अष्टम मंडल सूक्त १ - १०३ (ऋग्वेद)

 

Rigveda | Gyan Dhyan Sanskar

सूक्त-१

हे मित्रो ! इन्द्रदेव को छोड़कर अन्य किसी देव की स्तुति उपादेय नहीं है। उसमें शक्ति नष्ट न करें। सोम शोधित करके, एकत्र होकर, संयुक्तरूप से बलशाली इन्द्रदेव की ही बार-बार प्रार्थना करें॥१॥
(हे स्तोतागण ! आप सशक्त वृषभ (साँड़) के सदृश संघर्षशील ज्ञराहत, शत्रुओं का विरोध और उनका संहार करने वाले, महान् दैविक और भौतिक ऐश्वर्यों के दाता इन्द्रदेव का ही स्तवन करे॥२॥
हे इन्द्रदेव ! अपनी रक्षा के निमित्त यद्यपि भी मनुष्य आपका आवाहन करते हैं, फिर भी हमारी स्तुतियाँ आपके गौरव को सतत बढ़ाती रहें॥३॥
ऐश्वर्यवान्, ज्ञानी, श्रेष्ठ तथा मनुष्यों के पालक हे इन्द्रदेव ! आपकी अनुकम्पा से स्तोतागण समस्त विपत्तियों से बचे रहते हैं। आप हमारे निकट पधारें और पोषण के निमित्त विविध प्रकार के बल प्रदान करें॥४॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! अत्यधिक धन मिलने पर भी आपको नहीं त्यागा जा सकता । हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! सौ हजार-दस हजार (किसी भी कीमत पर आपकी भक्ति नहीं त्यागी जा सकती॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे जन्मदाता पिता की अपेक्षा अधिक धनवान् हैं। पालन न करने वाले भाई से भी अधिक धनवान् हैं। सबके पालनकर्ता इन्द्रदेव, आप हमारी माता के समतुल्य हैं। हम धन-धान्य से परिपूर्ण जीवन की कामना करते हैं। आप हमें महान् बनाएँ॥६॥
विभिन्न स्थानों में मन को रमाने वाले, युद्ध कौशल में निपुण, शत्रुओं के नगरों को उजाड़ने वाले हे बलवान् इन्द्रदेव ! आप कहाँ गये थे? अब आप कहाँ हैं ? हमारे कुशल स्तोताओं द्वारा किये जा रहे सामगान को सुनने के लिए आप यज्ञ में पधारें॥७॥
उपासकों पर कृपा करने वाले तथा रिपुओं की पुरियों को ध्वस्त करने वाले, इन्द्रदेव की गायत्री छन्दके द्वारा प्रार्थना करें। जिन स्तुतियों से प्रसन्न होकर कण्व पुत्रों के यज्ञ में पधारकर उन्होंने रिपुओं की पुरियों को वज्र से तोड़ा था, उन्हीं ऋचाओं से उनकी प्रार्थना करें॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने सैकड़ों हजारों योजन तक दौड़ने वाले शक्तिशाली तथा वेगवान् अश्वों द्वारा हमारे पास शीघ्र पधारें॥९॥
इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए हम, सुगमता से दुहीं जाने योग्य, सबको दुग्ध (पोषण) प्रदान करने वाली गौ की तरह, अन्य प्रकार के अन्न (पोषण) प्रदान करने वाली, अनेकों धाराओं से युक्त गायत्री रूपी धेनु (वाणी-स्तुति) का आवाहन (उच्चारण करते हैं॥१०॥
जब सूर्यदेव ने वायु की तरह वक्र (आड़ी, तिरछी किसी भी दिशा में चल पड़ने वाली) गति वाले ‘एतश' को व्यथित किया, तब शतक्रतु (सैकड़ों यज्ञ कर्म करने वाले) इन्द्रदेव ने आर्जनेय (अर्जुन, जो कुटिल नहीं है उससे उत्पन्न) कुत्स को साथ लेकर नष्ट न होने वाले गंधर्व (सूर्य) पर छद्म रूप से आक्रमण किया॥११॥
जो इन्द्रदेव हँसुली (गले से नीचे की हड्डी) को रक्त निकलने से पूर्व संधानद्रव्य के बिना ही जोड़ देते हैं, (जो कठिनतम कार्यों को सुगमता से सम्पन्न कर देते हैं), महान् धन के स्वामी वे इन्द्रदेव छिन्न-भिन्न होने वालों को पुन: जोड़ (एकत्रकर) देते हैं॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी कृपा से हमारा पतन न हो और न ही हम दुःखी हों । पतझड़ में शाखाविहीन वृक्षों के समान हम संतानरहित न हों । हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! हम अपने घरों में सुरक्षित रहकर आपकी स्तुति करते हैं॥१३॥
हे वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ! हम हड़बड़ाहट तथा क्रोधरहित होकर आपका स्तवन करें । हे वीर इन्द्रदेव ! आपके निमित्त हम भले ही जीवन में एक बार ही यज्ञ करें, पर प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न होकर करें॥१४॥
यदि वे इन्द्रदेव हमारी स्तुति को सुनें, तो हम उत्साह प्रदान करने वाला, पवित्र होने वाला तथा जल से निकलकर बढ़ने वाला सोमरस समर्पित करके उन्हें हर्षित करें॥१५॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने सेवा भावी मित्र के साथ हमारी तथा दूसरे धनवानों की स्तुतियों को सुनकर आज हमारे निकट आएँ । हम आपकी विधिवत् प्रार्थना करना चाहते हैं॥१६॥
हे ऋत्विज्ञो ! पत्थरों से कूटकर छाने हुए सोमरस को (वसतीवरी नामक) जल में मिश्रित करें । पृथ्वी को बादलों से आच्छादित करते हुए वायुदेव नदियों के निमित्तं पानी को बरसाते हैं॥१७॥
हे इन्द्रदेव ! उत्तम यज्ञ के आधार पृथ्वी एवं द्युलोक में आप अपनी आभा का विस्तार करें और अपनी प्रेरणा से हमारे सहयोगियों को पोषण प्रदान करें॥१८॥
हे स्तोताओ! आप अत्यन्त हर्ष प्रदायक तथा महान् सोमरस इन्द्रदेव के निमित्त तैयार करें, जिससे वे (इन्द्रदेव) अपने सम्पूर्ण विवेक से स्तवन करने वाले तथा अन्न प्राप्ति की कामना करने वाले याजकों की इच्छा को पूर्ण करें॥१९॥
सिंह के समान महान् पराक्रमी भरण-पोषण करने में समर्थ हे इन्द्रदेव ! यज्ञ में सोमरस प्रदान करते हुए, विजयिनी स्तुतियों द्वारा हम निरन्तर आपसे याचना करते हैं। हम क्रोध के पात्र कदापि नहीं हैं; क्योंकि कौन ऐसा व्यक्ति है, जो अपने अधिपति से याचना नहीं करता॥२०॥
प्रसन्नतापूर्वक तैयार किए हुए शक्तिशाली तथा हर्ष प्रदायक इस सोमरस का पान करके इन्द्रदेव महान् शक्ति से सम्पन्न हों । वे समस्त रिपुओं के मद को चूर करके उनका विनाश करने वाली सन्तान हमें प्रदान करें॥२१॥
समस्त विश्व के पालक इन्द्रदेव रिषुओं द्वारा भी प्रशंसित होते हैं। वे सत्कर्म करने वाले, दान करने वाले, सोम अभिषव करने वाले तथा स्तुति करने वाले मनुष्यों को प्रचुर सम्पत्ति प्रदान करते हैं॥२२॥
महान् तेजस्वी हे इन्द्रदेव ! आप यहाँ पधारें और हमें इच्छित धन प्रदान करके हर्षित करें । मरुद्गणों के साथ सोमरस पीकर अपने उदर को पूर्णरूपेण भर लें॥२३॥
हे इन्द्रदेव ! स्वर्णिम रथ में जुड़ने वाले, स्तुति योग्य, लम्बे बालों वाले सैकड़ों हजारों घोड़े (वाला स्वर्णिम रथ) आपको सोमपान करने के लिए यहाँ (यज्ञस्थल पर) ले आएँ॥२४॥
हे इन्द्रदेव ! हर्षदायी सोमरस का पान करने के लिए मयूरवर्ण तथा सफेद पीठ वाले घोड़े आपको स्वर्ण रथ पर बैठाकर यहाँ (यज्ञस्थल पर) ले आएँ॥२५॥
हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! आप सर्वप्रथम इस शोधित-निष्पन्न सोमरस का पान करें। यह सोमरस अत्यधिक आह्लादवर्धक है॥२६॥
अपने महान् पराक्रम से अकेले ही शत्रुओं को परास्त करने वाले, अति उग्र तथा व्रत पालन के कारण सर्वश्रेष्ठ इन्द्रदेव हमारे पास पधारें । वे हमसे कभी भी दूर न हों, हमारे यज्ञ में आकर सदैव विद्यमान रहें॥२७॥
हे प्रकाशमान इन्द्रदेव ! दूर तक पीछा करते हुए आपने शुष्ण (शोषक असुर) के चलते-फिरते आवास को अपने वज्र से ध्वस्त कर दिया। उसके बाद होताओं द्वारा आवाहन-योग्य आप दोनों (स्तोताओं एवं याजकों) से प्रशंसनीय हुए॥२८॥
सबके पालक हे इन्द्रदेव ! सूर्योदय के समय, मध्याह्नकाल में दिन के अन्त में तथा रात्रि के प्रारम्भ में हमारे स्तवन आपको प्राप्त हों॥२९॥
(राजर्षि आसङ्ग का कथन) हे मेधातिथे ! हम आपको सबसे ज्यादा सम्पत्ति प्रदान करते हैं। हमारे बल से ही दूसरों को नीचा दिखाने वाले, अश्व तथा श्रेष्ठ आयुध आपको प्राप्त हुए हैं । अतः आप बार-बार स्तुति करें॥३०॥
(राजर्षि आसंग का कथन) हे मेधातिथे ! नम्रतापूर्वक श्रद्धा के साथ हमने आपके रथ को अश्वों के साथ नियोजित किया है । पशुधन से सम्पन्न यदुवंश में उत्पन्न हमने आपको बहुत-सा धन प्रदान किया है, इसलिए (हमारी) स्तुति करो॥३१॥
(मेधातिथि का कथन) जिन आसङ्ग ने मुझे सुवर्णमय आवरण सहित बहुत-सा धन प्रदान किया है, वे शब्दायमान रथ से युक्त होकर शत्रुओं के व्यापक धन-वैभव पर विजय प्राप्त करें॥३२॥
हे अग्निदेव ! दस हजार गौओं को प्रयोग के पुत्र आसंग ने दान कर दिया, जिससे वे अन्य दानियों में सर्वोच्च हो गये । इसके अलावा हमें प्रदान किए गए दस हजार परिपुष्ट गोधन, सरोवर के तट से प्रादुर्भूत वेंत के पौधे की भाँति प्रचुर मात्रा में वृद्धि को प्रात हों॥३३॥
(अङ्गिरस की पुत्री आसङ्ग की पत्नी शश्वती कहती हैं) हे स्वामिन् आपका शरीर हष्ट-पुष्ट हैं । आपका शक्तिशाली विशाल शरीर अति सुन्दर हैं, आप परम सौभाग्यशाली और सर्वश्रेष्ठ॥३४॥

सूक्त-२

भयभीत न होने वाले ऐश्वर्यवान् हे इन्द्रदेव ! आप अभिषुत सोमरस को ग्रहण करके पूर्णरूपेण तृप्त हों । आपको आनन्दित करने के लिए यह सोमरस अर्पित है॥१॥
जिस प्रकार घोड़े को जलाशय में धोकर स्वच्छ किया जाता है, उसी प्रकार याजकों द्वारा सोम (सोमलता को) स्वच्छ करके पत्थरों से कूटकर, छलनी से छानकर यह सोमरस तैयार किया गया है॥२॥
हे इन्द्रदेव ! पुरोड़ाश की भाँति, गाय के दूध में मिलाकर शोधित यह मधुर सोमरस आपके लिए तैयार किया गया है। इस आनन्ददायी सोमपान के लिए हम आपका आवाहन करते हैं॥३॥
देवों और मनुष्यों में केवल इन्द्रदेव ही सोमरस को पीने के अधिकारी हैं। सोमरस को पीने वाले इन्द्रदेव दीर्घजीवी हैं॥४॥
जिन इन्द्रदेव को सामान्य सोमरस, क्षीर से युक्त सोमरस तथा तृप्तकारी सोमरस रुष्ट नहीं करता (सन्तुष्ट करता है, उन विशाल तथा श्रेष्ठ हृदय वाले इन्द्रदेव की हम प्रार्थना करते हैं॥५॥
(जाल एवं वाद्ययंत्र लेकर) मृगों को जिस प्रकार शिकारी ढूंढते-फिरते हैं, उसी प्रकार हम ऋत्विक् और यजमान गौ दुग्ध और श्रेष्ठ स्तुतियों के साथ इन्द्रदेव को खोजते हैं॥६॥
यज्ञ मण्डप में इन्द्रदेव की तृप्ति (पीने) के लिए याजकगण तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न, सायं) निचोड़े हुए सोमरस को तैयार रखें॥७॥
समान रूप से पोषण करने वाले अधिष्ठानों वाले यज्ञों में तीन कलशों से सोमरस टपकाया जाता है तथा तीन भरी हुई सुचियों (चमचा) से आहुति दी जाती है॥८॥
हे सोम ! आप पवित्र हैं तथा अनेकों के अन्त:करण में विद्यमान रहते हैं। आप दुग्ध-दधि में मिलकर शूरवीर इन्द्रदेव को आनन्द प्रदान करते हैं॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी तृप्ति के निमित्त हमारे द्वारा अभिषुत हुए तीखे तथा कषैले स्वाद वाला सोमरस दुग्धादि मिलाये जाने की आवश्यकता अनुभव करता है॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप ऐश्वर्यवान् हैं, अत: हमारे द्वारा प्रदान किये गये पुरोड़ाश तथा दूध मिले सोमरस का पान करके हमें ऐश्वर्य प्रदान करें॥११॥
जैसे सुरा पीने के बाद उन्मत्त लोग आपस में युद्ध करते हैं, वैसे ही हे इन्द्रदेव ! यह सोमरस आपके हृदय में युद्ध (मन्थन करता है । जिस प्रकार दुग्ध से युक्त थनों वाली गाय की लोग प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार प्रार्थना करने वाले आपकी प्रशंसा करते हैं॥१२॥
हे विभूतिवान् इन्द्रदेव ! आपकी स्तुति करने वाला निश्चय ही धन प्राप्त करता है । आपका उपासक सभी ऐश्वर्यों से युक्त होता है॥१३॥
स्तुति न करने वाले (आस्था हीनों) के इन्द्रदेव शत्रु हैं । स्तोताओं द्वारा पठित स्तोत्रों को वे भली-भाँति जानते हैं। वे सामवेद गायक (उद्गाता) के गायन को भी सुनते और समझते हैं॥१४॥
हे इन्द्रदेव ! हिंसक शत्रुओं और उपेक्षित करने वालों के आश्रय में हमें न छोड़े। अपने बल से हमें अभीष्ट ऐश्वर्य प्रदान करें॥१५॥
हे इन्द्रदेव ! आपसे मित्रता करने के इच्छुक हम याजकगण (आपके स्तोता) तथा सभी कण्ववंशीय हमारे पुत्र-पौत्रादि स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं॥१६॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! यज्ञ कर्म में आपकी स्तुति करने के अतिरिक्त हम अन्य दूसरे की स्तुति नहीं करेंगे । हम स्तोत्रों द्वारा आपकी ही स्तुति करना जानते हैं अर्थात् आपकी ही स्तुति करते हैं॥१७॥
यज्ञ के निमित्त सदैव सोमरस तैयार करने वाले साधकों से देवगण प्रसन्न रहते हैं, उन्हीं की कामना करते हैं । आलस्यरहित देवगण आनन्द प्रदान करने वाले सोमरस को सदा पान करते हैं॥१८॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार विचारशील पुरुष अपनी पत्नी पर क्रोध नहीं करते, उसी प्रकार आप भी हमारे ऊपर क्रोधित न हों। आप अपने घोड़ों के द्वारा हमारे इस यज्ञ में पधारें॥१९॥
शत्रुओं पर असह्य प्रहार करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप हमारे निकट शीघ्र ही आएँ । श्रीहीन तथा बार-बार बुलाए जाने वाले, किन्तु फिर भी शीघ्र न आने वाले अहंकारी दामाद की तरह सायं आने में आप विलम्ब न करें॥२०॥
प्रचुर सम्पत्ति प्रदान करने वाली, शूरवीर इन्द्रदेव की बुद्धि तथा तीनों लोकों में विख्यात उनके मानस को हम भली-भाँति जानते हैं॥२१॥
हे याजको ! कण्ववंशीय ऋषि इन्द्रदेव को सोमरस से अभिषिंचित करें । अत्यन्त शक्तिशाली तथा अनेकों । प्रकार के रक्षण-साधनों से सम्पन्न इन्द्रदेव से अधिक कीर्तिमान् देवता के बारे में हम कुछ भी नहीं जानते हैं॥२२॥
सोमरस तैयार करने वाले है याजको ! आप सबसे अधिक महान् , पराक्रमी, बलशाली तथा श्रेष्ठ इन्द्रदेव को सोमरस प्रदान करें, जिसका कि वे प्रसन्नतापूर्वक पान करें॥२३॥
जिन याजकों के यज्ञ मण्डप में इन्द्रदेव पधारते हैं, वे कभी भी दुःखीं नहीं होते। वे देव प्रार्थना करने वालों को अश्व, गौ आदि धन प्रदान करते हैं॥२४॥
हे सोम शोधन में रत याजको ! पराक्रमी शूरवीर इन्द्रदेव के लिए आनन्ददायी सोमरस अर्पित करो॥२५॥
सैकड़ों साधनों से (हर प्रकार से) हमारी रक्षा करने वाले, वृत्रासुर का हनन करने वाले सोमपायी हे इन्द्रदेव ! आप हमारे यज्ञ में अवश्य पधारें और शत्रुओं को हमसे दूर करें॥२६॥
संकेतमात्र से रथ में नियोजित होने वाले सुखवर्धक दोनों अश्व, सबको आश्रय प्रदान करने वाले, मित्ररूप इन्द्रदेव को, स्तुति गान के साथ यज्ञ मण्डप पर लेकर पहुँचें॥२७॥
हे सौन्दर्यवान् , ज्ञानवान् तथा वीर्यवान् इन्द्रदेव ! आप यहाँ पधारें । सोमरस अभिषुत होकर तैयार हो चुका है। आपके उपासक आपको बुला रहे हैं। अत: आप यहाँ पधारें॥२८॥
हे कर्मशील इन्द्रदेव ! स्तवन करने वाले समस्त साधक मन्त्रों से आपको समृद्ध करते हैं। आप स्तुतियों को ग्रहण करके हमें श्रेष्ठ तथा हितकारी धन प्रदान करें॥२९॥
उक्थ (स्तुति) मंत्रों के साथ आवाहन योग्य तथा प्रशंसनीय हे इन्द्रदेव ! आपके निमित्त की जाने वाली समस्त स्तुतियाँ एक साथ मिलकर आप में बल उत्पन्न करती हैं॥३०॥
हे इन्द्रदेव ! आप विविध प्रकार के श्रेष्ठ कर्म करने वाले तथा अद्वितीय वज्रधारी हैं। आप रिपुओं के लिए अजेय हैं तथा यजमान को सदैव अन्नादि प्रदान करते हैं॥३१॥
अपनी कुशलता द्वारा(दायें हाथ से) वृत्र को मारने तथा विराट् शक्तियों के कारण इन्द्रदेव महान् हैं । सर्वव्यापी इन्द्रदेव को समस्त प्राणी अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं॥३२॥
जिन इन्द्रदेव में विश्व के समस्त प्राणी तथा सम्पूर्ण बल स्थित हैं, ऐसे ऐश्वर्यवान् देव को निश्चित रूप से प्रसन्न करना चाहिए॥३३॥
जिन इन्द्रदेव को सभी लोग अत्यन्त बलशाली तथा शूरवीर के रूप में जानते हैं, उन्होंने ही ये सब पराक्रम पूर्ण कर्म सम्पन्न किये हैं। सभी ऐश्वर्यवानों को अन्न प्रदान करने वाले वे ही हैं॥३४॥
सभी के पोषक इन्द्रदेव, वेगपूर्वक दौड़ते हुए अपने रथ की , रिपुओं से रक्षा करते हैं। वे इन्द्रदेव सबके स्वामी होकर धन को प्राप्त करते हैं॥३५॥
ज्ञानी इन्द्रदेव अपने अश्वों से सभी गन्तव्य स्थलों पर पहुँच जाते हैं तथा शूरवीर नेताओं (मरुद्गणों) की सहायता से वृत्र का वध करते हैं। वे सत्यरूप इन्द्रदेव अपने सेवकों की रक्षा करते हैं॥३६॥
(ऋषि मेध का स्वयं के प्रति अथवा अन्तः चेतना को अपनी प्रिय मेधा से कथन) हे प्रियमेध ! सोमरस पान करके इन्द्रदेव वास्तविक शक्ति से सम्पन्न होते हैं । अत: मनोयोग से उनके निमित्त यज्ञ करो॥३७॥
हे कण्वपुत्रो ! सज्जनों का पालन करने वाले, कीर्ति की कामना करने वाले, दृढ़ आत्मबल वाले तथा जिनके यश का गान सर्वत्र होता है, ऐसे इन्द्रदेव की आप स्तुति करें॥३८॥
जो देवगण इन (इन्द्रदेव) पर अपनी कामनाएँ आश्रित करते हैं, उन्हें श्रेष्ठ कर्म वाले, सखारूप इन्द्रदेव ने पद चिह्न न प्राप्त होने पर भी गौएँ (दिव्य वाणियाँ) खोजकर प्रदान कीं॥३९॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने इस प्रकार स्तुति करते हुए, ज्ञानी कण्वपुत्र मेधातिथि को मेषरूप में (अनुगमन करने वाले के रूप में प्राप्त किया है॥४०॥
हे विभिन्दो ! आपने इस ऋषि के लिए चालीस हजार की संख्या में धन प्रदान किया। इसके अतिरिक्त पुनः आठ सहस्र की संख्या में धन प्रदान किया॥४१॥
जल की वृष्टि करने वाले, सबका निर्माण करने वाले, याजकों को ऊँचा उठाने वाले, पृथ्वी तथा द्युलोक के पूर्वोक्त धन प्रादुर्भूत करने के लिए हम स्तुति करते हैं॥४२॥

सूक्त-३

हे इन्द्रदेव ! गौ के दूध में मिश्रित रस रूप में हमारे द्वारा शोधित किए गये सोमरस का आप पान करें और प्रफुल्लित हों । संगठित रूप से किये गए कार्यों में हमारे सहचर बनकर हमें उन्नतशील मार्ग दिखाएँ। आपकी बुद्धि हमारा संरक्षण करने वाली बने॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी अनुकूल उत्तम बुद्धि द्वारा प्रेरित होकर हम सामर्थ्य प्राप्त करें । शत्रु हमें नष्ट न करें । अपने सामर्थ्यशाली रक्षण-साधनों से हमारी रक्षा करते हुए सुख-समृद्धि बढ़ाएँ॥२॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! हमारी स्तुतियाँ आपकी कीर्ति को बढ़ाएँ । अग्नि के समान प्रखर, पवित्रात्मा और विद्वान् साधक स्तोत्रों द्वारा आपकी प्रार्थना करते हैं॥३॥
ये इन्द्रदेव हजारों ऋषियों के स्तुतिबल को पाकर प्रख्यात हुए हैं। इससे समुद्र की तरह विस्तृत हुए हैं। इनकी सत्यनिष्ठा और शक्ति प्रसिद्ध है । यज्ञों में स्तोत्रगान करते हुए इनका सम्मान किया जाता है॥४॥
दैवी प्रयोजनों के लिए किये गये यज्ञों में हम याजकगण जिस प्रकार यज्ञ के प्रारम्भ और उसकी समाप्ति के समय इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं, वैसे ही धन प्राप्ति की कामना से भी इन्द्रदेव को आवाहित करते हैं॥५॥
इन्द्रदेव ने अपनी सामर्थ्य से द्युलोक और पृथ्वी को विस्तृत किया। इन्द्रदेव ने ही सूर्यदेव को आलोकयुक्त किया । इन्द्रदेव ने ही सभी लोकों को आश्रय प्रदान किया । ऐसे इन्द्रदेव के लिए ही यह सोमरस समर्पित हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! प्राचीन काल से ही भुगणों तथा रुद्रों द्वारा आपकी स्तुति की जाती रही है । याजकगण स्तुति करते हुए सोमपान के लिए सर्वप्रथम आपको ही बुलाते हैं॥७॥
वे इन्द्रदेव सोमरस का सेवन करके अत्यधिक आनन्दित होकर यजमान के वीर्य और बल को बढ़ाते हैं। अतएव स्तोतागण आज भी इन्द्रदेव की महिमा का वर्णन करते हैं॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आपने जिस शक्ति से यतियों तथा भृगुऋषि को धन प्रदान किया था तथा जिस ज्ञान से ज्ञानियों (प्रस्कण्व) की रक्षा की थी, उस ज्ञान तथा बल की प्राप्ति के लिए सबसे पहले हम आपसे प्रार्थना करते हैं॥९॥
हे इन्द्रदेव ! जिस शक्ति से आपने समुद्र तथा विशाल नदियों का निर्माण किया है; वह शक्ति हमारे अभीष्ट को पूर्ण करने वाली है। आपकी जिस महिमा का अनुगमन द्यु तथा पृथ्वीलोक करते हैं, उसका कोई पारावार नहीं॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! जिस श्रेष्ठ पराक्रम से युक्त ऐश्वर्य की हम आपसे याचना करते हैं, आप उसे प्रदान करें । अन्न के इच्छुक मनुष्यों को सबसे पहले अन्न प्रदान करें । हे इन्द्रदेव ! आप स्तुतिकर्ता को भी धन-धान्य प्रदान करें॥११॥
हे इन्द्रदेव ! जिस शक्ति से आपने पुरु के पुत्रों की रक्षा की थीं, उसी शक्ति को विवेक से काम करने वाले लोग प्राप्त करें। जिस शक्ति से आपने तेजस्वी धन दाताओं तथा रुशम, श्यावक और कृप ( इस नाम के व्यक्तियों अथवा रोग शामकों, विद्वानों तथा कृपालुओं) की रक्षा की थी, उसी शक्ति से हमें भी सुरक्षा प्रदान करें॥१२॥
प्राचीनकाल से ही स्तुति करने वाले ऋषिगण जब उन इन्द्रदेव की महिमा-मण्डित शक्ति को नहीं जान सके, तो आज के स्तोता कौन सी नवीन स्तुति करें ?॥१३॥
है इन्द्रदेव ! ऐसे कौन से देव हैं, जो आपके निमित्त यज्ञ करते हैं तथा कौन से ऋषिज्ञानी हैं, जो आपकी स्तुति करके कृपा प्राप्त करते हैं? हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप सोमरस अभिघुत करने वालों की स्तुति सुनकर उनके पास कब जाते हैं?॥१४॥
(जीवन-संग्राम में) वास्तविक विजय दिलाने वाले, ऐश्वर्य प्राप्ति के माध्यम, सतत रक्षा करने वाले मधुर स्तोत्र, युद्ध के उपकरण रथ के समान कहे जाते हैं॥१५॥
कण्व गोत्रोत्पन्न ऋषियों की भाँति स्तुति करते हुए भृगुगोत्रोत्पन्न ऋषियों ने इन्द्रदेव को चारों ओर से उसी प्रकार घेर लिया, जिस प्रकार सूर्य रश्मियाँ इस संसार में चारों ओर फैल जाती हैं। ऐसे महान् इन्द्रदेव का प्रियमेध ने स्तुति करते हुए पूजन किया॥१६॥
वृत्रासुर के विनाश में सक्षम, रथ पर आसीन, ऐश्वर्य सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! आप शक्ति-सम्पन्न होकर मरुद्गणों के साथ सुदूर प्रदेश (द्युलोक) से हमारे यज्ञ में पधारें॥१७॥
हे प्रार्थनीय इन्द्रदेव ! मेधा जागरण के निमित्त, स्तोतागण विवेकपूर्वक आपकी साधना करते हैं । हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप आतुर व्यक्ति की भाँति हमारी स्तुतियों को स्वीकार करें॥१८॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपने विशाल धनुष से वृत्र, मायावी अर्बुद तथा मृगय नामक असुरों का वध किया । इसके अलावा पर्वतों द्वारा छिपाई हुई गौओं (बादलों में छिपी जल धाराओं) को मुक्त किया॥१९॥
हे इन्द्रदेव ! जब आपने आकाश से विशाल अहि को नीचे धकेलकर अपने शौर्य को प्रकट किया, तब अग्नियाँ (यज्ञादि) और सूर्य प्रकाशित होने लगे तथा आपके प्रिय सोम भी चमकने लगे॥२०॥
कुरयाण(कर्मनिष्ठ) के पुत्र पाकस्थामा (परिपक्व बलयुक्त) ने हमको वहीं प्रदान किया, जो इन्द्र और मरुद्गणों ने प्रदान किया था। वह ऐश्वर्य सभी धनों में अत्यधिक सुशोभित होता हुआ, आलोकित होने वाले गतिमान् सूर्य के सदृश सुशोभित होता है॥२१॥
पाकस्थामा (परिपक्व बलयुक्त) ने हमें श्रेष्ठ धुरी (धारण में समर्थ) से योजित, रोहित (लाल अथवा वर्धमान-गतिशील अश्व) प्रदान किया तथा ज्ञानयुक्त ऐश्वर्य भी दिया॥२२॥
वय (अश्व, पक्षी या आयुष्य) ने जिस प्रकार तुग्र (तेजस्वी परमात्म चेतना) के पुत्र (भुज्यु नामक व्यक्ति अथवा योगयोग्य जीव) को उसके आवास (ठिकाने) तक पहुँचाया, उसी प्रकार अन्य दस (वहनकर्ता अश्व, इन्द्रियाँ या प्राण-उपप्राण) धुरे (जीव चेतना के धारक शरीर) को (उसके लक्ष्य-आवास) तक ले जाते हैं॥२३॥
आत्मरूप पिता का पुत्र पाकस्थामा श्रेष्ठ आवास देने वाला तथा शत्रुहन्ता हैं। ऐसे रोहित (आरोहणशील-प्रगतिशील) तेज को देने वाले की हम स्तुति करते हैं॥२४॥

सूक्त-४

हे इन्द्रदेव ! आप स्तोताओं द्वारा सहायता के लिए चारों ओर से आवाहित किये जाते हैं । शत्रुनाशक इन्द्रदेव ! 'अनु’ और ‘तुर्वश' के लिए आपको प्रार्थनापूर्वक बुलाया जाता है॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप रुम, रुशम, श्यावक और कृप के लिए प्रसन्न किये जाते हैं । कण्व वंशीय ऋषिगण आपको विभिन्न स्तोत्रों से प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। हे इन्द्रदेव ! आप यज्ञार्थ पधारें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! प्यासे गौर मृग जिस तरह पानी से भरे तालाब के निकट द्रुतगति से जाते हैं, उसी प्रकार आप हमारे सहचर बनकर यज्ञ में आयें और हम कण्वपुत्रों के यज्ञ में सोमपान कर तृप्त हों॥३॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! सोमयज्ञ सम्पन्न करने वाले साधकों को वैभव प्रदान करने के लिए सोमरस आपको आनन्दित करे । पात्र में रखे शोधित सोमरस को पीकर आप श्रेष्ठ बल से युक्त होते हैं॥४॥
अपनी शक्ति और तेज से इन्द्रदेव ने रिपुओं को वशीभूत करके उनके क्रोध और अहंकार को नष्ट किया । उसके पश्चात् उन्होंने सबको वृक्ष के सदृश जडवत् निष्क्रिय बना दिया॥५॥
हे इन्द्रदेव ! जो व्यक्ति आपकी प्रार्थना करता है, उसे आप हजारों अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं । जो विनम्र भाव से आपको आहुति प्रदान करता है, वह व्यक्ति पराक्रमी तथा शत्रु-विध्वंसक पुत्र को प्राप्त करता है॥६॥
महान् बलशाली हे इन्द्रदेव ! आपकी मित्रता के प्रभाव से हम किसी से भयभीत न हों और न कभी थकें । उपासकों की कामना पूर्ति करने वाले हे देव ! आपके सत्कार्य प्रशंसनीय हैं। हम तुर्वश और यदु को भी प्रसन्नता की स्थिति में देखें॥७॥
सर्वशक्तिमान् हे इन्द्रदेव ! आप अपने बाँयें हाथ से (सरलता से सबको आश्रय देते हैं । नष्ट-भ्रष्ट करने वाले क्रूर शत्रु आपको कष्ट देने में सक्षम नहीं हैं । शहद की तरह मधुर दूध से युक्त सुखदायी सोम आपके लिए प्रस्तुत है । शीघ्रता से यज्ञवेदी के समीप पधारें और सोमपान करें॥८॥
हे इन्द्रदेव ! मनुष्य जब आपको अपना मित्र बना लेता है, तब वह रथों से युक्त सौन्दर्यवान्, ऐश्वर्यवान् तथा धन-धान्य से सदैव पूर्ण रहता है । वह सदा श्रेष्ठ आभूषणों से सुसज्जित तथा सबको प्रसन्नता देने वाला होकर सभा गृहे आदि में जाता है॥९॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! ऋश्य (दिखाई देने में सुन्दर) तृषित हिरण के सदृश आप सोमपात्र के सन्निकट आकर इच्छानुसार सोमपान करें । आप नित्य वर्षा करते हुए ओज से सम्पन्न हों॥१०॥
बलवान् अश्वों वाले रथ पर आरूढ़, वृत्र-संहारक इन्द्रदेव का आगमन हो गया है । हे अध्वयों ! आप सोमरस पान के इच्छुक इन्द्रदेव के लिए शीघ्र ही सोमरस तैयार करें॥११॥
हे इन्द्रदेव ! जिसके घर पर पधारकर आप सोमरस पान करके सन्तुष्ट होते हैं, वह दानी व्यक्ति अपने को श्रेष्ठ समझता है । हे इन्द्रदेव ! आपके निमित्त सोमरस रूप श्रेष्ठ आहार तैयार है, आप पधारकर उसका पान करें॥१२॥
हे अध्वयों ! रथ पर आरूढ़ होने वाले इन्द्रदेव के निमित्त सोमरस को निचोड़े। सोमरस अभिषुत करने वाले ऊँचे स्थान पर विद्यमान पत्थरों से ज्ञात होता है कि योजकों द्वारा यज्ञ सम्पन्न किया जा रहा है॥१३॥
अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले दो शक्तिशाली घोड़े हमारे इस यज्ञ में इन्द्रदेव को ले आएँ । हे इन्द्रदेव ! यज्ञ की सेवा करने वाले एवं सदैव गतिशील रहने वाले घोड़े आपको इस यज्ञ में लाएँ॥१४॥
अनेकों द्वारा आहूत होने वाले हे पूषादेव ! आप बहुत ऐश्वर्यवान् तथा सबके पोषक हैं । हम श्रेष्ठ मित्रभाव से आपका आवाहन करते हैं। आप धन देकर तथा शत्रुओं को नष्ट करके विपत्ति से हमें मुक्ति प्रदान करें॥१५॥
संकट से छुड़ाने वाले हे पूषादेव ! आप हमारी मेधा को (नाई के) हाथ के छुरे के समान तीक्ष्ण करें तथा हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । हे इन्द्रदेव ! जिस ऐश्वर्य को आप अन्य मनुष्यों के लिए प्रदान करते हैं, उस गौ रूप धन को हमें भी प्रदान करें॥१६॥
सभी के पालक है पूषादेव ! आप रिपुओं के विनाशक तथा सज्जनों के हर्ष प्रदायक हैं। हम आपको प्रसन्न करना चाहते हैं । हे तेजस्वी इन्द्रदेव ! हम केवल आपकी उपासना करना चाहते हैं, क्योंकि आपके अतिरिक्त किसी अन्य देव की उपासना हितकारी नहीं है । हे वास प्रदान करने वाले इन्द्रदेव ! आप स्तुतिकर्ता पज्र (कक्षीवान्) की तरह हमें भी धन प्रदान करें॥१७॥
हे तेजस्वी इन्द्रदेव ! जब कभी हमारी गौएँ चरती हुई दूर चली जाएँ, तो वहाँ आप उन्हें सुरक्षित रखें। हे पूषन् ! आप हमारे रक्षक तथा कल्याणकारी हैं। आप हमें प्रचुर अन्न तथा धन प्रदान करें॥१८॥
प्रखरता सम्पन्न, श्रेष्ठ धन वाले कुरुङ्ग (नामक राजा अथवा कर्मशील) के द्वारा दिव्यदान देते समय हमें सैकड़ों अश्वों से युक्त प्रचुर धन मिला॥१९॥
हमने (देवातिथि ऋषि ने) साठ हजार पवित्र गौओं को कण्व पुत्र मेधातिथि, उनके स्तोताओं तथा प्रिय मेधे के द्वारा प्राप्त किया था॥२०॥
हमने (देवातिथि ष ) जो पूर्वोक्त (साठ हजार गौ रूप) धन प्राप्त किया, उसे देखकर वृक्षों ने हर्षध्वनि पूर्वक कहा कि इस (ऋषि) को स्तुति योग्य श्रेष्ठ गौएँ एवं श्रेष्ठ अश्व प्राप्त हुए॥२१॥

सूक्त-५

बहुत दूर होते हुए भी अति समीप दिखाई देने वाली अरुणाभा उषा जब अपनी स्वर्णिम रश्मियों को फैलाती हैं, तब उसके प्रकाश से समूचा विश्व प्रकाशित हो जाता हैं॥१॥
हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो ! आप नेतृत्व करने वाले हैं। इच्छा मात्र से ही आप अति विशाल ऐश्वर्यवान् रथ द्वारा उषा के पास पहुँच जाते हैं॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप धन प्रदाता हैं, इसलिए आपके निमित्त स्तवन गाये जाते हैं । हम दूत के समान अपनी वाणी से आपका वर्णन करते हैं (आपकी स्तुति करते हैं ) ॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप सभी को प्रिय लगने वाले, सबको आनन्दित करने वाले तथा प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। हम कण्ववंशीय (स्तोतागण) अपनी रक्षा के लिए आपकी स्तुति करते हैं॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों अत्यन्त पूजनीय, बल प्रदान करने वाले, श्रेष्ठ कर्म करने वाले तथा अन्न उत्पन्न करने वाले हैं। आप यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म करने वाले दानियों के घर जाकर उनका कल्याण करते हैं॥५॥
श्रेष्ठ देवों के लिए देने वाले (हव्यदाता) को आप नष्ट न होने वाली बुद्धि (स्थिर प्रज्ञा) तथा (उनकी) गौओं (गौ, वाणी या इन्द्रियों) के पोषण क्षेत्र को घृत (तेजस् अथवा जल) से सिंचित करें॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों श्येन पक्षी की तरह द्रुतगामी अश्वों के द्वारा हमारे इस यज्ञ में शीघ्र ही पधारें॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों जिस यान की सहायता से तीन दिन और तीन रात्रि (लगातार) दिव्य लोकों में भ्रमण करते हैं, उसी (यान) से हमारे इस यज्ञ स्थल पर पधारें॥८॥
हे अश्विनीकुमारों ! आप दोनों हमें गौओं से सम्पन्न प्रचुर अन्न तथा वितरित करने योग्य धन प्रदान करें, साथ ही यह भी निर्देश करें कि उस धन का सदुपयोग हम कैसे करें॥९॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमें गौ, अश्व, श्रेष्ठ रथ तथा साहसी पुत्रों से युक्त महान् ऐश्वर्य प्रदान करें॥१०॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों श्रेष्ठ कार्य करने वाले तथा रिपुओं को नष्ट करने वाले हैं। आप अपने स्वर्णिम रथ से यज्ञस्थल की ओर बढ़ते हुए मधु मिश्रित सोमरस का पान करें॥११॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ऐश्वर्यवान् हैं। आप हम धन-सम्पन्नों को सुरक्षित विशाल आवास प्रदान करें॥१२॥
हे अश्विनीकुमारो ! मनुष्यों की मेधा तथा ज्ञान को आप सुरक्षित रखते हैं। आप अन्य किसी के पास न । जाकर हमारे निकट आएँ॥१३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमारे द्वारा समर्पित किए गये मधुर तथा आनन्ददायक सोमरस का पान करें॥१४॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप, सबका पालन करने वाले तथा सबके जीवन को धारण करने वाले हैं। हमें सैकड़ों एवं हजारों प्रकार का धन-वैभव प्रदान करें॥१५॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों को मनीषीगण अनेकों स्थानों पर निश्चित रूप से बुलाते हैं, अत: आप अपने वाहन द्वारा यज्ञस्थल पर पधारें॥१६॥
हे अश्विनीकुमारो ! याजकगण अलंकारयुक्त कुशा का आसन बिछाकर आप दोनों का आवाहन करते हैं॥१७॥
हे अश्विनीकुमारो ! इस समय हम स्तोताओं द्वारा उच्चरित ये स्तोत्र आप दोनों के अति निकट पहुँचे॥१८॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपके रथ के दर्शनीय भाग पर यजमानों द्वारा स्थापित किये गये मधुपात्र से मुधर रस ग्रहण कर उसका पान करें॥१९॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों अन्न तथा धन से सम्पन्न हैं । आप हमारी सन्तानों तथा गौ आदि पशुओं के निमित्त प्रचुर अन्न लेकर अपने रथ से यहाँ आएँ॥२०॥
नित्य प्रात:काल दर्शनीय एवं स्तुत्य हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों कृपापूर्वक समयानुसार जल की वर्षा करते रहें, जिससे हमें प्रचुर अन्न मिलता रहे॥२१॥
हे अश्विनीकुमारो ! समुद्र में फेंके हुए तुम पुत्र भुज्यु ने आपकी प्रार्थना कब की थी ? जिससे आपने अपने रथ वहाँ पहुँचकर उसे बचाया था॥२२॥
सत्य के पालक हे अश्विनीकुमारो ! पीड़ित कण्व ऋषि को आपने सदा ऊँचे आवास देकर सुरक्षा प्रदान की थी॥२३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों धन की वर्षा करने वाले हैं। हमारे द्वारा आवाहन किये जाने पर आप अपने रक्षण-साधनों से युक्त होकर यहाँ पधारें॥२४॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार आपने प्रार्थना करने वाले अत्रि, प्रियमेध, कण्व तथा उपस्तुत को सुरक्षा प्रदान की थीं, उसी प्रकार हमें भी सुरक्षा प्रदान करें॥२५॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपने जिस प्रकार प्राप्त करने योग्य ऐश्वर्य को पाने के लिए अंशु' की रक्षा की थीं, गौओं की प्राप्ति के निमित्त 'अगस्त्य की रक्षा की थी तथा ‘सोभरि' को युद्ध में सुरक्षा प्रदान की थी, उसी प्रकार हमें भी सुरक्षा प्रदान करें॥२६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ऐश्वर्य की वर्षा करने वाले हैं। प्रार्थना करने वाले हम स्तोतागण आपसे प्रचुर धन की याचना करते हैं॥२७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों सोने के दण्ड वाले, सोने की लगाम वाले तथा दिव्य लोक का स्पर्श करने वाले रथ पर आरूढ़ होकर पधारें॥२८॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपके रथ की लकड़ी स्वर्णिम आभा से युक्त हैं । धुरा तथा पहिया भी सुवर्ण निर्मित है॥२९॥
बल तथा धन से सम्पन्न हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों अपने रथ द्वारा हमारी प्रार्थना को सुनने के लिए दूर देश से भी हमारे पास आयें॥३०॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों दुष्टों की अनेकों पुरियों को विनष्ट करके अन्न लेकर यज्ञस्थल पर पधारें॥३१॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों सत्यनिष्ठ तथा अनेकों के मित्र हैं। आप धन, अन्न तथा दैवी सम्पत्ति से सम्पन्न होकर हमारे पास आयें॥३२॥
हे अश्विनीकुमारो ! पक्षियों के सदृश तेजगति वाले घोड़े, आपको श्रेष्ठ यज्ञादि कर्म करने वाले याजक के पास ले जाएँ॥३३॥
स्तोता जिसके अनुगामी हैं, आपका वह अश्व अथवा अन्नयुक्त रथ चक्र (सैन्य या प्रकृति के चक्र) को बाधा नहीं पहुँचाता॥३४॥
बुद्धि के समान सत्य भासित होने वाले (देवो ! आप) स्वर्णिम रथ एवं दौड़ने वाले अश्वों द्वारा यहाँ पधारें॥३५॥
वर्षणशील सम्पत्ति वाले (हे अश्विदेवो !) जाग्रत् और शोधित सोम का पान करने वाले आप दोनों हमें पोषक अन्न से युक्त करें॥३६॥
वे (दोनों) अश्विनीकुमार हमारे लिए उपयोगी ऐश्वर्यो-विभूतियों को जानें । चेदि (ज्ञानियों के) वंशज “कशु' (नामक पात्र अथवा प्रेरक बल) ने हमें जिस प्रकार सैकड़ों ऊँट, दासियाँ एवं सहस्र गौएँ प्रदान कीं, यह भी वे जानें॥३७॥
जिन (कशु) ने हमें दस राजाओं (इन्द्रियों) के स्वर्णाभ (चमकीले) पुरुषार्थ (हमारी सेवार्थ) प्रदान किये, ऐसे चेदिवंशीय के चरणों में सारी प्रजाएँ रहती हैं॥३८॥
जिस रास्ते से चेदिवंशीय (ज्ञानजन्य प्रेरक - प्रवाह) जाते हैं, उस रास्ते से दूसरे नहीं जाते । सभी याजकों को ‘कशु' से अधिक धन कोई नहीं प्रदान करता॥३९॥

सूक्त-६

जल की वृष्टि करने वाले मेघों के सदृश महान् और तेजस्वी वे यशस्वी इन्द्रदेव अपने प्रिय पात्रों की स्तुतियों से समृद्ध होकर व्यापक रूप ग्रहण करते हैं ॥१॥
जब आकाश मार्ग से गमन करने में सक्षम अश्व यज्ञ के लिए तत्पर इन्द्रदेव को वेगपूर्वक (यज्ञस्थल पर) ले जाते हैं, तब उद्गातागण यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले मंत्रों से उन इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं॥२॥
जब कण्ववंशीय ऋषिगण स्तुतियों के माध्यम से इन्द्रदेव को यज्ञ साधक (यज्ञरक्षक) बना लेते हैं, तब (यज्ञ रक्षार्थ) शस्त्रों की आवश्यकता नहीं रह जाती, ऐसा कहा गया है॥३॥
समस्त प्रजाएँ उग्र इन्द्रदेव के प्रति नमनपूर्वक उसी प्रकार आकर्षित होती है, जैसे कि सभी नदियाँ समुद्र में मिलने के लिए वेग से जाती हैं॥४॥
इन्द्रदेव का वह ओजस (बल) अत्यन्त तेजस्वी हैं, जिससे वे द्युलोक से पृथ्वीलोक तक आवरण के समान फैलकर सुरक्षा करते हैं॥५॥
संसार को भयभीत करने वाले (कम्पित करने वाले) वृत्रासुर के शीश को शक्ति - सम्पन्न इन्द्रदेव ने अपने तीक्ष्ण प्रहार वाले वज्र से अलग कर दिया॥६॥
अग्नि की ज्वालाओं के सदृश तेजयुक्त स्तोत्रों का स्तोताओं के समक्ष हम बार-बार उच्चारण करते हैं॥७॥
गुफा में रहने वाली गौएँ (अन्त:करण में विद्यमान स्तुतियाँ) इन्द्रदेव के निकट पहुँचकर निश्चिन्त होती हैं, उनको कण्ववंश के षि सोमरस से सिंचित करते हैं॥८॥
हे इन्द्रदेव ! हम गौओ और अश्वो से युक्त धन को प्राप्त करें। सबसे पहले हम अपने ज्ञान के बल पर अन्न को प्राप्त करें॥९॥
हम (याजकों) ने पालनकर्ता यज्ञरूप इन्द्रदेव की बुद्धि (कृपा) को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। इससे हम सूर्य के सदृश तेज से युक्त हो गये हैं॥१०॥
कण्व अघि के सदृश हमने इन्द्रदेव को उने प्राचीन स्तोत्रों से सुशोभित किया है, जिनके प्रभाव से वे शक्ति-सम्पन्न बनते हैं॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी स्तुति न करने वाले तथा आपके निमित्त स्तुति करने वाले अधिगणों के मध्य मेरे स्तोत्र ही प्रशंसनीय हैं । आप उन स्तोत्रों के प्रभाव से भली प्रकार परिपुष्ट हों॥१२॥
इन्द्रदेव के क्रोध से टुकड़े-टुकड़े होकर जब वृत्र ने गर्जना की, तब इन्द्रदेव ने पानी को समुद्र की ओर भेज दिया॥१३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपने वज्र से शुष्ण नामक राक्षस पर प्रहार किया और उसका वध करके यशस्वी हो गये॥१४॥
उन वज्रधारी इन्द्रदेव को द्युलोक, अन्तरिक्षलोक तथा पृथ्वीलोक अपनी शक्ति से घेर नहीं सकते॥१५॥
है इन्द्रदेव ! बृहत् जल-प्रवाहों को रोककर बैठे हुए वृत्रासुर को आपने जल के मध्य में ही मार दिया॥१६॥
जब वृत्रासुर ने महान् द्युलोक तथा पृथ्वीलोक को ढक लिया, तब सभी जगह अंधकार छा गया॥१७॥
हे शूरवीर इन्द्रदेव ! आपकी प्रार्थना सभी यतया आर भृगुओं ने की । आप हमारी भी प्रार्थना को सुने॥१८॥
है इन्द्रदेव ! आपकी ये यज्ञ प्रक्रिया को आगे बढ़ाने-पोषित करने वाली पृश्नियाँ (गौएँ किरणें, पृथ्वी आदि) यह (यज्ञ पोषक) आशिर (दूध या पोषक रस) एवं घृत (ऊर्जावर्धक या स्निग्ध हव्य) प्रदान करती हैं॥१९॥
हे इन्द्रदेव ! ये जो (ऊपर वर्णित) प्रसवशील (वांछित उत्पादन देने वाली) हैं, वे अपने मुख से आपके द्वारा (प्रदत्त अन्न या ओज को ग्रहण कर) गर्भवती होती हैं (और) सूर्य के चारों ओर धारक किरणों की तरह रहती या घूमती हैं॥२०॥
हे बलों के स्वामी इन्द्रदेव ! कण्ववंशीय ऋषि अपने स्तवन से आपको समृद्ध करते हैं। वे सोमरस समर्पित करके आपको हर्षित करते हैं॥२१॥
पर्वतों के दुर्ग में निवास करने वाले है इन्द्रदेव ! आपकी कृपा से जो यज्ञ सम्पन्न होते हैं, उनमें आपकी ही स्तुति की जाती है॥२२॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें गौओं से सम्पन्न विशाल नगर, अन्न, श्रेष्ठ बल तथा उत्तम सन्ताने प्रदान करें॥२३॥
हे इन्द्रदेव ! आपने जिस प्रकार अनेक द्रुतगामी अश्व, नहुष नामक राजा को प्रदान किया, उसी प्रकार हमें भी प्रदान करें॥२४॥
हे ज्ञान-सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप हमारी गौशाला को गौओं से समृद्ध करके हमें हर्ष प्रदान करें॥२५॥
हे आत्मस्वरूप इन्द्रदेव !आप अपने महान् ओज तथा शौर्य को प्रदर्शित करके प्रजाओं पर शासन करते हैं॥२६॥
हे इन्द्रदेव !आहुति प्रदान करने वाले सभी मनुष्य अपनी सुरक्षा हेतु आपको ही सोमपान के लिए बुलाते हैं॥२७॥
पर्वत की गुफाओं-घाटियों एवं नदियों के संगम (पवित्र स्थलों) पर (किये गये प्रयोगों से) विप्र (इन्द्र, श्रेष्ठतम मेधावी या ज्ञानी) उत्पन्न होते हैं॥२८॥
जहाँ से व्यापक (जीवन तत्त्व) गतिशील (प्रवाहित होता हैं, ऊपर वाले उस स्थान से प्रखर दृष्टि वाले (इन्द्र, विद्वान् या सूर्यदेव) समुद्र जल, सागर अथवा जीवन प्रवाह को देखते हैं॥२९॥
द्युलोक से भी परे स्वप्रकाशित (सविता) तथा दिन में दृश्यमान सूर्य एवं इन सभी प्राचीनतम तेजस्वी स्वरूपों में इन्द्रदेव का ही तेज देखते हैं॥३०॥
हे इन्द्रदेव ! सभी कण्ववंशीय ऋषि आपकी मेधा तथा ओज को बढ़ाते हैं एवं आपके शौर्य को भी समृद्ध करते हैं॥३१॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारी प्रार्थना को स्वीकार करके हमें भली प्रकार सुरक्षित करें तथा हमारी मेधा को बढ़ायें॥३२॥
हे इन्द्रदेव ! आप विशाल वज्र धारण करने वाले हैं। अपने दीर्घायुष्य के निमित्त हम स्तोतागण आपकी प्रार्थना करते हैं॥३३॥
जिस प्रकार प्रवहमान जल नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार कण्ववंशीय ष द्वारा की हुई स्तुति इन्द्रदेव के पास पहुँचती है॥३४॥
जिस प्रकार नदियों का पानी समुद्र को समृद्ध करता है, उसी प्रकार हमारी स्तुतियाँ उत्साहीं तथा अविनाशी इन्द्रदेव को बढ़ाएँ॥३५॥
हे इन्द्रदेव !आप अपने बलवान् अश्वों द्वारा सुदूर स्थानों से भी पधार करे अभिपुत सोम का पान करते हैं॥३६॥
वृत्रासुर का विनाश करने वाले हे इन्द्रदेव ! अन्न तथा ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए हम याजकगण आपका ! आवाहन करते हैं॥३७॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार रथ के पहिए घोड़ों के पीछे चलते हैं, उसी प्रकार द्युलोक, पृथ्वीलोक तथा सोम । आपका अनुगमन करते हैं॥३८॥
हे इन्द्रदेव !शर्यणावत् प्रदेश में सम्पन्न होने वाले यज्ञ में आप याजकों द्वारा की गई प्रार्थनाओं से प्रसन्न हों॥३९॥
सर्वश्रेष्ठ, शक्ति-सम्पन्न, वज्रधारी, वृत्रहन्ता तथा अत्यधिक सोमपान करने वाले इन्द्रदेव दिव्यलोक के निकट से गर्जना करते हैं॥४०॥
हे इन्द्रदेव ! आप सबसे पहले उत्पन्न होने वाले ऋषि हैं तथा अपनी ही शक्ति से सबको संचालित करते हैं। आप हमें प्रचुर धन प्रदान करें॥४१॥
हे इन्द्रदेव ! मजबूत तथा श्रेष्ठ पृष्ठ भाग वाले, सैकड़ों अश्व हमारे द्वारा निचोड़े गये सोमरस का पान करने के लिए आपको यज्ञस्थल पर लायें॥४२॥
कण्व वंशीय पूर्वज मंत्रों द्वारा यज्ञ करके मधुर जल की वृष्टि करते हैं॥४३॥
अपनी सुरक्षा तथा यज्ञों के लिए सभी मनुष्य महान् देवताओं के बीच इन्द्रदेव का ही वरण करते हैं॥४४॥
प्रियमेध तथा अनेकों द्वारा प्रशंसित अश्व आपको सोमपान के लिए हमारे पास लायें॥४५॥
यदुवंशियों में सर्वश्रेष्ठ, हमने ‘परशु' के पुत्र 'तिरिन्दिर' से हजारों की संख्या में विभिन्न प्रकार का धन-वैभव ग्रहण किया॥४६॥
इस यज्ञ में ‘तिरिन्दिर' ने 'पज्र' को तीन सौ अर्वा (अश्व अथवा गतिशील जीवन के वर्ष) तथा दस हजार गौएँ (अथवा वेद वाणियाँ) प्रदान कीं॥४७॥
तिरिन्दिर नामक राजा ने चार सोने के बोरों से युक्त ऊँटों को दान करके अपने यज्ञ के पुण्य से उन्नत होकर दिव्यलोक की प्राप्ति की॥४८॥

