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| Rigveda | Gyan Dhyan Sanskar |
सूक्त - १
| प्रभात वेला में सर्वप्रथम अग्निदेव ऊर्ध्वमुखी (प्रज्वलित) होकर (यज्ञ में ) स्थित होते हैं। वे अन्धकार को दूर करके, तेजोमय होकर आगे आते हैं तथा अपने श्रेष्ठ तेज से सभी स्थानों को प्रकाशित करते हैं॥१॥ |
| ये अग्निदेव द्यावा -पृथिवी के गर्भ में (गुप्त रूप से) रहते हैं । ओषधियों (अथवा काष्ठादि) से जन्म लेकर सुन्दर स्थानों पर प्रतिष्ठित होते हैं । अन्धकार को परास्त करते हैं तथा शिशु की तरह शब्द करते हुए माताओं (समिधाओं अथवा द्यावा-पृथिवी) के पास जाते हैं॥२॥ |
| इस प्रकार (ऊपर के मंत्र के अनुसार ) ये विद्वान् विष्णु (पोषणकर्ता) देव जन्म लेकर, वृद्धि पाकर इस तृतीय (त्रित ऋषि अथवा तीसरे लोक-द्युलोक) क्रा पालन करते हैं । उनके मुख से उत्पन्न पय (पोषक रस) की अभिलाषा करते हुए यहाँ ( यज्ञ में) याजक उनकी अर्चना करते हैं॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! आप विश्व के पालक, ओषधियों और अन्नों के उत्पादनकर्ता तथा सूखे काष्ठों की ओर गमनशील हैं आप ही मानव सभ्यता (प्रजाओं) के लिए यज्ञ- निष्पादक हैं। अन्न वृद्धि के लिए हम हविष्यान्न समर्पित करते हुए आपकी अर्चना करते हैं॥४॥ |
| यज्ञीय कार्यों में पताका रूप, दीप्तिमान् देवताओं का आवाहन करने वाले, सबके स्वामी, यजमानों के लिए वन्दनीय, इन्द्रदेव के समीप पहुँचाने वाले अग्निदेव की, हम उत्तम ऐश्वर्य प्राप्ति के निमित्त स्तुति करते हैं॥५॥ |
| हे देदीप्यमान अग्निदेव ! आप पृथ्वी के नाभिस्थल पर स्वर्ण के सदृश दीप्तिमान् होकर तेजस्विता को धारण करते हुए प्रादुर्भूत होते हैं। आप यज्ञ स्थल पर उत्तर वेदी में स्थापित होकर अपनी तेजस्विता से शोभायमान होते हुए हमारे द्वारा देवशक्तियों के लिए समर्पित हविष्यान्न ग्रहण करें॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! आप दिव्यलोक और पृथ्वीलोक को उसी प्रकार व्यापक विस्तार प्रदान करते हैं, जिस प्रकार पुत्र, माता-पिता को धनादि से सुखी करते हैं। हे तरुण पुत्र ! आप यथोचित सहयोगार्थ माता- पिता के समीप जाएँ और उनकी सहायता करें । हे शक्तिमान् अग्ने ! हमारे इस यज्ञ में आप इन्द्रादि देवताओं को भी ले आएँ॥७॥ |
सूक्त - २
| सबके लिए कल्याणकारी, नित्य नवीन रूपवान् हे अग्निदेव ! आप कामनापूर्ति करने वाले देवताओं को प्रशंसित करें । हे ऋतुओं के ज्ञाता अग्निदेव ! आप ऋतुओं के अनुसार ही दिव्यज्ञान - सम्पन्न त्वजों के सहयोग से यज्ञ सम्पन्न करें, क्योंकि आप ही होताओं के बीच में सर्वश्रेष्ठ हैं॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! मनुष्यों के यज्ञ को चाहने वाले आप होता (आवाहन कर्ता), पोता (पवित्र कर्ता), बुद्धिमान् , ऋत (सत्य या यज्ञ) के संरक्षक एवं दाता हैं। हम हव्य पदार्थों से स्वाहाकार करते हैं, आप पूजित होकर देवों का सत्कार करें॥२॥ |
| हम अपनी सामर्थ्यानुसार देवत्व के उच्च लक्ष्य की ओर गतिमान् हों । हमारा वह ( देवमार्ग की ओर बढ़ाने का ) कार्य अनुकूलतापूर्वक पूर्ण हो । मनुष्यों के लिए यज्ञों के सम्पादक अग्निदेव ऋतुओं के अनुसार यज्ञों को सम्पन्न करें। वे देवताओं के निमित्त आहुतियों का सेवन करते हैं॥३॥ |
| हे देवो ! हम ज्ञानरहित मनुष्यों ने अज्ञानतावश व्रतों ( प्राकृतिक मर्यादाओं) को भंग किया हैं। इससे परिचित अग्निदेव उन ऋतुओं या यज्ञीय भावनाओं को हमारे अन्दर परिपूर्ण करें, जिनसे वे देवताओं को प्रसन्न करते हैं॥४॥ |
| अज्ञानग्रस्त मनुष्य मानसिक परिपक्वता लाने वाली विधि (यज्ञीय कर्मों) से अनभिज्ञ रहते हैं, परन्तु उस विधि के विशेषज्ञ अग्निदेव इस विधा से भली प्रकार परिचित हैं । वे ऋतुओं के अनुसार (विधि-विधानपूर्वक) देवताओं के निमित्त यज्ञ करके हमें सुख और आरोग्य प्रदान करते हैं ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! आप सभी यज्ञों के अग्रणी तथा इच्छित विशिष्ट ज्ञान के उत्पादनकर्ता हैं । आप प्रजापति द्वारा उत्पन्न किए गये हैं। ऐसे आप स्तवनों से युक्त, सबके लिए कल्याणकारी हविष्यान्न देवताओं को प्रदान करें॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! आपको श्रेष्ठ सृजेता प्रजापति ने द्युलोक में सूर्यरूप, पृथ्वी में वैश्वानररूप, जल में बड़वानल रूप तथा मेघों में स्थित विद्युत्रूप में सर्वत्र संव्याप्त किया है । आप पितरों के गमन मार्ग से भली प्रकार परिचित होते हुए, समिधाओं से तेजस्विता युक्त होकर विशेष रूप से प्रकाशित हों॥७॥ |
सूक्त - ३
| हे अग्निदेव ! आप सबके स्वामी, दिव्य गुणों से युक्त, देदीप्यमान , शत्रुओं के लिए भयंकर, उपासकों को इच्छित पदार्थ प्रदान करने वाले, सब प्रकार से शक्ति को विकसित करने वाले हैं, ऐसा अनुभव किया गया है । सर्वज्ञाता आप प्रदीप्त होकर अपने प्रकाश को सर्वत्र फैलाते हुए निशाकाल में प्रकट होते हैं॥१॥ |
| ये अग्निदेव पिता रूप सूर्य से उत्पन्न होकर, उषाकाल में प्रकट होकर, अँधेरी रात को अपनी ज्वालाओं से परास्त करते हैं। उस समय गतिशील अग्निदेव द्युलोक में सूर्य की दीप्ति को ऊपर ही स्थापित करके स्वयं भी प्रकाशित होते हैं॥२॥ |
| हितकारक अग्निदेव कल्याणकारिणी उषा द्वारा सेवित होकर प्रदीप्त होते हैं। रिपुनाशक अग्निदेव अपनी बहिन उषा के पास जाते हैं। अपनी तेजस्विता के प्रभाव से सर्वत्र विचरणशील वे जाज्वल्यमान लपटों से रात्रि के अंधेरे को नष्ट करके प्रतिष्ठित होते हैं॥३॥ |
| अग्निदेव की , प्रज्वलित होकर गमन करने वाली ज्वालारूपी किरणें स्तोताओं के लिए हानिरहित होती हैं। ये स्तोत्रों को प्राप्त, सौख्यप्रद, कल्याणकारिणी किरणें श्रेष्ठ, दर्शनीय तथा अन्धकार को दूर करने वाली हैं । वे शक्तिवर्द्धक और देदीप्यमान किरणें यज्ञस्थल में अग्नि के प्रकाश को फैलाती हैं॥४॥ |
| अग्निदेव की प्रज्वलित , विशाल, तेजस्वी, ज्वालारूपी किरणें शब्दों के संव्याप्त होने के समान ही सर्वत्र अपनी आभा बिखेर रहीं हैं। वे अग्निदेव अपनी उत्तम, विस्तृत, तेजस्वी, वायु के प्रभाव से क्रीड़ा करती हुई किरणों के माध्यम से दिव्यलोक को संव्याप्त करते हैं॥५॥ |
| दर्शन योग्य तेजस्वी अग्निदेव हवियों को देवताओं की ओर ले जाते हैं । इनकी सामर्थ्यशाली, विकारनाशक किरणें वायु के माध्यम से शब्दायमान होती हैं । गतिशील, ऐश्वर्य - सम्पन्न, महिमायुक्त, शाश्वत काल से तेजस् - सम्पन्न, शब्द करने वाले, उज्ज्वल वर्णयुक्त तथा देवों में प्रमुख ये अग्निदेव अपनी आभा से प्रकाशमान होते हैं॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! आप हमारे यज्ञ में सभी महान् देवों के साथ आगमन करें । द्युलोक और पृथ्वी के बीच में सूर्य के रूप में गमनशील आप यज्ञ में विराजमान हों । यजमानों के लिए सुगमतापूर्वक प्राप्य गमनशील अग्निदेव शीघ्रगामी वायुरूप अश्वों के सहयोग से हमारे यज्ञ में उपस्थित हों॥७॥ |
सूक्त - ४
| हे अग्निदेव ! हम मननीय स्तोत्रों को उच्चारण करते हुए, आपके निमित्त आहुतियाँ प्रदान करते हैं। हमारे आवाहन को सुनकर, आप यज्ञ स्थल पर विशेष रूप से विराजमान हों । हे प्राचीन दीप्तिमान् अग्निदेव ! आप याज्ञिक मनुष्यों के लिए मरुस्थल में जल उपलब्ध होने के सदृश ही शान्तिप्रद हों॥१॥ |
| नित्य युवा बलिष्ठ हे अग्निदेव ! जिस प्रकार गौएँ ठंड से बेचैन होकर गोष्ठ (गोशाला) में आश्रय लेती हैं, वैसे ही मनुष्य भी यज्ञरूप आपको आश्रय लेते हैं । आप देवताओं - मनुष्यों के सन्देशवाहक हैं । महिमामय आप द्युलोक और पृथ्वी लोक दोनों के बीच हवि वहन करते हुए अन्तरिक्ष में प्रकाशमान होकर संचरित होते हैं॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! जिस प्रकार माता, पुत्र की पुष्टता के लिए उसे अपने सानिध्य में रखने की इच्छुक होती हैं, उसी प्रकार धरतीमाता विजयशील आपको संवर्धित करके सान्निध्य की कामना से धारण करती है । आप अन्तरिक्ष के विशाल मार्ग से नीचे के लोकों में उसी प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार बन्धन - युक्त पशु गोष्ठ में जाने को प्रेरित होते हैं तथा उसमें पहुँचते हैं॥३॥ |
| ज्ञानवान् हे अग्निदेव ! हम अज्ञानग्रस्त मनुष्य आपकी महिमा से अनभिज्ञ हैं। हे चैतन्य अग्निदेव ! आप स्वयं ही अपनी महिमा के ज्ञाता हैं, आप साकार होकर निश्चिन्त शयन करते हैं तथा ज्वाला रूपी जिह्वा से हविष्यान्न को ग्रहण करके विचरण करते हैं। आप प्रजाजनों के अधिपति रूप.राजा के समान ही अपनी पत्नीरूपा आहुति को ग्रहण करते हैं॥४॥ |
| नूतन अग्निदेव सूखी वनस्पतियों ( समिधाओं) में प्रतिदिन कहीं भी प्रकट हो जाते हैं । ये धूम्रयुक्त पताका वाले, पिंगल वर्ण, तेजस्विता से जंगल में स्थित हैं। बिना सान के ही शुद्ध हुए वे अग्निदेव जंगल में जल की ओर उसी प्रकार जाते हैं, जैसे तृषित वृषभ जलाशय की ओर गमन करता है - ऐसे अग्निदेव को श्रेष्ठ, जागरूक याजक यज्ञवेदी पर प्रतिष्ठित करते हैं ॥५॥ |
| जिस प्रकार वन में विचरण करने (शरीर का मोह न करने वाले दो तस्कर दसों रस्सियों से (अपनी पकड़ में आने वालों को) बाँधते हैं। हे अग्निदेव ! (उसी प्रकार) आपकी (आपके निमित्त) ये नवीन स्तुतियाँ रथ की तरह आपके तेज को धारण करें॥६॥ |
| हे सर्वज्ञाता अग्निदेव ! हमारे द्वारा आपका स्तुतिगान किया गया । ये स्तोत्र आपके लिए ही वन्दना के साथ समर्पित किए गए हैं। ये स्तोत्र आपकी महिमा को सदैव बढ़ाने वाले (विस्तृत करने वाले) सिद्ध हों । हे तेजस्वी अग्निदेव ! आप हमें संरक्षण प्रदान करें, साथ ही हमारे परिजनों को भी पूर्ण संरक्षण प्रदान करें॥७॥ |
सूक्त - ५
| वे अद्वितीय अग्निदेव समुद्र के समान विशाल आधार एवं सभी ऐश्वर्यों के धारणकर्ता हैं । वे विविध रूपों में उत्पन्न होने वाली हमारी हार्दिक अभिलाषाओं के ज्ञाता हैं। वे अग्निदेव आकाश और पृथ्वी के बीच अन्तरिक्ष में स्थित हैं और विद्युत् के रूप में मेघमण्डल में संचरित होते हैं॥१॥ |
| समान नीड़ (आवास) में वास करने वाले बलवान् (पुरुष) महान् चंचल (लपटों या अश्वों) से युक्त (सम्पन्न) होते हैं। कवि (दूरदर्शी लोग) गुहा (हृदय स्थलों में (अग्नि के) अन्य (अप्रचलित) नामों को धारण करते हैं, (इस प्रकार) वे (अग्निदेव) यज्ञ के चरणों ( अनुशासनों) की रक्षा करते हैं॥२॥ |
| अन्न, तेज, सत्य और ऐश्वर्य से सम्पन्न द्यावा - पृथिवी अग्नि को धारण करते हैं । शिशु रूप अग्नि को वे माता-पिता के समान ही काल-परिमाण (समय-सीमा में प्रादुर्भूत करते हैं । समस्त जड़ और चेतन संसार के नाभिरूप ज्ञानवान् व्यापक अग्निदेव का गुणगान करते हुए हव्य समर्पित करते हैं॥३॥ |
| यज्ञादि कर्म करते हुए ऐश्वर्य की अभिलाषा करने वाले यजमान बल की प्राप्ति के लिए भली प्रकार प्रदीप्त अग्निदेव की अर्चना करते हैं । पृथ्वी और द्युलोक ने अग्नि, विद्युत् और सूर्य रूप से तीनों लोकों में स्थित अग्निदेव को मधु, घृत, जल तथा अन्न द्वारा संवर्धित किया॥४॥ |
| विद्वान् (अग्निदेव) ने उज्ज्वल, रमण योग्य सात भगिनी (सप्तवर्णी किरणों अथवा ज्वालाओं) को सहजता से सुखकारक समस्त पदार्थों को देखने के लिए प्रकट किया। इन (सप्तवर्णी किरणों) को पुरातन समय में उत्पन्न अग्निदेव ने द्युलोक और पृथ्वी के मध्य स्थापित किया था। प्रखर यजमानों की कामना से अग्निदेव ने (पर्जन्य वर्षा के रूप में) पृथ्वी को पोषक रस प्रदान किया॥५॥ |
| नीति-निर्धारकों ( विधिवेत्ताओं ने मनुष्यों के लिए सात मर्यादाओं को निर्धारित किया। उनमें से एक का भी जो उल्लङ्घन करते हैं, वे पापकर्मी कहलाते हैं। पाप रूपी दुष्कर्मों से मनुष्यों को बचाने वाले अग्निदेव हैं । वे अग्निदेव मनुष्यों के समीप यज्ञवेदी पर सूर्य रश्मियों के विचरण मार्ग तथा जल के मध्ये तीनों (पृथ्वी, द्यु एवं अन्तरिक्ष) लोकों में विराजमान होते हैं॥६॥ |
| (ये अग्नि) असत् (अव्यक्त) तथा सत् (व्यक्त) दोनों रूपों में परम व्योम में संव्याप्त हैं। इन दक्ष (कर्म कुशल) का जन्म अदिति (अखण्ड-एकात्म तत्त्व अथवा सूर्य) के अंक (अंतरिक्ष में हुआ । वे निश्चित रूप से हमसे एवं हमारे यज्ञ से पहले उत्पन्न हुए। प्रथम सृष्टि में वे ही वृषभ (गर्भ स्थापक) तथा वे ही धेनु (गर्भ धारक) रहे हैं॥७॥ |
सूक्त - ६
| ये वही अग्निदेव हैं, जिनकी संरक्षण शक्तियों से स्तुतिकर्ता अभीष्ट फलों को प्राप्त कर अपने सुख - सौभाग्य को बढ़ाते हैं । अग्निदेव श्रेष्ठ सूर्य किरणों के रूप में दीप्तिमान् तेज से चारों ओर प्रकाशित होकर सर्वत्र विचरण करते हैं॥१॥ |
| जो सत्य और नित्य-शाश्वत अग्निदेव, देवों की तेजस्विता से प्रकाशित होते हैं, वे ही गतिशील अश्व के समान सखारूप यजमानों के कल्याणकारी कार्यों को सम्पन्न करने के लिए निरन्तर उनके समीप पहुँचते हैं॥२॥ |
| सर्वत्र गतिशील अग्निदेव सम्पूर्ण विश्व में यज्ञीय कर्मों के अधिपति (स्वामी) हैं। सबके प्राणरूप वे उषा काल में सक्रिय ( पोषक प्रवाहों या यज्ञादि कर्मों के स्वामी हैं। अग्निदेव को साधकगण मानसिक भावनाओं के अनुरूप हविष्यान्न समर्पित करते हैं। उनका कल्याणकारी यज्ञरूप रथ ही अनिष्टकारी शक्तियों के कुप्रभाव को रोकते हुए विश्व - व्यवस्था को संचालित करने का माध्यम है॥३॥ |
| अनेक शक्तियों से संवर्द्धित, स्तोत्रों से स्तुत्य अग्निदेव अपने शीघ्रगामी रथों से देवों के समीप पहुँचते हैं। वे स्तुत्य, देवावाहक, वाणी द्वारा यजन योग्य अग्निदेव देवताओं द्वारा नियुक्त हैं। वे ही सबके सहयोगी रूप में देवताओं के निमित्त हविष्यान्न को समर्पित करते हैं॥४॥ |
| हे ऋत्विजो ! महान् ऐश्वर्य एवं विभिन्न साधनों के प्रदाता देदीप्यमान अग्निदेव को इन्द्रदेव के सदृश ही प्रार्थनाओं और आहुतियों द्वारा अपने समक्ष प्रकट करो। मेधावीजन, शत्रुपराभवकारी देवों का आवाहन करने वाले जातवेदा अग्निदेव की आदरपूर्वक स्तुति करते हैं (जिससे उनकी कृपा प्राप्त हो सके)॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! जिस प्रकार तीव्र गतिशील अश्व समर क्षेत्र ( युद्ध भूमि) में इकट्टे होते हैं, उसी प्रकार संसार की समस्त सम्पदाएँ आपके अधीनस्थ होकर आपकी ओर जाती हैं ( आपमें संगृहीत होती हैं)। हे अग्निदेव ! आप हमारे निमित्त पराक्रमी इन्द्रदेव से उपलब्ध नवीन संरक्षण - साधन प्रदान करें॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! आप उत्पन्न होने के साथ ही महिमायुक्त होकर शीघ्रता से प्रज्वलित होते हैं तथा यज्ञस्थल में आहुतियों का सेवन करते हैं। अतएव सभी देवगण आपको देखते ही अनुगमन करते हैं तथा श्रेष्ठ लोग आपसे संरक्षित होकर उत्कर्ष प्राप्त करते हैं॥७॥ |
सूक्त - ७
| हे दिव्यगुण सम्पन्न अग्निदेव ! दिव्यलोक और पृथ्वी से आप हमारे यज्ञ के लिए सम्पूर्ण कल्याणकारी अन्नों को प्रदान करें । हम आपके निमित्त यज्ञीय भाव से साधन अर्पित करें । हे अद्वितीय अग्निदेव ! आप अपनी विशिष्ट ज्ञान - सम्पदा तथा श्रेष्ठ संरक्षण - सामथ्र्यों से हमारा संरक्षण करते हैं॥१॥ |
| हे. अग्निदेव ! ये स्तोत्र आपके निमित्त ही उच्चारित किये गये हैं। हमारे लिये जो गौओं और अश्वों से युक्त धन आपके द्वारा भेंट किया गया है, उसमें भी आपकी ही महिमा है । आप मनुष्यों को उपभोग्य धन-सम्पदा प्रदान करते हैं । हे श्रेष्ठ गुण - सम्पन्न ऐश्वर्यदाता ! आपके प्रति हम प्रार्थनाएँ समर्पित करते हैं॥२॥ |
| हम अग्निदेव को ही संरक्षक रूप पिता, सहायक रूप बन्धु तथा हमेशा से ही अपना हितैषी-मित्र स्वीकार करते रहे हैं। हम महिमायुक्त अग्निदेव की यज्ञस्थल पर उसी प्रकार अर्चना करते हैं, जिस प्रकार दिव्यलोक स्थित, पूजनीय, प्रकाशमान सूर्य मण्डल की लोग उपासना करते हैं॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! हमारी बुद्धियाँ ( प्रार्थनाएँ) अभीष्ट फलों की प्राप्ति में सहायक सिद्ध हों । होतारूप आप जिन्हें अपने नियन्त्रण एवं संरक्षण में रखते हैं, ऐसे हम आपके सान्निध्य में रहकर यज्ञमय जीवन जिये । हम अश्वादि से युक्त धन तथा प्रचुर सम्पदा के स्वामी बनें । हमें ऐश्वर्यशाली दिनों में हविष्यान्न समर्पित करने का लाभ मिले॥४॥ |
| तेजोमय, मित्रतुल्य, पुतिन, ऋत्विज्रूप, हिंसारहित, यज्ञसम्पन्न कर्ता अग्निदेव को याज्ञिकों ने अपने हाथों से प्रादुर्भूत किया । मनुष्यों ने देवों के आवाहक और यज्ञ के निमित्त अग्नि को प्रजाजनों के मध्य प्रतिष्ठित किया॥५॥ |
| हे तेजस्- सम्पन्न अग्निदेव ! आप दिव्यलोक में स्थित देवताओं के लिए स्वयं यजन करें । मन्द बुद्धि और अबोध मनुष्य आपके बिना कुछ भी करने में सक्षम नहीं । हे श्रेष्ठ जन्मा अग्निदेव ! जिस प्रकार आप समय-समय पर देवताओं के निमित्त यजन करते हैं, उसी प्रकार इस समय भी करें॥६॥ |
| हे ज्ञानी अग्निदेव ! आप प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में सभी दुःखों से हमारी रक्षा करें । आप हमारे लिये अन्न के उत्पादनकर्ता और दातारूप भी बनें । हे पूजनीय अग्निदेव ! आप हमारे लिए यज्ञ करने की सामग्री प्रदान करें तथा हमारे शरीर को आलस्य , प्रमादादि से बचाएँ॥७॥ |
सूक्त - ८
| वे अग्निदेव धूम्ररूप विशाल पताका से युक्त होकर द्युलोक और पृथ्वी में संव्याप्त होते हैं। वे देवों के आवाहन काल में वृषभ के समान शब्द करते हैं। वे द्युलोक के समीपस्थ प्रदेश में व्याप्त होते हैं तथा जल के आश्रय स्थान अन्तरिक्ष में विद्युत्रूप में संवर्द्धित होते हैं॥१॥ |
| महान् तेजस्वी और कामनाओं के वर्षक अग्निदेव आकाश और पृथ्वी के बीच प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। ये शब्दायमान अग्निदेव रात्रि और उषा के गर्भ से उत्पन्न होकर यज्ञीय सत्कर्मों का निर्वाह करते हैं । आप आवाहन योग्य स्थानों को उपलब्ध करते हुए यज्ञ में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित होते हैं॥२॥ |
| जो माता-पिता पृथ्वी-द्युलोक के शीर्ष (मस्तक) पर अपनी तेजस्विता को फैलाते हैं, उन बलवान् तेजस्वी अग्निदेव के तेज को यज्ञकर्ता अपने यज्ञ में प्रतिष्ठित करते हैं। अग्निदेव के यज्ञस्थल में व्याप्त होने,तेजस्-सम्पन्न होने तथा हविष्यान्नों से युक्त होने पर मेधावीजन उनकी अर्चना करते हैं॥३॥ |
| हे प्रशंसनीय अग्निदेव ! आप उष:काल से पहले ही यज्ञस्थल पर विराजमान होते हैं। आप दिवस-रात्रि दोनों को सुशोभित करते हैं। आप अपने तेज से सूर्यदेव को उत्पन्न करके यज्ञ के लिए सप्तकिरणों रूपी दिव्यता को धारण करते हैं॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आप महिमायुक्त यज्ञ अथवा सत्य के नेत्रों के प्रकाशक हैं । जब आप वरुण के रूप में यज्ञस्थल पर जाते हैं, उस समय आप ही उसका संरक्षण करते हैं । हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! आप ही जल के पौत्र रूप (जल से मेघ और मेघ से विद्युत् अथवा जल से काष्ठ एवं काष्ठ से अग्नि की उत्पत्ति के कारण) हैं। आप जिस याज्ञिक की हविष्य को स्वीकार करते हैं, उसके संदेशवाहक होकर देवों तक उसे पहुँचाते हैं॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! जब आप हविष्यान्न ग्रहण करने वाली अपनी जिह्वा रूपी ज्वालाओं को प्रदीप्त करते हैं, तब आप यज्ञ और फलश्रुति रूप पर्जन्य के प्रवर्तक (नायक) कहलाते हैं। जब आप कल्याण स्वरूप अश्वों के साथ प्राप्त होते हैं, तब दिव्यलोक में विराजमान आदित्य की शोभा को धारण करते हैं॥६॥ |
