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| Rigveda | Gyan Dhyan Sanskar |
सूक्त-१
| हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए पान करने हेतु निकाले गये हैं, अत: अत्यन्त स्वादिष्ट, हर्ष प्रदायक धार के रूप में प्रवाहित हों॥१॥ |
| दुष्टों का नाश करने वाले, मानवों के लिए हितकारी, सोमदेव शुद्ध होकर सुवर्ण पात्र (द्रोण कलश) में भरकर यज्ञ स्थल पर प्रतिष्ठित हो गये हैं॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आप महान् ऐश्वर्य प्रदाता तथा शत्रुओं ( विकारों ) को नष्ट करने वाले हों । वृत्रासुर का हनन करके, उसका महान् धन हमें प्रदान करें॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आप श्रेष्ठ देवगणों के यज्ञ में अन्न सहित पहुँचे तथा हमें अन्न और बल प्रदान करें॥४॥ |
| हे सोम ! हमारी इच्छायें सदैव आपको समर्पित रहती हैं, अत: हम उत्तम विधि से आपकी सेवा करते हैं॥५॥ |
| हे सोमदेव ! सूर्य पुत्री (उषा) आपके रस को सनातन (प्रकाशरूप) आवणं से पवित्र बनाती है॥६॥ |
| सोम को पवित्र करते समय बहिनों के समान दस अँगुलियाँ (रस निकालने के लिए) उस सोमवल्ली को पकड़ती हैं॥७॥ |
| तेजस्वी दिखाई पड़ने वाले इस सोमरस को अँगुलियाँ लातीं और दबाकर निकालती हैं। इस दुःख निवारक मधुर रस में तीन शक्तियाँ (शरीर, मन और बुद्धि को सामर्थ्य प्रदान करने वाली) विद्यमान हैं॥८॥ |
| ने मारी जाने योग्य गौएँ अपने बछड़े को पुष्ट करने के लिए उन्हें (दूध) पिलाती हैं । (इसी प्रकार) सोम इन्द्रदेव को पुष्ट बनाता है॥९॥ |
| सोमपान करने से आनन्दित हुए इन्द्रदेव शत्रुओं का संहार करके याज्ञिकों को धन प्रदान करते हैं॥१०॥ |
सूक्त-२
| हे सोमदेव ! देव शक्तियों का सान्निध्य पाने की इच्छा करने वाले आप तीव्र गति से शोधित हों । हे सोमदेव ! बलवर्द्धक आप इन्द्रदेव की तृप्ति के लिए प्रतिष्ठित हों॥१॥ |
| हे सोमदेव ! शौर्यवान्, दीप्तिमान् और सर्वधारक गुणों से युक्त आप हमें प्रचुर मात्रा में अन्न और बल प्रदान करें तथा आप निर्धारित स्थल पर पधारें॥२॥ |
| शोधित सोमरस की धाराएँ प्रिय मधुर रस को पात्र में संगृहीत करती हैं। सत्कर्मों से युक्त याज्ञिक सोम को जल में मिश्रित करते हैं॥३॥ |
| हे सोमदेव ! जिस समय आप गौ (किरणों अथवा गौ दुग्ध) में मिश्रित होते हैं, उस समय महान् जल (श्रेष्ठ रसादि) आकी ओर आकर्षित होता है॥४॥ |
| जल से युक्त, देवलोक का धारक और आधारभूत हमारा इच्छित सोमरस जल में मिश्रित और शोधित होकर हमारे निकट आता है॥५॥ |
| मित्र के समान प्रिय, शक्तिमान् , हरिताभ सोमरस, निचोड़े जाते समय शब्द करता हुआ, उसी प्रकार प्रकाशित होता है, जिस प्रकार सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं॥६॥ |
| हे सोमदेव ! आपकी शक्ति-सामर्थ्य से ही कर्म की प्रेरणा पाने वाले स्तोतागण वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हैं । वे स्तुति मन्त्रों द्वारा आनन्द वृद्धि के लिए आपको सुशोभित करते हैं.॥७॥ |
| संसार के कल्याण की इच्छा से शत्रुओं का संहार करने वाले हे सोमदेव ! हम आनन्दवृद्धि के लिए महान् स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते हैं॥८॥ |
| हे सोमदेव ! प्राण-पर्जन्य की वर्षा के समान आप हमारी इन्द्रियों की शक्ति-सामर्थ्य को अपनी अमृत रूपी मधुर धारा से बढ़ायें॥९॥ |
| हे सोमदेव ! यज्ञ के मूल तथा प्रमुख आत्मा के रूप में आप हमें गौ, अश्व, अन्न और सुसन्तति प्रदान करने वाले हों॥१०॥ |
सूक्त-३
| अमरणधर्मा ये दिव्य सोम्देव गतिमान् पक्षी के सदृश, कलश में वेग से प्रविष्ट होते हैं॥१॥ |
| अँगुलियों द्वारा निचोड़कर शोधित किया गया सोम, स्वयं अदम्य रहकर शत्रुओं का दमन करता हैं॥२॥ |
| इस शोधित किये गये सोमरस को उद्गातागण स्तुतियों द्वारा उसी तरह विभूषित करते हैं, जिस प्रकार युद्धोन्मुख अश्व को सब प्रकार से सुसज्जित किया जाता है, मंत्रशक्ति द्वारा शोधित सोम को अधिक प्रभावोत्पादक बनाया जाता है॥३॥ |
| यह शोधित, बलयुक्त सोम अपनी सामर्थ्य से उत्तम ऐश्वर्य को प्राप्त करते हुए उसके समुचित वितरण की इच्छा करता है॥४॥ |
| ये शोधित दिव्य सोमदेव ध्वनि करते हुए यज्ञ स्थल में जाने हेतु उपयुक्त माध्यम की कामना करते हैं । वे याजकों को इष्ट-पदार्थ प्रदान करने की इच्छा रखते हैं॥५॥ |
| श्रेष्ठ पुरुषों से प्रशंसा पाने वाले ये दिव्य सोमदेव, हविदाता को धन-वैभव प्रदान करते हुए, जल में मिश्रित होते हैं॥६॥ |
| शोधित होकर , शब्द करते हुए न्यू रूप में प्रकट सोमदेव , शत्रुलोकों ( प्रकृति चक्र में आने वाले अवरोधों ) को जीतकर यज्ञ के प्रभू: * ॐ त ऊो प्राप्त करते हैं॥७॥ |
| उत्तम, यज्ञकारक, शोधित, दिव्य मदेव को पराजित करने में समर्थ हुए, वे इस यज्ञ-स्थल से दिव्यलोक को गमन करते हैं॥८॥ |
| सनातन रीति से संस्कारित कि दी यह हरिताभ44 देवों के लिए छानकर शोधित किया जाता हैं॥९॥ |
| विशिष्ट कार्यक्षमता के जनक और पोषक आहार पत्र करने वाले ये सोमदेव अपने प्रवाह के क्रम में स्वाभाविक रूप से शुद्ध हो जाते हैं॥१०॥ |
सूक्त-४
| अत्यधिक स्तुत्य, पवित्र हे सोमदेव ! आप देवशक्तियों को उपलब्ध हों तथा बैरियों पर विजय प्राप्ति के बाद हमें कीर्तिमान् बनायें॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें तेजस्विता प्रदान करें। सभी स्वर्गापम सुख और सौभाग्य देते हुए आप हमारा कल्याण करें॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें बल और यज्ञीय कर्तव्य पालन करने की शक्ति प्रदान करें तथा शत्रुपक्ष को पराजित करके हमारा कल्याण करें॥३॥ |
| सोमरस शोधित करने वाले बाजको ! आप इन्द्रदेव के पान हेतु सोमरस को पवित्र करें । (जिस पीकर) वे हमारा कल्याण करें॥४॥ |
| हे सोमदेव ! आप अपने सत्कर्मों और संरक्षण-युक्त साधनों से हमें सूर्यदेव की ओर प्रेरित करें, जिससे हमारा श्रेष्ठ हित हो॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आपके द्वारा प्रदत्त सद्ज्ञान से एवं आपके संरक्षण से युक्त हम बहुत वर्षों तक सूर्यदर्शन (दीर्घायुष्य) से लाभान्वित हों, आप हमारा मंगल करें॥६॥ |
| हे श्रेष्ठ शस्त्रधारी सोमदेव ! लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के धन से आप हमें सम्पन्न करें, जिससे हम सुख को प्राप्त करें॥७॥ |
| हे शक्तिसम्पन्न सोमदेव ! युद्ध-भूमि में विजयी होने वाले और बैरियों को पराजित करने वाले आप कलश में स्थापित हों और हमें कल्याण से युक्त करें॥८॥ |
| हे पवित्रता से युक्त सोमदेव ! अति फलदायक यज्ञ में यजमान उत्तम स्तोत्रों का गान करते हुए आपकी महिमा को बढ़ाते हैं, आप हमें कल्याण से युक्त करें॥९॥ |
| हे सोमदेव ! हमें विचित्र अश्वों से सम्पन्न और सर्वलोक हितकारी वैभव पर्याप्त मात्रा में प्रदान करें जिससे हम सुख को प्राप्त करें॥१०॥ |
सूक्त-५
| सबका स्वामी, तेजस्वी, बलशाली सोम शब्द करता हुआ पवित्र होता हैं और सबको सन्तुष्ट करता है॥१॥ |
| शरीर को क्षीण न करने वाला यह पवित्र सोमरस अन्तरिक्ष से चमकते हुए उच्च भाग से तेजस्वीरूप में सवित होता है॥२॥ |
| प्रशंसा के योग्य यह पवित्र सोम तेजस्वी होकर अपनी मधुर रस धाराओं से सुशोभित होता हुआ (याज्ञिकों को ) इच्छित धन प्रदान करता है॥३॥ |
| हरिताभ दिव्य सौम शोधित होते समय देवगणों के सम्मुख फैलाये गये आसन की ओर अपनी शक्ति से बढ़ता हैं॥४॥ |
| उत्तम विधि से पूजित स्वर्णिम किरणें दिव्य सोम के साथ अपने पराक्रम से सभी ओर दृष्टिगोचर होती हैं॥५॥ |
| यह सोम महान् गुणों से युक्त, पूज्य, दर्शनीय तथा सुन्दर उषा (दिवारात्रि के आगमन) की इच्छा करता है॥६॥ |
| मानव मात्र के द्रष्टा तथा दिव्य होता, इन दोनों (इन्द्र तथा सोम) देवताओं की हम प्रार्थना करते हैं॥७॥ |
| हमारे इस पवित्र यज्ञ में भारती (भाषा की अधिष्ठात्री), सरस्वती (विद्या की अधिष्ठात्री) तथा इडा (वाक् कों अधिष्ठात्री) तीनों देवियाँ पधारें॥८॥ |
| सनातन प्रजापालक, सृष्टिकर्ता, आगे ले जाने वाले त्वष्टा देव को हम आवाहन करते हैं। हरिताभ पवित्र सोम तथा इच्छाओं की पूर्ति करने वाले प्रजापालक इन्द्रदेव का भी हम इस यज्ञ में आवाहन करते हैं॥९॥ |
| हे पवमान सोमदेव ! आप अपनी सहस्रों मधुर धाराओं के संयोग से वनस्पतियों को हरा (विकसित करने वाले तथा स्वर्णिम प्रकाशयुक्त हजारों धाराओं से (जीव-जगत् को) सिंचित करने वाले हैं॥१०॥ |
| हे वायु, बृहस्पति, सूर्य, अग्नि तथा इन्द्रदेव ! आप सभी इस यज्ञ में आएँ तथा उत्तम सम्मान प्राप्त करे॥११॥ |
सूक्त-६
| बलवर्धक, देवताओं के अभीष्ट, हे सोमदेव ! आप हमें संरक्षण प्रदान करें और आनन्ददायक धारा के रूप में छलनी से शोधित हों॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप परमात्मा हैं, अत: आनन्द प्रदान करने वाले सोमरस की वर्षा करें और हमें बलशाली घोड़े भी प्रदान करें॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आप रस निकालते समय शाश्वत आनन्द की वृद्धि करने वाले बनकर श्रेष्ठ यज्ञ स्थल में पधारे तथा हमें अन्न और बल प्रदान करें॥३॥ |
| शीघ्रगामी, शोधित सोमरस उत्तम मार्ग से जलधाराओं के समान प्रवाहित होकर इन्द्रदेव को प्राप्त हो॥४॥ |
| वन में उत्पन्न होने वाले, सूर्य से भी अधिक तेजस्वी, जिसको चपल घोड़े सदृश दस अंगुलियाँ निचोड़ती हैं॥५॥ |
| उस बलवर्धक, देवगणों के लिए आनन्ददायी सोमरस को गाय के दूध के साथ मिश्रित करते हैं॥६॥ |
| यह दिव्य सौमरस इन्द्रदेव के लिए धार रूप से पात्र में गिरता है, जो इन्द्रदेव के लिए पुष्टिकारक है॥७॥ |
| यज्ञ की आत्मा के रूप में यह सोमरस यजमान की कामनाओं की पूर्ति के लिए पात्र में द्रुतगति से नि:सृत होता है तथा सनातन स्तोत्रों की मर्यादा का पालन करता है (मन्त्र के भाव से प्रवाहित होती हैं)॥८॥ |
| हे आनन्दवर्धक सोमदेव ! स्तुतिरूपी वाणी को स्वीकार कर आप इन्द्रदेव के पान करने के उद्देश्य से आनन्ददायी बनकर यज्ञशाला में स्थापित हों॥९॥ |
सूक्त-७
| यज्ञमान एवं देवताओं के सम्बन्ध में भली-भाँति जानते हुए, यशस्वी सोमदेव धर्म कार्यों की तरह यज्ञ मार्ग में आरूढ़ होते हैं॥१॥ |
| हवियों में श्रेष्ठ प्रशंसित, हविरूप सोम जल में मिश्रित होता हुआ मधुर रसधार से पात्र में स्थिर हो रहा है॥२॥ |
| आहुतियों में अग्रिम, वाणी का उत्पादक, शक्तिशाली, सत्ययुक्त और अहिंसक यह सोमरस जल के साथ मिश्रित होकर यज्ञशाला में प्रविष्ट होता है॥३॥ |
| प्रज्ञावान् सोमदेव अपनी शक्ति-सामर्थ्य से मनुष्यों में पवित्रता का संचार करते हैं। वे जब स्तुतियों को स्वीकार करते हैं, तब शक्तिशाली इन्द्रदेव स्वर्ग से यज्ञ स्थल पर आने के लिए उद्यत होते हैं॥४॥ |
| याज्ञिकों की प्रेरणा से संस्कारित सोमदेव, राजा की भाँति प्रजा की रक्षा तथा शत्रुओं का संहार करने के लिए तैयार होते हैं॥५॥ |
| जल मिश्रित हरिताभ सोम, शोधक (यन्त्र) द्वारा पवित्र होते समय, अत्विजों द्वारा की गई स्तुतियों को स्वीकार करते हुए, ध्वनि के साथ पात्र में स्थिर हो रहा है॥६॥ |
| जो याजक इस सोम को निकालने एवं शुद्ध करने में संलग्न रहते हैं, वे आनन्दवर्धक सोम के साथ वायु इन्द्र और अश्विनीकुमारों का सान्निध्य लाभ प्राप्त करते हैं॥७॥ |
| जिन त्वजों द्वारा मधुर सोम की धाराएँ मित्र, वरुण और भग देवों के निमित्त प्रवाहित होती हैं, ऐसे सोम की महिमा से परिचित याजक आनन्द की प्राप्ति करते हैं॥८॥ |
| हे पृथ्वी और द्युलोक के अधिष्ठाता देवता ! सोमरस रूप श्रेष्ठ पोषक आहार को प्राप्त करने के लिए आप हमें धन-धान्य के रूप में अपार वैभव प्रदान करें॥९॥ |
सूक्त-८
| इन्द्रदेव की सामर्थ्य में वृद्धि करने वाला यह सोम इन्द्रदेव को प्रिय लगने वाले रसों की वर्षा करता है॥१॥ |
| हे शुद्ध सोमदेव ! आप वायु और अश्विनीकुमारों के साथ मिलकर हमें वीरोचित श्रेष्ठता प्रदान करें॥२॥ |
| हे पवित्र सोमदेव ! आप इन्द्रदेव की आराधना के लिए हमारे हृदय में प्रेरणा उत्पन्न करें । हम देवों के अनुकूल यज्ञ कर्म हेतु प्रस्तुत हुए हैं॥३॥ |
| हे सोमदेव ! दस दिशाएँ आपका मार्जन करती हैं, सप्त धारण शक्तियाँ आपको संवर्द्धित करती हैं। विप्र-सत्पुरुष आपको (स्तुतियों या यज्ञीय कृत्यों द्वारा) सन्तुष्ट करते हैं॥४॥ |
| शोधित होने वाले सुखद हे सोम ! देवताओं को आनन्दित करने के लिए हम आपको गौदुग्ध में मिलाते हैं ।॥५॥ |
| शुद्ध होकर कलश में स्थापित होने वाले हरिताभ सोम को गौ दुग्ध धारण कर लेता है॥६॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें धन-ऐश्वर्य से युक्त करने के लिए पवित्र हों, द्वेष करने वालों का नाश करें और मित्ररूप इन्द्रदेव के साथ एकाकार हो जाएँ॥७॥ |
| हे सोमदेव ! आप आकाश से पृथ्वी पर दिव्येवृष्टि करें, पृथ्वी पर पोषक रस उत्पन्न करें और हमें संघर्ष की शक्ति प्रदान करें॥८॥ |
| हे सोमदेव ! समस्त प्राणियों का निरीक्षण करने वाले सर्वज्ञ इन्द्रदेव के द्वारा पात्र किये जाने वाले आप हमें सन्तान, अन्न, बल और सद्ज्ञान आदि प्रदान करे॥९॥ |
सूक्त-९
| बुद्धि को बढ़ाने वाला यह सोम, सोमरस निकालने के दो फलकों (दो पाटों द्युलोक एवं पृथ्वी) के बीच में स्थित होकर ब्रह्मनिष्ठों द्वारा सचेतन प्राणियों तक पहुँचाया जाता है । ॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आपके स्थायित्व के लिए प्रयत्नशील, द्रोहरहित, मित्रभाव से गुणगान करने वाले, मनुष्यों के लिए पोषक आहार के रूप में उपयोग किए गए आप स्तुति के योग्य हैं॥२॥ |
| संस्कारित होता हुआ वह सोमरूपी महान् पुत्र, यज्ञ को पोषण देने वाले प्रसिद्ध माता-पिता अन्तरिक्ष और पृथ्वी को सुशोभित करती है॥३॥ |
| धारण शक्तियों से सुरक्षित, द्रोहरहित सोम (प्रकृति के) सप्त प्रवाहों अथवा नदियों को आनन्दित करता है, जो( वे सप्त-नदियाँ) इस क्षीण न होने वाले सोम को संवर्धित करती हैं.॥४॥ |
| है इन्द्रदेव ! यज्ञ में देवताओं को अर्पित करने के लिए अहिंसित, बलवान्, तरुण सोम को वे ( धारण क्षमताएँ) अपने अंदर समाहित करती हैं॥५॥ |
| हवनीय पदार्थों से देवताओं को तृप्त करने वाला, यज्ञ संचालक, न मारे जाने वाला सोम सातों प्रवाहों को देखता है । वह कूप के समान जल से पूर्ण होकर दिव्य प्रवाहों को तृप्ति प्रदान करता है॥६॥ |
| पवित्रता प्रदान करने वाले हे दिव्य सोमदेव ! आप युद्ध की इच्छा करने वाले राक्षसों का संहार कर प्रत्येक अवसरों पर हमारा संरक्षण करें॥७॥ |
| स्तुति योग्य, हमारे प्रशंसनीय हे सोमदेव ! सूक्तों को सुनने के लिए आप सनातन रूप में अपना तेज़ प्रकट करते हुए उत्तम मार्ग से पधारें॥८॥ |
| हे सोमदेव ! आप अन्न, गौ तथा अश्व सहित वीर सन्तति प्रदान करने वाले हैं। इन सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त करते हुए आप हमें सद्बुद्धि प्रदान करें॥९॥ |
सूक्त-१०
| अश्वों एवं रथों की भाँति वेगपूर्वक तथा ध्वनि करते हुए सोमरस का शोधन हो रहा है । शोधित सोमदेव में अपार यश एवं वैभव प्रदान करते हैं॥१॥ |
| युद्ध में जा रहे रथों के समान यज्ञ की ओर जाने वाले सोमरस को, भारवाहक द्वारा दोनों हाथों से उठाये गये बोझ के समान याजकगण धारण करते हैं॥२॥ |
| प्रशंसित राजा तथा सात याजकों द्वारा जिस प्रकार यज्ञदेव की प्रतिष्ठा होती हैं, उसी प्रकार गौ-घृतादि से ये सोमदेव संस्कारित होते हैं॥३॥ |
| अभिषुत होने (निचोड़ने) के बाद अमृत स्वरूप, ज्ञानवर्धक मधुर सोमरस साधकों के द्वारा स्तुतिगान करते हुए छाना जाता है॥४॥ |
| उषा काल का वह समय भाग्यशाली होता है, जब इन्द्रदेव के पान के लिए सोमरस शब्द करते हुए नीचे आता है॥५॥ |
| शक्तिशाली सोमदेव की स्तुति करने वाले, स्तोता प्राचीन यज्ञ द्वारों को उद्घाटित करते हैं॥६॥ |
| उत्कृष्ट सात बन्धुओं के समान सोम के स्थान को एक साथ पूर्ण करते हुए सात याज्ञिक यज्ञकर्मानुष्ठान के लिए उपस्थित होते हैं॥७॥ |
| नेत्र सूर्य पर निर्भर है। अपने यज्ञ एवं नाभि (उदर) के लिए कवि (क्रान्तदर्शी दिव्य प्रवाह) के पुत्र रूप में हम सोम का दोहन करते हैं॥८॥ |
| बलवान् इन्द्रदेव अपने नेत्रों से दिव्य लोक में प्रिय और अध्वर्युओं द्वारा हृदयस्थ सोम को देखते हैं॥९॥ |
सूक्त-११
| हे याजको ! देवशक्तियों के निमित्त, यज्ञार्थ प्रयुक्त होने वाले, शुद्ध हुए इस सोम की स्तुति करो॥१॥ |
| यह दिव्यरस देवों ने देव पुरुषों के लिए प्रकट किया है । इसे अथर्वा ऋषियों (विज्ञान वेत्ताओं ) ने तुम्हारे लिए मथुर गौ-दुग्ध के साथ दिलाया हैं॥२॥ |
| हे कल्याणकारी सोमदेव ! आप स्वयं शुद्ध होकर पशुधन, प्रज्ञाधन तथा अश्वादि सैन्यबल का कल्याण करें और ओषधियों को पवित्र बनायें॥३॥ |
| हे स्तोता ! आप लोग भूरे रंग के बलशाली, अरुणिमा युक्त, आकाश में रहने वाले सोम की स्तुति करो॥४॥ |
| हे ऋत्विजो ! पाषाणों से कूटकर निष्पन्न सोमरस को शोधित करो तथा मधुर सोमरस में मधुर गौ-दुग्ध मिश्रित करो॥५॥ |
| है ऋत्विजो ! इस सोमरस को नमस्कारपूर्वक दही में मिलाकर रखो। दीप्तिमान् सोमरस इन्द्रदेव के पीने के लिए अर्पित करो॥६॥ |
| हे दिव्य सोमदेव ! शत्रुनाशक, सर्वद्रष्टा, देवों की इच्छानुसार कार्य करने वाले आप हमारी गौओं को सुख दें (सुखपूर्वक रखें ) ॥७॥ |
| यह सोम मनों में रमणशील, मनों के अधिपति इन्द्रदेव के सेवनार्थ उनके आनन्दवर्द्धन के निमित्त संस्कारित होकर पात्र में एकत्रित होता है॥८॥ |
| हे शोधित होने वाले पवित्र सोमदेव ! आप उत्तम तेजस्विता युक्त होकर अपने सहायक इन्द्रदेव के पास से हमें अभीष्ट धन दिलाएँ॥९॥ |
सूक्त-१२
| यज्ञ के लिए शोधकर तैयार किये गए मधुररस युक्त सोम को इन्द्रदेव के निमित्त प्रस्तुत करते हैं॥१॥ |
| हे विजो ! जिस प्रकार गौएँ अपने बछड़ों के लिए व्याकुल हो जाती हैं, उसी भाव से तुम सोम पीने के लिए इन्द्रदेव की स्तुति करो॥२॥ |
| हर्ष बढ़ाने वाला सोम यज्ञ - स्थल पर प्रतिष्ठित होता है। नदी की तरंगों के समान यह वाणी को तरंगित करता है॥३॥ |
| यह सोम श्रेष्ठकर्मा तथा ज्ञानयुक्त है, जो अन्तरिक्ष की नाभि के समान छत्रे में शुद्ध होकर महत्त्व (प्रतिष्ठा) को प्राप्त होता है॥४॥ |
| पवित्र होकर कलशों में अवस्थित सोमरस में चन्द्रमा के श्रेष्ठ गुणों का संचार होता हैं ।॥ ५॥ |
| मधुर सोमरस आकाश (घटाकाश) में प्रवेश कर शब्द करता हुआ कलश को पूरी तरह भर देता है॥६॥ |
| नित्य स्तुत्य, वनों के स्वामी सोमदेव, श्रेष्ठ मनुष्यों को संगठित होने की प्रेरणा प्रदान करें और मधुर भाषी की हार्दिक स्तुतियों को स्वीकार करें॥७॥ |
| यह ज्ञानवर्धक सोम ज्ञानी जनों को अन्तरिक्ष से (सत्कर्म की ) प्रेरणा देता हुआ धार रूप में यज्ञस्थल पर प्रतिष्ठित होता है॥८॥ |
| हे शुद्ध होने वाले सोमदेव ! आप हमें सहस्र गुणसम्पन्न अपने धाम और ऐश्वर्य का अधिकारी बनाएँ । ॥९॥ |
सूक्त-१३
| हजारों धाराओं के रूप में शोधक यंत्र से शोधित सोम, वायु और इन्द्रदेव के पान करने के लिए श्रेष्ठ पात्रों में स्थिर होता हैं॥१॥ |
| अपने संरक्षण की कामना करने वाले, हे याजको ! सबको पवित्र करने वाले, विशेष आनन्द प्रदान करने वाले, देवों के पान करने योग्य शोधित सोम के लिए सम्मानपूर्वक स्तुतियों का गान करो॥२॥ |
| अन्न ( पोषण) प्रदान करने के कारण स्तुत्य, देवतुल्य, हजारों प्रकार से बलवर्द्धक यह सोमरस शोधित किया जा रहा है॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आप जीवन-संग्राम की सफलता के लिए हमें श्रेष्ठ अन्न प्रदान करें तथा तेजस्वी और सामर्थ्यवान् बनाएँ॥४॥ |
| वह स्रवित किया गया दिव्य सोमरस हमें असंख्य ऐश्वर्य और उत्तम सामर्थ्य प्रदान करे॥५॥ |
| युद्धस्थल पर जाते हुए अश्वों की भाँति प्रेरित सोम ऋत्विजों द्वारा तीव्र गति से शोधित किया जाता है॥६॥ |
| जैसे गौएँ बछड़ों की ओर सँभाती हुई जाती हैं, उसी प्रकार शब्द करता हुआ सोमरस कलश में प्रवेश करता है और ऋत्विजों द्वारा हाथों में धारण किया जाता है॥७॥ |
| इन्द्रदेव को तृप्त करने वाले हे सोमदेव ! आप पवित्र होकर शब्द करते हुए सभी शत्रुओं (विकारों ) का विनाश करें॥८॥ |
| हे सोम ! दान न देने वाले स्वार्थियों का नाश करते हुए अपने तेजस्वी रूप में आप यज्ञस्थल पर स्थित हों॥९॥ |
सूक्त-१४
| बुद्धिवर्द्धक, प्रशंसनीय, याजकों का पोषण करने वाला, नदी की लहरों (जल) में मिला हुआ यह सोमरस पात्र ( सत्पात्रों) में स्थिर होता है॥१॥ |
| भ्रातृभाव से रहने वाले पाँचों वर्गों के लोग यज्ञीय कर्म की कामना करते हुए सबके पोषक सोमदेव को वाणी द्वारा (स्तुतियों से) सुशोभित करते हैं॥२॥ |
| सोमरस निकालने के बाद जब उसे गौ-दुग्ध में मिलाया जाता है, तब इस बलवर्द्धक सोम के पान से सभी देवगण आनन्दित होते हैं॥३॥ |
| छलनी से शोधित होता हुआ सोम छलनी को (अपने रस से) सराबोर करती हुआ, उसके छिद्रों से नीचे की ओर प्रवाहित होता है और सखा रूप में इन्द्रदेव से मिल जाता है॥४॥ |
| याज्ञिक यजमान की अँगुलियों से शोधित होता हुआ सोमरस गौ के दूध में मिलाने पर सफेद, दीप्तिमान् , तरुण अश्व के समान तथा दूध जैसा ही दिखाई पड़ता है॥५॥ |
| (शोधित होते समय) सोमरस अँगुलियों से दबाने पर इधर-उधर से गौ के दूध में मिश्रित होने के लिए नीचे गिरता है । पात्र में गिरते हुए (यजमान की जानकारी के लिए शब्द करता है॥६॥ |
| सोमरस को शोधित करती हुई अँगुलियाँ आपस में मिलकर बलशाली सोम को पकड़ती हैं और उसे स्वच्छ (शुद्ध) करती हैं॥७॥ |
| हे दिव्य सोमदेव ! सम्पूर्ण पृथिवीं का ऐश्वर्य लेकर आप हमारे पास पधारें॥८॥ |
सूक्त-१५
| अंगुलियों से निचोड़ा गया शक्तिशाली यह सोम तीव्र गतिशील रथ से विवेकपूर्वक इन्द्रदेव के निकट पहुँच जाता है॥१॥ |
| देवों से अधिष्ठित, श्रेष्ठ, यह सोम यज्ञ-स्थल में असंख्यों कर्म सम्पन्न करने की अभिलाषा रखता है॥२॥ |
| हविष्यान्न के रूप में प्रयुक्त यह सोम यज्ञस्थल पर ले जाया जाता है, जहाँ से अध्वर्युगण उसे शुद्ध करते हुए देवताओं को समर्पित करते हैं॥३॥ |
| ऐश्वर्यवान् यह सोम अपनी सामर्थ्य को उसी प्रकार प्रकट करता है, जिस प्रकार बलशाली वृषभ पशुओं के मध्य अपनी शक्ति को प्रकट करता हैं॥४॥ |
| श्वेत रश्मियों से युक्त, रसों का अधिपति, प्रवहमान, शक्तिशाली सोम वेग से प्रवाहित होकर उपासकों के पास पहुँचता है॥५॥ |
| अपनी सामर्थ्य से निठल्ले दुष्टों को पीड़ित करता हुआ, यह सोम, उन्हें मर्यादित रखता है और हिंसकों का विनाश कर देता है॥६॥ |
| रसयुक्त (पोषक) अन्नों से उत्पत्तिकारक, शोधित होने योग्य सोम को त्विग्गण संस्कारित करके कलशों में एकत्रित करते हैं॥७॥ |
| श्रेष्ठ, आनन्ददायी शक्ति को शरण करने वाला हरिताभ सोम, दसों अँगुलियों एवं सप्तऋत्विजों द्वारा निचोड़ा जाकर शोधित किया जाता है॥८॥ |
सूक्त-१६
| हे सोमदेव ! याज्ञिकज़न द्युलोक और पृथिवी लोक के मध्य में शत्रुओं के संहार के उद्देश्य से उत्साह बढ़ाने के लिए आपका रस निकालते हैं॥१॥ |
| अन्न की पोषक शक्ति से युक्त, बलवर्धक सोम को सत्कर्म की शक्ति प्राप्त करने हेतु जल एवं गौ के दुग्ध के साथ मिलाते हैं । उसे हमारी अँगुलियाँ धारण करती हैं॥२॥ |
| हे याजको ! शत्रुओं की पहुँच से बाहर, दुष्टों के आक्रमण की परिधि से दूर जल-मिश्रित सोमरस को इन्द्रदेव के पान करने हेतु छलनी से छानकर रखो॥३॥ |
| शोधित करने वाला याज्ञिक बुद्धिपूर्वक सोम को पवित्र करने के कार्य में लग जाता है । इस कृत्य से वह सोम (यज्ञस्थलों में) प्रतिष्ठित होता है॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! सोम आपको विनयपूर्वक प्राप्त होता है । यह सोम आपको संग्राम में शत्रुहनन के कार्य में समर्थ बनाता है॥५॥ |
| जिस प्रकार शूर पुरुष अश्व के साथ सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार शोधित सोमरस ( गौ-दुग्ध में ) सुशोभित होता है॥६॥ |
| जिस प्रकार आकाश की जलधारा पर्वत के शिखर पर पड़ती हैं, उसी प्रकार पवित्र-सोम की धारा शोधित होते समय अनायास ही पात्र में गिरती है॥७॥ |
| हे सोमदेव ! समस्त मनुष्यों में जो आपकी स्तुति करते हैं, उनका आप संरक्षण करते हैं । आप स्वयं शोधन के लिए अनश्वर छलनी में वेगपूर्वक जाते हैं॥८॥ |
सूक्त-१७
| जैसे नदियों का प्रवाह नीचे की ओर होता है, उसी प्रकार दुष्टों का संहारक, शीघ्रगामी सोमरस वेगपूर्वक छलनी से नीचे की ओर प्रवाहित होता है॥१॥ |
| पृथ्वी पर होने वाली वर्षा की भाँति शोधित सोमरस इन्द्रदेव के पास जाता है॥२॥ |
| उत्साहवर्द्धक, आनन्ददायी, स्फूर्तिदायक सोमरस राक्षसों ( विकारों ) का संहार करते हुए देवगणों के पास जाने के उद्देश्य से छलनी में जाता है॥३॥ |
| यह सोमरस छलनी में छाने जाते समय कलशों में एकत्रित होता है और यज्ञ के स्तोत्रों से वृद्धि को प्राप्त करता है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! आप तीनों लोकों में सबसे ऊपर रहकर द्युलोक को प्रकाशित करते हैं तथा अपनी इच्छानुसार सूर्यदेव को भी प्रेरित करते हैं॥५॥ |
| सोमरस के प्रति प्रीतियुक्त भाव रखने वाले कर्मनिष्ठ याज्ञिक विद्वज्जन यज्ञस्थल के मुख्य भाग में बैठकर यज्ञ करते हैं॥६॥ |
| अपने संरक्षण की कामना वाले ज्ञानी जन बुद्धियुक्त कर्मों से अन्नयुक्त सोम को यज्ञार्थ शोधित करते हैं॥७॥ |
| हे सोमदेव ! आप शोधन स्थल पर मधुर रस की धार के रूप में वेगपूर्वक पात्र में एकत्रित हों । आप देवगणों के पान करने के लिए तथा यज्ञ हेतु प्रवाहित हों॥८॥ |
सूक्त-१८
| यह सोमरस पवित्र कलश में निकाला गया है । हे सोमदेव ! आप पर्वत पर उत्पन्न होने वाले हैं, रस निकाले जाने पर आनन्द देने वालों में आप सबसे श्रेष्ठ॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप ज्ञानवान् हैं, दूरदर्शी हैं तथा अन्न से उत्पन्न हुए पोषक तत्वों को देने वाले हैं । आनन्दप्रद रसों में आपका स्थान सर्वोत्तम है॥२॥ |
| हे सोमदेव ! संगठन शक्ति से क्रियाशील सभी देवता आपके रस का सेवन करने की कामना करते हैं। आनन्द प्रदाताओं में आप ही सर्वोत्कृष्ट हैं॥३॥ |
| हर प्रकार का ऐश्वर्य हस्तगत करने वाले जो सोमदेव हैं, वे पदार्थों में सभी प्रकार के आनन्द स्थापित करने वाले हैं॥४॥ |
| जो सोम माता के समान द्यु तथा पृथ्वी दोनों लोकों को पुत्रवत् सुख प्रदान करता हैं । वह सोम आनन्द देने वालों में भी विशेष आनन्द प्रदायक है॥५॥ |
| जो सोम द्यु तथा पृथिवी दोनों लोकों को सदैव अन्न से परिपूर्ण रखता है, वह श्रेष्ठ आनन्ददायी है॥६॥ |
| जो सोमबल बढ़ाने वाला है तथा शोधित होते समय कलश में शब्दनाद करता हुआ प्रवाहित होता है, वह आनन्द प्रदान करने वाले पदार्थों में सर्वाधिक आनन्दप्रद है॥७॥ |
सूक्त-१९
| पवित्रता को प्राप्त होने वाले हे दिव्य सोमदेव ! इस पृथ्वी पर जो भी अद्भुत प्रशंसनीय दिव्य वैभव है, वह सब आप हमें प्रदान करें॥१॥ |
| गौओं के स्वामी ऐश्वर्यशाली हे सोम और इन्द्रदेव ! आप दोनों निश्चित रूप से इस जगत् के रक्षक है। हम सबकी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर नियोजित करें॥२॥ |
| याजकों के जीवन को पवित्र करने वाले हे हरिताभ सोमदेव ! शब्दायमान होते हुए आप अपने आसन पर स्थिर हों॥३॥ |
| पुत्र की इच्छा करने वाली माताओं की भाँति धारण करने वाली (भूमि-वनस्पतियाँ-काया आदि), बलशाली सोम के उत्पादक तेजस् की इच्छा करती हैं॥४॥ |
| जो पवित्र-तेजस्वी पय (जल या सारतत्त्व) का दोहन करती हैं (ऐसी भूमि, वनस्पतियाँ आदि) अन्तरिक्षीय वृष्टि की कामना करने वाली (प्रकृति) में, पवित्र होता हुआ यह सोम गर्भ ( उर्वरता या तेज) की स्थापना करता है॥५॥ |
| हे सोमदेव ! हमसे दूर रहने वाले मित्रों को आप हमारे पास लाएँ । हमारे शत्रुओं को भयभीत करें तथा हमें धन प्रदान करें॥६॥ |
| हे सोम ! आप हमारे समीप तथा दूर के सभी शत्रुओं की सामर्थ्य, उनका तेज तथा उनके अन्न को नष्ट करें॥७॥ |
सूक्त-२०
| देवताओं को प्रदान करने के लिए यह ज्ञानवर्धक सम उत्तम रीति से संस्कारित किया जाता है । विकारनाशक यह सभी शत्रुओं को परास्त करता है॥१॥ |
| परिशुद्ध यह दिव्य सोम, स्तुति करने वाले याजकों को धन-धान्य प्रदान करके सन्तुष्ट करता है॥२॥ |
| हे संस्कारित हुए वन्दनीय सोमदेव ! आप में विचारपूर्वक अन्न के भण्डार प्रदान करें॥३॥ |
| हे दिव्य सोमदेव ! स्तुति करने वाले धनवान् साधकों के लिए भी आप महान् यश, स्थायी निधि एवं अन्न के भण्डार प्रदान करें॥४॥ |
| सत्कर्म में निरत, सद्भावनासम्पन्न, पवित्र हृदय वाले स्वामी के समान हे दिव्य सोमदेव ! आप याजकों द्वारा प्रस्तुतं श्रेष्ठ वचनों ( स्तुतियों ) को स्वीकार करें॥५॥ |