सूक्त-७

हे मरुद्गण ! जब विद्वान् याजकगण तीनों सवनों में (त्रिष्टुभ् छन्दके द्वारा)आपकी स्तुति करके अन्न (आहुतियाँ) समर्पित करते हैं, तब आप पर्वत श्रृंखलाओं (उच्च-शिखरों) परसुशोभित होते हैं॥१॥
सौंदर्ययुक्त, प्रिय तथा बलवान् हे मरुद्गण ! जब आप जाने के लिए अपने रथ को सुसज्जित करके यात्रा करते हैं, तब पर्वत भी प्रकम्पित होने लगते हैं॥२॥
शब्द करने वाले तथा पृथ्वी को माता सदृश मानने वाले मरुद्गण, अपने वायु के झकोरों से बादलों को विदीर्ण करके जल वृष्टि करते हैं । इस प्रकार वे प्राणिमात्र के लिए पोषक अन्न प्रदान करते हैं॥३॥
वीर मरुद्गण जब वायु प्रवाहों के साथ चलते हैं, तब वर्षा करते हुए पर्वतों को कम्पायमान कर देते हैं॥४॥
हे मरुद्गण ! आपके वेग तथा महान् बल से पर्वत डर जाते हैं तथा नदियाँ भयभीत होकर मन्दगति से प्रवाहित होने लगती हैं॥५॥
हे मरुतो ! अपनी सुरक्षा के निमित्त हम आपको रात्रि के समय, दिन के समय तथा यज्ञ करते समय आरम्भ में ही बुलाते हैं॥६॥
लाल रंगे तथा अद्भुत गर्जना करने वाले मरुद्गण अपने रथ पर बैठकर दिव्यलोक से आगमन करते हैं॥७॥
वे मरुद्गण सूर्यदेव की किरणों के लिए भी आगे बढ़ने का पथ - प्रशस्त करते हैं तथा उनकी तेजस्वी किरणो को सर्वत्र बिखेरते हैं॥८॥
अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हे वीर मरुतो ! हमारे द्वारा उच्चरित स्तोत्रों को तथा स्तुतियों को आप ग्रहण करें॥९॥
पृश्नियों (मरुद्गणों की माताओं अथवा वर्षणशील किरणों) ने इन्द्रदेव के निमित्त तीनों सवनों में पीने योग्य मधु-दुग्ध तथा जल मिश्रित सोमरस के तीन बड़े पात्र (पृथ्वी, अन्तरिक्ष एवं आकाश ) भरकर तैयार कर दिए हैं॥१०॥
हे वीर मरुतो ! सुख की कामना करने वाले हम याजकगण जब आपका आवाहन करें, तब आप दिव्यलोक से शीघ्र ही अवतरित हों॥११॥
श्रेष्ठ, दानशील, रिपुओं को रुलाने वाले तथा अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले हे तेजस्वी मरुतो ! जब आप यज्ञ मण्डप में रहकर हर्ष प्रदान करने वाले सोमरस को पीते हैं, तब आपकी मेधा निश्चित रूप से चेतना - सम्पन्न हो जाती है॥१२॥
हे मरुद्गण ! आप रिपुओं के मद को चूर करने वाली तथा पोषक सम्पत्ति प्रचुर मात्रा में दिव्य लोक से हमारे लिए लाएँ॥१३॥
हे तेजस्वी मरुतो ! जब आप पहाड़ों पर चढ़ने के लिए अपने रथ को सुसज्जित करके अभिषुत सोमरस को पीते हैं, तब आप आनन्दित होते हैं॥१४॥
स्तवन करने वाले यजमान अपने स्तोत्रों के द्वारा शक्ति-सम्पन्न मरुतों से श्रेष्ठ सुख की याचना करते हैं॥१५॥
वे मरुद्गण अनवरत स्रोतों का दोहन करते हैं। समस्त भू-भाग तथा अंतरिक्ष को वर्षा द्वारा जल की बूंदों से ढक देते हैं ॥१६॥
पृश्नि (धरती अथवा किरणें ) जिनकी माता हैं, वे मरुद्गण ध्वनि करते हुए अपने रथ द्वारा मन्त्रशक्ति तथा वायु द्वारा ऊर्ध्वगति प्राप्त करते हैं॥१७॥
हे वीर मरुतो ! जिस शक्ति के माध्यम से आपने यदु नरेश तुर्वश को सुरक्षित किया तथा ऐश्वर्य की कामना करने वाले कण्व को सुरक्षित किया । ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए हम उसी बल को पाने के लिए आपसे प्रार्थना करते हैं॥१८॥
हे श्रेष्ठ दानी मरुतो ! घृत के सदृश पौष्टिक अन्न (सोमरूप हव्य) तथा कण्वपुत्रों के मननीय स्तोत्रों द्वारा आप समृद्ध हों॥१९॥
कुश-आसन पर आरूढ़ होने वाले श्रेष्ठ दानी हे मरुतो ! आप कहाँ आनन्दित हो रहे थे? वह कौन ब्राह्मण हैं, जो आपकी सराहना करता है?॥२०॥
हे मरुतो ! पूर्व में अन्य स्तोताओं द्वारा किये गये स्तोत्रगान द्वारा आप अपने यज्ञ (सत्य) सम्बन्धी बल में वृद्धि करें, यह सम्भव नहीं। हमारे द्वारा किये गये स्तुतिगान से आप समृद्ध हों॥२१॥
उन मरुद्गणों ने वृष्टि रूप जल को ओपधियों में स्थापित किया, दिव्यलोक, पृथ्वीलोक तथा सूर्यलोक को उचित स्थान पर स्थापित किया । वृत्र का समूल नाश करने के लिए उन्होंने अपने कठोर वज्र को धारण किया॥२२॥
शक्तिशाली तथा पुरुषार्थ की वृद्धि करने वाले शासक मरुतों ने पर्वत के सदृश वृत्र को छिन्न-भिन्न कर दिया॥२३॥
उन मरुद्गणों ने संघर्षरत वीरों की तथा त्रित की कार्यशक्ति को सुरक्षा प्रदान की। उन्होंने वृत्र के मारने में इन्द्रदेव की सहायता की थी॥२४॥
सुन्दरवर्ण से सुशोभित मरुद्गणों ने सौदर्य बढ़ाने के लिए अपने सिर पर सोने के बने शिप (शिरस्त्राण)को धारण किया। वे विद्युत् के समान तेजस्वी हथियारों को अपने हाथ में धारण करते हैं॥२५॥
हे मरुद्गण ! आप दूसरों के कल्याण की कामना करते हैं। जब आप इस देश में बादलों के साथ आते हैं, तब दिव्यलोक वासियों की तरह मृत्युलोक के प्राणी भी भय से काँपने लगते है॥२६॥
हे मरुतो ! आप हम याज्ञिकों को दिव्य अनुदान प्रदान करने के निमित्त सोने के आभूषणों से युक्त अपने घोड़ों के द्वारा यज्ञस्थल पर पधारें॥२७॥
उन मरुतों के रथ को श्वेत धब्बेदार रंग वाले मृग तेजगति से खीचते हैं। गौरव के मरुद्गण जिस समय यज्ञस्थल पर पहुँचते हैं, उस समय जल की वर्षा होती हैं॥२८॥
वीर मरुद्गण जीका प्रदेश में शर्यणावन् सरोवर के निकट यज्ञगृह में निवास करते हैं । वे वेगवान् पहिया से युक्त रथ पर आसीन होकर गमन करते हैं॥२९॥
हे मरुद्गण ! जो विद्वान् याजक ऐश्वर्य की कामना से आपकी स्तुत करते हैं, उनके पास ऐश्वर्य साधना सहित आप कब पहुँचेंगे ?॥३०॥
हे रस्तुति प्रिय मरुतो ! क्या कभी आपने इन्द्र का साथ छोड़ा है ? (ऐसा कभी नहीं हुआ यह जानकर भी ) आपकी मित्रता प्राप्त करने के लिए किसने याचना की ?॥३१॥
है कण्ववंशियो ! स्वर्णिम कुल्हाड़ियों का प्रयोग करने वाले तथा हाथों में वज्र धारण करने वाले मरुता के साथ आप अग्निदेव की विधिवत् प्रार्थना करे॥३२॥
अत्यन्त प्रार्थनीय तथा अद्भुत शक्ति -सम्मन्न मरुद्गणों को नवीन ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए हम अपने पास बुलाते हैं॥३३॥
उन वीर मरुतों के आवागमन से उच्च चोटियों वाले पर्वत अपनी जगह से हिल जाते हैं। विशाल पर्वत सदृश मेघ भी अपनी मर्यादा में (एक स्थान पर) स्थिर नहीं रह पाते हैं॥३४॥
आँखों की पलकों के समान वेग वाले घोड़े अपने भक्तों को अन्न प्रदान करने वाले मरुद्गणों को आकाश मार्ग से ले जाते हैं॥३५॥
अग्निदेव अपने तेजोबल से सूर्य के सदृश सर्वश्रेष्ठ होकर उत्पन्न हुए। इसी प्रकार वे मरुद्गण भी अपने तेजोबल से सर्वव्यापी होकर निवास करते हैं॥३६॥

सूक्त-८

हे शत्रुहन्ता अश्विनीकुमारो ! आप अपने रक्षण- साधनों के साथ स्वर्णिम रथ पर आसीन होकर हमारे निकट पधारे और मधुर सोमरस का पान करें॥१॥
स्वर्णिम शरीर से सुशोभित होने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप श्रेष्ठ कर्मशील तथा महान् क्रांतदर्शी हैं । आप सूर्य के समान कान्तिवाले रथ पर आरूढ़ होकर हमारे निकट पधारें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर अन्तरिक्ष से पधारें । कण्ववंशीय षियों द्वारा आयोजित यज्ञ में पहुँचकर आप निचोड़कर तैयार किये गये मधुर सोमरस का पान करें॥३॥
भूलोक वासियों द्वारा निष्पन्न सोमरस को पसन्द करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आष दिव्यलोक तथा अन्तरिक्ष लोक से हमारे निकट पधारें । आपके निमित्त शहद मिश्रित सोमरस को कण्ववंशियों ने तैयार किया है॥४॥
हे ज्ञानी अश्विनीकुमारो ! आप हमारे द्वारा प्रार्थना किये जाने पर हमें समृद्धशाली बनाते हैं । अत: इस में सोमपान करने के निमित्त अवश्य पधारें॥५५॥
हे अश्विनीकुमारो ! प्राचीन काल में अपनी सुरक्षा के लिए जब ऋषियों ने आपका आवाहन !ि था, आप उपस्थित हुए, अत: हमारे द्वारा भावनापूर्वक प्रार्थना करने पर आप पुन: पधारें॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप आत्मज्ञानी हैं तथा अपने भक्तों की पुकार को सुनने वाले और पुत् प्रेम करून वाले हैं। आप हमारी स्तुतियों को सुनकर दिव्यान्तरिक्ष लोक से अवश्य पधारें॥७॥
हमारे अतिरिक्त अन्य कौन उपासक भली प्रकार से आपकी प्रार्थना करते हैं ? हे अश्विनीकुमार ! हो । ऋषि के पुत्र ‘वत्सग्रेषि' अपने स्तोत्रों से आपको समृद्ध करते हैं॥८॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप पापरहित तथा वृत्रासुर को मारने वाले हैं। अपनी रक्षा के निमित्त याजकग3 आवाहन करते हैं । हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे लिए कल्याणप्रद सिद्ध हों॥९॥
शक्तिशाली तथा धनवान् हे अश्विनीकुमारो ! जब आपके रथ पर (आकाश मंडल में) देवी उषा पृर्णम् । सुशोभित होती हैं, तब आप दोनों ध्यान की पराकाष्ठा में पहुँच जाते हैं॥१०॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के निमित्त विद्वान् क्रान्तदर्शी ब्रष वत्स ने मधुर वाणी में स्तोत्रमान पि; अत: आप हजारों प्रकार से सुशोभित रथ पर आरूढ़ होकर पधारें॥११॥
हे धनवान् अश्विनीकुमारो ! आप दोनों मनोवांछित ऐश्वर्य तथा प्रसन्नता प्रदान करने वाले हैं। आर३ गत् के वहनकर्ता है, अत: हमारे स्तवन को सुनकर हर्षित हों॥१२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमें पवित्र ऐश्वर्य प्रदान करें तथा सृजनात्मक कार्य करने में समर्थ बनाएँ। आप हमें निन्दक लोगों के अधीन न करें॥१३॥
सहस्रों प्रकार के ऐश्वर्य से सम्पन्न तथा सत्य के पालक हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों चाहे दिव्यलोक में हों अथवा किसी अन्य लोक में अपने रथ के द्वारा यहाँ अवश्य पधारे॥१४॥
सत्य के पालक हे अश्विनीकुमारो ! अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा जिन वत्स ऋषि ने आपको समृद्ध किया था, उनको सहघा रूपों में ऐश्वर्यवान् बनाएँ॥१५॥
हे दानदाता अश्विनीकुमारो ! सुख की कामना करने वाले साधक आपकी प्रार्थना करते हैं । ऐश्वर्य की कामना करने वाले तथा यज्ञ के निमित्त घृत की धार समर्पित करने वाले याजकों को शक्तिदायक अन्न प्रदान करें॥१६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों, रिषुओं के विनाशक तथा सज्जनों का पालन करने वाले हैं। आप हमारी प्रार्थनाओं को ग्रहण करके श्रेष्ठ सौंदर्य युक्त सुखकारक पदार्थों को प्रदान करने के लिए पधारें॥१७॥
हे अश्विनीकुमारो ! प्रियमेध त्रधि ने देवताओं का आवाहन करते समय आप दोनों को भी रक्षा - साधनों के साथ बुलाया है। आप इस श्रेष्ठ यज्ञ में पधारकर विराजमान हों॥१८॥
प्रशंसा के योग्य हे अश्विनीकुमारो ! उन वत्स अषि के आनन्दवर्धक तथा शान्तिप्रदायक यज्ञादि कार्यों तथा वचनों से प्रसन्न होकर आप दोनों हमारे निकट पधारें॥१९॥
हे अश्विनीकुमारों ! जिन रक्षण-साधनों से आपने ‘कण्व' मेधातिथि, वश, दशवज, गोश (शयु) की रक्षा की थी, उन्हीं साधनों से हमारी भी रक्षा करें॥२०॥
हे अश्विनीकुमारो ! प्राप्त करने योग्य ऐश्वर्य के सम्बन्ध में जिन रक्षण-साधनों से अपने प्रेसदस्य को रक्षित किया था, उन्हीं साधनों से ऐश्वर्य वितरण करने के निमित्त हमारी भी रक्षा करें॥२१॥
अनेकों के रक्षक तथा वृत्रहन्ता हे अश्विनीकुमारो ! भली-भाँति उच्चरित स्तोत्र आप दोनों को समृद्ध करें । आप हमारे लिए वांछनीय धन प्रदान करने वाले हो॥२२॥
अश्विनीकुमारों के तीन चक्र गुह्य क्षेत्र से परे (दृश्य जगत् से अलग ) रहते हैं। वे दोनों प्रत्यक्ष यज्ञरूप रथ से प्राणियों के सामने प्रकट होते हैं॥२३॥

सूक्त-९

हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों वत्स ऋषि की सुरक्षा के निमित्त निश्चित रूप से पधारें । उन्हें क्रोधी मनुष्यों से सुरक्षित विशाल आवास प्रदान करें । तत्पश्चात् आप दोनों उनके रिपुओं को दूर भगाएँ॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! जो ऐश्वर्य अन्तरिक्ष, दिव्यलोक तथा (पृथ्वी पर) पाँच प्रकार के मनुष्यों के पास उपलब्ध रहता है, वहीं ऐश्वर्य हमें भी प्रदान करें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! कण्व पुत्रों ने तथा जिन विद्वान् पुरुषों ने अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा आपके कर्मों को ज्ञात कर लिया है, आप उनकी जानकारी रखें अर्थात् उनकी रक्षा करें॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपके निमित्त यह घर्म (गमी या ऊर्जा उत्पादक-यज्ञ अथवा सोम) स्तोत्रों (मंत्रशक्ति) द्वारा सिंचित (परिपुष्ट) किया जा रहा है । हे बल - सम्पन्न देवो ! यही वह मधुर सोम हैं, जिससे आप वृत्र को देख (पहचान लेते हैं॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस शक्ति से आप दोनों ने ओषधियों, विशाल वृक्षों तथा जल को रक्षित किया, उसी बल से हमारी भी रक्षा करें॥५॥
श्रेष्ठ दान दाता हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों जगत् के पालन करने वाले तथा सभी को स्वस्थ रखने वाले हैं । केवल ज्ञान के द्वारा ये स्तोतागण आपको नहीं प्राप्त कर सकते; क्योंकि आप तो हवि प्रदान करने वाले याजकों के निकट जाते हैं॥६॥
अश्विनीकुमारों की स्तुतियों को स्तोताओं ने अपनी श्रेष्ठ बुद्धि से सम्पन्न किया। मधुर सोमरस तथा घृत सिंचित हवि को उन्होंने समर्पित किया॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों तेज चलने वाले रथ पर आरूढ़ होते हैं । नभ की तरह विस्तृत हमारी स्तुतियाँ आपको प्राप्त हों॥८॥
हे सत्यनिष्ठ अश्विनीकुमारो ! आज जिस प्रकार शास्त्र वचनों के द्वारा आपको बुलाया गया है, जिस प्रकार स्तुतियों द्वारा आपको बुलाया गया है, उसी प्रकार मुझ कण्व ऋष द्वारा स्तोत्रों के माध्यम से आपका आवाहन किया जाता है॥९॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार आप दोनों का कक्षीवान्, व्यश्व, दीर्घतमा ने आवाहन किया। जिस प्रकार यज्ञ स्थल पर बेनपुत्र पृथी ने आवाहित किया था, उसी प्रकार हम आपको इस समय आवाहन करते हैं, आप इसे (हदगत भाव को ) जानें॥१०॥
सबके घरों की रक्षा करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे तथा हमारे घर और समस्त संसार के पालक बनें । आप हमारे पुत्र-पौत्रों के कल्याण के लिए घर पर पधारें॥११॥
हे अश्विनीकुमारो ! यदि आप इन्द्रदेव के साथ उनके रथ पर आसीन होकर गमन करते हैं, वायुदेव के साथ एक जगह निवास करते हैं, अदिति पुत्रों अथवा ऋभु संज्ञक देवों के साथ प्रेमपूर्वक रहते हैं तथा विष्णु के विशिष्ट पदक्षेप के साथ तीनों लोकों में विराजते हैं, तो हमारे निकट भी पधारें॥१२॥
अश्विनीकुमारों का संरक्षण उच्च कोटि का है। संग्राम में रिपुओं का विनाश करने में वे पूर्ण सक्षम हैं, अत: अपनी रक्षा के लिए यदि उन्हें हम पुकारें तो वे निश्चित रूप से पधारेंगे॥१३॥
यह सोमरस ‘तुर्वश' और 'यदु' के घर पर विद्यमान हैं, यह कण्व पुत्र को प्रदान किया गया था। हे अश्विनी कुमारो ! यह सोमरस हव्य आपके लिए प्रस्तुत है, अत: आप (इसका पान करने के लिए) पधारें॥१४॥
सत्यनिष्ठ हे अश्विनीकुमारो ! जो ओषधियाँ निकट तथा दूर प्रदेश में उपलब्ध है, उनसे संयुक्त रहने हेतु श्रेष्ठ आवास, अहंकाररहित वत्स अर्घष के लिए प्रदान करें॥१५॥
दोनों अश्विनीकुमारों की दिव्य वाणियों से हम चैतन्य हो गये हैं। हे प्रकाशमान उषा देवि ! आप अंधकार को दूर करके सभी मनुष्यों को सद्बुद्धि तथा उपयुक्त ऐश्वर्य प्रदान करें॥१६॥
हे प्रकाशमान तथा महान् उषा देवि ! आप अश्विनीकुमारों को प्रेरित करें । हे याजको ! आप अश्विनीकुमारों को आनन्द प्रदायक प्रचुर हव्य प्रदान करें॥१७॥
हे उषादेवि ! जब आप स्वर्णिम किरणों से सम्पन्न होकर चलती हैं, सूर्य के तेज़ से प्रकाशित हो जाती हैं, उस समय अश्विनीकुमारों का रथ मनुष्यों को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने के लिए यज्ञ मण्डप में प्रवेश करता है॥१८॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस समय पीतवर्ण की सोमलताएँ गाय के थन के दूध निकालने के समान निचोड़ी जाती हैं तथा जिस समय देवत्व की कामना करने वाले अपने स्तुति वचनों से आपकी प्रार्थना करते हैं, उस समय आप हमारे संरक्षक हों॥१९॥
श्रेष्ठ ज्ञान से सम्पन्न हे अश्विनीकुमारो ! आप हमें ऐसी प्रेरणा प्रदान करें, जिससे हम शक्ति, ऐश्वर्य, सहनशीलता तथा श्रेष्ठ कार्य करने का कौशल प्राप्त कर सकें॥२०॥
प्रशंसा के योग्य हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे पिता तुल्य हैं । अत: जिस प्रकार पिता अपने पुत्रों के लिए प्रत्येक सुख-साधन उपलब्ध कराता हैं, उसी प्रकार आप हमें हर्ष प्रदान करें॥२१॥

सूक्त-१०

हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों चाहे पृथ्वी रूप विशाल यज्ञमण्डप में रहते हों या प्रकाशमान दिव्यलोक में अथवा अन्तरिक्ष-लोक में निवास करते हों, आप उस स्थान से हमारे निकट अवश्य पधारें॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपने जिस प्रकार मनु के यज्ञ को भली प्रकार से सिंचित किया था, उसी प्रकार कण्वपुत्रों के यज्ञ को भी समझें । बृहस्पति, इन्द्र, विष्णु एवं सभी देवगणों सहित हम आपका आवाहन करते हैं॥२॥
जिनसे हमारी मित्रता है, वे दोनों अश्विनीकुमार श्रेष्ठ कर्म करने वाले हैं। वे हमारी आहुतियों को प्राप्त करने के लिए ही प्रकटे हुए हैं । देवगणों से उनकी मित्रता उच्चकोटि की हैं । इसीलिए हम उनकी आवाहन करते हैं॥३॥
वे दोनों अश्विनीकुमार अज्ञानियों के बीच में जाकर ज्ञान का प्रचार करके उन्हें सन्मार्गगामी बनाते हैं । वे दोनों ऐसे यज्ञ का सञ्चालन बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्वक करते हैं, जिसमें हिंसा नहीं होती। वे मधुर रस मिश्रित सोमरस का पान करें॥४॥
शक्ति सम्पन्न हे अश्विनीकुमार ! जब हम आपका आवाहन करें, तब आप चाहें पूर्व दिशा में विद्यमान हों या पश्चिम दिशा में अथवा द्रुह्य, अनु तथा यदु के समीप हों, वहाँ से हमारे पास अवश्य पधारें॥५॥
विशाल भुजाओं वाले हे अश्विनीकुमारो ! जब आप दोनों अपने तेजोबल से रथारूढ़ होकर अन्तरिक्ष लोक, दिव्यलोक तथा पृथ्वी लोक में विचरण कर रहे हों, उस समय आप हमारे समीप भी पधारें॥६॥


सूक्त-११

दिव्यगुण सम्पन्न हे अग्निदेव ! आप मनाया और देवताओं के बीच में श्रेा संकल्प के संरक्षक हैं, इसलिए समस्त यज्ञो में आपकी उपस्थिति के लिए प्रार्थना की जाती हैं॥१॥
रिपुओं को परास्त करने वाले हे अग्निदेव ! आप हिसारहित श्रेष्ठ यज्ञों के नेतृत्वकर्ता हैं, इसलिए समस्न यज्ञो में आपकी स्तुति होती है॥२॥
समस्त पदार्थों के ज्ञाता है अग्निदेव ! आप शत्रुओं को तथा उनकी सेनाओं को हमसे दूर भगाएं॥३॥
हे ज्ञान- सम्पन्न अग्निदेव ! निकट रहने पर भी आप शत्रुओं क यज्ञ में कभी जाने की इच्छा नक नहीं करन ॥४॥
हे अग्निदेव ! आप सभी पदार्थों को जानने वाले ज्ञानी हैं। आपके विराट् अविनाशी नाम का हम चिन्नन करते हैं॥५॥
मेधावी अग्निदेव को प्रसन्न करने के लिए हम उनकी स्तुति करते हुए आतियां समर्पित करते हैं। अपनी रक्षा के लिए हम उनका आवाहन करते हैं॥६॥
हे सर्वव्यापी , प्रदीप्त अग्निदेवे ! हम आपके पुत्र , हृदय से आपकी स्तुति करते हुए आपको अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं॥७॥
हे अग्निदेव ! आप सर्वत्र समान दृष्टि रखने वाले सभी प्रजाओं के अधिपति हैं, अत: युद्ध में अपनी सुरक्षा के निमित्त हम आपका आवाहन करते हैं॥८॥
हम संग्राम में बल प्राप्ति एवं संरक्षण के लिए अद्भुत सामर्थ्यवान् एवं धन- सम्पन्न अग्निदेव का आवाहन करते हैं॥९॥
हे अग्निदेव ! प्राचीन काल से ही आप समस्त यज्ञों में प्रार्थनीय तथा आनन्द प्रदायक है । बहुत पहले से ही आप यज्ञों में होतारूप तथा प्रार्थना के योग्य होकर आसीन होते रहे हैं । आप हवियों द्वारा म्वयं प्रसन्न हों तथा हमें भी सौभाग्यवान् बनाएँ॥१०॥

सूक्त-१२

सोमपान करने वालों में श्रेष्ठ हे बलशाली इन्द्रदेव ! आप उल्लसित होकर कार्यों के प्रति जागरूक होते हैं। जिस बल से आप घातक असुरों (आसुरी वृत्तियों) को नष्ट करते हैं, हम आपसे वही सामर्थ्य माँगते हैं॥१॥
हे इन्द्रदेव ! जिस शक्ति से आपने अंगिरा वंशीय अधिगु' की, अंधेरे को नष्ट करने वाले सूर्य की तथा समुद्र या अन्तरिक्ष की रक्षा की थी, उसी शक्ति की हम आपसे याचना करते हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपने जिस बल से विशाल जल राशियों को रथ की भाँति समुद्र की ओर प्रेरित (गतिशील) किया, उसी बल को हम यज्ञीय पथ पर गमन करने के लिए आपसे माँगते हैं॥३॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप घृत के सदृश हमारे द्वारा की गई पुनीत स्तुतियों को ग्रहण करें। आप बल-सम्पन्न होकर हमारे लिए वांछित ऐश्वर्य शीघ्र ही प्रदान करें॥४॥
है इन्द्रदेव ! जिस प्रकार नदियों के जल से समुद्र बढ़ता है, उसी प्रकार हमारी प्रार्थनाओं से समृद्ध होकर आप अपने समस्त रक्षण - साधनों से हमारी रक्षा करें॥५॥
दिव्यगुणों से सम्पन्न इन्द्रदेव ने सुदूर स्थान से आगमन कर हमारी मित्रता की वृद्धि के लिए ऐश्वर्य प्रदान झिया । हे इन्द्रदेव ! अन्तरिक्ष से वर्षा होने के सदृश आप हमें प्रचुर धन प्रदान करें॥६॥
सूर्य के सदृश वे इन्द्रदेव जब वृष्टि आदि श्रेष्ठ कार्यों से द्युलोक तथा पृथ्वीलोक को समृद्ध करते हैं, तब उनको विजय पताकाएँ तथा हाथ में वज्र अत्यन्त सुशोभित होते हैं॥७॥
सत्पात्रों के पालक हे महान् इन्द्रदेव ! जब आपने सहस्रों राक्षसों का वध किया, तब आपकी शक्ति और बढ़ गयीं॥८॥
जिस प्रकार अग्निदेव जंगलों को जलाकर राख कर देते हैं, उसी प्रकार इन्द्रदेव सूर्य की किरणों के द्वारा, दुःख देने वाले शत्रुओं को जला डालते हैं। रिपुओं का विनाश करके वे समृद्ध होते हैं॥९॥
हे इन्द्रदेव ! सबका सम्मान करने वाली, यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली, नूतन तथा बहुप्रिय स्तुतियाँ आपका गुणगान करती हुई आपके पास पहुँचती हैं॥१०॥
यज्ञ को सम्पन्न करने वाले, देवताओं को प्राप्त करने की कामना करने वाले याजकगण अपने कार्यों को भली-भाँति सम्पन्न करते रहते हैं । वे अपनी प्रार्थनाओं से इन्द्रदेव का गुणगान करके उन्हें समृद्ध करते हैं॥११॥
अपने मित्रों को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले इन्द्रदेव याजकों द्वारा स्तुतिगान करते हुए समर्पित किये गये सोमरस का पान करते हैं। इससे उनके यश की वृद्धि होती हैं॥१२॥
ज्ञानी तथा प्रार्थना करने वाले याजकगण यज्ञाग्नि में स्थापित की जाने वाली घृत आहुतियों के सदृश सोमरूप वियों को इन्द्रदेव के मुख में समर्पित कर उन्हें प्रसन्न करते हैं॥१३॥
यज्ञरूप सत्य की रक्षा के लिए अदिति ने स्वप्रकाशित इन्द्रदेव की प्रशंसा कराने वाले अनेकों उत्तम स्तोत्रों की रचना की॥१४॥
अपनी प्रशंसा तथा सुरक्षा के लिए याजकगण उन इन्द्रदेव की प्रार्थना करते हैं। हे इन्द्रदेव ! विभिन्न श्रेष्ठ कर्म करने वाले अश्व आपको यज्ञस्थल पर ले आएँ॥१५॥
हे इन्द्रदेव ! यज्ञों में विष्णु के उपस्थित होने के बाद आपने सोमपान किया था । त्रितआप्त्य एवं मरुद्गणों के साथ सोमरस के सेवन से आनन्दित होने वाले आप हमारे यज्ञ में भी सोमपान करके आनन्दित हों॥१६॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार सुदूर क्षेत्र में सोमरस पान करके आप हर्षित होते हैं, उसी प्रकार हमारे यज्ञ में भी सोमपान करके हर्षित हों॥१७॥
हे सत्य के पालक इन्द्रदेव ! आप जिस याजक के यज्ञ में विधिवत् सोमपान करके आनन्दित होते हैं । उस याजक को आप बढ़ाते हैं॥१८॥
सबकी रक्षा के लिए देवाधिदेव इन्द्रदेव की हम प्रार्थना करते हैं। हमारी प्रार्थना को सुनकर वे रिपुओं का हनन करने तथा यज्ञ में भाग लेने के लिए पधारें॥१९॥
यज्ञों में आहूत करने योग्य तथा सर्वाधिक सोमपान करने वाले इन्द्रदेव को याजकगण अपने यज्ञों, सोमों तथा प्रार्थनाओं से समृद्ध करते हैं और उनके अनुग्रह को प्राप्त करते हैं॥२०॥
इन इन्द्रदेव की अनेकों नीतियाँ हैं। वे प्राचीन काल से ही यशस्वी रहे हैं। दान दाता को वे प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥२१॥
देवताओं ने वृत्र का वध करने के लिए इन्द्रदेव को अग्रणी किया। अत: शक्ति के निमित्त हमारी वाणियाँ उन्हीं की प्रार्थना करती हैं॥२२॥
अपनी सामर्थ्य से ही महान् बने तथा याजकों की पुकार को सुनने वाले इन्द्रदेव की प्रार्थना में करते हैं । हम बल प्राप्ति के निमित्त यज्ञों तथा स्तवनों के द्वारा उनका सम्मान करते हैं॥२३॥
वज्र धारण करने वाले जिन इन्द्रदेव को द्युलोक, पृथ्वी लोक तथा अन्तरिक्ष लोक भी अपने से अलग नहीं कर सकते, ऐसे शक्तिशाली इन्द्रदेव के तेज से ही सम्पूर्ण जगत् आलोकित हो रहा है॥२४॥
हे इन्द्रदेव ! संग्राम में जब देवताओं ने आपको सबसे अग्रणी किया, तब दो बलशाली अश्वों ने आपको वहाँ पहुँचाया॥२५॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! नदियों के जल को अवरुद्ध करने वाले वृत्र का वध करने के लिये दो बलवान् अश्वों ने आपको वहाँ पहुँचाया, तब आपने अपने बाहुबल से उसका वध किया॥२६॥
हे इन्द्रदेव ! जब विष्णुदेव ने अपनी शक्ति से तीन कदमों के द्वारा तीनों लोकों को नापा था, तब दो बलवान् अश्वों को वाहन बनाकर आप वहाँ पहुँचे थे॥२७॥
हे इन्द्रदेव ! जब आपके बलशाली अश्व दिनों-दिन समृद्ध हुए, तब आपने समस्त जगत् को अपने नियंत्रण में किया॥२८॥
हे इन्द्रदेव ! जब मरुद्गण आपके निमित्त समस्त प्राणियों को नियंत्रित करते हैं, तब आप सम्पूर्ण लोकों को नियमित करते हैं॥२९॥
हे इन्द्रदेव ! जब तेजोयुक्त तथा आलोकवान् सूर्य को आपने दिव्यलोक में स्थापित किया, तत्पश्चात् ही अपने समस्त लोकों को नियंत्रित किया॥३०॥
जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने भाई को श्रेष्ठ दिशा की ओर अग्रसर करता है, उसी प्रकार ये ज्ञानी पुरुष हर्ष बढ़ाने वाली प्रार्थनाओं से इन्द्रदेव को यज्ञीय कर्मों की ओर ले जाते हैं॥३१॥
स्तोतागण यज्ञ के बीच में सोमरस को अभिषुत करते समय, इन्द्रदेव के प्रिय स्थान यज्ञ मण्डप में एकत्रित होकर उनकी प्रार्थना करते हैं॥३२॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें श्रेष्ठ शक्ति, श्रेष्ठ अश्व तथा श्रेष्ठ गौओं से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करें । हम यज्ञ में होता के सदृश ज्ञान सम्पन्न बनने के लिए आपकी प्रार्थना करते हैं॥३३॥

सूक्त-१३

हे इन्द्रदेव ! तैयार किये गये सोमरस का पान करके आप यजमान और स्तोता को उन्नति की ओर बढ़ाने वाली शक्ति प्रदान करते हैं। आप दोनों को पवित्र कर देते हैं, क्योंकि आप महान् हैं॥१॥
दु:खों से छुड़ाने वाले, श्रेष्ठ कीर्ति वाले तथा आकाश में स्थित शत्रुओं को जीतने वाले इन्द्रदेव, विशाल अन्तरिक्ष में विद्यमान देवताओं के सान्निध्य में रहकर सबको समृद्ध करते हैं॥२॥
हम उन बलवान् इन्द्रदेव को अन्न की वृद्धि के लिए यज्ञों में बुलाते हैं। हे इन्द्रदेव ! सुख एवं उन्नति के समय मार्गदर्शक के रूप में आप हमारे पास रहें॥३॥
स्तुतियोग्य हे इन्द्रदेव ! इस यज्ञ में प्रदान की हुई सोमरस की आहुतियाँ आपके लिए प्रवाहित हो रही हैं। आप प्रसन्नचित्त से इस आसन पर विराजमान हों॥४॥
हे इन्द्रदेव ! सोमयज्ञ करते हुए हम आपसे याचना करते हैं कि आप हमें इच्छित ऐश्वर्य प्रदान करें तथा आत्मिक सुख प्रदान कराने वाली सम्पत्ति भी प्रदान करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! जब विद्वान् स्तोता आपके निमित्त रिपुओं को परास्त करने वाली स्तुतियाँ करते हैं । उन स्तुतियों से हर्षित होकर आपका बल, वृक्ष की शाखाओं की तरह बढ़ता है॥६॥
है इन्द्रदेव ! पहले की तरह आप स्तोत्र प्रकट करें तथा स्तोताओं की प्रार्थना को सुनकर हर्षित हों। जो यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म करते हैं, उन्हें आप ऐश्वर्य प्रदान करें॥७॥
इन इन्द्रदेव के निमित्त की गई प्रार्थनाएँ उनके पास उसी तरह पहुँचती हैं, जिस प्रकार नदियों का जल नीचे की ओर बहता है । दिव्यलोक के स्वामी इन्द्रदेव इन प्रार्थनाओं से प्रसन्न होते हैं॥८॥
स्तुति (गुणगान) कर्ता साधकों को समृद्ध करने वाले तथा सुरक्षा की कामना करने वालों को अपने वश में करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप सभी मनुष्यों के एक मात्र पालक कहलाते हैं। आप सोमयज्ञ में हर्षित हों॥९॥
हे याजको ! आप सब, ज्ञानी तथा यशस्वी इन्द्रदेव की प्रार्थना करें । रिपुओं को परास्त करने वाले इन्द्रदेव को उनके अश्व, स्तुतिकर्ता तथा दानी याजकों के घर ले जाते हैं॥१०॥
महान् बुद्धिमान हे इन्द्रदेव ! ओजस्वी रूप वाले तथा द्रुतगामी अश्वों वाले आप हमारे यज्ञ में शीघ्र पधारें । आपका आगमन सबके लिए हितकारक हैं॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप शक्तिशाली तथा सत्य के पालक हैं । आप प्रार्थना करने वालों को ऐश्वर्य तथा ज्ञानियों को अक्षय धन प्रदान करें॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! सूर्योदय तथा मध्याह्न के समय हम आपका आवाहन करते हैं। आप हमारी स्तुतियों को सुनकर अपने अश्वों के द्वारा हमारे निकट पधारें॥१३॥
हे इन्द्रदेव ! आप यथा शीघ्र पधारें और गौ दुग्ध मिलाये हुए सोमरस को पीकर हर्षित हों । आप पहले की तरह ऐश्वर्य को प्रदान करने के लिए यज्ञ को विस्तृत करें॥१४॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! आप वृत्र का वध करने वाले हैं। आप चाहे दूर हों या पास में हों अथवा आकाश में हों, (यहाँ आकर) सोमरस का पान करके आप हमारे संरक्षक बनें॥१५॥
हमारी प्रार्थनाएँ उन इन्द्रदेव का गुणगान करती हैं तथा निचोड़कर तैयार किया गया सोमरस उनको समृद्ध करता है। यज्ञ करने वाले साधक इन्द्रदेव के प्रति साधनारत होते हैं॥१६॥
सुरक्षा की कामना वाले मेधावीजन शीघ्रकर्मी, संरक्षक इन्द्रदेव का स्तवन करते हैं । पृथ्वी पर आश्रित सभी जीव इन्द्रदेव को शाखाओं की तरह समृद्ध करते हैं॥१७॥
देवताओं ने त्रिकद्रुक नामक (अथवा तीनों लोकों में सम्पन्न होने वाले) यज्ञ से महान् तथा चैतन्यता सम्पन्न इन्द्रदेव का गुणगान किया था । हमारी प्रार्थनाएँ भी उन्हें समृद्ध करें॥१८॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी प्रार्थना करने वाले याजकगण जब विभिन्न ऋतुओं के अनुसार स्तोत्रों के द्वारा आपका स्तवन करते हैं, तब वे पुनीत तथा पवित्र होते हैं॥१९॥
विद्वान् पुरुष जिनके प्रति अपने मन को एकाग्र करते हैं, वे रुद्रपुत्र मरुत अपनी पुरातन स्थली में ही स्थित हैं॥२०॥
हे इन्द्रदेव ! यदि आप हमें अपना सखा मानते हैं, तो इसे सोमरस का पान करें। आपके अनुग्रह से हम समस्त शत्रुओं को परास्त कर सकें॥२१॥
हे प्रार्थनीय इन्द्रदेव ! आप स्तुति करने वाले स्तोताओं को कब प्रसन्न करेंगे? आप हमें गौओं, अश्वों आदि से युक्त ऐश्वर्य कब प्रदान करेंगे?॥२२॥
हे इन्द्रदेव ! आप जरा रहित हैं । आप अत्यधिक हर्ष प्रदान करने वाले हैं। प्रशंसनीय अश्व तथा रथ आपको भली-भाँति हमारे समीप ले आएँ॥२३॥
अनेकों द्वारा स्तुत्य तथा महान् इन्द्रदेव की हम पुरातन स्तोत्रों से वन्दना करते हैं। वे हमारे यज्ञ में पुन:-पुनः पधार कर आसन ग्रहण करें॥२४॥
है बहुप्रशंसित इन्द्रदेव ! आपकी अनेक ऋषियों द्वारा स्तुति की जाती हैं । आप अपने रक्षण साधनों से हमें समृद्ध करें तथा पोषक अन्न प्रदान करें॥२५॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप प्रार्थना करने वालों के संरक्षक हैं। हम आपके मानस को पुलकित करने वाली प्रार्थनाएँ करते हैं॥२६॥
हर्षित होने वाले तथा ऐश्वर्यवान् हे इन्द्रदेव ! अपने दोनों अश्वों को रथ में जोड़कर आप हमारे यज्ञ में सोमरस पीने के लिए पधारें॥२७॥
हे इन्द्रदेव ! आप मरुद्गणों के साथ यज्ञ में पधार कर हव्य को ग्रहण करें । मरुद्गणों की प्रजाएँ भी पधारें॥२८॥
इन्द्रदेव की शत्रुनाशके मरुतादि प्रजाएँ दिव्यलोक में निवास करती हैं, वे (मरुद्गण) यज्ञ के नाभि स्थल पर हमें ऐश्वर्य प्रदान कराने हेतु एकत्रित होकर रहते हैं॥२९॥
पूर्व दिशा में सूर्यदेव के निकलने पर याजकगण यज्ञ का शुभारम्भ करते हैं। वे यज्ञों की देखभाल करते हुए दूर दृष्टि प्राप्त करने के निमित्त इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं॥३०॥
हे इन्द्रदेव ! आपके अश्व एवं रथ दोनों ही शक्तिशाली हैं। आप स्वयं भी सामर्थ्यवान् हैं । हे शतक्रतो ! आपके निमित्त की जाने वाली स्तुतियाँ कामनाओं की पूर्ति करने वाली हैं॥३१॥
सोम को पीसने वाला पाषाण, निचोड़कर अभिषुत किया हुआ सोमरस तथा उसको पान करने से मिलने वाला आनन्द ये सभी शक्ति प्रदायक हैं। हे इन्द्रदेव ! आप जिस यज्ञ में पधारते हैं, वह यज्ञ तथा आपके निमित्त कहे गये स्तोत्र कामनाओं को पूर्ण करने वाले होते हैं॥३२॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप इच्छाओं को पूर्ण करने वाले तथा विभिन्न प्रकार के रक्षा-साधनों से सम्पन्न हैं। स्तोताओं द्वारा की गई प्रार्थनाओं को आप स्वीकार करते हैं, इसलिए आपके स्तोत्र फलित होने वाले हैं॥३३॥

सूक्त-१४

हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार आप समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी हैं, वैसा ही यदि मैं बन जाऊँ, तो मेरे भी स्तोता(वाणी का धनी अथवा इन्द्रियों का मित्र) हो जाएँ॥१॥
हे इन्द्रदेव ! यदि मैं वाणी या इन्द्रियों का स्वामी बन जाऊँ, तो मनीषियों को दान देने वाला एवं उन्हें शिक्षा, सहायता देने वाला बनूं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी स्तुतियाँ गौ-रूप धारण करती हैं। वे सोमयज्ञ करने वाले यजमानों को पोषित करती हुई, उनके लिए इच्छित पदार्थों को उपलब्ध कराती हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! जब आप स्तुत्य होकर याजक को धन प्रदान करना चाहते हैं, तब आपको धन देने से देवता या मानव कोई रोक नहीं सकता॥४॥
जब यज्ञ ने इन्द्रदेव (की शक्ति को बहाया (तो) इन्द्रदेव ने द्युलोक में आवास बनाकर भूमि का विस्तार किया॥५॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपके उस दिव्य संरक्षण को प्राप्त करना चाहते हैं, जिससे हम समृद्ध हों तथा शत्रुओं के समस्त ऐश्वर्यों को जीत सकें॥६॥
सोमपान से उत्पन्न उमंग में जब इन्द्रदेव ने बलवान् मेघों को विदीर्ण किया, तो (प्रकारान्तर से) उन्होंने प्रकाशवान् आकाश का भी विस्तार किया॥७॥
सूर्यरूप हे इन्द्रदेव !आप गुफा में स्थित (अप्रकट) किरणों (गौओं) को प्रकट कर उन्हें देहधारियों (अंगिराओं) तक पहुँचाया। उन्हें रोके रखने वाला असुर (बल) नीचा मुँह करके पलायन कर गया॥८॥
अन्तरिक्ष में स्थित सभी प्रकाशवान् नक्षत्रों को इन्द्रदेव ने सुदृढ़ तथा समृद्ध किया। उन नक्षत्रों को कोई भी उनके स्थान से च्युत नहीं कर सकता॥९॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार समुद्र की लहरें उछलती चलती हैं, उसी प्रकार आपके लिए की गई प्रार्थनाएँ शीघ्रता से पहुँचकर आपके उत्साह को बढ़ाती हैं॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप स्तोत्रों तथा स्तुतियों से सन्तुष्ट, समृद्ध होते हैं । आप स्तुतिकर्ताओं के लिए हितकारी हैं॥११॥
बालों से युक्त दोनों अश्व, श्रेष्ठ ऐश्वर्य सम्पन्न इन्द्रदेव को सोम पीने के लिए यज्ञ मण्डप के समीप ले जाते हैं॥१२॥
सभी स्पर्धा करने वाले असुरों को पराजित करने के बाद इन्द्रदेव ने नमुचि (मुक्त न करने वाले असुर या आसुरी प्रवृत्ति) के सिर को अप (जल या प्राण प्रवाह) के फेन (उफान-शक्ति) से नष्ट कर दिया॥१३॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपनी माया के द्वारा सर्वत्र विद्यमान हैं । आपने द्युलोक में बढ़ने वाले दस्युओं (वृत्र, अहि आदि) को नीचे धकेल दिया॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप सोमपान करने वाले तथा महान् हैं । सोमयज्ञ न करने वाले (स्वार्थी) मनुष्यों के संगठन को आपस में लड़ाकर, आपने विनष्ट कर दिया॥१५॥

सूक्त-१५

हे स्तोताओ ! अनेक यजमानों द्वारा स्तुतिपूर्वक आवाहन किये जाने वाले, प्रशंसा के योग्य उन महान् इन्द्रदेव की विभिन्न स्तोत्रों से स्तुति करो॥१॥
वे इन्द्रदेव अपनी शक्ति से शीघ्रगामी बादलों तथा गतिमान जल को धारण करते हैं । उनके महान् बल को द्युलोक और पृथ्वीलोक ग्रहण करते हैं॥२॥
बहुप्रशंसित हे इन्द्रदेव ! आप अपनी दिव्य कान्ति से आलोकित होते हैं। ऐश्वर्य तथा कीर्ति को प्राप्त करने के निमित्त आप अकेले ही वृत्रासुर का वध करते हैं॥३॥
हे वज्रपाणि इन्द्रदेव ! शक्तिशाली, संग्राम में शत्रु को पराजित करने वाले, कल्याणकारक तथा अश्वों के लिए सेवनीय आपके उत्साह को हम प्रशंसा करते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपने दीर्घजीवी मनुष्य के हित के लिए ज्योतिर्मान् (सूर्यादि नक्षत्र) प्रकाशित किये हैं। आप इस यज्ञ वेदिका पर विराजमान होते हैं॥५॥
हे इन्द्रदेव ! सनातन स्तुतिकर्ता आज भी आपके बल की स्तुति करते हैं । पर्जन्य की वर्षा करने वाले जलों को आप प्रतिदिन मुक्त करें अर्थात् समयानुसार वर्षा करते रहें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! हमारी प्रार्थनाएँ आपके शौर्य, सामर्थ्य, कुशलता, पराक्रम और श्रेष्ठ वज्र को तेजस्वी बनाती हैं॥७॥
हे इन्द्रदेव ! अन्तरिक्ष से आपकी शक्ति-सामर्थ्य का और पृथ्वी से आपके यशस्वी स्वरूप का विस्तार होता हैं । जल प्रवाह और पर्वत (मेघ)आपको अपना अधिपति मानकर आपके पास पहुँचते हैं॥८॥
हे इन्द्रदेव ! महान् आश्रयदाता मान करके विष्णु, मित्र और वरुणादि देवता आपका स्तुति गान करते हैं। मरुद्गणों के बल से आप हर्षित होते हैं॥९॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! आप देव समुदाय के मध्य सबसे महान् माने जाते हैं। आप श्रेष्ठ संतति सहित समस्त ऐश्वर्यों को धारण करते हैं॥१०॥
हे बहु प्रशंसित इन्द्रदेव ! आप अकेले ही रिपुओं का वध कर देते हैं । आपके अतिरिक्त कोई दूसरा व्यक्ति ऐसे महान् कार्य को नहीं कर सकता॥११॥
हे इन्द्रदेव ! जिस समय अपनी सुरक्षा के निमित्त मनुष्य स्तुतियों द्वारा आपका आवाहन करते हैं, उस समय युद्धक्षेत्र में राजाओं के साथ रहकर हमारे निमित्त शत्रुओं को परास्त करें॥१२॥
हे याजको ! हमारी विजय के लिए तथा विशाल आवास के लिए आप समस्त रूपों (प्रकारों) से शक्तिशाली इन्द्रदेव को हर्षित करें॥१३॥

सूक्त-१६

हे स्तोताओ ! आप, मनुष्यों में भली प्रकार प्रतिष्ठा प्राप्त, स्तुति किये जाने योग्य, शत्रुजयी नेतृत्व क्षमता सम्पन्न, इन महान् इन्द्रदेव की स्तुति करें॥१॥
जिस प्रकार समुद्र के अन्दर जल तरंगों की शोभा दिखाई पड़ती है, उसी प्रकार समस्त स्तुतियों तथा कीर्तियों से इन्द्रदेव सुशोभित होते हैं॥२॥
हम महान् धनों की प्राप्ति के लिए, रणक्षेत्र में महान् पुरुषार्थ करने वाले, शक्तिशाली, महान् शासक उन इन्द्रदेव की श्रेष्ठ वचनों द्वारा स्तुति करते हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव । आपके पराक्रम को हम प्रशंसा करते हैं। आप अत्यन्त विशाल तथा श्रेष्ठ । रणक्षेत्र में अत्यधिक उत्साहित होकर , आप रिपुओं का हनन करते हैं॥४॥
युद्ध प्रारम्भ हो जाने पर अपने पक्ष में लड़ने के लिए याजकगण इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं, क्योंकि जिस पक्ष में इन्द्रदेव रहते हैं, विजयश्री उन्हीं को मिलती हैं॥५॥
अपने महान् स्तोत्रों तथा कार्यों द्वारा मनुष्य उन इन्द्रदेव के अनुग्रह को प्राप्त कर सकते हैं । वे इन्द्रदेव ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं॥६॥
आत्मज्ञानी, ऋषि तुल्य तथा महान् इन्द्रदेव अपनी बृहत् शक्तियों के कारण अनेकों साधकों के द्वारा सः। यता प्राप्ति के निमित्त आवाहित किये जाते हैं॥७॥
प्रार्थनीय, आवाहनीय, अविनाशी तथा शक्तिशाली इन्द्रदेव अतिशीघ्र कार्य करते हैं, वे अकेले होने पर भी शत्रुओं को परास्त कर देते हैं॥८॥
ऋचाओं, गाने योग्य स्तोत्रों तथा गायत्री छन्दआदि मंत्रों के द्वारा विद्वान् पुरुष उन इन्द्रदेव को समृद्ध करते हैं॥९॥
धनवानों से ऐश्वर्य का दान कराने वाले, संग्राम में शौर्य दिखाने वाले तथा अपने अस्त्र-शस्त्रों द्वारा रिपुओं को परास्त करने वाले इन्द्रदेव की सभी मनुष्यों द्वारा प्रशंसा की जाती है॥१०॥
मनुष्यों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले इन्द्रदेव सबके द्वारा आवाहित किये जाते हैं। वे रक्षण-साधनों रूपों अपनी नाव के द्वारा समस्त रिपुओं से हमें पार लगा दें॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें शक्ति और धन-धान्य से परिपूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करें । श्रेष्ठ मार्ग प्रदर्शित करते हुए हमें पूर्ण सुखी बनाएँ॥१२॥

सूक्त-१७

हे इन्द्रदेव ! आप हमारे इस यज्ञ में पधारें । तैयार किया गया सोमरस आपके लिए समर्पित हैं, उसका पान करके आप श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हों॥१॥
हे इन्द्रदेव ! मंत्र सुनते ही (संकेत मात्र से रथ में जुड़ जाने वाले श्रेष्ठ अश्वों के माध्यम से, आप निकट आकर हमारी प्रार्थनाओं पर ध्यान दें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! हम ब्रह्मनिष्ठ सोमयज्ञकर्ता साधक, सोमपान के लिए आपका आवाहन करते हैं॥३॥
श्रेष्ठ मुकुट धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! सोमयज्ञ करने वाले हम याजकगण, अपनी श्रेष्ठ प्रार्थनाओं के द्वारा आपको अपने निकट बुलाते हैं। अत: आप यहाँ आकर सोमरस का पान करें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपके उदर को सोमरस से पूर्ण करते हैं। वह आपके सम्पूर्ण शरीर में संचरित हो और आप इस मीठे सोमरस को जीभ के द्वारा स्वादपूर्वक सेवन करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं, इसलिए मधु मिला हुआ सोमरस आपको सुस्वादिष्ट लगे । आपके शरीर और हृदय के लिये यह आनन्द उत्पन्न करने वाला हो॥६॥
हे दूरदर्शी इन्द्रदेव ! जिस प्रकार श्वेत वस्त्र धारण करने वाली स्त्री सात्विकता की अभिव्यक्ति करती है, उसी प्रकार गौ दुग्ध में मिला हुआ सोमरस तेजयुक्त होकर आपको प्राप्त हो॥७॥
सुन्दर ग्रीवा वाले, विशाल उदर वाले तथा सुदृढ़ भुजाओं वाले इन्द्रदेव, सोमरस पान से प्राप्त उत्साह द्वारा शत्रुओं का वध करते हैं॥८॥
हे जगत् पर शासन करने वाले ओजस्वी इन्द्रदेव ! आप अग्रणी होकर गमन करें । हे वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं का संहार करने वाले हैं॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आप जिसके द्वारा सोमयाग करने वाले याजकों को ऐश्वर्य अथवा आवास प्रदान करते हैं, आपका वह अंकुश (आयुधअत्यधिक विशाल है॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! वेदिका पर सुशोभित, आसन पर स्थापित, शोधित सोमरस आपके लिए प्रस्तुत है । आप शीघ्र ही आकर पान करें॥११॥
शक्तिसम्पन्न, शत्रुनाशक, सामर्थ्यवान् , तेजस्वी हे पूज्य इन्द्रदेव ! आपके आनन्दवर्धन हेतु सोमरस तैयार किया गया है, (उसके पान हेतु) हम आपका आवाहन करते हैं॥१२॥
हे तेजस्वी इन्द्रदेव !आप सरलता से पान करने योग्य सोम के लिए इस कुण्डपायी यज्ञ की ओर उन्मुख हों॥१३॥
हे गृहस्वामी ! घर के स्तम्भ मजबूत हों, सोमयज्ञ करने वाले याजकों को देहरक्षक शक्ति की प्राप्ति हो। राक्षसों की अनेक नगरियों को उजाड़ने वाले सोमपायी इन्द्रदेव मुनियों के सखा हों॥१४॥
विशाल सिर वाले, गौओं (किरणों की खोज करने वाले पूजनीय इन्द्रदेव अकेले ही समस्त शत्रुओं को परास्त करते हैं। सर्वव्यापी तथा पालन-पोषण करने वाले इन्द्रदेव का सोमरस पान के लिए हम आवाहन करते हैं॥१५॥