| त्रित् (त्रषि अथवा जीवात्मा) परम पिता (परमात्मा) से ही अंत:करण में क्रतु (यज्ञकर्म) की इच्छा करता है। पिता की गोद (अनुशासन) में स्थित होकर वह स्तुतियाँ करता हुआ, आयुधों ( जीवन समर के लिए प्रभावपूर्ण माध्यमों को प्राप्त करता है॥७॥ |
| पिता से आयुध प्राप्त करके उस विद्वान् आप्त्य (आप्त का पुत्र त्रित ऋषि अथवा सनातन चेतना से उत्पन्न जीव या अग्नि) ने प्रबल संग्राम किया। तीनशीर्ष ( तीन आयामों ) सप्त बन्धन (सप्त धातु) युक्त त्वष्टा पुत्र (देहाभिमान) का वध करके उस मित्र ने उसकी गौओं ( किरणों, वाणियों ) को संचरित किया॥८॥ |
| सत् के अधिपति इन्द्रदेव ने त्वष्टा के पुत्र भारी बलयुक्त , अभिमानी विश्वरूप (कोई भी रूप धारण करने में समर्थ मेघ या अहंकार) को विदीर्ण कर दिया। उसकी गौओं किरणों-शक्तियों) को अपने पास बुलाते हुए उसके तीनों शीर्षों का उच्छेदन कर दिया॥९॥ |
सूक्त - ९
| हे जलदेव ! आप सुखों के मूल स्रोत हैं । आप हमें पराक्रम से युक्त उत्तम कार्य करने के लिए पोषकरस (अन्न) प्रदान करें॥१॥ |
| हे जलदेव ! अपने अत्यन्त सुखकर पोषकरस को हमें सेवन करने दें । जैसे बच्चे को माताएँ अपने दुग्ध से पोषण देती हैं, वैसे ही आप हमें पोषित करें॥२॥ |
| हे जलदेव ! आपका वह कल्याणकारी रस हमें शीघ्रता से उपलब्ध हो, जिसके द्वारा आप सम्पूर्ण विश्व को तृप्त करते हैं। आप हमारे वंश को पोषण प्रदान कर उसे आगे बढ़ाएँ॥३॥ |
| हमें, सुख-शान्ति प्रदान करने वाला जल प्रवाह प्रकट हो । वह जल पीने योग्य, कल्याणकारी एवं सुखकर हो, मस्तक के ऊपर क्षरित होकर रोगों को हमसे दूर करे॥४॥ |
| जल प्रवाह ही मनुष्यों के इच्छित पदार्थों का स्वामी और प्राणिमात्र का आश्रयदाता (आश्रय स्थल) है । हम उस जल से ओषधियों में जीवन रस की कामना करते हैं॥५॥ |
| जलतत्त्व में सम्पूर्ण ओषधिरस और संसार के लिए सुखदायक अग्नितत्त्व भी विद्यमान है, ऐसा सोमदेव ने संकेत किया है॥६॥ |
| हे जलदेव ! हमारे शरीर के लिए आप संरक्षक ओषधियाँ प्रदान करें । जिनसे आरोग्य लाभ प्राप्त करके हम चिरकाल तक सूर्य दर्शन से कृतार्थ हों अर्थात् दीर्घायु को प्राप्त करें॥७॥ |
| हमारे अन्दर किसी के प्रति द्वेषभाव, आक्रोशवश मारण प्रयोग अथवा असत्य वाणी का प्रयोग आदि कोई विकार हो, तो हे जलदेव ! आप उन्हें पूर्णरूपेण समाप्त करके, हमें शुद्ध- पवित्र बनाएँ॥८॥ |
| आज हमने जल का आश्रय प्राप्त किया है तथा इस के रस से लाभान्वित हुए हैं । हे अग्निदेव ! आप जल में विद्यमान हैं। हमारे समीप आकर हमें अपनी तेजस्विता से परिपुष्ट करें॥९॥ |
सूक्त - १०
| (यमी ने कहा) हे यमदेव ! विशाल समुद्र (व्योम) के एकान्त प्रदेश में सख्य भाव या मित्र रूप से आपसे मैं मिलना चाहती हूँ । विधाता की इच्छा है कि नौका के समान संसार सागर में तैरने के लिए, पिता के नाती सदृश श्रेष्ठ सन्तति - प्रजननार्थ हम परस्पर संगत हों॥१॥ |
| (यम का कथन) हे यमी ! आपका सहयोगी यम आपके साथ इस प्रकार के सम्पर्क (सहयोग) की कामना से रहित है; क्योंकि आप सहोदरा बहिन हैं । हमें यह अभीष्ट नहीं । असुरों (शक्ति- सम्पन्न व्यक्तियों या तत्त्वों) के वीर पुत्र हैं, जो दिव्य लोकादि के धारणकर्ता हैं, वे सर्वत्र विचरण करते हैं। उनकी संगति हीं अभीष्ट है)॥२॥ |
| (यमी का कथन) हे यम ! यद्यपि मनुष्यों में ऐसा संयोग त्याज्य हैं, तो भी देवशक्तियाँ इस प्रकार के संसर्ग की इच्छुक होती हैं। मेरी इच्छा का अनुकरण आप भी करें । पतिरूप में आप ही हमारे लिए उपयुक्त हैं॥३॥ |
| (यम का कथन) हे यमों ! हमने पहले भी इस प्रकार का कृत्य नहीं किया; हम सत्यवादी हैं, असत्य वचन नहीं बोलते । अप् (सृष्टि का मूल तत्त्व) से ही गन्धर्व (धारण करने वाला-पिता) और अप् से ही योषा (नारी-माता) की उत्पत्ति हुई है, वे ही हम दोनों के उत्पादक हैं, यही हमारा विशिष्ट सम्बन्ध है, (जिसे हमें निभाना चाहिए)॥४॥ |
| (यमी का कथन) है यम ! सर्वप्रेरक और सर्वव्यापी उत्पादन कर्ता त्वष्टा (गढ़ने वाले देव ने हमें गर्भ में ही (एक साथ रहकर) दम्पति के रूप में सम्बद्ध किया है। उस प्रजापालक परमेश्वर की इच्छा (विधि- व्यवस्था) को रोकने में कोई सक्षम नहीं, हमारे इस सम्बन्ध का पृथ्वी और द्युलोक को भी परिचय है॥५॥ |
| हे यम ! इस प्रथम दिवस की बात से कौन परिचित है? इसे कौन देखता है ? इस पारस्परिक सम्बन्ध को कौन बतलाने में समर्थ है ? मित्र और वरुण देवों के इस महान् धाम में अध: पतन की बात आप किस प्रकार कहते हैं ?॥६॥ |
| पति के प्रति पत्नी के समर्पण के समान ही, तुम्हें अपने आपको सौंपती हूँ । एक ही स्थान पर साथ-साथ रहकर, कर्म करने की कामना मुझे प्राप्त हुई है । हम रथ के दो पहियों की तरह समान कार्यों में प्रेरित हों॥७॥ |
| (यम का कथन) हे यमी ! इस लोक में जो देवताओं के पार्षद हैं, वे रात- दिन विचरण करते हैं, वे कभी रुकते नहीं, उनकी दृष्टि से कुछ भी छुपाने की सामर्थ्य नहीं । हे आक्षेपकारिणि ! आप कृपया इस भावना से मेरे समीप से चली जाएँ और किसी दूसरे को पति रूप में वरण करें॥८॥ |
| (यमी का कथन) हे यम ! रात्रि और दिवस दोनों ही हमारी कामनाओं को पूर्ण करें, सूर्य का तेज यम के लिए तेजस्विता प्रदान करे । द्युलोक और पृथ्वी के समान ही हमारा सम्बन्ध अभिन्न साथी का है, अतएव यमी यम का साहचर्य प्राप्त करे, इसमें दोष नहीं है॥९॥ |
| (यम का कथन) हे यमी ! ऐसा समय भविष्य में आ सकता है, जिसमें बहनें बन्धुत्व भाव रहित भाइयों को ही पतिरूप में स्वीकार करें; किन्तु हे सौभाग्यवती ! आप मुझ से पतित्व सम्बन्ध की अपेक्षा न रखें । आप किसी दूसरे से सन्तानोत्पत्ति की इच्छा करें॥१०॥ |
| (यमी का कथन) हे यम ! वह कैसा भाई, जिसके रहते बहिन अनाथ फिरे ? वह कैसी बहिन, जो लाचार की तरह पलायन कर जाये? काम भावना से प्रेरित होकर मेरे द्वारा बहुत बात कही जा रही है, इसीलिए परस्पर काया को संयुक्त करो॥११॥ |
| (यम का कथन) हे यमी ! यह यथार्थ है कि मैं शारीरिक सम्बन्धों की इच्छा नहीं करता, क्योंकि भ्राता और बहिन का सम्बन्ध पवित्र है, आप मेरी आकांक्षा त्याग कर अन्य पुरुष के साथ ही प्रसन्नचित्त हों । हे सुभगे ! भाई होने के नाते आपका निवेदन मुझे कदापि स्वीकार्य नहीं॥१२॥ |
| (यमी का कथन) अरे यम ! तुम बहुत दुर्बल हो। तुम्हारे मन और हृदय के भावों को समझने में मुझसे भूल हुई । क्यों रस्सी द्वारा घोड़े को बाँधने के समान तथा लता द्वारा वृक्ष को आच्छादित करने के समान तुम्हें कोई अन्य स्त्री (नारी) स्पर्श कर सकती है (फिर मैं क्यों नहीं ?)॥१३॥ |
| (यम का कथन) हे यमी ! जब आप इस जानकारी से परिचित हैं, तो आप भी अन्य पुरुष का वृक्ष की लता के समान आश्रय ग्रहण करें, अन्य पुरुष को पति रूप में आप स्वीकार करें, परस्पर एक दूसरे की हार्दिक इच्छाओं के अनुरूप आचरण करें तथा उसी से अपने मंगलकारी सुखों को प्राप्त करें॥१४॥ |
सूक्त - ११
| वर्षणशील, महिमायुक्त और अदम्य अग्निदेव ने अन्तरिक्षीय मेघों का दोहन करके यज्ञ- सम्पादक यजमानों के लिए जल बरसाया । जिस प्रकार वरुणदेव अन्तर्ज्ञान से सम्पूर्ण संसार को जानते हैं, उसी प्रकार वे अग्निदेव भी सम्पूर्ण संसार के ज्ञाता हैं । यज्ञ में प्रयुक्त अग्निदेव की ऋचाओं के अनुरूप अर्चना करें॥१॥ |
| अग्निदेव की महिमा का गान करने वाली गन्धर्व-पली (वाणी) और जल द्वारा शुद्ध हुई हवियों ने अग्निदेव को सन्तुष्ट किया । एकाग्रतापूर्वक स्तोत्र गान करने वाले साधकों को अखण्ड़ अग्निदेव यज्ञीय सत्कर्मों की और प्रेरित करें । यजमानों में प्रमुख हमारे ज्येष्ठ भ्राता के समान, यज्ञ संचालक इन अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं॥२॥ |
| जिस समय यज्ञ कार्य के इच्छुक और उसकी व्यवस्था जुटाने वाले याजक अग्निदेव की प्रार्थना करते हुए उन्हें यज्ञ के लिए प्रज्वलित करते हैं, उसी अवसर पर कामनाओं को पूर्ण करने वाली, श्रेष्ठ शब्दों वाली ( सुन्दर सम्भाषण युक्त) कीर्तिमती, सुविख्यात उषादेवी मनुष्यों के कल्याण के लिए सूर्योदय से पूर्व ही उदित हो जाती हैं॥३॥ |
| इस ( दिव्य उषा के आवरण) के बाद यज्ञ प्रेरित श्येन ( सुपर्ण - सूर्य ) द्वारा बलशाली, महिमामय, दर्शनीय सोम को समुचित मात्रा में लाया गया। जिस समय श्रेष्ठजन, सम्मुख जाने योग्य, दर्शनीय तथा देवों के आवाहन कर्ता अग्निदेव की स्तुति करते हैं, उसी (यज्ञ के) समय धी (बुद्धि अथवा धारण करने की क्षमता) उत्पन्न होती है॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! पशुओं के लिए जिस प्रकार घास आदि आहार विशेष रुचिकर होते हैं, उसी प्रकार आप सदैव रमणीय होकर श्रेष्ठ यज्ञों से मनुष्यों के लिए कल्याणप्रद हों । स्तोताओं के स्तोत्रगान से प्रशंसित होकर आप हविष्यान्न ग्रहण करते हुए विभिन्न देवशक्तियों के साथ हमारे यज्ञ को सफल बनाएँ ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! जिस प्रकार रात्रि रूपी अन्धकार को विनष्ट करने वाले सूर्यदेव अपने प्रकाश रूपी तेज से सर्वत्र फैलते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने ज्वाला रूपी तेज को माता-पिता रूपी पृथ्वी-आकाश में विस्तृत करें । सन्मार्ग के अभिलाषी यजमान दैवी गुणों के संवर्द्धन के लिए अन्त:करण से यज्ञरूपी सत्कर्मों को करने के इच्छुक हैं। अग्निदेव स्तोत्रों को संवर्धित करते हैं । ब्रह्मा यज्ञ कर्म को भली प्रकार संचालित करने की उत्सुकता से स्तोत्रों को बढ़ाते हैं तथा यज्ञकर्म में कोई त्रुटि न रह जाये, इसके लिए सदैव जागरूक रहते हैं॥६॥ |
| बल से उत्पन्न हे अग्निदेव ! जो मनुष्य आपकी कृपादृष्टि को प्राप्त कर लेते हैं। वे विशेष ख्याति को प्राप्त होते हैं । अन्नादि से सम्पन्न, अश्वादि से युक्त तेजस्-सम्पन्न और शक्तिशाली होकर वे मनुष्य दीर्घजीवन तथा सुख सौभाग्य को प्राप्त करते हैं॥७॥ |
| हे स्वधायुक्त यज्ञीय अग्निदेव ! जिस अवसर पर हम यजनीय देवताओं के लिए प्रार्थनाओं को सम्पन्न करें तथा आपके द्वारा विभिन्न प्रकार के रत्नादि द्रव्यों को यजमानों में वितरित करते हों, उस समय आप हमारे भी धन का हिस्सा हमें प्रदान करें॥८॥ |
| हे अग्निदेव ! इन सम्पूर्ण देवताओं से सम्पन्न यज्ञ स्थल में रहते हुए आप हमारे द्वारा की गई प्रार्थनाओं के अभिप्राय को जानें । आप अपने अमृतवर्षक रथ को योजित करें। देवशक्तियों के माता-पिता रूप द्यावा- पृथिवी को हमारे यज्ञ में लेकर आएँ । कोई भी देव हमारे यज्ञकर्म से असन्तुष्ट न हों, अतएव आप यहीं रहें । देवों के आतिथ्य से पृथक् न हों॥९॥ |
सूक्त - १२
| सत्य वचनों के द्वारा द्युलोक और पृथ्वी, यज्ञीय अवसर पर नियमानुसार सर्वप्रथम अग्निदेव का आवाहन करें । तत्पश्चात् तेजस्-सम्पन्न अग्निदेव भी यज्ञीय कर्मों की ओर मनुष्यों को प्रेरित करें । वे अपनी प्रज्वलित ज्योति से यज्ञ में प्रतिष्ठित होकर देवों के आवाहन के लिए उद्यत हों॥१॥ |
| दिव्यगुण- सम्पन्न, देवताओं में सत्य के प्रमुख ज्ञाता, सर्वोत्तम अग्निदेव, हमारे द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न को देवताओं के समीप पहुचाएँ । धूम्र ध्वजा वाले, समिधाओं द्वारा ऊर्ध्वगामी, कान्ति द्वारा उज्ज्वल, प्रशंसनीय देवों के आवाहक, नित्य अग्निदेव को अभिमन्त्रित आहुतियाँ समर्पित की जाती हैं॥२॥ |
| अग्निदेव द्वारा सुखों को प्रदान करने वाले जल का उत्पादन होता है, उससे उत्पादित ओषधियों को द्यावा-पृथिवी द्वारा पोषण किया जाता है । हे अग्निदेव ! आपकी दीप्तिमान् ज्वालाएँ स्वर्गस्थ दिव्य पोषक रस के रूप में जल का दोहन करती हैं। सभी देवताओं द्वारा आपके इस जल-वृष्टि रूपी अनुदान की महिमा का गान किया जाता है॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! आप हमारे यज्ञीय कर्मों को उन्नत करें । हे जलवर्षक द्यावा-पृथिवि ! हम आपकी स्तुति करते हैं ।आप इसके अभिप्राय को जानें । स्तोता जिस समय यज्ञ के अवसर पर आपकी प्रार्थना करते हैं, उसी समय माता-पिता रूपी पृथ्वी और द्युलोक यहाँ जल- वृष्टि करके हमारे लिए विशेष सहायक हों॥४॥ |
| क्या प्रज्वलित अग्निदेव हमारी प्रार्थनाओं और हविष्यान्न को ग्रहण करेंगे ? क्या हमारे द्वारा उनके नियमों-व्रतों का उचित रीति से निर्वाह किया गया है? इसे जानने में कौन समर्थ है? श्रेष्ठ मित्र को बुलाने के समान ही अग्निदेव भी हमारे आवाहन पर प्रकट होते हैं। हमारी ये प्रार्थनाएँ और हविष्यान्न देवताओं की ओर गमन करें॥५॥ |
| जल इस भूमि पर अमृत स्वरूप गुणों से सम्पन्न और नानाविध रूपों में संव्याप्त है, जो यमदेव के अपराधों को क्षमा करता है । हे महिमावान् तेजस्वी अग्निदेव ! आप उस जल का संरक्षण करें॥६॥ |
| यजमान की यज्ञ वेदी (पूजा वेदी पर प्रतिष्ठित होने वाले देवगण, अग्निदेव के सान्निध्य को प्राप्त करके हर्षित होते हैं। इनके द्वारा ही सूर्य में तेजस्विता (दिवस) तथा चन्द्रमा में रात्रि को स्थापित किया गया है। ये दोनों सूर्य और चन्द्र अनवरत तेजस्विता को धारण किये हुए हैं॥७॥ |
| जिन ज्ञान-सम्पन्न अग्निदेव की उपस्थिति में देवशक्तियाँ अपने कार्यों का निर्वाह करती हैं। हम उनके रहस्यमय स्वरूप को जानने में असमर्थ हैं॥८॥ |
| हे अग्निदेव ! आप समस्त देवताओं से सुशोभित यज्ञस्थल में रहते हुए हमारे द्वारा की गई प्रार्थनाओं के अभिप्राय को समझें । आप अपने अमृतवर्षक रथ को योजित करें । देवशक्तियों के माता-पिता रूप द्युलोक और पृथिवी को हमारे यज्ञ में लेकर आएँ । हमारे यज्ञीय कर्मों से कोई भी देव असन्तुष्ट न हों । आप यहीं रहे, देवों के सान्निध्य को छोड़कर कहीं न जाएँ॥९॥ |
सूक्त - १३
| हे शकटद्वय ! आप दोनों को हम सोम आदि हविष्यान्न से अभिपूरित करके पत्नीशाला (यज्ञशाला में यजमान पत्नी के लिए नियत स्थान) से हविर्धान की ओर लाते हैं, तब यज्ञ को सम्पन्न करते हैं। आहुतियों की तरह हमारे स्तोत्र वचन भी देवों के समीप पहुँचें । दिव्य लोक के उच्च स्थान में प्रतिष्ठित अमरता को प्राप्त देवगण हमारे स्तोत्रों को सुनें॥१॥ |
| हे शकटदेव ! जब आप परस्पर जुड़कर (युग्म रूप में) उत्साहपूर्वक यज्ञस्थल में उपस्थित होते हैं । उस समय याजकगण आपके ऊपर सोम आदि हविष्यान्न समर्पित करते हैं । आप अपने यथेष्ट स्थल को प्राप्त करें जिससे सोम भी उत्तम स्थल पर सुशोभित हो॥२॥ |
| हम यज्ञ के पाँचों उपकरणों को यथाक्रम रखते हुए चतुष्पदी त्रिष्टुप् आदि छन्दों का नियमपूर्वक प्रयोग करते हैं। यज्ञस्थल की वेदी पर स्थित सोम को पवित्र करते हुए हम परमात्मा के ॐ नाम का उच्चारण करके अपने यज्ञीय कार्यों को पूर्ण करते हैं॥३॥ |
| देवों में किसे मृत्युभय है? ( अर्थात् किसी को नहीं) मनुष्यों में किसे अमरता नहीं चाहिए? (अर्थात् सभी को चाहिए)। याज्ञिक जन मन्त्रों से पावन यज्ञ को सम्पादित करते हैं, जिससे हमारे शरीर, आरोग्य लाभ प्राप्त करके मृत्यु के भय से मुक्त रहते हैं॥४॥ |
| पुत्रवत् ऋत्विग्गण प्रशंसनीय श्रेष्ठ पिता स्वरूप सोम के लिए सप्त छन्दों का उच्चारण करते हुए स्तोत्रों का गान करते हैं। ये दोनों शकट दोनों लोकों को प्रकाशित करते हैं। ये दोनों अपने तेज से देवों और मनुष्यों को परिपुष्ट करते हैं॥५॥ |
सूक्त - १४
| हे यजमान ! आप पितरों के अधिपति यमदेव की पुरोडाश आदि समर्पित करते हुए सेवा करें । यमदेव पुण्य कर्मियों को सुखद धाम में ले जाते हैं । वे अनेकों के लिए कल्याणकारी मार्गदर्शन प्रदान करते हैं । विवस्वान् के पुत्र यम के समीप ही सभी मनुष्यों को अन्ततः जाना होता है॥१॥ |
| यम देव की नियम व्यवस्था को कोई परिवर्तित करने में सक्षम नहीं है। जिस मार्ग से हमारे पूर्वकालीन पूर्वज गये हैं, उसी मार्ग से सभी मनुष्य भी स्व-स्व कर्मों के अनुसार लक्ष्य की ओर जायेंगे। हे सर्वोत्तम यमदेव ! आप सभी मनुष्यों के पाप रूपी दुष्कर्म और पुण्य रूपी सत्कर्मों को जानने में समर्थ हैं॥२॥ |
| (सारथी) मातलि, अधीश्वर इन्द्रदेव, काव्ययुक्त पितर जनों की सहायता से यम, अंगिरादि पितरजनों और बृहस्पतिदेव, ऋक्व नामक पितरजनों के सहयोग से उन्नतिशील होते हैं । जो देवताओं को संवर्धित करने वाले हैं अथवा जिन्हें देवता बढ़ाते हैं, वे भली प्रकार प्रगति करते हैं। उनमें से कुछ (देवगण) स्वाहा तथा कुछ (पितर गण) स्वधा द्वारा सन्तुष्ट होते हैं॥३॥ |
| हे यमदेव ! अंगिरादि पितरजनों सहित आप हमारे इस उत्तम यज्ञ में आकर विराजमान हों । ज्ञानी ऋत्विजों के स्तोत्र आपको आमन्त्रित करें । हे मृत्युपति यम ! इन आहुतियों से तृप्त होकर आप हमें आनन्दित करें॥४॥ |
| हे मृत्युदेव ! नाना स्वरूपों के धारणकर्त्त पूजनीय गिरा देवों के साथ आप यज्ञस्थल पर पधारें और इस यजमान को प्रसन्न करें । जो आपके पिता विवस्वान् हैं, उनको हम यज्ञ में आवाहित करते हैं । वे इस यज्ञस्थल की पूजावेदी पर कुश के आसन पर विराजमान होकर हमें आनन्दित करें॥५॥ |
| अंगिरा, अथर्वा और भृगु आदि हमारे पितरगण अभी-अभी पधारे हैं। वे सभी सोम के इच्छुक हैं । उन पितरगणों की कृपादृष्टि हमें उपलब्ध हो, हम उनके अनुग्रह से कल्याणकारी मार्ग की ओर बढ़े॥६॥ |
| हे पिता ! जिन पुरातन मार्गों से हमारे पूर्वज पितरगण गये हैं, उन्हीं से आप भी गमन करें । वहाँ स्वधा रूप अमृतान्न से तृप्त होकर राजा यम और वरुणदेवों के दर्शन करें॥७॥ |
| हे पिता ! आप उत्तम लोक स्वर्ग में यज्ञ आदि दान-पुण्य कर्मों के फलस्वरूप अपने पितरगणों के साथ संयुक्त हों । पाप कर्मों के प्रभाव से मुक्त होकर पुन: घर में प्रविष्ट हों तथा तेजस्वी देवरूप को प्राप्त करें॥८॥ |
| हे दुष्ट पिशाचो ! पितरगणों ने इस मृतात्मा के लिए यह स्थान निर्धारित किया है अर्थात् दाह स्थल निश्चित किया है । अत: आप इस स्थान को त्याग कर यहाँ से दूर चले जाएँ । यमदेव ने दिन-रात जल से सिंचित इस स्थल को मृत देहों के लिए प्रदान किया है॥९॥ |
| हे मृतात्मा ! चार नेत्रों वाले, अद्भुत स्वरूप वाले, जो ये दो सारमेय (सरमा के पुत्र अथवा साथ रमण करने वाले) श्वान हैं, इनके सान्निध्य में आप शीघ्र गमन करें । तदनन्तर जो पितरगण यम के साथ सदैव हर्षित रहते हैं, उन विशिष्ट ज्ञानी पितरों की श्रेणी को आप भी प्राप्त करें॥१०॥ |
| हे मृत्युदेव यम ! आपके गृहरक्षक, मार्गरक्षक तथा ऋषियों द्वारा ख्याति प्राप्त चार नेत्रों वाले जो दो श्वान (गमनशील दूत) हैं, उनसे मृतात्मा को संरक्षित करें तथा इस मृतात्मा को कल्याण का भागी बनाकर पापकर्मों से मुक्त करें॥११॥ |
| यमदेव के ये दो दूत (कुक्कुर) लम्बी नाक वाले, प्राण हन्ता और अति सामर्थ्यवान् हैं । ये मनुष्यों के प्राणहरण को लक्ष्य करके घूमते हैं। दोनों (यमदूतो हमें सूर्य के दर्शन लाभ के लिए इस स्थान पर कल्याणकारी प्राणदान देने की कृपा करें॥१२॥ |
| हे त्वग्गण ! यमदेव के लिए हविष्यान्न समर्पित करने के साथ ही उन्हें अभिषवित सोम प्रदान करो। अग्निदेव जिस यज्ञ के वाहक (दूत हैं, वह (यज्ञ) नानाविध मांगलिक ओषधियों से युक्त होकर यमदेव की ओर गमन करता है॥१३॥ |
| हे ऋत्विजो ! यमदेव के लिए घृत से परिपूर्ण हविष्य का यजन करते हुए उनकी स्तुति करो। वे यमदेव हमारे दीर्घ जीवन के निमित्त, हमें चिरायु प्रदान करें॥१४॥ |
| हे ऋत्विजो ! आप मृत्युराज यम के लिए मिष्ठान्न युक्त आहुतियाँ समर्पित करें। प्राचीनकाल में जिन पूर्वज ऋषिगणों ने हमें सन्मार्ग की प्रेरणा दी है, उनके लिए हम नमन करते हैं॥१५॥ |
| मृत्युदेव यम त्रिकद्रुक (ज्योति, गौ और आयु) नामक यज्ञ में संरक्षणार्थ उपस्थित हों । वे यमदेव छ: स्थानों (द्युलोक, भूलोक, जल, ओषधियाँ, ऋक् और सूनृत) में निवास करने वाले हैं । त्रिष्टुप् , गायत्री एवं दूसरे सभी छन्दों के माध्यम से हम उनका स्तुति गान करते हैं॥१६॥ |