| यज्ञ सम्पन्न कराने वाला, हथेलियों की सहायता से शुद्ध किया जाता हुआ, जल-मिश्रित सोम पात्र में स्थिर होता है॥६॥ |
| यज्ञ की भाँति निरन्तर परमार्थ में निरत होकर क्रीड़ा करने वाले हे सोमदेव ! आप स्तोताओं को शौर्य-पराक्रम प्रदान करते हुए शुद्धता को प्राप्त होते हैं॥७॥ |
सूक्त-२१
| यह तेजस्वी सोम इन्द्रदेव के पास आनन्द बढ़ाने, ज्ञान देने तथा युद्ध की प्रेरणा देने के लिए गमन करता है॥१॥ |
| यह सोमरस स्तोताओं को धन-धान्य से पूर्ण करने वाला तथा शोधित करने वालों की विशेष प्रकार से उपयोगी सहायता करने वाला है॥२॥ |
| यह सोमरस सहज रूप से पात्र में रखे हुए, नदी के जल में क्रीड़ा करने जैसा गिरकर एकत्रित होता है॥३॥ |
| रथ में जुड़े घोड़े के समान यह शोधित सोमरस स्वीकार करने योग्य समस्त ( अभीष्ट) धन प्रदान करता है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! जो याज्ञिक अपने धन को दान (सत्कार्यों के लिए नियोजन) करता है, उसे हर प्रकार का धन इस उद्देश्य के लिए प्रदान करें॥५॥ |
| हे सोमदेव ! ऋभुगण जिस प्रकार रथ चलाने के लिए नवीन उत्तम सारथी को नियुक्त करते हैं, उसी प्रकार आप हमें यज्ञ कार्य के लिए नियुक्त करें । शोधित सोमरस (यज्ञ में उपयोग के लिए) जल के साथ पवित्र हो॥६॥ |
| यज्ञ की कामना करने वाला यह बलवान् सोम यज्ञस्थल पर प्रतिष्ठित होता है । वह याज्ञिक की बुद्धि को यज्ञ करने की प्रेरणा देता है॥७॥ |
सूक्त-२२
| यह सोम शोधित होते समय छलनी द्वारा, रथ की भाँति अथवा अश्वों की भाँति शब्दनाद करता हुआ द्रुतगति से नीचे की ओर (अन्तरिक्ष से भूमि की ओर) गमन करता है॥१॥ |
| यह सोम पर्जन्य की वर्षा के समान तथा अग्नि की ज्वालाओं के समान वायु वेग से गमन करता है॥२॥ |
| इस शोधित सोमरस को ज्ञानवर्धक दही के साथ मिलाया गया है, जो विशेष रूप से ज्ञान प्रदायक होकर बुद्धिमत्ता पूर्ण किए जा रहे यज्ञकर्म में पहुँचता है॥३॥ |
| यह पवित्र तथा अमृत के समान शोधित सोमरस, शोधन के समय शोधक यंत्र से नीचे (कलश या भूमण्डल) की ओर सतत प्रवाहित होता है, (फिर भी) थकता नहीं है॥४॥ |
| यह सोमरस स्वर्गलोक तथा पृथिवीलोक के पृष्ठ भाग ( गुह्य या अंतिम भागों) तक विविध प्रकार से गमन करता है और विस्तार पाता है । यह उत्तम सोमरस द्युलोक में भी प्राप्त होता है॥५॥ |
| यज्ञ का विस्तार करने वाले उत्कृष्ट सोम को नदियों के जल में मिश्रित किया जाता है । वही सोम श्रेष्ठ यज्ञ को पूर्णता तक पहुँचाता है॥६॥ |
| हे सोमदेव ! आप पणिजनों (गौओं को रखने वालों तथा व्यापार करने वालों) से दूध, दही तथा घृत आदि पदार्थ प्राप्त कर यज्ञस्थल में प्रतिष्ठित करते हैं। आप यज्ञ को पूर्ण कर इसकी कीर्ति का विस्तार करें॥७॥ |
सूक्त-२३
| स्तोताओं द्वारा अनेक प्रकार के स्तोत्रों से स्तुति करते हुए मधुर रस की धारा के रूप में द्रुतगति से सोमरस निकाला जाता है॥१॥ |
| अति पुरातन (शाश्वत) सतत आवागमनशील (सोमदेव) नये-नये पद (चरण-स्वरूप प्राप्त करते हैं। प्रकाश के लिए सूर्य को उत्पन्न करते हैं॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आप शत्रुओं के समान अनुदार लोगों का धन तथा प्रजायुक्त अन्न हमें प्रदान करें॥३॥ |
| शोधित होने वाला सोमरस आनन्दवर्धक है । इस मधुर रस को पात्र में एकत्रित करते हैं॥४॥ |
| सर्वोत्तम बलशाली, हर प्रकार के दुःखों से बचाने वाला, इन्द्रियों की शक्ति को बढ़ाने वाला, धारणा शक्ति से युक्त यह सोमरस पात्र में एकत्रित होता हैं॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप यज्ञ के उपयुक्त हैं। इन्द्रदेव तथा अन्य सभी देवगणों के निमित्त ही आपके रस को निकाला जाता है । आप हमारे लिए अन्न देने वाले हैं॥६॥ |
| आनन्ददायी, उत्साहवर्द्धक इस सोमरस का पान करके अजेय इन्द्रदेव ने चारों ओर से घेरने वाले शत्रुओं को नष्ट किया तथा (वे इन्द्रदेव) आगे भी नष्ट करते रहें॥७॥ |
सूक्त-२४
| दुग्ध आदि पोषक तत्वों से युक्त शीतल सोमरस पवित्र होते समय जल के साथ नीचे रखे हुए पात्र में एकत्रित हो रहा है॥१॥ |
| शुद्धता को प्राप्त होने वाला सोमरस अधः पात्र (नीचे के बर्तन) में पहुँचकर स्थिर हो रहा है । देवराज इन्द्र इस पवित्र रस का पान करते हैं॥२॥ |
| इन्द्रदेव का उत्साहवर्द्धन करने वाले है पवित्र सोमदेव ! शुद्धिकरण की प्रक्रिया के बाद आप अत्विजों (याजकों ) द्वारा यज्ञवेदी पर पहुँचाए जाते हैं॥३॥ |
| प्रशंसा के योग्य हे संस्कारित सोमदेव ! मानवमात्र के आनन्द को बढ़ाने वाले, याजकों के द्वारा धारण किए गये, आप पवित्रता को प्राप्त करें॥४॥ |
| हे सोमदेव ! पत्थरों से कुचलकर निकालने के बाद आपको छन्ने द्वारा शुद्ध किया जाता है, तब आप इन्द्रदेव के पीने योग्य होते हैं॥५॥ |
| आश्चर्यजनक रीति से शत्रुओं का विनाश करने वाले, श्रेष्ठ वचनों द्वारा वन्दना करने योग्य हे सोमदेव ! आप शुद्धता और पवित्रता को प्राप्त करें॥६॥ |
| विधिपूर्वक तैयार किया गया शुद्ध, संस्कारित और पवित्र सोमरस देवताओं को तृप्ति देने वाला एवं दुष्टों का विनाश करने वाला ( विकारों का शमन करने वाला) कहा गया है॥७॥ |
सूक्त-२५
| हे हरिताभ सोमदेव ! आप हर्ष और शक्ति के साधनभूत हैं। देवों और मरुतों के पीने के निमित्त कलश में स्थित हों ॥१॥ |
| भली-भाँति विचारपूर्वक स्थापित किए गए, हे संस्कारित सोमदेव ! आप अपने स्वाभाविक गुणों से वायु के साथ संयुक्त होकर कलश में प्रतिष्ठित हों॥२॥ |
| ज्ञान और बल से सम्पन्न शुद्ध, संस्कारित होने के कारण सभी को परम प्रिय, किसी के बन्धन में न रहने वाले सोमदेव, देवताओं के मध्य सुशोभित हो रहे हैं॥३॥ |
| यह पवित्र सोम सभी रूपों में प्रविष्ट होकर जहाँ देवगण रहते हैं, उनके पास सुशोभित होकर जाता हैं॥४॥ |
| यह मेधावी सोमरस प्रीतिपूर्वक इन्द्रदेव के पास जाता है । यह तेजस्वी सोम शोधित होते समय शब्दनाद करता है । ॥५॥ |
| आनन्द प्रदान करने वाले कान्तिमान् हे सोमदेव ! पूजा के योग्य इन्द्रदेव के आश्रय को प्राप्त करने के लिए आप धारा रूप से शोधित होकर पवित्र बनें॥६॥ |
सूक्त-२६
| विद्वज्जन अपनी सूक्ष्म बुद्धि से उस बलशाली सोम को अदिति की गोद में ( अखण्ड प्रकृति या यज्ञ क्षेत्र में) उत्तम विधि से पवित्र बनाते हैं॥१॥ |
| सूर्यादि लोकों को धारण करने वाले, कभी भी क्षीण न होने वाले, हजारों धाराओं से स्रवित होने वाले सोमदेव की, हम उत्तम स्तोत्रों द्वारा स्तुति करते हैं॥२॥ |
| सबके आधार, सभी के धारणकर्ता तथा सभी के आश्रयदाता उन सोमदेव को (याज्ञिक जन) अपनी मेधाशक्ति से द्युलोक के पास अर्थात् उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं॥३॥ |
| वाणी के अधिष्ठाता, अविनाशी सोम को याज्ञिक जन अपने हाथों में धारण करके यज्ञस्थल तक ले जाते हैं॥४॥ |
| याजकगण उच्चस्थान पर स्थित हरिताभ सोम को पत्थरों से कूटकर दसों अँगुलियों से रस निकालते हैं॥५॥ |
| हे सोमदेव ! स्तोत्रों द्वारा स्तुति किये जाने पर प्रशंसित होने वाले इन्द्रदेव को आनन्द प्रदान करने हेतु ज्ञानीजन आपको प्रेरित करते हैं॥६॥ |
सूक्त-२७
| ज्ञानियों और कवियों के द्वारा स्तुत्य, शोधित, विकारनाशक यह सोम तृप्ति प्रदान करने वाला है॥१॥ |
| शक्तिवर्धक एवं स्वर्गीय सुख को अपने अधिकार में रखने वाला दिव्य सोम अन्तरिक्ष से छनकर इन्द्रदेव ( मेघों) और वायु के निमित्त नीचे आता है॥२॥ |
| यह द्युलोक के उच्च भाग से वर्षणशील-बलवान् सोम वनों में सभी (वनस्पति आदि) का ज्ञाता है, अभिषुत होकर यह अग्रणी मनुष्यों द्वारा ( यज्ञादि में) लाया जाता है॥३॥ |
| द्युलोक में प्रतिष्ठित, शक्तिवर्द्धक, रसरूप, विश्वज्ञाता यह सोम वनों (वृक्ष-वनस्पतियों) के माध्यम से मनुष्यों द्वारा प्रयुक्त किया जाता है॥४॥ |
| यह पवित्र सोम आनन्द प्रदान करने वाला तथा प्रसन्नतादायी हैं । सूर्यदेव के द्वारा इसे द्युलोक की शोधक छलनी (अंतरिक्षीय शोधन प्रणाली) में स्थापित किया जाता है॥५॥ |
| यह अन्तरिक्ष से वर्षणशील-बलवर्द्धक हरि (हरे रंग का या विकारनाशक) सोम नीचे आता हुआ, पवित्र होता हुआ इन्द्रदेव को प्रदान किया जाता है॥६॥ |
सूक्त-२८
| सर्वज्ञाता, मन का अधिपति, बलशाली सोम यज्ञकर्ताओं द्वारा शुद्ध होकर कलश में प्रतिष्ठित होता है॥१॥ |
| देवों के निमित्त निष्पन्न हुआ यह सोम शुद्ध होकर देवों के शरीरों में संव्याप्त हो जाता है॥२॥ |
| देवों को अतिप्रिय, देवत्व को बढ़ाने वाला, अविनाशी, शत्रुसंहारक सोम, कलश में शोभायमान होता है॥३॥ |
| दसों अंगुलियों द्वारा निचोड़ा गया बलवर्द्धक यह सोम, शब्द करता हुआ, कलश में पहुँचता है॥४॥ |
| सबका द्रष्टा यह सोमरस समस्त विश्व का ज्ञाता है । यह सोम समस्त यज्ञ स्थानों ( श्रेष्ठ कर्मो) तथा सूर्यदेव को भी प्रकाशित करता हैं॥५॥ |
| देवताओं के रक्षक, पापियों के संहारक, नष्ट न होने वाले , शोधित हुए, बलयुक्त सोमदेव, कलश में पहुँचते हैं॥६॥ |
सूक्त-२९
| सोमरस की बल बढ़ाने वाली तथा देवों पर अपना अनुकूल प्रभाव डालने वाली, प्रभावकारी धाराएँ वेगपूर्वक (कलश) पात्र में एकत्रित होने लग गईं हैं॥१॥ |
| देदीप्यमान, स्तुत्य, अश्व के समान वेगवान् सोम को मेधावी अध्वर्युगण अपनी वाणी रूप स्तुतियों द्वारा शुद्ध कर रहे हैं॥२॥ |
| हे सम्पत्तिशाली और स्तुत्य सोमदेव ! पवित्र होने वाले आप, अपने प्रचण्ड पराक्रम से रक्षा करने वाले हैं । समुद्र के समान (आप अपने दिव्य रसों से) इस पात्र को पूर्ण कर दें॥३॥ |
| हे सोमदेव ! समस्त धन को जीतते हुए आप शुद्ध हों तथा हमारे सभी शत्रुओं को हमसे दूर भगाएँ ।॥ ४॥ |
| हे सोमदेव ! अनुदार लोगों एवं उनके ही समान अन्य शत्रुओं तथा निन्दा करने वालों से, भली प्रकार से हमारी रक्षा करें, ताकि हम शत्रुओं से मुक्त हो जाएँ॥५॥ |
| हे सोमदेव ! पृथिवीं पर अपनी धारा से रस प्रवाहित करते हुए आप हर प्रकार का दिव्य धन प्रदान करें तथा तेजोयुक्त बल भी हमें दें॥६॥ |
सूक्त-३०
| स्तुति सुनने की कामना से बलशाली सोम की धाराएँ छलनी से पवित्र होने के लिए प्रवाहित होती हैं॥१॥ |
| शोधित करने वाले याज्ञिकों द्वारा प्रेरित किया गया यह सोमरस शोधित होते समय शब्दनाद करता है और ( याज्ञिकों की ) इन्द्रियों को यज्ञ कार्य (सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करता है॥२॥ |
| हे सोमदेव ! पवित्र धाराओं से प्रवाहित होते हुए आप शत्रुओं का विनाश करने वाला, शौर्यवर्द्धक तथा सभी के द्वारा पूज्य बल हमें प्रदान करें॥३॥ |
| यह पवित्र सोमरस पात्र में स्थापित होने के लिए धारा रूप में प्रवाहित होता है॥४॥ |
| हरिताभ, अत्यन्त मधुर, जल में मिश्रित, सोमरस को पत्थरों से कूटकर तैयार करते हैं । उसे इन्द्रदेव को पान करने के लिए प्रदान करते हैं॥५॥ |
| हे याज्ञिको ! वज्रधारी इन्द्रदेव के बलवर्द्धन हेतु, आनन्दद्गायी तथा अत्यन्त मधुर सोमरस निकालो॥६॥ |
सूक्त-३१
| शोधित सोमरस ज्ञानवर्द्धक तथा स्फूर्ति प्रदान करने वाला है । वह उत्तम धन प्रदायक भी है॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप द्युलोक तथा पृथिवीलोक में अन्न की वृद्धि करने वाले हैं, आप बलों के संरक्षक हों॥२॥ |
| हे सोमदेव ! वायु आपको तृप्त करते हुए तथा नदियाँ आपका अनुगमन करती हुई आपकी महत्ता का विस्तार कर रही हैं॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आपको प्रत्येक स्थान पर बल की प्राप्ति हो । आप विस्तृत होते हुए संग्राम के समय हमारे लिए अन्न प्रदान करने वाले हों॥४॥ |
| आपका स्थान सर्वोच्च है । हे प्रज्ञापालक सोमदेव ! गौएँ आपको कभी भी न घटने वाला दूध तथा घृत प्रदान करती हैं॥५॥ |
| भुवनों के स्वामी हे सोमदेव ! हम सभी श्रेष्ठ आयुधों से युक्त होकर आपसे मित्रता की कामना करते हैं॥६॥ |
सूक्त-३२
| आनन्ददायक सौम अभिषुत होकर हमारे यज्ञ में अन्न और यश प्रदाता बनकर स्थित होता है॥१॥ |
| इस शुद्ध हरितवर्ण के सोमरस को साधक अपनी अँगुलियों से निचोड़कर इन्द्रदेव के पीने योग्य बनाते हैं॥२॥ |
| हंस जिस प्रकार (सहज भाव से) अपने समूह में (गतिपूर्वक) जाता है, उसी गति के साथ यह सोमरस विवेकवानों की बुद्धि को प्रभावित करता है॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आप द्युलोक तथा पृथिवी लोक दोनों को देखते हुए हरिण के समान तेजस्वी होकर यज्ञ स्थल पर प्रतिष्ठित होते हैं॥४॥ |
| जिस प्रकार युद्ध में जाते हुए वीर योद्धा की स्तुति होती है तथा जिस प्रकार स्त्री अपने प्रियतम की स्तुति करती है, उसी प्रकार हे सोमदेव ! हम मंत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें तेजस्वी बनाने वाला अन्न तथा याज्ञिकों को धन, बुद्धि तथा यश प्रदान करें॥६॥ |
सूक्त-३३
| बुद्धिवर्द्धक यह सोमरस पानी की लहरों के समान तथा स्वाभाविक रूप से पशुओं के वन में जाने के समान प्रवाहित होता हैं॥१॥ |
| गौ दुग्ध रूपी अन्न के साथ भूरे रंग का यह सोमरस जल की धारा के साथ बर्तन में मिलाया जाता है॥२॥ |
| अभिषुत सोमरस इन्द्र, वायु, वरुण, मरुत् तथा विष्णु आदि देवगणों को प्राप्त हो॥३॥ |
| जब तीन प्रकार के (तीन वेदों के) मंत्र बोले जाते हैं। धारक वाणियाँ ( गौएँ) स्वर प्रकट करती हैं, तब यह मनोहारी हरिताभ सोम भी शब्द करता हुआ अवतरित होता है॥४॥ |
| चुलोक से उत्पन्न हुए सोम को शोधित करते समय महान् विद्वज्जनों द्वारा परमार्थ परायण बनने की प्रेरणा देने वाली ऋचाएँ बोली जाती हैं॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप सभी माध्यमों से ऐश्वर्य के चारों समुद्र हमारे लिए उपलब्ध कराने हेतु हजारों प्रकार से प्रवाहित हों॥६॥ |
सूक्त-३४
| अभिषुत सोमरस व्यापक बलों से युक्त होकर धारारूप से पात्र में एकत्रित होता है । वह अपनी शक्ति से शत्रु के सुदृढ़ किलों को भी ध्वस्त कर देता है॥१॥ |
| इन्द्र, वरुण, वायु, मरुत् तथा विष्णु आदि देवों के लिए अभिषुत सोम पात्र में एकत्र होता है॥२॥ |
| शक्ति से ( दबाव देकर ) दूध दुहने की भाँति बल बढ़ाने की शक्ति से युक्त सोमरस को सुदृढ़ पत्थरों से कूटकर अभिषुत किया जाता है॥३॥ |
| त्रित ऋषि द्वारा शोधित हरिताभ सोमरस गौ दुग्ध के साथ मिश्रित करके इन्द्रदेव को प्रदान किया जाता है॥४॥ |
| मरुद्गण इस अत्यन्त प्रिय सुन्दर हवन के योग्य सोम का यज्ञस्थल पर रस निकालते हैं॥५॥ |
| जिस प्रकार गौ अपने बछड़े के पास आने की कामना करती है उसी प्रकार हमारी स्तुतियाँ सोमदेव के पास जाने की कामना करती हैं॥६॥ |
सूक्त-३५
| हे सोमदेव ! आप जिस धारा से हमें तेज प्रदान करते हैं, उसी धारा से हमें अपने रस के साथ पर्याप्त धन भी प्रदान करें॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप अपने रस में जल को मिश्रित होने के लिए प्रेरित करें। सभी शत्रुओं को भयभीत करने वाले हे सोमदेव ! आप अपनी शक्ति से हमें धनवान् बनाने वाला रस प्रदान करें॥२॥ |
| हे शौर्यवान् सोमदेव ! आप जैसे वीर सहयोगी के साथ रहकर हम शत्रुसेना का मुकाबला करेंगे । हमें आप वीरता प्रदान करने वाला धन प्रदान करें॥३॥ |
| यह अन्नयुक्त सोम द्रष्टा है तथा हमें अन्न प्रदान करता है । यह सोम आयुधों को अपने पास रखता है तथा सभी नियमों को जानता है॥४॥ |
| पवित्र बनाने वाले, स्तुतियों के लिए प्रेरणा देने वाले, प्रजापालक तथा गौओं की रक्षा करने वाले सोम को हम सुरक्षित रखते हैं तथा उस सोम की हम स्तोत्रों से स्तुति करते हैं॥५॥ |
| सोमयज्ञ में सभी याज्ञिकों का मन लगा रहता है । शोधित किया हुआ यह सोम धर्म पालक तथा पर्याप्त धन से युक्त होता है॥६॥ |
सूक्त-३६
| नियंत्रित रथ के अश्वों की तरह, निचोड़ा गया सोमरस सावधानी पूर्वक पात्र में भरा जाता है । वह बलवान् । सोम देवताओं की तरह अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ हैं॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप सामर्थ्यवान् जाग्रत् सूर्य के समान कान्तिमान् हैं, अतः मधुरता से युक्त होकर आप पात्र में शोधित हों॥२॥ |
| हे सनातन सोमदेव ! आप हमारे तेज का विस्तार करें तथा यज्ञ कार्य के लिए बल प्राप्ति की प्रेरणा दें॥३॥ |
| याज्ञिकों से शोधित सोम भेड़ के बालों की (अविनाशी) छलनी से छाने जाने पर सुशोभित होता है॥४॥ |
| वह सोम द्युलोक, पृथ्वी लोक तथा अन्तरिक्ष लोक का सम्पूर्ण वैभव याज्ञिकों को प्रदान करे॥५॥ |
| हे अन्नदाता सोम ! आप अश्वों, गौओं तथा वीरपुत्रों की इच्छा करते हुए द्युलोक के ऊपर स्थित होते हैं॥६॥ |
सूक्त-३७
| दिव्य गुणों से युक्त, इन्द्रादि देवों के लिए तैयार किया हुआ अभीष्ट प्रदायक सोम, विकारों को नष्ट करता हुआ शोधन यंत्र से टपकता हैं॥१॥ |
| सबका संरक्षक, सभी का धारक, दुष्टों का संहारक, वह हरिताभ सोम छन्ने से पवित्र होकर शब्द करता हुआ कलश में पहुँचता है॥२॥ |
| द्युलोक में प्रकाशवान् . सामर्थ्यवान् , दुष्टों का संहारक शोधित होता हुआ दिव्य सोम, अविरल रूप से प्रवाहित होता है॥३॥ |
| वह सोम त्रित (अन्तरिक्ष, प्रकृति और जीवों के मध्य आदान-प्रदान करने वाले) यज्ञ में संस्कारित होकर अपने महान् तेज से सूर्यदेव को प्रकाशित करता हैं॥४॥ |
| शत्रुओं का नाश करने वाला बलवर्द्धक, निचोड़कर निकाला गया, धन देने वाला सोम अश्व के वेग के समान कलश में प्रविष्ट होता हैं॥५॥ |
| द्युलोक में प्रकाशवान् वह सोम याजकों के द्वारा प्रभावित होकर इन्द्रादि देवों की महत्ता बढ़ाने के लिए वेगपूर्वक कलश (विश्व घट) में प्रविष्ट होता है॥६॥ |
सूक्त-३८
| रथ के सदृश वेगवान्, अभीष्ट अन्नप्रदायक, यह सोम कलश में छलनी के द्वारा छाना जाता है॥१॥ |
| इन्द्रदेव द्वारा प्रयुक्त किये जाने के लिए यह हरिताभ सोम (त्रित) तीन प्रकार से (अन्तरिक्ष में, भौतिक यंत्रों में तथा शरीरस्थ तन्त्र में ) निचोड़ा जा रहा है॥२॥ |
| इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञार्थ दस अँगुलियाँ उस सोम को शोधित करती हैं॥३॥ |
| जिस प्रकार बाज़ पक्षी अपने शिकार के प्रति तथा प्रेमी अपनी प्रियतमा के प्रति वेगपूर्वक जाता है, उसी प्रकार यह सोम, मानवों के बीच शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर प्रतिष्ठित होता है॥४॥ |
| द्युलोक में उत्पन्न हुआ यह आनन्दवर्धक सोम, सबको देखता हुआ (प्राकृतिक) छलनी से शुद्ध होता है॥५॥ |
| सबको धारण करने वाला यह अविनाशी सोम, देवों के पीने के लिए तैयार किया गया है, जो ध्वनि करता हुआ अपने प्रिय निवास स्थान कलश में प्रवेश करता है॥६॥ |
सूक्त-३९
| हे मूर्तिमान् सोमदेव ! “जहाँ देवों का निवास (देवलोक या यज्ञीय क्षेत्र) है वहाँ जाता हूँ” ऐसा कहते हुए आप प्रिय रसधारा सहित शीघ्र उपस्थित हों॥१॥ |
| हे सोमदेव ! संस्काररहित क्षेत्र को संस्कारवान् बनाते हुए, मानवमात्र के निमित्त अन्न आदि उत्पन्न करने के लिए आकाश से वर्षा करें (प्राण-पर्जन्य के रूप में आपको अनुग्रह जल के साथ प्राप्त हो)॥२॥ |
| सबका निरीक्षक, सबका प्रकाशक, दिव्य सोम अन्तरिक्ष से, प्राकृतिक छत्रे द्वारा छाता हुआ तीव्रगति से अवतरित होता है॥३॥ |
| आकाश में तीव्र गति से विचरण करने वाला, पवित्र किया जाता हुआ, सोमरस सागर (नदी-जलाशय आदि) की लहरों को प्राप्त होता है॥४॥ |
| तैयार किया हुआ सोमरस दूर एवं समीप (समुचित रीति) से संस्कारित (पवित्र) करके इन्द्रदेव को समर्पित किया जाता है॥५॥ |
| यज्ञस्थल पर प्रतिष्ठित, शिलाओं के द्वारा पीसकर निकाले गये, ताजे हरे रंग वाले सोमरस को शोधित करते समय एक स्थान पर एकत्रित साधक स्तुति करते हैं॥६॥ |
सूक्त-४०
| पवित्र होने के बाद बुद्धिवर्द्धक एवं ज्ञानवर्द्धक यह सोमरस सभी शत्रुओं (विकारों) का शमन करता है। ज्ञानी जन इस सोम की दिव्य स्तोत्रों से स्तुति करते हैं॥१॥ |
| विधिवत् तैयार किया गया अरुणाभ सोम, कलश में स्थिर होता है, श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित होता है और इन्द्रदेव के निकट जाता है॥२॥ |
| हे तृप्तिदायक सोमदेव ! आप हमें शीघ्र ही हजारों प्रकार का महान् वैभव सभी ओर से प्रदान करे॥३॥ |
| हे शोधित तेजस्वी सोमदेव ! आप हमें हर प्रकार के धन से भरपूर करें तथा हजारों प्रकार का अन्न हमें प्रदान करें॥४॥ |
| हे सोमदेव ! आप शोधित होते हुए, पराक्रमी बनाने वाला श्रेष्ठ धन हम सभी स्तोताओं को प्रदान करें तथा स्तोताओं की स्तुतियों का विस्तार करें॥५॥ |
| हे तेजस्वी सोमदेव ! आप शोधित होते हुए द्युलोक तथा पृथ्वी लोक का धन हमें प्रदान करे । हे धन प्रदाता सोमदेव ! हमें प्रशंसनीय (श्रेष्ठ) धन प्रदान करें॥६॥ |
सूक्त-४१
| गौ-किरणों की तरह यह (सोम) शीघ्रता से काली त्वचा (काला आवरण-अँधेरा अथवा विकारों का निवारण करते हुए तीव्र गति से आगे बढ़ता हैं॥१॥ |
| हे सुख प्रदान करने वाले सोमदेव ! असह्य बन्धनों को दूर करने वाले, सत्कर्म से विरत-दुष्कर्म में निरत शत्रुओं का शमन करने के लिए हम आपकी वन्दना करते हैं॥२॥ |
| पवित्र किये जाते सोम की ध्वनि, वर्षा के समय होने वाली जल की ध्वनि के समान मधुर है। उस तेजस्वी सोम की किरणें आकाश में सर्वत्र फैलती हैं॥३॥ |
| सुपात्र में स्थित हे सोमदेव ! आप हमें अन्न के भण्डार एवं पुत्र-पौत्र, गौएँ, अश्व एवं स्वर्णादि अपार वैभव प्रदान करें॥४॥ |
| उषाकाल के बाद अपनी स्वर्णिम रश्मियों से जगत् को आलोकित करने वाले सूर्यदेव की भाँति हे विश्व द्रष्टा सोमदेव ! आप अपने तृप्तिदायक पवित्र हुए रस से धरतीं और आकाश को भर दें॥५॥ |
| हे सोमदेव ! जल से घिरी हुई पृथ्वी की भाँति आप अपनी सुखद रसधार से हमें चारों ओर से घेर लें॥६॥ |
सूक्त-४२
| यह हरिताभ सोम द्युलोक में नक्षत्रों को तथा अन्तरिक्ष में सूर्यदेव का निर्माण करके गौ (किरणों या पृथ्वी) तथा जल को आच्छादित (प्रभावित करता है॥१॥ |
| सनातन स्तुतियों की सहायता से यह देदीप्यमान सोमरस देवगणों के लिए धार रूप में प्रवाहित होता है॥२॥ |
| सोमरस हजारों प्रकार के बल की वृद्धि के लिए तथा अन्नादि लाभ के उद्देश्य से निकाला जाता है॥३॥ |
| बर्तन में निचोड़ा गया यह सोमरस छलनी से छाना जाता है । शब्द करता हुआ यह सोम देवगणों को यज्ञ में आवाहित करता हुआ प्रतीत होता है॥४॥ |
| यह शोधित सोमरस सत्यव्रतधारी देवगणों को समीप लाते हुए सभी प्रकार का धन विविध प्रकार से प्रदान करता है॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप गौओं, वीर पुत्रों, अश्वों तथा बलों से युक्त अन्न हमें प्रदान करें॥६॥ |
सूक्त-४३
| अश्व की भाँति गतिशील सोम को गौदुग्ध में मिश्रित कर शोधित किया जाता है, जो आनन्ददायी होने के कारण प्रिय हैं, उस सोम की स्तुतियों द्वारा यज्ञस्थल में स्थापना करते हैं॥१॥ |
| सनातन स्तुतियों की भाँति हर प्रकार से रक्षण करने वाली स्तुतियाँ, उस सोम को सुशोभित करते हुए इन्द्रदेव के लिए तैयार करती हैं॥२॥ |
| स्तुतियों से संस्कारित, शोधित, सोमरस ज्ञानवान् मेधातिथि के यज्ञ में पहुँचता है॥३॥ |
| हे पवित्र तेजस्वी सोमदेव ! आप सहस्रों प्रकार का उत्तम धन हमें प्रदान करें॥४॥ |
| युद्ध में जाते हुए अश्वों के समान यह सोम देवगणों के पास जाने की कामना से छलनी में शब्द करते हुए जाता है॥५॥ |
| हे सोमदेव ! स्तोता, विप्र की वृद्धि के लिए तथा उत्तम बल से युक्त अन्न के लिए आप प्रवाहित हों॥६॥ |
सूक्त-४४
| हे सोमदेव ! प्रचुर सम्पदा प्राप्ति के लिए आप कलश में छाने जाते हैं। आपके तेज़ को धारण करने वाले अयास्य ऋषि, देवों की ओर (देवत्व की ओर अथवा देवपूजन के लिए) बढ़ते हैं॥१॥ |
| ज्ञानवानों की उत्तम बुद्धि से सेवित यह ज्ञानी सोमरस सत्कर्म रूपी यज्ञ में दूर-दूर तक के स्थानों में गमन करता है॥२॥ |
| जागरण शील, दिव्य द्रष्टा यह सोमरस छलनी में छाने जाने पर देवगणों की ओर गमन करता है॥३॥ |
| हे सोमदेव ! इस हिंसारहित यज्ञ को उत्तम विधि से पूर्ण करते हुए आप याज्ञिकों तथा हम सभी के लिए अन्न प्रदान करने वाला रस प्रदान करें॥४॥ |
| ज्ञानी जनों द्वारा प्रेरित वह सोमरस सदा संवर्धित होकर वायुवत् (सर्व हितकारी) देवत्व प्रदान करने वाला ऐश्वर्य हमें प्रदान करे॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप पुण्य कर्मों के मार्गदर्शक तथा सत्कर्म करने वाले हैं, अतः (अपनी सामर्थ्य से) आप धन तथा उत्तम अन्न पर विजय प्राप्त करते हैं॥६॥ |
सूक्त-४५
| हे सोमदेव ! आप मनुष्यों के द्रष्टा हैं। देवों के निमित्त तथा इन्द्रदेव के आनन्दवर्द्धन के लिये उनके पान करने हेतु सुखपूर्वक अपना रस निष्पादित करें॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप ज्ञान के संदेशवाहक बनकर इन्द्रदेव की तुष्टि के लिए देवगणों के निमित्त तथा मित्रों के लाभ हेतु रस प्रदान करें॥२॥ |
| उस अरुणाभ सोम को आनन्द वृद्धि तथा सुख प्राप्ति के लिए, गौ दुग्ध के साथ मिलाते हैं। हे सोमदेव ! आप हमारे धन प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करें॥३॥ |
| जिस प्रकार अश्व धुरे को मार्ग पर गतिशील करता है, उसी प्रकार शोधन यंत्र को पार करके सोम देवों तक पहुँचता है॥४॥ |
| छलनी में क्रीड़ा करते हुए शोधित सोमरस की, सखाभाव वाले याजक, यज्ञस्थल में स्तुति करते हैं॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप जिस धारा से पान करने पर स्तोताओं को उत्तमबल प्रदान करते हैं, उसी धारा से पात्र में क्षरित हों-पवित्र हों॥६॥ |
सूक्त-४६
| पर्वत में उत्पन्न हुआ तथा क्षरित होता हुआ सोमरस देवगणों के पास जाने के लिए, वेगवान् अश्वों के समान पात्र में गमन करता है॥१॥ |
| जिस प्रकार पुत्री, पिता द्वारा अलंकारों से विभूषित होकर पति के पास जाती हैं, उसी प्रकार तेजस्वी सोम वायुदेव के पास जाता है॥२॥ |
| पात्र में निकालकर रखा गया, यह तेजस्वी सोमरस अन्न के साथ मिलकर अपने यज्ञीय कार्यों से इन्द्रदेव के बल को बढ़ाता है॥३॥ |
| हे सिद्धहस्त याज्ञिको ! हमारे पास आओ तथा मथानी से मथकर इस बलशाली सोमरस को गाय के दूध के साथ मिलाओ॥४॥ |
| हे शत्रुओं का धन जीतने वाले सोम ! आप हमें उत्तम धन प्रदान करने वाला श्रेष्ठ मार्गदर्शन प्रदान करें॥५॥ |
| स्तुत्य, पवित्र, सुखद सोम इन्द्र को देने तथा उनको उल्लसित करने के लिए दसों अँगुलियाँ शुद्ध करती हैं॥६॥ |
सूक्त-४७
| हे सोम ! आप श्रेष्ठ कार्यों से सम्मानित होकर महान् बनते हैं और आनन्द प्रदान करके शक्ति बढ़ाते हैं॥१॥ |
| यह सोम शत्रुओं का नाश करता है तथा धैर्यपूर्वक (याज्ञिकों के) ऋण को भी दूर करता है॥२॥ |
| इन्द्रदेव के स्तोत्र बोलते समय उनका प्रिय सोमरस हजारों प्रकार का पौष्टिक अन्न प्रदान करता है॥३॥ |
| अँगुलियों से शोधित होते समय कवि सदृश यह सोम ज्ञानीजनों को धन प्रदान करने की कामना करता है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! जैसे संग्राम में जाते समय अश्वों को घास देते हैं, उसी प्रकार युद्धभूमि में विजय की कामना करने वालों को आप धन प्रदान करते हैं॥५॥ |
सूक्त-४८
| देवलोक में व्याप्त, नाना प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त, सुन्दर, हे सोमदेव ! उत्तम कर्मों ( यज्ञों) के द्वारा आपको प्राप्त करने की हमारी कामना है॥१॥ |
| हे असुरजयी सोमदेव ! आप उत्तम कर्म करने वाले आनन्ददायी तथा शत्रुओं के सैकड़ों नगरों को ध्वस्त करने वाले हैं। आपसे हम ऐश्वर्य की याचना करते हैं॥२॥ |
| उत्तम कर्मों के अधिष्ठाता, ऐश्वर्यवान् , तेजस्वी हे सोमदेव ! कष्ट एवं पीड़ा को महत्त्व न देने वाले गरुड़ आपको द्युलोक से पृथ्वी पर लायें॥३॥ |
| यज्ञरक्षक, जल का प्रेरक, स्वयं प्रकाशित, देवशक्तियों को सहजता से प्राप्त होने वाला दिव्य सोम आकाश को संव्याप्त कर लेता है॥४॥ |
| इसके बाद (पृथ्वी पर आकर) ज्ञान सम्पन्न एवं इष्ट फलदायी सोम, शोधित होकर, अपनी क्षमताओं को और अधिक बढ़ाकर अतिशय श्रेष्ठ बन जाता है॥५॥ |
सूक्त-४९
| हे दिव्य सोमदेव ! आप (हमारे लिए) द्युलोक द्वारा उत्तम रीति से वृष्टि करें, जल को तरंगित करें तथा उनके साथ रोगनाशक अन्न हमें प्रदान करें॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप उन धाराओं को प्रकट करें, जिनसे अन्य (जो हमें प्राप्त हैं, उनके अतिरिक्त) गौएँ (वाणियाँ, पोषक प्रवाह) हमें प्राप्त हों॥३॥ |
| हे सोमदेव ! यज्ञ में देवों द्वारा अभिलषित हुए आप धार-रूप जल की वृष्टि करें॥३॥ |
| हे सोमदेव ! हमें अन्न प्रदान करने के लिए आप छन्ने से धार-रूप में छनकर कलश में प्रविष्ट हों । देवगण आपके (मधुर) शब्द सुनकर उल्लसित हों॥४॥ |