सूक्त-१८

आदित्यों के नियंत्रण में चलने वाले मनुष्य निश्चित रूप से ऐसे समस्त सुखों को प्राप्त करते हैं, जिनकी प्राप्ति पहले नहीं हो सकी थीं॥१॥
इन आदित्यों का मार्ग हिंसा और छल-छद्म से रहित है । उनका अनुसरण करने से सभी प्राणियों का भरण-पोषण होता है । वे जीवन में हर्षोल्लास की वृद्धि करने वाले हैं॥२॥
हम जिस सुख की कामना करते हैं, उस ऐश्वर्य को सविता, वरुण, मित्र,भग तथा अर्यमादेव हमें प्रदान करें॥३॥
श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न अहिंसा को पोषण प्रदान करने वाली, अनेकों की प्रिय हे अदिति देवि ! आप ज्ञानियों देवताओं तथा श्रेष्ठ सुखों सहित हमारे निकट पधारें॥४॥
महान् कार्य करने वाले तथा बुराइयों से दूर रहने वाले अदिति माँ के बेटे, द्वेष करने वाले रिपुओं तथा अत्याचारियों को निश्चितरूप से भगाना जानते हैं। वे हमें पापाचारों से मुक्त करना भी जानते हैं॥५॥
माता अदिति हमारे पशुओं की सुरक्षा निरन्तर करें तथा अपने समस्त रक्षण-साधनों द्वारा हमें सम्पूर्ण बुराइयों से भी बचाएँ॥६॥
हे देवों की माता अदिति ! पूर्ण रक्षा-साधनों सहित आप हमारे निकट पधारें । शत्रुओं का हनन करें और हमें सुख-शान्ति प्रदान करें॥७॥
देवताओं के चिकित्सक दोनों अश्विनीकुमार हमारे पापों और शत्रुओं को हमसे दूर करके हर्ष प्रदान करें॥८॥
अग्निदेव अपनी लपटों की उष्णता से, सूर्य अपने प्रखर प्रकाश से तथा वायु अपने दोषमुक्त प्रवाहों से हमारे शारीरिक शत्रुओं को विनष्ट करके हमें हर्ष प्रदान करें॥९॥
हे आदित्यो ! (आप हमें) रोगों, शत्रुओं, पापों एवं दुर्बुद्धि के दुष्प्रभाव से दूर रखें॥१०॥
हे आदित्यो ! आप हमारी दुर्बुद्धि तथा हमारे शत्रुओं को हमसे दूर भगाएँ । हे समस्त पदार्थों के ज्ञाता देवताओ ! आप द्वेष करने वाले लोगों को भी हमसे दूर भगाएँ॥११॥
हे श्रेष्ठ दानी आदित्यो ! आप हमें ऐसा ज्ञान प्रदान करें, जो पापियों को भी दुष्कर्म करने से बचा देता है॥१२॥
जो मनुष्य राक्षसी प्रवृत्ति धारण करके हमारी हत्या करने का प्रयत्न करें, वे हमसे दूर जाकर अपने दुष्कर्मों द्वारा स्वयं ही नष्ट हो जाएँ॥१३॥
जो व्यक्ति हमसे कुटिलतापूर्ण व्यवहार करें, हमारी हत्या करने का प्रयत्न करें, वे पापी और शत्रु अपने पाप से ही नष्ट हो जाएँ॥१४॥
सबका पालन करने वाले हे आदित्यगण ! छल करने वाले तथा छल रहित व्यक्तियों को आप अपने अन्त:करण से पहचान लें तथा पवित्रता प्रिय व्यक्तियों के समीप ही विद्यमान रहें॥१५॥
पर्वतों (मेघों) तथा जल के बीच विद्यमान सुख को प्राप्त करने की हम कामना करते हैं । हे द्यावा-पृथिवि ! आप हमारे पापों को हमसे दूर भगाएँ॥१६॥
सबको आवास प्रदान करने वाले हे आदित्यगण ! आप अपनी हितकारी तथा सुखप्रदायक (सत्कर्म रूपी) नौकाओं के द्वारा हमें समस्त बुराइयों से पार लगा दें॥१७॥
हे महान् आदित्यो ! हमारे पुत्र और पौत्रों को दीर्घायुष्य प्रदान करने की कृपा करें॥१८॥
हे आदित्यो ! आप जिस यज्ञ में पधारने की इच्छा कर रहे हैं, वह आपके निकट ही सम्पन्न हो रहा हैं । आपकी मैत्री प्राप्त करके हम सदैव आपके होकर ही रहेंगे॥१९॥
हम शीत, आतप आदि से मुक्त, कल्याणकारी आवास की कामना से मरुद्गणों के संरक्षक इन्द्रदेव, अश्विनी कुमारों, मित्र, वरुण तथा गृहपति वास्तोष्पतिदेव का आवाहन करते हैं॥२०॥
हे मित्र, अर्यमा, वरुण तथा महान् मरुद्गणो ! आप हमें शीत, आतप और वर्षा रहित तीन खण्डों वाला श्रेष्ठ आवास प्रदान करें॥२१॥
हे आदित्यो ! जो मनुष्य मौत के मुख में जाने वाले हैं अर्थात् अल्पायु हैं, उनके लिए आप लम्बी आयु प्रदान करें॥२२॥

सूक्त-१९

हे स्तोताओ ! स्वर्गस्थ देवों के लिए हवि पहुँचाने वाले अग्निदेव की स्तुति करो । याजकगण स्तुति करते हैं और देवताओं को हव्य प्रदान करते हैं॥१॥
हे ऋषियो ! यज्ञ की सफलता के लिए हम, प्रचुर वैभव प्रदान करने वाले, अतितेजस्वी, इस श्रेष्ठ सोमयज्ञ के नियामक, चिरन्तन अग्निदेव की वन्दना करते हैं॥२॥
हे अग्निदेव ! आप श्रेष्ठ याज्ञिक है। इस यज्ञ को भली प्रकार सम्पन्न करने वाले हैं। हम आपकी स्तुति करते हैं॥३॥
ऊर्जा का पतन न होने देने वाले, श्रेष्ठ ऐश्वर्य सम्पन्न, श्रेष्ठ दीप्ति एवं कान्तियुक्त अग्निदेव की हम स्तुति करते हैं। वे इस देवयज्ञ में मित्र, वरुण एवं जल देवता की तुष्टि के लिए यजन कार्य सम्पन्न करें॥४॥
हिंसा न करने वाले जो मानव अन्न, समिधा, हविष्य तथा ज्ञान के द्वारा अग्निदेव के निमित्त वि प्रदान करते हैं, वे मनुष्य श्रेष्ठ सुखों से सम्पन्न हो जाते हैं॥५॥
अग्निदेव के निमित्त यज्ञ करने वाले साधक द्रुतगामी अश्वों के मालिक एवं उज्ज्वल कीर्ति वाले बन जाते हैं। प्रमोदवश देवताओं तथा मनुष्यों के प्रति हुए (भूलों) पापों के कारण वे विनष्ट नहीं होते॥६॥
शौर्य के पुत्र और बल के स्वामी हे अग्निदेव ! आपके गार्हपत्यादि स्वरूप के द्वारा हम श्रेष्ठ अग्नियों से सम्पन्न हों । आप हम मानवों को श्रेष्ठ पराक्रमी पुत्र प्रदान करें॥७॥
हे अग्निदेव ! आप अतिथि के सदृश प्रशंसनीय, रथ के सदृश गमनीय तथा अपने सखाओं का कल्याण करने वाले हैं। आपके आश्रित रहने वाले उपासकों का सम्पूर्ण रूप से हित होता है । वे समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी बनते हैं॥८॥
हे अग्निदेव ! जो दानी व्यक्ति श्रेष्ठ यज्ञादि कर्म करते हैं, वे सत्य के परिणाम को भी प्राप्त करें । श्रेष्ठ सम्पत्ति वाले हे अग्निदेव ! आप स्तुति के योग्य हैं । आप अपने श्रेष्ठ ज्ञान द्वारा हमारी सुरक्षा करें॥९॥
हे अग्निदेव ! आप जिस याजक के यज्ञ में पधारने के लिए राजी होते हैं, वह पुरुष पराक्रमी सन्तानों, अश्वों तथा ज्ञान से सम्पन्न होकर अपने कार्यों को पूर्ण करता है । वह पराक्रमी जनों द्वारा पूजनीय होता है॥१०॥
समस्त मनुष्यों के वरणीय अग्निदेव जिस याजक के घर में स्तोत्र और हव्य ग्रहण करते हैं, वे हवियाँ देवों को प्राप्त होती हैं॥११॥
पराक्रम के पुत्र तथा सभी का पालन करने वाले हे अग्निदेव ! हव्य प्रदान करने में फुतले, कुशल तथा प्रार्थना करने वाले ज्ञानी मनुष्यों की प्रार्थनाओं को देवताओं के नीचे तथा मनुष्यों से ऊपर स्थापित करें (मनुष्यों के प्रयास देवोन्मुख बने)॥१२॥
जो हवियों और स्तुतियों के द्वारा श्रेष्ठ अग्निदेव की उपासना करते हैं तथा जो अपने स्तुति वचनों के द्वारा उनकी सेवा करते हैं, वे याजक ऐश्वर्य आदि से सम्पन्न हो जाते हैं॥१३॥
जो साधक एकाग्रचित्त होकर भक्तिपूर्वक अखण्ड अग्निदेव की आराधना करते हैं, वे जल की भाँति ओज, बल तथा श्रेष्ठ कर्मों द्वारा सम्मर्ण मनुष्यों से ऊँचे उठ जाते हैं॥१४॥
हे अग्निदेव ! आप हमें प्रखर तेज प्रदान करें, जिससे यज्ञ में आने वाले दुष्टों (व्यक्तियों या प्रवृत्तियो ) को नियन्त्रित किया जा सके और दुर्बुद्धिजन्य क्रोध को भी दूर किया जा सके॥१५॥
हे अग्निदेव ! आप अपने जिस प्रकाश से वरुण, मित्र और अर्यमा देव को आलोकित करते हैं, जिससे दोनों अश्विनीकुमारों और स्तुति करने योग्य इन्द्रदेव सहित अन्य देवगणों को आलोकित करते हैं, उसी प्रकाश से हमें भी सम्पन्न करके, शक्तिशाली बनाएँ॥१६॥
ज्ञानी तथा तेजस्वी हे अग्निदेव ! जो विद्वान् विप्न अपने समस्त कार्यों को सम्पादित करने वाले हैं तथा जो अपने हृदय स्थल में आपका ध्यान करते हैं, वे ही सबसे महान् होते हैं॥१७॥
श्रेष्ठ सम्पत्तिवान् हे अग्निदेव ! जो मनुष्य आपसे अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करवाना चाहते हैं, वे ही आपके निमित्त यज्ञ वैदिका तैयार करते हैं, हवि प्रदान करते हैं तथा दिव्य सोमरस निचोड़ते हैं। ऐसे श्रेष्ठ कर्म करने वाले वे याजक अपने शौर्य से प्रचुर ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं॥१८॥
वियों से सन्तुष्ट हुए हे अग्निदेव ! आप हमारे लिए मंगलकारी हों । हे ऐश्वर्यशाली ! हमें कल्याणकारी धन प्राप्त हो और आपकी स्तुतियाँ हमारे लिए मंगलकारी हों॥१९॥
हे अग्ने युद्ध में जिस मनोबल से आप रिपुओं को परास्त करते हैं, उसी मंगलकारी मनोबल को हमें भी प्रदान करें । हम रिपुओं की सेनाओं को परास्त करके इच्छित सुखों से सम्पन्न होकर आपकी उपासना कर सकें॥२०॥
सम्माननीय, हवियों के वाहक, देवताओं के सन्देशवाहक तथा सम्पत्तिवान् अग्निदेव को ज्ञानी पुरुष अपनी प्रार्थनाओं द्वारा प्रदीप्त करते हैं। मनुष्यों के हित साधक ऐसे अग्निदेव की हम वन्दना करते हैं॥२१॥
हे मनुष्यो ! जब आप तीव्र ज्वालाओं वाले आलोकवान् अग्निदेव की , हर्षित होकर स्तुति करते हैं, तब वे श्रेष्ठ प्रार्थनाओं तथा घी की हवियों को प्राप्त करके आपको उत्तम पराक्रम प्रदान करते हैं॥२२॥
घृत की हवियों को ग्रहण करके जब अग्निदेव द्यावा-पृथिवी को अपनी ध्वनि से भर देते हैं, तब वे महाप्रतापी सूर्य के सदृश अपने ओज को प्रदर्शित करते हैं॥२३॥
मनुष्यों का हित साधने वाले, महान् गुणों वाले, अपने मुख द्वारा आहुतियों को देवताओं के समीप पहुँचाने वाले, अहिसित कार्यों को करने वाले, देवताओं का आवाहन करने वाले तथा अजर-अमर अग्निदेव हमें श्रेष्ठ सम्पत्ति प्रदान करते हैं॥२४॥
शौर्य के पुत्रों द्वारा आहूत तथा सखा की तरह पूजनीय हे अग्निदेव ! आपकी साधना करके हम मरेणधर्मा मनुष्य आपके सदृश अमरता प्राप्त करें॥२५॥
सबके पालक हे अग्निदेव ! हम किसी घातक दुष्कर्म के लिए आपकी प्रार्थना न करें । हमारे प्रशंसक तथा शत्रु दुर्बुद्धिग्रस्त न हों और अपने दुष्कर्म से हमें कष्ट न दें॥२६॥
जैसे पिता पुत्र का पोषण करता है, उसी प्रकार मनुष्यों द्वारा अग्निदेव पोषण करने योग्य होते हैं। वे यज्ञ में प्रदान की हुई आहुतियों को ग्रहण करके देवताओं तक पहुँचाते हैं॥२७॥
समस्त प्राणियों के पालक हे अग्निदेव ! आपके रक्षण-साधनों द्वारा संरक्षित होकर हम मरणधर्मा मनुष्य आपकी कृपा प्राप्त करें॥२८॥
हे अग्निदेव ! हम आपके श्रेष्ठ कर्मों, दानों तथा प्रशस्तियों से सम्पन्न बने । विद्वानों के द्वारा आप श्रेष्ठ ज्ञानी कहे जाते हैं । हे अग्निदेव ! आप हमें अपनी कृपा का अनुदान देने के निमित्त हर्षित हों॥२९॥
हे अग्निदेव ! आप जिसके मित्र बनकर सहयोग करते हैं, वे स्तोतागण श्रेष्ठ सन्तान, अन्न-बल आदि समृद्धि प्रदायक आपके संरक्षण को प्राप्त करते हैं॥३०॥
हे सोम सिंचित अग्निदेव ! प्रवहमान शकट में स्थापित, कामना योग्य, प्रकाशित, तेजस्वी सोम आपके निमित्त प्राप्त किया जाता है । महान् उषाओं के प्रियरूप आप रात्रि में अधिक प्रकाशित होते हैं॥३१॥
अत्यधिक तेजस्वी, श्रेष्ठ रूप वाले तथा उत्कृष्ट इच्छाशक्ति वाले हे अग्निदेव ! आप त्रसदस्य द्वारा प्रशंसित हों । हे अग्निदेव ! अपनी सुरक्षा के लिये हम आपको ग्रहण करें॥३२॥
जिस प्रकार अन्य अग्नियाँ वृक्ष की शाखाओं के सदृश आपके द्वारा शक्ति प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार हम भी सामर्थ्य तथा ऐश्वर्य से आपको समृद्ध करें और स्वयं भी सम्पत्ति तथा कीर्ति को प्राप्त करें॥३३॥
द्रोहरहित तथा श्रेष्ठ दानी हे आदित्यो ! जिस मनुष्य पर आप प्रसन्न होते हैं, उसे समस्त विपत्तियों से पार लगा देते हैं तथा अपार धन प्रदान करते हैं॥३४॥
शत्रुओं का विनाश करने वाले हे आदित्यो ! जो मनुष्य का अहित करते हैं, आप उन्हें प्राणदण्ड दे । हे वरुण, मित्र और अर्यमा देवो ! आपके यज्ञ को हम सम्पादित करते हैं॥३५॥
पुरुकुत्स (आयुधों से युक्त) के बेटे त्रसदस्यु (दुष्टों के प्रतिरोधक) श्रेष्ठ दानी तथा प्रार्थना करने वालों की रक्षा करते हैं, उन्होंने मुझे पचास वधुएँ प्रदान कीं॥३६॥
इसके अलावा सुवास्ता (श्रेष्ठ आवास युक्त) नदी के तट पर, दो सौ दस गौओं तथा एक श्यामवर्ण वृषभ के स्वामी ने हमें धन एवं वस्त्रादि प्रदान किये॥३७॥

सूक्त-२०

गतिशील मरुद्गण हमें हानि न पहुँचाते हुए हमारे निकट आएँ । हे मन्युयुक्त वीरो ! आप स्थिर तथा बलशाली शत्रुओं (पर्वतों) को भी झुकाने वाले हैं, आप हमसे कभी दूर न हों॥१॥
शत्रुओं को रुलाने वाले वज्रधारी हे वीर मरुतो ! आप अपने तेजोमय कठोर वज्रों सहित यहाँ पधारें । अनेकों द्वारा स्पृहणीय तथा सोभरि अनुष पर कृपा दृष्टि रखने वाले हे वीरो ! आप हमारे यज्ञ में अन्न सहित पधारें॥२॥
समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले तथा उद्यमी रुद्र पुत्र मरुतों के उग्र पराक्रम का हमें ज्ञान है॥३॥
श्वेत आभूषण धारण करने वाले हे तेजस्वी मरुद्गण ! जब आप रिपुओं पर चढ़ाई करने के लिए अत्यन्त वेग से चलते हैं, तब बड़े-बड़े द्वीप धराशायी होने लगते हैं, पेड़-पौधे संकटग्रस्त हो जाते हैं, आकाश-पृथ्वी काँपने लगते हैं तथा रेगिस्तान की बालू चारों ओर उड़ने लगती है॥४॥
आपके धावा बोलते समय अपने स्थान पर स्थिर रहने वाले पर्वत तथा पेड़-पौधे चीत्कार करने लगते हैं। उसी प्रकार जब आप शत्रुओं की सेना पर चढ़ाई करते हैं, तब धरती भी प्रकम्पित हो जाती है॥५॥
हे मरुद्गण ! जब आप अपने पराक्रम से नायक के रूप में प्रतिष्ठित होकर, अपनी शक्तियों को इकट्ठा करके शत्रुदल पर प्रहार करते हैं, तब ऐसा लगता है कि आकाश भी अधिक व्यापक बनता जा रहा है॥६॥
ये नायक मरुद्गण अत्यन्त तेजोमय, बलिष्ठ तथा सौम्य स्वभाव वाले हैं। ये अपनी कर्मठता और ग्रहण शक्ति द्वारा श्रेय-सौभाग्य को समृद्ध करते हैं॥७॥
सोभरि ऋषि के स्वर्णिम रथ के बीच गीतों के साथ मरुतों की वीणा बज रही है । सुजन्मा, गोबन्धु (गौओं के रक्षक अथवा किरणों के सहयोगी) अत्यन्त महिमावान् ये मरुद्गण हमें अन्न तथा भोग्य-पदार्थों को प्रदान करने के लिए यत्नशील हों॥८॥
आदरपूर्वक सोम प्रदान करने वाले हे याजको ! शक्तिशाली मरुद्गणों के सम्वर्धन के लिए आप उन्हें हविरूप अन्न प्रदान करें, जिससे वे बलवान् तथा द्रुतगामी बन सकें॥९॥
हे नायक मरुद्गणो ! शक्तिशाली अश्वों से सम्पन्न मजबूत रथों पर आरूढ़ होकर, आप श्येन पक्षी की तरह तेजगति से हमारे हविरूप अन्न को ग्रहण करने के लिए यज्ञस्थल में पधारें॥१०॥
उन मरुद्गणों की पोशाक एक जैसी हैं । गले में स्वर्णिम हार विभूषित है तथा भुजदण्डों पर तीक्ष्ण हथियार चमक रहे हैं॥११॥
ये मरुद्गण अत्यन्त विकराल तथा बलिष्ठ भुजाओं वाले हैं । (युद्ध में) ये अपने शरीर की रक्षा का यत्न नहीं करते । हे मरुद्गणो ! आपके रथों में सुदृढ़ धनुष तथा अन्य अस्त्र-शस्त्र विद्यमान रहते हैं, इसीलिए आप रणक्षेत्र में सदैव विजयी होते हैं॥१२॥
ये अनेक मरुद्गण एक ही नाम वाले हैं; (किन्तु) पैतृक सम्पत्ति की तरह (सञ्ज प्राप्त तथा निर्वाह में समर्थ) हैं। ये तेजस्वी तथा जल के समान प्रवहमान हैं॥१३॥
रिपुदल को प्रकम्पित करने वाले मरुद्गणों के बीच में कोई भेद-भाव नहीं है। आप उनकी वन्दना एवं स्तुति करें, क्योंकि उनके द्वारा दिया गया दान अत्यन्त महत्त्व रखता है॥१४॥
हे मरुद्गणो ! प्राचीन काल में जो उपासक आपके अनुयायी बनकर चले, वे आपके रक्षण-साधनों द्वारा संरक्षित होकर निश्चित रूप से सौभाग्यशाली बन गये॥१५॥
शत्रुओं को प्रकम्पित करने वाले नायक हे मरुद्गणो ! आप जिस ऐश्वर्यशाली याजक के हविष्यान्न का सेवन करने के लिए जाते हैं, वह आपकी उज्ज्वल कीर्ति को प्राप्त करके भली-भाँति सुखोपभोग करता है॥१६॥
दूसरों की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान करने वाले, युवक वीर मरुद्गण जिस समय दिव्यलोक, से पधारें, उस समय हमारा व्यवहार उनकी इच्छा के अनुकूल रहे॥१७॥
जिस प्रकार अन्य याजक श्रेष्ठ्दानी मरुतों की उपासना करते हैं तथा उनके अनुरूप व्यवहार करते हैं, हम भी उन्हीं याजकों के समान अनुकूल व्यवहार करते हैं । हे वीर मरुतो ! आप हमारे समीप पधारकर, उदारतापूर्वक हमें समृद्धि प्रदान करें॥१८॥
हे सोभरि षे ! जिस प्रकार कृषक कृषि कार्य करते समय, अपने वृषभों को रिझाने के लिए गीत गाते हैं, उसी प्रकार आप उन शक्तिशाली, पवित्र तथा नव (युवक) वीर मरुतों के लिए नवीन स्तोत्रों का पाठ करें॥१९॥
शत्रुओं को चुनौती देकर उन पर मुष्टि प्रहार करने वाले सैनिकों की तरह (शत्रु के आक्रमण को सहन करने वाले बलिष्ठ, यशस्वी तथा चन्द्रमा की तरह आह्लादक वे वीर मरुद्गण ही प्रशंसा के योग्य हैं । उत्तम स्तोत्रों से उनकी वन्दना करें॥२०॥
समान उमंगों से युक्त हे मरुतो ! गौएँ (किरणें ) सजातीय होने के कारण विभिन्न दिशाओं में विचरण करती हुई परस्पर (एक दूसरे को) चाटती (स्नेहपूर्वक सहलाती रहती हैं॥२१॥
नर्तन करने वाले तथा आभूषणों से सुशोभित हृदय-स्थल वाले हे मरुतो ! मनुष्य आपसे मित्रता की इच्छा करते हैं। आप भातृत्व-भाव से हमारे साथ रहते हुए प्रमुदित हों॥२२॥
श्रेष्ठ दानों तथा मित्र रूप हे मरुतो ! आप सर्पणशील (चलने वाले हैं; अतः पंक्तिबद्ध होकर चलते हुए हवाओं के द्वारा, दिव्य ओषधियाँ लेकर हमारे पास पधारें॥२३॥
हर्ष प्रदायक हे मरुद्गणो ! जिन रक्षण शक्तियों के द्वारा आपने समुद्र को संरक्षित किया, जिनसे कूप (जल संग्रह स्थल) तैयार किये, जिनसे आपने शत्रुओं को नष्ट किया, उन्हीं शक्तियों के द्वारा हमें सुख प्रदान करें॥२४॥
श्रेष्ठ तेजस्वी हे मरुतो ! सिन्धु नदी, असिनी, समुद्र तथा पहाड़ों पर जो ओषधियाँ विद्यमान हैं, उन सबकी जानकारी आपको है॥२५॥
हे मरुद्गणो ! आप हमारे शरीर को बलिष्ठ बनाएँ, हममें से रोगी व्यक्तियों के रोगों को दूर करें तथा टूटे हुए अङ्गों को पुनः ठीक करें॥२६॥


सूक्त-२१

वज्रधारी, अनुपम हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार सांसारिक गुण-सम्पन्न, शक्तिशाली मनुष्यों को लोग बुलाते हैं; उसी प्रकार अपनी रक्षा की कामना से विशिष्ट सोमरस द्वारा तृप्त करते हुए, हम आपकी स्तुति करते हैं॥१॥
हे शत्रु संहारक देवेन्द्र ! कर्मशील रहते हुए हम अपनी सहायता के लिए तरुण और शूरवीर रूप में विद्यमान आपका ही आश्रय लेते हैं । मित्रवत् सहायता के लिए हम आपका स्मरण करते हैं॥२॥
अश्वों एवं गौओं के स्वामी, भूमिपालक, सोमरसे का पान करने वाले हे इन्द्रदेव ! निचोड़े गये सोमरस को ग्रहण करने के लिए हम आपका आवाहन करते हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं। हम बन्धुहीन विद्वान् ब्राह्मण आषको ही भाई के रूप में मानते हैं। आप अपने सम्पूर्ण ओज के साथ सोमरस का पान करने के लिए पधारे॥४॥
हे इन्द्रदेव ! निचोड़ने के बाद गो-दुग्ध मिश्रित, स्फूर्तिवर्धक तथा वाणों को शक्ति देने वाले सोमरस के निकट हम सभी पक्षियों के समान एकत्रित होकर आपको नमस्कार करते हैं॥५॥
हरित अश्व वाले हे इन्द्रदेव ! हम नमनपूर्वक आपकी महिमा का गान करते हैं । आप किस सोच-विचार में हैं ? हे अश्व (पराक्रम) युक्त इन्द्रदेव ! आप दाता हैं; हमारी कामनाएँ तेथी हमारी बुद्धियाँ (नीयत या विचार) सब आपके सामने हैं॥६॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित रहकर, हम सदैव नवीन बने रहते हैं । आप सर्वव्यापी हैं, आपकी इस महानता को हम नहीं जानते थे, लेकिन अब ज्ञात हो गया है, अत: हम सब आपके द्वारा रक्षणीय हैं॥७॥
हे शूरवीर तथा वज्रधारी इन्द्रदेव ! हमें आपकी मित्रता और ऐश्वर्य के बारे में ज्ञान है, इसलिए हम उसकी कामना करते हैं। सबका पालन करने वाले तथा शोभन शिरस्त्राण धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप हमें गौ आदि धनों से परिपूर्ण करें॥८॥
हे मित्रो ! पूर्वकाल से ही जो, धन - वैभव प्रदान करने वाले हैं, उन इन्द्रदेव की हम आपके कल्याण के लिए स्तुति करते हैं॥९॥
जो साधक, हरि अश्वों वाले, भद्रजनों का पालन करने वाले तथा रिपुओं को परास्त करने वाले इन्द्रदेव की प्रार्थना करते हैं, जिससे वे प्रसन्न रहते हैं- ऐसे इन्द्रदेव हम स्तुतिकर्ताओं को सैकड़ों गौओं तथा अश्वों से भरपूर ऐश्वर्य प्रदान करें॥१०॥
वृषभ के समान बलशाली हे इन्द्रदेव ! गौ आदि उपकारों पशुओं के पालक के प्रति क्रोध व्यक्त करने वालों (असुरों) को हम, आपकी सहायता से उचित प्रत्युत्तर देकर दूर हटा दें॥११॥
बहुतों द्वारा आहूत किये जाने वाले है इन्द्रदेव ! रणक्षेत्र में हम, हिंसक तथा दुर्बुद्धिग्रस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें । हम आपके सहयोग से वृत्र (हमारे व्यक्तित्व को घेरकर विकास में बाधा पहुँचाने वाली आसुरी माया) का वध करके आपकी कीर्ति फैलाएँ । हे इन्द्रदेव ! आप हमारी बुद्धि अथवा यज्ञादि कर्मों की सुरक्षा करें॥१२॥
है इन्द्रदेव ! आप जन्म से ही भ्रातृ - संघर्ष से मुक्त हैं। आप पर शासन करने वाला कोई नहीं है और न ही सहायता करने वाला कोई बन्धु । आप युद्ध (जन संरक्षण) द्वारा अपने सहयोगियों (बन्धुओं) और भक्तों को पाने की कामना करते हैं॥१३॥
हे इन्द्रदेव ! आप (यज्ञ, दान आदि से रहित) धनाभिमानी को मित्र नहीं बनाते । सुरा पीकर मदान्ध(अमर्यादित लोग) आपको दुःख देते हैं। ज्ञान एवं गुणसम्पन्नों को मित्र बनाकर आप उन्नति पथ पर चलाते हैं, जिससे आप पिता तुल्य सम्मान प्राप्त करते हैं॥१४॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपकी मित्रता का लाभ प्राप्त करके अपने गृह में पुत्र-पौत्रों के साथ रहते हुए समृद्धि को प्राप्त करें । सोम का अभिषन करते समय हम एकत्र होकर बैठे॥१५॥
हे इन्द्रदेव ! आप गौओं का अनुदान प्रदान करने वाले हैं। हम भी आपकी सम्पत्ति से वंचित न रहें । हमें आपके सिवा और किसी से सम्पत्ति न लेनी पड़े। आप हमें ऐसे ऐश्वर्य से परिपूर्ण करें, जिसे कोई छीन न सके॥१६॥
हे राजन् ! आहुति प्रदान करने वाले हम याजकों को इतनी सम्पत्ति क्या इन्द्रदेव ने प्रदान की ? यी सम्पत्ति की स्वामिनी सरस्वती (वाणी या मंत्र शक्तिो ने ? अथवा आपने ही यह प्रदान की है?॥१७॥
पर्जन्य जिस प्रकार सर्वत्र फैल जाता है, उसी प्रकार) सरस्वती (नदी या बुद्धि की देवी) के अनुगामी चित्र (नामक या विशिष्ट) राजा (शासक अथवा प्रकाशवान्) ने अन्य राज्याश्रितों को हजारों - लाखों प्रकार के अनुदान प्रदान किए॥१८॥

सूक्त-२२

हे अश्विनीकुमारो !आप दर्शनीय रथ पर सूर्या (सूर्य से उत्पन्न उषा अथवा ऊर्जा) का वरण करने के निमित्त आरूढ़ हुए हैं, आपका वह रथ आवाहित करने योग्य है । हम अपनी रक्षा के लिए आपका आवाहन करते हैं॥१॥
अश्विनीकुमारों का रथ स्तुति करने वालों का पोषक तथा सरलतापूर्वक आवाहनीय है। सबके द्वारा वांछनीय यह रथ सबको पोषण प्रदान करता है तथा समर-भूमि में सबसे आगे रहता है। जिससे शत्रु भी ईष्र्या करते हैं, ऐसे श्रेष्ठ रथ की हे ऋषि सोभरे ! आप अपनी प्रार्थनाओं द्वारा प्रशंसा करें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हविप्रदाता याजकों के घर जाते हैं। हम अपने यज्ञ के संरक्षण के लिए आपको नमनपूर्वक आवाहन करते हैं॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपके रथ का एक पहिया द्युलोक में रहता है तथा दूसरा आपके पास विद्यमान रहता हैं । हे कल्याणकारी रसधाराओं के स्वामी ! आपकी बुद्धि गौओं की तरह (उपकारी प्रवृत्तियुक्त) है । वह हमारी ओर शीघ्रता से आए॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों सत्य के पालक हैं। तीन प्रकार की गद्दी (संचालन के आसन) तथा चाबुक (प्रेरक तंत्र) से युक्त आपका सुप्रसिद्ध स्वर्णिम रथ, द्यावा-पृथिवीं को विभूषित करता हैं । आपका वह रथ हमारे समीप पधारे॥५॥
कल्याण के स्वामी हे अश्विनीकुमारो ! आपने सर्वप्रथम दिव्यलोक में स्थित सम्पत्तियाँ मनु को प्रदान की तत्पश्चात् ‘हुल' के द्वारा कृषिकर्म किया- ऐसे सुप्रसिद्ध आप दोनों की श्रेष्ठ स्तुतियों द्वारा हम प्रशंसा करते हैं ॥६॥
ऐश्वर्यवान् तथा बलवान् हे अश्विनीकुमारो ! जिन यज्ञीय मार्गों द्वारा आप त्रसदस्यु-पुत्र तृक्षि को क्षत्रियों के अनुरूप महान् शौर्य प्रकट करने के लिए प्रेरणा देने जाते हैं, उन्हीं मार्गों द्वारा हमारे निकट पधारें॥७॥
ऐश्वर्य की वर्षा करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! यह सोमरस पाषाण द्वारा कूटकर आप दोनों के लिए अभिषुत किया गया है । आहुति प्रदान करने वाले हम याजकों के आवास पर पधार कर, आप सोमरस का पान करें॥८॥
धन की वर्षा करने वाले है अश्विनीकुमारो ! आपका स्वर्णिम रथ आयुधों और पौष्टिक अन्नों के भण्डार से युक्त है । आप उस रथ पर आसीन हों॥९॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपने जिन (सामथ्र्यो ) से विशेषरूप से सेवा-सहायता करने वाले पक्थ (परिपक्व) अधिगु (दृढ़ता से धारण करने वाले) एवं बभु (भरण-आपूर्ति करने वाले) को रक्षित-पोषित किया, उन्हीं सामथ्र्यो से आतुरों (पीड़ितों ) को औषधि - उपचार द्वारा संरक्षण प्रदान करें॥१०॥
शीघ्रगामी हे अश्विनीकुमारो ! काम में बाधा आने पर आपको प्रातः कालीन स्तुति वचनों द्वारा हम आहूत करते हैं। अत: आप निश्चित रूप से पधारें॥११॥
दानीं तथा शक्तिशाली नायक हे अश्विनीकुमारो ! आप सबके द्वारा स्वीकार करने योग्य हमारी समस्त स्तुतियों को सुनें; अपने उन सामथ्र्यों तथा ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर हमारे समीप पधारें और जलकुण्डों को जल से परिपूर्ण करें॥१२॥
प्रात: काल दोनों अश्विनीकुमारों की हम वन्दना करते हैं। हम उनके निकट बैठकर स्तुति करते हुए उन्हीं की कामना करते हैं॥१३॥
पालक तथा बलवान् हे अश्विनीकुमारो ! हम आपको प्रात: काल तथा रात्रि के समय बुलाते हैं। आप रणक्षेत्र में वीरों के मार्ग का अनुगमन करते हैं । बलों को पुष्ट करने वाले तथा धन-धान्य से सम्पन्न आप हमें शत्रुओं के अधीन न होने दें॥१४॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार पिता अपने पुत्रों को पुकारता है, उसी प्रकार हम (सोभरि ऋषि) आपका आवाहन करते है। हम सुख प्राप्त करने के योग्य हैं। अत: आप प्रात: काल रथ पर आरूढ़ होकर हमें सुख प्रदान करने के लिए पधारें॥१५॥
हे अश्विनीकुमारो !आप दोनों ऐश्वर्य की वर्षा करने वाले, मन के समान द्रुतगति से चलने वाले तथा रिपुओं के अहंकार को नष्ट करने वाले हैं । आप अपने शीघ्रगामी रक्षण-साधनों से सम्पन्न होकर हमारे निकट निवास करें॥१६॥
मधुर सोमरस का पान करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप यज्ञीय मार्गों को अश्व, गौ, स्वर्ण आदि धनों से सम्पन्न बनाते हुए हमारे आवास (यज्ञस्थल) पर पधारें॥१७॥
शक्तिशाली हे अश्विनीकुमारो ! आपके आने पर हम ऐसी सम्पत्ति प्राप्त करते हैं, जो श्रेष्ठ पराक्रम से सम्पन्न और सरलतापूर्वक देने योग्य हैं । बलवान् मनुष्य भी जिस पर आक्रमण नहीं कर सकते , वे भली प्रकार वरण करने योग्य हैं॥१८॥

सूक्त-२३

हे स्तोताओ ! आप शत्रुजयी, अदम्य तेजोयुक्त, सर्वव्यापी, धूम्र से सुशोभित, सर्वज्ञ अग्निदेव की अर्चना करो॥१॥
सम्पूर्ण जगत् को एक दृष्टि से देखने वाले हे ऋषि विश्वमना ! स्पर्धा करने वाले (प्रगति के लिए प्रयासरत) याजकों को रथादि (प्रगति के माध्यम) देने वाले अग्निदेव की, अपने स्तुति वचनों से प्रशंसा करें॥२॥
प्रार्थनायोग्य अग्निदेव रिपुओं को दण्डित करने वाले हैं। वे जिस हविप्रदाता के हविष्यान्न और सोमरस को स्वीकार करते हैं, उसे ही ऐश्वर्य से सम्पन्न बनाते हैं॥३॥
आलोकवान् अग्निदेव रिपुओं को प्रताड़ित करते हैं। वे श्रेष्ठ तथा दर्शनीय तेज से सम्पन्न हैं। उनका अविनाशी प्रकाश ऊर्ध्वमुखी होकर प्रकट हो रहा है॥४॥
श्रेष्ठ यज्ञादि कर्म करने वाले हे याजको ! आप उन अग्निदेव की साधना करके यशस्वी, तेजस्वी तथा महान् हों। उनकी प्रसन्नता को प्राप्त करके आप उन्नति करें॥५॥
हे अग्ने ! आप देवताओं के निमित्त आहुतियों को वहन करने वाले हैं। आप श्रेष्ठ स्तुतियों तथा आहुतियों को प्राप्त करके, उन्हें देवताओं तक पहुँचाने के लिए प्रस्थान करें॥६॥
हम याजक उन प्राचीनतम अग्निदेव की प्रार्थना करके उनको आवाहित करते हैं। आप सब लोगों को भी उनकी प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करते हैं॥७॥
सखा तुल्य, सबके हितैषी वे अग्निदेव, अत्यंत ज्ञानी हैं । जो साधक यजन करते हुए उन्हें घृताहुतियाँ समर्पित करते हैं, वे उनकी अनुकम्पा प्राप्त करके समृद्ध बनते हैं॥८॥
यज्ञ की आकाक्षा करने वाले हे साधको ! आप उन अग्निदेव का अपने स्तुति वचनों के द्वारा पूजन करें, जो नित्यज्ञान के देने वाले तथा यज्ञ के आधार रूप हैं॥९॥
जो अग्निदेव यज्ञ के सम्पादनकर्ता तथा कीर्तिवान् हैं, ऐसे श्रेष्ठ आंगिरस के लिए हमारे समस्त यज्ञादि कर्म समर्पित हैं॥१०॥
हे अविनाशी अग्निदेव ! जगत् को आलोकित करने वाली आपकी महान् किरणें अश्वों की भाँति अत्यन्त शक्तिशाली हैं । वे सबकी इच्छाओं की पूर्ति करने वाली हैं॥११॥
बलों के स्वामी हे अग्ने ! आप हमें श्रेष्ठ बल से सम्पन्न, धन प्रदान करें । रणक्षेत्र में हमारे पुत्र-पौत्रों को भलीप्रकार से संरक्षित करें॥१२॥
यजमानों के रक्षक, हविष्यान्न से प्रदीप्त होने वाले ये अग्निदेव प्रसन्न होकर, याजकों के यहाँ प्रतिष्ठित होते हैं। वे सभी दुष्ट-दुराचारियों का (अपने प्रभाव से) विनाश करते हैं॥१३॥
हे प्रजापालक अग्ने ! हमारे इस नूतन स्तोत्र को सुनकर उत्साही हुए आप, छली और कपटी दुष्टों को अपने प्रखर तेज से भस्म कर दें॥१४॥
अग्निदव को हविष्यान्न की आहुति प्रदान करने वाले यजमान पर किसी भी दुष्ट की माया (छल-छद्म) का प्रभाव नहीं पड़ता॥१५॥
हे अग्निदेव ! आप अपनी सामर्थ्य से सम्पूर्ण जगत् का पालन करते हैं तथा सुख प्रदान करते हैं । व्यश्व अषि ने धन प्राप्त करने की इच्छा से आपको प्रसन्न किया था। हम भी प्रचुर धन प्राप्त करने के निमित्त आपको भली प्रकार प्रदीप्त करते हैं॥१६॥
हे अग्ने ! आप सम्पूर्ण जगत् के ज्ञाता तथा पूजन करने योग्य हैं । उशना ऋष ने आपको याजक के रूप में मनु के घर में प्रतिष्ठित किया था॥१७॥
हे अग्निदेव ! परस्पर प्रेमपूर्वक निवास करने वाले देवगणों ने आपको अपना संदेशवाहक बनाया। आप अपने द्रुतगामी गुणों के कारण यज्ञ में सबसे पहले वन्दनीय हुए॥१८॥
हे मनुष्यो !आप ऐसे अविनाशी अग्निदेव को अपना सन्देशवाहक बनायें, जो धूम्रमार्ग से गमन करते हैं॥१९॥
वे अग्निदेव श्रेष्ठ, तेजस्वी और दिव्य आलोक से सम्पन्न हैं। वे अविनाशी तथा मनुष्यों द्वारा प्रार्थनीय हैं। हम उनका आवाहन करते हैं॥२०॥
जो याजक उन अग्निदेव को आहुतियाँ प्रदान करते हैं, वे अत्यन्त पौष्टिक अन्न तथा पराक्रमी सन्तान से सम्पन्न होकर कीर्ति प्राप्त करते हैं॥२१॥
वे अग्निदेव सम्पूर्ण जगत् के ज्ञाता, देवताओं में प्रमुख और सबसे प्राचीन हैं। यज्ञ में हव्य से परिपूर्ण सुक्-पात्र समर्पित करते हुए हम विनम्रतापूर्वक उनकी सेवा करते हैं॥२२॥
अश्व के सदृश शक्तिशाली तथा ज्ञानयुक्त स्तोत्रों द्वारा हम उन तेजस्वी अग्निदेव की वन्दना करते हैं॥२३॥
हे विश्वमना (विश्व हित की कामना वाले) ऋषे ! आप स्थूरयूप (स्थूल, प्रत्यक्ष अथवा सुदृढ़ स्तंभयुक्त) ऋषि के सदृश ही अपनी स्तुतियों द्वारा रिपुओं के दमन कर्ता उन महान् अग्निदेव की उपासना करें॥२४॥
अपनी सुरक्षा के निमित्त हम लोग ज्ञानी, याजक, मनुष्यों के अतिथि, समिधाओं से उत्पन्न तथा अत्यन्त प्राचीन अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं॥२५॥
हे अग्निदेव ! आप अपनी शक्ति से सम्पूर्ण पदार्थों में विद्यमान रहते हैं । याजकों द्वारा प्रदान की हुई आहुतियों को ग्रहण करते हैं । आप, इस यज्ञ में स्तवनों द्वारा पूजे जाने के बाद विद्यमान रहते हैं॥२६॥
हे अग्निदेव ! आप हमें ऐसी सम्पत्ति प्रदान करें, जो अनेकों द्वारा वांछित और प्राप्त करने के योग्य हो । जो सन्तान, साहस, कीर्ति तथा अन्न आदि वैभव प्रदान करने वाली हो॥२७॥
हे शक्तिशाली अग्ने ! आप अनेकों द्वारा वरणीय तथा निवास प्रदान करने वाले हैं। आप स्तोताओं के कल्याण के लिए सदैव सम्पत्ति प्रदान करें॥२८॥
हे अग्निदेव ! आप ही श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करने वाले दाता हैं । आप हमें गौ-अन्न आदि से सम्पन्न प्रचुर धन-वैभव प्रदान करें॥२९॥
हे अग्निदेव ! देवगणों के मध्य आप अत्यन्त कीर्तिमान् हैं । आप उन मित्र तथा वरुण देव को भी हमारे इस यज्ञ में ले आयें, जो अत्यन्त तेजयुक्त, शक्तिशाली तथा सत्य के पालक हैं॥३०॥

सूक्त-२४

हे मित्रो !स्तोत्रों से वज्र धारण करने वाले इन्द्रदेव की स्तुति करते हुए हम उनसे आशीर्वाद की याचना करते हैं । श्रेष्ठ वीर तथा शत्रुओं को पराजित करने वाले इन्द्रदेव की, आप सभी के कल्याण के लिए हम स्तुति करते हैं॥१॥
हे मित्र याजको ! वज्र धारण करने वाले इन्द्रदेव के निमित्त म स्तुति पाठ करते हैं। आप भी उन रिपु-संहारक तथा महान् नायक इन्द्रदेव की भलीप्रकार से प्रार्थना करें॥२॥
अश्वों से सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! आप हमारे द्वारा प्रशंसित होकर हमें प्राप्त करने योग्य तथा श्रेष्ठ कीर्तिदायक धन प्रदान करें। आप सम्पत्तिवानों को ही धन प्रदान करते हैं॥३॥
हे रिपु-संहारक इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा स्तुति किये जाने पर आप हमें शक्ति से सम्पन्न ऐश्वर्य प्रदान करें । रिपुओं का वैभव भी हमको ही प्रदान करें॥४॥
अश्वों से सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! रणक्षेत्र में लड़ाई करने वाले रिपु आपके दाहिने तथा बायें हाथ को नहीं रोक सकते । आपके कार्य में विघ्न पहुँचाने का प्रयास करने वाले भी आपका अनर्थ नहीं कर सकते॥५॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव !जिस प्रकार गोपालक गौओं के साथ गोशाला में प्रवेश करता है, उसी प्रकार हम अपनी प्रार्थनाओं के साथ आपके समीप पहुँचते हैं । आप हमारी मनोकामनाओं को पूर्ण करके हमें शान्ति प्रदान करें॥६॥
हे वृत्र-संहारक वीर इन्द्रदेव ! आप श्रेष्ठ निवास प्रदान करने वाले हैं। आप विश्वमना ऋषि के समस्त कार्यों को विवेकपूर्वक सम्पन्न करें तथा अपनी समीपता प्रदान करें॥७॥
हे वृत्रहन्ता पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप अनेकों लोगों द्वारा आहूत किये जाते हैं। आप हमें, मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला, सराहनीय तथा इच्छित ऐश्वर्य प्रदान करें॥८॥
हे श्रेष्ठ नायक इन्द्रदेव ! जिस प्रकार आपका अपरिमित बल रिपुओं द्वारा विनष्ट नहीं किया जा सकता, उसीं प्रकारे बहुतों द्वारा आवाहनीय हे इन्द्रदेव ! दानी के लिए प्रदत्त आपका दान भी कभी नष्ट होने वाला नहीं हैं॥९॥
हे धनवान् तथा उत्तम नायक इन्द्रदेव ! आप अत्यन्त पूजनीय हैं। आप मधुर सोमरस पीकर तृप्त हों तथा हमें सम्पत्ति प्रदान करने के लिए रिपुओं की मजबूत पुरियों को विनष्ट करें॥१०॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप सम्पत्ति से सम्पन्न हैं । आपके पहले भी हमने अन्य देवगणों से अभिलाषाएँ की थीं। अब आप अपने रक्षण- साधनों से सम्पन्न होकर हमें सम्पत्ति प्रदान करें॥११॥
आत्मीय, नायक तथा प्रार्थना के योग्य है इन्द्रदेव ! यश, सम्पत्ति तथा तेजोबल को प्राप्त करने के निमित्त हम आपके अतिरिक्त किसी अन्य देव को नहीं जानते॥१२॥
हे ऋत्विजो ! इन्द्रदेव के निमित्त वह सोमरस समर्पित करो, जिस मुधर सोमरस का पान करके वे अपने प्रभाव से याजकों को विपुल धन प्रदान करते हैं॥१३॥
अश्वों के अधिपति, स्तोताओं के धनप्रदायक इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं। हे इन्द्रदेव ! स्तुति करते हुए अभ्य (अश्व या पराक्रम युक्त ऋषि या साधक) के स्तोत्रों को आप निश्चित रूप से सुनें॥१४॥
हे इन्द्रदेव ! आपसे पहले आपके समान वीर, धनदाता, युद्ध में शत्रुओं को परास्त करने वाला तथा स्तुतियोग्य अन्य कोई देवता नहीं हुआ॥१५॥
हे ऋत्विग्गण ! मधुर सोमपान से आनन्दित होने वाले इन्द्रदेव को यह रस समर्पित करो । पराक्रमी और निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होने वाले इन्द्रदेव ही स्तोताओं द्वारा सर्वदा प्रशंसित होते हैं॥१६॥
हे अश्वपति इन्द्रदेव ! ऋषि प्रणीत आपकी स्तुतियों को अपनी सामर्थ्य एवं तेजस्विता से अन्य कोई भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं अर्थात् आपके समान बलवान् एवं तेजस्वी कोई दूसरा नहीं॥१७॥
ऐश्वर्य की कामना से हम उन वैभवशाली इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं, जो प्रमादरहित होकर याजकों के यज्ञों (सत्कर्मों) से वृद्धि को (पोषण को) प्राप्त करते हैं॥१८॥
है मित्रो ! शीघ्र आओ; हम उन स्तुत्य, नायक इन्द्रदेव की प्रार्थना करें, जो अकेले ही सभी शत्रुओं को परास्त करने में सक्षम हैं॥१९॥
हे याजको ! गौ (गाय, वाणी अथवा इन्द्रियों ) का वध न करके उसको संरक्षित करने वाले तेजस्-सम्पन्न इन्द्रदेव के निमित्त घृत से भी अधिक मधुर तथा सुस्वादयुक्त स्तुति वचनों का पाठ करें॥२०॥
वे इन्द्रदेव असीम शौर्य से सम्पन्न हैं। उनकी सम्पत्ति को कोई प्राप्त नहीं कर सकता। उनका दान प्रकाश के समान सबके लिए उपलब्ध है॥२१॥
हे स्तोताओ ! वे इन्द्रदेव अहिंसित शक्ति - सम्पन्न तथा समस्त जगत् को नियमित करने वाले हैं। आप व्यश्व ऋषि के सदृश उनकी प्रार्थना करें । वे दानियों को सराहनीय ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥२२॥
हे विश्वमना ऋषे ! वे विद्वान् इन्द्रदेव मनुष्यों के अन्दर नौ प्राणों के अतिरिक्त दसवें प्राण (मुख्य प्राण) की तरह विद्यमान रहते हैं - ऐसे पूजनीय इन्द्रदेव की आप साधना करें॥२३॥
जिस प्रकार शोधनकर्ता (सूर्य, अग्नि आदि) सब ओर गतिशील (प्राणियों-पक्षियों) को जानते (उन्हें शुद्ध बनाते हैं, उसी प्रकार है वज्रपाणि (इन्द्रदेव) !आप नितियों (राक्षसों-सभी लोकों) को नियंत्रित करना जानते हैं॥२४॥
हे इन्द्रदेव ! आप अत्यन्त कर्मशील हैं। आप जिन रक्षण-साधनों के द्वारा सत्कर्म करने वालों को रक्षित करते हैं, जिनसे कुत्स ऋषि को रक्षित करने के लिए दो रिषुओं का वध किया था, उन्ही रक्षण-साधनों से आप हमें सुरक्षा प्रदान करें॥२५॥
हे श्रेष्ठ कर्मशील इन्द्रदेव ! ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए हम आपकी स्तुति करते हैं। आप हमारे समस्त रिपुओं का संहार करें॥२६॥
जिन्होंने अपने भक्तों को निशाचरों और दुष्कर्मों से मुक्त किया, जिन्होंने सातों सरिताओं में पानी प्रदान किया तथा जिन्होंने उन अत्याचारियों को नष्ट किया, जो मनुष्यों को गुलाम बनाते थे, ऐसे शक्तिशाली इन्द्रदेव को हम बारम्बार प्रणाम करते हैं॥२७॥
हे वरो (श्रेष्ठ पुरुषों अथवा राज वरु)! जिस प्रकार आपने प्राचीन काल में ‘सुषाम' नामक शासक की (पितृ लोक से) मुक्ति के लिए याचकों को धन प्रदान किया था, उसी प्रकार व्यश्व ऋषि को भी ऐश्वर्य प्रदान करें । हे उषा देवि ! आप अत्यन्त सौभाग्यवती तथा सम्पत्ति से सम्पन्न हैं। आप भी हमें यथोचित ऐश्वर्य प्रदान करें॥२८॥
मनुष्यों के हितैषी, सोम युक्त (व्यक्तियों अथवा) वरु राजा द्वारा प्रदान किया हुआ दान, हम व्यश्व (विशेष अश्व-पराक्रम सम्पन्नों की) सन्तानों को मिले, सैकड़ों-हजारों संख्या वाले ऐश्वर्य भी हमारे समीप आएँ॥२९॥
माया को विनष्ट करने वाली हे उषा देवि ! यदि कोई आपसे पूछे कि 'वरु' राजा कहाँ निवास करते हैं ? तो आप उनके स्थान तथा रिपु-संहारक 'वरु' के विषय में कहना कि वे गोमती (नदी अथवा वाणी एवं इन्द्रियों से युक्त चेतना) के निकट निवास करते हैं॥३०॥