सूक्त - १५
| हमारे तीनों प्रकार (उत्तम, मध्यम और निम्न के पितर अनुग्रहपूर्वक इस यज्ञानुष्ठान में उपस्थित हैं। वे पुत्रों की प्राण-रक्षा के उद्देश्य से यज्ञ में समर्पित हविष्यान्न ग्रहण करें तथा हमारी रक्षा करें॥१॥ |
| जो पितामहादि पूर्वज या उसके पश्चात् मृत्यु को प्राप्त पितरगण हैं या जो पृथिवी के राजसी भोगों का उपभोग करने के लिए उत्पन्न हुए हैं या जो सौभाग्यवान् वैभव- सम्पन्न बांधवों के रूप में हैं, उन सभी को नमन है॥२॥ |
| हमने यज्ञानुष्ठान सम्पन्न करने का विधि-विधान अपने पितरों से ही सीखा है । वे इससे भली-भाँति परिचित हैं। सभी पितर यज्ञशाला में कुश-आसन पर प्रतिष्ठित होकर हविष्यान्न एवं सोमरस ग्रहण करें॥३॥ |
| हे पितृगण ! हमारे आवाहन पर आप उपस्थित होकर कुश-आसन पर प्रतिष्ठित हों । विभिन्न यज्ञीय पदार्थ आपके लिए प्रस्तुत हैं, इनको स्वीकार कर आप हमारा हर प्रकार से कल्याण करें । पाप से बचाकर रक्षा करें॥४॥ |
| हम अपने पितृगणों का आवाहन करते हैं। कुश-आसन पर विराजमान होकर प्रस्तुत सोमरस आदि हविष्यान्न का उपभोग करें । हमारी प्रार्थना को स्वीकार करके प्रसन्न होते हुए हमारी रक्षा करें॥५॥ |
| हे पितृगण ! हम अबोध बालकों की त्रुटियों को क्षमा करते हुए आप यज्ञशाला में दक्षिण की ओर घुटनों के बल पृथ्वी पर विराजमान होकर यज्ञ की शोभा बढ़ाएँ॥६॥ |
| अरुणिम ज्वालाओं के सन्निकट बैठने वाले (यज्ञादि कर्म सम्पन्न करने वाले) यजमान को धन-धान्य प्रदान करें । हे पितरो ! आप यजमान के पुत्र-पौत्रों को भी धन-ऐश्वर्य प्रदान करें, जिससे वे यज्ञादि कर्मों के निमित्त धन नियोजित करते रहें॥७॥ |
| सोमरस तैयार करने वाले वसिष्ठ आदि (याजक) वैभव-सम्पन्न होकर सोमपायों पितरों को हविरूप सोम प्रदान करते हैं । पितरों के साथ पितृपति यम भी हविष्य की कामना करते हैं । जो भी हवियों की कामना करते हैं, वे सभी उन्हें प्राप्त करते हैं॥८॥ |
| हे अग्निदेव ! यज्ञविधान के ज्ञाता और ऋचाओं के द्रष्टा जो पितरगण देवत्व पद की प्राप्ति कर चुके हैं। यदि वे हमारी श्रद्धा-भावना की अपेक्षा करते हैं, तो हमारे इस यज्ञ में आएँ । उन सम्माननीय, ज्ञानसम्पन्न, सत्यवती, मेधावी, तेजस्विता युक्त पितरगणों के साथ आप भी हमारे यहाँ उपस्थित हों॥९॥ |
| सत्यवती, हविष्य के इच्छुक, सोमरस पानकर्ता जो पितरगण हैं, वे इन्द्रदेव और अन्य देवगणों के साथ संयुक्त रूप से रथ पर विराजमान हैं। हे अग्निदेव ! आप उन सभी देव उपासक, प्राचीन यज्ञीय अनुष्ठानों के निर्वाहक पितरगणों के साथ स्तुतियों द्वारा आवाहन किये जाने पर सादर पधारें॥१०॥ |
| हे अग्नि के समान तेजस्वी पितरो ! आप यहाँ आएँ और निर्धारित आसन में विराजमान हों । हे पूजनीय पितरो ! पात्रों में स्थित हविष्यान्न का सेवन करें तथा सन्तानादि से युक्त ऐश्वर्य एवं साधन हमें प्रदान करें॥११॥ |
| हे जातवेदा अग्निदेव ! हम आपके प्रति स्तुति- प्रार्थना करते हैं । आप हमारी श्रेष्ठ-सुगन्धित आहुतियों को स्वीकार करके पितरगणों को प्रदान करें। पितरगण स्वधी द्वारा समर्पित आहुतियों को ग्रहण करें । हे अग्निदेव ! आप भी श्रद्धा- भवनापूर्वक समर्पित आहुतियों का सेवन करें॥१२॥ |
| हे सर्वज्ञाता अग्निदेव ! यहाँ जो पितरगण उपस्थित हुए हैं, जो हमसे परिचित हैं, जो हमारे आवाहन पर नहीं आये हैं अथवा जो हमसे अपरिचित हैं, आप उन सभी पितरगणों के सम्पूर्ण ज्ञाता हैं । हे पितरगण ! स्वधायुक्त इस श्रेष्ठ यज्ञ को आप स्वीकार करें॥१३॥ |
| हे अग्निदेव ! जिन पितरों का अग्नि संस्कार किया गया अथवा जिनका संस्कार सम्पन्न नहीं किया गया है, जो पितरंगण स्वधायुक्त अन्न से तृप्ति को प्राप्त करके स्वर्गलोक में हर्षित हैं, आप उनके साथ सुगन्धित द्रव्यों का सेवन करें तथा पितरगणों की आत्माओं को देवत्व प्रदान करें॥१४॥ |
सूक्त - १६
| हे अग्निदेव ! इस मृतात्मा को पीड़ित किये बिना (अन्त्येष्टि) संस्कार सम्पन्न करें । इस मृतात्मा को छिन्न-भिन्न न करें । हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! जिस समय आपकी ज्वालाएँ इस देह को भस्मीभूत कर दें, उसी समय इसे (मृतात्मा को) पितरगणों के समीप भेज दें॥१॥ |
| हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! जब आप मृतशरीर को पूर्णरूप से दग्ध कर दें, तब इस मृतात्मा को पितरजनों को समर्पित करें । जब यह मृतात्मा पुन: प्राणधारी हो, तो देवाश्रय में ही रहे॥२॥ |
| हे मृत मनुष्य ! आपके प्राण और नेत्र, वायु और सूर्य से संयुक्त हों । आप अपने पुण्य कर्मों के फल की प्राप्ति के लिए स्वर्ग पृथ्वी अथवा जल में निवास करें । यदि वृक्ष वनस्पतियों में आपका कल्याण निहित है, तो सूक्ष्म शरीरों से उन्हीं में प्रवेश करें॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! इस मृत पुरुष में जो अविनाशी ईश्वरीय अंश है, उसे आप अपने तेज से तपाएँ- प्रखर बनाएँ। आपकी ज्वालाएँ उसे सुदृढ़ बनाएँ। हे सर्वज्ञाता अग्निदेव ! आप अपनी कल्याणकारी विभूतियों से उन्हें पुण्यात्माओं के लोक में ले जाएँ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! जो मृत पुरुष आपके लिए स्वधायुक्त आहुति के रूप को ग्रहण करता है, उसे आप दुबारा पितरजनों के लिए सृजित करें । हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! इसका जो आयु भाग शेष है, वह प्राण- सम्पन्न हो तथा पुनः सुदृढ़ शरीरधारी बने॥५॥ |
| हे मृत मनुष्य ! आपके शरीर (जिस अंग-अवयवों को कौवे, चींटी, साँप अथवा किसी दूसरे हिंसक पशु ने व्यथित किया हो, तो सर्व भक्षक अग्निदेव उस अंग को पीड़ारहित करें । शरीर के अन्दर जो पोषक रस रूप सोम विद्यमान हैं, वह भी उसे कष्टमुक्त करे॥६॥ |
| हे मृतपुरुष ! तुम अपने मेद और मांसादि से पूर्णता युक्त हो । स्वयं अग्नि ज्वाला रूप कवच को धारण कर लेने से शरीर को भस्मीभूत करने को उपस्थित (संलग्न) अग्निदेव आपके समस्त अंगों को नहीं जलायेंगे॥७॥ |
| हे अग्ने ! देवों और पितरगणों के प्रिय इस चमसपात्र को आप हिंसित न करें । यह चमसपात्र मात्र देवताओं के सोमपान के निमित्त ही सुरक्षित है । इसी से सम्पूर्ण अविनाशी देव तथा पितरगण आनन्दित होते हैं॥८॥ |
| मांस भक्षक (चिताग्नि) अग्निदेव को हम यहाँ से दूर करते हैं, वे शवदाहक अग्निदेव मृत्युराज यम के ही समीप रहें । यहाँ पर दूसरे सुप्रसिद्ध जातवेदा अग्निदेव हैं, जो हमारी आहुतियों को देवताओं के समीप पहुँचाएँगे॥९॥ |
| जो ये शेव-दाहक अग्निदेव चितास्थल में वास करते हैं, पितृयज्ञ के लिए उन्हें दूर करते हुए दूसरे पवित्र यज्ञाग्नि की स्थापना करते हैं । वे सर्वश्रेष्ठ यज्ञ स्थल में प्रतिष्ठित अग्निदेव हमारे तेजस्वी यज्ञ को पूर्ण करें॥१०॥ |
| श्राद्ध कर्म के समय समर्पित हव्य को वहन करने वाले अग्निदेव यज्ञ को समृद्धि-सम्पन्न बनाते हैं । वे देवों एवं पितरों तक हव्य पहुँचाकर उनकी परिचर्या करते हैं॥११॥ |
| हे पवित्र यज्ञाग्ने ! हम श्रद्धापूर्वक यत्न करते हुए आपको प्रतिष्ठित करते हैं तथा अधिक प्रज्वलित करने का प्रयत्न करते हैं । जो देव एवं पितृगण यज्ञ की कामना करते हैं, आप उन तक समर्पित हव्य को पहुँचाते हैं॥१२॥ |
| हे अग्निदेव ! आपने जिस भूस्थल को दग्ध किया है, उसे पुन: तापरहित (उर्वरक) बनाएँ । यहाँ जलाई युक्त पवित्र और अनेक शाखा युक्त दूर्वा घास उत्पन्न हो॥१३॥ |
| शीतल तथा आह्लादप्रद हे पृथिवि ! आप, सबके लिए आनन्दप्रद, मंगलकारी तथा शीतलता प्रदान करने वाली ओषधियों से परिपूर्ण हैं। आप अग्निदेव को संतुष्ट करके मेढ़क की इच्छानुरूप जल वृष्टि से युक्त हों॥१४॥ |
सूक्त - १७
| त्वष्टा (स्रष्टा) अपनी पुत्री (प्रकृति) को वहन करने योग्य अथवा विवाहित करते हैं । (इस प्रक्रिया में) समस्त विश्व के प्राणी सम्मिलित होते हैं । यम की माता ( सरयू) का जब सम्बन्ध हुआ, उस समय विवस्वान् ( सूर्य) की महिमामयी पत्नी लुप्त हुई॥१॥ |
| अमर (सरण्यू) को (देवताओं ने) मनुष्यों से रहस्यमय ढंग से छिपा लिया। सरयू के समान ही दूसरी स्त्री को विनिर्मित करके विवस्वान् (सूर्य) को प्रदान किया । उस समय सरण्यू वहाँ पर थीं, उनने आरोग्यप्रद अश्विनी कुमारों को गर्भ में धारण किया, जिससे ये दोनों जुड़वाँ सन्तान के रूप में पैदा हुए॥२॥ |
| ज्ञानवान्, सम्पूर्ण विश्व के संरक्षक और पशुधन से सम्पन्न पूषादेव आपको सुन्दर लोक की ओर ले जाएँ। अग्निदेव आपको धनैश्वर्य से सम्पन्न बनाएँ तथा सुखों के दाता देवताओं और पितरगणों के समीप पहुँचाएँ॥३॥ |
| सर्वत्र संचरणशील प्राणवायु आपका सभी प्रकार से संरक्षण करे । श्रेष्ठ मार्गदर्शक, सबसे आगे रहने वाले पूषादेव (सूर्य) आपका संरक्षण करें । जिस श्रेष्ठ लोक में पुण्यात्माएँ प्रतिष्ठित हैं , सवितादेव आपको भी वहीं प्रतिष्ठित करें॥४॥ |
| सम्पूर्ण विश्व के पोषक पूषादेव (सूर्य) इन सभी दिशाओं से परिचित हैं, वे हमें भयमुक्त मार्ग से ले जाएँ। कल्याणकारी, सर्वोत्तम, दिव्यता युक्त तथा मेधावी पूषादेव सदैव हमारे अग्रगामी रहें॥५॥ |
| पूषादेव स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य स्थित सभी मार्गों में श्रेष्ठ, सर्वोत्तम मार्ग में उत्पन्न हुए । द्यावा-पृथिवी, जो परस्पर स्नेहयुक्त तथा श्रेष्ठ स्थानों से सम्पन्न हैं, उनके बीच मेधावी पूषादेव विशेष रूप से सुशोभित होते हैं॥६॥ |
| दैवी गुणों के इच्छुक मनुष्य देवी सरस्वती का आवाहन करते हैं । यज्ञ के विस्तारित होने पर वे देवी सरस्वती की ही स्तुति करते हैं। श्रेष्ठ पुण्यात्माओं द्वारा देवी सरस्वती के आवाहन किये जाने पर, वे दानियों की आकांक्षाओं को परिपूर्ण करती हैं॥७॥ |
| हे सरस्वती देवि ! आप पितरगणों के साथ स्वधायुक्त हविष्यान्न से सन्तुष्ट होकर प्रसन्नतापूर्वक एक ही रथ पर गमन करें। इस यज्ञ में श्रेष्ठ आसन पर विराजमान होकर हमें आरोग्यता और अन्न प्रदान करें॥८॥ |
| यज्ञस्थल के दक्षिण भाग में प्रतिष्ठित पितरगण देवी सरस्वती का आवाहन करते हैं । इस यज्ञ- सम्पादक यजमान के लिए आप प्रचुर मात्रा में दिव्यधन तथा पोषक अन्न प्रदान करें॥९॥ |
| मातृवत् पोषक जल हमें पावन बनाए । घृतरूपी जल हमारी अशुद्धता का निवारण करें । जल की दिव्यता अपने दिव्य स्रोत से सभी पापों का शोधन करे । जल से शुद्ध और पवित्र बनकर हम ऊर्ध्वगामी हों॥१०॥ |
| सोमरस प्राचीन ऋषियों तथा देवताओं के लिए अन्तरिक्ष लोक से उत्पन्न हुआ हैं । जो हमारे प्रखर- तेजस्वी पूर्वज थे, उन्हें ही यह सोमरस उपलब्ध हुआ। हम सात याज्ञिक, समान लोक में रहने वाले, उस दिव्य सोमरस को आहुतिरूप में समर्पित करते हैं॥११॥ |
| हे सोमदेव ! तेजस्वी रूप में प्रवाहित होने वाले, पवित्रता से क्षरित होने वाले अथवा अभिषवण फलक के निकट ऋत्विजों के हाथों से गिरने वाले आपके अवयव- रसों को हम नमन करते हुए यज्ञ में समर्पित करते हैं॥१२॥ |
| हे सोमदेव ! सुक् पात्र से नीचे टपकने वाले आपके रस अंश को तथा प्रवाहित होने वाले आपके रस भाग को बृहस्पतिदेव ग्रहण करें, जिससे हमारे ऐश्वर्य में वृद्धि हो॥१३॥ |
| हे जल देव ! ओषधियाँ आपके पोषणयुक्त रस से ओतप्रोत हैं। हमारे सारगर्भित स्तोत्र के समान जल का सूक्ष्म अंश भी अति सूक्ष्म है । इसके साथ आप हमें पवित्रता प्रदान करें॥१४॥ |
सूक्त - १८
| हे मृत्युदेव ! आप सबसे भिन्न दूसरे ही मार्ग से गमन करें । जो देवयान मार्ग से भिन्न है, उसी से आप प्रस्थान करें । दिव्यदृष्टि सम्पन्न हे सर्वश्रुत देव ! आपसे विनम्र आग्रह है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि सन्तानों तथा वीरों को हिंसित न करें॥१॥ |
| हे मृत पुरुष के संबन्धियो ! जो मनुष्य मृत्यु मार्ग को त्यागकर चलते हैं, वे दीर्घ और श्रेष्ठ आयु को धारण करते हैं। आप सब ऐसा ही करें । हे याज्ञिक यजमानो ! आप सभी पुत्र-पौत्र, गौ आदि ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर पापों से मुक्त हों तथा शुद्ध और पवित्र जीवन व्यतीत करें॥२॥ |
| ये जीवित मनुष्य मृत बान्धवों के समीप ही स्थित न रहें, हमारा आज का यह पितृमेध यज्ञ कल्याणकारी ढंग से पूर्ण हो। हम दीर्घ आयुष्य का लाभ प्राप्त करके हँसी-खुशी का आनन्दमय जीवन जियें । हम पूर्व दिशा की ओर मुख करके आगे की यात्रा पर बढ़े॥३॥ |
| प्राणधारी मनुष्यों के संरक्षण के लिये हम यह (पत्थर की) परिधि तैयार करते हैं, जिससे कोई भी अल्प मृत्यु को प्राप्त न हो । ये पुत्र-पौत्रादि शतायु को लाभ प्राप्त करें। हम प्रस्तर का व्यवधान उपस्थित करके मृत्यु को अनुबन्धित करते हैं॥४॥ |
| जिस प्रकार दिन एक के बाद एक क्रमानुसार बीतते हैं, जैसे ऋतुएँ एक के बाद एक व्यतीत होती हैं, जिस प्रकार पहले से उत्पन्न वृद्ध पुरुषों के रहते पुत्रादि शरीर नहीं त्यागते, ऐसे ही हे विधाता ! आप हमारे स्वजनों को दीर्घ जीवन के लाभ से वंचित न करें॥५॥ |
| हे मृतक के पुत्रादिको ! आप अपनी पूर्ण आयु को भोगते हुए वार्धक्य को प्राप्त करें । क्रम से आप प्रगति मार्ग पर बढ़े । इस लोक में श्रेष्ठ जन्म वाले त्वष्टादेव आपको इन मनुष्यों के साथ जीवन व्यतीत करने के लिए दीर्घायुष्य प्रदान करें॥६॥ |
| ये सधवा (सौभाग्यवती) और सुन्दर नारियाँ घृताञ्जन से शोभायमान होकर अपने घरों में प्रविष्ट हों । ये नारियाँ आँसुओं को रोककर, मानसिक विकारों का त्याग करती हुईं, आभूषणों से सुसज्जित होकर आदरपूर्वक आगे-आगे चलती हुईं घरों में प्रविष्ट हों॥७॥ |
| हे मृतक पत्नी ! आपके पति मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं। इन्हें छोड़कर आप अपने पुत्रादि और घर-परिवार पर विचार करती हुई उठे । आप अपने पति के साथ सन्तानोत्पादन आदि स्त्री- कर्तव्य का निर्वाह कर चुकी हैं, अत: घर लौट चलें॥८॥ |
| अपनी प्रजा के संरक्षण के लिए आवश्यक बल और तेज़ हमें उपलब्ध हो, इस हेतु मैं मृतक के हाथ से धनुष को धारण करता हूँ। इस राष्ट्र में हम श्रेष्ठ वीर सन्तानों को प्राप्त करके सभी अहंकारी रिपुओं पर विजयी हों । हे मृतक ! आप यहीं पर निवास करें॥९॥ |
| हे मृतक ! आप इस मातृस्वरूपा, महिमामयी, सर्वव्यापिनी तथा सुखदायिनी धरती माता की गोद में विराजमान हों। ये धरती माता ऊन के समान कोमल स्पर्शवाली तथा दानी पुरुष की स्त्री के समान ही सभी ऐश्वयों की स्वामिनी हैं । ये आपको पापकर्मों के दुष्प्रभाव से मुक्त करें॥१०॥ |
| हे धरती माता ! मृतक को पीड़ादायक संताप से रक्षित करने के लिए आप इसे ऊपर उठायें । इसका भली प्रकार स्वागत- सत्कार करने वाली तथा सुख में साथ रहने वाली बनें । हे भूमाता ! जिस प्रकार माता, पुत्र को अञ्चल से ढुकती है, उसी प्रकार आप भी इसे सभी ओर से आच्छादित करें॥११॥ |
| इस मृतक देह को आच्छादित करने वाली धरती माता भली प्रकार स्थित हो तथा हजारों प्रकार के धूलिकण इसके ऊपर समर्पित करें। यह धरती घृत की स्निग्धता के समान इसे आश्रय प्रदान करने वाली होकर सुखदायी हो॥१२॥ |
| हे अस्थि-कुम्भ ! आपके ऊपर पृथ्वी (मिट्टी) को भली प्रकार स्थापित करते हैं, आप इस भार को वहन करें । यह आपको पीड़ा न पहुँचाए। आपके इस अवलम्बन को पितरगण धारण करें । यमदेव यहाँ आपके निमित्त निवास-स्थल प्रदान करें॥१३॥ |
| जिस प्रकार बाण के मूल में पंख लगाते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ दिन में देवताओं ने मुझ ( संकुसुक ) ष को स्थापित किया है । जिस प्रकार तीव्र गतिशील अश्वों को लगाम द्वारा ग्रहण करते हैं ( अनुकूल बनाते हैं ), वैसे ही हमारी पूजनीय प्रार्थना को आप ग्रहण करें॥१४॥ |
सूक्त - १९
| हे गौओ ! आप हमें छोड़कर किसी दूसरे के पास न जाएँ, वापस लौट आएँ । हे धन-सम्पन्न गौओ ! आप हमें दुग्ध प्रदान करते हुए परिपुष्ट करें । हे अग्निदेव ! आप निरन्तर धन प्रदान करने वाले हैं, आप और सोमदेव मिलकर हमें ऐश्वर्य- सम्पदा प्रदान करें॥१॥ |
| है यजमान ! इन गौओं को बारम्बार हमारे समीप लाएँ, तत्पश्चात् इन्हें अपने नियन्त्रण में रखें । इन्द्रदेव भी इन्हें आपके नियन्त्रण में रखने में सहायक हों तथा अग्निदेव इन्हें दुधारू बनाएँ॥२॥ |
| ये गौएँ बार-बार लौटकर हमारे पास आगमन करें । हमारे संरक्षण में रहकर ये परिपुष्ट हों । हे अग्निदेव ! आप इन्हें हमारे इस गोष्ठ में स्थापित करें। ये यहाँ रहती हुईं धनैश्वर्य को परिपुष्ट करें॥३॥ |
| हम गोशाला , गौओं की गोष्ठ, उनकी उपस्थिति, गौओं का निर्धारित समय पर लौटना, चारागृह में गमन, पुनः वापस आगमन आदि गौओं की स्वाभाविक क्रियाओं की स्तुति करते हैं। गो संरक्षक गोपालों की भी स्तुति करते हैं॥४॥ |
| गौओं को चराने वाले जो चारों ओर उन्हें खोजते रहते हैं, जो उनके साथ-साथ जाने का अनुभव लाभ लेते हैं, वे गोपाल गौओं को चराकर कुशलतापूर्वक घर वापस आएँ ॥५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप हमारे सहायक बनकर गौओं को हमारी ओर प्रेरित करें । ऐसी गौएँ हमें बार-बार प्रदान करें, जिनसे हम सुखों का उपभोग करें॥६॥ |
| हे देवों ! हम आपको प्रचुर अन्न-सामग्री, घृत और दुग्धादि पदार्थों से युक्त हविष्यान्न समर्पित करते हैं। जो भी यज्ञीय सत्कर्मों को पूर्ण करने वाले देवता हैं, वे सभी हमें गौ आदि ऐश्वर्य-सम्पदा प्रदान करें॥७॥ |
| हे गौओं को चराने वाले गोपालो ! आप इन गौओं को हमारे समीप लेकर आएँ । हे गौओ ! आप भी आएँ । हे गोपालो ! आप गौओं को वापस लेकर आएँ । (गोपाल प्रश्न करता है) मैं कहाँ से लाऊँ ? (उत्तर) चारों दिशाओं से गौओं को इकट्ठा करके घर वापस लाएँ॥८॥ |
सूक्त - २०
| हे अग्निदेवे ! आप हमारे मन को श्रेष्ठ-मंगलकारी संकल्पों से संयुक्त करें॥१॥ |
| हविभक्षक, देवों में तरुणतम, दुर्द्धर्ष, सबके मित्र तथा अपराजेय अग्निदेव की हम प्रार्थना करते हैं । इस यज्ञ में सभी देवता , माता के दूध के समान अपने लिए प्रदत्त आहुतियों का सेवन करते हैं॥२॥ |
| सत्कर्मों के आश्रयरूप, तेजस्वी अग्निदेव को स्तोतागण विभिन्न स्तोत्रों से संवर्धित करते हैं। वे कल्याणकारी अग्निदेव इन स्तोत्रों से विशेष शोभायमान होते हैं॥३॥ |
| यजमानों के आश्रयरूप अग्निदेव जब प्रज्वलित होकर ऊर्ध्वगामी होते हैं, तब दिव्यलोक तक संव्याप्त हो जाते हैं। वे मेघमण्डल को विद्युत्रूप से प्रकाशित करके श्रेष्ठ पद पर विराजमान होते हैं॥४॥ |
| इस श्रेष्ठ यज्ञ में आहुतियों के सेवनकर्ता अग्निदेव ज्योति स्वरूप होकर उन्नत होते हैं। ऐसे में वे उत्तर वेदी को पार करते हुए (हमारे-याजक के सामने उपस्थित होते हैं॥५॥ |
| अग्निदेव ही हव्य तथा आहुतियों को ग्रहण करके कल्याणकारी यज्ञ को सम्पन्न करने वाले हैं। आप ही देवताओं के आवाहनकर्ता हैं । देवशक्तियों उन्हीं प्रशंसनीय अग्निदेव के साथ यज्ञ में आगमन करती हैं॥६॥ |
| जिन अग्निदेव को पत्थरों के घर्षण से पैदा होने के कारण पाषाण-पुत्र की संज्ञा से विभूषित किया जाता है, यज्ञ के धारणकर्ता उन अग्निदेव की, श्रेष्-सुखमय जीवन की प्राप्ति के लिए, हम श्रद्धापूर्वक अर्चना करते हैं॥७॥ |
| अग्निदेव को आहुतियों द्वारा संवर्धित करते हुए हमारे पुत्र-पौत्रादि श्रेष्ठ सन्तानें सभी प्रकार की श्रेष्ठतम सम्पत्तियों को प्राप्त करें , ऐसी हमारी मंगल कामना हैं॥८॥ |
| अग्निदेव का रथ कृष्णवर्ण, कान्तिमान् , तेजस्विता-सम्पन्न, लालवर्ण युक्त, सहजता से गमनशील, तीव्रगामी एवं कीर्तिमान् है । स्वर्ण के समान उज्ज्वल दीप्तिमान् उस रथ को सृजेता ने विनिर्मित किया है॥९॥ |