| शत्रुओं का संहार करने वाला, तेज से देदीप्यमान, पवित्र होने वाला सोमरस कलश में स्रवित होता है । ॥५॥ |
सूक्त-५०
| हे सोमदेव ! आपके प्रवाहित होने से समुद्र की तरंगों जैसी ध्वनियाँ होती हैं। आप वाणी से उत्पन्न शब्दों की भाँति ध्वनि को प्रेरित करें॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आपके प्रादुर्भाव के बाद याजकवृन्द ऋक्, यजु, साम के मंत्रों का गान करते हैं, तब आप उच्च आसन पर विराजमान होकर संस्कारित होने के लिए तत्पर हो जाते हैं॥२॥ |
| ऋत्विग्गण पाषाणों से कूटे गये हरिताभ, सुन्दर, मधुर सोमरस को छन्ने से छानते हैं॥३॥ |
| है परम आनन्ददायी सोमदेव ! इन्द्रदेव को तृप्ति प्रदान करने के लिए आप शोधन यंत्र में से निर्मज्ञ धारा के रूप में प्रवाहित हों॥४॥ |
| हे आनन्ददाता सोम ! आप गौ के पुष्टिकारक दुग्धादि के मिश्रण में छनकर इन्द्र के पान करने योग्य बनें॥५॥ |
सूक्त-५१
| हे अध्यर्वो ! इन्द्र के पीने योग्य बनाने हेतु पत्थर से निचोड़े गये सोम को पवित्र करके पात्र के पास लाओ॥१॥ |
| हे याज्ञिको ! द्युलोक के अमृत के समान अत्यन्त मधुर सोमरस को वज्रधारी इन्द्रदेव को प्रदान करने के लिये अभिषिक्त करो॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आपके आनन्दवर्द्धक मधुर अन्नरूप रस का देवगण तथा मरुद्गण सेवन करते हैं॥३॥ |
| हे अभिषुत सोमदेव ! आप देवगणों को आनन्दित करने, उनकी कामनाओं की पूर्ण करने तथा संरक्षण प्रदान करने में सहायक होते हैं॥४॥ |
| हे सर्वद्रष्टा सोमदेव ! छलनी में धारारूप में निचोड़े गये, आपका रस हमें अन्न तथा कीर्ति प्रदान करे॥५॥ |
सूक्त-५२
| धन प्रदान करने वाला तेजस्वी सोम हमें बल एवं अन्न से परिपूर्ण करे । हे सोमदेव ! आप शोधक यंत्र से शोधित होते हुए आएँ॥१॥ |
| हे सोम ! हजारों धाराओं से गमनशील आपका प्रिय रस अनश्वर छलनी से नीचे की ओर प्रवाहित होता है॥२॥ |
| हे सोमदेव ! पत्थरों से कूटते समय आप रस को बाहर निकलने के लिए प्रेरित करें । हे सोमदेव ! आप चरु के समान जो खाद्य है, उसे हमें प्रदान करें॥३॥ |
| हे स्तुतियों के योग्य सोमदेव ! आपकी बल बढ़ाने की प्रेरणा हमारे लिए हितकारी है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! हजारों प्रकार से शुद्ध होकर आप संरक्षण से युक्त धन प्रदान करने वाला रस निकालें॥५॥ |
सूक्त-५३
| पाषाणों से कूटे गये हे शुद्ध सोमदेव ! आपकी उठती तरंगों (बल) से राक्षसों (विकारों) का विनाश होता है । आप हमसे संघर्ष करने वाले शत्रुओं को दूर करें॥१॥ |
| है सोमदेव ! आप अपनी सामर्थ्य से शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ हैं । युद्ध में हम निर्भय अन्त: करण से रथों में स्थित धन प्राप्ति के लिए आपकी स्तुति करते हैं॥२॥ |
| इस संस्कारित सोम के कर्मों से दुष्ट राक्षसों की प्रगति नहीं हो सकतीं । हे सोमदेव ! अपने प्रति आक्रामक शत्रुओं का आप विनाश करें॥३॥ |
| आनन्द रस बहाने वाले, बल और उत्साह बढ़ाने वाले इस हरिताभ सोम को (ऋत्विग्गण) नदियों (जल) के माध्यम से इन्द्रदेव के लिए प्रेरित करते हैं॥४॥ |
सूक्त-५४
| याजक गण सनातन स्वरूप वाले शुद्ध सोम को निकालते हैं, वह द्रष्टा सोमरस (याजकों को) हजारों प्रकार का धन प्रदान करता है॥१॥ |
| देवलोक तक सप्तधाराओं (सप्तकिरणों) के रूप में प्रवाहित सूर्यदेव के समान सभी लोकों का द्रष्टा सोमरस जल पात्रों में शोधित किया जाता है॥२॥ |
| पवित्र होने वाला यह सोमरस सूर्यदेव के समान सभी लोकों में प्रकाशित होता है॥३॥ |
| इन्द्रदेव के पास जाने की कामना वाले हे शोधित सोमदेव ! आप देवगणों के निमित्त गौ (गौएँ या पौषण) तथा हर प्रकार का अन्न प्रदान करते हैं॥४॥ |
सूक्त-५५
| हे सोमदेव ! अपने दिव्य पोषक रस को अन्न एवं वनस्पतियों के साथ आप हमें उपलब्ध कराते रहें तथा हमें सम्पूर्ण वैभव प्रदान करें॥१॥ |
| देवताओं के प्रिय आहार हे सोमदेव ! याजकों द्वारा जिस भावना से आपकी स्तुति की जाती है, उसी स्नेह के साथ आप यज्ञशाला में श्रेष्ठ आसन ग्रहण करें॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें गौ, अश्व, अन्न आदि के रूप में अपार वैभव प्रदान करें॥३॥ |
| शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले हे सामदेव ! असुरों का विनाश करने वाले, उनसे कभी पराजित न होने वाले आप पवित्रता को प्राप्त हों॥४॥ |
सूक्त-५६
| द्रुतगति से कार्य करने वाला, देवगणों के पास जाने वाला सोमरस शोधक प्रक्रिया के अन्तर्गत शत्रुओं ( विकारों) का संहार करता है तथा हमें उत्तम धन (लाभादि) प्रदान करता है॥१॥ |
| यज्ञ की कामना वाली सैकड़ों सोमरस की धाराएँ जब इन्द्रदेव से मित्रभाव स्थापित करती हैं, तभी सोमरस से हमें अन्न प्राप्त होता है॥२॥ |
| जिस तरह स्त्री अपने प्रियतम को बुलाती है, उसी प्रकार दसों अँगुलियाँ सोमरस को पकड़तीं और शुद्ध करती हैं॥३॥ |
| है सोमदेव ! विष्णु तथा इन्द्रदेव के निमित्त आप मधुर रस निकालें और स्तुति करने वाले याजकों को पापकर्मों से बचाएँ॥४॥ |
सूक्त-५७
| हे सोमदेव ! आपकी अविरल धाराएँ प्रचुर अन्नादि देने वाली हैं, जैसे आकाश से वृष्टि होती है, वैसे ही आपकी धाराएँ पृथ्वी पर अन्न (पोषक तत्त्व) की वृष्टि करती हैं॥१॥ |
| सभी प्रिय कर्मों पर दृष्टि रखने वाला हरिताभ सोम शत्रुओं पर आयुधों का प्रहार करता हुआ (उन्हें पराभूत करके) आगे बढ़ता जाता है॥२॥ |
| वह नित्य उत्तम कर्मों को सम्पन्न करने वाली सोम, ऋत्विजों द्वारा संस्कारित होता हुआ राजा के समान निर्भीक और तेजस्वी दिखाई देता है । वह बाज़ पक्षी के समान वेगपूर्वक जल में मिलाया जाता है॥३॥ |
| हे सोमदेव ! पवित्र होने वाले आप द्युलोक और पृथिवीलोक में संव्याप्त रहते हुए हमें सभी प्रकार की सम्पदाएँ प्रदान करें॥४॥ |
सूक्त-५८
| निकाली गई सोमरस की पुष्टिकारक धारा आनन्द प्रदान करने वाली हैं । वह निकृष्ट संस्कारों से रहित और उपासकों को ऊर्ध्वगति प्रदान करने वाली है॥१॥ |
| सभी प्रकार के वैभवों से युक्त देदीप्यमान धाराएँ याजक का हर प्रकार से संरक्षण करना जानती हैं, ऐसी आनन्द प्रदायक धाराएँ तेजगति से प्रवाहित होती हैं॥२॥ |
| ध्वस्र (विकारों को ध्वस्त करने वाले) और पुरुषन्ति (ऐश्वर्य प्रदायक-राजाओं या इन गुणों वाले सोम) से हम अपार वैभव प्राप्त करें । आनन्दप्रद ऐसा (सोम) अतिवेग से प्रवाहित होता है। ॥३॥ |
| जिससे हम तीस सहस्र विस्तृत (वस्त्र या आच्छादन) प्राप्त करते हैं, वह आनन्ददायक (सोम) तीव्र गति से संचरित होता हैं॥४॥ |
सूक्त-५९
| हे सोमदेव ! आप गौओं ( गौएँ, किरणों, इन्द्रियों) को जीतने वाले, अश्वों ( घोड़ों-शक्ति प्रवाहों) के विजेता हैं । आप प्रवाहित हों तथा हमें प्रजासहित धन - सम्पन्न बनाएँ॥१॥ |
| हे सोमदेव ! जल में मिश्रित होने के लिए आप, अपना रस प्रदान करें। न दबाए जाने वाले आप उत्तम ओषधियों के विस्तार के लिए तथा हमारी बुद्धि को पवित्र बनाने के लिए अपना रस प्रदान करें॥२॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! सभी राक्षसों को दूर करते हुए आप ज्ञानवान् होकर उत्तम आसन पर विराजें॥३॥ |
| हे सर्वज्ञाता सोमदेव ! आप यजमान को उत्तम फल प्रदान करें । उत्पन्न होते ही वृद्धि को प्राप्त होने वाले आप, सभी शत्रुओं को दूर करें॥४॥ |
सूक्त-६०
| हे याजको ! सर्वद्रष्टा, हजारों प्रकार से देखने वाले, सोमरस को शोधित करते समय (स्तोतागण) गायत्री छन्दसे उसकी स्तुति करते रहो॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप हजारों चक्षुओं वाले तथा हजारों के पालक हैं । आप अवरोधों (शोधकतंत्र) को पार करके प्रवाहित हों॥२॥ |
| पवित्र सोमरस दिव्य छलनी से शुद्ध होकर, इन्द्रदेव के हृदय में प्रवेश करते हुए कलश (विश्वघट) में द्रुतगति से स्थापित होता है॥३॥ |
| हे विश्व के द्रष्टा सोमदेव ! इन्द्रदेव की तुष्टि के लिए आप शान्तिदायक रस प्रदान करें तथा हमें बलशाली सन्तति देने की कृपा करें॥४॥ |
सूक्त-६१
| हे सोमदेव ! इन्द्रदेव के सेवनार्थ आप कलश में स्थित हों । आपका यह रस युद्ध में शत्रुओं के सभी नगरों को नष्ट करने के लिए इन्द्रदेव को सामर्थ्य प्रदान करता हैं॥१॥ |
| सोम पीकर इन्द्रदेव ने यज्ञ करने वाले दिवोदास (दिव्यगुणों के लिए समर्पित व्यक्ति) के लिए शबरासुर (अकल्याण करने वाले) को, तुर्वस (क्रोध) को और यदु (नियंत्रण विहीन) को मारा॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें गौ, अश्व, सुवर्ण आदि ऐश्वर्य और अभीष्ट पोषक अन्न प्रदान करें॥३॥ |
| हे सोम !परिष्कृत और शोधित होने वाले आपसे, हम मित्र के रूप में सहयोग पाने की कामना करते हैं॥४॥ |
| हे सोम !आपकी लहरों में से जो धारा शोधित हो रही है, उसके द्वारा हमें उल्लसित करने का अनुग्रह करें॥५॥ |
| हे सोम ! आप जगत् नियन्ता हैं । शोधित होने के बाद आप हमें धन-धान्य के साथ सुसन्तति प्रदान करें॥६॥ |
| सिन्धु (अन्तरिक्ष अथवा नदियाँ ) जिनकी माता हैं, ऐसे सोमदेव को शुद्ध करने में दसों ( अँगुलियाँ या दिशाएँ) सहायक हैं। वे आदित्य (अदिति पुत्र देवों या सूर्य) के साथ संयुक्त प्रतीत होते हैं॥७॥ |
| सूर्य - रश्मियों से प्रकाशित हे सोमदेव ! आप सुपात्र में स्थिर हुए इन्द्र और वायुदेव को प्राप्त होते हैं॥८॥ |
| हे मधुर और मनोहर सोमदेव ! हमारे यज्ञ में भग, वायु, पूषा, मित्र और वरुणदेव के लिए आप शुद्ध हों॥९॥ |
| हे सोमदेव ! आपके पोषक रस का जन्म द्युलोक में हुआ है । वहाँ प्राप्त होने वाला कल्याणकारी सुख और महान् अन्न (आपके माध्यम से) हम पृथ्वी पर प्राप्त करते हैं॥१०॥ |
| इस (सोम) की सहायता से मनुष्यों के लिए आवश्यक सभी प्रकार के अन्नादि हमें प्राप्त हों । हम उनके श्रेष्ठ उपयोग की कामना करते हैं॥११॥ |
| हमें ऐश्वर्यशाली बनाने वाले हे सोमदेव ! हम लोग जिनके लिए यज्ञ करते हैं, उन इन्द्र, मरुद्गण और वरुणदेव के निमित्त आप भली प्रकार से क्षरित हों॥१२॥ |
| शत्रु संहारक, भली प्रकार से तैयार, जल और गौ दुग्ध में मिला हुआ यह सोमरस देवगणों को तृप्ति देने वाला सिद्ध हो॥१३॥ |
| हमारी वाणी इन्द्रदेव के हार्दिक प्रिय पात्र, श्रेष्ठ सोम की स्तुतियाँ करे । जिस प्रकार बालक को माता अपने दुग्ध से पुष्ट करती है, उसी प्रकार हमारी स्तुतियाँ सोम की यश वृद्धि करें॥१४॥ |
| स्तुति करने योग्य हे सोमदेव ! हमारी गौओं को सुख प्रदान करने वाले, इमारे घर को पौष्टिक अन्न से भरने वाले आप जल से मिश्रित होकर सुपात्र में स्थिर हों॥१५॥ |
| पवित्र होने के बाद इस सोमरस ने दिव्य लोक में विद्यमान, सभी को प्रकाशित करने में समर्थ, महान् वैश्वानर ज्योति को बिजली के समान प्रकट किया॥१६॥ |
| हे सुशोभित होने वाले पवित्र सोमदेव ! दुष्टतारहित, आनन्दप्रद , आपका दिव्यरस अनश्वर छन्ने से होकर अवतरित होता है॥१७॥ |
| पवित्रता को प्राप्त होने वाले सोम का शक्तिवर्द्धक एवं तेजस्वी रस सुशोभित होता है। समस्त विश्व में उसकी प्रकाश-किरणें दिखाई देती हैं॥१८॥ |
| हे सोमदेव ! देवताओं को आकृष्ट करने वाला, दुष्टों का नाश करने वाला आपका दिव्यरस अत्यन्त हर्षप्रद हैं । उस पोषक रस सहित आप (कलश में ) प्रतिष्ठित हों॥१९॥ |
| हे सोमदेव ! आप अमित्र (अहितकारी) वृत्र (अज्ञानरूपी वृत्ति) के नाशक हैं। आप सतत संघर्षशील रहते हैं । आप गोधन और अश्वों की भी वृद्धि करते हैं॥२०॥ |
| हे सोमदेव ! जैसे बाज़ पक्षी अपने घोंसले पर शोभायमान होता है, वैसे ही धेनुओं (गौओं, इन्द्रियों, धारण करने वाली भूमि आदि) के साथ संयुक्त होकर आप तेजस्वी बनते हैं॥२१॥ |
| हे सोमदेव ! आप जल प्रवाह को रोकने वाले वृत्र को मारने के लिए इन्द्रदेव को प्रोत्साहित करें तथा तीव्र धारा के साथ कलश में छनते जाएँ॥२२॥ |
| हे पवित्र सोम !आप हमारी स्तुतियों का विस्तार करें । हम शौर्यवान् होकर शत्रु के धन पर विजय प्राप्त करें॥२३॥ |
| हे सोमदेव ! आपका संरक्षण प्राप्त कर हम शत्रुओं का संहार करें । हम व्रतशील बनकर जाग्रत् रहें॥२४॥ |
| यह सोम रिपुओं को तथा दान न देने वालों को मारता है । इन्द्रदेव के पास जाता हुआ क्षरित होता है॥२५॥ |
| हे पवित्रकर्मा सोम !आप हमें अनेकों साधन, पुत्रादि और यश प्राप्त कराएँ । हमारे शत्रुओं का हनन करें॥२६॥ |
| हे पवित्र सोमदेव ! यज्ञ करने वाले को जब आप ऐश्वर्य देने की इच्छा करते हैं, उस समय आपको सैकड़ों शत्रु भी नहीं रोक सकते॥२७॥ |
| हे अभिषुते सोमदेव ! आप श्रेष्ठ बल को बढ़ाने वाले हैं। लोगों में आप हमें यशस्वी बनाएँ तथा हमारे सभी शत्रुओं ( विकारों ) को नष्ट करें॥२८॥ |
| हे सोमदेव ! मित्र भाव से आपने हमें तेजस्वी बनाया है, अत: आक्रमणकारी शत्रुओं पर हम विजय प्राप्त कर सकते हैं॥२९॥ |
| हे सोमदेव ! शत्रुओं का नाश करने वाले अपने तीक्ष्ण शस्त्रों के द्वारा आप हमें शत्रुओं की निन्दा द्वारा आहत होने से बचाएँ॥३०॥ |
सूक्त-६२
| छन्ने की ओर द्रुतगति से जाते हुए सोमरस को, सभी सौभाग्यों की प्राप्ति के लिए ऋत्विजों द्वारा शोधित किया जाता है॥१॥ |
| बलवर्द्धक , पापनाशक यह सोमरस हमारे एवं हमारी सन्तति के लिए पशु एवं धन प्रदान करने का मार्ग स्वयं बनाना है॥२॥ |
| हमारे लिए एवं हमारी गौओं के लिए उत्तम धन तथा पौष्टिक अन्न के प्रदाता सोमदेव हमारी सुन्दर प्रार्थनाओं को स्वीकार करते हैं॥३॥ |
| पर्वतों ( ऊर्ध्वलोकों) में उत्पन्न सोम आनन्द वृद्धि के लिए निचोड़ा गया एवं जल के संयोग से व्यापक बना । वह सोम श्येन पक्षी के समान अपने निश्चित स्थान पर स्थित है॥४॥ |
| योजकों द्वारा अभिषुत, देवों का श्रेष्ठ आहार, जल मिश्रित पवित्र सोमरस को गौएँ अपना दूध मिलाकर अधिक स्वादिष्ट बना रही हैं॥५॥ |
| अश्व सदृश स्फूर्तिवान् सोम को याजकगण अमरत्व प्राप्ति की कामना से यज्ञस्थल पर स्थापित करते हैं॥६॥ |
| अपनी मधुर रस की धाराओं से सभी को संरक्षण देने वाले, हे सोमदेव ! आप उन धाराओं के साथ शुद्धता को धारण करें॥७॥ |
| ऊन के छत्रे द्वारा शुद्ध होने वाले हे सोमदेव ! यज्ञ के मूल स्थान पर स्थापित होकर आप इन्द्रदेव की तृप्ति के लिए तैयार हों॥८॥ |
| धन-वैभव प्रदानकर्ता हे सोम ! अंगिरादि ऋषियों के लिए आप घृत, दुग्धयुक्त पौष्टिक आहार प्रदान करें॥९॥ |
| विशिष्ट, बुद्धिवर्द्धक, पात्र में स्थित होकर शुद्ध किया हुआ यह सोमरस पानी में मिलकर प्रचुर अन्न (पोषण) प्रदान करता हुआ यशस्वी होता है॥१०॥ |
| यह शत्रुनाशक, कामनाओं की पूर्ति करने वाला बलशाली सोम, श्रेष्ठ कार्यों में नियोजन करने वालों को धन प्रदान करता है॥११॥ |
| हे सोम ! गौओं तथा अश्वों से युक्त, अनेकों के द्वारा चाहा गया हजारों प्रकार का तेजस्वी धन हमें प्रदान करें॥१२॥ |
| निकाला गया वह सोम, जो याजकों के द्वारा शोधित किया जाता है, बुद्धिपूर्वक कर्म करने वाला तथा अनेकों प्रकार से स्तुत्य होता है॥१३॥ |
| हजारों प्रकार से संरक्षण करने वाला, सैकड़ों प्रकार का धनदाता, विभिन्न लोकों का निर्माण करने वाला आनन्दवर्द्धक ज्ञानी सोम इन्द्रदेव के लिए शोधित किया जाता है॥१४॥ |
| जिस प्रकार पक्षी घोंसले की ओर आता है, उसी प्रकार हमारी वाणी द्वारा स्तुत होता हुआ परिष्कृत सोमरस इन्द्रदेव के पास जाता है॥१५॥ |
| जिस प्रकार योद्धा संग्राम में जाते हैं, उसी प्रकार याजकों द्वारा निकाला गया शोधित सोमरस अपनी सामर्थ्य से पात्र में जाता है॥१६॥ |
| याजकगण तीनों सवनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं ) में ऋषियों के यज्ञरूप रथ में सात छन्दों के द्वारा, तीन वेदों (क्, यजु, साम) का गान करते हुए सोमरस को देवगणों के पास ले जाते हैं॥१७॥ |
| सोमरस को शोधित करने वाले हे याजको ! जिस प्रकार अश्वों को युद्ध में जाने के लिए सजाया जाता है, उसी प्रकार हरिताभ सोम को यज्ञ के निमित्त अलंकृत करो॥१८॥ |
| यह परिष्कृत सोमरस कलश में भरे जाते समय सुशोभित होता हैं, जिस प्रकार गौओं का संरक्षण वीर पुरुष करते हैं, उसी प्रकार यह सोम यज्ञ का संरक्षण करता है॥१९॥ |
| हे सोमदेव ! सभी देव तथा सभी याजक मिलकर देवगणों को कौन सा आनन्द प्रदान करने के लिए दूध मिला हुआ मधुर सोमरस निकालते हैं ?॥२०॥ |
| हे याजको ! देवों का अतिप्रिय तथा मधुर सोमरस को (शोधित करने के लिए) शोधन यंत्र में रखो॥२१॥ |
| परमानन्द युक्त यह सोमरस, स्तुतिगान के बाद हमें श्रेष्ठ शक्ति प्रदान करने के लिए धारा के साथ कलश पात्र में गिरता है॥२२॥ |
| मानवमात्र को सुख देने वाले हे सोमदेव ! आप देवताओं के सेवन हेतु गो दुग्धादि से मिश्रित होकर अन्न प्रदान करते हुए कलश में एकत्र हों॥२३॥ |
| हे सोमदेव ! जमदग्नि ऋषि द्वारा की गई स्तुति से युक्त होकर आप हमें गौओं के साथ अन्य सभी प्रशंसनीय पोषक आहार प्रदान करें॥२४॥ |
| हे सोमदेव ! आप सर्वश्रेष्ठ हैं। अपने रक्षण-सामर्थ्य सहित आप हमारी वाणी में प्रविष्ट हों तथा सभी काव्यों-स्तुतियों में भी संचरित हों॥२५॥ |
| हे सर्वहितकारी सोमदेव ! आप अग्रणी होकर, हमारी स्तुतियों को सुनकर प्रसन्न हुए देवलोक के जल का आवाहन करें॥२६॥ |
| हे दूरदर्शी सोमदेव ! आपकी महत्ता के प्रभाव से यह विश्व स्थित है। आपके लिए दूध उपलब्ध कराने हेतु देवगणों को तृप्त करने वाली गौएँ आपके पास आ रही हैं॥२७॥ |
| हे सोमदेव ! आपकी प्रवाहित होने वाली रस - धाराएँ द्युलोक से होने वाली वर्षा के समान छलनी से शोधित होते हुए गमन करती हैं॥२८॥ |
| हे याजको ! वेगवान् , बल बढ़ाने के मुख्य साधन, धनपति, शक्ति के धनी सोम को इन्द्रदेव के निमित्त प्रस्तुत करो॥२९॥ |
| यह तेजसू प्रदायक, पवमान, सत्यरूप, मेधावी सोम. स्तोत्रों को तेजस्विता प्रदान करता है॥३०॥ |
सूक्त-६३
| हे सोमदेव ! आप हजारों प्रकार के बल से युक्त श्रेष्ठ धन तथा अन्न हमें प्रदान करें॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप अत्यन्त आनन्द प्रदान करने वाले हैं, अतः इन्द्रदेव के लिए अन्न और बल का संवर्द्धन करते हुए यज्ञस्थल पर प्रतिष्ठित हों॥२॥ |
| अभिषुत सोमरस इन्द्र, विष्णु और वायुदेव के लिए कलश में प्रतिष्ठित होता है । वह सोमरस मधुर हो॥३॥ |
| भूरे रंग का द्रुतगामी यह सोमरस जल की धारा के साथ आगे बढ़ता है॥४॥ |
| यह सोम इन्द्रदेव के यश को बढ़ाने वाला, प्रजा को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने वाला, सम्पूर्ण विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाने वाला तथा अदानशीलों को मारने वाला है। ॥५॥ |
| निकाला गया भूरे रंग का सोमरस अपने स्थान को प्राप्त करने के लिए इन्द्रदेव की ओर गमन करता है॥६॥ |
| हे सोमदेव ! जिसके द्वारा आप मनुष्यों के लिए (शरीरस्थ या प्रकृतिगत) जल रसों को बढ़ाते हैं, जिनसे सूर्यदेव को प्रकाशित करते हैं, उन्हीं श्रेष्ठ धाराओं के साथ आप प्रवाहित हों॥७॥ |
| यह पवित्र सोम अभीष्ट ऊर्ध्व गति पाने के लिए संकल्पित याजकों को सूर्य के अश्वों ( किरणों ) जैसा वेग प्रदान करने में समर्थ है॥८॥ |
| सोम इन्द्रदेव के नाम का उच्चारण करते हुए हरित वर्ण वाले अश्वों को सूर्य के रथ की भाँति इशों दिशाओं में जाने के लिए नियोजित करता हैं॥९॥ |
| हे स्तोता याजको ! आनन्ददायी सोम को वायु तथा इन्द्रदेव के लिए अनश्वर छलनी से छानकर शोधित करो॥१०॥ |
| हे परिष्कृत होने वाले सोमदेव ! शत्रुओं के लिए जो दुर्लभ हो, जिसे दुष्ट भी नष्ट न कर सकें, ऐसा धन आप हमें प्रदान करें॥११॥ |
| हे सोमदेव ! आप गौओं तथा अश्वों से युक्त हजारों प्रकार का धन, बल तथा अन्न हमें प्रदान करें॥१२॥ |
| अद्रि । मेघों या पत्थरों) से निकाले गये देवतुल्य तेजस्वी सोम रस को कलश (विश्वघट) में स्थापित किया जाता है॥१३॥ |
| यह परिष्कृत सोमरस याजकों के घरों में पशुधन तथा अन्न के रूप में प्रवाहित होता है॥१४॥ |
| निष्पन्न (प्रकट हुआ) सोम दधि आश्रित (दही के साथ मिलकर अथवा धारण योग्य पर स्थापित होकर) वज्रधारी इन्द्रदेव को समर्पित किया जाता है॥१५॥ |
| हे सोमदेव ! देवगणों के निमित्त आपको जो आनन्ददायी रस है, वह छलनी से छानने पर परिष्कृत होकर ऐश्वर्य की वृद्धि करने वाला हो॥१६॥ |
| इन्द्रदेव को आनन्दित करने वाले हरिताभ सोम को याजकगण नदी के जल में मिलाकर शुद्ध करते और बलवर्द्धक बनाते हैं॥१७॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें सुवर्ण आदि धन से, अश्वों से तथा वीर सन्तति से युक्ते वैभव प्रदान करें । गों के दुग्ध से युक्त अन्न आप हमें भरपूर मात्रा में दें॥१८॥ |
| हे याजको ! संग्राम में युद्ध की कामना वाले योद्धा को भेजने की भाँति अत्यन्त मधुर सोमरस को इन्द्रदेव के निमित्त छलनी में शोधित करने के लिए डालो॥१९॥ |
| संरक्षण की कामना वाले याजक ज्ञानवर्द्धक सोम को अपनी अँगुलियों से शोधित करते हैं। वह बलवर्द्धक सोम शब्दनाद करता हुआ पात्र में एकत्रित होता है॥२०॥ |
| धारा के रूप में जल के साथ मिश्रित होने वाले बलवर्द्धक सोमरस की ज्ञानी जन अपनी बुद्धि के अनुसार स्तुति करते हैं॥२१॥ |
| हे दिव्य गुण वाले सोमदेव ! आप छनने के लिए पात्र में जाएँ । आपका आनन्ददायी रंस इन्द्रदेव को प्राप्त हो। आप दिव्यरूप से वायु में मिल जाएँ॥२२॥ |
| हे पवित्र सोमदेव ! आप सराहनीय ऐश्वर्य के लिए दुष्टों को दण्डित करते हैं । हम यज्ञ कलश में आपका आवाहन करते हैं॥२३॥ |
| हे सोमदेव ! आप आनन्द प्रदायक, ऋत (सत्य या यज्ञ) के ज्ञाता हैं । विकारों के विनाशक आप देवत्व के विरोधियों का निवारण करें॥२४॥ |
| शुभ ज्योतिर्मय पवित्रता को प्राप्त होने वाला सोमरस वेदमंत्रों की स्तुतियों के साथ क्षरित होता है॥२५॥ |
| पवमान, उज्ज्वल सोम विकारों का शमन करते हुए तीव्रगति से सुपात्र में स्थिर हो रहा है॥२६॥ |
| शोधित सोम पृथ्वी के ऊँचे भाग आकाश से किरणों तथा अन्तरिक्ष की वृष्टि के समान प्रकट होता है॥२७॥ |
| हे श्रेष्ठ कर्म करने वाले तेजस्वी सोमदेव ! हमारे सभी शत्रुओं को पराजित करते हुए आप उन्हें दूर कर दें। स्वयं धारा रूप से शोधित होकर पवित्र बनें॥२८॥ |
| हे सोमदेव ! असुरों को नष्ट करके शब्दनाद करते हुए आप हमें श्रेष्ठ-तेजस्वी बल प्रदान करें॥२९॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें आकाश तथा पृथ्वी में उत्पन्न हुए, स्वीकार करने योग्य सम्पूर्ण धन प्रदान करें॥३०॥ |
सूक्त-६४
| हे सोमदेव ! आप पराक्रमी और तेजस्वी हैं । बल बढ़ाने की क्षमता से युक्त आप सदैव अपने इस धर्म (गुण) को धारण किए रहते हैं॥१॥ |
| हे वर्षणशील (सोम) ! आपका बल वर्षणशील है, तेजसमूह वर्षणशील है, आनन्द भी वर्षणशील या बलशाली है । हे बलशाली ! आप वास्तव में हीं वृषा (वर्षणशील या बलशाली) हैं॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आप बलशाली हैं, पशुधन की वृद्धि करने वाले हैं। अत: आप हमें ऐश्वर्य दिलाएँ॥३॥ |
| बल और स्फूर्ति बढ़ाने वाली यह सोमरस तेजस्वी है। गौ, अश्व तथा वीर पुत्रों की कामना करने वालों के द्वारा अभिषुत किया जाता है॥४॥ |
| याजकों द्वारा अपने हाथों से तैयार किया गया, विशेष रूप से शोभायमान सोमरस शोधक यंत्र द्वारा संस्कारित किया जाता है॥५॥ |
| दिव्य सोमरस हविदाता को स्वर्गस्थ, अन्तरिक्ष और भौतिकी ( सभी प्रकार की) विभूतियों से युक्त करे॥६॥ |
| हे सर्वज्ञ सोम ! पवित्र होती हुई आपकी धाराएँ सूर्य की रश्मियों की भाँति तीव्र वेग से नीचे आ रहीं हैं॥७॥ |
| हे विश्वव्यापी सोमदेव ! अन्तरिक्ष में ज्ञान चेतना (विचार तरंगों) के रूप में संव्याप्त होकर आप हमें (प्राण पर्जन्य वर्षा के रूप में) जल के माध्यम से विभिन्न प्रकार का वैभव प्रदान करते हैं॥८॥ |
| सूर्य रश्मियों की भाँति प्रकाशित होने वाले हे सोमदेव ! स्तुतिगान के साथ पवित्र होते हुए आप ध्वनिपूर्वक पात्र में स्थिर हो रहे हैं॥९॥ |
| रथी जिस प्रकार अश्वों को (लक्ष्य की ओर ) प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार यह चेतना सम्पन्न सोम सूक्ष्मदर्शयों की बुद्धि के द्वारा तरंगित होता है॥१६॥ |
| हे सोमदेव ! आपकी जो धारा देवगणों को तृप्त करने वाली हैं, वह छलनी में प्रवाहित होते हुए यज्ञस्थल पर प्रतिष्ठित होती है॥११॥ |
| हे सोमदेव ! देवगणों का अतिप्रिय तथा आनन्ददायी जो सोमरस है, वह इन्द्रदेव के पान करने के लिए हमारी शोधन प्रणाली से प्रवाहित होता है॥१२॥ |
| हे सोमदेव ! आप ज्ञानी ऋत्विजों के द्वारा परिष्कृत होते हुए पोषक रस के लिए धारा के रूप में शुद्ध हों और गौ-दुग्ध के साथ मिलकर प्रकाशित हों॥१३॥ |
| हे हरिताभ स्तुत्य सोम ! दूध के साथ मिलाकर शोधित होने वाले आप याजकों को अन्नादि से परिपूर्ण करें॥१४॥ |
| हे स्तुत्य, बलवान् सोम ! यज्ञ के निमित्त याजकों द्वारा शोधित किए गये आप, इन्द्रदेव के पास पहुँचें॥१५॥ |
| अन्तरिक्ष में स्थित वेगवान् सोम अँगुलियों द्वारा दबाने से रस प्रदान करता है॥१६॥ |
| शोधित होने वाला गतिमान् सोमरस सहज ही अन्तरिक्ष से यज्ञस्थल की ओर गमन करता है॥१७॥ |
| हे सोमदेव ! हमारे यज्ञ में पहुँचने की कामना वाले आप अपनी सामर्थ्य से सम्पूर्ण धन तथा हमारे सन्तति युक्त घर का संरक्षण करें॥१८॥ |
| यह सोम जब याजकों द्वारा यज्ञ में आवाहित किया जाता है, तब जल में मिश्रित होते समय शब्द करता है॥१९॥ |
| वेगवान् सोम जब सुवर्ण सदृश यज्ञस्थल पर प्रतिष्ठित होता है, तब याजकों के अज्ञान को दूर करता है॥२०॥ |
| स्तोताजन (सोम की) स्तुति करते हैं । श्रेष्ठ ज्ञानीज़न (सोम के) यजन की कामना करते हैं तथा मिथ्या बुद्धि वाले डूब (नष्ट हो जाते हैं॥२१॥ |
| अत्यन्त मधुर हे सोमदेव ! जिनके सहायक मरुद्गण हैं, उन इन्द्रदेव के लिए आप यज्ञस्थल पर सुशोभित कलश में प्रतिष्ठित हों॥२२॥ |
| अखिल विश्व को धारण करने वाले हे सोमदेव ! वाणी के विशेषज्ञ याजक स्तुतियों से आपकी शोभा बढ़ाते हुए आपको भली-भाँति पवित्र कर रहे हैं॥२३॥ |
| हे नूतन तत्त्वदर्शी सोम ! पवित्रता युक्त आपके रस को मित्र, वरुण, अर्यमा और मरुद्गण सेवन करें॥२४॥ |
| हे तेजस्वी सोमदेव ! आप शोधित होते समय हजारों प्रकार के पवित्र स्तोत्रों को प्रेरित करते हैं॥२५॥ |
| शोधित होने वाले हे सोमदेव ! आप हमें हजारों प्रकार के यज्ञों में स्तोत्रों का गायन करने की प्रेरणा दें॥२६॥ |
| हे सोमदेव ! इन लोकों के प्रिय आप अनेक प्रकार की स्तुतियों से पवित्र होते हुए जल में मिश्रित हों॥२७॥ |
| कान्तिमान् , तेजस्वी, शब्दयुक्त धारा से शुद्ध हुए सोम को गौ के दुग्ध में मिलाकर तैयार किया जाता है॥२८॥ |
| जैसे युद्ध भूमि में यशस्वी शूरवीर घूमते हैं, उसी प्रकार याजकों से प्रशंसित बलवर्द्धक, सबका हितकारी, संस्कारित सोम यज्ञभूमि में प्रतिष्ठा पाता है॥२९॥ |
| हे ज्ञानयुक्त सोमदेव ! आप तेजस्वी सूर्यदेव के सदृश दिव्य आभायुक्त होकर सबके कल्याण के लिए संस्कारित हों॥३०॥ |
सूक्त-६५
| सर्वत्र गमनशील एक ही स्थान पर उत्पन्न बहिने ( सूर्य किरणे अथवा हाथ की अँगुलियाँ ) इस सामर्थ्यवान् , शूर, पालक, महान् सोम को ( शोधन के लिए) प्रेरित करती हैं॥१॥ |
| शुद्ध किए गए हे तेजस्वी सोमदेव ! आप देवताओं को समर्पित करने के लिए तैयार किए गए हैं। आप सब प्रकार की ( सांसारिक एवं दैवी) सम्पदाएँ हमें प्रदान करें॥२॥ |
| हे पवित्र सोमदेव ! जिस प्रकार देवताओं के आशीर्वाद मिलते हैं, उसी प्रकार आप स्तुति करने योग्य (रस) की वर्षा करें । वह वर्षा हमें अन्न प्रदान करने वाली हो॥३॥ |
| हे पवित्र होने वाले बलवर्द्धक सोमदेव ! आप सबको समान दृष्टि से देखने वाले तथा तेजस्वी हैं । इस यज्ञ में हम आपको बुलाते हैं॥४॥ |
| हे उत्तम आयुधों से युक्त सोमदेव ! आनन्ददायी बनकर आप हमें श्रेष्ठ पराक्रम की क्षमता से युक्त करें और हमारे यज्ञ में आकर सुशोभित हों॥५॥ |
| ऋत्विजों द्वारा दोनों हाथों से शोधित हे सोमदेव ! जल में मिलाने के पश्चात् आपको कलश में स्थापित किया जाता है॥६॥ |
| हे याजको ! आप व्यश्व ऋषि की भाँति महान् , हजारों आँखों वाले सोम के गुणों का गायन करें॥७॥ |
| हरिताभ सोम को पत्थरों से कूटकर रस निकाला जाता है। उस मधुर तथा शत्रु विनाशक सोमरस को इन्द्रदेव के निमित्त समर्पित किया जाता है॥८॥ |
| सभी प्रकार के धन पर विजय प्राप्त करने वाले हे सोमदेव ! हम आपसे मित्रभाव की कामना करते हैं॥९॥ |
| हे सोमदेव ! आप उद्गाताओं के लिए वेगवती धारा से कलश में प्रवेश करें और मरुद्गणों से सेवित इन्द्रदेव के लिए सामर्थ्य एवं हर्ष बढ़ाने वाले सिद्ध हों॥१०॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! आत्मदर्शी, बलवान् आप द्युलोक से पृथिवीलोक तक सभी को संरक्षण प्रदान करने वाले हैं। आप बलवान् को हम वाजी (अन्न, बल, संग्राम) के लिए प्रेरित करते हैं॥११॥ |