सूक्त-२५

हे मित्र और वरुणदेव ! आप समस्त जगत् के पालक और समस्त देवताओं के उपास्य हैं । आप यज्ञ के संरक्षक तथा पाचन शक्ति से सम्पन्न हैं । हे याजको ! आप उन दोनों देवों की उपासना करें॥१॥
सत्कर्म करने वाले मित्र और वरुणदेव अदिति माता के पुत्र हैं तथा व्रतों को धारण करने वाले हैं। वे अपने रथ के द्वारा सब जगह गमन करते हैं॥२॥
सत्यपालक तथा महान् अदिति माता ने राक्षसों का संहार करने के लिए मित्रावरुण को उत्पन्न किया। वे दोनों समस्त विश्व के ज्ञाता तथा महान् तेज से सम्पन्न हैं ॥३॥
महान् मित्र और वरुणदेव अत्यन्त तेज तथा दिव्यगुणों से सम्पन्न हैं । वे जीवनीशक्ति प्रदान करने वाले और यज्ञ की रक्षा करने वाले हैं । वे यज्ञ को शोभा प्रदान करते हैं॥४॥
मित्र और वरुण देव श्रेष्ठ सामर्थ्य को पैदा करके उसकी रक्षा करते हैं। वे सत्कर्म करते हुए श्रेष्ठ दान करने वाले हैं। वे अन्न से सम्पन्न प्रदेश में निवास करने वाले हैं॥५॥
हे मित्रावरुण ! आप दिव्यलोक तथा पृथ्वीलोक को धन-धान्य से परिपूर्ण कर देते हैं । अन्तरिक्ष से प्रवाहित होने वाली वर्षा आपके अधीन है॥६॥
हे मित्रावरुणदेव !आप यज्ञ-पथ पर चलने वाले हैं । आप तेज-सम्पन्न होकर द्युलोक से हमारा उसी प्रकार पालन करते हैं, जिस प्रकार गोपाल अपनी गौओं को भलीप्रकार देखता है । आप विनम्र मनुष्यों के हितैषी हैं॥७॥
वे मित्र और वरुणदेव सत्य का पालन तथा सत्कर्म करते हुए, कुशलता से शासन करके स्वयमेव सर्वोच्च स्थान पर विराजते हैं। वे अपने संकल्प का पालन करते हुए, विपत्ति से मनुष्यों को बचाकर उन्हें सामर्थ्य प्रदान करते हैं॥८॥
नेत्रों की परिधि में आने से पूर्व ही स्पष्ट रूप से समस्त प्राणियों को जानने वाले, मित्रावरुण सबको प्रेरित करते हैं। वे अपने असहनीय तेज के कारण प्राचीन काल से ही सबके द्वारा पूजे जाते हैं॥९॥
सत्य के पालक दोनों अश्विनीकुमार, माता अदिति तथा शक्ति से समृद्ध मरुद्गण हमारा संरक्षण करें॥१०॥
हे श्रेष्ठ दानी मरुतो ! आप नौका के सदृश रात-दिन हमारा संरक्षण करें । हम अहसत रहकर ... ग-साधनों से सम्पन्न हों॥११॥
हिसा न करते हुए हम श्रेष्ठदानी विष्णुदेव को आहुति प्रदान करते हैं । हे स्वप्रवाहित सिन्धो ! हमारी कामनाओं को समझने के लिए आप हमारी विनती को सुनें॥१२॥
जिस ऐश्वर्य का संरक्षण मित्र, वरुण और अर्यमादेव करते हैं, उस सर्वश्रेष्ठ तथा वणीय ऐश्वर्य की हम आपसे याचना करते हैं॥१३॥
हमारी सम्पत्ति का संरक्षण जलयुक्त सरिताएँ, मरुद्गण तथा दोनों अश्विनीकुमार करें। इसके अतिरिक्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले तथा एक साथ निवास करने वाले देवगण भी हमारे ऐश्वर्य को संरक्षित करें॥१४॥
जिस प्रकार पानी की तेज धार पेड़ों को नष्ट कर देती है, उसी प्रकार सम्मानीय तथा द्रुतगामी नायक (मित्रावरुण) रिपुओं के अहंकार को नष्ट कर देते हैं॥१५॥
मित्र और वरुण दोनों में से एक देव, मित्र समस्त जगत् का पोषण तथा देखभाल करते हैं । हे याजको । अपने हित के लिए हम उनके नियमों पर चलते हैं॥१६॥
हम सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने वाले सम्राट् वरुणदेव के व्रतों का पालन करते हैं तथा मित्र देवता के भी व्रतों का पालन करते हैं॥१७॥
मित्र देवता ने अपनी किरणों से दिव्यलोक तथा पृथिवीलोक को व्याप्त किया। वे और वरुणदेव ने दोनों लोकों को अपनी महिमा के द्वारा पूर्ण किया॥१८॥
जब मित्र और वरुणदेव सूर्यदेव के स्थान पर अपना दिव्य प्रकाश प्रकट करते हैं, तब वे अग्निदेव के सदृश तेज-सम्पन्न होकर सभी लोगों द्वारा आहूत किये जाते हैं॥१९॥
है याजको ! आप इस विशाल यज्ञ में स्तोत्रों का पाठ करें । वे मित्र देवता, गौ से सम्पन्न अन्न के अधिष्ठाता हैं। वे ही दोषरहित अन्न को हमें प्रदान करने में समर्थ हैं॥२०॥
हम उन सूर्यदेव तथा दोनों (घु और पृथिवी) लोकों की प्रार्थना करते हैं । हे वरुणदेव ! आप हमें भोज्य पदार्थ प्रदान करने के लिए सदैव हमारे निकट पधारें॥२१॥
‘उक्ष' वंशीय शासक ‘सुषाम' के पुत्र ‘वरु' नामक राजा ने हमें द्रुतगामी अश्व तथा सोने-चाँदी से विभूषित रथ प्रदान किया। वह रथ रिपुओं की आयु हरने में सक्षम है॥२२॥
हमें अश्वों से, रिपुओं का संहार करने वाले तथा नायकों का वहन करने वाले दो द्रुतगामी घोड़े प्राप्त हुए॥२३॥
श्रेष्ठ लगाम तथा चाबुक वाले, ज्ञान - सम्पन्न दो द्रुतगामी अश्वों पराक्रमों) को हमने अभिनव प्रार्थनाओं के द्वारा एक साथ प्राप्त किया॥२४॥

सूक्त-२६

बलशाली, सुख या धन वर्षक, अनश्वर बलों के धारक हे अश्विनीकुमारो ! ज्ञानियों के बीच संयुक्त रूप से स्तुति के लिए हम आपके रथ (संचार के साधनों का आवाहन करते हैं॥१॥
सत्य के पालक, शक्तिशाली हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ऐश्वर्य की वर्षा करने वाले हैं। जिस प्रकार आप ‘सुषाम' (नरेश या निष्पक्ष दानी) को ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए पधारते थे, उसी प्रकार हमारे लिए भी रक्षण-साधनों सहित आगमन करें । हे वरु (नरेश या श्रेष्ठ साधक) ! आप ऐसी स्तुति करें॥२॥
शक्ति- सम्पन्न, ऐश्वर्यवान् हे अश्विनीकुमारो ! प्रातः काल, प्रचुर धन-धान्य की प्राप्ति के लिए हम आपको आवाहन करते हुए, आपको आहुतियाँ समर्पित करते हैं॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! सर्वत्र अमण करने वाला आपका प्रसिद्ध रथ इधर भी पधारे । आप स्तुति करने वालों को ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए उनकी प्रार्थना को सुनें॥४॥
हे धनवर्षक अश्विनीकुमारो ! आप दोनों शत्रुओं को पीड़ित करने वाले हैं। आप दोनों ईर्ष्या करने वाले शत्रुओं को नष्ट करके आगे बढ़ जाते हैं॥५॥
दर्शनीय तथा कान्तिमान् हे अश्विनीकुमारो ! आप अपने कार्यों को कुशलतापूर्वक सम्पन्न करते हैं तथा द्रुतगामी अश्वों द्वारा समस्त स्थानों पर पहुँचते हैं॥६॥
धन-सम्पन्न तथा गतिशील रहने वाले हे अश्विनीकुमारो ! समस्त प्राणियों का पालन करने हेतु धन- सम्पन्न होकर आप हमारे निकट पधारें॥७॥
हे इन्द्र-हे सत्यपालक दानदाता (अश्विनी कुमारो) !आप देवताओं के साथ प्रचुर धन - सम्पन्न होकर हमारे इस यज्ञ में पधारें॥८॥
हे विद्वान् अश्विनीकुमारो ! व्यश्व ऋषि के सदृश, हम भी ऐश्वर्य प्राप्ति की आकांक्षा से आपका आवाहन करते हैं। अत: आप श्रेष्ठ ज्ञान-सम्पन्न होकर हमारे निकट पधारें॥९॥
हे व्यश्व ऋषे ! आप उन अश्विनीकुमारों की स्तुति करें, वे आपकी प्रार्थना को अवश्य सुनेंगे। वे दोनों पास में निवास करने वाले शत्रुओं तथा लालची वणिकों (व्यापारियों को नष्ट कर देते हैं॥१०॥
सबके नायक हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों व्यश्व अषि की प्रार्थना का श्रवण करें और हमारे भी स्तुति-वचनों पर ध्यान दें । आप दोनों, मि-वरुण तथा अर्यमादेव आदि सभी के साथ यहाँ यज्ञस्थल पर पधारें॥११॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों स्तुति के योग्य तथा कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। जो ऐश्वर्य आप ज्ञानियों को प्रदान कर चुके हैं, वही ऐश्वर्य हमें भी प्रतिदिन प्रदान करें॥१२॥
जिस प्रकार कोई नववधू सुन्दर आवरण में लिपटी रहती है, उसी प्रकार जो मनुष्य यज्ञों (श्रेष्ठकर्मों) से आवृते रहते हैं, उनकी निगरानी करने वाले दोनों अश्विनीकुमार सदैव उन्हें प्रसन्न रखते हैं॥१३॥
हे अश्विनीकुमारो ! जो मनुष्य आप दोनों को अत्यन्त विशाल तथा श्रेष्ठ सुरक्षित आसन (आवास) प्रदान कर रहा है, आप उस याजक के घर सदैव जाने की आकांक्षा रखते हैं॥१४॥
वसु (सुख या धन) वर्षक हे अश्विनीकुमारो ! आप नेतृत्व प्रदान करने वालों (हितपालकों) द्वारा बरतने योग्य (गुण या सुविधाएँ) हमारे लिए लाएँ । व्याधि के बाण के समान (पशु या रोगनाशक) वाणी (मंत्रयुक्त) यज्ञ को ऊर्ध्वगति प्रदान करे॥१५॥
हे नायक (अश्विदेवो) ! आपके आवाहन के लिए बड़ी मात्रा में भेजे गये स्तोत्रों में यह स्तोत्र आपको दूत की तरह बुलाए और वे आपको प्रिय लगे॥१६॥
हे अविनाशी अश्विनीकुमारो ! आप दोनों चाहे दिव्यलोक में हों या समुद्र में अथवा अपने उपासक के गृह में विद्यमान होकर आनन्दित हो रहे हों, हमारी पुकार पर निश्चित रूप से ध्यान देकर शीघ्र ही पधारें॥१७॥
हे अश्विनीकुमारो ! स्वर्ण के समान कान्तिमान् , पवित्र जल वाली 'श्वेतयावरी' (शुभ प्रवाह वाले) प्रवाहों, प्रार्थनाओं के द्वारा हम आपका आवाहन करते हैं॥१८॥
हे अश्विनीकुमारो ! शुभ्रवर्ण वाली (उत्तम भावनायुक्त), श्रेष्ठ कीर्तिवाली, कल्याण प्रदायिनी श्वेतयावरी नामक धारा को आप प्रवमान बनाएँ॥१९॥
सबका पालन करने वाले हे वायो ! रथ को खींचने वाले दो बलिष्ठ अश्वों को नियोजित करके आप हमारे इस यज्ञ में पधारें तथा मधुर सोमरस का पान करें॥२०॥
सत्कर्मों के पालक हे वायो !आप त्वष्टा के जामाता हैं । हम आपके रक्षण-साधनों की कामना करते हैं॥२१॥
त्वष्टा देवता के जामाती, धन से सम्पन्न वायु देवता की, हम धन प्राप्ति के निमित्त स्तुति करते हैं। उनकी कृपा से हम धन-धान्य सम्पन्न बनें॥२२॥
हे वायुदेवता ! आप विशाल अश्व समूह में से (चुनकर) दो बलिष्ठ अश्वों को अपने रथ में नियोजित करें। हे महान् वायो ! आप हितकारी साधनों के साथ हमारे निकट पधारें॥२३॥
सौन्दर्य से सम्पन्न हे वायुदेव ! आप अपनी महानता से सब जगह विद्यमान रहते हैं। हम अपने यज्ञ में आपको ग्रावा (सोमरस निचोड़ने में प्रयुक्त पत्थर) के समान आवाहित करते हैं॥२४॥
देवताओं में अग्रगामी हे वायो ! आप अन्त:करण से प्रसन्न होकर हमें अन्न, जल तथा सद्बुद्धि प्रदान करें॥२५॥

सूक्त-२७

उक्थ (स्तुतिपरक) यज्ञ में पुरोहित अग्नि, मावा (सोम निष्पादक पत्थर) तथा कुश (आसन) आदि स्थापित हैं । हे मरुतो ! हे ब्रह्मणस्पते ! हे देव ! वेदमंत्रों के द्वारा हम आपसे श्रेष्ठ रक्षण की कामना करते हैं॥१॥
हे अग्निदेव ! आप हमें उषा एवं रात्रि के समय पशु, जमीन, पेड़-पौधे तथा श्रेष्ठ ओषधियाँ प्रदान करें। समस्त जगत् के ज्ञाता हे वसुओ ! आप हमारी (हितकारिणी) बुद्धियों के संरक्षक हों॥२॥
हमारा यह प्राचीन यज्ञ अग्निदेव, व्रतशील वरुणदेव, सर्वव्यापी प्रकाशवान् मरुद्गण तथा अन्य देवताओं के समीप कुशलतापूर्वक पहुँचे॥३॥
समस्त विश्व को जानने वाले तथा रिपुओं का विनाश करने वाले सभी देवगण मानव मात्र को समृद्ध करें । चिरस्थायी रक्षण-साधनों से हमारा संरक्षण करें तथा हमें सुरक्षित आवास प्रदान करें॥४॥
समान विचारवाले हे विश्वेदेवो ! हमारी वाणी से प्रकट ऋचाओं से प्रसन्न होकर आप संगठित रूप से हमारे समीप पधारें । हे महान् अदिति देवी तथा मरुद्गण ! आप हमारे यज्ञ में पधार कर आसीन हों॥५॥
शत्रुओं का वध करने में शीघ्रता बरतने वाले हे ऋभुगण, मरुत्, इन्द्र, वरुण, आदित्यादि देवो ! आप सभी अपने प्रिय अश्वों के द्वारा आहुति ग्रहण करने के निमित्त हमारे इस यज्ञ- मण्डप में पधारें॥६॥
हे वरुणदेव ! हम मनु की तरह सोमरस अभिषुत करके यज्ञाग्नि को प्रज्वलित कर आहुतियाँ प्रदान करते हैं । आपके निमित्त आसन बिछाकर बारम्बार आपका आवाहन करते हैं॥७॥
हे मरुद्गण, विष्णु, पूषा तथा दोनों अश्विनीकुमारो ! आप हमारी प्रार्थनाओं से प्रभावित होकर हमारे समीप पधारें । शक्तिशाली, वृत्रहन्ता हे इन्द्रदेव ! आप भी अपने सहचरों सहित हमारे यज्ञ में सर्वप्रथम पधारें॥८॥
किसी से भी शत्रुता न करने वाले हे देवताओ ! आप सभी मनुष्यों को बसाने वाले हैं। अतः आप हमें त्रुटिरहित, नष्ट न होने वाला आवास प्रदान करें॥९॥
हे देवताओ ! आप हिंसक प्रवृत्ति वालों के लिए शत्रु के समान हैं । आपके बीच छोटे-बड़े का कोई भेद-भाव नहीं हैं। आप हमारी उन्नति तथा अभिनव सुख के लिए यथाशीघ्र हमें उपदिष्ट करें॥१०॥
समस्त पदार्थों के ज्ञाता हे देवताओ ! हम अन्नादि श्रेष्ठ ऐश्वर्यों की कामना करते हुए आपसे भावपूर्ण प्रार्थना करते हैं॥११॥
हे देवताओ ! वरण करने योग्य, महान् सूर्यदेव जब आपके मध्य उदित होते हैं, तब सभी मनुष्य और पशु-पक्षी अपने कर्मों में निरत होकर अपनी कामनाओं की पूर्ति करते हैं॥१२॥
हम दिव्य स्तोत्रों (बुद्धियों) के माध्यम से अपनी सुरक्षा के लिए, अभीष्ट प्राप्ति के लिए तथा अन्न या बल की प्राप्ति के लिए दिव्य देवों अथवा देवों ही देवों को आवाहित करते हैं॥१३॥
शत्रुओं पर मेन्यु प्रदर्शित करने वाले हे देवताओ ! आप सभी मुझ मनु को एक साथ मिलकर ऐश्वर्य प्रदान करें । आप हमें और हमारी सन्तानों को प्रतिदिन श्रेष्ठ मार्गदर्शन प्रदान करें॥१४॥
मित्रता करने वाले हे देवताओ ! इस यज्ञस्थल पर हम आपकी प्रार्थना करते हैं । हे मित्र और वरुणदेव ! जो मनुष्य आप जैसी तेजस्विता धारण करते हैं, उन्हें कोई भी विनष्ट नहीं कर सकता॥१५॥
हे देवताओ ! जो व्यक्ति वरिष्ठता को ग्रहण करने के लिए आपको हवि प्रदान करता है, वह अपने गृह को पौष्टिक अन्न सामग्री से समृद्ध करता है । इसके अतिरिक्त वह धर्म का आचरण करके प्रजाओं (सन्तानों) से सम्पन्न होता है । उसे कोई हताहत नहीं कर सकता॥१६॥
श्रेष्ठ दानी मित्र, वरुण और अर्यमा देवता जिनका संरक्षण करते हैं, ऐसे व्यक्ति झगड़े के बिना भी ऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं। वे प्रगति करते हुए सन्मार्गगामी बनते हैं॥१७॥
हे देवताओ ! शत्रु के अजेय एवं दुर्गम दुर्ग को (हमारे लिए) सुगमता से प्रवेश करने तथा जीतने योग्य बना दें । रिपुओं के वज्र (अस्त्र-शस्त्र) हमारे वीरों को क्षतिग्रस्त न करके स्वयं विनष्ट हो जाएँ॥१८॥
शौर्य से प्रेम करने वाले सर्वज्ञाता हे देवताओ ! आप सूर्योदय, सूर्यास्त तथा मध्याह्न काल में-हर समय हमारे लिए हितकारी हों॥१९॥
सज्जनों को जीवनी शक्ति प्रदान करने वाले हे देवताओ ! आपके निमित्त आहुति प्रदान करने वाले ज्ञाता को आप श्रेष्ठ आवास प्रदान करें । हे सर्वज्ञाता वसुओ ! हम आपके समीप आसीन हों॥२०॥
हे सर्वज्ञाता देवताओ ! सूर्योदय, सूर्यास्त तथा दोपहर के समय यजन करने वाले विद्वान् मनु को आप श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें॥२१॥
हे ओजस्वी देवताओ ! जिस प्रकार पुत्र अपने पिता से याचना करता है, उसी प्रकार हम आपसे ऐसी सम्पत्ति की याचना करते हैं; जो अनेकों का पोषण करने वाली हो । हे आदित्यो ! हवि प्रदाता हम याजक उसी सम्पत्ति से हर्ष प्राप्त करें॥२२॥

सूक्त-२८

हमारे द्वारा प्रदत्त आहुतियों को स्वीकार करने के लिए कुश के आसन पर विराजित तैतीस देवताओं ने हमारी भावना को जाना। उन्होंने हमें दो प्रकार के धन प्रदान किये॥१॥
वरुण, मित्र, अर्यमा तथा अग्निदेव हमारी हवियों को ग्रहण करने के लिए अपनी शक्तियों सहित उपस्थित होकर हमारो आतिथ्य स्वीकार करें॥२॥
वे देवगण सहचरों सहित पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर और नीचे सभी दिशाओं से हमारी सुरक्षा करें॥३॥
वे देवगण जिस वस्तु की कामना करते हैं, उसे प्राप्त कर लेते हैं। उनकी इच्छाओं को रोकने में कोई भी मनुष्य समर्थ नहीं हो सकता॥४॥
उन सप्त मरुतों के सात प्रकार के हथियार एवं सात प्रकार के कवच भिन्न-भिन्न हैं। वे सभी तेजस्वी स्वरूप वाले हैं॥५॥

सूक्त-२९

ओजस्वी, सर्वत्र गमन करने वाले, श्रेष्ठ, नित्य नवीन शोभा वाले, रात्रि के नायक (सोम) स्वर्णिम रूप में उत्पन्न हुए॥१॥
अग्निदेवता आलोकयुक्त और विद्वान् हैं, वे अपने मध्यस्थान पर विराजते हैं॥२॥
त्वष्टा देवता सभी देवों के मध्य में बैठकर, अपने हाथ में लौह-निर्मित हथियार धारण किए हुए हैं॥३॥
इन्द्रदेवता अपने हाथ में वज्र धारण करते हैं तथा उसके प्रहार से शत्रुओं का संहार करते हैं॥३॥
जल द्वारा रोगों का निवारण करने वाले पुनीत तथा भीषण रुद्रदेव अपने हाथों में नुकीले हथियार ग्रहण करते हैं॥५॥
पूषा देवता पथ को सुरक्षित करने वाले तथा चोर के सदृश सबके छिपे हुए ऐश्वर्य को जानने वाले हैं॥६॥
अपने तीन कदमों से, तीनों लोकों को नापने वाले विष्णुदेव स्तुति के योग्य हैं। इनके कार्य को देखकर सभी देवता हर्षित होते हैं॥७॥
दोनों अश्विनीकुमार, उषा के साथ एक ही रथ पर विराजमान होकर सभी जगह विचरण करते हैं, जैसे प्रवासी व्यक्ति (एक रथ या वाहन पर) गमन करते हैं॥८॥
अत्यन्त तेज़-सम्पन्न देवता द्वय (मित्र और वरुण) घृत की आहुतियों से युक्त या प्रकाशित हैं। वे दिव्यलोक में निवास करते हैं॥९॥
प्रार्थना करने वाले स्तोतागण सामगान करते हैं और अपनी उपासना द्वारा सूर्यदेव को आलोकित करते हैं॥१०॥

सूक्त-३०

हे देवताओ ! आप में से न तो कोई बालक हैं और न किशोर; आप सभी देवता महान् (परिपक्व) हैं॥१॥
हे देवताओ ! आप हिंसक प्रवृत्ति के व्यक्तियों के विनाशक हैं और विद्वानों के द्वारा पूजनीय हैं। आप तैतीस देवताओं के रूप में सम्मानित किये जाते हैं॥२॥
हे देवताओ ! आप सभी हमारा संरक्षण करें तथा पोषण प्रदान करते हुए हमें उपदेशित करें । हमें पितरों के अनुरूप मनुष्योचित मार्ग पर आगे बढ़ायें, उससे विपरीत या दूर न जाने दें॥३॥
सभी को सन्मार्ग की ओर ले जाने वाले हे देवताओ ! आप हमारे पास उपस्थित होकर हमें गौओं, अश्वों सहित विविध ऐश्वर्य प्रदान करें॥४॥


सूक्त-३१

जो ब्राह्मण अपने आप यज्ञ करते और अन्यों से करवाते हैं तथा सोमरस अभिषुत करते हैं और दूसरों से करवाते हैं, वे इन्द्रदेव द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं॥१॥
जो याजक पुरोडाश और गो दुग्ध मिला हुआ सोमरस इन्द्रदेव को प्रदान करते हैं, उन्हें वे देव दुष्कर्मों से बचाते हैं॥२॥
याजकगण देवों के द्वारा प्रदान किया हुआ तेजस्वी रथे प्राप्त करते हैं। वे अपने शत्रुओं को परास्त करके भली प्रकार समृद्धिशाली बनते हैं॥३॥
इस (याजक) के घर में प्रजायुक्त, स्थिरतापूर्वक विद्यमान रहने वाली, नियमित रूप से धेनु रूपी मति प्रतिदिन ऐश्वर्य दुहती है॥४॥
हे देवो ! समान विचार वाले जो पति-पत्नी सोमरस अभिषुत करके उसे शुद्ध करते हैं, जो प्रतिदिन देवों को गो-दुग्ध मिश्रित सोम समर्पित करते हैं॥५॥
वे समान विचार वाले दम्पति यज्ञ करते हैं, सदैव पोषक आहार प्राप्त करते हैं। उन्हें कभी भी अन्न से विमुख नहीं होना पड़ता॥६॥
वे दम्पति देवों की उपेक्षा नहीं करते और न ही अपने विवेक को खोते हैं । अतः वे महान् कीर्ति को वरण करते हैं॥७॥
वे दोनों सोने के आभूषणों से युक्त होकर सन्तानों के साथ हर्षित होते हुए पूर्ण आयुष्य को प्राप्त करते हैं॥८॥
नित्यप्रति देवताओं की प्रार्थना करने वाले वे दम्पति ऐश्वर्य और हर्ष प्रदायक अन्न का दान करते हैं । वे गौओं, भेड़ों आदि पशुओं से समृद्ध होकर उन देवों की उपासना करके अमरत्व को प्राप्त करते हैं॥९॥
पहाड़ों और सरिताओं में विद्यमान सुख, तथा विष्णुदेव के पास रहने वाले सुख की हम याचना करते हैं॥१०॥
पूषा देवता ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। वे अत्यन्त हितकारी तथा सबको धारण करने वाले हैं। वे हमारे समीप पधारें । उनके आगमन से जीवन का विस्तृत भाग हमारे लिए हितकारी हो॥११॥
रिपुओं द्वारा परास्त न होने वाले पूषादेव की सभी मनुष्य सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं। आदित्यगण जिन साधकों पर प्रसन्न होते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं॥१२॥
मित्र, वरुण तथा अर्यमा देवों के द्वारा संरक्षित होने के कारण जीवन में सन्मार्ग पर चलना हमारे लिए सरल हो॥१३॥
हे देवो ! ऐश्वर्य के निमित्त हम स्तोतागण आपमें से प्रमुख अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं । आप अनेकों लोगों के प्रिय पात्र तथा सखा हैं । आप यज्ञ क्षेत्र को सिद्ध करने वाले हैं॥१४॥
जिस प्रकार रणक्षेत्र में कोई योद्धा तीव्रगति से आगे बढ़ता है, उसी प्रकार देवताओं को प्रिय लगने वाले भक्त का, जीवन रूपी रथ द्रुतगति से आगे बढ़ता है । जो याजक देवताओं की सच्चे मन से उपासना करते हैं, वे अयाज्ञिक व्यक्ति को परास्त करते हैं॥१५॥
हे याजको ! हम सोमरस को अभिषुत करने वाले तथा देवों की प्रार्थना करने वाले हैं। आपका कभी विनाश नहीं होगा। जो याजक सच्चे मन से देवताओं की उपासना करते हैं, वे अयाज्ञिकों को परास्त करने में समर्थ होते हैं॥१६॥
देवों की सच्ची लगन से उपासना करने वाले यजमान अपने कर्तव्य से च्युत नहीं हो सकते और न ही उन्हें कोई धन से दूर कर सकता है। वे स्वयं कभी भ्रष्ट नहीं हो सकते, (इसके विपरीत) अयाज्ञिकों को वे परास्त करने में सक्षम होते हैं॥१७॥
सच्ची लगन से उपासना करने वाले यजमान देवताओं के द्वारा श्रेष्ठ शक्ति तथा अच्चों को प्राप्त करते हैं। इसके अतिरिक्त वे अयाज्ञिकों को परास्त करने में सक्षम होते हैं॥१८॥

सूक्त-३२

हे कण्ववंशीय ऋषियो ! इन्द्रदेव के द्वारा सोमरस पीने के बाद, आनन्दित होकर किये गये कर्मों का आप गुणगान करें॥१॥
पानी की धाराओं को प्रवाहित करने वाले शक्तिशाली इन्द्रदेव ने सृबिन्द, अनर्शनि, पिपु, अहीशुव तथा दास आदि समस्त शत्रुओं का संहार किया॥२॥
हे इन्द्रदेव ! अत्यन्त विशालकाय अर्बुद (मेघ) के दुर्ग को आप तोड़ दें, ऐसा वीरतापूर्ण कार्य आप ही सम्पन्न कर सकते हैं॥३॥
हे याजको ! जिस प्रकार बादलों से पानी की याचना करते हैं, उसी प्रकार हम आपकी सुरक्षा के निमित्त शत्रुओं के संहारक, मुकुटधारी इन्द्रदेव से स्तुति करते हैं॥४॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप हर्षित होकर गौओं और अश्वों की शालाओं को सोम अभिषव करने वालों के उपयोग हेतु उसी प्रकार खोल देते हैं, जिस प्रकार आपने रिपुओं के नगर द्वारों को खोला था॥५॥
यदि आप हमारे द्वारा अभिषुत सोमरस और स्तुति वचनों की आकांक्षा करते हैं, तो हमें पोषक अन्न प्रदान करने के निमित्त सुदूर स्थान से भी यज्ञस्थल पर पधारें॥६॥
सोमरस पीकर तृप्त होने वाले, प्रशंसा के योग्य हे इन्द्रदेव ! हम आपकी स्तुति करते हैं। आप हमें तुष्टि प्रदान करें॥७॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप प्रसन्न होकर हमें ऐसा ऐश्वर्य प्रदान करें, जो केभी क्षय न हो; क्योंकि आपके पास अपार सम्पत्ति है॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें गौ, अश्व, स्वर्ण तथा धन-धान्य से सम्पन्न बनाएँ, जिसे प्राप्त कर हम हर्षित हों॥९॥
सम्पूर्ण जगत् के संरक्षण के लिए अपनी भुजाओं को फैलाने वाले तथा सत्कर्म करने वाले उन इन्द्रदेव का हम आवाहन करते हैं, जिनका सर्वत्र ही गुणगान किया जाता है॥१०॥
युद्धक्षेत्र में अनेकों वीरतापूर्ण कार्य करने वाले इन्द्रदेव वृत्र का वध करते हैं तथा अन्य शत्रुओं का भी संहार करते हैं। वे प्रार्थना करने वालों को प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥११॥
सामर्थ्यवान् तथा दान-दाता इन्द्रदेव हमें बलवान् बनाएँ । वे अपनी रक्षण-शक्ति के द्वारा हमें अन्त: शक्ति प्रदान करें॥१२॥
हे मनुष्यो ! प्रचुर धन वाले, संरक्षण करने वाले तथा विपत्ति से भली प्रकार पार लगाने वाले इन्द्रदेव, यजन करने वालों के सखा हैं । आप, ऐसे इन्द्रदेव का गुणगान करें॥१३॥
हे स्तोताओ ! संग्राम में अडिग रहने वाले, वैभव को जीतने वाले तथा अपने ओज से अनन्त शत्रुओं पर अधिकार एवं नियंत्रण करने वाले इन्द्रदेव की प्रार्थना करें॥१४॥
उन इन्द्रदेव की महान् सामथ्र्यों को कोई भी परास्त नहीं कर सकता । ऐसा भी कोई नहीं है, जो उन्हें दान-दाता न कहे॥१५॥
सोम का अभिषवण एवं पान करने वाले ब्राह्मणों (ब्रह्मनिष्ठों) पर निश्चितरूप से कोई ऋण (देव, अषि या पितृ ऋण) नहीं होता । जिसने ऋण भरा (चुकाया नहीं, वह सोमपान नहीं कर सकता॥१६॥
प्रार्थना के योग्य इन्द्रदेव के निमित्त स्तुतिगान करें, उनके निमित्त ही मन्त्रोच्चारण करें तथा उन्हीं के निमित्त स्तोत्रों का निर्माण करें॥१७॥
जिस शक्तिशाली इन्द्रदेव ने सहस्रों रिपुओं का वध कर दिया, उन्हें कोई भी शत्रु पीड़ित नहीं करते। वे याजकों को समृद्ध करते हैं॥१८॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी धारक शक्ति के निमित्त हम आपको आहूत करते हैं। आप हमें अन्न प्रदान करें और हमारे द्वारा प्रदत्त सोमरस का पान करें॥१९॥
हे इन्द्रदेव ! आपके निमित्त गौ दुग्ध और जल मिश्रित सोमरस प्रस्तुत है, आप उसका पान करें॥२०॥
है इन्द्रदेव !जो साधक क्रोधित होकर सोमरस निकालता है, आप उसे ग्रहण न करें। उत्तम विधि से जो साधक सोमरस तैयार करता है, उसके यज्ञ में पहुँच कर सोमरस का पान करें॥२१॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारी पुकार को सुनकर तीनों सवनों में दूर देश से भी पधारें। आप पाँचों प्रकार के मनुष्यों (पितर, गन्धर्व, देवता, राक्षस तथा निषाद आदि) को लाँघकर भी हमारे समीप पधारें॥२२॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार सूर्य अपनी रश्मियों को प्रदान करता है, उसी प्रकार आप हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । जिस प्रकार जल की धारा नीचे की तरफ (सहज हीं) प्रवाहित होती है, उसी प्रकार हमारे स्तुति वचन आपके पास पहुँचें॥२३॥
हे अध्वयों ! किरीटधारी इन्द्रदेव के पीने के लिए कलश में सोमरस लेकर आप उन्हें यथाशीघ्र समर्पित करें॥२४॥
उन इन्द्रदेव ने जल के निमित्त बादलों को तितर-बितर किया, सरिताओं को प्रवाहित किया तथा गौओं के अन्दर परिपक्व दुग्ध स्थापित किया॥२५॥
समस्त साधनों में जिन इन्द्रदेव की सराहना की जाती हैं, उन्होंने वृत्र, और्णवाभ तथा अहीशुव (नामक राक्षसों अथवा घेर लेने वाले, ऊन जैसे तथा गतिशील बादलों ) को नष्ट किया । अर्बुद (राक्षस या जल युक्त मेघ को ) हिम (शीतलता) से वेध दिया॥२६॥
हे स्तुति करने वालो ! शक्तिशाली बलवान् तथा रिपुओं का विनाश करने वाले इन्द्रदेव के निमित्त देवताओं को हर्षित करने वाले स्तोत्रों का पाठ करो॥२७॥
हे इन्द्रदेव ! आप सोमरस से आनन्दित होकर देवताओं के अन्दर समस्त कर्मों के ज्ञान को जाग्रत् करते हैं॥८॥
एक साथ ही उत्साहित होने वाले स्वर्णिम बालों वाले वे दोनों अश्व, कल्याणकारी धन-धान्यों को हमारी ओर ले आएँ॥२९॥
अनेकों द्वारा स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! दोनों अश्विनीकुमारों और प्रियमेध के द्वारा आप प्रशंसित हैं । अतः सोमपान के निमित्त यज्ञस्थल के निकट आप पधारें॥३०॥

सूक्त-३३

हे वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ! जिस प्रकार जल नीचे की ओर प्रवाहित होता है, उसी प्रकार शोधित सोमरस सहित हम आपको झुककर नमन करते हैं। पवित्र यज्ञ में कुश के आसन पर एक साथ बैठकर याजकगण आपकी उपासना करते हैं॥१॥
सभी को निवास देने वाले है इन्द्रदेव ! सोमरस निकालकर याजकगण आपकी स्तुति करते हैं। सोमपान की इच्छा वाले आप, वृषभ जैसा नाद करते हुए कब हमारे यहाँ पधारेंगे?॥२॥
धनवान् , ज्ञानी, हे इन्द्रदेव ! शत्रुनाशक, सुवर्ण कान्तियुक्त, गौ के समान पवित्र धन, हम आपके पास से पाने के इच्छुक हैं । हे शूरवीर इन्द्रदेव ! कण्ववंशियों (मेधावी पुरुषों) द्वारा स्तुति किए जाने के बाद आप उन्हें हजारों प्रकार के बल तथा ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥३॥
हे मेधातिथे ! जो इन्द्रदेव रथ में दो अच्चों को जोड़ते हैं, वज्रधारी हैं, रमणीय हैं, सुवर्णरथ में विराजमान हैं, ऐसे इन्द्रदेव को सोमपान से आनन्दित करके अपनी गौओं की रक्षा करें॥४॥
जिनके दायें-बायें हाथ श्रेष्ठ हैं, जिनसे वे सत्कर्म करते हैं, जो हजारों गुणों से सम्पन्न हैं, जो सैकड़ों ऐश्वर्यो से युक्त हैं, जो शत्रुओं के दुर्गों को ध्वस्त करते हैं और जो यज्ञों में पधारते हैं, उन इन्द्रदेव की हम प्रार्थना करते हैं॥५॥
जो इन्द्रदेव शत्रुओं द्वारा कभी पराजित न होकर उनके बीच में प्रवेश करके उनका संहार करते हैं, वे प्रचुर ऐश्वर्य सम्पन्न तथा अनेकों द्वारा स्तुत्य हैं । अपने कर्म में प्रयत्नशील यजमान के लिए वे गौ के समान हैं॥६॥
सोमयज्ञ में एक ही स्थान पर विद्यमान होकर सोमपान करने वाले अत्यधिक वैभव सम्पन्न इन्द्रदेव को कौन नहीं जानता ? सोमपान से प्रमुदित, शिरस्त्राण धारण किये हुए इन्द्रदेव अपनी शक्ति से विरोधियों के नगरों को विनष्ट कर देते हैं॥७॥
अपने ओज से विचरण करने वाले हमारे लिए सम्माननीय है इन्द्रदेव ! आप इस सोमयज्ञ में पधारें । शत्रु की खोज में घूमने वाले, मतवाले हाथी के समान रथ द्वारा यज्ञ में जाने से आपको कोई रोक नहीं सकता॥८॥
जो शस्त्रों से सुसज्जित युद्धभूमि में स्थिर रहने वाले हैं, ऐसे अपराजेय, पराक्रमी वैभवशाली इन्द्रदेव हमारी स्तुतियों को सुनकर, दूसरे स्थान पर न जाकर इस यज्ञ में ही उपस्थित हो॥९॥
हे वीर इन्द्रदेव ! दूर और पास के देशों में सर्वत्र, शक्तिशाली रूप में आपकी ख्याति फैल रही है । हे इन्द्रदेव ! आप निश्चित ही बलशाली हैं। सोमयज्ञ करने वाले हम याजकों के आवाहन पर आकर आप हमारा संरक्षण करें॥१०॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपका स्वर्णिम चाबुक, रास, रथ तथा दोनों अश्व अत्यन्त बलशाली तथा सामर्थ्यवान् हैं । हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! आप भी अत्यन्त शक्ति-सम्पन्न हैं॥११॥
सोम अभिषव करने वाले शक्तिशाली मनुष्य सोमरस निचोड़ें । हे सोमपान करने वाले इन्द्रदेव ! आप हमें प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करें । आपके निमित्त पानी में संस्कारित सोम को मिश्रित करने वाले सोमरस प्रस्तुत करते हैं॥१२॥
हे शक्ति-सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप मधुर सोमरस को पीने हेतु पधारें । आप महान् कार्य करने वाले हैं। हमारे द्वारा उच्चारित ज्ञानयुक्त स्तोत्रों का आप भली प्रकार श्रवण करें॥१३॥
वृत्र का संहार करने वाले हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! रथ में नियोजित आपके अश्व, दूसरों द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले यज्ञों को छोड़कर हमारे इस श्रेष्ठ यज्ञ में आपको ले आएँ॥१४॥
हे महान् इन्द्रदेव ! आप हमारे द्वारा की गई स्तुतियों को समीप पधारकर ग्रहण करें (सुनें ) । आप अत्यधिक सोमपान करने वाले हैं। आपको हर्षित करने के लिये सुखदायी सोमरस प्रस्तुत हैं॥१५॥
ओजस्वी इन्द्रदेव हमारे नायक हैं । वे हमारे, आपके या किसी अन्य के अधीन रहना पसन्द नहीं करते॥१६॥
इन्द्रदेव का भी कथन यहीं था कि स्त्रियों के मन पर अधिकार करना बड़ा ही दुष्कर कार्य है; क्योंकि उनका संकल्प अदम्य होता है॥१७॥
इन्द्रदेव के दो मतवाले अश्व उनके रथ में एक साथ नियोजित होकर उन्हें ले जाते हैं। उनके रथ की धुरी अति उत्तम है॥१८॥
(शापवश स्त्री बने हुए प्रायोगि से इन्द्रदेव ने कहा) अब तुम नीचे की ओर दृष्टि रखो, ऊपर की ओर नहीं । पैरों को पास-पास रखकर (छोटे कदमों से) चलो। तुम्हारे दोनों अंग-मुख एवं पिण्डलियाँ दिखाई न दें (वस्त्र से ढकी रहें), तुम ज्ञानी होकर भी (शाप वश) स्त्री बने हो॥१९॥

सूक्त-३४

हे तेजस्वी इन्द्रदेव ! आप अश्वारूढ़ होकर कण्व ऋषि की श्रेष्ठ स्तुतियों के श्रवण हेतु पधारें । द्युलोक में शासन करने वाले आप (हमारा अभीष्ट साधन करके) पुनः वहीं के लिए प्रस्थान करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! (इस यज्ञ में) सोम कूटने वाला पाषाण शब्द करते हुए आपको (सोम) प्रदान करे । द्युलोक में वास एवं शासन करने वाले है इन्द्रदेव ! पुन: आप अपने लोक को जाएँ॥२॥
यहाँ (यज्ञ में) यह (मावा पत्थर)सोमलता को (उसी प्रकार)कॅपाती हैं, जैसे भेड़िया भेड़ को । हे द्युलोक के वासी एवं शासक इन्द्रदेव ! आप देव लोक को प्रस्थान करें॥३॥
दिव्यलोक में निवास करने वाले हे इन्द्रदेव ! हम कण्ववंशीय ऋषि अपनी सुरक्षा और अन्न प्राप्त करने के लिए आपको आहूत करते हैं। इसके बाद दिव्यलोक में शासन करने के निमित्त आप पुन: द्युलोक में जाएँ॥४॥
हे दिव्यलोक में निवास करने वाले इन्द्रदेव ! जिस प्रकार वायु को सबसे पहले संस्कारित सोम प्रदान किया जाता है, उसी प्रकार हम आपको सोमरस प्रदान करते हैं। आप द्युलोक के शासक हैं, इसलिये पुन: द्युलोक को प्रस्थान करें॥५॥
हे दिव्यलोक के वासी इन्द्रदेव ! आप हमारी बुद्धि के संरक्षण तथा यश-विस्तार के लिए पधारें । आप द्युलोक के शासक हैं, इसलिए पुन: द्युलोक में वापस जाएँ॥६॥
हे श्रेष्ठ बुद्धिवाले तथा धुलोक में निवास करने वाले इन्द्रदेव ! आप सहस्रों रक्षण-साधनों वाले और प्रचुर ऐश्वर्य वाले हैं। आप हमारे पास पधारें और द्युलोक के शासक होने के कारण पुनः द्युलोक में वापस जाएँ॥७॥
हे द्युलोकवासी इन्द्रदेव ! देवताओं द्वारा प्रशंसित और मनुष्यों के हितैषी अग्निदेव, आपको हमारे समीप ले आएँ। आप द्युलोक के शासक हैं, इसलिए पुन: द्युलोक में वापस जाएँ ॥८॥
हे द्युलोक वासी इन्द्रदेव ! जिस प्रकार बाज़ पक्षी के पंख उसको वहन करते हैं, उसी प्रकार आपके मतवाले घोड़े आपको वहन करके ले आएँ । हे इन्द्रदेव ! आप द्युलोक के शासक हैं, इसलिए आप पुन: द्युलोक में वापस जाएँ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा प्रदान किये गये सोमरस को पीने के निमित्त आप पधारें । हे द्युलोकवासी इन्द्रदेव ! आप दिव्यलोक को नियन्त्रित करने वाले हैं, इसलिए आप पुनः वापस द्युलोक जाएँ॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारी स्तुतियों को श्रवण करके हमारे इस यज्ञ के समीप पधारें और हमें हर्षित करें । हे द्युलोक निवासी इन्द्रदेव ! आप द्युलोक को नियन्त्रित करने वाले हैं, इसलिए आप पुन: वापस द्युलोक जाएँ॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आपके घोड़े अत्यन्त बलवान् हैं। आप समान आकृति वाले अश्वों द्वारा हमारे समीप पधार । हे द्युलोक निवासी इन्द्रदेव ! आप द्युलोक को नियन्त्रित करने वाले हैं, इसलिए पुनः वापस द्युलोक जाएँ॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आप पर्वतों तथा आकाश से पधारें । हे द्युलोक निवासी इन्द्रदेव ! आप द्युलोक को नियन्त्रित करने वाले हैं, इसलिए पुनः द्युलोक वापस जाएँ॥१३॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप हमें सहस्रों गौओं और अश्वों को प्रदान करें । हे द्युलोक निवासी इन्द्रदेव ! आप द्युलोक को नियन्त्रित करने वाले हैं, इसलिए पुन: द्युलोक वापस जाएँ॥१४॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें सैकड़ों-हजारों की संख्या में ऐश्वर्य प्रदान करें । हे द्युलोकवासी इन्द्रदेव ! आप द्युलोक को नियन्त्रित करने वाले हैं, इसलिए पुनः द्युलोक वापस जाएँ॥१५॥
धनों से समृद्ध होकर हम और आप, इन्द्रदेव द्वारा प्रदान किये गये हजारों की संख्या में बलिष्ठ अश्व आदि पशुओं को ग्रहण करें॥१६॥
वायु के सदृश गति वाले तथा आसानी से गमन करने वाले इन्द्रदेव के रथ में नियोजित घोड़े सूर्यदेव की तरह आलोकित हो रहे हैं॥१७॥
पारावत (तत्त्वज्ञ ऋषि) द्वारा प्रदत्त ऐश्वर्य तथा द्रुतगामी अश्वों से युक्त रथ में विराजमान होकर हम (तपो) वन के मध्य पहुँच गये (ऐसा वसुरोचिष् ने बार-बार कहा )॥१८॥

सूक्त-३५

हे अश्विनीकुमारो ! इन्द्र, वरुण, अग्नि, विष्णु, आदित्यगण, वसु, रुद्र, उषा तथा सूर्यदेव के सहित आप दोनों सोमरस का पान करें॥१॥
हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो ! समस्त जीवधारियों, द्युलोक, भूलोक, उषा, सूर्य तथा श्रेष्ठ बुद्धि से सम्पन्न हाकर आप सोमरस का पान करें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! सम्पूर्ण तैतीस देवताओं, भृगुआ, मरुतो, जल, उषा तथा सूर्यदेव के साथ मिलकर आप दोनों सोमरस का पान करें॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमारी स्तुतियों पर ध्यान दें और हमारे यज्ञ का सेवन करें । आप दोनों, तीनों सवना के समय पधारे । उसके बाद आप देवी उषा और सूर्यदेव के साथ विराजमान होकर हमें अन्न प्रदान करें॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार युवतियों के स्वयंवर हेतु आने वाले आमन्त्रण को युवक स्वीकार करते हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियों को आप स्वीकार करें । आप हमारे सम्पूर्ण (तीनों ) सवनों में पधारें और सूर्यदेव के साथ विराजमान होकर हमें अन्न प्रदान करें॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे स्तुतिवचनों को ग्रहण करें और श्रेष्ठ यज्ञों का सेवन करें। आप दोनों, समस्त (तीनों) सवनों में यहाँ पधारे और प्रात: सूर्योदयकाल में हमें अन्न प्रदान करें॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार प्यास से व्याकुल होकर पक्षी और पशु पानी के पास जाते हैं, उसी प्रकार तैयार किये हुए सोमरस के पास आप दोनों पधारें आप देवी उषा तथा सूर्यदेव के साथ हमारे यज्ञस्थल पर पधारें॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप हंस के सदृश तेज-सम्पन्न हैं। जिस प्रकार प्यास से व्याकुल होकर पथिक तथा पशु-पक्षी जल के पास जाते हैं, उसी प्रकार आप दोनों तैयार किये हुए सोमरस के पास पधारें। आप उषाकाल तथा सूर्योदय के समय हमारे घर पर तीनों सवनों में पधारें॥८॥
हे अश्विनीकुमारो ! अन्न प्रदान करने के लिए आप बाज़ पक्षी की तरह द्रुतगति से पधारें । जल के समीप जाते हुए प्यासे पशु-पक्षी के समान आप सोमरस पीने के लिए पधारें । आप उषाकाल और सूर्योदय के समय हमारे घर में तीनों बार पधारें॥९॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप सोमपान करके तृप्त हों और हमें संतान एवं ऐश्वर्य प्रदान करें । आप देवी उषा तथा सूर्यदेव के साथ विद्यमान रहकर हमें महान् सामर्थ्य प्रदान करें॥१०॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप रिपुओं पर विजय प्राप्त करें । हमारे द्वारा प्रशंसित होकर हमारी रक्षा करें । हमें संतान और ऐश्वर्य प्रदान करें । आप उषाकाल और सूर्योदय के समय विद्यमान होकर हमें सामर्थ्य प्रदान करें॥११॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप शत्रुओं का विनाश करें और हमसे मित्रता करके हमें सन्तति तथा ऐश्वर्य प्रदान करें । आप उषाकाल तथा सूर्योदय के समय विद्यमान रहकर हमें शक्ति प्रदान करें॥१२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप मित्र, वरुण तथा धर्मशील मरुतों के साथ स्तुति करने वालों के आवाहन को सुनकर पधारते हैं । आप देवी उषा, सूर्यदेव तथा अदिति पुत्रों के साथ विद्यमान रहकर गमन करें॥१३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप स्तोताओं के आवाहन को सुनकर विष्णु, मरुद्गण तथा अंगिरस के साथ पधारते हैं। आप देवी उषा, सूर्यदेव और अदिति पुत्रों के साथ विद्यमान रहकर प्रस्थान करें॥१४॥
अन्न से सामर्थ्यवान् हे अश्विनीकुमारो ! स्तोताओं के आवाहन को सुनकर आप ऋभुओं, आदित्यों तथा मरुतों के साथ पधारते हैं। आप देवी उषा तथा सूर्यदेव के साथ प्रस्थान करें॥१५॥
हे अश्विनीकुमारो !आप असुरों का संहार करें और रोग के कीटाणुओं को भगायें । आप मनुष्यों के ज्ञान और कर्म को नियन्त्रित रखें । आप देवी उषा और सूर्यदेव के साथ सोमयाग में पधारकर सोमरस का पान करें॥१६॥
हे अश्विनीकुमारो !आप असुरों का विनाश करें और रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करके, योद्धाओं को तथा उनके पराक्रम को नियन्त्रित करें । आप देवी उषा तथा सूर्यदेव के साथ सोमयाग में पधारकर सोमपान करें॥१७॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप असुरों का संहार करें और रोगों को नष्ट करके गौओं तथा सन्तानों को बलिष्ठ बनायें । आप दोनों, देवी उषा और सूर्यदेव के साथ पधारकर अभिषुत सोमरस का पान करें॥१८॥
रिपुओं के मद को चूर करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार आपने ‘अत्रि की प्रार्थना को सुना था, उसी प्रकार सोम अभिषव करते हुए मुझ 'श्यावाश्व' ऋषि की प्रार्थना को सुनें । देवी उषा और सूर्यदेव के साथ आकर आप दोनों अभिषुत सोमरस का पान करें॥१९॥
रिपुओं के घमण्डे को चूर करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! सोम अभिषव करते हुए मुझ 'श्यावाश्व' ऋषि की प्रार्थनाओं को निकट पधारकर स्वीकार करें। देवी उषा और सूर्यदेव के संग पधारकर आप दोनों अभिषुत सोमरस का पान करें॥२०॥
रिपुओं के घमण्ड को नष्ट करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! सोम अभिषव करने वाले मुझ ‘श्यावाश्व' श्रेष के यज्ञों में लगाम (नियंत्रक) की भाँति आयें । देवीं उषा और सूर्यदेव के साथ उपस्थित होकरआप दोनों अभिषुत सोमरस का पान करें॥२१॥
हे अश्विनीकुमारो ! अपनी सुरक्षा के निमित्त हम आपका आवाहन करते हैं, आप पधारें । आप अपने रथ को हमारे पास लायें और मधुर सोमरस का पान करके हमें रत्न प्रदान करें॥२२॥
हे अश्विनीकुमारो ! अपनी सुरक्षा के निमित्त हम आपको आहूत करते हैं, आप निश्चित रूप से पधारें । हमारे श्रेष्ठ यज्ञ में किये गये अभिवादन-पूजन को ग्रहण करके, सोमपान के निमित्त पधारें और मुझ दानी को रत्न-धन प्रदान करें॥२३॥
हे अश्विनीकुमारो ! अपने संरक्षण के लिए हम आपको आहूत करते हैं। अत: आप निश्चित रूप से पधारें। हमारे द्वारा अभिषुत सोम की हवियों को ग्रहण करके संतुष्ट हों और हमें रत्न-धन प्रदान करें॥२४॥

सूक्त-३६

हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! सोम अभिषुत करने वालों तथा कुश को आसन बिछाने वाले याजकों को आप संरक्षण प्रदान करते हैं । आप सत्पुरुषों को पालन करने वाले और समस्त रिपुओं को पराजित करने वाले हैं। देवताओं द्वारा निर्धारित किये गये सोम के अंश को आप मरुतों के साथ पान करके हर्षित हों॥१॥
हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! आप महान् वैभव से सम्पन्न हैं । आप स्तोताओं को संरक्षण प्रदान करें। आप समस्त रिप-सेनाओं पर विजय प्राप्त करने वाले तथा फैले हुए जल को नियन्त्रित करने वाले हैं। देवताओं द्वारा निर्धारित किये गये सोम के अंश को आप मरुतों के साथ मिलकर पान करें और हर्षित हों । यह सोमरस आपके लिए सुखकारक हो॥२॥
हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! आप अपनी ओजस्विता और शक्ति के द्वारा देवताओं को संरक्षित करते हैं । आप समस्त रिपु सेनाओं को पराजित करने वाले तथा सर्वत्र फैले हुए जल को नियन्त्रित करने वाले हैं। हे इन्द्रदेव ! देवताओं द्वारा निर्धारित किये गये सोमरस के भाग को आप मरुतों के साथ मिलकर, हर्षित होने के लिए पान करें । यह सोम आपके लिए सुखकारक हो॥३॥
हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! आप द्यु और भूलोक को उत्पन्न करने वाले हैं। आप समस्त रिपु सेनाओं को पराजित करने वाले और सर्वत्र फैले हुए जल (रस) को नियन्त्रित करने वाले हैं। देवताओं द्वारा निर्धारित किये गये सोमरस के भाग को आप मरुतों के साथ मिलकर पान करें और हर्षित हों । यह सोमरस आपके लिए सुखकारक हो॥४॥
हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! आप गौओं और अश्वों को उत्पन्न करने वाले हैं । आप समस्त रिपु सेनाओं को पराजिन करने वाले तथा सर्वत्र फैले हुए जल को नियन्त्रित करने वाले हैं। देवताओं द्वारा निर्धारित किये गये सोमरस के भाग को आप मरुतों के साथ मिलकर हर्षित होने के लिए पान करें॥५॥
आयुधधारी शतक्रतो हे इन्द्रदेव ! आप 'अत्रि' वंशियों की स्तुतियों का श्रवण करें। आप रिओ की समग्न सेनाओं को परास्त करने वाले तथा सर्वत्र फैले हुए जल को नियन्त्रित करने वाले हैं। हे सत्पुरुषों के पालक इन्द्रदेव ! देवताओं के द्वारा निर्धारित किये गये सोमरस के भाग को आय मरुतों के साथ मिलकर, हर्षित होने के लिए पान करें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार आपने यज्ञ कृत्य करने वाले 'अत्रि ऋषि की स्तुतियों का श्रवण किया था, उसी प्रकार सोम अभिषव करने वाले मुझ 'श्यावाश्व' ऋषि की स्तुतियों का भी श्रवण करें । हे इन्द्रदेव ! रणक्षेत्र में आपने ब्रह्मज्ञान को समृद्ध करते हुए ‘त्रसदस्यु' को अकेले ही रक्षित किया॥७॥