| हे तेजस्वी अग्ने ! आप अमृत स्वरूप ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं। सद्बुद्धि की कामना से प्रेरित विमद ऋषि ने आपके लिए उत्तम स्तोत्रों की रचना की है । हे बलवर्द्धक अग्निदेव ! आप प्रार्थनाओं को स्वीकार करते हुए उनके लिए श्रेष्ठ निवास, उत्तम बल तथा प्राप्त करने योग्य जो भी अन्नादि उपभोग्य सामग्री है, वह सभी प्रदान करें॥१०॥ |
सूक्त - २१
| हम स्वरचित प्रार्थना मन्त्रों से देवों के आवाहनकर्ता , पावन, ज्योतिर्मय तथा सर्वत्र विद्यमान अग्निदेव का वरण करते हैं । कुश के आसनों से सुशोभित यज्ञ तथा आनन्द प्राप्ति के लिए हम उन्हें धारण करते हैं। वे अपनी शोधक प्रदीप्त ज्वालाओं को विमद ऋषि (हमारे आनन्द) के लिए प्रेरित करें॥१॥ |
| प्रखर तेजस्विता-सम्पन्न और ऐश्वर्य-सम्पन्न यजमान आपको शोभायमान करते हैं । हे तेजस्वी अग्निदेव ! सहज गति से क्षरणशील (चलने वाली) आहुतियाँ आपकी सन्तुष्टि के लिए आपके समीप जाती हैं। आप उन्हें धारण करके संवर्द्धित होते हैं॥२॥ |
| जिस प्रकार वृष्टिरूप जल के अभिषिञ्चन से पृथ्वी की सेवा होती है, उसी प्रकार यज्ञ के धारणकर्ता जत्विज् हवन में प्रयुक्त पात्रों से आपको सींचते हैं। आप कृष्णवर्ण की ज्वालाओं से युक्त आभा वाले होकर, देवताओं की प्रसन्नता हेतु अत्यधिक सुशोभित होते हैं । हे अग्निदेव ! इसीलिए आप महिमामय हैं॥३॥ |
| बल-सम्पन्न, अमर, तेजस्वी हे अग्निदेव ! आप जिस ऐश्वर्य को उत्तम और आश्चर्यजनक विधि से स्वीकार करते हैं, उसे देवताओं के आनन्द, हमारे बल और अन्नादि की समृद्धि के लिए यज्ञों में प्रदान करें। आप महिमायुक्त सामर्थ्य से सम्पन्न हैं॥४॥ |
| सभी प्रकार के स्तोत्रों के ज्ञाता ऋषि अथर्वा ने अग्निदेव को प्रकट किया। सबकी कामना पूर्ण करने वाले वे अग्निदेव देवावाहन के लिए सन्देशवाहक रूप हैं। वे हर्षित होकर सुखों को प्रदान करें । हे अग्निदेव ! आप महिमामय हैं॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! ऋत्विज् और यजमान यज्ञ की प्रारम्भिक वेला में आपकी स्तुति करते हैं तथा सभी प्रकार के अभीष्ट वैभवों को विशिष्ट रूप से ग्रहण करते हैं। आप यजमानों के आनन्द और मंगल के लिए दान प्रदान करते हैं, अतएव आप महान् हैं॥६॥ |
| घृत से प्रज्वलित, तेजस्वी ऋत्विजों से सम्बद्ध, मनोहर, सामर्थ्यवान् तथा मेधावी रूप हे अग्निदेव ! आपको यजमान आनन्द प्राप्ति के लिए यज्ञ में प्रतिष्ठित करते हैं, अतएव आप पूजनीय हैं॥७॥ |
| है अग्निदेव ! आपकी महिमा महान् है, आप प्रज्वलित तेज से अत्यधिक ख्यातिलब्ध हैं। युद्ध भूमि में मदमत्त वृषभ के समान ध्वनि करते हुए आप अति शक्तिशाली हो जाते हैं । ओषधियों में बीजोत्पत्ति के आप ही कारण हैं । सोम आदि से आनन्द प्राप्त होने पर आप महिमायुक्त होते हैं॥८॥ |
सूक्त - २२
| इन्द्रदेव की ख्याति आज कहाँ है ? मित्र के समान हितैषी इन्द्र आज किन व्यक्तियों के बीच ख्याति पा रहे हैं? जो ऋषि के आश्रमों अथवा गुफाओं में स्तुतियों से उपास्य रहे हैं, वे इन्द्र आज कौन सी स्थिति में होंगे?॥१॥ |
| आज हमारे इस यज्ञ में इन्द्रदेव प्रमुख प्रतिनिधि हैं। इसमें वज्रधारी और प्रशंसनीय इन्द्रदेव की हम प्रार्थना करते हैं। मित्र के समान कल्याणकारी इन्द्रदेव हमें कीर्तिमान् तथा यशस्वी बनाएँ॥२॥ |
| शक्ति के स्वामी इन्द्रदेव स्तोताओं को महान् वैभव प्रदान करते हैं। वे शत्रु संहारक, वज्र के धारण कर्ता हैं। जैसे पिता अपने प्रियपुत्र का संरक्षण करता है। वैसे ही आप हमारी रक्षा करें॥३॥ |
| हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आप देवस्वरूप हैं । आप वायु से भी अधिक गतिशील, श्रेष्ठ मार्ग से जाने वाले दोनों अश्वों को रथ में योजित करके, मार्ग को बनाते हुए सदैव प्रशंसनीय होते हैं॥४॥ |
| है इन्द्रदेव ! आप वायु के समान गमनशील हैं । सरल मार्गों से जाने वाले दोनों अश्वों को अपनी सामर्थ्य शक्ति से गतिमान करते हुए आप हमारे अभिमुख प्रस्तुत होते हैं । इन दोनों अश्वों के सञ्चालन में देवों ओर मनुष्यों में कोई भी समर्थ नहीं है तथा इनके सामर्थ्य को कोई जानता भी नहीं है॥५॥ |
| यज्ञ समापन के पश्चात् जिस समय इन्द्रदेव और अग्निदेव अपने धाम को लौटने लगे, उसी समय उशना भार्गव ने प्रश्न किया कि आप दोनों किस उद्देश्य से इतनी दूर से हम यजमानों के घर पर पधारे हैं ?॥६॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप हमें सभी प्रकार से संरक्षण प्रदान करें । हमने महिमामय स्तुतियों के साथ यज्ञीय हविष्यान्न आपके निमित्त समर्पित किया है । हम उसी दिव्य, श्रेष्ठ संरक्षण शक्ति की आपसे कामना करते हैं, जिस सामर्थ्य से शुष्ण राक्षस का आपने संहार किया॥७॥ |
| हे शत्रु संहारकर्ता इन्द्रदेव ! जो पुरुषार्थहीन, सबके अपमान कर्ता, यज्ञादि सत्कर्मों से रहित, असुरता से ओतप्रोत, दुष्ट दस्यु हमारी सेना को सभी ओर से घेरे हैं, आप उन दस्युओं को उचित दण्ड दें, उनका संहार करें॥८॥ |
| हे सामर्थ्यशाली इन्द्रदेव ! आप वीर मरुद्गणों के सहयोग से हमारा संरक्षण करें। आपसे संरक्षित होकर हम युद्ध भूमि में आपकी सामर्थ्य से शत्रुओं के संहार में सक्षम होंगे। आपकी कामनाओं को पूर्ण करने के सुख-साधन प्रचुर मात्रा में (हमारे पास) हैं। आपके साधक-भक्त, अधिपति के समान ही नानाविध प्रार्थनाओं से आपको प्रशंसित करते हैं॥९॥ |
| शूरवीर, वज्रधारी हे इन्द्रदेव ! आप मरुद्गणों को वृत्ररूपी शत्रुओं के संहार के लिए उस समय प्रोत्साहित करते हैं, जब आप ज्ञानी स्तोताओं के द्वारा नक्षत्रलोकवासी देवताओं के लिए उच्चरित स्तोत्रों का श्रवण करते हैं॥१०॥ |
| वज्रधारी शूरवीर हे इन्द्रदेव ! युद्ध भूमि में आप तीव्रगति से सक्रिय रहते हैं। आपने मरुद्गणों के सहयोग से शुष्ण- राक्षस का समूल नाश किया । कृपापूर्वक अनुदान देना ही आपका प्रमुख कर्म हैं॥११॥ |
| हे वीर इन्द्रदेव ! हमारी अभीष्ट कामनाएँ और सम्पत्तियाँ कभी भी सत्प्रयोजन विहीन न हों । हे वज्रधारी देव ! हम आपके दिव्य संरक्षण में पल्लवित-पुष्पित होकर सदा सुखी रहें॥१२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हमारी शुभ आकाक्षाएँ और प्रार्थनाएँ आपके समीप पहुँचकर सत्यरूप तथा हिंसारहित हों । हे वज्रधारी ! आपकी कृपा से हम गौदुग्ध के समान हीं आपके आशीर्वाद के पुण्यफल को प्राप्त करें॥१३॥ |
| देवताओं के प्रति समर्पित यज्ञादि क्रियाओं द्वारा यह पृथ्वी हाथ-पैरों से रहित होते हुए भी अतिव्यापक (समृद्ध हुई है । सम्पूर्ण मनुष्यों के हित के लिए पृथ्वी की चारों ओर से परिक्रमा करके राक्षस शुष्ण का आप (इन्द्रदेव) ने वध किया॥१४॥ |
| हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! आप सोमरस का शीघ्रतापूर्वक पान करें । हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आप स्वयं धन-सम्पन्न हैं, अतएव संरक्षक होकर हमें हिंसित न करें। आप स्तुतिकर्ता यजमान को संरक्षित करें । हम प्रचुर धन के स्वामी हों । हमें ऐश्वर्य-सम्पन्न बनने का आशीर्वाद प्रदान करें॥१५॥ |
सूक्त - २३
| वज्रपाणि, गतिमान् रथ पर आसीन, केशों या बाहुओं को हिलाकर शत्रुओं को प्रकम्पित करने वाले, सर्वश्रेष्ठ, सेना के माध्यम से शत्रुओं को भयभीत करने वाले इन्द्रदेव के निमित्त हम आहुति प्रदान करते हैं। वे इन्द्रदेव उपासकों को धन-वैभव प्रदान करते हैं॥१॥ |
| इन्द्रदेव के इन दोनों अश्वों ने यज्ञ के माध्यम से धन अर्जित किया, उन्हीं से प्राप्त प्रचुर धन के अधिपति होकर इन्द्रदेव ने वृत्रासुर को विनष्ट किया । तेजस्विता युक्त, शक्तिसम्पन्न और सहायक इन्द्रदेव बल और धन के अधिपति हैं । हम दस्यु समुदाय का - शत्रुओं का समूल नाश करने के इच्छुक हैं॥२॥ |
| इन्द्रदेव जब अपने तेजस्वी स्वर्णिम वज्र को धारण कर अपने दो अश्वों से जोते गये रथ पर आरूढ़ होते हैं, तब वे विशेष रूप से सुशोभित होते हैं। इन्द्रदेव सभी के द्वारा जाने गये उत्तम अन्नों और ऐश्वर्य-सम्पदा के अधीश्वर हैं॥३॥ |
| जिस प्रकार वर्षा के जल से पशुसमूह भीगता है, उसी प्रकार इन्द्रदेव हरितवर्ण सोमरस से अपनी दाढ़ी-मूंछ को भिगोते हैं। तत्पश्चात् वे उत्तम यज्ञस्थल में जाकर प्रस्तुत मधुर सोमरस का पान करते हैं, तत्पश्चात् जैसे वायु वन-वृक्षों को कम्पायमान करती हैं, वैसे ही वे रिपुओं को संत्रस्त करते हैं॥४॥ |
| अनेक प्रकार की उत्तेजक वाणी का प्रयोग करने वाले शत्रुओं को इन्द्रदेव ने अपनी ललकार से शान्त किया और क्रोध से हजारों शत्रुओं का समूल नाश किया । पिता जिस प्रकार अन्नादि से पुत्रों का पोषण करता है, उसी प्रकार इन्द्रदेव मनुष्यों का पोषण करते हैं । हम उन इन्द्रदेव की महिमा का गुणगान करते हैं॥५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपको श्रेष्ठ दानी जानकर ही विमद वंशियों ने अति अनुपम स्तोत्रों को विनिर्मित किया है । हम ऐश्वर्य के अधिपति इन्द्रदेव से भली प्रकार परिचित हैं। जिस प्रकार गोपाल गौ आदि पशुओं को अपनी ओर बुलाते हैं, वैसे ही हम ऐश्वर्य-प्राप्ति के लिए आपको आवाहित करते हैं॥६॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप और विमद ऋषि के बीच जो मैत्री सम्बन्ध है, उसे कोई विच्छिन्न न करे तथा यह सदैव स्थिर रहे । हे देव ! जैसे भाई-बहिन समान मन वाले होते हैं, उसी प्रकार आपका मैत्रीभाव युक्त मन हमारी ओर प्रेरित हो तथा हमारी मित्रता सदैव सुदृढ़ बनी रहे॥७॥ |
सूक्त - २४
| हे इन्द्रदेव ! पत्थरों से कूट-पीसकर तैयार किया गया मधुर सोमरस प्रस्तुत है, आप इसका पान करें । प्रचुर धन-सम्पन्न हे इन्द्रदेव ! आप असंख्यों प्रकार के विपुल धन हमें प्रदान करें। आप सदैव महिमामय हों॥१॥ |
| हे शचीपते इन्द्रदेव ! यज्ञीय मन्त्रों, यज्ञकर्मी तथा हवन सामग्रियों द्वारा हम आपकी अर्चना करते हैं। आप सभी श्रेष्ठ कर्मों के अभीष्ट फल हमें प्रदान करें, ऐसे इन्द्रदेव वास्तव में महिमामय हैं॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप अभीष्ट ऐश्वर्यों के अधिपति, साधकों को साधना मार्ग में प्रोत्साहन देने वाले तथा स्तोताओं के पालनकर्ता हैं । आप शत्रु रूपी विकारों एवं दुष्कर्म रूपी पापों से हमारी रक्षा करें । ऐसे इन्द्रदेव की महिमा प्रख्यात है॥३॥ |
| कर्मों के प्रति निष्ठावान्, समर्थ हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों विद्वानों ने परस्पर सहयोग से अरणियों का मंथन करके अग्निदेव को प्रकट किया । जब ऋषि विमद ने आपकी प्रार्थना की, तो सत्यरूप आप दोनों ने अग्नि को प्रज्वलित किया॥४॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! जब दोनों अरणि काष्ठों के परस्पर घर्षण से अग्नि की चिनगारियाँ बाहर निकलने लगीं, तब समस्त देवताओं ने आपकी स्तुति की । सभी देवशक्तियों ने अश्विनीकुमारों से प्रार्थना करते हुए कहा कि आप बार-बार मन्थन करें॥५॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! हमारा बहिर्गमन स्नेह भावना से युक्त हो तथा आगमन भी वैसा ही मधुर प्रीति भावना से युक्त हो । हे देव ! आप दोनों अपनी दिव्यशक्तियों से हमें माधुर्ययुक्त प्रीति से सम्पन्न बनायें॥६॥ |
सूक्त - २५
| हे सोम ! आप हर्षित होते हुए हमारे मन को बल, कार्य कुशलता, कल्याणकारी शक्ति, श्रेष्ठता तथा मित्रता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करें । जैसे गौओं की मित्रता हरी घास से है, उसी प्रकार हमें आपकी मित्रता प्राप्त हो॥१॥ |
| है सौम ! हृदय को हर्षित करने वाली आपकी प्रार्थना करके स्तोता लोग चारों ओर विराजमान होते हैं। इस धन की प्राप्ति के लिए हमारे मन विभिन्न कामनाओं से सम्पन्न होते हैं । वास्तव में आपकी महिमा अपार हैं॥२॥ |
| हे सोमदेव ! हम अपनी श्रेष्ठ(परिपक्व) बुद्धि से आपके कर्मों की गति को जानते हैं । आप प्रसन्नचित्त होकर हमारे शत्रुओं का संहार करके हमें संरक्षित करें । जैसे पिता, पुत्र का संरक्षण करता है, वैसे ही हमारा पोषण करके आप हमें सुख-सौभाग्य प्रदान करें । वास्तव में आपकी कीर्ति महान् है॥३॥ |
| हे सोम ! जैसे जल को निकालने के लिए कलश कुएँ में जाते हैं, वैसे हमारी सभी प्रार्थनाएँ आपको प्राप्त होती हैं। हमारी जीवन रक्षा के निमित्त या दीर्घ जीवन की प्राप्ति के लिए) इस यज्ञ कर्म को आप सफल बनाएँ। आपकी प्रसन्नता के निमित्त हम सोमरस के पेयपात्रों को समर्पित करते हैं । यथार्थतः आप महिमायुक्त ही हैं॥४॥ |
| हे सोमदेव ! वे नानाविध फलों की अभिलाषाओं से युक्त, निग्रही, विद्वान् , सामर्थ्यवान्, अनेक प्रकार के कर्मों के निर्वाहक ऋत्विग्गण आपकी प्रार्थना करते हैं। आप प्रशंसित होकर गौ और अश्व से सम्पन्न पशुशाला हमें प्रदान करें । वास्तव में आप महान् और ज्ञा–सम्पन्न हैं॥५॥ |
| हे सोमदेव ! आप हमारे पशुओं से युक्त घरों का संरक्षण करते हैं और विविध रूपों में स्थित आप इस संसार का भी संरक्षण करते हैं। आप ही सम्पूर्ण लोकों का अनुसन्धान करके हमारी प्राण-रक्षा (जीवन-रक्षा) के लिए जीवनोपयोगी सभी पदार्थों का पोषण करते हैं । सभी के आनन्द के लिए आप महानतायुक्त हैं॥६॥ |
| हे सोमदेव ! आप अविनाशी, अमृतस्वरूप हैं, अतएव आप सब प्रकार से हमारे संरक्षक बने । हे राजास्वरूप (देदीप्यमान) सामदेव ! हमारे शत्रुओं का आप निवारण करें तथा हमारे निन्दक अपने दुष्कृत्यों में सफल न हों, आप महिमायुक्त हैं॥७॥ |
| हे सोम ! आप श्रेष्ठकर्मा हैं, अन्न प्रदान करने के लिए सदा हमें जागरूक रखें, आश्रय प्रदान करने के लिए आप सुप्रसिद्ध हैं । आप विद्रोही मनुष्यों और पापकर्मो से हमारी रक्षा करें । वास्तव में आपको कीर्ति महान् हैं॥८॥ |
| हे वृत्रहन्ता सोमदेव ! जिस समय अपने प्रजाजनों को युद्धभूमि में प्रेरित करने वाले रिपु योद्धा विकराल युद्ध के लिए ललकारते हैं, उस समय इन्द्रदेव के कल्याणकारी सहयोगी आप हमारे लिए भी सहायक बनते हैं। वास्तव में आपकी कीर्ति महान् है॥९॥ |
| वह सोमरस निश्चित ही शीघ्र क्रियाशील, आनन्दवर्द्धक, बलप्रदायक और इन्द्रदेव के लिए प्रीतियुक्त होकर संवर्द्धित होता है । इसने ही महाज्ञानी ऋषि कक्षीवान् की बुद्धि को प्रखर बनाया था । वास्तव में ही सोमदेव महिमायुक्त हैं॥१०॥ |
| ये सोमदेव दानी और ज्ञानसम्पन्न यजमान (साधक) को पशुओं से युक्त अन्न तथा उपभोग्य सामग्री प्रदान करते हैं। यही सात होताओं को जीवनोपयोगी धन-सम्पदा प्रदान करते हैं। इन्होंने नेत्रहीन दीर्घतमा ऋषि को नेत्र और पंगु परावृज ऋषि को पैर प्रदान करके अनुकम्पा की थी । वास्तव में सोमदेव की महिमा अनन्त है॥११॥ |
सूक्त - २६
| इन अति प्रशंसनीय, सेहभाव से प्रेरित स्तोत्रों को पूषादेव के लिए समर्पित करते हैं। वे सदैव रथ में अश्वों को संयुक्त करके पधारते हैं। वे महान् पूषादेव यजमान दम्पती का संरक्षण करें॥१॥ |
| यह ज्ञानी मनुष्य, जिन पूषादेव की जीवनी शक्ति प्रदायक जल राशि की महिमायुक्त शक्ति को अपनी प्रार्थना से जलवृष्टि के रूप में उपयोगी बनाता है, वहीं पूषा ध्यानमग्न होकर यजमान की प्रार्थनाओं का श्रवण करते हैं॥२॥ |
| सोमदेव के सदृश ही ये पूषादेव भी अभीष्ट कामनाओं के पूरक और श्रेष्ठ स्तोत्रों को जानते-सुनते हैं। वे सौन्दर्ययुक्त पूषादेव कृपापूर्वक जल वर्षा करते हैं तथा हमारे गोष्ठों को भी जल से अभिषिञ्चित करते हैं॥३॥ |
| हे सबके पोषक पूषादेव ! हम आपको सविचारणाओं का प्रेरक और ज्ञानी मनुष्यों का आश्रय मानकर आपकी अर्चना करते हैं॥४॥ |
| यज्ञ का अर्द्धभाग पूषादेव ग्रहण करते हैं। वे घोड़ों को अपने रथ से नियोजित करके गमन करते हैं। वे सर्वद्रष्टा, मनुष्यों के हितैषी, मेधावीजनों के मित्र हैं तथा उनके शत्रुओं के निवारणकर्ता हैं॥५॥ |
| पूषादेव सभी प्रकार की धारणा शक्ति से सम्पन्न, तेजस्वी, नर-मादा पशुओं के अधिपति हैं, वहीं भेड़ की ऊन से वस्त्रों का निर्माण करने वाले की भाँति (सृष्टि के तन्तुओं को) पवित्र बनाते हैं॥६॥ |
| पूषादेव (सूर्यदेव) सभी हविष्य पदार्थों एवं अन्नों के अधिपति, सबके पोषक तथा मित्ररूप हैं। वे उत्तम, तेजस्वी पूषादेव अपने कर्मों में अपने केशों (विकिरणों) को हिलाते हुए चलते हैं॥७॥ |
| हे पूषा ! आप सभी जिज्ञासुओं की कामनाओं की पूर्ति करने वाले मित्रस्वरूप हैं। आप ही अत्यन्त पुरातन काल में उत्पन्न हुए अविनाशी देव हैं। आपके रथ के धुरे को अज (जिनका जन्म नहीं हुआ वे) वहन करते हैं॥८॥ |
| महिमामय पूषादेव अपनी सामर्थ्य से हमारे रथ को संरक्षित करें। वे अन्न को संवर्धित करें तथा हमारे । निवेदन के अभिप्राय को जानें॥९॥ |
सूक्त - २७
| (इन्द्र का कथन) हे स्तोता ! मेरा यह सत्प्रयास सदैव रहता है कि मेरे द्वारा सोमयाग के अनुष्ठानकर्ता साधक को अभीष्ट फलों की प्राप्ति हो । जो यज्ञीय कर्मों से रहित, सत्य जीवन से विहीन होकर चारों ओर दुष्ट-दुष्कर्मियों सा आचरण करते हुए घूमते हैं, उनका समूल नाश कर देता हूँ॥१॥ |
| (ऋषि वसुक्र) हे इन्द्र ! जब मैं देवोपासना से रहित और शारीरिक सामर्थ्य से अभिमानी मनुष्यों के साथ संघर्ष के लिए जाता हूँ, तब आपको हव्य द्वारा संतुष्ट करता हूँ। मैं पन्द्रहों तिथियों में सोम समर्पित करता हूँ॥२॥ |
| (इन्द्र का कथन) ऐसे व्यक्ति को मैं नहीं जानता, जिसने मुझे देव-विद्वेषियों का हत्यारा कहा हो । जब हिंसक शत्रुओं के संग्राम में जाकर मैं संहार करता हूँ, उस समय सभी हमारे वीरतापूर्ण कर्मों का गुणगान करते हैं॥३॥ |
| जब मैं युद्धक्षेत्र में पहुँचता हूँ, तो सभी महान् सन्त, ऋष मुझे चारों ओर से घेर लेते हैं । समस्त संसार के मंगल तथा संरक्षण के लिए सभी ओर विस्तृत रूप में फैले हुए शत्रुओं का मैं संहार करता हूँ। उन्हें पैरों से पकड़कर शिला पर पछाड़ता हूँ॥४॥ |
| मुझे युद्ध क्षेत्र में पराजित करने की सामर्थ्य किसी में नहीं। यदि मैं चाहूँ, तो विशाल पर्वत भी मेरे कार्य में बाधक नहीं हो सकते । मेरे शब्द की ललकार से बहरे व्यक्ति भी भयभीत हो जाते हैं, किरणों के स्वामी सूर्य भी प्रतिदिन काँपते हैं॥५॥ |
| जो मेरा अनुशासन नहीं मानते, देवों के पेय सोम को स्वेच्छा से, बलपूर्वक पीने वाले, हविष्य पदार्थों के स्वयं उपभोगकर्ता तथा हिंसा के लिए भुजाओं को चलाने वाले, ऐसे सभी लोग मेरी दृष्टि से बाहर नहीं, उनसे भलीप्रकार परिचित हैं, जो अपने मित्र की भी निन्दा करने में नहीं चूकते, उन पर निश्चित ही मेरे वज्र का प्रहार होता है॥६॥ |
| (ऋषि वसुक्र का कथन) हे इन्द्रदेव ! आप दीर्घजीवी (चिरंजीवी) हों । आपने प्रकट होकर दर्शन लाभ दिया तथा जलवृष्टि से अभिषिंचित किया । पुरातन काल से लेकर आज तक आप शत्रुओं के हननकर्ता रहे हैं । जो इस संसार के अतिरिक्त दूसरे लोक में भी संव्याप्त होते हैं, ऐसे द्युलोकादि भी आपको मापने में सक्षम नहीं हैं॥७॥ |
| (इन्द्र का कथन) अनेक गौएँ एकत्रित होकर जौ आदि का भक्षण कर रही हैं , स्वामी के समान मैं गौओं की देखभाल करता हूँ। देखता हूँ कि वे गौएँ चरवाहों के साथ घास चर रही हैं । बुलाये जाने पर वे गौएँ अपने पालनकर्ता के चारों ओर इकट्ठी हो जाती हैं। स्वामी ने उनसे प्रचुर दूध का दोहन कर लिया है॥८॥ |
| (ऋषि का कथन) इस विस्तृत संसार में अन्न, जौ और कन्दमूल पर जीवन निर्वाह करने वाले हम अंष ही हैं। इस संसार में एकाग्रचित्त होकर (ध्यानस्थ-योगस्थ) मनुष्य ईश्वर की उपासना करते हुए उससे शक्तियों की कामना करे । जो योगरहित और भौतिकवादी हैं, ऐसे मनुष्यों को भी वे इन्द्र सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं॥९॥ |