| हे हरे रंग वाले सोमदेव ! ज्ञानयुक्त बुद्धि अथवा अँगुलियों से परिष्कृत किये गये आप स्रवित हों और अपने सखा इन्द्रदेव को संग्राम में जाने के लिए प्रेरित करें॥१२॥ |
| हे सर्व द्रष्टा सोमदेव ! आप हमें भरपूर अन्न प्रदान करें। आप हम सबके पथ-प्रदर्शक हैं॥१३॥ |
| हे सोमदेव ! आपके रस की धाराओं से युक्त कलशों की हम अपनी सामर्थ्य से स्तुति करते हैं। आप इन्द्रदेव के पान करने के निमित्त इन कलशों में प्रविष्ट हों॥१४॥ |
| हे सोमदेव ! आपके अत्यन्त हर्षकारी वेगवान् रस को अद्रि (मेघों या पत्थरों ) से दुहते (प्राप्त करते ) हैं, वह (रस) शत्रुनाशक (विकारनाशक) होकर स्रवित हो॥१५॥ |
| मन की शक्तियों के अधीन अथवा यज्ञ के अन्तर्गत यह पवमान राजा ( सोम) मेधाओं ( गायनों अथवा मंत्रों) से गतिमान् होता हुआ अंतरिक्ष से ( यज्ञ कलश या विश्वघट में) जाने के लिए समर्थ होता है॥१६॥ |
| हे सोमदेव ! आप सैकड़ों गौओं एवं श्रेष्ठ अश्वों की प्राप्ति और उनका पोषण करने में समर्थ सौभाग्य हमें प्रदान करें॥१७॥ |
| दैवी शक्तियों के लिये शोधित हे सोमदेव ! आप बलवर्द्धक बनकर हमें ऐसी शक्ति प्रदान करें , जिससे हमारी तेजस्विता बढ़े॥१८॥ |
| हे तेजस्वी सोमदेव ! आप शब्द करते हुए पात्र (यज्ञ या विश्वघट) में शुद्ध होकर स्थित हों । आप तपोवन में स्थित इस यज्ञ मण्ड़प में पधारें॥१९॥ |
| जल मिश्रित सोमरस इन्द्र, वायु, वरुण, मरुत् एवं विष्णु आदि देवों की तृप्ति के लिए कलश में स्थिर हो॥२०॥ |
| हे दिव्य सोमदेव ! हमारी सन्तानों के लिए आप सहस्रों प्रकार का अन्न, धनादि वैभव सभी ओर से लाकर प्रदान करें॥२१॥ |
| जो सोम दूरस्थ देशों में या समीपस्थ देशों में शर्यणावत सरोवर के निकट उत्पन्न होकर संस्कारित होता है, वह हमारे लिए इष्ट प्रदायक हो॥२२॥ |
| जो सोम आजक देश में, कर्म करने वालों के देशों में नदियों के किनारे या पंचजनों के बीच उत्पन्न होता तथा संस्कारित किया जाता है, वह हमारे लिये सुखदायक हो॥२३॥ |
| निष्पादित, दीप्तिमान् दिव्य सोम हमें द्युलोक से वृष्टि और उत्तम बल युक्त पोषक अन्न प्रदान करे॥२४॥ |
| जमदग्नि (ऑष अथवा जाग्रत् अग्नि) के द्वारा व्यक्त-प्रस्तुत किया गया यह कान्तिमान् (या इच्छा युक्त) गतिशील सोम, गौ त्वचा (गाय के चमड़े अथवा पृथ्वी की ऊपरी सतह ) पर धारण करके प्रेरित (प्रयुक्त किया जाता है॥२५॥ |
| जल के साथ मिले हुए, अन्न प्रदान करने वाले कान्तिमान् सोमरस को गतिमान् अश्व की भाँति जल से पवित्र किया जाता है॥२६॥ |
| उस सोमरस को याजकगण यज्ञों में देवगणों को देने के लिए प्रेरित करते हैं। हे निष्पन्न सोमदेव ! आप इसके अनुरूप सुशोभित हों॥२७॥ |
| हे सोमदेव ! आपके हर्ष प्रदान करने वाले, सम्पत्ति देने वाले, रिपुओं से रक्षा करने वाले, अनेक लोगों द्वारा कामना किए जाने वाले बल को हम धारण करते हैं॥२८॥ |
| आनन्दवर्द्धक, श्रेष्ठ, ज्ञानी, विलक्षण संरक्षक और सबके द्वारा प्रशंसनीय हे सोमदेव ! हम (याजकगण) आपकी उपासना करते हैं॥२९॥ |
| उत्तम कर्मरत हे सोमदेव ! धन, उत्तम ज्ञान, पुत्र-पौत्र आदि श्रेष्ठ सन्तति, सबल संरक्षण और प्रशंसा के योग्य शक्ति-सामर्थ्य पाने के लिए हम आपकी वन्दना करते हैं॥३०॥ |
सूक्त-६६
| हे सर्वद्रष्टा सोमदेव ! मित्र की भाँति हम आपकी सभी स्तोत्रों से स्तुति करते हैं, आप इन स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें उत्तम रस प्रदान करें॥१॥ |
| उन दो धामों (लोकों) से यह पवमान सोम विश्व को प्रकाशित अथवा नियंत्रित करता हैं । (वहाँ से भू-मण्डलीय क्षेत्र में प्रविष्ट होने पर ) सोम पश्चिम में स्थित होता है॥३॥ |
| है पवित्र ज्ञानी सोमदेव ! सम्पूर्ण विश्व में आपका स्थान ऋतुओं के अनुसार निर्धारित है॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आप सबके मित्र हैं, अतः स्वीकार करने योग्य सम्पूर्ण धन तथा उत्तम अन्न अपने मित्रों के संरक्षण के लिए प्रदान करें॥४॥ |
| हे सोम ! आपकी कान्तिमान् किरणें सूर्य और भूमि के पृष्ठ भाग पर अपने तेज से पवित्र प्रकाश फैलाती हैं॥५॥ |
| हे सोमदेव ! सातों नदियाँ ( प्रकृतिगत सप्त प्रवाह) आपकी आज्ञा से प्रवाहित हैं तथा गौएँ ( धारक किरणें ) दौड़कर आपके पास आती हैं॥६॥ |
| हे अक्षय अन्न के धारणकर्ता सोम ! इन्द्र को आनन्द प्रदान करने के लिए आप धारारूप से उनके पास पहुँचें॥७॥ |
| हे सोमदेव ! सात याजक यज्ञ कार्य में स्तुतियों द्वारा आपकी महिमा बढ़ाने वाले गुणों का वर्णन करते हैं॥८॥ |
| हे सोमदेव ! ऊन की बनी छलनी से शब्दनाद करते हुए शोधित होते समय हम अँगुलियों से आपको पवित्र बनाते हैं । शोधित होते समय आप शब्द करते हुए जल में मिलाए जाते हैं॥९॥ |
| हे बलवर्द्धक सोमदेव ! शुद्ध होते समय आपकी यशस्वी धारा अश्वशाला से निकलने वाले द्रुतगामी अश्वों के समान वेगवती होती है॥१०॥ |
| मधुर रस युक्त कलश में हम सोमरस को छानते हैं, जिसे हमारी अँगुलियाँ बार-बार शुद्ध करती हैं॥११॥ |
| जलयुक्त कलश में छाना गया सोमरस यज्ञस्थल में उसी प्रकार (स्वभावतः) जाता है, जैसे दुधारू गौएँ अपने स्थान (गोष्ठी में जाती हैं॥१२॥ |
| हे सोमदेव ! हमारे महान् यज्ञ में, आपके रस में मिलाने के लिए नदियों का जल लाया गया है । उस सोमरस को गौ के दूध के साथ मिलाया जाता हैं॥१३॥ |
| हे सोमदेवे ! हम आपके मित्ररूप बनकर रहें । आपकी मित्रता से हम संरक्षण की कामना करते हैं॥१४॥ |
| हे दिव्यद्रष्टा सोमदेव ! आप गौओं का रक्षण करने वाले हैं। अत: इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित होकर आप उनके उदर में प्रवेश करें॥१५॥ |
| हे सोमदेव ! आप महान् हैं, आप श्रेष्ठ हैं, शूरों में अधिक श्रेष्ठ वीर हैं । आप शत्रुओं पर हमेशा विजय प्राप्त करते हैं॥१६॥ |
| यह सोम पराक्रमियों में भी महापराक्रमी , शूरवीरों से भी कहीं अधिक शूरवीर तथा बहुत दान देने वालों से भी महादानी है॥१७॥ |
| हे सोमदेव ! आप पौष्टिक अन्न हमें प्रदान करें। आप पुत्र तथा पौत्रों को देने वाले हैं, अतः मित्रता की कामना करते हुए सहयोग के लिए हम आपका वरण करते हैं॥१८॥ |
| हे अग्निदेव ! हमें लम्बी आयु प्रदान करें । हमें अन्न और बल से पूर्ण करें। श्वान वृत्ति वाले शत्रुओं को आप हमसे दूर करें॥१९॥ |
| पंचजनों ( समाज के पाँचों वर्गों) का हित चाहने वाले और सब कुछ देखने वाले अग्निदेव, जिसे ऋत्विजों ने यज्ञ के लिए प्रथम स्थापित किया है, उन समर्थ अग्निदेव की हम स्तुति करते हैं॥२० ॥ |
| हे अग्ने ! आप उत्तम कर्म की प्रेरणा देने वाले हैं। हमें तेज तथा पराक्रम से युक्त शक्ति प्रदान करें । हमें ऐश्वर्य और पोषक तत्वों से सम्पन्न बनाएँ॥२१॥ |
| सोम शत्रुओं को पार करके दूर जाता है । यह सूर्यदेव के सदृश सर्वद्रष्टा सोम उत्तम स्तुतियों से सुशोभित होता है॥२२॥ |
| शोधित हुआ वह तेजस्वी सोम देवगणों के पास जाने की कामना से यज्ञ में अर्पित किया जाता है॥२३॥ |
| यह पवित्रकर्ता सोम महान् , प्रखर, तेजस्वी प्रकाश प्रकट करता है, और काले (अज्ञानरूपी) अन्धकार को विनष्ट करता है॥२४॥ |
| शत्रु विनाशक, सर्वत्र गमनशील, तेजोमय हरिताभ सोम की आह्लादकारी धारा प्रवाहित होती हैं॥२५॥ |
| उच्च स्थान पर सुशोभित, शुभ्रतेज से कान्तिमान् हरिताभ (सोम) मरुद्गणों की सहायता से पुष्ट होता हुआ सबको आह्लाद युक्त करता है॥२६॥ |
| हे सोम ! असंख्यों प्रकारके अन्न और सामर्थ्य प्रदाता आप स्तेाताओं को श्रेष्ठ पुत्रैश्वर्य प्रदान करते हैं॥२७॥ |
| अभिषुत सोम ऊन से बनी छलनी से शोधित होकर इन्द्रदेव की ओर गमन करता है॥२८॥ |
| यह सोम भूमि के पृष्ठ भाग पर पत्थरों से कूटे जाते समय क्रीड़ा करते हुए आनन्द प्राप्ति के लिए इन्द्रदेव को आमंत्रित करता है॥२९॥ |
| हे सोमदेव ! दुग्ध के समान आपका तेजस्वी रस देवलोक में सर्वत्र व्याप्त है । उस रस से आप दीर्घजीवन प्रदान करते हुए हमें सुखी बनाएँ॥३०॥ |
सूक्त-६७
| हे सोमदेव ! परम सुखप्रदायक, सामर्थ्यवान् आप उत्तम यज्ञ में अपनी धाराओं को ऐश्वर्ययुक्त बनाएँ । धन और बल प्रदायक हे सोमदेव ! आप कलश में शुद्ध हों॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आपका रस याजकों का आनन्द बढ़ाता है। यजमानों को धन तथा आनन्द प्रदान करने वाले आप इन्द्रदेव को भी आनन्दयुक्त अन्न प्रदान करें॥२॥ |
| हे सोम ! पत्थरों से कूटकर निकाला गया आपका रस घोषणापूर्वक हमें तेजोयुक्त पौष्टिक अन्न प्रदान करे॥३॥ |
| अनश्वर शोधक यंत्र से नीचे की ओर गमन करता हुआ, वृद्धि को प्राप्त हरिताभ सोमरस शब्दनाद करता हुआ पात्र में एकत्रित होता है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! आप अनश्वर छलनी से शोधित किये जाते हैं। गौओं (किरणों या इन्द्रियों) से युक्त बल तथा हविष्यान्न ग्रहण करते हुए आप अनेक प्रकार का सौभाग्य प्राप्त करते हैं॥५॥ |
| हे तेजस्वी सोमदेव ! आप हमें सैकड़ों गौओं तथा अनेक अश्वों से युक्त हजारों प्रकार का धन प्रदान करें॥६॥ |
| छलनी में शोधित होने के लिए जाने वाला द्रुतगामी सोमरस अपने नियमों के अनुरूप इन्द्रदेव को प्राप्त करता हैं॥७॥ |
| सोम नामक वनस्पति से निकाला गया सोमरस श्रेष्ठ ऐश्वर्यवान् होकर, सर्वत्र गमनशील इन्द्रदेव के निमित्त गमन करता है॥८॥ |
| उत्तम, बलशाली, मधुर रस प्रदान करने वाले सोम को अँगुलियाँ विस्तृत करती हैं । याजक उस समय स्तुतियों का गान करते हैं॥९॥ |
| अज (अजन्मा-सनातन) जिनका वाहन है, ऐसे पूषा देवता प्रत्येक पवित्र स्थान पर हमारा संरक्षण करें। आप हमें इच्छित सुलक्षणी कन्यायें (शक्तियाँ, पुत्रियाँ या वधुएँ ) प्रदान करें॥१०॥ |
| उत्तम मुकुटों से सज्जित पूषा देवता के लिए यह सोम मधुर घृत के समान रस प्रदान करता है। वह हमें श्रेष्ठ कन्याएँ प्रदान करता है॥११॥ |
| हे तेजस्वी पूषादेव ! रस प्रदान करने वाला यह सोम शुद्ध घृत के समान रस आपके लिये देता है और हमें श्रेष्ठ कन्याएँ प्रदान करता है॥१२॥ |
| हे सोमदेव ! आप स्तोताओं की स्तुतियों के प्रकाश हैं। आप देवों को रत्नादि से पूर्ण करने वाले हैं। आप हमें धारारूप में रस प्रदान करें । ॥१३॥ |
| जिस प्रकार श्येन पक्षी अपने निवास में जाता है, उसी प्रकार सोमरस शब्दनाद करता हुआ कलश पात्र में जाता है॥१४॥ |
| जिस प्रकार श्येन पक्षी अपने निवास में रहता है, उसी प्रकार कलश में स्थापित सोमरस चारों ओर से सुशोभित होता है॥१५॥ |
| हे सोमदेव ! इन्द्रदेव को आनन्द प्रदान करने के लिए आप मधुर रस प्रदान करें॥१६॥ |
| शत्रुओं को पराजित करने वाले रथ के समान देवगणों के पान हेतु सोमरस निकाला जाता हैं॥१७॥ |
| हर्षकारक, तेजस्वी सोमरस अभिषुत होते हुए वायु के समान शब्दनाद करता है॥१८॥ |
| हे सोमदेव ! पत्थरों से कूटकर निकाला गया, आपको रस पवित्र होने के लिए प्रवाहित होता है । यह रस स्तोताओं को उत्तम बल प्रदान करता है॥१९॥ |
| यह स्तुत्य शोधित सोम सर्वोपरि पवित्रता प्रदान करता है । राक्षसों का नाश करने वाला यह सोमरस अविनाशी छलनी में छाना जाता है॥२०॥ |
| हे पवित्र सोम ! जो भय हमारे समीप है, जो दूर है तथा जो यहाँ व्याप्त है, आप उस भय को नष्ट करें॥२१॥ |
| वह सर्वद्रष्टा सोम पवित्र करने वाला है, शोधित होते समय हमें भी वह पवित्र बनाये॥२२॥ |
| हे अग्निदेव ! आपके अन्दर जो पवित्र करने वाला तेज़ व्याप्त हैं, उससे हमारे ज्ञान को पवित्र बनाएँ॥२३॥ |
| हे अग्निदेव ! आपका जो पवित्र करने वाला तेज है, उससे तथा ज्ञान के स्तोत्रों से हमें पवित्र बनाएँ॥२४॥ |
| हे सवितादेव ! आप पवित्र करने वाले ज्ञान तथा सोम इन दोनों से हमें पवित्र करें॥२५॥ |
| हे सवितादेव ! हे अग्निदेव ! हे सोमदेव ! सर्व समर्थ तीनों तेजों के द्वारा आप हमें पवित्र बनाएँ॥२६॥ |
| अष्टवसु, जातवेद, दिव्यजन तथा सभी देवगण बुद्धि के द्वारा हमें पवित्र बनाएँ॥२७॥ |
| हे सोम ! देवों को समर्पित करने योग्य सभी प्रकार के हविष्यान्न हमें प्रदान करते हुए हमारी वृद्धि करें॥२८॥ |
| शब्दनाद करने वाले, उपासकों के प्रिय, आहुतियों से विस्तार पाने वाले तरुण अग्निदेव को हम नमन करते हुए उनके समीप जाते हैं॥२९॥ |
| आक्रान्ता शत्रु के शस्त्र नष्ट हों । हे सोम ! अपना रस प्रदान करते हुए आप हमारे शत्रुओं का नाश करें॥३०॥ |
| 'ऋषियों द्वारा संगृहीत जीवन सूत्रों में रस लेने वाले, पवित्र करने वाले सूक्तों का पाठ करने वाले (साधक) यज्ञ के प्रभाव से वायुदेव द्वारा सुखपूर्वक स्वीकार किया हुआ (यज्ञ से सूक्ष्मीकृत) सब प्रकार से पवित्र अन्न का सेवन करते हैं॥३१॥ |
| जो ऋषियों द्वारा प्रणीत हुए वेदों का-ऋचाओं का अध्ययन करता है, उसके लिए(उसके ज्ञान को पुष्ट करने के लिए) सरस्वती दुग्ध, घृत, शहद जैसे तत्त्व स्वयं उपलब्ध कराती है॥३२॥ |
सूक्त-६८
| मधुर सोमरस देवगणों के लिए प्रवाहित होकर पात्र में उसी प्रकार जाता है, जिस प्रकार दुधारू गौएँ अपने बछड़ों के लिए दुग्ध प्रवाहित करती हैं। यज्ञमण्डप में एकत्रित या व्यक्त गौएँ अथवा वाणियाँ शब्द करती हुई अपने सार तत्त्व प्रकट करने वाले भागों-अंगों में परिश्रुत (दुहा गया या श्रवण योग्य) सार तत्त्व (दुग्ध या ज्ञान) धारण करती हैं॥१॥ |
| वह हरिताभ सोम स्तोताओं की सर्वश्रेष्ठ स्तुतियों को सुनते हुए, समीप आने वालों को विशेष रूप से आनन्द प्रदान करता है। सर्वोत्तम पवित्र बनकर अग्रगामी यह सोम वेगपूर्वक शत्रुओं का नाश करता हैं और शब्दनाद करते हुए दिव्यता को धारण करता है॥२॥ |
| आनन्द बढ़ाने वाला यह सोम सुनियमों से बँधे तथा परस्पर साथ रहने वाले, क्षीण न होने वाले, महान् द्यावा-पृथिवी को जानता है और उन्हें पय (जल या दुग्ध) से सिंचित करता, आगे बढ़ता (प्रवाहित होता हुआ) , यह सोम अक्षयबल को धारण करता (कराता) है॥३॥ |
| वह बुद्धिमान् सोम माता-पिता रूपी पृथिवीं लोक तथा द्युलोक के ऊपर विचरण करते हुए जल को प्रेरित करता है। अपनी शक्ति से अपने पद को समृद्ध करते हुए यह सोम जौ आदि अन्नों से पुष्ट होता है । यह सोम मनुष्यों की शक्तियों ( अँगुलियों) से मिलकर रहता है तथा श्रेष्ठ (तत्त्वों-प्रवृत्तियों) की रक्षा करता है॥४॥ |
| यह सोम शक्तिशाली मन से भली प्रकार प्रकट होता है। नियमानुसार यह उच्च स्थान पर रहता है । यह सोम यज्ञ का गर्भ हैं। ये दोनों (सूर्य और चन्द्र अथवा सोम के प्रकट एवं अप्रकट रूप) पहले जान लिए गए हैं। गुह्य स्थान पर रहने वाले इनका जन्म (प्राकट्य ) नियमानुसार होता है॥५॥ |
| श्येन पक्षी द्वारा दूर से लाये गये इस आनन्दवर्द्धक सोमरूपी अन्न के स्वरूप को ज्ञानीजन जानते हैं । स्तुति करने योग्य यह सोम नदियों के जल में मिलकर उत्तम रीति से परिष्कृत तथा विस्तृत होकर देवगणों के पास पहुँचने की कामना से उनके पास जाता है॥६॥ |
| हे सोमदेव ! ऋषियों ने यज्ञकर्मों के द्वारा आपके रस को बुद्धिपूर्वक यज्ञस्थल पर स्थापित किया है। हमारी दस अँगुलियों सोमरस को पवित्र बनाती हैं। इसे देवगणों की स्तुति करने वाले याजकों ने ऊन की छलनी से छानकर रखा हैं । यह सोम दान (श्रेष्ठ कार्य) के लिए अन्न प्रदान करता है॥७॥ |
| देवों के इच्छित सुप्रतिष्ठित यज्ञ पात्र में स्थापित होने वाले सोमरस की मन से स्तुतियाँ की जाती हैं। बलशाली यह सोम सर्वोपरि शक्ति के साथ धारारूप में द्युलोक से आता है । शत्रु के धन पर विजय प्राप्त करने वाले इस अविनाशी सोम की याजकगण स्तुति करते हैं॥८॥ |
| यह सोम द्युलोक से पृथ्वी पर जल वृष्टि करता है । परिष्कृत सोमरस यज्ञस्थल पर कलशों में विराजमान होता हैं । पत्थरों से कूटकर तैयार किया गया यह सोमरस शोधित होने पर स्तोताओं को धन प्रदान करता हैं॥९॥ |
| हे सोमदेव ! जल और गौ के दुग्ध से मिश्रित हुए आप विविध प्रकार का अन्न हमें प्रदान करें । द्वेष न करने वाले द्युलोक तथा पृथिवी लोक का हम आवाहन करते हैं। ये देवगण हमें शौर्यवान् संतति से युक्त धन प्रदान करें॥१०॥ |
सूक्त-६९
| जिस प्रकार धनुष पर बाण लगाया जाता है, जिस प्रकार माता की गोद में पुत्र बैठता है, उसी प्रकार हम इन्द्रदेव की स्तुति करते हैं। जिस प्रकार दूध देने वाली गौ सबको स्नेहपूर्वक दूध देती है, उसी प्रकार हम इस श्रेष्ठ कर्म में (इन्द्रदेव के लिए श्रद्धासिक्त सोम अर्पित करते हैं॥१॥ |
| मधुर एवं आनन्ददायक सोमरस स्तुत्य इन्द्रदेव को प्रदान किया जाता है । यजमानों द्वारा निकाला गया यह मधुर सोमरस शत्रु पर आघात करने वाले बाणों के समान बार-बार परिष्कृत किया जाता हैं॥२॥ |
| वधू की कामना करने वाले की भाँति यह सोम अनश्वर त्वचा (अंतरिक्ष के अयनमण्डल के आवरण अथवा पृथ्वी की सतह) पर स्रवित होता है । अदिति की सन्तान रूप यह सोम यजमान को यज्ञ कार्य (प्रकृति या यज्ञस्थल के यज्ञ) को प्रेरित करता है । याज्ञिकों को आनन्दित करते हुए यह गतिशील सोम सबको पार करता हुआ अपनी शक्ति को तीक्ष्ण करके शूरवीरों के समान सुशोभित होता है॥३॥ |
| शब्द करते हुए प्रकाशमान सोम की दिव्य वाणी से स्तुति की जाती है । वह सोम शुद्ध होता हुआ दिव्य गुणों को धारण कर लेता है॥४॥ |
| हरिताभ अविनाशी सोम, जल के साथ मिलाये जाने पर शोधित होता हैं । कान्तिमय, शुद्ध तथा तेजस्वी रूप में वह सोम सर्वत्र व्याप्त है । द्युलोक के पृष्ठभाग पर स्थित सूर्यदेव को तेजस्वी बनाते हुए आकाश तथा भूमि को प्रकाशित करता है॥५॥ |
| सूर्य रश्मियों के सदृश प्रेरणादायी, आनन्दवर्द्धक सोमधाराएँ शोधक छत्रे से गिरती हुई फैलती हैं। वे इन्द्रदेव ( संगठक, धारक शक्तियों) के अतिरिक्त किसी और को प्राप्त नहीं होतीं॥६॥ |
| याजकों द्वारा निकाला गया आनन्ददायी सोमरस नदी के प्रवाह की भाँति इन्द्रदेव के पास जाने की कामना करता है । हे सोमदेव ! हमें धन-धान्य तथा सन्तति प्रदान करते हुए आप हम मनुष्यों तथा हमारे पशुओं को संरक्षण प्रदान करें॥७॥ |
| हे सोमदेव ! द्युलोक के उच्च शिखर पर विराजमान आप हमारे पिता हैं, आप अन्नदाता हैं, अत: हमें अश्वों गौओं, उत्तम पराक्रम तथा सुवर्ण आदि से युक्त धन-धान्य प्रदान करें॥८॥ |
| जिस तरह शत्रुओं को धन हरण करने के लिये रथ अच्छी तरह जाते हैं, उसी तरह शोधित सोमरस इन्द्रदेव के पास जाता है । यह सोमरस अविनाशी छलनी से प्रवाहित होते हुए वृद्धावस्था दूर करने की शक्ति के साथ सुखों की वृष्टि करता है॥९॥ |
| हे सोम ! महान् इन्द्र के लिये आप रस प्रदान करें । आप उत्तम सुख प्रदायक अनिन्दनीय तथा शत्रुनाशक हैं । स्तोताओं को भरपूर अन्न प्रदान करें । हे पृथिवीं तथा धुलोक ! आप उत्तम ऐश्वर्य सहित हमारी रक्षा करें॥१०॥ |
सूक्त-७०
| परम व्योम में सोम को२१ गौएँ (दिव्य धाराएँ) दुग्ध (पोषण) प्रदान करती हैं, तब यज्ञ से संबन्धित यह सोम चार अन्य सुन्दर भुवनों (लोकों अथवा रसों) का निर्माण करता है॥१॥ |
| श्रेष्ठ रस की इच्छा करने वालों की स्तुतियों से प्रभावित दिव्य सोम द्युलोक और पृथिवीलोक को जल से परिपूर्ण कर देता है । ऋत्विज् जब देवों के स्थान को यज्ञ की हवि से युक्त करते हैं, तो वह (सोम) जल को अपनी महिमा से मंडित कर देता है॥२॥ |
| अदम्य और अमरत्व प्राप्त सोमरस की किरणें दोनों प्रकार के(द्विपद एवं चतुष्पद अथवा स्थावर एवं जंगम) प्राणियों की रक्षक हैं । अपनी सामर्थ्य से यह सोम अन्न को देवों की ओर प्रेरित करता है, तत्पश्चात् राजा सोम की स्तुतियाँ की जाती हैं॥३॥ |
| श्रेष्ठ कर्म करने वाली दस ( दिशाओं या अँगुलियों ) से शोधित वह सोम सहयोगी रूप में सभी लोकों को जानता है। माता के समान वह यज्ञस्थल के मध्य में प्रतिष्ठित होता है । सर्वद्रष्टा वह सोम सुनियमों पर चलता हुआ उत्तम जल की वृष्टि करता है तथा दोनों प्रकार के मनुष्यों (उत्तम तथा अधम) का निरीक्षण करता है॥४॥ |
| सबके धारक इन्द्रदेव की सामर्थ्य को बढ़ाने के उद्देश्य से शोधित वह सोमरस द्युलोक तथा पृथिवीं लोक के मध्य स्थापित होकर हर्षित होता है। शत्रु सेनाओं को मारने के उद्देश्य से बार-बार शत्रुओं का आवाहन करते हुए अपने पराक्रम से उनका संहार करता है॥५॥ |
| द्युलोक तथा पृथिवीं लोक रूपी दोनों माताओं को बार-बार देखकर, शब्दनाद करते हुए वह सोम सर्वत्र गमनशील है। गाय के बछड़े तथा मरुतों के समान शब्द करते हुए वह सोम द्यावा - पृथिवीं के पास जाता है । जल को मानवों का सर्वोत्तम हितकारी जानकर स्वयं को जल में मिलाते हुए, वह सोम स्तुति करने वाले याजकों को प्राप्त होता है॥६॥ |
| यह भंयकर हरणकर्ता की भाँति सूक्ष्म निरीक्षण करने वाला वृषभ (बलशाली-वर्षणशील सोम) अपने बल वर्द्धन की कामना से दोनों सींगों (दोनों प्रकार के सूक्ष्म एवं स्थूल प्रवाहों) को तीक्ष्ण करता हुआ गर्जन करता है । यह श्रेष्ठ कर्मो (यज्ञादि) के उत्पत्ति केन्द्रों (यज्ञ वेदी या प्रकृति यज्ञ के केन्द्रों) में स्थापित होता है । (इसका माध्यम) निश्चित रूप से अविनाशी गौ की त्वचा (अंतरिक्षीय संरक्षण अयन आवरण अथवा पृथ्वी की सतह) होती हैं॥७॥ |
| शरीर को पवित्र बनाने वाला निष्पाप, शुद्ध, हरि (हरे रंग या गतिशील तेजस्वी) सोम ऊपर स्थित अविनाशी छन्नों में स्थित रहता है । वह सोमरस याज्ञिकों द्वारा मित्र, वरुण, वायु आदि देवगणों के लिए दिया जाता है॥८॥ |
| हे बलशाली सोमदेव ! देवों के लिए आप अपना रस प्रदान करें, इन्द्रदेव के निमित्त उनके पात्र में स्थापित हों तथा कष्ट पहुँचाने वाले पापियों से हमारी रक्षा करें । मार्ग का ज्ञाता जिस प्रकार पथिक का मार्गदर्शन करता है, उसी प्रकार आप श्रेष्ठ कर्मों के लिए हमारा मार्गदर्शन करें॥९॥ |
| हे सोमदेव ! आप कलश में स्थापित हों । युद्ध में जाने वाले प्रेरक घोड़ों की भाँति आप कलश में गमन करें । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के उदर में जाकर उन्हें तृप्त करें । जिस प्रकार नाविक नौका द्वारा नदी को पार करता है, उसी प्रकार आप दुःखों से हमें पार करें, विद्वान् शूरवीर की तरह युद्ध करते हुए हमारे निन्दकों का नाश करें तथा हमारा संरक्षण करें॥१०॥ |
सूक्त-७१
| बलवर्द्धक सोम यथास्थान स्थित हो रहा है। वह सोम जाग्रत् रहने वाले याजकों को , द्रोही राक्षसों से संरक्षण प्रदान करता है । द्युलोक और पृथिवी लोक के मध्य में वह सोम सूर्यदेव को प्रकाशित कर रहा है । आकाश से हो रहीं वृष्टि में वह हरिताभ सोम प्रवेश कर रहा हैं । (इस प्रकार प्रकृति द्वारा) सोमयज्ञ में दक्षिणा दी जा रही है॥१॥ |
| सोम विस्तारित (ऊन अथवा अंतरिक्षीय अयन मण्डल) से छुनकर, परिष्कृत होकर, पिता (पालनकर्ता या पोषक अन्न) के रूप में प्रकट हो रहा है । (इस प्रक्रिया में) दुर्धर्ष शत्रु नाशक वीर की भाँति शब्द करते हुए, सोम अपने असुर (विकार) नाशक बल को प्रकट करता है तथा बुढ़ापे को दूर करता है॥२॥ |
| हाथों द्वारा पत्थरों से कूटकर निकाला गया सोमरस यज्ञपात्र में स्थापित होता है । बलवान् होकर स्तुतियों से आनन्दित होते हुए आकाश में सर्वत्र गमन करता है । जल में मिश्रित शोधित सोमरस पात्र में एकत्रित होकर स्तुति करने पर मनोकामनाओं की पूर्ति करते हुए यज्ञ में प्रतिष्ठित होता है॥३॥ |
| यह बलशाली मधुर सोमरस द्युलोक के उच्च शिखर में रहने वाले शत्रु के नगरों को ध्वंस करने वाले इन्द्रदेव को तृप्त करता हैं । हविष्यान्न का सेवन करने वाली गौएँ ( गौ, प्रजाएँ, किरणें ) अपने दूध को श्रेष्ठ गुणों के साथ (इन्द्रदेव के लिए) प्रदान करती हैं॥४॥ |
| जिस प्रकार रथ को अँगुलियाँ (इच्छित मार्ग में जाने के लिए प्रेरित करती हैं, उसी प्रकार दोनों भुजाओं की दसों अँगुलियाँ सोम को यज्ञस्थल की ओर (यज्ञीय कार्य के लिए प्रेरित करती हैं। स्तोताओं की स्तुतियों से प्रकट हुआ यह सोमरस गाय के दूध में मिश्रित होकर पात्र में एकत्रित होता है॥५॥ |
| यह तेजस्वी सोम स्तोताओं द्वारा स्तुति करने पर श्येन पक्षी के अपने निवास में जाने की भाँति सुवर्णमय आसन पर विराजमान होता है। जिस प्रकार अश्व देवगणों के पास जाता है, उसी तरह स्तोताओं की स्तुतियों से यह प्रिय सोम यज्ञस्थल पर जाता है॥६॥ |
| यह तेजस्वी ज्ञानवान् सोम आकाश में सूर्यदेव के समान दूर-दूर तक स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। तीनों लोकों में व्याप्त यह बलशाली सोम गो-दुग्ध अथवा वाणी से संयुक्त होता है । हजार नेत्रों वाला, यज्ञपात्र में एकत्रित होने वाला, स्तोता के समान शब्दनाद करता हुआ, यह सोमरस विशेष रूप से उषा काल के पूर्व भी प्रकाशित होता है॥७॥ |
| (सूर्यदेव की) किरणें इस सोम को तेजस्वी रूप प्रदान करती हैं। वह सोम किरणों के स्रोत में रहकर शत्रुओं का विनाश करता है। वह सोम जल के साथ मिलकर हविरूप में देवत्व धारियों को प्राप्त होता है । ( ऐसे सोम की ) उत्तम स्तुतियों की जाती हैं । यह सोम गौ, हव्यों ( दुग्धादि) अथवा किरणों के अग्रभाग से संयुक्त होता है॥८॥ |
| जिस प्रकार अपने चारों ओर गौओं के झुण्ड को देखकर, प्रमत्त बैल शब्दनाद करता है, उसी प्रकार द्युलोक में उत्पन्न हुआ सोम पृथिवी को देखते हुए चारों ओर सूर्यदेव जैसा तेज फैलाता है । यह सोम यज्ञस्थल में याजकों का निरीक्षण करता है॥९॥ |
सूक्त-७२
| हरिताभ सोम को शोधित किया जा रहा है। तेजस्वी सोम धेनुओं ( धारक किरणों ) अथवा गौ-दुग्ध से संयुक्त होकर जब कलश अथवा विश्वमण्डल में स्थापित होता है, तब वह शब्दनाद करता है, उस समय उसकी स्तुतियों की जाती हैं । स्तुत्य सोम याज्ञिकों को प्रिय लगने वाला कई प्रकार का धन प्रदान करता है॥१॥ |
| इन्द्रदेव (संयोजक शक्ति) की तृप्ति के लिए पवित्र हाथ या पुरुषार्थ युक्त नेतृत्वकर्ता (व्यक्ति या चेतना) द्वारा दसों ( अँगुलियों अथवा दिशाओं) से सोम को निष्पादित किया जाता है, उस मधुर रस को शोधित किया जाता है, तब ऋषियों द्वारा एक साथ मंत्रों का उच्चारण किया जाता है॥२॥ |
| वह सोम अन्यत्र रमण न करता हुआ गौ के दुग्ध में जाता है । उष:काल में यह सोम (स्तोत्रों के अलावा) अन्य शब्दों को दूर करता है । स्तोतागण इस सोम के लिए स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं। दोनों हाथों की अँगुलियों से यह सोमं संगति करता है॥३॥ |
| है इन्द्रदेव ! यज्ञीय कार्य में उपयोगी मनुष्य के यज्ञ का साधनरूप यह सोम आपके प्रिय यज्ञस्थल में आपके निमित्त शोधित होता है। पत्थरों से कूटकर निकाला गया, याजकों द्वारा शोधित, गाय के दूध के साथ मिश्रित यह सोमरस अनादिकाल से देवगणों के लिए प्रिय है॥४॥ |
| जिस प्रकार पक्षी वृक्ष पर रहता है, उसी तरह हरिताभ सोम कलशों अथवा अन्तरिक्ष में स्थित रहता है । हे। इन्द्रदेव ! धारा रूप में रस प्रदान करने वाला सोमरस आपका बल बढ़ाने के उद्देश्य से याजकों की भुजाओं से प्रेरित होकर यज्ञस्थल में शोधित होता है। हिंसा से रहित सोमयज्ञ में आप सोमरस का पान करके अभिमानी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं॥५॥ |
| बुद्धिमान्, दूरदर्शी, कर्मकुशल, याजकगण क्षीण न होने वाले, शब्दनाद करने वाले, ज्ञानवर्द्धक सोम का रस निकालते हैं। बार-बार प्रसूत होने वाली गौएँ अथवा वाणियाँ एवं उत्तम बुद्धियाँ संयुक्त होकर यज्ञ को प्रकट (सम्पन्न) करती हैं॥६॥ |
| महान् द्युलोक का धारणकर्ता, पृथ्वी के उच्च शिखर पर स्थित नदियों के जल में मिश्रित इन्द्रदेव के वज्र की भाँति बलशाली, ऐश्वर्य से युक्त यह उत्तम आनन्ददायी सोम मन को हर्षित करने के लिए रस प्रदान करता है॥७॥ |
| हे श्रेष्ठकर्मा सोमदेव ! आप पृथ्वी को देखते हुए (मनुष्य मात्र के लिए अपना रस प्रदान करें । स्तोताओं को धन-धान्य से पूर्ण करें। हमें पर्याप्त साधन प्रदान करें। हम विविध स्वर्णादि धन से सदैव युक्त रहें॥८॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें सैकड़ों प्रकार का सुख प्रदान करने वाला, अश्वों से युक्त, हजारों प्रकार के दान के योग्य ऐश्वर्य शीघ्र हीं प्रदान करें । हे सोमदेव ! आप हमारे स्तोत्रों को सुनने के लिए पधारें और हमें पशुओं से युक्त तथा सुवर्ण से युक्त महान् धन-धान्य प्रदान करें॥९॥ |
सूक्त-७३
| यह रस (सोम) धारक स्थल (यज्ञपात्र अथवा विश्वघट) में ऋतु (सनातन सत्य या यज्ञ) के उत्पत्ति स्थल से शब्द करते हुए प्रकट होता है । वे बलशाली, नाभि (यज्ञ कुण्ड अथवा पदार्थों के नाभिक न्यूक्लियस) से संयुक्त होकर उच्च स्तरीय तीनों लोकों अथवा मेखलाओं) से कार्य आरम्भ करते हैं । सत्य की नाव (साधकों अथवा पदार्थों को सत्य से युक्त करने वाले) सोमदेव सुकृत करने वालों की सहायता करते हैं॥१॥ |
