव को अपने अश्वों सहित यज्ञ में लायें, जिससे हम उन उत्तम दानदाता इन्द्रदेव का अतिथि सत्कार कर सकें॥३॥
हवि भक्षक अग्निदेव का हम प्रजाजन स्तोत्रों से आवाहन करते हैं । यजन के योग्य हे अग्निदेव ! आप यज्ञ में प्रतिष्ठित और 'पोता' रूप में पोषित किये जाने वाले हैं। आप धनों को उत्पन्न करने वाले हैं। धन के निमित्त हमारी कामना को जाने और उसे पूर्ण करें॥४॥
हे अग्निदेव ! आप होतारूप और सत्य-स्वरूप हैं । आप मेधावियों में श्रेष्ठ मेधावी रूप में ज्ञानी मनुष्यों की हवियों द्वारा देवों के साथ पूजे जाते हैं। आप प्रसन्नता देने वाली आहुतियों को ग्रहण करते हैं॥५॥

सूक्त - ७७

इन अग्निदेव के लिए हम किस प्रकार हवि दें? इन्हें कौन सी देव-प्रिय स्तुति से प्रकाशित करें ? जो मनुष्यों के बीच रहकर देवों को हविष्यान्न पहुँचाते हैं, ऐसे ये अग्निदेव अविनाशी, पूज्य, यज्ञकर्म सम्पादक और होता रूप हैं॥१॥
ये अग्निदेव यज्ञों में अत्यन्त सुख प्रदान करने वाले तथा होता रूप में यज्ञ करने वाले हैं। हे मनुष्यो ! उन अग्निदेव का श्राळ स्तोत्रों से अभिवादन करें । ये अग्निदेव मनुष्यों के हित के लिए देवों के पास जाते हैं । देवों को जानने वाले ये अग्निदेव मन से देवों का यजन करते हैं॥२॥
वे अग्निदेव निश्चय ही यज्ञ रूप हैं, वे ही साधु रूप पर हितकारी हैं। वे ही यजमान और मित्र के समान सहायक भी हैं । वे विलक्षण प्रकार के रथी वीर हैं। देवत्व प्राप्ति की कामना करने वाले लोग यज्ञों में उन दर्शनीय यज्ञदेव की सर्वप्रथम उत्तम स्तुतियाँ करते हैं॥३॥
ये अग्निदेव मनुष्यों में सर्वोत्कृष्ट और शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं। वे विचारपूर्वक की गई हमारी स्तुतियों को स्वीकार करते हुए रक्षण साधनों द्वारा हमारी रक्षा करें । ये अत्यन्त ऐश्वर्यशाली और बलशाली अग्निदेव हमारी हविष्यान युक्त स्तुतियों को प्राप्त हों॥४॥
सत्य युक्त, सर्वज्ञ अग्निदेव की मेधा सम्पन्न गोतमों ने स्तुति की। यज्ञ में अग्निदेव ने हविष्यान्न को ग्रहण कर, दीप्तिमान् सोम का पान किया । र्घषया की भक्ति को जानकर उन्होंने उन्हें भली प्रकार पुष्ट किया॥५॥

सूक्त - ७८

सृष्टि के समस्त रहस्यों को देखने में जानने वाले हे अग्निदेव ! गोतमवंशी हम उत्तम वाणियों से तेजस्वी मंत्रों का गान करते हुए आपका अभिवादन करते हैं॥१॥
हे अग्निदेव ! धन की कामना से गोतम-वंशी आपकी उत्तम वाणियों से परिचर्या करते हैं। तेजवी स्तोत्र से हम भी आपका अभिवादन करते हैं॥२॥
विपुल अन्नों को देने वाले हे अग्निदेव ! म अंगिराओं के समाने आपका आवाहन करते हैं और नज़वी मंत्रों से आपको नमस्कार करते हैं॥३॥
हम तेजस्वी मंत्रों से राक्षसों को कंपाने वाले अंधकार रूपी असुर का संहार करने वाले अग्निदेव का म्नवन करते हैं॥४॥
रहूगण वंशी हम लोग अग्निदेव के लिए मधुर स्तुतियाँ प्रस्तुत करते हैं। तेजस्व मंत्रों में आपको नमस्कार करते हैं॥५॥

सूक्त - ७९

ये अग्निदेव स्वर्णिम् ज्वालाओं से युक्त लोकों के विस्तारक, मेघा को कंपाने वाले, वायु के समान वेग वाले हैं। शुभ कान्ति-से युक्त ये अग्निदेव देवी उषा के लिए अन्तरक्ष का विस्तार करते हैं। अपने कर्म में रत, सरल यशस्विनी देवी उषां इस बात से अनभिज्ञ हैं॥१॥
हे अग्निदेव ! आपकी दीप्तिमान् रश्मियाँ नीचे आती हुई मेघों से टकराती हैं, तब वर्पण शील कृष्णवर्ण मेघ गरजने लगते हैं । ये मेघ विद्युत् से युक्त गर्जना करते हुए मानो हास्यमयी वृष्टि करते हैं॥२॥
ये अग्निदेव यज्ञ के रसों से चराचर जगत् का पोषण करते हैं, यज्ञ के प्रभाव को सरल मार्गों से अंतरिक्ष में पहुँचाते हैं। तब अर्यमा, मित्र, वरुण एवं मरुद्गण मेघों के उत्पत्ति स्थल पर इनकी त्वचा में जल को स्थापित करते हैं॥३॥
बल से (अरणि मंथन से) उत्पन्न होने वाले हे जातवेदा अग्निदेव ! आप अन्न एवं गौ आदि पशु धन से सम्पन्न हैं । आप हमारे लिए भी अपार वैभव प्रदान करें॥४॥
ज्वालाओं के रूप में विभिन्न मुखों वाले जाज्वल्यमान हे अग्निदेव ! आप त्रिकालदर्शी एवं सभी के आश्रय स्थल हैं । दिव्य स्तुतियों से संतुष्ट हुए यज्ञ में सर्वप्रथम उपस्थित होने वाले आप हमें अपनी तेजस्विता से अपार धन-वैभव प्रदान करें॥५॥
लपटों के रूप में विकराल दादों वाले हे तेजस्वी अग्निदेव ! अपने तीक्ष्ण स्वभाव से आप असुरों का संहार करने वाले हैं, अतएव हमारे लिए हानिकारक रात्रि और दिन के तथा उषा काल के सभी असुरों (विकारों) को भस्म कर दें॥६॥
हे अग्निदेव ! आप सभी यज्ञों में वन्दनीय हैं। गायत्री छन्द वाले सामगान से स्तुति करने पर प्रसन्न हुए आप अपने संरक्षण-साधनों से हमारी रक्षा करें॥७॥
हे अग्निदेव ! दरिद्रता को नष्ट करने वाले, शत्रुओं को पराजित करने वाले, वरण करने योग्य आप हमें श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें॥८॥
हे अग्निदेव ! आप उत्तम ज्ञान से युक्त जीवन भर पोषण-सामर्थ्य प्रदान करने वाला सुखदायक धन, हमारे दीर्घ जीवन के लिए हमें प्रदान करें॥९॥
हे गोतम (गोतमयंशीय याजक गण) ! आप सुख की इच्छा से तीक्ष्ण ज्वालाओं वाले अग्निदेव के लिए पवित्र वचनों वाली स्तुतियों का उच्चारण करें॥१०॥
हे अग्निदेव ! समीपस्थ या दूरस्थ जो शत्रु हमें अपने वश में करके बन्धक बनाना चाहें, उनका पतन हो । आप हमारी वृद्धि करने वाले हों॥११॥
हे अग्निदेव ! आप सहस्रों ज्वालाओं रूपी नेत्रों से सबको देखने वाले हैं। आप प्रशंसनीय होता रूप में स्तुतियों से प्रशंसित होते हैं॥१२॥

सूक्त - ८०

वज्र धारण करने वाले शक्तिशाली हे इन्द्रदेव ! आपने ब्रह्मनिष्ठों द्वारा प्रदत्त दिव्य गुणों से सम्पन्न सोमरस का पान करके अपने उत्साह को बढ़ाया है। अपनी सामर्थ्य से देव समुदाय को हानि पहुँचाने वाले दुराचारियों को पृथ्वी पर से मारकर भगा दिया॥१॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! उस श्येन पक्षी द्वारा (तीव्रगति से) लाये हुए अभिषुत, बलवर्धक सोमरस ने आपके हर्ष को बढ़ाया । अनन्तर आपने अपने बल से वृत्र को मारकर जलों से दूर कर दिया। इस प्रकार अपने राज्य क्षेत्र अर्थात् देव समुदाय को सम्मानित किया॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं पर चारों ओर से आक्रमण कर उन्हें विनष्ट करें । आपका वज्र अनुपम शक्तिशाली और शत्रुओं को तिरस्कृत करने वाला है। अपने अनुकूल स्वराज्य की कामना करते हुए आप वृत्र का वध करे और विजय प्राप्त कर जल प्राप्त करायें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने वृत्र को पृथ्वी से खींचकर आकाश में उठाकर नि:शेष होने तक नष्ट किया। आपने जीवन धारक इन मरुद्गणों से युक्त जलों को प्रवाहित होने के लिए छोड़ा और आत्म सामर्थ्य में प्रतिष्ठित हुए॥४॥
क्रोध में आकर इन्द्रदेव ने भय से काँपने वाले वृत्र की ठुड्डी पर वज्र से प्रहार किया। जल प्रवाहों को बहने के लिए प्रेरित किया। वे इन्द्रदेव इस प्रकार आत्म सामर्थ्य से प्रकाशित हुए॥५॥
सोम से आनन्दित हुए इन्द्रदेव सौ तीक्ष्ण शूल वाले वज्र से, वृत्र की ठुड्डी पर आघात करते हैं। मित्रों के आत्म सामर्थ्य से प्रकाशित होते हैं॥६॥
हे पर्वतवासी, स्वराज्य की अर्चना करने वालों के सहायक वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपकी शक्ति शत्रुओं से अपराजेय है । छल-छद्मी मृग का रूप धारण करने वाले, वृत्र का हनन करने के लिए आप कूटनीति का भी सहारा लेते हैं॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आपका वज्र नब्बे नावों से घिरे वृत्र को विचलित करने में समर्थ हैं। आपका पराक्रम अति महान् है । आपकी भुजाओं का बल भी अपरिमित है । आप आत्म-सामर्थ्य से प्रकाशित हों॥८॥
हे मनुष्यों ! आप सहस्रों की संख्या में मिलकर इन्द्रदेव का स्तवन करें। बीसों स्तोत्रों का गान करें। सैकड़ों अनुनय-अर्चनाएँ उनके निमित्त करें । इन्द्रदेव के लिए श्रेष्ठ मंत्रों का प्रयोग करें । ये इन्द्रदेव अपनी आत्म- सामर्थ्य से प्रकाशित हों॥९॥
इन्द्रदेव ने अपनी सामर्थ्य से वृत्र की सेना के साथ संघर्ष कर उनके बल को क्षीण किया । वृत्र को मारकर वे अपनी आत्म सामर्थ्य से प्रकाशित हुए॥१०॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने बलशाली मरुतों के सहयोग से वृत्र-असुर का वध किया । उस समय आपके मन्यु (दुष्टता के प्रति क्रोध) के सम्मुख व्यापक आकाश और पृथ्वी भय से प्रकम्पित हुए। आप अपनी आत्म सामर्थ्य से प्रकाशित हुए॥११॥
वह असुर वृत्र इन्द्रदेव को अपनी सामर्थ्य से न कॅपा सका और न गर्जना से इरा सका । इन्द्रदेव ने उस वृत्र पर फौलादी, सहस्रों तीक्ष्ण धारों वाले वज्र से प्रहार किया। इस प्रकार इन्द्रदेव ने आत्म सामर्थ्य के अनुकूल कर्म सम्पन्न किया॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! वृत्र द्वारा फेंके गये तीक्ष्ण शस्त्र का सामना आपने अपने वज्र से किया। उस वृत्र को मारने की आपकी इच्छा से आपका बल आकाश में स्थापित हुआ। इस प्रकार आपने आत्म - सामर्थ्य के अनुरूप कर्तृत्व प्रदर्शित किया॥१३॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपकी गर्जना से जगत् के सभी स्थावर और जंगम काँप जाते हैं। आपके मन्यु (अनीति संघर्षक क्रोध) के आगे त्वष्टा देव भी काँपते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुकूल आप कर्तृत्व प्रस्तुत करते हैं॥१४॥
, उन इन्द्रदेव की सामर्थ्य को समझने में कोई समर्थ नहीं । उनके समान पराक्रम-पुरुषार्थ को करने वाला अन्यत्र कोई नहीं । देवों ने उनमें सभी बलों, ऐश्वर्यों और क्षमताओं को स्थापित किया है । अतः वे आत्मानुरूप सामर्थ्य से प्रकाशित हुए हैं॥१५॥
ऋषि अथर्वा, पालन कर्ता मनु और दध्यङ् ऋषि ने पूर्व की भाँति अपनी बुद्धि से उन इन्द्रदेव के निमित्त मंत्र - रूप स्तुतियों का गान किया। वे इन्द्रदेव आत्म - सामर्थ्य के प्रभाव से प्रकाशित (प्रसिद्ध) हुये॥१६॥

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सूक्त - ८१

हर्ष और उत्साहवर्धन की कामना से स्तोताओं द्वारा इन्द्रदेव के यश का विस्तार किया जाता है, अतः छोटे और बड़े सभी युद्धों में हम रक्षक, इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं। वे इन्द्रदेव युद्धों में हमारी रक्षा करें॥१॥
हे वीर इन्द्रदेव ! आप सैन्यबलों से युक्त हैं । आप अनुचरों की वृद्धि करने वाले और उन्हें विपुल धन देने वाले हैं। आप सोमयाग करने वाले यजमान के लिये विपुल धन-प्राप्ति की प्रेरणा देने वाले हैं॥२॥
युद्ध प्रारम्भ होने पर शत्रुजयीं हीं धन प्राप्त करते हैं । हे इन्द्रदेव ! युद्धारम्भ होने पर मद टपकाने वाले (उमंग में आने वाले) अश्वों को आप अपने रथ में जोड़े। आप किसका वध करें, किसे धन दें ? यह आपके ऊपर निर्भर हैं । अत : हे इन्द्रदेव ! हमें ऐश्वर्यों से युक्त करें॥३॥
भीषण शक्ति से युक्त इन्द्रदेव सोमरस पान कर अपने बल की वृद्धि करते हैं। तदनन्तर सौन्दर्यशाली, श्रेष्ठ शिरस्त्राण धारण करने वाले, रथ में अश्वों को नियोजित करने वाले, इन्द्रदेव दाहिने हाथ में लौह-निर्मित वज्र को अलंकार के रूप में धारण करते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपनी सामर्थ्य से पृथ्वी और अन्तरिक्ष को पूर्ण किया है । आपने आकाश में प्रकाशमान नक्षत्रों को स्थापित किया है । हे इन्द्रदेव ! उत्पन्न हुए या उत्पन्न होने वालों में आपके समान अन्य कोई नहीं हैं। आप ही सम्पूर्ण विश्व के नियामक हैं॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप विदाता के लिए जो उपयोगी पदार्थ देते हैं, वह हमें भी प्रदान करें । आपके पास जो विपुल धनों के भण्डार हैं, वह हमें भी बाँटें । हम उस भाग का उपयोग कर सकें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! यज्ञ कार्यों में सोमरस से अत्यन्त प्रफुल्लित होकर आप हमें गौएँ आदि विपुल धनों को देने वाले हैं। आप हमें दोनों हाथों से सैकड़ों प्रकार का वैभव प्रदान करें । हम वीरता पूर्वक यश के भागीदार बनें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप बल वृद्धि के लिए, हविष्यान्न ग्रहण करने के लिए और अभिषुत सोम का पान करने के लिए हमारे यज्ञस्थल में पधारें तथा सोमपान करके हर्षित हों । आप विपुल सम्पदाओं के स्वामी माने गये हैं। आप कामनाओं को पूरा करके हमारी रक्षा करने वाले हैं॥८॥
हे इन्द्रदेव ! ये सभी प्राणी आपके वरण करने योग्य पदार्थों की वृद्धि करने वाले हैं। हे स्वामी इन्द्रदेव ! आप कृपणों के गुप्त धन को जानते हैं, उस धन को प्राप्त कर हमें प्रदान करें॥९॥

सूक्त - ८२

हे धनवान् इन्द्रदेव !हमारे स्तोत्रों को निकट से भली प्रकार सुनें । आप हमें सत्यभाषी बनायें । हमारी स्तुतियों को ग्रहण करने वाले आप अश्वों को आगमन के निमित्त नियोजित करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आपके अन्न से तृप्त हुए ब्राह्मणों ने अपने आनन्द को व्यक्त करते हुए सिर हिलाया और फिर उन्होंने अभिनव स्तोत्रों का पाठ किया। अब आप अपने अश्वों को यज्ञ में प्रस्थान के लिए नियोजित करें॥२॥
हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हम सभी प्राणियों के प्रति अनुग्रह दृष्टि रखने वाले आपकी अर्चना करते हैं। स्तोताओं को देने वाले धन से परिपूर्ण रथ वाले, कामनायुक्त यजमानों के पास शीघ्र ही आते हैं । हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! आप 'हरी' नामक अश्वों को रथ में नियोजित करें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप-अन्न सोम आदि से पूर्ण गायों को देने में समर्थ और दृढ़ रथ को भली प्रकार जानते हैं। तथा उसी पर आसीन होते हैं । अतः हे इन्द्रदेव !आप अपने घोड़ों को रथ में जोड़े॥४॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आपके दाहिनी और बायीं ओर दो अश्व रथ में जुते हैं। इन दोनों अश्वों से नियोजित रथ को लेकर प्रिय पत्नी के पास जायें। उसी रथ से आकर हमारे हविष्यान्न को ग्रहण करके हर्षित हों॥५॥
है वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपके केशयुक्त अश्वों को हम मन्त्रयुक्त स्तोत्रों से रथ में नियोजित करते हैं। आप अपने हाथों में रास (लगाम) धारण कर घर जायें । वेग पूर्वक प्रवाहित होने वाले सोमरस ने आपको हर्षित किया है। घर में पत्नी के साथ सोम से हर्षित होकर आप पुष्टि को प्राप्त हों॥६॥

सूक्त - ८३

हे इन्द्रदेव ! आपकी सामर्थों से रक्षित हुआ आपका उपासक अश्वों और गौओं से युक्त धनों को पाकर अग्रणी होता है। जैसे जल सब ओर से समुद्र को प्राप्त होता है, वैसे ही आपके सम्पूर्ण धन उस उपासक को पूर्ण करके उसे भली प्रकार सन्तुष्ट करते हैं॥१॥
होता (के चमस पात्र) को जिस प्रकार जल धाराएँ प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार देवगण अन्तरिक्ष से यज्ञ को देखकर अपने प्रिय स्तोताओं के निकट पहुँचकर उनकी मंत्र युक्त प्रिय स्तुतियों को ग्रहण करते हैं। वे उन स्तोताओं को पूर्व की ओर श्रेष्ठ मार्गों से ले जाते हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! परस्पर संयुक्त दो अन्नपात्र आपके निमित्त समर्पित हैं। आपने उन पात्रों को स्तुति वचनों के साथ स्वीकार किया हैं । जो स्तोता आपके नियमों के अनुसार रहता है, उसकी आप रक्षा करते हैं और पुष्टि प्रदान करते हैं। सोमयाग करने वाले यजमान को आप कल्याणकारी शक्ति देते हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! अंगिराओं ने अपने उत्तम कर्मों से अग्नि को प्रज्वलित करके सर्वप्रथम हविष्यान्न प्रदान किया हैं । अनन्तर उन श्रेष्ठ पुरुषों ने सभी अश्वों, गौओं से युक्त पशु रूप धनों और भोज्य पदार्थों को प्राप्त किया॥४॥
सर्वप्रथम 'अथर्वा 'ने 'यज्ञ' के सम्पूर्ण मार्गों को विस्तृत किया। अनन्तर नियमों के दृढ़ पालक सूर्यदेव का प्राकट्य हुआ । फिर उशना' ने समस्त गौओं को बाहर निकाला । हम सब इस जगत् के नियामक अविनाशी देव इन्द्र की पूजा करते हैं॥५॥
जिसके घर में उत्तम यज्ञादि कर्मों के निमित्त कुश काटे जाते हैं। सूर्योदय के पश्चात् आकाश में जहाँ स्तोत्र पाठ गुंजरित होते हैं। जहाँ उक्ति वचनों सहित सोम कूटने के पाषाणों का शब्द गूंजती हैं, इन्द्रदेव उनके यहाँ ही हविद्रव (सोमरस) का पान कर आनन्द पाते हैं॥६॥

सूक्त - ८४

हे शक्तिशाली, शत्रुओं को पराजित करने वाले इन्द्रदेव ! अन्तरिक्ष को अपनी किरणों से परिव्याप्त करने वाले सूर्यदेव के समान आप में भी सोमपान के बाद अपार शक्ति का संचार हो॥१॥
अपराजेय शक्ति से सम्पन्न इन्द्रदेव को उनके अश्व यज्ञशाला में पहुँचायें, जहाँ याजकों-ऋषियों द्वारा स्तुति गान हो रहा है॥२॥
शत्रुओं को पराजित करने वाले है इन्द्रदेव ! आप मंत्रों के द्वारा जोड़े गये घोड़ों वाले अपने रथ पर बैठे। सोम कुचलते हुए पत्थर की ध्वनि आपके मन को उसकी ओर आकर्षित करे (अर्थात् सोमरस पीने की इच्छा से यहाँ आयें)॥३॥
हे इन्द्रदेव ! अविनाशी , श्रेष्ठ, आनन्दवर्धक, सोमरस का पान करें । यज्ञस्थल में शोधित सोमरस आपकी ओर प्रवाहित हो रहा है (आपको समर्पित है )॥४॥
हे ऋत्विजों ! आनन्दवर्धक, पवित्र सोमरस समर्पित करके विभिन्न स्तोत्रों से गुणगान करते हुए, आप सभी इन्द्रदेव की ही पूजा करो । सामर्थ्यशाली उन इन्द्रदेव को नमस्कार करो॥५॥
अश्वशक्ति से चालित रथ में बैठने वाले है इन्द्रदेव ! आपसे अधिक पराक्रमी कोई दूसरा वीर नहीं है। आप जैसा कोई अन्य शक्तिशाली अश्वपालक (घोड़े का स्वामी नहीं है॥६॥
हे प्रिय याजको ! दानशील होने के कारण मनुष्यों को धन देने वाले, प्रतिकार न किये जाने वाले, वे अकेले इन्द्रदेव ही सभी ( प्राणियों) के अधिपति हैं॥७॥
वे इन्द्रदेव हमारी स्तुतियों को कब सुनेंगे ? और आराधना न करने वालों को क्षुद्र पौधे की भाँति कब नष्ट करेंगे?॥८॥
असंख्यों में से जो यजमान सोमयज्ञ करके आपकी आराधना करता है, उसे हे इन्द्रदेव ! आप शीघ्र बल सम्पन्न बना देते हैं॥९॥
भक्तों पर कृपावृष्टि करने वाले इन्द्र (सूयी देव के साथ आनन्दपूर्वक गौएँ (किरणें) शोभा पाती हैं। वे भूमि पर स्वराज्य की मर्यादा के अनुरूप उत्पन्न सुस्वादु मधुर रस का पान करती हैं॥१०॥
इन्द्रदेव ( सूर्य) का स्पर्श करने वाली धवल गौएँ ( किरणें ) दूध (पोषण) प्रदान करती हुईं, उनके वज्र को प्रेरणा देती हुई स्वराज्य में ही रहती हैं॥११॥
ज्ञान युक्त वे ( किरणें ) उन (इन्द्रदेव) के प्रभाव का पूजन करती हैं, पूर्व में हो चुके को समझने वाली वे इन्द्रदेव द्वारा पहले किये गये कार्यों का स्मरण दिलाती हैं, और स्वराज्य के अनुशासन में ही रहती हैं॥१२॥
अपराजित इन्द्रदेव ने दधीचि की हड्डियों से (बने हुए वज्र से) निन्यानवे (सैंकड़ों-हजारों) राक्षसों का संहार किया॥१३॥
इन्द्रदेव ने इच्छा करने से यह जान लिया कि (उस) अश्व का सिर पर्वतों के पीछे शर्यणावत् सरोवर में है और पूर्व मंत्रानुसार उसका वज्र बनाकर असुरों का वध कर दिया॥१४॥
मनीषियों ने त्वष्टा (संसार को तुष्ट करने वाले सूर्यदेव) का दिव्यतेज,गतिमान् चन्द्रमण्डल में अनुभव किया॥१५॥
सामर्थ्यवान् , शत्रुओं पर क्रोध करने वाले , बाण धारण करके लक्ष्य भेद करने वाले इन्द्रदेव के रथ, जिसकी धुरी ऋत ( सत्य अथवा यज्ञ) है, उसके साथ अश्वों को आज कौन योजित कर सकता है? जो इन (अश्वों ) का पालन-पोषण करता है, वही जीवित (प्राणवान्) रहता है॥१६॥
( इन्द्रदेव के सम्मुख युद्ध में) कौन भागता है ? कौन मारा जाता है ? कौन भयभीत होता है ? कौन सहायक होता है ? समीपस्थ इन्द्रदेव को कौन जानता है ? कौन सन्तान के निमित्त, कौन पशुधन एवं ऐश्वर्य के निमित्त, कौन शारीरिक सुख के निमित्त और कौन सम्बन्धी जनों के हित के निमित्त इन्द्रदेव से उत्तम वचनों द्वारा स्तुति करता है?॥१७॥
कौन अग्निदेव की स्तुति करते हैं? कौन सर्वदा सुचि पात्र से घृत और हवि से यज्ञ करते हैं ? देवगण किसके निमित्त आहूत धन को लाते हैं ? कौन इन दाता, उत्तम याजक, श्रेष्ठ इन्द्रदेव को जानते हैं ?॥१८॥
हे प्रशंसनीय बलवान् इन्द्रदेव ! आप अपने तेज से तेजस्वी होकर साधक की प्रशंसा करते हैं। हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपके अलावा अन्य कोई सुख प्रदान करने वाला नहीं है, अत: हम सभी आपका स्तवन कर रहे हैं॥१९॥
हे विश्व के आश्रयदाता इन्द्रदेव ! आपके द्वारा प्रदान धन साधन हमारे लिए विनाशकारी न बने । रक्षा के लिए प्रेरित आपके द्वारा दी गई शक्तियाँ विध्वंस न करें । हे मानव हितैषी इन्द्रदेव ! हम सज्जन नागरिकों को सभी प्रकार की (लौकिक एवं दैवी) सम्पत्ति प्रदान करें॥२०॥

सूक्त - ८५

लोकहित में तीव्रगति से श्रेष्ठ कार्य करने वाले रुद्रदेव के पुत्र मरुद्गण रमणियों के समान सुसज्जित होकर बाहर जाते हैं। ये मरुद्गण शत्रुओं के साथ संघर्ष कर युद्ध क्षेत्र में हर्षित होते हैं। उन्होंने ही आकाश, पृथ्वी को स्थापित कर इसकी वृद्धि की है॥१॥
इन शोभावाने और महिमावान् रुद्रदेव के पुत्र मरुद्गणों ने आकाश में अपना श्रेष्ठ स्थान बनाया हैं । इन्द्रदेव के लिये स्तोत्रों का उच्चारण कर बलों को प्रकट किया है। वे पृथिवीपुत्र मरुद्गण अलंकारों को धारण कर शोभायमान हुए हैं॥२॥
वे पृथिवीपुत्र मरुद्गण अलंकारों को शरीर पर विशेष रूप से धारण कर सुशोभित होते हैं। वे मार्ग के शत्रुओं को विदीर्ण करते हैं, जिससे घृत (पोषक सारतत्व) की उपलब्धि के मार्ग खुल जाते हैं॥३॥
उत्तम युद्ध करने वाले वीर मरुद्गण दीप्तिमान् अस्त्रों से सज्जित होकर अडिग शत्रुओं को भी अपनी सामर्थ्य से प्रकम्पित करते हैं । हे मरुद्गणो ! आप मन के समान वेग वाले रथों में धब्बेदार मृगों को योजित कर संघबद्ध होकर चलने वाले हैं॥४॥
हे मरुद्गणो ! जब आप युद्ध में वज्र को प्रेरित करते हुए बिन्दुदार (चितकबरे) मृगों को रथ में योजित करते हैं, तब धूमिल (मटमैले) मेघों की जल-धाराएँ वेग से नीचे प्रवाहित होती हैं । वे भूमि को त्वचा के समान आई (नम) कर देती हैं॥५॥
हे मरुद्गणो ! वेगवान् अश्व आपको इस यज्ञस्थल पर ले आयें । आप शीघ्रता पूर्वक दोनों हाथों में धन को धारण कर इधर आये । आपके निमित्त यहाँ बड़ा स्थान विनिर्मित किया है । यहाँ कुश आसनों पर अधिष्ठित होकर मधुर हवि रूप अन्नों का सेवन कर हर्षित हों॥६॥
वे मरुद्गण अपनी सामर्थ्य से स्वयं वृद्धि को प्राप्त होते हैं। उन्होंने अपनी महत्ता के अनुरूप स्वर्ग में बड़े विस्तृत स्थान को तैयार किया है । इन इष्टवर्धक और हर्ष प्रदायक मरुतों की रक्षा स्वयं परमात्मा विष्णु करते हैं। हे मरुद्गणो ! हमारे प्रिय यज्ञ स्थान में पक्षियों की भाँति पंक्ति बद्ध होकर पधारें॥७॥
वीरों के समान संघर्षशील, योद्धाओं के समान आक्रामक, यश के इच्छुक, वीरों के समान अग्रणी, युद्धों में अति प्रयत्नशील ये मरुद्गण राजाओं के समान विशेष तेजस्वी रूप में शोभायमान हैं। इनसे सारे लोक भयभीत हो उठते हैं॥८॥
अत्यन्त कुशल कर्मवाले त्वष्टादेव ने इन्द्रदेव के लिए स्वर्णमय सहस्र धारों से युक्त वज्र को बनाकर दिया। इन्द्रदेव ने उसे धारण कर मनुष्यों के हितार्थ उससे वीरोचित कर्मों को सम्पन्न किया। जल को बाधित करने वाले वृत्र को मारकर जलों को मुक्त किया॥९॥
उन मरुद्गणों ने अपने बल से भूमि के जलों को ऊपर की ओर प्रेरित किया और दृढ़ मेघों को विशेष रूप से भेदन किया, तदनन्तर उत्तम दानी पुरुष मरुद्गणों ने सोमों से हर्षित होकर वाद्ययंत्रों से ध्वनि करते हुए उत्तम गान भी किया॥१०॥
मरुद्गणों ने जलाशय के जल को तिरछा करके प्रवाहित किया। प्यास से व्याकुल गोतम ऋषि के वंशजों के लिए झरने से सिंचन किया । थे अद्भुत दीप्ति वाले संरक्षण साधनों से युक्त होकर उनकी रक्षा के लिये गये, और अषि की पिपासा को तृप्त किया॥११॥
हे मरुद्गणो ! स्तोताओं और दाताओं को जो आप उनकी कामना से तीन गुना अधिक देकर सुखी करते हैं, वह हमें भी दें । हे बलवान् वीरो ! आप उत्तम सन्तान से युक्त धन हमें प्रदान करें॥१२॥

सूक्त - ८६

दिव्य लोक के वासी, विशिष्ट तेजस्विता सम्पन हे मरुद्गण ! आपके द्वारा जिस यजमान के यज्ञस्थल पर सोमपान किया गया, निश्चित ही वे चिरकाल पर्यन्त आपके द्वारा संरक्षित रहते हैं॥१॥
हे यज्ञ को वहन करने वाले मरुद्गणो ! हमारे यज्ञों में ऋषियों द्वारा प्रणीत स्तुतियों का श्रवण करें॥२॥
जिस यज्ञ के यजमान को आपने ऋषियों के अनुकूल श्रेष्ठमाग बनाया, वह यजमान गौ समूह को प्राप्त करने वाला होता है॥३॥
स्वर्ग सुख प्राप्ति के इच्छुक लोग इन मरुद्गणों के लिए यज्ञों में कुश के आसन पर अभिषुत सोम रखते हैं और स्तोत्रों का गान करते हैं। उससे वे मरुद्गण हर्षित होते हुए प्रशंसा प्राप्त करते हैं॥४॥
हे सर्वद्रष्टा शत्रुविजेता मरुद्गण ! आप इस यजमान का निवेदन सुनें । इनके साथ हम स्तोता भी अन्नों को प्राप्त करें॥५॥
हे मरुद्गणो ! आपके रक्षण सामथ्र्यों से युक्त होकर हम लोग पूर्व के अनेक वर्षों से व्यादि दान करते आये हैं॥६॥
हे पूज्य मरुद्गणो ! वे मनुष्य सौभाग्यशाली हैं, जिनके हविष्यान्न का सेवन आप करते हैं॥७॥
हे सत्यबल सम्पन्न पराक्रमी मरुद्गणो ! स्तुति करने वाले ( श्रम से) पसीने से भीगे हुए याजकों को आप अभीष्ट फल प्रदान करें॥८॥
हे सत्यबल युक्त मरुतो ! आप अपनी तेजस्वी सामर्थ्य से राक्षसों को मारने वाले बल को प्रकट करें॥९॥
हे मरुद्गण ! गहन तमिस्रा को आप दूर करें । सभी राक्षसों को हमसे दूर भगायें । हम आपसे ज्योति रूप ज्ञान की याचना करते हैं॥१०॥

सूक्त - ८७

शत्रु संहारक, महान् बलशाली वक्ता, अड़िग, अविच्छिन्न रहने वाले, सरल व्यवहार वाले जनों के अतिप्रिय, मनुष्यों के शिरोमणि ये मरुद्गण देवी उषा के समान अलंकारों से युक्त होकर विशेष प्रकाशित होते हैं॥१॥
हे मरुद्गणो ! आप पक्षी की भाँति किसी भी पथ से आकर हमारे यज्ञ के समीप एकत्र हों । अपने रथों में विद्यमान धनों के कोश हम पर बरसायें और याजक पर मधुर मृत युक्त अन्नों का वर्षण करें (अर्थात् जल के साथ पोषक पर्जन्य की वर्षा करें ।)॥२॥
ये मंगलकारी वीर मरुद्गण एकत्र होकर युद्ध स्थल पर आक्रमण की मुद्रा में वेग से जाते हैं, तो पृथ्वी भी अनाथ नारी की भाँति काँपने लगती हैं। ये क्रीड़ायुक्त, गर्जनयुक्त, चमकीले अस्त्रों से युक्त होकर शत्रुओं को विचलित करके अपनी महत्ता को प्रकट करते हैं॥३॥
ये मरुद्गण स्वचालित विन्दुओं से चिह्नित अश्व वाले विविध बलों से युक्त सब पर प्रभुत्व करने में समर्थ हैं । ये सत्यरूप, पापनाशक, अनिन्दनीय, बलशाली, बुद्धि को प्रेरित करने वाले और रक्षा करने वाले हैं॥४॥
मरुद्गणों के जन्म की कथा हमारे पूर्वज कहते हैं। सोम को देखकर हमारीं वाणी उन मरुद्गणों की स्तुतियाँ करती है । जब ये मरुद्गण संग्राम में इन्द्रदेव के सहायक हुए, तो याज्ञिकों ने उन्हें (मरुद्गणों को ) प्रशंसनीय (यज्ञार्ह) नामों से विभूषित किया॥५॥
उत्तम अलंकारों और अस्त्रों से सज्जित होकर ये मरुद्गण र्घषयों की वाणी से भली प्रकार सुशोभित होते हैं । ये स्त्रोताओं के निमित्त वृष्टि करने की इच्छा करते हैं, अतएव वेग से जाने वाले ये निड़र चीर अपने प्रिय स्थान पर पहुँचते हैं॥६॥

सूक्त - ८८

हे मरुद्गणो ! विद्युत् की भाँति अत्यन्त दीप्तिवाले, अतिशय गति सम्पन्न, अस्त्रों से सज्जित उड़ने वाले, अश्वों से योजित रथों द्वारा यहाँ आयें। आपकी बुद्धि कल्याण करने वाली है। आप श्रेष्ठ अन्नों के साथ पक्षियों के सदृश वेग से हमारे पास आयें॥१॥
वे मरुद्गण अरुणिम आभा वाले, भूरे वर्ण वाले अश्वों से नियोजित स्वर्णमय रथों से कल्याणकारी कर्म सम्पादन करने के लिए त्वरित गति से आते हैं । अद्भुत आयुधों से युक्त होकर रथ पर विराजित ये रथ के पहियों की लौह पट्टिकाओं से भूमि को उखाड़ते जाते हैं॥२॥
हे मरुद्गण ! आप अपने शरीरों को आयुधों से सुशोभित करते हैं। वनों में वृक्षों के बढ़ने के समान उपासक अपनी बुद्धि को उच्चकोटि की बनाते हैं। हे भली प्रकार उत्पन्न मरुद्गणो ! अति उत्साह से युक्त यजमान आपको हर्षित करने के निमित्त, सोम कूटने के पाषाणों की ध्वनि करते हैं अर्थात् सोमरस तैयार करते हैं॥३॥
हे स्तोताओ ! जल की इच्छा वाले आपके शुभ दिन अब आ चुके हैं । गोतमों ने दिव्य बुद्धि से मन्त्र युक्त स्तोत्रों से स्तुतियाँ की हैं, पीने के लिए ऊपर स्थित 'मेघरूप' कुण्ड को आपकी ओर प्रेरित किया है॥४॥
हे मरुद्गणो ! स्वर्णमय रथ पर अधिष्ठित होकर, तीक्ष्ण धार वाले आयुधों से युक्त होकर विविध भाँति शत्रु पर वार करने वाले, उनका नाश करने वाले, आपको देखकर गोतम षि ने जो छन्दयुक्त स्तुतियाँ वर्णित की हैं। उनका वर्णन सम्भव नहीं था॥५॥
हे मरुतो ! आपके बाहुओं की धारक शक्ति का यशोगान करने वाली ऋषियों की वाणी का अनुकरण कर हम आपकी स्तुति करते हैं। यह स्तुति हमारे द्वारा पूर्व की भाँति सहज स्वभाव से ही की जा रही है॥६॥

सूक्त - ८९

कल्याणकारी, किसी के दबाव में न आने वाले, अपराजित, समुन्नतिकारक शुभ कर्मों को हम सभी ओर से प्राप्त करे । प्रतिदिन सुरक्षा करने वाले सम्पूर्ण देवगण हमारा सम्वर्द्धन करते हुए हमारी रक्षा करने में उद्यत हों॥१॥
सन्मार्ग की प्रेरणा देने वाले देवों की कल्याणकारी सुबुद्धि तथा उनका उदार अनुदान हमें प्राप्त होता रहे। हम देवों की मित्रता प्राप्त कर उनके समीपस्थ हों । वे हमारे जीवन को दीर्घ आयु से युक्त करें॥२॥
हम उन देवगणों भग, मित्र, अदिति, दक्ष, मरुद्गण, अर्यमा, वरुण, सोम, अश्विनीकुमार और सौभाग्यशालिनी सरस्वती की प्राचीन स्तुतियाँ करते हैं। वे हमें सुख देने वाले हों॥३॥
वायुदेव हमें सुखप्रद ओषधियाँ प्रदान करें । माता पृथिवी, आकाश पिता और सोम निष्पादित करने वाले पाषाण, हमें वह औषधि दें । तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारी प्रार्थना सुनें॥४॥
स्थावर जंगम जगत् के पालक, बुद्धि को प्रेरणा देने वाले विश्वेदेवों को हम अपनी सुरक्षा के लिये बुलाते हैं । वह अविचलित पूषादेव हमारे ऐश्वर्य की वृद्धि और सुरक्षा में सहायक हों । वे हमारा कल्याण करें॥५॥
अति यशस्वी इन्द्रदेव हमारा कल्याण करने वाले हों । सर्वज्ञाता पृषादेव हमारा मंगल करें। अतहनगन वाले गरुड़ हमारे हित कारक हों । ज्ञान के अधीश्वर बृहस्पति देव हमारा कल्याण करे॥६॥
बिन्दुवत् चिह्न वाले चितकबरे अश्वों से युक्त भूमिपुत्र, शुभकर्मा, युद्धों में गमनशील, अग्नि की ज्वालाओं के समान तेज सम्पन्न, मननशील ज्ञान सम्पन्न, मरुद्गण अपनी रक्षण सामथ्र्यों से युक्त होकर यहाँ आये॥७॥
हे यजन योग्य देवो ! कानों से हम मंगलमय वचनों का ही श्रवण करें । नेत्रों से कल्याणकारी दृश्यों को ही देखें। स्थिर -पुष्ट अंगों से आपकी स्तुति करते हुए, देवों के द्वारा नियत आयु को प्राप्त करके, हम देर्वाहतकारी कार्यों में इसका उपयोग करें॥८॥
हे देवो ! सौ वर्ष तक हमारी आयु की सीमा है । हमारे इस शरीर में बुढ़ापा भी आपने दिया है, उस समय हमारे पुत्र भी पिता बन जाते हैं, अत: हमारी आयु मध्य में ही टूट न जाये, ऐसा प्रयत्न करें॥९॥
अदिति ही द्युलोक है । अन्तरिक्ष, माता, पिता, पुत्र, सम्पूर्ण देवगण, पञ्चजन (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद) नव उत्पन्न और भावी आगे उत्पन्न होने वाले जो भी हैं, वे अदिति के ही रूप हैं॥१०॥

सूक्त - ९०

ज्ञानी देव मित्र और वरुण हमें सरल नीति पथ पर बढ़ाते हैं। देवों के सहचर अर्यमा हमें सरल मार्ग से उन्नतिशील बनायें॥१॥
वे धनों के धारणकर्ता धनपति, प्रकृष्ट बुद्धि सम्पन्न, महान् सामथ्र्यों से सम्पूर्ण शत्रुओं के नाशक नियमों में अटल हैं॥२॥
वे अविनाशी देवगण हमारे शत्रुओं का नाश करके हम मनुष्यों को सब भाँति सुख देते हैं॥३॥
ये वन्दनीय देवगण इन्द्र, मरुत् , पूषा और भग हमें कल्याणकारी पथ पर प्रेरित करें॥४॥
हे पूषन् ! हे विष्णो ! हे गतिशील मरुतो ! आप हमारी बुद्धि को गो सदृश (पोषक विचार स्रवित करने वाली) बनायें । (इस प्रकार) हमारा कल्याण करें॥५॥
यज्ञ कर्म करने वालों के लिये वायु एवं नदियाँ मधुर प्रवाह पैदा करें । सभी ओषधियाँ मधुर रस से सम्पन्न हों॥६॥
पिता की तरह पोषणकर्ता दिव्यलोक हमारे लिए माधुर्य युक्त हो । मातृवत् रक्षक पृथ्वी की रज भी मधु के समान आनन्दप्रद हो । रात्रि और देवी उषा भी हमारे लिये माधुर्ययुक्त हों॥७॥
सम्पूर्ण वनस्पतियाँ हमारे लिये मधुर सुख प्रदायक हों । सूर्यदेव हमें अपने माधुर्य (तेजस्वी किरणों से परिपुष्ट करें तथा गौएँ भी हमारे लिये अमृत स्वरूष मधुर दुग्ध रस प्रदान करने में सक्षम हों॥८॥
मित्रदेव, श्रेष्ठ वरुणदेव, न्यायकारी अर्यमादेव, ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव, वाणी के स्वामी बृहस्पतिदेव, संसार के पालन करने वाले विष्णुदेव हम सबके लिये कल्याणकारी हों॥९॥

सूक्त - ९१

हे सोमदेव ! हम अपनी बुद्धि से आपको जान सकें । आप हमें उत्तम मार्ग पर चलाते हैं । आपके नेतृत्व में आपका अनुगमन करके हमारे पूर्वज, देवों से रमणीय सुख प्राप्त करने में सफल हुए थे॥१॥
हे सोमदेव ! आप अनेक कर्मों का सम्पादन करने वाले होने से सुकर्मा रूप में प्रसिद्ध हैं । सबको जानने वाले आप अनेक कर्मों में कुशल होने से उत्तम दक्ष हैं। आप अनेक बलों के युक्त होने से महाबली हैं। आप अनेकों तेजस्वी धनों से युक्त वैभव सम्पन्न हैं॥२॥
हे सोमदेव ! आप अत्यन्त पवित्र हैं। आपका धाम बड़ा विस्तृत और भव्य हैं । राजा वरुण के सभी नियमों से आप मुक्त हैं। आप मित्र के समान प्रीति-कारक और अर्यमा के समान अति कुशल हैं॥३॥
हे राजा सोम ! आपके उत्तम स्थान आकाश में, पृथ्वी के ऊपर पर्वता म, ओषधियों में और जलों में है । आप उन सम्पूर्ण स्थानों से द्वेष रहित प्रसन्न मन से यहाँ आकर हमारी हवियों को ग्रहण करें॥४॥
हे सोमदेव ! आप श्रेष्ठ अधिपति हैं । आप सबके नेतृत्वकर्ता और पोषक हैं । आप वृत्र-नाशक और कल्याणकारी बल के प्रकट रूप हैं॥५॥
हे सोमदेव ! आप हमारे दीर्घजीवन के लिए प्रशंसनीय ओषधिरूप है। आपकी अनुकूलता से हम मृत्यु से बच सकेंगे॥६॥
हे सोमदेव ! आप महान् यज्ञ का सम्पादन करने वाले, तरुण उपासकों को उत्तम जीवन के लिए बल और सौभाग्य प्रदान करते हैं॥७॥
हे राजा सोमदेव ! आप जिसकी रक्षा करते हैं,वह कभी भी नष्ट नहीं होता। आप दुष्ट पापियों से सब प्रकार हमारी रक्षा करें॥८॥
हे सोमदेव ! हविदाता के सुखद जीवन के लिए अपने रक्षण-सामथ्र्यो से उसकी रक्षा करें॥९॥
हे सोमदेव ! आप इस यज्ञ में हमारी इन स्तुतियों को स्वीकार करें। हमारे पास आयें और हमारी वृद्धि करें॥१०॥
स्तुति वचनों के ज्ञाता हे सोमदेव ! हम अपनी वाणियों से आपको बढ़ाते हैं। आप हमारे बीच सुख-साधनों को लेकर प्रविष्ट हों॥११॥
हे सोमदेव ! आप हमारी वृद्धि करने वाले, रोगों का नाश करने वाले, धन देने वाले, पुष्टि वर्धक और उत्तम मित्र बनें॥१२॥
हे सोमदेव ! गौएँ जैसे जौ के खेत में और मनुष्य जैसे अपने घर में रमण करता है, वैसे आप हमारे हृदय में रमण करें॥१३॥
हे सोमदेव ! जो याजक आपकी मित्रता से युक्त रहता है, वहीं मेधावी और कुशल ज्ञानी हो जाता है॥१४॥
हे सोमदेव ! हमें अपयश से बचायें । पापों से हमें रक्षित करें और हमारे निमित्त सुखकारी मित्र बनें॥१५॥
हे सोमदेव ! आप वृद्धि को प्राप्त हों । आप सभी ओर से बलों से युक्त हों। संग्राम में आप हमारे सहायक रूप हों॥१६॥
हे अति आह्लादक सोमदेव ! अपने दिव्य गुणों की यश गाथाओं से चतुर्दिक् विस्तार को प्राप्त करें । हमारे विकास के निमित्त मित्र रूप में आप सहयोग करें॥१७॥
हे शत्रु, संहारक सोमदेव ! आप दूध, अन्न बल को धारण करें। अपने अमरत्व के लिए द्युलोक में श्रेष्ठ अन्नों (दिव्य पोषक तत्वों) को प्राप्त करें॥१८॥
हे सोमदेव ! यज्ञ करने वाले आपके जिन तेजों के लिए हवियाँ प्रदान करते हैं, वे सभी प्रखर यज्ञ क्षेत्र के चारों ओर रहें । घरों की अभिवृद्धि करने वाले, विपत्तियों से पार करने वाले, पुत्र पौत्रादि श्रेष्ठ वीरों से युक्त करने वाले, शत्रुओं के विनाशक, हे सोमदेव ! आप हमारी ओर आयें॥१९॥
जो हवि (द्रव्य) का दान करता है, उसे सोमदेव गौ और अश्व देते हैं। कर्म कुशल, गृह व्यवस्था कुशल, यज्ञाधिकारी, सभा में प्रतिष्ठित, पिता का यश बढ़ाने वाला पुत्र भी सोमदेव के अनुग्रह से प्राप्त होता है॥२०॥
हे सोमदेव ! संग्रामों में असहनीय दिखाई देने वाले, शत्रुओं पर विजय पाने वाले, विशाल सेनाओं के पालक, जलदाता, शक्ति संरक्षक, संग्रामों के विजेता, श्रेष्ठ निवास युक्त तथा कीर्तिवान् आपका हम अनुसरण करते हैं॥२१॥
अपने तेज से अंधकार को नष्ट करने वाले एवं अंतरिक्ष को विस्तार देने वाले हे दिव्य सोमदेव ! आपने ही पृथ्वी पर सभी ओषधियों, गौओं एवं जल को उत्पन्न किया॥२२॥
हे दिव्य शक्ति सम्पन्न सोमदेव ! विचारपूर्वक श्रेष्ठ धन का भाग हमें प्रदान करें । दान के लिये प्रवृत्त हुए आपको कोई प्रतिबंधित नहीं करेगा, क्योंकि आप हीं अति समर्थ कार्यों के साधक हैं । स्वर्ग की कामना से युक्त हमें दोनों लोकों में सुख प्रदान करें॥२३॥

सूक्त - ९२

नित्यप्रति ये उषायें उजाला लाती हैं । (इस समय) आकाश के पूर्वार्द्ध में प्रकाश फैल जाता है। जैसे वीर शस्त्रों को पैना करते हैं (चमकाते हैं ),उसी प्रकार अपने प्रकाश से जगत् को प्रकाशित करती हुईं वे गमनशील और तेजस्वी लालवर्ण की गौएँ (किरणे) आगे बढ़ती हैं॥१॥
(उषा काल में) अरुणाभ किरणे स्वाभाविक रूप में (क्षितिज के) ऊपर आ गई हैं। स्वयं जुते हुए बैलों (किरणों) के रथ से देवी उषा ने पहले ज्ञान का (चेतना का संचार किया, फिर प्रकाश दाता तेजस्वी सूर्यदेव की सेवा (सहायता) करने लगीं॥२॥
(यज्ञादि) श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ प्रयोजन हेतु दान देने वाले, सोमरस को संस्कारित करने वाले, यजमान को अपनी किरणों (के प्रभाव) से प्रचुर मात्रा में अन्नादि देती हुई (उषा) आकाश को अपने तेज से परिपूर्ण करती हैं। रण में शस्त्रों से सज्जित वीर के तुल्य देवी उषा आकाश को सुन्दर दीप्तिमान् बना देती हैं॥३॥
ये देवी उषा नर्तकी के समान विविध-रूपों को धारण कर उतरती हैं। ये देवी उषा गौ के समान (दूध की तरही पोषक प्रवाह प्रदान करने के लिए अपना वक्ष खोल देती हैं । ये देवी उषा सम्पूर्ण लोकों को प्रकाश से व्याप्त करती हैं और तमिस्रा को मिटाकर सबकी रक्षा करती हैं॥४॥
इन देवी उषा की दीप्तियाँ उदित होकर सर्वत्र फैल रही हैं और व्यापक तमिस्रा को दूर करती हैं। यज्ञों में जैसे यूप को घृत से लीपकर सुन्दर बनाते हैं, वैसे ही आकाश पुत्री देवी उषा विलक्षण प्रकाश को धारण करती हैं॥५॥
हम उस अंधकार से पार हो गये। प्रकाशवती देवी उषा सब कुछ स्पष्ट कर देती हैं । कवि द्वारा छन्दों से अलंकृत करने के समान और पति को प्रसन्न करने के लिए अलंकारों से सुसज्जित सुन्दर स्त्री के समान दिव्य प्रकाश से अलंकृत देवी उषा मुस्कराती हैं॥६॥
ये प्रकाशमती, सत्यवाणी को प्रेरित करने वाली, आकाशपुत्री उषा गोतम ऋषि द्वारा स्तुत्य है । हे उषे ! आप हमें पुत्र-पौत्रों, अश्वों, गौओं तथा विविध प्रकार के धन-धान्यों से सम्पन्न करें॥७॥
हे सौभाग्य शालिनि उषे ! हमें सुन्दर पुत्रों, सेवकों, अश्वों से युक्त उस यशस्वी धन को प्राप्त करायें । आप उत्तम कर्म वाली, यशस्विनी, अन्न उत्पन्न करने वाली हैं। अपने ऐश्वर्यों से हमें भी प्रकाशित करें॥८॥
ये देवी उषा सभी लोकों को देखती हुई पश्चिम की ओर मुख करके विशिष्ट प्रकाश से प्रतिभासित होती हैं। यह सब जीवों को जगाकर गतिवान् बनाती हैं । विश्व के मननशील मानवों की वाणी को प्रेरणा देती हैं॥९॥
पुन:पुनः प्रकट होने वाली पुरातन देवी उषा प्रतिदिन एक समान वर्ण को प्राप्त कर अति सुशोभित होती हैं। ये देवी उषा मनुष्य की आयु को उसी प्रकार क्षीण करती जाती हैं, जैसे व्याधिनी पक्षियों की संख्या क्षीण करती जाती है॥१०॥
वे देवी उषा आकाश के विस्तृत प्रदेशों को प्रकाशित करने के लिए जाग उठी हैं। वे अपनी बहिन रात्रि को दूर छिपाती हैं । ये मानवीं युगों को विनष्ट करती हुईं (अर्थात् नित्यप्रति मनुष्य की आयु को कम करती ) सूर्यदेव के दर्शन से विशेष प्रकाशित होती हैं॥११॥
उज्ज्वल वर्णवाली, सौभाग्यशालिनी देवी उषा गौशाला से निकले हुए पशुओं के समान विस्तार को प्राप्त होती हैं। नदियों में बढ़ते जल के समान फैलती हुई जाती हैं । ये देवी उषा देवों के श्रेष्ठ कर्मों से विचलित नहीं होती और सूर्य की रश्मियों सी दीखती हुई प्रतीत होती हैं॥१२॥
वनों को प्रारम्भ करने वाली हे उषे ! हमें वह विलक्षण ऐश्वर्य प्रदान करें, जिससे हम सन्तानादि का पोषण कर सकें॥१३॥
गौओं ( पोषक तत्वों) और अश्वों (पराक्रम) से युक्त यज्ञ कर्मों की प्रेरक हे उषे ! आप आज हमें धन-धान्य से परिपूर्ण करें॥१४॥
हवनों को प्रारम्भ करने वाली हे उषे ! अरुणाभ अश्वों ( किरणों) को अपने रथ से युक्त करें और हमें विश्व के सब सौभाग्य प्रदान करें॥१५॥
शत्रुओं का नाश करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप गौओं और स्वर्णमय रथ को मनोयोग पूर्वक हमारी ओर प्रेरित करें॥१६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप द्युलोक से प्रशंसा योग्य प्रकाश लाकर लोगों का हित करते हैं, ऐसे आप हमें अन्न से पुष्ट करें॥१७॥
देवी उषा के साथ जाग्रत् अश्व (शक्तिप्रवाह) स्वर्णिम प्रकाश में स्थित दुःख निवारक एवं सुखदायी अश्विनीकुमारों को इस यज्ञ में सोमपान के लिये लायें॥१८॥

सूक्त - ९३

हे शक्तिवान् अग्निदेव और सोमदेव ! आप हमारे आवाहन को सुनें और हमारे उत्तम वचनों से आप हर्षित हों । हम हविदाताओं के लिये सुखकारी हों॥१॥
हे अग्निदेव और सोमदेव ! हम आज आपके निमित्त उत्तम वचनों को अर्पित करते हैं । आप उत्तम पराक्रम धारण कर हमारे निमित्त उत्तम अश्वों और उत्तम गौओं की वृद्धि करें॥२॥
हे अग्निदेव और सोमदेव ! जो आपके निमित्त आहुतियाँ देकर हवन सम्पादित करता है, उसे आप सन्तान सुख के साथ उत्तम बलों और पूर्ण आयु से सम्पन्न करें॥३॥
हे अग्निदेव और सोमदेव ! आपका वह पराक्रम उस समय ज्ञात हुआ,जब आपने ‘पणि' से गौओं का ह्रण किया और 'बृसप' के शेष रक्षकों को क्षत-विक्षत किया। असंख्यों के लिये सूर्य प्रकाश का प्राकट्य किया॥४॥
हे सोमदेव और अग्निदेव ! आप दोनों समान कर्म करने वाले हैं । हे अग्नि और सोमदेव ! आपने आकाश में प्रकाशित नक्षत्रों को स्थापित किया है और हिंसक वृत्र द्वारा प्रतिबन्धित नदियों को मुक्त किया हैं॥५॥
हे अग्निदेव और सोमदेव ! आप में से अग्निदेव को मातरिश्वा वायु द्युलोक से यहाँ ( भृगुऋषि के लिए) ले आये और दूसरे सोम को श्येन पक्षी पर्वत शिखर से उखाड़कर लाया, इस प्रकार आपने स्तोत्रों से वृद्धि पाकर व्यापक क्षेत्र में यज्ञों का विस्तार किया॥६॥
हे बलवान् अग्निदेव और सोमदेव ! आप हमारी हवियों को ग्रहण करके हर्षयुक्त हों। आप हमें उत्तम सुख देने वाले और हमारी रक्षा करने वाले हों । इस यजमान के कष्टों को दूर कर सुख प्रदान करें॥७॥
हे अग्निदेव और सोमदेव ! जो साधक देवों के लिये भक्ति और मनोयोग पूर्वक घृतयुक्त हवियों को समर्पित करता है, उसके व्रत की आप रक्षा करें । उसे पापों से बचायें और उसके सम्बन्धी जनों को विपुल सुखों से युक्त करें॥८॥
हे अग्निदेव ! हे सोमदेव ! आप दोनों ऐश्वर्य सम्पन्न हैं । यज्ञस्थल पर संयुक्त रूप से बुलाये जाते हैं। आप दोनों देवत्व से युक्त हैं। हमारे द्वारा संयुक्त रूप से की गई स्तुतियों को स्वीकार करें॥९॥
हे अग्निदेव और सोमदेव ! जो आपको घृतयुक्त हविष्यान देते हैं, उनके लिये आप भरपूर अन्न और ऐश्वर्य प्रदान करें॥१०॥
हे अग्निदेव और सोमदेव ! आप हमारी इन हवियों को स्वीकार करें। आप दोनों संयुक्त रूप से हमारे निकट आयें॥११॥
हे अग्निदेव और सोमदेव ! आप हमारे अश्वों को पुष्ट करें । दुग्ध-घृत रूप हवि देने वाली हमारी गौओं को पुष्ट करें । हे धनवान् ! आप हम याजकों को विविध बल धारण करायें । हमारे यज्ञों के यश को विस्तृत करें॥१२॥