| (इन्द्र का कथन) जो भी यहाँ मेरे विषय में कथन किया जा रहा है, वह यथार्थ है, हरेक मनुष्य को इस पर विश्वास करना चाहिए। जो भी द्विपाद मनुष्य-पक्षी और चतुष्पाद पशु हैं, उनका मैं जन्मदाता हैं । इस संसार में जो पुरुष अपने शूरों को स्त्रियों से संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं, बिना युद्ध किये ही ऐसे दुष्कर्मी के धन को छीनकर मैं सज्जनों को प्रदान कर देता हूँ॥१०॥ |
| जो कन्या अक्ष (आँख या इन्द्रिय) हीन हैं, उसे कौन विद्वान् (सूक्ष्मदर्शी) आश्रय प्रदान करता है? जो इस (कन्या) का वरण करता है, उसे धारण करता है, उसके वज्र तुल्य बल को कौन रोक सकता है?॥११॥ |
| कितनी स्त्रियाँ इस प्रकार की है, जो वधू की कामना करने वाले पुरुष के प्रशंसक वचनों और उसकी धन-सम्पदा को ही पतिवरण का माध्यम मान लेती हैं, परन्तु जो स्त्रियाँ सुशील, स्वस्थ और श्रेष्ठ मानसिक भावनाओं से युक्त हैं, वे अपनी इच्छानुकूल मित्र पुरुष को पतिरूप में वरण करती हैं॥१२॥ |
| आदित्यदेव (सूर्यदेव) अपनी किरणों द्वारा प्रकाश फैलाते हैं और अपने मण्डल में विद्यमान प्रकाश को स्वयं में समाहित करते हैं । वे अपनी आवृत करने वाली किरणों को सांसारिक मनुष्य के मस्तक पर डालते हैं। ऊपर विद्यमान रहते हुए भी वे नीचे से विस्तृत पृथ्वी पर अपनी किरणों से संव्याप्त होते हैं॥१३॥ |
| वे महान् (सूर्य) मृत्यु या अंधकाररहित, भोगरहित, गतिशील होकर रहते हैं। माता (अदिति) से पृथक् होकर गर्भ पोषक यज्ञ या परमव्योम से नि:सृत प्रवाह का सेवन करता है । धेनु (धारण करने वाली प्रकृति) अपने से भिन्न (अव्यक्त प्रकृति ) के वत्स (सूर्य) को स्नेह प्रदान करती है । इस गाय के स्तन ऊपर कहाँ स्थित हैं?॥१४॥ |
| उस प्रजापति की नाभि से सात वीर (सप्त ऋषि अथवा सप्त धातु उत्पन्न हुए। उसके उत्तर भाग से आठ (अष्टवसु अथवा बालखिल्यादि) प्रकट होकर एक साथ संगत हुए। पीछे के भाग से नौ (भृगु आदि) उत्पन्न हुए। पूर्व (भाग ) से दस (अंगिराओं अथवा दिशाओं) की उत्पत्ति हुई । ये सभी भोजन (दिव्य प्रवाहों या यज्ञांश का सेवन) करते हुए द्युलोक से उत्पन्न क्षेत्रों का संवर्द्धन करने लगे॥१५॥ |
| दस अंगिराओं में एक सबके प्रति समभाव रखने वाले कपिल ऋषि हैं। उन्हें उच्च पद पर प्रतिष्ठित करने वाले उत्कृष्ट यज्ञादि सत्कर्मों की साधना के लिए प्रेरित करते हैं। विश्व निर्माण की प्रकृति रूपी माता इच्छा शक्ति से अनुप्रेरित उस गर्भ को मानो सुखपूर्वक जल में स्थापित करती है॥१६॥ |
| वीरों ( अंगिराओं) ने बलशाली मेष ( स्पर्धा करने वालों ) को परिपक्व किया। क्षेत्र में क्रीड़ा के लिए पाँसे फेंके गये। (उनमें से) दो बलशाली धनुष सहित बृहत् आपः (मूल तत्त्व अथवा जल) में विचरण करने लगे - पवित्रता का संचार करने लगे॥१७॥ |
| शब्द (स्तुति) करने वाले विविध मार्गगामी (अंगिरादि अथवा प्राणी) इस लोक में आते हैं। उनमें से एक वर्ग (देवताओं के निमित्त हव्यादि) पकाते हैं। आधे नहीं पकाते; यह तथ्य सवितादेव ने हमसे कहा । काष्ठ एवं घृत का सेवन करने वाले (अग्नि) भीं (देवों के लिए हव्य) पकाते हैं॥१८॥ |
| . भगवान् की स्वचालित जगत् की प्रकृति जो अनादि काल से प्रवमान रूप में इस प्राणि-समुदाय को वहन कर रही है, उसे हम देख रहे हैं । वे (प्रशंसनीय) नवीन उत्साह से युक्त स्वामी सदैव दु:खों का नाश करते हुए जीवों के जोड़ों को उत्पन्न करते और आपस में मिलाते हैं॥१९॥ |
| हे परमेश्वर ! प्राण-रक्षक जो हमारे ये दोनों प्राण और अपने शरीर रूपी रथ में लगे दो बैलों के समान हैं, उन्हें आप कभी इस देह से पृथक् न करें, अपितु इन्हें बार-बार जोड़े । इस जीव के सूक्ष्म प्राण ही इनको प्राप्य लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। वे परमेश्वर सूर्य के समान विश्व के शोधनकर्ता तथा मेघ के समान पदार्थों के दाता हैं॥२०॥ |
| ये जो दुःखों के निवारणकर्ता, जीवों को धारण करने में सक्षम, विविध प्रकार से संव्याप्त हैं, वे सूर्य के सदृश ही सर्व संचालकं महिमामय स्वामी के ऐश्वर्य से हमें प्राप्त होते हैं । इस लोक में प्रत्यक्ष ऐश्वर्य से उत्कृष्ट दुसरा भी श्रवणीय परमैश्वर्य हैं, उसे बिना बाधा के बन्धनों का उच्छेदन करने वाले ईश्वर के उपासक प्राप्त करते हैं॥२१॥ |
| वृक्ष के (विकासमान प्रकृति तक) साथ सम्बद्ध गौ (पोषक शक्ति) शब्द करती है, तब असुरों को नष्ट करने वाले वय (बाण या प्रवाह) छूटते हैं। इससे विश्व भयभीत होकर (रक्षा के लिएइन्द्रदेव की स्तुति करता है । ( इस प्रक्रिया के संदर्भ में) अधिगण शिक्षण प्रदान करते हैं॥२२॥ |
| देवों के सृजन-समय में सर्वप्रथम मेघों का उत्पादन हुआ, मेघों के छिन्न-भिन्न होने से जल की उत्पत्ति हुई। तीन गुणों के उत्पादनकर्ता पर्जन्य, वायु और सूर्य - ये तीनों ही अनुकूल स्थिति में पृथ्वी को तप्त करते हैं तथा इनमें से वायु और सूर्य ये दोनों ही जल को धारण करते हैं॥२३॥ |
| हे ऋषे ! सूर्यदेव ही आपकी प्राणाधार शक्ति हैं और आप भली प्रकार इनके स्वरूप के ज्ञाता हैं। यज्ञ काल में ऐसे प्राणदायक स्वरूप को गोपनीय न करके आप उनके प्रभाव का वर्णन करें । वे सूर्यदेव तीनों लोकों (द्यु, अन्तरिक्ष और पृथ्वी) को प्रकाशित करते हैं। वे जल-शोषण तथा गतिशीलता की प्रक्रिया को कभी त्यागते नहीं॥२४॥ |
सूक्त - २८
| (इन्द्र के पुत्र वसुक्र की पत्नी कहती हैं) इन्द्रदेव को छोड़कर समस्त देवता हमारे यज्ञ में आए हैं, मेरे श्वसुर इन्द्रदेव केवल नहीं पधारे हैं। यदि वे आए होते, तो भुने हुए जौ के साथ सोमपान करते तथा आहारादि से सन्तुष्ट (प्रशंसित) होकर दुबारा अपने घर लौट जाते॥१॥ |
| (इन्द्र) हे पुत्र वधू ! अभीष्ट फलों को प्रदान करने वाला तेजस्वीं मैं पृथ्वी के व्यापक और ऊँचे स्थान में वास करता हूँ । जो सोम अभिषवण कर्ता मुझे सोमपान से सन्तुष्ट करते हैं, मैं उनकी सभी प्रकार से सुरक्षा करता हूँ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपके लिए पाषाण खण्डों पर शीघ्रतापूर्वक अभिषवित आनन्दप्रद सोम को जब यजमान लोग तैयार करते हैं, ऐसे में आप उनके द्वारा प्रदत्त सोमरस का पान करते हैं । हे ऐश्वर्य-सम्पन्न इन्द्रदेव ! जिस समय सत्कार- पूर्वक हविष्यान्नों से यज्ञ किया जाता है, उस समय साधकगण वृषभ (शक्तिसम्पन्न हव्य) को पकाते (परिपक्व करते हैं और आप उनका सेवन करते हैं॥३॥ |
| हे शत्रु संहारक, शूरवीर, वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ! आपके अनुग्रह से हमारे अन्दर यह सामर्थ्य है कि इच्छा मात्र से नदियाँ उल्टी दिशा की ओर जल प्रवाहित करने लगती हैं, तृण खाने वाला हिरण आगे आते हुए सिंह को पीछे खदेड़कर उसके पीछे दौड़ता है तथा शृगाल ( सियार ) शूकर को घने जंगल से भागने के लिए मजबूर कर देता है॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप ज्ञानवान् , सामर्थ्यवान् और प्राचीन हैं । हम अल्पज्ञ मनुष्य आपकी भक्ति करने में सामर्थ्यहीन हैं। आप सर्वज्ञाता हैं, अतएव यथासमय हमारा विशेष मार्गदर्शन करते रहें । हे वैभवशाली इन्द्रदेव ! जिस आपके अंश को हम स्तोत्र करने में समर्थ हैं, उसे आप स्वीकार करें॥५॥ |
| (इन्द्र कहते हैं-) स्तोतागण मेरी प्राचीन महिमा की प्रशंसा इस प्रकार करते हैं कि मेरी स्वर्ग से भी अतिश्रेष्ठ कार्यों के निर्वाह की धारण सामर्थ्य है । मेरे द्वारा असंख्य शत्रुओं का एक साथ ही संहार किया जाता है । सृष्टि सृजेता प्रजापति ने मुझे अजातशत्रु के रूप में उत्पन्न किया है॥६॥ |
| हे इन्द्रदेव ! मैंने आनन्दित होकर वज्रास्त्र से वृत्रासुर का संहार किया और अपनी सामर्थ्य से दानियों को वैभव प्रदान किया। अतएव देवशक्तियाँ मुझे भी आपके समान ही प्राचीन महिमायुक्त, प्रत्येक कर्म में कुशल, शक्तिशाली और अभीष्ट फलों का दाता मानती हैं॥७॥ |
| हाथ में परशु अस्त्र धारण कर्ता, विजय के इच्छुक देवता आते हैं तथा वे लोगों के सहयोग से बादलों को विदीर्ण करके जल वृष्टि करते हैं, वह जल उत्तम नदियों में प्रवाहित होता है । देवता जिस मेघ में जल की सम्भावना देखते हैं, उसी को विद्युत् से विदीर्ण कर जल वृष्टि करते हैं॥८॥ |
| इन्द्रदेव की इच्छा मात्र से हिरण भी समक्ष आते हुए सिंह का मुकाबला करता है, हम भी उसी की सामर्थ्य से पत्थर फेंककर पर्वत को भी दूर से तोड़ डालते हैं । इन्द्रदेव की इच्छा से बछड़ा भी साँड़ से मुकाबला करता है तथा बड़े भी छोटे के नियंत्रण में आ जाते हैं॥९॥ |
| पिंजड़े में बन्द शेर जिस प्रकार अपने स्थान का परित्याग किये बिना प्रहार के लिए हमेशा अपने पंजों को तैयार रखते हैं, उसी प्रकार बाज़ पक्षी भी नाखूनों को रगड़ते हैं। जैसे बँधा हुआ भैसा प्यास से बेचैन होता हैं, वैसे ही गोधा (वैदिक छन्द गायत्री आदि) तृषार्त इन्द्रदेव को तृप्त करते हैं ॥१०॥ |
| जो ब्रह्मनिष्ठ लोग अन्न से सन्तुष्ट होकर रिपुओं (मनोविकारों) को दूर करते हैं, ऐसे ब्रह्मवादियों के लिए गायत्री सहज ही अमृतरूपी सोम उपलब्ध कराती है। वे सभी प्रकार के रसों से युक्त अमृतस्वरूप सोम का पान करते हैं तथा स्वयमेव विकाररूपी रिपुओं के शरीरों तथा सामर्थ्य को विनष्ट करते हैं॥११॥ |
| जो सोमयाग करके स्तोत्र वाणियों से अपना शारीरिक परिपोषण करते हैं, वे श्रेष्ठ कर्मों के निर्वाहक कहे जाकर सत्कर्मों से स्वयं को कृतार्थ करते हैं। श्रेष्ठ मनुष्यों के समान ही स्पष्टवादी आप हमारे लिए अन्न उपलब्ध कराते हैं तथा देवलोक में दानवीर के नाम से प्रख्यात, आप यहाँ दानपति (धनपति) नाम को अलंकृत करते हैं॥१२॥ |
सूक्त - २९
| हे शीघ्र गमनशील अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार पक्षी फलाहार की इच्छा से अपने शिशु को वृक्ष के नीड में सावधानी- पूर्वक रखते हैं, उसी प्रकार ये अति पवित्र स्तोत्र आपके निमित्त ही समर्पित हैं। अनेक दिनों तक हम इन्हीं स्तोत्रों से इन्द्रदेव का आवाहन करते रहें, वे इन्द्रदेव नेतृत्व प्रदान करने वालों में सर्वश्रेष्ठ, पराक्रमशाली, नायक तथा रात्रिकाल में भी सोमपान करने वाले हैं॥१॥ |
| हे मनुष्यों को नेतृत्व प्रदान करने वाले ! इन उषाओं और अन्य उषाकालों में आपकी अर्चना से हमारी भी श्रेष्ठता जाग्रत् हो । हे इन्द्रदेव ! त्रिशोक नामक ऋषि ने आपकी स्तुति-प्रार्थना से आपसे सौ मनुष्यों का सहयेाग प्राप्त किया तथा कुत्स ऋषि जिस रथ पर आरूढ़ होते हैं, वह भी आपकी सहायता का परिणाम है॥२॥ |
| है इन्द्रदेव ! हमारी स्तोत्र वाणियों को सुनकर यज्ञस्थल के द्वार की ओर आप शीघ्रता से आएँ । किस प्रकार का हर्षदायक सोम आपको अति प्रसन्नताप्रद तथा रुचिकर है ? हमें कब श्रेष्ठ वाहुन मिलेंगे ? हमारे मनोरथ कब पूर्ण होंगे? हम आपके स्तोता अन्न-धन की प्राप्ति के लिए कौन सी साधना से आपको प्रशंसित कर सकेंगे ?॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप किस समय हमारे ध्यान में प्रकट होंगे और किस समय हमें साधना की सिद्धि मिलेगी ? किस प्रकार के स्तोत्रों और सत्कर्मों से आप हम मनुष्यों को अपने समान ही सामर्थ्यवान् बनायेंगे? हे यशस्वी इन्द्रदेव ! आप तो सभी के सच्चे सखारूप हितैषी हैं, यह बात इससे सिद्ध होती है कि सभी साधकों का अन्न से पालन-पोषण करने की आपकी अभिलाषा रहती है ॥४॥ |
| तेजस्वी आप: देवताओं के लिए भली प्रकार प्रवाहित हों । हे ऋत्विजों ! मित्र और वरुण के लिए श्रेष्ठ अन्नरूप सोम संस्कारित करो तथा महावेगशाली इन्द्रदेव के लिए श्रेष्ठ रीति से स्तुतियों का उच्चारण करो॥५॥ |
| है इन्द्रदेव ! आपकी विशेष कृपा से प्राचीन समय में विनिर्मित ये जो द्युलोक और पृथ्वी लोक हैं, वहीं विविध लोकों के निर्माता हैं। आपके लिए घृतयुक्त सोमरस प्रस्तुत किया जा रहा है, इसे पीकर आप हर्षित हों तथा मधुररसों से युक्त अन्न आपके लिए प्रसन्नतादायक हो॥६॥ |
| वे इन्द्र निश्चित ही ऐश्वर्यदाता हैं, अतएव ऐसे देव के निमित्त मधुपर्क से परिपूर्ण सोम-पात्र को सादर समर्पित करें । वे मनुष्यों के हितकारी हैं तथा पृथ्वी के व्यापक क्षेत्र में अपने पराक्रम से सभी प्रकार से उन्नतशील हैं॥७॥ |
| अतिशक्तिशाली इन्द्रदेव ने शत्रुसेना को घेर लिया, श्रेष्ठ शत्रु-सेनाएँ भी इन्द्रदेव से मैत्री रूप संधि करने को सदैव प्रयशील रहती हैं। हें इन्द्रदेव ! जिस प्रकार संसार के हित के लिए सत्प्रेरणा से आप समर-क्षेत्र में रथारूढ़ होकर जाते हैं, उसी प्रकार इस समय भी रथ पर आरूढ़ होकर प्रस्थान करें॥८॥ |
सूक्त - ३०
| (यज्ञकाल में) स्तुतियों से प्रशंसित मन की गति के समान शीघ्रता से तेजस्वी आप: देवताओं के लिए भली प्रकार प्रवाहित हों । हे ऋत्विजो ! मित्र और वरुणदेव के लिए श्रेष्ठ अन्नरूप सोम संस्कारित करो तथा महावेगशाली इन्द्रदेव के लिए श्रेष्ठ रीति से स्तुतियों का उच्चारण करो॥१॥ |
| हे पुरोहितगण ! आप हव्यपदार्थों से सम्पन्न रहें । प्रीतियुक्त सुख की कामना करते हुए आप सोम की इच्छा से आपः (जल) की ओर शीघ्रतापूर्वक गमन करें । लालरंग के पक्षी के समान यह श्रेष्ठ आपः जो नीचे क्षरित होता है, आप उसे सत्कर्म-शील हाथों से, तरङ्गरूप में यज्ञ में समर्पित करें॥२॥ |
| हे वग्गण ! आप 'अप्' के सागर को प्राप्त करें और अपांनपात्देव का हविष्यान्न से अर्चन करें । वे आपको अति पवित्र और स्वच्छ तरंगें प्रदान करें । अतएव आप उनके लिए मधुर सेमरस समर्पित करें॥३॥ |
| स्तोतागण जिसकी यज्ञकाल में प्रार्थना करते हैं तथा जो बिना काष्ठ के अन्तरिक्ष में विद्युत्रूप में प्रदीप्त होते हैं, वे हमें वृष्टिरूप जल प्रदान करें, जिससे इन्द्र तेजस्वी होकर अपनी पराक्रम शक्ति को उत्पन्न करें॥४॥ |
| जिस प्रकार युवापुरुष मात्र समवयस्क सुन्दर स्त्रियों से ही सुशोभित और हर्षित होते हैं, वैसे ही इस अप् (जल) से मिलकर सोम सुशोभित होता है । हे ऋत्विग्गण ! आप ऐसे ही जल को सुदूर से प्राप्त करें, जिसके साथ मिलकर सोम स्वच्छ और पवित्र होता है ॥५॥ |
| जिस प्रकार युवतियाँ युवापुरुषों के प्रति सहजढंग से आकर्षित होती हैं तथा जिस प्रकार सहज स्नेहभावना से युवा पुरुष प्रेयसी युवतियों को उपलब्ध करते हैं, उसी प्रकार ऋत्विज् और उनकी स्तुतियाँ दिव्य अप्देवता को जानती हैं तथा दोनों विचारशीलतापूर्वक अपने कार्यों को सम्पन्न करते हैं॥६॥ |
| हे अपूदेव ! जो आपके अवरुद्ध मार्ग को आपके गमन के लिए खोलते हैं और जो आपको भंयकर मार्ग से विमुक्त करते हैं, आप देवताओं के साथ उन इन्द्रदेव को आनन्दप्रद और मधुर सोमरस प्रदान करें॥७॥ |
| हे प्रवाहशील अप्देव ! आपका बीजरूप जो मधुररस युक्त सोमप्रवाह है, उसकी मधुर गुणों से युक्त श्रेष्ठ तरंगों को इन्द्रदेव के लिए प्रेरित करें । हे अनेक ओषधियों से युक्त वैभवशाली अप्देव ! यज्ञ के निमित्त घृताहुति और स्तोत्रोच्चारण किया जा रहा है। आप हमारे इन श्रेष्ठ वचनों को सुनें॥८॥ |
| हे प्रवाहशील अपुदेव ! जो दोनों लोकों के लिए कल्याणप्रद है, उस आनन्दप्रद और इन्द्रदेव के पेय-योग्य सोम-प्रवाह को अति संवर्द्धत रूप में हमें प्रदान करें । वे आनन्ददायक समृद्धि की कामनाओं को पूर्ण करने वाले आकाश में उत्पादित, तीनों लोकों के आश्रय, सहजमार्ग पर गमनशील तथा निरन्तर प्रवाहित होते हैं॥९॥ |
| जिस प्रकार इन्द्रदेव बादलों के बीच से अनेक धाराओं का सृजन करते हैं, उसी प्रकार जल की अनेक धाराओं में सोम समाहित होता है । जल संसार की संरक्षक माता सदृश है, वह सोम के साथ समान रूप से मिलता है, वह स्वयं तत्त्वरूप है, है ऋषियो ! ऐसे जल की आप प्रार्थना करें॥१०॥ |
| हे अप्देव ! आप देवों के प्रति यज्ञीय अर्चन करने के लिए यज्ञकार्य में सहयोग प्र । करें तथा धनार्जन के लिए स्तोत्रोच्चारण करें । सृष्टि के नियम-व्यवस्थानुसार अवरोधों को दूर करके जल की वर्षा करें तथा हम सभी के लिए कल्याणदायक सिद्ध हों॥११॥ |
| हे समृद्धिप्रदा पदार्थों से सम्पन्न अप्देव ! आप अनेक ऐश्वर्यों के अधिपति हैं, आप कल्याणकारी कर्मों और अन्नादि को धारण करें। आप सुसन्तति और ऐश्वर्य के संरक्षक हों । देवी सरस्वती हम स्तोताओं को श्रेष्ठ धन-सम्पदा प्रदान करें॥१२॥ |
| हे अप्देव ! जब आप घृत, दूध और मधुरूप अन्न धारण करते हुए आगमन करते हैं, यज्ञीय ऋत्विजों के साथ हार्दिक भावनाओं से युक्त होकर वार्तालाप करते हैं तथा इन्द्रदेव के लिए विशेष रीति से अभिषवित सोमरस प्रदान करते हैं, तब हम आपको भली प्रकार दर्शन करते और आपकी प्रार्थना करते हैं॥१३॥ |
| हमें श्रेष्ठ ऐश्वर्यों से सम्पन्न और प्राणियों के लिए कल्याणकारी अप् (जल) उपलब्ध हुआ है । हे याज्ञिको ! जल को भली प्रकार आप प्रतिष्ठित करें। आप वृष्टि के अधिष्ठाता रूप देव से श्रेष्ठ ढंग से परिचित हैं, सोमरस के लिए उपयुक्त इस जल को श्रेष्ठ कुशा के आसन पर प्रतिष्ठित करें॥१४॥ |
| देवताओं की ओर उमड़ता हुआ'अप्' तत्परतापूर्वक (शीघ्रतापूर्वक) कुशाओं के बीच यज्ञस्थल में प्रतिष्ठित हुआ है । हे ऋत्विग्गण ! इन्द्रदेव के निमित्त आप सोमरस समर्पित करें । जल आने से देवों के प्रति पूजा-उपासना का कर्म सहज-सरलतापूर्वक पूर्ण हो गया है॥१५॥ |
सूक्त - ३१
| हमारी स्तुतियाँ देवताओं को उपलब्ध हों। स्तुत्य यज्ञदेव सभी शत्रुओं (विकारों) से हमारा संरक्षण करें। देवताओं के साथ हम स्नेहपूर्ण मैत्री स्थापित करेंगे.तथा सभी प्रकार की विपदाओं से मुक्त होंगे॥१॥ |
| सभी प्रकार के ऐश्वर्यों के आकांक्षी मनुष्य अन्त:प्रेरणा से सत्यमार्ग द्वारा सत्कर्मों से संलग्न हों, वे श्रेष्ठज्ञान (सज्ञान) युक्त विवेक-बुद्धि से देवताओं की उपासना करें तथा उनके कल्याणकारी (मंगलकारी विराट् स्वरूप को हृदयक्षेत्र (अन्तः करण) में धारण करें॥२॥ |
| हमने यज्ञकर्म सम्पन्न किया है । यज्ञ में प्रयुक्त पदार्थ तीर्थ के अंशों की तरह देवताओं की ओर पहुँचते हैं। वे देव सबके संरक्षक और शत्रुओं के संहारक हैं । हम स्वाभाविक रूप से उपलब्ध होने योग्य सुखों को सभी ओर से प्राप्त करें तथा सभी देवों के स्वरूप से परिचित हों॥३॥ |
| विश्व के सृजेता सवितादेव ने जिस यजमान को पैदा किया, ऐश्वर्यों के अधिपति और दानशील प्रजापति उसे श्रेष्ठ फल प्रदान करें । भग और अर्यमादेव स्तुतियों से प्रशंसित होकर इस (यजमान) के प्रति प्रीतियुक्त हों तथा सभी देवता यजमान पर सभी प्रकार से अनुग्रह करें॥४॥ |
| जब स्तोत्रों के इच्छुक देवगण सामर्थ्ययुक्त होकर द्रुतगति से आते हैं, तब प्रभातवेला के समान ही यह पृथ्वी हमारे लिए प्रकाशमयी होती है। हमारी प्रार्थनाओं के अभिलाष देवगण हमें स्नेह करते रहें और हम आनन्दप्रद अन्नादि उपभोग-सामग्री प्राप्त कर सकें॥५॥ |
| देवताओं की ओर जाने के लिए इस समय हमारी सनातन, विस्तृत (महिमायुक्त) स्तुतियाँ प्रोत्साहित होकर वृद्धि को प्राप्त हो रही हैं, अतएव हमारे इस देवत्व-संवर्द्धक यज्ञ में सम्पूर्ण देव अपने-अपने स्थान पर स्थित होकर सत्परिणाम देने हेतु आगमन करें॥६॥ |
| वह कौन सा वन और कौन सा वृक्ष है, जिससे उपादान (कच्चा माल) प्राप्त करके दिव्यलोक और पृथिवी लोक को रचा गया है ? ये दोनों लोक परस्पर आश्रित, देवताओं से संरक्षित तथा जीर्णतारहित हैं, दिन और रात्रि दोनों इनसे परिचित हैं॥७॥ |
| द्यावा-पृथिवी के परे भी इस (रचयिता) के समान और कोई नहीं है। जो ईश्वर सृष्टि का निर्माता और द्युलोक-पृथ्वी को धारण कर्ता है, वहीं अन्नादि पोषक पदार्थों का स्वामी हैं । सूर्य के अश्वों ने जिस समय सूर्य का वहन करना शुरू नहीं किया था, उसी बीच उसने अपने आवरण की रचना कर ली थीं॥८॥ |