| महान् (याजक अथवा देवगण) संगठित होकर जल तंरगों में सोमरस को मिलाते हैं। वे स्तोत्रों अथवा प्रेरणाओं द्वारा इन्द्रदेव के प्रिय धाम (यज्ञ अथवा शरीर) को सोम की धाराओं से पुष्ट करते हैं॥२॥ |
| सामर्थ्ययुक्त पवित्र सोम की स्तुति की जाती है। आदिपिता ये सोमदेव अपने व्रतों का निर्वाह करते हुए महान् अन्तरिक्ष को अपने तेज से आवृत कर देते हैं । ज्ञानी याजक उन्हें धारणशील जल में मिश्रित करते हैं॥३॥ |
| अन्तरिक्ष से हजारों जल धाराओं से युक्त सोम की रश्मियों पृथ्वी पर आ रही हैं। ये मधुरता से युक्त सोम रश्मियाँ द्युलोक से ऊपर रहती हैं। ये सोम - रश्मियाँ प्रत्येक स्थान पर दुष्टों को कष्ट पहुँचाती हैं॥४॥ |
| द्युलोक तथा पृथिवी लोक में उत्पन्न होने वाली सोम की किरणें स्तोताओं की स्तुतियों से प्रकाशित होती हैं। ये कुकर्मियों को पूरी तरह से नष्ट करती हैं। जिनसे इन्द्रदेव द्वेष करते हैं, उन राक्षसों को ये किरणें पृथ्वी तथा आकाश से बहुत दूर कर देती हैं॥५॥ |
| वेगगामी स्तुत्य सोम किरणें सर्वप्रथम अन्तरिक्ष से प्रवाहित होती हैं। इन किरणों को दृष्टिहीन तथा-वधिर (सुप्त तथा अज्ञानी) नहीं देख सकते । ऐसे व्यक्ति इन सोम किरणों को नहीं पा सकते॥६॥ |
| हजारों धाराओं से नीचे प्रवाहित होने वाले सोमरस को,शोधित करते समय ज्ञानी जन स्तोत्रों द्वारा स्तुति करके. पवित्र बनाते हैं। रुद्र के पुत्र मरुत् के समान यह सोम स्तुत्य, द्रोहरहित, सुन्दर दिखाई देने वाला, सर्वद्रष्टा सुकर्मा तथा शत्रुओं पर उत्तम प्रकार से आक्रमण करने वाला है॥७॥ |
| श्रेष्ठकर्मा यज्ञरक्षक यह सोम किसी भी ज्ञानीजन को पीड़ित नहीं करता है । वह सोम अग्नि, वायु और सूर्य के तेज को धारण करता है । सभी युवकों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते हुए नियमों (मर्यादाओं) का पालन न करने वाले दुष्टों को (दण्ड व्यवस्था के अनुसार) प्रताड़ित करता है॥८॥ |
| यह सोम यज्ञ तथा पवित्रता का विस्तार करने वाला है। वह अपनी शक्ति से वरुण के अग्रभाग (जल के ऊपर) में स्थित है । ज्ञानीजन उसे प्राप्त करते तथा उपयोग करते हैं। अकर्मण्य लोग (उसे प्राप्त न कर पाने के कारण) पतन के मार्ग पर जाते हैं॥९॥ |
सूक्त-७४
| सोम प्रवाह अन्तरिक्ष में जन्म लेने वाले शिशु के समान (नीचे को मुख-रुख करके) शब्द करता हैं । तेजस्वी सोम दिव्य ओज (ओषधियों आदि के माध्यम से) तथा दुग्ध या जल से संयुक्त होकर वर्द्धित होता है । अश्व की तरह (यज्ञीय माध्यम से) स्वर्ग की ओर जाने की कामना करता है । श्रेष्ठ बुद्धि वाले (याजकगण) सुन्दर स्तुतियों से शुभ आवास एवं ऐश्वर्य सहित सोम की कामना करते हैं॥१॥ |
| यह सोम द्युलोक को स्तम्भवत् थामने वाला, संसार को धारण करने वाला, सर्वत्र फैला हुआ तथा सब ओर से पूर्ण रहकर सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है । वह सोम द्युलोक तथा पृथिवीलोक में अन्न, जल तथा शक्ति का विस्तार करता है । यह ज्ञानी सोम, द्युलोक तथा पृथिवी लोक को संयुक्त रूप से धारण करते हुए सभी प्रकार का अन्न धारण करता है॥२॥ |
| श्रेष्ठ यज्ञीय कार्य में प्रयुक्त सोमरस यज्ञ में जाने वाले इन्द्रदेव के पान करने के लिए उत्तम होता हैं । जो इन्द्रदेव यहाँ की वर्षा के स्वामी हैं, उनके लिए पृथिवी का मार्ग विस्तृत होता है । वे गौओं के हितकारी, जल के वृष्टिकर्ता तथा सबके नियन्ता हैं । वे इन्द्रदेव सोम यज्ञ में सम्मिलित होने वाले तथा प्रशंसनीय हैं॥३॥ |
| आकाश से घृत एवं दुग्ध के समान साररूप (सोम) दुहा जाता है । ऋत की नाभि (यज्ञ कुण्ड़ अथवा सत्यलोक के केन्द्र) से अमृतरूप(सोम) उत्पन्न होता है । एक साथ मिलजुलकर श्रेष्ठ दानी (यज्ञकर्ता) उस(सोम) को (स्तुतियों अथवा यज्ञीय प्रक्रिया द्वारा) प्रसन्न करते हैं । वह रक्षक नेता हितकारी पदार्थों की वर्षा करता है॥४॥ |
| देवों की रक्षा तथा मानवों के हित के लिये यह सोम अपने आप को अर्पित करते हुए जल में मिलाये जाने पर शब्दनाद करता है । पृथ्वी के ऊपर यह सोम अपनी गर्भ (ओषधियों के रूप में) स्थापित करता है, जिससे हम संतति को नीरोग बनाकर रक्षण करने में समर्थ होते हैं॥५॥ |
| तृतीय लोक अर्थात् स्वर्ग में पृथक्-पृथक् रहने वाला वह सोमरस सहस्रों धाराओं के रूप में पृथिवी पर स्रवित होकर प्रजा का सहायक बनता है। सोम के चार प्रकार के प्रवाह द्युलोक से स्रवित होते हैं । यह घृत (ओजस्) प्रदान करने वाला सोमरस रक्षण- शक्ति से युक्त अमरत्व प्रदान करने वाला तथा हविष्यान्न रूप है॥६॥ |
| जब वह सोम स्वर्ग की कामना से यज्ञ में प्रतिष्ठित होता है, तब श्वेत दिखाई पड़ता है। ऐसा बलशाली सोम याजकों की कामनाओं को पूरा करते हुए अनेक प्रकार का धन प्रदान करता हैं । वह सोम बुद्धिपूर्वक किए गए श्रेष्ठ कर्मों को पूरा करते हुए जल देने वाले बादलों को (बरसने के लिए) नीचे भेजता है॥७॥ |
| जिस प्रकार घोड़ा युद्ध में जाता है, उसी प्रकार वह सोमरस श्वेत वर्ण गौ के दूध में मिलकर कलश में यथा स्थान स्थापित होता है । जिस प्रकार कक्षीवान् ऋषि द्वारा सैकड़ों प्रकार की स्तुतियाँ करने पर गौएँ प्रदान की गईं, उसी प्रकार देवों को प्राप्त करने वाले याजकों के द्वारा उन सोमदेव की मन से, उत्तम विधियों से स्तुतियाँ की जाती हैं॥८॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! जल में मिलाया जाने वाला आपका रस ऊन की बनी छलनी में छाना जाता है । हे आनन्ददायी सोमदेव ! याजकों द्वारापरिष्कृत रस को इन्द्रदेव के पान के लिए प्रदान करें॥९॥ |
सूक्त-७५
| दिव्य सोम, सर्वत्रगामी सूर्यदेव के रथ पर आरूढ़ होकर संसार का द्रष्टा बन जाता है । वह प्रिय जल के साथ संयुक्त होकर, अन्नों के लिए हितकारी बनकर विस्तार पाता-प्रवाहित होता है॥१॥ |
| ऋत की जिह्वा स्वरूप (यज्ञ की ज्वाला रूप ) सोम मधुर एवं प्रिय (सूक्ष्मीकृत प्रवाह) प्रदान करता है। यह (उत्पन्न प्रवाह) बोलने वाला (स्वयं को व्यक्त करने वाला है, इसकी बुद्धि (धारणा) अदम्य है । यह पुत्र (उत्पन्न हुआ प्रवाह), पिता (उत्पन्नकर्ता) के लिए अज्ञात, तीसरा (निर्माता तथा निर्माण में प्रयुक्त पदार्थ से भिन्न) नाम धारण करके (प्राण-पर्जन्य रूप में) द्युलोक में प्रकाशित होता है॥२॥ |
| त्विजों द्वारा स्वर्ण कलश में शोधित होते समय शब्द करने वाले तेजस्वी सोम की स्तुति की जाती है । यह सोम तीनों ही संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में प्रकाशित होता है॥३॥ |
| विद्वज्जनों ने पत्थरों से कूटकर निकाले गए परिष्कृत सोमरस को अन्न रूप में रखा। यह सोमरस द्यावा-पृथिवी रूपी माताओं को तेजस्वी बनाता है । यह सोम प्रतदिन (यज्ञ के माध्यम से ) मधुर धाराओं को पवित्र बनाता है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमारे समीप आकर हमारा कल्याण करें, याज्ञिकों द्वारा परिष्कृत हुए आप दूध में मिश्रित होकर रहें । आपका आनन्ददायी रस महान् शक्ति-सम्पन्न तथा शत्रुनाशक है। आप इन शक्तियों के साथ धन प्रदान करने के लिए इन्द्रदेव को प्रेरित करें॥५॥ |
सूक्त-७६
| धारक शक्ति से सम्पन्न, कर्मनिष्ठ, देव शक्ति संवर्धक, स्तोताओं द्वारा प्रशंसित, हरित सोम शोधित होता है। यह निष्पन्न सोमरस बलवान् अश्व के समान सहजता से ही अपने आप नदी (जल प्रवाहों) में मिल जाता है ॥१॥ |
| हाथों में शस्त्र धारण किये हुए सूरमाओं की तरह रथारूढ़, गौओं के रक्षक, वीरों का एवं इन्द्रदेव का बल बढ़ाते हुए, यह दिव्य सोम, अत्विजों द्वारा प्रेरित होकर, गौ दुग्ध के साथ मिलाया जाता है॥२॥ |
| हे संस्कारित सोमदेव ! आप महान् सामर्थ्यवान् बनकर इन्द्रदेव के उदर में प्रवेश करें । मेघों को बरसने के लिए प्रेरित करती विद्युत् की तरह आप आकाश और पृथ्वी को फलदायी बनाएँ । कर्म करते हुए, कर्म के माध्यम से आप हमारे लिए अक्षय पोषकतायुक्त अन्न प्रदान करें॥३॥ |
| यह सोम सम्पूर्ण विश्व का राजा है । अषयों द्वारा स्तुत्य यह सोम सर्वद्रष्टा इन्द्रदेव के कर्म को प्रशंसित करता है । सब प्रकार से प्रशंसनीय यह सोम स्तुतियों का संरक्षक है, इसे सूर्य किरणों से शोधित किया जाता है॥४॥ |
| जिस प्रकार बैल अपने समूह में जाता है, उसी प्रकार सोमरस कलश पात्र में जाता है। आकाश में जिस प्रकार जलयुक्त मेघ गर्जना करते हैं, उसी प्रकार शब्दनाद करता हुआ सोमरस यज्ञ पात्र में जाता है । इन्द्रदेव के निमित्त शोधित वह सोम अत्यन्त आनन्ददायी है । हे सोम ! आपके संरक्षण में हम संग्राम में विजय प्राप्त करें॥५॥ |
सूक्त-७७
| दुधारू गौओं के घृत युक्त श्रेष्ठ दूध की धार की तरह ध्वनि करता हुआ, इन्द्रदेव के वज्र के समान शक्तिशाली, सुन्दरतम बीजों को अंकुरित करने वाला सोम, शब्द करता हुआ कोश ( कलश, पदार्थों) में प्रवेश करता हैं॥१॥ |
| वह सोम आदिकाल से ही शुद्ध होता हैं । द्युलोक से प्रेरित श्येन पक्षी द्वारा समस्त बाधाओं को पार करके वह सोम पृथिवी पर लाया गया है । रजोलोक से प्राप्त वह सोम मधुरता से युक्त होकर दुग्धादि से मिश्रित होता हैं । भयभीत मन से कार्य करने वाले मनुष्य की तरह (दुरुपयोग के भय से ) यह सोम यज्ञ में रहता हैं॥२॥ |
| सर्वोपरि विराजमान, पूर्व से ही लक्ष्य प्राप्त, महान् सोमरस गाय के दूध से युक्त अन्न हमें प्रदान करे । यह व्य सेवन करने वाला सोमरस सभी प्रकार की स्तुतियों से दर्शनीय तथा रमणीय होता है॥३॥ |
| यह सोम हानि पहुँचाने वाले शत्रुओं (विकारों) को जानकर उनका संहार करे । जो सोम यज्ञ स्थल की अग्नि में, ओषधियों के गर्भ में, गौओं के दुग्ध में तथा जल में मिश्रित होकर रहता है, उस सोम की सत्य मन से, संगठित रूप से स्तुति की जाती है॥४॥ |
| सृष्टिकर्ता, कर्म-कुशल, रस-रूप यह सोम महान् है । दुष्टों का संहार करने वाले अविनाशी सोम का निष्पादन किया जाता है । समूह के चपल घोड़े की भाँति यज्ञ का मुख्य साधन यह सोम शब्दनाद करता हुआ शत्रुओं के द्वारा हमला होने पर हमारी रक्षा करता है॥५॥ |
सूक्त-७८
| यह राजा सोम शब्दनाद करता हुआ जल में मिश्रित होकर स्तुतियों को स्वीकार कर रस प्रदान करता है । यह सोम भेड़ के बालों से निर्मित छलनी से शोधित होकर देवों के पास जाता है॥१॥ |
| हे सोमदेव ! यज्ञकर्ताओं द्वारा इन्द्रदेव के निमित्त आपका रस निकाला जाता है । उस रस को याजकों के द्वारा जल में मिश्रित किया जाता है । अनादिकाल से आप यज्ञ के हव्यरूप में जाने जाते हैं । आपके क्षरण के लिए हजारों मार्ग ( छिद्र ) हैं तथा अश्व ( सूर्य) के समान सहस्रों किरणें हैं॥२॥ |
| महान् आकाश में विद्यमान सोम जल में मिश्रित होने के लिए पहुंच रहा है । यह (सोम मिश्रित) जल यज्ञ-स्थल के समीप जाने के लिए सोम को प्रेरित करता है । इस पवित्र सोम से याजकगण सुख की याचना करते हैं॥३॥ |
| हमारे लिए (दूध उपलब्ध कराने के लिए) गौओं को जीतने वाला, (वीर शत्रुओं के विनाश के लिए रथों को जीतने वाला, सुवर्ण को जीतने वाला, जल को जीतने (अपने अधीन करने ) वाला, हजारों प्रकार का धन जीतने वाला सोमरस शोधित किया जाता है । इस अरुणाभ मधुर रस रूपी सोम को देवों के निमित्त आनन्द बढ़ाने के लिए, सुख की वृद्धि के लिए बनाया गया है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! सत्यपथ पर चलने वालों की सहायता करने वाले आप शोधित होकर धन प्रदान करते हुए आगे जाएँ। जो शत्रु हमारे पास हैं अथवा हमसे दूर हैं, उन्हें पराजित करके, हमारा संरक्षण कर हमें विस्तीर्ण मार्ग में निर्भयता प्रदान करें॥५॥ |
सूक्त-७९
| उत्तेजित न होने वाला सोमरस हमें प्रेरणा प्रदान करे, हरित ( हरियाली के कारणभूत) वर्षा का रस प्रदान करे । हमारे अन्न के शत्रु नष्ट हो जाएँ । हमारी भावनाएँ (स्तोत्रों के माध्यम से) देवों तक पहुँचें फलित हों॥१॥ |
| सोमरस हमारे आनन्द में वृद्धि करते हुए धन को हमारे पास आने के लिए प्रेरित करे । इस बलवान् सोम की शक्ति से सभी बाधाओं को दूर करते हुए हम शत्रु के साथ मुकाबला कर सकें तथा अनेक प्रकार का धन प्राप्त करने में समर्थ हों॥२॥ |
| वह सोम अपने तथा दूसरों के शत्रुओं का संहार करने वाला है । मरुदेश में रहने वालों की प्यास की तरह आप (सोमदेव) शत्रुओं के पीछे पड़ जाएँ, उन शत्रुओं (विकारों) को नष्ट करें॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आपका हविष्यान्न स्वीकार करने वाला अंश द्युलोक में सर्वोपरि रहता है । पृथिवी के उच्च भाग में रहकर वह विस्तार पाता है । ज्ञानी जनों द्वारा पत्थर से कूटकर आपका रस निकाला जाता है और उसे हाथों से जल में मिलाकर भूमि के पृष्ठ भाग पर स्थापित किया जाता है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! इस प्रकार मुख्य याजक एकत्रित होकर ज्येष्ठ यज्ञ स्थल में आपका सौन्दर्ययुक्त रस निकालते हैं । हे सोमदेव ! हमारे शत्रुओं का आप संहार करें । आपका आनन्दवर्द्धक, बलवर्द्धक रस प्रकट हो॥५॥ |
सूक्त-८०
| सोमरस की धाराएँ शोधित हो रही हैं। सर्वद्रष्टा सोमदेव, यज्ञ के द्वारा देवगणों को सुखी बनाते हैं। बृहस्पतिदेव की स्तुतियों से वह सोम द्युलोक में सर्वोपरि प्रकाशित होता है। जैसे पृथिवी पर समुद्र व्याप्त है, उसी प्रकार यज्ञ में सोमरस व्याप्त है॥१॥ |
| हे बलवान् सोमदेव ! जब अविनाशी वाणियाँ ( स्तोत्रों द्वारा ) आपकी स्तुति करती हैं, तब आप सुवर्ण आभूषणों ( सुनहली किरणों) से युक्त हाथों से सुसंस्कारित होकर यज्ञ स्थल पर प्रतिष्ठित होते तथा तेजस्वी होते हैं । हे सोमदेव ! यज्ञ कर्ताओं को आयु तथा भरपूर अन्न प्रदान करते हुए आप इन्द्रदेव के आनन्द और बल की वृद्धि करें ॥२॥ |
| यह सोमरस इन्द्रदेव को तृप्त करने के लिए निकाला जाता है । अन्न वृद्धि के लिए, आनन्ददायी बलवृद्धि के लिए यह सोमरस निकाला जाता है । यह सोमरस सभी भुवनों को प्रत्यक्ष रूप से प्रकाशित करते हुए उनका उत्तम कल्याण करता है । यह हरिताभ सोम चपल घोड़े के समान यज्ञस्थल में खेलते हुए बलशाली होकर दूर-दूर तक संव्याप्त होता हैं'॥३॥ |
| हजारों धाराओं वाले अत्यन्त मधुर सोमरस को देवों के निमित्त याजकों की दसों अँगुलियाँ निकालती हैं। हे सोमदेव ! पत्थरों से कूटकर याजकों द्वारा निकाले गए आप, देवों के निमित्त हजारों प्रकार से विजय दिलाने वाला रस प्रदान करें॥४॥ |
| पत्थरों से कूटकर ( सोम निचोड़ने के पश्चात् ) उत्तम हाथ वाले ( याजकों ) की दसों अँगुलियाँ बलशाली , मधुर सोमरस को जल में मिश्रित करती हैं। इन्द्रदेव तथा अन्य देवगणों को आनन्दित करने के लिए हे पवित्र एवं बलशाली सोमदेव ! आप सिन्धु ( सिन्धु नदी या समुद्र ) की लहरों के समान परिशोधित ( पवित्र ) होकर प्रवाहित हों॥५॥ |
सूक्त-८१
| शोधित सोमरस की सुन्दर धाराएँ इन्द्रदेव के पेट में प्रवेश कर रही हैं । यह सोमरस जब गौ के दही के साथ मिलाया जाता है, तब वीर इन्द्रदेव को दान देने के लिए उल्लसित करता है॥१॥ |
| जिस तरह रथ को खींचने वाला घोड़ा द्रुतगति से जाता है, उसी प्रकार यह सोमरस उत्तम विधि से कलशों में स्थापित होता है । यह बलशाली सोम सूर्यादि लोकों को घुमाने में समर्थ हैं । द्युलोक तथा भूलोक में व्याप्त वह ज्ञानी सोम, देवों को आनन्दित करने वाला है॥२॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! आप हमें महान् ऐश्वर्य प्रदान करें । हे अन्नदाता सोमदेव ! आप हमारे लिए कल्याणकारी ज्ञानयुक्त धन प्राप्त कराएँ; वह (धन) कभी भी हमसे दूर न हो॥३॥ |
| पोषणकारी पूषादेव, पवित्र सोम, मित्र, श्रेष्ठ वरुण, ज्ञान-प्रदाता बृहस्पति, मरुत, वायु, अश्विनीकुमार, त्वष्टादेव, सवितादेव, विद्यादायिनी सरस्वती आदि देवशक्तियाँ हमारे पास आएँ॥४॥ |
| सर्वव्यापी द्युलोक तथा पृथिवीलोक, अर्यमा देव, प्रकृति देवी, विधाता देव, भग तथा मानवों द्वारा प्रशंसित यह विशाल अन्तरिक्ष आदि सभी देव समुदाय इस सोमरस का पान करें॥५॥ |
सूक्त-८२
| ओजस्वी, शक्तिवर्द्धक, हरित वर्ण का सोमरस निकाला जा रहा है। वह सोम सम्राट् के सदृश सौन्दर्ययुक्त है। गौ का दुग्ध मिश्रित करने के बाद सोम ध्वनि करता हुआ, पवित्र होकर छलनी से अभिषुत किया जाता है। उसके बाद श्येन पक्षी के सदृश पानी से युक्त पात्र में स्थित होता है॥१॥ |
| हे सोमदेव ! यज्ञ की इच्छा से जल से युक्त आप छत्रे में शोधित होकर, युद्ध स्थल पर जाने वाले अश्व के सदृश, वेगपूर्वक स्थिर होते हैं । हे सोमदेव ! आप हमें दुष्प्रवृत्तियों से दूर कर सुखी करें॥२॥ |
| पर्जन्य की वर्षा करने वाले मेघ ही बड़े-बड़े पत्तों वाले सोम के जनक हैं। वह सोम पृथ्वी के नाभि स्थल पर अवस्थित पर्वतों का निवासक है । वह गौ-दुग्ध, जल और स्तुतियों को प्राप्त करता हुआ यज्ञस्थल पर स्थित होता है॥३॥ |
| जिस प्रकार पति के लिए पत्नी सुखकारी होती हैं, उसी प्रकार यजमान के लिए सोम सुखकारी है । हे पर्जन्य पुत्र सोमदेव ! स्तुतियों के अन्दर शुभ गुणों के साथ रहने के लिए हम आपसे कहते हैं, उसे सुनें । हे स्तुत्य सोमदेव ! हमारा जीवन सुखी हो, इसके लिए आप हमारे शत्रुओं पर दृष्टि रखें॥४॥ |
| हे सोम ! जिस प्रकार ऋषियों ने सैकड़ों प्रकार का धन दिया, उसी प्रकार हिंसारहित होकर हजारों प्रकार का धन हमें प्रदान करें तथा ज्ञान पिपासुओं को सुखदायी रस दें । आपका व्रत यज्ञीय कर्म के अनुरूप पूरा हो ॥५॥ |
सूक्त-८३
| हे मन्त्राधिपति सोमदेव ! आपके पवित्र अंग (अंश) सर्वत्र विद्यमान हैं। आप शक्तिशाली होने के कारण पान करने वालों के देह में स्फूर्ति की वृद्धि करते हैं। तप से हीन शरीर वाले अपरिपक्व (साधक या वनस्पति आदि) वह फल प्राप्त नहीं कर पाते । परिपक्व होने के पश्चात् ही वे उसे प्राप्त करने में समर्थ होते हैं॥१॥ |
| सोम के पवित्र अंग शत्रुओं को संताप देने के लिए द्युलोक में फैले हैं। इनकी चमकती हुई रश्मियाँ द्युलोक के पृष्ठ भाग पर विशेष रीति से स्थिर हो गईं हैं। यह रश्मियाँ याज्ञिकों की रक्षा करती हैं॥२॥ |
| सूर्य रूप में सोम ही स्वप्रकाशित एवं प्रमुख है । वही वर्षा करके पोषक जले-धाराओं से प्राणिमात्र को पोषण प्रदान करने वाला है । वह सोम ही अपनी क्षमता से जगत् का निर्माण करने वाला है । उसकी आज्ञा से देवमानवों ने ओषधियों में गर्भ की स्थापना की॥३॥ |
| सत्य रूप सूर्यदेव इस सोम को संरक्षण प्रदान करते हैं। यह सोम देवत्वधारियों के जीवन की रक्षा करता है । शत्रु को जाल से बाँधता है । पाशाधिपति श्रेष्ठ कार्य के लिए इस मधुर सोम का पान करते हैं॥४॥ |
| जिस प्रकार राजा श्रेष्ठ रथ में बैठकर संग्राम में जाता है और अनेक अस्त्र-शस्त्रों से युद्ध करके बहुत खाद्यान्न जीतकर लाता है, उसी प्रकार हे जलयुक्त सोमदेव ! महान् जलनिधि में रहने वाले पवित्र जल के साथ आप यज्ञशाला में प्रतिष्ठित हों॥५॥ |
सूक्त-८४
| हे सोमदेव ! आप आनन्ददायी, सर्वद्रष्टा, जल धाराओं को प्रवाहित करने वाला रस प्रदान करें, इन्द्र, वरुण तथा वायु आदि देवों के लिए रस प्रदान करें। आज ही हमारे धन को आप कल्याणकारी बनायें तथा इस विशाल भूमि में देवत्वधारियों को सुखी बनायें॥१॥ |
| जिस प्रकार उषा के साथ सूर्यदेव रहते हैं, उसी प्रकार इष्ट फल प्रदाता सोम यज्ञ में रहता है । जो अविनाशी सोम सभी भुवनों में व्याप्त है, वह देवत्वधारियों के दिव्य संस्कारों को सुदृढ़ करता है तथा कुविचारों को दूर करते हुए, उनमें प्रवेश करता है॥२॥ |
| जो सोम गाय के दूध के साथ ओषधियों में मिलाया जाता है और देवजनों की सुख-वृद्धि के लिए निकाला जाता है, देवों को प्राप्त करने की कामना से शत्रुओं को पराजित करके उनका धन प्राप्त कराता है, वह सोम तेजस्वी धारा के रूप में रस प्रदान करते हुए इन्द्र तथा अन्य देवजनों को आनन्दित करता है॥३॥ |
| रस प्रदान करने वाला यह सोम हजारों प्रकार के धन पर विजय प्राप्त करता हुआ, स्तोताओं को स्तुति करने के लिए प्रेरित करता है । उष:काल में जाग्रत् होने की, योग्य इच्छा की प्रेरणा देता है। यह सोम वायु के द्वारा रस-प्रवाह को ऊपर जाने की प्रेरणा देते हुए, इन्द्रदेव के लिए कलश में स्थापित होता है॥४॥ |
| दूध के साथ मिलकर विस्तार पाने वाले उस सोम को गौएँ (वाणियाँ) ज्ञानवर्द्धक स्तुतियों के साथ अपने दूध में मिश्रित करती हैं । शत्रुओं के धन पर विजय प्राप्त करने वाला सोम स्तोत्रों के गायन से रस प्रदान करता है। यह कर्म-कौशल बढ़ाने वाला मेधावान् ज्ञानी सोम पौष्टिक अन्न से युक्त रस प्रदान करता है ॥५॥ |
सूक्त-८५
| हे सोमदेव ! आप श्रेष्ठ रीति से अभिषुत होकर इन्द्रदेव के पीने के लिये प्रवाहित हों और रोगरूपी राक्षसों से रहित हों । दो प्रकार का (छल युक्तो व्यवहार करने वाले दुष्टों को सोमरस न प्राप्त हो । इस यज्ञ में यह सोमरस ऐश्वर्य-युक्त बने ॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें युद्ध के लिए प्रेरित करें, हमारे पास आकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें । आप देवों को पूर्ण दक्ष बनाने वाले तथा हर्षित करने वाले हों। स्तुति की कामना वाले हे इन्द्रदेव ! सोमरस का पान करके आप हमारे शत्रुओं को पराजित करें॥२॥ |
| हे सोम ! आप हिंसारहित तथा आनन्ददायक रस प्रदान करें। आप सर्वोत्तम धारक तथा इन्द्रदेव के प्रिय अन्तरंग हैं । इन भुवनों के राजा सोम की ज्ञानीजन स्तुति करते हैं तथा अति घनिष्ठ के समान उसे प्राप्त करते हैं॥३॥ |
| सैकड़ों धाराओं से स्रवित होने वाला, हजारों प्रकार से लाया गया अद्भुत सोम इन्द्रदेव के निमित्त, उनके द्वारा चाहा गया रस प्रदान करता है । हे सोमदेव ! रणक्षेत्र को जीतकर आगे बढ़ते हुए मेघवत् सुखों की वर्षा करते हुए तथा प्रजा को अपने अनुशासन में रखते हुए हमारे लिए उन्नतिशील मार्ग बनायें॥४॥ |
| हे सोमदेव ! आप गाय के दूध के साथ मिश्रित होकर शब्दनाद करते हुए ऊन की बनी छलनी में से कलश में स्थापित होते हैं । चपल घोड़े के समान परिष्कृत होकर सेवन के योग्य बनकर आप इन्द्रदेव को तृप्त करें॥५॥ |
| हे सोम ! आप दिव्यता प्राप्त करने वाले देवों के निमित्त अपना मधुर रस प्रदान करें । पुण्यशील इन्द्र के निमित्त सुस्वादु रस दें । मित्र, वरुण, वायु तथा बृहस्पति आदि के लिए अमृत के समान मधुर रस प्रदान करें॥६॥ |
| इस सोम को कलश में सबसे ऊपर रखकर दस अँगुलियाँ शोधित करती हैं। इस समय स्तोतागण स्तुतियाँ करते हैं । इन स्तुतियों को पवित्र सोमरस सुनता है । यह आनन्दप्रदायक सोमरस इन्द्रदेव को प्राप्त होता है॥७॥ |
| हे पवित्र सोमदेव ! आप हमें श्रेष्ठ पराक्रम युक्त महान् सुख प्रदान करने वाली सुविस्तृत मार्ग दिखाएँ । हे सोमदेव ! आपके सान्निध्य में हम हर प्रकार का धन प्राप्त करें । इसे कोई हिंसाकारी अपने अधिकार में न ले॥८॥ |
| यह बलवान्, सर्वद्रष्टा, ज्ञानी सोम द्युलोक में रहकर अपने तेज को विशेष रूप से प्रकाशित करता है एवं अमृत के समान रस प्रदान करता है । छलनी में शोधित होते समय शब्द करता हुआ पात्र में एकत्रित होता है॥९॥ |
| सुखमय वातावरण में रहनेवाले, मधुरभाषी ऋषिगण पृथक्-पृथक् पर्वतों पर रहने वाले, जल से वृद्धि पाने वाले, रस रूप में विद्यमान मधुर सोमरस को सिन्धु की लहरों (जल) में मिश्रित करके पवित्र बनाते हैं॥१०॥ |
| द्युलोक में उत्पन्न सोम की आदिकाल से ज्ञानीजन स्तुतियाँ करते रहे हैं। सुवर्ण जैसा तेजस्वी, शक्तिमान् , शब्द करने वाला, बालक के समान संस्कार के योग्य, सोम यज्ञस्थल में स्थापित होकर स्तुतियाँ प्राप्त करता है॥११॥ |
| सूर्य किरणों को धारण करने वाला सोम स्वर्ग के ऊपर ऊँचे स्थान में रहकर सूर्यदेव के अनेक रूपों को देखता है। तेजस्वी प्रकाश से सूर्यदेव चमकते हैं । माता की भाँति द्युलोक तथा पृथिवी लोक को तेजस्वी सूर्यदेव प्रकाशित करते हैं॥१२॥ |
सूक्त-८६
| हे सोमदेव ! द्रुतगामी घोड़े के समान आपका आनन्ददायी रस व्यापक मन के वेग से प्रवाहित हो रहा है । तेज एवं ज्ञान से युक्त यह मधुर सोमरस हर्षित करते हुए कलश में स्थापित होता है॥१॥ |
| गतिमान् रथ के घोड़े की भाँति आपका आनन्ददायी रस स्वतंत्र रूप से प्रवाहित हो रहा है । जिस तरह गौएँ अपने बछड़ों को तृप्त करती हैं, उसी प्रकार मधुर धाराओं में प्रवाहित होने वाला सोमरस वज्रधारी इन्द्रदेव को तृप्त करता है॥२॥ |
| जिस तरह घोड़ा प्रेरणा पाकर युद्ध में जाता है, उसी प्रकार सर्वज्ञ सोम द्युलोक से मेघों द्वारा जल संचार की भाँति कोशों (पात्र या जीदकोशों ) में प्रतिष्ठित हो । हे बलशाली सोमदेव ! अनश्वर पवित्र (छलनी) से शोधित होकर आप धारणकर्ता इन्द्रदेव के निमित्त तैयार हों॥३॥ |
| है पवित्र सोमदेव ! दिव्य रस से परिपूर्ण आपकी धाराएँ' वाणी के प्रवाह के साथ कलश में पहुँचती हैं। संस्कारित करने वाले विद्वान् ऋषि आपको ऊपर के पात्र से नीचे के पात्र में डालते हैं॥४॥ |
| हे सर्वदर्शी, व्यापक स्वभाव वाले सोमदेव ! आपकी दीर्घ रश्मियों का प्रभाव सर्वत्र फैला हुआ हैं, अपने स्वाभाविक धर्म से शुद्ध होने वाले आप अखिल विश्व के स्वामी के रूप में सुशोभित हो रहे हैं॥५॥ |
| पवित्रता को प्राप्त हुआ संस्कारित हरिताभ सोम पात्रों में स्थिर होता है। उसकी सुवासे चतुर्दिक् फैलती एवं पवित्रता का संचार करती है॥६॥ |
| यज्ञ चक्र को प्रकाशित करने वाला, उत्तम याज्ञिक सोम देवस्थल पर पहुँचकर रस प्रदान करता है । रस प्रदान करने वाला यह सोमरस शब्द नाद करता हुआ हजारों धाराओं से शोधन प्रणाली को पार करके निर्धारित कोशों ( पात्रों) में स्थापित होता है॥७॥ |
| अन्तरिक्ष के जल में मिश्रित होकर यह राजा सोम जल के प्रवाह में सम्मिलित होते हुए समुद्र के जल में मिश्रित होता हैं । महान् द्युलोक को धारण करने वाला यह सोमरस अनश्वर शोधक उपकरण में छनकर पवित्र होता है॥८॥ |
| द्युलोक के सर्वोच्च स्थान की आकांक्षा करता हुआ, यह सोम इन्द्रदेव की मित्रता चाहते हुए शब्दनाद करता है । जिसकी धारण शक्ति से द्युलोक और पृथिवीलोक धारण किए गये हैं, ऐसा सोमरस शोधित होकर कलश में विराजता है॥९॥ |
| यज्ञों के प्रकाशक, देवताओं के लिए प्रिय, मधुर रस प्रदायक, पोषक, जनक, वैभवशाली, आनन्दवर्द्धक, उत्साहवर्द्धक, इन्द्रदेव को प्रिय लगने वाले हे सोमदेव ! आप अन्तरिक्ष और भूलोक के गुप्त वैभव को यजमानों के लिए प्रदान करते हैं॥१०॥ |
| दिव्यलोक के अधिपति सैकड़ों विधियों (धाराओं ) द्वारा शोधित, बुद्धिवर्द्धक और बलशाली हरिताभ सोमरस ध्वनियुक्त होकर कलश में स्थापित है । जल मिश्रित होकर शोधन यन्त्र से शोधित हे शौर्यवान् सोमदेव ! आप अभीष्ट पूर्ति हेतु मित्र के समान यज्ञ के पात्र में प्रतिष्ठित होते हैं॥११॥ |
| हे सोमदेव ! जल मिश्रित होने से पूर्व शोधित होने के लिए और स्तुतियों को प्राप्त करने के लिए आप पूज्यभाव से आमन्त्रित किये जाते हैं। श्रेष्ठ आयुधों से युक्त होकर शौर्य हेतु गौओं का संरक्षण प्रदान करते हुए आप प्रवाहित होते हैं और प्रचुर वैभव प्रदान करते हैं। हे सोमदेव ! आप याजकों द्वारा शोधित किये जाते हैं॥१२॥ |
| स्तोत्रों से स्तुत्य यह सोम यज्ञ स्थल में प्रतिष्ठित है । जिस प्रकार शकुन (पक्षी) द्रुतगामी होते हैं, उसी प्रकार हे सोमदेव ! अनश्वर शोधक यंत्र में से धारा रूप में आप नीचे पात्र में आएँ । हे इन्द्रदेव ! आपके सुकर्मों से ही द्युलोक और पृथिवी लोक के मध्य यह पवित्र सोम स्तुतियों के साथ शोधित होता हैं॥१३॥ |
| यह पूज्य सोम द्युलोक को स्पर्श करने वाले रक्षा कवच को धारण करता है तथा अपने प्रकाश से अन्तरिक्ष को पूर्ण रूप से भर देता है। स्वर्ग तुल्य सुख उत्पन्न करने वाला यह सोम आकाश मार्ग से जल के साथ संचरित होकर ( यज्ञ स्थल या भूमण्डल में ) आता है । इस प्रकार यह अपने पुरातन पितर (इन्द्र, परब्रह्म अथवा यज्ञ) की परिचर्या - सेवा करता है॥१४॥ |
| जो सोम इन्द्रदेव की देह (उदर) में सर्वप्रथम प्रविष्ट होता है, वह उन्हें तृप्त करते हुए महान् सुख प्रदान करता है । द्युलोक में इस सोम का यह परम पवित्र स्थान है। इस सोम से तृप्त होकर इन्द्रदेव सभी संग्रामों में जाते हैं॥१५॥ |
| मित्र की तरह यह सोम इन्द्रदेव के पेट में पहुँचकर उन्हें कोई पीड़ा नहीं देता। जिस प्रकार युवा पुरुष स्त्रियों के साथ घुलमिलकर रहता है, उसी प्रकार यह सोम पानी के साथ मिलकर शोधक यंत्र के सैकड़ों छिद्रों से निकलकर कलश में प्रविष्ट होता है॥१६॥ |