सूक्त-३७

बलों के स्वामी हे इन्द्रदेव ! आपने अपने समस्त रक्षण-साधनों के द्वारा इस स्तोता तथा सोम यज्ञ करने वाले याज़क को रक्षित किया। निन्दारहित, वज्रधारी तथा वृत्र का हनन करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप माध्यन्दिन सवन में पधारकर सोमपान करें॥१॥
बलों के स्वामी तथा वज्रधारी हे इन्द्रदेव ! आप अत्यन्त वीर हैं और निन्दारहित होकर वृत्र को मारने वाले हैं। आप अपने समस्त रक्षण-साधनों के द्वारा रिपु सेनाओं को परास्त करके, माध्यन्दिन सवन में पधार कर सोमरस का पान करें॥२॥
बलों के स्वामी तथा वज्रधारी हे इन्द्रदेव ! आप इस लोक के एकमात्र सम्राट् के रूप में अलंकृत होते हैं । निन्दारहित और वृत्र का विनाश करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप अपने समस्त रक्षण-साधनों से सम्पन्न होकर माध्यन्दिन सवन में पधारकर सोमरस का पान करें॥३॥
बलों के स्वामी और वज्र धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! भली प्रकार संगठित हुई रिपु-सेनाओं को आप अकेले ही तितर-बितर कर देते हैं। निन्दारहित और वृत्रहन्ता हे इन्द्रदेव ! आप अपने समस्त रक्षण-साधनों से सम्पन्न होकर, माध्यन्दिन सवन में पधारकर सोमरस का पान करें॥४॥
बलों के स्वामी और वृत्र का हनन करने वाले हे इन्द्रदेव ! उपलब्ध होने वाले और न उपलब्ध होने वाले समस्त ऐश्वर्यों के आप स्वामी हैं । निन्दारहित और वज्रधारी हे इन्द्रदेव ! आप अपने समस्त रक्षण-साधनों से सम्पन्न होकर माध्यन्दिन सवन में पधारकर सोमरस का पान करें॥५॥
बलों के स्वामी और वृत्र का हनन करने वाले हे इन्द्रदेव ! अपनी सामर्थ्य के द्वारा आप सम्पूर्ण विश्व को रक्षित करते हैं, स्वयं भी पूर्ण सुरक्षित हैं। निन्दारहित और वज्रधारी हे इन्द्रदेव ! आप अपने समस्त रक्षण- साधनों से सम्पन्न होकर माध्यन्दिन सवन में पधारकर सोमरस का पान करें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार यज्ञ-अनुष्ठान करने वाले ‘अत्रि ऋषि की स्तुतियों का आपने श्रवण किया था, उसी प्रकार स्मरण करने वाले 'श्यावाश्व' ऋषि की स्तुतियों का भी श्रवण करें । हे इन्द्रदेव ! आपने रणक्षेत्र में क्षात्रधर्म को समृद्ध करते हुए 'त्रसदस्यु' को अकेले ही सुरक्षित किया था॥७॥

सूक्त-३८

हे इन्द्राग्ने ! आप ही यज्ञ के ऋत्विज् हैं । आप हमारी अभिलाषा को समझें तथा पवित्र यज्ञीय कर्मों में पधारें॥१॥
हे इन्द्राग्नि देव ! शत्रुओं का हनन करने वाले, रथ से यात्रा करने वाले, घेरा डालने वाले, दुष्टों का संहार करने वाले और कभी परास्त न होने वाले, आप हमारी स्तुति को स्वीकार करें॥२॥
हे इन्द्राग्ने ! ऋत्विजों ने आपके लिए आनन्दप्रद, मधुर सोमरस तैयार किया है । इसके लिए हमारी प्रार्थना स्वीकार करें॥३॥
हे इन्द्राग्ने ! आपकी एक साथ प्रार्थना की जाती है। हमारी आकांक्षाओं को पूर्ण करने के निमित्त आप हमारे यज्ञ में पधारें और अभिषुत सोमरस का पान करें॥४॥
हे इन्द्राग्ने ! जिस शक्ति से आप आहुतियों को ग्रहण करते हैं, हमारे इस यज्ञ में पधारकर, उसी शक्ति से इसका सेवन करें॥५॥
हे इन्द्राग्ने ! हमारी गायत्री छन्दसे बनी स्तुतियों का आप श्रवण करें और हमारे समीप पधारें॥६॥
हे इन्द्राग्ने ! आप रिपुओं की सम्पत्ति पर विजय प्राप्त करते हैं । उषा काल के समय पधारने वाले देवताओं के साथ आप, सौमपान के निमित्त पधारें॥७॥
हे इन्द्राग्ने ! आप सोम अभिषव करने वाले ‘अत्रि' वंशीय ऋषियों और मुझ ‘श्यावाश्व' ऋषि की प्रार्थना को सुने तथा सोमपान के निमित्त पधारें॥८॥
हे इन्द्राग्ने ! जिस प्रकार आत्मज्ञानियों ने सोमपान के निमित्त आपको आहूत किया था, उसी प्रकार अपनी सुरक्षा के लिए हम आपका आवाहन करते हैं॥९॥
जिन इन्द्रदेव और अग्निदेव के लिए गायत्री छन्दवाले स्तोत्र उच्चारित किये जाते हैं, उनके द्वारा संरक्षित होने की हम सब कामना करते हैं॥१०॥

सूक्त-३९

अपने यज्ञ के निमित्त हम ऋक्मन्त्रों द्वारा पूजने योग्य अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं। हमारे द्वारा प्रदत्त आहुतियों से वे देवताओं को आलोकित करें । क्रान्तदर्शी अग्निदेव मनुष्य और देवों के मध्य में संदेशवाहक का कार्य करते हुए गमन करते हैं, जिसके कारण हमारे समस्त रिपु नष्ट हो जाते हैं॥१॥
हे अग्ने ! हमारे शरीर में विद्यमान (रोग रूपी) रिपुओं को और हविप्रदाता के रिपुओं को आप अपने नवीन आयुधों द्वारा नष्ट करें । (साथ ही) समस्त मूढ़ और दुष्ट-दुराचारी शत्रुओं का विनाश करें॥२॥
हे अग्ने ! हम आपके मुख में हर्ष प्रदायक घृत की आहुतियाँ प्रदान करते हुए मननीय स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं, इन्हें ग्रहण करें। आप अत्यन्त प्राचीन, हितकारी, सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के स्वामी तथा देवताओं के सन्देशवाहक हैं। आप हमारे सम्पूर्ण रिपुओं का विनाश करें॥३॥
स्तोतागण, जिस प्रकार के अन्न की इच्छा करते हैं, अग्निदेव उन्हें वैसा ही अन्न प्रदान करते हैं । स्तुतियों द्वारा बुलाये जाने वाले अग्निदेव, याजकों को हितकारी सुख और रोगनिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। यज्ञों में सभी देवों के साथ आवाहन किये जाने वाले अग्निदेव, हमारे रिपुओं का विनाश करें॥४॥
अग्निदेव अपनी सामर्थ्य और कार्यों की विचित्रता से पहचाने जाते हैं। वे यज्ञों में विद्यमान रहने वाले और देवताओं का आवाहन करने वाले हैं । वे अपनी सम्पूर्ण शक्ति से सम्पन्न होकर चढ़ाई करने के निमित्त रिपुओं तक पहुँचते हैं और उनका विनाश करते हैं॥५॥
वे अग्निदेव मनुष्य जीवन के रहस्यों और देवताओं के रहस्यों को जानते हैं । वे नवीन अन्नों की आहुतियों को ग्रहण करके समस्त ऐश्वर्यों को प्रदान करते हैं तथा सम्पूर्ण रिपुओं का विनाश करते हैं। वे बुलाये जाने के बाद सम्पूर्ण सम्पत्ति का द्वार खोल देते हैं॥६॥
वे अग्निदेव देवताओं के बीच में वास करते हैं और यज्ञ-कृत्य करने वालों के बीच में यज्ञाग्नि के रूप में प्रकट होते हैं। जिस प्रकार पृथ्वी, जगत् को पोषण प्रदान करती है, उसी प्रकार अग्निदेव सम्पूर्ण कार्यों को पुष्ट करते हैं । वे महान् गुणों से सम्पन्न होने के कारण पूजनीय हैं। वे हमारे समस्त रिपुओं का संहार करें॥७॥
वे अग्निदेव सातों द्वीपों, सरिताओं और सभी मनुष्यों में व्याप्त रहते हैं। तीनों (द्यु, अन्तरिक्ष और पृथ्वी) स्थानों में विद्यमान रहने वाले अग्निदेव विद्वान् पुरुषों की रक्षा करते हैं । महान् तथा दुष्ट लोगों के संहारक अग्निदेव को हम यज्ञों में वरण करते हैं, क्योंकि वे हमारे सम्पूर्ण रिपुओं का विनाश करते हैं॥८॥
क्रान्तदर्शी अग्निदेव तीनों स्थानों ( पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक ) में निवास करते हैं। वे देवताओं के संदेशवाहक हैं । वे पवित्र होकर देवताओं तक आहुतियाँ पहुँचाते हैं और हमें भी तुष्ट करते हैं। वे हमारे सम्पूर्ण रिपुओं का संहार करते हैं॥९॥
हे पुरातन अग्ने ! आप देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं और मनुष्यों के स्वामी हैं । सर्वत्र प्रवाहित होने वाली जल धाराएँ आपकी तरफ गमन करती हैं। आप हमारे सम्पूर्ण रिपुओं का संहार करें॥१०॥

सूक्त-४०

हे इन्द्राग्ने ! आप हमें श्रेष्ठ सम्पत्ति प्रदान करें । जैसे अग्नि और वायु दोनों मिलकर वनों को भस्म कर देते हैं, उसी प्रकार हम उस सम्पत्ति के द्वारा बलिष्ठ रिपु-सेनाओं का विनाश करें॥१॥
नायकों में सर्वश्रेष्ठ, शक्तिशाली हे इन्द्राग्ने !हम, आप दोनों की उपेक्षा नहीं, उपासना करते हैं । आष अन्न आदि वैभव प्रदान करने के लिए अपने अश्वों द्वारा हमारे यज्ञों में कब पधार रहे हैं? हमारे रिषु स्वयं नष्ट हो जाएँ॥२॥
हे श्रेष्ठ नायक इन्द्राग्ने ! आप अपनी विद्वत्ता के कारण सबके लिए वरणीय हैं । मित्रता के इच्छुक अपने भक्तों द्वारा किये गए कर्मों को आप स्वीकार करें। आप रणक्षेत्र के बीच में विद्यमान रहते हैं, जिससे हमारे अन्य रिपु अपने आप नष्ट हो जाते हैं॥३॥
उन दोनों (इन्द्राग्नि) में समस्त जगत् , धरती और आकाश विद्यमान हैं तथा वे ऐश्वर्य धारण करते हैं । हे याजको ! 'नाभाक' ऋषि के सदृश आप भी उन इन्द्राग्नि का यज्ञ और स्तोत्रों द्वारा पूजन करें। उनके प्रभाव से हमारे सभी शत्रु नष्ट हो जाएँ॥४॥
साधकगण 'नाभाक' ऋषि के सदृश इन्द्र और अग्निदेव की स्तुति करते हैं। वे जल के सप्तमूल अर्थात् सप्त महासागरों को अपने बल से आच्छादित करने वाले तथा जल-धाराओं को प्रवाहित करने वाले हैं। वे इन्द्रदेव अपने ओज के द्वारा समस्त जगत् को नियन्त्रित करने वाले ईश्वर हैं। (उनकी कृपा से) सभी शत्रु नष्ट हों॥५॥
हे इन्द्रदेव ! प्राचीन काल की तरह आप रिपुओं को पौधों की अवाञ्छित टहनियों की भाँति काट दें। आप दस्युओं के ओज को विनष्ट करें । आपके सहयोग से असुरों द्वारा संगृहीत ऐश्वर्य हमको प्राप्त हो तथा हमारे अन्य रिपु अपने आप नष्ट हो जाएँ॥६॥
जो मनुष्य अपने धन और प्रार्थनाओं के द्वारा इन्द्राग्निदेव को आवाहित करते हैं, उनके साथ हम अपने पराक्रमी योद्धाओं की सहायता से रिपु-सेनाओं को पराजित करते हैं। जो व्यक्ति हमसे प्रेम करते हैं, हम भी उनके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें (और) हमारे अन्य रिपु विनष्ट हो जाएँ॥७॥
वे इन्द्रदेव और अग्निदेव सतोगुण सम्पन्न हैं । वे अपने आलोक के द्वारा द्युलोक में सब जगह गमन करते हैं । उन्होंने सरिताओं को बन्धनमुक्त करके प्रवाहित किया। उनके कृत्यों के अनुसार याजकगण आचरण करते हैं । वे देव हमारे अन्य रिपुओं का विनाश करें॥८॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! अपने वीरतापूर्ण कार्यों से प्रसन्न करने वाले योद्धाओं को आप ऐश्वर्य प्रदान करें। आपके अनेकों नाम और अनेकों स्तोत्र हैं। उन स्तुतियों ने हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ बनाया है, आप हमारे समस्त रिपुओं का संहार करें॥९॥
तेज-सम्पन्न इन्द्रदेव ने अपने ओज के द्वारा ‘शुष्ण' नामक राक्षस के पुत्रों का संहार किया। उन्होंने ध्वनि करने वाली सरिताओं को नियन्त्रित किया । शक्तिशाली तथा मन्त्रों द्वारा प्रार्थनीय उन इन्द्रदेव को स्तुतियों द्वारा समृद्ध करें, जिससे वे समस्त रिपुओं का संहार करें॥१०॥
हे स्तोताओं ! जो सर्वत्र गमन करते हैं और शुष्ण' नामक राक्षस के पुत्रों का संहार करते हैं तथा जो हर्ष प्रदायक जल-प्रवाहों को नियंत्रित करते हैं; उन श्रेष्ठ मार्गदर्शक, अविनाशी तथा प्रार्थनीय इन्द्रदेव को आप समृद्ध करें, जिससे वे समस्त रिपुओं का संहार कर सकें॥११॥
हमने अपने पिता ‘मान्धाता' और 'अंगिरा' ऋषि के सदृश ही अग्नि और इन्द्रदेव के लिए अभिनव स्तुतियाँ की हैं । वे हमें तीन पर्वो वाला (तीन प्रकार सर्दी - गर्मी - बरसात से सुरक्षित) आवास प्रदान करें और हमें ऐश्वर्य सम्पन्न बनाएँ॥१२॥


सूक्त-४१

हे स्तोताओ ! वरुणदेव, मनुष्यों के समस्त पशुओं को, गौओं के सदृश ही रक्षित करते हैं। ऐश्वर्यवान् वरुणदेव तथा ज्ञानी मरुद्गण की आप उपासना करें। वे हमारे समस्त रिपुओं का विनाश करें॥१॥
हम अपने श्रेष्ठ स्तोत्रों से वरुणदेव की स्तुति करते हैं, पितरों की स्तुति करते हैं। ‘नाभाक' षि के स्तोत्रों के द्वारा, सात सरिताओं से समृद्ध सप्तमहासागरों की स्तुति करते हैं । वे हमारे समस्त रिपुओं का संहार करें॥२॥
दर्शनीय और अत्यन्त त्यागी वरुणदेव अपने कर्म-कौशल के द्वारा समस्त संसार को विनिर्मित करते हैं। वे रात्रियों को मिलाकर रखते हैं। वृद्धि की कामना वाले व्यक्ति उन (वरुण देव) को तीनों उषाओं में संवर्धित करते हैं । वे हमारे समस्त रिपुओं का विनाश करें॥३॥
जिन दर्शनीय वरुणदेव ने पृथ्वी पर समस्त दिशाओं की स्थापना की, वही सबके स्वामी भी हैं। उनका उच्च स्थान पहले से निर्धारित है । वे ग्वाले के समान सबकी सुरक्षा करते हैं। वे हमारे समस्त रिपुओं का विनाश करें॥४॥
वरुणदेव, समस्त लोकों को धारण करने वाले और किरणों के गुह्य नामों को जानने वाले हैं। वे ही द्युलोक के समान कवियों (दूरदर्शियों) के ज्ञान को पुष्ट करते हैं। वे हमारे समस्त रिपुओं का विनाश करें॥५॥
चक्र की नाभि के समान जिन वरुणदेव में समस्त सद्ज्ञान आश्रित हैं, तीनों भुवनों में व्याप्त होने वाले उन देव की सभी लोग प्रार्थना करें । जिस प्रकार गौएँ गोष्ठ में प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार रिपुओं को पराजित करने के लिए रथों में घोड़ों को नियोजित करके वे रणक्षेत्र में जाते हैं । वे समस्त रिपुओं का विनाश करते हैं॥६॥
जो वरुणदेव समस्त पदार्थों को छत्र के सदृश ढक कर रहते हैं, जो समस्त देवताओं के बल को समृद्ध करते हैं; सभी देवता उनके कृत्यों का अनुपालन करते हैं। वे हमारे समस्त रिपुओं का विनाश करें॥७॥
समुद्रों के स्वामी वरुणदेव, सूर्य की भाँति आकाश में आरूढ़ होकर सभी दिशाओं में कर्मरत होते हैं। वे सभी मनुष्यों को दान देते हैं। वे राक्षसों की माया को अपने दिव्य प्रकाश से नष्ट कर देते हैं। हमारे समस्त रिपु नष्ट हों॥८॥
अन्तरिक्ष में विद्यमान रहने वाले जिन वरुणदेव ने अपने उज्ज्वल तेज के द्वारा तीनों लोकों का विस्तार किया, उनका स्थान अविचल है। वे (जल के) सातों (स्रोतों ) को नियंत्रित करते हैं। वे हमारे समस्त रिषुओं का विनाश करें॥९॥
जिन वरुणदेव ने अपने व्रत के अनुसार अपनी किरणों को दिन में सफेद और रात में काली बनाया तथा जिनने अन्तरिक्ष और पृथ्वीलोक को उसी प्रकार धारण किया, जैसे आदित्य द्युलोक को धारण करते हैं, वे हमारे समस्त रिपुओं का विनाश करें॥१०॥

सूक्त-४२

वरुणदेव सर्वज्ञाता और बलवान हैं, उन्होंने द्युलोक को स्थापित किया तथा पृथ्वी को विस्तार दिया है । उन्होंने समस्त लोकों को नियंत्रित किया है । ये समस्त पुरुषार्थ वरुणदेव के ही हैं॥१॥
हे स्तोताओ ! आप उन श्रेष्ठ वरुणदेव की वंदना करें । जो अमृत को सुरक्षित करने वाले और धैर्य धारण करने वाले हैं। आप उनको नमन करें । वे हमें तीन खण्डों वाला सुरक्षित आवास प्रदान करें । आकाश तथा पृथ्वी पर हमारा संरक्षण करें। हम उनकी गोद में निश्चिन्त होकर रहते हैं॥२॥
हे वरुणदेव ! यज्ञ(परमार्थ) करने वाली हमारी बुद्धि को आप श्रेष्ठ दिशा प्रदान करें । आप हमारी कर्मशीलता और बौद्धिक क्षमता को बढ़ाएँ । जिसके सहयोग से हम समस्त विपत्तियों को पार कर जाएँ और सुगमता से पार लगाने वाली नाव को बढ़ाएँ॥३॥
सत्य के पालक हे अश्विनीकुमारो ! विद्वान् पुरुष आप दोनों के निमित्त पाषाणों से पीसकर तैयार किया गया सोमरस प्रस्तुत करते हैं, जिससे आपकी अनुकम्पा प्राप्त करके, वे अपने समस्त रिपुओं का विनाश करने में सफल हो सकें॥४॥
सत्य के पालक हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार ‘अत्रि ऋषि ने अपनी स्तुतियों के द्वारा, सोमरस पान करने के लिए आपको आवाहित किया था, उसी प्रकार हम भी आपका आवाहन करते हैं। आप हमारे समस्त रिपुओं का विनाश करें॥५॥
सत्य के पालक हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार विद्वान् पुरुषों ने सोमपान के निमित्त आपकी आवाहन किया था, उसी प्रकार अपने संरक्षण के लिए हम भी आपका आवाहन करते हैं । आप हमारे समस्त रिपुओं का संहार करें॥६॥

सूक्त-४३

मेधावी अग्निदेव ही समस्त संसार को बनाने वाले हैं। वे अपने याजकों को कभी भी नष्ट नहीं होने देते । हम स्तोतागण ऐसे अग्निदेव की उपासना करते हैं॥१॥
समस्त पदार्थों के ज्ञाता और सबको प्रकाशित करने वाले हे अग्ने ! आप से अनुदान की कामना करने वाले, हम याजकगण आपके निमित्त स्तोत्र पाठ करते हैं॥२॥
हे अग्ने ! जिस प्रकार प्रकाश अंधकार को खा जाता है, उसी प्रकार आप की तेजस्वी लपटें वनों (काष्ठादि) को खा जाती हैं॥३॥
धूम्र रूप ध्वजा से पहचाने जाने वाले अग्निदेव रसों का हरण करते हैं। वायु के द्वारा प्रेरित होकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने वाले अग्निदेव आकाश में पृथक्-पृथक् रूपों से विचरण करते हैं॥४॥
अग्निदेव अलग-अलग जलकर प्रात:काल उषा की लाली रूपी पताका के सदृश देखने योग्य हो जाते हैं॥५॥
संसार के समस्त पदार्थों के ज्ञाता अग्निदेव धरती पर प्रकट होकर जब वापस होते हैं, उस समय रज-कण काले रंग के हो जाते हैं॥६॥
वे अग्निदेव अनेक प्रकार की ओषधियों को अन्न समझकर खाते हैं, फिर भी वे तुष्ट नहीं होते। वे सदैव युवा बने रहकर ओषधियों में विद्यमान रहते हैं॥७॥
वे अग्निदेव पेड़पौधों को अपनी जिह्वा के द्वारा चाटते हुए (जलाते हुए) अपने आत्मतेज से अत्यन्त आलोकन होते हैं और वनों में सुशोभित होते हैं॥८॥
हे अग्ने ! आप जल में प्रविष्ट होते हैं और ओषधियों को स्थिरता प्रदान करते हुए उन्हीं के बीच से उत्पन्न होते हैं॥९॥
हे अग्ने ! आपकी लपटें घृत के रूप में आहुति ग्रहण करती हैं । घों से भरे हुए चम्मच को मुख से चाटकर वे सुशोभित होती हैं॥१०॥
जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य और आहुति भक्षण करने योग्य है, उन सोम पीठ वाले अग्निदेव का महान् स्तोत्रों के द्वारा हम पूजन करते हैं॥११॥
देवताओं का आवाहन करने वाले महान् ज्ञानी हे अग्ने ! हम विनम्रतापूर्वक समिधाओं को प्रचलित कर आपकी प्रार्थना करते हैं॥१२॥
पवित्र और आवाहन किये जाने योग्य हे अग्ने ! जिस प्रकार ‘भग' और 'मनु' ने आपका आवाहन किया था, उसी प्रकार हम भी आपका आवाहन करते हैं॥१३॥
हे अग्ने ! आप सखा, सज्जन तथा विद्वान् हैं । आप समान गुणों वाली अग्नियो के द्वारा प्रकट या सुशोभित होते हैं॥१४॥
हे अग्ने ! आप आहुति प्रदान करने वाले ज्ञानी पुरुषों को हजारों प्रकार का धन-धान्य और सन्तान आदि से युक्त वैभव प्रदान करें॥१५॥
भाई के समान प्रेम करने वाले, शक्तिशाली, तेज-सम्पन्न, लपटों वाले तथा पवित्र व्रतो को धारण करने वाले हे अग्ने ! आप हमारी स्तुतियों को स्नेहपूर्वक ग्रहण करें॥१६॥
हे अग्ने ! जिस प्रकार गौएँ आवाज करते हुए बछड़े की ओर जाती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियाँ आपकी ओर गमन करती हैं॥१७॥
हे आने ! आप अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ । अपनी कामनाओं को प्राप्त करने के लिए समन प्रजाएं आपका उपासना करती हैं॥१८॥
अपने मन को श्रेष्ठ दिशा में चलाने वाले विद्वान् और ज्ञानी पुरुष अपने श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा प्रत्येक घर में विद्यमान रहने वाले, अग्निदेव को प्रदीप्त करते हैं॥१९॥
हे अग्निदेव ! आप अत्यन्त शक्तिशाली, हवियों को वहन करने वाले तथा देवताओं को बुलाने वाले हैं। याजक, अपने घरों में यज्ञ सम्पन्न करते हुए आपकी प्रार्थना करते हैं॥२०॥
हे अग्निदेव ! आप सर्वत्र विराजमान रहने वाले तथा समस्त प्राणियों को समान दृष्टि से देखने वाले सबके स्वामी हैं। इसलिए हम लोग युद्ध में आपका आवाहन करते हैं॥२१॥
अग्निदेव घृत की हवियों से प्रज्वलित होते हैं । हे याजको ! आप उन अग्निदेव की ही प्रार्थना करें ; क्योंकि वे ही हमारी प्रार्थनाओं को सुनते हैं॥२२॥
हे अग्निदेव ! आप समस्त पदार्थों को जानने वाले, हमारी स्तुतियों को सुनने वाले तथा सम्पूर्ण रिपुओं का संहार करने वाले हैं । हम आपका आवाहन करते हैं॥२३॥
वे अग्निदेव श्रेष्ठ कार्यों के स्वामी और समस्त मनुष्यों के सम्राट् हैं । हम उनकी प्रार्थना करते हैं॥२४॥
वे अग्निदेव समस्त मनुष्यों को चलाने वाले एवं शक्तिशाली मनुष्यों के समान सबके लिए कल्याणकारी हैं । वे अश्व की भाँति द्रुतगामी हैं। अपनी आहुतियों के द्वारा हम उन्हें शक्तिशाली बनाते हैं॥२५॥
हे अग्निदेव ! हिंसा करने वालों, ईष्र्या करने वालों तथा बाधा पहुँचाने वाले असुरों को जलाते हुए आप सदैव तीव्र आलोक से प्रकाशित हों॥२६॥
हे अग्निदेव ! आप अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ । जिस प्रकार आपको 'मनु' ने प्रज्वलित किया था, उसी प्रकार ये मनुष्य भी करते हैं। आप हमारी प्रार्थनाओं को भी उन्हीं की भाँति समझें॥२७॥
हे अग्निदेव ! आप आकाश से पैदा हुए (आदित्य रूप) हैं अथवा जल में पैदा हुए (बिजली रूप) हैं अथवा बल से पैदा हुए (भौतिक अग्नि के रूप में) हैं। हम आपका अपनी स्तुतियों द्वारा आवाहन करते हैं॥२८॥
हे अग्निदेव ! सभी साधकगण तथा समस्त प्रजाएँ आपके भक्षण के लिए पृथक्-पृथक् हविष्यान्न प्रदान करती हैं॥२९॥
हे अग्निदेव ! आपके अनुग्रह से सत्कर्म करने वाले तथा सदैव श्रेष्ठ पदार्थों को देखने वाले होकर हम समस्त विपत्तियों को पार कर जायेंगे॥३०॥
वे अग्निदेव पवित्र आलोक फैलाने वाले, अनेकों के प्रिय तथा यज्ञों द्वारा अत्यन्त तेज-सम्पन्न हैं । हम प्रसन्नता प्रदान करने वाली स्तुतियों से उन्हें आनन्दित करते हैं॥३१॥
हे अग्निदेव ! आप उत्पन्न होकर सूर्यदेव की तरह शक्ति का संवर्धन तथा अंधकार का नाश कर देते हैं॥३२॥
हे अग्निदेव ! आपका ग्रहण करने योग्य तथा दान करने योग्य ऐश्वर्य सदैव अविनाशी बना रहता है। हम आपसे उसी ऐश्वर्य की याचना करते हैं॥३३॥

सूक्त-४४

हे ऋत्विजो ! अतिथि के सदृश अग्निदेव की समिधाओं के द्वारा सेवा करें । घृत के रूप में इन्हें श्रेष्ठ आहुतियाँ समर्पित करें॥१॥
हे अग्ने ! आप हमारे मननीय स्तोत्रों को स्वीकार करें और समृद्धि को प्राप्त करें। आप हमारे स्तोत्रों की कामना करें॥२॥
देवताओं के संदेशवाहक के रूप में आहुतियों को उनके पास तक पहुँचाने वाले अग्निदेव की हम स्थापना करते हैं और उनकी प्रार्थना करते हैं। वे इस यज्ञ मण्डप में देवगणों को आहूत करें॥३॥
हे तेजस्वी अग्निदेव ! भली प्रकार प्रदीप्त, महानता को प्रेरित करने वाली आपकी लपटें वृद्धि को प्राप्त करती हैं॥४॥
पूजायोग्य हे अग्निदेव ! घृत ( हवि) से परिपूर्ण पात्र आपको प्राप्त हों । आप हमारी आहुतियों को स्वीकार करें॥५॥
आनन्द प्रदायक देवताओं का आवाहन करने वाले, ऋतु के अनुकूल यज्ञ करने वाले, तेजस्विता से युक्त, प्रकाशमान अग्निदेव की हम स्तुति करते हैं॥६॥
देवताओं को आहृत करने वाले, स्तुति के योग्य, परिचर्या करने योग्य, अत्यन्त विद्वान् तथा यज्ञों को अलंकृत करने वाले उन प्राचीन अग्निदेव की हम प्रार्थना करते हैं॥७॥
हे अग्निदेव ! आप ‘अंगिरा' वंशियों में सबसे श्रेष्ठ । हमारे यज्ञों को सम्पादित करते हुए समयानुसार आहुतियों का सेवन करें॥८॥
हे अग्निदेव ! आप पूजने योग्य और पवित्र तेज वाले हैं। आप सर्वज्ञाता तथा दर्शनीय आलोक वाले हैं। आप देवजनों को हमारे इस यज्ञ में ले आयें॥९॥
ज्ञानसम्पन्न, देवताओं को यज्ञ में आहूत करने वाले, धूम्र रूप पताका वाले, अत्यन्त तेज-सम्पन्न, विद्रोह न करने वाले तथा यज्ञों के ध्वज रूप अग्निदेव की हम स्तुति करते हैं॥१०॥
हे शक्तिसम्पन्न, तेजस्वी अग्निदेव ! आप हम याजकों की, हिंसक रिपुओं से सुरक्षा करें और हमसे ईर्ष्या करने वालों को नष्ट करें॥११॥
अपने तेजस्वी स्वरूप में सुशोभित होने वाले मेधावी अग्निदेव को ऋत्विज्ञों द्वारा पुरातन स्तोत्रों से प्रज्वलित किया जाता है॥१२॥
ऊर्जा को नीचे न गिरने देने वाले, पवित्र बनाने वाले, दीप्तिमान् अग्निदेव का इस उत्तम यज्ञ में हम आवाहन करते हैं॥१३॥
पूज्य, मित्र तुल्य हे अग्निदेव ! आप शुभ्र ज्वालाओं और तेज से पूर्ण होकर देवों के साथ इस यज्ञ में प्रतिष्ठित हों॥१४॥
ऐश्वर्य की अभिलाषा करने वाले जो व्यक्ति अपने घरों में अग्निदेव की अभ्यर्थना करते हैं, उन्हीं को वे ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥१५॥
देवताओं में सर्वश्रेष्ठ, आकाश के उन्नत स्थान पर प्रतिष्ठित रहने वाले, पृथ्वी के स्वामी ये अग्निदेव (जल) में ओज स्थापित करते हैं॥१६॥
हे अग्ने ! स्वच्छ, उज्ज्वल और प्रकाशित ज्योतियाँ आपके तेज को प्रवाहित करती रहती हैं॥१७॥
हे अग्ने ! आप स्वर्ग लोक के स्वामी, वरण करने योग्य और दान देने योग्य धन के अधिष्ठाता हैं। आपके द्वारा प्रदत्त सुख भोगते हुए हम सदा आपके प्रशंसक बने रहें॥१८॥
हे अग्निदेव ! मनीषीगण आपकी प्रार्थना करते हुए अपने श्रेष्ठ कर्मों से आपको हर्षित करते हैं। हमारी प्रार्थनाएँ आपको समृद्ध करें॥१९॥
हे अग्निदेव ! आप अविनाशी और सामर्थ्यवान् हैं। आप देवताओं के संदेशवाहक तथा ज्ञान के उपदेशक हैं। हम आपको मित्रता को अंगीकार करते हैं॥२०॥
हे अग्निदेव ! आप पवित्र ज्ञानी, अत्यन्त शुभ कर्म करने वाले तथा क्रांतदर्शी हैं । आप पवित्रतापूर्वक प्रदान की हुई आहुतियों द्वारा अलंकृत होते हैं॥२१॥
हे अग्निदेव ! हमारे सत्कर्म और हमारी स्तुतियाँ आपको समृद्ध करें । आप हमारे सख्यभाव को समझें॥२२॥
हे अग्निदेव ! हम आपको समर्पित होकर आपके बन जाएँ और आप हमारे बन जाएँ। आपके आशीष हमारे जीवन में सत्य सिद्ध हों॥२३॥
हे अग्निदेव ! आप आलोक-सम्पन्न, सबका पालन करने वाले और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के स्वामी हैं। हम आपकी इच्छा के अनुरूप विवेकपूर्ण आचरण करें॥२४॥
हे अग्निदेव ! आप सत्कर्मो के धारक हैं । हमारी सुन्दर प्रार्थनाएँ आपके पास उसी प्रकार पहुँचती हैं, जिस प्रकार सरिताएँ समुद्र की ओर गमन करती हैं॥२५॥
यज्ञादि विविध सत्कर्म करने वाले, हमेशा युवा रहने वाले, समस्त आहुतियों का सेवन करने वाले विद्वान् अग्निदेव को हम अपनी स्तुतियों द्वारा समृद्ध करते हैं॥२६॥
तीक्ष्ण लपटों वाले, यज्ञों में प्रमुख तथा पराक्रमी अग्निदेव की हम अपने स्तोत्रों द्वारा प्रार्थना करते हैं॥२७॥
पवित्र बनाने वाले, पूजनीय हे अग्निदेव ! हम स्तोता आपकी विविध प्रकार से वन्दना करते हैं। आप हमें सुख प्रदान करें॥२८॥
हे अग्निदेव ! आप ज्ञानी तथा धैर्यवान् है । आप आहुतियों का सेवन करते हुए प्रजाओं के हित में सदैव जाग्रत् रहते हैं । आप आकाश में आलोकित होते हैं॥२९॥
हे मेधावी अग्निदेव ! आप सबको आश्रय प्रदान करने वाले हैं। पाप करने वालों और हिंसा करने वालों से आप हमारी रक्षा करें और हमारे आयुष्य की वृद्धि करें॥३०॥

सूक्त-४५

यज्ञाग्नि को प्रज्वलित करने वाले याजकगण अपने मित्र चिरयुवा इन्द्रदेव के निमित्त यज्ञशाला में पवित्र आसन (कुशाएँ प्रदान करते हैं॥१॥
अधियों के पास समिधायें पर्याप्त हैं । स्तोत्र भी असंख्य हैं । चिरयुवा इन्द्रदेव सदैव ही इन ऋषियों के मित्र बनकर रहते हैं॥२॥
इन्द्रदेव जिनके मित्र हैं, वे साधक युद्ध की इच्छा न रखते हुए भी सैन्यबल से युक्त शत्रु को पराजित करने में समर्थ होते हैं॥३॥
वृत्र को मारने वाले इन्द्रदेव ने जन्म लेते ही अपने हाथ में धनुष-बाण ग्रहण किया और अपनी माता से पूछा कि इस संसार में अत्यन्त पराक्रमी वीर कौन-कौन से हैं ?॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी शक्ति से सम्पन्न माता ने कहा कि शत्रु जो तुमसे शत्रुता रखता है, वह पर्वतों में (मदमत्त) हाथी की तरह विचरण करता है॥५॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! जो व्यक्ति आपसे याचना करते हैं, आप उन्हें वह सब प्रदान करते हैं। जिसे आप शक्तिशाली बनाते हैं, वही बलवान् बनता है । अतः आप हमारी प्रार्थनाएँ सुनें॥६॥
इन्द्रदेव जब अपने श्रेष्ठ अश्वों को नियोजित करके रणक्षेत्र में युद्ध करने के लिए जाते हैं, तब वे सभी रथियों के बीच महारथी की भाँति सुशोभित होते हैं७॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! जैसे भी सम्भव हो आप अपनी प्रजाओं को हर प्रकार से (बढ़ाएँ) समृद्ध करें। आप हमारे लिए उत्तम अन्न से सम्पन्न बने रहें॥८॥
दुष्ट लोग जिनको मार नहीं सकते, ऐसे इन्द्रदेव हमारी वांछित वस्तुओं को प्रदान करने के लिए अपने श्रेष्ठ रथ को सामने करें अर्थात् यज्ञ स्थल पर उपस्थित हों॥९॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! हम आपके शत्रुओं के बन्धन में कभी न जाएँ । जब आप अनेकों गौओं से सम्पन्न वांछित धन देते हैं, तब हम आपके सम्मुख विद्यमान रहें॥१०॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! हम धीरे-धीरे प्रगति करते हुए सैकड़ों गौओं और अश्वों से युक्त धन से सम्पन्न हों तथा पापरहित बने रहें॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने यजमान को सैंकड़ों और हजारों प्रकार के विविध ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! आप धन को जीतने वाले मजबूत किलों को भी ध्वस्त करने वाले तथा रिपुओं का संहार करने वाले हैं। हम आपको घर के समान संरक्षण प्रदान करने वाले समझते हैं॥१३॥
हे क्रान्तदर्शी इन्द्रदेव ! आप रिपुओं के संहारक हैं । जब हम आपसे धन की कामना करें, तब हमारा यह सोमरस आपके लिये तृप्तिदायक हो॥१४॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! जो मनुष्य अपार वैभव से सम्पन्न होकर भी कृपण है और आपसे द्वेष करता है। आप उसका ऐश्वर्य हमें प्रदान करें॥१५॥
जिस प्रकार पशुपालक हाथ में घास लेकर स्नेहपूर्वक पशुओं की ओर देखता है, उसी प्रकार आपको तृप्त करने के लिए याजकगण सोमादि हाथ में लेकर आपकी ओर देखते रहते हैं॥१६॥
हे इन्द्रदेव ! आप ध्वनियाँ सुनने में भली प्रकार सक्षम हैं, बधिर नहीं है । अपनी सुरक्षा के लिए हम आपको दूर स्थान से भी आहूत करते हैं॥१७॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारी पुकार को सुनकर अपनी असीम सामर्थ्य को प्रकट करें और हमारे निकटस्थ प्रिय बन्धु हो जाएँ॥१८॥
हे इन्द्रदेव ! जब हम दुःख से व्यथित होकर आपकी शरण में आये और प्रार्थना करें, तब आप जागरूक होकर हमें गोएँ प्रदान करें॥१९॥
सामर्थ्यवान् हे अग्निदेव ! जिस प्रकार वृद्ध व्यक्ति दण्ड का सहारा प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार हम आपके अश्रय को प्राप्त करें । हम यज्ञ मण्डप में आपकी उपस्थिति की कामना करते हैं॥२०॥
हे स्तोताओ ! जिन पराक्रमी इन्द्रदेव को रणक्षेत्र में कोई परास्त नहीं कर सकता, आप उन इन्द्रदेव का गुणगान करें॥२१॥
हे बलशाली इन्द्रदेव ! इस सोमयज्ञ में आपके लिए सोमरस समर्पित करते हैं । आप इस तृप्तिकारक सोमरस का पान करें॥२२॥
हे इन्द्रदेव ! आपसे रक्षण की कामना करने वाले तथा उपहास करने वाले अज्ञानियों का आप पर कोई प्रभाव न पड़े । ज्ञान-द्वेषियों की आप कोई भी सहायता न करें॥२३॥
हे इन्द्रदेव ! गौ-दुग्ध मिश्रित सोमरस की हवि देकर होता ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए आपकी प्रार्थना करते हैं । तालाब में जल पीने वाले मृग की भाँति आप सोमरस का पान करें॥२४॥
हे वृत्रद्न्ता इन्द्रदेव ! प्राचीन काल में आपने जो पुरातन तथा नवीन धन प्रदान किया था, उसको विवेचन आप सभागृह में करें॥२५॥
कद्रु के द्वारा निष्पन्न सोमरस का इन्द्रदेव ने पान किया और हजारों भुजाओं वाले बलशाली शत्रु का संहार किया। इससे उनका दर्शनीय पराक्रम प्रकट हुआ॥२६॥
हे इन्द्रदेव ! आपने 'तुर्वश' और यादवों के वास्तविक कार्यों को जानकर रणक्षेत्र में 'अह्नवाय' नामक रिपु का वध कर दिया॥२७॥
(हे स्तोताओ) सज्जनों को बाधाओं से पार कराने वाले, शत्रुओं को भयभीत करने वाले, पशुधन से सम्पन्न, अन्न का दान करने वाले तथा उन्नतशील इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं॥२८॥
सोमाभिषव करते हुए सभी स्तोता एक साथ मिलकर जल की वृद्धि करने वाले महान् इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं। उनसे ऐश्वर्य प्राप्ति की कामना करते हैं॥२९॥
जिन इन्द्रदेव ने त्रिशोक के निमित्त जल को प्रवाहित करने के लिए विशाल मेघों को विदीर्ण किया, उन्होंने ही पृथ्वी पर किरणों के लिये (अथवा बहने वाले जल के लिए) मार्ग भी बनाया॥३०॥
हे इन्द्रदेव ! हर्षित होकर जिस ऐश्वर्य को धारण करते हैं, जिसकी कामना करते हैं तथा जिसका दान करते हैं, वह ऐश्वर्य हमें क्यों नहीं प्रदान करते ? हे देव ! आप हमें समृद्ध करें॥३१॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा किया हुआ छोटा कार्य भी धरती पर विख्यात हो जाता है । अत: आप हमारे ऊपर कृपा करें॥३२॥
हे इन्द्रदेव ! जब आप हमें हर्षित करते हैं, उस समय आप ही यशस्वी और प्रशंसनीय होते हैं॥३३॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा एक अपराध होने पर हमारा संहार न करें । दो अपराध होने पर अथवा तीन या अधिक अपराध होने पर भी आप हमें पीड़ित न करें॥३४॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप रिपुओं पर चोट करने वाले और पापी मनुष्यों का विनाश करने वाले हैं। आप रिपुओं को परास्त करने में सक्षम हैं। हम आपसे भयभीत न हों॥३५॥
सम्पदा से सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! हम अपने सखा अथवा पुत्र के ऐश्वर्य की याचना नहीं करते। हम तो आपके मन को अपनी ओर आकृष्ट करना चाहते हैं॥३६॥
हे मनुष्यो ! क्रोधरहित, सखारूप इन्द्रदेव ने अपने मित्र से प्रश्न किया कि हमने किस निर्दोष मनुष्य का हनन किया है? और कौन हमसे दूर भागता हैं ?॥३७॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! जिस प्रकार पर्वतों पर रहने वाला शिकारी अपने शिकार को प्राप्त करता हैं, उसी प्रकार सोम अभिषव करने वाले 'एवार' (नाम वाले अथवा आदरणीय व्यक्ति) को आपने प्रचुर सम्पत्ति प्रदान की॥३८॥
हे इन्द्रदेव ! आपके कहने मात्र से ही रथ में नियोजित हो जाने वाले अश्वों को हम आहूत करते हैं । इस सम्पत्ति को आपने ब्रह्मनिष्ठ साधकों के निमित्त ही प्रदान किया हैं॥३९॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे समस्त हिंसक रिपुओं का विनाश करके उन्हें हमसे दूर हटाएँ तथा उनका ऐश्वर्य हमारे पास पहुँचाएँ॥४०॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें ऐसी सम्पत्ति प्रदान करें, जो पुष्ट और स्थिर भूमि में विद्यमान हो तथा जिसे किसी ने स्पर्श न किया हो॥४१॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा प्रदत्त जिस वैभव को सभी लोग उचित ढंग से जानते हैं, उस वाञ्छित ऐश्वर्य को हमें पर्याप्त मात्रा में प्रदान करें॥४२॥

सूक्त-४६

धनवान्, श्रेष्ठ नायक और अश्वों के स्वामी हे इन्द्रदेव ! आपके समान रक्षक अन्य कोई नहीं हैं । हम आपके प्रति समर्पित होकर रहें॥१॥
वज्र धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! हम आपको अन्नदाता और ऐश्वर्य प्रदाता के रूप में मानते हैं, यही वास्तविकता है॥२॥
हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! आप सैकड़ों रक्षण- साधनों से सम्पन्न हैं । स्तोतागण स्तुति करते हुए आपकी महानता का वर्णन करते हैं॥३॥
मरुद्गण, मित्र और अर्यमादेव द्रोहरहित होकर जिस साधक की रक्षा करते हैं, वह साधक निश्चित रूप से श्रेष्ठ पथगामी होता है॥४॥
हम स्तोतागण इन्द्र (सूर्य) द्वारा संरक्षित होकर गौओं और अश्वों से सम्पन्न सामर्थ्यवान् होते हैं । हम उनसे वांछित धन प्राप्त करके समृद्ध होते हैं॥५॥
शक्ति से सम्पन्न, निर्भीक तथा सबके अधिष्ठाता, उन इन्द्रदेव से हम दान और ऐश्वर्य की याचना करते हैं॥६॥
रक्षण करने वाली समस्त निर्भीक सेनाएँ इन्द्रदेव के आश्रित रहकर साथ-साथ निवास करती हैं। उनके द्रुतगामी घोड़े उन्हें हर्षित करने के लिए सोमयाग के समीप ले आयें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आपका जो ‘मद' (सोमपानजनित हर्षातिरेक) वरण करने योग्य हैं, जो रिपुओं का संहारक है, जो शत्रुओं के धन को हरण करने वाला है और जो संग्राम में अभिभूत (पराभूत) न होने वाला है, (उस मद-हर्षातिरेक के लिए अश्व लेकर आएँ)॥८॥
उन इन्द्रदेव का शौर्य रणक्षेत्र में रिपुओं के द्वारा अजेय, शक्तिप्रदायक तथा विपत्तियों से मुक्ति दिलाने वाला है । वरण करने योग्य, शक्ति से सम्पन्न तथा सबको निवास प्रदान करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप हमारे यज्ञ में पधारें, जिससे हम गौओं से सम्पन्न गोष्ठ में प्रविष्ट हों॥९॥
हे इन्द्रदेव ! सदैव की तरह हमें उत्तम गौओं, श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त रथ तथा प्रतिष्ठापूर्ण धन प्रदान करने की इच्छा से आप हमारे पास आयें॥१०॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! वास्तव में आपकी सम्पत्ति असीम हैं । हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप अपनी सामर्थ्य से हमारे कर्मों का संरक्षण करें॥११॥
वे महान् इन्द्रदेव कीर्तिवानों के सखा और अनेकों द्वारा प्रशंसित हैं। वे हमारे सम्पूर्ण जन्मों के ज्ञाता हैं। उन शक्तिशाली इन्द्रदेव के निमित्त सुक् पात्र से हवि प्रदान करने वाले हम याजकगण सदैव यजन करते हैं॥१२॥
वे धनवान् इन्द्रदेव अनेकों को निवास प्रदान करने वाले और वृत्र का संहार करने वाले हैं। वे रणक्षेत्र में सदैव अग्रणी रहुकर हमारा संरक्षण करें॥१३॥
हे उद्गाताओ ! हितकारी, असुरजयी, सोमरस से आनन्दित होने वाले वीर, मेधावी तथा कीर्तिमान् इन्द्रदेव की विशेष स्तोत्रों से स्तुति करो॥१४॥
अनेकों द्वारा आहूत किये जाने वाले हे इन्द्रदेव ! आप हमको पुष्टिदायक धन दें, श्रेष्ठ आवास दें तथा रणक्षेत्र में शक्ति से सम्पन्न असीम उत्साह प्रदान करें॥१५॥
हे स्तोताओ ! समस्त ऐश्वर्यों को नियंत्रित करने वाले और शक्तिशाली रिपुओं को भी परास्त करने वाले इन्द्रदेव की आप भली प्रकार प्रार्थना करें॥१६॥
हम उन शक्तिशाली, सज्जनों की सहायता करने वाले, सब जगह गमन करने वाले इन्द्रदेव की प्रचुर अन्न प्राप्ति के लिए यजनीय स्तोत्रों द्वारा प्रार्थना करते हैं। आप भी उनकी प्रार्थना करें । हे इन्द्रदेव ! आप समस्त मनुष्यों तथा मरुद्गणों के उपास्य हैं, हम अपने विनम्र वचनों द्वारा आपका गुणगान करते हैं॥१७॥
जो मरुद्गण अपने शक्ति-प्रवाहों से सम्पन्न होकर पर्वतीय (मेघीय) जल को नीचे की ओर प्रवाहित करते हैं, उन गर्जनशील मरुतों के निमित्त हम यजन करते हैं। उनकी कृपा से इस श्रेष्ठ यज्ञ में सुख प्राप्त करते हैं॥१८॥
प्रेरक बुद्धि से सम्पन्न, शक्तिशाली हे इन्द्रदेव ! आप दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्यों का विनाश करते हैं। आप हमें उत्तम ऐश्वर्य से परिपूर्ण करें॥१९॥
दानशील, शक्तिशाली तथा सत्यभाषी हे इन्द्रदेव ! आप अद्भुत सामर्थ्य से सम्पन्न हैं और रिपुओं का विनाश करने वाले सम्राट् हैं। हमें आप ऐसी सम्पत्ति प्रदान करें, जो रणक्षेत्र में रिपुओं को परास्त करने वाली और सहनशक्ति प्रदान करने वाली हो॥२०॥
अश्य (अश्व से उत्पन्न या पुत्र) 'वश' ने उषाकाल में कानीत (कनीत से उत्पन्न या पुत्र) पृथुश्रवा (यशस्वी) से वैभव प्राप्त किया। ऐसा दान प्राप्त करने वाले (वश) यहाँ पधारे॥२१॥
(वश कहते हैं-) मैंने साठ हजार तथा अयुत (दस हजार) अश्वों (संचारके सामथ्र्यो ) को तथा बीस सौ (दो हजार) ऊँटों को प्राप्त किया। श्याम वर्ण की दस सौ (एक हजार) घोड़ियाँ तथा तीन स्थानों (ककुद, पीठ एवं बगल) पर प्रकाशित (सफेद लकीरों से युक्त) दस हजार गौएँ भी प्राप्त कीं॥२२॥
हमारे रथ की धुरी को दस श्याम वर्ण वाले घोड़े खींचते हैं। वे घोड़े अत्यन्त द्रुतगामी, शक्तिशाली तथा रिपुओं को मथने वाले हैं॥२३॥
‘पृथुश्रवा' के पुत्र ‘कानीत' अत्यन्त धनवान् हैं। उन्होंने हमें स्वर्णिम रथ प्रदान किया। इसलिए वे सर्वश्रेष्ठ दानी और विद्वान् हो गए। इसके बाद हमने उनकी कीर्ति को समृद्ध किया॥२४॥
हे वायो ! महान् ऐश्वर्य प्राप्त करने के निमित्त हम आपकी प्रार्थना करते हैं। आप हमें प्रचुर सम्पत्ति और यज्ञीय बल प्रदान करने के लिए पधारें॥२५॥
सोमरस पीने वाले, बल बढ़ाने वाले तथा शुद्ध करने वाले वायुदेव अपने अश्वों से गमन करते हैं और तीन गुना सात बार, फिर उसका सत्तर गुना (अर्थात् गौओं को आश्रय प्रदान करते हैं। सोम अभिषव करने वालों को वे दान देते हैं॥२६॥
यह जो (दानशील वायु) हमें विलक्षण दान देकर आनन्दित होता है, उस सत्कर्म परायण (पृथुश्रवा) यशस्वी ने (इस प्रयोजन हेतु) युवा 'अक्ष' (व्यवहार कुशल) नहुष' (मनुष्यों) सुकृत्' (श्रेष्ठकमीं) तथा 'सुकृत्तर' (श्रेष्ठतर कमी) को प्रेरित किया॥२७॥
तेजस्वी वायु (प्राणयुक्त प्रवाह) जो उचथ्य (नामक राजा अथवा स्तुत्य) वपु (राजा या शरीर) के क्षेत्र में स्व प्रकाशित (अथवा स्वयं ही शासक) हैं; उन्होंने घोड़ों, ऊँटों तथा श्वानों से प्रेरित (प्रेषित) जो अन्न प्रदान किया, यह वही है॥२८॥
इस समय ऐश्वर्य प्रदान करने वाले शासक से हमने आठ हजार शक्तिशाली अश्वों को दान के रूप में ग्रहण किया॥२९॥
जिस प्रकार गौएँ (पोषक शक्तियाँ) अपने झुण्ड के साथ गमन करती हैं, उसी प्रकार ‘पृथुश्रवा' द्वारा प्रदत्त वृषभ (बलशाली प्रवाह) हमारे साथ गमन करते हैं॥३०॥
उसके बाद विचरण करने वाले ऊँटों के झुण्ड से सौ ऊँट और श्वेत वर्ण वाली गौओं में दो हजार गौएँ दान में प्रदान की ॥३१॥
हम गौओं और अश्वों का पालन करने वाले ब्राह्मण हैं । हमने बलबूथ' नाम वाले (अथवा बल-सम्पन्न) से सैकड़ों गौएँ तथा अश्व प्राप्त किये थे । हे वायो ! ये सब आपके आश्रित हैं। ये स्तोतागण इन्द्र तथा अन्य देवताओं द्वारा संरक्षित होकर हर्षित होते हैं॥३२॥
इसके बाद वे (दाता) स्वर्णिम आभूषणों से सुसज्जित तथा वंदनीया नारी को 'अश्व्य' के पुत्र ‘वश' के सम्मुख पहुँचाते हैं॥३३॥

सूक्त-४७

हे मित्र और वरुणदेव ! जिन रक्षण-साधनों से आप हवि प्रदाता यजमान को संरक्षण प्रदान करते हैं, वे अत्यन्त श्रेष्ठ हैं। हे आदित्यगण ! आप जिस यजमान को विद्रोही रिपुओं से संरक्षित करते हैं, उसको पाप आदि पीड़ित नहीं कर सकते॥१॥
हे आदित्यगण ! आपको यह ज्ञात है कि हमारा दुःख किस प्रकार दूर हो ? जिस प्रकार पक्षी अपने बच्चों को पंख से ढककर सुख देता है, उसी प्रकारे आप में सुख प्रदान करें। आपके रक्षण- साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥२॥
जिस प्रकार पक्षी पंखों से ढककर अपने बच्चों को सुरक्षा प्रदान करते हैं, उसी प्रकार आप हमें संरक्षित करें । सर्वज्ञाता हे देवो ! आपसे सम्पूर्ण संरक्षण की हम कामना करते हैं। आपके रक्षण- साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ हैं॥३॥
प्रचेता (चेतना के संचारको आदित्यगण जिन्हें जीवन के साधन एवं आवास प्रदान करते हैं, उन्हीं मनुष्यों के लिए संसार के ऐश्वर्यों पर भी शासन (उन्हें व्यवस्थित-सुनियोजित) करते हैं । हे देवो ! आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥४॥
जिस प्रकार रथ को खींचने वाले घोड़े दुर्गम पथ को छोड़ देते हैं, उसी प्रकार हम पापपूर्ण रास्तों को छोड़ देंगे। हम इन्द्रदेव के आश्रित तथा आदित्यों से संरक्षित होकर रहें । आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ हैं॥५॥
कष्ट सहन करके भी जो व्यक्ति आपकी उपासना करता है, वह आपके ऐश्वर्य को प्राप्त करता है । हे द्रुत गति से गमन करने वाले देवताओ ! जिनके समीप आप पधारते हैं, वे व्यक्ति असीमित ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं। आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥६॥
हे आदित्यगण ! जो व्यक्ति आपके आश्रित होकर रहते हैं, उन्हें तीक्ष्ण हथियार भी पीड़ित नहीं कर सकते । वें बड़ी-बड़ी विपत्तियों से भी बचकर सुखी रहते हैं। आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥७॥
हे देवताओ ! जिस प्रकार कवच धारण करके योद्धा सुरक्षित रहते हैं, उसी प्रकार आपको समर्पित होकर, हम छोटे-बड़े पापों से बचे रहते हैं। आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥८॥
सम्पत्तिवान् अर्यमा, मित्र और वरुणदेव की माता अदिति हमें सुरक्षित करें । वे हमें सुख प्रदान करें । आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ हैं॥९॥
हे देवताओ !आप अपने आश्रय (कवच) का सुख हमें प्रदान करें वह त्रिधातु (तीन गुणों या धारण-क्षमताओ) कल्याणप्रद, रोगमुक्त तथा रक्षण-सामर्थ्य से युक्त हो । आपके रक्षण- साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥१०॥
हे आदित्यगण ! जिस प्रकार मनुष्य सरिता के किनारे से नीचे की ओर दृष्टिपात करता है, उसी प्रकार आप ऊपर से नीचे हमारी तरफ देखें । जिस प्रकार अन्न घाट से अश्वी को (जल तक ले जाते हैं, उसी प्रकार आप हम श्रेष्ठ मार्ग पर चलाएँ । आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ हैं॥११॥
हे आदित्या ! आप असुरों, विद्वंपियों तथा उपद्रवियों का हित न करके सदेव गोआ (पोषण देने वालो ), पराक्रमियों (रक्षकों ) तथा कीर्ति की कामना करने वाले (लोक हितेषी ) मनुष्यों का ही कल्याण करें। आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥१२॥
हे देवताओ ! हमारे प्रकट तथा गुप्त पापों को आप हमसे दूर करे । मुझ त्रित आप्त्य (तीन-भाव, विचार एवं कर्मानुसार आप्त अनुशासन में रहने वाले, कृषि या साधक) में वे एक भी पाप न रहे । आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ हैं॥१३॥
हे सूर्य पुत्री उषादेवि !आप हमारी औरहमारी गौओं के दु:स्वानो (कुकल्पनाओ ) को मुझ 'त्रित आप्य' ग्रंथ के निवेदन पर दूर करें । हे विभावरी (श्राळ आभा से भर देने वाली) !आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्राद्ध हैं॥१४॥
हे सूर्य पुत्री उषादेवि ! गढ़ाई करने वाले तथा माला बनाने वाले के दुःस्वप्नों (कुकल्पनाओं ) को आप 'त्रित आप्त्य' ऋषि की प्रार्थना से दूर करें । आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥१५॥
हे उषादेवि ! आप अन्न लेने वाले और देने वाले अथवा उस अन्न के भाग को ग्रहण करने वाले 'त्रित आप्त्य' के दु:स्वप्नों (कुकल्पनाओं या हीन संकल्पों ) को दूर हटाएँ। हे देवो ! आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ हैं॥१६॥
जिस प्रकार यज्ञार्थ वस्तुओं का क्रमश: दान करते हैं। जिस प्रकार उधार के सूद एवं मूलधन को क्रमशः पूर्णरूपेण चुका देते हैं, उसी प्रकार अपने सम्पूर्ण दु:स्वप्नों को हम ‘त्रित आप्त्य' श्रेष्ठ अपने पास से हटा देंगे। आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ॥१७॥
हे उषादेवि ! आज हम विजयी होकर लाभान्वित तथा पापरहित होंगे। जिस दुःस्वप्न से हम भयभीत हो गये थे, उससे हमें मुक्त करें। आपके रक्षण-साधन पापरहित तथा श्रेष्ठ है॥१८॥