| रश्मिधारी सूर्य पृथ्वी का उल्लंघन नहीं करते और वायुदेव पृथ्वी को अति वृष्टि से छिन्न-भिन्न नहीं करते । वन के बीच उत्पन्न अग्नि के समान प्रकट होकर मित्र और वरुण अपने प्रकाश को सभी ओर विस्तारित करते हैं॥९॥ |
| जैसे वृषभ द्वारा संयुक्त हुई गाय बछड़ा उत्पन्न करने में सक्षम होती है, उससे वह स्वयं कष्ट सहती हुई भी अपने संरक्षकों को सुख प्रदान करती है, वैसे ही प्राचीनकाल में पितरों द्वारा पुत्र, अरणियों द्वारा अथवा द्यावा-पृथिवी द्वारा अग्नि की उत्पत्ति हुई । जिस समय ऋत्विग्गण उसकी तलाश करते हैं, उस समय शमी वृक्ष से गौ (अग्नि उत्पादक अरणी) उत्पन्न होती है॥१०॥ |
| कण्व ऋषि नृषद के पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। उन कृष्णवर्ण कण्व ने हविष्यान्न समर्पित करके अग्निदेव से ऐश्वर्य- सम्पदा उपलब्ध की । इस यज्ञ में तेजस्वी अग्निदेव ने कृष्णवर्ण कण्व के लिए अपने कान्तिमान् स्वरूप को प्रकट किया। ऋषि कण्व के यज्ञ के समान अग्निदेव के निमित्त किसी दूसरे ने ऐसा यज्ञ नहीं किया॥११॥ |
सूक्त - ३२
| इन्द्रदेव साधक की अर्चना को स्वीकार करने के लिए यज्ञस्थल की ओर अपने अश्वों को प्रेरित करते हैं। यजमान के सत्कर्मों से प्रशंसित होकर श्रेष्ठ हविष्य और प्रार्थना को ग्रहण करने के लिए यहाँ पधारें । यहाँ आकर वे हमारी प्रार्थनाओं और प्रदत्त आहुतियों को स्वीकार करें, तत्पश्चात् वे सोमरूपी अन्न (हव्य) ग्रहण करें॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप दिव्य और दीप्तिमान् धामों में घूमते रहते हैं। हे बहुसंख्यकों द्वारा पूजित इन्द्रदेव ! आप पृथ्वी के श्रेष्ठ स्थानों में वास करते हैं । आपके जो अश्व बार-बार हमारे यज्ञीय कार्यों में आपको यहाँ लेकर आते हैं, वे हम स्तोताओं को ऐश्वर्य-सम्पन्न बनायें॥२॥ |
| जिस प्रकार पुत्र, माता-पिता के धन को ग्रहण करते हैं, वैसे ही इन्द्रदेव भी अद्भुत धन को उत्कृष्ट यज्ञ-कर्मों द्वारा हमें उपलब्ध कराएँ । जैसे कल्याणकारी मधुरवाणी से स्त्री, पति को अपना स्नेहपात्र बनाती है और श्रेष्ठ सुसंस्कृत पुरुष भी स्त्री को धर्मपत्नी के रूप में स्वीकार कर साथ-साथ रहते हैं, वैसे ही इन्द्रदेव शोधित सोमरस को पीकर हमारे सेहपात्र बने अथवा हमें अपना स्नेहपात्र बनायें॥३॥ |
| जिस प्रकार गौएँ गोशाला की ओर जाने की इच्छुक रहती हैं, उसी प्रकार इस पवित्र यज्ञ में इन्द्रदेव के आने की प्रतीक्षा ( इच्छा) में स्तोत्रों का उच्चारण किया जा रहा है । हे इन्द्रदेव ! आप अपनी उज्ज्वल दीप्ति से यज्ञस्थल को प्रकाशित करें तथा हमारे स्तोत्र मंत्रों की श्रेष्ठता यज्ञकर्ताओं में प्रथम स्थान पर रहे, साथ ही सप्त वाणियों ( सप्त छन्दों-सप्तस्वरों) से स्तुति करने वालों को मिलने वाले श्रेष्ठ पद हमें भी प्रदान करें॥४॥ |
| हे याज्ञिको ! देवों की प्राप्ति के अभिलाषी व्यक्ति आपके सहयोग से देवत्वपद प्राप्त करते हैं । इन्द्रदेव रुद्रगणों के साथ अकेले ही शीघ्रता से यज्ञस्थल में पहुँचते हैं। प्रार्थनाएँ ही अमृतस्वरूप देवों से ऐश्वर्यरूपी अनुदान उपलब्ध करने के लिए सक्षम हैं। आप सभी संरक्षणकर्ता देवताओं के निमित्त मधुर सोमरस को जल में मिश्रित करके प्रदान करें॥५॥ |
| अपूतत्त्व अथवा जल में अग्नि रहस्यमय स्वरूप में विद्यमान है । देवताओं के पुण्यकर्मों के संरक्षणकर्ता इन्द्रदेव ने यह रहस्य हमें बताया है । हे अग्निदेव ! मेधावी इन्द्रदेव ही आपका साक्षात्कार करने में समर्थ हैं, उनसे परामर्श लेकर हम आपके समीप आये हैं॥६॥ |
| किसी गन्तव्यपथ से अपरिचित व्यक्ति निश्चित ही पथप्रदर्शक से परामर्श लेते हैं तथा अपने लक्ष्य को उपलब्ध करते हैं। श्रेष्ठ मार्गदर्शक के मार्गदर्शन का यही कल्याणकारी प्रतिफल (सत्परिणाम) है कि अपरिचित (अज्ञानी) व्यक्ति भी ज्ञानरूपी कल्याणमार्ग को उपलब्ध करते हैं॥७॥ |
| ये गोवत्सरूप अग्निदेव प्रकट होकर (प्रज्वलित होकर) कुछ समय से लगातार बढ़ रहे हैं। उन्होंने अपनी माता का दुग्धपान किया है। वे सभी कार्यों को सुगम करने वाले, अपार वैभव-सम्पन्न तथा श्रेष्ठमन की व्यवस्था से पूर्णतायुक्त हैं , तत्पश्चात् इन्हें युवावस्था के साथ ही जीर्णता प्राप्त हुई है॥८॥ |
| हे सम्पूर्ण कलाज्ञानयुक्त स्तुतियाँ सुनने वाले इन्द्रदेव ! आप स्तोत्र, प्रार्थनाओं को सुनकर श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। हे स्तोतारूप वैभव-सम्पन्न (त्वजो) इन्द्रदेव आपके लिए ऐश्वर्य दाता हों, जिसे हम अपने हृदय में धारण करें, ऐसा सोमरस भी वे ( आपको) प्रदान करें॥९॥ |
सूक्त - ३३
| (ऋषि कवष कहते हैं- ) प्रजाओं को प्रेरित करने वाले (देवों या परमात्मा) ने मुझे (कुरुश्रवण) के साथ इस प्रयोजन में नियोजित किया है। मैंने अन्त:करण में पूषादेव को धारण किया। इसके बाद सभी देवों ने मेरी (कवष की) रक्षा की । तब यह उक्ति सुनी गई कि अदम्य (कवष ऋषि अथवा दिव्य संरक्षक) आवरण प्राप्त हुआ॥१॥ |
| सपलियों की तरह मेरे पार्श्व (पसली या आजू-बाजू वाले) पीड़ा देते हैं। दुर्मति, अज्ञान, नग्नता, अभाव, मृत्युभय तथा अशक्तता मुझे सताते हैं। पक्षी की भाँति मेरा मन चंचल हो रहा हैं॥२॥ |
| जैसे चूहा रस से गीले हुए तन्तुओं को खा जाता है, वैसे ही हे असंख्य कर्मों के निर्वाहक इन्द्रदेव ! आपके उपासक होने पर भी हमारी मानसिक व्यथाएँ ही हमें खोखला कर रही हैं । हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आप हमें अभीष्ट फल प्रदान करके हमारे लिए अति सुखदायक हों तथा पिता के समान ही आप हमारा संरक्षण करे॥३॥ |
| मैं ऋषि कवष, त्रसदस्यु के पुत्र, श्रेष्ठ दानी राजा कुरुश्रवण के समीप ऋत्विग्गणों के लिए दान प्राप्ति की इच्छा से आया हूँ॥४॥ |
| जिस राजा कुरुश्रवण के आरूढ़ होने पर तीन अश्व मुझे वहन करते हैं, उस सहस्रों दक्षिणाएँ देने वाले राजा की स्तुति में (कवष) इस यज्ञ में करता हूँ॥५॥ |
| (पुनः कवध ऋषि मित्रातिथि के पुत्र के पास पहुँचते हैं । उनकी उदासीनता देखकर कहते हैं-) हे राजन् उपमश्रवस् ! आपके पिता की वाणी बड़ी सरस थी । वे (दान के लिए आकर्षक खेत के समान (उदार) थे॥६॥ |
| हे मित्रातिथि के पुत्र उपमश्रवस् ! मित्रातिथि के लिए मैं (स्तोता) स्तोत्र गान करता हैं । आप शोक न करते हुए हमारे समीप पहुँचें । आपके पिताजी के हम प्रशंसक हैं॥७॥ |
| देवता अमृत स्वरूप अमर हैं। यदि देवों और मनुष्यों के संरक्षक यहाँ विद्यमान होते, तो ऐश्वर्यवान् मित्रातिथि के निश्चित ही जीवित होने की संभावना की जा सकती थी॥८॥ |
| दैवी अनुशासनों की अवहेलना करते हुए कोई शतायु जीवन का लाभ नहीं पा सकता। हमारे सहयोगी जो असमय ही साथ छोड़कर चल देते हैं, इसका कारण भी दैवीसत्ता के अनुशासन की अवज्ञा ही है॥९॥ |
सूक्त - ३४
| नीचे की भूमि (निम्न स्तर की मनोभूमि) में उपजे (लोभ रूप) बड़े-बड़े प्रभाव-सम्पन्न गतिशील पाँसे मुझे उत्साहित करते हैं । मौजवान् (पर्वत पर उत्पन्न अथवा तरंगित करने वाला) सोम पीने से जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही विभीतक से बने पाँसे मुझे उन्मत्त कर देते हैं॥१॥ |
| मेरी यह सुन्दर, सुशीला पत्नी मुझसे कभी भी असंतुष्ट नहीं होती, वह हमेशा मेरी और मेरे पारिवारिक परिजनों, मित्रों की अथक सेवा करती रही है। मात्र इस अक्षक्रीड़ा (जुआ के खेल) ने ही मुझसे अति मेहमयी पत्नी को छीन लिया॥२॥ |
| जुआ खेलने वाले व्यक्ति को उसकी सास कोसती है और उसकी सुन्दर पत्नी उसका परित्याग तक कर देती है। वह भिखारी बनकर किसी से कुछ माँगता भी हैं, तो उसे अविश्वस्त मानकर सभी उसका तिरस्कार करते हैं। जैसे बूढ़े घोड़े की कोई कीमत नहीं रहती, वैसे ही जुआरी भी अपनी मान-प्रतिष्ठा खो देता है॥३॥ |
| जिस जुआरी के धन पर इन बलशाली पाँसों की दृष्टि पड़ जाये, उसकी पत्नी को भी दूसरे लोग हथिया लेते हैं। उसके माता, पिता और भाई भी उसके सम्बन्ध से कतराने लगते हैं, यहाँ तक कि पहचानने से भी इन्कार करते पाये जाते हैं। कहते हैं, इसे बाँधकर ले जाओ, हमारा इससे कोई सम्बन्ध नहीं है॥४॥ |
| जब कभी मैं मन में विचार करता हूँ कि अब द्यूतक्रीड़ा रूपी पापकर्मों से पीछा छुड़ा लूंगा, क्योंकि मेरे साथी भी मुझे बार-बार अपमानित करते हैं, तभी ये लाल-पीले रंग के पाँसे मुझे आकर्षित कर लेते हैं तथा मैं कुलटा स्त्री की भाँति उनके पास पुन: चला जाता हूँ॥५॥ |
| शरीर से प्रफुल्लित जुआरी, किस धनवान् को अपनी जीत का निशाना बनाऊँ, ऐसा मन ही मन सोचता हुआ चूत-सभा में पहुँचता है । विरोधी (प्रतिपक्षी) जुआरी को हराने के लिए प्रस्तुत किये गये वे पाँसे, धन की अभिलाषा को उत्तरोत्तर बढ़ाते हैं॥६॥ |
| जब जुआरी की चाल उसके अनुकूल नहीं चलती तो वहीं पाँसे जुआरी को अंकुश के समान चुभते, बाण के समान छेदते, छुरे के समान काटते तथा संताप देते हैं । सर्वस्व हार जाने पर परिवार-परिजनों को भारी कष्टकर होते हैं। इसके विपरीत विजयी जुआरी के लिए ये पाँसे पुत्रजन्म के समान हर्षप्रदायक होते हैं, माधुर्य से युक्त तथा मधुर वचनों से अपने चंगुल में फंसाने वाले होते हैं; लेकिन पराजित जुआरी को तो मार ही डालते हैं॥७॥ |
| तिरपन पाँसों का समूह सत्यधर्मपालक सूर्यदेव की किरणों की भाँति क्रीड़ा करता है। वे उग्रस्वभाव युक्त मनुष्य के क्रोध से भी अप्रभावित रहते हुए, न उसके सामने झुकते हैं, न ही उनके वश में आते हैं। बड़े-बड़े राजा भी इन्हें प्रणाम ही करते हैं॥८॥ |
| ये द्यूतक्रीड़ा के पाँसे कभी ऊपर उठते हैं, तो कभी नीचे जाते हैं। हाथों से रहित होते हुए भी पाँसे हाथों से युक्त जुआरियों को पराजित करते देखे जाते हैं । ये जुए के पाँसे दिव्य क्षमता-सम्पन्न होते हुए भी जले हुए अंगारों के समान ही संतप्त करते हैं। ये स्पर्श में शीतल होते हुए भी हृदय को दग्ध करते रहते हैं॥९॥ |
| जुआरी की परित्यक्ता स्त्री दुःख पाती है और कहीं तो अनावश्यक घूमने वाले (जुआरी) पुत्र की माता उसको चिन्ता में दुःखी पायी जाती है । ऋणी जुआरी भयग्रस्त होकर दूसरों के घर में रात्रि बिताता है॥१०॥ |
| जुआरी दूसरों की स्त्रियों को श्रेष्ठ घरों एवं सुख-सौभाग्य से युक्त देखकर अपनी पत्नी की दुर्दशा पर मन ही मन दुःखी होता है; परन्तु सुबह होते ही गेरु (भूरे) रंग के पॉसों से वह फिर से द्यूतक्रीड़ा में शामिल हो जाता है। सायंकाल उसके शरीर पर वस्त्र तक न रह जाने की स्थिति में जुआरी रात को ठण्डक में आग के समीप समय गुजारता है॥११॥ |
| हे अक्ष-समूह ! आपके महासंघ (विशाल समूह) का जो मुख्य नायक हैं और जो सर्वोत्तम राजा है, उसे मैं अपनी दसों अँगुलियों को जोड़कर प्रणाम करता हूँ । ऐसे जुए से प्राप्त धन की भी हमारी कामना नहीं, मेरा यह कथन यथार्थ है॥१२॥ |
| हे द्यूतक्रीड़क ! जुआ कभी मत खेलो, कृषि जैसे उत्पादक कार्यों को करो । (इस प्रकार प्राप्त) धन को ही पर्याप्त मानकर संतुष्ट रहो। इसी से पत्नी और गौओं की प्राप्ति होगी । ऐसा परामर्श हमें साक्षात् सवितादेव ने दिया है॥१३॥ |
| हे अक्षो ! हमें अपना सखारूप मानकर हमारे लिए आप कल्याणकारी हों । हमारे ऊपर कष्टकारी, उग्र, क्रोधी स्वभाव से प्रहार की बात न सोचें । आपके ऐसे क्रोध हमारे विरोधियों को प्राप्त हों, शेष हमारे शत्रु ही भूरे रंग के जुए के पाँसों के बन्धन में जकड़े रहें॥१४॥ |
सूक्त - ३५
| इन्द्रदेव के साथ आवाहित अग्निदेव भी प्रभातवेला में अन्धकार को समाप्त करते हैं तथा तेजस्वितायुक्त होकर प्रदीप्त होते हैं। महिमायुक्त (विस्तृत) द्युलोक और पृथिवीलोक अपने कार्यों में जागरणशील हों । इन्द्रादि देवगण हमारी प्रार्थनाएँ सुनकर हमें संरक्षण प्रदान करें॥१॥ |
| हमारी प्रार्थना है कि द्युलोक और भूलोक हमारे संरक्षक हों, उसी प्रकार लोकों के निर्माण में सहायक सागर, सरोवर, पर्वत, सूर्य और उषा से भी विनम्र निवेदन है कि वे सभी हमें पापकर्मों से मुक्त करें। इस समय जो सोम अभिषुत करके श्रेष्ठ रीति से बनाया गया है, वह भी हमारे लिए कल्याणकारी हो॥२॥ |
| अतिवंदनीय माता-पिता के समान निष्पाप द्यावा-पृथिवी श्रेष्ठ सुखों की प्राप्ति के लिये हमारा संरक्षण करें । अन्धकार की विनाशक उषा हमारे पापकर्मों को विनष्ट करे । हम तेजस्वी अग्नि से कल्याण की कामना करते हैं॥३॥ |
| धनप्रदात्री, पापों की निवारणक, सूर्यदेव से पहले उत्पन्न होने वाली उषा, हम साधकों को सौभाग्यशाली ऐश्वर्य प्रदान करें । निर्धनता से पीड़ित लोगों के क्रोध का भाजन हमें न बनना पड़े। तेजस्वी अग्निदेव से हम कल्याण कामना करते हैं॥४॥ |
| सूर्य की किरणों के साथ आने वाली उषाएँ विशेष प्रकाशमयी होकर अन्धकार को विनष्ट करती हैं। इस समय वे हमें अन्नादि प्रदान करके, हमारे लिये कल्याणकारी होकर, अन्धकार को विनष्ट करें । तेजस्वी अग्निदेव से हम मंगल की कामना करते हैं॥५॥ |
| जिस समय आरोग्यदायिनी उषा हमारी ओर आगमन करती हैं, उस समय में विशेष प्रकाशमान यज्ञीय अग्नि भी प्रज्वलित होती हैं। दोनों अश्विनीकुमार भी शीघ्रगामी रथ में अपने अश्वों को नियोजित कर यहाँ पधारें । तेजस्वी अग्निदेव से हम कल्याण की प्रार्थना करते हैं॥६॥ |
| हे सवितादेव ! आप हमें धारण करने योग्य धन प्रदान करें, क्योंकि आप श्रेष्ठ ऐश्वर्यों के दातारूप हैं। धन को उत्पन्न करने वाली प्रार्थनाओं से हम स्तवन करते हैं। तेजस्वी अग्निदेव से हम सुख की कामना करते हैं ॥७॥ |
| सत्कर्मशील मनुष्य जिस देवयज्ञ को करने के इच्छुक रहते हैं, वहीं यज्ञ हमें भी संरक्षित करे । सूर्यदेव सभी उषाओं को प्रकाशमान करते हुए प्रकट होते हैं। प्रदीप्त अग्निदेव से हम कल्याण की कामना करते हैं॥८॥ |
| इस यज्ञस्थल में आज कुश के आसन बिछाये गये हैं। अभीष्ट फल प्राप्तिरूप सोम अभिषुत करने के लिये दो पत्थर धारण किये गये हैं। हे यजमानो ! अपनी अभीष्टपूर्ति के लिए विद्वेषरहित, मेहमूर्ति आदित्यगणों का आश्रय ग्रहण करो। आपके कर्तव्यकर्म-अनुष्ठान से हर्षित हुए आदित्यदेव आपको सुख प्रदान करने वाले हों । प्रदीत अग्निदेव से हम सुख की प्रार्थना करते हैं॥९॥ |
| हे अग्निदेव ! हमारे अतिविस्तृत, दिव्यतायुक्त यज्ञीय सत्कर्मों में देवगण संगठित होकर आनन्दित होते हैं। इस प्रगति प्रदायक यज्ञ में सप्त होताओं के साथ इन्द्र, मित्र, वरुण, भगदेव तथा अतिरिक्त देवों को भी बुलाकर आप प्रतिष्ठित करें। यज्ञ में उपस्थित सम्पूर्ण देवों से ऐश्वर्य के लिये हम प्रार्थना करते हैं तथा अग्निदेव से हम कल्याण की कामना करते हैं॥१०॥ |
| है आदित्यदेवो ! आप जगविख्यात हैं, हम सबके कल्याण के लिये आप हमारे यज्ञस्थल में पधारें । आप सभी पारस्परिक सहयोग से ऐश्वर्य-वृद्धि के लिये हमारे यज्ञों को संरक्षण प्रदान करें । बृहस्पतिदेव, पूषादेव, अश्विनीकुमारों, भगदेव तथा प्रदीप्त अग्निदेव से हम कल्याण की कामना करते हैं॥११॥ |
| हे आदित्य देवो ! आप हमारे यज्ञ को सर्वसुख-सम्पन्न बनायें । हमें ऐश्वर्यशाली, सुखप्रद, मनुष्यों के पालन में सक्षम राजभवन प्रदान करें । हम तेजस्वी अग्निदेव से पुत्र-पौत्रादि, गवादि पशु तथा दीर्घजीवनादि सभी प्रकार के कल्याण की कामना करते हैं॥१२॥ |
| आज सभी मरुदेव और रुद्रादिदेव हमारा संरक्षण करें, सम्पूर्ण अग्नियाँ प्रज्वलित हों । सभी इन्द्रादिदेवगण हमारे संरक्षण के लिये यज्ञ में पधारें । हमें सभी प्रकार की ऐश्वर्य-सम्पदा एवं अन्न सामग्री उपलब्ध हो॥१३॥ |
| हे शीघ्र अभीष्टफलपूरक देवो ! आप युद्ध क्षेत्र में जिसका संरक्षण करते हुए शत्रुपक्ष से सुरक्षित करते हैं, पापकृत्यों का निवारण करके जिसे ऐश्वर्य-सम्पन्न बनाते हैं तथा जो आप के संरक्षण में निर्भय रहते हैं, हम देवाराधक मनुष्य इसी प्रकार के गुणों को धारण करें॥१४॥ |
सूक्त - ३६
| हम अपने यज्ञस्थल में महिमामय एवं श्रेष्ठ शोभायुक्त प्रभातवेला, रात्रि, द्यावा, पृथ्वी, वरुण, मित्रगण, अर्यमा, इन्द्र, मरुद्गण, पर्वत, जल, आदित्यगण, अन्तरिक्ष तथा देवलोक आदि को सादर आमन्त्रित करते हैं ॥१॥ |
| यज्ञ के अधिष्ठाता स्वरूप तथा विशाल हृदयवाले द्यावा-पृथिवी हमें सभी पापों से संरक्षित करें । पापबुद्धि युक्त (पाप वृत्ति रूप) मृत्युदेव हमें अपने नियन्त्रण से निवृत्त करें। आज हम देवशक्तियों से श्रेष्ठ संरक्षण की कामना करते हैं॥२॥ |
| ऐश्वर्य सम्पन्न मित्रावरुण तथा देवों की माता देवी अदिति हमें संम्पूर्ण पापकर्मों से बचायें, जिससे हम अविनाशी, संरक्षणयुक्त तेजस्विता को प्राप्त करें । हम देवशक्तियों से पूर्ण - संरक्षण की प्रार्थना करते हैं॥३॥ |
| सोम अभिषवण में प्रयुक्त पाषाण, अभिषवण क्रिया के समय शब्दायमान होते हुए यज्ञ में विघ्नकारी असुरों, कष्टदायक स्वप्नों, मृत्युरूप पापों तथा सभी पैशाचिक दुष्कृत्यों में संलग्न शत्रुओं का संहार करें । इस प्रकार विनों से रहित यज्ञ में हम आदित्यों और मरुद्गणों से सुख प्राप्त करें। हम आज सभी देवताओं से पूर्ण संरक्षण की कामना करते हैं॥४॥ |
| इन्द्रदेव हमारे यज्ञ में आकर आसन ग्रहण करें । वाणी और पृथ्वी हमें श्रेष्ठ फल प्रदायिनी हों । सामगान से प्रशंसायुक्त बृहस्पतिदेव उनकी स्तुति करें । हम जीवनोपयोगी , श्रेष्ठ अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले धन उपलब्ध करें । हम देव शक्तियों से भलीप्रकार संरक्षण की प्रार्थना करते हैं॥५॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! हमारा सत्कर्मरूपी यज्ञ अति तेजस्वी अग्नि से युक्त, हिंसारहित तथा अनिष्टरहित होकर हमारे अभीप्सित लाभ के लिये कल्याणप्रद हो, ऐसी आपकी कृपा रहे । जिस अग्नि में घृतयुक्त हवियाँ प्रदान की जाएँ, उनकी ज्योतियों को देवों के प्रति प्रेरित करें । आज हम देवशक्तियों से पूर्ण संरक्षण की कामना करते हैं॥६॥ |
| यज्ञ सम्पादनशील, पवित्रतायुक्त, दर्शनीय और सुखदायक मरुद्गणों की हम प्रार्थना करते हैं। धन के दानकर्ता उन्हें हम, मैत्री भावना से आवाहित करते हैं। सुखदाता, कीर्तिवान् , अन्नों के दानकर्ता मरुद्गणों को हम हृदय में धारण करते हैं। हम तेजस्वी अग्निदेव से रक्षा की प्रार्थना करते हैं॥७॥ |
| जल के संरक्षक, प्राणियों के लिए सन्तोषप्रद (आनन्दप्रद) , देवों के तुष्टिदायक, प्रशंसनीय, श्रेष्ठ संज्ञक, यज्ञ की शोभा तथा श्रेष्ठ रश्मिधाराओं से युक्त सोम को हम धारण करते हैं । उनसे हम शक्ति की प्राप्ति के लिए कामना करते हैं तथा सभी देव शक्तियों से आज हम संरक्षण की प्रार्थना करते हैं॥८॥ |
| अपनी और अपनी सन्तानों के दीर्घायुष्य से युक्त एवं दुष्कर्मों से रहित होकर हम उपभोग्य सामग्रियों और श्रेष्ठ सत्कर्मों द्वारा परमात्मा की सच्ची आराधना करें। परमात्मज्ञान से रहित लोग सभी प्रकार के पापकर्मों में संलग्न होकर शीघ्र विनाश को प्राप्त हों । हम देवशक्तियों से आज श्रेष्ठ संरक्षण की कामना करते हैं॥९॥ |
| हे आराध्य देवगण ! आप सम्पादित यज्ञ भाग को उपलब्ध करने के अधिकारी हैं। आप हमारी प्रार्थना-स्तुतियों का श्रवण करें । हम आपसे जिन मनोरथों की कामना करते हैं, उन सभी ज्ञान, बल, ऐश्वर्य तथा सन्तानादि से युक्त यश आप हमें उपलब्ध करायें । आज हम देवों से संरक्षण की कामना करते हैं॥१०॥ |
| आज हम महिमायुक्त, व्यापक तथा अविचल-इन्द्रादि देवताओं से संरक्षण की प्रार्थना करते हैं, जिससे हम ऐश्वर्य और वीर सन्तानों को प्राप्त करें। आज हम देवशक्तियों से श्रेष्ठ संरक्षण की प्रार्थना करते हैं॥११॥ |