| हे सोमदेव ! आपका ध्यान करने वाले, आनन्दपूर्वक स्तुति करने के अभिलाषी, याजक जब यज्ञस्थल में यज्ञ करने लगते हैं, तब मननशील स्तोतागण तरंगित होकर आपकी स्तुतियाँ करते हैं, उस समय धेनुएँ (गौएँ अथवा धारक किरणें ) पय (दुग्ध या जल) के साथ आपको संयुक्त करती हैं॥१७॥ |
| हे पवित्र होने वाले तेजोमय सोमदेव ! दिन के तीनों सवनों में प्रयुक्त जो अन्न, प्रशंसित, बलवर्द्धक, मधुर तथा उत्तम पुत्र प्रदान करने वाला है, हमारे उस पोषक अन्न को आप अपनी तरंगों से शुद्ध करें॥१८॥ |
| स्तोताओं की कामना को पूर्ण करने वाला, द्रष्टा, दिन, उषा और आदित्य का शक्ति संवर्द्धक -- यह सोम छाना जाता है। नदियों के प्राण स्वरूप पानी में मिलाकर मनीषी उद्गाताओं द्वारा निष्पन्न यह सोमरस इन्द्रदेव के पेट में प्रवेश करने की इच्छा से पात्र में स्थित होता है॥१९॥ |
| सर्वज्ञ शोधित सोम याजकों द्वारा कलश में एकत्रित किया जाता है। त्रैलोक्य पूजित इन्द्रदेव की ख्याति बढ़ाता हुआ यह मधुर सोम, उनको तृप्त करने के लिये, वायु के साथ कोशों ( पात्रों ) में ध्वनि करता हुआ सवित होता है॥२०॥ |
| जनहितकारी यह पवित्र सोम (अपने दिव्य रूप में) उषा को प्रकाशित करता है, (अपने प्राकृतिक रूप में) नदियों को बढ़ाने वाला है और अपने जीवगत रूप में) हृदयस्थ होने के लिये इक्कीस घटकों (१० प्राण +१० इन्द्रियाँ +१ मन = कुल२१) को पुष्ट करता हुआ प्रवाहित होता है॥२१॥ |
| हे सर्व प्रकाशक सोमदेव ! यज्ञ स्थल में आप अपना दिव्य रस प्रवाहित करें। कलश में रखा हुआ यह पवित्र सोम इन्द्रदेव के पेट में ध्वनि करता हुआ जाता है । याजकों द्वारा यज्ञ में प्रतिष्ठित इस सोम को, द्युलोक में सूर्यदेव को अर्पित किया जाता है॥२२॥ |
| पत्थरों से कूटकर निकाला गया शोधित पवित्र सोमरस इन्द्रदेव के उदर में प्रविष्ट होता है । हे सोमदेव ! आप सर्वद्रष्टा हैं, आप दिव्य द्रष्टा हैं। अंगिराओं (याजकों - अंगधारियों- जीवों) के लिए गो ( इन्द्रियों ) रक्षक रस आप अपने पास रखते हैं॥२३॥ |
| हे सोमदेव ! स्वाध्यायी ब्राह्मण अपने संरक्षण की कामना से आपके द्वारा निकाले गये पवित्र सोमरस की स्तुति करते हैं। है स्तुतियों द्वारा प्रशंसित सोमदेव ! आपको धुलोक के ऊपर सुपर्ण ( पक्षी या श्रेष्ठ पालनकर्ता) लेकर आया है॥२४॥ |
| ऊन की छलनी के द्वारा शोधित हरिताभ सोमरस को सात धेनुएँ (धारक प्रवाह या नदियाँ) प्राप्त करती हैं। ज़ल में विद्यमान ज्ञानवर्द्धक सोम को मनीषीगण यज्ञस्थल में जाने के लिए प्रेरित करते हैं॥२५॥ |
| यह सोमरस शोधित होते हुए विनाशक प्रवृत्तियों को पार करते हुए जाता है तथा याज्ञिकों के लिए श्रेष्ठ मार्ग विनिर्मित करता है । अपना स्वरूप गौओं के समान पवित्र बनाकर सुशोभित होता है । कान्तिमान् ज्ञानी सोम घोड़े के समान क्रीड़ा करता हुआ वरण योग्य स्थानों पर प्रतिष्ठित होता है॥२६॥ |
| सैकड़ों धाराओं से नि:सृत हरिताभ सोम के चारों ओर रहने वाली सूर्यदेव की किरणें परस्पर साथ रहती हैं । दिव्य वाणियों (मंत्रों) से आवृत होकर यह क्षिप्त किरणें ( अथवा प्रेरणाएँ) इस सोमरस को शुद्ध करती हैं। यह सोम द्युलोक के तीसरे स्थान (सर्वोच्च पद) पर प्रतिष्ठित होता है॥२७॥ |
| हे सोमदेव ! यह समूचा विश्व आपके अधीन हैं । आप ही सभी भुवनों के स्वामी हैं। आपकी ही दिव्य शक्ति से सभी प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं । हे सोमदेव ! आप सबसे पहले विश्व को धारण करने वाले हैं॥२८॥ |
| हे ज्ञानी सोमदेव ! आप जलमय हैं, सर्वज्ञ हैं, आप द्युलोक और पृथिवी लोक को धारण करते हैं । आपकी धारणशक्ति से ही ये पाँचों दिशाएँ विद्यमान हैं। हे सोमदेव ! सूर्यदेव आपके तेज को बढ़ाते हैं॥२९॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! रस धारण करने वाली छलनी से देवों के निमित्त आपको पवित्र बनाया जाता है। आपकी इच्छा करने वाले मुख्य याजक आपको ( आनन्द प्राप्त करने के लिए) ग्रहण करते हैं। ये सभी भुवन आपके बल से बँधे हुए हैं॥३०॥ |
| बलशाली हरिताभ सोम ध्वनि करता हुआ जल में व्याप्त होता है तथा ऊन की छलनी से शोधित किया जाता है। शोधित करने वाले याजकगण इस सोम की उत्तम विधि से स्तुति करते हैं॥३१॥ |
| सोम सूर्य की रश्मियों को आत्मसात् करके तीन सवनों (प्रातः, मध्याह्न, साय) से युक्त यज्ञ का विस्तार करता है तथा (याजकों की) यज्ञ में की गई नवीन श्रेष्ठ इच्छाओं को यथा रीति पूर्ण करता है । यह सोमरस जननियों ( नारियों अथवा उत्पादक क्षमताओं ) का स्वामी है। यह सोम सर्वश्रेष्ठ पद पर प्रतिष्ठित होता है॥३२॥ |
| द्युलोक का स्वामी तथा जल का स्वामी हरिताभ सोम हजारों धाराओं से ध्वनि करता हुआ यज्ञ मार्ग से पात्रों में प्रतिष्ठित होता है । यज्ञ के पास रहने की कामना वाला यह सोम स्तुतियों का निर्माण करता हैं॥३३॥ |
| हे सोमदेव ! आप जलनिधि के पास जाते हैं । सूर्यदेव की भाँति पूज्य होकर आप ऊन की बनी छलनी से पात्रों में प्रतिष्ठित होते हैं । पत्थरों से कूटकर याजकों के द्वारा निकाला गया यह सोमरस धन प्राप्ति के निमित्त बड़े युद्धों में जाता है॥३४॥ |
| है सोमदेव ! आप अन्न और बल की वृद्धि करने वाले हैं। जिस प्रकार श्येन पक्षी अपने निवास में आकर रहता है, उसी प्रकार आप कलशों में रहते हैं। चुलोक को धारण करने वाला यह सोम उदाहरण देने योग्य सर्व द्रष्टा है । यह सोमरस इन्द्रदेव के लिए आनन्द प्रदायक तथा उत्साहवर्धक है॥३५॥ |
| माता तथा बहिनों के समान उपकार करने वाली सात नदियों का जल निकाले गए ज्ञानी सोमरस में मिलाने के लिए लाया जाता है। समस्त भुवनों पर राज्य करने की कामना से देव मानवों के द्रष्टा, जल मिश्रित सोम को सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित करते हैं॥३६॥ |
| हरे वर्ग के तीव्रगामी अश्वों (किरणों) से सभी लोकों में संव्याप्त, जगत् के स्वामी, हे तेजस्वी सूर्यरूप सोमदेव ! मधुर स्निग्ध जलधाराओं में आपका रस (शक्ति) स्थिर रहे । हे दिव्य सोमदेव ! आपकी प्रेरणा से याजक गण सत्कर्म में निरत रहें॥३७॥ |
| हे शक्तिवर्द्धक पवित्र सोमदेव ! आप सभी में व्याप्त, साक्षी रूप, आप संस्कारित होते हुए हमारे पास पधारें । आपके अनुग्रह से हम सभी धन-सम्पदा से सम्पन्न होकर सुखी जीवन जियें॥३८॥ |
| स्वर्ण - सम्पदा से युक्त, पराक्रम बढ़ाने वाले, सभी भुवनों में व्याप्त गो दुग्ध मिश्रित हे सोमदेव ! आप पवित्र हैं। आप सर्वज्ञ, शूरवीर एवं श्रेष्ठ पथ पर ले जाने वाले हैं। सभी ऋत्विज् ( साधक) आपकी प्रार्थना करते हैं॥३९॥ |
| जल मिश्रित महान् सोमरस जब कलश में जाता है, तब उसकी मधुर धाराएँ तथा स्तुतियाँ ऊपर उठती (सुनाई देती) हैं। उत्तम रथवाला यह राजा (सोम) जब युद्ध में जाता है, तब हजारों प्रकार का अन्न जीत ( अपने अधिकार में कर लेता है॥४०॥ |
| वह सोम सभी मनुष्यों का स्वामीं, उत्तम प्रजा तथा सुख प्रदान करने वाला है, इसे ( सोम को) स्तुतियाँ दिन और रात प्रेरित करती हैं । हे सोमदेव ! इन्द्रदेव के द्वारा पान किये जाने पर आप हमारे लिए प्रजायुक्त, धनयुक्त तथा गृहादि से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करें॥४१॥ |
| यह सोम ब्राह्ममुहूर्त में स्तोताओं की स्तुतियों से उत्कृष्ट रूप में जाना जाता है । यह हर्षप्रदायक, प्रिय हरिताभ सोम दो जनों (दाता एवं धारणकर्ता) को प्रयत्नरत करता है तथा धुलोक और पृथिवीलोक के मध्य स्थापित होता है। मनुष्यों तथा देवताओं द्वारा प्रशंसित दिव्य धन, धारणकर्ता ( सत्पात्रों ) को हस्तगत कराता है॥४२॥ |
| स्तोता, सोमरस को गौ के दुग्ध में विशेष ढंग से भली प्रकार मिलाते हैं, जिसका स्वाद देवगण लेते हैं। उस सोम में गोघृत तथा शहद मिश्रित करते हैं। इसके बाद नदी के जल में स्थित सोम को स्वर्ण से शुद्ध करके तेजस्वी रूप प्रदान करते हैं॥४३॥ |
| हे ऋत्विजो ! श्रेष्ठ विचारशील और शुद्ध सोम की स्तुति करो, यह सोम महाधारा के समान वेग से अन्न (पोषण) प्रदान करता है । सर्पतुल्य वह अपनी पुरानी त्वचा (छाल) का त्याग करता हैं । शक्तिमान् और हरित वर्ण का सोमरस घोड़े की तरह खेल करता हुआ कलश- पात्र में स्थापित होता है॥४४॥ |
| प्रगतिशील राजा सोम जल में मिश्रित होता हुआ प्रशंसित होता हैं । वह दिवस का मापक (निर्माण करने वाला) सोम जल में स्थापित है । हरित वर्ण का, जल मिश्रित, सुन्दर दर्शनीय और जल में निवास करने वाला, ज्योति स्वरूप रथ वाला सोम धनागार स्वरूप हैं॥४५॥ |
| द्युलोक के आधार स्तंभ , पराक्रमी सोम का रस निकालते हैं। तीन कलशों ( तीनों लोकों ) में यह सोम व्याप्त रहता है । ध्वनि करने वाले सोम की ज्ञानी स्तोता स्तुति करते हैं। याजकगण स्तुतियों के द्वारा तेजस्वी सोम को प्राप्त करते हैं॥४६॥ |
| हे शोधित सोम ! ध्वनि करने वाली आपकी संयुक्त धाराएँ ऊन की छलनी से परिष्कृत होकर स्रवित हो रही हैं । हे सोम ! जब जल के साथ आपको पात्र में मिश्रित करते हैं, उस समय आप कलशों में प्रतिष्ठित होते हैं॥४७॥ |
| सभी कर्मों के ज्ञाता, प्रशंसनीय हे सोमदेव ! आप हमारे यज्ञ के लिए रस प्रदान करें । आनन्दवर्द्धक रस प्रदान करने के लिए अनश्वर शोधक यन्त्र से शीघ्र ही स्रवित हों । हे सोमदेव ! आप दूसरे के अधिकारों का हनन करने वालों का संहार करें । उत्तम वीरों से युक्त होकर हम यज्ञ में स्तुतियों के द्वारा आपका गुणगान करेंगे॥४८॥ |
सूक्त-८७
| हे सोमदेव ! याजकों द्वारा पवित्र किये जाते हुए आप शीघ्र ही पात्र में स्थित हों तथा यजमान को पोषक तत्त्व प्रदान करें । शक्तिमान् घोड़े की भाँति शुद्ध करते हुए याजक आपको यज्ञ मण्डप में ले जाते हैं॥१॥ |
| उत्तम आयुधों से युक्त, शत्रुनाशक, विघ्नों को दूर कर उनसे रक्षा करने वाला, पालन करने वाला, दिव्यता का विकास करने वाला, उत्तम बलवान् , दिव्य सोम शोधित किया जाता है॥२॥ |
| नेतृत्व प्रदान करने वाले प्रखर , परमज्ञानी, धैर्यवान् उशना (नियंत्रण में सक्षम अघि इन गौओं (गौओं, इन्द्रियों, वाणियों ) में गुप्त रूप से रहने वाले सोम को यलपूर्वक प्राप्त करते हैं॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! बलवर्धक आपका यह सोम मधुर और वीर्यवान् होकर शोधक यंत्र से निकलता है। हजारों सैकड़ों प्रकार का प्रचुर धन प्रदान करने वाला, यह शक्ति सम्पन्न सोम, लगातार सम्पन्न होने वाले यज्ञ में जाकर स्थित होता है॥४॥ |
| जिस प्रकार अन्न की कामना वाले शत्रुजयी अश्व आगे बढ़ते हैं । उसी प्रकार गौ के दूध से मिश्रित हजारों प्रकार का अन्न प्रदान करने वाला सोम छलनी से शोधित हो रहा है । अमृत तुल्य यह सोमरस प्रचुर मात्रा में (पौष्टिक) अन्न देने के लिए तैयार हो रहा है॥५॥ |
| मनुष्यों को हर प्रकार का भोज्य पदार्थ प्रदान करने के लिए ज्ञानी जनों द्वारा प्रशंसित परिष्कृत होने वाला सोमरस यज्ञ स्थल में आता है । श्येन पक्षी द्वारा लाये गये हे सोमदेव ! आप धन प्रदान करते हुए प्रचुर मात्रा में अन्न प्रदान करें॥६॥ |
| बंधन से मुक्त होकर वेगवान् घोड़ा जिस प्रकार दौड़ता है, उसी प्रकार रस निकालते समय सोमरस शोधन यंत्र में से दौड़ता है। भैंसे द्वारा अपने तीक्ष्ण सींगों को और तीक्ष्ण बनाने के समान यह सोमरस गौ (गाय, पृथ्वी, इन्द्रियादि) से संयुक्त होने की कामना से अपने (निर्धारित) स्थान पर जाता है॥७॥ |
| यह सोम की धारा परम (सत्ता या लोक) से प्रवाहित होती. है । यह अद्रि (पर्वत या मेघों) से निकलकर अन्य प्रदेशों से होती हुई गौ (गौओं, पृथ्वी, वाणी, इन्द्रियों आदि) को जानती - प्राप्त करती है, बादलों से प्रेरित होकर धुलोक से विद्युत् जैसी ध्वनि करते हुए सोमरस की धाराएँ इन्द्रदेव के लिए प्रवाहित होती हैं॥८॥ |
| हे सोमदेव ! शोधित होते हुए आप गौओं के समूह के समीप जाते हैं। आप इन्द्रदेव के रथ में एक साथ बैठकर त्वरित दान की कामना से स्तुत्य धन, प्रचुर मात्रा में प्रदान करें । हे शक्तिमान् सोमदेव ! वह अन्न आपका ही है॥९॥ |
सूक्त-८८
| हे इन्द्रदेव ! यह सोमरस आपके निमित्त निकालकर शोधित किया जाता हैं। इस पवित्र हुए। सोम का आप पान करें। आप ही इसके उत्पादक हैं, इस दीप्तिमान् सोम को आनन्द के लिए योग के लिए आप ग्रहण करें॥१॥ |
| वे महान् इन्द्रदेव अधिक भार धारण किये हुए रथ के समान हमें अपार वैभव प्रदान करने के निमित्त, नियुक्त किये गये हैं। वे हमारे विरोधी शत्रुओं को संग्राम में विनष्ट करते हैं॥२॥ |
| जो सोम वायु की भाँति इच्छानुसार गमन करने वाले घोड़ों के समान है । जो सोम अश्विनीकुमारों की भाँति आमंत्रण पाते ही आता है । जो सोम धनदाता स्वामी के तुल्य अपने को योग्य मानता है । हे सोमदेव! आप पूषादेव के समान मन के वेग से यज्ञस्थल में पधारें॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के समान महान् कर्म करने वाले तथा दुर्विचारों को शत्रुवत् नष्ट करने वाले हैं। आप शत्रु के नगरों को ध्वस्त करने वाले हैं । हे सोमदेव ! आप सभी शत्रुओं का संहार करने वाले हैं। अत: अश्व के समान ही आप ‘अहि' नामक शत्रु को नष्ट करें॥४॥ |
| जो सोम वन में उत्पन्न होकर वन में उत्पन्न अग्निदेव द्वारा बल प्रदर्शन की भाँति अपनी सामर्थ्य को प्रदर्शित करता है, शूरवीर की तरह बड़े शत्रुओं से लोहा लेता है, वैसा यह शोधित सोम, रस की धाराओं को प्रेरित करता है॥५॥ |
| बादलों द्वारा की जा रही वर्षा से प्रवाहित नदियाँ जिस प्रकार स्वाभाविक रूप से समुद्र के पास जाती हैं, उसी प्रकार जलमिश्रित यह सोम दिव्य कोशों (पात्र अथवा जीव कोशों ) में जाता है । इस सोमरस को अविनाशी अथवा ऊन की छलनी से शोधित किया जाता है॥६॥ |
| हे बलशाली सोमदेव ! आप वायु के समान बल हमें प्रदान करें , जिससे उत्तम प्रजा पीड़ित न हो । ज्ञानी जनों की भाँति हम शीघ्र ही बुद्धिमान् हों । अनेकों रूपों वाले हे सोमदेव ! युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले इन्द्रदेव के समान आप यज्ञ में पूज्य हों॥७॥ |
| हे सोमदेव ! आप श्रेष्ठ राजा हैं, आपके नियमों का हम पालन करते हैं । आप महान् तेजस्वी और गंभीर हैं । आप मित्र देवता के समान पवित्र हैं तथा अर्यमा के समान पूज्य हैं॥८॥ |
सूक्त-८९
| आकाश से होने वाली वर्षा के समान सोम प्रवाहित होता हैं । वह सोम आगे बढ़ता हैं । विभिन्न मार्गों से गमन करने वाला वह सोमरस अनेक धाराओं से हमें प्राप्त हो॥१॥ |
| जल का राजा सोम गोदुग्ध में निवास करता है । श्येन पक्षी द्वारा लाया गया सोम, जल में मिश्रित होकर सत्यरूपी नौका पर आसीन होकर गतिशील होता है । द्युलोक से उत्पन्न हुए सोमरस को याज्ञिक निकालते हैं॥२॥ |
| मधुर जल को प्रेरित करने वाले, शत्रुनाशक, प्रकाशक, द्युलोक के पालक, हरिताभ सोमरस को (याजकगण) निकालते हैं। युद्धों का शूर यह सोमरस सर्वप्रथम गौओं ( किरणों) की कुशलता पूछता है । इस सोमरस की सामर्थ्य से ही इन्द्रदेव सभी को संरक्षण प्रदान करते हैं॥३॥ |
| उत्तम पीठ वाला मधुर सोम देखने में सुन्दर , गमनशील तथा कर्म में भयंकर है । यज्ञरूपी रथ में इस सोम को अश्व के समान युक्त करते हैं। बहिने ( ज्वालाएँ, अँगुलियाँ) इसका मार्जन करती हैं। समान नाभि ( केन्द्र, उद्देश्य, बन्धन) वाले ( याजक या प्रकृति प्रवाह) इसे बलवान् बनाते हैं॥४॥ |
| घृत (तेजस् ) का दोहन करने वाली चार गौएँ (चार प्रकार की वाणियाँ) सोम से संयुक्त होती हैं । समान आश्रय में रहने वाली वे सोम को प्राप्त करती हैं। नमनपूर्वक (या अन्न द्वारा) पवित्र होने वाली अनेक गौएँ ( किरणें, इन्द्रियाँ) उसे सब ओर से आवृत कर लेती हैं॥५॥ |
| यह सोम द्यु तथा पृथिवीलोक का आधार है। समस्त मानव सोम के ही हाथ में हैं । इन्द्रदेव को अर्पित करने के लिए मधुर तथा उत्साहवर्द्धक सोम की स्तुतियाँ की जाती हैं । हे सोम ! आप शक्तियों के स्वामी हैं॥६॥ |
| हे अजेय सोमदेव ! यज्ञस्थल पर जाकर वृत्र का वध करने वाले इन्द्रदेव के निमित्त आप रस प्रदान करें। हम उत्तम पराक्रम के स्वामी बने, इसके लिए आप हमें तेजस्वी धन प्रचुर मात्रा में प्रदान करें॥७॥ |
सूक्त-९०
| द्युलोक एवं पृथिवीलोक को उत्पन्न करने वाले, शस्त्रों की प्रखरता को बढ़ाने वाले देवताओं के पोषक सोमदेव, वेगपूर्वक इन्द्रदेव के समीप पहुँचते हुए मानो विश्व का अपार वैभव हमें (याजकों को) प्रदान करने के लिए आए हैं॥१॥ |
| ऋत्विजों की वाणियाँ तीन स्थानों (द्यु, अन्तरिक्ष एवं पृथिवी अथवा अन्तरिक्ष, वनस्पति एवं शरीर) में निवास करने वाले काम्यवर्धक अन्नदाता सोम की तीव्र स्वर से स्तुति करती हैं। जल में अधिष्ठित वरुणदेव की भाँति पानी में मिलकर सोम स्तोताओं को रत्न और धन प्रदान करता है॥२॥ |
| हे सोमदेव ! आप शूरों के समूह और अनेक वीरों के प्रेरक, शक्तिशाली, विजेता, धनप्रदाता, आयुधों से युक्त, अतिशीघ्र गतिवाले, शस्त्र प्रहारक, संग्राम में अदम्य तथा युद्ध में शत्रुओं को हराने वाले हैं॥३॥ |
| विस्तीर्ण पथयुक्त, निर्भय बनाने वाले, आकाश और पृथ्वी को जोड़ने वाले हे सोमदेव ! आप अवतरित हों । जल, उषा, सूर्य किरणों और गौओं द्वारा पोषित आप शब्दनाद करते हुए हमें अपार ऐश्वर्य प्रदान करें॥४॥ |
| हे पवित्र सोमदेव ! आप वरुणदेव, मित्र देव, इन्द्रदेव, विष्णुदेव, मरुत्देव तथा सभी देवों सहित महान् सनातन इन्द्रदेव को आनन्दित करते हैं॥५॥ |
| यज्ञ करने वाले राजा के समान स्तुत्य हे सोमदेव ! आप सभी दुष्टों का विनाश करते हुए रस प्रदान करें तथा अन्न प्रदान करते हुए कल्याणकारी ढंग से हमारा संरक्षण करें, इसके लिए स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते हैं॥६॥ |
सूक्त-९१
| जिस प्रकार युद्ध में अश्वों को भेजा जाता है, उसी प्रकार सबको प्रिय लगने वाला सर्वप्रथम स्तुत्य सोम शब्द करता हुआ यज्ञ कर्म में प्रेरित किया जाता है । दस बहिनें (दस दिशाएँ, इन्द्रियाँ अथवा अँगुलियाँ ) सोम को अनश्वर शोधन यंत्र के द्वारा अपने स्थान की ओर प्रेरित करती हैं ॥१॥ |
| विद्वज्जनों द्वारा शोधित सोमरस देवगणों के पान हेतु गमन करता है । यह अविनाशी सोम याजकों द्वारा परिष्कृत किया जाता है। ऊन की बनी छलनी से शुद्ध होकर गाय के दूध के साथ जल में मिश्रित होकर यह सोमरस यज्ञस्थल पर पहुँचता है॥२॥ |
| बलशाली सोम ध्वनि करते हुए परिष्कृत रूप में वर्षा करने वाले इन्द्रदेव के लिए अपना तेज प्रदर्शित करता है। वह गाय के दूध में मिलाया जाता हैं । स्तुत्य, श्रेष्ठ, पराक्रमी सोम हिंसा से रहित हजारों मार्गों वाली छलनी से शोधित किया जाता है॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आप असुरों के किलों को नष्ट करें, परिष्कृत होकर उनके बल तथा अन्न को भी नष्ट करें। जो ( असुर ) ऊपर से आते हैं, हमारे समीप हैं अथवा जो दूर से आते हैं, उनके नायकों का संहार करके आप उन्हें समाप्त करें॥४॥ |
| सभी के स्तुत्य हे सोमदेव ! आप आदि सूक्तों की तरह नवीन सूक्तों को भी ग्रहण करें । हे बहुकर्मा, स्तुत्य सोमदेव ! आपकी शक्ति शत्रुओं के लिए अजेय और असह्य है । शत्रुनाशक उस सामर्थ्य को हम आप से प्राप्त करें॥५॥ |
| हे सोमदेव ! इस प्रकार परिष्कृत होते हुए आप हमें स्वर्ग, गौएँ, सन्तति तथा जल प्रदान करें । हे सोमदेव ! हमारे क्षेत्र को सुखदायी बनाते हुए आप इन नक्षत्रों का विस्तार करें । हम चिरकाल तक सूर्यदेव के दर्शन कर सकें॥६॥ |
सूक्त-९२
| हरितवर्ण (दोषों का हरण करने वाला सोम शोधक उपकरण में से निकलता है । पवित्र होता हुआ यह सोम स्तुतियों को सुनता (मन्त्रशक्ति से प्रभावित होता है । यह सोम हव्यरूप में इन्द्रादि देवों की प्रसन्नता के लिए रथ की तरह उनकी ओर प्रेरित किया जाता है॥१॥ |
| दिव्य द्रष्टा ज्ञानी सोम को इस यज्ञ स्थल पर जल में मिलाकर छलनी से अच्छी प्रकार शोधित किया जाता है । होता (यज्ञों में मन्त्रोच्चारण करने वाला) के समान यह सोम यज्ञस्थल पर सुपात्रों में प्रतिष्ठित रहता है । सात ज्ञानवान् याजक ऋषि स्तोत्रों का उच्चारण करते हुए सोम के पास बैठते हैं॥२॥ |
| उत्तम मार्ग का ज्ञाता, प्रकाशमय, ज्ञानी, शोधित सोम सदैव कलश में स्थापित होता है । समस्त स्तोत्रों को ग्रहण करता हुआ यह धैर्यवान् सोम पाँच (पंचभूतों, पंचप्राणों अथवा पाँच प्रकार की प्रजाओं) के अनुकूल होकर उनकी उन्नति का मार्ग बनाता है॥३॥ |
| हे पवमान सोमदेव ! वे तैतीस विश्वदेव द्युलोक में आपको अनश्वर शोधन प्रक्रिया द्वारा दसों ( दिशाओं-सामथ्र्यो) से शुद्ध करते हैं । सात विशाल धाराएँ जल के द्वारा आपका मार्जन करती हैं॥४॥ |
| जहाँ सभी कर्ता (कर्मनिष्ठ, याजक, क्रियाशील) सम्यक् रूप से एक जुट होते हैं, वहीं इस पवमान-सत्य रूप सोम का निवास होता है । दिन में प्रकाश करने वाली जो सोम की ज्योति है, वह मनुष्यों को संरक्षण प्रदान करती हैं। दस्युओं-दुष्टों के लिए सोम अपने तेज को विनाशक बनाता है॥५॥ |
| पशु आदि से समृद्ध घर में जिस प्रकार होता जाता है, श्रेष्ठ कर्म करने वाला राजा जिस प्रकार सभागृह में जाता है, भैंसा जिस प्रकार जल में जाता है, उसी प्रकार शोधित होने वाला सोम कलशों में जाता है॥६॥ |
सूक्त-९३
| कर्म करने वाली अँगुलियाँ सोमरस को पवित्र करती हैं। ये दस अँगुलियाँ वीर्यवान् सोम को हिलाती तथा ग्रहण करती हैं। यह हरिताभ सोमरस सभी दिशाओं में ज्ञाता हुआ तेजगति से दौड़ने वाले अश्व के समान कलश में स्थित होता है॥१॥ |
| देवताओं का इष्ट, वरणीय शक्तिशाली सोम, माता द्वारा शिशु से या पुरुष द्वारा स्त्री से मिलने के तुल्य जल में मिलाकर धारण किया जाता है। संस्कार किए जाने वाले स्थान में फिर गौ-दुग्धादि से मिश्रित होता है॥२॥ |
| गौओं के योग्य पोषक वनस्पतियों में प्रविष्ट हुआ सोम उनके दुग्धाशय को पूर्ण करता है । उत्तम मेधावी यह सोम दुग्ध धाराओं में मिलाया जाता है। जिस प्रकार लोग स्वयं को कपड़ों से आच्छादित करते हैं, उसी प्रकार कलशस्थ सोम को गौएँ अपने दूध से आवृत करती हैं॥३॥ |
| हे सोम ! हमारी इच्छाओं की पूर्ति करते हुए अश्वों से युक्त दैवी धन हमें प्रदान करें। आप महारथियों द्वारा धारण की जाने वाली बुद्धि हमें प्रदान करें, जिससे हम अपने धन को श्रेष्ठ कार्य में लगाने का साहस कर सकें॥४॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! हमें सन्ततियुक्त आनन्ददायी तथा शीतल (शान्तिदायक) धन तथा स्तोताओं को दीर्घायुष्य प्रदान करें । बुद्धियुक्त धन प्रदान करने वाले हे सोमदेव ! आप हमारे यज्ञ में शीघ्र ही पधारें॥५॥ |
सूक्त-९४
| जब इस (सोम) को अश्व की तरह शुभ( संस्कारों) से सज्जित करने, सूर्य को किरणों से सुशोभित करने की तरह संस्कारित करने के लिए बुद्धि (मेधा या मंत्रशक्ति) स्पर्धा करती है, (तब) पशुओं के संवर्धन के लिए विचरण स्थल (चरागाह) की भाँति यह सोम क्रान्तदर्शी की भाँति (कलश या विश्वघट) में संचरित होता है॥१॥ |
| यह सोम अमृततुल्य स्थान प्राप्त करने के लिए (पृथ्वी पर) दो प्रकार (स्थूल रूप में सोमरस, सूक्ष्मरूप में रश्मियों के माध्यम से अपने तेज़ को प्रकट करता है । आनन्दमय सोम के लिए समस्त भुवन विस्तृत हो जाते हैं । उस समय यज्ञ की कामना वाली स्तोताओं की वाणियाँ सोम की उसी प्रकार की स्तुति करती हैं, जैसे गौशाला में गौएँ ध्वनि करती हैं॥२॥ |
| जिस प्रकार युद्ध में शूरवीरों के लिए रथ, आभूषण की तरह होता है, उसी प्रकार दैवी धन मनुष्य को विभूषित करता है । जिस समय ज्ञानी सोम स्तोत्रों का श्रवण करता है, उस समय यज्ञों में धन की वृद्धि होती है॥३॥ |
| सम्पत्ति की वृद्धि करने वाला सोम यज्ञ में धन प्रदान करने के लिए आता है। वह सोम स्तोताओं को धन-धान्य प्रदान करता है । स्तुति करने वाले शोभायमान याजक अमरत्व को प्राप्त करते हैं । नियमित अभ्यास) करने वाले वीर के संग्राम (जीवन - संग्राम) सत्य (सार्थक) होते हैं॥४॥ |
| हे विचित्र सोमदेव ! हमें अन्न तथा बल बढ़ाने वाला रस प्रदान करें। हमें महान् प्रकाश देने वाली सूर्य किरणें तथा अश्व और गौएँ दें । समस्त राक्षस आपके समक्ष सहज ही पराजित होने वाले हैं, अत: शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके सभी देवों को हर्षित करें॥५॥ |
सूक्त-९५
| मनुष्यों द्वारा दबाकर रस निकाला जाने वाला, हरिताभ सोम पवित्र होता है । काष्ठ के बर्तन में गो दुग्ध मिश्रित वह सोमरस शब्द करते हुए गिरता है । याजक इस सोम की हवियुक्त स्तुति करते हैं॥१॥ |
| जिस प्रकार नाविक नौका को चलाता है, उसी प्रकार अभिषुत हरिताभ सोम यज्ञ का मार्गदर्शन करने वाले । स्तोत्रों को प्रेरित करता है । वह तेजस्वी सोम देवों के गुप्त नामों का गुणगान ( गुप्त शक्तियों को प्रकट करता है॥२॥ |
| पानी की द्रुतगामी तरंगों के सदृश बोलने में शीघ्रता करने वाले स्तोतागण स्तुति को सोम के पास शीघ्र ही प्रेषित करते हैं। उन्नति की कामना वाली नमनशील स्तुतियाँ कामना करने वाले सोम के निकट जाती हैं और उसी में समाहित हो जाती हैं॥३॥ |
| शोधित करने वाले याजक पर्वत में उत्पन्न हुए सोम से भैंस को दुहने के समान रस निकालते हैं। तीनों लोकों में व्याप्त शत्रुनाशक इस सोम को अन्तरिक्ष धारण करता है, ऐसे सोम की स्तुति की जाती हैं॥४॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! स्तोताओं को प्रेरित करने वाले याज्ञिकों के समान आप हमारी बुद्धि को यज्ञ के निमित्त प्रेरित करें । जब इन्द्रदेव के साथ आप रहते हैं, तब हम श्रेष्ठ पराक्रमी होने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं॥५॥ |
सूक्त-९६
| सेना के नायक (की भाँति) शूरवीर (सोम) शत्रुओं की गौओं (पोषण सामथ्यों ) को प्राप्त करने की कामना करते हुए रथों के आगे चलते हैं। इस कार्य से इनकी सेना हर्षित होती है । यह सोम इन्द्रदेव की प्रार्थना को मित्रो और याजकों के लिए मंगलमय बनाते हुए तेजस्विता को धारण करता हैं॥१॥ |
| याजकगण हरिताभ सोमरस का शोधन करते हैं । यह सोमरस, रथ रूपी पात्र में स्तुतियों से हर्षित होकर रहता है। यह ज्ञानी सोम, मित्र इन्द्रदेव के साथ यज्ञ के साधन रूप श्रेष्ठ स्तोताओं के पास पहुँचता है॥२॥ |
| है दिव्य सोमदेव ! हमारे इस दैवी यज्ञ में महान् ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये आप इन्द्रदेव के पान करने योग्य रस प्रदान करें । आकाश की वर्षा के जल के साथ मिश्रित विशाल अन्तरिक्ष से आने वाले हे सोमदेव ! शोधित होकर आप हमें ऐश्वर्य प्रदान करें॥३॥ |
| हे सोमदेव ! शत्रुओं को पराजित करने के लिए प्रजा को पीड़ित न होने देने के लिए, सुख की वृद्धि के लिए तथा महान् यज्ञों के लिए आप हमें शुद्ध सोमरस प्रदान करें । हे पवित्र सोमदेव ! हम तथा हमारे सभी मित्र आपसे यही कामना करते हैं॥४॥ |
| द्युलोक, पृथिवी लोक, अग्नि, सूर्य, इन्द्र विष्णु तथा श्रेष्ठ बुद्धि, को उत्पन्न करने वाला सोम शुद्ध किया जा रहा है॥५॥ |
| देवताओं, कवियों, विप्रों, पशुओं, पक्षियों एवं हिंसा करने वालों में विभिन्न रूपों से संव्याप्त दिव्य सोम संस्कारित होते हुए ध्वनि के साथ कलश में स्थित हो रहा है॥६॥ |
| प्रवाहित नदी की लहरों द्वारा उठ रही मधुर ध्वनि की भाँति पवित्र होता हुआ सोम, मनोरम ध्वनि कर रहा है । अन्तर्दृष्टि से छिपी हुई शक्तियों को जानकर वह सोम कभी कम न होने वाली सामर्थ्य को प्राप्त करता है॥७॥ |
| हे आनन्दवर्द्धक सोमदेव ! आप सूर्यदेव के समान तेजस्वीं एवं हजारों बलों से युक्त होकर युद्ध में शत्रु बल पर आक्रमण करके उनका नाश करें । हे शोधित होते हुए ज्ञानी सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के निमित्त स्तुतियों को प्रेरित करते हुए गाय के दूध में मिश्रित सोमरस की धाराएँ प्रवाहित करें॥८॥ |
| देवों का प्रिय रमणीय सोम, इन्द्र को हर्षित करने के लिए कलश में स्थापित होता है । सैंकड़ों बलों से युक्त, हजारों धाराओं से स्रावित होने वाला यह सोम कलश में उसी प्रकार जाता है, जैसे बलवान् अश्व युद्ध में जाते हैं॥९॥ |
| पत्थरों से कूटकर निकाला गया, जल मिश्रित , समस्त भुवनों का राजा , शोधित सोमरस, आदिकाल से याजकों द्वारा यज्ञ में लाया जाता रहा है । वह शत्रुओं से रक्षा प्रदान करने वाला ऐश्वर्ययुक्त सोम यज्ञ के लिए ( याजकों का मार्ग प्रशस्त करता है॥१०॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! बुद्धिपूर्वक कार्य करने वाले हमारे पूर्वज अनादिकाल से आपकी सहायता से यज्ञीय कर्म करते रहे हैं। आप शत्रुओं का नाश करते हुए अपराजित होकर, उन्हें दूर करें एवं हमें वीरों तथा घोड़ों से युक्त धन प्रदान करें॥११॥ |
| हे सोमदेव ! जिस प्रकार पूर्वकाल में आप मनस्वी याजकों को शत्रु विनाशक ऐश्वर्य तथा हविष्यान्न युक्त धन प्रदान करते थे, उसी प्रकार हमें भी धन प्रदान करें तथा इन्द्रदेव के निमित्त आयुधों का निर्माण करें॥१२॥ |