सूक्त - ९४

पूजनीय जातवेद (अग्नि) को यज्ञ में प्रकट करने के लिए स्तुति को विचार पूर्वक रथ की तरह प्रयुक्त करते हैं। इस यज्ञाग्नि के सान्निध्य से हमारी बुद्धि कल्याणकारी बनती है । हे अग्निदेव ! हम आपकी मित्रता से सन्ताप रहित रहें॥१॥
हे अग्निदेव ! आप जिस साधक की सहायता करते हैं, वह शक्ति से सम्पन्न होकर एवं शत्रुओं से निर्भय होकर निवास करता है । धन-बल से सम्पन्न वह प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। आपकी मित्रता से हमें कभी कोई कष्ट न हो॥२॥
हे अग्निदेव ! आपको समिधाओं आदि से भली-भाँति प्रज्वलित कर हम देवताओं के लिए आहुतियाँ प्रदान करते हैं । हवि ग्रहण करने हेतु देवों को बुलायें और हमारा यज्ञ भली-भाँति सम्पन्न करें । यहाँ हमें उनके आगमन के लिए उत्सुक हैं । हे अग्निदेव ! आपकी मित्रता से हम कल्याण युक्त हों॥३॥
हे अग्निदेव ! प्रत्येक शुभ अवसर पर हम समिधाएँ एकत्र कर आपको प्रज्वलित करते हैं तथा आहुतियाँ प्रदान करते हैं । आप हमारे दीर्घायुष्य की कामना से यज्ञ को सफल करें। आपकी मित्रता से हम कभी कष्ट न पायें॥४॥
इन अग्निदेव से उत्पन्न किरणें समस्त प्राणियों की रक्षा करती हुई विचरण करती हैं। इन अग्निदेव से रक्षित होकर दो पाये (मनुष्य) और चौपाये (पशु) भी विचरण करते हैं । हे अग्निदेव ! विलक्षण तेजों से युक्त होकर आप देवी उषा के सदृश महान् होते हैं। आपकी मित्रता से हम दु:खी न हों॥५॥
हे मेधावी अग्निदेव ! आप अध्वर्यु और चिर पुरातन होता रूप हैं। आप प्रशासक, पोतारूप और प्रारम्भ से ही पुरोहित रूप हैं। आप ऋत्विजोंं और विद्वानों के सम्पूर्ण कर्मों को पुष्ट करने वाले हैं। आपको मित्रता हमारे लिए कष्टकर न हो॥६॥
हे अग्निदेव ! आप अति उत्तम रूपवान् और सब ओर से दर्शनीय हैं। दूरस्थ होते हुए आप तड़ित् (विद्युत् के समान अति दीप्तिमान् हैं । हे देव ! आप रात्रि के अंधकार को भी नष्ट कर प्रकाशित होते हैं । आपकी मित्रता से हम कभी कष्ट में न रहें॥७॥
हे देवो ! सोम-सवन करने वाले को रथ सदा अग्रणी हो । हमारे स्तोत्र पाप बुद्धि वाले दुष्टों का पराभव करें । आप हमारा निवेदन जानकर हमारे वचनों को पुष्ट करें । हे अग्निदेव ! आपकी मित्रता से हम कभी व्यथित न हों॥८॥
हे अग्निदेव ! आप पाप बुद्धि वाले, दूरस्थ अथवा निकटस्थ दुष्टों और हिंसक शत्रुओं का, शस्त्रों से वध करें । तदनन्तर यज्ञ के स्तोता का मार्ग सुगम करें । हम आपकी मित्रता से कभी कष्ट न पायें॥९॥
हे अग्निदेव ! आप तेजस्वी, रोहित वर्ण वाले, वायु के सदृश वेग वाले अश्वों को रथ में नियोजित करते हैं, तब गम्भीर ध्वनि उत्पन्न होती है। फिर वनों के सभी वृक्षों को आप धूम्र की पताका से ढक लेते हैं। आपको मित्रता से हम कभी कष्ट न पायें॥१०॥
हे अग्निदेव ! जिस समय आपकी ज्वालाएँ जंगल में फैलती हैं, तो आपके शब्द से पक्षी भयभीत हो उठते हैं। जब ये ज्वालाएँ तिनकों के समूह को जलाती हुई फैलती हैं, तब आपके अधीनस्थ रथ भी सुगमता पूर्वक गमन करते हैं। आपकी मित्रता में हम कभी पीड़ित न हों॥११॥
ये अग्निदेव मित्र और वरुण देवों को धारण करने में समर्थ हैं । उतरते हुए मरुतों का क्रोध भयंकर है। हे अग्निदेव ! इन मरुतों का मन हमारे लिये प्रसन्नता युक्त हो । हमें आप सुखी करें । आपकी मित्रता में हम कभी कष्ट न पायें॥१२॥
हे दिव्य अग्निदेव ! आप समस्त देवों के अद्भुत मित्र रूप हैं। आप यज्ञ में अति सुशोभित होने वाले और सम्पूर्ण धनों के परमधाम हैं । आपके व्यापक गृह में शरण लेकर हम संरक्षित हों। आपकी मित्रता में हम कभी पीड़ित न हों॥१३॥
हे अग्निदेव ! आप अपने स्थान (यज्ञ गृह) में प्रज्वलित होकर सोमयुक्त आहुतियों को ग्रहण करते हैं, और स्तोताओं को अत्युत्तम सुख प्रदान करते हैं। हविदाताओं को रत्नादि धन देने का आपका कार्य अति प्रशंसनीय हैं। आपकी मित्रता को प्राप्त होकर हम कभी पीड़ित न हों॥१४॥
हे सुन्दर ऐश्वर्यवान् अनन्त बलवान् अग्निदेव ! आप यज्ञों में जिस याजक को पाप-कर्मों से मुक्त करते हैं, तथा जिसे कल्याण, बल, वैभव के साथ पुत्र-पौत्रादि से युक्त करते हैं, उनमें हम भी शामिल हों॥१५॥
हे दिव्य अग्निदेव ! सर्व सौभाग्य के ज्ञाता आप हमारी आयु में वृद्धि करें । मित्र, वरुण, अदिति, पृथ्वी, समुद्र और आकाश देव भी हमारी उस आयु की रक्षा करें॥१६॥

सूक्त - ९५

भिन्न स्वरूप वाली, उत्तम प्रयोजनों में लगी हुई दो स्त्रियाँ (रात्रि और दिन रूप में एक दूसरे के पुत्रों को पोषित करती हैं। एक का पुत्र हरि (रात्रि के गर्भ से उत्पन्न रसों का हरण करने वाला सूर्य) अन्य ( दिन)के द्वारा पोषित होता है तथा दूसरी का पुत्र शुक्र (दिन में जाग्रत् तेजस्वी अग्नि) अन्य (रात्रि) के द्वारा घोषित होता है॥१॥
आलस्य रहित ये युवतियाँ (दस अंगुलियाँ ) तेज के गर्भ रूप अग्निदेव को उत्पन्न करती हैं । ये भरण पोषण करने वाले, तीक्ष्ण मुखों (लपटों ) वाले अपने यश से जनों में प्रकाशित अग्निदेव लोगों द्वारा चारों ओर ले जाये जाते हैं॥२॥
इन अग्निदेव के तीन विशिष्ट रूप सर्वत्र विभूषित हैं । समुद्र में (बड़वानलन रूप में )आकाश में (सूर्यरूप में) और अन्तरिक्ष में जलरूप में (जलों में विद्युत् रूप में), (सूर्यरूप) अग्नि ने ही ऋतु चक्र की व्यवस्था की हैं । पृथ्वी के प्राणियों की व्यवस्था के लिए पूर्वादि दिशाओं की स्थापना भी (सूर्यरूप) अग्नि ने ही की है॥३॥
इन गुह्य अग्निदेव को कौन जानता है ? पुत्र होते हुए भी इनने अपनी माताओं को निज धारक सामथ्र्यों से प्रकट किया। निज-धारक सामर्थ्य से जलों के गर्भ में स्थित रहकर समुद्र में संचार करने वाले ये अग्निदेव कवि (क्रान्तदर्शी) हैं॥४॥
जलों में प्रविष्ट हुए अग्निदेव यज्ञ के साथ प्रकाशित होकर बढ़ते हुए ऊपर उठते हैं। इनके उत्पन्न होने पर त्वष्टा देव की दोनों पुत्रियाँ ( अग्नि उत्पादक काष्ठ या अरणियाँ) भयभीत होती हैं और सिंह रूप इन अग्निदेव की अनुचारिणी बनकर सेवा करती हैं॥५॥
कल्याण करने वाली सुन्दर स्त्रियों के समान आकाश और पृथ्वी दोनों सूर्यरूप अग्निदेव की सेवा करती हैं। रंभाने वाली गौओं की तरह ये अपनी चाल से इनके पास जाती हैं । ऋत्विग्गण दक्षिण की ओर मुख करके हवियों द्वारा अग्निदेव का यजन करते हैं । वे अग्निदेव बलवानों से भी अधिक बली हैं॥६॥
अग्निदेव सवितादेव के समान अपनी भुजाओं रूपी रश्मियों को फैलाते हैं और विकराल होकर सिंचन करने वाली दोनों माताओं (द्यावा-पृथ्वी) को अलंकृत करते हैं। तदनन्तर प्रकाश का कवच हटाकर माताओं को नवीन वस्त्रों से आच्छादित कर देते हैं॥७॥
ये मेधावी और ज्ञान सम्पन्न अग्निदेव अपने स्थान में गौ दुग्ध-घृत रूगी रसों से संयुक्त होकर उत्तरोत्तर तेजस्वी रूप को धारण करते हैं। वे मूल स्थान को परिशुद्ध कर दूर अन्तरिक्ष तक दिव्य तेजस्विता को विस्तृत कर देते हैं॥८॥
महाबली अग्निदेव का उज्ज्वल तेज अन्तरिक्ष के व्यापक स्थानों तक फैल गया है । हे अग्निदेव ! आप प्रदीप्त होकर सम्पूर्ण यशस्वी सामर्थों और अटल रक्षण साधनों से हमारी रक्षा करें॥९॥
ये अग्निदेव निर्जन स्थान में भी जल स्रोत फोड़कर मार्ग बनाते हैं । वर्षा करके पृथ्वी को जलों से पूर्ण कर देते हैं। सब अन्नों को प्राणियों के पेट में स्थापित करते हैं। ये नूतन वनस्पतियों-ओषधयों के गर्भ में शक्ति का संचार करते हैं॥१०॥
हे पवित्र कर्ता अग्निदेव ! समिधाओं से संवर्धित होकर आप हमारे लिए धन देने वाले हों और अपने यश से प्रकाशित हों । हमारे इस निवेदन का मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्युलोक भी अनुमोदन करें॥११॥

सूक्त - ९६

बल (काष्ठों के बल पूर्वक घर्षण से उत्पन्न अग्निदेव ने, पूर्व की भाँति सभी स्तुतियों को धारण किया। उन अग्निदेव ने जल समूह और पृथिवी को अपना मित्र बनाया । देवों ने उन धन प्रदाता अग्निदेव को दूतरूप में धारण किया॥१॥
उन अग्निदेव ने मनोयोग पूर्वक की गई प्राचीन स्तुति काव्यों से सन्तुष्ट होकर मनु की संतानों (प्रजाओं) को उत्पन्न किया। अपने तेजस्वी प्रकाश से सूर्य रूप में आकाश को और विद्युत् रूप में अन्तरिक्ष के जलों को व्याप्त किया। देवों ने धन प्रदाता अग्निदेव को दूत-रूप में धारण किया'॥२॥
हे बुद्धि सम्पन्न प्रजाजनो ! आप उन देवयज्ञ के साधक, आहुति प्रिय, इच्छित फल प्रदायक, बलोत्पन्न (अरणि मन्थन से प्रकट) भरण पोषण करने वाले, उत्तम दानशील अग्निदेव की सर्वप्रथम स्तुति करें । देवों ने ऐसे धन प्रदाता अग्निदेव को दूतरूप में धारण किया है॥३॥
वे मातरिश्वा अग्निदेव विविध प्रकार से पुष्टि प्रदायक, आत्म प्रकाश के ज्ञाता, प्रजारक्षक, पृथ्वी और आकाश के उत्पादक हैं। उन्होंने अपनी सन्तानों की प्रगति के उत्तम मार्ग ढूंढ निकाले हैं। देवों ने उन धन प्रदाता अग्निदेव को दूतरूप में धारण किया है॥४॥
रात्रि और उषा एक दूसरे के वर्ण के अस्तित्व को नष्ट करने वाली स्त्रियाँ हैं, जो एक स्थान पर रहकर एक ही शिशु (अग्नि)को पालती हैं। ये प्रकाशक अग्निदेव आकाश और पृथ्वी के मध्य विशेष रूप से प्रतिभासित होते हैं, देवों ने उन धन प्रदाता अग्निदेव को दूत रूप में धारण किया है॥५॥
धन वैभव के मूल आधार ये अग्नि देव ऐश्वर्यों से युक्त करने वाले, यज्ञ की सूचक ध्वजा के समान तथा मनुष्य के निमित्त इष्टफल प्रदायक हैं। अमरत्व के रक्षक देवों ने ऐसे अग्निदेव को धारण किया है॥६॥
ये अग्निदेव वर्तमान और पूर्व की सम्पदाओं के आधार हैं । जो उत्पन्न हुए या उत्पन्न होने वालों के आश्रय स्थान हैं। जो उत्पन्न हुए या उत्पन्न होने वालों के आश्रय स्थान हैं । जो विद्यमान और उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थों के संरक्षक हैं। देवों ने उन धन प्रदाता अग्निदेव को धारण किया है॥७॥
धन-प्रदाता अग्निदेव हमारे उपयोग के लिए जंगम ऐश्वर्य साधन (गवाद धन) और स्थावर ऐश्वर्य साधन (वानस्पतिक पदार्थ) भी दें वे सन्तान युक्त धन सम्पदा और दीर्घ आयु भी प्रदान करें॥८॥
है पवित्रकर्मा अग्निदेव ! समिधाओं से सम्वर्धित होकर आप हमें धन देते हुए अपने यश से प्रकाशित हो । हमारे इस निवेदन का मित्र, वरुण, अदिति, समुद्र, पृथिवी और द्युलोक भी अनुमोदन करें॥९॥

सूक्त - ९७

हे अग्निदेव ! आप हमारे पापों को भस्म करें । हमारे चारों ओर ऐश्वर्य को प्रकाशित करें । हमारे पापों को विनष्ट करें॥१॥
हे अग्निदेव ! उत्तम क्षेत्र, उत्तम मार्ग और उत्तम धन की इच्छा से हमें आपका यजन करते हैं। आप हमारे पापों को विनष्ट करें॥२॥
हे अग्निदेव ! हम सभी साधक वीरता और बुद्धि पूर्वक आपकी विशिष्ट प्रकार से भक्ति करते हैं। आप हमारे पापों को विनष्ट करें॥३॥
हे अग्निदेव ! हम सभी और ये विद्वद्गण आपकी उपासना से आपके सदृश प्रकाशवान् हुए हैं, अत: आप हमारे पापों को विनष्ट करें॥४॥
इन बल सम्पन्न अग्निदेव की देदीप्यमान किरणें सर्वत्र फैल रही हैं, ऐसे वे अग्निदेव हमारे पापों को विनष्ट करें॥५॥
हे सर्वतोमुखी अग्निदेव ! आप निश्चय ही सभी ओर व्याप्त होने वाले हैं, आप हमारे पापों को विनष्ट करें॥६॥
हे सर्वतोमुखी अग्निदेव ! आप नौका के सदृश सभी शत्रुओं से हमें पार ले जाएँ । आप हमारे पापों को विनष्ट करें॥७॥
हे अग्निदेव ! आप नौका द्वारा नदी के पार ले जाने के समान हिंसक शत्रुओं से हमें पार ले जाएँ । आप हमारे पापों को विनष्ट करें॥८॥

सूक्त - ९८

हम वैश्वानर अग्निदेव की प्रसन्नता बढ़ाने वाले हों । वे ही सम्पूर्ण लोको के पोषक और सबके द्रष्टा हैं। राजा के सदृश सामर्थ्यवान् ये वैश्वानर अग्निदेव सूर्य के समान हीं यल करते हैं॥१॥
ये वैश्वानर अग्निदेव द्युलोक और पृथ्वी लोक में प्रशंसनीय हैं । ये सम्पूर्ण ओषधियों में व्याप्त होकर प्रशंसा के पात्र हैं। बलों के कारण प्रशंसनीय ये अग्निदेव दिन और रात्रि में हिंसक प्राणियों से हमारी रक्षा करें॥२॥
हे वैश्वानर अग्निदेव ! आपका कार्य सत्य हो । हे ऐश्वर्यवान् ! हमें धन युक्त ऐश्वर्य से अभिपूरित करें । हमारे इस निवेदन का मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथिवीं और द्यौ आदि देव अनुमोदन करें॥३॥

सूक्त - ९९

हम सर्वज्ञ अग्निदेव के लिए सोम - सवन करें। वे अग्निदेव हमारे शत्रुओं के सभी धनों को भस्मीभूत करें। नाव द्वारा नदी से पार कराने के समान वे अग्निदेव हमें सम्पूर्ण दुःखों से पार लगाएँ और पापों से रक्षित करें॥१॥

सूक्त - १००

जो बलशाली इन्द्रदेव बलवर्धक साधनों से संयुक्त रहने वाले, महान् आकाश और पृथ्वी के स्वामी हैं, जो जलों को प्राप्त कराने वाले, संग्राम में आवाहन के योग्य हैं, वे इन्द्रदेव मरुद्गणों सहित हमारे रक्षक हों॥१॥
सूर्य की गति के समान दुर्लभ गति वाले वृत्तनाशक इन्द्रदेव प्रत्येक संग्राम में शत्रुओं को प्रकम्पित करने वाले हैं। ये मित्र रूप आक्रामक मरुतों के साथ मिलकर अतीव बलशाली हैं। ये इन्द्रदेव मरुद्गणों सहित हमारे रक्षक हों॥२॥
इन इन्द्रदेव के निर्विघ्न मार्ग सूर्य किरणों के सदृश अन्तरिक्ष के नलों का दोहन करने वाले हैं। ये अपने पराक्रम से द्वेषियों का नाश करने वाले, शत्रुओं का पराभव करने वाले और बलपूर्वक आगे-आगे गमन करने वाले हैं, ये इन्द्रदेव मरुद्गणों के साथ हमारे रक्षक हों॥३॥
वे इन्द्रदेव अंगिरा ऋषियों में अतिशय पूज्य, मित्रों में श्रेष्ठ मित्र, बलवानों में अतीव बलवान् , ज्ञानियों में अतिज्ञान सम्पन्न और सामादिगान करने वालों में वरिष्ठ हैं । वे इन्द्रदेव मदरुद्गणों के साथ हमारे रक्षक हों॥४॥
महान् इन्द्रदेव ने पुत्रों के समान प्रिय सहायक मरुतों के साथ मिलकर शत्रुओं को पराजित किया। साथ रहने वाले मरुद्गणों के साथ मिलकर आपने अन्नों की वृद्धि के निमित्त जलों को नीचे प्रवाहित किया । वे इन्द्रदेव मरुतों के साथ हमारे रक्षक हों॥५॥
शत्रुओं के प्रति मन्यु (क्रोध) प्रदर्शित करने वाले ,हर्ष युक्त होकर युद्ध में प्रवृत्त रहने वाले, सत्प्रवृत्तियों के पालक ,बहुतों द्वारा आवाहनीय इन्द्रदेव आज के दिन हमारे वीरों को लेकर वृत्र का नाश करें । सूर्य देव को प्रकट करें । वे इन्द्रदेव मरुतों के साथ मिलकर हमारे रक्षक हों॥६॥
सहायक मरुतों ने इन्द्रदेव को युद्ध में उत्तेजित किया । प्रजाओं ने अपनी रक्षा के निमित्त उन वीर मरुद्गणों को रक्षक बनाया। वे इन्द्रदेव अकेले ही सम्पूर्ण श्रेष्ठ कर्मों के नियन्ता हैं । ऐसे वे इन्द्रदेव मरुद्गणों के साथ हमारी रक्षा करें॥७॥
बलशाली वीरों द्वारा युद्धों में उन श्रेष्ठ वीर इन्द्रदेव को धन और रक्षा के निमित्त बुलाया जाता है। उन इन्द्रदेव ने गहन तमिस्रा में भी प्रकाश को प्राप्त किया । ऐसे वे इन्द्रदेव मरुतों के साथ हमारी रक्षा करें॥८॥
वे इन्द्रदेव बायें हाथ से हिंसक शत्रुओं को रोकते हैं और दाँयें हाथ से याजकों की हवियों को ग्रहण करते हैं । वे स्तुतियों से प्रसन्न होकर उन्हें धन देते हैं। ऐसे वे इन्द्रदेव मरुद्गणों के साथ हमारे रक्षक हों॥९॥
इन्द्रदेव मरुतों के सहयोग से रथों द्वारा धनों को देने वाले हैं, ऐसा सम्पूर्ण प्रजाजन जानते हैं। वे इन्द्रदेव अपनी सामथ्र्यों से निन्दनीय शत्रुओं का पराभव करने वाले हैं। ऐसे वे इन्द्रदेव मरुद्गणों के साथ हमारे रक्षक हों॥१०॥
बहुतों के द्वारा बुलाये जाने वाले वे इन्द्रदेव जब बन्धु अथवा अबन्धु वीरों के साथ युद्ध में जाते हैं, तो वे उनके पुत्र-पौत्रादि की विजय के लिए यत्नशील रहते हैं। ऐसे वे इन्द्रदेव मरुद्गणों के साथ हमारे रक्षक हों॥११॥
वे वज्रधारी, दुष्ट नाशक, विकराल, पराक्रमी, सहस्र ज्ञान की धाराओं से युक्त, शतनीति युक्त, प्रकाशवान्, सोम के सदृश पूज्य इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य से पाँचजन्य (पाँचों प्रकार के मनुष्यों के हितकारी हैं। ऐसे वे देव इन्द्र मरुद्गणों के साथ हमारे रक्षक हों॥१२॥
उन इन्द्रदेव का वज्र बहुत तीव्र गर्जना करता है । वह द्युलोक के सूर्यदेव की भाँति तेजस्विता सम्पन्न है । स्तोताओं की स्तुतियों से वे उन्हें उत्तम सुख और उत्तम धनादि दान देकर सन्तुष्ट करते हैं। ऐसे वे इन्द्रदेव मरुतों के साथ हमारे रक्षक हों॥१३॥
उन इन्द्रदेव का प्रशंसनीय बल आकाश और पृथिवी दोनों लोकों का सभी ओर से निरन्तर पोषण कर रहा है। वे हमारे यज्ञादि कर्मों से हर्षित होकर हमें दुःखों से दूर करें। ऐसे वे इन्द्रदेव मरुतों के साथ हमारे रक्षक हों॥१४॥
जिन इन्द्रदेव के बल का अन्त दान-प्रवृत्ति वाले देवगण, मनुष्य तथा जल भी नहीं पा सकते, वे इन्द्रदेव अपनी तेजस्वी सामर्थ्य से पृथ्वी और द्युलोक से भी महान् हैं। ऐसे वे इन्द्रदेव मरुतों के साथ हमारे रक्षक हों॥१५॥
रोहित और श्यामवर्ण के अश्व उत्तम तेजस्वी आभूषणों से सुशोभित इन्द्रदेव के रथ में नियोजित होकर प्रसन्नता पूर्वक गर्जना करते हुए चलते हैं । इन्द्रदेव अज्राश्व को ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। मानवी प्रजा भी धन के निमित्त निवेदन करती हुई दिखाई दे रही है॥१६॥
हे इन्द्रदेव ! समीपस्थ ऋषियों के साथ बज्राश्व अम्बरीष, सहदेव, भयमान और सुराधस ये सब वृषागिर के पुत्र आप जैसे सामर्थ्यवान् के लिए प्रसिद्ध स्तोत्रों को गायन करते हैं॥१७॥
बहुतों द्वारा बुलाये जाने पर इन्द्रदेव ने अपने सहायक मरुद्गणों के साथ मिलकर पृथ्वी के ऊपर दुष्टों और हिंसक शत्रुओं पर तीक्ष्ण वज्र से प्रहार करके उन्हें जड़ विहीन किया, तब उसे उत्तम वज्रधारी ने श्वेत वस्त्रों और अलंकारों से विभूषित मरुद्गणों के साथ भूमि प्राप्त की । जल समूह को प्राप्त किया और सूर्य भी प्राप्त किया॥१८॥
इन्द्रदेव प्रत्येक दिन हमारे लिए प्रेरक उपदेशक हों । कपट तजकर हम उन्हें अन्नादि अर्पित करें। मित्र वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्यौ हमारे इस निवेदन का अनुमोदन करें॥१९॥

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सूक्त - १०१

हे ऋत्विग्गण ! श्रेष्ठ इन्द्रदेव की, हविष्यान्न देकर अर्चना करो । 'जश्व' की सहायता से, कृष्णासुर की गर्भिणी स्त्रियों के साथ उसका वध करने वाले, दायें हाथ में वज्र धारण करने वाले, मरुद्गणों की सेना के साथ विद्यमान रहने वाले, शक्ति सम्पन्न, उन इन्द्रदेव का अपने संरक्षण की कामना करने वाले हम यज्ञमान मित्रभाव से आवाहन करते हैं॥१॥
जिन इन्द्रदेव ने सर्वप्रथम वृत्रासुर के कंधों को काटा, पश्चात् धर्म नियमों से विहीन पिघु का हनन किया। प्रजा के शोषक शम्बर और शुष्ण दोनों दैत्यों का वध किया, इस प्रकार सभी दैत्यों के नाशक वे इन्द्रदेव हैं। मित्रता के लिए मरुत् के सहयोगी ऐसे इन्द्रदेव का हम आवाहन करते हैं॥३॥
जिनकी मर्थ्यशक्ति से स्वर्गलोक, भूलोक, वरुण, सूर्य और सरिताएँ अपने-अपने व्रत नियमों में आरूढ़ हैं । मरुतों से युति ऐसे इन्द्रदेव को मैत्रीभाव की दृढ़ता हेतु आवाहित करते हैं॥३॥
जो इन्द्रदेव गौओं और अश्वों के पालक (स्वामी) हैं, सभी को अपने नियन्त्रण में रखकर प्रत्येक कार्य (कर्तव्य निर्वाह) में सुस्थिर रहकर प्रशंसित होते हैं । जो इन्द्रदेव विधि पूर्वक सोमयुक्त यज्ञीय कर्म से रहित शत्रुओं के नाशक हैं, ऐसे मरुयुक्त इन्द्रदेव को मित्रता के लिए आवाहित करते हैं॥४॥
विश्वाधिपति इन्द्रदेव जो सम्पूर्ण गतिमान् प्राणधारियों के स्वामी हैं, जिन्होंने ब्रह्मपरायण ज्ञानवानों को सर्वप्रथम गौएँ उपलब्ध करायीं, जिन्होंने अपने नीचे दुष्टों का दलन किया, ऐसे मरुद्युक्त इन्द्रदेव की मैत्री की स्थिरता हेतु हम उनका आवाहन करते हैं॥५॥
जो इन्द्रदेव शूरवीरों और भीरु मानवों, दोनों के द्वारा सहयोग हेतु आवाहित किए जाते हैं, जो संग्राम विजेताओं और पलायनकर्ताओं द्वारा भी बुलाये जाते हैं तथा सम्पूर्ण लोक जिनकी पराक्रम शक्ति के आश्रित हैं, ऐसे मरुतों से युक्त इन्द्रदेव को हम मैत्री के लिए आमंत्रित करते हैं॥६॥
जो विवेक सम्पन्न ( बुद्धिमान् ) इन्द्रदेव रुद्रपुत्र मरुतों की दिशा का अनुगमन करते हैं; मरुतों और देवी उषा के सामंजस्य से अपने विस्तृत प्रसिद्ध तेज को और अधिक विस्तारित करते हैं तथा जिन प्रख्यात इन्द्रदेव की अर्चना मनुष्यों की मेधा सम्पन्न प्रखर वाणी करती है, ऐसे मरुतां से संयुक्त इन्द्रदेव को मित्रता वृद्धि के लिए आमंत्रित करते हैं॥७॥
है मरुतों से युक्त इन्द्रदेव ! आप सर्वश्रेष्ठ दिव्य लोक अथवा अधर स्थित अन्तरिक्ष लोक में जहाँ कहीं भी आनन्द युक्त हों, हमारे इस यज्ञस्थल पर अतिशीघ्र पधारें । हे श्रेष्ठ ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपकी कृपा के आकांक्षी हम आपके निमित्त यज्ञ में आहुतियाँ प्रदान करते हैं॥८॥
दक्षता सम्पन्न हे श्रेष्ठ इन्द्रदेव ! आपके निमित्त ही हम सोम निणादित करते हैं। हे स्तोत्रों द्वारा प्राप्त होने योग्य इन्द्रदेव ! आपके लिए ही हम हवि प्रदान करते हैं । हे अश्वों से युक्त इन्द्रदेव ! मरुद्गणों सहित इस यज्ञ में आकर विराजमान हों और सोमपान से आनन्दित हों॥९॥
हे इन्द्रदेव ! अश्वों के साथ प्रसन्नता को प्राप्त करें, अपने जबड़ों को खोलकर सुखद ध्वनि करें । हे श्रेष्ठ शिरस्त्राण धारण करने वाले इन्द्रदेव ! रथ खींचने वाले घोड़े आपको हमारे समीप ले आयें । अभीष्ट पूरक इन्द्रदेव आप हमारी आहुतियों को प्रेम पूर्वक ग्रहण करें॥१०॥
मरुद्गणों की स्तुतियों से प्रशंसित , शत्रु संहारक इन्द्रदेव द्वारा संरक्षित हमें उनके (इन्द्रदेव के) सहयोग से अन्न की प्राप्ति हो । अतएव मित्र, वरुण, अदिति , सिन्धु, पृथ्वी और दिव्यलोक सभी हमें सहयोग प्रदान करें॥११॥

सूक्त - १०२

हे महान् यशस्वी इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं को पराजित करके उन्नति को प्राप्त करने वाले हैं। हम उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। उत्साही देवगण अपने धनों की वृद्धि व रक्षा के लिए आपको प्रसन्न करते हैं॥१॥
इन इन्द्रदेव के कर्तृत्व (जल वर्षण) की कीर्ति को सप्तसरितायें (नदियाँ) तथा मनोहारी रूप को पृथ्वी , अन्तरिक्ष और स्वर्गलोक धारण करते हैं । हे इन्द्रदेव ! आपकी तेजस्विता से प्रकाशित होकर सूर्यदेव और चन्द्रमा प्राणिमात्र को श्रद्धा युक्त ज्ञान एवं आलोक देने के लिए नियमपूर्वक गतिमान होते हैं॥२॥
हे वैभव सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप हमारी विभिन्न प्रकार की प्रार्थनाओं से प्रसन्न हों । आपके जिस विजयी रथ को सेना के साथ, होने वाले संग्राम में देखकर हम आनन्दित होते हैं, उसी रथ को हमारी विजय के लिए प्रेरित करें । हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आप हमें सुख प्रदान करें॥३॥
हे ऐश्वर्य सम्पन्न इन्द्रदेव ! आपके सहयोग से हम घिरे हुए शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें । आप प्रत्येक संग्राम में हमारे पक्ष की सुरक्षा करें, आप हमारे शत्रुओं की सामर्थ्य को क्षीण करें, जिससे हम प्राप्त धन का निर्विघ्न होकर उपभोग करने में समर्थ हों॥४॥
धन को धारण करने वाले हे इन्द्रदेव । आपके आवाहनकर्ता और स्तोता अनेक मनुष्य हैं। अतएव आप सम्पत्ति प्रदान करने के लिए मात्र हमारे ही रथ पर आकर विराजमान हों । स्थिरतायुक्त आपका मन हमें विजयी बनाने में पूर्ण सक्षम हो॥५॥
बलवान् इन्द्रदेव की भुजाएँ गौओं को जीतने में सक्षम हैं। वे श्रेष्ठ इन्द्रदेव प्रत्येक कर्म में संरक्षण साधनों से सम्पन्न हैं। वे अतुलित शक्ति सामर्थ्ययुक्त, संघर्षशील, अद्वितीय पराक्रम की प्रतिमूर्ति हैं । इसलिए धन की कामना से मनुष्य उनका आवाहन करते हैं॥६॥
हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! मनुष्यों में आपकी कीर्ति सैकड़ों और हजारों रूपों से भी बढ़कर है । मनुष्यों की बृहत् प्रार्थनाएँ, अतुलित शक्तिशाली इन्द्रदेव की महिमा को प्रकट करती हैं। अभेद्य दुर्गों को तोड़ने में समर्थ हे इन्द्रदेव ! आप वृत्रों (शत्रुओं) का हनन करने में समर्थ हैं॥७॥
हे मनुष्यों के संरक्षक इन्द्रदेव ! आप तीनों लोकों में तीन रूपों सूर्य, अग्नि और विद्युत् में स्थित हैं, आप अपनी शक्ति सामर्थ्य से तीन भूमियों, तीन तेजों तथा इन सम्पूर्ण लोकों को संचालित कर रहे हैं । आप प्राचीन काल से (जन्म के समय से) ही शत्रुरहित हैं॥८॥
है इन्द्रदेव ! आप देवों में सर्वश्रेष्ठ - प्रधान रूप हैं, हम आपका आह्वान करते हैं। आप युद्धों में शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं, अति क्रोध युक्त शत्रुओं को भी पीछे धकेलने वाले इस कलापूर्ण रथ को आप सदैव आगे रखें॥९॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने पर, धनों को अपने तक सीमित नहीं रखते, (अर्थात् संग्रह नहीं करते, सत्पात्रों को बाँट देते हैं। छोटे और विशाल युद्धों में अपने संरक्षण हेतु योद्धागण इन्द्रदेव को ही बुलाते हैं । अतएव आप हमें उचित मार्गदर्शन प्रदान करें॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप सदैव हमारे पक्ष के अधिवक्ता हैं। हम भी द्वेष पूर्ण व्यवहार से रहित होकर अन्नादि प्राप्त करें, इसलिए मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और दिव्यलोक सभी हमें वैभव सम्पदा प्रदान करें॥११॥

सूक्त - १०३

है इन्द्रदेव ! आपकी उस पराक्रम शक्ति को क्रांतदर्शी ज्ञानवानों ने प्राचीनकाल से ही शत्रुओं को पराजित करने वाले कर्मों के रूप में धारण किया था। आपकी दो-प्रकार की शक्तिधाराएँ हैं- एक धारा तो भूलोक में अग्नि रूप में है और दूसरी स्वर्गलोक में सूर्य प्रकाश के रूप में है । युद्ध स्थल पर उल्टी दिशाओं से आती हुई दो पताकाओं की तरह ये दोनों शक्तिधाराएँ अन्तरिक्ष लोक में परस्पर संयुक्त होती हैं॥१॥
उन इन्द्रदेव ने पृथ्वी को धारण करके उसका विस्तार किया। वज्र रूपी तीक्ष्ण शक्तिधाराओं से नदी के प्रवाह को अवरुद्ध किये हुए अहि, रौहिण और व्यंसादि दैत्यों का संहार किया, जिससे पुनः अवरुद्ध जलधाराएँ प्रवाहित हुईं॥२॥
विद्युत् के समान तीक्ष्ण धारवाले आयुधों से युक्त होकर, इन्द्रदेव आत्म-विश्वास के साथ आक्रमण द्वारा दस्युओं के नगरों को ध्वस्त करते हैं, तथा निर्विघ्न होकर विचरण करते हैं। हे ज्ञान सम्पन्न वज्रधारी इन्द्रदेव ! इस स्तोता के शत्रुओं पर भी आयुध फेंकें और आर्यों के बल तथा कीर्ति को बढ़ायें॥३॥
शक्ति पुत्र वज्रधारी इन्द्रदेव ने शत्रु के संहार के लिए आगे बढ़कर जो नाम कमाया, उसे प्रशंसनीय मघवा' नाम को उन्होंने युगों तक मनुष्यों के लिए धारण किया॥४॥
उन इन्द्रदेव ने अपनी सामर्थ्य से गौओं, अश्वों, ओषधियों, जलों और वनों को प्राप्त किया। अतः हे मनुष्यो ! आप इन्द्रदेव के इन अत्यन्त पराक्रमपूर्ण कार्यों को देखें और उनकी अद्भुत शक्ति के प्रति आत्मविश्वास जगायें॥५॥
जो शक्तिशाली इन्द्रदेव लालची दुष्टों, लुटेरों द्वारा एकत्रित किये गये धनों का तथा यज्ञीय कर्मों से रहित राक्षसी वृत्ति से युक्त दैत्यों के धनों का हस्तान्तरण करके ज्ञानियों को सम्मानित करते हैं, अर्थात् दुष्ट जनों से प्राप्त धन को श्रेष्ठ जनों में वितरित कर देते हैं, ऐसे श्रेष्ठ कर्म सम्पन्न करने वाले महान् दाता और सत्यबल सम्पन्न इन्द्रदेव के लिए हम सोम तैयार करें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आपने सोते हुए वृत्र को वज्र के प्रहार से जगाया अर्थात् पराभूत किया । वस्तुतः यह आपका परमशौर्य है। ऐसे में आपको आनन्दित देखकर सभी देवताओं ने अपनी पलियों के साथ अतिहर्ष अनुभव किया॥७॥
हे इन्द्रदेव ! जब आपने शुष्ण, पिपु, कुयव और वृत्र का हनन किया और शम्बरासुर के गढ़ों को धूलिधूसरित किया (तोड़ा) तो मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथिवीं और दिव्यलोक हमारे उत्साह को भी संवर्धित करें॥८॥

सूक्त - १०४

हे इन्द्रदेव ! हमने आपके लिए श्रेष्ठ स्थान निर्धारित किया है। रथ वाहक अश्वों को उनके बन्धनों से मुक्त करके, हिनहिनाते हुए घोड़ों के साथ रात-दिन चलकर यज्ञस्थल में निर्धारित आसन पर विराजमान हों॥१॥
सुरक्षा की भावना से प्रेरित होकर अपने समीप आये हुए मनुष्यों को इन्द्रदेव ने शीघ्र ही श्रेष्ठ मार्गदर्शन दिया। देवशक्तियाँ दुष्कर्मियों की क्रोध भावना को समाप्त करें। वे यज्ञीय कार्य के निमित्त वरण करने योग्य इन्द्रदेव को हमारे यज्ञ स्थल में आने की प्रेरणा दें॥२॥
कुयव राक्षस (कुधान्य-हीन संस्कार युक्त अन्न खाने से उत्पन्न बैल) धन का मर्म समझकर अपने लिए हीं उसका अपहरण करता है । फेनयुक्त जल (प्रवाहमान रसों) को भी अपने हीन उद्देश्यों के लिए रोकता है। ऐसे कुयव राक्षस की दोनों पलियाँ (विचार शक्ति एवं कार्य शक्ति) शिफा नाम की नदी की धार अथवा ( कोड़ों की मार) से मर जायें॥३॥
इस कुयव राक्षस (कुधान्य से उत्पन्न प्रवृत्ति) की शक्ति जल की नाभि (रसानुभूति) में छिपी है । अपहृत जल (शोषण से मिलने वाले सुख) से यह वीर तेजस्वी बनता है । अञ्जसी (गुणवती) तथा कुलिशी (शस्त्र सम्पन) इसकी दोनों वीर पलियाँ (विचार और कार्यशक्ति) जलों (सुखकर प्रवाहों) से भरती-तृप्त करती रहती हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव जैसे गौएँ अपने मार्ग से परिचित रहती हुईं अपने गोष्ठ में पहुँच जाती हैं, वैसे ही दुष्टों (दुष्ट - प्रवृत्तियों) ने हमारे आवास को जान लिया, अतएव हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! राक्षसी उपद्रवों से हमारी सुरक्षा करें । जिस प्रकार व्यभिचारी पुरुष धन का अपव्यय करता है, उसी प्रकार आप हमें त्याग न दें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे लिए सूर्यप्रकाश और जल उपलब्ध करायें । हम इन दोनों पदार्थों से कभी पृथक् न रहें । सम्पूर्ण प्राणियों के लिए कल्याणकारी पाप रहित मार्ग का हम सदैव अनुसरण करें । आप हमारी गर्भस्थ संतान को पीड़ित न करें । हमें आपकी सामर्थ्य-शक्ति पर पूर्ण विश्वास है॥६॥
हे शक्ति सम्पन्न, अति स्तुत्य इन्द्रदेव ! हम आपके प्रति सम्मानास्पद भावना रखते हैं। आपके इस बल के प्रति हम श्रद्धावान् हैं : इमें आप वैभव प्राप्ति हेतु प्रेरणा प्रदान करें । हमें कभी ऐसे स्थानों पर न रखें जो धनों से रहित हों । अत: ऐश्वर्य सम्पन्न होकर भूख प्यास से पीड़ित लोगों को खाद्य और पेय प्रदान करें॥७॥
हे ऐश्वर्यसम्पन्न, सर्व समर्थ इन्द्रदेव ! आप हमारी हिंसा न करें और न हमारा त्याग करें । हमारे आहार के लिए उपयुक्त एवं प्रिय पदार्थों को विनष्ट न करें, हमारी गर्भस्थ संततियों को विनष्ट न करें तथा ? शिशुओं को भी अकाल मृत्यु से बचायें॥८॥
हे सोमाभिलाषी इन्द्रदेव ! आप हमारे सम्मुख प्रस्तुत हों, यह निष्पादित सोम आपके निमित्त हैं, इसे आनन्दपूर्वक सेवन करके स्वयं को तृप्त करें तथा आवाहन किये जाने पर हमारी प्रार्थनाओं को पिता के समान ही सुनने की कृपा करें॥९॥

सूक्त - १०५

अन्तरिक्ष में चन्द्रमा तथा द्युलोक में सूर्य दौड़ रहे हैं । (हे विज्ञपुरुषो !) तुम्हारा स्तर सुनहरी धार वाली विद्युत् को जानने योग्य नहीं है । हे द्युलोक एवं भूलोक ! आप हमारे भावों को समझें । (हमें उनका बोध करने की सामर्थ्य प्रदान करें)॥१॥
उद्देश्य पूर्ण कार्य करने वाले अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर लेते हैं। पत्नी उपयुक्त पति को पा लेती हैं। दोनों मिलकर (उद्देश्य पूर्वक) संतान प्राप्त कर लेते हैं। हे द्युलोक एवं पृथिवी देवि ! आप हमारी भावना समझे (हमारे लिए उत्कृष्ट उत्पादन बढ़ाएँ)॥२॥
हे देवगण ! हमारी तेजस्विता कभी भी स्वर्गलोक से निम्नगामी न हो अर्थात् हमारा लक्ष्य सदा ऊँचा हो । आनन्द प्रदायक सोम से रहित स्थान पर कभी भी हमारा निवास न रहे । हे द्युलोक और भूलोक ! आप हमारी इस प्रार्थना के अभिप्राय को समझें॥३॥
हम समुपस्थित यज्ञाग्नि से प्रश्न करते हैं, वे देवदूत अग्निदेव उत्तर दें, कि प्राचीन सरलभाव रूपी शाश्वत नियमों का कहाँ लोप हो गया ?नवीन पुरुष कौन उन प्राचीन नियमों का निर्वाह करते हैं ? हे पृथिवि और द्युलोक ! हमारी इस महत्वपूर्ण जिज्ञासा को जाने और शान्त करें॥४॥
हे देवो ! तीनों (पृथ्वी, अन्तरिक्ष एवं द्युलोक) में से आपका वास द्युलोक में है। आपका त वास्वविक रूप क्या है ? अमृत (माया युक्त) रूप कहाँ है? आपने प्रारंभ में ( सृजन यज्ञ में ) जो आहुति डाली, वह कहाँ है ? द्युलोक एवं पृथ्वी हमारे भावों को समझें (और पूर्ति करें )॥५॥
आपके श्रेष्ठ सत्य का निर्वाह करने वाले नियम कहाँ हैं ? वरुण की व्यवस्थादृष्टि कहाँ है ?सर्वश्रेष्ठ अर्यमा के मार्ग कौन-कौन से हैं? जिससे हम दुष्टजनों से राहत पा सकें । हे द्युलोक और पृथिवि ! हमारी इस जिज्ञासा के अभिप्राय को समझें॥६॥
पिछले यज्ञ में सोमनिष्पादन काल में स्तोत्रों का पाठ हमने किया था, लेकिन अब मानसिक व्यथाएँ भेड़िये द्वारा प्यासे हरिण को खाये जाने के समान हो, हमें व्यथित किये हुए हैं। हे द्यावापृथिवी देवि ! हमारी इन व्यथाओं को समझें और दूर करें॥७॥
दो सौतों ( पत्नियों) की तरह हमारे पाश्र्व (बाजू) में रहने वाली कामनाएँ हमें सता रही हैं। हे शतक्रतो ! जिस प्रकार चूहे माड़ी लगे धागों को खा जाते हैं, वैसे ही आपकी स्तुति करने वालों को भी मन की पीड़ाएँ सता रही हैं । हे द्यावापृथिवीं देवि ! हमारी इन व्यथाओं को समझें और दूर करें॥८॥
ये सात रंगो वाली सूर्य की किरणें जहाँ तक हैं, वहाँ तक हमारा नाभि क्षेत्र (पैतृक प्रभाव) फैला हैं। इसका ज्ञान जल के पुत्र ‘त्रित' को है । अतएव प्रीतियुक्त मैत्री भाव हेतु हम प्रार्थना करते हैं । हे द्यावापृथिवि! आप हमारी इन प्रार्थनाओं के अभिप्राय को समझें॥९॥
(कामनाओं) की वर्षा करने वाले ये पाँच शक्तिशाली देव (अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा और विद्युत् ) विस्तृत चुलोक में स्थित हैं। देवों में प्रशंसनीय ये देवगण आवाहन करते ही पूजा ग्रहण करने के लिए उपस्थित हो जाते हैं। इसके बाद तृप्त होकर अपने स्थान पर लौट जाते हैं। अर्थात् मन के साथ ये इन्द्रियाँ भी उपासना में तल्लीन हो जाती हैं। हे द्युलोक और पृथिवि ! आप हमारी इस प्रार्थना के अभिप्राय को जानें॥१०॥
सर्वव्यापी आकाश में सूर्य की रश्मियाँ हैं। विशाल जलराशि पार करते समय, मार्ग में, सूर्य-रश्मियाँ अरण्यकुक्कूर या वृक को निवारण करती हैं। द्यावा-पृथिवी, मेरा यह विषय जानो॥११॥
देवगण, तुम्हारे भीतर वह नव्य, प्रशंसनीय और सुवाच्य बल है। उसके द्वारा वहनशील नदियाँ सदा जल-संचालन करतीं और सूर्य अपना सर्वदा विद्यमान आलोक विस्तार करते हैं। द्यावा-पृथिवी, मेरा यह विषय जानो॥१२॥
अग्नि, देवों के साथ तुम्हारा वही प्रशंसनीय बन्धुत्व है। तुम अत्यन्त विद्वान् हो । मनु के यज्ञ की तरह हमारे यज्ञ में बैठकर देवों का यज्ञ करो । द्यावा-पृथिवी, मेरा यह विषय जानो॥१३॥
मनु के यज्ञ की तरह हमारे यज्ञ में बैठकर देवों के आह्वानकारी, अतिशय विद्वान् और देवों में मेधावी अग्निदेव देवों को हमारे हव्य की ओर शास्त्रानुसार प्रेरणा करें। द्यावा-पृथ्वी, मेरा यह विषय जानो॥१४॥
वरुण रक्षा-कार्य करते हैं। उन (वरुण) मार्ग-दर्शक के पास हम याचना करते हैं। अन्तःकरण से स्तोता वरुण को लक्ष्य कर मननीय स्तुति का प्रचार करता है। वही स्तुति-पात्र वरुण हमारे सत्य-स्वरूप हों। धावा-पृथिवी, मेरा यह विषय जानो॥१५॥
यह जो सूर्य, आकाश में, सर्व-सिद्ध पथ-स्वरूप हैं, देवगण, उन्हें तुम लोग नहीं लाँध सकते । मनुष्यगण, तुम लोग नहीं उन्हें जानते । द्यावा-पृथिवी, मेरा यह विषय जानो॥१६॥
पाप रूपी कुएं में गिरे हुए 'त्रित' ने अपनी सुरक्षा के लिए देवताओं का आवाहन किया । ज्ञान रूपी बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना को सुनकर, ‘त्रित को पाप रूपी कुएँ से निकालकर कष्टों से मुक्ति पाने का व्यापक मार्ग खोल दिया। हे द्युलोक और पृथिवी देवि ! आप हमारी इस प्रार्थना पर ध्यान दें॥१७॥
पीठ के रोगी बढ़ई की तरह (टेढ़ा) चन्द्रमा अपने मार्ग पर चलता हुआ हमें नित्य देखता है । वह नीचे की ओर जाकर (अस्त होकर) पुन: उदित होता है । हे द्यावापृथिवी देवि ! आप हमारी इस स्थिति पर ध्यान दें॥१८॥
इन्द्रदेव तथा सभी वीर पुरुषों से युक्त होकर हम इस स्तोत्र से संग्राम में शत्रुओं को पराजित करें । मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्युलोक सभी देव हमारे इस स्तोत्र का अनुमोदन करें॥१९॥

सूक्त - १०६

हम सभी अपने संरक्षणार्थ इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, मरुद्गण और अदिति का आवाहन करते हैं । हे श्रेष्ठ धनदाता वसुओ ! आप जिस प्रकार रथ को दुर्गम मार्ग से निकालते हैं, वैसे ही सम्पूर्ण विपदाओं से हमें पार करें॥१॥
हे आदित्यगणो ! आप सभी हमारे अभीष्ट यज्ञ में आगमन करें । असुर संहारक युद्धों में हमारे लिए सुखप्रद् हों । हे श्रेष्ठ दानदाता वसुदेवो ! सभी विपदाओं से हमें आप उसी प्रकार पार करें, जैसे दुर्गम मार्ग से रथ को सावधानी पूर्वक निकालते हैं॥२॥
श्रेष्ठ प्रशंसनीय सभी पितर और सत्य संवर्धक देवमाताएँ हमारी संरक्षक हों । हे श्रेष्ठ दानदाता वसुदेवो ! आप रथ को दुर्गम मार्ग से निकालने की तरह ही सभी संकटों से हमें बाहर निकालें॥३॥
मनुष्यों द्वारा प्रशंसित, बलवान्-वीर की शक्ति को संवर्धित करने वाले, वीरों के स्वामी पूषादेव की हम श्रेष्ठ मनोभावनाओं द्वारा स्तुति करते हैं। हे श्रेष्ठदानदाता वसुदेवो ! आप रथ को दुर्गम मार्ग से निकालने के समान ही सभी संकटों से हमें सुरक्षित करें॥४॥
हे बृहस्पते !हमारे मार्ग सदैव सर्वसुलभ करें । आपके पास जो मनुष्यों के कल्याणकारी, श्रेष्ठ, सुखप्रदायक और दुःख निवारक साधन हैं, वही हमारी कामना है । हे श्रेष्ठ दानदाता वसुदेवों ! आप रथ को दुर्गम मार्ग से निकालने के समान ही सभी संकटों से हमें संरक्षित करें॥५॥
पाप रूपी कुएँ में गिरे हुए कुत्स ऋषि ने शत्रु संहारक और सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव को आवाहित किया। हे श्रेष्ठ दानदाता वसुदेवो ! रथ को कठिन मार्ग से वहन करने की तरह ही आप सभी पापों से हमें निवृत्त करें॥६॥
देवमाता अदिति, देव समूह के साथ हमे संरक्षित करें । संरक्षण साधनों से युक्त अन्य देवगण भी आलस्य रहित होकर हमारी सुरक्षा करें। हमारी इस प्रार्थना को मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्युलोक आदि देवगण स्वीकार करें॥७॥

सूक्त - १०७

यज्ञ देवगणों के लिए सुखदायक हैं । हे आदित्यगण ! आप हमारे लिए कल्याणकारी हों । आपकी श्रेष्ठ विवेकशील प्रेरणा हमें प्राप्त हो, जो हमें कष्टों से संरक्षित करते हुए श्रेष्ठ सम्पदा प्रदान करे॥१॥
अंगिराओं के सामों (गेय मंत्रों) से प्रशंसित हुए सभी देवता संरक्षण साधनों से युक्त होकर हमारे यहाँ आगमन करें। इन्द्रदेव अपनी शक्ति सामथ्र्यो, मरुत् अपने वीरों तथा अदिति अपनी आदित्य शक्तियों के सहित हमें सुख प्रदान करें॥२॥
इन्द्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सूर्य देवगण हमारे लिए मधुर अन्न प्रदान करें । हमारी कामना को मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्युलोक आदि देव अनुमोदित करें॥३॥

सूक्त - १०८

हे इन्द्राग्नि ! आपका जो अद्भुत रथ सभी लोकों को देखता हैं । उस रथ में दोनों एक साथ बैठकर हमारे यहाँ पधारें और अभिषुत सोमरस का पान करें॥१॥
यह सम्पूर्ण विश्व जितना विशाल, श्रेष्ठ और गाम्भीर्य युक्त है, हे इन्द्राग्नि ! आपके सेवन के लिए निष्पादित सोमरस उतना ही प्रभावशाली होकर प्रचुर मात्रा में प्राप्त हो॥२॥
हे इन्द्राग्नि ! आपकी संयुक्त शक्ति विशेष कल्याणकारी है । हे वृत्रहन्ताऔ ! आप संयुक्त रूप में ही वास करते हैं । हे शक्ति सम्पन्न वीरो ! आप दोनों एक साथ बैठकर सोमरस पान द्वारा अपनी शक्ति को बढ़ायें॥३॥
यज्ञ में यज्ञाग्नि प्रज्वलित होने पर जिनके निमित्त आहुतियाँ प्रदान करने के लिए घृतयुक्त चमसों (पात्रों) को भरकर रखा गया है, तथा कुशाओं के आसन बिछाये गये हैं, ऐसे हे इन्दाग्नि ! जो तीक्ष्ण सोमरस जल मिलाकर तैयार हैं, उसके सेवन हेतु आप हमारे यज्ञ में पधारें॥४॥
हे इन्द्राग्नि ! शक्ति के परिचायक जिन कर्मों को आपने सम्पादित किया, जिन रूपों को शक्ति के प्रदर्शन के समय आपने प्रकट किया तथा आपके जो प्राचीन समय से प्रचलित कल्याणकारी मित्र भावना के प्रेरक कर्म हैं, उनका ध्यान रखते हुए सोमरस पान के लिए यहाँ पधारें॥५॥
सर्वप्रथम आप दोनों की इच्छा को ध्यान में रखते हुए ही हमने कहा था कि याज्ञिकों ने ये हमारा सोमरस आपके निमित्त ही निष्पन्न किया है, इसलिए हमारी हार्दिक श्रद्धानुसार आप दोनों हमारे यज्ञ में आयें तथा निष्पन्न सोमरस का सेवन करें॥६॥
हे इन्द्रदेव और यज्ञाग्ने ! यजमान के गृह, ज्ञान सम्पन्न साधक की वाणी अथवा राजगृह में जहाँ भी आप - आनन्दयुक्त रहते हों, उन स्थानों से आप हमारे यज्ञ में आयें । इस अभिषुत सोमरस का पान करें॥७॥
हे इन्द्राग्नि ! आप दोनों, यदुओं, तुर्वशों, द्रुह्यों, अनुओं और पुरुओं के यज्ञों में विद्यमान हों तो वहाँ से भी (हे सामर्थ्यवान् देवो !) हमारे यज्ञ में आएँ और निष्पादित सोमरस का पान करें॥८॥
हे सामर्थ्यवान् इन्द्राग्नि ! आप दोनों ऊपर, नीचे या मध्य में जहाँ भी पृथ्वी के जिस किसी भाग में भी स्थित हों, इस यज्ञ में आकर सोमरस का पान अवश्य करें॥९॥
हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव और अग्निदेव ! आप ऊपरी स्वर्गलोक, अन्तरिक्ष लोक, मध्य लोक तथा नीचे के भूभाग में जहाँ भी हों, हमारे यज्ञ में आकर सोमरस का पान करें॥१०॥
हे बलशाली इन्द्राग्नि ! आप दोनों द्युलोक, पृथ्वी पर्वतों, औषधियों अथवा जलों में भी जहाँ विद्यमान हों, वहाँ से हमारे यज्ञ में निष्पादित सोमपान के लिए आगमन करे॥११॥
हे सामर्थ्य सम्पन्न इन्द्राग्नि ! आप दोनों स्वर्गलोक के बीच में, सूर्योदय की वेला में हों, अथवा अन्न सेवन (विश्राम) का आनन्द ले रहे हों, ऐसे में भी आप दोनों हमारे यज्ञ में आकर सोमरस का पान करें॥१२॥
हे सामर्थ्यवान् इन्द्राग्नि ! आप दोनों सोमरस के पान से हर्षित होकर सभी प्रकार की सम्पदाओं को जीतकर हमें प्रदान करें । हमारी अभीष्ट कामना पूर्ति में मित्र, वरुण, अदिति, पृथ्वी, और दिव्यलोक के सभी देव सहायक हों॥१३॥