| सवितादेव की आज्ञा के अनुगत होकर हम देवों के उत्तम संरक्षण का वरण करते हैं। हम प्रदीप्त अग्निदेव के आश्रय को प्राप्त होते हुए मित्र और वरुणदेव के मध्य में अपराधरहित होकर सदा कल्याण को प्राप्त करें॥१२॥ |
| जो देवगण सत्यकर्मों के प्रेरक सवितादेव, मित्र और वरुण के व्रत - नियमों में संलग्न हैं, वे वीर सन्तानों से सम्पन्न, पशुओं से युक्त सम्पदा, ज्ञान-धन, पूजा योग्य सम्पत्तियाँ तथा सत्कर्म की प्रेरणा हमें प्रदान करें॥१३॥ |
| जो सर्व उत्पादक सवितादेव पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सभी दिशाओं में विस्तृत हैं, वे सवितादेव हमें सभी प्रकार की ऐश्वर्य - सम्पदा उपलब्ध करायें । वे सवितादेव हमें दीर्घायुष्य प्रदान करें॥१४॥ |
सूक्त - ३७
| हे ऋत्विग्गण ! आप मित्र और वरुणदेवों को देखने वाले, महान् दिव्यतायुक्त, अति दूर से सभी वस्तुओं के दर्शक, देवों के कुल में उत्पन्न, जगत् के प्रकाशक तथा द्युलोक के पुत्रस्वरूप सूर्यदेव को नमन करें । उनके सत्यपथ का अनुगमन करें तथा उनकी अर्चना करें॥१॥ |
| जिसके आश्रय से द्युलोक - पृथ्वी और दिन-रात उत्पन्न होते हैं, जो गतिमान हैं, जड़ से पृथक् चेतन भी जिसके आश्रय में निवास करते हैं, जिसके प्रभाव से जल निरन्तर प्रवाहित रहता है और सूर्योदय होता है, सत्य से युक्त ऐसे वचन हमें सभी प्रकार से संरक्षित करें॥२॥ |
| हे सूर्यदेव जब आप वेगशील अश्वों को रथ से योजित करके आकाशमार्ग में गमन करते हैं, तब कोई अदेव आपके निकट नहीं पहुँच सकता । आप जिस तेजस्विता के साथ उदित होते हैं, वहीं आपका अनुगमन करती हैं॥३॥ |
| हे सूर्यदेव ! आप जिस तेजस्विता से अन्धकार को विनष्ट करते हैं तथा जिन प्रकाशकिरणों से सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करते हैं, उसी तेजस्विता के प्राण से पापकर्मों का निवारण करें; अन्न-जल की अभावग्रस्तता, रोगों-व्याधियों तथा कुविचारों आदि मानसिक कष्टों का निवारण करें॥४॥ |
| हे सूर्यदेव ! आप सर्वप्रेरक होकर सहज-स्वभाव से विश्व के व्रतों - कर्मों का संरक्षण करते हैं और प्रात: कालीन यज्ञों की आहुतियों को ग्रहण करते हैं । हे सूर्यदेव ! आज जिस समय हम आपके पावन नाम से आपकी प्रार्थना करते हैं, उस यज्ञीय क्रम का इन्द्रादि देवगण समर्थन प्रदान करें॥५॥ |
| इन्द्रदेव, मरुद्गण, जल तथा द्यावा-पृथिवी हमारे आवाहन पर हमारी वाणी को सुनें । हमारे ऊपर सूर्यदेव की कृपा बनी रहे, उनके दर्शन से लाभान्वित होकर हम कष्टों से बचे रहें । हम दीर्घायुष्य को प्राप्त करके कल्याणकारी-सुखी जीवन को भोगते हुए वृद्धावस्था की ओर बढ़े॥६॥ |
| हे आदित्यदेव ! आपकी कृपा से हम सदैव सुविचारों से सम्पन्न, शोभनदृष्टि से युक्त, सुसन्ततियों से सम्पन्न, आरोग्य-सम्पन्न तथा पाप कर्मों से रहित हों । हे मित्रगणों से पूजनीय ! हम जीवन्त रहकर प्रतिदिन उदय होते हुए आपके ज्योतित स्वरूप के दर्शन करें॥७॥ |
| हे सूर्यदेव ! महिमामय ज्योति के धारणकर्ता, देदीप्यमान, सबके नेत्रों के लिए सुखद, अतिशक्तिमान् , समुद्र के जल से ऊपर आकाशमण्डल में उदित होते हुए हम सभी आपके दर्शन लाभ से प्रतिदिन लाभान्वित हों॥८॥ |
| हे हरिकेश सूर्यदेव ! आपकी जिस ज्ञानरूप (प्रकाशरूप) ध्वजा से सम्पूर्ण विश्व प्रकाशमान होता है और जिससे आप प्रत्येक रात्रि को अन्धकार दूर करते हैं, आप उसी ध्वजा के सहित प्रतिदिन उदित हों । हमें पापकर्मों से निवृत्त करके श्रेयमार्ग पर चलायें, आप हमारे लिए श्रेयस्कर हों॥९॥ |
| हे सूर्यदेव ! आप अपनी तेजस्विता से हमारे लिए कल्याणकारी हों; अपने दिवस, रश्मियाँ, शीतलता तथा उष्णता से हमें सुखी करें । आप हमारे जीवन-पथ तथा घरों में भी शान्तिवर्षा करें; हमें आप ऐश्वर्य प्रदान करें॥१०॥ |
| हे देवगण ! आप द्विपाद मनुष्यों-पक्षियों तथा चतुध्याद पशुओं, सभी प्राणियों को सुख प्रदान करें । सभी के खान-पान ऊर्जावर्द्धक (बलवर्द्धक) हों, हितकारी हों । सभी को हितकारी, निष्पाप एवं स्वावलम्बी जीवन प्रदान करें॥११॥ |
| हे ऐश्वर्यवान् देवगण ! वाणी या मन से हमारे द्वारा देवताओं को कुपित करने वाले जो पाप हो जाते हैं, उनका दोष आप उन पर डालें, जो यज्ञरहित-अदानशील तथा हमारी अनिष्ट करने वाले हैं॥१२॥ |
सूक्त - ३८
| हे इन्द्रदेव ! ऐसे संग्राम में, जो यशस्वितायुक्त हैं, जिसमें हमले पर हमले का क्रम चलता है, उसमें आप वीरोचित शौर्य से उद्घोष करते हैं तथा रिपुओं द्वारा जीती गयी गौओं को सुरक्षित करते हैं। इस युद्ध में एक तरफ तीक्ष्णधार युक्त बाण, योद्धा शत्रुओं पर गिरते हैं, इसे देखकर लोग विस्मित हो जाते हैं॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप प्रचुर धन-धान्य और गोधन से हमारे घरों को परिपूर्ण करें । हे सबके आश्रयभूत इन्द्रदेव ! आपके विजयी होने पर हम आपके कृपापात्र बनें, जिस ऐश्वर्य की हम कामना करते हैं, वह हमें उपलब्ध हो॥१॥ |
| हे असंख्यों के स्तुतियोग्य इन्द्रदेव ! जो दासजाति, आर्यजाति या जो कोई भी देवविरोधी असुर हमारे साथ संग्राम के आकांक्षी हैं, वे शत्रु आपकी अनुकम्पा से पराभूत हों । हम आपके सहयोग से उन्हें पराजित करें॥३॥ |
| जिनकी अर्चना अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक सभी मनुष्य करते हैं, जो भयंकर संग्राम में विजयी बनकर श्रेष्ठधनों को प्राप्त करते हैं। उन पवित्रतायुक्त और सुप्रसिद्ध नायक इन्द्रदेव को हम अपने संरक्षण के लिए आवाहित करते हैं॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप अपने साधकों को प्रोत्साहित करते हैं। हमें किसके द्वारा प्रोत्साहन प्राप्त होगा ? यह हमें ज्ञात है कि आप अपनी सामर्थ्य से ही अपने बन्धनों को काटने में सक्षम हैं, अतएव स्वयं को तथा दूसरों को शीघ्र विमुक्त करें । कुत्स के बन्धन से आप हमें मुक्त करें तथा यहाँ उपस्थित हों । क्या आपके समान समर्थ व्यक्ति मुष्कद्वय के बन्धन में जकड़े रह सकते हैं?॥५॥ |
सूक्त - ३९
| हे अश्विनीकुमारो ! आपका सर्वत्र विचरणशील जो श्रेष्ठ सुखद् रथ है, उस रथ को आवश्यक कार्य हेतु रात-दिन यजमान लोग आदरपूर्वक आवाहित करते हैं, हम ऐसे रथ का नामोच्चारण करते हैं । जैसे पिता का नाम लेने से हृदय आनन्दित होता है, वैसे ही इस रथ के साथ आपको आवाहित करते हुए प्रसन्नता होती है॥१॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप हमें श्रेष्ठ सम्भाषण की ओर प्रेरित करें, हमारे श्रेष्ठ कर्मों को सफल बनाएँ। आप दोनों नानाविध प्रेरणाओं को प्रकट करें, हम यही आकांक्षा करते हैं। हमें कीर्तियुक्त उपयोगी ऐश्वर्य प्रदान करें। जिस प्रकार सोमरस कल्याणकारी हैं, वैसे ही ऐश्वर्य-सम्पन्नों में हमें सर्वश्रेष्ठ बनाएँ॥२॥ |
| हे सत्यनिष्ठ अश्विनीकुमारो ! पिता के घर में जब एक असहाय नारी वार्द्धक्य को प्राप्त कर रही थी, तब आप दोनों के सहयोग से उसे अपने सौभाग्यस्वरूप वर की प्राप्ति हुई । जो चलने में असमर्थ हैं, उसके लिए आप आश्रयरूप हैं । आपको लोग नेत्रहीन, दुर्बलकाय तथा रोग से दुःखी मनुष्यों का चिकित्सक मानते हैं॥३॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने शरीर से जर्जर च्यवनषि को उसी प्रकार यौवन प्रदान किया, जिस प्रकार कोई पुराने रथ को नये ढंग से विनिर्मित करके दुबारा गतिशील होने के लिए तैयार कर देता हैं। आपने ही तुम - पुत्र भुज्यु को जल के ऊपर से सुरक्षित किया। आप दोनों के ये कार्य यज्ञादि कर्मों में विशेष वर्णनीय हैं॥४॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के प्राचीनकाल के वीरतापूर्ण किये गये कार्यों का हम लोगों में प्रसार करते हैं । हे सत्यनिष्ठ ! आप दोनों ही अतिकुशल चिकित्सक हैं । आपके आश्रय को प्राप्त करने के लिए हम आपकी प्रार्थना करते हैं। जिससे यजमान श्रद्धा - भावना से युक्त हों, आप ऐसी कृपा करें॥५॥ |
| हे अश्विनीदेवो ! आप दोनों का, यह घोषा आवाहन करती है, उसके निवेदन पर ध्यान दें । जैसे पिता, पुत्र को मार्गदर्शन देते हैं, वैसे ही आप मुझे परामर्श दें। मेरा कोई सहायक बन्धु नहीं। मैं ज्ञान से रहित, परिवार परिजनों से रहित तथा अल्पज्ञा हूँ । मेरे दुर्गतिग्रस्त होने से पूर्व ही आप दोनों मुझे इस दुर्दशा से उबारें॥६॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने पुरुमित्र नामक राजा की शुन्थ्युव नाम की पुत्री को रथारूढ़ करके उसके पति विमद को सौंप दिया था। आप दोनों ही वधिमती के आवाहन पर उसके समीप आये थे, उसके निवेदन को सुनकर तथा प्रसव-वेदना को दूर करके प्रसव में सहायक हुए थे॥७॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने जर्जरकाया वाले ऋषि को पुनः यौवन प्रदान किया। आपने पत्नी शोक से दु:खी वन्दन नामक ऋषि को कुएँ से बाहर निकाला था। उसी प्रकार आपने लँगड़ी (अपंग) विश्पला को लोहे की जङ्घा प्रत्यारोपित करके उसे चलने-फिरने के लिए उपयोगी बनाया॥८॥ |
| हे अभीष्ट फलदायक अश्विनीकुमारो !जब रेभ नामक ऋषि को दुष्ट शत्रुओं ने मरणासन्न स्थिति में गुफा के बीच छिपा लिया था, तब आपने ही उन्हें कष्टमुक्त किया था। जिस समय अत्रि ऋषि सात बन्धनों से बाँधे जाकर प्रज्वलित अग्निकुण्ड में झोंक दिये गये थे, उस समय भी आप दोनों ने ही उन्हें अग्निकुण्ड से मुक्त किया था॥९॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने ही राजा पेदु को निन्यानवे अश्वों के साथ एक श्वेतवर्ण का उत्तम अश्व भी प्रदान किया था। ये सभी शत्रुपक्ष को पराभूत करने के लिए ही प्रदान किये थे। यह विचित्र अश्व शत्रुसेनाओं को खदेड़ देने वाला, बुलाये जाने पर शीघ्र आने वाला, योद्धाओं के लिए बहुमूल्य ऐश्वर्यप्रद था। उसके नामोच्चारण से प्रसन्नता होती थी तथा देखने से मन पुलकित हो जाता था॥१०॥ |
| हे अविनाशी राजास्वरूप अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के नाम लेने से भी आनन्द की अनुभूति होती हैं । जिस समय आप मार्ग में गमन करते हैं, उस समय सभी ओर से आपकी प्रार्थना होती है। यदि आप दम्पती को रथ के अगले हिस्से में चढ़ाकर आश्रय दें, तो उन्हें कोई भी पाप, दुर्गति और संसार के भय स्पर्श नहीं कर सकेंगे॥११॥ |
| हे अश्विनीकुमारों ! आपके निमित्त जो रथ ऋभुदेवों ने प्रदान किया, जिसके प्रकट होने पर तेजस्वी अन्तरिक्ष की पुत्री देवी उषा का उदय होता है और सूर्यदेव से अति मनोहर दिन तथा रात्रि जन्म लेते हैं, ऐसे मन से भी अति गतिशील रथ से आप आगमन करें॥१२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप उस विजयी रथ से पर्वत की ओर प्रस्थान करें, शंयु की वृद्धा गाय को पुनः दुधारू बनाएँ । आपने अपनी सामर्थ्य से भेड़िये के मुँह से पति वर्तिका (चटका) को मुक्त करके उसका संरक्षण किया था॥१३॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार भृगु वंशजों द्वारा रथों का निर्माण किया जाता है, वैसे ही हम यह रथ (स्तोत्र) आपके लिए समर्पित करते हैं। जैसे दामाद को कन्या देने के समय लोग उसे वस्त्राभूषण से सुशोभित करते हैं, वैसे ही हम इन स्तोत्रों को भावना से समर्पित करते हैं। हमारे पुत्र-पौत्रादि सन्ताने सदैव सुख-सौभाग्य युक्त हों॥१४॥ |
सूक्त - ४०
| हे कर्मों के द्रष्टा अश्विनीकुमारो ! आपका तेजस्वी रथ जिस समय प्रात:काल गमन करता है और प्रत्येक साधक के पास सुखोपभोग के साधन ले जाता है, उस समय अपने यज्ञ की सफलता के लिये कौन याजक उस तेजस्वी रथ का स्तुतिगान नहीं करता? आपका वह रथ किस स्थान पर स्थित है ?॥१॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों रात्रि में किन स्थानों तथा दिन में भी किस स्थान की ओर गमन करते हैं? कहाँ पर अपना समय व्यतीत करते हैं? जैसे विधवा स्त्री द्वितीय वर तथा सुन्दर स्त्री अपने पति को सम्मानित करती है, उसी प्रकार यज्ञकाल में आदर सहित आपका कौन आवाहन करते हैं?॥२॥ |
| हे नेतृत्व क्षमता-सम्पन्न अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार प्रात:काल वैभवशाली राजाओं को, चारण (प्रशंसक) स्तोत्रों द्वारा जगाते हैं, वैसे ही आप दोनों के लिए प्रात: काल ही स्तोतागण स्तोत्रगान करते हैं । यज्ञ भाग को प्राप्त करने के लिए आप प्रतिदिन किस यजमान के गृह में प्रवेश करते हैं? आप यजमान के किन दोषों का निवारण करते हैं? आप दोनों राजपुत्रों के समान ही किस यजमान के यज्ञ में जाते हैं ?॥३॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! जैसे व्याध, हाथी और शेर की आकांक्षा करते हैं, वैसे ही हम आपको रात-दिन हविर्द्रव्यों के साथ आवाहित करते हैं । हे उत्तम नायको ! आपके निमित्त यथाकाल यजमान-साधक आहुतियाँ समर्पित करते हैं, आप दोनों मनुष्यों के लिए अन्नादि प्रदान करते हैं। आप कल्याणकारी उद्देश्यों के स्वामी हैं॥४॥ |
| हे उपदेशक अश्विनीकुमारो ! मैं कक्षीवान् की पुत्री राजकुमारी घोषा हूँ । जो चारों ओर भमणशील होकर आपका ही यशोगान करती हूँ । आप दोनों के प्रति ही जिज्ञासु भावनाएँ रखती हैं । दिन और रात आप मेरे कल्याण के निमित्त नित्य कर्मों में सहायक बनें॥५॥ |
| हे क्रान्तदशीं अश्विनीकुमारो ! आप दोनों रथारूढ़ हों । कुत्स के समान ही आप स्तुतिकर्ता के गृह में रथ पर विराजमान होकर जाते हैं । हे अश्विनीकुमारो ! आपके पास प्रचुर मात्र में मधु है । नारियों की तरह मक्खियाँ भी उसे मुँह में ग्रहण करती हैं॥६॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! दुःखद स्थिति में समुद्र में पड़े हुए भुज्यु नामक व्यक्ति को आपने ही सुरक्षित किया था। आपने राजा वश और ऋषि अत्रि के श्रेष्ठ स्तोत्र से प्रशंसित होकर उनका उद्धार किया था। आपकी मित्रता श्रेष्ठ दानी ही प्राप्त कर सकते हैं । आपके संरक्षण में जो सुख-शान्ति मिलती है, उसकी अभिलाषा घोषा करती है॥७॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आपने अपने सहायक कृश, ष शंयु तथा विधवा नारी को संरक्षित किया था। यज्ञ सम्पादनशील के लिये आप ही बादलों को खुला करते हैं, जिससे बादल ध्वनि करते हुए जल बरसाते हैं॥८॥ |
| हे अश्विनीकुमारो । आपकी सामर्थ्य से ही यह घोषा, नारी लक्षणों से युक्त होकर सौभाग्यवती हुई, यथेच्छित वर-श्रेष्ठ की उसे प्राप्ति हुई । आपकी कृपावृष्टि से ही श्रेष्ठ वनस्पतियाँ हरी-भरी हुई हैं। नीचे की ओर अपने प्रवाह को करके, नदियाँ प्रवहमान हैं, इन सभी को सामर्थ्य एवं आरोग्य लाभ प्राप्त हुआ है॥९॥ |
| है अश्विनीकुमारो ! जो पुरुष अपनी पत्नी की जीवन रक्षा के लिए रोदन तक करते हैं, उन्हें यज्ञादि सत्कर्मों में नियोजित करते हैं, गर्भाधानादि संस्कार से सन्तानोत्पादन करके पितृ-यज्ञ में नियोजित करते हैं, उनकी स्त्रियाँ उन्हें सुख और सहयोग प्रदान करती हैं॥१०॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! मैं उस सुख से अपरिचित हूँ। आप ही उन सुखों का वर्णन करें, जो युवा पति-युवा पली के साथ रहकर प्राप्त करते हैं। मेरी इच्छा है कि पत्नी से प्रेम करने वाले स्वस्थ-बलिष्ठ पति के गृह में पहुँचें॥११॥ |
| हे अन्न और ऐश्वर्ययुक्त अश्विनीकुमारो ! आप हमारे प्रति कृपा दृष्टि करें, हमारी मानसिक इच्छाओं की पूर्ति में सहायक हों, आप हमारे लिए कल्याणकारी हों । हम अपने पति की प्रेमपात्र बनकर पतिगृह को सुशोभित करें॥१२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप मेरी प्रार्थना से प्रशंसित होकर मेरे पतिगृह को ऐश्वर्य एवं सन्तानादि से परिपूर्ण करें । हे कल्याणकारी अश्विनीकुमारो ! आप हमें सुख से सेवन करने योग्य जल प्रदान करें। हमारे पतिगृह के गमनमार्ग में यदि कोई दुष्ट, विघ्न उपस्थित करे , तो उसका निवारण करें॥१३॥ |
| हे दर्शनीय एवं कल्याणकारी अश्विनीकुमारो ! आजकल आप कहाँ, किनके गृहों में मनोविनोद करते हुए संरक्षण प्रदान करने के गुण से स्वयं को सन्तुष्ट करते हैं? कौन यजमान आप दोनों को बाँधकर रखने में समर्थ हैं ? किस ज्ञानवान् यजमान के गृह में आप गये हैं ?॥१४॥ |
सूक्त - ४१
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के पास एक ही रथ है, उस उत्तम रथ की स्तुति करते हुए अनेक लोग उसका आवाहन करते हैं । वह रथ तीन चक्रों से युक्त है, जो यज्ञ स्थलों में जाता हैं । वह चारों ओर विचरते हुए यज्ञों को सफल बनाता है, प्रतिदिन प्रभात वेला में हम श्रेष्ठ स्तुतियों से उसी रथ का आवाहन करते हैं॥१॥ |
| हे सत्यनिष्ठ एवं नायक अश्विनीकुमारो ! आप प्रभात वेला में ही मधु वहन करके ले जाने वाले अश्वों से जोते गये रथ पर विराजमान हों । उसके द्वारा यज्ञशील यजमानों के समीप जाएँ, जो आपकी प्रार्थनाएँ करते हैं, उसके होतृयुक्त यज्ञ में भी आप भाग लें॥२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हाथ में मधु धारण किये हुए अध्वर्यु , सुहस्त अथवा अग्निध नामक जो जितेन्द्रिय प्रत्व दान भावना से प्रेरित हैं, उनके समीप पहुँचे । आप सदैव विद्वान्-ज्ञानी यजमानों के यज्ञों में गमन करते हैं । मधुपान करने के लिए आप हमारे घर में भी अवश्य पधारें॥३॥ |
सूक्त - ४२
| जिस प्रकार धनुर्धारी उत्तम रीति से लक्ष्यवेधी बाणों का प्रहार करते हैं तथा पुरुष आभूषणों से सुसज्जित होते हैं, वैसे ही इन्द्रदेव के लिए श्रेष्ठ स्तुतियों का प्रयोग करें । हे ज्ञानी मनुष्यो ! प्रतिस्पर्धा करने वालों के लिये ऐसी स्तुतियों का प्रयोग करें, जिससे वे पराजित हो जाएँ । हे स्तोताओ ! पराक्रमी इन्द्रदेव को सोमपान की ओर आप लोग आकर्षित करें॥१॥ |
| हे स्तुतिकर्ता ! जिस प्रकार गौओं का दोहन करके अपना प्रयोजन पूर्ण किया जाता है, वैसे ही मित्रस्वरूप इन्द्रदेव से अपने अभीष्टफलों को उपलब्ध करें, प्रशंसा योग्य इन्द्रदेव को जाग्रत् करें । जैसे मनुष्य अन्न से भरे हुए पात्र के मुख को नीचे की ओर करके उसके अन्न को निकालते हैं, वैसे ही शूर इन्द्रदेव को अभीष्ट सिद्धि के लिए अनुकूल बनायें॥२॥ |
| हे वैभवशाली इन्द्रदेव ! आपको ज्ञानी लोग कामनापूरक क्यों कहते हैं? आप हमें धन से सम्पन्न बनाएँ, हम आपको प्रोत्साहित करने वाला मानते हैं। हे इन्द्रदेव ! हमारी विवेक-बुद्धि,कार्यों को कुशलता से सम्पादित । करे, आप हमें श्रेष्ठ ऐश्वर्य-सम्पदा से सौभाग्ययुक्त करें॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! योद्धा लोग समरभूमि में जाते हुए सहयोगार्थ आपका स्मरण करते हैं। वे साधक युद्ध में वीर की सहायता करते हैं । जो वीर इन्द्र के लिए सोम प्रस्तुत नहीं करते, वे इन्द्र की मैत्रीभावना से वञ्चित रहते हैं॥४॥ |
| जो हविष्यान्नयुक्त यजमान असंख्य गौ-अश्वादि देने वाले वैभवशाली के समान ही उदार हृदय से इन्द्रदेव को तीव्र सोमरस समर्पित करते हैं, वे इन्द्रदेव का सहयोग प्राप्त करते हैं। वृत्रहनकर्ता इन्द्रदेव उस यजमान के ते है हननको इन्दै सामर्थ्यवान् एवं अनेक आयुधों से युक्त सैन्यदल वाले शत्रुओं को भी शीघ्रातिशीघ्र परास्त कर देते हैं तथा विघ्नकारी असुरों का संहार करते हैं॥५॥ |
| जिन इन्द्रदेव की हम स्तोत्रों से प्रार्थना करते हैं तथा जो ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव हमें अभीष्ट ऐश्वर्यं प्रदान करते हैं, उनके सामने से शत्रु भयभीत होकर पलायन करें तथा शत्रुपक्ष की ऐश्वर्य-सम्पदा इन्द्रदेव को उपलब्ध हो॥६॥ |
| हे इन्द्रदेव ! असंख्य साधक आपको आमन्त्रित करते हैं । जो आपका तीक्ष्ण वज्रास्त्र है, उससे आप हमारे समीपस्थ शत्रुओं को खदेड़ कर दूर करें तथा हमें अन्न-जौ एवं गवादि से युक्त सम्पदा प्रदान करें । अपने स्तुतिकर्ता की प्रार्थना को अन्न-रत्नप्रसविनी बनाएँ ॥७॥ |