| हे मधुर सोमदेव ! आप जल में मिलकर , ऊँचे स्थान पर स्थित होकर एवं छलनी से छुनकर पवित्र होते हैं। तत्पश्चात् इन्द्रदेव के पीने योग्य यह हर्षप्रदायक सोम जलयुक्त बर्तन में पहुँचकर स्थित रहता है॥१३॥ |
| हे सोमदेव ! आप द्युलोक से सैकड़ों धाराओं में वर्षा करें । सहस्रों प्रकार का धन तथा अन्न देने की कामना से जल में मिश्रित होकर आप यज्ञस्थल के कलश में स्थापित हों। गाय के दूध में मिश्रित होकर आप यज्ञ में प्रवेश करें तथा हमें दीर्घायु बनायें॥१४॥ |
| मनस्वी याजकों से शोधित यह सोम चपल घोड़े की भाँति शत्रुओं को लाँघकर जाता है । गोदुग्ध के समान यह सोम पवित्र है । लक्ष्य तक पहुँचाने वाला घोड़ा जैसे सुखदायी होता है, वैसे ही यह सोम सुखदायी है॥१५॥ |
| याज्ञिकों द्वारा शोधित, श्रेष्ठ यज्ञीय साधनों से युक्त सोम, सुन्दर रसमय स्वरूप प्राप्त करता है। अश्व के समान सर्वत्र गमनशील हे सोमदेव ! आप हमें अन्न प्रदान करें, गाय का दूध प्रदान करें तथा प्राणवान् बनाएँ॥१६॥ |
| नवजात शिशु के सदृश सभी को प्रमुदित करने वाले सोम को मरुद्गण शुद्ध करते हैं । सप्त गुणों से युक्त यह मेधावर्द्धक सोम स्तुतियों के साथ शब्द करता हुआ शुद्ध हो जाता है॥१७॥ |
| ऋषियों जैसे संस्कार वाला, ऋषित्व प्रदान करने वाला, स्तुत्य, ज्ञानदायी सोम स्वयं महान् है । यह तृतीय धाम स्वर्गलोक में रहने वाले तेजस्वी इन्द्रदेव को और भी अधिक तेजस्- सम्पन्न बनाता है॥१८॥ |
| यह प्रशंसनीय, सभी सामथ्र्यों से युक्त, शक्तिमान् , समुद्र की तरंगों के समान गतिमान् तथा गौ दुग्ध में मिलाया जाने वाला प्रवाही सोम चतुर्थ (महः) लोक में स्थापित होता है॥१९॥ |
| अलंकृत मनुष्य के समान, शरीर को स्वच्छ बनाने के समान, द्रुतगामी अश्व के समान, धन प्राप्ति के इच्छुक के समान, शब्द करते तथा समूह में जाते वृषभ के समान सोमरस कलश में स्थापित होता है॥२०॥ |
| महान् याजकों के द्वारा शोधित हे सोमदेव ! ध्वनि करते हुए आप कलश में स्थापित हों । पवित्र होकर क्रीड़ा करते हुए यज्ञ पात्र में प्रवेश करें । आपका आनन्ददायी रस इन्द्रदेव को आनन्दित करे॥२१॥ |
| इस सोमरस की बृहद् धाराएँ विशेष रीति से प्रवाहित होते हुए गाय के दूध में मिश्रित होकर कलशों में प्रवेश करती हैं। सामगान करने वाले ज्ञानी याजक मित्रवत् स्नेह भाव से प्रवाहित सोम की स्तुतियाँ करते हैं॥२२॥ |
| जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसलों में जाते हैं, जिस प्रकार पुरुष अपनी प्रिय पत्नी के पास जाता है, उसी प्रकार पवित्र, शोधित हुआ, शत्रुओं का संहार करके (विकारों से मुक्त होकर) जल के साथ मिलकर परिष्कृत हुआ सोमरस कलशों में स्थापित होता है॥२३॥ |
| हे पवमान सोमदेव ! आपकी किरणें श्रेष्ठ नारियों एवं उत्तम दूध की धाराओं के समान प्रकट होती हैं। यह हरि (हरे रंग का अथवा विकारनाशक) सोम बहुत बार (बार-बार) जल में, देवों के कलश (यज्ञ कलश या विश्वघट) में शब्द करता हुआ प्रविष्ट होता है॥२४॥ |
सूक्त-९७
| जिस प्रकार (गोपालको पशुओं के घर में जाते हैं, उसी प्रकार) इस (यज्ञ) का प्रेरक देव (दिव्य) सोम अभिषुत होकर शोधक छने में से प्रवाहित होता है, स्वर्ण ( अथवा स्वर्णिम किरणों) से शोधित होता हुआ यह देवों को अपने रस से संपृक्त (तृप्त) कर देता है॥१॥ |
| वीरोचित शौर्य एवं शोभा-सम्पन्न- महान् ज्ञानी, स्तुत्य, चैतन्य, विशिष्ट द्रष्टा हे सोमदेव ! आप पवित्र होकर यज्ञशाला के पात्रों में प्रविष्ट हों॥२॥ |
| यशस्वियों में श्रेष्ठ भूमि में प्रकट, तृप्तिदायक सोम छत्रे द्वारा शुद्ध होता है । हे पवित्र होने वाले सोमदेव ! आप शब्द करते हुए कल्याणकारी साधनों से हमारी रक्षा करें॥३॥ |
| मधुर, तेजस्वी सोमरस छन्ने से छनकर पवित्रता को धारण करते हुए पात्र में स्थिर रहे । वैभव प्राप्ति की कामना से हम स्तुत्य सोमरस को प्रेरित करते हुए देवताओं की अर्चना करें॥४॥ |
| देवों की मित्रता की कामना से यह सोम आनन्द प्रदान करने के लिए हजारों धाराओं से प्रवाहित होता है । याजकों द्वारा स्तुत्य सोम सनातन स्वरूप को प्राप्त करता हुआ इन्द्र के पास पहुँचकर सौभाग्यशाली बनता है॥५॥ |
| हे हरिताभ सोमदेव ! आप परिष्कृत होकर स्तोत्रों को स्वीकार करते हुए हमें ऐश्वर्य प्रदान करें। आपका आनन्द प्रदायक रस युद्ध में इन्द्रदेव को प्राप्त हो । देवों के साथ एक ही रथ पर आरूढ़ होकर श्रेष्ठ साधनों से आप हमारी रक्षा करते हुए हमें धन प्रदान करें॥६॥ |
| अषि उशना के सदृश स्तोत्रों का पाठ करने वाले ऋत्विज् देवताओं के जन्म वृत्तान्तों का वर्णन करते हैं। महान् वती, तेजस्वी और पवित्र करने वाला श्रेष्ठ सोमरस, शब्द करते हुए पात्र में प्रवाहित होता है॥७॥ |
| हंसों के समान (विवेक-सवृत्तियुक्त) बलवान् (धीर-वीर पुरुष त्रस्त (शत्रुओं या दुःखों से पीड़ित होने पर इस शीघ्र कार्य करने वाले, मन्युयुक्त, शत्रुनाशक सोम के स्थान (यज्ञ स्थल या आवास) पर पहुँचते हैं। सर्वसुलभ, अजेय, पवमान, साथ रहने वाले इस मित्र (को प्रसन्न करने के लिए वाद्य बजाते हैं॥८॥ |
| क्रीड़ा करते हुए सहजरूप से ही वह सोम प्रशंसनीय गति को प्राप्त करता है । जिसे अन्यों के द्वारा मापा नहीं जा सकता, उसका तेजस्वी प्रकाश, दिन में हरित(हरणशील किरणों वाला) तथा सौम्य आभायुक्त होता है॥९॥ |
| इन्द्रदेव की शक्ति बढ़ाने वाला, होताओं को धन देने वाला , शक्ति का स्वामी सोम हर्ष बढ़ाने के लिए बर्तन में छाना जाता है । वह सोमरस राक्षसों को नष्ट करता हैं और दुष्टों को मार भगाता है॥१०॥ |
| पत्थरों की सहायता से निकाला गया, तेजस्वी, सुखदायी सोम अपनी मधुर धार से पवित्रता को प्राप्त हो रहा है। इन्द्रदेव का सान्निध्य पाने की इच्छा वाला वह सोम उनके उत्साह को बढ़ाते हुए सभी को तृप्त कर रहा है॥११॥ |
| ऋतुओं को धारण करने वाला व्रतशील तेजस्वी सोम अपने मधुर रस से देवताओं को तृप्त करता है। अँगुलियों द्वारा पवित्र होते हुए पात्र में स्थिर हो रहा है॥१२॥ |
| निरन्तर गतिशील सुखों की वर्षा करने वाले हे दिव्य सोमदेव ! आप द्युलोक से पृथिवी तक किरणों के बीच मेघ जैसी गर्जना-प्रतिध्वनियाँ उत्पन्न करते हुए संव्याप्त हैं। हम इन्द्रदेव की तरह आपके निर्देशों को सुनते हैं । आप भी अपनी उपस्थिति का बोध कराते हुए हमारी स्तुतियों को स्वीकार करते हैं॥१३॥ |
| अपने आप में मधुर, गाय के दूध में मिश्रित होने के बाद अधिक सुस्वाद हुए हे सोमदेव ! पानी में शोधित होकर आप (निरन्तर) धार रूप में इन्द्रदेव को प्राप्त हों॥१४॥ |
| हे उत्साहवर्द्धक सोमदेव ! आप छाये हुए मेघों को जलवृष्टि के लिए प्रेरित करते हुए आनन्ददायी बने तथा पानी के साथ श्वेत वर्ण धारण करके गौ दुग्ध के रूप में हमारे चारों ओर स्रवित हों॥१५॥ |
| हे सोमदेव ! स्तुतियों से हर्षित होकर, श्रेष्ठ मार्ग से, सुगमता पूर्वक धन प्रदान करते हुए आप रस रूप में कलश में प्रतिष्ठित हों तथा सभी राक्षसों को आयुधों से नष्ट करके अनश्वर छलनी में उच्च भाग से धारा रूप में प्रवाहित हों॥१६॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमारे लिए सुखदायक, जीवनप्रद, द्युलोक से आने वाली अन्नयुक्त वृष्टि करें । पृथ्वी पर चलने वाली वायु से सन्तति के समान सम्बन्ध बनाते हुए हम उसे (वृष्टि को) प्राप्त करें॥१७॥ |
| जिस प्रकार ग्रन्थि को खोलते हैं, उसी प्रकार है सोमदेव ! हमें आप पापों से मुक्ति दिलाएँ तथा हमारे मार्ग को सुगम बनाते हुए हमें बलशाली बनाएँ । हे हरिताभ दिव्य सोमदेव ! शोधित होते समय अश्व के समान ध्वनि करते हुए, शत्रुओं का संहार करते हुए आप अपने निवास स्थल कलश में स्थापित हों॥१८॥ |
| हे सोमदेव ! अनश्वर (या उनकी) छलनी पर धारा रूप से प्रवाहित होकर आप आनन्दवर्द्धक स्वरूप प्राप्त करते हुए शोधित हों, हिंसारहित होते हुए सुगन्ध युक्त हजारों धाराओं में प्रवाहित हों तथा संग्राम में जाने वाले वीरों के लिए आप अन्न प्रदान करने वाला रस स्रवित करें॥१९॥ |
| जिस प्रकार बन्धन एवं रथादि से मुक्त घोड़ा युद्ध में द्रुतगति से लक्ष्य तक पहुँचता है, उसी प्रकार परिष्कृत सोमरस कलशों में शीघ्रता से गतिमान होता है । देवगण उस आनन्ददायी सोमरस का पान करने के लिए यज्ञस्थल पर जाते हैं॥२०॥ |
| हे सोमदेव ! आप द्युलोक के जल से हमारे यज्ञ के कलशों को भर दें तथा वीर सन्तति युक्त धन प्रदान करने वाला सोमरस हमें प्रदान करें॥२१॥ |
| जब बोलने वाले (मंत्र वक्ता) तेजस्वी पुरुष के अन्त:करण से वाणी (स्तुति) निकलती हैं, मुख से शब्द उच्चरित होते हैं, तभी ज्येष्ठ तेजस्वी सोम लाया जाता है । उसी समय कलश में स्थित श्रेष्ठ, सेवनीय, पालक सोम की इच्छा करने वाले ( देवों-याजकों) को गौएँ ( इन्द्रियाँ-पोषण सामर्थ्य ) प्राप्त होती हैं॥२२॥ |
| दाताओं ( श्रेष्ठ कार्य में धन लगाने वालों ) को धन प्रदान करने वाला, द्युलोक से उत्पन्न हुआ, उत्तम ज्ञान से युक्त सोम इन्द्रदेव के निमित्त ज्ञानवर्द्धक रस प्रदान करता है । उत्तम बलों के धारणकर्ता राजा सौम को दस रश्मियों ( किरणों या अँगुलियों) द्वारा विशेष विधि से धारण किया जाता है॥२३॥ |
| दिव्य द्रष्टा , शोधित होने वाला यह पवित्र सोम, देवगणों तथा मनुष्यों का राजा तथा समस्त धनों की स्वामी हैं । यह उत्तम तथा सुन्दर सोम, विशेष रीति से जल को धारण करते हुए देवगणों तथा मनुष्यों में विद्यमान रहता है॥२४॥ |
| हे सोमदेव ! जिस प्रकार अश्व युद्ध क्षेत्र में जाते हैं, उसी प्रकार आप इन्द्रदेव एवं वायुदेव के पान हेतु तथा हमें अन्न और धन का लाभ देने के लिए गतिशील हों । हे सोमदेव ! आप शोधित होकर हमें सभी प्रकार का ऐश्वर्य प्रदान करें॥२५॥ |
| जल के साथ मिश्रित होकर पात्र में रहने वाला, देवगणों को तृप्त करने वाला सोमरस हमें उत्तम सन्तति युक्त आवास प्रदान करे । संयुक्त रूप से यज्ञ करने वाले, सबके लिए स्वीकार्य हवन करने वाले, द्युलोकवासी देवगणों के निमित्त आहुति देने वाले के समान यह सोमरस अत्यन्त आनन्द प्रदान करने वाला है॥२६॥ |
| हे सोमदेव !आप इस दैवी यज्ञ में देवों के पान योग्य सोमरस प्रदान करें। सोमरस की प्रेरणा से वे देवगण संग्राम में दुर्दान्त शत्रुओं को भी हरा सकें। हे सोमदेव ! परिष्कृत होकर आप भूलोक तथा पृथ्वी लोक को भली-भाँति रहने के योग्य बनायें॥२७॥ |
| याजकों द्वारा एकत्रित किया गया सोमरस सिंह के समान भयंकर, मन के समान द्रुतगामी तथा अश्व के समान ध्वनि करने वाला है । हे सोमदेव ! सुगम तथा प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने वाले मार्गों से सद्भावपूर्वक आप हमें रस प्रदान करें॥२८॥ |
| हे सोमदेव ! देवगणों के निमित्त उत्पन्न हुई आपकी सौ धाराएँ प्रवाहित हुईं, जिन्हें हजारों प्रकार से ज्ञानीजन पवित्र बनाते हैं। हे सोमदेव ! आप महान् ऐश्वर्य के दाता बनकर हमें द्युलोक को धन प्रदान करें॥२९॥ |
| जिस प्रकार दिन में सूर्य की किरणें प्रसरित होती हैं, उसी प्रकार सोमरस की धाराएँ प्रवाहित होती हैं। बुद्धिवर्द्धक यह राजा सोम मित्र की भाँति किसी के लिए भी दुःखदायी नहीं हैं, अपने कार्य कौशल से उन्नति करने वाले पुत्र के समान सम्पूर्ण प्रजा को उन्नतिशील बनाने वाला सोमरस हमें प्राप्त हो॥३०॥ |
| हे सोमदेव ! जब आप अनश्वर छन्ने से पार निकलते हैं, तब आपकी मधुर धाराएँ प्रकट होती हैं। गौओं के धाम (किरणों के क्षेत्र) में प्रकट एवं शुद्ध होकर आप सूर्य को तेजस्विता से पूर्ण कर देते हैं॥३१॥ |
| वह अमृत तुल्य सोम यज्ञ मार्ग से गमन करता हुआ, ध्वनि करता हुआ यज्ञस्थल को तेजस्वी बनाकर प्रकाशित करता है । ज्ञानीजनों की स्तुतियों को स्वीकार कर वह आनन्दवर्द्धक सोम घोषणापूर्वक इन्द्रदेव को रस प्रदान करता है॥३२॥ |
| हे सोमदेव ! आप द्युलोक में उत्पन्न होने वाले श्रेष्ठ पत्तों से युक्त हैं । यज्ञीय कर्म के साथ इस दैवी यज्ञ में चारों तरफ देखते हुए, सूर्य किरणों को आत्मसात् करते हुए घोषणापूर्वक आप सोम कलश में रस की धाराओं के रूप में प्रवेश करें॥३३॥ |
| याजकगण सत्य को धारण करने वाले, तीनों वेदों के मंत्रों से दिव्य, श्रेष्ठ सोम की स्तुति करते हैं । बैल के पास जाने वाली गौओं की तरह उत्तम सुख की इच्छा करने वाले स्तोता, सोम के पास पहुँचते हैं॥३४॥ |
| निकालने के बाद शोधित हुआ सोम पात्र में गिरता है । ज्ञानीजन अपनी बुद्धियों द्वारा त्रिष्टुप् छन्दके मंत्र से उसकी स्तुति करते हैं। दुधारू गौएँ (परमार्थ निष्ठ बुद्धियाँ) सोम की इच्छा करती हैं॥३५॥ |
| हे सोमदेव ! जल मिश्रित तथा शुद्ध होते हुए आप हमारे कल्याण के लिए ध्वनि करते हुए शोधित हों तथा आनन्दपूर्वक इन्द्रदेव को तृप्त करें । हमारी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए आप हमें सद्बुद्धि प्रदान करें॥३६॥ |
| चैतन्य, सत्य स्तुतियों के ज्ञाता सोमदेव शुद्ध होकर पात्र में उतरते हैं । उत्तम कर्म-कुशल, देहधारी, मनोकांक्षी अध्वर्यु इसे एकत्रित करके सुरक्षित रखते हैं॥३७॥ |
| पवित्र होने वाला, वह सोम, इन्द्रदेव को प्राप्त होता है । यह सोम आकाश और पृथ्वी को अपने तेज से पूर्ण करने वाला है; जिसकी अत्यन्त प्रिय रस युक्त धाराएँ हमारा संरक्षण करती हैं और हमें ऐश्वर्य प्रदान करती हैं॥३८॥ |
| वृद्धि पाने वाला, देवत्व की वृद्धि करने वाला, इष्ट प्रदायक, शोधित सोम अपने तेज से हमारी रक्षा करे । मंत्रज्ञ, आत्मज्ञानी, पदज्ञ ( विभिन्न चरणों को जानने वाले ), सर्वज्ञ हमारे पूर्वज अद्रि ( पर्वत या मेघों) से गौओं ( खोई गौओं या किरणों ) को प्राप्त कर सकें॥३९॥ |
| जलयुक्त, समस्त भुवनों का राजा बलवर्द्धक अभिषुत सोम सर्वप्रथम प्रजाजनों का उत्साह बढ़ाकर उनकी उन्नति करते हुए सबसे महान् हो गया॥४०॥ |
| महान् शक्तिशाली दिव्य सोम द्वारा महान् कार्य सम्पादित होते हैं। वहीं जल का गर्भ धारण करने वाला) और देवताओं को पोषण देने वाला हैं । शुद्ध होकर वहीं इन्द्रदेव को सामर्थ्य प्रदान करता है और वहीं सूर्य में तेज स्थापित करता है॥४१॥ |
| हे दिव्य सोमदेव ! हमें अन्न और धन की प्राप्ति कराने हेतु आप वायु को प्रमुदित करें । शोधित किये गये आप मित्र और वरुण को, मरुत् की सामथ्र्यों को, आकाश और पृथ्वी के हर्ष को बढ़ाने वाले हों॥४२॥ |
| हे सोमदेव ! आप दुष्ट नाशक, रोग निवारक तथा शत्रुनाशक रस सुगमता से प्रदान करें । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के मित्र हैं और हम आपके मित्र हैं, अत: गौ दुग्ध मिश्रित सोमरस हमें भी प्रदान करें॥४३॥ |
| हे सोमदेव ! आप मधुरता से युक्त अन्न तथा धन प्रदान करने वाला रस हमें प्रदान करें । आप सन्तानरूपी धन भी प्रदान करें । हे शोधित सोमदेव ! इन्द्रदेव के लिए रस देते हुए आप हमें भी अन्तरिक्ष से धन प्रदान करने वाला रस दें॥४४॥ |
| निकाला गया सोमरस अश्व के समान तीव्रगति से धारा रूप में प्रवाहित होता है । वह बलशाली सोम नीचे रखे कलश में नदी के समान गमन करता है । शोधित सोम वनों की योनि (वनस्पति आदि की उर्वरता में अथवा काष्ठ पात्र) में प्रतिष्ठित होता है । वह सोम गोदुग्ध में मिश्रित होकर जल के साथ शोधित किया जाता है॥४५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! सर्वद्रष्टा, उत्तम रथीं, श्रेष्ठ बलों से युक्त, धैर्यवान् तथा द्रुतगामी सोमरस याजकों की इच्छा के समान (आपकी) इच्छा पूर्ति के लिए कामना करते हुए कलश में प्रतिष्ठित होता है॥४६॥ |
| यह सोमरस अनादि काल से हविष्यान्न के साथ शोधित किया जाता रहा है। पृथ्वी के रूपों को दूर करता हुआ (देशभेद-रूप भेद मिटाता हुआ सम्पूर्ण पृथ्वी को) शीत, उष्ण और वर्षा इन तीनों कालों में समान रूप से प्राप्त होने वाला यह सोमरस ध्वनि करता हुआ यज्ञ में स्थापित होता है॥४७॥ |
| हे सोमदेव ! स्वाद युक्त, मधुर, ज्ञानवान् तथा सर्वप्रेरक बनकर रथ में आरूढ़ होकर आप जल मिश्रित रस के रूप में शोधित होते हुए यज्ञपात्र में स्थापित हों । आप देवों की भाँति सत्य रूप एवं मननीय स्तुतियों को श्रवण करते हुए अपना रस प्रदान करें॥४८॥ |
| हे सोम ! आप स्तुति के बाद वायुदेव के पान हेतु प्रस्तुत हों । पवित्र होकर मित्र और वरुण को प्राप्त हों । नेतृत्ववान्, बुद्धिप्रदाता, रथ में सवार अश्विनीकुमारों की ओर पहुँचें और वज्रतुल्य भुजाओं वाले इन्द्र के पास जाएँ॥४९॥ |
| हे दिव्य सोमदेव ! आप हमें उत्तम वस्त्र, तेजस्वी स्वर्ण आदि ऐश्वर्य प्रदान करें । रथों के लिए आप हमें अश्व दें। शुद्ध हुए आप हमें नव प्रसूता दुधारू गौएँ प्रदान करें॥५०॥ |
| हे सोमदेव ! शुद्ध हुए आप हमें दिव्य धनों एवं पार्थिव ऐश्वर्यों से युक्त करें । जमदग्नि आदि ऋषियों के समान सम्पत्ति (सामर्थ्य) प्रदान करें । हमें श्रेष्ठ धन के सदुपयोग करने की सामर्थ्य आपसे प्राप्त हो॥५१॥ |
| हे सोमदेव ! आप पवित्र हुई धारा से हमें ऐश्वर्य प्रदान करें। जिस प्रकार प्रकृति के मूल आधार सूर्यदेव, वायुदेव को प्रवाहित करते हैं, उसी प्रकार आप वसतीवरी नामक कलश में प्रवाहित होकर बुद्धिशाली इन्द्रदेव को प्राप्त हों तथा हमें सुसन्तति प्रदान करें॥५२॥ |
| हे सोमदेव ! सबके लिये स्तुति योग्य स्थल, हमारे यज्ञ में आप पवित्र धारा के साथ शुद्ध हों । हे शत्रुनाशक सोमदेव ! आप पेड़ों से मिलने वाले पके फल की भाँति (सुगमता से प्राप्त होने वाले परिपक्व) साठ हजार धन ( स्वर्ण मुद्राएँ), युद्ध में विजय हेतु हमें प्रदान करें॥५३॥ |
| साधकों पर सुखों की वर्षा करना और दुराचारियों को पराजित कर झुकाना ये दो आपके सुखदायी कार्य है । हे सोमदेव ! आप संग्राम द्वारा (अस्त्र प्रहार द्वारा), मल्लयुद्ध द्वारा अथवा छुपकर हानि पहुँचाने वाले शत्रुओं (दोषों ) को शक्तिहीन करके नष्ट करें तथा जड़ता को (मूर्खता को) हमसे दूर करें॥५४॥ |
| हे सोमदेव ! तीन (अग्नि, वायु, जल) विशाल छलनियों से शोधित होकर, आप एक (कलश या भूमण्डल) के पास दौड़कर पहुँचते हैं। आप ऐश्वर्यवान् हैं, दान योग्य धन के दाता तथा धनवानों के भी धनपति हैं॥५५॥ |
| सर्वज्ञ ज्ञानी तथा सभी भुवनों के राजा ये सोमदेव अनश्वर छलनी में दोनों ओर से प्रवाहित होते हुए सभी यज्ञों में रस प्रदान करते हैं॥५६॥ |
| महान् अषिगण इस अविनाशी समरस का स्वाद लेते हैं। धन की कामना वाले ज्ञानी जनों के समान विद्वान् याजक जल के साथ इस सोमरस को दसों ( दिशाओं या अंगुलियों ) से मिलाते हुए उनकी स्तुति करते हैं॥५७॥ |
| हे संसार को शुद्ध-पवित्र करने वाले सोमदेव ! आपकी सहायता से हम जीवन-संग्राम में निरन्तर उत्तम कर्मों का चयन करें । इसके कारण अदिति, मित्र, वरुण, पृथ्वी, सिन्धु और द्युलोक हमें यशो भागों बनाएँ॥५८॥ |
सूक्त-९८
| सैकड़ों लोगों द्वारा प्रशंसित, हजारों का पोषक, विशेष ओजस्वी, बल बढ़ाने वाला यह सोमरस हमें धन प्रदान करे॥१॥ |
| जिस प्रकार कवच से युक्त पुरुष रथ में आरूढ़ होता है, उसी प्रकार स्तुत्य सोम कलश से डालने पर धारा रूप में प्रवाहित होता है॥२॥ |
| सूर्य रश्मियों की कामना करने वाला, स्वाभाविक तेज से युक्त यह श्रेष्ठ सोम धारा रूप में यज्ञार्थ प्रयुक्त होता है । याजकों को आनंदित करने के लिए प्राकृतिक ढंग से परिष्कृत होता है॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आप सदैव दान (श्रेष्ठ कार्यों के लिये धन) देने वाले मनुष्यों को सैकड़ों प्रकार कम धन प्रदान करते हैं॥४॥ |
| हे उत्तम आश्रय देने वाले सोमदेव ! सबके द्वारा सराहनीय, सभी को पोषण देने वाली आपकी विभूतियों का हम सान्निध्य-लाभ चाहते हैं । सूर्य रश्मियों के साथ रहने वाले हे सोमदेव ! आपके द्वारा प्रदत्त अन्नादि (पोषक पदार्थों ) के उपयोग से हम सुखी हों॥५॥ |
| पाषाणों द्वारा कूटकर निष्पन्न, कीर्तिवान्, सबके इष्ट और इन्द्रदेव के प्रिय सोम को दसों अँगुलियाँ भली प्रकार शोधित करती हैं और जलों से युक्त करती हैं॥६॥ |
| हरित और भूरे रंग के सुन्दर सोम को जल से पवित्र बनाते हैं। यह सोम इन्द्र आदि देवताओं के निकट अपने हर्ष प्रदायक गुणों के साथ जाता है॥७॥ |
| हे देवो ! रक्षण सामर्थ्य से युक्त तथा बलवर्द्धक इस सोमरस का आप पान करें। यह सोमरस ज्ञानी जनों को सूर्य के समान तेजस्विता प्रदान करता है॥८॥ |
| हे द्यु तथा पृथिवीं लोक ! यज्ञों में मानवों का हितकारी तथा तेजस्वी सोमरस उत्पन्न किया जाता है। यह तेजस्वी सोमरस पर्वत के उच्च शिखरों में रहता है । इसे यज्ञ में याजक तैयार करते हैं॥९॥ |
| हे सोमदेव ! दुष्ट संहारक इन्द्रदेव के पान हेतु, यज्ञ में दक्षिणा देने वाले वीर के लिए और यज्ञ करने वाले यजमान के लिए आप पात्र में प्रवाहित होकर स्थिर हों॥१०॥ |
| प्रात: काल ( ब्राह्ममुहूर्त में) अज्ञानी छिपे हुए चोर (आलस्य) को जो सोम भगा देता हैं, उस सनातन सोम को प्रातः काल में ही शोधित करके पवित्र बनाते हैं॥११॥ |
| हे मित्रो ! तुम और हम उस पराक्रमी, पौष्टिक, श्रेष्ठ सुगन्धि से युक्त, शक्ति सामर्थ्य को बढ़ाने वाले सोमरस को प्राप्त करें॥१२॥ |
सूक्त-९९
| जिस प्रकार योद्धा धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाते हैं, उसी प्रकार महान् उद्देश्यों वाले ऋत्विग्गण विद्वानों के सम्मुख प्राणशक्ति संवर्द्धन के लिए वाणी (मंत्रों) से तेजस्वी (सोम) का विस्तार करते हैं॥१॥ |
| रात्रि की समाप्ति पर उषा काल में जल मिश्रित परिष्कृत सोम पौष्टिकता प्रदान करता है। साधकों की अँगुलियाँ हरित वर्ण के सोम को कलश पात्रों की ओर प्रेरित करती हैं॥२॥ |
| परिष्कृत सोमरस आनन्ददायक है, इन्द्रदेव के पीने योग्य है । गौएँ और साधकगण, जिसका पूर्व से सेवन करते रहे हैं और आज भी करते हैं, ऐसे सोम को हम परिष्कृत करते हैं॥३॥ |
| पवित्र सोमरस के प्रचलित स्तवनों से याजक लोग स्तुति करते हैं। यह कर्म के लिए प्रेरित अँगुलियाँ देवताओं के निमित्त सोम को हविरूप में तैयार करती हैं॥४॥ |
| सबके धारण कर्ता, दुग्ध से सिंचित सोमरस को बालों की छलनी से शोधित करके पवित्र बनाते हैं। पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने की कामना से दूत के समान उस सोम की ज्ञानी जन स्तुति करते हैं॥५॥ |
| भार वाहक पशुओं पर जिस तरह वजन लादा जाता हैं, उसी तरह आनन्ददायक पवित्र सोमरस को पात्र में स्थापित किया जाता है । पात्र में स्थापित वह बुद्धियों का अधिष्ठाता सोम स्तुत्य होता है॥६॥ |
| मनुष्य समुदाय में दाता के रूप में यह सोम जाना जाता है । उत्तम कर्म करने वाले याजकों के द्वारा देवों के निमित्त निकाला गया सोमरस जल में मिश्रित होकर शोधित किया जाता है॥७॥ |
| हे सोमदेव ! आपका निकाला गया अत्यन्त विशाल तथा अति आनन्ददायी रस इन्द्रदेव के पान हेतु याजकों द्वारा छलनी में शोधित और कलश में स्थापित किया जाता हैं॥८॥ |
सूक्त-१००
| गौएँ जिस प्रकार नवजात बछड़े को चाटती हैं, उसी प्रकार विद्रोह न करने वाला जल, इन्द्रदेव को प्रिय लगने वाले और चाहने योग्य सोम को प्राप्त होता हैं॥१॥ |
| हे कान्तिमान् सोमदेव ! पवित्र होते हुए आप दोनों लोकों (इहलोक एवं परलोक) वाला धन हमें प्रदान करें। आप दाता के घर में नाना प्रकार के ऐश्वर्यों को पुष्ट बनाते हैं॥२॥ |
| हे सोमदेव ! जिस तरह बादल वर्षा करते हैं, उसी तरह मन को श्रेष्ठ बनाने वाली बुद्धि आप हमें प्रदान करें । आप द्युलोक तथा पृथिवी लोक के ऐश्वर्यों को बढ़ाते हैं॥३॥ |
| हे सोमदेव ! निकाला गया आपका सेवनीय रस अनश्वर छलनी पर द्रुतगामी धारा के रूप में वीर अश्व की भाँति प्रवाहित होता है॥४॥ |
| हे ज्ञानी सोमदेव ! इन्द्र, वरुण तथा मित्रदेवों के पान हेतु निकाला गया आपका रस हमें ज्ञानवान् तथा बलशाली बनाने के लिए धारारूप में प्रवाहित होते हुए पवित्र बने ॥५॥ |
| रस रूप में निष्पन्न हे सोमदेव ! आप अपनी मधुर पोषक धारा से इन्द्र, विष्णु आदि सभी देवताओं की तृप्ति के लिए पवित्र होकर सुपात्र में स्थिर हों॥६॥ |
| संस्कारित होने वाले (छनने वाले) हे हरिताभ सोम ! आपस में द्वेष न करने वाली अंगुलियाँ आपको उसी प्रकार निचोड़ती हैं अर्थात् साफ करती हैं, जैसे कोई गाय नवजात बछड़े को प्यार से चाटती हैं॥७॥ |
| हे पवित्र सोमदेव ! आप अपनी सुन्दर रश्मियों के साथ सर्वत्र जाते हुए महान् यशस्वी बनते हैं। आप दाताओं के घरों में जाकर अपना शौर्य दिखाते हुए सम्पूर्ण अन्धकार को समाप्त करते हैं॥८॥ |
| पवित्रता को प्राप्त करने वाले हे महान् व्रती सोमदेव ! अन्तरिक्ष और पृथ्वी को भली-भाँति धारण करते हुए आप अपनी महिमा के अनुरूप कवच को धारण करते हैं॥९॥ |
सूक्त-१०१
| हे मित्रो ! आप आगे रखे हुए, आनन्द प्रदान करने वाले, इस सोमरस के निकट जाने की इच्छा वाले, लम्बी जिह्वा वाले (जूठा करने वाले) श्वान को दूर भगाओ॥१॥ |
| यज्ञ में सहयोगीं यह सोमरस शोधित होते समय अश्व की गति से पात्र में गिरता है॥२॥ |
| हे ऋत्विजो ! दुष्टतानाशक उस सोम को आवाहित करो और यज्ञ के निमित्त सम्पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ पत्थरों से कूटकर रस निकालो॥३॥ |
| मधुर और हर्ष प्रदायक सोमरस पवित्र होकर इन्द्रदेव के लिये तैयार होता है । हे सोमदेव ! आपका यह आनन्ददायक रस देवगणों के पास पहुँचे॥४॥ |
| स्तोताओं के अनुसार सोम, इन्द्र के लिए शोधित होता है । ज्ञान रक्षक, समर्थ सोम, यज्ञ में प्रयुक्त होता है॥५॥ |
| वाणी का प्रेरक, ऐश्वर्यवान्, इन्द्रदेव का मित्र, सोम प्रतिदिन सहस्रों धाराओं से कलश में शोधित होता है॥६॥ |
| परिपोषक, सेवनीय, सुन्दर यह दिव्य सोम छुनते हुए नीचे के बर्तन (भूमण्डल) में प्रवाहित होता है। सभी जीवों का पालक यह सोमरस अपने दिव्य तेज से दोनों लोकों (द्यावा-पृथिवी) को प्रकाशित करता है॥७॥ |
| हे सामदेव ! आनन्द प्राप्ति के लिए प्रेम और स्पर्धा प्रदर्शित करने वाली वाणियाँ आपकी स्तुति करती हैं। शोधित तथा ऐश्वर्यवान् सोमरस भी आनन्द के लिए संचरित होता है॥८॥ |
| हे सोमदेव ! समाज के पंचजनों (समाज के पाँचों वर्णो अर्थात् सम्पूर्ण समाज) को प्राप्त होने वाला शक्ति वर्द्धक, प्रशंसा के योग्य रस भरपूर मात्रा में आप हमें प्रदान करें॥९॥ |
| श्रेष्ठ मार्ग को ठीक ढंग से जानने वाला, मित्र के सदृश, पाप रहित , मन को भली प्रकार से एकाग्र करने वाला, आत्मविद् यह अभिषुत सोमरस हमारे लिए शुद्ध किया जाता है॥१०॥ |
| पृथ्वी के ऊपर निवास करने वाला, पत्थरों से पीसे जाने वाला, धन प्रदायक यह सोम ऐश्वर्य प्रदान करता है॥११॥ |
| देखने में सूर्य के सदृश तेजस्वी, शुद्ध, विलक्षण सोम दधि से युक्त कलश में स्थिर है तथा जल की स्निग्ध धार से मिलकर पवित्र होने वाला है॥१२॥ |
| शोधित होते समय सोम का नाद विघ्न सन्तोषी मनुष्य न सुनें । भृगुओं ने जिस प्रकार मख नाम के दानव को हटा दिया था, उसी प्रकार श्वानों को यज्ञस्थल से हटायें॥१३॥ |
| भाता सदृश अत्यन्त प्रिय सोम, माता-पिता की भुजाओं में रक्षित पुत्र के तुल्य छन्ने में प्रवाहित होकर कलश में उतरता है, जैसे जार स्त्री की ओर, वरकन्या की ओर उन्मुख होता है, वैसे ही सोम कलश में प्रविष्ट होता है॥१४॥ |
| पौष्टिक तत्त्वों और रसायनों से युक्त वह वीर सोम, द्यावा-पृथिवी को अपने तेज से व्याप्त कर देता है। यजमान के घर में प्रविष्ट होने के तुल्य शोधित हुआ हरिताभ सोम छनकर कलश को प्राप्त करता है॥१५॥ |
| यह सोम ऊन की बनी छलनी से शोधित किया जाता है। भूमि के पृष्ठ भाग पर स्थापित यह बलवान् सोम ध्वनि करते हुए इन्द्रदेव के समीप जाता हैं॥१६॥ |
सूक्त-१०२
| यह सोम, यज्ञ कर्ता तथा महान् जल का पुत्र है । यह यज्ञ को प्रकाशित करने वाले अपने रस को प्रेरित करता है । यह सभी हविष्यान्नों ( आहुतियों) में व्याप्त होता हुआ द्युलोक तथा पृथ्वी लोक में व्याप्त रहता है॥१॥ |
| त्रित ( महान्) अषि की गुफा में चट्टान के समान कठोर दो फलकों के मध्य से प्राप्त होने वाले सोम रस की, ऋत्विजों ने गायत्री आदि सात छन्दों से स्तुति की॥२॥ |
| त्रित (तीन भुवनों) के तीनों सवनों (कालों) में व्याप्त हे दिव्य सोमदेव ! आप अपनी रस की धारा से इन्द्रदेव को प्रेरित करें । श्रेष्ठ याजक उन (इन्द्र) का उत्तम स्तोत्रों से गुणगान करते हैं॥३॥ |
| सात माताओं (धाराओं) से समुत्पन्न (वृद्धि को प्राप्त याजकों की) मेधा शक्तिवर्द्धन हेतु प्रयत्नशील यह सोम धन-सम्पदाओं को भली प्रकार जानने वाला हैं॥४॥ |
| जब प्रेम करने वाले, प्रसन्न रहने वाले देवगण इस सोमरस को पाने करते हैं, तब इस व्रत में लगे हुए परस्पर द्रोह से रहित सभी देवगण संगठित होते हैं॥५॥ |