सूक्त-४८

जिस सोमरस को समस्त देवता तथा मनुज 'मधुर' कहकर सराहना करते हुए ग्रहण करते हैं; अत्यन्त स्वादिष्ट तथा सम्माननीय उस सोमरस का, हम श्रेष्ठ स्वाध्यायी और मेधावी याजकगण सेवन करते हैं॥१॥
हे अविनाशी सोमरस ! आप देवताओं के अन्त: करण प्रवेश करके उनके क्रोध को नष्ट करते हैं । रथ में नियोजित होकर अश्व जिस प्रकार भार वहन करते हैं, उसी प्रकार आप इन्द्रदेव की मैत्री को ग्रहण करके याजकों को ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए संलग्न होते हैं॥२॥
हे सोम ! आप यज्ञ की समृद्धि को बढ़ाने वाले हैं। हम यजमान आपके सहयोग से सूर्य रूप ज्योति से ज्योतित होकर अमरत्व को प्राप्त करें । हम भूलोक से दिव्य लोक में आरोहण करें । हम देवों के ज्योतिर्मय स्वर्गलोक को देखने में समर्थ हों॥३॥
हे सोम ! जिस प्रकार पिता के लिए पुत्र तथा मित्र के लिए मित्र सुखदायक होता है, उसी प्रकार आप (सोम) हमारे हदय के लिए सुखकारी हों । हे बहु प्रशंसित सोम ! आप बुद्धि से सम्पन्न हैं । आप हमारे जीवन में सुख और आयुष्य की वृद्धि करें॥४॥
जिस प्रकार बैलों को रथ में नियोजित किया जाता है, उसी प्रकार यह सोमरस हमारे प्रत्येक अंग को कर्म में नियोजित करे । कीर्तिवान् यह सोम हम संरक्षण की अभिलाषा करने वालों की चारित्रिक-भष्टता से रक्षा करे और रोगों से मुक्त करे॥५॥
हे सोम ! पान किये जाने पर आप प्रज्वलित अग्नि के समान हमें आलोक और तेज से सम्पन्न करें। आप हमें ऐश्वर्यवान् बनायें । इसके बाद आपके आनन्द के लिए हम प्रार्थना करते हैं। आप ऐश्वर्यवान् के समान सब जगह गमन करें तथा पोषण प्राप्त करें॥६॥
हम कामनायुक्त मन से पैतृक सम्पत्ति के समान अभिषुत सोमरस का सेवन करेंगे । हे तेजसम्पन्न सोम ! जिस प्रकार सूर्यदेव दिन में प्रकाश की वृद्धि करते हैं, उसी प्रकार आप हमारे आयुष्य की वृद्धि करें॥७॥
हे तेज सम्पन्न सोम ! हमारे हित के लिए आप हमें प्रसन्न करें । हम व्रतशील आपके ही हैं, इस तथ्य को आप समझें । हे सोम ! आप हमें विवेक युक्त मन्यु (अनीति से लड़ने की क्षमता) प्रदान करें । आप हमें रिपुओं के अधीन न करें॥८॥
हे सोम ! आप हमारे शरीर के संरक्षक तथा मनुष्यों के निरीक्षक हैं । आप हमारे अंग-प्रत्यंग में समाहित हो जायें । यद्यपि हम आपके व्रतों को भंग कर देते हैं (प्रयास करने पर भी निभा नहीं पाते); फिर भी आप हमारे अभिन्न सखा बनकर हमें सुख प्रदान करें॥९॥
श्रेष्ठ अश्वों वाले हे इन्द्रदेव ! जो सोमरस पान करने पर पीड़ा न पहुँचाये, हम उस सुपाच्य सोमरस की मित्रता प्राप्त करें। अपने पेट में पहुँचे हुए सोमरस को दीर्घकाल तक बने रहने की हम आपसे प्रार्थना करते हैं॥१०॥
वह श्रेष्ठ सोमरस हमें मिल गया है । कठिनाई से दूर होने वाले और अत्यधिक पीड़ा पहुँचाने वाले रोग अब नष्ट हो जाएँ, जिससे हम भयरहित हो जाएँ । जहाँ पर सोम आयुष्य की वृद्धि करते हो, हम वहीं जाएँ॥११॥
हे पितरो ! पान करने पर जो अविनाशी सोमरस मानवों के हृदय में प्रवेश करता है, उस सोमरस की आहुतियों के द्वारा हम आपकी सेवा करते हैं । हम उनकी श्रेष्ठ बुद्धि तथा अनुकम्पा को प्राप्त करें॥१२॥
हे सोम ! आप पितरों की शक्ति के साथ मिलकर दिव्यलोक और भूलोक तक विस्तार प्राप्त करते हैं । हम विष्य समर्पित करते हुए आपकी सेवा करते हैं, आप हमें धन-धान्य से सम्पन्न करें॥१३॥
हे रक्षा करने वाले देवताओ ! आप हमें मीठे शब्दों में उपदेशित करें । दुःस्वप्न में अपने अधीन न करें । हम नित्य ही सोमरस के प्रियपात्र बने रहें । श्रेष्ठ सन्तानों से सम्पन्न होकर हम सोमरस को प्रार्थना करें॥१४॥
हे सोम ! आप हर तरफ से हमें अन्न प्रदान करने वाले हैं। आप सुखदाता तथा सर्वदर्शी हैं। आप हमारे अन्दर प्रवेश करें । हर्षित होकर अपने रक्षण-साधनों द्वारा हमें सुरक्षा प्रदान करें॥१५॥

सूक्त-४९

हे ऋत्विजो ! ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव स्तुति करने वालों को अनेक प्रकार के श्रेष्ठ धनों से सम्पन्न बनाते हैं । अतः उत्तम धन की प्राप्ति के लिए जैसे भी संभव हो, उनकी (इन्द्रदेव की) अर्चना करो॥१॥
जिस प्रकार सेनापति, शत्रु सेना पर चढ़ाई करते समय अपनी सेना का संरक्षण करता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ कार्यों में अपने साधन लगाने वालों का इन्द्रदेव संरक्षण करते हैं। ऐसे साधन, लोगों को तृप्तिदायक पर्वत के जल (झरने) के समान लाभदायक होते हैं॥२॥
हे वज्रधारी, शूरवीर इन्द्रदेव ! आनन्द-प्रदायक सोमरस आपके लिए ही अभिषुत किया गया है । जिस प्रकार पानी सरोवर को भरता है, उसी प्रकार यह सोमरस आपको परिपूर्ण (तृप्त) करता है॥३॥
रिपुओं का विनाश करने वाले है इन्द्रदेव ! आप इस दोषमुक्त और सराहनीय सोमरस का पान करें । हर्षित होकर आप हमें क्षुद्र की तरह (बहुत क्षुद्र-छोटी वस्तु समझकर) ऐश्वर्य प्रदान करें॥४॥
हे तृप्ति देने वाले इन्द्रदेव ! आपकी धेनुएँ (गौएँ अथवा धारण सामर्थ्य ) तथा कण्व वंशियों को दिये गए साधन, जिस (यज्ञ) को श्रेष्ठ बनाते हैं; सोम अभिषव करने वालों के द्वारा की हुई स्तुतियों से प्रेरित होकर, अश्व के सदृश द्रुतगति से आप वहाँ पधारें॥५॥
है वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप, नष्ट न होने वाले अनेकों प्रकार के ऐश्वर्यों से सम्पन्न हैं। जिस प्रकार मनुष्य पराक्रमी व्यक्ति का आश्रय ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार हम विनयपूर्वक आपके पास आते हैं । जिस प्रकार कुएँ के जल से खेतों की सिंचाई होती है, उसी प्रकार हमारे हाथ की अँगुलियाँ आपके निमित्त सोमरस अभिषुत करती हैं॥६॥
श्रेष्ठ बुद्धि-सम्पन्न हे वीर इन्द्रदेव !आप यज्ञ-मण्डप में विद्यमान हों, धरती पर विद्यमान हों या अन्य किसी स्थान पर विद्यमान हों, आप हमारे यज्ञ-स्थल पर अपने बलशाली तथा द्रुतगामी अश्वों द्वारा अवश्य पधारें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्रुतगामी तथा वायु के सदृश वेगवान् अश्व रिपुओं पर विजय प्राप्त करने वाले हैं । आप उनके द्वारा मनुष्यों के यज्ञों को तथा समस्त लोकों को देखने के लिए गमन करते हैं॥८॥
है इन्द्रदेव ! जिस प्रकार आपने ऋष मेध्यातिथि (मेधा के अनुगामी) और नीपातिथि (नीतिमार्ग के अनुगामी) को अपार धन देकर उनकी रक्षा की थीं, उसी प्रकार आप हमें गौओं, अश्वों से सम्पन्न वैभव प्रदान करें । हम आप से याचना करते हैं॥९॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! आपने जिस प्रकार कण्व, दशवज (दस इन्द्रियों के नियामक), त्रसदस्यु (दस्युओं को त्रास देने वाले), पक्थ (परिपक्व) तथा ऋजिश्वी (जुमार्गगामी) को गौओं (पोषण तथा स्वर्ण (वैभव) से सम्पन्न ऐश्वर्य प्रदान किया, उसी प्रकार हमें भी प्रदान करें॥१०॥

सूक्त-५०

हे स्तोताओ ! जो इन्द्रदेव सोम यज्ञ करने वालों तथा स्तोताओं को सहस्रों प्रकार के इच्छित ऐश्वर्य प्रदान करते हैं, उन बलशाली तथा ऐश्वर्यशाली, यशस्वी इन्द्रदेव की वाञ्छित सम्पत्ति प्राप्ति के निमित्त आप विधिवत् प्रार्थना करें॥१॥
जब सुसंस्कृत सोमरस उन इन्द्रदेव को आनन्दित करता है, तब वे सम्पत्तिवानों को पर्वत के सदृश विशाल पदार्थों का भण्डार प्रदान करके, उन्हें तुष्ट करते हैं। उनके पास अडिग रहने वाले तथा भली प्रकार फेंके जाने वाले सैकड़ों अस्त्र-शस्त्र हैं॥२॥
सबको निवास प्रदान करने वाले हे इन्द्रदेव !अभिषुत सोमरस ने जब आपको आनन्दित किया, तब आपने हम आहुति प्रदाताओं के यज्ञ-कर्म को दूध देने वाली गौओं तथा जल के सदृश (सबको तृप्ति देने वाला) बनाया॥३॥
हे याजको ! अपनी सुरक्षा के लिए आप उन इन्द्रदेव के निमित्त सोमरस अभिषुत करते हैं, जो अत्यन्त सराहनीय तथा रिपुओं के द्वारा अजेय हैं। सबको निवास प्रदान करने वाले हे इन्द्रदेव ! यज्ञ-मण्डप में सराहनीय सोमरस आपके सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारी स्तुतियों की अभिलाषा करते हैं, वे आपको हर्षित करती हैं । अश्व के सदृश वेगपूर्वक गमन करते हुए आप हमारे सोमयज्ञ में पधारें तथा रिपुओं (दुष्प्रवृत्तियों) का विनाश करे॥५॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव !आप अत्यन्त पराक्रमी तथा अनेकों प्रकार के ऐश्वर्यों से सम्पन्न हैं । हम आपसे प्रचुर ऐश्वर्य की याचना करते हैं । आप पानी से युक्त जलकुण्ड के सदृश, हम हवि-प्रदाता यजमानों को सन्तुष्ट करते हैं॥६॥
महान् बुद्धि सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! आप द्युलोक में विद्यमान हों, भूलोक अथवा अन्यत्र किसी दूरे प्रदेश में हों, अपने शक्तिशाली अश्वों को नियोजित करके हमारे समीप शीघ्र हीं पधारें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आपके रथ में नियोजित होने वाले अश्व बाधाओं से रहित हैं । आप उनके द्वारा रिपुओं को प्रताड़ित करते हैं तथा स्वर्ग-लोक में चारों ओर गमन करते हैं। आपके अश्व वायु में व्याप्त ओज को आत्मसात् करते हैं॥८॥
सबको निवास प्रदान करने वाले शूरवीर हे इन्द्रदेव ! आपने ऐश्वर्य के लिए 'एतश' तथा 'दशवज' श्रेष्ठ को संरक्षित किया। आप ऐश्वर्यवान् तथा प्रार्थनीय हैं। हम आपको भली-भाँति जानते हैं॥९॥
वज्र को धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार आपने यज्ञ-स्थल पर 'कण्व' ऋषि, 'दीर्घनीथ', तथा ‘गोशर्य' को रक्षित किया था, उसी प्रकार अश्वों द्वारा पधारकर हमारी सुरक्षा करें॥१०॥

सूक्त-६१

धनवान् और बलवान् हे इन्द्रदेव ! दोनों प्रकार की हमारी प्रार्थना को समीप आकर सुनें । सामूहिक उपासना से प्रसन्न होकर आप सोमपान के लिए यहाँ उपस्थित हों॥१॥
आकाश और पृथ्वी ने वृष्टिकर्ता समर्थ और तेजस्वी इन्द्रदेव की महत्ता प्रदर्शित करने के लिए संस्कारित किया । हे इन्द्रदेव ! आप उपमानों में सर्वश्रेष्ठ । आप सोमपान की इच्छा से यज्ञवेदी पर विराजमान होते हैं॥२॥
महान् ऐश्वर्य से सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! आप सोमरूप अन्न की वृष्टि करें । आप रणक्षेत्र में अश्वों से सम्पन्न होकर रिपुओं को पराजित करने वाले हैं। हमें ज्ञात है कि आप स्वयं पराजित न होकर औरों का विनाश करने वाले हैं॥३॥
सदैव सत्य का आचरण करने वाले हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप जिस प्रकार की इच्छा करते हैं, वह पूर्ण हो जाती है । हे वज्रधारी तथा मुकुटधारी इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित होकर विजयी होते हुए हम अन्न प्राप्त करें॥४॥
शचीपति, शूरवीर हे इन्द्रदेव ! सब प्रकार के रक्षा-साधनों के साथ आप हमें अभीष्ट फल प्रदान करे । सौभाग्ययुक्त धन प्रदान करने वाले आपकी हम आराधना करते हैं॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप गौओं (गायो, इन्द्रियों, पोषक-प्रवाहों) तथा अश्वों (घोड़ों, पुरुषार्थ एवं शक्ति प्रवाह) को बढ़ाने वाले हैं। आप स्वर्ण (सम्पदा) के स्रोत हैं । आपके अनुदानों को विस्मृत करने की सामर्थ्य किसी में नहीं, अत: हमें अभीष्ट फलों से परिपूर्ण करें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! हम उत्तम आचरण से युक्त होकर आपका आवाहन करते हैं । हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! गों, अश्व तथा श्रेष्ठ धन प्राप्ति की हमारी कामनाओं की पूर्ति करें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप हविर्दाता को सैकड़ों-हजारों गौओं के समूह देने की सामर्थ्य से युक्त हैं । शत्रुनगरों को विध्वंस करने में समर्थ आपको हम अपनी रक्षा के निमित्त सामगान करते हुए बुलाते हैं॥८॥
मन्यु शक्ति से सम्पन्न हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! कोई भी व्यक्ति, चाहे वह ज्ञानी हो या मूर्ख हो, यदि आपकी प्रार्थना करता हैं, तो आपकी अनुकम्पा से हर्षित होता है॥९॥
रिपुओं का संहार करने वाले तथा विशाल भुजाओं वाले हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आप ऐश्वर्य के स्वामी तथा रिपुओं की पुरियों को नष्ट करने वाले हैं, आप हमारी स्तुतियों का श्रवण करें । हम ऐश्वर्य की कामना करने वाले याजक आपका आवाहन करते हैं॥१०॥
इन्द्रदेव को हम पाप-प्रवृत्ति का नहीं मानते। उन्हें ऐश्वर्य एवं यज्ञ कर्म से हीन भी नहीं मानते । अस्तु, हम उन बलशाली को सोमयज्ञ में अपना सखा बनाते हैं॥११॥
जिनकी स्तुति ऋण के समान सुनिश्चित फल प्रदायक है, जो अनेकों गतिशील अश्वों और रथो के स्वामी एवं उनके ज्ञाता हैं, जो अनेकों यजमानों के मध्य समाये रहते हैं-ऐसे अदम्य साहस के धनी, अजेय वीर इन्द्रदेव को हम (यज्ञस्थल पर) प्रतिष्ठित करते हैं॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! हम भयभीत हैं , हमें भयरहित करें । हे धनवान् देव ! आप सर्वसामर्थ्यवान् हैं, अतः अपनी सामर्थ्य से हमारे शत्रुओं तथा हिंसक वृत्ति वालों को नष्ट कर हमारा संरक्षण करें॥१३॥
हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमें देने के लिए आप असंख्य धनों को धारण करते हैं । हे स्तुति करने योग्य धनवान् देव ! शुद्ध सोमरसे का आस्वादन करने के निमित्त, हम साधक आपको बुलाते हैं॥१४॥
हे सर्वज्ञ इन्द्रदेव ! आप वृत्र का संहार करने वाले तथा सज्जनों का पोषण करने वाले हैं। आप हमारे वरणीय होकर हमारी श्रेष्ठतम तथा मध्यम प्रवृत्तियों को संरक्षण प्रदान करें (हीन भावों को नष्ट होने दें। आप आगे और पीछे की ओर से हमारी सुरक्षा करें॥१५॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें असुरों और देवताओं के डर से रहित करें तथा ऊपर-नीचे, आगे-पीछे सब तरफ से हमारी सुरक्षा करें॥१६॥
हे इन्द्रदेव ! वर्तमान और भविष्य में हमें आपका संरक्षण प्राप्त हो । हे सज्जनों के पालक इन्द्रदेव ! आप सर्वदा दिन और रात हम याजकों के रक्षक बने रहें॥१७॥
ये इन्द्रदेव अपने पराक्रम से शत्रुओं की सामर्थ्य को चूर-चूर करने वाले हैं। ये सब में व्याप्त होने वाले और ऐश्वर्यवान् हैं । हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आपकी दोनों भुजाएँ, जो वज्र को धारण करती हैं, विशिष्ट सामर्थ्य से युक्त हैं॥१८॥

सूक्त-६२

हे याजको ! आप इन्द्रदेव की प्रार्थना करें तथा उनके सामरूप अन्न को अपने स्तोत्रों द्वारा समृद्ध करें । उनके द्वारा दिया गया दान हितकारी होता है॥१॥
वे इन्द्रदेव समस्त देवताओं में प्रमुख, सर्वश्रेष्ठ तथा अनश्वर हैं । वे अपने ओज से समस्त प्राणियों तथा पुरातन लोगों को समृद्ध करते हैं। उनका ऐश्वर्य कल्याण करने वाला है॥२॥
शीघ्रता से दान करने वाले, द्रुतगामी अश्वों द्वारा गमन के इच्छुक हे इन्द्रदेव ! वीरता प्रदर्शित करने वाला आपका प्रसिद्ध कार्य सराहनीय है । आपका ऐश्वर्य हित करने वाला है॥३॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! हम आपके जोश को बढ़ाने वाले स्नोत्रों का गायन करते हैं, अत: आप पधारें । आप कीर्ति की कामना करने वाले याजकों का हित करना चाहते हैं, क्योंकि आपका ऐश्वर्य हित करने वाला है॥४॥
जो यजमान परिष्कृत सोमरस समर्पित करके वन्दनापूर्वक आपका सत्कार करते हैं, आप उनको उच्च मनोबल प्रदान करते हैं। आपका ऐश्वर्य सभी के लिए हितकारी होता है॥५॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार मनुष्य प्यास से व्याकुल होकर जलकुण्ड को देखते हैं, उसी प्रकार आप हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर हम सबको देखते हैं। सोम अभिषव करने वालों से आप मित्रता करते हैं। आपका ऐश्वर्य कल्याण करने वाला है॥६॥
हे इन्द्रदेव ! समस्त देवता आपका अनुगमन करके शक्ति तथा बुद्धि को धारण करते हैं । हे बहुप्रशंसित इन्द्रदेव ! आप समस्त लोकों तथा गौओं के अधिष्ठाता हैं । आपका दान कल्याण करने वाला है॥७॥
हे शचीपते इन्द्रदेव ! हम निकट ही सम्पन्न होने वाले उस यज्ञ में आपके सामर्थ्य की स्तुति करते हैं, जिसके कारण आप वृत्र का वध करने में सक्षम हैं। आपका दान कल्याणकारी हैं ॥८॥
जिस प्रकार समान विचार वाली पत्नी सामर्थ्यवान् पति को अपने वश में कर लेती है, उसी प्रकार समस्त जीवों और सम्वत्सर को इन्द्रदेव अपने वश में कर लेते हैं । वे उस विवेकपूर्ण कार्य के द्वारा विख्यात होते हैं । उनका दान कल्याण करने वाला है॥९॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! अनेक गौओं से सम्पन्न यजमान आपके द्वारा प्रदान किये गये सुख का उपभोग करते हैं वे आपकी सामर्थ्य और कर्म को बढ़ाते हुए समृद्धिशाली बनाते हैं। आपका दान कल्याण करने वाला है॥१०॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप वृत्र का वध करने वाले हैं। ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए हम आपको समर्पित हो जाएँ । हे शूरवीर इन्द्रदेव ! दान न देने वाले भी आपके ऐश्वर्य की प्रशंसा करते हैं। आपका दान कल्याण करने वाला हैं॥११॥
हम उन इन्द्रदेव की सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं, यह सत्य है । सोम अभिषव न करने वाले व्यक्ति को वे नष्ट कर देते हैं तथा अभिषव करने वाले के लिए उनका दान हितकारी होता हैं॥१२॥

सूक्त-६३

जिन इन्द्र के द्वारा, देवताओं के सान्निध्य में पिता (पालक) मनु ने बुद्धि (अथवा कर्म के प्रेरक सूत्र) प्राप्त किये, वे (इन्द्र) तेजस्वी (श्रेष्ठ) यजमानों की हवि की कामना करते हुए (यज्ञ में) पहुँचते हैं॥१॥
सोमाभिषव करने वाले सराहनीय स्तोत्र तथा पाषाण कभी भी उन इन्द्रदेव का त्याग न करें, जिन्होंने दिव्यलोक का सृजन किया हैं॥२॥
ज्ञानी इन्द्रदेव ने ऋषि अंगिरा के निमित्त गौओं को प्रदान किया। अत: हम उन इन्द्रदेव के सामर्थ्य की सराहना करते हैं॥३॥
वे इन्द्रदेव मेधावियों की वृद्धि करने वाले तथा स्त्रोताओं को सुख प्रदान करने वाले हैं। हमारी सुरक्षा के लिए सोमयाग करते समय वे यज्ञशाला में पधारे॥४॥
हे इन्द्रदेव ! स्वाहा उच्चारण के साथ यज्ञकर्म सम्पन्न करने वाले तथा स्तुति करने वाले याजकगण ऐश्वर्य प्राप्ति के निमित्त आपके कृत्यों का गुणगान करते हैं॥५॥
स्तुति करने वाले, उन इन्द्रदेव को हिंसारहित मानते हैं । सभी शौर्यपूर्ण कार्य इन्द्रदेव के अन्दर समाहित हैं॥६॥
जब पाँची प्रज्ञाएँ (पांची वर्ग के मनुष्य अथवा पंचतत्व, पंच प्राण आदि) एक साथ मिलकर इन्द्रदेव की प्रार्थना करती हैं, तन्त्र ने इन्द्रदेव अपने पराक्रम से शत्रुओं का संहार करते हैं। ऐसे महान इन्द्रदेव हम विप्रों द्वारा सम्मान-प्राप्ति के अधिकारी हैं॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आपने जो शौर्य प्रदर्शित किया है, उसके लिए हम प्रार्थना करते हैं। आप हमारे रथ के मार्ग को संरक्षित करें॥८॥
पशुओं के सदृश मनुष्य भी उन शक्तिशाली इन्द्रदेव से जौ आदि अन्न प्राप्त करके जीवित रहने के लिए उत्कृष्ट कर्म करते हैं॥९॥
हे याजको ! रक्षण की कामना करने वाले हम योजक, मरुत्वान् इन्द्रदेव की कीर्ति में वृद्धि करते हुए आप सबके सहयोग से धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएँ॥१०॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप यज्ञों के (सत्कर्म के) पालन करने वाले तथा ओजस्वी हैं । हम आपके सहयोग से विजयी हो॥११॥
समस्त देवताओं में वृत्रहन्ता इन्द्रदेव प्रमुख तथा शक्तिशाली हैं। वे रस्तोताओं के समीप पधारते हैं। वर्षा कारक मेघों द्वारा रुद्रों के साथ रणक्षेत्र में वे हमारा संरक्षण करें॥१२॥

सूक्त-६४

हे इन्द्रदेव ! आपको यह सोमरस आनन्द प्रदान करने वाला हो । हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप हमें ऐश्वर्य प्रदान करें तथा ज्ञान के साथ द्वेष रखने वालों का संहार करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप महान् हैं। आपके समान समर्थता किसी में नहीं है । आप यज्ञादि कर्म न करने वाले कृपणों को पीड़ित करें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप सिद्ध रस युक्त (सोमरस) पदार्थों एवं निषिद्ध पदार्थों के स्वामी हैं। आप समस्त प्राणियों के शासक हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप यज्ञस्थल पर पधारें और उद्घोष करते हुए स्वर्गलोक की ओर गमन करें । आप अपने ओज से धरती और आकाश को तुष्ट करते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप उस पहाड़ के समान वज्र से सैकड़ों, सहस्रों मेघों को विदीर्ण करें, हम स्तुति करने वालों का आप कल्याण करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! सोम अभिषव करते समय हम आपको अपनी सहायता के लिए आहूत करते हैं। आप हमारी अभिलाषाओं की पूर्ति करें॥६॥
युवा, सशक्त ग्रीवा वाले एवं किसी के सामने न झुकने वाले वे देवेन्द्र इस समय कहाँ हैं? कौन याजक उनका पूजन करता है?॥७॥
वे शक्तिशाली इन्द्रदेव किन मनुष्यों के यज्ञ की हवियों को ग्रहण करने के लिए पधारते हैं। उन इन्द्रदेव के विषय में किस याजक को ज्ञान है ?॥८॥
हे वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ! आप किस व्यक्ति को ऐश्वर्य प्रदान करते हैं? और किस व्यक्ति को सामर्थ्य प्रदान करते हैं तथा किसके समीप यज्ञ में आसीन होते हैं ?॥९॥
हे इन्द्रदेव !आपके निमित्त हम मनुष्य सोम निचोड़ते हैं । आप यथाशीघ्र पधार कर सोमरस का पान करें॥१०॥
यह 'शर्यणावत् सुषोमा' एवं 'आर्जीकीया' (क्षेत्र या नदी के समीप) में तैयार अथवा उपलब्ध; यह सोम आपको आनन्दित करने वाला हो॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए तथा रिपुओं का संहार करने के लिए यथाशीघ्र पधारकर श्रेष्ठ सोमरस का पान करें॥१२॥

सूक्त-६५

हे इन्द्रदेव ! यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों में निरत साधनों द्वारा सभी दिशाओं से जिनका आवाहन किया जाता हैं, वे आप यथाशीघ्र अपने द्रुतगामी अश्वों द्वारा पधारें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप दिव्यलोक की अमृत रूपी शक्ति धाराओं, अन्तरिक्ष की रस धाराओं तथा पृथ्वी पर यज्ञादि के समय प्रवाहित होने वाली सोमरस की धाराओं से पुष्ट एवं हर्षित होते हैं॥२॥
हे महान् इन्द्रदेव ! जिस प्रकार गौओं को भोजन देने के लिएआहूत करते हैं, उसी प्रकार हम अपनी स्तुतियों द्वारा सोमरस पीने के लिए आपका आवाहन करते हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! महान् महिमा वाले आपके अश्व, रथ को वहन करते हुए यहाँ (यज्ञस्थल) तक ले आएँ॥४॥
पराक्रमी तथा सबके अधिष्ठाता हे इन्द्रदेव ! आप अत्यन्त महान् हैं। हम प्रार्थनाओं द्वारा आपका गुणगान करते हैं। आप हमारे निकट पधार कर सोमरस का पान करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! हविष्यान्न से युक्त हम सोम अभिषव करने वाले याजक, कुश निर्मित पवित्र आसन पर आसीन होने के लिए आपका आवाहन करते हैं॥६॥
है इन्द्रदेव ! आप अनेकों मनुष्यों के लिए सामान्यत: उपलब्ध रहते हैं, इसी कारण हम आपका आवाहन करते हैं॥७॥
हे इन्द्रदेव ! हम याजक पाषाणों द्वारा पीसकर सोम को तैयार करते हैं । आप हर्षित होकर उस मधुर सोमरस का पान करें॥८॥
हे महान् इन्द्रदेव ! आप शीघ्र ही पधारें और (मार्ग के) समस्त विप्रजनों को पार करके हमें ऐश्वर्ग प्रदान करें॥९॥
स्वर्ण और गौओं के स्वामी हे इन्द्रदेव ! आप हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। हे देवताओ ! उन इन्द्रदेव को कोई बाधा न पहुँचाए॥१०॥
इन्द्रदेव द्वारा प्रदत्त हर्ष प्रदान करने वाले सहस्रों गौओं के रूप में श्रेष्ठ, प्रचुर तथा तेजपूर्ण ऐश्वर्य को हम ग्रहण करते हैं॥११॥
हम अरक्षित एवं पीड़ित हैं । (हम एवं) हमारे सम्बन्धी जन सहस्रों प्रकार के ऐश्वर्य के स्वामी हो और देवताओं के बीच में यशस्वी बने॥१२॥

सूक्त-६६

जैसे बालक अभिभावक को पुकारता है, वैसे ही हम अपने हितैषी इन्द्रदेव को सहायता के लिए बुलाते हैं। हे त्विजो ! अपनी रक्षा के लिए सोमयज्ञ में ऐश्वर्य देने वाले वेगवान् अश्वों से युक्त इन्द्रदेव की आराधना करें॥१॥
सुन्दर आकृति वाले इन्द्रदेव को प्राणों की बाजी लगाने वाले असुर भी नहीं हरा सकते । ऐश्वर्य दाता, सोमरस पीकर आनन्दित होने वाले इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं । वे सोमयज्ञ करने वाले, भावपूर्ण स्तुतियाँ करने वाले याजकों को श्रेयस्कर अनुदान प्रदान करते हैं॥२॥
वे इन्द्रदेव अत्यन्त शक्तिशाली तथा ऐश्वर्यवान् हैं। वे अश्वों से सम्पन्न, अद्भुत तथा वृत्ररूपी शत्रुओं का संहार करने वाले हैं। गौओं (किरणों) के अवरोधक को वे भय से प्रकम्पित कर देते हैं॥३॥
मुकुटधारी तथा वज्र को धारण करने वाले अश्ववान् इन्द्रदेव अपनी इच्छानुसार कर्म करते हैं। वे संगृहीत किये गये प्रचुर ऐश्वर्य को दानी याजकों के लिए बाहर निकालते हैं॥४॥
बहुप्रशंसित तथा पराक्रमी हे इन्द्रदेव ! आपने पुराने अनुभवी याजकों से जो कामना की थी, उसको हम पूर्ति करते हैं। हम आपके सामने यज्ञों, उक्थों तथा प्रार्थनाओं को समर्पित करते हैं॥५॥
अनेकों द्वारा आहूत किये जाने वाले तथा वज्र धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप तेज से सम्पन्न तथा सोमपान करने वाले हैं। सोम अभिषव करते समय आप हर्षित होने के लिए सम्मिलित होते हैं । स्तोताओं तथा सोम यज्ञ करने वालों को आप इच्छित ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥६॥
हम याजकों ने इन्द्रदेव को कल सोमरस से तृप्त किया था। उन्हें आज के यज्ञ में भी सोमरस प्रदान करते हैं । हे याजको ! इस समय स्तोत्रों का गान करके इन्द्रदेव को अलंकृत करें॥७॥
भेड़िये जैसे क्रूर शत्रु भी इन्द्रदेव के समक्ष अनुकूल हो जाते हैं, ऐसे वे (इन्द्रदेव) हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार करते हुए हमें उत्कृष्ट चिन्तन, संयुक्त विवेक-बुद्धि प्रदान करें॥८॥
ऐसा कौन सा पुरुषार्थ है, जिसको इन्द्रदेव ने नहीं किया हो तथा उनकी वीरता की गाथाएँ किसने नहीं सुनीं ? वृत्र का संहार करने वाले इन्द्रदेव बचपन से ही विख्यात हैं॥९॥
उन इन्द्रदेव ने अपने महान् पराक्रम से रिपुओं का कब संहार नहीं किया ? उनको रिपु वृत्र, उनके द्वारा कब अवध्य रहा? वे अपने कर्मों के द्वारा समस्त लोभियों तथा कृपणों को नष्ट करते हैं॥१०॥
अनेकों द्वारा आहूत किये जाने वाले तथा वृत्र का संहार करने वाले हैं इन्द्रदेव ! आप वज्र को धारण करने वाले हैं। अभिनव स्तोत्रों के द्वारा हम सेवकों की भाँति आपकी स्तुति करते हैं॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप अनेकों श्रेष्ठ कर्मों को करने वाले हैं। आपके पास अनेकों संरक्षण-साधन उपलब्ध हैं, इसलिए हम आपको आहूत करते हैं। शक्तिशाली तथा सबको निवास प्रदान करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप हमारी स्तुतियों को सुनने के बाद अन्यों को लाँघकर हमारे यज्ञ-मण्डप में पधारें॥१२॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप अनेकों द्वारा आहूत किये जाने वाले हैं। हम याजकगण आपके ही आश्रय में रहें । हमें आपके अलावा कोई अन्य सुख प्रदान करने वाला नहीं दिखाई देता॥१३॥
हे बलशाली इन्द्रदेव ! आप सत्यमार्ग के ज्ञाता हैं । आप हमें निर्धनता तथा क्षुधा के अभिशाप से मुक्त करें। आप अपने वीरतापूर्ण विचित्र कार्यों तथा संरक्षण-साधनों से हमें समर्थ बनाएँ॥१४॥
हे कलि वंशियो ! आपके द्वारा अभिषुत सोम इन्द्रदेव के निमित्त प्रस्तुत हो । आप भयभीत न हों, क्योंकि हिंसा करने वाले लोग स्वयं दूर भाग रहे हैं॥१५॥

सूक्त-६७

श्रेष्ठ सुख प्रदान करने वाले तथा रिपुओं के आक्रमणों से बचाने वाले उन आदित्यगणों से अपने अभीष्ट की पूर्ति के निमित्त हम सुरक्षा की याचना करते हैं॥१॥
मित्र, वरुण, अर्यमा तथा आदित्यगण जिस प्रकार भी उचित समझें, (उसी प्रकार) वे हमें दुष्कर्मों से बचाएँ॥२॥
उन आदित्यों के पास वरण करने योग्य तथा प्रशंसा करने योग्य प्रचुर ऐश्वर्य है । वे हवि प्रदान करने वाले बलशाली यज्ञमान को महान् ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥३॥
हे मित्रावरुण और अर्यमा देवो ! आप और आपकी सुरक्षा-प्रक्रिया दोनों महान् हैं । हम आपसे सुरक्षा की कामना करते हैं ॥४॥
हे आदित्यो ! आप हमारी स्तुतियों को सुनने वाले हैं। आप चाहे जहाँ हों, हमारी मृत्यु के पहले ही (हमारी रक्षार्थ) यथाशीघ्र पधारें॥५॥
हे देव !सोमयाग करने वाले याजकों को आप जो ऐश्वर्य तथा धर प्रदान करते हैं, उससे हमें भी सम्पन्न क्॥६॥
दुष्कर्म करने वाले मनुष्य पाप के भागीदार होते हैं । सत्कर्म करने वालों का पुण्य बहुत रमणीक होता हैं । हे आदित्यगण ! आप हमें पापों से मुक्त करें तथा सन्मार्ग का पथ-प्रशस्त करें॥७॥
विख्यात इन्द्रदेव सबको वशीभूत करने वाले हैं। वे महान् कर्म करने में रुकावट न डालकर हमें बन्धनमुक्त करें॥८॥
रक्षा करने के इच्छुक हे देवताओ ! कपटीं रिपुओं का हिंसक कार्य हमें पीड़ित न करे। उनके हिंसक काय से हमें मुक्त करें॥९॥
हे महान् अदिति देवि ! आप श्रेष्ठ सुख प्रदान करने वाली हैं। अभीष्ट कामना की पूर्ति के लिए हम आपकी प्रार्थना करते हैं॥१०॥
पराक्रमी सन्तानों में सम्पन्न हे अदिति देवि ! हिंसक प्रवृत्ति के लोग दीन या अच्छी (कैसी भी) परिस्थितियों में हमारी सन्तानों की हत्या न करें॥११॥
हे महान् आदित्यगण ! हिंसारहित, श्रेष्ठ गमन करने योग्य हमारे पथ हर प्रकार से सुरक्षित हों । हमारी सन्तानों को आप दीर्घायुष्य प्रदान करें॥१२॥
हे आदित्यो ! आप अत्यन्त कीर्तिमान् हैं । आप प्रमाद और विद्रोहरहित होकर हम मनुष्यों के कर्मों को संरक्षण प्रदान करते हैं॥१३॥
हे अदितिमाता तथा आदित्यगण ! चोरों की भाँति (छल से ) बाँधे गये हम लोगों को आप हिंसक दुष्टों के मुखों से बचायें॥१४॥
हे आदित्यगण ! मारक साधन हमारी हिंसा न करके हमसे दूर हट जायें । दुर्बुद्धि भी हमसे दूर हो जाये॥१५॥
श्रेष्ठ, दानी हे आदित्यो ! आपके रक्षण-साधनों द्वारा संरक्षित होकर हम सदैव श्रेष्ठ सुखों का सेवन करते रहें॥१६॥
हे विद्वान् देवताओ ! हमको मारने वाले पापी को दूर करके हमें दीर्घ आयुष्य प्रदान करें॥१७॥
हे अदितिदेवि और आदित्यगण ! जिस प्रकार आप बँधे हुए व्यक्तियों को बन्धन से छुड़ाते हैं, उसी प्रकार आपका बले हमें भी बन्धन से मुक्त करे । आपका वह बल प्रार्थना के योग्य हैं॥१८॥
हे आदित्यो ! हम आपके सदृश वेगवान् नहीं हैं। आपका वह वेग हमें संकटों से मुक्त कर सकता है, अत: आप हमें सुख प्रदान करें॥१९॥
हे आदित्यो ! यम के मारक आयुध हमको वृद्धावस्था से पूर्व विनष्ट न करें॥२०॥
हे आदित्यो ! आप विद्वेषियों, पापियों तथा उनके संगठनों का विनाश करके, पापों को समस्त स्थानों से दूर करें॥२१॥

सूक्त-६८

शत्रुओं को पराजित करने वाले, शौर्ययुक्त यजमानों के पोषक, हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! संरक्षण एवं सुख के निमित्त, गतिशील रथ के समान, आपको हम (यजमान गण) यज्ञस्थल पर ले आते हैं॥१॥
महान् शक्तिमान, बहुत से उत्तम कर्म करने वाले पूज्य हे इन्द्रदेव ! आप सब प्रकार की महिमा से युक्त होकर संसार भर में व्याप्त रहते हैं॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आपके महान् हाथ सर्वत्र व्यापक और गतिशील हैं । आप स्वर्णयुक्त (सोने की तरह देदीप्यमान) वज्र को धारण करने वाले हैं॥३॥
हे मरुतो ! आपके सैनिकों पर होने वाले आक्रमण के समय रथों की सुरक्षा के लिए हम शत्रु सैनिकों पर आक्रमण करने वाले, शत्रुओं के लिए अजेय, बलशाली इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं॥४॥
सभी लोग संग्राम में अपनी सुरक्षा के लिए तथा अभीष्ट प्राप्ति के लिए जिनका आवाहन करते हैं, हमेशा विकासमान उन इन्द्रदेव का हम भी आवाहन करते हैं॥५॥
जो इन्द्रदेव अत्यन्त पराक्रमी, सम्पत्तिवान्, असीम, प्रार्थनाओं के इच्छुक तथा ऐश्वर्यों के स्वामी हैं, उन्हें हम आवाहित करते हैं॥६॥
जो सबके नायक हैं तथा स्तोताओं की पुरातन प्रार्थनाओं को सुनने वाले हैं, उन इन्द्रदेव का हम श्रेष्ठ सम्पत्ति की प्राप्ति हेतु, सोमपान के लिए आवाहन करते हैं॥७॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! कोई भी व्यक्ति आपको मित्रता तथा सामर्थ्य की प्रतिद्वन्द्वता नहीं कर सकता॥८॥
वज्र धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित होकर तथा आपकी कृपा प्राप्त करके हम सूर्योदय काल के यज्ञ को सम्पन्न करें । हम युद्धों में जीतकर प्रचुर सम्पत्ति प्राप्त करें॥९॥
हे वंदनीय इन्द्रदेव ! हम यज्ञों तथा प्रार्थनाओं द्वारा आपका आवाहन करते हैं, जिससे संग्राम में आप हमें संरक्षण प्रदान करें॥१०॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपकी मित्रता तथा प्रीति मधुर एवं सुस्वादु है; अत: सभी लोग आपके निमित्त यजन करते हैं॥११॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारी सन्तानों के निमित्त प्रचुर ऐश्वर्य, हमारे आवास के निमित्त विशाल भवन तथा जीवन के लिए दीर्घ आयुष्य प्रदान करें॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! अपने परिजनों के निमित्त हम आपसे विशाल ऐश्वर्य, गौओं के निमित्त विस्तृत स्थान तथा रथों के निमित्त विस्तृत मार्ग की कामना करते हैं ! इस हेतु हम यज्ञन करते हैं॥१३॥
सोमरस पान से आनन्दित होकर श्रेष्ठ सम्पत्ति के साथ छ: नायक दो-दो की जोड़ी में हमारी ओर पधार रहे हैं॥१४॥
(अतिथिग्व पुत्र) इन्द्रोत से उजु (सरल प्रकृति वाले)क्ष पुत्र से प्रेरक तथा अश्वमेध के पुत्र से रोहित (लाल अथवा आरोहणशील)अश्व अथवा बल प्रवाह प्राप्त हुए॥१५॥
अतिथिग्व के पुत्र से श्रेष्ठ रथ युक्त अक्ष पुत्र से सुन्दर लगाम (नियंत्रण तंत्र) युक्त तथा अश्वमेध के पुत्र से सुन्दर स्वरूप वाले (अश्व या प्राण प्रवाह) प्राप्त हुए॥१६॥
अतिथिग्व के पुत्र इन्द्रोत के पवित्र कर्मानुष्ठान (यज्ञ) में हमने मादा सहित छः अश्वों को (यज्ञ) में एक साथ ग्रहण किया॥१७॥
आसानी से चलने वाले अश्वों के मध्य में शक्तिशाली तेजस्वी तथा लगाम से युक्त (घोड़ी) भी दिखायी दे रहीं हैं॥१८॥
अन्नदान करने वाले है बन्धुओ ! निन्दक व्यक्ति भी आपकी निन्दा करने में सक्षम नहीं हो सकता॥१९॥

सूक्त-६९

हे याजको ! तीन स्तोत्रों से तैयार किये गये हविरूप अन्न (भोज्य पदार्थ) को श्रेष्ठ वीर इन्द्रदेव के लिए प्रदान करें । यज्ञ-सम्पादन के लिए विवेकपूर्वक किये गये सत्कर्मों का अभीष्ट फल प्रदान करके वे इन्द्रदेव यजमानों को सम्मानित करते हैं॥१॥
हे यजमानो ! आपके लिए हम उषा को उत्पन्न करने वाले, चन्द्रकिरणों को उत्पन्न करने वाले गौओं को पालने वाले इन्द्रदेव को बुलाते हैं; (क्योंकि आप गोदुग्ध को पोषक अन्न के रूप में प्राप्त करने की इच्छा करते हैं॥२॥
सूर्योदय होने पर जो गौएँ (किरणे) देवताओं के जन्म स्थान (द्युलोक ) से तीनों सवनों में प्रचुर दुग्ध (रस) प्रदान करती हैं। वे अपने दुग्ध को इन्ददेव के निमित्त सोमरस में मिलाती हैं॥३॥
हे याजको ! गोपालक, सत्यनिष्ठ, सज्जनों के संरक्षक इन्द्रदेव की मन्त्रोच्चारण सहित प्रार्थना करें, जिससे उनकी शक्तियों का आभास हो सके॥४॥
जिन इन्द्रदेव की हम अपने यज्ञमण्डप में प्रार्थना करते हैं, उनको उत्तम अश्व यज्ञशाला में ले आएँ॥५॥
जब यज्ञस्थल के समीप ही इन्द्रदेव मधुर रस का पान करते हैं, तब गौएँ वज्रहस्त इन्द्रदेव के (पान करने के लिए मधुर दुग्ध प्रदान करती हैं॥६॥
जब हम इन्द्रदेव के साथ सूर्यलोक में गमन करें, तब अपने सखा उन इन्द्रदेव के श्रेष्ठतम इक्कीसवें स्थान पर मीठे सोमरस का पान करके एक-दूसरे से मिलें॥७॥
है प्रियमेध के वंशज मनुष्यो ! यज्ञ-प्रिय, सन्तान एवं साधकों की कामना को पूर्ण करने वाले तथा शत्रुओं को पराजित करने वाले इन्द्रदेव का आप सभी (श्रद्धापूरित होकर) सम्मान करें ॥८॥
गर्गर स्वर ( रणवाद्यों अथवा मेघों से ) उभर रहे हैं। गोधा (हस्तरक्षक आवरण अथवा किरणों के धारणकर्ता अवरोधक) सब ओर शब्द कर रहे हैं । पिंगा ( धनुष की प्रत्यंचा अथवा विद्युत् ) की ध्वनि (टंकार या कड़क) सब ओर सुनाई देती है। ऐसे में इन्द्रदेव (पराक्रमी संरक्षक अथवा वर्षा के देवता) के लिए स्तोत्र बोलें॥९॥
जब उज्ज्वल जल से समृद्ध नदियाँ प्रवाहित होती हैं। उस समय इन्द्रदेव के पीने के लिए श्रेष्ठ गुणों से युक्त मधुर सोमरस लेकर उपस्थित हों॥१०॥
अग्नि, इन्द्र तथा विश्वेदेवा सोमपान करके हर्षित हुए । वरुणदेव भी यहाँ उपस्थित रहे । जिस प्रकार गौएँ अपने बच्चे को प्राप्त करने के लिए शब्द करती हैं, उसी प्रकार हमारे स्तोत्र उन वरुणदेव की प्रार्थना करते हैं॥११॥
हे वरुणदेव ! जिस प्रकार किरणें सूर्य की ओर गमन करती हैं, उसी प्रकार आपके ओज से सातों सरिताएँ समुद्र की ओर प्रवाहित होती हैं॥१२॥
जो इन्द्रदेव द्रुतगामी अश्वों को रथ में नियोजित करके हविप्रदाता यजमान के पास जाते हैं, वे विशाल शरीर वाले नायक इन्द्रदेव यज्ञशाला में प्रमुख स्थान प्राप्त करते हैं॥१३॥
वे इन्द्रदेव अत्यन्त सौन्दर्ययुक्त तथा शक्तिशाली हैं। वे समस्त रिपुओं तथा स्तुतियों से भी परे हैं। वे जल से युक्त बादलों को नष्ट कर डालते हैं॥१४॥
ये इन्द्रदेव अपने विशाल शरीर से नूतन रथ पर सुशोभित होते हैं। वे विविध श्रेष्ठ कर्मों को सम्पन्न करते हुए बादलों को जल बरसाने के लिए प्रेरित करते हैं॥१५॥
हे सुन्दर आकृति वाले दम्पते (इन्द्रदेव) ! सहस्रों रश्मियों से आलोकित, द्रुतगामी स्वर्णिम रथ पर आप भली प्रकार आरूढ़ हों (यहाँ आयें), तब हम दोनों एक साथ मिलेंगे॥१६॥
उन स्वप्रकाशित इन्द्रदेव की वंदना करने वाले याजक साधना करते हैं। उसके बाद वे श्रेष्ठ सम्पत्ति तथा सद्बुद्धि ग्रहण करते हैं॥१७॥
कुश-आसन फैलाने वाले तथा यज्ञों में हविष्यान्न प्रदान करने वाले ‘प्रियमेध'अघि की सन्तानों ने उन इन्द्रदेव के शाश्वत निवासस्थल (स्वर्ग) को प्राप्त किया॥१८॥

सूक्त-७०

मानवों के अधिपति, वेगवान् , शत्रु-सेना के संहारक, वृत्रहन्ता, श्रेष्ठ इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं॥१॥
हे साधक ! अपनी रक्षा के लिए देवराज इन्द्र की उपासना करो। जिनके संरक्षण में (देवत्व की) रक्षा एवं ( असुरता के) विनाश की दोहरी शक्ति है । वे इन्द्रदेव, सूर्य के समान तेजस्वीं वज्र को हाथ में धारण करते हैं॥२॥
स्तुत्य, महाबलशाली, समृद्ध, अपराजित, शत्रुओं का दमन करने वाले इन्द्रदेव को जो साधक यज्ञादि कर्मा द्वारा अपना सहचर (अनुकूल) बना लेता है, उसके कर्मों को कोई नष्ट नहीं कर सकती॥३॥
जिन इन्द्रदेव के प्राकट्य पर महान् वेगवाली गौएँ ( किरणें ) और पृथ्वी तथा आकाश भी उनके समक्ष झुककर अभिवादन करते हैं, उन उग्र, शत्रु विजेता और पराक्रमी इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! सैकड़ों देवलोक, सैकड़ों भूमियाँ तथा हजारों सूर्य भी यदि उत्पन्न हो जाएँ, तो भी आपकी समानता नहीं कर सकते । द्यावा-पृथिवी में (कोई भी) आपकी बराबरी करने वाला नहीं है॥५॥
हे बलशाली इन्द्रदेव ! आप अपनी सामर्थ्य से सभी की इच्छा पूरी करते हैं । हे बलवान्, धनवान्, वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप गौयुक्त (पोषण साधनों सहित) हमें संरक्षण प्रदान करे॥६॥
हे दीर्घजीवी इन्द्रदेव ! (जो व्यक्ति) शुभवर्ण वाले दो अश्वों (उज्ज्वल चिंतन-चरित्र) को अपने जीवन के) साथ जोड़ता है, उसी के साथ हर्याश्व ( इन्द्र के दोनों हरित अश्व ) भी जुड़ जाते हैं॥७॥
हे याजको ! मित्रवत् जो इन्द्रदेव सामान्य स्थानों, निवास स्थानों तथा संग्रामों में आवाहनीय हैं। आप उनकी धन-ऐश्वर्य प्राप्त करने के निमित्त प्रार्थना करें॥८॥
पराक्रमी तथा सम्पत्तिवान् हे इन्द्रदेव ! आप हमें श्रेष्ठ सम्पत्ति प्रदान करने के लिए विकसित करें । आप हमें इस योग्य बनाएँ, जिससे हम श्रेष्ठ अन्न ग्रहण कर सकें॥९॥
अति पराक्रमी हे इन्द्रदेव ! आप यज्ञ की रक्षा करने वाले हैं। आप निन्दकों के ऐश्वर्य को छीनकर हमें सन्तुष्ट करें । आप शस्त्रों के द्वारा दस्युओं का संहार करके हमें अपना महान् आश्रय प्रदान करें॥१०॥
(इन्द्रदेव के) सखारूप पर्वत-ऋषि देवताओं के निन्दक, मानवता से शून्य अयाज्ञिकों तथा धार्मिक कृत्य न करने वालों को स्वर्ग से पतित कर देते हैं । ऐसे दुष्टों को पर्वत ऋषि वध करने वाले योद्धाओं को सौंप देते हैं॥११॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! आप हमारी अभिलाषाओं की पूर्ति करने वाले हैं। जिस प्रकार याजक धान की खील (लाजा) को यज्ञार्थ हाथ में लेते हैं, उसी प्रकार आप हमारे लिए अपने हाथ में (दानार्थ) गौएँ लें, पुनः पुत्र लें ( अर्थात् गौएँ एवं पुत्र प्रदान करें )॥१२॥
हे मित्रो ! हम उन अन्न प्रदाता, कपटरहित तथा ज्ञानी इन्द्रदेव की किस तरह से प्रार्थना करें, जो शौर्य प्रकट करने की अभिलाषा से शत्रुओं का संहार करने वाले हैं ?॥१३॥
शत्रुओं के विनाशक हे इन्द्रदेव ! आप वन्दनीय हैं, जब आप हमें अनेकों बछड़ों सहित गौएँ प्रदान करते हैं, तब अनेकों षि तथा याज्ञिक आपकी सराहना करते हैं॥१४॥
हे सम्पत्तिवान् इन्द्रदेव ! जिस प्रकार समझदार मालिक बकरी को कान पकड़कर लाते हैं, उसी प्रकार आप पराक्रम से प्राप्त होने वाली दिव्य गौओं ( यो शक्तियों) को हमारे लिए ले आएँ॥१५॥