सूक्त - १०९

हे इन्द्राग्नि ! अभीष्ट कामना पूर्ति हेतु किन्हीं ज्ञानवान् एवं अनुकूल स्वभाव वाले बन्धुओं की खोज की हमारा विचार हैं। हमारे और आपके मध्य कोई विचार भिन्नता नहीं, अतएव आपकी सामर्थ्य, शक्ति, प्रभाव एवं क्षमता के परिचायक स्तोत्रों की हम रचना करते हैं॥१॥
हे इन्द्रदेव और अग्निदेव (श्वसुर द्वारा) जमाता और शाले (द्वारा बहनोई को दिये जाने वाले दान) से भी अधिक दान देने में आप समर्थ हैं, ऐसा हमें ज्ञात हुआ है ।अतएव आप दोनों के निमित्त सोमरस भेंट करते हुए नवीन स्तोत्र की रचना करते हैं॥२॥
हमारी सन्तान रूपी गृहश्मियों का हनन न करें। पितरों की शक्ति वंशानुगत (वंशजों में अनुकूलता युक्त) हो, ऐसी प्रार्थना से युक्त हमें, हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव और अग्निदेव ! कृपा दृष्टि से सुखप्रदायक आनन्द की प्राप्ति हो । इन देवों को सोमरस प्रदान करने के लिए दो पत्थर (सोमरस निकालने का साधन सोमपात्रों के समीप स्थापित हों॥३॥
है इन्द्रदेव और अग्निदेव ! आपकी प्रसन्नता के लिए सोमरस अभिषवण करके दिव्य सोमपात्र पूर्णरूप से भरे हुए स्थापित हैं। हे अश्विनीकुमारो ! उत्तम कल्याणकारी हाथों से युक्त आप दोनों शीघ्र आएँ और मधुर सोमरस को जलों से मिश्रित करें॥४॥
हे इन्दाग्नि ! आप दोनों धन को वितरित करते समय और वृत्र को मारने के समय अति शीघ्रता का परिचय देते हैं, ऐसा हमने सुना है । हे स्फूर्तिवान् देवो ! इस यज्ञ स्थल पर श्रेष्ठ आसन पर विराजमान होकर आप दोनों सोमरस से आनन्द की प्राप्ति करें॥५॥
है इन्द्राग्नि ! युद्ध के लिए बुलाए गये वीर पुरुषों की अपेक्षा आप अधिक बलशाली हैं। पृथ्वी, दिव्यलोक, पर्वत तथा अन्य समस्त लोकों से भी अधिक आप दोनों की प्रभाव क्षमता है॥६॥
वज्र के समान सशक्त भुजाओं से युक्त हे इन्द्राग्नि ! हमारे घरों को धन से भरपूर करें, हमें शिक्षित करें तथा अपने बलों से हमारी सुरक्षा करें । ये वही सूर्य रश्मियाँ हैं, जो हमारे पितरों को भी उपलब्ध थीं॥७॥
वज्र से सुशोभित हाथ वाले, शत्रुओं के दुर्ग को ध्वस्त करने वाले हे इन्द्राग्नि ! आप हमें युद्ध विद्या में प्रशिक्षित करें और संग्रामों में हमारा संरक्षण करें। मित्र, वरुण, अदित, सिंधु, पृथ्वी और द्युलोक सभी हमारी कामना पूर्ति में सहयोगी हों॥८॥

सूक्त - ११०

हे ऋभुदेवो ! जो पूजनकृत्य हमने पहले किया था, उसे फिर से सम्पन्न करते हैं । यह मधुर स्तुति देवताओं का गुणगान करती है । समुद्र की तरह विस्तृत गुणवाला सोमरस सम्पूर्ण देवताओं के निमित्त यहाँ स्थिर है । स्वाहा के साथ आप इसे ग्रहण कर संतुष्टि प्राप्त करें॥१॥
हे सुधन्वापुत्रो ! अधिक प्राचीन हमारे प्रिय आप्तबन्धु के समान आप जब सुखोपभोग की कामना से आगे बढ़े, तब आप अपने निर्मल चरित्र के प्रभाव से उदार दानी सवितादेव के आश्रय को प्राप्त हुए॥२॥
हे ऋभुदेवो ! कभी न छिपने योग्य सवितादेव की कीर्ति का गान करते हुए जब आप उनके समीप गये, तब तत्काल उन्होंने आपको अमरता प्रदान की। त्वष्टा द्वारा निर्मित चमस (सोमपान का पात्र) को उन्होंने चार प्रकार का बना दिया॥३॥
मरणधर्मी मानवों ने निरन्तर उपासना और कर्मयोग की साधना से अमर कीर्ति को प्राप्त किया। सुधन्वा के पुत्र ऋभु सूर्यदेव की तरह ही तेजस्विता सम्पन्न होकर एक वर्ष के अन्तराल में ही सबके द्वारा प्रशंसनीय स्तवनों से पूज्यभाव को प्राप्त हुए ।( अर्थात् पूजे जाने योग्य बन गये)॥४॥
प्रशंसित ऋभुओं ने, अमर देवों की कीर्ति की उपमा के योग्य यश की इच्छा की और खेत तैयार करने की तरह तेजधार वाले शरत्र से बार-बार प्रयुक्त होने वाले तीक्षा-तेजस्वी संकल्प से देवों के समतुल्य पात्रता-व्यक्तित्व को विकसित किया॥५॥
अन्तरिक्ष में विचरणशील इन मनुष्य रूप धारी ऋभुओं के निमित्त मनोयोगपूर्वक की गई प्रार्थना के साथ हम चमस पात्र से घृताहुति समर्पित करें । ये ऋभुदेव अपने पिता के साथ सतत क्रियाशील रहकर दिव्यलोक और अन्तरिक्ष लोक से अन्न का उत्पादन करने में समर्थ हुए॥६॥
सामर्थ्यवान् होने से ऋभुदेव सदा तरुण (नौजवान) जैसे ही दिखाई देते हैं और इन्द्रदेव की तरह ही सम्पन्न हैं। शक्तियों और धन सम्पदा से युक्त ये ऋभु हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। हे देवो !आपके स्मरणीय साधनों से संरक्षित हम किसी शुभ वेला में, यज्ञीय कर्मों से रहित रिपुदल पर विजय प्राप्त करें॥७॥
हे ऋभुदेव ! आपने जिसके चर्म ही शेष रह गये थे, ऐसी कृषकाय (दुर्बल शरीर वाली) गौ को फिर से सुन्दर हष्ट-पुष्ट बना दिया, तत्पश्चात् गोमाता को बछड़े से संयुक्त किया । हे सुधन्वा पुत्र वीरो ! आपने अपने सत्प्रयास से अति वृद्ध माता-पिता को भी युवा बना दिया॥८॥
हे ऋभुओं से युक्त इन्द्रदेव ! बलपूर्वक पराक्रम प्रधान समरक्षेत्र में अपने समर्थ साधनों के साथ आप प्रविष्ट हों । युद्ध से प्राप्त अद्भुत सम्पदाओं को हमें प्रदान करें। हमारी यह प्रिय कामना मित्र, वरुण, अदिति, समुद्र, पृथ्वी और द्युलोक आदि देवों द्वारा भी अनुमोदित हो॥९॥

सूक्त - १११

कुशल विज्ञानी ऋभुदेवों ने उत्तम रथ को अच्छी प्रकार से तैयार किया। इन्द्रदेव के रथ वाहक घोड़े भी भली प्रकार प्रशिक्षित किए। वृद्ध माता-पिता को श्रेष्ठ मार्गदर्शन देकर तरुणोचित उत्साह प्रदान किया तथा माता को बच्चे के साथ रहने के लिए तैयार किया॥१॥
हे ऋभु देवो ! हमें यज्ञीय सत्कर्मों के लिए तेजस्विता प्रधान जीवनी शक्ति प्रदान करें । श्रेष्ठ कर्मों और बल संवर्धन हेतु प्रजा को समृद्ध करने वाले पौष्टिक अन्न हमें प्रदान करें । संगठन के लिए हममें पर्याप्त शारीरिक सामर्थ्य पैदा करें॥२॥
नेतृत्व करने वाले हे ऋभुओ ! आप हमारे लिए वैभव, हमारे रथों के लिए सुन्दरता तथा अश्वों के लिए बल प्रदान करें । समर क्षेत्र में हमारे निकटस्थ सम्बन्धी या अपरिचित जो भी सम्मुख हों, हम उन्हें पराजित करें । हमें विजय योग्य विभूतियाँ प्रदान करें॥३॥
हम अपनी सुरक्षा के लिए ऋभुओं के साथ रहने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं । ऋभु, वाज, मरुत्, दोनों मित्र और वरुण तथा अश्विनी कुमार इन सभी देवों को सोमपान के लिए आवाहित करते हैं। वे धन, श्रेष्ठ बुद्धि और विजय प्राप्ति के लिए हमें प्रेरित करें॥४॥
ऋभुगण हमें धन-धान्य से परिपूर्ण कर दें। युद्ध में विजय दिलाने वाले वाजादि देव हमारे संरक्षक हों । मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्युलोक आदि देव हमारी कामना में सहायक हों॥५॥

सूक्त - ११२

द्युलोक, भूलोक तथा भली प्रकार प्रज्जवलित-तापयुक्त अग्नि की हम सर्वप्रथम प्रार्थना करते हैं । हे अश्विनी देवो ! जिनसे कर्मशील (पुरुषार्थी) व्यक्ति को समर क्षेत्र में अपना भाग ग्रहण करने के लिए आपका मार्गदर्शन मिलता है, उन संरक्षण-साधनों के साथ आप दोनों हमारे यहाँ पधारें॥१॥
हे अश्विनीदेवो ! भरण-पोषण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति जिस प्रकार इधर-उधर न भटक कर ज्ञानी जनों के पास जाते हैं, उसी प्रकार आपके रथ के समीप दान ग्रहण करने के लिए साधक स्थित रहते हैं। जिन संरक्षण शक्तियों से आप लक्ष्य प्राप्ति के लिए उनकी बुद्धियों और कर्मों को प्रेरित करते हैं, उन्हीं शक्तियों के साथ आप दोनों भली प्रकार यहाँ पधारें॥२॥
हे नेतृत्व गुणयुक्त अश्विनीकुमारो ! आप दोनों दिव्यलोक में उत्पन्न हुए सोमरस के पीने से अमर और बलशाली बने हैं तथा उसी बल से इन सभी प्रजाजनों पर शासन करते हैं। आपने जिन चिकित्सा प्रणालियों से बन्ध्या (प्रजनन क्षमता से रहित) गौओं को प्रजनन योग्य हष्ट-पुष्ट और दुधारू बनाया, उन संरक्षण साधनों सहित आप निश्चित ही हमारे यहाँ पधारें॥३॥
सर्वत्र विचरणशील वायुदेव और अग्निदेव जिस बल से दो माताओं ( अरणियों) से उत्पन्न होकर अति गतिशील होकर विशेष शोभायमान होते हैं तथा कक्षीवान् ऋषि जिन तीन साधन रूपी यज्ञों से विशिष्ट ज्ञानवान् बने, हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों उन संरक्षण साधनों के साथ हमारे यहाँ पधारें॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस सामर्थ्य से आप दोनों ने, जल में सम्पूर्ण स्थिति में डूबे और बन्धन युक्त रेभ तथा वन्दन को बाहर निकालकर प्रकाश के दर्शन योग्य बनाया। जिस प्रकार साधनारत कण्व को संरक्षण साधनों द्वारा उचित रीति से समर्थ बनाया, उन्हीं संरक्षण युक्त साधनों के साथ आप हमारे यहाँ पधारें॥५॥
हे अश्विनीदेवो ! जिस सामर्थ्य से आप दोनों ने कूप गर्त में पड़े और कष्ट पीड़ित राजर्षि अन्तक को बाहर निकाला, जिस कड़ी मेहनत से तुम्न पुत्र भुज्यु को सुरक्षित किया और कन्धु तथा वय्य की जिन संरक्षण साधनों से युक्त होकर रक्षा की, उन संरक्षण साधनों से युक्त होकर आप हमारे यहाँ पधारें॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस सामर्थ्य से आप दोनों ने धन वितरण कर्ता शुचन्ति को श्रेष्ठ निवास योग्य स्थान दिया। अत्रि ऋषि के लिए तप्त बन्दी गृह को शान्त किया तथा पृश्निगु और पुरुकुत्स को सुरक्षित किया। उन संरक्षण सामथ्र्यों से युक्त होकर आप हमारे यहाँ पधारें॥६७॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस सामर्थ्य से आपने पंगु परावृक् ऋषि को, नेत्र हीन ऋज्राश्व को और पैरों से लँगड़े श्रोण को, दृष्टि युक्त करके पाँवो से चलने-फिरने योग्य बनाया । भेड़िये द्वारा मुख में पकड़ी हुई, दाँतों से घायल चिड़िया को अपनी सामर्थ्य से मुक्त करके आरोग्य प्रदान किया, उन आरोग्य प्रद चिकित्सा साधनों के साथ आप हमारे यहाँ पधारें॥८॥
हे चिरयुवा अश्विनीकुमारों ! आप दोनों ने जिस सामर्थ्य से मधुर जलरूप रसवाली नदियों को प्रवाहित किया, जिससे वसिष्ठ, कुत्स, श्रुतर्य और नर्य को शत्रुओं से सुरक्षित किया, उन्हीं संरक्षण साधनों के साथ हमारे यहाँ उपस्थित हों॥९॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस सामर्थ्य से आप दोनों ने हजारों योद्धाओं द्वारा लड़े जा रहे समर-क्षेत्र में अथर्व वंश में उत्पन्न धनदात्री विश्पला का सहयोग किया तथा प्रेरणाप्रद, अश्वराज के पुत्र वश ऋषि को संरक्षित किया, उन्हीं संरक्षण सामथ्र्यों के साथ आप हमारे यहाँ अवश्य पधारें॥१०॥
हे श्रेष्ठ दान दाता अश्विनीकुमारो ! जिस सामर्थ्य से आपने उशिक् पुत्र दीर्घश्रवा नामक व्यापारी के लिए मधु के भण्डार प्रदान किये तथा स्तोत्र कर्ता कक्षीवान्' को सुरक्षित किया। उन्हीं संरक्षण शक्तियों के साथ आप दोनों हमारे यहाँ पधारें॥११॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस सामर्थ्य से आप दोनों ने नदी के तटों को जलों से भरपूर किया, जिससे अश्वों से रहित रथ को तेजगति से चलाकर शत्रु को पराजित करके विजय उपलब्ध की तथा कण्वपुत्र 'त्रिशोक' के लिए दुधारू गौओं को प्रदान किया, उन्हीं संरक्षण सामथ्र्यों के साथ आप हमारे यहाँ पदार्पण करें॥१२॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस सामर्थ्य से आप दोनों दूर स्थित सूर्यदेव के चारों ओर परिक्रमा करते हैं । आप दोनों ने जिस प्रकार मान्धाता को क्षेत्रपति के कर्तव्यों का निर्वाह करने की सामर्थ्य प्रदान की तथा ज्ञान-सम्पन्न भरद्वाज को, जिन श्रेष्ठ सुरक्षा-साधनों द्वारा बचाया, उन्हीं सामर्थ्ययुक्त साधनों के साथ हमारे यहाँ पधारें॥१३॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिन सामथ्र्यो से शम्बर का वध करने वाले संग्राम में अतिथिग्व, कशोजुव और महान् दिवोदास को आप दोनों ने संरक्षण प्रदान किया था । शत्रु नगरों को ध्वस्त करने वाले संग्राम में त्रसदस्यु (दस्युओं को संत्रस्त करने वाले राजा) को संरक्षित किया था, उन्हीं संरक्षण सामथ्र्यों के साथ आप हमारे यहाँ उपस्थित हों॥१४॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिन सामथ्र्यों से सोमरस पान करने वाले, निकटस्थ लोगों द्वारा प्रशंसनीय वम्र ऋषि को आप दोनों ने संरक्षित किया जिनसे धर्मपत्नी सहित कलि ऋषि को संरक्षित किया तथा अश्व रहित पृथि को संरक्षित किया था, उन सभी सुरक्षा-साधनों से आप यहाँ आएँ॥१५॥
नेतृत्व क्षमता सम्पन्न हे अश्विनीकुमारो ! जिन सामथ्र्यों से शयु का सहयोग देने के लिए, जिनसे अत्रि ऋषि को कारागृह से मुक्त करने के लिए, जिनसे मनु को पुरातन समय में दुःख से निवृत्त होने का रास्ता आप दोनों ने बताया था तथा शत्रु सेना पर बाणों का प्रहार करके स्यूम-रश्मि की रक्षा की, उन्हीं समस्त संरक्षण-सामथ्र्यों से युक्त आप हमारे यहाँ पधारें॥१६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपकी जिन सामथ्र्यों का सहयोग पाकर समिधाओं से प्रदीप्त तेजस्विता युक्त अग्नि के समान ही पर्वा राजा’ युद्ध में अपनी शारीरिक शक्ति से अति तेजस्वी बना था, विशाल सम्पदा अर्जित करने वाले संग्राम में आप दोनों ने 'शर्यात' को जिनसे संरक्षित किया था, उन्हीं संरक्षण-सामथ्र्यों के साथ आप यहाँ पधारें॥१७॥
है अश्विनीकुमारो ! आङ्गिरसों द्वारा श्रद्धा - पूर्वक आप दोनों की स्तुति किये जाने पर जिस सामर्थ्य से आपने उन्हें सन्तुष्ट किया, चुराये गये गौ - समूह को प्राप्त करने के लिए गुफा के दरवाजे में आप दोनों ही आगे जाते हैं तथा जिस सामर्थ्य से शूरवीर मनु को संग्राम में प्रचुर अन्न सामग्री द्वारा सुरक्षित किया, उन्हीं सम्पूर्ण सामथ्र्यों के साथ आप दोनों हमारे यहाँ आएँ॥१८॥
है अश्विनीकुमारो ! जिन सामथ्र्यों से आप दोनों ने विमद की धर्म पलियों को उनके निवास स्थान पर पहुँचाया। लालवर्ण की घोड़ियों को भली प्रकार प्रशिक्षित किया (अथवा लाल रंग की उषा कालीन किरणों को मनुष्यों के लिए प्रेरित किया) तथा पिजवन-पुत्र सुदास को दिव्य सम्पदा प्रदान की, उन्हीं प्रेरणाप्रद शक्तियों के साथ हमारे यहाँ पधारें॥१९॥
हे अश्विनीदेवों ! जिन सामथ्र्यों से आप दानी मनुष्यों के लिए सुखद बने, भुज्यु और अधिगु को आपने संरक्षित किया तथा ऋतस्तुभ को श्रेष्ठ पौष्टिक और आनन्दप्रद अन्न सामग्री प्रदान की, उन्हीं सुखदायक सामथ्र्यो के साथ आप दोनों हमारे यहाँ पदार्पण करें॥२०॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने जिन सामथ्र्यों से ‘कृशानु' का संग्राम में सहयोग किया, नवयुवा 'पुरुकुत्स' के गतिशील अश्व को संरक्षित किया तथा मधुमक्खियों के लिए मधुर शहद उत्पन्न किया, उन्हीं संरक्षण साधनों के द्वारा आप हमारे यहाँ आएँ॥२१॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिन सामथ्र्यों से आप गौओं के संरक्षणार्थ संघर्षशील योद्धाओं को और कृषि उत्पादनों की वितरण वेला में कृषकों को पारस्परिक कलह से संरक्षित करते हैं तथा वीरों के रथों और अश्वों की सुरक्षा करते हैं, उन्हीं सामथ्र्यों सहित आप दोनों उत्तम रीति से यहाँ आएँ॥२३॥
सैकड़ों यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म सम्पन्न करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने जिन सामथ्र्यों से अर्जुन के पुत्र कुत्स, तुर्वीति एवं दधीति को तथा ध्वसन्ति और पुरुषन्ति ऋषियों को संरक्षण प्रदान किया, उन्हीं सुरक्षा-व्यवस्थाओं के साथ आप श्रेष्ठ विधि से यहाँ पदार्पण करें॥२३॥
हे दर्शनयोग्य शक्तिसम्पन्न अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमारी वाणी और बुद्धि को सकर्मों में नियोजित करें । हम याजकगण सन्मार्ग से उपलब्ध होने वाले अन्न हेतु आप दोनों का आवाहन करते हैं । आप दोनों ही यज्ञ में हमारी वृद्धि के कारण बने॥२४॥
हे अश्विनीकुमारो ! दिन-रात्रि अनश्वर श्रेष्ठ धनों से हमें सभी प्रकार से संरक्षित करें । मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु और द्युलोक आपके द्वारा प्रदत्त धनों के संरक्षण में सहायक हों॥२५॥

सूक्त - ११३

सर्व दीप्तिमान् पदार्थों में ये देवी उषा सर्वाधिक तेजयुक्त हैं। इनका विलक्षण प्रकाश चारों ओर व्यापक होकर सभी पदार्थों को आच्छादित कर लेता है। सूर्यदेव के अस्त होने के पश्चात् ) से उत्पन्न हुई रात्रि, इन देवी उषा के उदय के लिए स्थान रिक्त कर देती है॥१॥
तेजस्वी देवी उषा उज्ज्वल पुत्र (सूर्य) को लेकर प्रकट हुईं और काले रंग की रात्रि ने उसे स्थान दिया है। देवी उषा और रात्रि दोनों सूर्यदेव के साथ समान सखा भाव से युक्त हैं। दोनों अविनाशी और क्रमश: एक के पीछे एक आकाश में विचरण करती हैं तथा एक दूसरे के प्रभाव को नष्ट करने वाली हैं॥२॥
रात्रि और देवी उषा दोनों का बहिनों जैसा एक ही मार्ग है तथा वे अन्तहीन हैं। उस मार्ग से होकर देवी उषा और रात्रि द्योतमान सूर्य से अनुप्राणित होकर क्रमश: एक के पीछे एक चलती हैं। उत्तम कार्य करने वाली ये एक दूसरे के विपरीत रूप वाली होते हुए भी एक मनोभूमि की हैं । न कभी परस्पर विरुद्ध होती हैं, न ही कहीं रुकती हैं, अपितु अपने-अपने कार्यों में निरत रहती हैं॥३॥
अपने प्रकाश से लोगों को श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करने वाली दीप्तिमती देवी उषा का उदय हो गया है । वे अद्भुत मनोहारी किरणों से दरवाजे खोलने की प्रेरणा देती हैं। विश्व को ज्योतिर्मय (प्रकाशित) करके ऐश्वर्य प्राप्ति हेतु मनुष्यों में प्रेरणा भरती हैं तथा अपनी किरणों से समस्त लोकों को प्रकाशित करती हैं॥४॥
धनेश्वरी देवी उषा सुषुप्त (सोये हुओं) को जगाकर चलने के लिए, उपभोग, ऐश्वर्य एवं इष्टकर्म के लिए प्रेरित करती हैं। अन्धकार में भटके हुए लोगों को दृष्टि देने हेतु विस्तृत तेजस्विता से युक्त देवी उषा सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करती हैं॥५॥
हे तेजस्वी देवी उचे !रक्षापरक(क्षत्रियोचित) कर्म के लिए श्रेय (कीर्ति के लिए महायज्ञों हेतु प्रचुर धनोपार्जन तथा नानाविध जीवनोपयोगी कर्तव्य निर्वाह के लिए समस्त लोकों को आप ही जाग्रत् करती हैं॥६॥
ये स्वर्ग कन्या देवी उषा अँधेरे को भगाती हुई उदित हो गई हैं। नवयुवती की तरह शुभ्र वस्त्र धारण करने वाली देवी उषा सम्पूर्ण धरती की सम्पदाओं की अधीश्वरी हैं । हे सौभाग्य प्रदात्री उषे ! आप यहाँ अपना आलोक प्रकट करें॥७॥
ये देवी उषा पिछली आई हुई उषाओं के मार्ग का ही अनुसरण कर रही हैं तथा भविष्य में अनन्तकाल तक आने वाली अनेक उषाओं में सर्वप्रथम हैं। ये प्रकाशमयी देवी उषा जीवन्तों में प्रेरणा जगातीं तथा मृतक के समान सोये हुओं में प्राणतत्त्व का संचार करती हैं॥८॥
हे उषे ! आपके उदय होते ही यज्ञ कर्मों का सम्पादन करने वाले जागकर अग्नि को प्रदीप्त करने लगे। सूर्योदय से पूर्व आपने ही प्रकाश फैलाया। विश्व के लिए मंगलकारी और देवताओं के लिए प्रिय उपासनादि सत्कर्मों की प्रेरणा आपने ही प्रदान की॥९॥
कितने समय पर्यन्त ये देवीं उषा यहाँ स्थित रहती हैं? जो पूर्व में प्रकाशित हो चुकीं और जो भविष्य में आने वाली हैं, वे भी कहाँ अधिक समय तक स्थित रहेंगी? पूर्व में आ चुकी उषाओं का स्मरण दिलाती हुई वर्तमान में देवीं उषा प्रकाश फैलाने में सक्षम होती हैं। प्रकाश फैलाने वाली देवी उषा अन्य उषाओं का ही अनुगमन करती हैं॥१०॥
जो मनुष्य विगतकाल में प्रकट हुई उषाओं का दर्शन करते थे, वे दिवंगत हो गये । जो आज इन देवी उषा को देख रहे हैं, वे भी एक दिन यहाँ से प्रस्थान कर जायेंगे। जो भविष्य में उषाओं का दर्शन करेंगे, उनका भी स्थायित्व नहीं है, अर्थात् मात्र देवी उषा ही अकेली स्थायी रहने वाली हैं, जो बार-बार आती रहेंगी॥११॥
अज्ञानान्धकार रूपीं शत्रुओं का विनाश करने वाली, सत्य के विस्तार हेतु ही प्रकट होने वाली, सत्य का अनुपालन करने वाली, सुखप्रद वाणी की प्रेरक, श्रेष्ठ कल्याणकारी देवों की सन्तुष्टि हेतु यज्ञीय कर्मों की प्रेरक, अति श्रेष्ठ गुणों से युक्त हे उषे ! आप यहाँ प्रकाशमान हों॥१२॥
देवी उषा विगत काल में हमेशा प्रकाशित होती रहीं हैं। धनेश्वरी देवी उषा आज इस विश्व को प्रकाशमान कर रही हैं तथा भविष्य में भी प्रकाश देती रहेंगी, ऐसीं ये देवी उषा तीनों कालों में प्रकाशमान होने से अजर-अमर हैं। अपनी धारण की गई क्षमताओं से ये देवी उषा सदा चलायमान हैं॥१३॥
देवी उषा अपनी तेजस्वी रश्मियों से आकाश की सभी दिशाओं में प्रकाशित होती हैं। इन दिव्य देवी उषा ने कृष्णवर्ण (कालेरंग) के अन्धकार को दूर किया है । भली प्रकार रक्तवर्ण की किरणों रूपी अश्वों द्वारा खींचे गये रथ से ये देवी उषा आगमन करती हैं और सभी को जाग्रत् करती हैं॥१४॥
पौष्टिक और धारण करने योग्य उपयोगी धनों की प्रदात्री ये देवी उषा सबको प्रकाशित करती हुई अद्भुत मनोरम तेजस्विता को फैला रही हैं । वर्तमान देवी उषा विगत उषाओं में अन्तिम हैं और आगत उषाओं में सर्वप्रथम हैं, अतएव उत्तम रूप से प्रकाशित हो रही हैं॥१५॥
हे मनुष्यो ! उठो आलस्य त्यागकर उन्नति के मार्ग पर बढ़ चलो। प्रभात वेला में हमें प्राणरूपी जीवनी शक्ति का सघन संचार प्राप्त होता है । मोहरूपी अन्धकार हटता है। ज्योतिर्मान सूर्यदेव आगे बढ़ते जाते हैं । देवी उषा सूर्यदेव के आगमन के निमित्त मार्ग बनाती जाती हैं। हम सभी उस आयु( आरोग्यवर्धक जीवनी शक्ति) को प्राप्त करें॥१६॥
ज्ञान सम्पन्न साधक दीप्तिमान् उषाओं की प्रार्थना करते हुए शोभनीय तथा मनोरम स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं । हे ऐश्वर्यशाली उषे ! स्तुति करने वालों के हृदय में आप ज्ञान रूपी प्रकाश भर दें । हमारे लिए सुसन्तति से युक्त जीवन और अन्नादि प्रदान करें॥१७॥
हविदाता मनुष्यों के लिए ये उषाएँ सम्पूर्ण शक्तियों से युक्त, कान्तिमान् रश्मियों से सम्पन्न होकर प्रकाशमान हो रही हैं । वायु के तुल्य तीव्र गतिशील स्तोत्र रूपी श्रेष्ठ वाणियों से प्रशंसित होकर जीवनी शक्ति प्रदान करने वाली ये उषाएँ, सोमयज्ञ सम्पादित करने वाले साधकों के समीप जाती हैं॥१८॥
हे देवी उषे ! आप देवत्व का संचार करने से देवमाता हैं, अदिति के मुख के समान तेजस्वी हैं। यज्ञ की ध्वजा के समान हे विस्तृत उषे ! आप विशेष रूप से प्रकाशित हो रही हैं। हमारे सद्ज्ञान की प्रशंसा करती हुई आलोकित हों । हे विश्ववंद्य उषे ! हमें श्रेष्ठ मार्ग से उत्तम लोकों में ले चलें॥१९॥
जिन आश्चर्यजनक विभूतियों को उषाएँ धारण करती हैं, वहीं विभूतियाँ यज्ञ का निर्वाह करने वाले यजमान के लिए भी कल्याणप्रद हों । मित्र, वरुण, अदिति, समुद्र, पृथ्वी और दिव्य लोक ये सभी देवत्व सम्वर्धक धाराएँ हमारी प्रार्थना को पूर्ण करें॥२०॥

सूक्त - ११४

हमारी प्रजाओं और गवादि पशुओं को सुख की प्राप्ति हो । इस गाँव के सभी प्राणी बलशाली और उपद्रव रहित हों । हम अपनी बुद्धि को दुष्टों का नाश करने वाले वीरों के प्रेरक जटाधारी रुद्रदेव को समर्पित करते हैं॥१॥
हे रुद्रदेव ! हम सभी को स्वस्थ व निरोग रखते हुए सुख प्रदान करें । शूरों को आश्रय प्रदान करने वाले आपको हम नमन करते हैं । आप मनुष्यों का पालन करते हुए शान्ति और रोग प्रतिरोधक शक्ति प्रदान करते हैं। हे रुद्रदेव ! हम आपकी उत्तम नीतियों का अनुगमन करें॥२॥
हे कल्याणकारी रुद्रदेव ! वीरों को आश्रय प्रदान करने वाली आपकी श्रेष्ठ बुद्धि को हम सब अर्जित करें । हमारे प्रजाजनों को अपने देव यजन अर्थात् श्रेष्ठ कर्मों द्वारा सुख देते हुए आप हमारे लिए अनुकूलता प्रदान करें । हमारे वीर अक्षय बल को प्राप्त करें, हम आपके निमित्त आहुतियाँ समर्पित करें॥३॥
तेजस्विता सम्पन्न यज्ञीय सत्कर्मों के निर्वाहक स्फूर्तिवान् , ज्ञानवान् रुद्रदेव की हम सभी स्तुति करते हैं। वे हमें संरक्षण प्रदान करें । देव - शक्तियों के क्रोध के भागीदार हम न बन सके, अपितु हम उनकी अनुकम्पा को प्राप्त करें॥४॥
सात्विक आहार ग्रहण करने वाले दीप्तियुक्त सुन्दर रूपवान् जटाधारी वीर का हम सादर आवाहन करते हैं। अपने हाथों में आरोग्य प्रदायक ओषधियों को धारण कर वे दिव्यलोक से अवतरित हों। हमें मानसिक शान्ति तथा बाहरी रोगों की प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करें। हमारे शरीरों में समाहित विषों को बाहर निकालें॥५॥
हम मरुद्गण के पिता रुद्रदेव के लिए यह अति मधुर और कीर्तिवर्धक स्तोत्रगान करते हैं। है अमृतस्वरूप रुद्रदेव ! आप हम सभी के निमित्त उपभोग्य सामग्री प्रदान करें। हमें तथा हमारी सन्तानों को भी सुखी रखें॥६॥
हे रुद्रदेव ! हमारे ज्ञान और बल में सम्पन्न वृद्धों को पीड़ित न करें । हमारे छोटे बालकों की हिंसा न करें । हमारे बलवान् युवा पुरुषों को हिंसित न करें । हमारी गर्भस्थ सन्तानों को हिसित न करें और न ही हमारे माता-पिता को विनष्ट करें । इन सभी हमारे प्रिय जनों के शरीरों को कष्ट न पहुँचाएँ॥७॥
हे रुद्रदेव ! हमारी पुत्र-पौत्रादि सन्तति, हमारे जीवन को, गौओं और अश्वों को आघात न पहुँचाएँ। आप हमारे शूरवीरों के विनाश के लिए क्रोधित न हों । हविष्यान्न प्रदान करने के लिए यज्ञस्थल में हम आपका आवाहन करते हैं॥८॥
हे मरुद्गणों के पिता रुद्रदेव ! जिस प्रकार पशुओं के पालनकर्त्ता गोपाल प्रात: ग्रहण किये गये पशुओं को सायंकाल उनके स्वामी को सौंप देते हैं, उसी प्रकार आपकी कृपा से प्राप्त मन्त्रों को स्तुति रूप में आपको ही समर्पित करते हैं । आप हमें सुख प्रदान करें, आपकी कल्याणकारी बुद्धि अत्यधिक सुख प्रदान करने वाली है, अतएव हम सभी आपके संरक्षण की कामना करते हैं॥९॥
हे वीरों के आश्रयदाता रुद्रदेव ! पशुओं और मनुष्यों के लिए संहारक आपके शस्त्र हमें कोई कष्ट न पहुँचाएँ। हम सभी के लिए आपकी श्रेष्ठ प्रेरणाएँ प्राप्त हों तथा आप हम सभी को सुख-प्रदान करें । हे देव ! हमें विशेष मार्ग दर्शन दें तथा दो प्रकार की शक्तियों से युक्त आप हम सभी के निमित्त शान्ति प्रदान करें॥१०॥
सुरक्षा की कामना करने वाले हम सभी, रुद्रदेव को नमन हो, ऐसा उच्चारण करते हैं। मरुद्गणों के साथ वे रुद्रदेव हमारी प्रार्थना को सुनें । इस प्रकार हमारी अभीष्ट कामना को मित्र, वरुण, अदिति, समुद्र, पृथ्वी और दिव्यलोक सभी स्वीकार करें॥११॥

सूक्त - ११५

जंगम, स्थावर जगत् के आत्मा रूपी सूर्यदेव, दैवी शक्तियों के अद्भुत तेज के समूह के रूप में उदित हो गये हैं। मित्र, वरुण आदि के चक्षु रूप इन सूर्यदेव ने उदय होते ही द्युलोक, पृथ्वीलोक तथा अन्तरिक्ष को अपने तेज से भर दिया है॥१॥
प्रथम दीप्तिमान् और तेजस्विता युक्त देवी उषा के पीछे सूर्यदेव उसी प्रकार अनुगमन करते हैं, जिस प्रकार मनुष्य नारी का अनुगमन करते हैं । जहाँ देवत्व के उच्च लक्ष्य को पाने के लिए साधक यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म सम्पन्न करते हैं, वहाँ उन साधकों एवं कल्याणकारी यज्ञीय कर्मों को सूर्यदेव अपने प्रकाश से प्रकाशित करते हैं॥२॥
सूर्यदेव की अश्वरूपी किरणें कल्याणकारी जलों को सुखाने वाली, तत्पश्चात् वृष्टि करने वाली आश्चर्यजनक, आनन्दकारी तथा निरन्तर गतिशील हैं । वे रश्मियाँ वन्दित होती हुई दिव्यलोक के (पृष्ठ भाग पर) सर्वोच्च विस्तृत भाग पर फैलती हैं। यही द्युलोक और भूलोक पर भी शीघ्र विस्तार युक्त होती हैं॥३॥
वह (पृवक्त मन्त्र के महान कार्य) सूर्यदेव के देवत्व का कारण हैं । जब वे सूर्यदेव अपनी हरणशील किरणों को आकाश से विलग कर केन्द्र में धारण करते हैं, तब रात्रि इस विश्व के ऊपर गहन तमिस्रा का आवरण डाल देती हैं॥४॥
द्युलोक की गोद में स्थित सूर्यदेव, मित्र और वरुणदेवों का वह रूप प्रकट करते हैं, जिससे वे मनुष्यों को मव ओर से देखते हैं । इनकी किरणें अनन्त विश्व में एक ओर प्रकाश और चेतना भर देती हैं, तो दूसरी ओर अन्धकार भर जाता है॥५॥
हे देवो ! आप सूर्योदय काल से ही हमें आपत्तियों और दुष्कर्म रूपी पापों से संरक्षित करें। हमारी इस कामना को मित्र, वरुण, अदिति, समुद्र, पृथ्वी और दिव्यलोक सभी देव भी अनुमोदित करें॥६॥

सूक्त - ११६

सेना के साथ चलने वाले रथ से दोनों अश्विनीकुमार नौजवान विमद की धर्मपत्नी को उसके घर छोड़ आये थे । सत्यवान् अश्विनीकुमारों के निमित्त हम स्तोत्र वाणियों को वैसे ही प्रेरित करते हैं, जैसे वायु मेघमण्डल में स्थित जलों को वृष्टि हेतु प्रेरित करते हैं तथा यज्ञकर्ता कुश के आसनों को फैलाते हैं॥१॥
हे सत्ययुक्त अश्विनीकुमारो ! आप दाना अतिवेग से आकाश में उड़ने वाले, तीव्र गति से जाने वाले, देवताओं को गति से चलने वाले याना से भी अति तीव्र गति से गमनशील हैं। आपके यानों से संयुक्त हुए रासभ ने यम को आनन्दत करने वाले युद्ध में हजारों की संख्या वाले शत्रु सैनिको पर विजय प्राप्त की थीं॥२॥
जैसे मरणासन्न मनुष्य अपने धन की इच्छा त्याग देते हैं, उसी प्रकार अपने पुत्र की आकांक्षा त्यागकर तुग्र नरेश ने अपने भुज्यु नामक पुत्र को शत्रुपक्ष पर आक्रमण करने हेतु अति गम्भीर महासागर में प्रवेश की आज्ञा दी। उसे आप दोनों अपनी सामथ्र्यों द्वारा अन्तरिक्ष यानों तथा पनडुब्बियों और नौकाओं के सहयोग से निकाल कर उसके पिता के समीप ले गये॥३॥
हे सत्य से युक्त अश्विनीकुमारो ! अति गहन सागर से दूर जहाँ मरुस्थल हैं, वहाँ से तीन दिवस और तीन रात्रि निरन्तर चलते हुए, अतिवेग से गमनशील सौं चक्रों और छ: अश्वों (अश्वशक्ति) सम्पन्न यन्त्रों वाले, पक्षी के समान आकाश मार्ग से जाते हुए तीन यानों द्वारा आप दोनों ने भुज्यु को उसके निवास पर पहुँचाया॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! विश्राम से रहित, आश्रय रहित जहाँ (बचाव के लिए) हाथ में पकड़ने के लिए कोई भी पदार्थ नहीं, ऐसे अतिगहन महासमुद्र में से आप दोनों ने सौ पतवारों से चलने वालीं नाव पर चढ़ाकर भुज्यु को उसके निवास स्थल पर पहुँचाया था। यह दुस्साहसिक कार्य निश्चित ही अति वीरता से युक्त था॥५॥
है अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने अघाश्व भूपति (नरेश) के लिए जिस सफेद अश्व को प्रदान किया, वह सदैव मंगलकारी है। ऐसा दान अति सराहनीय हुआ। शत्रुदल पर आक्रमणकारी “पेदु” के लिए दिया हुआ निपुण घोड़ा भी सदैव प्रशंसनीय है॥६॥
हे नेतृत्व क्षमता सम्पन्न अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने ऊँचे कुल में उत्पन्न स्तोता कक्षीवान् को नगर के संरक्षणार्थ श्रेष्ठ परामर्श दिया । बलशाली अश्व के खुर के समान आकृति वाले विशेष पात्र से स्वच्छ जल के सौ घड़े आप दोनों ने पूर्ण करके स्थापित किये॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने प्रचण्ड अग्निदेव को बर्फयुक्त शीतल जल से शान्त किया। असुरों द्वारा स्वराज्य के लिए संघर्षरत अन्धेरे कारावास में रखे गये अत्रि ऋषि को सहयोगियों के साथ कारावास तोड़कर आपने मुक्त किया तथा दुर्बल बने ऋषि अत्रि को पौष्टिक और शक्तिवर्धक आहार देकर हृष्ट-पुष्ट किया॥८॥
सत्य के प्रति स्थिर हे अश्विनीकुमारो ! आप कुएँ के पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक अति दूर ले गये । इस हेतु आपने कुएँ के आधार स्थल को ऊँचा किया और (नहर आदि) टेढ़े मार्ग से जल प्रवाहित किया। उस जल को गौतम ऋषि के आश्रम तक ले जाकर आश्रम वासियों को पेय जल उपलब्ध कराया। आश्रम वासियों को सिंचाई के जल से सहस्रों तरह की धान्यादि सम्पदा भी प्राप्त हुई॥९॥
शत्रुओं का संहार करने वाले सत्यनिष्ठ हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने शरीर से जीर्ण च्यवन उन्नषि को कवच उतारने के समान ही बुढ़ापे रूपी जीर्ण काया को उतारकर तरुण बना दिया। अतिवृद्ध होने से अशक्त च्यवन को दीर्घायुष्य प्रदान किया। तत्पश्चात् उन्हें आप दोनों ने सुन्दर स्त्रियों का पति बना दिया॥१०॥
सत्य से युक्त नेतृत्व प्रदान करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के श्रेष्ठ सराहनीय कार्य स्तुति और आराधना के योग्य हैं । हे ज्ञानवान् अश्विनीकुमारो ! जो वन्दन ऋषि गहरे गर्त में पड़े थे, उन्हें आप दोनों ने गुप्त स्थल से धन को उठाने के समान ही गर्त से निकाला॥११॥
हे अश्विनीकुमारो ! अथर्वकुल में जन्म लेने वाले दधीचि ऋषि ने अश्व मुख से आपको मधु विद्या का अभ्यास कराया। आपने इस प्रचण्ड पुरुषार्थ को सम्पन्न किया। जन सेवा की कामना से वर्षा के पूर्व घोषणा करने वाले मेघों की भाँति हम आपके इन कार्यों का प्रचार करते हैं॥१२॥
हे सत्य से युक्त अश्विनीकुमारो ! आप दोनों असंख्यों के पालक, पोषक और कर्तव्यपरायण गुणों से युक्त हैं । लम्बी यात्रा के समय आप दोनों का कुशाग्र मति वाली स्त्री ने आवाहन किया था, उस स्त्री की प्रार्थना को राजा की आज्ञा जैसा मानकर आपने उसे हिरण्यहस्त नामक श्रेष्ठ पुत्र प्रदान किया॥१३॥
हे सत्य से युक्त अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने उपयुक्त वेला में भेड़ियों के मुख से चिड़िया को मुक्त किया। हे भोजन द्वारा असंख्यों के पालक ! दृढ़ निश्चय के सहित प्रार्थना करने पर आप दोनों ने कृपा पूर्वक एक नेत्रहीन कवि को श्रेष्ठ दर्शन हेतु दृष्टि प्रदान की॥१४॥
जिस प्रकार पक्षी को पंख गिर जाता है वैसे ही खेल राजा से सम्बन्धित विश्पला स्त्री का पैर युद्ध में कट गया था । ऐसे रात्रिकाल में ही उस विश्पली को युद्ध प्रारम्भ होने के पश्चात् आक्रमण करने के लिए लोहे की जाँघ आप दोनों ने लगाकर तैयार किया॥१५॥
ऋज्राश्व ने अपने पिता को सौं भेड़ों को भेड़िये के भक्षण हेतु छोड़ने का अपराध किया । दण्डस्वरूप उसे उसके पिता ने दृष्टिविहीन कर दिया। हे असत्य रहित, शत्रु संहारक वैद्यो !(अश्विनीकुमारो !) उन नेत्रहीन (ऋज्राश्व) को कभी खराब न होने वाली आँखें देकर आप दोनों ने उसे दृष्टिहीन दोष से मुक्त किया॥१६॥
हे सत्य से युक्त अश्विनीकुमारो ! सूर्य की पुत्री उषा घुड़सवारी प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) में विजयी होती हुई आपके रथ पर आकर विराजमान हो गई । सभी देवताओं ने उसका हार्दिक अभिनन्दन किया। बाद में आप दोनों भी सूर्य की पुत्री उषा से विशेष शोभायमान हुए॥१७॥
हे आवाहन योग्य अश्विनीकुमारो ! जब आप दोनों अन्नदाता दिवोदास के घर पर गये, तब उपभोग्य धन से परिपूर्ण रथ आपको ले गये थे। उस समय आपके रथ को शक्तिशाली और शत्रु विध्वंसक अश्व खींच रहे थे। यह आपकी ही विलक्षण सामर्थ्य हैं॥१८॥
हे असत्य रहित अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हविष्यान्नों द्वारा तीनों कालों में यजन करने वाली जहू की प्रजा को श्रेष्ठ क्षात्र बल, सुसंतति, उत्तम वैभव सम्पदा तथा श्रेष्ठ शौर्यमय जीवन स्वयं उनके समीप जाकर प्रदान करते हैं॥१९॥
अविनाशी, सत्य से युक्त हे अश्विनीकुमारो ! जाहुष राजा के चारों ओर से शत्रुसेना द्वारा घिरे होने पर आप दोनों ने रात्रिकाल में उस राजा को उस घेरे से उठाया और गुप्त लेकिन आसान मार्ग से उसे दूर सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया । विशेष ढंग से शत्रु के घेरे को तोड़ने में सक्षम आप दोनों रथ पर बैठकर पर्वतों को लाँघकर अति दूर चले गये॥२०॥
हे सामर्थ्यवान् अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने वश नामक राजा को सहस्रों प्रकार के असंख्य धनों की प्राप्ति के लिए एक ही दिन में पूर्ण संरक्षणों से युक्त कर दिया। पृथुश्रवा के कष्टकर रिपुओं को इन्द्रदेव के सहयोग से आप दोनों ने पूर्णरूप से नष्ट कर दिया॥२१॥
हे सत्यपालक अश्विनीकुमारो !प्यास से पीड़ित ऋचत्क के पुत्र शर के पीने हेतु आप दोनों जलस्तर को गहरे कुएँ से ऊपर ले आये । आप दोनों ने अपनी सामथ्र्यों से अत्यन्त कृषकाय शयु ऋषि के निमित्त वन्ध्या (प्रसूत न होने वाली) गाय को दुधारू बना दिया॥२२॥
हे सत्य से युक्त अश्विनीकुमारो ! आप दोनों की प्रार्थना करने वाले और अपनी रक्षा के इच्छुक सुगम मार्ग से जाने वाले, कृष्णपुत्र विश्वक के विनष्ट हुए पुत्र विष्णाष्व को, खोये हुए पशु के समान (खोजकर) आप दोनों ने अपनी सामर्थ्य शक्तियों से, दर्शनार्थ उपस्थित कर दिया॥२३॥
दुष्ट राक्षसों द्वारा पाश (रज्जु) से बाँधकर जलों के बीच दस रातों और नौ दिन तक फेंके हुए, भीगे, संत्रस्त और पीड़ित रेभ नामक ऋषि को आप दोनों उसी प्रकार बाहर निकालकर लाये, जिस प्रकार सुवा से सोमरस को ऊपर उठाते हैं॥२४॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के कर्मों का हमने इस प्रकार से श्रेष्ठ वर्णन किया है, जिससे हम उत्तम गायों और शूरवीर पुत्रों से सम्पन्न इस राष्ट्र के शासक बन सकें । दीर्घ जीवन का लाभ लेकर दर्शनादि सामथ्र्यों से युक्त रहकर अपने घर में प्रविष्ट होने की तरह ही वृद्धावस्था में प्रवेश करें॥२५॥

सूक्त - ११७

हे सत्य से युक्त अश्विनीकुमारो ! प्राचीन काल से आपकी सम्पूर्ण सेवा करने वाले आपके साधक, मधुर सोमरस के आनन्द को आपके लिए लाये हैं। हमारी प्रार्थनाएँ आप तक पहुँच गई हैं। इस कुशा के आसन पर आपके निमित्त सोमपात्र भरकर रखा है, अतः आप दोनों अपनी अन्न युक्तं शक्तियों के साथ हमारे पास आयें और हमारा सहयोग करें॥१॥
नेतृत्व की क्षमता से सम्पन्न हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के रथ मन से भी तीव्र गतिशील, उत्तम अश्वों से युक्त रहते हैं। ऐसे रथ आपको प्रजाजनों के बीच ले जाते हैं, उसी से सत्कर्मरत साधकों के घर आप जाते हैं, उसी रथ पर आरूढ़ होकर आप दोनों हमारे यहाँ पधारें॥२॥
नेतृत्व प्रदान करने वाले है बलशाली अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने पंचजनों के कल्याण के निमित्त प्रयत्नशील अत्रि ऋषि को, पीड़ादायक कारावास से उनके सहयोगियों (अनुयायियों के साथ मुक्त कराया। शत्रुओं का संहार करने वाले आप दोनों शत्रु की विनाशकारी मायावी चालों को पहले से ही ज्ञात करके क्रमशः दूर करते हैं॥३॥
हे शक्तिशाली नेतृत्व प्रदान करने वाले अश्विनीकुमारो ! दुष्कर्मियों द्वारा जलों के मध्य फेंके गए ऋषि रेभ की अति दुर्बल देह को, आप दोनों ने अपने औषधि आदि उपचारों से विशेष हृष्ट-पुष्ट बना दिया । घोड़े जैसी सुदृढ़ देह से युक्त कर दिया । आपके जो पूर्वकृत कार्य हैं वे अविस्मरणीय हैं॥४॥
हे अरि विध्वंसक अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार आप अन्धकार में छिपे सूर्यदेव को उदय के पूर्व ऊपर लाते हैं, जिस प्रकार जमीन पर सोये पुरुष को ऊपर उठाते हैं अथवा भूमि के गर्त में पड़े हुए सुन्दर स्वर्ण के आभूषण को ऊपर धारण करते हैं, उसी प्रकार आप दोनों ने वन्दन को गर्त से बाहर निकाला॥५॥
हे सत्य से युक्त नेतृत्व प्रदान करने वाले अश्विनीकुमारों ! अंङ्गिरस गोत्र में पञ्च कुलोत्पन्न कक्षावान् ऋषि के निमित्त आपके कार्य अति प्रशंसनीय हैं, जो शक्तिशाली अश्व के खुर के समान महापात्र से आप दोनों ने मधु के सौ घड़ों को सभी मनुष्यों के पीने हेतु पूर्णरूप से भरकर तैयार रखा था॥६॥
हे नेतृत्व प्रदान करने वाले अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने प्रार्थना करने वाले कृष्ण के पात्र तथा विश्वक के पुत्र विष्णाप्व को उसके पिता के पास पहुँचाया। पिता के गृह में ही रोगी और वृद्धा के रूप में रहने वाली को रोग मुक्त करके नवयुवती बनाकर सुयोग्य वर आप दोनों ने ही प्रदान किया॥७॥
हे शक्ति सामर्थ्य युक्त अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने ही श्याव ऋषि को उत्तम तेजस्विनी स्त्री प्रदान की। नेत्रहीन कण्व को उत्तम ज्योति दी । नृषद पुत्र जो बधिर था, उसे सुनने की शक्ति प्रदान की। आप दोनों के ये सभी कार्य अति प्रशंसनीय हैं॥८॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों विभिन्न रूप धारण करके रमण करते हैं। आपने पेदु को विजयशील, शत्रुओं का विनाश करने वाला, असंख्य धनों को प्रदान करने वाला, कीर्तिमान, संरक्षण कर्ता, बलशाली तथा तीव्र गतिमान अश्व प्रदान किया॥९॥
हे श्रेष्ठ दानदाता अश्विनीदेवो ! आप दोनों के ये कर्म श्रवणीय हैं। आपके निमित्त वेद मन्त्र रूपी स्तोत्र बने हैं तथा आप दोनों स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों स्थानों पर रहते हैं। हे अश्विनीदेवो ! क्योंकि आप दोनों को आङ्गिरस आवाहित करते हैं, अतएव अन्न के साथ आकर यजमान को भी अन्न बल प्रदान करें॥१०॥
हे सर्व पोषणकर्ता, सत्य से युक्त अश्विनीकुमारो ! आप दोनों से मान ने पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना की, उस यजमान को पुत्रोत्पत्ति की सामर्थ्य प्रदान की । अगस्त्य के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर आपने विश्पला के भग्न पाँव को ठीक किया॥११॥
हे सामर्थ्यवान् अश्विनीकुमारो ! आप दोनों दिव्यलोक को स्थायित्व देने वाले और शेयु के संरक्षक हैं। शुक्र की प्रार्थना स्वीकार करने के बाद आप दोनों किस ओर जाते हैं ?कुएँ में पतित रेभ को दसवें दिन, गर्त में पड़े स्वर्ण कुम्भ के समान निकालने के पश्चात् आप दोनों कहाँ गये ?॥१२॥
हे सत्य पर दृढ़ अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने अपनी शक्ति सामथ्र्यों से अतिवृद्ध च्यवन ऋषि को पुनः तरुण बना दिया था। सूर्य की पुत्री ने अपने सौभाग्य सहित आप दोनों के रथ पर ही विराजमान होना स्वीकार किया था॥१३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों युवा तुग्र नरेश द्वारा पिछले समय में किये गये श्रेष्ठ कर्मों से पूजनीय थे ही; परन्तु अब जो उसके पुत्र भुज्यु को अथाह महासमुद्र से सुरक्षित करके पक्षी के समान उड़ने वाले अश्वों से युक्त यानों द्वारा उसके पिता के पास पहुँचाया, इससे तुम नरेश के लिए आप दोनों अत्यन्त सम्मानास्पद बन गये॥१४॥
हे सामर्थ्यवान् अश्विनीकुमारो ! तुग्र नरेश के पुत्र भुज्यु को सागर यात्रा हेतु भेजा गया था। वे बिना किसी कष्ट के वहाँ चले गये। जब उनने सहयोग के लिए आप दोनों का आवाहन किया तब उसे मन के समान गतिशील तथा श्रेष्ठ ढंग से जोते गये रथ द्वारा आप दोनों ने पिता के घर सकुशल पहुँचा दिया॥१५॥
हे अश्विनीकुमारो ! वर्तिका के आवाहन पर वहाँ पहुँचकर भेड़िये के मुख से आप दोनों ने मुक्त किया, ऐसे में वे अपने विजयी रथ से पर्वत के शिखर को पार करके पहुँचे । उसे घेरने वाले शत्रु के सैनिकों को आपने विष दग्ध वाणों से मार डाला॥१६॥
ऋज्राश्व ने सौ भेड़ें, भेड़िये को भक्षणार्थ दीं, इससे क्रुद्ध होकर उसके पिता ने दृष्टिहीन (अन्धा) कर दिया। हे अश्विनीकुमारो ! उस ऋज्राश्व की दोनों आँखों में आपने ज्योति प्रदान की । दृष्टिहीन को दृष्टि प्राप्त हो, इस उद्देश्य से आप दोनों ने उसकी आँखों का पुनर्निर्माण कर दिया॥१७॥
ऋज्राश्च के दृष्टिहीन होने पर वृकी उसके सुख के लिए इस प्रकार प्रार्थना करने लगी कि हे सामर्थ्यशाली नेतृत्व प्रदान करने वाले देवो ! तरुण जार के द्वारा तरुणी को सर्वस्व सौंप देने के समान बेसमझी में एक सौ एक भेड़े मेरे लिए भक्षण हेतु दी गई थीं॥१८॥
है ज्ञान सम्पन्न सामर्थ्यशाली अश्विनीकुमारो ! आप दोनों की संरक्षण शक्ति बड़ी कल्याणकारी हैं। आप अंग - भंग (वालों) को भली प्रकार ठीक कर देते हैं। आप दोनों का ही श्रेष्ठ बुद्धिमती स्त्री ने आवाहन किया है कि अपनी संरक्षण सामथ्र्यों के साथ आयें॥१९॥
हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो ! गर्भ धारण करने में असमर्थ, दुर्बल, दुग्धरहित गाय को शयु ऋषि के कल्याणार्थ आप दोनों ने दुधारू बना दिया। पुरु मित्र की पुत्री को विमद के लिए धर्मपत्नी रूप में आपने ही अपनी सामथ्र्यों से दिलवाया॥२०॥
हे शत्रु विनाशक अश्विनीकुमारो ! जौ आदि धान्य को हल से वपन करके मनुष्यों के लिए अन्न रस देते हुए और शत्रु को तेजधार वाले शस्त्र से विनष्ट करते हुए आप दोनों ही आर्यों के लिए विस्तृत प्रकाश दिखाते हैं॥२१॥
हे शत्रु संहारक अश्विनीकुमारो ! अथर्वकुल में उत्पन्न दधीचि ऋषि के अश्व का सिर आप दोनों ने लगाया, तब उस ऋषि ने यज्ञ मार्ग को प्रसारित करते हुए आप दोनों को मधु विद्या का उपदेश दिया तथा आप दोनों को शरीर के भग्न अङ्गों को जोड़ने की विद्या भी सिखाई॥२२॥
सत्य के प्रति स्थिर, कवि हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों हमें सदैव सद्बुद्धि की प्ररेणा प्रदान करें । हमें सत्कर्मों और सद्ज्ञान की ओर उत्तम रीति से प्रेरित करें। आप दोनों सुसन्तति से युक्त, श्रेष्ठ धनसम्पदा हमें प्रदान करें॥२३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों श्रेष्ठ दानदाता, औदार्यपूर्ण और नेतृत्व क्षमता से सम्पन्न हैं । बाँझ स्त्री को पुत्रदान देकर उसके हाथों को स्वर्ण सम्पदा को धारण करने योग्य बनाया। जो श्याव तीन स्थानों से घायलावस्था में पड़े थे, उन्हें जीवनदान देने हेतु आप दोनों के द्वारा उत्तम ढंग से परिचर्या की गयी॥२४॥
हे सामर्थ्यवान् अश्विनीकुमारो ! आपके शौर्ययुक्त कर्मों की प्राचीन समय से ही सभी मनुष्य प्रशंसा करते रहे हैं। आप दोनों के निमित्त ही हमने इस स्तोत्र की रचना की है। इससे हम श्रेष्ठ वीर बनकर, सभाओं में प्रखर प्रवक्ता बनें॥२५॥