| इस व्यापक, ज्ञानी, पूज्य, अभीष्ट सोम को यज्ञ का विस्तार करने वाले याजकों ने स्थापित किया है॥६॥ |
| जब यज्ञ विस्तारक याजक सोमरस को जल से मिश्रित करते हैं, तब वह सोमरस स्वयं ही परस्पर एकत्रित होकर महान् यज्ञ का निर्माण करने वाले द्युलोक और पृथिवी लोक की ओर गमन करता है॥७॥ |
| हे सोमदेव ! आप इस अहिंसित यज्ञ में ऋत को तेजस्वी बनाते हुए ज्ञान और कर्म के तेजस्वी सामर्थ्य से द्युलोक के अन्धकार को नष्ट करें॥८॥ |
सूक्त-१०३
| हे स्तोतागण ! जिस प्रकार पोषण करने वाले (स्वामी या पिता) पोषितों के लिए प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार आप इस पवित्र होते, स्तुतियों से हर्षित होने वाले, ज्ञानी सोम के लिए प्रेरक मंत्रों का गान करें॥१॥ |
| गौ दुग्ध से मिश्रित सोमरस अनश्वर छलनी की ओर गमन करता है। परिष्कृत होता हुआ हरिताभ सोमरस तीन स्थानों (द्युलोक, पृथ्वीलोक तथा अन्तरिक्ष में स्थापित होता है॥२॥ |
| पवित्र होता हुआ सोम, अपने मधुर रस को पात्र में पहुँचाता है । ऋषियों की सात पदों वाली वाणियाँ (गायत्री आदि सातों छन्द) इन सोमदेव की प्रार्थना करती हैं॥३॥ |
| बुद्धियों को श्रेष्ठ मार्ग पर प्रेरित करने वाला, अहिंसित, सभी देवगणों को प्रिंय, शोधित हरिताभ सोमरस कूटकर रस निकालने वाले पत्थरों पर पहुँचता है॥४॥ |
| हे सोमदेव ! स्तोताओं के द्वारा स्तुत्य, अविनाशी, शोधित होते हुए आप दैवी बलों के अनुकूल बनकर एक ही रथ पर इन्द्रदेव के साथ बैठकर चलें॥५॥ |
| देवों के निमित्त निकाला गया, सर्वव्यापी, बल की कामना वाला, तेजस्वी, पवित्र सोमरस अश्व के दौड़ने के समान चारों ओर प्रवाहित होता है॥७॥ |
सूक्त-१०४
| हे मित्रो ! (त्वजो) आप आकर बैठो। सोम को शोधित करते समय स्तुति करो। जिसे प्रकार शिशु को आभूषणों से सजाते हैं, उसी प्रकार (यज्ञ से) यज्ञीय साधनों से इस सोमरस को विभूषित करो॥१॥ |
| हे ऋत्विग्गण ! घर के साधनभूत, दिव्य गुणों के रक्षक, आनन्दवर्द्धक, दोनों (दिव्य और पार्थिव) प्रकार से बलवर्द्धक इस साम को उसी प्रकार जल से मिश्रित करो, जैसे माताओं के साथ बच्चे मिलकर रहते हैं॥२॥ |
| जिस प्रकार शक्ति प्राप्त हो, मित्र एवं वरुण आदि सुख पायें, ( वैसे) छन्ने से सोम को शोधित करो॥३॥ |
| हे सोमदेव ! आप धन देने वाले हैं, आपका धन हमें प्राप्त हो, इसलिए हमारी वाणी आपकी प्रार्थना करती है। हम आपके रस को गौ दुग्ध से युक्त करते हैं॥४॥ |
| हे आनन्द के स्वामी सोमदेव ! आप तेजस्वी स्वरूप वाले हैं। जिस तरह मित्र अपने मित्र का पथ-प्रदर्शन करता है, उसी तरह आप हमारे श्रेष्ठ मार्गदर्शक हों॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमें अपना अभिन्न मित्र बनाएँ । हमारा नाश करने वाले मायावी तथा दो भाव रखने वाले कपटी, वह चाहे जो भी हो; उन्हें मारते हुए हमारे पापों को दूर करें॥६॥ |
सूक्त-१०५
| आनन्ददायी, सोमरस को अभिषवण करते समय हे मित्रों ! इसकी प्रार्थना करो। शिशु को जिस प्रकार अलंकृत करते हैं, उसी प्रकार यज्ञों और स्तुतियों से आप इसे ग्राह्य बनाओ॥१॥ |
| देव संरक्षक, प्रसन्नतादायक, स्तुतियों से शोधित और याजकों के प्रेरक सोमरस को जल से मिश्रित करते हैं। माता के द्वारा शिशु को नहलाने धुलाने की तरह सोम को जल के द्वारा शुद्ध किया जाता है॥२॥ |
| बलवृद्धि के साधन रूप इस मधुरतम सोमरस को देवताओं के पीने हेतु विधिवत् निकालते हैं। वे (देवता) शक्ति-सामर्थ्यवान् बनने के लिए इसका पान करते हैं॥३॥ |
| रस निकालने के पश्चात् हे बलशाली सोमदेव ! आप हमें गौओं, घोड़ों से युक्त धन प्रदान करें । तत्पश्चात् आप गौ दुग्ध में मिलकर पवित्र वर्ण (श्वेत वर्ण वाले बन जाएँ॥४॥ |
| हे हरितवर्ण सोमदेव ! तेजस्विता के पुञ्ज, मानव मङ्गलकारी आप हमारी भी तेजस्विता में प्रखरता लाएँ । जिस प्रकार एक मित्र दूसरे मित्र के सहयोग के लिए तत्पर रहता है, ऐसा ही व्यवहार आप हमारे साथ करें॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप पुरातन सुखों को हमारे लिए प्रकट करें तथा आप सुखबाधक रिपुओं का संहार करें । दुहरे व्यवहार वाले दुष्टों को समाप्त करें एवं दिव्य गुणों से रहित स्वार्थी शत्रुओं का भी आप संहार करें॥६॥ |
सूक्त-१०६
| तुरन्त तैयार हुआ, आत्मिक ज्ञान की वृद्धि करने वाला, यह हरित सोम पराक्रमी इन्द्रदेव को शीघ्र प्राप्त हो ॥१॥ |
| युद्ध के समय सेवन योग्य यह सोमरस इन्द्रदेव के लिए तैयार किया जाता है । जैसा कि सभी जानते हैं, विजय के लिए इच्छुक इन्द्रदेव को यह सोमरस विशेष स्फूर्ति देता है॥२॥ |
| सेवनीय सोमपान से आनन्दित, जल को जीतने वाले इन्द्रदेव अपने धनुष और वज्र को धारण कर लेते हैं॥३॥ |
| हे सोमदेव ! स्फूर्ति से सम्पन्न होकर, आप इन्द्रदेव के निमित्त कलश में प्रवाहित हों । हमें तेजोवर्द्धक एवं ज्ञानवर्द्धक शक्ति से परिपूरित करें॥४॥ |
| हे सोमदेव ! आप सर्वद्रष्टा , ज्ञानवान्, हजारों मार्गों के निर्माता तथा ज्ञाता हैं, अत: इन्द्रदेव के निमित्त बलशाली तथा आनन्ददायक रस प्रदान करें॥५॥ |
| हे सोम ! आप श्रेष्ठ पथ-प्रदर्शक तथा देवों को प्रिय हैं, अत: ध्वनि करते हुए हजारों मार्गों से प्रवाहित हों॥६॥ |
| हे सोमदेव ! आप देवगणों के सेवनार्थ वेगपूर्वक धाराओं सहित कलश में प्रवाहित हों । आनन्ददायक हे सोमदेव ! आप हमारे इस कलश में आकर स्थित हों॥७॥ |
| जल में मिश्रित किया जाने वाला आपका रस इन्द्रदेव के आनन्द एवं यश को बढ़ाने के लिए है । देवगण अमरत्व प्राप्त करने हेतु सोमरस का पान करते हैं॥८॥ |
| आकाश से प्राण-पर्जन्य की वृष्टि कराने वाले, शोधित रसरूप हे दिव्य सोम ! आप हमें ऐश्वर्य प्रदान करें॥९॥ |
| पवित्र होने वाला, स्तुति के पश्चात् ध्वनि करता हुआ, शोधित होने वाला यह सोमरस, प्रवाह के साथ अविनाशी छलनी से छुनता चला जाता है॥१०॥ |
| जल मिश्रित, शक्तिशाली सोम स्तुतिगान करते हुए अंत्वजों द्वारा छन्ने से संशोधित किया जाता है । अन्तरिक्ष, वनस्पति एवं जीव जगत् रूपी तीन पात्रों में विद्यमान उस दिव्य सोम की ज्ञानी जन वन्दना करते हैं॥११॥ |
| पोषक तत्वों से युक्त, जल में मिलने वाला सोम पात्रों में स्थिर होता है । संस्कारित होता हुआ, वह युद्ध स्थल पर जाते हुए अश्व की भाँति (ध्वनि करता हुआ) तीव्र वेग से पात्रों में पहुँचता है॥१२॥ |
| अभिनन्दनीय हरित वर्ण का सोम अपने वेगयुक्त प्रवाह से अपने अशुद्ध भाग को शुद्ध करता हुआ, नीचे कलश में टपकता है । हे सोमदेव ! आप ऋत्विजों को पुत्र सम्बन्धी या अन्न सम्बन्धी कीर्ति प्रदान करें॥१३॥ |
| हे सोमदेव ! आप देवगणों से मिलने की इच्छा से शोधित होते समय, अविरल धार के साथ शब्दनाद करते हुए मधुर होकर, प्रचुर मात्रा में स्रवित हों॥१४॥ |
सूक्त-१०७
| हे ऋत्विजो ! मनुष्यों के हितैषी पत्थरों द्वारा शोधित जल मिश्रित यह सोम, देवों के लिए उत्तम हवि है॥१॥ |
| अनश्वर, अति सुगन्धित, शोधित होने वाले हे सोमदेव ! छुनने के बाद आपको अन्नादि एवं गौ दुग्ध के साथ मिश्रित किया जाता है, तब आपको जल में संयुक्त कर प्रसन्न (सेवन योग्य) किया जाता है॥२॥ |
| देवों का आनन्दवर्द्धक, यज्ञों का साधन रूप, ज्ञानसम्पन्न, तेजस्वी सोम सबके दर्शनार्थ कलश में स्थिर हो॥३॥ |
| ऐश्वर्यदाता, स्वर्ण के समान दमकने वाले, स्वच्छ हे सोमदेव ! शोधन क्रम में जल से संयुक्त होकर अविरल धारा के रूप में प्रवाहित होते हुए आप यज्ञ पात्र में प्रतिष्ठित होते हैं ॥४॥ |
| यज्ञ कर्ताओं द्वारा परिष्कृत किया गया मधुर आह्लादक, दिव्यरस सोम यज्ञ वेदी पर स्थापित हैं । निरीक्षणकर्ता यह सोम, श्रेष्ठ यज्ञीय भाव सम्पन्न याजकों को प्राप्त होता है॥५॥ |
| चैतन्य, प्रिय और पवित्र सोम, शोधन यन्त्र से शुद्ध होकर नीचे गिरता है। अंगिरस् (ऋषि) की परम्परा में श्रेष्ठ हे देव सोम ! आप बुद्धिवर्द्धक होकर हमारे यज्ञ को मधुर रस से पवित्र करें॥६॥ |
| सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक, ज्ञानी, मेधावी, सर्वद्रष्टा, अत्यन्त आनन्ददायक यह सोमरस परिष्कृत हो रहा है। हे दूरदर्शी सोमदेव ! आप देवों के लिए अत्यन्त प्रिय हैं तथा आपने आकाश में सूर्यदेव को स्थापित किया है ॥७॥ |
| याजकों द्वारा अभिषुत होता हुआ सोम पवित्र होकर नीचे बर्तन में प्रवाहित होता हैं । यह सोम वेगपूर्वक हरे रंग की आनन्ददायक धारा से पात्र में जाता है॥८॥ |
| आनन्द प्राप्ति के लिए तैयार किया जाने वाला, प्रकाशित, गौ दुग्ध मिश्रित यह सोमरस, पात्र में उसी प्रकार स्थिर हो रहा है, जिस प्रकार सभी नदियाँ अपने आश्रयदाता समुद्र के पास पहुँचतीं और स्थिर होती हैं॥९॥ |
| पाषाणों द्वारा अभिषुत यह सोमरस शोधन यन्त्र से नीचे के बर्तन में छाना जाता है । हरिताभ सोम इस लकड़ी के बर्तन में उसी प्रकार प्रवेश करके स्थिर रहता है, जैसे नगर में मनुष्य॥१०॥ |
| बलवर्द्धक, परिपुष्ट, अश्व के सदृश प्रिय, ऋत्विजों द्वारा ऊन के छत्रे से छाना जाता हुआ, विद्वानों की स्तुतियों से प्रशंसित होता हुआ सोमरस पवित्रता को प्राप्त हो रहा है॥११॥ |
| यह सोम देवताओं को पान करने के लिए पानी में मिश्रित किया जाता है। हर्षप्रदायक होने के साथ-साथ यह सोम स्फूर्तिदायक भी है। यह सोमरस जल से मिलकर मधुररस टपकाने वाले बर्तन में स्थित हो॥१२॥ |
| प्रिय शिशु के समान संस्कारित इस स्वच्छ सोमरस को वेगपूर्वक हाथों से जल-पात्र में उसी प्रकार मिलाते हैं, जैसे द्रुतगामी रथ युद्ध में जाता है॥१३॥ |
| मनुष्यों के हितैषी, ज्ञानदाता, आनन्दप्रदायक, शोधन यंत्र से नीचे प्रवाहित होने वाला , आनन्ददायी सोम, जल से भरे हुए पात्र में स्वत: शुद्ध होकर एकत्रित होता है॥१४॥ |
| प्रेरणादायी दिव्य सोम शुद्ध होकर , प्रकृति में स्थित विशाल सोम (ऋत) के समुद्र में मित्र और वरुण देवों द्वारा प्रयुक्त किये जाने के लिए स्थापित किया जाता है॥१५॥ |
| अर्शत्वजों द्वारा शोधित, सबका प्रेम पात्र, विशेष ज्ञानवर्द्धक, राजा दिव्य सोम, इन्द्रदेव के निमित्त शोधित होकर जल में मिलता हैं॥१६॥ |
| हर्षप्रदायक, अभिषुत किया हुआ सोम, मरुत्वान् इन्द्रदेव के लिए पवित्र होता है। यह सोम पहले सहस्रों धाराओं के रूप में शोधन यंत्र से शुद्ध होता है, इसके बाद पुन: स्तोतागण मंत्रों से इसका शोधन करते हैं॥१७॥ |
| ज्ञान को प्रकटीकरण करने वाला, स्तुति प्रेरक, क्रान्तदर्शी सोमरस छलनी में से जल पात्र के ऊपर शोधित होता हुआ इन्द्र आदि देवगणों के पास जाता है । जल मिश्रित वह सोम उत्तरोत्तर परिष्कृत होता हुआ दुग्धादि में मिलकर काष्ठ पात्र में प्रतिष्ठित होता है॥१८॥ |
| हे सोमदेव ! हमें आपकी मित्रता का लाभ प्राप्त हो । जो अनेक प्रकार के दुष्ट व्यक्ति हमें पीड़ा पहुँचाते हैं, उन सबको आप नष्ट करें॥१९॥ |
| हे समुज्ज्वल सोमदेव ! हमें दिन-रात आपका सामीप्य प्राप्त हो । हुम, सुदूर चमकने वाले सूर्यदेव तथा आपको पक्षी की भाँति (प्रत्यक्ष गतिशील) देखते हैं॥२०॥ |
| श्रेष्ठ हाथों द्वारा निकाले गये पवित्र हुए हे सोमदेव ! आप शुद्ध किये जाने वाले कलश में शब्द करते हुए प्रवाहित होते हैं और स्तोताओं को प्रिय स्वर्णादि धन प्रदान करते हैं॥२१॥ |
| बलवर्द्धक, पवित्र छत्रे द्वारा शोधित हुआ सोमरस जल में अति वेग से प्रवाहित होता है । हे शुद्धता से युक्त सोमदेव ! आप देवों के लिए गोदुग्ध के साथ मिश्रित किये जाते हैं और पवित्र पात्र में स्थापित किये जाते हैं॥२२॥ |
| स्तोत्रों से पवित्र हुए, विशिष्ट अन्न (पोषकता) से युक्त, देवों को आनन्द देने वाले हे सोमदेव ! उदारता आदि विशिष्ट गुणों से युक्त होकर आप इस श्रेष्ठ यज्ञ में पवित्र हों॥२३॥ |
| हे सोमदेव ! द्युलोक और पृथिवी लोक को अपनी धारक सामर्थ्य के साथ पवित्र बनाएँ । हे विशेष द्रष्टा सोमदेव ! शुभवर्ण वाले आपको बुद्धिमान् स्तोतागण अँगुलियों के द्वारा निचोड़ते हैं॥२४॥ |
| मरुद्गणों का मित्र, हर्ष प्रदाता, इन्द्र प्रिय, बुद्धि और अन्न (पोषकता) से युक्त यज्ञ में प्रयुक्त होने वाला तथा शुद्ध होने वाला सोमरस शोधन यंत्र से नीचे गिरता है॥२५॥ |
| ऋत्विजों द्वारा अभिषुत किया गया जल मिश्रित यह सोमरस कलश में एकत्र होता हैं । ज्योतिष्मान्, प्रकाश का निर्माण करते हुए हे सोमदेव ! आप आनन्ददायी दूध से आच्छादित अपने विशुद्ध रूप को प्रकट करें॥२६॥ |
सूक्त-१०८
| हे सोमदेव ! अत्यंत मधुर हवि (यज्ञ) के विषय में सर्वविद्, श्रेष्ठ, तेजस्वी, आनन्द बढ़ाने वाले आप इन्द्रदेव को आनन्दित करने के लिए पवित्र हों॥१॥ |
| हे सोमदेव ! बलशाली इन्द्रदेव आपका पान करके अधिक बलशाली हो जाते हैं । आत्मज्ञानी भी आपका पान करके अत्यधिक आनन्दित होते हैं। उत्तम ज्ञानी इन्द्रदेव आपके बल से संग्राम में विजयी अश्व की भाँति शीघ्रता से शत्रुओं के धन को अपने अधिकार में ले लेते हैं॥२॥ |
| है पवित्र सोम ! आप तेजस्वी, दिव्य जन्मों को जानने वाले तथा अमृत तत्त्व को प्रकट करने वाले हैं॥३॥ |
| जिस सोम की सहायता से दध्यङ् ऋषि ने नवीन गौओं ( दिव्य किरणों) का द्वार खोला, जिसकी सहायता से विप्रों ( याज्ञिकों-साधकों) ने उन्हें प्राप्त किया, जिसकी सहायता से (यज्ञ द्वारा) देवों के प्रसन्न होने पर याजकगण श्रेष्ठ अमृत, अत्रादि प्राप्त करते हैं, वह सोम देवों के लिए अमरत्व की घोषणा करता है॥४॥ |
| अतिहर्षप्रदायक, पानी की तरंगों के सदृश क्रीड़ा करता हुआ यह सोम, बालों की छलनी से छाना जाता है॥५॥ |
| यह सोम, विवर्द्धमान् आकाश में बादलों के भीतर जल को अपनी शक्ति से छिन्न-भिन्न करता है तथा गौओं और अश्वों को सब ओर से घेरता है । हे सोम ! कवच से युक्त वीरों की तरह आप रिपुओं का विनाश करें॥६॥ |
| है स्तोताओ ! अश्व के सदृश तीव्र गतिशील, प्रार्थना के योग्य, पानी की तरह प्रवहमान, प्रकाश की किरणों की तरह शीघ्र गमन करने वाले, जलयुक्त सोम का रस अभिषुत करो और उसमें दुग्ध का मिश्रण करो॥७॥ |
| असंख्य धाराओं से शोधित, सुखवर्द्धक, दुग्ध मिश्रित प्रिय सोम को देवताओं के निमित्त संस्कारित करो । वह दिव्य गुणों से संयुक्त सोम जल से प्रकट हुआ वृद्धि पाता है॥८॥ |
| हे अन्नाधिपति एवं देदीप्यमान सोमदेव ! आप देवगणों को प्राप्त होने वाले हैं। आप हमें तेजोमय एवं महान् कीर्ति प्रदान करें तथा कलश-पात्र में जाकर उसे पूर्ण कर दें॥९॥ |
| राजा की भाँति सबका पालन करने वाले, बुद्धिशाली हे सोमदेव ! याजकों की बुद्धियों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए, अन्तरिक्ष से बरसने वाले पर्जन्य की तरह नीचे के पात्र में स्थिर होने की कृपा करें॥१०॥ |
| आनन्ददायी, सहस्रों धाराओं के साथ कलश में टपकने वाले शक्तिवर्द्धक, सब धनों के स्वामी, तेजस्वी इस सोम का रस ऋत्विग्गण निचोड़ते हैं॥११॥ |
| अपनी ज्योति से अन्धकार को हटाने वाला, बलोत्पादक सोम को अविनाशी रूप में जाना जाता है । ज्ञानवान् याजकों द्वारा स्तुत्य सोम अपना विशुद्ध रूप धारण करता है। तीनों लोकों में व्याप्त वह सोम यज्ञीय कर्म के लिए प्रवाहित होता है॥१२॥ |
| ऋत्विज्ञों ने सम्पत्ति, दुग्ध आदि पदार्थ, भूमि तथा श्रेष्ठ सन्तान प्रदायक उस सोम का रस निकाल लिया हैं॥१३॥ |
| हमारे जिस सोमरस का पान इन्द्रदेव करते हैं, जिसका पान मरुत् करते हैं और जिसे अर्यमा तथा भगदेव पीते हैं; मित्र, वरुण एवं इन्द्र को जिस सोम के संरक्षण के लिए बुलाते हैं, उसी सोम का अभिषवण करते हैं॥१४॥ |
| हे सोमदेव ! याजकों द्वारा एकत्रित, अत्यन्त मधुर, आनन्ददायक, श्रेष्ठ आयुधों से युक्त इन्द्रदेव द्वारा पान किये जाने के निमित्त आप प्रवाहित हों॥१५॥ |
| हे सोमदेव ! जिस प्रकार समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार आप इन्द्रदेव के हृदय रूपी कलश में प्रवेश करें । आप मित्र, वरुण, वायुदेव तथा इन्द्रदेव के निमित्त स्नेहयुक्त रस प्रवाहित करें॥१६॥ |
सूक्त-१०९
| हे स्वादिष्ट सोमदेव ! आप ईन्द्र, मित्र, पूषा और भगदेव के लिए प्रवाहित हों॥१॥ |
| हे सोम ! श्रेष्ठ ज्ञान एवं बल प्राप्त करने के लिए इन्द्रदेव सहित सभी देव निष्पन्न (सोम) रस का पान करें॥२॥ |
| हे सोमदेव ! प्रकाशमान, दिव्य लोक में देवों के सेवनार्थ प्रकट हुए, आप अमरत्व तक पहुँचने के लिए गतिशील हों॥३॥ |
| हे सोमदेव ! विस्तृत समुद्र के समान पोषण करने वाले आप देवों के सभी आवास स्थल रूपी पात्रों में विद्यमान रहते हैं॥४॥ |
| हे कान्तिमान् सोमदेव ! आप दिव्य गुणों के लिए प्रवाहित हों, जिससे आकाश, पृथ्वी तथा प्रजाओं (समस्त जीव-जगत् ) को सुख प्राप्त हो ॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप तेजस्वी पेय तथा दिव्य गुणों के धारक हैं । हे बलवान् सोम ! आप सत्य रूप यज्ञकर्मा के बीच परिष्कृत होते चलें॥६॥ |
| हे सोमदेव ! प्रकाशयुक्त, भली-भाँति सरल धारा से पात्र में गिरते हुए, आप पूर्ववत् श्रेष्ठ ही हैं । आप पात्र में स्वत: ही प्रवाहित हों॥७॥ |
| वह सोम याजकों के द्वारा निचोड़ कर पवित्र, आनन्दमय तथा सर्वज्ञ रूप में प्रकट किया गया है । वह हमें नाना प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करे॥८॥ |
| वह ऊन की छलनी से छाना गया पवित्र तथा तेजस्वी सोमरस हमें प्रज्ञायुक्त सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त कराये॥९॥ |
| हे सोमदेव ! अश्व के समान (प्रयासपूर्वक) स्वच्छ किये गए , शक्तिवर्द्धक आप बल एवं ऐश्वर्य को प्रदान करने के लिए पात्रों में स्थिर रहें॥१०॥ |
| हे सोमदेव ! साधकगण आपके रस को हर्षवर्द्धन के लिए शोधित करते हैं। हम आपको दिव्य तेज रूपी ज्ञान के लिए परिशोधित करते हैं॥११॥ |
| नवजात शिशु को शुद्ध करने के सदृश ऋत्विग्गण, हरिताभ दीप्तिमान् सोम को देवों के निमित्त छन्ने से शोधित करते हैं॥१२॥ |
| श्रेष्ठ ज्ञान-सम्पन्न यह सौम सम्पत्ति युक्त हर्ष की प्राप्ति के लिए जल से संयुक्त किया जाता है॥१३॥ |
| जिस शरीर से इन्द्रदेव ने सभी पापी राक्षसों का संहार किया, यह सोम उनके उस कल्याणकारी शरीर को धारण करता है॥१४॥ |
| याजकों द्वारा निचोड़कर निकाले गये, गाय के दूध में मिश्रित सोमरस का सभी देवगण पान करते हैं॥१५॥ |
| बलयुक्त और अनेक धाराओं से छाना जाने वाला सोम ऊन के शोधक( छत्रे) से छनकर टपकता हैं॥१६॥ |
| बलशाली, जल से शोधित, गोदुग्ध आदि से मिश्रित वह सोम छनता हुआ ( पात्र में ) जाता है॥१७॥ |
| पाषाणों से कूटकर निष्पादित ऋत्विजों द्वारा विधिपूर्वक पवित्र किये गये हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के उदर (रूपकलश) में प्रविष्ट हों॥१८॥ |
| हजारों धाराओं से प्रवाहित होने वाला, छलनी से शोधित हुआ, बलशाली, ज्ञानवान् सोमरस इन्द्रदेव के निमित्त तैयार किया जाता है॥१९॥ |
| इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए, सुख की वृष्टि करने वाले सोमरस को याजकगण गाय के मधुर दूध से मिश्रित करते हैं॥२०॥ |
| हे सोमदेव ! आपके जल मिश्रित, हरिताभ रस को याजकगण देवों के निमित्त शोधित करते हैं॥२१॥ |
| इस बलशाली सोम को तप से तपाकर इन्द्रदेव के लिए भली-भाँति शोधित किया जाता है । इस सोमरस को शोधित करते समय जल में मिश्रित किया जाता है॥२२॥ |
सूक्त-११०
| हे सोमदेव ! आप अन्न प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ विधि से कलश में अवस्थित रहें । हमें ऋणों से विमुक्त करने वाले आप शत्रुओं को परास्त करने के लिए उन पर भाक्रमण करने जाएँ॥१॥ |
| हे सोमदेव ! रस निचोड़ने के बाद हम आपकी विधिपूर्वक अर्चना करते हैं । हे शोधित सोम ! श्रेष्ठ राजा के रक्षण के निमित्त, शक्तिशाली होकर आप विरोधी सेना पर आक्रमण करने के लिए गमन करते हैं॥२॥ |
| हे दिव्य सोमदेव ! आप किरणों के माध्यम से अंतरिक्ष और पृथ्वी लोक में जीवन को गतिशील बनाने वाले हैं। आपने अपनी क्षमता से जल को धारण करने वाले आकाश से ऊपर सूर्यदेव को उत्पन्न किया॥३॥ |
| हे अमृत रूपी सोमदेव ! आपने सत्य एवं कल्याणकारी अमृत तत्त्व को धारण करके अन्तरिक्ष लोक में सूर्यदेव को मानवों के निमित्त प्रादुर्भूत किया तथा देवगणों की सेवा की । आप अन्न आदि वैभव के लिए नित्य सक्रिय रहते हैं॥४॥ |
| हे सोमदेव ! जिस प्रकार (कोई समर्थ व्यक्ति) हाथों - अँगुलियों से प्रजाजनों के पीने के लिए अक्षय जल स्रोत उपलब्ध कराता है, (उसी प्रकार) आप अन्नदायक रूप में छत्रे से नीचे आते हैं॥५॥ |
| कालान्तर में, जब तक सर्वग्राही अंधकार का निवारण नहीं कर देते, (तब तक) इस (सोम) के द्रष्टा वसुरूप भाई की तरह हम इस सौम की स्तुति करते हैं॥६॥ |
| हे सोमदेव ! प्रधान ऋत्विज् श्रेष्ठ बल एवं (पोषण) अन्न के निमित्ते आपके विषय में श्रेष्ठ विचार से पूर्ण (आश्वस्त) हैं । हे वीर सोमदेव ! आप हमें वीरता की प्राप्ति के लिए प्रेरित करें॥७॥ |
| सबसे पहले यह स्तुत्य (सोमरस) अमृत, सर्वोच्च एवं सुविस्तृत द्युलोक से प्रकट होता है, तदनन्तर इन्द्रदेव के समक्ष याजकगण सोम की सस्वर स्तुति करते हैं॥८॥ |
| हे शोधित सोमदेव ! गौओं के समूह में अवस्थित वृषभ के समान (आप) द्युलोक, पृथ्वीलोक एवं सम्पूर्ण प्राणियों के मध्य विद्यमान रहते हैं॥९॥ |
| यह सोम हजारों धाराओं से छलनी से प्रवाहित होते हुए बच्चों के समान क्रीड़ा करता हुआ असीम सामथ्र्यो से युक्त तथा तेजस्वी रूप में कलश में पहुँचता हैं॥१०॥ |
| यह शोधित सोमरस मधुर, सुखद तथा सत्य से युक्त धाराओं के रूप में इन्द्रदेव के निमित्त अन्न, धन तथा आयु प्रदान करते हुए प्रवाहित होता है॥११॥ |
| हे सोमदेव ! आप युद्ध के इच्छुक शत्रुओं को पराजित करते हुए दुष्ट भावों वाले, कठिनता से वश में आने वाले राक्षसों का संहार करें । आप उत्तम अस्त्र-शस्त्रों से युक्त होकर शत्रुओं को विनष्ट करते हुए प्रवाहित हों॥१२॥ |
सूक्त-१११
| हरिताभ शोधित सोमरस अपने तेज से शत्रुओं का नाश करता है । अन्धकार को दूर करने वाली सूर्य रश्मियों जैसी इस सोमरस की उत्तम दिखाई पड़ने वाली धार चमकती है । शोधित हरिताभ सोमरस भी चमकता है, जो प्रकाश के सात मुखों (सतरंगी किरणों) के तेज तथा स्तोत्रों से अनेक रूप धारण करता है॥१॥ |
| हे सोमदेव ! आपने व्यापारियों से धन-सम्पदा उपलब्ध की । यज्ञ के आधारभूत जल से यज्ञस्थल में भली प्रकार आप पवित्र होते हैं । आनन्दित हुए याजकगणों के स्थान (यज्ञ स्थल) से गूंजने वाले सामगान दूर से ही सुनाई पड़ते हैं। तीनों स्थानों (पृथ्वी, अन्तरिक्ष एवं द्युलोक) पर देदीप्यमान हे सोमदेव ! आप याजकों को सुनिश्चित रूप से (पोषक) अन्न प्रदान करते हैं॥२॥ |
| हे सर्वज्ञ सोमदेव ! जब आप पूर्व दिशा में प्रस्थान करते हैं, तब दिव्य और दर्शनीय आपका रथ रश्मियों के प्रभाव से और अधिक तेजस्वी दिखाई देता है । पुरुषार्थवर्द्धक स्तोत्र इन्द्रदेव तक पहुँचते हैं, जिनसे स्तोतागण विजय के लिए उन्हें प्रसन्न करते हैं और वे (उसके प्रभाव से) वज्र प्राप्त करते हैं । हे सोम और इन्द्रदेव ! तब आप आपसी सहयोग की स्थिति में युद्ध में पराजित नहीं होते॥३॥ |
सूक्त-११२
| जिस प्रकार शिल्पी लकड़ी के काम की इच्छा करता है, जिस प्रकार वैद्य रोगी की कामना करती हैं, जिस प्रकार ज्ञानवान् याज्ञिक यजमान की कामना करता है, इसी प्रकार हमारी बुद्धियाँ नाना प्रकार की कामना वाली हैं, मनुष्य के कर्म भी विविध प्रकार के हैं । हे तेजस्वी सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित हों॥१॥ |
| पुरानी परिपक्व लकड़ी, पक्षियों के पंख तथा तीक्ष्ण शिला खण्डों से बाण बनाने वाला शिल्पी जिस प्रकार धनी (साधन-सम्पन्न) व्यक्ति की कामना करता है, उसी प्रकार हम सोम के प्रवाहित होने की कामना करते हैं । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए प्रवाहित हों॥२॥ |
| हम उत्तम शिल्पों का सम्पादन करने वाले हैं। हमारे पिता तथा पुत्र चिकित्सक हैं। माता तथा कन्या जौ पीसने का कार्य करती हैं। हम सभी भिन्न-भिन्न कार्य करने वाले हैं, फिर भी गौओं की जिस तरह गोपालक सेवा करते हैं, उसी प्रकार हे सोमदेव ! हम आपकी सेवा करते हैं। आप इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित हों॥३॥ |
| जिस प्रकार भारवाहक अश्व अच्छे रथ की कामना करता हैं, मित्र हास-परिहास की कामना करते हैं, कामी व्यक्ति नारी की कामना करता है, मेढक जलमय तालाब की कामना करता है, उसी प्रकार हम सोम की कामना करते हैं । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित हों॥४॥ |
सूक्त-११३
| महान् पराक्रमी, वृत्रहन्ता इन्द्रदेव अपने में श्रेष्ठ बल धारण करते हुए शर्यणावत् सरोवर में स्थित सोम का पान करें । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के निमित्त धारा रूप में प्रवाहित हों॥१॥ |
| समस्तं दिशाओं के स्वामी, कामनाओं की पूर्ति करने वाले हे सोमदेव ! सत्य का पालन करने वाले याजकों ने पवित्र स्तोत्रों से श्रद्धा तथा तप से युक्त होकर आपका पूजन किया है, अत: आप आजक देश से प्रवाहित हों। हे तेजस्वी सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित हों॥२॥ |
| सूर्य की पुत्री ( उषा ) द्वारा वर्षा के जल से विस्तृत हुआ वह महान् सोम अन्तरिक्ष से लाया गया है। उसे वसुओं ने ग्रहण करके सोमवल्ली में स्थापित किया है । हे तेजस्वी सोमदेव ! आप इन्द्रदेव की प्रसन्नता के निमित्त प्रवाहित हों॥३॥ |
| वह सोम सत्य कान्ति से युक्त तथा सत्य कर्म कारक है । हे तेजस्वी सोमदेव ! सत्य कर्म करते हुए, श्रद्धा युक्त सत्य वचन बोलते हुए तथा याजक द्वारा शोधित होकर आप राजा इन्द्रदेव के लिए रस प्रवाहित करें॥४॥ |
| सर्वोपरि सत्य के उद्घाटक महान् सोमरस की धाराएँ भली प्रकार एक साथ बह रही हैं। हे हरिताभ सोमदेव ! ब्रह्मपरायणों के द्वारा शोधित होकर आप इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित हों॥५॥ |
| सोमरस से देवगणों को आनन्दित करने वाला ब्राह्मण, छन्दों से बनाये स्तोत्रों का उच्चारण करते हुए पत्थरों से कूटकर निकाले गये सोमरस की जहाँ पूजा करता है, हे सोम ! वहाँ इन्द्रदेव के निमित्त आप रस प्रवाहित करें॥६॥ |
| हे पवित्र सोमदेव ! जिस लोक में सूर्यदेव के अखण्ड तेज का सुख प्राप्त होता है; उस मृत्युरहित, विनाश रहित लोक में आप हमें रखें । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित हों॥७॥ |
| जहाँ विवस्वान् को पुत्र राजा हैं । जहाँ बड़ी-बड़ी नदियाँ प्रवाहित होती हैं, जहाँ स्वर्ग का द्वार हैं, उस लोक में आप हमें अमरत्व प्रदान करें । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित हों॥८॥ |
| जिस श्रेष्ठ तीसरे लोक (अन्तरिक्ष में सूर्यदेव अपनी इच्छा के अनुसार गतिशील हैं, जहाँ की प्रजा तेजस्वी है, वहाँ आप हमें अमरत्व प्रदान करें । हे सोमदेव ! इन्द्रदेव के निमित्त आप प्रवाहित हों॥९॥ |
| जहाँ सब प्रकार की अभिलाषाएँ पूर्ण हों , जहाँ सुख प्रदान करने वाला तथा तृप्तिकारक अन्न है, जहाँ प्रतापी सूर्यदेव का स्थान है, वहाँ आप हमें अमरत्व प्रदान करें । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के निमित्त प्रवाहित हों॥१०॥ |
| जिस लोक में ऋद्धियों तथा आनन्द का वास है, जहाँ हर्षदायी सम्पदाएँ और ऐश्वर्य हैं, जहाँ सारी कामनाओं की पूर्ति होती है, वहाँ आप हमें अमरत्व प्रदान करें। है सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए प्रवाहित हों॥११॥ |
सूक्त-११४
| जो पवित्र तेजस्वी सोम के कार्यों का अनुगमन करता है, जो पवित्र सोम के चित्त के अनुकूल आचरण करता है; उसे श्रेष्ठ सन्तति से युक्त गृह स्वामी कहते हैं । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए प्रवाहित हों॥१॥ |
| हे मन्त्रों के द्रष्टा कश्यप ऋषे ! आप उस सोम की पूजा करें, जो स्तुति युक्त वाणी से विस्तार पाता है, जो ओषधियों के समान प्रजापालक है। हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए प्रवाहित हों॥२॥ |
| सूर्यदेव को आश्रय प्रदान करने वाली सात दिशाओं, सात याज्ञिकों तथा सात आदित्यों के साथ हे सोमदेव ! आप हमें संरक्षण प्रदान करें । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए प्रवाहित हों॥३॥ |
| हे राजा सोमदेव ! आपके लिए जिस हविष्यान्न को तैयार किया गया है, उसके द्वारा हमारा पोषण करें । कोई भी शत्रु हमें हिसित न करे तथा हमारे किसी भी पदार्थ का कोई शत्रु अपहरण न करे । हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए प्रवाहित हों॥४॥ |