सूक्त-७१

हे अग्ने ! संसार से द्वेष करने वाले व्यक्तियों एवं शत्रुओं से हमारी रक्षा करें और विषम परिस्थितियों में हमें धैर्यवान् बनाएँ॥१॥
जन्म से ही प्रिय लगने वाले हे अग्निदेव ! किसी पापी का क्रोध आपके भक्तों पर शासन नहीं कर सकता। आप रात्रि में भी आलोकित होते हैं॥२॥
शक्ति को क्षीण न होने देने वाले हे अग्निदेव ! आप कल्याणकारी आलोक से सम्पन्न हैं । आप समस्त देवताओं के द्वारा हमें वरणीय ऐश्वर्य प्रदान कराएँ॥३॥
हे अग्निदेव ! आप जिन हवि प्रदाता मनुष्यों को संरक्षण प्रदान करते हैं, उनको कोई दुराचारी व्यक्ति ऐश्वर्य से वंचित नहीं कर सकता॥४॥
हे ज्ञानी अग्निदेव ! आप जिन याज्ञकों को ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए यज्ञ-कृत्यों में प्रेरित करते हैं, वे आपके संरक्षण में गौओं से युक्त होते हैं॥५॥
हे अग्निदेव ! आप आहुति प्रदाताओं को योद्धाओं से युक्त श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करते हैं । अत: हमें भी प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करें॥६॥
समस्त पदार्थों के ज्ञाता हे अग्निदेव ! आप हमें संरक्षण प्रदान करें। आप हमें पापी तथा हिंसक मनुष्यों के अधीन न होने दें॥७॥
हे तेजस्वी अग्निदेव ! आप ही समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी हैं। कोई दुराचारी व्यक्ति आपके द्वारा प्रदत्त दान से हमें वंचित न करे॥८॥
शक्ति के पुत्र तथा अनेकों को निवास प्रदान करने वाले हे अग्निदेव ! हम स्तुति करने वालों को आप महानता से सम्पन्न श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें॥९॥
हमारी प्रार्थनाएँ भली प्रकार से प्रज्वलित ज्वालाओं से सुशोभित और दर्शन योग्य अग्निदेव के समीप सहजता से जाएँ । हमारी रक्षा के लिए घृतयुक्त हवियों से सम्पन्न यज्ञ, प्रचुर सम्पदा से युक्त और अति प्रशंसनीय अग्निदेव को प्राप्त हों॥१०॥
हम दान की प्राप्ति की कामना से बल के पुत्र जातवेदा अग्निदेव का आवाहन करते हैं । वे दो रूपों वाले हैं, मरणधर्मा प्रजाओं ( मनुष्यों ) में वे ‘होता' तथा अमरदेवों के लिए वे 'आनन्दरूप ' हैं॥११॥
हे याजको ! यज्ञ के लिए हम अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं । यज्ञाग्नि के प्रदीप्त होने पर समस्त विवेकपूर्ण कार्यों में संलग्न रहते हुए तथा क्षेत्रीय लाभ के लिए सर्वप्रथम उन अग्निदेव की हम उपासना करते हैं॥१२॥
वे अविनाशी अग्निदेव समस्त प्राणियों के पालन करने वाले तथा सभी के अन्दर निवास करने वाले हैं। वे श्रेष्ठ ऐश्वर्यों के अधिष्ठाता तथा हमारे सखा हैं । हम अपनी सन्तानों के निमित्त उनसे प्रचुर ऐश्वर्य एवं अन्न की कामना करते हैं॥१३॥
हे स्तोताओ ! विस्तृत-विकराल ज्वालाओं वाले अग्निदेव की स्तुति करो। उद्गातागण उन प्रसिद्ध अग्निदेव से धन तथा श्रेष्ठ प्रकाशयुक्त आवास-प्राप्ति हेतु प्रार्थना करते हैं॥१४॥
वे अग्निदेव शासक के सदृश सम्पूर्ण प्रजाओं के संरक्षक तथा ऋषियों को निवास प्रदान करने वाले हैं। अपने रिपुओं को दूर हटाने, हर्ष तथा अभय प्राप्त करने के लिए हम उन स्तुत्य अग्निदेव की साधना करते हैं॥१५॥

सूक्त-७२

हे याजको ! आप सब आहुतियाँ प्रदान करें, (क्योंकि अग्निदेव प्रकट हो गए हैं। ये (याजक) आहुतियाँ प्रदान करने में कुशल हैं, पुन:-पुन: आहुतियाँ प्रदान करते हैं॥१॥
तीक्ष्ण लपटों वाले अग्निदेव के समीप जो याजकगण आसीन होते हैं, उनका सम्बन्ध अग्निदेव से मित्रवत् होता है॥२॥
याजकगण, रुद्र के समान अग्निदेव को प्रतिष्ठित करने की आकांक्षा करते हैं । वे सुप्त अग्नि को जिह्वा (मन्त्रों ) द्वारा प्रदीप्त करते हैं॥३॥
अन्न प्रदान करने वाले अग्निदेव प्रदीप्त होकर अन्तरिक्ष का अतिक्रमण कर जाते हैं । वे वनसमूह या जलसमूह ( मेघों ) पर भी ( विद्युत् रूप में) आरूढ़ हो जाते हैं। वे अपनी जिह्वा ( लपटों) से मेघों ( या शिलाओं हिमशिलाओं) को विदीर्ण कर देते हैं॥४॥
बच्चे के सदृश उछलने वाले अग्निदेव जाज्वल्यमान होकर, प्रार्थना करने वाले स्तोताओं की कामना करते हैं। कोई भी निन्दा करने वाला व्यक्ति उनको नहीं प्राप्त कर सकता ॥५॥
उन अग्निदेव के महिमामय तथा विशाल रथ अश्वों से सम्पन्न हैं उन रथों की लगाम भी दिखने लगी है॥६॥
सिन्धु तट पर, स्व प्रकाशित तीर्थ में, सात मिलकर एक का दोहन करते हैं। उनमें से दो, पाँच को प्रेरित करते हैं॥७॥
अग्निदेव दस विवस्वतों एवं त्रिविध दीप्तियों के द्वारा दिव्य (अथवा द्युलोक के) कोष को विदीर्ण (उपयोग के लिए खोल देते हैं॥८॥
तीन रंगों वाले (काला, लाल, सफेद) द्रुतगामी अग्निदेव, अपनी अभिनव ज्वालाओं के द्वारा यज्ञ की ओर गमन करते हैं । होतागण उनको घृत की हवियों से सिंचित करते हैं॥९॥
जिसका चक्र ऊपर (अंतरिक्ष में स्थित है । चारों ओर से नीचे झुकता हुआ जिसका निचला द्वार क्षीण नहीं है। उस महान् को नमन करते हुए यज्ञकर्ता हवन करते हैं॥१०॥
सम्मानित अध्वर्युगण यज्ञ के समीप पधारकर, शेष मधुर सोमरस को महावीर (पात्र या महान् पराक्रमी इन्द्रदेव) के विसर्जन के अवसर पर स्थापित करते हैं॥११॥
सूर्य-रश्मियाँ यज्ञार्थ आएँ, वे पृथ्वी को (उर्वर बनाकर) यज्ञीय रूप प्रदान करने वाली हैं, जिनके दोनों छोर चमकीले हैं॥१२॥
हे अध्वर्यो ! आकाश और पृथ्वी में देदीप्यमान दुग्ध ( धवल किरणों) से सोम का मिश्रण करो; ( क्योंकि बाद में वह दुग्ध बलशाली सोम को आत्मसात् कर लेता है और स्वयं अत्यधिक बलशाली बन जाता है)॥१३॥
वे गौएँ ( पोषक किरणें ) अपने स्थानों को जानती हैं, जिस प्रकार बछड़े भीड़ में विद्यमान होते हुए भी अपनी माताओं के पास चले जाते हैं, उसी प्रकार ये गौएँ (दिव्य किरणे) भी अपने बन्धुओं (समान गुण-धर्म वालों) के पास चली जाती हैं॥१४॥
भक्षण करने वाली ज्वालाओं से प्राप्त अन्न और दुग्ध को इन्द्रदेव और अग्निदेव यज्ञ (यज्ञीय प्रक्रिया) द्वारा आकाश में विकीर्ण कर देते हैं । तत्पश्चात् इन्द्रदेव और अग्निदेव को सभी (प्रकृति के अंग-अवयव या देवशक्तियाँ) दुग्ध (पोषक पदार्थ) देते हैं॥१५॥
वायुदेव ने सूर्यदेव की सप्त रश्मियों से पुष्ट हुए अन्न एवं रस का दोहन (यज्ञीय प्रक्रिया के अन्तर्गत) सप्त पद वाली ( वाणियों-मंत्रों) के संयोग से किया॥१६॥
हे मित्र और वरुणदेव ! सूर्योदय के समय शक्तिदायक सोमरस को हम प्राप्त करते हैं, क्योंकि वह रोगियों के लिए औषधिरूप है॥१७॥
आलोकवान् अग्निदेव अपने निर्धारित स्थल पर आसीन होकर, अपनी ज्वालाओं को सम्पूर्ण अन्तरिक्ष में फैलाते हैं॥१८॥

सूक्त-७३

हे अश्विनीकुमारो ! आप अपने रथ को नियोजित करके सुगम मार्गों से गमन करते हुए पधारें । आपका संरक्षण सदा हमारे पास रहे॥१॥
हे अश्विनीकुमारो !आप अत्यन्त द्रुतगामी रथ द्वारा पधारें । आपके संरक्षण-साधन हमेशा हमारे समीप रहें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! अग्निदेव की ज्वलनशीलता को आप ‘अत्रि ऋषि के निमित्त बर्फ द्वारा रोके । आपके संरक्षण-साधन सदैव हमारे पास रहें॥३॥
हे अश्विद्वय ! आप कहाँ निवास करते हैं? आप किस जगह गये थे? आप बाज़ पक्षी के समान कहाँ से आ रहे हैं? आपका संरक्षण सदा हमारे पास रहे॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप चाहे जहाँ हों, हमारी पुकार को सुनकर आपके संरग-साधन सदैव हमारे पास रहें॥५॥
आवाहन करने योग्य दोनों अश्विनीकुमारों को हम अपना आत्मीय मित्र जानकर उनके समीप जाते हैं। उनके संरक्षण-साधन सदैव हमारे पास रहें॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! 'अत्रि ऋषि के निमित्त आपने संरक्षणयुक्त आवास विनिर्मित किया था। अत: आपके रक्षण-साधन हमेशा हमारे समीप रहें॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! श्रेष्ठ वाणी से आपके निमित्त स्तोत्र उच्चरित करने वाले 'अत्रि ऋषि को आप अग्नि की ज्वलनशीलता से सुरक्षित करें। आपके संरक्षण-साधन सदैव हमारे पास रहें॥८॥
है अश्विनीकुमारो ! सप्तवधि (एक ऋषि अथवा सप्त किरणों या अश्वों) को नियोजित करने वाले सूर्यदेव ने, आशा भरे स्तोत्रों से प्रेरित होकर अग्नि की ज्वालाओं को मंजूषा से बाहर करके धरती पर फैला दिया। आपके संरक्षण-साधन सदैव हमारे पास रहें॥९॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप ऐश्वर्य की वर्षा करने वाले हैं। आप स्तुतियों को सुनकर हमारे समीप पधारें । आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥१०॥
हे अश्विनीकुमारो ! वृद्ध पुरुषों की भाँति आपको बार-बार क्यों आवाहित करना पड़ता हैं? आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥११॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों का पैदा होना समान है तथा भातृत्व-भाव भी समान है । आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥१२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपका रथ धरती, आकाश तथा अन्य समस्त भुवनों को लाँघकर गमन करता हैं । आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥१३॥
हे अश्विनीकुमारो ! सहस्रों अश्वों तथा गौओं के समूह के साथ हमारे निकट पधारें । आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥१४॥
हे अश्विनीकुमारो ! सहस्रों अश्वों तथा गौओं के समूह से आप हमें वंचित न करें । आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥१५॥
हे अश्विनीकुमारो ! प्रात: अरुणोदय के समय आकाश लालिमायुक्त हो गया है और यज्ञों के साथ आलोक प्रसरित होने वाला है। इसलिए आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥१६॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार कुल्हाड़ी से युक्त मनुष्य वृक्षों को काट डालते हैं, उसी प्रकार आलोकवान् सूर्यदेव, तम को नष्ट करके उदित हो गये हैं। आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥१७॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार इन्द्रदेव ने दुष्कर्मयों के नगरों को विनष्ट किया था, उसी प्रकार आप भी उन काले कर्म करने वालों (रोगों) का विनाश करें । आपके रक्षण-साधन सदैव हमारे समीप रहें॥१८॥

सूक्त-७४

अन्न एवं बल चाहने वाले, हे मनुष्यो ! सर्वप्रिय एवं सर्वपूज्य अग्निदेव की स्तुति करो। हम (त्विग्गण) भी इन (गृहपति) अग्निदेव की सुखदायक स्तोत्रों से स्तुति करते हैं॥१॥
हविदाता मित्र के समान घृतादि से यज्ञ सम्पन्न करते हुए वैदिक स्तोत्रों से अग्निदेव का धन करते हैं॥२॥
स्तुत्य, सर्वज्ञान युक्त अग्निदेव की हम प्रशंसा करते हैं । अग्निदेव यज्ञ में प्रदत्त हविष्यान्न को देवलोक तक पहुँचाने में सहायक हैं॥३॥
ऋक्षपुत्र श्रुतर्वा की (वृद्धि) हेतु, प्रचण्ड ज्वालाओं वाले, वृत्र संहारक, श्रेष्ठ, मनुष्यों के लिए हितकारी अग्निदेव का हम वरण (उपासना करते हैं॥४॥
वे अविनाशी अग्निदेव समस्त पदार्थों के ज्ञाता तथा अन्धकार को नष्ट करके दिखने वाले हैं। घृत से आहुतियाँ देने योग्य (उन) की हम स्तुति करते हैं॥५॥
कामना करने वाले याजकगण अपने यज्ञों में सुवा-पात्र को लेकर जिन अग्निदेव को आहुतियाँ समर्पित करते हैं, हम उनकी स्तुति करते हैं॥६॥
दर्शनीय तथा अतिथि के समान वन्दनीय हे अग्निदेव ! आप अत्यन्त प्रज्ञावान्, हर्षदायक तथा सत्कर्म करने वाले हैं । आपकी प्रशंसनीय मेधा हमारे अन्दर स्थापित हो॥७॥
हे अग्निदेव ! हमारे द्वारा सम्पन्न की गयी प्रार्थनाएँ आपके लिए हर्षदायक, अन्नप्रदायक तथा प्रिय हों । उसे ग्रहण करके आप समृद्ध हों॥८॥
हे अग्निदेव ! आप हमारी तेजस्वी प्रार्थनाओं को ग्रहण करके हमें ऐसी शक्ति प्रदान करें, जिससे हम संग्राम में रिपुओं को परास्त कर श्रेष्ठ कीर्ति प्राप्त कर सकें॥९॥
जो अग्निदेव अपनी शक्ति के द्वारा मनुष्यों को श्रेष्ठ सम्पत्ति तथा अन्न प्रदान करते हैं, सत्पुरुषों का पालन करने वाले प्रकाशमान उन अग्निदेव की सभी लोग सेवा करते हैं । वे गौओं, अश्वों, महारथियों तथा इन्द्रदेव के समान हैं॥१०॥
गोपवन (इस नाम के ऋषि, पवित्र इन्द्रियों वाले साधक) की स्तुति द्वारा प्रकट हुए, शरीरावयवों में सूक्ष्म रूप से विद्यमान, सबको पवित्र करने वाले हे अग्निदेव ! आप हमारी प्रार्थना ध्यान से सुनें॥११॥
हे अग्निदेव ! सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए विपित्तग्रस्त लोग आपकी प्रार्थना करते हैं। रिपुओं का संहार करने के लिए आप जागरूक हों॥१२॥
ऋक्ष (पराक्रमी) के पुत्र श्रुतर्वा (अश्वों-गतिशीलों के स्वामी) रिषुओं के अभिमान को नष्ट करने वाले हैं। उनके यज्ञ में हमने चार अश्वों के सिर को भेड़ों के बालों के सदृश साफ किया॥१३॥
जिस प्रकार तुम पुत्र ‘भुज्यु' को अश्विनीकुमारों के यानों ने उनके लक्ष्य तक पहुँचाया था, उसी प्रकार शक्तिशाली ( श्रुतर्वा) के चार द्रुतगामी घोड़े उनके रथ में नियोजित होकर हमें गन्तव्य स्थान तक पहुँचाते हैं॥१४॥
हे महान् सरिता परुष्णि तथा जल-समूह ! हम आपसे, वास्तविक रूप से निवेदन करते हैं कि इस शक्तिशाली ( श्रुतर्वा) से श्रेष्ठ, अश्वों (पराक्रम) का दान करने वाला कोई अन्य नहीं है॥१५॥

सूक्त-७५

हे अग्ने ! देवों का आवाहन करने वाले अश्वों को सारथी के समान अपने रथ में नियोजित करें । सर्वप्रथम हविदाता होने से आप हमारे इस यज्ञानुष्ठान में प्रतिष्ठित हों॥१॥
हे अग्निदेव ! देवताओं के बीच में सर्वश्रेष्ठ विद्वान् के रूप में हमें प्रतिष्ठित करें । वरणीय हव्य को सार्थक रूप प्रदान करें॥२॥
शक्ति के पुत्र तथा सत्य का पालन करने वाले हे अग्निदेव ! आप यजनीय हैं तथा हवियों के द्वारा प्रदीप्त होते हैं॥३॥
ज्ञानी अग्निदेव सैकड़ों-हजारों प्रकार के अत्रों तथा धनों के सर्वोच्च अधिष्ठाता हैं॥४॥
हे (अङ्गिरा) अग्निदेव ! जिस प्रकार कुशल शिल्पकार रथ की नेमि को श्रेष्ठ बनाते हैं, उसी प्रकार देवताओं के साथ आप भी उपस्थित होकर हमारे यज्ञों को श्रेष्ठ तथा वंदनीय बनाएँ॥५॥
हे महर्षि विरूप शक्तिशाली तथा प्रखर तेज सम्पन्न अग्निदेव की आप अपने अमृत वचनों द्वारा प्रार्थना करें॥६॥
सूक्ष्म दृष्टि-सम्पन्न अग्निदेव की सेना (ज्वाला-ऊर्जा) द्वारा, गौएँ (पोषक किरणे या वर्षा) प्राप्त करने के निमित्त किस पणि (आसुरी बाधा) का हनन करें ?॥७॥
हे अग्निदेव ! जिस प्रकार दूध देने वाली गौएँ अपने दुर्बल बछड़े का त्याग नहीं करतीं, उसी प्रकार आप भी हमारा परित्याग न करें, क्योंकि हम देवों की प्रजा (संतान) हैं॥८॥
जिस तरह समुद्र की लहरें नौका को बाधा पहुँचाती हैं, उसी तरह समस्त विद्वेषियों की दुर्बुद्धि हमें ,ट न पहुँचाए॥९॥
हे दिव्य क्षमता-सम्पन्न अग्ने ! समस्त साधकजन आपको नमस्कार करते हैं। आप अहितकारियों का संहार करें॥१०॥
हे अग्निदेव ! आप हमें प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करें, जिससे हम गौओं को प्राप्त कर सकें । आप हमें समृद्ध करें, क्योंकि आप उन्नत करने वाले हैं॥११॥
हे अग्निदेव ! भारवाहक व्यक्ति की भाँति (थककर या ऊबकर) युद्ध में आप हमारा परित्याग न करें। आप हमारे लिये रिपुओं के ऐश्वर्य को जीतें॥१२॥
हे अग्निदेव ! आपकी कष्ट देने वाली सामर्थ्य, हमको छोड़कर अन्यों को भयाक्रान्त करे । आप हमारी शक्ति तथा वेग को बढ़ाएँ॥१३॥
जिन स्तोताओं तथा याज्ञिकों के त्रुटिपूर्ण यज्ञ-कृत्यों को भी आप स्वीकार कर लेते हैं, उनकी बढ़ने वाली सम्पत्ति को संरक्षण प्रदान करते हैं॥१४॥
हे अग्निदेव ! आप शत्रु-सेना के स्थान पर हमारी सेना को विजयी बनाएँ । जिस सेना के मध्य हम स्थित हैं, उसे संरक्षण प्रदान करें॥१५॥
हे अग्निदेव ! जैसे पुत्र अपने संरक्षक पिता के श्रेष्ठ सुख की कामना करते हैं, वैसे ही हे रक्षक ! प्राचीनकाल से ही प्राप्त आपके सुख को हम जानते हैं तथा उसकी कामना करते हैं॥१६॥

सूक्त-७६

जो इन्द्रदेव विवेकपूर्वक अपनी सामर्थ्य के द्वारा सबको नियन्त्रित करते हैं। उन मरुत्वान् इन्द्रदेव को हम रिपुओं का संहार करने के लिए आवाहन करते हैं॥१॥
इन इन्द्रदेव ने मरुद्गणों के साथ मिलकर, सैकड़ों पर्वो वाले (गाँठों वाले) वज्र का प्रहार करके वृत्र के सिर को विदीर्ण किया॥२॥
उन इन्द्रदेव ने मरुतों की सहायता से वृत्र का संहार करके अन्तरिक्ष में स्थित जल को प्रवाहित किया॥३॥
जिन्होंने मरुतों के सहयोग से सोमपान करने के लिए, स्वर्ग को भी जीत लिया था; ये वही इन्द्रदेव हैं ॥४॥
हम उन मरुत्वान् इन्द्रदेव को अपनी प्रार्थनाओं द्वारा आहूत करते हैं, जो अत्यन्त ओजस्वी तथा महान् हैं॥५॥
उन मरुत्वान् इन्द्रदेव को, हम अपनी पुरातन स्तुतियों द्वारा, सोमपान के निमित्त आवाहन करते हैं॥६॥
हुर्ष की वर्षा करने वाले हे मरुत्वान् इन्द्रदेव ! आप सैकड़ों यज्ञादि सत्कर्म करने वाले हैं। अत: आप इस यज्ञ में (पधारकर) सोमरस का पान करें॥७॥
वज्र धारण करने वाले हे मरुत्वान् इन्द्रदेव ! जिन स्तोताओं ने आपके निमित्त सोमरस संस्कारित किया है, वे श्रद्धापूर्वक अन्त:करण से आपका आवाहन करते हैं॥८॥
मरुतों के सखा हे इन्द्रदेव ! आप हमारे स्वर्ग प्रदायक यज्ञों में सोमपान करके, अपनी शक्ति के द्वारा वज्र की धार को तीक्ष्ण बनाएँ॥९॥
हे इन्द्रदेव ! पात्र में रखे हुए सोमरस को ग्रहण करें तथा सामर्थ्यशाली होकर उठे और अपनी ठोड़ी ( जबड़ों ) को चलाएँ॥१०॥
शत्रुओं के प्रति स्पर्धा का भाव रखने वाले है इन्द्रदेव ! आपके द्वारा शत्रुओं का नाश किये जाने पर द्युलोक एवं पृथ्वीलोक दोनों ही आनन्द को प्राप्त करते हैं॥११॥
हे इन्द्रदेव ! सत्य को बढ़ाने वाली, नवीन कल्पनाओं वाली तथा आठ पदों वाली, आपको हम छोटी-सी स्तुति करते हैं॥१२॥

सूक्त-७७

पैदा होते ही शतक्रतु (इन्द्रदेव) ने अपनी माता से पूछा कि कौन-कौन से विख्यात योद्धा हैं ?॥१॥
इसके बाद शक्तिशाली माता ने जवाब दिया कि हे वत्स ! ‘और्णवाभ' तथा 'अहीशुव' नामक राक्षस हैं, जिनका आपके द्वारा वध किया जाना चाहिए॥२॥
उसके बाद वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ने रथ में अरों को बाँधने के सदृश, उन राक्षसों को रस्से से कस कर बाँध दिया । तब दस्युहन्ता इन्द्रदेव ने अपना विस्तार किया॥३॥
उन इन्द्रदेव ने सोमरस से परिपूर्ण तीस पात्रों का एक साथ ही पान कर लिया॥४॥
उन इन्द्रदेव ने विद्वानों को समृद्ध करने के लिए आकाश में स्थित आधाररहित मेघों को विदीर्ण किया॥५॥
इन्द्रदेव ने अस्त्रों से मेघोंको नष्ट करके जल प्रवाहित किया। इस प्रकार पृथ्वी ने परिपक्व अन्न धारण किया॥६॥
हे इन्द्रदेव ! धनुष में नियोजित होने वाला एक ही बाण है, जिसमें सैकड़ों फल तथा सहस्रों पंख हैं॥७॥
युद्ध में अविचल रहने वाले हे इन्द्रदेव ! शीघ्र ही प्रकट होकर आप उस बाण की सहायता से पुरुषों, नारियों तथा स्तुति करने वालों के लिए प्रचुर अन्न प्रदान करें॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप इन सेनाओं को अपने अविचल तथा मृदुल अंत:करण से धारण करें, क्योंकि ये आपके द्वारा संघबद्ध की गई हैं॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा प्रेरणा प्राप्त कर बलशाली विष्णुदेव (पोषण प्रदायक देव) सैंकड़ों सामर्थ्यवान् बैल, जल से पूर्ण मेघ, परिपक्व क्षीर तथा समस्त पदार्थों को प्रदान करते हैं॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आपका बाण सोने से बना है और आपके दोनों बाहु रिपुओं के विनाशक तथा यज्ञों को समृद्ध करने वाले हैं। आपके धनुष अनेकों बाणों को छोड़ने वाले हैं तथा अच्छे ढंग से निर्मित होने के कारण अत्यधिक हर्षकारी हैं॥११॥

सूक्त-७८

हे शूरवीर इन्द्रदेव ! आप सैकड़ों गौओं के समूह, सोमरस तथा श्रेष्ठ आहार के रूप में हजारों पुरोडाश हमारे लिए प्रदान करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें सुसंस्कृत व्यञ्जन, गौ, अश्व, तेल तथा स्वर्णिम आभूषण प्रदान करें॥२॥
श्रेष्ठ धनों से सम्पन्न, उदार हे इन्द्रदेव ! आप हमारे लिए अनेक प्रकार के कर्णाभूषण आदि प्रदान करें॥३॥
हे शूरवीर इन्द्रदेव ! आप सबसे महान् हैं। सभी को ऐश्वर्य आदि देने वाले हैं । याजकों को कोई नेतृत्व प्रदान करने वाला भी आपसे भिन्न नहीं है॥४॥
उन बलशाली इन्द्रदेव को कोई परास्त नहीं कर सकता और न ही कोई उनको नष्ट कर सकता है । वे समस्त पदार्थों को देखने-सुनने वाले हैं॥५॥
किसी भी व्यक्ति द्वारा पराभूत न होने वाले इन्द्रदेव, पापी लोगों के निकृष्ट क्रोध को निन्दा करने के पहले ही शान्त कर देते हैं॥६॥
वे कर्मशील इन्द्रदेव, वृत्र का संहार करने वाले हैं। वे सोमरस पान करने वाले हैं। मनुष्यों की इच्छाओं को तुरन्त पूर्ण करने वाले इन्द्रदेव का उदर निश्चितरूप से (सोमरस से) परिपूर्ण है॥७॥
हे इन्द्रदेव ! कपटरहित, श्रेष्ठ ऐश्वर्य तथा समस्त सौभाग्य आप में सन्निहित हैं॥८॥
हे इन्द्रदेव ! अन्न, स्वर्ण, गौ तथा अश्वों की कामना करने वाला हमारा मन आपकी ही उपासना करता है॥९॥
हे इन्द्रदेव ! आप ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं । आपके ही आश्रय में हम अपने हाथ में दराँती (फसल काटने वाला औजार) ग्रहण करते हैं। हमारे द्वारा तैयार किए हुए जौ की मुट्ठी द्वारा हमारे भवनों (भंडारों ) को परिपूर्ण करें॥१०॥

सूक्त-७९

यह सोम समस्त कर्मों के कर्ता, सबको जीतने वाले, दूसरों के द्वारा अग्रहणीय तथा विश्वजित् एवं उभिद नामक सोमयज्ञों को सम्पन्न करने वाले हैं। विद्वान् ऋषि के काव्यों ( स्तोत्रों) द्वारा' ये स्तुत्य हैं॥१॥
(ये सोमदेव) वस्त्रहीनों को आच्छादित करते हैं, रोगियों के समस्त रोगों की चिकित्सा करते हैं, अन्धों को दृष्टि प्रदान करते हैं तथा लँगड़ों को गति प्रदान करते हैं॥२॥
हे सोमदेव ! आप, शरीर को कमजोर बनाने वाले (रोगरूपी) रिपुओं से सुरक्षा करने के लिए श्रेष्ठ कवच के समान हैं॥३॥
हे सरल गति वाले सोमदेव ! आप अपने विवेक तथा कुशलता द्वारा हमारे विनाशकारी रिपुओं को द्यावा-पृथिवी से दूर भगाएँ॥४॥
ऐश्वर्य की कामना करने वाले लोग, ऐश्वर्य प्रदाता के पास जाकर अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति कर लेते हैं॥५॥
जब व्यक्ति नष्ट हुई अपनी पुरानी सम्पत्ति को पुन: प्राप्त करते हैं, उस समय वह धन उन्हें यज्ञ करने के लिए प्रेरित करता है, तभी दीर्घायु की प्राप्ति होती है॥६॥
हे सोमदेव ! आप हमारे हृदय के लिए हर्घकारी तथा उन्माद को दूर करने वाले हों । आप हमारे वात आदि रोगों को दूरकर हमें शान्ति प्रदान करें॥७॥
हे ओजस्वी सोमदेव ! आप अपने ओज से हमें प्रकम्पित तथा भयाक्रान्त न करें। हमारे अन्त:करण को पीड़ित न होने दें॥८॥
हर्षप्रदायक तथा तेजस्वी हे सोमदेव ! हमारे गृहों में देवताओं का अभिशाप न आए । आप हमारे रिपुओं तथा हिंसा करने वाले मनुष्यों को देखते ही, हमसे दूर भगाएँ॥९॥

सूक्त-८०

हे शतक्रतो !हमने आपके अतिरिक्त किसी को सुख देने वाला नहीं माना, अत: आप हमें सुख प्रदान करें॥१॥
हे अहिसित इन्द्रदेव ! पहले आपने अन्न प्राप्त करने के लिए हमें संरक्षित किया था। अब आप हमें हर प्रकार से सुख प्रदान करें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप धन दाताओं को प्रेरणा देने वाले हैं तथा याज्ञिकों के संरक्षक हैं । अतः आप हमें प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करें॥३॥
वज्र धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! हमारे पिछड़े हुए रथ को-आप संरक्षित करें तथा उसे आगे लाएँ॥४॥
रिपुओं का संहार करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप मौन होकर क्यों बैठे हैं ? आप हमारे रथ को सबसे आगे कर दें, क्योंकि शक्ति प्रदान करने वाला अन्न आपके पास विद्यमान है॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आपके लिए सभी कार्य हर तरह से आसान हैं । अन्न से सम्पन्न हमारे रथ का आप संरक्षण करें तथा संग्राम में विजयी बनाएँ॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं, इसलिए आप समृद्ध हों । आप यज्ञ-कर्म को सम्पादित करने वाले हैं। हमारी हितकारी स्तुतियाँ आपके लिए किये गये सत्कर्मों की ओर गमन करती हैं ॥७॥
प्रिय न लगने वाले रिपु, हमारे समीप न आएँ । विराट् रणक्षेत्र में विद्यमान ऐश्वर्य को, वे इन्द्रदेव निन्दकों में वितरित न करें॥८॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपके यज्ञ सम्बन्धी चौथे नाम की कामना करते हैं, जिसको आपने स्वयं निर्धारित किया है । आप इसी यज्ञरूप से ही सभी को ऐश्वर्य प्रदान करते हैं॥९॥
हे देवियो तथा देवताओ ! स्तुतिपूर्वक सोम समर्पित करके हम 'एकचू' अषि आपको तृप्त करते हैं। तथा महानता की वृद्धि करते हैं। आप हमें उत्तम धन प्रदान करें । विवेक द्वारा ऐश्वर्य प्रदान करने वाले इन्द्रदेव उषाकाल में ही पधारें॥१०॥


सूक्त-८१

महान् भुजाओं वाले हे इन्द्रदेव ! आप हमें न्यायोपार्जित, प्रशंसनीय ऐश्वर्य दाहिने हाथ से प्रदान करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपको ऐश्वर्यशाली, बहुमुखी पराक्रम प्रकट करने वाले, व्यापक आकारयुक्त संरक्षणकर्ता के रूप में जानते हैं॥२॥
हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप बलशाली वृषभ जैसे हैं। दान देने में प्रवृत्त आपको देवता या मनुष्य, कोई भी नहीं डिगा सकता॥३॥
हे स्तोताओ ! ऐश्वर्य के स्वामी तथा स्वयं प्रकाशित होने वाले इन्द्रदेव की; हम यहाँ उपस्थित होकर प्रार्थना करें, जिससे ऐश्वर्य के क्षेत्र में हमारी प्रतिद्वन्द्विता करने वाला कोई अन्य न रहे॥४॥
हे स्तोताओ ! वे इन्द्रदेव इन स्तोत्रों की प्रशंसा करें, छन्दों को जाने तथा गाने योग्य सामगान का श्रवण करें । वे ऐश्वर्य प्रदान करके हमारे ऊपर अनुकम्पा करें॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने दोनों हाथों द्वारा हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । हमें धन से वंचित न करें॥६॥
रिपुओं के संहारक हे इन्द्रदेव ! आप ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए गमन करें । अपनी शक्ति द्वारा स्वार्थी मनुष्यों के ऐश्वर्य का अपहरण करके हमें (यज्ञार्थ) प्रदान करें॥७॥
हे इन्द्रदेव !विप्नों के बीच में वितरित करने योग्य जो आपकी सम्पत्ति है, उसे हमारे बीच में भी वितरित करें॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आपका ऐश्वर्य सबको शीतलता देने वाला तथा तत्काल प्राप्त होने वाला हैं । आप उस ऐश्वर्य को हमें तथा अपने अधीन रहने वाले दूसरे लोगों को प्रदान करें॥९॥

सूक्त-८२

हे वृत्र-संहारक इन्द्रदेव ! आप चाहे दूर हों या पास, हमारे यज्ञ मण्डप में (मधुर) सोमरस को पीने के लिए अवश्य पधारें॥१॥
हे इन्द्रदेव !आनन्ददायी सोम अभिषुत किया गया है, अत: आप यहाँ तीव्र गति से पधारकर सोमपान करें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप सोमरूप अन्न से हर्षित हों तथा वह आपके हृदय के लिए हर्षकारी हो । सेवन करने के बाद वह आपके हृदय में मन्यु पैदा करे॥३॥
हे इन्द्रदेव ! आप रिपुओं से रहित हैं । आप तेज से सम्पन्न हैं । आप यज्ञों में स्तुतियों द्वारा आहूत किये जाते हैं। इसलिए दिव्यलोक से आप यहाँ पधारें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! पत्थरों द्वारा कूटकर अभिषुत किये गये सोमरस को हम गोदुग्ध में मिलाकर आपकी प्रसन्नता के लिए आपको प्रदान करते हैं॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे आवाहन का भली प्रकार श्रवण करें । हमारे द्वारा समर्पित, गो-दुग्ध मिलाए हुए अभिषुत सोमरस को पीकर, आप आनन्दित हों॥६॥
हे सामर्थ्यशाली इन्द्रदेव ! आपके लिए शुद्ध सोमरस चमस (छोटे-बड़े) पात्रों में भरकर रखा हुआ है। आप इस दिव्य रस का पान करें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! अन्तरिक्ष (या जल) में चन्द्रमा के सदृश प्रतीत होने वाले ग्रहों में विद्यमान सोमरस के आप स्वामी हैं । इसलिए आप इसका पान करें॥८॥
हे इन्द्रदेव ! श्येन (प्रशंसनीय) पक्षी ने आपके लिए अस्पृष्ट (जिसे किसी ने उपयोग के लिए छुआ भी नहीं है) सोमरस को स्वर्ग से ला दिया है । अस्तु, पदों (दोनों सवनों) में आप इस सोम का पान करें॥९॥

सूक्त-८३

हे बलशाली देवो ! हम अपनी रक्षा के लिए आपके महिमामय संरक्षण की याचना करते हैं ॥१॥
मित्र, वरुण और अर्यमा देवता सदैव हमारे सहायक बनें। वे धन की अभिवृद्धि करने वाले बनें॥२॥
यज्ञों में अग्रणी हे देवो ! जिस प्रकार सरिताओं को नावों द्वारा पार किया जाता है, उसी प्रकार आप हमें अनेकों विपत्तियों से पार करें॥३॥
हे वरुणदेव तथा अर्यमादेव ! हम आपसे श्रेष्ठ ऐश्वर्य की याचना करते हैं; आपके द्वारा हमें श्रेष्ठ तथा सराहनीय ऐश्वर्य प्राप्त हो॥४॥
रिपुओं के संहारक, विद्वान् हे देवताओ ! आप श्रेष्ठ ऐश्वर्यों के अधिष्ठाता हैं । हे आदित्यगण ! दुष्कर्मियों के पास विद्यमान ऐश्वर्य को हमें प्रदान करें॥५॥
हे श्रेष्ठ दानी देवो हम घर में हों अथवा रास्ते में हों, अपनी प्रगति के लिए आपका ही आवाहन करते हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव,मरुत्व, विष्णुदेव तथा अश्विनीकुमारो !अपने परिजनों के मध्य में आप हमें सर्वश्रेष्ठ बनाएँ॥७॥
हे श्रेष्ठ दानी देवताओ ! माँ के गर्भ में, समानता से तथा भ्रातृ-भाव सहित दो प्रकार से रहने वाले (अथवा दो-दो करके जन्म लेने वाले) आपका हम (स्तोतागण) वर्णन करते हैं॥८॥
हे श्रेष्ठ दानी देवताओ ! आप सब ओज से सम्पन्न हैं। आप इन्द्रदेव को अपने से ज्येष्ठ स्वीकार करते हैं; इसलिए हम आपकी प्रार्थना करते हैं॥९॥

सूक्त-८४

हे अग्ने ! उपासकों की अभिलाषा पूरी करने वाले, सदा सब पर कृपा करने वाले, मित्र के समान व्यवहार करने वाले आप हमारी प्रार्थना से प्रसन्न हों॥१॥
देवो ने प्रशंसनीय ज्ञानियों की भाँति अग्नि को दोनों रूपों में मनुष्यों के बीच स्थापित किया॥२॥
सदा युवा (अजर) रहने वाले हे अग्ने ! आप दानशीलों की रक्षा के लिए उनकी स्तुतियों पर ध्यान दें । अपने पुत्रों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील हों॥३॥
हे अग्निदेव ! आप अंगिरा (अंगों में रस संचरित करने वाले) एवं ऊर्जा न गिरने देने वाले हैं । वरण योग्य और विरोधियों को पीड़ित करने वाले आपकी हम किस वाणी से स्तुति करें ?॥४॥
(अरणि मंथन रूप) पुरुषार्थ से उत्पन्न हे अग्ने ! किस यजमान के यजन कर्म द्वारा हम आपके निमित्त आहुति अर्पित करें। ये हवि (अथवा ये स्तुतियाँ) आपको प्राप्त हों, ऐसी प्रार्थना हम कब करें ?॥५॥
हे अग्ने ! आपकी हम पर ऐसी कृपा हो, जिससे अपनी स्तुतियों के प्रभाव से हम श्रेष्ठ स्थानों के अधिपति और श्रेष्ठ पोषक धन-धान्य से युक्त हो जाएँ॥६॥
हे सत्य के रक्षक अग्ने ! आप किस प्रकार की बुद्धि (स्तुतियों) से प्रसन्न होते हैं? आपकी किस प्रकार से और कौन सी स्तुतियाँ करके ज्ञान का साक्षात्कार हो सकता है॥७॥
जो अग्निदेव सत्कर्म करने वाले हैं तथा युद्ध में रिपुओं का संहार करने के लिए आगे बढ़ने वाले हैं, ऐसे शक्तिशाली अग्निदेव को लोग अपने गृहों में स्थापित करके उनकी उपासना करते हैं॥८॥
हे अग्निदेव ! जो व्यक्ति आपके द्वारा संरक्षित होकर अपने घरों में सज्जनों के साथ निवास करते हैं, उनका संहार कोई रिपु नहीं कर सकता। वे अपने रिपुओं का संहार करते हुए श्रेष्ठ सन्तानों से समृद्ध होते हैं॥९॥

सूक्त-८५

सत्यपालक हे अश्विनीकुमारो !आप हमारे आवाहन को सुनकर मधुर सोमरस पान करने के निमित्त पधारें॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! मीठे सोमरस का पान करने के निमित्त आप हमारे आवाहन तथा स्तोत्रों को सुनें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप अन्नरूप ऐश्वर्य से युक्त हैं । हम 'कृष्ण' ऋषि मधुर सोमरस पान के निमित्त आपका आवाहन करते हैं॥३॥
हे अश्विनीकुमारो !स्तुति करने वाले हम, 'कृष्ण' ऋषि के आवाहन को आप मीठे सोमपान के निमित्त सुनें॥४॥
हे अश्विनीकुमारो ! मधुर सोमपान के निमित्त आप विद्वान् स्तोताओं को नष्ट न होने वाला आवास प्रदान करें॥५॥
हे अश्विनीकुमारो !मधुर सोमपाने के निमित्त, आप आहुति प्रदान करने वाले याज्ञिक के घर पधारें॥६॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप ऐश्वर्य की वर्षा करने वाले हैं। मजबूत रथ में आवाज करने वाले अश्वों को आप मीठे सोमरस पीने के निमित्त नियोजित करें॥७॥
हे अश्विनीकुमारो ! तिकोने आकार के तीन फलकों वाले रथ द्वारा मधुर सोमपान के निमित्त आप पधारें॥८॥
सत्यपालक हे अश्विनकुमारो ! आप मधुर सोमपान करने के निमित्त हमारी स्तुतियों का श्रवण करें॥९॥

सूक्त-८६

देखने योग्य हे अश्वनीकुमारो ! आप हर्षप्रदायक भेषज रूप हैं तथा कुशलतापूर्वक किये गये स्तुति वचनों के योग्य हैं। अपने शारीरिक संरक्षण के निमित्त हम 'विश्वक' ऋषि आपका आवाहन करते हैं । आप हमें अपनी मित्रता से वञ्चित न करके हमारे कष्टों को दूर करें॥१॥
हे अश्वनीकुमारो ! 'विमना' अघि ने पुरातन काल में आपकी किस प्रकार स्तुति की थी ? उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए आपने 'विमना' को विवेक प्रदान किया है । शारीरिक संरक्षण के निमित्त हम ‘विश्वक' ऋषि आपका आवाहन करते हैं। आप हमें अपनी मित्रता से वञ्चित न करके हमारे कष्टों को दूर करें॥२॥
अनेकों का पालन करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! विष्णु आदि की अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिए आपने उन्हें ऐश्वर्य प्रदान किया था; इसलिए शारीरिक संरक्षण के निमित्त हम 'विश्वक' अषि आपका आवाहन करते हैं । आप हमें अपनी मित्रता से वञ्चित न करके हमारे कष्टों को दूर करें॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप ऐश्वर्य का दान करने वाले तथा सोमरस पान करने वाले हैं। आप अपनी श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा पिता के सदृश हमारा पालन करने वाले हैं। हम अपने संरक्षण के निमित्त, दूर देश में रहने पर भी आपका आवाहन करते हैं। आप हमें अपनी मित्रता से वञ्चित न करके हमारे कष्टों को दूर करें॥४॥
ऋत के द्वारा आदित्य अपनी रश्मियों को बटोरते हैं तथा ऋत के द्वारा वे पुनः रश्मियों को फैलाते हैं। विशाल सेनायुक्त रिपुओं को वे परास्त करते हैं । वे हमें अपनी मित्रता से वञ्चित न करके हमारे कष्टों को दूर करें॥५॥

सूक्त-८७

हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार बरसात में जलकुण्ड भरा रहता है, उसी प्रकार आप हमारी स्तुतियों द्वारा परिपूर्ण होकर पधारें । जैसे हिरण जलकुण्ड में पानी पीते हैं, उसी प्रकार आप ‘द्युम्नीक' ऋषि द्वारा अभिषुत किये गये आनन्ददायक सोमरस का पान करें॥१॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप हम मनुष्यों के द्वारा तैयार किये गये यज्ञ मण्डप में पधारकर कुश-आसन पर आसीन हों । आप मधुर सोमरस का पान करके आनन्दित हों । अपने ऐश्वर्य के द्वारा आप हमारे आयुष्य (जीवन) का संरक्षण करें॥२॥
हे अश्विनीकुमारो ! हम 'प्रियमेध' ऋषि समस्त रक्षण-साधनों सहित आपका आवाहन करते हैं । हम अपने यज्ञमण्डप में कुश-आशन बिछाकर तैयार किये हैं, अत: आप दोनों पधारकर हमारी श्रेष्ठ आहुतियों को ग्रहण करें॥३॥
हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार हिरण जलकुण्ड़ के पास जाते हैं, उसी प्रकार आप हमारी प्रार्थनाओं द्वारा तृप्त हों । आप दिव्य लोक में पधारकर सुखदायक आसन ग्रहण करें तथा मधुर सोमरस का पान करें॥४॥
सत्पात्रों का पालन करने वाले तथा ऋत (यज्ञ) का संवर्धन करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप स्वर्णिम रथ से सम्पन्न हैं तथा रिपुओं का विनाश करने वाले हैं। आप अपने तेजस्वी अश्वों द्वारा पधारकर सोमरस का पान करें॥५॥
हे अश्विनीकुमारो ! हम प्रार्थना करने वाले विप्र लोग अन्न वितरण के निमित्त आपका आवाहन करते हैं। आप विभिन्न कर्म करने वाले तथा रिपुओं का विनाश करने वाले हैं। श्रेष्ठ सौन्दर्ययुक्त तथा विवेकवान् , आप दोनों शीघ्र पधारें॥६॥

सूक्त-८८

है ऋत्विजो ! शत्रुओं से रक्षा करने वाले, तेजस्वी सोमरस से तृप्त होने वाले इन्द्रदेव की हम उसी प्रकार स्तुति करते हैं, जैसे गोशाला में अपने बछड़ों के पास जाने के लिए गौएँ उल्लसित रहती हैं॥१॥
देवलोकवासी , उत्तम दानदाता, सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव से हम सब प्रकार के ऐश्वर्य, सैकड़ों गौएँ तथा पोषक अन्न की कामना करते हैं॥२॥
विशाल, स्थिर पर्वत के समान, कर्तव्यपथ से विचलित न होने वाले हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा प्रदान किया या वैभव हम यजमानों को निरन्तर प्राप्त होता रहे॥३॥
हे इन्द्रदेव !आप अपने कर्म और सामर्थ्य के द्वारा वीर कहलाते हैं तथा समस्त जीवों को नियन्त्रित करते हैं। अपनी सुरक्षा के लिए हम आपको बार-बार बुलाते हैं। आपको गौतमवंशियों ने उत्पन्न किया है॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने ओज से, द्युलोक से परे भी प्रतिष्ठित हैं । भू-मण्डल का तेज भी आपको व्याप्त नहीं कर सकता। आप (हमारे लिए) स्वधा (तृप्तिदायक अन्न) लाएँ ॥५॥
हे मघवन् (धनवान्) इन्द्रदेव ! जब आप दाताओं को धन प्रदान करना चाहते हैं, तो उसे रोकने वाला कोई नहीं होता । स्तोताओं के लिए धन के प्रेरक, सर्वश्रेष्ठ दाता आप, हमारे-उचथ के-स्तोत्रों को जानें॥६॥

सूक्त-८९

यज्ञ के संवर्धक हे मरुतो ! जिस सोम के द्वारा समस्त देवताओं ने इन्द्रदेव को जाग्रत् । तथा ज्योति-सम्पन्न किया था; रिपुओं का संहार करने वाले उस ‘बृहत् साम’ को आप सब, देवराज इन्द्रदेव' के निमित्त गान करें॥१॥
अत्यधिक तेज से सम्पन्न हे मरुतो ! वे इन्द्रदेव समस्त हिंसक रिपुओं तथा दुष्कर्मियों का संहार करने वाले हैं। इसी कारण वे ओजस्वी हुए। हे इन्द्रदेव ! समस्त देवता, मित्रता के निमित्त आपके समीप पहुँचते हैं॥२॥
हे मरुतो ! महान् इन्द्रदेव के लिए स्तुतियाँ अर्पित करें । वे शतकर्मा सैकड़ों पर्वो (ग्रन्थियों) वाले वज्र से वृत्र को मारने वाले हैं॥३॥
सुदृढ़ मानस वाले हे इन्द्रदेव ! समस्त श्रेष्ठ अन्न आपके ही हैं। अपने बलशाली मानस द्वारा आप हमें उस अत्र से परिपूर्ण करें । आप मातृभूत जलधारा को वेग से प्रवाहित करें । हे इन्द्रदेव ! आप वृत्र का संहार करें तथा जल को जीत लें॥४॥
हे अद्भुत वैभवशाली इन्द्रदेव ! आपने वृत्र ( असुरता ) का संहार करने के लिए प्रकट होकर पृथ्वी को विस्तृत करने के साथ-साथ द्युलोक को भी स्थिर किया॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आपके प्राकट्य काल से ही श्रेष्ठ यज्ञ-कर्मों की उत्पत्ति हुई तथा दिन के नियामक सूर्यदेव स्थापित हुए। उत्पन्न हुए तथा आगे उत्पन्न होने वाले सभी प्राणी आपके द्वारा अभिभूत (संव्याप्त) हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपरिपक्व (गौ या पृथ्वीं) से परिपक्व (दूध या पोषण पदार्थ) उत्पन्न किया तथा आकाश में सूर्यदेव को स्थापित किया। जिस प्रकार याजक यज्ञ (अग्नि) को प्रकट करते हैं, उसी प्रकार उक्त स्तुतियों से इन्द्रदेव में हर्ष उल्लास की वृद्धि होती है । हे स्तोताओ ! स्तुत्य, इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए 'बृहत् साम' का गान करो॥७॥

सूक्त-९०

संग्राम में रक्षा के लिए बुलाने योग्य, वृत्रहन्ता, धनुष की श्रेष्ठ प्रत्यंचा के समान, उत्तम मंत्रों से स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! हमारे (तीनों) सवनों एवं स्तोत्रों को आप सुशोभित करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आप सर्वप्रथम धनदाता हैं । ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। आपसे हम पराक्रमी एवं श्रेष्ठ सन्तानों की कामना करते हैं॥२॥
प्रार्थनीय तथा अश्ववान् हे इन्द्रदेव ! आप हमारे सत्यरूप स्तोत्रों द्वारा सुसंगत होकर उनको ग्रहण करें तथा अन्यों के द्वारा बोले गये मन्त्रों को भी सेवन करें॥३॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! आप अनेकों वृत्रों ( असुरों ) का संहार करने वाले हैं तथा यथार्थ रूप में किसी के अधीन न होने वाले हैं। आप अत्यन्त शक्तिशाली तथा अपने हाथ में वज्र धारण करने वाले हैं। आप आहुति प्रदान करने वाले याजकों की ओर ऐश्वर्य प्रेषित करें॥४॥
है इन्द्रदेव ! आप बलशाली, सोमपायी तथा कीर्तिवान् है । आप मानव मात्र के हित के लिए अत्यधिक बलशाली शत्रुओं को बिना किसी सहायता के अकेले ही नष्ट करने में समर्थ हैं॥५॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! जिस प्रकार पिता से पुत्र धन का भाग माँगता है, उसी प्रकार हम आपसे श्रेष्ठ ऐश्वर्य की याचना करते हैं। आप धन तथा ज्ञान-सम्पन्न सबके आश्रयदाता हैं। आपके श्रेष्ठ सुख हमें प्राप्त हों॥६॥

सूक्त-९१

जल की ओर (स्नान द्वारा पवित्र होने के लिए उन्मुख कन्या (अपाला) मार्ग में सोम (पोषक तत्व) प्राप्त करती है । घर लौटती हुई वह कहती है (हे सोम !) तुम्हें मैं इन्द्र (जीवात्मा) तथा शक्र (शक्तिशाली मन) के लिए प्रयुक्त करूंगी॥१॥
(अपाला कहती हैं) ये वीर इन्द्रदेव जो प्रकाशित होकर प्रत्येक घर (प्रकोष्ठ) में पहुँचते हैं । (वे) पीने के लिए निष्पादित इस 'धानावन्त' (खीलों युक्त या धारक क्षमता युक्त), करम्भ (क्रियाशील) तथा अपूपवन्त (पुए की तरह या विस्तारयुक्त) प्रशंसनीय सोम का पान करें॥२॥
(हे इन्द्रदेव या पुरुष !) हम (अपाला) आपको समझने (तुष्ट करने में समर्थ नहीं हैं, किन्तु समझने की इच्छुक हैं । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए शनैः-शनैः ( औषधि की तरह निर्धारित मात्रा में ) प्रवाहित हों॥३॥
अपने स्वामी की रुष्टता के कारण भ्रमणशील हम (अपाला) ने इन्द्रदेव (सूर्य) की बहुत उपासना की है। वे हमें बहुत प्रकार से सामर्थ्य, सक्रियता तथा साधन-सम्पन्न बनाएँ॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप मेरे पिता के मस्तिष्क, उर्वरा (भूमि या मनोभूमि) तथा मेरे उदर-इन तीन स्थलों को विशेष प्रयोजनों के लिए श्रेष्ठ या उपजाऊ बनाएँ ॥५॥
आप हमारे इस उर्वर भूमि, हमारे इस शरीर तथा रचयिता के मस्तिष्क को अंकुरणशील या पुलकित करें॥६॥
उन शतक्रतु (शतकर्मा-इन्द्रदेव) ने रथ (इन्द्रियों युक्त काया), अनस (शकट की तरह पोषक प्राण) तथा दोनों को जोड़ने वाले 'युग' (मन) इन तीन स्थानों या छिद्रों से अपाला को पवित्र करके उसकी त्वचा (बाहरी संरक्षक सतह) को सूर्यदेव के तेज से युक्त बना दिया॥७॥