सूक्त - ११८

हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो ! आप दोनों का रथ बैठने के लिए सुखप्रद, अपनी बनावट से सुदृढ़, मनुष्य के मन से भी अधिक गतिशील, वायु के समान गतिवान्, बाज़ पक्षी की तरह आकाश मार्ग में गमनशील तथा जो तीन स्थानों से सुदृढ़तायुक्त हैं, उस रथ से आप दोनों हमारे यहाँ पधारें॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप अपने तीन पहियों से युक्त, तीन बन्धनों वाले, त्रिकोणाकृति तथा उत्तम गतिशील रथ पर चढ़ कर हमारे यहाँ पहुँचें । आप हमारे लिए दुधारू गौएँ, गतिशील अश्व तथा शूरवीर सन्तान प्रदान करें॥२॥
हे अरि विनाशक अश्विनीकुमारो ! आप दोनों अपने सुन्दर शीघ्र गतिशील रथ से यहाँ आकर सोमरस अभिषवण काल में स्तोत्रगान सुनें । आप दोनों के सम्बन्ध में पुरातन काल के ज्ञानवान् बार-बार कहते रहे हैं। कि आप दरिद्रता और दुःखों का नाश करने के लिए ही विचरण करते हैं॥३॥
सत्य का पालन करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! गिद्ध पक्षी की भाँति आकाश मार्ग में तीव्र गति से उड़ने वाले बाज़ पक्षी जिस रथ को खींचते हैं, वह रथ आप दोनों को अति शीघ्र यज्ञस्थल की ओर ले आये॥४॥
हे नेतृत्व प्रदान करने वाले अश्विनीकुमारो ! आप दोनों से लेह करने वाली सूर्यदेव की तरुणी कन्या (उषा) आपके रथ पर चढ़कर बैठ गई। इस रथ में जोते गये लाल रंग के, शरीर एवं आकृति से पक्षी की तरह उड़ने वाले अश्व, आप दोनों को यज्ञस्थल के समीप ले आयें॥५॥
सामर्थ्ययुक्त, शत्रु विनाशक हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने अपनी अद्भुत सामर्थ्य शक्ति से वन्दन को और रेभ को कुएँ से निकालकर बाहर किया। तुम नरेश के पुत्र भुज्यु को समुद्र से उठाकर घर पहुँचाया तथा वृद्ध च्यवन को पुनः युवा बनाया था॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! कारागृह के भीतर तलघर में स्थित अत्रि ऋषि के लिए आप दोनों ने जल से अग्नि को शान्त किया और उसे पौष्टिक तथा शक्तिवर्धक अन्न प्रदान किया। इसी प्रकार कण्व की आँखों को मार्ग देखने के लिए ज्योति युक्त किया। इसीलिए आप दोनों की सब ओर से प्रशंसा होती है॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने प्राचीन काल में स्तुति करने वाले शयु के निमित्त गाय को दुधारू बनाया, बटेर को भेड़िये के मुख से मुक्त किया तथा विश्पला की भग्न टाँग के स्थान पर उचित प्रक्रिया (शल्य क्रिया) से लोहे की टाँग लगा दी॥८॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने अहि (शत्रुओं) का नाश करने वाले सुदृढ़ एवं बलिष्ठ अंगों से युक्त, शत्रुओं को पराजित करने वाले सहस्रों प्रकार से धनों के विजेता, युद्धों में अति उपयोगी, इन्द्रदेव की प्ररेणा से युक्त, बलशाली, सफेद अश्व को घेदु के लिए प्रदान किया था॥९॥
हे नेतृत्व प्रदान करने वाले अश्विनीकुमारो ! श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुए आप दोनों को अपने संरक्षणार्थ हम आवाहन करते हैं। आप हमारी प्रार्थना को स्वीकार करें । हमारी प्रिय वाणियों को सुनते ही अपने रथ को धन सम्पदा से परिपूर्ण करके हमारे कल्याणार्थ यहाँ आयें॥१०॥
हे सत्य से युक्त अश्विनीदेवो! आप दोनों एकमत होकर अपने श्येन पक्षी को अतिवेग से गतिशील करके हमारे पास आयें । हे अश्विनीदेवो ! शाश्वत रहने वाली देवी उषा के उदय होते ही हम हविष्यान्न तैयार करके आप दोनों का आवाहन करते हैं। आप आयें और हवि ग्रहण करें॥११॥

सूक्त - ११९

हे अश्विनीकुमारो ! विविध प्रकार की कलाकारिता से पूर्ण, मन के समान गतिमान् पावन, गतिशील अश्वों से युक्त, विविध पताकाओं से सुसज्जित, सुखदायक, सैकड़ों प्रकार के धनों से परिपूर्ण, शीघ्रगामी आपके रथ को हविष्यान्न ग्रहण करने के लिए आवाहन करते हैं, वे आयें और हमें दीर्घ जीवन प्रदान करें॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! इस रथ के अग्रसर होने पर हमारी बुद्धि आप दोनों की प्रशंसा करते हुए उच्चस्तरीय स्तोत्रों का गान कर रही हैं । सभी दिशाओं के लोग इसमें सम्मिलित होते हैं । घृतादि पदार्थ श्रेष्ठ बनाकर यज्ञ के निमित्त तैयार करते हैं । यज्ञ के प्रभाव से संरक्षण करने वाली शक्तियाँ चारों ओर फैल रही हैं। आप दोनों के रथ पर सूर्य देव की तेजस्वी पुत्री देवी उषा विराजमान हैं॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! जब जन साधारण के कल्याण के लिए युद्ध में अनेक विजेता महान् शूरवीर पारस्परिक स्पर्धा भाव से एकत्रित होते हैं, तब आप दोनों का रथ मन्द गति से नीचे आता हुआ दिखाई देता है। जिसमें याजकों के लिए श्रेष्ठ धन आप अपने साथ लेकर आते हैं॥३॥
हे शक्तिमान् अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने अपने ही प्रयासों से, पक्षियों के समान उड़ने वाले यान द्वारा जीवन के प्रति संशयात्मक स्थिति में (भ्रम में ) पहुँचे हुए तुमपुत्र भुज्यु को, उसके माता - पिता के निकट पहुँचाया था। आप दोनों का यह सहयोग-संरक्षण दिवोदास के लिए भी अति महत्वपूर्ण था॥४॥
हे अश्विनीकुमारों ! आप दोनों रथ पर बैठे हुए तथा स्वयं रथ को जोतते हुए अतिशय शोभायमान हो रहे थे। रथ आपके इशारे पर ही चल रहा था। मित्रता की इच्छुक, विजय से प्राप्त करने योग्य सूर्य पुत्री देवी उषा ने आप दोनों को पतिरूप में वरण किया है॥५॥
आप दोनों ने 'रेभ' को कष्ट से मुक्त किया। अत्रि ऋषि के कारागृह के अति गर्म स्थान को शीतल जल से शान्त किया। शयु के लिए गौओं को दुधारू बनाया तथा आप दोनों ने ही वन्दन को दीर्घ-जीवन प्रदान किया॥६॥
शत्रुओं का संहार करने वाले एवं कार्य में कुशल हे अश्विनीकुमारो ! रथ का जीर्णोद्धार करने के समान आपने अतिवृद्ध ‘वन्दन' को नवयुवक बना दिया। प्रार्थना द्वारा प्रशंसित होकर ज्ञानवान् को भूमि से (वृक्ष उगने के समान ही) उत्पन्न किया, अतएव आप दोनों के ये सहयोग पूर्ण कार्य यहाँ स्थित व्यक्तियों के लिए अतीव प्रभावपूर्ण रहे॥७॥
तु नामक अपने ही पिता द्वारा परित्यक्त किये जाने पर कष्ट से पीड़ित अवस्था में प्रार्थना करने वाले मन्यु के पास आप दोनों दूरवर्ती स्थान पर भी चले आये। ऐसे आप के ये संरक्षण युक्त कार्य बहुत ही अद्भुत, तेजस्वी और सबके लिए अनुकरणीय हैं॥८॥
जिस प्रकार मधुमक्खी मधुरस्वर में गुंजन करती है, वैसे ही सोमपान की प्रसन्नता में उशिक् के पुत्र कक्षीवान् आपका आवाहन करते हैं। जब दधीचि ऋषि के मन को आपने अपनी सेवा से प्रभावित किया, तब घोड़े के शिर से युक्त होकर उन्होंने आप दोनों (अश्विनीकुमार) के प्रति मधु विद्या का उपदेश दिया॥९॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने सबके द्वारा प्रशंसनीय, तेजस्वी, युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले, शत्रु पक्ष से अजेय, इन्द्रदेव के सदृश शत्रुओं के पराभव कर्ता, चपल सफेद अश्व को पेद् नरेश के लिए प्रदान किया॥१०॥

सूक्त - १२०

हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों को किस प्रकार की प्रार्थना प्रिय है, जिससे आप प्रसन्न होते हैं ? आप को सन्तुष्ट करने में कौन सक्षम हो सकता है ? अल्पज्ञ मनुष्य आपकी उपासना कैसे करें ?॥१॥
ज्ञान रहित और प्रतिभा रहित ये दोनों प्रकार के मनुष्य विद्वान अश्विनीकुमारों से ही उचित मार्गदर्शन प्राप्त कर लें । क्या वे मानव हित के सम्बन्ध में कुछ न कर पाने की असमर्थता प्रकट करेंगे ? ऐसा सम्भव नहीं, वे अवश्य ही मानवों के कल्याण के प्रति प्रेरित होंगे॥२॥
हम सहयोग के लिए आप अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं, आप आज हमें यहाँ आकर चिंतन प्रधान मार्गदर्शन दें, आप दोनों के प्रति मित्रता के इच्छुक ये मनुष्य हवि समर्पित करते हुए आपकी अर्चना करते हैं॥३॥
है शत्रु संहारक अश्विनीकुमारो ! हमारी प्रार्थना आप से ही है, अन्य के प्रति नहीं । अद्भुत शक्ति के उत्पादक, आदर पूर्वक दिये गये इस सोमरस को आप दोनों ग्रहण करें तथा हमें जिम्मेदारी पूर्ण कार्यों को वहन करने की सामर्थ्य प्रदान करें॥४॥
घोषा ऋषि के पुत्र, भृगु ऋषि तथा ज्ञान सम्पन्न एवं अन्न के इच्छुक पञ्च कुल में उत्पन्न अंगिरा ऋषि जिस प्रकार की स्तुति रूप वाणी का प्रयोग आप दोनों के प्रति करते रहे वैसी ही प्रस्तुतीकरण की विधा हमारी वाणी में भी आये॥५॥
हे कल्याण के स्वामी अश्विनीकुमारो ! प्रगति की इच्छा से प्रेरित ऋषि का यह गायत्री छन्द का स्तोत्र आप दोनों ने श्रवण किया । आप दोनों नेत्रहीनों को दृष्टि प्रदान करते हैं, इसके लिए हम आपका गुणगान करते हैं हमारा भी मनोरथ पूर्ण करें॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों किसी साधक को प्रचुर दान भी देते हैं और किसी से धन शक्ति को पूर्णरूपेण अलग भी कर देते हैं। ऐसे आप दोनों हमारे श्रेष्ठ संरक्षक बने । दुष्कर्मी तथा भेड़िये के समान क्रोधी शत्रुओं से हमें बचायें॥७॥
किसी भी प्रकार के शत्रुओं से हमारा पराभव न हों। अपने दूध से भरण - पोषण करने वाली गौएँ बछड़ों से अलग होकर हमारे घरों का कभी त्याग न करें अर्थात् हमारे घर दुग्ध आदि पोषक रसों से सदैव परिपूर्ण बने रहें॥८॥
आप से सहयोग पाने के इच्छुक हम लोग मित्रों के भरण-पोषण के लिए प्रचुर धन सम्पदा चाहते हैं । अतएव शक्ति से सम्पन्न धन और गोधन से भरपूर अत्र में प्रदान करें॥९॥
सैन्य शक्ति से सम्पन्न अश्विनीकुमारों से अश्वों के बिना चलने वाले इस रथ को हमने प्राप्त किया है। इससे हम प्रचुर यश प्राप्ति की अभिलाषा करते हैं॥१०॥
यह सुखदायक रथ धनों से परिपूर्ण हैं । अश्विनीकुमार सोमपान के लिए याज्ञिक जनों के समीप इसी में सवार होकर जाते हैं। यह रथ हमें यशस्विता प्रदान करने वाला हो॥११॥
असमर्थों को भोजन प्रदान करने तक की उदारता न रखने वाले धनवानों को और आलस्य-प्रमाद में पड़े रहने वाले व्यक्तियों को देखकर हमें बहुत खेद होता है; (क्योंकि) शीघ्र ही उनका विनाश सुनिश्चित है॥१२॥

सूक्त - १२१

मनुष्यों को संरक्षण प्रदान करने वाले इन्द्रदेव शीघ्रता से देवत्व पद पाने के इच्छुक अंगिरसों की प्रार्थनाओं को इस प्रकार कब सुनते हैं? इसका सुनिश्चित ज्ञान नहीं; लेकिन जब स्वीकार करते हैं, तब प्रजाजनों के घर में स्थित यज्ञ में शीघ्रता पूर्वक पहुँचकर उनकी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करते हैं॥१॥
निश्चित ही उन्हीं (सूर्य रूप इन्द्रदेव) ने द्युलोक को स्थिरता प्रदान की है। तेजस्वी रश्मियों के प्रकाशक ये इन्द्रदेव सर्वत्र अन्न उत्पादन के लिए जल को बरसाने के माध्यम हैं वे महान् सूर्यदेव अपनी कन्या देवी उषा के पश्चात् प्रकाशित होते हैं तथा वे शीघ्र गतिशील चन्द्रमा की पत्नी रात्रि को प्रकाश किरणों की माता बनाते हैं॥२॥
श्रेष्ठ मनुष्यों को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करने वाले, आंगिरसों के ज्ञाता, सूर्यदेव (इन्द्रदेव) नित्य ही उषाओं को प्रकाशमान करते हुए श्रेष्ठ स्तुति रूप वाणियों से सम्मानित होते हैं (वन्दनीय होते हैं) । साथ ही वे इन्द्रदेव वज्र को तेजधार युक्त करते हैं तथा सम्पूर्ण प्राणि मात्र के कल्याण के निमित्त वे दिव्य लोक को स्थिरता प्रदान करते हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! इन प्रार्थनाओं से प्रशंसित होकर आप रात्रि में छिपी हुई प्रकाशमय किरणों के समूह को यज्ञ सम्पादन के लिए प्रकट करते हैं। जब तीनों लोकों में सर्वोत्तम इन्द्रदेव युद्ध में तत्पर हो जाते हैं, तब वे द्रोहियों के लिए पतन का मार्ग खोल देते हैं॥४॥
जब मनुष्य उत्तम दुधारू गौओं के पवित्र घृत-दुग्धादि से आपके लिए यज्ञ करते हैं, तब हे इन्द्रदेव ! शीघ्रतापूर्वक क्रियाशील आपके लिए भरण-पोषण कर्ता माता-पिता रूप द्यावापृथिवी, ऐश्वर्यप्रद और श्रेष्ठ उत्पादन क्षमता से युक्त वृष्टिरूप जल को बरसाते हैं॥५॥
जिस प्रकार सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं, वैसे ही दुःखनाशक इन्द्रदेव भी उषाओं के निकट प्रकाशित होते हैं । श्रेष्ठ मधुर पदार्थों की हवि प्रदान करने वाले यजमानों द्वारा इन्द्रदेव के लिए यज्ञस्थल पर सुवा पात्र से सोमरस प्रदान किया जाता है। ऐसे सोम से अभिषिंचित होकर वे प्रसन्न हों॥६॥
जब प्रकाशित सूर्य किरणों के माध्यम से मेघ जल वर्षण करते हैं, तब इन्द्रदेव यज्ञार्थ किरणों के अवरोध को दूर कर देते हैं । हे इन्द्रदेव ! जब आप (सूर्य रूप में) किरणों का संचार करते हैं, तब गाड़ीवान्, पशुपालक तथा गतिशील पुरुष अपने कार्यों की पूर्ति के लिए तत्पर होते हैं॥७॥
हे इन्द्रदेव ! जब यज्ञकर्ता मनुष्य आपके संवर्धन के लिए उत्तम, आनन्दप्रद, गाय के दूध से मिश्रित और शक्तिप्रद सोम को पत्थरों द्वारा कूटपीस कर बनाते हैं, तब विस्तृत दिव्यलोक को संव्याप्त करने वाली आपकी अश्वरूपी किरणें हविरूप सोमरस को यहाँ आकर ग्रहण करें। आप वृष्टि अवरोधक तत्वों को हटाकर तेजस्वी जलधाराओं को चारों ओर बरसायें॥८॥
अनेकों द्वारा आवाहित हे इन्द्रदेव ! जब आप कुत्स के संरक्षण के लिए शुष्ण दानव को विभिन्न शस्त्रों का प्रहार करके नाश करते हैं, तब सभी निर्भय होकर चारों दिशाओं में विचरण करते हैं। उस आक्रान्ता के हनन के लिए आप ऋभु द्वारा स्वर्गलोक से लाये गये पत्थर और लोहे से निर्मित अस्त्र-शस्त्रों को प्रहार करते हैं॥९॥
ज्ञब वज्रधारी इन्द्रदेव ने बादलों को नष्ट करने वाले शस्त्र का प्रहार किया, तब सूर्यदेव मुक्त हुए। हे इन्द्रदेव ! आपने शुष्णु (शोषण करने वाले असुर) का जो बल द्युलोक को घेरे हुए था, उसे नष्ट कर दिया॥१०॥
महान् सामर्थ्य से युक्त, हे इन्द्रदेव ! सभी ओर संव्याप्त, द्युलोक और भूलोक ने आपके कार्य के प्रति आभार प्रकट किया, तब प्रोत्साहित होकर आपने विशाल वज्र द्वारा वृत्र को जल में ही सुला दिया॥११॥
हे इन्द्रदेव ! क्रान्तदर्शी के पुत्र 'उशना' ने आनन्दप्रद, वृत्रहन्ता तथा शत्रु आक्रान्ता वज्र आपके लिए प्रदान किया। आपने उसे तीक्ष्ण बनाया। तत्पश्चात् भार वहन में कुशल, रथ में भली प्रकार नियोजित होने वाले तथा वायु के समान वेगवान् घोड़ों से खींचे जाने वाले रथ पर बैठकर आप मनुष्यों के हित चिन्तकों को संरक्षण प्रदान करते हैं॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आप प्रकाशमान सूर्यदेव के समान ही मनुष्यों की हितकारक और रसों को अवशोषित करने वाली रश्मियों को आलोकित करते हैं । आपके रथ का चक्र सदैव गतिमान् रहता है । नौकाओं से लाँघने योग्य नब्बे नदियों के पार यज्ञ विरोधियों को फेंककर आपने विलक्षण कार्य सम्पन्न किया॥१३॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! जिन्हें अति प्रयास पूर्वक ही नष्ट किया जा सकता है ऐसे दुर्गति कारक पापकर्मों से में बचाकरे संरक्षित करें । युद्ध भूमि में भली प्रकार से हमारी रक्षा करें । हमें यश, बल तथा श्रेष्ठ सत्य से युक्त व्यवहार के निमित्त रथ और अश्वों से युक्त ऐश्वर्य सम्पदा प्रदान करें॥१४॥
अपनी सामथ्र्यों से स्तुति योग्य हे इन्द्रदेव ! आपकी विवेक-युक्त बुद्धि का कभी हमारे जीवन में अभाव न हो। विवेक बुद्धि से हम सभी प्रकार के अन्न एवं धन को अर्जित करें । हे श्रेष्ठ ऐश्वर्य सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप हमें गोधन से परिपूर्ण करें तथा आपकी महिमा को बढ़ाने वाले हम सभी एक साथ रहकर आनन्दित हों॥१५॥

सूक्त - १२२

हे अक्रोधी ऋत्विजों ! आप हर्ष प्रदायक रुद्रदेव के निमित्त अन्नरूपी आहुति प्रदान करें । जिस प्रकार धनुर्धारी वाणों से शत्रु पक्ष का विनाश करते हैं, वैसे ही दिव्यलोक से आकर असुरता के संहारक, दिव्यलोक और भूलोक के मध्य शूरवीरों के साथ वास करने वाले मरुद्गणों की हम प्रार्थना करते हैं॥१॥
जिस प्रकार धर्मपत्नी अपने पति का सदैव सहयोग करती हैं, उसी प्रकार देवी उषा और रात्रि हमारी पूर्व प्रार्थनाओं को जानकर हमें प्रगति मार्ग पर अग्रसर करें । अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्यदेव के समान स्वर्णिम वस्त्रों से सुसज्जित सूर्यदेव की सुषमा से सुशोभित तथा दर्शन में अति रूपवती देवी उषा हमें समुन्नति के शिखर पर पहुँचाये॥२॥
तिमिर नाशक और दिन लाने वाले, सर्वत्र विचरणशील सूर्यदेव हमें सभी सुखों को प्रदान करें । वायुदेव जलवृष्टि करके हमें आनन्दित करें । इन्द्रदेव और मेघ आप दोनों को एवं हमें (अथवा हमारी बुद्धि को) परिष्कृत करें तथा सभी देवगण हमें ऐश्वर्यों से सम्पन्न बनायें॥३॥
उशिक पुत्र कक्षीवान् द्वारा अपनी यशस्विता और तेजस्विता उपलब्ध करने हेतु सर्वत्र गमनशील, पालनकर्ता अश्विनीकुमारों की प्रार्थना की जाती है । हे मनुष्यो ! आप सत्कर्मों के संरक्षक अग्निदेव के निमित्त श्रेष्ठ प्रार्थना करें तथा स्तुति करने वालों के माता-पिता के सदृश द्यावा-पृथिवी की भी प्रार्थना करें॥४॥
हे देवो ! जिस प्रकार घोषा नामक स्त्री ने रोग निवारण के निमित्त अश्विनीकुमारों का आवाहन किया, उसी प्रकार उशिक् पुत्र कक्षीवान् अपने दु:खों की निवृत्ति के लिए आपके आवाहन हेतु सस्वर स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं। आपके साथ धनदाता पूषादेव की भी प्रार्थना करते हैं। अग्निदेव द्वारा प्रदत्त सम्पदाओं के लिए भी प्रार्थना करते हैं॥५॥
हे मित्र और वरुणदेव ! आप दोनों हमारा निवेदन सुने तथा यज्ञ मण्डप में चारों ओर से उच्चारित प्रार्थना को भी सुनें । सुविख्यात, दानशील जलवर्षक देव हमारी प्रार्थना को सुनकर जलराशि से हमारे खेतों को सिंचित करें॥६॥
हे वरुण और मित्र देवो ! हम आपकी प्रार्थना करते हैं । जहाँ अश्व तीव्र गति से चलाये जाते हैं, ऐसे संग्राम में शूरवीर ही असंख्य गौओं रूपी धन को उपलब्ध करते हैं। आप दोनों उस विख्यात एवं अपने प्रिय रथ में बैठकर शीघ्र यहाँ आकर हमें पुष्ट करें॥७॥
जो सामर्थ्यवान् मनुष्य घोड़ों और रथों से सुसज्जित योद्धाओं को हमारे संरक्षणार्थ प्रेरित करते हैं। ऐसे महान् वैभवशाली मनुष्यों का धन सभी जनों द्वारा सराहा जाता है । श्रेष्ठ शौर्यवान् हम सभी मनुष्य एक साथ संगठित हों॥८॥
हे मित्र और वरुणदेवो ! जो मनुष्य आपसे निष्कारण द्वेष करते हैं, जो सोमरस निष्पादित करने से वंचित हैं। तथा यज्ञीय भावना से रहित हो कुमार्ग पर चलते हैं, वे अनेक प्रकार के मानसिक और हृदय सम्बन्धी रोगों से असित हो जाते हैं। लेकिन जो मनुष्य सत्यमार्ग पर चलते हुए मन्त्रों द्वारा यज्ञ सम्पन्न करते हैं, वे सदैव आपकी कृपा को प्राप्त करते हैं॥९॥
हे देवो ! यजन करने वाले साधक अश्वों से युक्त होकर, शत्रुओं के भयंकर विनाशकर्ता, अति तेजस्वी, याचकों के प्रति उदारतायुक्त तथा महान् बलशाली होते हैं। वे सभी युद्धों में अति सामर्थ्यवान् शत्रुओं का भी विध्वंस करते हुए अग्रसर होते हैं॥१०॥
हे आकाशव्यापी देवो ! आप अपनी सामर्थ्य से, अकल्याणकारी दुष्टों की सम्पदा को, प्रशंसा के योग्य श्रेष्ठ रथधारी शूरवीरों के लिए हस्तान्तरित करते हैं। तेजवान् हर्षदायक और अमृत स्वरूप यज्ञ की ओर प्रेरित करने वाले हे देवो ! मनुष्यों की स्तुतियों को सुनकर आप यहाँ पधारें॥११॥
“जिस स्तुतिकर्ता द्वारा दसे चमस पात्रों में रखे गये सोम के लिए आपको बुलाया गया है, आप उसकी सामर्थ्यशक्ति को बढ़ायेंगे” ऐसा देवों का कथन है । जिन देवताओं में तेजस्विता युक्त ऐश्वर्य सुशोभित हो, ऐसे सभी देव हमारे यज्ञों में आकर हविष्यान्न का सेवन करें॥१२॥
याज्ञिक दस चमसे पात्रों में रखे सोम रूपी हविष्यान्न को लेकर आते हैं। उन पात्रों में रखे सोमरस रूपी अन्न से हम प्रशंसित हैं। जो अश्वों को लगामों द्वारा भली प्रकार नियंत्रित करने की कला में निपुण हैं, ऐसे शत्रु संहारक (देवों) के होते हुए श्रद्धालु मनुष्यों को पीड़ित करने में भला कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात् कोई भी उनका अहित करने में सक्षम नहीं॥१३॥
सम्पूर्ण देवता हमें कानों में स्वर्ण आभूषण तथा कण्ठ में मणियों को धारण किये हुए सुसन्तति प्रदान करें। ये श्रेष्ठ देवता हमारे द्वारा उच्चारित प्रार्थनाओं एवं घृतादि आहुतियों को दोनों प्रकार के यज्ञों में शीघ्र ही ग्रहण करें॥१४॥
विजयी तथा शत्रु संहारक मशर्शार राजा के चार ( काम, क्रोध, लोभ, मोह) पुत्र और अन्नों के अधिपति आयवस” नरेश के तीन पुत्र (त्रिताप- दैहिक, दैविक और भौतिक) हमें पीड़ित करते हैं। हे मित्र और वरुण देवो ! आप दोनों का विशालकाय सुखकारी रश्मियों से युक्त रथ सूर्यदेव के सदृश आलोकित हो॥१५॥

सूक्त - १२३

इन कुशलदेवी उषा का विस्तृत रथ जुत करके तैयार हो गया हैं और उस पर अमर देवगण आकर विराजमान हो गये हैं। ये विशेष रूप से प्रकाशित उत्तम देवी उषा मानवों के सुखदायी निवास के निमित्त प्रयलशील होकर भयंकर काले अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाशमान हुई हैं॥१॥
सम्पूर्ण प्राणियों से पहले देवी उषा जागती हैं, यह प्रचुर दानदात्री देवी उषा ऐश्वर्यों की जनयित्री हैं। यह बार-बार आने वाली चिर युवा देवी उषा सर्वप्रथम यज्ञ करने के निमित्त प्रथम स्थान पर विराजमान होती हैं और ऊँचे स्थान से सबको देखती हैं॥२॥
हे कुलीन उषा देवि ! मनुष्यों की पालनकत्र आप जिस समय मनुष्यों के लिए धन का, योग्य भाग प्रदान करती हैं, उस समय दान के प्रति प्रेरित करने वाले देव, सूर्य के अभिमुख हमें पापरहित बनाएँ॥३॥
हविर्भाग को ग्रहण करने के लिए ज्योतिर्मय देवी उषा प्रतिदिन आगमन करती हैं। कीर्ति को धारण करने वाली देवी उषा प्रतिदिन घर-घर जाती हैं (अर्थात् प्रकाश बाँटती हैं ) तथा धनों के श्रेष्ठ अंश को ग्रहण करती है॥४॥
हे सुभाषिणि उषे ! आप भगदेव और वरुणदेव की बहिन हैं, ऐसी आप देवों में सर्वप्रथम स्तुति करने योग्य हैं। बाद में जो पापात्मा शत्रु हैं, उन्हें हम पकड़े और आपके द्वारा दक्षता पूर्वक प्रेरित रथ से पराभूत करें॥५॥
हमारे मुख स्तोत्रगान करें। प्रखर विवेक बुद्धि सत्कर्मों की ओर प्रेरित करे । प्रज्वलित अग्नि ज्वलनशील रहे, तब उनके निमित्त तेजस्वी उषाएँ तमसाच्छादित (अन्धकार से छिपे) वाञ्छित धनों को प्रकट करें॥६॥
विपरीत रूप-रंग वाली रात्रि और देवी उषा क्रमशः आती और जाती हैं। एक के चले जाने पर दूसरी आती हैं । इन भ्रमणशीलों में से एक रात्रि अन्धकार से सबको आच्छादित कर देती है और दूसरी देवी उषा दीप्तिमान् तेजरूप रथ से सबको प्रकाशित करती हैं॥७॥
आज ही के समान कल भी ये उषाएँ यथावत् आएँगी । ये पवित्र उषाएँ वरुण देव के व्यापक स्थान में देर तक रहती हैं। एक-एक देवी उषा तीस-तीस योजनों की परिक्रमा करती हुईं नियत समय पर कर्म प्रेरक सूर्यदेव से आगे-आगे चलती हैं॥८॥
दिन के प्रारम्भिक काल को जानने वाली गौरवर्णा तेजस्विनी देवी उषा काली रात्रि के काले अन्धकार से उत्पन्न होती हैं, ये स्त्री रूपी देवी उषा सत्यव्रत को न त्यागतीं हुई प्रतिदिन निश्चित समय पर आतीं और नियमपूर्वक रहती हैं॥९॥
हे देवी उषे ! शरीर के स्वरूप को प्रकट करने वाली कन्या के समान ही आप भी अभीष्ट कामना पूरक पतिरूप सूर्यदेव के पास जाती हैं। पश्चात् नवयुवती के समान मुस्कराती हुई कान्तिमती होकर अपने प्रकाश किरणों रूपी वक्षस्थल को प्रकटरूप से प्रकाशित करती हैं॥१०॥
माता द्वारा सुशोभित की गई नवयुवती के समान रूपवती ये देवी उषा अपने प्रकाश किरणों रूपी शारीरिक अंगों को मानो दिखाने के लिए प्रकट हो रही हों । हे उषे ! आप मनुष्यों का कल्याण करती हुई व्यापक क्षेत्र में प्रकाशित रहें । अन्य उषाएँ आपकी तेजस्विता की समानता नहीं कर सकेंगी॥११॥
अश्वों और गौओं से युक्त सबके द्वारा आदर-योग्य (वरण करने योग्य) सूर्यदेव की किरणों से अन्धकार को दूर भगाने में प्रयलशील, तथा कल्याणकारी यशस्विता को धारण करने वाली उषाएँ दूर जाती सी दीखती हैं, लेकिन फिर वहीं आ जाती हैं॥१२॥
हे देवि उषे ! सूर्यदेव की रश्मियों के अनुकूल रहते हुए आप हमारे अन्तरंग में कल्याणकारी कर्मों की प्रेरणा प्रदान करें । आप आवाहित किये जाने पर हमारे अभिमुख प्रकाशमान रहें । हमें और ऐश्वर्यवानों को प्रचुर मात्रा में धन सम्पदा प्रदान करें॥१३॥

सूक्त - १२४

अग्नि के प्रदीप्त होने पर देवी उषा अधिकार का नाश करती हैं और सूर्योदय के समान अति तेजस्विता को धारण करती हैं। ये सूर्यदेव हमें उपयोगी धन तथा मनुष्यों और मनुष्येत्तर प्राणियों को जाने के लिए मार्ग प्रशस्त करें । अर्थात् देवी उषा के आने के बाद हम मनुष्यों, गौ, अश्वादि पशुओं के लिए आने जाने के रास्ते खुल जायें॥१॥
ये देवी उषा अनुशासनात्मक नियमों का पालन करने वाली, मनुष्यों की आयु को लगातार कम करने वाली हैं। निरन्तर आने वाली विगत उषाओं के अन्त में तथा भविष्य में आने वाली उषाओं में यह सर्वप्रथम प्रकाशित होती हैं॥२॥
स्वर्गलोक की कन्यारूपी ये देवी उषा प्रकाश रूप वस्त्र धारण करने वाली, श्रेष्ठ मनवाली तथा प्रतिदिन पूर्व दिशा से आती हुई दिखाई देती हैं। जिस प्रकार विदुषी नारी सत्य मार्ग से जाती हैं, उसी प्रकार दिशाओं में अवरोध न पहुँचाती हुई ये देवी उषा जाती हैं॥३॥
शुद्ध पवित्र वक्षस्थल के समान देवी उषा समीप से ही दिखाई देती हैं। नई वस्तुओं का निर्माण करने वाले के समान ही देवी उषा ने अपने किरण रूपी अवयवों को प्रकट किया है। जिस प्रकार गृहस्थ महिलायें सोये हुए परिवारजनों को जगाती हैं, वैसे ही भविष्य में आनेवाली उषाओं में सर्वप्रथम ये देवी उषा दुबारा जगाने के लिए आ गई हैं॥४॥
विस्तृत अन्तरिक्ष लोक के पूर्व दिशा भाग में रश्मियों को उत्पन्न करने वाली देवी उषा ने प्रकाश रूपी ध्वजा को फहराया है । द्युलोक भूलोक रूपी माता-पिता के पास रहकर दोनों लोकों को प्रकाश से परिपूर्ण करती हुईं ये देवी उषा विशिष्ट तेजस्वी प्रकाश से अन्तरिक्ष को परिपूर्ण करती हैं॥५॥
विस्तृत होने वाली ये देवी उषा सुख व आनन्द के लिए जिस प्रकार विरोधी का त्याग नहीं करतीं, उसी प्रकार आत्मीय जनों को भी अपने प्रकाश से वंचित नहीं करतीं (अर्थात् अपने पराये का भेद किये बिना अपने प्रकाश से सभी को लाभ देती हैं ) प्रकाश रूपी निर्दोष शरीर से प्रकाशित होने वाली देवी उषा जिस प्रकार छोटे से दूर नहीं होतीं, उसी प्रकार बड़े का त्याग नहीं करतीं, अपितु छोटे - बड़े का भेद किये बिना दोनों को प्रकाशित करती हैं॥६॥
भ्रातृहीन बहिन जिस प्रकार निराश्रित होने पर वापस अपने माता-पिता के पास चली जाती है अथवा जिस प्रकार कोई विधवा धन में हिस्सा पाने के लिए न्यायालय में जाती हैं, उसी प्रकार उत्तम वस्त्रों को धारण करके सूर्य रूप पति से मिलने की इच्छुक ये देवी उषा मुस्कराती हुई अपने किरण रूप सौन्दर्य को प्रकट करती हैं॥७॥
जिस प्रकार छोटी बहिन अपनी ज्येष्ठ बहिन के लिए स्थान रिक्त कर देती है, वैसे ही रात्रिरूपी छोटी बहिन अपनी ज्येष्ठ बहिन देवी उषा के लिए मानो अपने स्थान से हट जाती हैं। सूर्यदेव की रश्मियों से अन्धकार को हटाती हुईं ये देवी उषा उत्सव में जाने वाली स्त्रियों की तरह अच्छी प्रकार चलने वाली किरण समूह के समान अपने स्वरूप को प्रकट करती हैं॥८॥
जो उषा रूपी बहिनें पहले चली गई हैं उन दिनों के बीच में अन्तिम देवी उषा के पीछे से एक-एक नवीन देवी उषा क्रम से जाती हैं । वे उषाएँ पूर्व की तरह नवीन दिन अर्थात् नयी उषाएँ भी हमारे लिए निश्चय ही प्रचुर धनयुक्त श्रेष्ठ दिवस को प्रकाशित करती रहें॥९॥
है धनवति उषे ! आप दाताओं को जगायें । न जागने वाले लोभी व्यापारी सोते रहें । हे धनवती उषे ! धनवानों के निमित्त धन देने के साथ यज्ञीय भावना की प्रेरणा भी प्रदान करें । हे सुभाषिणि उषे ! सम्पूर्ण प्राणियों की आयु कम करने वाली आप स्तोताओं के निमित्त अपार वैभव से युक्त होकर प्रकाशमान हों॥१०॥
तरुणी स्त्री के समान ये देवी उषा पूर्व दिशा से प्रकाशित हो रही हैं। इन्होंने किरणों रूपी लाल वर्ण के अच्चों को अपने रथ में जोता हुआ है। ये देवी उषा निश्चित ही विशेष रूप से प्रकाशित होती हैं। उसके प्रकाश रूपी ध्वजा रोहण के साथ ही घर-घर में यज्ञाग्नि प्रज्वलित होती है॥११॥
देवी उषा के प्रकाशित होते ही पक्षीगण अपना घोंसला त्याग देते हैं। मनुष्य भी अन्न की कामना के लिए प्रेरित होते हैं । हे देवी उषे ! आप गृहस्थ जीवन में रहकर यज्ञ और दानदाता मनुष्य के लिए प्रचुर धन सम्पदा प्रदान करें॥१२॥
हे स्तुति योग्य उषाओ ! हमारे इस स्तवन से आपकी प्रार्थना सम्पन्न हो रही हैं। सभी उषाएँ प्रगति की कामना से हम सभी प्रजाजनों को समृद्ध करें । हे देवत्व सम्पन्न उषाओ ! आपके संरक्षण साधनों से हम सैकड़ों और हजारों प्रकार के धन-धान्य से सम्पन्न सामर्थ्य-शक्ति अर्जित करें॥१३॥

सूक्त - १२५

प्रभात कालीन सूर्यदेव स्वास्थ्यप्रद पोषक तत्वों (रों) को लाकर मनुष्यों के लिए प्रदान करते हैं। ज्ञानी मनुष्य इस तथ्य से परिचित होते हुए सूर्योदय से पहले उठकर सूर्य रश्मियों में सन्निहित प्राणतत्त्व रूपी रलों के लाभ से कृतकृत्य होते हैं। उससे मनुष्य दीर्घायुष्य प्राप्त करके संतानों के लाभ से युक्त होकर धन सम्पदा और स्वस्थ जीवन प्राप्त करते हैं॥१॥
जो दानी मनुष्य प्रात: उठते ही किसी याचक को-रस्सी से पाँव को बाँधने के समान -अपार धन प्रदान करते हैं, ऐसे दानी मनुष्य श्रेष्ठ गौओं, अश्वों और स्वर्ण से युक्त होते हैं । इन्हें इन्द्रदेव अतिश्रेष्ठ अन्न-धन आदि प्रदान करते हैं॥२॥
हे देव ! आज प्रातः हम धन से सम्पन्न रथ द्वारा यज्ञ संरक्षक और श्रेष्ठ कर्तव्यों का निर्वाह करने वाले पुत्र प्राप्ति की कामना से आपके यहाँ आये हैं। आप सुखदायक अभिषुत सोमरस को ग्रहण करें तथा वीरों के आश्रयदाता आप, हमारा शुभ आशीषों से मंगल करें॥३॥
इस समय यज्ञ कार्य करने वालों तथा भविष्य में भी यज्ञीय भाव को पोषित करने वालों के निमित्त सुखदायक नदियाँ प्रवाहित होती हैं। सबके लिए कल्याणकारक तथा सबको सम्पन्न बनाकर प्रसन्न होने वाले याजकों को, अन्न (पोषण) की समृद्धि में समर्थ गौएँ, घृत की धारायें प्रदान करती हैं॥४॥
जो अपने आश्रित मनुष्यों को धनधान्य से परिपूर्ण करते हैं, वे सभी प्रकार के स्वर्गीय आनन्द को उपलब्ध करते हैं। वे देवत्व को प्राप्त करके उसी श्रेणी में प्रतिष्ठित होते हैं। जल प्रवाह उस दानी के लिए प्राणस्वरूप जल को प्रवाहित करते हैं तथा यह पृथ्वी भी उसके निमित्त सदैव अन्नादि का पर्याप्त भण्डार प्रदान करती है॥५॥
ये विलक्षण उपलब्धियाँ मात्र सार्थक दान दाताओं को प्राप्य हैं । दिव्य लोक में भी सूर्यदेव उनके लिए ही स्वास्थ्य प्रदान करते हैं। दानदाता ही अमरपद को प्राप्त करते हैं तथा प्रसन्नता में दानी के प्रति शुभ कामनाओं से दानदाता की आयु में वृद्धि होती है॥६॥
यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यों को सम्पन्न करने वाले तथा मनुष्यों को कल्याणरूप दान से संतुष्ट करने वाले, दुःखों और पापकर्मों से बचे रहें । ज्ञान साधक और यम नियमादि व्रतों को व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्यों को जल्दी बुढ़ापा नहीं घेरता। इसके विपरीत जो पापकर्मों में संलिप्त रहते हैं तथा जो देवताओं को वियों द्वारा संतुष्टि प्रदान करने वाले यज्ञादि सत्कर्मों से रहित हैं, उन्हें मानसिक चिन्ताएँ और शोक संताप घेरे रहते हैं॥७॥

सूक्त - १२६

हिंसादि कष्टों से परे, जिस राजा ‘भाव्य' ने कीर्ति की कामना से युक्त होकर हमारे लिए सहस्रों यज्ञों को सम्पन्न किया, उस सिन्धु नदी के किनारे वास करने वाले नरेश के लिए हम ज्ञान से भरे स्तवनों का विवेक बुद्धिपूर्वक उच्चारण करते हैं॥१॥
कक्षीवान् ने स्तोता और धनदाता राजा से सौ स्वर्णमुद्राएँ, सौ वेगशील अश्व तथा सौ श्रेष्ठ वृषभ ग्रहण किये; इससे उस नरेश की स्वर्गलोक में चारों ओर अक्षुण्ण कीर्ति फैल रही है॥२॥
स्वनय द्वारा प्रदत्त श्रेष्ठ वर्गों के अश्वों से युक्त और श्रेष्ठ स्त्रियों से युक्त दस रथ हमारे यहाँ आये हैं। दिन की प्रारम्भिक वेला में राजा से कक्षीवान् ने साठ हजार गौओं को प्राप्त किया॥३॥
हजारों की पंक्ति के आगे दस रथों को चालीस घोड़े खींच ले जाते हैं। अन्नयुक्त घास खाकर पुष्ट हुए, स्वर्णालंकारों से युक्त, जिनसे मद टपकता है, ऐसे घोड़ों को कक्षीवन्त अपने वश में करते हैं (मार्जन-मालिश आदि के द्वारा थकान मुक्त करते हैं ।)॥४॥
हे अन्नादि से पुष्ट श्रेष्ठ आचरण युक्त बन्धुओ ! आपके लिए हमने चार-चार (अश्वों अथवा वैभवों से युक्त) आठ और तीन (ग्यारह अर्थात् दस इन्द्रियाँ, ग्यारहवाँ मन) को, अगणित गौओं (पोषण देने वाली धाराओं) सहित प्रथम अनुदान के रूप में प्राप्त किया है। ये सब प्रेमपूर्वक रहनेवाली प्रजाओं-परिवारों की तरह रहकर, रथादियुक्त होकर श्रेय की कामना करें॥५॥
(स्वनय राजा का कथन) मेरी सहधर्मिणी (नीतियुक्त मति-श्रेष्ठ बुद्धि) मेरे लिए अनेक ऐश्वर्य एवं भोग्य पदार्थ उपलब्ध कराती है । यह सदा साथ रहने वाली, गुणों को धारण करने वाली मेरी सह-स्वामिनी है॥६॥
(सहधर्मिणी का कथन) हे पतिदेव ! आप मेरे पास आकर बार-बार मेरा स्पर्श करें (प्रेरणा लें-परीक्षण करके देखें ), मेरे कार्यों को अन्यथा न लें । जिस प्रकार गंधार की भेड़ रोमों से भरी होती है, उसी प्रकार मैं गुणों से युक्त-प्रौढ़ हूँ॥७॥

सूक्त - १२७

दैवी गुणों से सम्पन्न, श्रेष्ठ कर्म के संपादक, जो अग्निदेव देवताओं के समीप जाने वाली ऊर्ध्वगामी ज्वालाओं से प्रदीप्त और विस्तारयुक्त होकर, अनवरत घृतपान की अभिलाषा करते हैं; उन देव आवाहनकर्ता, दानकर्ता, सबके आश्रयभूत, अरणि मन्थन से उत्पन्न, (अतएव) शक्ति के पुत्र, सर्वज्ञान-सम्पन्न, शास्त्रज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ ज्ञानी के सदृश; अग्निदेव को हम स्वीकार करते हैं॥१॥
हे ज्ञानी और तेजस्वी अग्निदेव ! हम यजमान, उत्तम विचारकों के लिए मननीय मंत्रों द्वारा यज्ञ में आपका आवाहन करते हैं। ये प्रजाएँ अपनी रक्षा के लिए श्रेष्ठतम, तेजस्वी, सूर्य के सदृश गतिमान् , यज्ञ निर्वाहक एवं प्रदीप्त किरणों से युक्त अग्निदेव को तुष्ट-पुष्ट करती हैं॥२॥
वे अग्निदेव तेजोमयी सामर्थ्य से अत्यन्त दीप्तिमान् , शत्रुओं में भय का संचार करने वाले तथा फरसे के तुल्य द्रोहियों का नाश करने वाले हैं। धनुर्धारी अचल योद्धा की तरह जिनके प्रभाव से बलवान् शत्रु भी पराजित हो जाते हैं एवं अनुशासन स्वीकार करते हैं, उन अग्निदेव के संयोग से अत्यन्त कठोर पदार्थ भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं॥३॥
जैसे ज्ञानी पुरुषों को धन देने का विधान है, उसी प्रकार अति सुदृढ़ (शक्तिशाली) मनुष्यों द्वारा अपने संरक्षण के निमित्त अग्नि में हविष्यान्न देने पर, अणिमन्थन से प्रकट होने वाले अग्निदेव अपनी प्रचण्ड ज्वाला से प्रदीप्त होकर उसे ऐश्वर्यों से परिपुष्ट करते हैं। जिस प्रकार अग्निदेव असंख्य वनों में प्रविष्ट होकर उन्हें जला डालते हैं तथा अपने तेज से अन्नों को पकाते हैं, वैसे ही वे अपनी तेजस्विता से सुदृढ़ वैरियों को भी धराशायी कर देते हैं॥४॥
हम अग्निदेव के निमित्त यज्ञीय हविष्यान्न अर्पित करते हैं, जो दिन की अपेक्षा रात्रि को अधिक रमणीय लगते हैं। जैसे पुत्र के लिए पिता द्वारा सुखदायक निवास दिया जाता है, वैसे ही दिन की अपेक्षा रात्रि में प्रखर तेजस्वी दिखाई देने वाले अग्निदेव के निमित्त हवियाँ समर्पित करें । ये अग्नि ज्वालाएँ भक्त या अभक्त दोनों का भेद किये बिना प्रदत्त आहतियों को स्वीकार करती हैं। हविष्यान्न ग्रहण करने वाले अग्निदेव सदा ज़रारहित (चिरयुवा) रहते और यजमान को भी अजर (प्रखर) बना देते हैं॥५॥
पूजनीय अग्निदेव यज्ञीय कर्मों, उपजाऊ क्षेत्रों और रणक्षेत्रों पर सभी जगह वेगवान् वायु की तरह ही ऊँचे स्वर से गर्जना करते हैं । यज्ञ की ध्वजारूष पूजनीय अग्निदेव हवियों को स्वीकार कर हविष्यान्न ग्रहण करते हैं। निज़ की प्रसन्नता के साथ दूसरों के लिए भी आनन्दप्रद इन अग्निदेव के मार्ग का सम्पूर्ण देव उसी प्रकार कल्याण प्राप्ति हेतु अनुसरण करते हैं, जिस प्रकार मनुष्य कल्याण की इच्छा से सन्मार्गगामी होते हैं॥६॥
जब भृगुवंश में उत्पन्न ऋषियों ने मन्थन द्वारा इन अग्निदेव को प्रकट किया और स्तोत्रकर्ता, तेजवान् तथा विनयशील भृगुओं ने दो प्रकार से उनकी प्रार्थनाएँ कीं; तब परम पावन, धारण करने योग्य, ज्ञानी, अग्निदेव ने प्रेम पूर्वक अर्पित की गई आहुतियों को ग्रहण किया। वे ज्ञानी अग्निदेव धनों पर प्रभुत्व स्थापित करते हुए निश्चित ही हमारी प्रार्थनाएँ स्वीकार करते हैं॥७॥
हम सम्पूर्ण प्रज्ञा के रक्षक, समदर्शी, गृहपालक, सत्यवादी, अतिथि रूप, अग्निदेव को उपभोग्य सामग्री के निमित्त आवाहित करते हैं। उन अग्निदेव के निकट हविष्यान्न पाने के लिए सम्पूर्ण देव उसी प्रकार आते हैं, जिस प्रकार पुत्र पिता के पास अन्न सामग्री की प्राप्ति हेतु जाते हैं। इसी भाव से मनुष्य भी देवताओं के लिए आहुतियाँ प्रदान करते हैं॥८॥
हे अग्निदेव ! आप अपनी सामर्थ्य - शक्ति से शत्रुओं के पराभवकर्ता और अति तेजस्वी रूप में ही प्रकट हुए हैं। जैसे देवयज्ञों के निमित्त धन प्रकट होता है, वैसे ही अग्निदेव यज्ञीय संरक्षण के लिए प्रादुर्भूत हुए हैं। आप की प्रसन्नता अति बलप्रद और कर्म प्रखर-तेजस्वी हैं। हे अविनाशी अग्निदेव ! इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण सभी मनुष्य दूतरूप में आपकी सेवा में संलग्न रहते हैं॥९॥
है साधको ! शत्रु पराभवकर्ता, प्रभातवेला में जागरणशील अग्निदेव को आपके महिमामय स्तुतिगान उसी प्रकार से प्रसन्नता प्रदान करें, जैसे उदारमना पशुधन आदि का दान देने वाले मनुष्य को मनुष्यों द्वारा की गई स्तुतियाँ प्रसन्नता देती हैं। यज्ञ सम्पादक सभी जगह इसी भाव को दृष्टिगत रखकर प्रार्थनाएँ करते हैं, स्तुतिगान में कुशल होता सभी देवों में सर्वप्रथम इन अग्निदेव को उसी प्रकार प्रशंसित करते हैं, जिस प्रकार चारणगण धनवानों की प्रशंसा करते हैं॥१०॥
हे अग्निदेव ! समीप से दीप्तिमान् दिखाई देने वाले आप देवताओं द्वारा पूज्य हैं । आप कृपापूर्वक श्रेष्ठ धन से हमें परिपूर्ण करें । हे सामर्थ्यवान् अग्निदेव ! आप दीर्घायुष्य के लिए उपभोग्य पदार्थों को प्रदान करके हमें यशस्वी बनायें । हे ऐश्वर्य-सम्पन्न अग्निदेव ! आप स्तोताओं को श्रेष्ठ शौर्य-सम्पन्न और पराक्रमी बनायें तथा अपनी सामर्थ्य शक्ति से शत्रुओं का संहार करें॥११॥

सूक्त - १२८

देवताओं का आवाहन करने वाले, यज्ञादिकर्मों का सम्पादन करने वाले ये अग्निदेव यज्ञादि कर्म, व्रतनियमों के निर्वाह को दृष्टि में रखकर मनुष्यों द्वारा अरणिमन्थन से प्रकट होते हैं। मित्रता की भावना करने वालों को सर्वस्व तथा धनाकांक्षीं के लिए धन का अगाध भण्डार प्रदान करते हैं। पीड़ा मुक्त, होतारूप में ऋत्विजोंं से घिरे हुए अग्निदेव यज्ञवेदी में स्थापित किये जाते हैं, वे निश्चित ही यज्ञस्थल में प्रतिष्ठित होते हैं॥१॥
हम सत्यमार्ग से अति विनम्रतापूर्वक, यज्ञीय कर्म में घृतादि से युक्त आहुतियाँ देते हुए अग्निदेव की अर्चना करते हैं । जिन अग्निदेव को मनु के निमित्त मातरिश्वा वायु ने सुदूर स्थान से लाकर प्रदीप्त किया; ऐसे अग्निदेव हमारे द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न को ग्रहण करके भी अपनी ताप क्षमता में कमी न आने दें॥२॥
सदा प्रशंसनीय सैकड़ों आँखों (असंख्य ज्वालाओं) से वनों को प्रकाशमान करते हुए समीपस्थ और दूरस्थ पर्वत शिखरों पर अपना स्थान निर्धारित करते हुए, शक्तिशाली, शक्ति के धारणकर्ता तथा गर्जनशील, शत्रुविनाशक ये अग्निदेव सुगम मार्ग द्वारा शीघ्रतापूर्वक पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं॥३॥
सत्कर्मशील अग्रगामी अग्निदेव प्रत्येक घर में हिंसारहित यज्ञाग्नि के रूप में प्रचलित होते हैं, श्रेष्ठ कर्म द्वारा प्रदीप्त होते हैं तथा प्रखर कर्मों द्वारा अन्नादि के इच्छुकों को, ज्ञानी अग्निदेव सम्पूर्ण उपभोग्य पदार्थ प्रदान करते हैं, क्योंकि ये घृताहुति को ग्रहण करने के लिए पूजनीय अतिथि रूप में प्रकट हुए हैं। ये अग्निदेव हुविवाहक तथा ज्ञान सम्पन्न हैं॥४॥
जिस प्रकार मरुद्गण अग्नि को भोजन कराते हैं और जिस प्रकार (सत्पुरुष) भिक्षुकों को भोजन देते हैं, उसी प्रकार याजकगण विचारपूर्वक आदर सहित इन अग्नि ज्वालाओं के लिए आहुतियाँ प्रदान करते हैं। इसी प्रकार ये अग्निदेव अपनी सामर्थ्य से धनों को हविदाता की ओर प्रेरित करते हुए उस को पाप कर्मों और पराजय से सुरक्षित करते हैं। वे (अग्निदेव) दैवी अभिशापों तथा जीवन संघर्ष में पराभव से बचाते हैं॥५॥
विश्व व्यापक, महान् एवं सामर्थ्यशाली अग्निदेव सूर्यदेव के समान ही यजमान को देने के लिए दाहिने हाथ में धन धारण करते हैं। वे मुक्त हस्त से यशोभिलाषी सत्कर्मशीलों को धन देते हैं, दुष्टों और दुराचारियों को नहीं । हे अग्निदेव ! दिव्यता युक्त आप हविष्यान्न के अभिलाषी समस्त देवों के लिए हवि का वहन करते हैं तथा श्रेष्ठ कर्म करने वालों के निमित्त धन प्रदान करते हैं। आप उनके लिए धनकोष को पूर्ण रूप से खुला कर देते हैं॥६॥
वे अग्निदेव मनुष्यों के पाप निवारण के निमित्त यज्ञीय कर्मों में अतिसुखप्रद और कल्याणकारी हैं। विजेता नरेश के समान ही प्रजाजनों के पालक और स्नेह पात्र हैं। यजमानों द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न को अग्निदेव ग्रहण करते हैं। ऐसे अग्निदेव यज्ञकर्म के विरोधियों और धूर्तजनों से हमें सुरक्षित करें तथा महिमायुक्त देवताओं के कोपभाजन होने से हमें बचायें॥७॥
धन- धारणकर्ता, अतिचैतन्य, प्रेरणायुक्त, सर्वप्रिय, होतारूप अग्निदेव की सभी मनुष्य प्रार्थना करते हुए उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। उनके प्रयास से हविवाहक सबके प्राण स्वरूप, सर्वज्ञाता, देवावाहक, पूजनीय और क्रान्तदर्शी अग्निदेव भली प्रकार प्रज्वलित किये गये हैं। ऋत्विग्गण धन की कामना से प्रेरित होकर अपने संरक्षणार्थ उन मनोहारी अग्निदेव की स्तोत्र गान करते हुए अर्चना करते हैं॥८॥

सूक्त - १२९

हे पापरहित प्रेरक इन्द्रदेव ! आप यज्ञ कार्य के लिए अपने रथ को आगे बढ़ाते हैं और अपरिपक्वों को भी शीघ्रता से अभीष्ट प्राप्ति के लिए उपयोगी बना देते हैं। अन्न (हवि) के प्रति आपका विशेष आकर्षण हैं। शीघ्रतापूर्वक श्रेष्ठकर्मों को सम्पन्न करने वाले पाप मुक्त हे इन्द्रदेव ! वेदज्ञों की इस स्तुति रूपी वाणी के समान ही इस हवि को भी आप स्वीकार करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप संग्रामों में वीर पुरुषों के साथ शत्रु को नष्ट करने में कुशल हैं । भरण-पोषण के क्रम में जो स्वयं प्राप्त करने वाले तथा अन्नादि को वितरण करने वाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, उन्हें आप शक्ति-सामर्थ्य देते हैं। आप हमारी प्रार्थना सुनें । जिस प्रकार बलशाली लोग अश्व का सहारा लेते हैं, उसी प्रकार समर्थ लोग तेजस्वी इन्द्रदेव का आश्रय लेते हैं॥२॥
हे बलशाली इन्द्रदेव ! आप मनोहारी रूप में मेघों के आवरण को जल से पूर्ण करते हैं । आप कष्टप्रद असुरों को दूर करते तथा शत्रुओं का संहार करते हैं। ये इन्द्रदेव शत्रुओं के विनाश के निमित्त कारण, रुद्र के समान भयंकर, मित्र के समान हितैषी, श्रेष्ठ सुखप्रद तथा सबके द्वारा वरणीय हैं॥३॥
हे मनुष्यो ! समस्त जनों के मित्र के समान हितैषी इन्द्रदेव की आयुष्य वृद्धि और शत्रुओं के विध्वंस के लिए हम यज्ञ सम्पादनार्थं प्रार्थना करते हैं। हे इन्द्रदेव ! आप जिस शत्रु समूह का विध्वंस करते हैं, संगठित होकर भी आपकी सामर्थ्य के आगे नगण्य हैं । ऐसे आप सभी संग्रामों में हमारी ज्ञान-सामर्थ्य को संरक्षित रखें॥४॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप अपनी शक्तिशाली सामर्थ्य व संरक्षण साधनों की तेजस्विता से शत्रुओं के अहंकार को छिन्न-भिन्न कर दें अर्थात् विदीर्ण कर डालें । हे बलशाली इन्द्रदेव ! आप शत्रुनाशक होने पर भी पापमुक्त हैं। पूर्ववत् हमें आगे करके स्वयं अग्रगामी होकर सभी मनुष्यों के कषाय- कल्मषों का निवारण करें। आप सदैव हमारे सम्मुख रहें॥५॥
जो मनुष्य अपने पुरुषार्थ से प्रगतिशील हैं, वे इन्द्रदेव के समान प्रशंसनीय और प्रार्थना योग्य हैं तथा जो दुष्टों के नाशक हैं, वे भी स्तुत्य हैं । श्रेष्ठ सोम के लिए हम स्तोत्र का उच्चारण करें । वे निन्दकों को अपनी सामर्थ्य से हमसे दूर करें, घातक अस्त्रों से दुर्बुद्धिग्रस्तों तथा कटुवाणी का प्रयोग करने वालों का क्षय करें। थोड़े से जल के समान ही शत्रुओं का समूल नाश करें॥६॥
हे वैभव सम्पन्न इन्द्रदेव ! हम यजनीय वाणी से आपकी स्तुति करें तथा सुन्दर, शक्ति-सम्पन्न सम्पदा का लाभ प्राप्त करें । श्रेष्ठ, मननशील, सुविचारों एवं संकल्प शक्ति से, अलभ्य इन्द्रदेव को प्राप्त करें । यजन करने योग्य इन्द्रदेव को, यशस्विता युक्त सत्य स्वरूप का वर्णन करने वाली प्रार्थनाओं से प्रशंसित करें॥७॥
इन्द्रदेव अपनी यशस्वी संरक्षण सामर्थ्य द्वारा दुष्टों और दुर्बुद्धिग्रस्तों से हम सभी का संरक्षण करें । हमारे विनाश हेतु अति समीपवर्ती भक्षक राक्षसों द्वारा जो तीव्र गतिशील सेना भेजी गई है, वे आपसी कलह का शिकार होकर विनष्ट हो जाये । हमारे समीप तक उसकी पहुँच न हो॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप सभी प्रकार के धनों को पापरहित मार्ग से हमें उपलब्ध करायें। धन बल से हम किसी को पीड़ित न करें। आप हमारे दूरस्थ अथवा निकटस्थ दोनों जगह हैं । आप दूर या निकट जहाँ भी हों, हमें संरक्षित करें । उपयोगी वस्तुओं के दान द्वारा हमारी हर प्रकार से सहायता करें॥९॥
' हे ओजस्वी, पालनकर्ता, संरक्षक तथा अमर इन्द्रदेव ! आप सुखस्वरूप धन से हमें दुःख-क्लेशों से मुक्त करें । अपने यशस्वी जीवन की रक्षा हेतु हम सूर्य के समान तेजस्वी आपके ही सान्निध्य में रहें । हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप अपने विशेष रथ से यहाँ आयें । आप हम भक्तों के अतिरिक्त अन्यों पर क्रोध करें तथा हिंसक राक्षसों के प्रति क्रोधित हों॥१०॥
हे श्रेष्ठ, स्तुति योग्य इन्द्रदेव ! आप देवरूप में पापकर्मो से सदा हमारा संरक्षण करें । आप सदैव दुर्बुद्धिग्रस्तों और उनकी दुष्ट अभिलाषाओं के नाशक हों। आप विध्वंसक, पापकर्मों में लिप्त राक्षसों के हन्ता और विद्वान् पुरुषों के संरक्षक हों । हे आश्रयदाता ! इसी हेतु आपका प्रादुर्भाव हुआ है॥११॥