सूक्त-९२

हे याजको ! सामर्थ्यवान्, सैकड़ों प्रकार के यज्ञादि कर्म करने वाले, शत्रुनाशक, सोमपायी इन्द्रदेव की विशेष स्तोत्रों से प्रार्थना करो॥१॥
हे ऋत्विजो ! सहायता के लिए बहुतों द्वारा बुलाए जाने वाले, अनेकों द्वारा स्तुति किये जाने वाले तथा सनातन काल से प्रसिद्ध उन इन्द्रदेव की वन्दना करो॥२॥
सभी को गति प्रदान करने वाले, धन-धान्य से परिपूर्ण करने वाले, महान् इन्द्रदेव हमारे सामने प्रकट हों और हमें ऐश्वर्य प्रदान करें॥३॥
किरीटधारी इन्द्रदेव ने देवताओं के लिए हवि देने में निपुण याज्ञिकों द्वारा समर्पित जौ के आटे और दूध से मिश्रित सोमरस रूपी हविष्यान्न को ग्रहण किया॥४॥
उन इन्द्रदेव की सोमपान के निमित्त प्रार्थना करें । यह सोमरस उनको समृद्धिशाली बनाने वाला है॥५॥
वे इन्द्रदेव हर्षप्रदायक सोमरस पान करके अपने महान् ओज के द्वारा समस्त लोकों को नियन्त्रित करते हैं॥६॥
हे याजको ! अपनी समस्त वाणियों द्वारा उच्चारित उत्तम स्तुतियों से अपने संरक्षण के लिए असुरजयी इन्द्रदेव का आवाहन करो॥७॥
युद्ध में पराजित न होने वाले, शत्रुओं पर भारी पड़ने वाले तथा सोमरस का पान करने वाले, अपरिवर्तनीय निर्णय वाले तथा नायक इन्द्रदेव का सहयोग पाने के लिए हम आवाहन करते हैं॥८॥
दर्शनीय, सर्वज्ञ हे इन्द्रदेव ! आप हमें पर्याप्त धन प्रदान करें। शत्रुओं के पास से भी जीत कर लाये हुए धन को हमारे संरक्षण हेतु प्रयुक्त करें॥९॥
हे इन्द्रदेव ! सैकड़ों प्रकार के बलों से परिपूर्ण हजारों प्रकार के पोषक तत्त्वों एवं रसों सहित अन्तरिक्ष से आप हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा करें॥१०॥
हे बलशाली तथा वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप पहाड़ों को भी नष्ट करने वाले हैं। हम विवेकपूर्ण कार्यों को करें तथा आपके द्वारा प्रदत्त अश्वों से हम युद्ध में विजयश्री का वरण करें॥११॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! जिस प्रकार गोपालक अपनी गौओं को जौ द्वारा हर्षित करते हैं, उसी प्रकार हम आपको अपने स्तोत्रों द्वारा हर्षित करते हैं॥१२॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आप वज्र धारण करने वाले हैं। समस्त मानव कामनाओं की पूर्ति करना चाहते हैं, उसी प्रकार हम भी ऐश्वर्य की आकांक्षा करते हैं॥१३॥
शक्ति-पुत्र हे इन्द्रदेव ! ऐश्वर्य की अभिलाषा करने वाले पुरुष आपकी हीं प्रार्थना करते हैं; क्योंकि आपसे अधिक श्रेष्ठ कोई अन्य देवता नहीं हैं॥१४॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! आप रिपुओं के लिए भयंकर तथा सत्पुरुषों के लिए ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। आप अपनी श्रेष्ठ गुणों वाली मेधा से हमारा संरक्षण करें॥१५॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आपके लिए अति तेजस्वी अभिषुत किया हुआ सोमरस तैयार किया गया है, उसका पान करके आप तृप्त हों और धनादि देकर हमको आनन्दित करें॥१६॥
हे इन्द्रदेव ! जो सोमरस अत्यन्त कीर्तिमान् , अद्भुत, हर्षप्रदायक, ओज-प्रदायक तथा वृत्र का संहार करने वाला है, उसे हमने आपके निमित्त अभिषुत किया है॥१७॥
वज्रधारी तथा अविनाशी हे इन्द्रदेव ! आप देखने योग्य तथा सोमरस पीने वाले हैं। समस्त मनुष्यों को आपने जो ऐश्वर्य प्रदान किया है, वह हमें भी ज्ञात है॥१८॥
आनन्दमयी प्रकृति वाले, इन्द्रदेव के निमित्त निकाले गये दिव्य सोमरस की हम स्तोतागण स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करते हैं॥१९॥
उन कान्तिमान् इन्द्रदेव का हम सोमयज्ञ में आवाहन करते हैं, जिनकी स्तुति यज्ञ के सातों ऋत्विज् करते हैं॥२०॥
प्रेरण गदायी, उत्साह बढ़ाने वाले, तीन चरणों में सम्पन्न होने वाले यज्ञ का विस्तार देवगण करते हैं। साधक गण उस य ज्ञ की प्रशंसा करते हैं॥२१॥
हे इन्द्र देव ! नदियों के समुद्र में मिलने की भाँति सोमरस आपके अन्दर प्रविष्ट होता है । हे इन्द्रदेव ! आपसे अधिक महा न कोई अन्य देव नहीं है॥२२॥
शक्तिमान् , जागरणशील हे इन्द्रदेव ! आप सोमपान के लिए अपनी ख्याति से सभी स्थानों में व्याप्त रहते हैं। आपके द्वारा उदरस्थ सोम भी प्रशंसनीय है॥२३॥
हे वृत्रह- ता इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा प्रदत्त सोमरस आपके लिए पर्याप्त हो, आपके साथ-साथ यह सभी देवताओं के लिए भी पर वाप्ति हो॥२४॥
श्रुतकक्ष अघि गौओं, अश्वों और इन्द्रदेव के आवास (स्वर्ग) की प्राप्ति के लिए स्तोत्रों का गान करते हैं॥२५॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा अभिषुत सोमरस को आप विभूषित करते हैं। आप ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। आपके निमित्त र हि सोमरस पर्याप्त हो॥२६॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! दूर रहते हुए भी हमारी प्रार्थनाएँ आपके समीप पहुँचती हैं । हम आपके ऐश्वर्य को प्रचुर परिमाण में ग्रहण करें॥२७॥
हे बलवान् इन्द्रदेव ! रणक्षेत्र में शत्रुओं को पराजित करने वाले, युद्ध में अडिग रहने वाले आप शूरवीर हैं। आपका मन (संकर पशील) प्रशंसा के योग्य है॥२८॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्ददेव ! आपके द्वारा प्रदत्त साधन सभी याजक प्राप्त करते हैं। आप हमें ऐश्वर्यवान् बनाकर हमारी सहायता करें॥२९॥
अन्नाधिपति, बलवान् हे इन्द्रदेव ! आप गौ के दूध में मिलाये गये मधुर सोमरस को पनि कर आनन्दित हों। आलसी ब्राह्मण की भाँति निष्क्रिय न रहें॥३०॥
हे इन्द्रदेव ! सर्वत्र विचरणशील, सभी ओर शस्त्र फेंकने वाले (राक्षस) रात्रि के समय हमारे निक ट न आ सकें । वे (पास में आयें भी तों) आपके अनुग्रह से ही नष्ट हो जाएँ॥३१॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे हैं और हम आपके । आपके ही सहयोग से हम शत्रुओं का सामना कर सकेंगे॥३२॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी इच्छा करने वाले, हम सखारूप स्तोतागण आपकी ही प्रार्थना करते हैं॥३३॥

सूक्त-९३

जगद् विख्यात, ऐश्वर्य-सम्पन्न, शक्तिशाली, मानवमात्र के हितैषी और (दुष्टों पर) अस्त्रों से प्रहार करने वाले उदीयमान सूर्य इन्द्रदेव ही हैं॥१॥
अपने बाहुबल से शत्रु के निन्यानवे निवास केन्द्रों को विध्वंस करने वाले और वृत्रनामक दुष्ट का नाश करने वाले इन्द्रदेव हमें अभीष्ट धन प्रदान करें॥२॥
वे हमारे लिए कल्याणकारी मित्ररूप इन्द्रदेव, गौओं की असंख्य दुग्ध-धाराओं के समान ह में बहुसंख्यक धन प्रदान करें॥३॥
वृत्र के संहारक, अभी उदय हुए हे (सूर्यरूप) इन्द्रदेव ! आपसे प्रकाशित होने वाला वह र अब कुछसम्पूर्ण जगत् ) आपके अधिकार में ही है॥४॥
प्रगति करने वाले तथा सज्जनों का पालन करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप स्वयं को अमर मानते हैं, आपका ऐसा मानना ही यथार्थ है ॥५॥
हे इन्द्रदेव ! जो सोमरस दूर अथवा निकट के स्थानों में अभिषुत किया जाता है, आप उन समस्त स्थानों पर पधारते हैं॥६॥
जो वृत्रहन्ता हैं, हम उनकी प्रशंसा और स्तुति करते हैं । वे दानदाता इन्द्रदेव हमें धन-धान्य से परिपूर्ण करें॥७॥
दान देने के लिए ही उत्पन्न हुए इन्द्रदेव बलवान् बनने के लिए सोमपान करते हैं । प्रशंसनीय कार्य करने वाले वे देव, सोम पिलाये जाने योग्य हैं॥८॥
वज्रपाणि, स्तुतियों से प्रशंसित, बलवान्, तेजस्वी, वीर और अपराजेय इन्द्रदेव साधकों को ऐश्वर्य देने की इच्छा रखते हैं॥९॥
प्रार्थनीय तथा धनवान् हे इन्द्रदेव ! जब आप हमारे ऊपर कृपा करते हैं, तब आप हमें दुर्गम स्थानों तक सरलतापूर्वक पहुँचने योग्य बना देते हैं॥१०॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी आज्ञा तथा आपके अनुशासन का कोई देवता अथवा अग्रणी मनुष्य भी उल्लंघन नहीं कर सकते॥११॥
हे इन्द्रदेव ! द्युलोक तथा पृथ्वीलोक दोनों ही आपके अदम्य सामर्थ्य की उपासना करते हैं॥१२॥
हे इन्द्रदेव ! काले, लाल आदि अनेकानेक रंग की गौओं में देदीप्यमान श्वेत दुग्ध को आपने स्थापित किया, यह आपकी अद्भुत सामर्थ्य ही हैं॥१३॥
जब समस्त देवता 'अहि' नामक राक्षस से भयभीत होकर भाग गये, तब इन्द्रदेव ने उस रिपु की सामर्थ्य को पहचान लिया॥१४॥
जब से वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ने हमारे रिपुओं का संहार किया, तभी से वे रिपुविहीन तथा अपराजेय हो गये॥१५॥
हे ऋत्विजो ! वृत्रहन्ता, बलशाली, हितैषी इन्द्रदेव की स्तुति करके, तुम्हारे निमित्त महान् ऐश्वर्य प्रदान करता हूँ॥१६॥
बहुत से नामों से युक्त, बहुप्रशंसित हे इन्द्रदेव ! प्रत्येक सोमयज्ञ में जहाँ आप पहुँचते हैं, वहाँ गौओं की कामना वाली बुद्धि से हम आपकी स्तुति करते हैं॥१७॥
जिस देव के लिए बहुत से व्यक्ति सोमरस तैयार करते हैं, जो हमारी कामनाओं के ज्ञाता हैं, युद्धक्षेत्र में शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं, सामर्थ्यवान् और वृत्र संहारक वे इन्द्रदेव हमारी स्तुतियों को ध्यान से सुनें॥१८॥
हे अभीष्ट फलदायक इन्द्रदेव ! आप किस साधन से रक्षा करते हुए हमें अति हर्ष प्रदान करते हैं? कौन सी संरक्षण सामर्थ्य से आप स्तोताओं को सम्पन्न बनायेंगे ?॥१९॥
सामर्थ्यवान् , अश्ववान्, वृत्रहन्ता तथा अभिलाषाओं की पूर्ति करने वाले हे इन्द्रदेव ! किसे याजक के सोम अभिषव में भाग लेकर आप हर्षित होंगे?॥२०॥
है इन्द्रदेव ! आप हर्षित होकर हमें सहस्रों प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करें । वि प्रदाताओं को प्रेरित करने वाले आप, हमारी स्तुतियों पर ध्यान दें॥२१॥
पोषक जल से युक्त यह अभिषुत सोमरस इन्द्रदेव द्वारा पिये जाने की कामना करता हुआ उनकी ओर प्रवाहित होता है। सोमरस उनको आनन्दित करते हुए जल में समाविष्ट हो॥२२॥
इन्द्रदेव की प्रशंसा करने वाले याजकगण अपनी शक्ति से हमारे यज्ञ में अवभृथ स्नान (यज्ञ की समाप्ति पर होने वाला स्नान) होने तक यज्ञाहुतियाँ देते हैं॥२३॥
स्वर्णिम केशों वाले तथा साथ-साथ आनन्दित होने वाले इन्द्रदेव के दोनों अश्व, उन ( इन्द्रदेव) को सोमरूप अन्न की ओर ले आएँ॥२४॥
हे अग्निदेव ! आपके लिए यह सोमरस शोधित हुआ है । पवित्र कुश ( आसन के रूप में) बिछाये गये हैं। आप स्तोताओं के निमित्त इन्द्रदेव का आवाहन करें॥२५॥
हे याजको ! स्तुति करने वालों के निमित्त आप इन्द्रदेव की उपासना करें, जिससे हवि प्रदाता यजमान को वे शक्ति तथा रत्न प्रदान करें॥२६॥
हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! बलवर्धक समस्त स्तोत्रों को हम आपके निमित्त उच्चारित करते हैं । स्तुति प्रदान करने वालों को आप सुख प्रदान करें॥२७॥
हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! आप हमें सुखकारी अन्न-बल से युक्त ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में प्रदान करें, क्योंकि आप ही हमें सुखी बनाते हैं॥२८॥
हे शतक्रतो इन्द्रदेव ! यदि आप हमें सुख प्रदान करने की इच्छा करते हैं, तो समस्त हितकारी ऐश्वर्यों से हमें परिपूर्ण करें॥२९॥
रिपुओं का विनाश करने वाले हे इन्द्रदेव ! सोम अभिषव करने वाले हमें याजक, जब आपका आवाहन करें, तब आप हमें सुख प्रदान करें॥३०॥
है सोमाधिपति इन्द्रदेव ! अपने श्रेष्ठ घोड़ों के द्वारा आप हमारे सोमयज्ञ में बार-बार पधारें॥३१॥
जो इन्द्रदेव वृत्रहन्ता तथा शतक्रतु इन दो नामों ( या कर्मों) से जाने जाते हैं, वे हमारे द्वारा अभिषुत सोमरस के निकट अपने अश्वों द्वारा पधारें॥३२॥
हे शत्रुहन्ता इन्द्रदेव ! सोमरस को पीने की इच्छा से आप हमारे यज्ञ में अश्वों के माध्यम से पधारें॥३३॥
शक्ति-सम्पन्न इन्द्रदेव हमें श्रेष्ठ धन से सदैव परिपूर्ण करें । वे अन्न प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ उत्तराधिकार प्रदान करें । हे बलशाली ! आप हमें बलवान् बनाएँ॥३४॥

सूक्त-९४

धन-सम्पन्न मरुतों की माता गौ ( उत्पादक किरणें ), अन्नादि उत्पन्न करने की इच्छा से अपने पुत्रों को दुग्ध (सोम) का पान कराती हैं। वे मरुद्गणों को रथ से नियोजित करती हैं॥१॥
माता गौ के समीप ( गोद में ) रहकर समस्त देवगण अपने-अपने व्रतो का विधिवत् निर्वाह करते हैं । सूर्य तथा चन्द्रमा भी इनके निकट रहकर समस्त भुवनों को आलोकित करते हैं॥२॥
हे मरुतो ! समस्त स्तोतागण आपके सामर्थ्य की विधिवत् प्रार्थना करते हैं; अत: सोमरस पीने के लिए आप यहाँ पधारें॥३॥
हमारे द्वारा शोधित इस सोमरस का पान तेजस्वी मरुद्गण तथा अश्विनीकुमार करते हैं॥४॥
मित्र, अर्यमा और वरुणदेव इस संस्कारित हुए और तीन पात्रों में रखे हुए प्रशंसनीय सोमरस का पान करते हैं॥५॥
इन्द्रदेव भी प्रात: यज्ञ करने वाले होता की भाँति इस गोदुग्ध युक्त सोम का पान करके आनन्दित होते हैं॥६॥
विद्वान् मरुद्गण वक्र गति द्वारा कब उत्पन्न होंगे? वे रिपुओं का संहार करने वाले हैं । पुनीत शक्ति ग्रहण करने वाले वे मरुद्गण हमारे यज्ञ में कब पधारेंगे?॥७॥
हे मरुतो ! आप अत्यन्त तेजोयुक्त, श्रेष्ठ तथा प्रदीप्त हैं। आपसे सुरक्षा की प्रार्थना हम स्तोतागण कब करें ?॥८॥
जिन मरुद्गणों ने धरती के समस्त पदार्थों तथा दिव्य लोक के तेजोयुक्त पदार्थों को संवधित किया हैं, हम उन वीरों को सोमरस पीने के लिए आहूत करते हैं॥९॥
हे मरुद्गण ! आप अत्यन्त तेजोयुक्त तथा पुनीत शक्ति से सम्पन्न हैं । हम सोमरस पीने के लिए आपका आवाहन करते हैं॥१०॥
जिन मरुतों ने आकाश तथा धरती को आधार प्रदान किया है, उनका हम सोमरस पीने के लिए आवाहन करते हैं॥११॥
जो मरुद्गण पर्वतों पर निवास करने वाले हैं तथा शक्ति से सम्पन्न हैं, उन मरुतों के समूह का सोमरस पान करने के निमित्त हम आवाहन करते हैं॥१२॥

सूक्त-९५

हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! रथारूढ़ होकर सुरक्षित पहुँचने वाले योद्धा के समान तथा बछड़े के पास शीघ्र पहुँचने वाली गौ के समान, 'सोमयाग' में हमारी स्तुतियाँ आपके पास पहुँच जाती हैं॥१॥
हे प्रार्थनीय इन्द्रदेव ! आपके निमित्त समस्त दिशाओं में सोमरस विद्यमान है। अभिषुत सोमरस आपके समीप शीघ्र गमन करे । हे इन्द्रदेव ! आप अन्नरूष सोमरस को पान करें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! आप समस्त प्रजाओं के स्वामी तथा सम्राट् हैं । श्येन पक्षी द्वारा लाये हुए तथा अभिषुत किये हुए सोमरस का आप उत्साहित होने के लिए पान करें । आप समस्त प्रजाओं के स्वामी तथा शासक हैं॥३॥
हे इन्द्रदेव ! सत्कार करने वाले ‘तिरश्ची' ऋषि के स्तोत्रों को आप सुनें । हे महान् इन्द्रदेव ! आप श्रेष्ठ बल एवं गौ प्रदान करते हुए हमें धन-सम्पदा से परिपूर्ण करें॥४॥
हे इन्द्रदेव ! जो भी साधक नवीन आनन्ददायी स्तुतियों से आपका स्तवन करते हैं, उन्हें आप सनातन यज्ञ से वृद्धि को प्राप्त हुई तथा मन को पवित्र करने वाली बुद्धि प्रदान करें॥५॥
जिन इन्द्रदेव की महिमा मंत्रों और स्तोत्रों द्वारा गायी गई है, उन महान् पराक्रमी इन्द्रदेव की हम भक्तिभाव से स्तुति करते हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप शीघ्र पधारें । शुद्ध रूप से उच्चरित साम और यजुर्मत्रों द्वारा हम आपका स्तवन करते हैं। बलवर्धक, मंत्रों से शोधित किया गया, गो-दुग्ध मिश्रित सोमरस आपको आनन्द प्रदान करे॥७॥
हे पवित्र इन्द्रदेव ! आप हमारे निकट आएँ। आप पवित्र होकर पवित्र साधनों सहित आएँ । पवित्र होकर ही हमें ऐश्वर्य प्रदान करें। पवित्र होकर सोमपान करके आप आनन्दित हों॥८॥
हे इन्द्रदेव ! आप पवित्र हैं। हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । उत्तम कर्मों में आने वाले विघ्नों को दूर करें । ऐश्वर्य देने में समर्थ आप हमारे मन्त्रों से शुद्ध होकर शत्रुओं को विनष्ट करें॥९॥

सूक्त-९६

उन इन्द्रदेव के कारण उषाओं ने अपनी चाल को तेज किया। उनके निमित्त रात के चौथे प्रहर में श्रेष्ठ प्रार्थनाएँ उच्चरित की जाती हैं। उन इन्द्रदेव के कारण ही जल (स्नेह) से पूर्ण सप्त मातृकाये ( या नदियाँ) प्रवाहित होती हैं तथा सिन्धु (नदियाँ या समुद्र) मनुष्यों के लिए सुगमता से पार करने योग्य हो जाती हैं॥१॥
अपने वज्र के द्वारा इन्द्रदेव ने बिना किसी की सहायता के एकत्रित हुए पहाड़ों ( या मेघों) के इक्कीस शिखरों को नष्ट कर दिया। उन समृद्धिशाली तथा शक्तिशाली इन्द्रदेव ने जिस शौर्य को प्रकट किया, उसे कोई भी मानव अथवा देव नहीं कर सकते॥२॥
इन्द्रदेव अपने कठोर वज्र को परिपुष्ट भुजाओं में धारण करते हैं। संग्राम में प्रस्थान के समय वे अपने सिर पर मुकुट धारण करते हैं। उनके आदेशों को सुनने तथा मानने के लिए समस्त प्रजाएँ विद्यमान रहती हैं॥३॥
है इन्द्रदेव ! आप यज्ञों में सर्वाधिक पूज्य, च्युत न होने वाले पर्वतों को भी वज्र के प्रहार से विदीर्ण करने वाले तथा मनुष्यों में सबसे अधिक बुद्धि वाले हैं । हम आपके सम्बन्ध में ऐसी मान्यता रखते हैं॥४॥
हे इन्द्रदेव ! मद से चूर 'अहि' नामक असुर का संहार करने के लिए जब आप अपने वज्र को हाथ में उठाते हैं, उस समय आपके सम्मुख पर्वत (मेघ) तथा गौएँ ( किरणें ) नत होते हैं और विद्वान् लोग आपकी प्रार्थना करते हैं॥५॥
जो इन्द्रदेव समस्त प्राणियों को उत्पन्न करते हैं तथा जिनके बाद समस्त जगत् पैदा हुआ, उन इन्द्रदेव को हम स्तोतागण अपनी प्रार्थनाओं द्वारा अपना मित्र बनाते हैं। नमस्कार करते हुए उन शक्तिशाली देव के समीप बैठते हैं॥६॥
हे इन्द्रदेव ! वृत्रासुर के भय से आपके सभी सहायक देवगण आपका परित्याग करके चारों दिशाओं में पलायन कर गये । तदनन्तर मरुद्गणों का सहयोग लेकर आपने शत्रु-सेना को परास्त किया॥७॥
हे इन्द्रदेव ! तिरसठ मरुतों ने बैलों के समूह के समान एकत्रित होकर आपको समृद्ध किया; इससे आप वंदनीय हो गये । हम आपके आश्रय में आते हैं, अत: आप हमें सम्पत्ति प्रदान करें। हम भी सोम की आहुतियाँ समर्पित करके आपकी सामर्थ्य को बढ़ाते हैं ॥८॥
हे इन्द्रदेव ! तीक्ष्ण हथियारों , वज्र तथा मरुतों से सम्पन्न आपकी सेनाओं का कौन शत्रु प्रतिरोध कर सकता है ? सोम से सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! आप, हथियार रहित, देवत्व विहीन राक्षसों को भी अपने चक्र से विनष्ट न करें॥९॥
हे याजको ! आप पशुओं को प्राप्त करने के निमित्त, अत्यन्त शौर्यवान् तथा हितकारी इन्द्रदेव की प्रार्थना करें। उन प्रार्थनीय इन्द्रदेव के निमित्त बारम्बार प्रार्थनाएँ करें, जिससे वे हमारी सन्तानों के लिए प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करें॥१०॥
हे स्तोताओ ! नाविकों द्वारा नदी पार कराने की तरह आप अपनी स्तुतियों को बुद्धिपूर्वक महान् इन्द्रदेव के लिए प्रेषित करें । वे यशस्वी इन्द्रदेव हमें तथा हमारी सन्तानों को प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करें॥११॥
हे स्तोताओ ! आप इन्द्रदेव के निमित्त श्रेष्ठ प्रार्थनाएँ करें । आप उनकी इच्छा के अनुरूप प्रार्थनाएँ करें । आप अपनी गरीबी के लिए विलाप न करें, वरन् पवित्र मन से उनकी प्रार्थना करें । वे आपको प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करेंगे॥१२॥
त्वरित गतिशील, दस हजार सैनिकों सहित आक्रमण करने वाले, सम्पूर्ण संसार को दुःख देने वाले, 'अंशुमती' नदी (यमुना) के तट पर विद्यमान, (सबको आकर्षित करके अपने चंगुल में फंसा लेने वाले) कृष्णासुर पर सर्वप्रिय इन्द्रदेव ने प्रत्याक्रमण करके शत्रुओं की सेना को पराजित कर दिया॥१३॥
इन्द्रदेव ने कहा-'अंशुमती नदी के तट पर गुफाओं में घूमते हुए ‘कृष्णासुर' को हमने सूर्य के सदृश देख लिया है । हे शक्तिशाली मरुतो ! हम आपके सहयोग की आकांक्षा करते हैं। आप संग्राम में उसका संहार करें॥१४॥
अंशुमती नदी के तट पर शीघ्रगामी कृष्णासुर तेज-सम्पन्न होकर निवास करता है । इन्द्रदेव ने बृहस्पति देव की सहायता से, सभी ओर से आक्रमण के लिए बढ़ती हुई उसकी सेनाओं को परास्त किया॥१५॥
अजातशत्रु हे इन्द्रदेव ! वृत्रादि सात राक्षसों के उत्पन्न होते ही आप उनके शत्रु हो गये । (राक्षसों द्वारा स्थापित किये गये) अंधकार से घुलोक और पृथ्वी को (उद्धार करके) आपने प्रकाशित किया । अब आपने इन लोकों को भली-भाँति स्थिर करके ऐश्वर्यवान् तथा सौन्दर्यशाली बना दिया है॥१६॥
वज्र धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप रिपुओं को दबाने वाले हैं। असीमित शक्ति वाले 'शुष्णासुर' को आपने अपने वज्र से विनष्ट किया । राजर्षि 'कुत्स' के निमित्त आपने उसे (शुष्णासुर को) अपने हथियारों द्वारा काट डाला तथा अपने बल से गौओं ( किरणों या जलधाराओं) को उत्पन्न किया॥१७॥
मनुष्यों में सामर्थ्यवान् हे इन्द्रदेव ! आप ही उन रिपुओं का संहार करके बलशाली हुए हैं। आपने ही अवरुद्ध सरिताओं को प्रवाहित किया तथा दस्युओं द्वारा नियन्त्रित किये हुए जल प्रवाहों को अपने अधिकार में किया॥१८॥
सत्कर्म करने वाले इन्द्रदेव सोमयागों में आनन्दित होते हैं। वे अकेले ही मनुष्यों के युद्धों में वृत्र तथा अन्य रिपुओं का संहार अपने पराक्रम द्वारा करते हैं । वे दिन के सदृश ऐश्वर्यवान् हैं तथा अत्यधिक मन्यु (परिष्कृत क्रोध) प्रकट करने वाले हैं॥१९॥
जो वृत्र का संहार करने वाले तथा मुनष्यों का पालन करने वाले हैं, ऐसे आवाहनीय इन्द्रदेव को हम अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा आहूत करते हैं। जो हमारे संरक्षक तथा नियन्त्रक हैं, ऐसे धनवान् इन्द्रदेव हमें अन्न प्रदान करने वाले हैं॥२०॥
शिल्पकारों के संग निवास करने वाले तथा वृत्र का संहार करने वाले इन्द्रदेव प्रकट होते ही आवाहन करने योग्य हो गये । अनेकों व्यक्तियों के निमित्त कल्याणकारी कर्मों को करते हुए, वे इन्द्रदेव पान किये गये सोमरस के सदृश सखाओं द्वारा वरण करने योग्य हो गये॥२१॥

सूक्त-९७

आत्मशक्ति सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! आप राक्षसों से जीतकर लाये गये धन से स्तोताओं का संरक्षण करें और जो आपका आवाहन करते हैं, उनकी वृद्धि करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! आपके पास जो गौएँ, अश्व तथा अविनाशी ऐश्वर्य विद्यमान हैं, उसे आप सोमयागीं तथा दक्षिणा प्रदान करने वाले याजकों को प्रदान करें । आप उसे सम्पत्ति अर्जित करने वाले कृपण जमाखोरों को न दें॥२॥
हे इन्द्रदेव ! जो कुमार्गगामी व्यक्ति अपने कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता, वह अपने ही आचरण से अपने ऐश्वर्य को विनष्ट कर देता है । आप उसके ऐश्वर्य को उससे छिपाकर हमें प्रदान करें॥३॥
सामर्थ्यवान् , वृत्रहन्ता है इन्द्रदेव ! आप दूरस्थ हों या निकट हों, श्रेष्ठ घोड़ों के समान वेगवान् स्तुतियों में सोमयज्ञ में याजक आपका आवाहन करते हैं॥४॥
वृत्र का संहार करने वालों में सर्वश्रेष्ठ हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! आप दिव्यलोक के आलोकित स्थान में निवास करते हों, समुद्र के तल में हों; भूमि या अन्तरिक्ष में जहाँ भी हो; आप उस स्थान से हमारे समीप पधारे॥५॥
सामर्थ्य के स्वामी हे इन्द्रदेव ! आप सोमरस पीने वाले हैं। सोमरस संस्कारित होने पर आप हमें मधुर वचनों से सम्पन्न प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करके हर्षित करें॥६॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे रक्षक तथा बन्धु हैं । आप हमारे इस यज्ञ में पधारें। हमें आप अपने से कभी भी दूर न करें॥७॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे यज्ञ मण्डप में साथ-साथ विद्यमान होकर मधुर सोमरस की पान करने के निमित्त आसीन हों । हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आप स्तोताओं को महान् संरक्षण प्रदान करें॥८॥
वज्र धारण करने वाले हैं इन्द्रदेव ! कोई भी मनुष्य अथवा देवता आपकी बराबरी नहीं कर सकते । आप अपनी शक्ति से समस्त प्राणियों को परास्त करने वाले हैं॥९॥
विगण यज्ञ में मिल-जुलकर, सेनानायक, पराक्रमी-संगठित सेना से युक्त, शस्त्रास्त्र धारण करने वाले इन्द्रदेव को प्रकट करते हैं। वे शत्रुहन्ता, उग्र, महिमाशाली, तीव्र गति से कार्य करने वाले इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं॥१०॥
भादि त्रषियों ( याजकों) ने सोमपान के लिए इन्द्रदेव की स्तुति की । जब (स्तोतागण), देवलोक के स्वामी, बल एवं वैभवसम्पन्न इन्द्रदेव की वन्दना करते हैं, तो वे व्रतधारी ओज़ एवं संरक्षण-साधनों से युक्त हो जाते हैं ॥११॥
नम्र स्वभाव वाले विद्वान् ( भ आदि) नेत्रों एवं वाणी से इन्द्रदेव को नमस्कार करते हैं। किसी से द्रोह न करने वाले हे श्रेष्ठ, तेजस्वी स्तोताओ ! आप भी इन्द्रदेव के कानों को प्रिय लगने वाली चाओं से उनकी स्तुति करें॥१२॥
धनवान्, वीर, महाबलशाली, अपराजेय इन्द्रदेव को हम सहायतार्थ बुलाते हैं। सबसे महान् , यज्ञों में पूज्य इन्द्रदेव की म्तोत्रों द्वारा प्रार्थना करते हैं। वे वज्रधारी ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए हमारे सभी मार्ग मुलभ बनाएँ॥१३॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! आप अपने ओज से रिपुओं की समस्त पुरियों को ध्वस्त करना रानते हैं। वज्र धारण करने वाले हे इन्द्रदेव ! आपके डर से समस्त लोक तथा द्यावा-पृथिवी प्रकम्पित होते हैं॥१४॥
शूरवीर तथा अद्भुत तेजस्वी हे इन्द्रदेव ! आप अपने सत्य से हमारा संरक्षण करें । हे वञ्चिन् इन्द्रदेव ! जिस प्रकार नाविक जल से पार लगा देते हैं, उसी प्रकार आप पापों तथा विपत्तियों से हमें पार लगा दें। आप हमें विविध रूपों वाले वांछित ऐश्वर्य को कब प्रदान करेंगे ?॥१५॥

सूक्त-९८

हे उद्गाताओ ! विवेक-सम्पन्न, महान् , स्तुत्य, ज्ञानवान् इन्द्रदेव के निमित्त आप लोग बृहत्साम ( नामक स्तोत्रों ) का गायन करें॥१॥
सूर्य को प्रकाशित करने वाले, दुष्ट-दुराचारियों को पराजित करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप विश्वकर्मा हैं, विश्व के प्रकाशक हैं, महान् हैं॥२॥
अपने तेज का विस्तार करते हुए सूर्य को प्रकाशित करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप पधारें । समस्त देवतागण आपसे मित्रतापूर्वक सम्पर्क स्थापित करना चाहते हैं॥३॥
सर्वप्रिय, सभी शत्रुओं को जीतने वाले, अपराजेय हे इन्द्रदेव ! पर्वत के सदृश सुविशाल, द्युलोक के अधिपति आप ( अनुदान देने हेतु ) हमारे पास पधारें॥४॥
सत्यपालक, सोमपायी हे इन्द्रदेव ! आप आकाश और पृथ्वी दोनों लोकों को अपने प्रभाव में लेने में समर्थ हैं । हे द्युलोक के स्वामी ! आप सोमयाग कर्ताओं को उन्नति प्रदान करने वाले हैं॥५॥
हे इन्द्रदेव ! आप दुष्टों के अविनाशी पुरों का नाश करने वाले, अज्ञान मिटाने वाले, यज्ञकर्ता, मनुष्यों के मनोबल को बढ़ाने वाले तथा प्रकाशलोक के स्वामी हैं॥६॥
स्तोत्रों से पूजित हे इन्द्रदेव ! आपके पास हम लोग बड़ी-बड़ी कामनाएँ लेकर उसी प्रकार आते हैं, जैसे जल स्वभावत: जल समूह की ओर (नाले नदी की ओर तथा नदियाँ समुद्र की ओर) प्रवाहित होता हैं॥७॥
वज्रधारी, शूरवीर हे इन्द्रदेव ! जैसे नदियों के जल से समुद्र की गरिमा बढ़ती है, उसी तरह हम अपनी स्तुतियों से आपकी गरिमा का विस्तार करते हैं॥८॥
गमनशील इन्द्रदेव के महान् रथ में आज्ञा मात्र से ही दो श्रेष्ठ घोड़े नियोजित हो जाते हैं। स्तोतागण उन्हें स्तोत्रों से नियोजित करते हैं॥९॥
अनेक कार्यों के सम्पादनकर्ता, ज्ञानी हे इन्द्रदेव ! आप हमें शक्ति एवं ऐश्वर्य से पूर्ण करें तथा शत्रु को जीतने वाला पुत्र भी प्रदान करें॥१०॥
सबको आश्रय देने वाले शतकर्मा हे इन्द्रदेव ! आप पिता तुल्य पालन करने वाले और माता तुल्य धारण करने वाले हैं। हम आपके पास सुख माँगने के लिए आते हैं॥११॥
असंख्यों द्वारा स्तुत्य, बलवान्, प्रशंसित, शक्तिशाली हे इन्द्रदेव ! हम आपकी स्तुति करते हुए कामना करते हैं कि हमें उत्तम, तेजस्वी सामर्थ्य प्रदान करें॥१२॥

सूक्त-९९

याजकों द्वारा प्रदत्त सोमरस का निरन्तर सेवन करने वाले हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप त्वजों द्वारा उच्चारित स्तोत्रों को सुनते हुए यज्ञस्थल पर पधारें॥१॥
शिरस्त्राण धारक, अश्वपालक, स्तुति के योग्य हे इन्द्रदेव ! आपका पूजन करने वाले विविध सामग्री से आपको सुसज्जित करते हैं। आप सोमरस से तृप्त हों । हे स्तुतियोग्य इन्द्रदेव ! सोम के बाद आपके अनुरूप अन्न (हविष्य) भी आपको प्रदान किये जाते हैं॥२॥
जैसे किरणें सूर्य के आश्रय में रहती हैं, वैसे ही इन्द्रदेव सम्पूर्ण जगत् के आश्रयदाता हैं । पिता से पुत्र को प्राप्त होने वाले धन के भाग की भाँति इन्द्रदेव से हम अपने भाग की कामना करते हैं, क्योंकि वे ही जन्म लिए हुए तथा जन्म लेने वालों को अपना-अपना भाग प्रदान करते हैं॥३॥
हे स्तोताओ ! सात्विक पुरुषों को धनादि दान करने वाले इन्द्रदेव की स्तुति करें, क्योंकि इनके दान कल्याणकारी प्रेरणा प्रदान करने वाले हैं। जब इन्द्रदेव अपने मन के अनुरूप फल देने की प्रेरणा करते हैं, तो उपासक की कामना को नष्ट नहीं करते॥४॥
हे इन्द्रदेव ! आप संग्राम में शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं। सबके जन्मदाता आप, पालन न करने वालों एवं असुरों को नष्ट करने वाले हैं॥५॥
हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार माता-पिता अपने शिशु की रक्षा में तत्पर रहते हैं। आकाश और पृथ्वी उसी प्रकार शत्रु-संहारक आपके बलों के अनुगामी होते हैं। जब आप वृत्रासुर का वध करते हैं, तब आपके क्रोध के समक्ष युद्ध के लिए तत्पर सभी शत्रुपक्ष वाले कमजोर पड़ जाते हैं॥६॥
हे साधको ! अपने संरक्षण के लिए, शत्रु-संहारक, सर्वप्रेरक, वेगवान्, यज्ञस्थल पर जाने वाले, उत्तम रथी, अहिंसनीय, जलवृष्टि करने वाले तथा अजर-अमर इन्द्रदेव का आवाहन करो॥७॥
अपनी सुरक्षा के लिए हम, रिषुओं का संस्कार करने वाले, सैकड़ों यज्ञादि सत्कर्म करने वाले, अनेकों प्रकार से संरक्षण प्रदान करने वाले, सदैव समान रहने वाले, संसार को आच्छादित करने वाले तथा ऐश्वर्य प्रदान करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं॥८॥

सूक्त-१००

हे इन्द्रदेव ! रिपुओं पर विजय प्राप्त करने के निमित्त हम आपके आगे-आगे चलते हैं तथा समस्त देवता ( संरक्षक बनकर). हमारे पीछे-पीछे चलते हैं। आप हमें शौर्य तथा ऐश्वर्य आदि भोग्य-पदार्थ प्रदान करें॥१॥
हे इन्द्रदेव ! अभिषुत सोमरस आपके लिए भली-भाँति रखा हुआ है । उस सोमभाग को हम आपके सामने प्रस्तुत करते हैं। आप हमारे सखारूप होकर दाहिने हाथ के सदृश रहें, जिससे हम और आप मिलकर अनेकों असुरों का संहार कर सकें॥२॥
शक्ति के आकांक्षी हे मनुष्यो ! वास्तव में यदि इन्द्रदेव शक्तिशाली हैं, तो उनके निमित्त यथार्थरूप में प्रार्थना करें; किन्तु 'भृगुवंशीय नेम' ऋषि तो कहते हैं कि इन्द्रदेव नाम का कोई भी नहीं हैं। यदि कोई है, तो उन्हें किस व्यक्ति ने देखा है ? यदि कोई नहीं है, तो हम किसकी प्रार्थना करें ?॥३॥
हे स्तोताओ ! 'हम' आपके समीप हैं, आप हमें देखें । हम अपनी महिमा से समस्त जीवों को परास्त कर देते हैं । सत्य की दिशाएँ हमें समृद्ध करती हैं। रिषुओं को विदीर्ण करने वाले, हम समस्त लोकों को विनष्ट कर सकते हैं॥४॥
जब यज्ञ की अभिलाषा करने वालों ने हमें अकेले ही यज्ञ के बीच में आसीन कर दिया, तब उन लोगों के मन ने हमारे हृदय से कहा कि हम सन्तानों वाले, सखारूप आपका आवाहन कर रहे हैं॥५॥
हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपने अपने भाता रूप 'शरभ' (समर्थ सहयोगी) ऋषि के निमित्त 'पारावत’ (पर्वत की तरह अवरोधक) के प्रचुर ऐश्वर्य को अपने अधिकार में कर लिया है । इन सोम अभिषव करने वालों को अपने जो ऐश्वर्य प्रदान किया है; आपके वे समस्त कार्य सराहनीय हैं॥६॥
हे पराक्रमियो ! उन इन्द्रदेव ने वृत्र के मर्मस्थल पर वज्र द्वारा प्रहार कर दिया है, इसलिए निश्चित रूप से अब आप सभी रिपुओं पर चढ़ाई (आक्रमण) करें ; क्योंकि कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हैं, जो आपको अवरुद्ध कर सके॥७॥
मन के वेग से चलने वाले गरुड़, लौह नगरों को पार करते हुए दिव्यलोक में पहुँचकर वज्रधारी इन्द्रदेव के निमित्त सोमरस ले आएँ॥८॥
उन इन्द्रदेव का वज्र पानी ( मेघों ) से आवृत होकर समुद्र (अंतरिक्ष) के बीच विद्यमान रहता है । युद्ध की इच्छा करने वाले शत्रु, उस (वज्र) के लिए अपनी बलि चढ़ाते हैं॥९॥
अब अज्ञानियों को ज्ञान-सम्पन्न बनाने वाली तथा विद्वानों को आनन्दित करने वाली वाणी जब यज्ञों में प्रकट होती है, तब चारों दिशाओं से अन्न तथा जल का दोहन होता है । यह दिव्य वाणी किस स्थान से प्रकट हुई, कुछ पता नहीं है?॥१०॥
देवताओं ने जिस दिव्यवाणी को उत्पन्न किया, विविध प्रकार के पशु (प्राणी) उसका उच्चारण करते हैं । अन्न और बल प्रदान करने वाली तथा गौ के सदृश हर्ष प्रदान करने वाली, वह वाणी हमारे द्वारा भली-भाँति स्तुन होती हुई, हमारे समीप आए॥११॥
हे सखा विष्णुदेव ! आप अत्यधिक पराक्रम प्रकट करें । हे द्युलोक ! आप हमारे वज्र के गमन के लिए विस्तृत स्थान प्रदान करें । हे विष्णुदेव ! हम और आप एक साथ होकर वृत्र का संहार करे और जल को प्रवाहित करें । वे जल, मुक्त होकर इन्द्रदेव के आदेश से प्रवाहित हों॥१२॥

सूक्त-१०१

जो व्यक्ति मित्रावरुण को अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए आहुति प्रदान करता है, वहीं यथार्थ रूप में, देवताओं को हर्षित करने के लिए आहुति प्रदान करता है॥१॥
मित्रावरुण अत्यन्त शक्ति-सम्पन्न, तेज-सम्पन्न, श्रेष्ठनायक, विराट् दृष्टि-सम्पन्न तथा महान् मेधावी हैं। वे अपनी दोनों बाहुओं के सदृश सूर्य की रश्मियों के साथ यज्ञ-कृत्य में पधारते हैं॥२॥
हे मित्रावरुणदेवो ! जो यजमान सेवा करने के लिए दूत के रूप में आपके समीप आते हैं, वे स्वर्ण से अलंकृत सिर वाले होकर हर्ष प्रदायक धन प्राप्त करते हैं॥३॥
हे मित्रावरुणदेवो ! जो व्यक्ति किसी प्रश्न में रस नहीं लेते । यज्ञ-कर्म तथा श्रेष्ठ भाषण से भी हर्षित नहीं होते, ऐसे शत्रु के साथ युद्ध में आप अपने बाहुबल से हमारी रक्षा करें॥४॥
हे परमार्थी याज्ञिको ! 'मित्र' 'वरुण' और 'अर्यमादेव' के यज्ञशाला में प्रतिष्ठित होने के बाद आप छन्दोबद्ध गेय स्तोत्रों से उनकी प्रार्थना करें॥५॥
वे मित्रावरुणदेव लाल रंग के सूर्य के सदृश ओजस्वी, विजय प्राप्त कराने वाले तथा सबको निवास प्रदान करने वाले होकर तथा तीनों लोकों (द्यलोक, भूलोक तथा अन्तरिक्ष लोक) के इकलौते पुत्र सूर्य को उदय होने के निमित्त प्रेरणा देते हैं। आलस्यरिहत अविनाशी देवगण मनुष्यों के स्थानों का निरीक्षण करते हैं॥६॥
सत्य का पालन करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे द्वारा उच्चारित की गई वाणी के पास हवियों के सेवन करने के निमित्त पधारें॥७॥
धन-धान्य से सम्पन्न हे अश्विनीकुमारो ! हम, आप दोनों से नीतियुक्त दान की कामना करते हैं । जमदग्न उष से स्तुत्य होकर उनकी प्राचीन स्तुतियों को समृद्ध करते हुए आप दोनों पधारें॥८॥
हे वायो ! भली-भाँति अभिषुत किये गये पवित्र सोमरस को हम आपके लिए प्रदान करते हैं । दिव्यलोक का स्पर्श करने वाले हमारे इस यज्ञ में श्रेष्ठ स्तोत्रों के समीप आप पधारें॥९॥
हे वायो ! याजकगण आपके सेवन के लिए आहुतियों को सरल मार्गों से ले जाते हैं। आप शुद्ध तथा गौदुग्ध मिले हुए, हमारे दोनों तरह के सोमरस का पान करें॥१०॥
प्रेरक, अदितिपुत्र हे इन्द्रदेव ! यह सुनिश्चित सत्य हैं कि आप महान् तेजस्वी हैं । हे देव ! आप महान् शक्तिशाली भी हैं, आपकी महानता का हम गुण-गान करते हैं॥११॥
हे सूर्यदेव ! आप अपने यश के कारण महान् हैं। देवों के बीच विशेष महत्त्व के कारण आप महान् हैं । आप तमिस्रा (अन्धकार) रूपी असुरों का नाश करने वाले हैं। पुरोहित के समान देवों का नेतृत्व करने वाले हैं। आपका तेज अदम्य, सर्वव्यापी और अविनाशी है॥१२॥
वे सौन्दर्य युक्त उषा देवी नीचे की तरफ मुख किए हुए सूर्य के प्रताप से ही उत्पन्न हुई हैं। वे विश्व की दशों दिशाओं से आती हुई, चिह्नित गौ के सदृश दर्शनीय हैं॥१३॥
तीनों भुवनों में जिन प्रजाओं का सृजन किया गया हैं, वे समस्त प्रज्ञाएँ सूर्यदेव के आश्रित रहती हैं। वे विराट् सूर्यदेव समस्त लोकों में व्याप्त हैं तथा वायुदेव समस्त दिशाओं में समाविष्ट हो रहे हैं॥१४॥
हम विद्वान् लोगों से यही कहते हैं कि वे अपराधरहित तथा न मारने योग्य गौओं को न मारें, क्योंकि गौ-रुद्रों की माँ, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहिन तथा अमृत की मूल हैं॥१५॥
जो वाणी को प्रेरणा प्रदान करती हैं, सबको देवत्व प्रदान करती हैं, हर प्रकार से वर्णित की जाती हैं तथा हमारी ओर आती हैं, ऐसी गौ (विद्या) को हीन बुद्धि वाले मनुष्य ही त्यागते हैं॥१६॥

सूक्त-१०२

हे अग्निदेव ! आप अत्यन्त ज्ञानी, घर के मालिक तथा हमेशा युवा बने रहने वाले हैं। हवि प्रदान करने वालों को आप महान् अन्न प्रदान करते हैं॥१॥
हे तेजसम्पन्न अग्निदेव ! आप श्रेष्ठ ज्ञानी हैं। हमारी भावविह्वल पुकार से प्रेरित होकर समस्त देवों को आप यहाँ ले आएँ॥२॥
अत्यन्त बलशाली हे अग्निदेव ! समस्त देवों को सन्मार्ग में प्रेरित करने वाले आप ही हैं । हम आपके सहयोग से धन-धान्य प्राप्त करने के लिए रिपुओं को परास्त करें॥३॥
समुद्र में वास करने वाले हे अग्निदेव ! 'भृगु’ और ‘अप्नवान्' आदि ज्ञानी अषियों ने सच्चे मन से आपकी प्रार्थना की हैं। हम भी हृदय से आपकी स्तुति करते हैं॥४॥
मेघों के सदृश गर्जना करने वाले, सागर में सोने वाले, वायु के सदृश शब्द करने वाले अत्यन्त शक्तिशाली तथा विद्वान् अग्निदेव को हम बुलाते हैं ॥५॥
'भग' देवता के भोग के सदृश तथा आदित्य के उदय होने के सदृश सागर में सोने वाले अग्निदेव को हम बुलाते हैं॥६॥
हे ऋत्विजो ! अपने श्रेष्ठतम पारमार्थिक कार्यों ( यज्ञों) में सहायक, अतिश्रेष्ठ, सबके हितैषी तथा बलशाली अग्निदेव का सान्निध्य प्राप्त करो॥७॥
विश्वकर्मा ( बढ़ई) जिस प्रकार लकड़ी को संस्कारित करके उत्तम स्वरूप प्रदान करता है, उसी प्रकार इन अग्निदेव के कर्मों से हम यशस्वी होते हैं एवं श्रेष्ठ स्वरूप प्राप्त करते हैं॥८॥
सभी प्रकार के ऐश्वर्यों को प्रदान करने वाले अग्निदेव हमारे निकट अन्न एवं धन सहित पधारें॥९॥
हे. याजको.! समस्त होताओं में सर्वाधिक कीर्तिमान् तथा यज्ञों में प्रमुख अग्निदेव की यज्ञमण्डप में आप प्रार्थना करें॥१०॥
जो अग्निदेव देवताओं में सर्वश्रेष्ठ तथा अत्यन्त ज्ञानी होकर याजकों के गृह ( यज्ञमण्डप) में प्रदीप्त होते हैं, हम उन पवित्र ज्योतिरूप अग्निदेव की प्रार्थना करें॥११॥
हे स्तोताओ ! अश्व की भाँति सेवा करने योग्य, अत्यन्त शक्ति-सम्पन्न, सखा की तरह हर्ष प्रदायक तथा रिपुओं का संहार करने वाले उन अग्निदेव की प्रार्थना करें॥१२॥
हे अग्निदेव ! यजमान की वाणी से उच्चरित होने वाली प्रिय स्तुतियाँ आपके गुणों को प्रकट करती हैं। वे (यजमान) वायु के सहयोग से आपको प्रदीप्त करते हैं॥१३॥
जिन अग्निदेव (या अग्निकुण्ड) के चारों ओर तीन धारण क्षमताएँ ( या मेखलाएँ) बँधी हुई हैं तथा जिनके चारों ओर विभिन्न लोक ( या कुशाएँ ) खुली स्थिति में स्थापित हैं, उन (अग्निदेव) के साथ जल भी स्थिर पद प्राप्त करता है॥१४॥
प्रशंसनीय और तेजस्वी अग्निदेव के स्थाने, रिपुओं की बाधाओं से रहित एवं सुरक्षित हैं। उनका दर्शन भी सूर्य दर्शन के समान कल्याणकारी है॥१५॥
हे अग्निदेव ! आपकी वृद्धि के साधनभूत, घी से समर्थ (प्रज्वलित) होते हुए, आप अपनी लपटों के द्वारा देवों का आवाहन करें तथा उनका यजन करें॥१६॥
हे अग्निदेव ! आप विद्वान्, अविनाशी तथा आहुतियों का वहन करने वाले हैं। सभी देवताओं ने आपको माता के समान उत्पन्न किया है॥१७॥
हे ज्ञानी अग्निदेव ! आप श्रेष्ठ ज्ञान वाले, आहुतियों का वहन करने वाले तथा वरण करने योग्य हैं। आपको समस्त देवता सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित करते हैं॥१८॥
हे अग्निदेव ! हमारे पास ( अग्नि के लिए उपयोगी) दुग्ध प्रदान करने वाली गौ नहीं है और न ही लकड़ी ( समिधा) काटने वाली कुल्हाड़ी है, फिर भी अपने कल्याण के लिए ( अभाव में भी हम आपका पोषण करते हैं॥१९॥
हे सामर्थ्यवान् अग्निदेव ! जो भी समिधाएँ आपके निमित्त समर्पित की जाएँ, वे सभी घृत-आहुतियों के समान ही आपको परमप्रिय हों । आप उन सभी को प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करें॥२०॥
हे तरुण अग्निदेव ! दीमक जिस काष्ठ को चट कर जाती है, वल्मीक जिस काष्ठ को खा जाती हैं, ऐसे काष्ठ की समिधाएँ आपको घृतवत् प्रिय हों॥२१॥
मनोयोगपूर्वक अग्नि प्रदीप्त करने वाले साधक अपनी श्रद्धा को भी प्रदीप्त करते हैं। अस्तु, ( सूर्य किरणों) के साथ ही अग्निहोत्र की व्यवस्था करते हैं॥२२॥

सूक्त-१०३

धर्ममार्गों के ज्ञाता अग्निदेव प्रकट हो गये हैं, जिनके माध्यम से यज्ञ के नियम पूरे किये जाते हैं। उत्तम मार्ग से प्रकट हुए, सज्जनों की प्रगति के आधार अग्निदेव हमारी स्तुतियाँ स्वीकार करें॥१॥
इन्द्रदेव के समतुल्य शक्तिशाली अग्निदेवदिवोदास' (दिव्य कार्यों के लिए समर्पित व्यक्ति के लिए पृथ्वी पर प्रकट हुए। अपने यज्ञीय कार्यों के परिणाम स्वरूप वे (दिवोदास) स्वर्ग के अधिकारी बने॥२॥
कर्तव्य परायणों से कर्महीन मनुष्य भयभीत रहते हैं । हे मनुष्यो ! सहस्रों देने वाले-बुद्धिपूर्वक उत्तम कर्मों से सहस्रों ऐश्वर्य देने वाले अग्निदेव की सेवा करो॥३॥
सर्वाधार हे अग्निदेव ! जो साधक ऐश्वर्य के लिए आपके उपासक बनकरे हवि प्रदान करते हैं, वे सहस्रों व्यक्तियों के पोषण में सक्षम वीर पुत्र को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं॥४॥
प्रचुर ऐश्वर्यों के स्वामी हे अग्निदेव ! जो याजक आपकी प्रार्थना करते हैं, वे शक्तिशाली रिपुओं की सुदृढ़ पुरियों में विद्यमान अन्न को, अपने अश्वों द्वारा विनष्ट करके, अविनाशी कीर्ति ग्रहण करते हैं । हे अग्निदेव ! आप जैसे महान् दाता के अधीन रहकर हम भी श्रेष्ठ ऐश्वर्यों को प्राप्त करें॥५॥
याजकों को धन-धान्य के रूप में अपार वैभव देकर आनन्दित करने वाले अग्निदेव की , हम प्रथम स्तुति करते हैं, जैसे उन्हें सर्वप्रथम सोम का पात्र समर्पित किया जाता हैं॥६॥
हे अग्ने ! श्रेष्ठ दान-दाता और देवपक्षधर यजमानों द्वारा रथ में जोते गये अश्वों के रथ वाहक के समान ही आपकी स्तुति की जाती है। आप याजकों के पुत्र-पौत्रादिकों को, धनवानों के धन को छीनकर प्रदान करें॥७॥
हे स्तोताओ ! आप श्रेष्ठ स्तोत्रों द्वारा अग्निदेव की स्तुति करें । वे महान् सत्य और यज्ञ के पालक, महान् तेजस्वी और रक्षक हैं॥८॥
वीरों के समान प्रतापी अग्निदेव, आवाहित एवं प्रदीप्त होकर श्रेयस्कर अन्न-धन प्रदान करते हैं । इन अग्निदेव की अनुकूलता हमें प्रचुर मात्रा में धन-धान्य प्रदान करे॥९॥
हे स्तोताओ ! जो अग्निदेव आत्मीय जनों में सबसे अधिक पूज्य अतिथि स्वरूप तथा समस्त रथों का नियंत्रण करने वाले हैं, उन अग्निदेव की आप सभी प्रार्थना करें॥१०॥
वे अग्निदेव अत्यन्त विद्वान् और वन्दनीय हैं तथा वे प्रकट और गुप्त ऐश्वर्यों को प्रदान करते हैं। जिनकी विशाल लपटें, अधोगामी सागर की तरंगों की तरह भयंकर हैं, उन अग्निदेव की आप प्रार्थना करें॥११॥
हमारे प्रिय अतिथि स्वरूप अग्निदेव को यज्ञ से दूर मत ले जाओ। वे देवताओं को बुलाने वाले, धनदाता एवं अनेकों मनुष्यों द्वारा स्तुत्य हैं॥१२॥
सबको निवास प्रदान करने वाले हे अग्निदेव ! जो यजमान अपनी श्रेष्ठ वाणियों तथा श्रेष्ठ साधनों के द्वारा आपकी साधना करते हैं, वे कभी भी दुःखी नहीं होते । यज्ञ सम्पादन करने वाले एवं आहुति प्रदान करने वाले याजक तथा सन्देशवाहक का कार्य करने वाले भी आपकी स्तुति करते हैं॥१३॥
मरुतों के मित्र है अग्निदेव ! आप हमारे यज्ञमण्ड़प में सोमपान के निमित्त मरुद्गणों के साथ पधारें । हे अग्निदेव ! मुझ 'सोभरि' ऋषि की प्रार्थनाओं को ग्रहण करके आप हर्षित हों॥१४॥


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