सूक्त - १३०

हे सज्जनों के पालक इन्द्रदेव ! यज्ञों में अग्नि की तरह आप दूर से भी पहुँचें । क्षेत्रपालक राजा की तरह आयें । जैसे पुत्र पिता को बुलाते हैं, उसी प्रकार हम हव्ययुक्त याजक अन्न प्राप्ति के लिए आपका सोमयज्ञ में आवाहन करते हैं॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप जल द्वारा सींचे गये और पत्थरों द्वारा कूटकर अभिषुत हुए सोमरस का वैसे ही पान करें, जिस प्रकार तीव्र प्यास से युक्त वृषभ जलाशय में जाकर जल पीते हैं। अभीष्ट आनन्द की प्राप्ति के लिए आपके अश्व वैसे ही आपको यज्ञस्थल में लेकर आये, जैसे किरणरूपों अश्व सूर्यदेव को अभीष्ट की और प्रेरित करते हैं॥२॥
जिस प्रकार गौओं के गोष्ठ अथवा जंगल में छिपाकर रखे गये पक्षियों के बच्चों को कोई मांसभक्षी खोज निकालता है, वैसे ही अंगिराओं में उत्तम, तेजस्वी, वज्रधारी इन्द्रदेव ने असीमित बादलों में छिपे हुए जल के भण्डार को खोज निकाला और जल वृष्टि द्वारा मानो इन्द्रदेव ने मनुष्यों के लिए धन-धान्य रूपी वैभव के द्वारों को ही खोल दिया हो॥३॥
इन्द्रदेव अपने हाथों में तेजधार वाले वज्र को शत्रु पर प्रहार हेतु सुदृढ़ता से धारण करते हैं। वे जल की तीव्र धारा के समान ही असुरता के संहार के लिए शस्त्र की धार में अति पैनापन लाते हैं । हे इन्द्रदेव ! आप अपनी सामर्थ्य से उसी प्रकार परशु शस्त्र द्वारा शत्रुओं का संहार कर देते हैं, जैसे तेज कुल्हाड़े से बढ़ई जंगल के वृक्षों को काट डालते हैं॥४॥
हैं इन्द्रदेव ! आपने नदियों के जल प्रवाह को समुद्र की ओर सतत प्रवाहित होने के लिए उसी प्रकार प्रेरित किया है, जैसे शक्ति-सामर्थ्य की वृद्धि के लिए राजा रथों से युक्त सेना को प्रेषित करते हैं। कामनाओं की पूर्ति करने वाली कामधेनु गौ के समान ही नदियों के जल प्रवाह, विचारशील मनुष्यों के लिए अक्षुण्ण धन-सम्पदा को प्रदान करने वाले हैं॥५॥
हे इन्ददेव ! जिस प्रकार निपुण कारीगर धन की कामना से प्रेरित होकर श्रेष्ठ रथों का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार स्तोतागण आपके लिए प्रशंसक स्तोत्रों का गान करते हैं । हे ज्ञान - सम्पन्न इन्द्रदेव ! जिस प्रकार सारथि शक्तिशाली घोड़ों को विजय लाभ के लिए अतिशक्तिशाली बनाते हैं, वैसे ही स्तोतागण, धन, बल और सूख़ों के लाभ के लिए स्तुतियों द्वारा आपको प्रोत्साहित करते हैं॥६॥
हे आनन्दप्रद इन्द्रदेव ! आपने महान् दानदाता पुरु और दिवोदास के लिए शत्रुओं की नब्बे नगरियों का वज्र द्वारा विध्वंस कर डाला । हे पराक्रमी वीर इन्द्रदेव ! आपने अपनी शक्ति-सामर्थ्य से प्रचुर धन-सम्पदा अतिथिग्व के लिए प्रदान की तथा शम्बर को पर्वत से गिराकर समाप्त कर दिया॥७॥
परस्पर संगठित होकर किये जाने वाले युद्धों में सैकड़ों संरक्षण साधनों से युक्त इन्द्रदेव श्रेष्ठ मनुष्यों का संरक्षण करते हैं, मननशील मनुष्यों को पीड़ित करने वाले दुष्टों को दण्डित करके नियन्त्रित करते हैं तथा कलुषित कर्मों में संलिप्त दुष्टों का संहार करते हैं । इन्द्रदेव उपद्रवियों को उसी प्रकार भस्म कर देते हैं, जैसे अग्नि पदार्थों को जला डालती है। निश्चित ही वे हिंसकों को भस्म कर देते हैं॥८॥
तेजस्वी और सबके प्रेरक इन्द्रदेव अपनी शक्ति सामर्थ्य रूपी चक्र को लेकर शत्रुओं के पास पहुँचते ही उन्हें शान्त कर देते हैं, मानो अधीश्वर इन्द्रदेव ने उनकी वाणी का ही हरण कर लिया हो । हे क्रान्तदश इन्द्रदेव ! आप जिस प्रकार उशना अषि के संरक्षणार्थ अतिदूर से ही उनके समीप आते हैं, वैसे ही मनुष्यों के लिए भी सभी प्रकार के सुखों को प्रदान करें । जिस प्रकार कोई व्यक्ति सम्पूर्ण दिन, दान में व्यतीत करता है, हमारे लिए आप वैसे ही दाता बनें॥९॥
शत्रुओं के नगरों को ध्वस्त करने वाले सामर्थ्य सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! आप नवरचित स्तोत्रों से सन्तुष्ट होकर सुखप्रद साधनों और हमारे अनुष्ठित कर्मों का संरक्षण करें । हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार दिवस सूर्य की तेजस्विता को द्युलोक में फैलाते हैं, वैसे ही हमारे स्तोत्र आपकी शक्ति को बढ़ायें॥१०॥

सूक्त - १३१

विस्तृत पृथ्वी और तेजस्वी द्युलोक ने अपने संसाधनों से इन्द्रदेव का सहयोग किया। उत्साहित देवगणों ने सहमति पूर्वक इन्द्रदेव को अग्रणी रूप में प्रतिष्ठित किया। सभी देवता उन्हें अपना नायक मानकर हविभाग अर्पित करते हैं। मनुष्यों द्वारा दी गयी सोम युक्त आहुतियाँ इन्द्रदेव के लिए समर्पित हों॥१॥
हे इन्द्रदेव ! सभी सोमयज्ञों में विभिन्न उद्देश्यों वाले याजक आपको हविष्यान्न प्रदान करते हैं। स्वर्ग की प्राप्ति के इच्छुक भी पृथक् रूप में आहुतियाँ देते हैं। मनुष्यों को सागर से पार ले जाने वालों नाव के समान ही इन्द्रदेव को जागरूक करके सेना के अग्रिम भाग में प्रतिष्ठित करते हैं । हम स्तुति करने वाले स्तोत्रों द्वारा आपका ध्यान करते हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! संरक्षण के इच्छुक गृहस्थजन सपत्नीक स्वर्ग प्राप्ति एवं गौओं की प्राप्ति के लिए आपके सम्मुख प्रस्तुत होते हैं। ऐसे में हे इन्द्रदेव ! गौ समूह की प्राप्ति के लिए होने वाले संग्राम में आपको स्वयं ले जाकर प्रेरित करने वाले यजमान आपके लिए यज्ञ कर्म सम्पादित करते हैं । आपने ही अपने साथ रहने वाले वज्र को प्रकट (प्रयुक्त) किया है॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा शत्रुओं की सामर्थ्य को पद-दलित किये जाने पर, जब आपने ही उनकी शरद्कालीन आवासीय नगरियों का विध्वंस किया, तब प्रजाजनों में आपकी पराक्रम शक्ति विख्यात हुई । हे शक्ति के प्रतिनिधि इन्द्रदेव ! आपने मनुष्यों के कल्याण के लिए यज्ञ विध्वंसक राक्षसों को दण्डित करके पृथ्वी एवं जलों पर उनके प्रभुत्व को समाप्त किया॥४॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! आनन्दित होते हुए आपने यजमानों तथा मित्र भाव रखने वालों का संरक्षण किया। उनके द्वारा आपकी पराक्रम शक्ति को चारों और विस्तारित किया गया। आपने ही धनादि वितरण से संग्रामों में वीरों को प्रोत्साहित किया । आपने एक - दूसरे के सहयोग से धन लाभ देते हुए अन्नादि के इच्छुकों को अन्न उपलब्ध कराया॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे प्रभातकालीन यज्ञादिकर्मों के समय उच्चारित स्तुतियों पर ध्यान दें और आहुतियों को ग्रहण करें । सुखों की प्राप्ति हेतु स्तुतियों के अभिप्राय को जानें । हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! जिस प्रकार आप शत्रुनाशक कार्यों में सजग रहते हैं, उसी गम्भीरता से आप नवीन रचित स्तोत्रों और नये ज्ञानी स्तोताओं की प्रार्थनाओं पर ध्यान दें॥६॥
हे अति विख्यात वीर इन्द्रदेव ! आप हमारे संरक्षण के लिए हमें पीड़ित करने वाले दुष्टों को वज्रास्त्र से मार डालें । हे इन्द्रदेव ! आप हमारे निवेदन पर ध्यान दें । दुर्बुद्धि से ग्रस्त शत्रु आपके वज्रास्त्र के प्रहार से, खण्डित वस्तु के समान हमारे मार्ग से हट जायें । समस्त दुर्बुद्धियों का संसार से नाश हो॥७॥

सूक्त - १३२

हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपके संरक्षण में हम लोग प्रथम संग्राम में ही आक्रमणकारियों पर विजय प्राप्त करें । आप हिंसक वृत्ति के दुष्टों का संहार करें । इन समीपस्थ दिवसों में आप साधकों को प्रेरित करें । श्रेष्ठ कर्मों के लिए संघर्ष करने वाले हम याजकगण इस यज्ञ में आपका वरण करें । हम शक्ति सम्पन्न बनकर युद्ध नेतृत्व की योग्यता में कुशल हों॥१॥
सुख प्राप्ति हेतु किये जाने वाले संघर्षों, श्रेष्ठ मनुष्यों के उच्च लक्ष्यों, प्रभातवेला में जागने वालों के व्यवहारों तथा सत्कर्मों का निर्वाह करने वालों के नित्यकर्मों में बाधा डालने वाले आलस्य- प्रमादादि शत्रुओं को इन्द्रदेव ने ज्ञान की तीक्ष्ण धारा से समाप्त किया। इससे समस्त मनुष्यों में इन्द्रदेव प्रशंसनीय हुए। हे इन्द्रदेव ! आपके समस्त ऐश्वर्य हमें प्राप्त हों। आप जैसे मंगलकारी के सभी अनुदान हमारे लिए मंगलमय हों॥२॥
हे इन्द्रदेव !जिस यज्ञ में आपने प्रतिष्ठित स्थान बनाया है, वहाँ पूर्ववत् ही आपके निमित्त तेजस्वी अन्न उपलब्ध हों । सत्य की महिमा से सुशोभित उच्च स्थान पर पहुँचाने वाले आप उसी सत्यमार्ग को ही दिखायें । सूर्य-रश्मियों से सभी लोग दोनों लोकों के मध्य में स्थिर मेघरूप में आपके हीं दर्शन करते हैं । आप ही गौओं के प्रदाता होने के साथ सत्यधाम के ज्ञाता हैं तथा यजमानों के लिएगौओं को देने वाले हैं- ऐसा सुप्रसिद्ध हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! पहले के समान ही आपकी पराक्रम शक्ति प्रशंसनीय हो । जो आपने अंगिराओं को गौ समूह जीतकर दिया तथा उन्हें ले जाने का मार्ग दिखाया, वैसे ही आप हमारे लिए भी ऐश्वर्यों को जीतकर प्रदान करें । आप यज्ञविरोधियों तथा क्रोधयुक्त पापियों को यज्ञादि श्रेष्ठकर्म करने वालों के हित में विनष्ट करें॥४॥
जब बलशाली इन्द्रदेव ने पराक्रम युक्त कर्मों द्वारा मनुष्यों की तरफ निहारा, तब अन्न प्राप्ति के इच्छुक मनुष्यों ने युद्ध के प्रारम्भ होने पर शत्रुओं को विनष्ट किया। उस समय यशोभिलाषियों ने इन्द्रदेव की विशेष अर्चना की। आप अपनी सामर्थ्य-शक्ति से शत्रुओं को विनष्ट करके श्रेष्ठ सन्तान एवं दीर्घायुष्य प्रदान करें । श्रेष्ठ कर्मों के निर्वाहक मनुष्य इन्द्रदेव को ही अपना एकमात्र आश्रयदाता मानते हैं॥५॥
युद्ध क्षेत्र में आगे बढ़कर पराक्रम दिखाने वाले हे इन्द्रदेव और पर्वत ! आप दोनों युद्ध करने वाले प्रत्येक शत्रु को अपने तीक्ष्ण वज्र के प्रहार से यम लोक पहुँचायें । हे वीर ! शत्रुओं द्वारा चारों ओर से घिर जाने पर हमें उनसे मुक्त करायें । पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग तीनों लोकों में व्याप्त हे देव ! आपके अनुग्रह से हम सभी याजक श्रेष्ठ वीर पराक्रमी सन्तानों से युक्त होकर अपार धन-वैभव से लाभान्वित हों॥६॥

सूक्त - १३३

जो इन्द्रदेव यज्ञ की शक्ति से दोनों लोकों को पावन बनाते हैं। हम उन इन्द्रदेव के विरोधियों और अति भयंकर द्रोहियों का दहन करते हैं । जहाँ बड़ी संख्या में शत्रु मारे जाते हैं, वहाँ मृत शरीरों से युद्धभूमि श्मशान जैसी प्रतीत होती है॥१॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप हिंसक शत्रुओं के अति निकट जाकर (शीश पर पहुँचकर) अपनी विशाल सैन्य शक्ति से उन्हें पददलित करें॥२॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आप मृतक मनुष्यों के घृणित स्थान एवं घृणित श्मशानों के समान इस हिंसक सैन्य शक्ति को अपनी सामर्थ्य से विनष्ट करें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! जिन शत्रु सेनाओं के त्रिगुणित पचास अर्थात् डेढ़ सौ सैनिकों को चारों ओर से घेरकर युद्ध की चालों से विनष्ट किया । आपके वे पराक्रमी कार्य प्रशंसनीय हैं, भले ही आपके लिए उनकी कोई विशेष महत्ता न हो॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप क्रोधाग्नि से लाल हुए शस्त्रधारियों एवं विशालकाय पिशाचों को नष्ट करें। आप समस्त राक्षसी शक्तियों का संहार करें॥५॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप हमारे निवेदन पर भयंकर राक्षसों की सामर्थ्य को क्षीण करके उनका संहार करें । दिव्यलोक भी पृथ्वी पर हो रहे अत्याचारों से शोकातुर हो गया है । हे बज्रधारी इन्द्रदेव ! जिस प्रकार अग्नि द्वारा वस्तुएँ भस्म होती हैं, वैसे ही आपके भय से शत्रु दुःखी हैं। बलशाली सेना को सुदृढ़ शस्त्रबल से सुसज्जित करके आप शत्रुदल के समीप जाते हैं । हे अग्रगामी वीर ! आप अपने शूरवीरों को सुरक्षित करने हेतु तत्पर रहते हैं। हे शूरवीर इन्द्रदेव ! आप इक्कीस सेनाओं के साथ अर्थात् विशाल सैन्य शक्ति के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते हैं॥६॥
सोमरस निचोड़कर तैयार करने वाले यजमान सभी ओर फैले हुए दुष्टों और देवविरोधियों को दूर करते हैं । मुक्त इन्द्रदेव यजमानों को सहस्रों प्रकार के धन प्रदान करते हैं। वे उन्हें वैभव प्रदान करते हैं॥७॥

सूक्त - १३४

हे वायुदेव ! आपको शीघ्रगामी अश्व पहले के समान ही पुरोडाश- हविष्यान्न के लिए इस सोमयाग में पहुँचायें । हे वायो ! हमारी प्रार्थनाओं द्वारा अभिव्यक्त प्रिय वाणी आपके गुणों से परिचित है, वह आपके अनुरूप हो । आप अपने रथ से आहतियों को ग्रहण करने के लिए इस यज्ञ में पधारें॥१॥
हे वायो !आप हमारे द्वारा भली प्रकार से निष्पन्न हुए, उत्साहवर्धक, तेजस्विता युक्त तथा गोदुग्ध से मिश्रित सोमरस का आनन्द-पूर्वक पान करें । पुरुषार्थी मनुष्य संरक्षण की कामना से शक्ति-संचय के लिए श्रमरत रहते हैं। सभी विवेकशील मनुष्य सामूहिक प्रयास से संगठित होकर विवेक-सम्मत दान के लिए आपकी ही प्रार्थना करते हैं॥२॥
वायुदेव गमन करने के लिए, भारवहन में सक्षम लाल तथा अरुण रंग के दो बलिष्ठ अश्वों को अपने रथ के धुरे में जोतते हैं। हे वायुदेव ! जैसे प्रेमी पुरुष सोई हुई स्त्री को उठाते हैं, वैसे ही आप मनुष्यों को जगायें, द्यावा-पृथिवी को निश्चित रूप से प्रकाशमान करें तथा ऐश्वर्य के लिए देवी उषा को आलोकित करें॥३॥
हे वायुदेव ! पवित्र उषाएँ आपके लिए दूर स्थित, नवीन, दर्शन योग्य रश्मियों से अद्भुत कल्याणकारी वस्त्रों को बुनती हैं। अमृत रूपी दूध देने वाली गौएँ आपके लिए समस्त (दूधरूप) धनों को प्रदान करती हैं। इन्हीं अजन्मा हवाओं से नदियों (समुद्रों ) का जल ऊपर आकाश में जाता है । जाने के बाद बरसकर नदियों में पुन: आता है, अतएव जलवृष्टि के कारण के मूल में वायुदेव ही हैं॥४॥
हे वायुदेव ! उज्ज्वल, पवित्र, अति गतिशील, तीक्ष्णतायुक्त यह सोमरस, ऐश्वर्यप्रद यज्ञादि के अवसर पर आपके सहयोग का इच्छुक है। जलों की स्थापना तथा दूसरे स्थान में ले जाने में आपका ही विशेष सहयोग रहता है । हे वायुदेव ! निर्बल मनुष्य विपत्तियों के निवारण हेतु आपसे ही प्रार्थना करते हैं। क्योंकि आप ही निरन्तर प्राणवायु के संचार से सम्पूर्ण संसार को आसुरी शक्तियों से संरक्षण प्रदान करते हैं॥५॥
हे अतिश्रेष्ठ वायुदेव ! आप हमारे द्वारा अभिषुत सोमरस के सर्वप्रथम पान के लिए उपयुक्त हैं (अधिकारी हैं) । समस्त गौएँ जिस प्रकार दूध और घी आपके निमित्त प्रदान करती हैं, उसी प्रकार आप भी प्राणवायु प्रदान करें । आप निष्पाप तथा यज्ञादि सत्कर्म करने वाले मनुष्यों द्वारा प्रदत्त हवियों को ग्रहण करें॥६॥

सूक्त - १३५

हे वायुदेव ! आपके लिए ही हमारे द्वारा कुशासन (कुश का आसन) बिछाया गया है, आप सहस्रों अश्वों से युक्त रथ द्वारा हविष्यान्न ग्रहण करने के लिए यहाँ आयें । शक्तिरूपी सैकड़ों अश्वों से युक्त वायुदेव के लिए ऋत्विजोंं ने यह सोमरस तैयार किया है। अभिषुत मधुर सोमरस यज्ञ में आपके आनन्द के लिए प्रस्तुत है॥१॥
हे वायुदेव ! पत्थरों द्वारा कूटकर शोधित किया हुआ तथा वाञ्छित तेजस्विता को धारण किया हुआ सोमरस कलश में स्थित है। आप शुद्ध एवं कान्तिमान् सोम के हिस्से को सर्व प्रथम ग्रहण करते हैं। मनुष्यों द्वारा सर्व प्रथम देवरूप में आपका ही आवाहन किया जाता है । हे वायुदेव ! आप स्वयं ही अश्वों को प्रेरित कर हमारे पास आने की इच्छा करें॥२॥
हे वायुदेव ! आप हमारे यज्ञ में सैकड़ों और हजारों अश्वों सहित सोमरस पीने के लिए (हविष्यान्न ग्रहण करने के लिए) पधारें । आपके निमित्त ही ऋतु के अनुसार यह सोमरस तैयार किया गया है । यह सोमरस सूर्य रश्मियों के सम्पर्क से सूर्यदेव की तरह ही तेजस्विता को धारण किये हुए है । हे वायुदेव ! ऋत्विजोंं द्वारा यह सोमरस आपकी शक्ति को बढ़ाने के लिए कलशपात्रों में भरकर रखा गया है॥३॥
हे वायुदेव ! आप और इन्द्रदेव दोनों, घोड़ों से खींचे जा रहे रथ द्वारा, भलीप्रकार निष्पादित सोम रस रूपी हविष्यान्न को ग्रहण करने तथा हमारे संरक्षण के लिए यहाँ पधारें । यहाँ आकर हमारे द्वारा तैयार किये गये सोमरस का पान करें । हे वायुदेव ! आप इन्द्रदेव के साथ आनन्दप्रद ऐश्वर्य हमें प्रदान करें॥४॥
हे इन्द्रदेव और वायुदेव ! आप दोनों की बुद्धि सदैव यज्ञीय कर्मों के साथ रहे । जैसे गतिशील घोड़े को चालक स्वच्छ करते हैं। उसी प्रकार बलवर्धक इस सोमरस को आपके लिए हम तैयार करते हैं । हे इन्द्रदेव और वायुदेव ! आप दोनों संरक्षण साधनों के साथ यहाँ पधारकर सोमरसों का पान करें । पत्थरों द्वारा कूटकर अभिघुत, शक्ति प्रदायक सोमरसों को आप दोनों आनन्द प्राप्ति के लिए पिएँ॥५॥
(हे इन्द्रदेव और वायुदेव ऋत्विजोंं द्वारा अभिघुत यह सोमरस यज्ञों में आप दोनों को प्राप्त हो । हे वायुदेव ! दीप्तिमान् और प्रवाहित होने वाला यह सोमरस आपके लिए तिरछी धारा से पात्र में डाला जाता हैं, इस प्रकार का सोमरस आपको प्राप्त हो। अखण्डित रोम तंतुओं से छनकर सोमरस अति संरक्षक गुणों से सम्पन्न हो जाता है॥६॥
हे वायुदेव ! आप सोये हुए आलसी मनुष्यों को त्यागकर आगे चले जाते हैं। आप दोनों हमेशा वहीं जाते हैं, जहाँ सोम को पत्थरों द्वारा कूटने की ध्वनि होती है, जहाँ वेद-मन्त्रों की ध्वनि सुनाई देती है और घृताहुतियों द्वारा यज्ञ सम्पन्न किया जाता है। इन्द्रदेव और आप दोनों ही प्राणऊर्जा देने के लिए बलशाली घोड़ों के साथ उस यज्ञस्थल पर पहुँचे॥७॥
हे इन्द्रदेव और वायुदेव ! जो सोम पुरुषार्थी लोगों द्वारा पर्वतों से ओषधिरूप में प्राप्त किया जाता है, उस सोमरस को आप दोनों यहीं ले आयें । इस सोम ओषधि को पुरुषार्थी लोग प्राप्त करने में सफल हों । आपके लिए गौएँ अमृतरूपी दुध प्रदान करती हैं तथा ॐ आदि अन्न भी आपके लिए ही सोमरस में डालने के लिए पकाये जाते हैं । हे वायुदेव ! आपके लिए दुधारूगौएँ कभी कम न हों, किसी के द्वारा गौओं का अपहरण न हो॥८॥
हे श्रेष्ठ वायुदेव ! आपके ये बहुत शक्तिशाली युवा अश्व आपको द्युलोक और पृथ्वी के मध्य में सहज ही ले जाते हैं, जो मरुस्थलों में भी उतनी ही तेजगति से भागते हैं। उन अति वेगशील अश्वों का वाणों द्वारा वर्णन करना असम्भव है । जिस प्रकार सूर्य किरणों को कोई नियन्त्रित नहीं कर सकता, उसी तरह वायु की गति को हाथों द्वारा रोकना सर्वथा असम्भव है॥९॥


सूक्त - १३६

हे मनुष्यो ! वे दोनों मित्र और वरुणदेव अति तेजस्वी, घृताहुतियों का सेवन करने वाले तथा प्रत्येक यज्ञ में प्रार्थना के लिए उपयुक्त हैं। हम सभी श्रद्धा और भक्ति सहित मित्र वरुणदेव को प्रणाम करें तथा उत्तम बुद्धि से उनकी प्रार्थना करें । इनके क्षात्रबल और देवत्व को क्षीण नहीं किया जा सकता॥१॥
यज्ञ के लिए वेगवती उषादेवी प्रकाशित हुई हैं। रश्मियों से सूर्यमार्ग आलोकित हुआ हैं । ऐश्वर्यशाली सूर्यदेव की रश्मियों से आँखों में चमक आ गई है। मित्र, अर्यमा और वरुण देव सभी तेजस्विता सम्पन्न हुए हैं, अतएव सम्पूर्ण देवताओं के निमित्त आहुतियों के रूप में प्रशंसनीय हविष्यान्न अर्पित किया जाता है, जिसे वे स्वीकार करते हैं॥२॥
विशिष्ट धारण-क्षमता वाली पृथ्वी तथा दिव्य तेजस्विता युक्त अदिति देवी की सेवा में मित्र और वरुणदेव नित्य जाग्रत् रहकर प्रवृत्त होते हैं । धन के अधिपति आदित्यगण तेजस्वी शक्ति को नित्य ही प्राप्त करते हैं । मित्र, वरुण और अर्यमा तीनों देव मनुष्यों को श्रेष्ठ मार्ग में बढ़ाते हैं॥३॥
पेय पदार्थों में सबसे उत्कृष्ट तथा देवताओं में महावैभव सम्पन्न यह सोम, मित्र और वरुणदेव दोनों के लिए अति- आनन्दप्रद हो । सामञ्जस्य- युक्त सर्विचारों और सद्भावनाओं के प्रेरक समस्त देव समूह इस सोम का सेवन करें । हे तेजस्विता सम्पन्न मित्र और वरुणदेव ! आप श्रेष्ठ कर्मों के प्रेरक हों, हमारी अभीष्ट कामनाओं को निश्चय ही पूर्ण करें॥४॥
जो विद्वेष भावना से रहित होकर मित्र वरुण के प्रति सेवाभाव रखते हैं, जो अपने प्रशंसक कर्मों से दोनों को सुशोभित करते हैं; जो वाणी से उनके कर्मों की महिमा बढ़ाते हैं, उन्हें मित्र और वरुणदेव दुष्कर्म रूपी पापों से सुरक्षित करते हैं। जो दानशील सरल और सत्यमार्ग के अवलम्बी तथा श्रेष्ठ व्रतों के प्रति अनुशासित हैं; ऐसे सभी मनुष्यों को अर्यमादेव दु:खदायी पापकर्मों से बचाते हैं॥५॥
हुम द्यावा - पृथिवी, सुखप्रद मित्रदेव तथा अति सुखदायी वरुणदेव की वन्दना करते हैं । हे मनुष्यो ! आप इन्द्र, अग्नि, दीप्तिमान् अर्यमा तथा भगदेव की उपासना करें । जिससे इन सभी देवताओं की कृपा से हम सभी चिरंजीवी होकर सन्तानादि से युक्त हों और सभी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्थाओं से युक्त हों॥६॥
हम सभी देवताओं द्वारा प्रदत्त सुखों को प्राप्त करें तथा अपनी यशस्विता और बलों से सम्पन्न होकर देवकृपा से सुरक्षित हों । अग्नि, मित्र तथा वरुणदेव हमें सुखी करें; ऐसे महान् ऐश्वर्यों से युक्त होकर हम सदैव सुखोपभोग करें॥७॥

सूक्त - १३७

हे मित्र और वरुणदेव ! हम इस सोमरस को पत्थरों द्वारा कूटकर निचोड़ते (अभिषुत करते ) हैं । यह गो दुग्ध मिश्रित सोम निश्चित ही आनन्दप्रद है, अतएव आप दोनों हमारे यहाँ पधारें । अति दीप्तिमान् तथा दिव्यलोक को स्पर्श करने वाले आप दोनों हमारे पालन पोषण के निमित्त यहाँ आयें । हे मित्र और वरुण देव ! यह पवित्र सोमरस गो दुग्ध तथा जल में मिलाकर तैयार किया गया हैं, जो आपके लिए प्रस्तुत है॥१॥
हे मित्र और वरुणदेव ! आप दोनों, निचोड़कर तैयार किये गये दूध और दही में मिश्रित तेजस्वी सोमरस का पान करने के लिए यहाँ आयें । आपके लिए प्रभात वेला में सूर्य रश्मियों के प्रकाशित होने के साथ ही यह सोमरस अभिषुत किया गया है । मित्र और वरुण देवों के लिए (इस यज्ञ कर्म में) यह अभिषुत सोम प्रस्तुत है॥२॥
हे मित्र और वरुणदेव ! आपके लिए त्वग्गण उसी प्रकार पत्थरों से कूटकर सोम वल्लियों से रस निचोड़ते हैं, जिस प्रकार गौओं से दूध का दोहन किया जाता है । आप दोनों हमारे संरक्षण के लिए सोमपान हेतु यहाँ आयें । हे मित्रावरुणदेवो ! आप दोनों के पान करने के लिए ही याज्ञिकों द्वारा सोमरस अभिषुत किया गया है॥३॥

सूक्त - १३८

शक्ति के साथ उत्पन्न होने से पूषादेव की महिमा का सभी जगह गान होता है। इनकी सामर्थ्य को दबाना सम्भव नहीं तथा इनके प्रति स्तुतिगानों की कभी कमी नहीं रहती। जो देव यज्ञकर्ताओं के मनों में पारस्परिक सहयोग भावना जगाते हैं तथा जो तेजस्विता युक्त यज्ञों को सम्पन्न करते हैं ऐसे संरक्षण सामथ्र्यों से युक्त, सुख-प्रदायक पूषादेव से अभीष्ट सुखों की प्राप्ति के लिए हम अर्चना करते हैं॥१॥
हे पूषादेव ! जिस प्रकार मनुष्य तीव्र गतिशील अश्व को प्रशंसा द्वारा प्रोत्साहित करते हैं अथवा जिस प्रकार संग्राम की ओर प्रयाण करने वाले वीर को प्रोत्साहित करते हैं, उसी प्रकार हम स्तोत्रवाणियों द्वारा आपको प्रोत्साहित करते हैं। आप मरुस्थल से ऊँट द्वारा यात्रियों को पार उतारने के समान ही हिंसक शत्रुओं से हमें सुरक्षित करें। आप हमारी वाणी में प्रखरता लायें, सभी संघर्षों में हमें तेजस्विता युक्त करें । मैत्री भावना के लिए सुखकारी आप (पूषादेव) को ही हम सभी मनुष्य आवाहित करते हैं॥२॥
हे पूषादेव ! आपकी मैत्री भावना के ज्ञाता वीर पुरुष अपनी पुरुषार्थ क्षमता एवं आपके संरक्षण से सभी उपभोग्य पदार्थों को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार से सभी मनुष्य अपने पुरुषार्थ से ही उपभोग्य सामग्री को प्राप्त करने के लिए किसी की दया के पात्र नहीं बनते । उस श्रेष्ठ बुद्धि के अनुशासन के अधीन रहकर आपसे हम धन की कामना करते हैं । हे बहुसंख्यकों से स्तुत्य पूषादेव ! आप प्रत्येक संघर्षशील संग्राम में हमारा सहयोग करें॥३॥
हे पूषादेव ! आप हमें वैभव- सम्पन्न बनाने के लिए प्रेम भाव से दानदाता बनकर यहाँ पधारें । हे दर्शनयोग्य पूषादेव ! अन्न के इच्छुक आप हमारे पास आयें, हम श्रेष्ठ स्तवनों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। हे जल वर्षक पूषादेव ! हम आपके द्वारा अनादर से परे रहें, आपकी मैत्री से कभी वञ्चित न हों॥४॥

सूक्त - १३९

हमने अग्निदेव को बुद्धिपूर्वक धारण किया है। उस दिव्य प्रदीप्त ज्योति की हम आराधना करते हैं। नवीन याज्ञिक की यज्ञवेदी पर आकर, मनोरथ पूरे करने वाले इन्द्रदेव और वायुदेव की हम प्रार्थना करते हैं। हमारी स्तुति निश्चित ही देवताओं के पास पहुँचे । हमारी प्रार्थनाएँ देवों तक अवश्य पहुँचे॥१॥
हे मित्रावरुणो ! आप दोनों निज सामर्थ्य से सत्यवादिता द्वारा असत्यवादियों को अनुशासित करते हैं तथा अपनी शक्ति-सामर्थ्य से उनके ऊपर शासन करते हैं । अतएव आप दोनों की स्वर्णिम तेजस्विता को अपनी बुद्धि, मन, इन्द्रियशक्ति तथा ज्ञान सामर्थ्य के द्वारा हम प्रत्यक्ष देखते हैं॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! देवताओं के प्रति श्रद्धा भावना से युक्त मनुष्य स्तवनों द्वारा आप दोनों का यशोगान करते हैं । श्रद्धावान् याजक आप दोनों का आवाहन करते हैं। आप दोनों के सर्वज्ञ होने से, समस्त वैभव सम्पदाएँ और अन्न आप दोनों के ही आश्रित हैं। हे मनोहारी देवो ! सुन्दर स्वर्णिम रथ के चक्र आपको वहन करते हैं॥३॥
हे सुन्दर अश्विनीकुमारो ! आप दोनों सारथी रूप में स्वर्गस्थ मार्गों पर, तीव्र गतिशील अश्वों को रथ में नियोजित करके स्वर्ग पहुँचते हैं, ऐसा सभी का कथन है । हे उत्तम अश्विदेवो ! आप दोनों को हम भली प्रकार बन्धन युक्त स्वर्णिम रथ में विराजित करते हैं । आप दोनों अपनी सामर्थ्य से सम्पूर्ण लोकों पर शासन करते हुए जल पर नियन्त्रण रखकर निजमार्गों से प्रस्थान करते हैं॥४॥
हे पुरुषार्थयुक्त, वैभव सम्पन्न अश्विदेवो ! आप दोनों हमारे श्रेष्ठ कर्मों से प्रसन्न होकर हमें अनवरत (रात-दिन) धन प्रदान करें। आपके द्वारा प्रदत्त ऐश्वर्यों में कभी कमी न आये । हमारे सार्थक अनुदानों में भी कभी कमी न आये॥५॥
हे इन्द्रदेव ! यह पत्थर द्वारा कूटकर सामर्थ्य - शक्ति के निमित्त पानयोग्य सोमरस अभिषवण करके स्थापित है। यह स्थापित सोमरस आपके पीने के लिए शोधित किया गया है । सुन्दर महान् वैभव प्रदान करने के लिए यह (सोम) आपको उत्साहित करे। हे प्रशंसनीय इन्द्रदेव ! वाणी द्वारा की गई प्रार्थनाओं से आप यहाँ पधारें। प्रसन्नतापूर्वक आप हमारे यहाँ उपस्थित हों॥६॥
हे अग्निदेव ! हमारी प्रार्थनाओं से प्रसन्न होकर आप हमारे निवेदन पर ध्यान दें । अति पूजनीय देदीप्यमान देवों से कहें कि हे देवो ! आपने गौओं को अंगिराओं के लिए प्रदान किया, उन गौओं को इकट्ठा करते हुए अर्यमा ने उन्हें दुहा । ऐसी गौओं से अर्यमा और हम दोनों ही परिचित हैं॥७॥
हे मरुद्गणो ! पुरातनकाल की आपकी पराक्रमी सामथ्र्यों को हम कभी विस्मृत न करें । उसी प्रकार हमारी कीर्ति सदैव अक्षुण्ण रहे तथा हमारे नगरों का विध्वंस न हो। आश्चर्यप्रद, स्तुतियोग्य और अमृतरूपी रस प्रदान करने वाली गौओं से सम्बन्धित तथा मनुष्य मात्र के लिए जो धन सम्पदाएँ हैं, वे सभी युगों-युगों तक हमारे पास विद्यमान रहें । कठिनाई से प्राप्त होने योग्य जो सम्पदाएँ हैं, उन्हें भी आप हमें प्रदान करें॥८॥
पुरातन कालीन दध्यङ्, अंगिरा, प्रियमेध, कण्व, अत्रि और 'मनु' ये सभी ऋषि हम मनुष्यों के सभी जन्मों को जानते हैं। वे मननशील ज्ञानी हमारे पूर्वजों को जानते हैं। उन ऋषियों का देवताओं के साथ अति निकटस्थ सम्बन्ध हैं । साधारण मनुष्य देवों से ही शक्ति - ऊर्जा प्राप्त करते हैं। उन्हीं देवों के अनुगामी बनकर, हम हृदय से उन्हें प्रणाम करते हैं। स्तोत्रों से हम इन्द्राग्नी की प्रार्थना करते हैं॥९॥
यज्ञकर्ता यज्ञ द्वारा विभिन्न कामनाओं को पूर्ण करें। कल्याणकारी बृहस्पति, सामर्थ्यप्रद तथा विभिन्न लोगों द्वारा वांछित सोम से यज्ञ सम्पन्न करें । दूरस्थ दिशा से आ रहीं पत्थरों द्वारा सोमवल्ली कूटने की ध्वनि हम स्वयमेव सुनते हैं । सत्कर्म रूपी यज्ञीय कार्यों को करने वाले मनुष्य जल तथा अन्नादि से भरे - पूरे (सम्पन्न) रहते हैं । श्रद्धालु मन द्वारा याज्ञिक मनुष्य प्रचुर वैभव युक्त गृहों से सुशोभित रहते हैं॥१०॥
हे देवो ! आप पृथ्वी, अन्तरिक्ष और देवलोक इन तीनों लोकों में ग्यारह-ग्यारह की संख्या में हैं । हे देवगण ! आप सभी इन आहुतियों को ग्रहण करें॥११॥

सूक्त - १४०

हे ऋत्विजों ! यज्ञवेदी में विराजित सुन्दर प्रकाशवान्, श्रेष्ठ कान्तियुक्त अग्नि को और अधिक प्रखर-प्रज्वलित करने के लिए समिधाएँ और हविष्यान्न अर्पित करें। उस पावन रथ के समान प्रकाशमान, तेजस्वी, तथा अन्धकार के विनाशक अग्निदेव को अपने स्तोत्रोच्चारण द्वारा किसी वस्त्र से आच्छादित करने की तरह ढक दें॥१॥
दो विधियों (मंथन एवं अग्न्याधान) द्वारा प्रकट अग्निदेव तीन प्रकार के (आज्य, पुरोडाश तथा सोमरूप) अन्नों को प्राप्त (भक्षण) करते हैं। अग्नि द्वारा ग्रहण किया गया अन्न प्रति वर्ष पुनः बढ़ जाता है । वे (अग्निदेव) जठराग्नि के रूप में भक्षण करते हैं और दावानल के रूप में जंगल के वृक्षों को जला देते हैं॥२॥
अग्नि प्रज्वलन से काली हुई दोनों अरणिरूपी माताएँ कम्पित होती हैं, इसके बाद उस, गतिमान् , ज्वालाओं रूपीं जिह्वाओं से युक्त, अन्धकार नाशक, शीघ्र प्रज्वलनशील तथा साथ रहने योग्य, विशेष प्रयत्न द्वारा रक्षित तथा अपने पालनकर्ता याजकों की समृद्धि बढ़ाने वाले, शिशु रूप अग्नि को, (हम याजकगण) प्रकट करते हैं॥३॥
मोक्षप्रद, तीव्र गतिशील, कृष्ण मार्गगामी, नानाविध रंगों से युक्त, शीघ्रगामी, वायु द्वारा प्रभावित तथा सर्वत्र संव्याप्त होने वाले अग्निदेव गतिशील मनुष्यों के लिए यज्ञीय कार्यों में विशेष उपयोगी हैं॥४॥
जिस समय अग्निदेव गर्जन करते हुए श्वास लेते हुए, उच्च शब्दों से आकाश को गुंजित करते हुए तथा विस्तृत पृथ्वी को सभी दिशाओं से छुते हुए प्रज्वलित होते हैं, उस समय उनकी ज्योति- ज्वालाएँ अन्धेरे मार्ग को अपने प्रकाश द्वारा बिना किसी प्रयत्न के सभी ओर प्रकाशित करती हैं॥५॥
जो अग्निदेव पीतवर्ण वाली ओषधियों में मानो उनको सुशोभित करने के लिए प्रविष्ट होते हैं और बैल के समान शब्द करते हुए, आज्ञा पालन करने वाली पत्नीरूप ओषधियों - वनस्पतियों को भी खाने लगते हैं। अति तेजस्विता युक्त होने पर ज्वालारूपी अपने शरीर को चमकाते हैं। विकराल रूप धारण करके भयंकर बैल के समान ज्वाला रूपी सींगों को घुमाते हैं॥६॥
ये अग्निदेव कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष रूप से ओषधियों में अपनी सामर्थ्य को व्याप्त करते हैं। प्रकट रूप में अग्नि की अविच्छिन्न ज्वालाएँ सर्वोच्च दिव्यलोक की ओर बढ़ती हैं । पश्चात् वे ज्वालाएँ अपने पितारूप अग्नि सहित पृथ्वी और अन्तरिक्ष में (सूर्य, विद्युत् , अग्नि, वडवानल, दावानल आदि) विविध रूप धारण करती हैं॥७॥
केशों के समान लम्बी ज्वालाएँ उस अग्नि को सभी ओर से स्पर्श करती हैं। वे ज्वालाएँ मृतवत् होती हुई भी अग्नि से मिलने के लिए ऊर्ध्व मुख होकर ज्वलन्त हो उठती हैं। अग्निदेव उन ज्वालाओं की जीर्णता को समाप्त करके उन्हें सामर्थ्य और जीवन्त बनाते हुए गर्जन करते हैं॥८॥
धरती माता के तृण रूपी वस्त्रों को (वनस्पति आदि को) खाते हुए ये अग्निदेव विजयशील प्राणियों के साथ वेगपूर्वक जाते हैं। वे मनुष्य और पशुओं को अन्नरूपी शक्ति देते हैं । अग्निदेव हमेशा तृणादि को जलाते हुए जिस मार्ग से जाते हैं, उसे पीछे से काला कर देते हैं॥९॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे ऐश्वर्य सम्पन्न गृह को प्रकाशित करें । इसके बाद समर्थ शत्रुओं को पराजित करने वाले आप श्वास (प्राण वायु) द्वारा शैशव त्यागकर संग्राम में हमारे लिए रक्षा कवच के समान उपयोगी हों । बार-बार शत्रुओं को दूर भगाकर विशेष दीप्ति से प्रकाशित हों॥१०॥
हे अग्निदेव ! आपके प्रति हमारे द्वारा निवेदित स्तोत्र दूसरे सभी स्तोत्रों की अपेक्षा उत्तम हों । इन स्तोत्रों से आपकी तेजस्विता में वृद्धि हो, जिससे रत्लस्वरूप सुन्दर सम्पदा हम प्राप्त करें॥११॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे घर के परिजनों तथा महारथी दरों के लिए यज्ञीय सत्कर्म रूपी सुदृढ़ नाव प्रदान करें । जो नाव हमारे शूरवीरों, धनसम्पन्नों तथा अन्य मनुष्यों को भी संसार सागर से पार उतार सके । आप हमें श्रेष्ठ सुख सम्पदा भी प्रदान करें॥१२॥
हे अग्निदेव ! हमारे स्तोत्र आपकी भली प्रकार प्रशंसा करने वाले हैं। अन्तरिक्ष, पृथ्वी तथा स्वयं प्रवाहित सरिताये हमें गौओं द्वारा उत्पादित दुग्धादि और अन्नादि-पदार्थों को प्रदान करें। इसके अतिरिक्त अरुणवर्णा उषाएँ हमें श्रेष्ठ अन्न और बल सामर्थ्य से परिपूर्ण करें॥१३॥

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सूक्त - १४१

दिव्य अग्नि की उस रमणीय तेजस्विता को मनुष्य देह की सुदृढ़ता हेतु धारण करते हैं। क्योंकि वह तेजस्विता बल से उत्पादित हैं। इस विख्यात लोकोपयोगी अग्निदेव की तेजस्विता को हमारी विवेक बुद्धि प्राप्त करे। वह हमारे अभीष्ट उद्देश्यों को पूर्ण करे । सभी प्राणियों द्वारा अग्निदेव की ही प्रार्थनाएँ की जाती हैं॥१॥
(अग्निदेव के तीन रूप वर्णित हैं) प्रथम भौतिक अग्नि के रूप में अन्न को पकाने वाले और शरीर को पोषित करने वाले हैं। दूसरे सप्त लोकों के हितकारक मेघों में विद्युत् रूप में हैं। तीसरे बलशाली अग्निदेव सभी रसों का दोहन करने वाले सूर्य रूप में विद्यमान हैं। ऐसे दशों दिशाओं में श्रेष्ठ इन अग्निदेव को अँगुलियाँ मन्थन द्वारा उत्पन्न करती हैं॥२॥
जब ऋत्विज विशाल अरणियों के मूलस्थान के मन्थन द्वारा उसी प्रकार अग्नि प्रकट करते हैं, जिस प्रकार पहले भी सोमयज्ञ में आहुति देने के लिए अप्रकट इस अग्नि को विद्वान् मातरिश्वा ने मन्थन द्वारा प्रकट किया था। तब सभी के द्वारा उनकी स्तुति की जाती है॥३॥
सबके श्रेष्ठ पालक होने से अग्निदेव जब सभी ओर से प्रज्वलित होते हैं, तब समिधाओं के इच्छुक अग्निदेव के ज्वालारूपी दाँतों पर वृक्षादि अर्पित किये जाते हैं। जब दोनों अरणियाँ इस अग्नि को उत्पादित करने के लिए प्रयत्नशील होती हैं, तब पावन अग्निदेव प्रकट होकर तेजस्वी और बलशाली होते हैं॥४॥
अग्निदेव की सामर्थ्य प्रकट होकर मातृरूपा दसों दिशाओं में सर्वत्र संव्याप्त हो गई। वे उन सभी दिशाओं में विघ्नरहित होकर अति वृद्धि को प्राप्त हुए । चिरकाल से स्थायी ओषधियों तथा नई-नई प्रकट हो रही ओषधीय - गुणों से रहित वनस्पतियों में भी अग्नि के गुण संव्याप्त हो रहे हैं॥५॥
इसके बाद सभी याजकगणों ने यज्ञों में आहुतियाँ ग्रहण करने वाले अग्निदेव का वरण किया तथा वैभव सम्पन्न नरेश के समान ही उन्हें प्रसन्न किया। इससे आनन्दित होकर ये अग्निदेव शक्ति ऊर्जा से सम्पन्न हैं । श्रेष्ठ यज्ञों में ये अग्निदेव हवि सेवन करने के लिए देवों का आवाहन करते हैं॥६॥
जैसे अवरोध रहित, बहुभाषी, प्रशंसनीय उपहास युक्त वचनों से विदूषक सारे स्थान को हास्य से भर देता है, उसी प्रकार वायु द्वारा गतिमान् अग्निदेव सर्वत्र संव्याप्त हो जाते हैं। ऐसे अपनी ज्वलनशीलता से सब कुछ जलाने वाले, पावनस्वरूप में उत्पन्न, बहुमार्गगामी तथा जाने के बाद मार्ग में कालिमा छोड़ने वाले अग्निदेव के मार्ग का सभी लोक अनुगमन करते हैं॥७॥
कुशल कारीगरों द्वारा रचित और चालित रथ के समान ही ये अग्निदेव वेगशील ज्वालाओं से दिव्यलोक की ओर प्रस्थान करते हैं । जाने के साथ ही इनके वे गमन मार्ग कालिमायुक्त हो जाते हैं, क्योंकि वे काष्ठों को जलाने वाले हैं । वीरों से डर कर शत्रुओं के भागने के समान हीं, अग्नि की ज्वालाओं को देखकर पक्षीगण भाग जाते हैं॥८॥
हे अग्निदेव ! आपकी सामर्थ्य से ही वरुणदेव व्रतों का निर्वाह करते, सूर्यदेव अन्धेरे को दूर करते तथा अर्यमादेव श्रेष्ठ दान के व्रतों का पालन करते हैं । इसलिए हे अग्निदेव ! आप सभी ओर कर्तव्य परायणता द्वारा विश्वात्मारूप, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् रूप में प्रकट होते हैं । जैसे रथ का चक्र अरों को व्याप्त करके रखना है, उसी प्रकार आप भी सर्वत्र संव्याप्त होकर सबके नियमों का निर्धारण करते हैं॥९॥
हे अत्यन्त तरुण अग्निदेव ! आप स्तोता और सोम निष्पादनकर्ता यजमान के लिए ऐश्वर्यप्रद उत्तम धनों को प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं । शक्तिपुत्र, तरुण महिमामय और रत्नरूप हे अग्निदेव ! पूजा उपासना के समय हम आपकी भूपति के समान ही अर्चना करते हैं॥१०॥
हे अग्निदेव ! हमारे लिये गृहस्थ जीवन से सम्बन्धित एवं उपयोगी सम्पत्ति देने के साथ-साथ वैभवपूर्ण, अतिकुशल सहयोगी परिजनों (सन्तानादि) को भी प्रदान करें। आप अपने जन्म के कारण आकाश और भूलोक दोनों को रासों (घोड़ों की लगाम) की तरह ही अपने नियन्त्रण में रखते हैं। ऐसे श्रेष्ठ कर्मशील आप यज्ञ में उपस्थित ज्ञानियों द्वारा प्रशंसित हों॥११॥
तेजवान् वेगशील अश्वों से युक्त, देवावाहक, सुखदायी स्वर्णिम रथ से युक्त, अपराजेय शक्ति सम्पन्न तथा प्रसन्नता जैसे दैवीगुणों से विभूषित अग्निदेव क्या हमारी प्रार्थना पर ध्यान देंगे? वे सत्कर्मों की प्रेरणा द्वारा क्या हमें परम सौभाग्य प्रदान करेंगे ? अर्थात् अवश्य प्रदान करेंगे॥१२॥
साम्राज्य के लिए श्रेष्ठ तेजस्विता के धारणकर्ता अग्निदेव प्रभावकारी स्तोत्रवाणियों से सभी के द्वारा प्रशंसित होते हैं। जैसे सूर्यदेव मेघों में शब्द ध्वनि पैदा करते हैं, वैसे ही इन प्रत्विजों, हम यजमानों तथा अन्य वैभवशालियों द्वारा उच्चस्वरों से अग्निदेव की प्रार्थनाएँ की जाती हैं॥१३॥

सूक्त - १४२

हे अग्निदेव ! आप प्रज्वलित होकर विदाता यजमान के लिए देवताओं का आवाहन करें । सोम अभिषव कर्ता, दानी यजमान के लिए प्राचीन यज्ञ के सम्पादनार्थ अपनी ज्वालाओं को बढ़ायें॥१॥
शरीर के आरोग्य को बढ़ाने वाले हे अग्ने ! आपके प्रशंसक तथा दानदाता हम ब्रह्मनिष्ठ विद्वानों द्वारा किये जाने वाले माधुर्य से युक्त तथा तेजस्वी यज्ञ में आकर आप प्रतिष्ठित हों॥२॥
हे अग्निदेव ! आप देवताओं द्वारा पूजनीय, मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय, पवित्र रहकर दूसरों को भी पवित्र करने वाले, आश्चर्यप्रद और तेजस्वी हैं। आप दिव्य लोक के मधुर रस रूप यज्ञ को दिन में तीन बार सिंचित करें॥३॥
हे अग्निदेव ! आप प्रशंसित होकर विलक्षण कर्मों के निर्वाहक प्रिय इन्द्रदेव को हमारे इस यज्ञ में लेकर आयें । हे सुन्दर ज्वालारूपी जिह्वायुक्त अग्निदेव ! हमारी ये बुद्धियाँ, सदैव आपकी ही प्रार्थनाएँ करती हैं॥४॥
सुवा पात्र को धारण किये हुए ऋत्विग्गण श्रेष्ठ यज्ञ में कुश के आसनों को फैलाते हैं तथा देवों के आवाहक, विशाल यज्ञस्थल को इन्द्रदेव के लिए शोभायमान करते हैं॥५॥
महिमा युक्त, यज्ञ का विकास करने वाले, पवित्र, सबके प्रिय अलग-अलग स्थित दिव्य द्वार, देवत्व की प्राप्ति के लिए यहाँ स्थित हों (खुल जायें)॥६॥
मिलकर रहने वाली श्रेष्ठ स्वरूप युक्त, महिमामय, यज्ञकर्म को सिद्ध करने वाली पारस्परिक सहयोग की प्रतीक, रात्रि और उषा हमारे सम्बन्ध में श्रेष्ठ विचारधारा रखते हुए इस यज्ञ में आकर विराजमान हों॥७॥
वाणी के प्रयोक्ता, मेधावी, उच्चारण - विद्या में प्रवीण, दैवी गुणों से सम्पन्न यज्ञ संचालक (होता), वर्तमान विशिष्ट आध्यात्मिक उपलब्धियों द्वारा देवत्व पद को प्राप्त कराने वाले, हमारे देवयज्ञ में उपस्थित होकर यज्ञ सम्पन्न करायें॥८॥
देवताओं और मरुद्गणों में पूजनीय, पवित्र यज्ञीय कर्मों के निर्वाहक होता रूप भारती, सरस्वती और इळा इस यज्ञ में उपस्थित हों॥९॥
हमारे हितैषी निर्माता हे त्वष्टादेव ! आप हम सबके द्वारा इच्छिते, शीघ्र प्रवाहित होने वाले, अन्तरिक्षस्थ अद्भुत मेघों से जलवृष्टि द्वारा सबके लिए पौष्टिक अन्न और ऐश्वर्यों को प्रदान करें॥१०॥
हे वनों के अधिपते ! आप यज्ञीय कर्मों की प्रेरणा से युक्त होकर देवताओं के निमित्त अग्नि प्रज्वलित करें । ज्ञानवान् अग्निदेव को समर्पित आहुतियाँ सूक्ष्मरूप होकर देवताओं तक पहुँचती हैं॥११॥
हम पूघादेव और मरुद्गणों से युक्त सर्वदेव समूह के लिए, वायुदेव के लिए तथा गायत्री साधकों के संरक्षक इन्द्रदेव के लिए श्रेष्ठ हव्य समर्पित करें॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आप श्रद्धा भावना से समर्पित की गई- आहुतियों को ग्रहण करने के लिए यहाँ पधारें । यज्ञीय सत्कर्मों के लिए मनुष्य आपको आवाहित कर रहे हैं। उनके निवेदन को सुनकर उनके सहयोग हेतु अवश्य आयें ॥१३॥

सूक्त - १४३

शक्ति के पुत्र, जलों के संरक्षक, अग्निदेव सबके प्रिय तथा ऋतुओं को दृष्टिगत रखकर यज्ञीय कर्मों के सम्पादक हैं। वे ऐश्वर्यों सहित पृथ्वी के ऊपर यज्ञवेदी में प्रतिष्ठित होते हैं। ऐसे अग्निदेव के निमित्त हम नवीनतम श्रेष्ठ प्रार्थनाएँ अर्पित करते हैं॥१॥
वे तेजस्विता सम्पन्न अग्निदेव, मातरिश्वा वायु के लिए उच्च अन्तरिक्ष में सबसे पहले प्रादुर्भूत हुए । श्रेष्ठ विधि से प्रज्वलित होने वाले अग्निदेव की शक्ति सामर्थ्य से दिव्य लोक और भूलोक भी प्रकाशमान हुए॥२॥
इन अग्निदेव की प्रचण्ड तेजस्विता जीर्णता से रहित है । सुन्दर मुखवाली इनकी तेजस्वी किरणें सभी ओर संव्याप्त होकर प्रकाशित हैं । दीप्तिमान्, शक्ति सम्पन्न तथा रात्रि के अन्धकार को पार करते हुए इन अग्निदेव की ज्वालारूपी किरणें सदा जाग्रत् और क्षय रहित होकर कभी भयभीत नहीं होतीं॥३॥
जो अग्निदेव वरुणदेव के समान ही ऐश्वर्यों के एकमात्र अधिपति हैं, उन्हें भृगुवंशी अषयों ने अपनी सामर्थ्य से सम्पूर्ण विश्व के प्राणियों तथा पृथ्वी पर समस्त ऐश्वर्यों के लिए प्रतिष्ठित किया । ऐसे अग्निदेव को आप भी अपने गृह में ले जाकर श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से प्रज्वलित करें॥४॥
जो अग्निदेव मरुद्गणों की भीषण गर्जना की भाँति, आक्रमण को प्रेरित पराक्रमी सेना की भाँति तथा आकाश के वज्रास्त्र के समान ही अवरोध रहित हैं। वे अग्निदेव योद्धाओं के समान ही अपनी तीव्र ज्वालाओं रूपी तीखे दाँतों से शत्रुओं को विनष्ट करते हैं तथा वनों को भी उसी प्रकार भस्मीभूत कर देते हैं॥५॥
अग्निदेव हमारे स्तोत्र के प्रति विशेष कामना से प्रेरित होकर सबके आश्रयभूत धन द्वारा हमारी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करें । वे हमारे कल्याणार्थ श्रेष्ठ कर्मों की प्रेरणा बार-बार प्रदान करें । हम अपनी निर्मल भावनाओं से उत्तम ज्योति स्वरूप अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं॥६॥
हम आप के लिए यज्ञ सम्पादक और घृत द्वारा प्रज्वलित अग्निदेव को मित्र के समान प्रदीप्त करके सुशोभित करते हैं। वे अग्निदेव श्रेष्ठ प्रकाश युक्त दीप्तियों से सम्पन्न यज्ञों में प्रज्वलित किये जाने पर मनुष्यों की श्रेष्ठ भावनाओं में प्रखरता लाते हैं॥७॥
हे अग्निदेव ! आप निरन्तर आलस्य रहित, व्यवधान रहित, हितकारक तथा सुखदायी साधनों से हमें संरक्षण प्रदान करें । हे पूजनीय अग्निदेव ! आप अनिष्ट रहित होकर बिना किसी पीड़ा और आलस्य के हमारी सन्तानों को भी भली प्रकार सुरक्षा प्रदान करें॥८॥

सूक्त - १४४

विशेष ज्ञानवान् याज्ञिक अपनी उच्च निर्मल भावनाओं को धारण करते हुए इन अग्निदेव के निर्धारित व्रत अनुशासनों का ही अनुसरण करते हैं। पश्चात् ये याज्ञिक हवि प्रदान करने के लिए उपयोगी सुवा पात्र को हाथ में धारण करते हैं। जो सुवा को धारण करते हैं, वे हाथ सर्वप्रथम शोभा पाते हैं॥१॥
जलधाराएँ अग्नि के मूल स्थान दिव्य लोक को आच्छादित करके वहाँ आनन्दपूर्वक वास कर रहे अग्नि देव से वृष्टिरूप में धरती पर आने के लिए प्रार्थना करती हैं। ये अग्निदेव अपनी किरणों से जल वृष्टि करते हैं। उस अमृतरूपी जल का सभी लोग सेवन करते हैं। जलों के साथ अन्तरिक्ष से आने वाला अग्निरूप प्राण-पर्जन्य पहले वनस्पतियों में तत्पश्चात् सभी प्राणियों में समाविष्ट हो जाता है॥२॥
अग्नि को उत्पन्न करने के लिए भली प्रकार स्थापित एक ही समय में समान सामर्थ्य से युक्त दो अरणियाँ परस्पर घिसी जाती हैं। प्रज्वलित होने के बाद यजनीय अग्निदेव हमारे द्वारा प्रदत्त घृतधारा को सभी ओर से उसी प्रकार ग्रहण करते हैं, जिस प्रकार सारथी अश्वों को लगाम द्वारा नियन्त्रित करते हैं॥३॥
दो समान आयु वाले, एक ही घर में रहने वाले, समान कार्यों में संलग्न युग्म अग्निदेव की यज्ञीय कर्मों द्वारा अहर्निश अर्चना करते हैं। उनके द्वारा पूजित अग्निदेव बढ़ने पर भी (प्राचीन होते हुए भी) वृद्ध नहीं होते। वे अनेकों युगों से संचरित होकर भी कभी जीर्ण नहीं होते॥४॥
दसों अँगुलियों की आपसी भिन्नता होने पर भी वे सभी मिलकर प्रकाश देने वाली अग्नि को प्रकट करती हैं । हम सभी मनुष्य अपने संरक्षणार्थ अग्निदेव को आवाहित करते हैं । जिस प्रकार धनुष से बाण निकलता हैं, उसी प्रकार अग्निदेव प्रज्वलित होकर चारों ओर उपस्थित अपने प्रति स्तुतिगाताओं द्वारा निवेदित नूतन प्रार्थनाओं को धारण करते हैं॥५॥
हे अग्निदेव ! आप गौ आदि पशुपालकों के समान अपनी सामर्थ्य से दिव्यलोक और पृथ्वीलोक के अधिपति हैं। अतएवं व्यापक, ऐश्वर्य सम्पन्न, स्वर्णमय, मंगल शब्दमय, शुभ्रवर्णयुक्त ये दोनों, दिव्य लोक और भूलोक, आपके इस प्रख्यात यज्ञ में उपस्थित होते हैं॥६॥
प्रशंसा योग्य, अन्नों से समृद्ध यज्ञहेतु उत्पन्न श्रेष्ठ कर्मशील हे अग्निदेव ! जो आप समस्त जड़ और चेतनादि संसार के लिए अनुकूल दर्शन योग्य, पिता के समान पालक नेत्रों को शक्ति देने वाले तथा सबके आश्रय स्थान हैं । अतएव आप प्रसन्न होकर इन स्तोत्रवाणियों का बार-बार श्रवण करें॥७॥

सूक्त - १४५

हे मनुष्यो !आप सभी उन अग्निदेव से ही प्रश्न करें, क्योंकि वे ही सर्वत्र गमनशील, सर्वज्ञाता, ज्ञानवान्, निश्चय ही सर्वत्र व्यापक हैं । उन्हीं में प्रशासन की सामर्थ्य तथा सभी अभीष्ट पदार्थ विद्यमान हैं । वे अग्निदेव हीं अन्न, बल तथा शक्ति साधनों के स्वामी हैं॥१॥
ज्ञान सम्पन्न ही जिज्ञासा प्रकट करते हैं, क्योंकि सर्वसाधारण उनसे नहीं पूछ सकते । धैर्यवान् मनुष्य कार्य को निर्धारित अवधि से पहले ही सम्पन्न कर डालते हैं । वे किसी के कथन को अनावश्यक महत्त्व नहीं देते, अतएवं अहंकार से रहित मनुष्य ही अग्निदेव की सामर्थ्य को प्राप्त करते हैं॥२॥
घृत चमस द्वारा प्रदत्त सभी आहुतियाँ उन अग्निदेव को ही प्रदान की जाती हैं और प्रार्थनाएँ भी उन्हीं के निमित्त हैं। वे अकेले ही हमारी सम्पूर्ण स्तोत्र वाणियों का श्रवण करते हैं। ये अग्निदेव अनेकों के लिए प्रेरणाप्रद, दु:खों के निवारक, यज्ञसाधक, पवित्र संरक्षक तथा सामथ्र्यों से सम्पन्न हैं। अग्निदेव स्नेह युक्त होकर शिशु के समान ही आहुतियों को ग्रहण करते हैं॥३॥
जब ऋत्विग्गण अग्निदेव को प्रकट करने के लिए प्रयत्नशील होते हैं तब वे शीघ्र प्रदीप्त होकर सब ओर फैल जाते हैं । जब सर्वत्र संव्याप्त यज्ञाग्नि में आहुतियाँ दी जाती हैं, तब ये अग्निदेव उत्साही यजमानों को अभीष्ट फल प्रदान करके प्रोत्साहित करते हैं॥४॥
वनों में विचरणशील, अनुसंधान करने और उपलब्ध करने योग्य अग्निदेव, उत्तम समिधाओं के बीच स्थापित किये जाते हैं। मेधावी - यज्ञ के ज्ञान से सम्पन्न, सत्ययुक्त अग्निदेव वास्तव में ही मनुष्यों को यज्ञकर्म में प्रेरित करते हुए दिव्य ज्ञान का सन्देश देते हैं॥५॥

< h1 align="center">सूक्त - १४६

हे मनुष्यो ! आप सभी माता-पिता के समान पृथ्वी और दिव्यलोक के बीच गोद में विराजमान, तीन मस्तकों से युक्त (प्रातः- मध्याह्न और सायं ये तीन सवन ही अग्नि के तीन शीश हैं) सात छन्दरूप सात ज्वालाओं से युक्त (काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, उमा और प्रदीप्ता ये सात अग्नि की ज्वालाएँ हैं) सबको पूर्णता प्रदान करने वाले इन अग्निदेव की प्रार्थना करें । दिव्य लोक से संचरित होने वाला इनका दिव्य तेज़समूह सभी जड़ और चेतन सृष्टि में संव्याप्त हो रहा है॥१॥
महान् शौर्यवान् अग्निदेव इस द्युलोक और पृथ्वीलोक को सभी ओर से संव्याप्त करते हैं । सदा युवा रहने वाले पूजनीय अग्निदेव अपने संरक्षण साधनों से सम्पन्न होकर विराजमान हैं। भूमि के शीर्ष पर अपने पैरों को रखकर खड़े हुए इनकी प्रदीप्त ज्वालाएँ आकाश में सर्वत्र फैलती हैं॥२॥
एक ही अग्नि रूपी पुत्र को उत्पन्न करने वाली, मार्गों को प्रकाशित करके उन्हें जाने योग्य बनाती हुई, सभी प्रकार की ज्ञान सम्पदा को व्यापकरूप में धारण करती हुई, उत्तम दर्शन योग्य दो गौएँ (अग्नि सम्वर्धन करने वाली यजमान दम्पती रूप) चारों ओर विचरण कर रही हैं॥३॥
धैर्य युक्त एवं मेधावी मनुष्य, विभिन्न प्रकार के साधनों से भावनापूर्वक अग्नि की रक्षा करते हुए उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाते हैं। जब अग्नि की कामना करने वाले मनुष्यों ने समुद्र के जल को चारों ओर देखा, तब ऐसे मनुष्यों के लिए सूर्य प्रकाश रूप में प्रकट हुए॥४॥
सभी दिशाओं में संव्याप्त होने एवं सदा विजयी होने से ये अग्निदेव प्रशंसा योग्य हैं। ये छोटे और बड़े सभी प्राणियों को जीवनी - शक्ति देने वाले हैं। अत: विभिन्न सम्पदाओं के स्वामी और सबके प्रकाशक ये अग्निदेव बीजरूप में बोये गये (गर्भस्थ) पदार्थों के उत्पत्ति के मूल कारण हैं॥५॥

सूक्त - १४७

हे अग्निदेव ! यज्ञ द्वारा वायुमण्डल का शोधन करने वाली, सर्वत्र प्रकाश बिखेरने वाली आपकी ज्वालाएँ किस प्रकार पोषक अन्नों के द्वारा जीवन तत्व प्रदान करती हैं ?॥१॥
उत्तम तरुण रूप, वैभव सम्पन्न हे अग्निदेव ! आप हमारे महिमायुक्त बार-बार किये गये निवेदन को स्वीकार करें । कोई आपके निन्दक हैं तो कोई प्रशंसा करने वाले हैं, लेकिन हम स्तोता स्वभाव से युक्त आपकी प्रज्वलित ज्योति की वन्दना ही करते हैं॥२॥
हे अग्निदेव ! आपकी जिन प्रख्यात संरक्षक किरणों ने 'ममता' के पुत्र के अन्धेपन को दूर किया । ज्ञान से सम्पन्न लोकहित के कार्यों को करने वाले को आपने संरक्षण प्रदान किया, लेकिन अहंकारी दुष्कर्मी आपको प्रभावित न कर सके॥३॥
है अग्निदेव ! जो दुष्कर्मों में लिप्त पापीजन में सार्थक दान देने में बाधा पहुँचा रहे हैं, जो स्वयं भी यज्ञीय कर्मों में सहयोग नहीं करते तथा छलपूर्ण चालों से हमें भी परेशान करते हैं। उनकी वे छलरूपी समस्त योजनाएँ उनके स्वयं के ही विनाश का कारण बनें। दूसरों के लिए कटु वचन बोलने वालों के शरीर क्षीण हो जायें॥४॥
शक्ति के पुत्र हे अग्निदेव ! जो मनुष्य छल-कपटपूर्ण दुर्व्यवहार से हमें कष्ट पहुँचाना चाहते हैं, उनसे हम उपासकों को बचायें । हे स्तुत्य अग्निदेव ! हमें दुष्कर्मरूपी पापों की दु:खाग्नि में जलने से बचायें॥५॥

सूक्त - १४८

देवताओं के आवाहक, सर्वरूपवान्, देवताओं के निमित्त सभी यज्ञादि कर्मों में कुशल उन अग्निदेव को जब मातरिश्वा (अन्तरिक्ष में संचरित होने वाले) वायु ने सर्वव्यापक होकर मन्थन द्वारा उत्पन्न किया । तब सूर्यदेव की तरह विचित्र तेजस्विता सम्पन्न उन अग्निदेव को मनुष्यों के शरीरों में पोषण के लिए प्रतिष्ठित किया गया, उनकी हम प्रार्थना करते हैं॥१॥
अग्निदेव की स्तुति करने वाले हम याजकों को शत्रु पीड़ित नहीं कर सकते, क्योंकि अग्निदेव हमारे स्तोत्रों की मंगल कामना से प्रेरित हैं । हम स्तोताओं की प्रार्थनाओं को तथा समस्त सत्कर्मों को सम्पूर्ण देवशक्तियाँ ग्रहण करती हैं॥२॥
जिन अग्निदेव को याजकगण प्रतिदिन यज्ञ गृह में शीघ्रतापूर्वक स्तुतियों सहित प्रतिष्ठित करते हैं, उन्हें याजकगण यज्ञार्थ, तीव्रगामी रथ के घोड़ों की तरह विकसित करते हैं॥३॥
अग्निदेव ज्वालारूपी दाँतों से वृक्षों को प्राय: विनष्ट कर देते हैं । वे जंगल में सभी ओर प्रकाश बिखेरते हैं । इस अग्नि की ज्वाला इसके समीप से वायु की अनुकूलता पाकर छोड़े गये बाण की तरह वेग से आगे बढ़ती है॥४॥
गर्भ में स्थित अग्निदेव को शत्रु पीड़ित नहीं कर सकते । अज्ञानी दृष्टि विहीन एवं ज्ञान का दम्भ भरने वाले भी जिसकी महिमा को कम नहीं कर सके। उन अग्निदेव को नित्य यज्ञकर्म द्वारा संतुष्ट करने वाले मनुष्य सुरक्षित रखते हैं॥५॥

सूक्त - १४९

जब वे अग्निदेव धन-सम्पदा प्रदान करने के लिए हमारे यज्ञों में आगमन करते हैं, तब पत्थरों द्वारा कूटकर अभिषुत सोमरस से उनका अभिनन्दन किया जाता है॥१॥
शक्तिशाली पुरुष की तरह अग्निदेव द्युलोक और भूलोक में यश सहित रहते हैं। वे प्राणियों के लिए उपयुक्त सृष्टि की रचना करते हैं। वे ही प्रदीप्त होकर यज्ञवेदी में स्थापित होते हैं॥२॥
जो अग्निदेव यजमानों द्वारा निर्मित यज्ञ वेदियों को प्रदीप्त करते हैं, जो द्रुतगामी घोड़े और वायु के सदृश गति वाले तथा दूर द्रष्टा हैं, वे अनेक रूपों में (विद्युत्, प्रकाश, ऊर्जा आदि) सुशोभित अग्निदेव सूर्यदेव के संदृश तेजोमय हैं॥३॥
ये अग्निदेव द्विजन्मा (दो अरणियों अथवा मंथन एवं अग्न्याधान से स्थापित) हैं, त्रिरोचन (सूर्य, विद्युत् एवं लौकिक अग्निरूप में) सारे विश्व को प्रकाशित करने वाले हैं। ये होता अग्निदेव जलों के बीच भी विद्यमान हैं॥४॥
दो अरणियों से उत्पन्न हुए अग्निदेव देवों का आवाहन करने (बुलाने) वाले, सब श्रेष्ठ धनों और यशस्वी कर्मों के धारक हैं। वे अग्निदेव अपने याजकों को उत्तम सम्पत्ति प्रदान करने वाले हैं॥५॥

सूक्त - १५०

महान् सम्पत्तिशाली की शरण में आये हुए (धन याचक) सेवक के सदृश, हम अग्निदेव के निमित्त आहुति प्रदान करते हुए स्तुतिगान करते हैं॥१॥
है अग्निदेवे ! जो श्रद्धाहीन हैं, धन सम्पन्न होते हुए भी कृपण हैं तथा देवताओं के अनुशासन को नहीं मानते ; ऐसे स्वेच्छाचारी नास्तिकों को आप अपनी कृपादृष्टि से वञ्चित करें॥२॥
हे ज्ञान सम्पन्न अग्निदेव ! जो मनुष्य आपकी शरण में आते हैं, वे आपकी तेजस्विता से दिव्य लोक के चन्द्रमा के समान सबके लिए सुखदायक होते हैं। वे सबसे अधिक महानता युक्त होते हैं । अतएव हम सदैव आपके प्रति श्रद्धा भावना से ओतप्रोत रहें॥३॥


सूक्त - १५१

पूजनीय एवं प्रीतियुक्त जिन अग्निदेव को मानव मात्र की रक्षा के लिए गौ ( पोषक किरणों) की कामना से प्रेरित श्रेष्ठ ज्ञानियों ने, मित्र के समान अपने श्रेष्ठ यज्ञीय सत्कर्मों में प्रकट किया। उनकी ध्वनि और तेजोमयी शक्ति से दिव्य लोक और पृथ्वी लोक कम्पायमान होते हैं॥१॥
हे सामर्थ्यवान् मित्र और वरुण देवो ! आप दोनों के लिए मित्र के समान हितैषी ऋत्विग्गणों ने अपनी सामर्थ्य से सत्तावान् तथा विभिन्न सुखों के दाता सोमरस को अर्पित किया है । अतएव आप दोनों स्तोता के गुण, कर्म, स्वभाव को समझें तथा सद्गृहस्थ यजमान की प्रार्थना पर भी ध्यान दें॥२॥
हे शक्ति सम्पन्न मित्र और वरुण देवो ! पृथ्वीवासी महान् दक्षता की प्राप्ति के लिए द्यावा-पृथ्वी से उत्पन्न आप दोनों की प्रशंसा करते हैं और स्तोत्रों से अलंकृत करते हैं। क्योंकि आप दोनों सच्चे साधक तथा दैवी नियमों के पालक को सामर्थ्य प्रदान करते हैं। आप आमन्त्रित करने पर तथा सत्कर्मों से आकर्षित होकर यज्ञ में उपस्थित होते हैं॥३॥
हे बलशाली मित्रावरुण ! जो (यज्ञ भूमि) आप दोनों को विशेष प्रिय है, उस भूमि का व्यापक विस्तार हो । हे यज्ञीय कर्मों के पालनकर्ता देवों ! आप दोनों निर्भीकतापूर्वक महान् सत्यज्ञान का उद्घोष करें । महान् दैवी गुणों के संवर्धनार्थ आप दोनों सामर्थ्ययुक्त तथा कल्याणकारी कर्मों में उसी प्रकार संलग्न हों जिस प्रकार बैल हल के जुए में संलग्न होते हैं॥४॥
हे मित्र और वरुण देवो ! आप दोनों विस्तृत पृथ्वी पर अपनी प्रभाव क्षमता से धारण करने योग्य श्रेष्ठ धनों को प्रदान करते हैं तथा पवित्र गौएँ (किरणे) देते हैं। उषा काल में ये गौएँ, आकाश मण्डल पर बादलों के छा जाने पर सूर्यदेव के लिए रम्भाती हैं, जैसे मनुष्य चोर को देखकर सावधानी के लिए चिल्लाते हैं॥५॥
हे मित्र और वरुण देवो ! जहाँ आपकी प्रार्थनाएँ गाई जाती हैं, उस प्रदेश में अग्नि की ज्वालायें यज्ञीयकार्य के लिए आप दोनों का सहयोग करती हैं। आप हमारी बौद्धिक क्षमता को पुष्ट करके सामर्थ्य- शक्ति प्रदान करें । आप दोनों ही ज्ञानसम्पन्न विद्वानों के अधिपति हैं॥६॥
हे मित्र और वरुण देवो ! जो विद्वान् याजक प्रार्थनाएँ करते हुए आप दोनों को आहुतियाँ प्रदान करते हैं, उन मनुष्यों के समीप जाकर आप यज्ञीय कर्मों की अभिलाषा करते हैं । अतएव आप दोनों हमारी ओर उन्मुख होकर हमारे स्तोत्रों और श्रेष्ठ भावनाओं को स्वीकार करें॥७॥
हे सत्य सम्पन्न मित्रावरुण देव ! इन्द्रियों में मन जिस प्रकार सर्वोत्तम है, उसी प्रकार देवताओं में सर्वोत्तम आप दोनों को याजकगण दुग्ध, घृतादि की आहुतियों द्वारा सन्तुष्ट करते हैं। उन्हें ऐश्वर्य सम्पदा प्रदान करते हैं॥८॥
हे नेतृत्व सम्पन्न मित्र और वरुण देवो ! आप दोनों अपनी शक्तियों से सुरक्षित करते हुए हमें वैभव पूर्ण उपयोगी सम्पदाएँ प्रदान करते हैं। आप दोनों की दैवी क्षमताओं और सम्पदाओं को दिव्य लोक, अहोरात्र, नदियाँ तथा 'पणि' नामक असुरगण भी उपलब्ध नहीं कर सके॥९॥

सूक्त - १५२

हे मित्र-वरुणदेवो ! आप दोनों परिपुष्ट होकर तेजस्वी वस्त्रों को धारण करते हैं। आप के द्वारा रचित सभी वस्तुएँ दोषरहित और विचारणीय हैं । आप दोनों असत्यों का निवारण कर मनुष्यों को सत्यमार्ग से जोड़ देते हैं॥१॥
मित्र और वरुण देवों में से कोई एक देव भी विशेष ज्ञानवान्, सत्य के प्रति सुदृढ़, क्रान्तदर्शियों द्वारा स्तुत्य और सामर्थ्य सम्पन्न हैं। द्रष्टा-अंध इससे भली प्रकार परिचित हैं । वह पराक्रमी वीर त्रिधारा और चतुर्धारा युक्त शस्त्रों को विनष्ट कर देते हैं । दैवीं अनुशासनों की अवहेलना करने वाले प्रारम्भ में सामर्थ्यशाली प्रतीत होते हुए भी अन्ततोगत्वा अपनी प्रभाव क्षमता खोकर विनाश को प्राप्त होते हैं॥२॥
हे मित्र और वरुणदेव ! (दिन और रात्रिरूप आप दोनों की सामर्थ्य से) बिना पैरवाली उषा; पैरवाले प्राणियों से पहले पहुँच जाती हैं । (आप दोनों के गर्भ से उत्पन्न होकर शिशु सूर्य, संसार के पालन पोषण रूपी दायित्व का निर्वाह करते हैं। यही सूर्यदेव असत्यरूप अन्धकार को दूर करके सत्यरूप आलोक को फैलाते हैं॥३॥
सूर्यदेव सर्वत्र व्यापक, तेजस्वी प्रकाश को धारण करके, पत्नीरूप उषाओं की कान्ति को धूमिल करते हुए, मित्र और वरुण देवों के प्रिय धाम की ओर सदैव गतिशील होते हुए दिखाई देते हैं वे कभी भी विराम नहीं लेते॥४॥
अश्व और लगाम आदि साधनों से रहित होकर भी ये सूर्यदेव गतिमान होते हैं। वे अपने उदित होने के साथ शब्द करते हुए सभी ऊँचे शिखरों पर रश्मियाँ बिखेरते हैं। मित्र और वरुण देवों की तेजस्विता का गुणगान करते हुए युवा साधक सूर्यदेव की विशेष रूप से स्तुति करते हैं॥५॥
रक्षक गौएँ (गायें, वाणी, किरणे) अपने स्रोतों से ममतायुक्त उपासकों को पोषण प्रदान करें । सद्ज्ञान के ज्ञाता आप (मित्रावरुण) से उचित पोषण (आहार एवं विचार) माँगें । आपकी उपासना से साधक मृत्यु को जीत लें॥६॥
हे दीप्तिमान् मित्रावरुण देव ! हमारे द्वारा विनम्रतापूर्वक गाये गये स्तोत्रों को सुनकर आप दोनों यहाँ पधारें, आहुतियों को ग्रहण करके आप हमें संग्रामों में विजयी बनायें तथा दिव्य वृष्टि द्वारा हमें अकाल और दुःख-दारिद्रय से विमुक्त करें॥७॥

सूक्त - १५३

परस्पर प्रीतियुक्त, विशेष तेजस्वी, हे मित्र और वरुण देवो ! आपके प्रति हमारे ऋत्विज् स्तोत्रों का गान करते हैं। हम यजमान भी महानतायुक्त आप दोनों के प्रति हव्य सहित नमन करते हैं॥१॥
हे मित्र-वरुणदेवो ! वाक्पटु हम आप दोनों की प्रार्थना करते हैं । घर (के आवश्यक सामान) की तरह आपका ध्यान करते हैं। ज्ञानी याजक आप दोनों की स्तुति करते हैं। वे आप से आनन्द की कामना करते हैं॥२॥
जब हवि को प्रदान करने वाले मननशील होता आपकी अर्चना करते हुए यज्ञ में आहुतियाँ देते हैं, तब हे मित्र और वरुण देवो ! सत्य मार्ग पर सुदृढ़ रहने वाले तथा हविष्य प्रदान करने वाले साधकों को गौएँ (आपकी पोषक किरणे) हर प्रकार के सुख प्रदान करती हैं॥३॥
हे मित्र और वरुण देवो ! आप दोनों अन्नों, दुधारू गौओं और जलों से सभी मनुष्यों को आनन्दित करते हुए संतुष्ट करें । हमारे यज्ञ के पूर्व अधिष्ठाता अग्निदेव हमें वैभव सम्पदा प्रदान करें, पश्चात् सभी याजकगण ऐश्वर्यशाली होकर घृत की आहुतियाँ प्रदान करें॥४॥

सूक्त - १५४

जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा धुलोक को बनाने वाले हैं, जो देवताओं के निवास स्थान द्युलोक को स्थिर कर देते हैं, जो तीन पगों से तीनों लोकों में विचरण करने वाले हैं (अथवा मापने वाले हैं), उन विष्णुदेव के वीरतापूर्ण कार्यों का कहाँ तक वर्णन करें ?॥१॥
विष्णुदेव के तीन पादों (पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक) में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अवस्थित है । अतएव भयंकर, हिंस्र और गिरि-कन्दराओं में रहने वाले पराक्रमी पशुओं की तरह सारा संसार उन विष्णुदेव के पराक्रम की प्रशंसा करता है॥२॥
अकेले ही जिन (विष्णु) देव ने मात्र तीन कदमों से इस अतिव्यापक दिव्यलोक को माप लिया, उन मेघों में स्थित, अत्यन्त प्रशंसनीय, जल वृष्टि में सहायक, सूर्यरूप विष्णुदेव के लिए प्रखर-भावना से उच्चारित हमारा स्तोत्र समर्पित है॥३॥
जिन विष्णुदेव के तीन अमृत चरण अपनी धारण क्षमता से तीन धातुओं (सत्, रज, तम) से पृथ्वी एवं द्युलोक को आनन्दित करते हैं, वे (विष्णुदेव) अकेले ही सारे भुवनों-लोकों के एकाकी आधार हैं॥४॥
देवों के उपासक मनुष्य जहाँ पहुँचकर विशेष रूप से आनन्द की अनुभूति करते हैं, विष्णुदेव के उस प्रियधाम को हम भी प्राप्त करें । विष्णुदेव, महापराक्रमी, वीर इन्द्र के बन्धु हैं। विष्णुदेव के उस उत्तम धाम में अमृत जल धारा सदा ही प्रवाहित रहती है॥५॥
हे इन्द्र और वरुण देव ! आप दोनों से हम (यजमान दम्पती) अपने निवास के लिए ऐसा आश्रय स्थल (गृह) चाहते हैं, जहाँ अतितीक्ष्ण स्वास्थ्यप्रद सूर्य रश्मियाँ प्रवेश कर सकें (अथवा जहाँ सुन्दर सींगों वाली दुधारू गायें विद्यमान हों ।) इन्हीं श्रेष्ठ गृहों में अनेकों के उपास्य, सामर्थ्य सम्पन्न विष्णुदेव के उत्तम धामों की विशिष्ट विभूतियाँ स्वप्रकाशित होती है (अर्थात् वहाँ देव अनुग्रह अनवरत बरसता रहता हैं)॥६॥

सूक्त - १५५

अपराजेय तथा महिमायुक्त जो इन्द्र और विष्णुदेव श्रेष्ठ अश्वों के समान पर्वतों के शिखरों पर रहते हैं; सद्बुद्धि की ओर प्रेरित करने वाले उन महान् इन्द्र और विष्णुदेव के लिए सोम रस रूपी श्रेष्ठ हविष्यान्न समर्पित करें॥१॥
हे इन्द्र और विष्णुदेव ! आप दोनों रिपुओं का सर्वनाश करने वाले अग्नि की प्रखर- तेजस्वी ज्वालाओं का अधिकाधिक विस्तार करते हैं। आप दोनों की सभी ओर विस्तृत सामर्थ्यवान् तेजस्विता को, सोमयाग करने वाले मनुष्य और अधिक विस्तृत करते हैं॥२॥
वे प्रार्थनाएँ सूर्यरूप विष्णुदेव की महिमायुक्त सामर्थ्य को विशेष रूप से बढ़ाती हैं । विष्णुदेव अपनी उस क्षमता को उत्पादकता एवं उपयोग के लिए, द्यावा और पृथ्वीरूपी दो माताओं के बीच प्रतिष्ठित करते हैं। जिस प्रकार एक पुत्र अपने पिता के तीनों प्रकार के गुणों को धारण करता है, उसी प्रकार विष्णुदेव अपने सभी प्रकार के गुणों को द्युलोक में स्थापित करते हैं॥३॥
जिन सूर्यरूप विष्णुदेव ने अपने मार्ग का विस्तार करने तथा जीवनीशक्ति (प्राण-ऊर्जा) संचरित करने के लिए सभी विस्तृत लोकों को मात्र तीन पगों से नाप लिया; ऐसे संरक्षक, शत्रुरहित (अजातशत्र), सुखकारक तथा सभी पदार्थों के स्वामी विष्णुदेव के उन सभी पराक्रम-पूर्ण कार्यों की सभी प्रशंसा करते हैं॥४॥
मनुष्य के लिए तेजस्वितायुक्त, विष्णुदेव के (पृथ्वीं और अन्तरिक्ष रूपी) दो पगों का परिचय पाना सम्भव हैं, लेकिन (द्युलोक रूपी) तीसरे पग को किसी के भी द्वारा जानना असम्भव हैं । सुदृढ़ पंखों से युक्त पक्षी भी उसे नहीं जान सकते॥५॥
सूर्य रूप विष्णु देव चार सहित नब्बे अर्थात् चौरानवे काल गणना के अवयवों को अपनी प्रेरणा शक्ति से चक्राकार (गोल चक्र के समान) रूप में घुमाते हैं। विशाल स्वरूप धारी, सदा युवा रूप, कभी क्षीण न होने वाले, सूर्यरूप विष्णुदेव काल की गति को प्रेरित करते हुए ऋचाओं द्वारा आवाहन किये जाने पर यज्ञ की ओर आ रहे है (अर्थात् सृष्टि क्रम के विराट यज्ञ को सम्पन्न कर रहे हैं )॥६॥

सूक्त - १५६

हे विष्णुदेव ! आप जल के उत्पादनकर्ता, अति देदीप्यमान, सर्वत्र गतिशील, अतिव्यापक तथा मित्र के सदृश ही हितकारी सुखों के प्रदाता हैं । हे विष्णुदेव ! इसके पश्चात् मनुष्यों द्वारा हविष्यान्न समर्पित करते हुए सम्पन्न किया गया यज्ञ स्तुति योग्य है । ज्ञान सम्पन्न मनुष्यों द्वारा आपके प्रति कहे गये स्तोत्र सराहनीय हैं॥१॥
जो अनन्तकाल से ज्ञानरूप एवं सदा नवीन दीखते हैं तथा जो सद्बुद्धि के प्रेरक हैं, उन विष्णुदेव के लिए हविष्यान्न अर्पित करने वाले मनुष्य कीर्तिमान् होकर श्रेष्ठ पद को प्राप्त करते हैं॥२॥
हे स्तोताओ ! यज्ञ के नाभिरूप, चिरपुरातन उन विष्णुदेव से सम्बन्धित जिस भी ज्ञान से आप परिचित हों, उसी के अनुसार स्तुतियों द्वारा उन्हें तुष्ट करें। इनके तेजस्वी पराक्रम से सम्बन्धित जानकारी के अनुरूप आप इनका वर्णन करें । हे सर्वत्र व्यापक देव ! हम आपकी श्रेष्ठ प्रेरणाओं के अनुगामी बनें॥३॥
सर्वज्ञ विष्णुदेव के साथ तेजस्विता सम्पन्न वरुण और अश्विनीकुमार देवता भी कर्मरत रहते हैं। मित्रों से युक्त सूर्यरूप विष्णुदेव अपनी श्रेष्ठ सामर्थ्य से दिवस को प्रकट करते हैं, (प्रकाश के अवरोधक) आवरण को छिन्न-भिन्न कर देते हैं॥४॥
दिव्यलोक में निवास करने वाले, श्रेष्ठ कर्मों को सम्पन्न करने वालों में सर्वोत्तम विष्णुदेव, श्रेष्ठ कर्मशील इन्द्रदेव का सहयोग करते हैं। तीनों लोकों में व्याप्त ये विष्णुदेव श्रेष्ठ पुरुषों को तुष्ट करते हैं, यज्ञकर्ता के पास स्वत: पहुँच जाते हैं॥५॥

सूक्त - १५७

भूमि पर अग्निदेव चैतन्य हुए; सूर्यदेव उदित हो गये हैं। महान् उषादेवी अपने तेज से लोगों को हर्षित करती हुई आ गयी हैं। अश्विनीकुमारों ने यात्रा के लिए अपने अश्वों को रथ में जोड़ लिया है । सूर्यदेव ने सब प्राणियों को अपने पृथक्-पृथक् कर्मों में प्रवृत्त कर दिया है॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप अपने श्रेष्ठ रथ को जोड़कर (यज्ञ में पहुँचकर) हमारे क्षात्रबल (पौरुष) को घृत (तेज) से पुष्ट करें। हमारी प्रजाओं में ज्ञान की वृद्धि करें । हम युद्ध में शत्रुओं को पराजित करके धन प्राप्त करने में समर्थ हो सकें॥२॥
हे अश्विनीकुमारों ! आप रथ पर विराजित होकर यहाँ पधारें । तीन पहियों वाला और मधुर, अमृततुल्य, पोषक तत्वों को धारण करने वाला, शीघ्रगामी अश्वों से जुता हुआ, प्रशंसनीय, बैठने के तीन स्थानों वाला, समस्त ऐश्वर्य और सौभाग्य से भरा हुआ आपका रथ मनुष्यों और पशुओं के लिए सुखदायी हो॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों प्रचुर अन्न प्रदान करें । हमें मधु से परिपूर्ण पात्र प्रदान करें । हमें दीर्घायुष्य प्रदान करें। हमारे सभी विकारों को दूर करके तथा द्वेष भावना को मिटाकर सदैव हमारे सहायक बनें॥४॥
हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो ! आप दोनों गौओं में (अथवा सम्पूर्ण विश्व में) गर्भ (उत्पादक क्षमता) स्थापित करने में सक्षम हैं। अग्नि, जल और वनस्पतियों को (प्राणि मात्र के कल्याण के लिए आप ही प्रेरित करते हैं॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों श्रेष्ठ ओषधियों से युक्त उत्तम वैद्य हैं। उत्तम रथ से युक्त श्रेष्ठ रथी हैं । हे पराक्रमी अश्विनीकुमारो ! जो आपके प्रति श्रद्धा भावना से हविष्यान्न अर्पित करते हैं, उन्हें आप दोनों क्षात्र धर्म के निर्वाह के लिए उपयुक्त शौर्य प्रदान करते हैं॥६॥

सूक्त - १५८

हे सामर्थ्यवान् , शत्रुनाशक, सबके आश्रयरूप, दुष्टों के लिए रौद्ररूप, ज्ञानवान् , समृद्धिशाली अश्विनीकुमारो ! आप हमें अभीष्ट अनुदान प्रदान करें। उचथ्य के पुत्र दीर्घतमा के द्वारा धन सम्पदा प्राप्ति के लिए प्रार्थना किये जाने पर आप दोनों श्रेष्ठ संरक्षण सामथ्र्यों के साथ शीघ्रतापूर्वक पहुँचते हैं॥१॥
सबको आश्रय देने वाले हे अश्विनीकुमारो ! इस पृथ्वी पर जो भी आप की वन्दना करते हैं, आप दोनों उन्हें अनुदान प्रदान करते हैं । आपकी श्रेष्ठ बुद्धि की तुष्टि के लिए कौन क्या भेट दे सकता है ? हे सर्वत्र विचरणशील ! आप हमें धनों के साथ पोषक दुधारू गौएँ भी प्रदान करें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! राजा तुम के पुत्र भुज्यु के संरक्षण के लिए आपने अपने गतिशील यान को सागर के बीच में ही अपनी सामर्थ्य से स्थिर किया। वीर पुरुष जैसे युद्ध में प्रविष्ट होते हैं, वैसे हीं संरक्षणपूर्ण आश्रय के लिए हम आप दोनों के पास पहुँचें॥३॥
उचथ्य के पुत्र दीर्घतमा कहते हैं कि हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के निकट की गई प्रार्थना मेरी रक्षा करे। यह गतिशील दिन-रात्रि मुझे निचोड़ न लें । दशगुनी समिधाएँ डालकर प्रज्वलित की गई अग्नि मुझे भस्मीभूत न कर डाले । जिसने आपके इस श्रद्धालु उचध्य को बाँध दिया था, वही अब यहाँ धरती पर असहाय स्थिति में पड़ा है॥४॥
जब उचथ्य पुत्र दीर्घतमा को (मुझको) दस्युओं ने अच्छी प्रकार से जकड़कर और बाँधकर नदी में फेंक दिया (विसर्जित कर दिया), तब मातृरूपा उन नदियों ने संरक्षण प्रदान किया । जब मेरे सिर, छाती और कन्धे को काटने का प्रयत्न किया गया, तब आपकी कृपा एवं दिव्य संरक्षण से आपका सेवक ( मैं) सुरक्षित रहा, दस्यु के ही अंग कट गये॥५॥
ममता के पुत्र दीर्घतमा ऋषि दशमयुग अर्थात् एक सौ ग्यारहवें वर्ष में शारीरिक दृष्टि से वृद्धावस्था को प्राप्त हुए। उन्होंने संयमशील उत्तम कर्मों से धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरूपी पुरुषार्थ को प्राप्त किया। वे ब्रह्म ज्ञान सम्पन्न, सबके संचालन करने वाले सारथी के समान बने॥६॥

सूक्त - १५९

देव पुत्रियाँ द्यावा, पृथिवीं और अन्य देव शक्तियाँ मिलकर अपने श्रेष्ठ कर्मों और विचार प्रेरणाओं से सबको श्रेष्ठतम ऐश्वर्यों से विभूषित करती हैं। यज्ञीय भावनाओं के पोषक , यज्ञीय विचारों के प्रेरक , पृथिवीं और द्युलोक की हम स्तुति-मंत्रों से प्रार्थना करते हैं॥१॥
हम विद्वेषरहित पृथिवीं और आकाश के रूप में माता-पिता के सबल एवं महान् मन को स्तुति द्वारा प्रसन्न करते हैं। पराक्रमशील (प्रकृति रूपी) माता और (स्रष्टा रूपी) पिता ने अपनी (सृष्टि उत्पादन की) श्रेष्ठ सामर्थ्य से प्रजाओं की रक्षा करते हुए उन्हें प्रगतिशील बनाया। ये उनके सर्वोत्तम कार्य प्रशंसनीय है॥२॥
श्रेष्ठ, कर्मशील तथा गुणसम्पन्न सन्तानें, पृथिवी-द्यावारूप माता-पिता की प्रारम्भिक विशेषताओं से परिचित हैं । द्युलोक एवं पृथिवी लोक दोनों, स्थावर और जङ्गम सभी विद्रोहरहित सन्तानों का भली प्रकार से संरक्षण करते हुए अपने सत्यरूप श्रेष्ठ पद को सुशोभित करते हैं॥३॥
द्युलोक रूप आकाश गंगा के बीच विद्यमान सूर्य की क्रान्तदर्शी ज्ञानयुक्त किरणें, नित्य नये-नये ताने-बाने बुनती हैं। ये किरणें सहोदर बहिनों के समान एक स्थान (सूर्य) से उत्पन्न होती हैं । परस्पर सहयोग भावना से एक ही घर में निवास करने वाली ये किरणे द्यावा-पृथिवी को नाप लेती हैं॥४॥
हम आज श्रेष्ठ कर्मों के निर्वाह के लिए सम्पूर्ण विश्व के उत्पादक (प्रेरक) सूर्यदेव से श्रेष्ठ ऐश्वर्यों की कामना करते हैं । द्यावा-पृथिवीं अपनी उत्तम प्रेरणाओं से हमारे लिए श्रेष्ठ आवास तथा पशुधन प्रदान करें॥५॥

सूक्त - १६०

द्यावा-पृथिवी विश्व के सुखों के आधार हैं और यज्ञ युक्त हैं। ये तेजस्वी, मेधावी जनों के संरक्षक, सर्व उत्पादक एवं ज्ञान से सम्पन्न हैं । इन दोनों के मध्य में सम्पूर्ण प्राणियों में पवित्र सूर्यदेव अपनी धारण क्षमताओं से युक्त होकर गमन करते हैं॥१॥
क्योंकि पिता (द्युलोक) अपने दिव्य प्रकाश से मनुष्यों को आश्रय प्रदान करते हैं, अतएव ये अति सामर्थ्यवान् द्यावा-पृथिवीं सबको पुष्टि प्रदान करते हैं। अतिव्यापक, महिमामय और भिन्न-भिन्न प्रकृति वाले ये माता-पिता सभी लोकों के संरक्षक हैं॥२॥
माता-पिता के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को वहन करने वाले पुत्ररूप ज्ञानवान् सूर्यदेव अपनी सामर्थ्य से सम्पूर्ण लोकों में पवित्रता का संचार करते हैं। विविध रूपों वाली पृथिवी (धेनु) और बलशाली द्युलोक (बैल) को पावन बनाते हुए वे आकाश से तेजस् बरसाकर सभी प्राणियों को परिपुष्ट करते हैं॥३॥
जिस देव (परमात्मा) ने संसार के लिए आनन्दप्रद द्युलोक एवं पृथ्वी का प्रादुर्भाव किया, जिसने श्रेष्ठ कर्मों की प्रेरणा से दोनों द्यावा-पृथिवी को संव्याप्त किया, जिन्होंने अजर-सुदृढ़ आधारों से दोनों लोकों को स्थिरता प्रदान की, ऐसे श्रेष्ठ कर्मशील देवों के बीच में अग्रगण्य वे देव (परमात्मा) स्तुत्य हैं॥४॥
ये द्यावा-पृथिवी प्रसन्न होकर हमारे लिए प्रचुर अन्न और सामर्थ्य प्रदान करें, ताकि हम प्रजाजनों के विस्तार (प्रगति) में समर्थ हों । वे दोनों नित्य हमारे लिए उत्तम प्रेरणाओं से युक्त शक्ति प्रदान करें॥५॥

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सूक्त - १६१

(सुधन्वा के पुत्रों के पास जब अग्निदेव पहुँचते हैं, तो वे कहते हैं-) हमारे पास ये कौन आये हैं ? ये हमसे श्रेष्ठ या कनिष्ठ? (पहचान लेने पर कहते हैं) हे भाता अग्निदेव ! हम इस श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुव्यान्न को दूषित न करें; आप कृपया इसके उपयोग का उपाय बतलायें॥१॥
(अग्निदेव ने कहा:-) हे सुधन्वा पुगे ! आप इस अन्न को चार भागों में विभक्त करें, ऐसा देवशक्तियों का आपके लिए निर्देश है। इसी निवेदन के लिए हम आपके समीप आये हैं। यदि आप इस प्रकार करेंगे तो आप भी देवताओं के परमपद के अधिकारी बनेंगे॥२॥
हे ऋभुदेवो ! आपने हव्यवाहक अग्निदेव से जो निवेदन किया है कि अश्वों, गौओं एवं रथों को उत्तम बनायें । दोनों वृद्ध (माता-पिता) को तरुण बनायें । इन सभी कर्मों का निर्वाह करने वाले हे बन्धु अग्निदेव ! हम आपका अनुगमन करते हैं॥३॥
है ऋभुदेवो ! कार्य करने के बाद आपने पूछा कि जो दूतरूप में हमारे समीप आये हैं, वे कहाँ चले गये? जब त्वष्टा ने चार भागों में विभक्त अन्न उन अग्निदेव को अर्पित किया, तभी वे दूत स्त्रियों (मंत्र प्रकट करने वाली वाणियों) में समाहित हो गये॥४॥
त्वष्टादेव ने निर्देशित किया कि जो देवताओं के लिए उपयुक्त हविष्यान्नों की निन्दा करते हैं, उनका संहार करें । परस्पर सहयोग से अभिषुत सोम को विभिन्न नामों से सम्बोधित किया जाता है, तब (त्वष्टा की) कन्या (वाणी) भी उन्हीं नामों से संबोधित करती हैं॥५॥
इन्द्रदेव अपने अश्वों को जोतकर, अश्विनीकुमार अपने रथ को तैयार करके यज्ञ में जाने के लिए प्रस्तुत हैं । बृहस्पतिदेव ने भी विभिन्न स्तोत्ररूप वाणियों को प्रारम्भ कर दिया है, अतएव ऋभु, विभ्वा और वाज भी देवताओं के समीप गये और यज्ञ भाग प्राप्त किया॥६॥
हे सुधन्वा पुत्रो ! आपके श्रेष्ठ प्रयासों से चर्मरहित गौ को पुनर्जीवन मिला। अतिवृद्ध माता-पिता को आपने तरुण बनाया। एक घोड़े से दूसरे घोड़े को उत्पन्न करके उनको अपने रथ में जोतकर देवों के समीप उपस्थित हुए॥७॥
(देवों ने कहा-) हे सुधन्वा के पुत्रो ! आप जल पान करें, अथवा मूञ्ज से अभिषुत सोमरस का पान करें । यदि आपकी अभी इसे पीने की इच्छा न हो तो तीसरे पहर तो इसे अवश्य ही पीकर आनन्दित हों॥८॥
किसी ने जल की, दूसरे ने अग्नि की तथा किसी तीसरे ने भूमि की सर्व श्रेष्ठता को सिद्ध किया, इस प्रकार से सभी (भुदेवों) ने तीनों तत्त्वों की उपयोगिता को सत्यापित (सत्य सिद्ध करते हुए ऐश्वर्यों का विभाजन किया॥९॥
एक पुत्र ने गौ (किरणों-इन्द्रियों) को जल (रसों) की ओर प्रेरित किया। दूसरे ने उन्हें मांसादि (अंग अवयव, फलों के गूदे आदि) के संवर्धन में नियोजित किया। तीसरे ने सूर्यास्त (अंतिम चरण) के समय उनके अवशेषों (विकारों) को हटा दिया - ऐसे पुत्रों वाले पिता और क्या अपेक्षा करें ?॥१०॥
(सूर्य किरणों में संव्याप्त) हे ऋभु देवो ! आपने अपने श्रेष्ठ पुरुषार्थ से ऊंचे स्थानों में उपयोगी तृण आदि उगाये तथा निचले भागों में जल को संगृहीत किया। आप अब तक सूर्य मण्डल में विश्रामरत रहे, अब इस (उत्पादक) प्रक्रिया का अनुगमन क्यों नहीं करते ?॥११॥
सूर्य किरणों में संव्याप्त हे ऋभुओ ! जब आप लोकों को आच्छादित करके चारों ओर संचरित होते हैं, तब आपके मात - पिता दोनों कहाँ छिप जाते हैं ? जो लोग आपके हाथों (किरणों) को रोकते हैं, उपयोग नहीं करते, वे शापित होते हैं। जो प्रेरक वचन बोलते हैं, उन्हें आप प्रगति प्रदान करते हैं॥१२॥
हे सूर्य किरणो (ऋभुओं) ! (जाग्रत् होने पर) आपने सूर्य से पूछा कि हमें किसने सोते से जगाया ? तब सूर्य में वायु को जाग्रत् करने वाला बतलाया। आपने संवत्सर बदल जाने पर विश्व को प्रकाशमान किया है॥१३॥
हे शक्तिशाली ऋभुओ (किरणो) ! आपको पाने की कामना करते हुए मरुद्गण देवलोक से चलते हैं। भूमि पर अग्निदेव और वायुदेव आकाश में चलते हैं तथा वरुणदेव जल प्रवाहों के रूप में आपसे मिलते हैं॥१४॥

सूक्त - १६२

हम याजकगण यज्ञशाला में दिव्यगुण सम्पन्न, गतिमान्, पराक्रमी, वाजी (बलशाली) देवताओं के ही ऐश्वर्य का गान करते हैं । अतः मित्र, वरुण, अर्यमा, आयु, ऋभुक्ष, मरुद्गण, इन्द्र आदि देवता हमारी उपेक्षा करते हुए हमसे विमुख न हों (वरन् अनुकूल रहें )॥१॥
जब सुसंस्कारित, ऐश्वर्ययुक्त, सबको आवृत करने वाले (देवों) के मुख के पास (देवों का मुख यज्ञाग्नि को कहा जाता है ।) हविष्यान्न (पुरोड़ाश आदि) लाया जाता है, तो भली प्रकार आगे लाया हुआ विश्वरूप अज (अनेक रूपों में जन्म लेने वाली जीव चेतना) भी मैं- मैं करता (मुझे भी चाहिए- इस भाव से) आता है, (तब वह भी) इन्द्र और पूषादेव आदि के प्रिय आहार (हव्य) को प्राप्त करता है॥२॥
यह अज जब बलशाली अश्व के आगे लाया जाता है, तो श्रेष्ठ पुरुष (याजक या प्रजापति) इस चंचल (अश्व के साथ अज को भी, सबको प्रिय लगने वाले पुरोड़ाश आदि (हव्य) का भाग देकर उत्तम यश प्राप्त करते हैं॥३॥
जब मनुष्य (याजक गण) हविष्य को (यज्ञ के माध्यम ) तीनों देवयान मार्गों (पृथ्वी, अंतरिक्ष एवं द्युलोक) में अश्व की तरह संचारित करते हैं, तब यहाँ (पृथ्वी पर) यह अज पोषण के प्रथम भाग को पाकर देवताओं के हित के लिए यज्ञ को विज्ञापित करता चलता है॥४॥
होता, अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता, आग्नीध्र, ग्रावस्तोता, प्रशास्ता, प्रज्ञावान् ब्रह्मा आदि हे ऋत्विजों ! आप सब प्रकार सज्जित (अङ्ग- उपाङ्गों सहित सम्पन्न) इस यज्ञ द्वारा इष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए (प्रकृतिगत) प्रवाहों को समृद्ध बनाएँ॥५॥
हे ऋत्विजों ! यज्ञ की व्यवस्था में सहयोग देने वाले, लकड़ी काटकर यूप का निर्माण करने वाले, युप को यज्ञशाला तक पहुँचाने वाले, चषाल (लोहे या लकड़ी की फिरकी) बनाने वाले, अश्व बाँधने के बँटे को बनाने वाले- इन सबका किया गया प्रयास हमारे लिए हितकारी हो॥६॥
अश्वमेध यज्ञ की फलश्रुति के रूप में श्रेष्ठ मानवीय फल हमें स्वयं ही प्राप्त हो । देवताओं के मनोरथ को पूर्ण करने में समर्थ इस अश्व (शक्ति) की कामना सभी करते हैं। इस अश्व को देवत्व की पुष्टि के लिए मित्र के रूप में मानते हैं। सभी बुद्धिमान् ऋषि इसका अनुमोदन करें॥७॥
इस वाजिन् (बलशाली) को नियंत्रित रखने के लिए गर्दन का बन्धन, इस (अर्वन्) चंचल के लिए पैरों का बन्धन, कमर एवं सिर के बन्धन तथा मुख के घास आदि तृण सभी देवों को अर्पित हों ।(यज्ञीय ऊर्जा अथवा राष्ट्र की शक्तियों को सुनियंत्रित एवं समृद्ध रखने वाले सभी साधन देवों के ही नियंत्रण में रहें ।)॥८॥
अश्व (संचरित होने वाले व्य) का जो विकृत (होमा न जा सकने वाला) भाग मक्खियों द्वारा खाया जाता है, जो उपकरणों में लगा रहता है, जो याजक के हाथों में तथा जो नाखूनों में लगा रहता है, वह सब भी देवत्व के प्रति ही समर्पित हो॥९॥
उदर में ( यज्ञकुण्ड के गर्भ में) जो उच्छेदन योग्य गन्ध अधपचे ( हविष्यान्न) से निकल रही है, उसका शमन भलीप्रकार किये गये मेध (यज्ञीय) उपचार द्वारा हो और उसका पाचन भी देवों के अनुकूल हो॥१०॥
आपके जो अग्नि द्वारा पचाये जाते हुए अंग, शूल के आघात से इधर-उधर उछल कर गिर गये हैं, वे भूमि पर हीं न पड़े रहें, तृणों में न मिल जायें । वे भी यज्ञ भाग चाहने वाले देवों का आहार बनें॥११॥
जो इस वाजिन् (अन्न युक्त पुरोडाश) को पकता हुआ देखते हैं और जो उसकी सुगंध को आकर्षक कहते हैं, जो इस भोग्य अन्न से बने आहार की याचना करते हैं, उनका पुरुषार्थ भी हमारे लिए फलित हो॥१२॥
जो उखा पात्र में पकाये जाते (अन्न एवं फलों के गूदे से बने) पुरोडाश का निरीक्षण करते हैं, जो पात्रों को जल से पवित्र करने वाले हैं, (पकाने के क्रम में) ऊष्मा को रोकने वाले ढक्कन, चरु आदि को अंक (गोद) में रखने वाले तथा (पुरोड़ाश के टुकड़े काटने वाले जो उपकरण हैं, वे सब इस अश्वमेध को विभूषित करने वाले (यज्ञ की गरिमा के अनुरूप) हों॥१३॥
(पकाये जाते हुए पुरोड़ाश के प्रति कहते हैं-) धुएँ की गंधवालीं अग्नि तुम्हें पीड़ित न करे, (अग्नि के प्रभाव से) चमकता हुआ अग्नि पात्र (उखा) तुम्हें उद्विग्न न करे । ऐसे (धुएँ आदि से रहित, भली प्रकार सम्पन्न) अश्वमेध को देवगण स्वीकार करते हैं॥१४॥
(हे यज्ञ रूप अश्व !) आप का निकलना, आन्दोलित होना, पलटना, पीना, खाना आदि सारी क्रियाएँ देवताओं में (उनके ही बीच, उन्हीं के संरक्षण में) हों॥१५॥
यज्ञ को समर्पित (पूजन योग्य) अश्व को सजाने वाला ऊपर की वस्त्र, आभूषण, सिर तथा पैर बाँधने की मेखलाएँ आदि सभी देवताओं को प्रसन्नता प्रदान करने वाले हों॥१६॥
(हे यज्ञाग्नि रूप अश्व !) अतिशीघ्रता (जल्दबाजी में तुम्हें सताने वालों, निचले भाग को (व्य को जल्दी पचाने के लिए अग्नि के निचले भाग को कुरेद कर) पीड़ित करने वालों द्वारा की गयी सभी त्रुटियों को (हम पुरोहित) सुवा की आहुतियों (घृताहुतियों) से ठीक करते हैं॥१७॥
हे ऋत्विजों !धारण करने की सामर्थ्य से युक्त, गतिमान्, देवताओं के बन्धु इस अश्व (यज्ञ) के चौंतीस अंगों को अच्छी प्रकार प्राप्त करें (जान ।हर अंग को अपने प्रयासों द्वारा स्वस्थ बनाएँ और उसकी कमियों को दूर करें॥१८॥
(काल विभाजन के क्रम में) त्वष्टा (सूर्य) रूपी अश्व का विभाजन संवत्सर (वर्ष) करता है। उत्तरायण तथा दक्षिणायन नाम से दो विभाग उसके नियन्ता होते हैं। वह वसन्तादि दो-दो माह की ऋतुओं में विभक्त होता है। यज्ञ में शरीर के अलग-अलग अंगों की पुष्टि के निमित्त ऋतु संबंधी अनुकूल पदार्थों की आहुतियाँ देते हैं॥१९॥
हे अश्व (राष्ट्र अथवा यज्ञ) ! आपका परम प्रिय आत्म तत्त्व अर्थात् अपना गौरव कभी भी पीड़ादायक स्थिति में छोड़कर न जाये (राष्ट्र का गौरव अक्षुण्ण रहे) । शस्त्र (विखण्डित करने वाली शक्तियाँ) आपके अंग-अवयवों पर अपना अधिकार न जमा सकें (राष्ट्र कभी खण्डित न हो) । अकुशल व्यक्ति भी आपके दोषों के अतिरिक्त किसी उपयोगी अंग पर असि (तलवार ) का प्रयोग न करे॥२०॥
हे अश्व ! ( यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा) न तो आपका नाश होता है और न आप किसी को नष्ट करते हैं, (वरन् आप) सुगम - सहज मार्ग से देवताओं तक पहुँचते हैं। शब्द करने वालों (मंत्रोच्चार करने वालों के आधार पर वाजी (ऐश्वर्यवान्) और हरि (अंतरिक्षीय गतिशील प्रवाह) उपस्थित होकर, आपके साथ संयुक्त होकर पुष्ट होते हैं॥२१॥
देवत्व को प्राप्त करने वाला यह बलशाली (यज्ञीय प्रयोग) हमें पुत्र-पौत्र, धन-धान्य तथा उत्तम अश्वों के रूप में अपार वैभव प्रदान करे । हम दीनता, पाप कृत्यों एवं अपराधों से सदैव दूर रहें । अश्व के समान शक्तिशाली हमारे नागरिक पराक्रमी हो॥२२॥

सूक्त - १६३

हे अर्वन् (चंचल गतिवाले) ! बाज़ के पंखों तथा हिरन के पैरों की तरह गतिशील आप जब प्रथम समुद्र से उत्पन्न हुए, तब उत्पत्ति स्थान से प्रकट होकर आप शब्द करने लगे, तब आपकी महिमा स्तुत्य हुई॥१॥
वसुओं ने सूर्यमण्डल से अश्व (तीव्र गति से संचार करने वाली ऊर्जा रश्मियों को निकाला। तीनों लोकों में विचरने वाले वायु ने यम के द्वारा प्रदान किये गये अश्व को रथ में ( कर्म में नियोजित किया। सर्व प्रथम इस अश्व पर इन्द्रदेव चढ़े और गन्धर्व ने इसकी लगाम सँभाली (ऐसे अश्व की हम स्तुति करते हैं ।)॥२॥
हे अर्वन् ! अपने गुप्त व्रतों (जो प्रकट नहीं हैं, ऐसी विशेषताओं) के कारण आप यम हैं, आदित्य हैं, त्रित (तीनों लोकों अथवा तीनों आयामों) में संव्याप्त हैं। सोम (पोषक प्रवाह) के साथ आप एक रूप हैं । द्युलोक में स्थित आपके तीन बन्धन (ऋक्, यजु, साम रूप) कहे गये हैं॥३॥
हे अर्वन् (चंचल प्रकृति वाले) ! आपको श्रेष्ठ उत्पादक सूर्य कहा गया है। दिव्य लोक में, जलों में तथा अन्तरिक्ष में आपके तीन-तीन बन्धन कहे गये हैं। आप वरुण रूप में हमारी प्रशंसा करते हैं॥४॥
हे वाजिन् (बलशाली मेघ) ! आपके मार्जन (सिंचन) करने वाले साधनों को हम देखते हैं। आपके खुरों (धाराओं के आधात) से खुदे हुए यह स्थान देखते हैं । यहाँ आपके कल्याणकारी रज्जु (नियंत्रक सूत्र) हैं, जो रक्षा करने वाले हैं, जो कि इस ऋत (सनातन सत्य-यज्ञ) की रक्षा करते हैं॥५॥
हे अश्व (तीव्र गति से संचार करने वाले वायुभूत हव्य) ! नीचे के स्थान से आकाश मार्ग द्वारा सूर्य की तरफ जाते हुए आपकी आत्मा को हम विचारपूर्वक जानते हैं। सरलतापूर्वक जाने योग्य, धूलि रहित मार्गों से जाते हुए आपके नीचे की ओर आने वाले सिरों (श्रेष्ठ भागों) को भी हम देखते हैं॥६॥
हे अश्व (तीव्र गति से संचार करने वाले वायुभूत हव्य) ! आपके यज्ञ की कामना वाले श्रेष्ठ स्वरूप को हम सूर्य मण्डल में विद्यमान देखते हैं । यजमान ने जिस समय उत्तम हवियों को आपके निमित्त समर्पित किया, उसके बाद ही आपने हव्य रूप ओषधियों को ग्रहण किया॥७॥
हे अर्वन्(चंचल प्रकृति वाले यज्ञाग्नि) !रथ (मनोरथ) आपके अनुगामी हैं। आपके अनुगामी मनुष्य, कन्याओं का सौभाग्य तथा गौएँ हैं। मनुष्य समुदाय ने आपकी मित्रता को प्राप्त किया तथा देवगणों ने आपके शौर्य को वर्णित किया है॥८॥
सबसे पहले स्वर्ण मुकुट धारण करके अश्व पर आरूढ़ होने वाले इन्द्रदेव थे । इस अश्व के पैर लोहे के समान दृढ़ और मन के सदृश वेगवान् हैं । देवताओं ने ही इसके हवि रूप भोजन को ग्रहण किया॥९॥
जब पुष्ट जंघाओं और वक्ष वाले, मध्य भाग (कटिभाग) में पतले, बलशाली, सूर्य के रथ को खींचने वाले और लगातार चलने वाले अश्व (किरणे) पंक्तिबद्ध होकर हंसों के समान चलते हैं, तब वे स्वर्ग मार्ग में दिव्यता को प्राप्त होते हैं॥१०॥
हे अर्वन् (चंचल प्रकृति वाले अग्निदेव) ! आपका शरीर ऊर्ध्वगमन करने वाला और चित्त वायु के समान वेगवाला है । आपकी विशेष प्रकार से स्थित दीप्तियाँ वनों में दावानल के रूप में व्याप्त हैं॥११॥
यशस्वी, मन के समान तीव्र गति से चलायमान, तेजस्वी अश्व (सूक्ष्मीकृत हव्या ऊपर की ओर देवमार्ग को जाता है। अज (अर्थात् कृष्ण वर्ण धूम्र ) आगे चलता है । (सूक्ष्मीकृत हुव्य का) नाभि (नाभिक न्यूक्लियस-मुख्य भाग) उसका अनुगमन करता है। पीछे - पीछे पाट करते हुए स्तोता चलते हैं (मंत्रों का पाठ होता है ।)॥१२॥
शक्तिशाली अर्वन् (चंचल प्रकृति वाले सूक्ष्मीकृत हव्यो ! सर्वश्रेष्ठ उच्च स्थान को प्राप्त करके पालक और सम्माननीय माता-पिता (द्यावा-पृथिवी) से मिलते हैं। हे याजक ! आप भी सद्गुणों से सुशोभित होते हुए देवत्व को प्राप्त करें । देवताओं से अपार वैभव उपलब्ध करें॥१३॥

सूक्त - १६४

इन सुन्दर एवं जगपालक होता (सूर्यदेव) को हमने सात पुत्रों (सप्तवर्णी किरणों) सहित देखा है । इन(सूर्यदेव) के मध्यम (मध्य-अन्तरिक्ष में रहने वाला) भाई सर्वव्यापी वायुदेव हैं। उनके तीसरे भाई तेजस्वी पीठवाले (अग्निदेव) हैं॥१॥
एक चक्र (सविता के पोषण चक्र) वाले रथ से ये सातों जुड़े हैं। सात नामों (रंगों) वाला एक (किरण रूपी) अश्व इस चक्र को चलाता है। तीन (द्युलोक, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी ) नाभियों (केन्द्रक) अथवा धुरियों वाला यह कालचक्र सतत गतिशील अविनाशी, और शिथिलता रहित है। इसी चक्र के अन्दर समस्त लोक विद्यमान हैं॥२॥
इस (सूर्यदेव के पोषण चक्र) से जुड़े यह जो सात (सप्त वर्ण अथवा सातकाल वर्ग- अयन, ऋतु, मास, पक्ष, दिन, रात एवं मुहूर्त) हैं, यही सात चक्र अथवा सात अश्वों के रूप में इस रथ को चलाते हैं। जहाँ गौ (वाणी) में सात नाम (सात स्वर) छिपे हैं, ऐसी सात बहनें ( स्तुतियाँ) इसकी वन्दना करती हैं॥३॥
जो अस्थि (शरीर) रहित होते हुए भी अस्थियुक्त (शरीरधारी प्राणियों) का पालन पोषण करते हैं; उन स्वयंभू को किसने देखा ? भूमि में प्राण, रक्त एवं आत्मा कहाँ से आये ?इस सम्बन्ध में पूछने (जानने) के लिए कौन किसके पास जाता ?॥४॥
अपरिपक्व बुद्धिवाले हम, देवताओं के इन गुप्त पदों (चरणों ) के सम्बन्ध में जानने के लिए मनोयोग पूर्वक पूछते हैं सुन्दर युवा गोवत्स (बछड़े या सूर्य के लिए ये विज्ञ (देव आदि) सप्त तन्तुओं (किरणों ) को कैसे फैलाते हैं ?॥५॥
जिसके द्वारा इन छहों लोकों को स्थिर किया गया है, वह अजन्मा प्रजापति रूपी तत्त्व कैसा है ?उसका क्या स्वरूप है? इस तत्त्व ज्ञान से अपरिचित हम तत्त्ववेत्ताओं से निश्चित स्वरूप की जानकारी के लिए यह पूछते हैं॥६॥
जो इस सुन्दर और गतिमान् सूर्य के उत्पत्ति स्थान को (उत्पत्ति के रहस्य को ) जानते हैं, वे इस गुप्त रहस्य का यहाँ आकर स्पष्टीकरण करें कि इस सर्वोत्तम सूर्य की गौएँ (किरणे) पानी का दोहन करती हैं (बरसाती हैं)। वे ही (ग्रीष्मकाल में) तेजस्वी होकर पैरों (निचले भागों) से जल को सोखती हैं॥७॥
माता (पृथ्वी) ने ऋन (यज्ञ अथवा ऋतु अनुरूप उपलब्धि के लिये पिता (द्युलोक अथवा सूर्य) का सेवन किया। क्रिया के पूर्व मने से उनका संपर्क हुआ। माता गर्भ (उर्वरता धारण करने योग्य) रस से निबद्ध हुई । तब (गर्भ के विकास के लिए) उनमें नमन पूर्वक (एक दूसरे का आदर करते हुए) वचनों ( परामर्श) का आदान-प्रदान हुआ॥८॥
समर्थ सूर्यदेव की धारण क्षमता पर माता ( पृथ्वीं) आधारित हैं । गर्भ ( उर्वर शक्ति प्राणपर्जन्य) गमनशील (वायु अथवा बादलों के बीच रहता है । बछड़ा (बादल) गौओं (किरणों) को देखकर शब्द करते हुए अनुमान करता है, तब तीनों का संयोग विश्व को रूपवान् बनाता है॥९॥
यह स्रष्टा प्रजापति अकेले ही (पृथ्वी ,अन्तरिक्ष और द्युलोक रूपी) तीन माताओं तथा (अग्नि,वायु और सूर्य रूपी) तीन पिताओं का भरणपोषण करते हुए सबसे परे स्थित हैं। इन्हें थकावट नहीं आती । विश्व के रहस्य को जानते हुए भी अखिल विश्च से परे ( बाहर रहने वाले प्रजापति की वाणी ( शक्ति) के सम्बन्ध में (सभी देवगण) घुलोक के पृष्ठ - भाग पर विचार करते हैं॥१०॥
ऋत (सूर्य अथवा सृष्टि संचालक यज्ञ) का बारह अरों (राशियों) वाला चक्र इस द्युलोक में चारों ओर घूमता रहता हैं । यह चक्र कभी अवरुद्ध या जीर्ण नहीं होता। हे अग्निदेव ! संयुक्त रूप से रहने वाले सात सौ बीस पुत्र यहाँ (इस चक्र) में रहते हैं॥११॥
अयन, मास, ऋतु, पक्ष, दिन और रात रूपी पाँच पैरों वाला मास रूपी बारह आकृतियों से युक्त तथा जल को बरसाने वाले पिता रूप सूर्यदेव दिव्यलोक के आधे हिस्से में रहते हैं, ऐसी मान्यता है । अन्य विद्वानों के मतानुसार ये सूर्यदव तुरूप छ: अरों तथा अयन, मास, तु, पक्ष, दिन, रात एवं मुहूर्त रूपी सात चक्रों वाले रथ पर आरूढ़ हैं॥१२॥
अयन, मासादि पाँच अरों वाले इस कालचक्र (रथ) में समस्त लोक विद्यमान हैं। इतने लोकों का भार वहन करते हुए भी इस चक्र का अक्ष (धुरा ) न गरम होता है और न टूटता है॥१३॥
नेमि (धुरा या नियन्त्रण) से युक्त कभी क्षय न होने वाला सृष्टि चक्र सदैव चलता रहता है। अति व्यापक प्रकृति के उत्पन्न होने पर इसे दस घोड़े (पाँच घाण एवं पाँच उपप्राण, पाँच प्राण एवं पाँच अग्नियों आदि) चलाते हैं । सूर्य रूपी नेत्र का प्रकाश जल से आच्छादित होकर गतिमान् होता है, उसमें ही सम्पूर्ण लोक विद्यमान हैं॥१४॥
एक साथ जन्मे, जोड़े से रहने वाले छ: और सातवाँ यह सभी एक (काल अथवा परमात्म चेतना) से उत्पन्न हैं । यह देवत्व से उपजे श्रेष हैं । वे सभी अपने बदले हुए रूपों में अपने-अपने इष्ट प्रयोजनों में रत, अपने-अपने धामों (क्षेत्रों) में स्थित रहकर गतिशील (सक्रिय) हैं॥१५॥
ये (किरणे) स्त्रियाँ हैं, फिर भी पुरुष (गर्भ धारण करने में समर्थ) हैं, यह तथ्य (सूक्ष्म) दृष्टि सम्पन्न ही देख सकते हैं। दूरदर्शी पुत्र (साधक - शिष्य) ही इसे अनुभव कर सकता है । जो यह जान लेता है, वह पिता का भी पिता (सर्व सृजेता को भी जानने वाला) हो जाता है॥१६॥
गौएँ (पोषक किरणें) द्युलोक से नीचे की ओर तथा इस (पृथ्वी) से ऊपर की ओर (सतत गतिमान् हैं । यह बछड़े (जीवन तत्व) को धारण किए हुए किस लक्ष्य की ओर जाते हैं ? यह किस आधे भाग से परे निकल कर जन्म देती हैं ? यहाँ समूह के मध्य तो नहीं देती॥१७॥
जो द्युलोक से नीचे इस (पृथ्वी) के पिता (सूर्यदेव) तथा पृथिवीं के ऊपर स्थित अग्निदेव को जानते अर्थात् उपासना करते हैं, वे निश्चित ही विद्वान् हैं। यह दिव्यता से युक्त आचरण वाला मन कहाँ से उत्पन्न हुआ ?इस रहस्य की जानकारी देने वाला ज्ञानी कौन है? यह हमें यहाँ आकर बतायें॥१८॥
(इस गतिशील विश्व में) जो पास आते हुए को दूर जाता हुआ भी कहा जाता (अनुभव किया जाता है और दूर जाते को पास आता हुआ भी कहा जाता है । हे सोमदेव ! आपने और इन्द्रदेव ने जो चक्र चला रखा है,वह धुरे से जुड़ा रहकर लोकों को वहन करता है॥१९॥
साथ रहने वाले मित्रों की तरह दो पक्षी (गतिशील जीवात्मा एवं परमात्मा) एक ही वृक्ष (प्रकृति अथवा शरीर) पर स्थित हैं। उनमें से एक (जीवात्मा) स्वादिष्ट पीपल (माया) के फल खाता है, दूसरा (परमात्मा) उन्हें न खाता हुआ केवल देखता (द्रष्टा रूप) रहता है॥२०॥
इस (प्रकृति-रूपी) वृक्ष पर बैठी हुई संसार में लिप्त मरणधर्मा जीवात्माएँ सुख-दु:ख रूपी फलों को भोगती हुई अपने शब्दों में परमात्मा की स्तुति करती हैं। तब इन लोकों के स्वामी और संरक्षक परमात्मा अज्ञान से युक्त मुझ जीवात्मा में भी विद्यमान हैं॥२१॥
इस (संसार रूपी) वृक्ष पर प्राण रस का पान करने वाली जीवात्माएँ रहती हैं, जो प्रजा वृद्धि में समर्थ हैं। वृक्ष में ऊपर मधुर फल भी लगे हुए हैं, जो पिता (परमात्मा को नहीं जानते, वे इन मधुर (सत्कर्म रूपी) फलों के आनन्द से वञ्चित रहते हैं॥२२॥
पृथ्वी पर गायत्री छन्द को, अन्तरिक्ष में त्रिष्टुप् छन्द को तथा आकाश में जगती छन्द को स्थापित करने वाले को जो जान लेता है, वह देवत्व (अमरत्व) को प्राप्त कर लेता है॥२३॥
(परमात्मा ने) गायत्री छन्द से प्राण की रचना की, ऋचाओं के समूह से सामवेद को बनाया, त्रिष्टुम् छन्द से यजुर्वाक्यों की रचना की तथा दो पदों एवं चार पदों वाले अक्षरों से सातों छन्दमय वाणियों को प्रादुर्भूत (प्रकट) किया॥२४॥
गतिमान् सूर्यदेव द्वारा प्रजापति ने द्युलोक में जलों को स्थापित किया । वृष्टि के माध्यम से जल, सूर्यदेव और पृथ्वी संयुक्त होते हैं, तब सूर्य और द्युलोक में सन्निहित प्राण, जल वृष्टि के द्वारा इस पृथ्वी पर प्रकट होता है । गायत्री के तीन पाद अग्नि, विद्युत् और सूर्य (पृथ्वीं, द्यु और अन्तरिक्ष) हैं। उस प्रजापति की तेजस्विता से ही ये तीनों पाद बलशाली होते हैं, ऐसा कहा गया है॥२५॥
दुग्ध (सुख) प्रदान करने वाली गौ (प्रकृति प्रवाहों) का हम आवाहन करते हैं । इस गौ के दुग्ध का दोहन कुशल साधक ही कर पाते हैं। सविता देव हमें दुग्ध (श्रेष्ठ प्राण) प्रदान करें । तपस्वी एवं तेजस्वी (जीवन्त साधक) ही इसको ग्रहण कर सकता है, ऐसा कथन है॥२६॥
कभी भी वध न करने योग्य गौ, मनुष्यों के लिए अन्न, दुग्ध, घृत आदि ऐश्वर्य प्रदान करने की कामना से अपने बछड़े को मन से प्यार करती हुई, भाती हुई बछड़े के पास आ जाती है । वह गौ मानव समुदाय के महान् सौभाग्य को बढ़ाती हुई, प्रचुर मात्रा में दुग्ध प्रदान करती है॥२७॥
गौ आँखें बन्द किये हुए बछड़े के समीप जाकर रंभाती है । बछड़े के सिर को चाटने (सहलाने) के लिए वात्सल्यपूर्ण शब्द करती है। उसके मुँह के पास अपने दूध से भरे थनों को ले जाती हुई शब्द करती है । वह दूध पिलाते हुए (प्यार से) शब्द करते हुए बछड़े को संतुष्ट भी करती है॥२८॥
वत्स गौ के चारों और बिना शब्द के अभिव्यक्ति करता है। गौ सँभाती हुई अपनी (भाव भरी) चेष्टाओं से मनुष्यों को लज्जित करती है। उज्ज्वल दूध उत्पन्न कर अपने भावों को प्रकाशित करती है॥२९॥
श्वसन प्रक्रिया द्वारा अस्तित्व में रहने वाला जीव (चन्चल जीव) जब शरीर से चला जाता है, तब यह शरीर घर में निश्चल पड़ा रहता है । मरणशील (मरण धर्मा) शरीरों के साथ रहनेवाली आत्मा अविनाशी है, अतएव अविनाशी आत्मा अपनी धारण करने की शक्तियों से सम्पन्न होकर सर्वत्र निर्बाध विचरण करती है॥३०॥
समीपस्थ तथा दूरस्थ मार्गों में गतिमान् सूर्यदेव निरंतर गतिशील रहकर भी कभी नहीं गिरते । वे सम्पूर्ण विश्व का संरक्षण करते हैं। चारों ओर फैलने वाली तेजस्विता को धारण करते हुए समस्त लोकों में विराजमान सूर्यदेव को हम देखते हैं॥३१॥
जिसने इसे (जीव को) बनाया, वह भी इसे नहीं जानता; जिसने इसे देखा है, उससे भी यह लुप्त रहता है । यह माँ के प्रजनन अंग में घिरा हुआ स्थित है। यह प्रजाओं की उत्पत्ति करता हुआ स्वयं अस्तित्व खो देता है॥३२॥
द्युलोक स्थित (सूर्यदेव) हमारे पिता और बन्धु स्वरूप हैं। वहीं संसार के नाभि रूप भी हैं। यह विशाल पृथिवी हमारी माता है । दो पात्रों (आकाश के दो गोलार्द्ध) के मध्य स्थित सूर्यदेव अपने द्वारा उत्पन्न पृथ्वी में गर्भ (जीवन) स्थापित करते हैं॥३३॥
इस धरती का अन्तिम छोर कौन सा है ? सभी भुवनों का केन्द्र कहाँ है ?अश्व की शक्ति कहाँ है ?और वाणी का उद्गम कहाँ है? यह हम आप से पूछते हैं॥३४॥
(यज्ञ कीं) यह वेदिका पृथ्वी का अन्तिम छोर है, यह यज्ञ ही संसार चक्र की धुरी है। यह सोम ही अश्व (बलशाली) की शक्ति (वीर्य) है । यह 'ब्रह्मा' वाणी का उत्पत्ति स्थान है॥३५॥
सम्पूर्ण विश्व का निर्माण अषरा प्रकृति के मन, प्राण और पंच भूत रूपी सात पुत्रों से होता है । यह सभी तत्त्व सर्वव्यापक प्रजापति के निर्देशानुसार ही कर्तव्य निर्वाह करते हैं। वे अपनी ज्ञानशीलता, व्यापकता से तथा अपनी संकल्पशक्ति द्वारा सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हैं॥३६॥
मैं नहीं जानता कि मैं कैसा हैं ? मैं मूर्ख की भाँति मन से बँधकर चलता रहता हैं । जब पहले ही प्रकट हुआ सत्य मेरे पास आया, तभी मुझे यह वाणी प्राप्त हुई॥३७॥
यह आत्मा अविनाशी होने पर भी मरणधर्मा शरीर के साथ आबद्ध होने से विविध योनियों में जाती है । यह अपनी धारण क्षमता से ही उन शरीरों में आती और शरीरों से पृथक होती रहती है । ये दोनों शरीर और आत्मा शाश्वत एवं गतिशील होते हुए विपरीत गतियों से युक्त हैं। लोग इनमें से एक (शरीर) को तो जानते हैं, पर दूसरे (आत्मा) को नहीं समझाते॥३८॥
अविनाशी ऋचाएँ परमव्योम में भरी हुई हैं। उनमें सम्पूर्ण देव शक्तियों का वास है। जो इस तथ्य को नहीं जानता (उसके लिए) ऋचा क्या करेगी ? जो इस तथ्य को जानते हैं, वे इस (ऋचा) का सदुपयोग कर लेते हैं॥३९॥
हे अवधनीय गौ माता ! आप श्रेष्ठ पौष्टिक घास (आहार) ग्रहण करती हुई सौभाग्यशालिनी हों। आपके साथ हम सभी सौभाग्यशाली हों । आप शुद्ध घास खाकर और शुद्ध जल पीकर सर्वत्र विचरण करें॥४०॥
गौ (वाणी) निश्चित ही शब्द करती हुई जलों (रसों) को हिलाती (तरंगित करती है । वह गौ (काव्यमयी वाणी) एक, दो, चार, आठ अथवा नौ पदोंवाले छन्दों में विभाजित होती हुई सहस्र अक्षरों से युक्त होकर व्यापक आकाश में संव्याप्त हो जाती है॥४१॥
उन सूर्य रश्मियों से (जल वृष्टि द्वारा) जल प्रवाह बहते हैं । जिस जलवृष्टि से सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न होती हैं, इससे सम्पूर्ण विश्व को जीवन (प्राण) मिलता है॥४२॥
दूर से हमने धूम्र को देखा । चतुर्दिक् व्याप्त धूम्र के मध्य अग्नि को देखा, जिसमें प्रत्येक उत्तम कार्यों के पूर्व विग्गण शक्तिदायी सोमरस को पकाते हैं॥४३॥
तीन किरणों वाले पदार्थ (सूर्य, अग्नि और वायु) तुओं के अनुसार दिखाई देते हैं। इनमें से एक (सूर्य) संस्कार का वपन करता है । एक (अग्नि) अपनी शक्तियों से विश्व को प्रकाशित करता है। तीसरे (वायु) का रूप प्रत्यक्ष नहीं दिखाई पड़ता है॥४४॥
मनीषियों द्वारा यह ज्ञात हुआ है कि वाणी के चार रूप हैं, इनमें से तीन वाणियाँ (परा, पश्यन्ती तथा मध्यमा) प्रकट नहीं होती । सभी मनुष्य वाणी के चौथे रूप (बैखरी) को ही बोलते हैं॥४५॥
एक हीं सत्रूप परमेश्वर का विद्वज्जन (विभिन्न गुणों एवं स्वरूपों के आधार पर) विविध प्रकार से वर्णन करते हैं। उसी (परमात्मा) को (ऐश्वर्य सम्पन्न होने पर) इन्द्र, (हितकारी होने से) मित्र, (श्रेष्ठ होने से) वरुण तथा (प्रकाशक होने से) अग्नि कहा गया है ।वह (परमात्मा) भली प्रकार पालन कर्ता होने से सुपर्ण तथा गरुत्मान् है॥४६॥
श्रेष्ठ गतिमान् सूर्य-किरणें अपने साथ जल को उठाती हुई सबके आकर्षण के केन्द्र यानरूप सूर्यमण्डल के समीप पहुँचती हैं । वहाँ अन्तरिक्ष के मेघों में स्थित जल को बरसाते हुए पृथ्वी को सिक्त कर देती हैं॥४७॥
एक चक्र है, उसे बारह अरे घेरे हुए हैं । उसकी तीन नाभियाँ हैं । उसे कोई विद्वान् ही जानते हैं । उसमें तीन सौ साठ चलायमान कीलें ठुकी हुई है॥४८॥
हे देवी सरस्वति ! जो आपका सुखदायक, वरण करने योग्य, पुष्टिकारक, ऐश्वर्य प्रदाता, कल्याणकारी विभूतियों को देने वाला स्तन (स्वरूप) है, उसे जगत् के पोषण के लिए प्रकट करें॥४९॥
देवों ने यज्ञ से यज्ञ का यजन किया, उनका धर्म-कर्म में प्रथम स्थान है। (इससे) उन (देवों) ने स्वर्ग में स्थान पाया, जहाँ पूर्णकाल में साधना करने वाले देवता रहते हैं॥५०॥
यही जल (तप्त होकर वाष्परूप में) ऊपर जाता है और वही जल पर्जन्य रूप में नीचे आता है । जल बरसने से भूमि तृप्त होती है और अग्नियों (प्रदत्त आहुतियों) से दिव्य लोक तृप्त होते हैं॥५१॥
द्युलोक में विद्यमान रहनेवाले, उत्तम गति वाले, निरन्तर गतिमान् महिमाशाली, जलों के केन्द्र, ओषधियों को पुष्ट बनाने वाले, जल वृष्टि द्वारा चतुर्दिक् प्रवहमान जल प्रवाहों से भूमि को तृप्त करनेवाले सूर्यदेव को हम अपने संरक्षण के लिए आवाहित करते हैं॥५२॥

सूक्त - १६५

एक ही स्थान में रहने वाले, समवयस्क मरुद्गण, किस शुभ तत्त्व से सिंचन करते हैं ? कहाँ से आकर, किस मति से प्रेरित होकर, ये बलशाली मरुद्गण ऐश्वर्य की कामना से बल की उपासना करते हैं॥१॥
सदा युवा रहने वाले ये मरुद्गण किसके स्तोत्रों (हव्य) को स्वीकार करते हैं ? इन मरुतों को कौन यज्ञ की ओर प्रेरित कर सकता है ? अन्तरिक्ष में बाज़ पक्षी के समान विचरण करने वाले इन मरुतों को किन उदार-विशाल हृदय की भावनाओं से प्रसन्न करें ?॥२॥
हे महान् इन्द्रदेव ! आप अकेले कहाँ जाते हैं? आप ऐसे (महान् एवं पूज्य) क्यों हैं ? हे अश्वों से युक्त शोभनीय इन्द्रदेव ! अपने सान्निध्य में रहने वालों की आप सदैव कुशलक्षेम पूछते रहते हैं। अत: हमारे हित की जो भी बात आप कहना चाहें, वह कहें॥३॥
(इन्द्रदेव की अभिव्यक्ति) मननशील स्तुतियाँ एवं सोम मेरे लिए सुखकारी हों । मेरा बलशाली वैज्र शत्रुओं की ओर जाता है । स्तुतियाँ मेरी प्रशंसा करती हुई मेरी तरफ आती हैं। दोनों अश्व मुझे लक्ष्य की ओर ले जाते हैं॥४॥
हम अपने (इन्द्रियों रूपी) अति बलशाली अश्वों से युक्त होकर, महान् तेजस्विता से स्वयं को सज्जित करके, उनका उपयोग शत्रुओं के विनाश के लिए करते हैं। अत: हे इन्द्रदेव ! आप अपनी धारण-क्षमताओं को हमारे अनुकूल बनायें॥५॥
हे मरुद्गणो ! तुम्हारी वह स्वाभाविक शक्ति कहाँ थी, जिसे तुमने वृत्रवध के अवसर पर अकेले मुझ (इन्द्र) में स्थापित किया था। (वैसे तो मैं (इन्द्र) स्वयं ही शक्तिशाली, बलवान् , शूरवीर हूँ। मैंने अपने शस्त्रास्त्रों से भयंकर से भयंकर शत्रुओं को भी झुकने के लिए मजबूर किया है॥६॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! आपने हमारे (मरुतों के साथ मिलकर अपनी सामर्थ्य के अनुरूप अनेकों वीरतापूर्ण कार्य किये हैं । हे शक्ति सम्पन्न इन्द्रदेव ! हम (मरुतों ) ने भी अति वीरतापूर्ण कार्य किये हैं। हम (मरुद्गण) अपने पुरुषार्थ से जो भी चाहते हैं, प्राप्त कर लेते हैं॥७॥
है मरुतो ! अपनी सामर्थ्य शक्ति से ही मैंने (इन्द्रदेव ने) वृत्रासुर का संहार किया और अपने ही पराक्रम से शक्ति सम्पन्न बना। वज्र को हाथों में धारण करके मैंने (इन्द्रदेव ने) ही मनुष्यों तथा सभी प्राणियों के कल्याण के लिए, आनन्ददायी जल - प्रवाहों को सहजता से प्रवाहित किया॥८॥
हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आपसे बढ़कर और कोई धनवान नहीं है । आपके समान कोई ज्ञानी भी नहीं है। हे महान् इन्द्रदेव ! आपके द्वारा किये गये कार्यों की समानती न कोई कर सका है और न ही आगे कर सकेगा॥९॥
मैं (इन्द्र) जिन कार्यों को करने की कामना करता हैं, उन्हें एकाग्र मन से करता है, इसलिए मेरी अकेले की कीर्ति पताका चारों ओर फहरा रही है । हे मरुद्गणो ! चूँकि मेरे अन्दर वीरोचित शौर्य और विद्वत्ता है, इसलिए जिनकी तरफ भी जाता हैं, उनका स्वामी बनकर शक्तियों का उपभोग करता हूँ॥१०॥
हे नेतृत्वकर्ता, मित्र मरुतो ! आपने जो प्रशंसित स्तोत्र मेरे (इन्द्र के) निमित्त रचित किये हैं, उनसे मुझे अभूतपूर्व आनन्द की प्राप्ति हुई है। ये स्तोत्र, वैभवशाली शक्तिसम्पन्न उत्तम याज्ञिक तथा शक्ति सम्पन्न मेरी सामर्थ्य को और भी पुष्टं करने वाले हैं॥११॥
हे मरुतो ! इसी प्रकार मुझे ( इन्द्र को ) स्नेह प्रदान करते हुए, प्रशंसनीय धन-धान्य को धारण करते हुए, आनन्द प्रदायक स्वरूप से युक्त होकर चतुर्दिक मेरा यशोगान करें॥१२॥
हे मरुद्गणो ! यहाँ कौन आपकी पूजा- अर्चना करते हैं, यह भलीप्रकार जानकर मित्र के समान जो आपके हितैषी है, उनके समीप जायें ।उनके द्वारा किये जाने वाले उद्देश्यपूर्ण स्तोत्रों के अभिप्राय को जानकर उसे पूरा करें॥१३॥
हे मरुतो ! सम्माननीय स्तोता की मति हमें प्राप्त हो, जिससे हम स्तोत्रों के द्वारा आपकी (भली भाँति) स्तुति कर सकें । चूँकि स्तोता आपकी स्तोत्रों के द्वारा स्तुति करते हैं, अतः आप उन ज्ञान-सम्पन्नों की ओर उन्मुख हों॥१४॥
हे मरुतो ! यह वाजी ( यह स्तोत्र) आपके लिए है, अत: आप आनन्ददायी, सम्माननीय स्तोता को परिपुष्ट करने के निमित्त पधारें । हम भी अन्न, बल तथा यशस्वी धन प्राप्त करें॥१५॥

सूक्त - १६६

वर्षणशील मेघों को विभाजित करने वाले हे वीर मरुद्गणो ! हम आपके पुरातन महत्व का यशोगान करते हैं, हे गर्जनशील मरुतो ! योद्धाओं तथा धधकती हुई अग्नि के समान चढ़ाई करते हुए शत्रुओं का संहार करें॥१॥
युद्ध में शत्रुओं का संहार करने वाले, बालकों के समान मधुर क्रीड़ा करनेवाले रुद्र पुत्र-मरुद्गण, स्तोताओं की उसी तरह रक्षा करते हैं, जैसे पिता पुत्र की ये मरुद्गण हविदाता (याजक) को कष्ट नहीं होने देते॥२॥
अविनाशी वीर मरुतों ने अपनी संरक्षण शक्ति से युक्त होकर, जिस हविदाता को धनसम्पदा से परिपुष्ट किया, उसके लिए कल्याणकारी मित्रों के समान सुखदायक होकर उपजाऊ भूमि को प्रचुर जल से सींचते हैं॥३॥
हे मरुद्गणो ! आप गतिशील वीर अपनी शक्तियों से सभी का संरक्षण करते हैं। अपने ही अनुशासन में रहने वाले आप जब तीव्र गति से दौड़ते हुए अपने शस्त्रों को चलाते हैं, तब सारे लोक, बड़े-बड़े राजभवन कॉप उठते हैं । आपकी ये हलचलें वास्तव में आश्चर्यजनक हैं॥४॥
हे मरुद्गणो ! तीव्रगति से हमला करने वाले जब आप पहाड़ों को अपनी शब्द ध्वनि से गुञ्जित करते हैं, तथा जनकल्याण के इच्छुक आप अन्तरिक्ष के पृष्ठ भाग से गुजरते हैं, तो उस समय आपकी इस चढ़ाई से सभी वृक्ष भयभीत हो जाते हैं और समस्त ओषधियाँ भी रथ पर आरूढ़ महिलाओं के समान विचलित हो जाती हैं॥५॥
हे मरुतो ! अपने सबल हाथों से तीक्ष्ण हथियारों को धारण किये हुए आप शत्रुसेना का संहार कर देते हैं, तथा शत्रुओं के हिंसक पशुओं का भी वध कर देते हैं। उस समय हे पराक्रमी वीरो ! आप अपनी श्रेष्ठ आन्तरिक भावनाओं से हमें श्रेष्ठ विचार-प्रेरणाएँ प्रदान करें तथा हमारे ग्रामों को न उजाड़े॥६॥
शत्रुओं के संहारक, आश्रयदाता, उत्तम प्रशंसनीय, वीर मरुद्गणों के ऐश्वर्य को कोई नहीं छीन सकता है। ये वीर मरुद्गण सोमरस का पान करने के लिए संग्रामों और यज्ञों में तेजस्वी देवताओं की पूजा करते हैं; क्योंकि उनमें वीरों की शक्तियों की यथोचित परख करने की क्षमता होती है॥७॥
हे पराक्रमी, बलिष्ठ और सामर्थ्यवान् वीर मरुतो ! आप जिन्हें विनाश, पापकृत्यों तथा परनिन्दा से बचाते हैं, उन्हें सैकड़ों उपभोग के साधन प्रदान करके अपना समर्थ संरक्षण देकर, अभेद्य नगरी में निवास योग्य बनाते हैं, ताकि वे अपनी सन्तानों का भली प्रकार से पालन-पोषण कर सकें॥८॥
हे वीर मरुद्गणो ! आपके रथों में सभी कल्याणकारी वस्तुएँ स्थापित हैं । आपके कन्धों पर स्पर्धा योग्य शक्तिशाली आयुध हैं । लम्बे मार्गों के लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री संगृहीत है। आपके रथ और चक्र समयानुकूल घूमते हैं॥९॥
जनहितकारी इन वीर मरुतों की भुजाओं में यथेष्ट कल्याणकारी सामर्थ्य है । उनके वक्षस्थल एवं कन्धों पर विभिन्न वर्गों से युक्त सुदृढ़ रत्नाभूषण सुशोभित हैं । उनके वज्र तीक्ष्ण धार वाले हैं । पक्षियों के प धारण करने के समान ये वीर विविध विभूतियाँ धारण करते हैं॥१०॥
जो वीर मरुद्गण अपनी महत्ता से सामर्थ्यवान्, ऐश्वर्यसम्पन्न, आकाश के नक्षत्रों की भाँति देदीप्यमान, दूरदर्शी, उत्साही सुन्दर वाणी से मधुर गान करने वाले हैं, वे इन्द्रदेव के सहयोगी हैं ।अतः हर प्रकार से प्रशंसनीय हैं॥११॥
हे उत्तम कुल में उत्पन्न वीर मरुद्गण ! आपकी उदारता अदिति (भूमि) के समान ही महान् है । यह आपकी महानता वास्तव में प्रसिद्ध है । जिस पुण्यात्मा (सत्कर्मरत) मनुष्य को आप अपनी त्याग भावना से अनुदान प्रदान करते हैं, इन्द्रदेव भी उसे क्षीण नहीं करते॥१२॥
हे अमरवीर मरुतो !आपके भ्रातृपन की ख्याति चतुर्दिक व्याप्त है । प्राचीन काल में जिन स्तोत्रों को सुनकर आप भलीप्रकार हमारा संरक्षण कर चुके हैं, उन्हीं स्तोत्रों के प्रभाव से पराक्रमी नेतृत्व प्रदान करने वाले आप, मनुष्य मात्र के कर्मों के अनुरूप उनके ऐश्वर्य की रक्षा करते हुए उनके दोषादि दूर हटाते हैं॥१३॥
हे गतिशील वीर मरुद्गण ! आपके जिस महान् ऐश्वर्य के सहयोग से हम विशाल दायित्वों का निर्वाह करते हैं और जिससे समरक्षेत्र की चारों दिशाओं में विजयी होते हैं, उन सभी सामथ्र्यों को हम इन यज्ञीय कम द्वारा प्राप्त करें॥१४॥
हे शूरवीर मरुद्गण ! महान् कवि द्वारा रचित यह आनन्दप्रद काव्य रचना आपकी प्रशंसा के निमित्त है । ये स्तुतियों आपकी कामनाओं की पूर्ति एवं शरीर बल बढ़ाने के निमित्त प्राप्त हों । इसी तरह आप भी हमें अन्न, बल और विजयश्री शीघ्रतापूर्वक प्रदान करें॥१५॥

सूक्त - १६७

है अश्व युक्त इन्द्रदेव ! आपके हजारों रक्षा साधन हमारे संरक्षण के निमित्त हैं। हे इन्द्रदेव ! आप हजारों प्रकार के प्रशंसनीय अन्न, आनन्दित करनेवाले धन तथा असीमित बल हमें प्रदान करें॥१॥
ये अति कुशल वीर मरुद्गण अपने पुरुषार्थी संरक्षण सामथ्र्यो तथा महान् ऐश्वर्य के साथ हमारे समीप पधारें । इनके ‘नियुत' नामक श्रेष्ठ अश्व समुद्र पार से (अति दूर से) भी धन ले आते हैं॥२॥
मेघ मण्डल में स्थित विद्युत् के समान ही जिन वीर मरुद्गणों के मजबूत हाथों में स्वर्णवत् चमकने वाली तलवार (मर्यादा में रहने वाली पत्नी के समान) परदे (म्यान) में छिपी रहती है । वह विद्वानों की वाणी के समान किन्हीं विशेष परिस्थितियों में बाहर आकर अपना स्वरूप दर्शाती है॥३॥
गतिमान् एवं तेजस्वी मरुद्गण भूमि पर दूर-दूर तक जल की वृष्टि करते हैं । (विशिष्ट होते हुए भी) साधारण व्यक्तियों की तरह मरुद्गण द्युलोक एवं भूलोक में विद्यमान किसी की भी उपेक्षा नहीं करते, सभी से मित्रता बनाए रखते हैं। इसी कारण ये (मरुद्गण) महान् हैं॥४॥
मनुष्यों के मन को हरने वाली, जीवन प्रदायिनी विद्युत् ने मरुद्गणों का वरण किया। विविध किरणों को समेटती हुई सूर्य की भाँति तेजस्वी वह विद्युत् इन (मरुद्गणों) के साथ रथ पर आरूढ़ होती है॥५॥
हे वीर मरुद्गण ! जब हविष्यान्न युक्त, सोमरस लेकर सम्मान प्राप्त साधक यज्ञों में स्तोत्रों का गायन करते हुए आप सभी की पूजा करते हैं, तब याजक की बलशाली नव यौवनी पत्नी को आप शुभ यज्ञ (सन्मार्ग) में ले आते हैं॥६॥
इन वीर मरुद्गणों की स्तुत्य महिमा का हम यथावत् वर्णन करते हैं। इनकी महिमा के अनुरूप सुस्थिर भूमि भी इनकी अनुगामिनी बनकर, इन सामर्थ्यवानों से प्रेम करती हुई, स्वाभिमान की रक्षा करती हुई सौभाग्यशाली प्रज्ञा का पोषण करती है॥७॥
मित्र, वरुण और अर्यमा, निंदनीय दोष विकारों एवं निंदनीय पदार्थों के उपयोग से आपको बचाते हैं। हे मरुतो ! आप अडिग अपराजेयों को भी पदों से च्युत कर देते हैं। आपका दिया अनुदान निरन्तर बढ़ता रहता है॥८॥
हे वीर मरुतो ! आपकी सामर्थ्य अनन्त है, जिसका ज्ञान दूर या नजदीक से किसी भी प्रकार कर पाना असम्भव है। आपकी शक्ति, शत्रु सेना को जल के समान घेरकर विनष्ट कर डालती है॥९॥
आज हम इन्द्रदेव के विशेष कृपापात्र बने हैं, उसी प्रकार कल (भविष्य में) भी उनके कृपापात्र बने रहें । हम इन्द्रदेव की प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं, जिससे हम सदैव विजयश्री का वरण करते हुए महानता को प्राप्त हों । इन्द्रदेव की कृपा हम सभी के लिए अनुकूल हो॥१०॥
हे मरुद्गण ! ये स्तोत्र आपके निमित्त उच्चारित किये जा रहे हैं। अतएव आनन्दप्रद तथा सम्माननीय आप स्तोता के शारीरिक पोषण के निमित्त आएँ और हमें भी अन्न, बल और विजयश्री दिलाने वाला ऐश्वर्य प्रदान करें॥११॥

सूक्त - १६८

हे मरुद्गण ! प्रत्येक यज्ञीय कर्म में आपके मन की अनकलता ही कार्य को तत्परता से सम्पन्न करा लेती है । आपका चिन्तन देवत्व की ओर ही उन्मुख होता है। हम आकाश और पृथ्वी की सुस्थिरता तथा संरक्षण की कामना से श्रेष्ठ स्तुतियों द्वारा आपको यहाँ आवाहित करते हैं॥१॥
हे मरुद्गण ! आप अपनी सामर्थ्य से अत्यधिक पौष्टिक अन्न की प्राप्ति के लिए स्वयं प्रकट हुए हैं। आप जल की लहरों के समान हजारों लोगों द्वारा प्रशंसित हैं । आप पूज्य गौ आदि (पशुधन) के समान सदैव हमारे समीप रहें॥२॥
सोमरस पान करने से जिस प्रकार तृप्ति होती हैं, उसी प्रकार इन मरुद्गणों के कंधों पर सुशोभित आयुधों का आश्रय प्राप्त कर सेना प्रसन्न एवं निर्भय होती है ।इन मरुद्गणों के हाथों में अलंकृत तलवारें भी सुशोभित हैं॥३॥
अपनी ही इच्छा से कर्मरत ये मरुद्गण दिव्यलोक से अनायास ही अन्तरिक्ष में आये हैं । हे अविनाशी मरुतो ! आप अपनी शक्तियों से प्रेरणा प्रदान करें। प्रखर एवं तेजस्वी शक्तियों से हथियारों को धारण करने वाले ये वीर मरुद्गण प्रबलतम शत्रुओं को भी परास्त कर देते हैं॥४॥
हे आयुधों से सुशोभित वीर मरुतो ! आप अन्न वृद्धि के लिए विशेष प्रेरणाएँ प्रदान करते हैं । धनुष से छोड़े गये बाण के समान, प्रशिक्षित अश्वों के समान तथा जीभ के साथ स्वत: चलायमान हुनु (डी) की तरह कौन आपको गतिशील करता है?॥५॥
हे वीर मरुद्गण ! आप जिस महान् तथा असीम अन्तरिक्ष से आते हैं, उसका आदि-अन्त कौन सा है? जब आप सघन बादलों को हिलाते हैं, उस समय वज्र प्रहार से आश्रयहीन होने के समान वे तेजस्वी बादल जल वृष्टि करने लगते हैं॥६॥
हे वीर मरुद्गण ! आपके अनुदानों की तरह ही आपकी सम्पदा भी है । वह सामर्थ्यवान्, सुखप्रद, तेजसम्पन्न, विशिष्ट फलदायक, शत्रुदल संहारक तथा कल्याणकारी है। आपकी कृपा दक्षिणा के समान ही विजय प्रदान करने वालीं और दैवी शक्ति के समान शत्रु को परास्त करने वाली है॥७॥
जब इन वीर मरुद्गणों के रथ के पहियों से मेघों के गर्जन के समान प्रतिध्वनि सुनाई देती हैं, तब नदियों के जल प्रवाह में भारी खलबली मच जाती है । वीर मरुद्गण जब जल वृष्टि करते हैं, तब पृथ्वी पर विद्युत् तरंगें मानो हास्य कर रहीं प्रतीत होती हैं॥८॥
मातृभूमि की प्रेरणा से महासंग्राम के लिए गतिशील वीर मरुतों की प्रखर तेजस्वी सेना अस्तित्व में आयी। संगठित होकर शत्रुओं पर प्रहार करने वाले इन वीरों ने संग्राम में प्रखर तेजस्विता का परिचय दिया। उसके बाद सभी ने अन्न उत्पादक एवं धारक क्षमताओं को भी चारों ओर फैले हुए अनुभव किया॥९॥
हे वीर मरुतो ! सम्माननीय कवियों द्वारा आपको प्रसन्न करने के लिए उनके द्वारा की गई काव्य रचना आपके निमित्त समर्पित है । ये स्तुतियाँ आपको परिपुष्ट बनाएँ। हमें भी अन्न, बल तथा विजय प्राप्त कराएँ॥१०॥

सूक्त - १६९

हे इन्द्रदेव ! आप महान् देवताओं के एवं त्याग की प्रतिमूर्ति मरुद्गणों के भी संरक्षक हैं । हे ज्ञान सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप हमसे परिचित हैं, अतः मरुद्गणों और अपनी प्रिय सामग्री में प्रदान करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! जिन मरुद्गणों की सेना युद्ध के प्रारम्भ होने पर विशेष हर्षित होती हुई, सुख की अनुभूति करती है । शत्रुओं को दूर भगाने वाले वे सम्पूर्ण मनुष्यों के ज्ञाता मरुद्गण, सर्वोत्तम आपका ही सहयोग करते हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा सृजित (वज्र) हमें उपलब्ध हो । ये मरुद्गण सदैव जल वृष्टि करते हैं जिस प्रकार अग्नि काष्ठ को और जल द्वीप को धारण करता है । उसी प्रकार मरुद्गण अन्न (पोषण) प्रदान करते हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! मधुर दूध से जिस प्रकार स्तन परिपुष्ट होते हैं, वैसे ही हमारी स्तोत्र वाणियों से प्रसन्न होकर आप अभीष्ट अन्नादि से हमें परिपुष्ट करें । दक्षिणा में प्राप्त धन की तरह ही हमें धन सम्पदाओं से सम्पन्न बनाएँ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपके पास ऐसी धन सम्पदा हैं, जो यजमानों को संतुष्ट करके उन्हें यज्ञीय सत्कर्मों की ओर प्रेरित करती है । हे इन्द्रदेव ! जो मरुद्गण प्राचीन काल से ही यज्ञीय सत्कर्मों के पूर्वाभ्यासी हैं, वे हमें सुख-सौभाग्य प्रदान करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप व्यापक स्तर पर जल वृष्टि के लिए अग्रणीं मरुद्गणों के समीप जाएँ और उनके साथ मिलकर भूमण्डल में पराक्रम का परिचय दें । युद्ध में पराक्रम करने के समान मरुत् के अश्व (मेघों पर) आक्रमण करते हैं॥६॥
जिस प्रकार ऋणी मनुष्य को अपराधी मानकर दण्डित किया जाता है, उसी प्रकार इन्द्रदेव के सहयोगी मरुद्गण भी युद्धाकांक्षी असुरों को शस्त्रों के प्रहार से जकड़कर, जमीन पर पटक देते हैं, तब भयंकर, शीघ्र गमनशील, आक्रमणकारी और शत्रुओं को घेरने वाले इन मरुतों का शब्दनाद सुनाई देता है॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप मरुतों के सहयोग से अपनी विश्व-उत्पादक सामर्थ्य से, अपनी प्रतिष्ठा के लिए गौओं को आगे रखकर (अपने बचाव के लिए) युद्ध लड़ रहीं शोषण कारी शत्रु सेना का संहार करें । हे इन्द्रदेव ! आपकी प्रार्थना स्तुत्य देवताओं के साथ हीं की जाती है। हम आपके सहयोग से अन्न, बल और विजयश्री प्राप्त करें॥८॥

सूक्त - १७०

(इन्द्र का कथन) जो आज नहीं, वो कल भी नहीं (प्राप्त होगा) । जो हुआ ही नहीं हैं, उसे कैसे जाना जा सकता है ? दूसरे को चित्त चलायमान है, अत: वह संकल्प करेगा, तो भी बदल सकता है॥१॥
(अगस्त्य का कथन) हे इन्द्रदेव ! मुझ निरपराधी का वध आप क्यों करना चाहते हैं ?मरुद्गण आपके भाई है। आप उनके साथ यज्ञ के श्रेष्ठ भाग को प्राप्त करें । हे इन्द्रदेव ! हमें युद्ध क्षेत्र में हिंसित न करें॥२॥
हे भ्रातृस्वरूप अगस्त्य ! आप हमारे मित्र होकर हमारा अपमान क्यों करते हैं ?आपका मन जिस (लोभ) भावना से ग्रस्त हैं, उसे हम भली प्रकार जानते हैं। आप हमारा भाग हमें नहीं देना चाहते हैं॥॥३॥
याज्ञिक जन, यज्ञ वेदिका को भली प्रकार सुसज्जित करें । उसमें सबसे पहले अग्नि को प्रज्वलित करें । वहाँ पर हम आपके निमित्त अमरत्व को जाग्रत् करने वाली यज्ञीय भावनाओं को विस्तारित करें॥४॥
हे धनाधिपति इन्द्रदेव ! आप सम्पूर्ण धनों को अपने स्वामित्व में रखते हैं। हे मित्र रक्षक ! आप मित्रों के विशेष धारण करने योग्य आश्रय हैं। हे इन्द्रदेव ! आप मरुद्गणों के साथ सद्व्यवहार करें और उनके साथ ऋतुओं के अनुसार हमारे द्वारा प्रदत्त आहुतियों का सेवन करें॥५॥

सूक्त - १७१

हे मरुद्गण ! हम स्तुति गान करते हुए विनयावनत हो आपके समीप आते हैं। तीव्र गति से जाने वाले आप वीरों के श्रेष्ठ परामर्शो की हम याचना करते हैं। इन ज्ञानवर्धक स्तुतियों से हर्षित होकर किसी भी प्रकार के विद्वेष को भुला दें तथा रथ से घोड़ों को मुक्त कर दें (यहीं हमारे समीप रहें)॥१॥
है वीर मरुतो ! इस विनम्रभाव तथा एकाग्र मन से रचित स्तोत्रों को आप ध्यानपूर्वक सुनें । हे दिव्य वीरो ! हृदय से हमारे स्तोत्र से प्रशंसित होकर आप हमारे समीप आयें । आप ही इस (हव्य) को बढ़ाने वाले हैं॥२॥
स्तुतियों से प्रशंसित होकर मरुद्गण हमारे लिए सुख-सौभाग्य प्रदान करें, उसी प्रकार सबके सुखप्रदायक, वैभवशाली इन्द्रदेव भी स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें सुखी करे हे मरुद्गण ! हमारा शेष जीवन प्रशंसनीय, सुन्दर तथा योग्य बने॥३॥
है मरुतो ! इन शक्तिशाली इन्द्रदेव के भय से हम घबराते और कॉपते हैं। (भय के कारण आपके निमित्त तैयार की गयीं आहुतियाँ एक तरफ कर दी गयी । अत: (आप हमारे ऊपर नाराज न हों, अपितु) हमें सुखी बनायें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी जिस सामर्थ्य से प्रेरित होकर किरणे नित्य उषाओं के प्रकाशित होने पर सर्वत्र आलोक फैलाती हैं । हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! पराक्रमियों में सर्वश्रेष्ठ शूरवीर तथा बलप्रद आप मरुतों के सहयोग से हमें अन्न प्रदान करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं का संहार करने वाले नेतृत्वकर्ताओं का संरक्षण करें और मरुतों के साथ रहने वाले आप क्रोध से रहित हों । श्रेष्ठ तेजस्विता से सम्पन्न तथा शत्रविनाशक सामर्थ्य को आप धारण करते हैं। हम भी अन्न, बल और दाता की वृत्ति को स्वाभाविक रूप में धारण करें॥६॥

सूक्त - १७२

हे श्रेष्ठ दानवीर, अक्षय तेजसम्पन्न मरुतो !आपकी गति आश्चर्यजनक हैं, संरक्षण सामर्थ्य भी विलक्षण हैं॥१॥
, हे श्रेष्ठ दानवीर मरुद्गण ! आपके तीव्र गति से, शत्रु समूह पर फेंके गये शस्त्र हमसे दूर रहें । जिस वज्र से आप शत्रुओं पर प्रहार करें, वह भी हमसे दूर ही रहे॥२॥
हे श्रेष्ठ दानवीर मरुद्गण ! तिनके के समान सुगमता से नष्ट होने वाले इन प्रजाजनों को आप पतन के मार्ग से रोकें । हम प्रजाजनों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाकर दीर्घायु प्रदान करे॥३॥

सूक्त - १७३

कामनाओं की पूर्ति करनेवाली गौएँ (वाणी) यज्ञ में विराजमान् इन्द्रदेव की सेवा करती हैं। आप अपने ज्ञान के अनुसार शत्रु-हिंसक साम का गायन करें । हम भी इसी प्रकार इन्द्रदेव के लिए सुखदायी तथा उन्नतिकारी साम का गान करते हैं॥१॥
जिस समय हवि सेवन के इच्छुक इन्द्रदेव, सिंह के समान, अपने भक्ष्य (आहुतियों) की कामना करते हैं, उसी समय तेजस्वी अंत्वन् सामर्थ्यवर्धक अपना हविष्यान्न इन्द्रदेव को समर्पित करते हैं। है पुरुषार्थी इन्द्रदेव ! हविदाता, यज्ञकर्ता तथा होता, स्तोताओं के साथ मिलकर मन्त्रोच्चारपूर्वक आपके निमित्त हव्य प्रदान करते हैं॥२॥
होता इन्द्रदेव गतिशील होकर सर्वत्र संव्याप्त होते हैं और शरद तु से पूर्व (वर्षा ऋतु में) पृथ्वी के भीतरी भाग को जल से भर देते हैं । इन्द्रदेव को आते देखकर अश्व शब्द करते हैं, गौएँ भी रँभाती हैं । द्युलोक तथा भूलोक के बीच इन्द्रदेव दूत के समान घूमते हैं॥३॥
देवों के उपासक ऋत्विजोंं द्वारा जो शत्रु-संहारक हवि इन्द्रदेव के लिए अर्पित की जाती है, वहीं भली प्रकार से तैयार की गई हवि हम आपके निमित्त अर्पित करते हैं। दर्शनीय तेजस्विता युक्त और श्रेष्ठ गतिशील, रथ पर आरूढ़ वे इन्द्रदेव अश्विनीकुमारों के समान हमारे द्वारा प्रदत्त आहुतियों को स्वीकार करें॥४॥
हे मनुष्यो ! जो इन्द्रदेव शत्रुसंहारक, शूरवीर, ऐश्वर्य सम्पन्न, उत्तम सारथि, असंख्य विरोधियों से निर्भीकता पूर्वक युद्ध करने वाले, प्रचुर सामर्थ्य युक्त और छाये हुए अज्ञान रूपी अन्धकार के नाशक हैं, ऐसे गुणों से सम्पन्न इन्द्रदेव की ही आप अर्चना करें॥५॥
इन्द्रदेव अपनी महिमा से मनुष्यों के प्रभु हैं, उनके लिये कक्ष के ही समान आकाश और पृथ्वी, दोनों लोक पर्याप्त नहीं वे इन्द्रदेव बालों के समान पृथ्वी को तथा बैल के सींग के समान द्युलोक को धारण किये हुए हैं॥६॥
जो उत्साही वीरगण आनन्दित स्थिति में अत्रों के द्वारा ज्ञान सम्पन्न इन्द्रदेव को मरुतों के साथ प्रसन्न करते हैं, हे वीर इन्द्रदेव !वे सर्वोत्तम, श्रेष्ठ, मार्गदर्शक मानकर आपको ही युद्ध भूमि में भी अग्रणी स्थान प्रदान करते हैं॥७॥
जब जलों को समुद्र तथा समस्त भूक्षेत्रों में बरसाने के लिए इन्द्रदेव की स्तुति की जाती है, तब जल वृष्टि की कामना से किये जा रहे यज्ञ आनन्दप्रद होते हैं। जब ज्ञानी मनुष्य भावनापूर्वक इन्द्रदेव की प्रार्थना करते हैं, तब हर्षित इन्द्रदेव उन्हें अभीष्ट फल प्रदान करते हैं॥८॥
हे स्वामी इन्द्रदेव ! आप हमारे साथ वहीं व्यवहार करें, जिससे हमारी मित्रता आपके साथ रहे और हमारी स्तोत्र वाणिय आप से अभीष्ट साधनों की पूर्ति भी करा सकें । आप हमारी प्रार्थनाओं को सुनकर शीघ्र ही हमें कर्तव्यों का निर्वाह करने की शक्ति प्रदान करें॥९॥
याज्ञिकों के समान ही स्तोता लोग भी प्रशंसक वाणियों के द्वारा प्रतिस्पर्धा भावना से इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं, ताकि वज्रधारी इन्द्रदेव की मित्रता हमें प्राप्त हो । जैसे मध्यस्थ लोग शिष्टाचारवश मित्रता की कामना से कुछ (उपहार) देते हैं, वैसे ही राष्ट्र रक्षक इन्द्रदेव को यज्ञों के द्वारा दान स्वरूप हविष्यान्न समर्पित करते हैं॥१०॥
प्रत्येक यज्ञीय कर्म इन्द्रदेव को संवर्धित करते हैं, दुर्भावजन्य कुटिलता से किये गये यज्ञ से इन्द्रदेव प्रसन्न नहीं होते हैं। जिस प्रकार तीर्थ यात्रा में प्यासे को समीप का जल ही तुष्टि देता है, (दूर दिखने वाला जल तृप्त नहीं करता) उसी प्रकार श्रेष्ठ यज्ञ ही इन्द्रदेव को प्रसन्नता प्रदान करता है। जैसे लम्बा पथ पीड़ा पहुँचाता है, वैसे ही कुटिलतापूर्ण यज्ञ कुटिल फल प्रदान करता है॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप (मरुतों के साथ युद्ध में) हमारा भी साथ मत छोड़ना । हे बलशाली ! आपके लिए यज्ञ भाग प्रस्तुत है । हमारी सुख देने वाली, फलित होनेवाली स्तुतियाँ अन्न और जल देने वाले मरुतों की भी वन्दना करती हैं॥१२॥
हे अश्वों से सम्पन्न देवस्वरूप इन्द्रदेव ! हमारी ये स्तुतियाँ आपके निमित्त हैं, इनसे हमारे यज्ञ के उद्देश्य को समझें । हमें कल्याणकारी धन सम्पदा प्रदान करें; जिससे हम अन्न, बल तथा विजयश्री प्रदान करने वाले सैनिकों को प्राप्त करें॥१३॥

सूक्त - १७४

हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! आप संसार के अधिपति हैं। देवशक्तियों के सहयोग से आप मनुष्यों की रक्षा करें । आप सत्कर्मशील मनुष्यों के पालक हैं, आप हम वीरों को संरक्षित करें । आप ऐश्वर्यवान् हमारे तारणकर्ता हैं। आप ही श्रेष्ठ आश्रय दाता और बलदाता हैं॥१॥
हे इन्द्रदेव ! जिस समय आपने शरदकालीन निवास योग्य शत्रुनगरों के सात भवनों को विनष्ट किया, उसी समय कटुभाष शत्रुसैनिकों को भी विनष्ट कर दिया । हे अनिन्दनीय इन्द्रदेव ! आपने प्रवाहित होने वाले जलों के द्वारों को खोल दिया और युवा 'पुरुकुत्स' के लिए वृत्रासुर का संहार किया॥२॥
आवाहन योग्य हे इन्द्रदेव !आप निश्चित ही जिन मरुद्गणों के साथ दिव्य लोक में जाते हैं, उनके सहयोग से वीरों को सुरक्षित करके शत्रुओं की अभेद्य दीवारों को तोड़ देते हैं। हे इन्द्रदेव ! हमारे घरों में जलों की पति के लिए सिंह के समान अपनी पराक्रमी सामर्थ्य से इस रोगनाशक तीव्र गतिशील अग्नि को संरक्षित करें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आपको महिमा-मण्डित करने के लिए वज्र के प्रहार से युद्ध भूमि में ही असुर धराशायी होकर गिर पड़े। जिस समय आपने योद्धा शत्रुओं के पास जाकर उनके द्वारा अवरुद्ध जल प्रवाहों को प्रवाहित किया, उसी समय आप दोनों घोड़ों पर आरूढ़ हो गये। आपने अपनी घर्षक और शत्रुसंहारक सामर्थ्य से वीर सैनिकों को दोष मुक्त किया॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप कुत्स के जिस यज्ञ में हवि सेवन की कामना करते हैं, उसी ओर सुखदायी, सीधे मार्गों से, वायु की गति के समान शीघ्र गामी अपने अश्वों को प्रेरित करें । युद्ध में सूर्यदेव अपने चक्र को उनके समीप ले जायें और हाथों में वज्र धारण करने वाले इन्द्रदेव शत्रु सेनाओं की ओर उन्मुख हों॥५॥
हे अश्वों से युक्त इन्द्रदेव ! आपने अति उत्साह में मित्रों के शत्रुओं तथा यज्ञीय कर्मों से रहित दुष्टों का संहार किया। ऐसे आप को जो, अन्न- दान से संतुष्ट करते हैं, उन्हें आप सन्तान और वीरता प्रदान करते हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! ऋषियों ने स्तुतिगान के समय जब आपके निमित्त प्रशंसक वाणी का प्रयोग किया, तब आपने शत्रुओं का संहार करके उन्हें पृथ्वी रूपी शैय्या पर सुला दिया। ऐश्वर्यवान् इन्द्र ने तीन भूमियों (पर्वतमय,सम तथा जलमय) को उत्तम अन्न, ऐश्वर्य एवं सुखदायी पदार्थों से सुशोभित किया । दुर्योणि के लिए युद्ध में आपने कुयवाचे राक्षस का संहार किया॥७॥
हे इन्द्रदेव !आपकी शाश्वत स्तोत्रवाणियों का प्रषियों ने दुबारा गान किया है। आपने आसुरी शक्तियों को युद्ध रोकने के लिए दवाया है तथा शत्रुओं के दुर्गों को तोड़ने के समान ही असुरता की अभेद्य शक्ति को अपनी सामर्थ्य से छिन्न-भिन्न कर दिया है। हिंसक शत्रु के शस्त्रादि बल की तीक्ष्णता को भी अपने क्षीण कर दिया है॥८॥
है इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं को अपनी सामर्थ्य से भयभीत करने वाले हैं। प्रवाहित नदियों के समान ही जल के अथाह भण्डार को आपने खोल दिया । हे पराक्रमी वीर इन्द्रदेव ! जब आप समुद्र को जल से परिपूर्ण कर देते है, तभी आप तुर्वश और यदु को दक्षतापूर्वक पार उतारते हैं॥९॥
है इन्द्रदेव ! आप सदैव हमारे निष्कपट प्रजा संरक्षक हैं। ऐसे आप हमारी सम्पूर्ण सैन्यशक्ति की प्रभाव क्षमता को संवर्धित करें, जिससे हम भी अन्न, बल और दीर्घायु के लाभ को प्राप्त कर सकें॥१०॥

सूक्त - १७५

है अश्वधारक इन्द्रदेव ! बड़े पात्र के समान आप महान् हैं । आनन्ददायक, हर्षवर्द्धक, बलवर्द्धक, शक्तिशाली असंख्यों दान देने वाले आप सोमरस का पान करते हुए आनन्द की अनुभूति करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आपके लिए तैयार किया गया बलवर्द्धक, हर्षदायक, श्रेष्ठ, सामर्थ्ययुक्त, पीने योग्य अविनाशी, शत्रु विजेता, आनन्ददायी यह सोमरस आपको प्राप्त हो॥२॥
है इन्द्रदेव ! आप वीर और दानदाता हैं। मनुष्य के मनोरथों को भलीप्रकार प्रेरित करें। जैसे अग्निदेव अपनी ज्वाला से पात्र को तपाते हैं, वैसे ही आप सहायक बनकर दुष्टों और मर्यादाहीनों को नष्ट करें॥३॥
हे मेधावी इन्द्रदेव ! आप सबके स्वामी हैं, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए आपने अपनी सामर्थ्य शक्ति के द्वारा सूर्यदेव से चक्र (शक्ति) प्राप्त किया। आप 'शुष्ण' के संहार के लिए, वायु के समान वेगशील अश्वों द्वारा अपने प्रहारक वज्र को कुत्स के समीप पहुँचायें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी प्रसन्नता सबको शक्ति देने वाली है तथा आपके श्रेष्ठ कर्म प्रचुर अन्न प्रदान करने वाले हैं । अश्वों के दान में प्रख्यात आप हमें वृत्रवध करने वाले तथा ऐश्वर्य सम्पदा देने वाले शस्त्रों को प्रदान करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! प्राचीन स्तोताओं के लिए आप, प्यासे के लिए जल और दुःखी के लिए सुख मिलने के समान ही आनन्ददाता और प्रिय सिद्ध हुए हैं। आपकी सनातन स्तुतियों से हम आपको आमन्त्रित करते हैं, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घायुष्य प्राप्त करें॥६॥

सूक्त - १७६

हे इन्द्रदेव ! एश्वर्य सम्पदा की प्राप्ति के लिये आप हमें आनन्दित करें । हे बलदायक सोम ! आप इन्द्रदेव के शरीर में प्रविष्ट हों । शत्रुओं का संहार करते हुए आप देवशक्तियों के अन्दर भी संव्याप्त हों तथा विकार रूपी शत्रुओं को समीप न आने दें॥१॥
जो इन्द्रदेव सम्पूर्ण प्रजाजनों के एकमात्र अधीश्वर हैं, जिन इन्द्रदेव के प्रति आप हविष्यान्न समर्पित करते हैं, जो शक्तिशाली इन्द्रदेव किसान द्वारा जो की फसल को काटने के समान ही शत्रुओं का संहार करते हैं । आप सभी उन्हीं इन्द्रदेव की स्तुतियों द्वारा अर्चना करें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपके हाथों में पाँचों प्रकार की प्रजाओं की वैभव सम्पदा है। ऐसे आप हमारे विद्रोहियों को परास्त करें और आकाश से गिरने वाली तड़ित विद्युत् के समान ही उनको विनष्ट करें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! जो आपके लिए सोमाभिषवण नहीं करते, जो यज्ञकर्मों से विहीन दुष्कर्मी बड़ी कठिनाई से नियन्त्रण में आने वाले हैं, ऐसे दुष्टों का आप संहार करें । उनकी धनसम्पदा को हमें प्रदान करें॥४॥
स्तोत्रों के उच्चारण के समय सदैव उपस्थित रहकर आपने जिन दो प्रकार के (स्तोत्र-ज्ञानयज्ञ, आहुतिपरक-हविर्यज्ञ) यज्ञों को सम्पन्न कराने वाले यजमानों की रक्षा की हैं। हे सोम ! उसी प्रकार आप युद्ध के समय इन्द्रदेव की तथा ऐश्वर्यप्राप्ति के समय यजमानों की रक्षा करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप प्राचीन स्तोताओं के लिए प्यासे को जल और दु:ख पीड़ितों के सुख प्राप्ति की भाँति ही आनन्ददायक और प्रीतियुक्त हुए। आपकी उन्हीं प्राचीन स्तुतियों द्वारा हम आपको आमन्त्रित करते हैं । आप वी कृपा से हम अन्न, बल और दीर्घजीवन प्राप्त करें॥६॥

सूक्त - १७७

हे इन्द्रदेव ! आप प्रजाजनों के पालक, शक्तिशाली मनुष्यों के अधिपति और बहुतों द्वारा आवाहनीय हैं । आप स्तुतियों से प्रशंसित होकर हमारे यज्ञ की कामना करते हुए, संरक्षण साधनों के साथ बलिष्ठ अश्वों को रथ से संयुक्त करके हमारे समीप आयें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! जो आपके पास बलिष्ठ, सामर्थ्यवान् और संकेत मात्र से रथ में जुड़ जाने वाले घोड़े हैं, उनको रथ में जोतकर, रथ में बैठकर हमारी ओर आये । हे इन्द्रदेव ! हम सोम अभिषवण के समय आपका आवाहन करते हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप बलशाली रथ पर विराजमान हों । आपके निमित्त शक्तिप्रद सोमरस अभिषुत किया गया है, उसमें मधुर पदार्थों को मिश्रित किया गया है । है शक्तिशाली इन्द्रदेव ! आप बलिष्ठ अश्वों को विशेष गतिवाले रथ से जोड़कर अपनी प्रजा के समीप जायें॥३॥
हे इन्द्रदेव ! देवताओं को प्राप्त होने वाला यह यज्ञ, दुधारू पशु, स्तोत्र और सोमरस आपके निमित्त हैं। आपके लिए यह आसन बिछा हुआ है । हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! आप समीप आयें और यहाँ आसन पर बैठकर सोमपान करें। यहीं पर अपने घोड़ों के बन्धनों को खोलें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! भली-भाँति स्तुत्य आप, सम्माननीय स्तोता के स्तनों को सुनकर हमारे समीप आये । हम नित्यप्रति आपके संरक्षण से आपकी प्रशंसा करते हुए, धनसम्पदा हस्तगत करें और अन्न, बल तथा विजयश्री का दान प्राप्त करें॥५॥

सूक्त - १७८

हे इन्द्रदेव ! जिन धनों से आप स्तोताओं का संरक्षण करते हैं, वह हमें प्रदान करें । हमारी श्रेष्ठ अभिलाषाओं को न रोककर आप हमारे लिये उपयोगी ऐश्वर्य प्रदान करें॥१॥
हमारी अंगुलियों ने जिन यज्ञीय कार्यों को यज्ञस्थल में (सोमाभिषवण के रूप में) किया है, उन्हें तेजस्वी इन्द्रदेव नष्ट न करें। इस कार्य के सम्पादन के लिए शुद्ध जल की भी प्राप्ति हो । इन्द्रदेव हमारे लिए मैत्रीभाव और श्रेष्ठ पोषक अन्न प्रदान करें॥२॥
शूरवीर इन्द्रदेव युद्धों में सैन्य शक्ति के सहयोग से ऐश्वर्य विजेता, विपदाग्रस्त स्तोता की करुण पुकार को सुननेवाले, दानी यजमान के निकट रथ को रोकने वाले तथा जो साधक श्रद्धा भावना से प्रार्थना करनेवाले हैं, उनकी वाणी रूपी साधना को ऊर्ध्वगामी बनाने वाले हैं॥३॥
श्रेष्ठ यशस्वी इन्द्रदेव मनुष्यों के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करने वाले यजमान की हवियों को ही ग्रहण करते हैं। स्तोताओं की प्रार्थना को पूर्ण करने वाले और यजमान के शुभचिन्तक इन्द्रदेव, जहाँ परस्पर मिलकर अनेक स्तोत्रों से आवाहित किये जाते हैं, ऐसे युद्ध में अपने मित्रों का संरक्षण करते हैं॥४॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! हम आपके सहयोग से बड़े-बड़े अहंकारी-शत्रुओं को भी पराजित करें । आप ही हमारे संरक्षक और प्रगति के कारण बने । जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकें॥५॥

सूक्त - १७९

(देवी लोपामुद्रा कहती हैं ) - हम विगत जीवन के अनेक वर्षों में उषा काल सहित दिन-रात श्रमनिष्ठ (तपरत) रहे हैं । वृद्धावस्था शरीरों की क्षमताओं को क्षीण कर देती है इसलिए श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति की दृष्टि से) समर्थ पुरुष ही पत्नियों के समीप जायें । (यहाँ प्रकारांतर से व्यसन के रूप में पत्नियों के समीप जाने का निषेध है )॥१॥
पूर्वकाल में जो सत्य की साधना (करने-कराने) में प्रवृत्त ष स्तर के व्यक्ति हुए हैं, जो देवों के साथ (उनके समकक्षी सत्य बोलते थे। उन्होंने भी (उपयुक्त समय पर) संतानोत्पादन का कार्य किया, अन्त तक ब्रह्मचर्य आश्रम में ही नहीं रहे । (श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति की दृष्टि से) उन श्रेष्-समर्थ पुरुषों को पत्नियाँ उपलब्ध करायी गयीं॥२॥
(ऋषि अगस्त्य कहते हैं :-) हमारा (अब तक का) तप बेकार नहीं गया है देवता श्रेष्ठ प्रवृत्तियों के कारण हमारी रक्षा करते हैं, (अतः हमने विश्व की (जीवन में आने वाली) सारी स्पर्धाएँ जीत ली हैं । हम दम्पती यदि अब उचित ढंग से संतान उत्पन्न करें, तो इस जीवन में सौ (वर्षों तक) संग्राम (जीवन की चुनौतियों) में विजयी होंगे॥३॥
लोपामुद्रा नदी के प्रवाह को सब ओर से रोक लेने वाले संयम से उत्पन्न शक्ति को संतान प्राप्ति की कामना की ओर प्रेरित करती हैं । यह भाव इस (शारीरिक स्वभाव) अथवा उस (कर्तव्य बुद्धि) या किसी अन्य कारण से और अधिक बढ़ता है। श्वास का संयम रखने वाले समर्थ धीर पुरुष अधीरता को नियंत्रण में रखते हैं॥४॥
(इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद शिष्य के भाव हैं :-) सोम (ओषधि रस विशेष) के निकट जाकर भावनापूर्वक उसका पान करते हुए वह प्रार्थना करता है “मनुष्य अनेक प्रकार की कामनाओं वाला है। उक्त संदर्भ में) यदि मेरे मन में कोई विकार आया हो, तो यह सोम अपने प्रभाव से उसे शुद्ध कर दे॥५॥
उग्र तपस्वी अगस्त्य ने खनित्र (शोध क्षमता) से खनन (नये-नये शोध कार्य करते हुए, प्रजा (संतान) उत्पन्न करने वाले तथा (तप द्वारा) शक्ति अर्जित करनेवाले, दोनों वर्गों (प्रवृत्तियों) वाले मनुष्यों का पोषण किया (और इस प्रकार-) देवताओं के सच्चे आशीर्वाद को प्राप्त किया॥६॥

सूक्त - १८०

हे अश्विनीकुमारो ! जिस समय आप दोनों का रथ समुद्र में अथवा अन्तरिक्ष में संचरित होता है, उस समय आपके रथ को चलाने वाले अश्वसंज्ञक गति साधन भी अन्तरिक्ष मार्ग में नियमानुसार गति करते हैं। आपके रथ के स्वर्णिम दीप्ति वाले पहिये भी मेघमण्डल के जल से भीगने लगते हैं, आप दोनों मधुर सोमरस का पान करके प्रभात वेला में ही इकड़े होकर जाते हैं॥१॥
सर्वस्तुत्य तथा मधुर सोमपान कर्ता अश्विनीकुमारो ! आप दोनों निरन्तर गतिशील, आकाश में संचरण करने वाले, मनुष्यों के कल्याणकारी, पूजनीय, सूर्यदेव के आगमन से पहले ही आते हैं, तब बहिन उषा आपका सहयोग करती हैं और यज्ञ में यजमान, बल तथा अन्न बढ़ाने के लिए आप दोनों की ही प्रशंसा करते हैं॥२॥
हे सत्यपालक अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने गौओं में पोषक दुग्ध उत्पन्न किया है तथा अप्रसूता गौओं में भी पौष्टिक दूध की सम्भावनाएँ उत्पन्न की हैं । वन क्षेत्र में साँप के समान ही जागरूक रहकर पवित्र हविष्यान्न साथ रखने वाले यजमान, आप दोनों के निमित्त दुग्ध द्वारा यज्ञ करते हैं॥३॥
हे नेतृत्व सम्पन्न अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने अत्रि ऋषि को सुख देने के लिए ही गर्मी को जल के समान शीतल और माधुर्ययक्त सुखकारी बनाया। तब आपके समीप रथ के पहियों के समान यज्ञ तथा सोम रस पहुँचे॥४॥
हे शत्रुसंहारक पूजनीय अश्विनीकुमारो ! विजय का आकांक्षी तुम का पुत्र जिस प्रकार प्रशंसक वाणियों द्वारा आप दोनों से अनुदान प्राप्ति के लिए प्रवृत्त हुआ, उसी प्रकार हम भी आपके सहयोग को पाने के लिए प्रयत्नशील हों, आपकी महिमा सम्पूर्ण द्यावापृथिवी में संव्याप्त है । (हम) अतिवृद्ध होते हुए भी आप दोनों की कृपा से जरारूपी कष्ट से मुक्त होकर दीर्घजीवन प्राप्त करें । इसीलिए आपकी स्तुति करते हैं॥५॥
हे श्रेष्ठ दानवीर अश्विनीकुमारो ! जब आप दोनों, अश्वों को अपने रथ में जोतते हैं, तब असंख्यों का भरण-पोषण करने वाली व्यवस्था बुद्धि, प्रचुर अन्न सम्पदा के साथ, साधकों में आप उत्पन्न करते हैं। श्रेष्ठ कार्य करने वालों के समान ज्ञानसम्पन्न मनुष्य इस महत्वपूर्ण दायित्व के निर्वाह के लिए अन्न उपलब्ध करके हविष्यान्न के रूप में वायुभूते बनाकर आपको तृप्त करते हैं॥६॥
हे शक्ति सम्पन्न, अनिन्दनीय अश्विनीकुमारो ! हम सच्चे साधक हैं, अतएवं आप दोनों के प्रख्यात गुणों का वर्णन करते हैं, परन्तु धन संग्रह करने वाले व्यापारी यज्ञ ( लोक हित के कार्यों) में इसे बिल्कुल नहीं लगाते । आप दोनों देवों के ग्रहण करने योग्य सोमरस का ही पान करते हैं॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! मनुष्यों और नेताओं में सुप्रसिद्ध अगस्त्य ऋषि नित्य प्रति विशिष्ट गर्जना वाले जल प्रवाह को उपलब्ध करने के लिए कुशलता से बाँसुरी वादन करने वाले के समान ही आप दोनों की कोमल ध्वनि से सहस्रों अलापों (श्लोकों) से प्रार्थना करते हैं॥८॥
हे सत्य के पालनकर्ता और गतिशील अश्विनीकुमारो ! आप दोनों अपने सर्वोत्तम रथ में आरूढ़ होकर वेग से यज्ञकर्ता के पास मनुष्य लोक में गमन करते हैं, अतएव ऐसे श्रेष्ठ ज्ञानियों को उत्तम अश्वों से युक्त धन सम्पदा प्रदान करें तथा हमें भी ऐश्वर्य सम्पदा से परिपूर्ण करें॥९॥
हे अश्विनीकुमारों ! आज ही हमें सुखसाधनों की प्राप्ति हो, इसी निमित्त हम आपका आवाहन करते हैं। द्युलोक के चारों ओर विचरणशील, कभी विकृत न होने वाली धुरी से युक्त आपका नवीन रथ हमारे समीप पहुँचे और हमें अन्न, बल तथा दीर्घ जीवन प्रदान करे॥१०॥

सूक्त - १८१

हे मनुष्यों के संरक्षक और ऐश्वर्यदाता अश्विनीकुमारों ! इस यज्ञ में आपकी ही प्रशंसा होती हैं। आप यज्ञ हेतु जलों, अन्नों और धन सम्पदाओं को प्रेरित करते हैं, वह क्रम किस समय प्रारम्भ करेंगे?॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! पवित्र, दिव्यता युक्त, गतिशील, वायु के समान वेगवान्, दुग्धाहारी, मन के समान गतिशील, शक्तिशाली, उज्ज्वल पृष्ठ भाग वाले और स्वयं तेजस्विता युक्त गुणों से सुशोभित घोड़े, आप दोनों को हमारे यज्ञ में लायें॥२॥
हे उच्च भाग में प्रतिष्ठित, एक ही स्थान पर स्थिर होकर रहने वाले अश्विनीकुमारो ! मन के समान गतिशील, उत्तम अग्र भाग वाला, भूमि के समान व्यापक, अग्रगामी, शक्तिशाली रथ हमारे कल्याण की कामना से आपको हमारे समीप ले आये॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों निर्दोष शरीरों से तथा अपने नामों से प्रख्यात हुए इस लोक में भली-भाँति प्रशंसित हो चुके हैं। आप दोनों में से एक विजयी, श्रेष्ठ मुख वाले (देव मुख रूप यज्ञ) के प्रेरक हैं तथा दूसरे दिव्य लोक के पुत्र होकर श्रेष्ठ ऐश्वर्यों के धारणकर्ता हैं॥४॥
हे अश्विनीकुमारों ! आप दोनों में एक को पीतवर्ण युक्त (सूर्य के समान स्वर्णिम) तथा सर्वत्र गमनशील रथ, इच्छित दिशाओं एवं आवासों में पहुँचता है । दूसरे के मन्थन से उत्पन्न घोड़े (अग्नि) अन्नों एवं उद्घोषों (मंत्रों) सहित सम्पूर्ण लोकों को पुष्टि प्रदान करते हैं॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों में से एक प्राचीन सामर्थ्यशाली शत्रुसेना को पराजित करने वाले हैं और अन्न में मधुर रस की उत्पत्ति हेतु सर्वत्र विचरण करते हैं। दूसरे अन्नों को समृद्ध करने वाली ऊर्ध्वगामी नदियों को वेग पूर्वक प्रवाहित करते हैं। आप दोनों हमारे समीप आयें॥६॥
(अपने कार्य में दक्ष है अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के लिए प्राचीन काल से प्रचलित, सामर्थ्य बढ़ाने वाली स्तुतियाँ तीनों प्रकार (ऋक्, यजुषु एवं सामगान के रूप में की गई हैं। हमारे द्वारा की गई प्रार्थना को ज्ञाते हुए अथवा रुक कर सुनने की कृपा करें और साधकों की रक्षा करें॥७॥
हे सामर्थ्यवान् अश्विदेवो ! आप दोनों के देदीप्यमान स्वरूप का गुणगान करने वाली यह स्तोत्रवाणी, तीन कुश आसनों से युक्त यज्ञस्थल में मनुष्यों को परिपुष्ट करती है। जिस प्रकार गौ दूध देकर पौष्टिकता प्रदान करती है, उसी प्रकार आपकी प्रेरणा से मेघ भी पोषण प्रदान करते हैं॥८॥
हे अश्विनीकुमारो ! अनेकों के धारणकर्ता पूषादेव जिस प्रकार पोषण करते हैं, उसी प्रकार हविष्यान्न को साथ लेकर यजमान यज्ञ द्वारा उषा और अग्नि के सदृश ही आप दोनों की प्रार्थना करते हैं । हम कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए विनम्रता पूर्वक आपकी प्रार्थना करते हैं, जिससे हम अतिशीघ अन्न, बल और धन प्राप्त कर सकें॥९॥

सूक्त - १८२

हे मनस्वी ज्ञानियो ! हमें यह ज्ञात हुआ है कि अश्विनीकुमारों का सुदृढ़ रथ हमारे यज्ञस्थल के निकट आ गया है, उसे देखकर आप हर्षित हों और उसे भली-भाँति अलंकृत करें। वे दोनों पवित्र व्रतशील, द्युलोक के धारणकर्ता, विश्पला की कीर्ति को बढ़ाने वाले तथा सत्कर्म करने वालों को सदबुद्धि प्रदान करने वाले हैं॥१॥
हे शत्रु संहारकर्ता अश्विनीकुमारो ! आप दोनों प्रशंसा के योग्य तथा इन्द्रदेव और मरुद्गणों के अति श्रेष्ठ गुणों को धारण करने वाले हैं। आप दोनों सत्कर्मों में सदैव संलग्न और रथियों में अति श्रेष्ठ रथी हैं। आप मधु (मधुरता) से परिपूर्ण रथ सहित यज्ञकर्ता के समीप पहुँचते हैं॥२॥
हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो ! आप यहाँ क्या कर रहे हैं? जो लोग हवि न देकर बड़े बन गये हैं, उन्हें छोड़कर आगे बढ़ें । कृपण और यज्ञहीन व्यक्तियों को नष्ट करें । स्तोता विप्नों (सत्कर्मरतों) को प्रकाश प्रदान करें॥३॥
हे सत्यनिष्ठ अश्विनीकुमारो ! आप कुत्तों के समान हिंसक अत्याचारियों को सभी ओर से विनष्ट करें । जो हमलावर हैं, उनका भी संहार करें; उनसे आप भली प्रकार परिचित हैं। आप दोनों म स्तोताओं की प्रत्येक स्तोत्रवाणी को धन सम्पदा से युक्त करें तथा हमारे प्रशंसनीय स्तोत्रों का संरक्षण करें॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने अपनी सामर्थ्य से चलने वाले, पक्षी के समान उड़ने वाली नौका को बनाया और कुशल चालक आप दोनों ने मन की गति के समान वेगशील उस नौका में ऊपरी आकाश मार्ग से यात्रा की तथा महासागर के बीच पहुँचकर तुम्र के पुत्र 'भुज्यु' की वहाँ रक्षा की॥५॥
समुद्र के बीच में आधार रहित अँधेरे जल स्थान में तुम्रपुत्र भुज्यु को मुक्त करने के लिये अश्विनीकुमारों द्वारा भेजी गई चार नौकाएँ समुद्र के बीच पहुँच गईं और उसे ऊपर उठाकर समुद्र के पार पहुँचा दिया॥६॥
जल (समुद्र) के मध्य कौन सा वृक्ष रहा होगा, जिसे देखकर तुम के पुत्र भुज्यु ने जिसका आश्रय लिया। जिस प्रकार गिरने वाले मृग को पंखों का आश्रय मिल जाय, उसी प्रकार अश्विनीकुमारों ने भुज्यु को ऊपर उठाया, इस कल्याणकारी कार्य से वे यशस्वी बने॥७॥
हे सत्यनिष्ठ नेतृत्व प्रदान करने वाले अश्विनीकुमारो ! स्तोताओं ने जो आप दोनों के लिए स्तोत्रोच्चारण किये हैं, उनसे आप हर्षित हों । इस सोमयाग के यज्ञस्थल से हम अन्न, बल, ऐश्वर्य सम्पदा को प्राप्त करें॥८॥

सूक्त - १८३

हे सामर्थ्यवान् अश्विनीकुमारो ! आपका जो तीन पहियों वाला, तीन बैठने योग्य स्थान वाला, अत्यन्त गतिशील रथ है, उसे जोड़कर तैयार करें । तीन धातुओं से विनिर्मित रथ से पक्षी की तरह उड़कर आप दोनों श्रेष्ठ कर्मी के घर पर पहुँचते हैं॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! हमेशा सत्कर्म में तत्पर आप दोनों हविष्यान्न प्राप्त करने के लिए भूमि पर गतिमान अपने सुन्दर रथ से यज्ञस्थल पर पहुँचते हैं। आपकी महिमा का गान करने वाली स्तुतियाँ आपको हर्षित करें, आप दोनों द्युलोक की पुत्री उषा के साथ (प्रभात वेला में) ही प्रस्थान करते हैं॥२॥
हे सत्यनिष्ठ अश्विनीकुमारो ! हविष्यान्नों से पूर्णरूपेण भरा हुआ आपका रथ, आप दोनों को अपने कर्तव्य निर्वाह के लिए ले जाता है, उस सुन्दर वाहन (रथ) पर आप दोनों विराजमान हों और यजमान तथा उसकी सन्तानों को यज्ञ की प्रेरणा देने के लिए उनके घर पधारें॥३॥
हे शत्रु संहारक अश्विनीकुमारो ! आपके लिए हविर्द्रव्य तैयार है, यह स्तुतियाँ आपके ही निमित्त हैं । मधु से पूर्ण पात्र आपके लिए तैयार हैं, आप हमारा परित्याग न करें और न ही अन्य किसी पर अनुदान बरसायें । आपकी कृपा से हमारे ऊपर वृक एवं वृकी हमला न करें॥४॥
हे शत्रुनाशक और सत्यनिष्ठ अश्विनीकुमारो ! हविष्यान्न अर्पित करते हुए गोतम, अत्रि और पुरुमीढ़ ये ऋषि अपने संरक्षण के लिए आपका आवाहन करते हैं। सरल मार्ग से जाने वाला जिस प्रकार अभीष्ट लक्ष्य पर सहज ढंग से पहुँचता है, उसी प्रकार हमारे आवाहन को सुनकर आप हमारे समीप पधारें॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! हुम इस अन्धकार से पार हो गये हैं। आप दोनों के निमित्त ये स्तोत्रगान किये गये हैं। देवतागण जिस मार्ग से चलते हैं, आप उसी मार्ग से यहाँ पधारें तथा अन्न, बल और विजयश्री हमें शीघ्र प्रदान करें॥६॥

सूक्त - १८४

हे दिव्यलोक के आश्रयभूत, सत्यपालक अश्विनीकुमारो ! आज हमने आपको आमन्त्रित किया है, भविष्य में भी बुलायेंगे। हम अन्धकार की समाप्ति पर प्रभात वेला में स्तोत्रगान करते हुए अग्नि प्रदीप्त करते हैं। आप जहाँ कहीं भी हों, श्रेष्ठ पुरुष और दानवीर के यहाँ अवश्य पधारें, ऐसी हमारी प्रार्थना है॥१॥
हे नेतृत्व प्रदान करने वाले सामर्थ्यवान् अश्विनीकुमारो ! आप हमें भली प्रकार आनन्दित करें । आप पणियों (लोभी ठगों) को समाप्त करें । हमारी अभिव्यक्तियों, श्रेष्ठ स्तोत्रों को सुनने की कृपा करें, क्योंकि आप दोनों सुपात्रों को खोजते और उन पर अपनी कृपा बरसाते हैं॥२॥
हे दानी, सत्यनिष्ठ, पोषणकर्ता अश्विनीकुमारो ! उषाकाल में ही रथ पर आरूढ़ होकर यश पाने की कामना से आप दोनों बाण की गति की तरह सरल मार्ग से जाते हैं। उस समय समुद्र से प्राप्त अति विशाल वरुणदेव के पुरातन रथ के घोड़ों के समान ही आप दोनों के घोड़े भी प्रशंसित होते हैं॥३॥
हे श्रेष्ठ दानवीर, मधुररसों से युक्त अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के अनुदान में उपलब्ध होते रहें। आप मान्य द्वारा रचित स्तोत्रों को प्रेरित करें। सभी लोग आप दोनों की अनुकूलता प्राप्त कर श्रेष्ठ पराक्रम करने की कामना से आनन्दित होते हैं॥४॥
हे वैभवशाली, सत्यनिष्ठ अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के लिए यह सुन्दर स्तोत्र तैयार किये गये हैं। इससे हर्षित होकर आप सपरिवार अगस्त्य ऋषि के घर पधारें॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! हम इस अन्धकार रूपी अज्ञान से मुक्त हो गये हैं, आप दोनों के लिए ये स्तोत्र गान किये हैं। देवतागण जिस मार्ग से चलते हैं, आप उसी मार्ग से चलकर हमारे यहाँ पधारें तथा अन्न, बल और विजयश्री हमें शीघ्र प्रदान करें॥६॥

सूक्त - १८५

हे ऋषियो ! ये (द्युलोक और भूलोक) दोनों किस प्रकार उत्पन्न हुए और इन दोनों में कौन सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ तथा बाद में कौन हुआ? इस रहस्य को कौन भलीप्रकार जानने में समर्थ है? ये दोनों लोक सम्पूर्ण विश्व को धारण करते हैं और चक्र के समान घूमते हुए दिन-रात का निर्माण करते हैं॥१॥
स्वयं पद विहीन तथा अचल होने पर भी ये दोनों द्यावा-पृथिवी असंख्य चलने-फिरने में सक्षम पदयुक्त प्राणियों को धारण करते हैं। जिस प्रकार माता-पिता समीप उपस्थित पुत्र की सहायता करते हैं, उसी प्रकार द्युलोक और पृथिवी हम सभी प्राणियों को संकटों से बचायें॥२॥
हम अविनाशी पृथ्वी से पापमुक्त, क्षयरहित, हिंसारहित, तेजस्वी और विनम्रता प्रदान करने वाले धन-वैभव की कामना करते हैं। हे द्यावा-पृथिवि ! ऐसा वैभव स्तोताओं के लिए प्रदान करें। ये दोनों पाप कर्मों से हमारी रक्षा करें॥३॥
देव शक्तियों के उत्पादक, द्युलोक और पृथ्वी लोक पीड़ित न होते हुए भी अपने कार्य में शिथिल न होते हुए अपनी संरक्षण की शक्तियों से प्राणियों के संरक्षक हैं। दिव्यता युक्त दिन और रात के अनुकूल हम रहें । द्यावा-पृथिवी दोनों, पाप से हमारी रक्षा करें॥४॥
चिर युवा, बहिनों की तरह परस्पर सहयोग करने वाली ये दोनों (द्यावा-पृथिवी) पिता के समीप ( परमात्मा के अनुशासन में ) रहकर भुवन की नाभि (यज्ञ) को सूंघती (उससे पुष्ट होती हैं । ये द्यावा-पृथिवी हमें सभी विपदाओं से संरक्षित करें॥५॥
जो श्रेष्ठ स्वरूप वाली द्यावा-पृथिवीं जल रूप अमृत को धारण करती हैं। ऐसी विशाल आश्रयभूत तथा सबको उत्पन्न करने वाली द्यावा-पृथिवी को देवशक्तियों की प्रसन्नता के लिए-यज्ञीय कार्य के लिए आवाहित करते हैं, वे दोनों (द्यावा पृथिवीं) हमें पाप कर्मों से बचायें॥६॥
जो सुन्दर आकृतिरूप और श्रेष्ठ दानदाता रूप में द्यावा-पृथिवीं सबकी धरित्री हैं, ऐसी विशाल, व्यापक विभिन्न आकृतिरूप तथा जिनकी सीमा अनन्त हैं, उन द्यावा-पृथिवी की इस यज्ञ में विनम्र भावना से हम प्रार्थना करते हैं। वे (द्यावा-पृथिवी) हमें संकटों से सुरक्षित करें॥७॥
यदि हमसे कभी प्रमावश देवशक्तियों, मित्रजनों अथवा समस्त जगत् के सृजेता परमेश्वर के प्रति कोई पापकर्म बन पड़े हों, तो उनका शमन करने में हमारी विवेक बुद्धि सक्षम हो । द्यावा-पृथिवी पापकर्मों से हमारी रक्षा करें॥८॥
मनुष्यों के कल्याणकारी तथा स्तुति योग्य दोनों द्युलोक-पृथिवीलोक हमें आश्रय प्रदान करें। दोनों संरक्षक द्यावा-पृथिवी अपने संरक्षण साधनों से हमारा पोषण करें । हे देवशक्तियो ! हम श्रेष्ठता को धारण करते हुए, अन्नादि से हर्षित होकर दानवृत्ति को बनाये रखने के लिए प्रचुर धन सम्पदा की कामना करते हैं॥९॥
हम सद्बुद्धि को धारण करते हुए द्युलोक और पृथ्वीलोक की गरिमा से सम्बन्धित इस सत्यवाणी (ऋचा) की घोषणा करते हैं। पास-पास रहने वाले ये दोनों लोक अनिष्टों से हमारा संरक्षण करें । पितारूप (द्युलोक) और मातारूप (पृथ्वी) सरंक्षण साधनों से हमारी रक्षा करें॥१०॥
हे पिता और माता रूप द्यावा-पृथिवि ! आप दोनों के निमित्त इस यज्ञ में जो स्तुतियाँ हम करते हैं, उनका प्रतिफल हमें अवश्य मिले। आप दोनों देवत्वयुक्त संरक्षण साधनों से हमारी रक्षा करें एवं हमें अन्न, बल और दीर्घायुष्य प्रदान करें॥११॥

सूक्त - १८६

सबके कल्याणकारी सवितादेव भली-भाँति प्रशंसित होकर, अन्न से युक्त होकर हमारे यज्ञ में पधारें । हे वरुणदेव ! आप जिस तरह आनन्दित हैं, उसी तरह हमारे यज्ञ में पधारकर अपनी अनुकम्पा से हमें तथा सम्पूर्ण विश्व को भी हर्षित करें॥१॥
सभी शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले, परस्पर प्रीति करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमा देवे हमारे समीप आएँ तथा यथासम्भव हमारी प्रगति में सहायक हों । ये देव शत्रुओं को परास्त करने की सामर्थ्य से युक्त होकर हमारी शक्तियों को क्षीण न करें॥२॥
जो अग्निदेव शत्रुसंहारक और सबके साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करने के कारण अतिथि के समान पूज्य हैं, उनकी हम स्तोत्रों द्वारा स्तुतियाँ करते हैं। शत्रुओं के आक्रान्ता और ज्ञानवान् ये वरुणदेव हमें अन्न तथा यथोचित कीर्ति प्रदान करें॥३॥
हे सम्पूर्ण विश्व की संचालक देवशक्तियो ! गौ (सूर्य किरणों) से उत्पादित होने वाले (दुग्धरूपी) प्राण में सम्पूर्ण तेजस्विती की अनुभूति करते हुए, हम साधक मनोविकाररूपी शत्रुओं पर विजय पाने की कामना से प्रात: और सायं (दोनों सन्ध्याओं में) उसी प्रकार आपके समीप जाते हैं, जिस प्रकार श्रेष्ठ दुधारू गौएँ गोपाल के पास जाती हैं॥४॥
अहिर्बुध्य (विद्युत्रूप अग्नि) अन्तरिक्षीय मेघों से जल बरसाकर हमें सुखी करें । शिशु का पोषण करने वाली माता के समान नदियाँ जल से परिपूर्ण होकर हमारे समीप आएँ । जल को न गिरने देने वाले (अग्निदेव) की हम वन्दना करते हैं। मन की तरह वेगवान् अश्व (किरणे) उन्हें ले जाते हैं॥५॥
ज्ञानियों से स्नेहपूर्ण व्यवहार करने वाले ये त्वष्टादेव तथा मनुष्यों के तृप्तिकारक और वृत्रासुर के वध द्वारा सबके द्वारा प्रशंसनीय इन्द्रदेव, हमारे इस यज्ञ में पधारकर हमारे सत्कर्मों में सहायक बनें॥६॥
जिस प्रकार गौएँ अपने बछड़ों को स्नेह से चाटती हैं, उसी प्रकार श्रेष्ठ बुद्धियाँ उन चिरयुवा इन्द्रदेव के प्रति अपना स्नेह प्रकट करती हैं। उन महायशस्वी इन्द्रदेव को हमारी स्तुतियाँ उसी प्रकार आकर्षित करती हैं, जिस प्रकार प्रजननशील स्त्रियाँ पतियों को आकर्षित करती हैं॥७॥
रथों पर विराजमान रक्षकगणों के पास समान दुष्टशत्रुओं को विनष्ट करने वाले, मित्रों के समान पारस्परिक स्नेह रहने वाले, विलक्षण अश्वों से युक्त, समान मनोभावों से युक्त, तेजस्वी, महान् सामथ्र्यों से युक्त मरुद्गण तथा द्यावा-पृथिवी हमारे यज्ञ में पधारें॥८॥
श्रेष्ठ स्तुतियों से हर्षित होकर मरुद्गण अश्वों को अपने रथ में जोड़ते हैं। तत्पश्चात् दिन में जिस प्रकार प्रकाश सर्वत्र संचरित होता है, उसी प्रकार मरुतों की सेना ऊसर भूमि को जलों से सींचकर उपजाऊ बनाती है। इससे इन मरुद्गणों की ख्याति और भी अधिक बढ़ जाती हैं॥९॥
हे मनुष्यो ! अपनी रक्षा के लिए अश्विनीकुमारों, पूषादेव, विद्वेषरहित विष्णुदेव, वायुदेव, ऋभुओं के स्वामी (इन्द्रदेव) इन सभी देवों की स्तुति करो। हम भी सुख की प्राप्ति के लिए इन देव समूह की प्रार्थना करते हैं॥१०॥
हे यज्ञदेव ! आपका जो तेज देवों को ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है, मनुष्यों की अभिलाषाओं को पूर्ण कराने वाला तथा आवास प्रदान कराने वाला है। वह दिव्यतेज हम अपने अन्दर धारण करें, जिससे हम मनुष्य उत्तम अन्न, उत्तम बल और दीर्घ जीवन का लाभ प्राप्त कर सकें॥११॥

सूक्त - १८७

जिसके ओर से तीनों लोकों में यशस्वी इन्द्रदेव ने वृत्रनामक असुर के अंग-प्रत्यंगों को काट-काट कर मारा, उन महान् शक्तिशाली, सबके पोषक तथा धारणकर्ता अन्नदेव की हम स्तुति करते हैं॥१॥
हे स्वादिष्ट, पालक तथा माधुर्ययुक्त रसों के पोषक अन्नदेव ! हम आपमें विद्यमान पोषक तत्त्व को धारण करते हैं, आप हमारे संरक्षक हैं॥२॥
हे पालनकर्ता अन्नदेव ! आप कल्याणकारी सुखप्रद, विद्वेषरहित, मित्र के समान हितैषी, भली भाँति सेवनीय और ईष्र्या-द्वेष से रहित हैं। आप मंगलकारी संरक्षणयुक्त पोषक तत्वों से युक्त होकर हमारे समीप आएँ॥३॥
हे परिपोषक अन्नदेव ! जिस प्रकार अन्तरिक्ष में वायु प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार आपके वे विभिन्न रस सम्पूर्ण लोकों में विद्यमान हैं॥४॥
हे परिपोषक अन्नदेव ! आपके उपासक कृषक आप से दानवृत्ति को ग्रहण करते हैं, हे माधुर्ययुक्त पोषक देव ! आपके साधक आपकी पोषणशक्ति को बढ़ाते हैं । आपके रसों का सेवन करने वाले पुष्टग्रीवायुक्त होकर सर्वत्र विचरण करते हैं॥५॥
हे सर्वपालक अन्नदेव ! महान् देवों का मन भी आपके लिए लालायित रहता हैं । इन्द्रदेव ने आपकी श्रेष्ठ पोषक शक्ति एवं संरक्षक शक्ति से ही अहि असुर का वध करके महान् कार्य किया॥६॥
हे सर्व पालक अन्नदेव ! जब जलों से परिपूर्ण बादलों का शुभ जल आपके समीप पहुँचता है, तब आप हमारे पोषण के लिए इस विश्व में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों॥७॥
जब जलों और ओषधि तत्त्वों से युक्त सभी प्रकार से कल्याणकारी अन्न को हम ग्रहण करते हैं, तब हे शरीर ! आप इस पोषक अन्न से स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट हों॥८॥
हे सुखस्वरूप अन्नदेव ! जब अन्न में जौ, गेहूँ आदि पदार्थों के साथ गाय के दूध, घृतादि पौष्टिक पदार्थों का सेवन किया जाता है, तब हमारा शारीरिक स्वास्थ्य सुदृढ़ हो॥९॥
हे परिपक्व अन्नदेव ! पौष्टिक, आरोग्यप्रद तथा इन्द्रिय सामर्थ्य को बढ़ाने वाले हैं। पके हुए अत्रों के सेवन से हमारा शारीरिक स्वास्थ्य बढ़े॥१०॥
हे पालनकर्ता अन्नदेव ! आप देव शक्तियों और मनुष्यों दोनों को ही समानरूप से आनन्दित करने वाले हैं। प्रशंसित स्तोत्रों से आपको उसी प्रकार अभिषुत करते हैं, जैसे गोपाल गौओं से दूध दुहते हैं॥११॥

सूक्त - १८८

हे सहस्रों शत्रुओं के विजेता अग्निदेव ! देवों द्वारा तेजस्वीरूप में आज आप प्रदीप्त हो रहे हैं। हे क्रान्तदर्शी ! आप हमारे द्वारा प्रदत्त आहुतियों को दूत की तरह देवों तक पहुँचाएँ॥१॥
स्वास्थ्य संरक्षक, पूजनीय अग्निदेव सहस्रों प्रकार के अन्नों में प्राणतत्त्व को परिपोषित करते हुए यज्ञभूमि में जाते हैं और वहाँ हविष्यान्नों में मधुर रसों का संचार करते हैं॥२॥
हे अग्निदेव ! आप सहस्रों प्रकार की ऐश्वर्य सम्पदा के धारणकर्ता हैं। अतएव हमारे द्वारा आवाहित किये जाने पर आप अनेक आदरणीय देवताओंसहित हमारे यज्ञ में पधारें॥३॥
हे आदित्यगण ! प्राचीनकाल से हजारों देवगणों के साथ आप जिस आसन पर विराजमान होते रहे हैं, ऐसे कुश के आसन को यजमान अपनी शक्ति से (यज्ञस्थल पर) बिछाते हैं॥४॥
विराट् तेजस्वी, विभु, प्रभु, यज्ञदेव अनेक द्वारों से घृत की वर्षा करते हैं॥५॥
उत्तम स्वरूप वाली (उषा एवं रात्रि) और अधिक शोभा पा रही हैं । हे उषा और रात्रि ! आप दोनों हमारे यहाँ यज्ञ में विराजमान हों॥६॥
सर्वोत्तम, प्रखर वाणी के प्रयोक्ता, दिव्यगुणों से युक्त, मेधावी होता हमारे इस यज्ञ को सम्पन्न करें॥७॥
हे भारती, इळा और सरस्वती ! हम आप सभी को आमंत्रित करते हैं। आप तीनों हमें ऐश्वर्य विभूतियों की ओर प्रेरित करें॥८॥
त्वष्टादेव स्वरूप प्रदान करने में सक्षम हैं, वही पशुओं के निर्माता हैं। हे त्वष्टादेव ! आप हमारे लिए पशुधन की वृद्धि करें॥९॥
हे वनस्पते ! आप अपनी सामर्थ्य से हव्य पदार्थ उत्पन्न करें, तब अग्निदेव हव्य का सेवन करें॥१०॥
देवताओं में अग्रणी रहनेवाले अग्निदेव गायत्री मंत्र के उच्चारण से सुशोभित होते हैं; पश्चात् “स्वाहा” शब्द के साथ प्रदत्त आहुतियों से वे अग्निदेव प्रज्ज्ञलित होते हैं॥११॥

सूक्त - १८९

दिव्य गुणों से युक्त हे अग्निदेव ! आप सम्पूर्ण मार्गों (ज्ञान) को जानते हुए हम याजकों को यज्ञ फल प्राप्त करने के लिए सन्मार्ग पर ले चलें । हमें कुटिल आचरण करने वाले शत्रुओं तथा पापों से मुक्त करें हम आपके लिए स्तोत्र एवं नमस्कारों का विधान करते हैं॥१॥
हे अग्निदेव !आप नित्यनूतन अथवा अति प्रशंसनीय हैं ।आपकी कृपा से मंगलकारी मार्गों से हम सभी प्रकार के दुर्गम पापकर्मों एवं कष्टकारी दु:खों से निवृत्त हों। यह पृथ्वीं और नगर हमारे लिए उत्तम और विस्तृत हों। आप हमारी सन्तानों के लिए सुखप्रदायी हों॥२॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ द्वारा हमारे सभी रोगों (विकारों) का निवारण करें । यज्ञरहित मनुष्य सदैव रोग विकारों से त्रस्त रहते हैं । हे देव ! आप अमरत्व प्राप्त सभी देवताओं के साथ दिव्य गुणों से युक्त होकर हमारे कल्याण की कामना से यज्ञस्थल पर संगठित रूप से पधारें॥३॥
हे अग्निदेव ! आप निरन्तर अपनी संरक्षण शक्तियों से हमें रक्षित करें और हमारे प्रिय यज्ञ स्थल में पधारकर सर्वत्र प्रकाशमान हो । हे नित्य तरुण रूप अग्निदेव ! आपके स्तोता सभी प्रकार के भयों से मुक्त हों हे बलों से उत्पन्न अग्निदेव !आपकी सामर्थ्य से अन्य संकटों के समय भी हम निर्भय रहें॥४॥
है बलवान् अग्निदेव ! हमें पापों में लिप्त, अर्धमयुक्त कार्यों से उपार्जित अन्न को खाने वाले, सुखों के नाशक शत्रुओं के बन्धन में न सौंपें । हमें दाँतों से काटने वाले सर्परूपी शत्रुओं के अधीन न करें तथा हिंसकों एवं दस्यु असुरों के बन्धन में भी न बाँधे॥५॥
हे यज्ञ के निमित्त उत्पन्न अग्निदेव ! आपके साधक आपकी श्रेष्ठ प्रार्थना करते हुए शारीरिक दृष्टि से परिपुष्ट होकर हिंसक एवं पर निन्दक दृष्ट व्यक्तियों से स्वयं को संरक्षित करते हैं । हे दिव्य गुण सम्पन्न अग्निदेव ! आप दुर्बुद्धि से ग्रस्त, दुर्व्यव्यवहारयुक्त दुष्टकर्मियों को निश्चित ही दण्डित करने वाले हैं॥६॥
हे यजन योग्य अग्निदेव ! आप यज्ञ प्रेमी और यज्ञ विहीन इन दोनों से भलीप्रकार परिचित होते हुए प्रभात वेला में मनुष्यों के पास पहुँचते हैं । पराक्रम-सम्पन्न आप यज्ञ में उपस्थित मनुष्यों को उसी प्रकार शिक्षण प्रदान करें, जिस प्रकार ऋत्विज् यजमानों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं॥७॥
यज्ञ के उत्पन्नकर्ता और शत्रुसंहारक इन अग्निदेव के निमित्त हम सभी प्रकार के स्तोत्रों का गान करते हैं । हम इन इन्द्रिय रूपी ऋषियों को समर्थ बनाकर अनेक ऐश्वर्यों का उपभोग करें तथा अन्न, बल और दीर्धायुष्य को प्राप्त करें॥८॥

सूक्त - १९०

हे मनुष्यो ! जिन द्वेष रहित, बलशाली, मधुर भाषी, स्तुति के योग्य बृहस्पतिदेव के मधुर, तेजस्वी एवं प्रशंसा के योग्य वचनों को मनुष्य तथा देवगण सभी श्रद्धा के साथ सुनते हैं, उनका गुणगान करो॥१॥
समयानुकूल की गई स्तुतियाँ बृहस्पति देव ग्रहण करते हैं। जिन बृहस्पतिदेव ने नई सृष्टि की रचना के समान देव बनने की कामना करने वाले मनुष्य को उत्पन्न किया, ऐसे वायु के समान प्रगतिशील बृहस्पतिदेव उत्तम वस्तुओं के साथ अपनी प्रचण्ड शक्ति से उत्पन्न हुए॥२॥
जैसे सूर्यदेव बाहु (किरणे) फैलाते हैं, उसी प्रकार बृहस्पतिदेव याजकों की स्तुतियाँ, अन्नादि एवं मंत्रों को स्वीकार करते हैं। बृहस्पतिदेव के क्रूरतारहित कर्तव्य से ही सूर्यदेव भयंकर मृग (सिंह जैसा) की तरह बल सम्पन्न होते हैं॥३॥
इन बृहस्पतिदेव की कीर्ति द्युलोक और पृथ्वीलोक में सर्वत्र व्याप्त है। शीघ्रगामी अश्व के समान ज्ञानियों के भरणपोषण कर्ता, विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न ये बृहस्पतिदेव सभी लोकों के सहयोग के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। हरिणों के संहारक शस्त्रों के समान बृहस्पति देव के ये शस्र दिन में छल करने वाले कपटी असुरों को मारते हैं॥४॥
हे देव ! जो धन को अहंकार करने वाले पापी वृद्ध वैल के समान जीवित हैं, आप उन दुर्बुद्धिग्रस्तों को ऐवश्वर्य नहीं देते हैं । हे बृहस्पतिदेव ! आप सोमपान करने वालों पर ही अपनी कृपा बरसाते हैं॥५॥
ये बृहस्पतिदेव सन्मार्गगामी तथा उत्तम अन्नवाले मनुष्य के लिए श्रेष्ठ पथ प्रदर्शक रूप हैं तथा दुष्टों का नियन्त्रण करने वालों के मित्र के समान हैं। निष्पाप होकर जो मनुष्य हमारी ओर देखते हैं, वे अज्ञानरूपी अन्धकार से आवृत होने पर भी, अज्ञान को त्यागकर ज्ञान मार्ग पर बढ़ते हैं॥६॥
स्वामी को उत्तम भूमि प्राप्त होने तथा समुद्र को भंवरों से युक्त नदियों का जल प्राप्त होने के समान ही बृहपतिदेव को स्तोत्ररूप वाणियाँ प्राप्त होती हैं। सुखों के अभिलाषी, ज्ञानवान् बृहस्पति देव दोनों के मध्य विराजमान होकर तट और जल दोनों को देखते हैं॥७॥
हम सभी अति प्रख्यात, शक्तिशाली, महिमायुक्त, सुखवर्षक बृहस्पतिदेव की प्रार्थना करते हैं। वे हमें वीर संतान युक्त गवादि धन प्रदान करें । हम सभी प्राप्त करने योग्य, शक्ति सम्पन्न तथा तेजस्वी देव के ज्ञान से युक्त हों॥८॥

सूक्त - १९१

कुछ विषैले, कुछ विषरहित और कुछ जल में रहने वाले अल्पविष जीव होते हैं ।ये दृश्य भी होते हैं और अदृश्य भी । वे दोनों शरीर में दाह उत्पन्न करते है। उनका विष हममें संव्याप्त हो जाता है॥१॥
यह ओषधि, उन अदृश्य जीवों के विष को समाप्त करती है। वह कूट-पीसी जाकर भी विषैले जीवों के विष को नष्ट करती हैं॥२॥
इन विषैले जीवों में से कुछ सरकण्डों, कुछ कुशाघास, कुछ छोटे सरकण्डों में स्थित रहते हैं। कुछ नदी, तालाबों के तटों पर पैदा होने वाले घास में, कुछ पूँज और कुछ वीरण नामक घास में छिपे रहते हैं। ये सभी लिपटने वाले होते हैं॥३॥
जिस समय गौएँ गोष्ठ में और पशु अपने स्थानों में विश्राम करते हैं तथा जब मनुष्य भी थककर विश्राम करने लगते हैं, ऐसे में अदृश्य रहनेवाले ये जीव बाहर निकलते हैं और उन्हें लिपटते हैं॥४॥
ये विषाणु चोरों की तरह रात्रि में दिखाई देते हैं। ये अदृश्य होते हुए भी सबको दिखते हैं (उनको प्रभाव दिखता हैं) । हे मनुष्यो ! इनसे सावधान रहो॥५॥
हे विषाणुओ ! तुम्हारे पिता दिव्यलोक, जन्म दात्री पृथ्वी, सोम भातृरूप और देवमाता अदिति भगिनी स्वरूपा हैं, अतः स्वयं अदृश्य रूप होते हुए भी तुम सबको देखने में समर्थ हो । अस्तु तुम किसी को पीड़ित न करते हुए सुखपूर्वक विचरण करो॥६॥
जो जन्तु पीठ के सहारे (सर्पादि) सरकते हैं, जो पैरों के सहारे (कानखजूरा) चलते हैं, जो सुई के समान (बिच्छु) छेदते हैं, जो महाविषेले हैं और जो दिखाई नहीं पड़ते, ये सभी विषेले जीव एक साथ हमें कष्ट न पहुँचायें॥७॥
सबके दर्शनीय, अदृश्य दोषविकारों के नाशक, सूर्यदेव पूर्व दिशा में उदय होते हैं वे सभी अदृश्य प्राणियों और सभी प्रकार की कुटिल चाल धारण करने वाले राक्षसी तत्त्वों को दूर करते हुए प्रकट होते हैं॥८॥
अनेक अदृश्य जन्तुओं को विनष्ट करते हुए ये सर्वद्रष्टा सूर्यदेव ऊपर उठते हैं, इनके उदित होते ही सभी अनिष्टकारी (विषधारी) जीव छिप जाते हैं॥९॥
आसव को जिस प्रकार पात्र में रखते हैं, उसी प्रकार हम सूर्य किरणों में विष को रखते हैं। इस विष से सूर्यदेव प्रभावित नहीं होते तथा हमारे लिए विषनिवारक सिद्ध होते हैं । अश्वारुढ़, सूर्यदेव इस विष का निवारण करते हैं, तथा मधुला विधा इस विष को मृत्युनिवारक अमृत बनाती है॥१०॥
कपिजली नामक चिड़िया तेरे विष को खाये। जिससे वह न मरे तथा हमारे विष का भी निवारण हो और मधुला शक्ति इस विष के लिए मृत्युनिवारक (अमृत) सिद्ध हो॥११॥
इक्कीस प्रकार की ऐसी छोटी-छोटी चिड़ियाएँ हैं, जो विष के फलों को खा जाती हैं, पर फिर भी प्रभावित नहीं होतीं । इसी प्रकार हम भी विष से मृत्युरहित हों । अश्वारूढ़ सूर्य ने इस विष का निवारण कर दिया है; मधुला विधा विष को अमृत रूप में बदल देती है॥१२॥
निन्यानवे प्रकार की औषधियाँ हैं, जो विषों की निवारक हैं, उन सभी को हम जानते हैं। उनके उपयोग से हर प्रकार के विष का निवारण होता है । अश्वारुढ़, सूर्य इसका निवारण करे तथा मधुली शक्ति इसे अमृत बनाये॥१३॥
हे विष पीड़ित प्राणी !जिस प्रकार घड़ों में स्त्रियाँ जल ले जाती हैं, उसी प्रकार इक्कीस मोरनियाँ और भगिनीरूपा सात नदियाँ आपके विष का निवारण करें॥१४॥
इतना छोटा सा यह विषयुक्त कीट है, ऐसे हमारी ओर आने वाले छोटे कीट को हम पत्थर से मार डालते हैं । उसका विष अन्य दिशाओं में चला जाय॥१५॥
पहाड़ से आने वाले कुषुम्भक (नेवला) ने यह कहा कि बिच्छू का विष प्रभावहीन है । हे बिच्छू ! तुम्हारे विष में प्रभाव नहीं है॥१६॥
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