| तीक्ष्ण सोमरस, मधुररस के रूप में विभत्रधाराओं से गिरता हुआ, जिस समय इन्द्रदेव की देह में प्रविष्ट होता है, उस समय वैभव-सम्पन्न इन्द्रदेव सोमरस प्रदाता यजमान का विरोध नहीं करते, अपितु प्रचुर (पर्याप्त) मात्रा में सोमरस के प्रस्तुतकर्ता को (इच्छित) सम्पत्ति प्रदान करते हैं॥८॥ |
| जैसे पराजित जुआरी, विजयी जुआरी को खोजकर अपनी पिछली पराजय का बदला, उसे पराजित करके लेता है, वैसे इन्द्र भी अनिष्टकारी शत्रु के ऊपर पराक्रमी हमला करके उसे पराजित करते हैं। जो साधक देवपूजन (यज्ञादि) में आर्थिक कंजूसी नहीं दिखाते, ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव उस साधक को धन-सम्पदा से सम्पन्न बनाते हैं॥९॥ |
| हे बहुसंख्यकों द्वारा आवाहनीय इन्द्रदेव ! आपकी कृपादृष्टि से हम गोधन द्वारा दुःख-दारिद्रयों से निवृत्त हो; जौ आदि अत्रों से क्षुधा को शान्त करें। हम शासनाध्यक्षों के साथ अग्रसर होते हुए अपनी सामर्थ्य-क्षमता से शत्रुओं की विपुल सम्पदाओं को अपने (आधिपत्य) में ले सकें॥१०॥ |
| दुष्ट-पापी शत्रुओं से बृहस्पतिदेव हमें पश्चिम से, उत्तर से तथा दक्षिण से संरक्षित करें । इन्द्रदेव पूर्वदिशा और मध्यभाग से आगमन करने वाले शत्रुओं से हमें संरक्षित करें । वे इन्द्रदेव सबके मित्र तथा हम भी उनके प्रिय सखा हैं, वे इन्द्रदेव हमारे अभीष्टों को सिद्ध करें॥११॥ |
सूक्त - ४३
| पवित्र, आत्मशक्ति की वृद्धि करने, एक साथ रहने तथा उन्नति की कामना करने वाली हमारी स्तुतियाँ ऐश्वर्यवान् इन्द्र को वैसे ही आवृत करती हैं, जैसे स्त्रियाँ आश्रय पाने के लिए अपने पति का आलिंगन करती है॥१॥ |
| है असंख्यों द्वारा स्तुतियोग्य इन्द्रदेव ! आपको त्यागकर हमारा मन दूसरी और नहीं जाता। आप में ही हम अपनी आकांक्षाओं को केन्द्रित करते हैं। जैसे राजा राजसिंहासन पर विराजमान होते हैं, वैसे ही आप कुशा के आसन पर प्रतिष्ठित हों । इस श्रेष्ठ सोमरस से आपके, पान करने की इच्छा की पूर्ति हो॥२॥ |
| हमें दुर्दशायुक्त कुमति तथा अन्नाभाव से संरक्षण प्रदान करने के लिए इन्द्रदेव हमारे चारों ओर विराजमान हों । ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ही सभी सम्पदाओं और धनों के अधिपति हैं । अभीष्टवर्धक और तेजस्वी इन्द्रदेव के निर्देशन में ही गंगादि सप्त सरिताएँ उस देश को अनादि से समृद्ध करती हैं॥३॥ |
| जिस प्रकार सुन्दर पत्तों का अवलम्बन पक्षी लेते हैं, उसी प्रकार पात्रों में विद्यमान हर्षदायक सोमरस इन्द्रदेव का आश्रय लेते हैं। सोमरस के प्रभाव एवं तेज से इन्द्रदेव का मुख तेजोमय होता है । इन्द्रदेव अपनी सर्वोत्तम तेजस्विता मनुष्यों को प्रदान करें॥४॥ |
| जैसे जुआरी जुए के अड्डे पर अपने विजेता को खोजकर पराजित करता है, वैसे ही वैभवशाली इन्द्र जलवृष्टि अवरोधक सूर्य को पराजित करते हैं अर्थात् इन्द्रदेव सूर्य को जल बरसाने के लिए प्रेरित करते हैं । हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! कोई भी पुरातन या नवीन (नूतन) मनुष्य आपके पराक्रम की बराबरी करने में सक्षम नहीं है ॥५॥ |
| अभीष्टदाता इन्द्रदेव सभी मनुष्यों में स्थित हैं । वे स्तोताओं की स्तुतियों को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। इन्द्रदेव जिस यजमान के सोमयाग में हर्षित होते हैं, वे यजमान तीक्ष्ण सोमरस द्वारा युद्धाभिलाषी रिपुओं को पराभूत करने में सक्षम होते हैं॥६॥ |
| जिस प्रकार नदियों सागर की ओर स्वाभाविक रूप में प्रवाहित होती हैं तथा छोटे-छोटे नाले सरोवर की ओर बहते है, वैसे ही सोमरस भी सहज क्रम से इन्द्रदेव को प्राप्त होता है । जैसे दिव्य वृष्टि करने वाले पर्जन्य जौ की कृषि को संवर्धित करते हैं, वैसे ही इन्द्रदेव की महिमा को यज्ञस्थल में ज्ञानी लोग बढ़ाते हैं॥७॥ |
| जिस प्रकार क्रोधित बैल दूसरे बैल की ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार इन्द्रदेव क्रोधित होकर मेघ की ओर दौड़ते हैं, उन्हें तोड़कर अपने आश्रित वृष्टि से युक्त जल को हमारे लिए विमुक्त करते हैं। वे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव सोम अभिषवण कर्ता, दानी और हविष्यान्न समर्पित करने वाले यजमानों को तेजस्विता प्रदान करते हैं॥८॥ |
| इन्द्रदेव का वज्रास्त्र तेजस्विता के साथ प्रकट हो, पुरातनकाल के समान ही यज्ञ में स्तोत्रवाणी का प्रादुर्भाव हो । स्वयं देदीप्यमान इन्द्रदेव तेजस्विता से शोभायुक्त और पवित्र हों । सज्जनों के पालक इन्द्रदेव सूर्य के समान ही शुभ्रज्योति से प्रकाशमान हों॥९॥ |
| हे अनेकों द्वारा आवाहनीय इन्द्रदेव ! आपकी कृपा दृष्टि से हम गोधन द्वारा दुख-दारियों से निवृत्त हों। जौ आदि अन्नों से हम क्षुधा की आपूर्ति करें । शासनाध्यक्षों ( सत्ताधीशों) के कृपापात्र बनकर अपनी सामर्थ्य से शत्रुओं की विपुल सम्पदाओं को हम अपने आधिपत्य में ले सकें॥१०॥ |
| दुष्कर्मी पापियों से बृहस्पतिदेव हमें पश्चिम से, उत्तर से तथा दक्षिण से संरक्षित करें । इन्द्रदेव पूर्व दिशा और मध्य भाग से आने वाले शत्रुओं से हमें बचायें। वे इन्द्रदेव सबके सखा हैं। हम भी उनके प्रति मित्रभावना को सुदृढ़ करें । वे इन्द्रदेव हमारे अभीष्टों को पूर्ण करें॥११॥ |
सूक्त - ४४
| जो इन्द्रदेव शारीरिक दृष्टि से स्थूल हैं और जो अपनी विशाल तथा पराक्रमी सामर्थ्य से सम्पूर्ण शक्तिशाली पदार्थों को शक्तिहीन कर देते हैं, वे ऐश्वर्य-सम्पन्न इन्द्रदेव रथारूढ़ होकर, यहाँ आकर हर्ष को प्राप्त करें॥१॥ |
| है मनुष्यों के पालक इन्द्रदेव ! आपका रथ उत्तम रीति से विनिर्मित है, आपके रथ के दोनों अश्व भली प्रकार से नियंत्रित हैं और आप हाथ में वज्रास्त्र को धारण किये हुए हैं । हे अधिपति इन्द्रदेव ! ऐसे सुशोभित आप श्रेष्ठ मार्ग से शीघ्रतापूर्वक हमारे समीप आएँ । आपके सेवनार्थ सोमरस प्रस्तुत हैं, जिसे पिलाकर हम आपकी सामर्थ्य को संवर्धित करेंगे॥२॥ |
| मनुष्यों के पालक, हाथ में वज्रधारण कर्ता, शत्रु सैन्यबल को क्षीण करने वाले, अभीष्टवर्षक तथा सत्यनिष्ठ वीर इन्द्रदेव के रथ के वाहक उग्र, बलिष्ठ तथा अति उत्साहित अश्व हमारे समीप लेकर आएँ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जिस सोमरस द्वारा शरीर परिपुष्ट होता है, जो कलश में मिश्रित होकर बल को संचारित करने वाला है, ऐसे सोमरस को आप अपने अन्दर समाहित करें तथा हमारी सामर्थ्य-शक्ति में वृद्धि करें। आप हमें अपना आत्मीयजन बना लें, क्योंकि आप ज्ञानशीलों की धन-सम्पदा को समृद्ध करने वाले हैं॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हम स्तोताओं को आप विपुल सम्पदा प्रदान करें, सोम से युक्त हमारे यज्ञ में शुभाशीर्वाद देते हुए आएँ, क्योंकि आप ही सबके स्वामी हैं। आप हमारे यज्ञ में कुशा के आसन पर विराजमान हों । आपके सेवनार्थ सज्जित सोमपात्र को कोई बलपूर्वक छीन सके, ऐसी सामर्थ्य किसी में नहीं है॥५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जो श्रेष्ठ लोग पुरातनकाल से ही देवताओं को आमन्त्रित करते रहे हैं, उन्होंने कीर्तिजनक तथा दुष्कर कार्यों को सम्पन्न करते हुए भिन्न-भिन्न देवलोकों को प्राप्त किया; परन्तु जो यज्ञ-उपासना रूपी नौका पर आरूढ़ न हो पाये, वे दुष्कृत्य रूपी पापों में फंसकर, ऋण-बोझ से दबकर दुर्गतिग्रस्त होकर पड़े रहते हैं॥६॥ |
| इस समय जो भी दुर्बुद्धिग्रस्त, यज्ञ विरोधी लोग हैं, जिनके (जीवन रूपी) रथ में पतन मार्ग में घसीटने वाले अश्व जोते गये हैं, वे अधोगामी होते हैं -नरकगामी होते हैं । जो मनुष्य पहले से ही देवताओं के निमित्त विष्यान्न समर्पित करने में संलग्न हैं, वे वास्तव में स्वर्गधाम को प्राप्त करते हैं, जहाँ पर प्रचुर मात्रा में आश्चर्यप्रद उपभोग्य सामग्रियाँ उपलब्ध हैं॥७॥ |
| जिस समय इन्द्रदेव सोमपान करके आनन्दित होते हैं, उस समय वे सब जगह घूमने वाले और काँपते हुए बादलों को सुस्थिर करते हैं। वे आकाश को विचलित कर देते हैं, जिससे वह गर्जना करने लगता है। जो द्युलोक और पृथ्वी आपस में सम्बद्ध हैं, उन्हें उसी स्थिति में धारण करते हुए वे उत्तम वचन उच्चारित करते हैं॥८॥ |
| हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपके इस श्रेष्ठ ढंग से बनाये गये अंकुश को हम धारण करते हैं । अंकुश रूपी स्तोत्रवाणी से हाथियों ( दुष्टजनों) को दण्डित करते हुए, आप उन्हें अपने नियन्त्रण में रखते हैं। आप हमारे इस सोमयाग में पधारकर अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हों। हे इन्द्रदेव ! आप श्रेष्ठरीति से सम्पन्न किये गये सोमयज्ञ में हमारी प्रार्थनाओं पर ध्यान दें॥९॥ |
| हे अनेकों के द्वारा आवाहनीय इन्द्रदेव ! आपकी कृपा दृष्टि से हम गोधन के द्वारा दुःख-दारिद्र्यों से निवृत्त हों तथा जौ आदि अन्नों से क्षुधा की पूर्ति करें। शासनाध्यक्षों के स्नेहपात्र बनकर अपनी क्षमता से शत्रुओं की विपुल सम्पदाओं को हम अपने आधिपत्य में ले सकें॥१०॥ |
| दुष्कर्मी पापियों से बृहस्पतिदेव हमें पश्चिम से, उत्तर से तथा दक्षिण से संरक्षित करें । इन्द्रदेव पूर्वदिशा और मध्य भाग से प्रहारक शत्रुओं से हमें बचाएँ । इन्द्रदेव हमारे सखा हैं । हम भी उनके मित्र हैं। वे हमारे अभीष्ट की पूर्ति में सहायक हों॥११॥ |
सूक्त - ४५
| सबसे पहले अग्निदेव आकाश मण्डल में विद्युत्रूप में प्रादुर्भूत हुए । उनका द्वितीय ज़न्मजातवेदा' (ज्ञानी) नाम से हमारे बीच पार्थिव रूप में प्रकट हुआ । तृतीय बड़वानल के रूप में समुद्री जल में वे उत्पन्न हुए । मनुष्यों के लिए कल्याणकारी अग्निदेव निरंतर प्रदीप्त रहते हैं। ध्यानपटु लोग उन्हीं अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! हम आपके (उपर्युक्त) तीन प्रकार के स्वरूपों को जानते हैं । अनेक स्थानों में आपकी जो स्थिति है, उससे भी हम परिचित हैं। आपके जो अतिगूढ़ परमश्रेष्ठ नाम हैं, उनसे भी हम परिचित हैं। आपको जो उत्पादन-स्थल है, उस कारणभूत स्थान से भी हम परिचित हैं॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! मनुष्यों के कल्याणकारी वरुणदेव ने आपको समुद्री जल के भीतर प्रज्वलित किया है। मनुष्यों के निरीक्षक सूर्यदेव आपको दिव्य स्थान (आकाश या यज्ञ) में प्रज्वलित करते हैं। आप अपने तृतीय स्थान मेघमण्डल में वृष्टि उत्पादक विद्युत् अग्नि के रूप में स्थित हैं। प्रधान देवगण स्तुतियों से आपके तेज़ को संवर्धित करते हैं॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! आप आकाश में मेघों के मध्य विद्युत् के रूप में चमकते एवं गर्जना करते हुए पृथ्वी को गुंजायमान करते हैं। प्राण-पर्जन्य के रूप में वृक्ष-वनस्पतियों को अंकुरित करते हैं। आप शीघ्र उत्पन्न और प्रज्वलित होकर सभी को प्रकाशित करते हैं। पृथ्वी और द्युलोक के मध्य विद्युत् के रूप में सुशोभित होने वाले आप सभी के लिए स्तुत्य हैं॥४॥ |
| उदार सम्पत्तिवान् , ऐश्वर्ग धारणकर्ता, मनीषियों के प्रेरक, सौम के संरक्षक, धन प्रदायक, बल के पुत्र, जल के स्वामी अग्निदेव उषाओं के अग्रभाग में प्रज्वलित होकर शोभायमान होते हैं॥५॥ |
| सम्पूर्ण विश्व के प्रकाशक, जल के भीतर से उत्पन्न अग्निदेव प्रकट होते ही द्युलोक और भूलोक को संव्याप्त करते हैं । जिस समय पाँचों वर्गों के मनुष्य अग्निदेव की (यज्ञ द्वारा) अर्चना करते हैं, उस समय वे भली प्रकार सुदृढ़ पर्वत के समान बादलों का भेदन करके जल वृष्टि करते हैं॥६॥ |
| देखने में ज्योतिष्मान् अग्निदेव की दीप्ति महान् है । वे अदम्य प्राण युक्तं प्रकाश के साथ शोभायमान होते हैं। वे अन्न एवं वनस्पतियाँ पाकर अमर होते हैं । अग्नि के जन्मदाता द्युलोक की उत्पादक-शक्ति कितनी मनोरम है?॥७॥ |
| जिस प्रकार समस्त पदार्थों को प्रकाशित करने वाले, तेजस्वी सूर्यदेव इस लोक में सहज दर्शनीय हैं तथा विभिन्न प्रकार से धन, ऐश्वर्य को बढ़ाते हुए शोभायमान होते हैं, उसी प्रकार ये अग्निदेव श्रेष्ठ शक्ति-सम्पन्न, अमृत स्वरूप, दुःखनाशक तथा आयुष्य के संवर्द्धक हैं। देवताओं द्वारा इन्हें प्रकट किया गया है॥८॥ |
| हे मंगलमय ज्योतिस्वरूप, (तरुण रूप) अग्निदेव ! जो यजमान आपके निमित्त घृतयुक्त पुरोड़ाश समर्पित करते हैं, ऐसे श्रेष्ठ याज्ञिक को आप श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें । देवों के उपासक तथा हविष्य समर्पित करने वाले उस साधक को सभी प्रकार के सुख-सौभाग्य की ओर ले चलें॥९॥ |
| हे अग्ने ! जब श्रेष्ठ अन्न द्वारा शास्त्रोक्त क्रियाकलाप सम्पादित होते हैं, उसी समय आप उस यजमान को श्रेष्ठ अभीष्टफल प्रदान करते हैं । स्तुति योग्य आप प्रत्येक उक्थ (स्तोत्र) में उन्हें अभीष्टफल प्रदान करें । वे यजमान स्तुतिकर्ता सूर्य तथा अग्निदेव के प्रीतिपात्र हों । पुत्र-पौत्रादि सन्तानों के साथ वे शत्रुओं का संहार करें॥१०॥ |
| हे अग्निदेव ! आपके साधक नित्य ही सभी प्रकार की श्रेष्ठतम पूजन-सामग्रियाँ आपके निमित्त समर्पित करते हैं। आपके साथ गोधन की आकांक्षा से प्रेरित देवस्वरूप ज्ञानियों ने गौओं से परिपूर्ण गोशाला का द्वार आपके लिए खोल दिया है॥११॥ |
| मनुष्यों में जिन अग्निदेव की सुन्दर आभा (ज्योति) स्थित है और जो सोम-संरक्षक हैं, उन्हीं अग्निदेव की ऋषयों द्वारा स्तुति की जाती हैं। विद्वेष भावना से रहित द्यावा-पृथिवीं का हम आवाहन करते हैं । हे देवगण ! हमें श्रेष्ठ वीर सन्तानों से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करें॥१२॥ |
सूक्त - ४६
| जो समस्त मनुष्यों तथा मेघों के बीच विद्युत् के रूप में रहता है, वही यज्ञाग्नि के स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं । वे ( यज्ञकुण्ड में) भली प्रकार प्रतिष्ठित अग्निदेव उपासकों को अन्न-धन देने वाले एवं शरीर के संरक्षक सिद्ध हों॥१॥ |
| जिस प्रकार चुराए हुए पशुओं को उनके पदचिह्नों के आधार पर खोज लिया जाता है, उसी प्रकार अप् तत्त्व (अथवा जल) के बीच गुह्य रूप में स्थित अग्नि को अनुसंधानरत, तपस्वी तथा ज्ञानवान् भृगुवंशियों ने स्तोत्रों से उपलब्ध किया॥२॥ |
| महान् अग्निदेव के अभिलाषी विभूवसु के पुत्र त्रितऋषि ने उन्हें भूमि में उपलब्ध किया । सुखों को देने वाले अग्निदेव यजमानों के द्वारा यज्ञस्थल में प्रकट हुए। वे देव प्रकाशवान् पदार्थों (स्वर्गलोक) के नाभि रूप हैं॥३॥ |
| आनन्दरूप, सभी के सुखदायक, अतिस्तुत्य, यजनीय, यज्ञ के प्रतिरूप, तीव्रगतिशील, पवित्रकर्ता, हविर्वाहक तथा मनुष्यों के श्रेष्ठ अधिपति जैसे गुणों से सुशोभित अग्निदेव को अभिलाषी ऋत्विग्गणों ने प्रार्थनाओं द्वारा हर्षित किया॥४॥ |
| हे स्तोताओ ! शत्रुओं के विजेता महिमायुक्त तथा ज्ञानियों के धारणकर्ता अग्निदेव की स्तुति करने योग्य बनो । सभी ज्ञानी मनुष्य शत्रु नगरों के विनाशक, अरणिगर्भ रूप ( अन्तर्भूत), प्रशंसनीय हरितकेश युक्त, तेजस्वी ज्चालायुक्त तथा स्तुतिप्रेमी अग्निदेव को हविष्यान्न समर्पित करके अपने अभीष्ट फलों को उपलब्ध करते हैं॥५॥ |
| गार्हपत्यादि तीन रूप वाले, यज्ञमान के घरों को सुस्थिर करने वाले अग्निदेव लपटों से संव्याप्त होकर यज्ञस्थल में अपनी वेदिका पर प्रतिष्ठित होते हैं। अग्निदेव, प्रजाजनों द्वारा दी गई आहुतियाँ लेकर, यजमानों के निमित्त दानदाता बनकर तथा प्रजाजनों के लिए ही शत्रुओं को विनष्ट करते हुए, देवों के समीप जाते हैं॥६॥ |
| यजमान-साधक अनेक अग्नियों से युक्त हैं । वे अग्निदेव जरारहित, शत्रुओं के दमनकर्ता, वन्दनीय, धूम्ररूपी ज्वालाओं से युक्त, पावनस्वरूप, उज्ज्वल वर्ण, शीघ्र सहायक, भरण-पोषणकर्ता, वन में आश्रित, वायु के समान उत्साहप्रद तथा सोम के समान फलदायी हैं॥७॥ |
| जो अग्निदेव ज्वालारूपी जिह्वा से अपने सुकर्मों का निर्वाह करते हैं और जो प्रकृति के संरक्षण के लिए अनुकूलता पूर्वक स्तोत्रों को धारण करते हैं, प्रगतिशील मनुष्य उन्हीं तेजस्वी, परमशोधक, स्तवनीय, होता तथा यजनीय अग्निदेव को प्रतिष्ठित करते हैं॥८॥ |
| ये वही अग्निदेव हैं, जिन्हें द्यावा-पृथिवी ने प्रादुर्भूत किया, भृगुवंशियों ने जिन्हें स्तोत्र इत्यादि साधनों से उपलब्ध किया तथा त्वष्टादेव ने अप् में से जिन्हें उत्पन्न किया, मातरिश्वा वायु ने जिन्हें प्रमुख स्तुतियोग्य तथा अन्य सम्पूर्ण देवों ने मनुष्यों के यज्ञार्थ बिनिर्मित किया हैं॥९॥ |
| हे अग्निदेव ! आप हव्यवाहक हैं, देवताओं ने आपको धारण किया हुआ है । अभिलाषा युक्त मनुष्यों ने यज्ञीय कार्यों के लिए आपको स्वीकार किया है । हे अग्निदेव ! आप यज्ञ में हम स्तोताओं के लिए अन्नादि प्रदान करें । देवाराधक यजमान आपकी कृपा से यशस्वी बनते हैं॥१०॥ |
सूक्त - ४७
| हे सम्पत्तिवान् - शूरवीर, वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ! ऐश्वर्य की कामना से हम आपके दाएँ हाथ का आश्रय लेते हैं। आप गौ ( गौओं-इन्द्रियों अथवा किरणों) के स्वामी हैं। आप हमें चित्र-विचित्र कामनाओं को पूर्ण करने वाला धन-वैभव प्रदान करें॥१॥ |
| सुन्दर वज्रादि अस्त्रों से युक्त, श्रेष्ठ संरक्षक, सुन्दर नेत्रों वाले, चारों समुद्रों को जल से परिपूर्ण करने वाले, धन-धारण कर्ता, बारम्बार धनों के सम्पादनशील, स्तुत्य तथा दु:ख-क्लेशों के निवारणकर्ता हे इन्द्रदेव ! आप हमें सुखदायक तथा विलक्षण ऐश्वर्य प्रदान करें॥२॥ |
| है इन्द्रदेव ! आपको हम स्तवनीय, देवाराधक, महान्, अति गम्भीर, सुविस्तृत, अतिज्ञानवान् , तेजस्वी और शत्रु- संहारक मानते हैं । आप हमें श्रेष्ठ और बलशाली सन्तानादि ऐश्वर्य प्रदान करें॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हम अन्न-सम्पन्न, सर्वोत्तमज्ञानी, तारणकर्ता, ऐश्वर्यपूरक, उत्कर्षशाली, श्रेष्ठ शक्तिमान् शत्रु-संहारक, शत्रुनगरियों के विध्वंसक तथा सत्यकर्मनिष्ठ आपको स्वीकार करते हैं । आप हमें विलक्षण एवं कामनापूरक सन्तान सहित सम्पदा प्रदान करें॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हम आपको अश्व सम्पन्न रथ एवं शूरवीर योद्धाओं से युक्त , सैकड़ों-हजारों गौओं अथवा सहायकों से युक्त, अन्नादियुक्त, हितैषी सेवकों से युक्त अतिश्रेष्ठ वीर तथा सर्वसुखदायक रूप में स्वीकार करते हैं। आप हमें अभीष्टपूरक एवं शक्तिशाली सन्ततियुक्त ऐश्वर्य प्रदान करें॥५॥ |
| सत्यकर्म निष्ठ, श्रेष्ठ मेधावी, मंत्र विद्या के विशेषज्ञ (स्वामी) अंगिरावंशज मुझ सप्तगु को श्रेष्ठ सज्ञान-सम्पन्न सुमति उपलब्ध हो । मैं नमन करते हुए देवों के अनुग्रह को प्राप्त करने के लिए उनके समीप ज्ञाता हूँ। आप हमारे लिए अद्भुत और अभीष्टपूरक सन्तानसहित ऐश्वर्य प्रदान करें॥६॥ |
| सुन्दर, स्नेह भावनाओं से ओतप्रोत, सद्बुद्धि की अभिलाषा से प्रेरित होकर हमारी प्रार्थनाएँ दूतरूप में इन्द्रदेव के समीप जाएँ । ये प्रार्थनाएँ अन्त:स्पर्शी हैं, मनोयोगपूर्वक रचित हैं । आप हमें सुखदायक एवं आश्चर्ययुक्त ऐश्वर्य प्रदान करें॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप हमारी अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति करें । हमें निवास योग्य ऐसा विशाल गृह भी प्रदान करें , जो अद्वितीय हो, द्युलोक-पृथिवी लोक भी इस बात का अनुमोदन करें । आप हमें आश्चर्यप्रद्, अभीष्टपूरक ऐश्वर्य प्रदान करें॥८॥ |
सूक्त - ४८
| मैं इन्द्रदेव ही ऐश्वर्य का अधिपति हूँ तथा असंख्य शत्रुओं के धन पर एक साथ आधिपत्य करने में समर्थ हैं। जैसे पिता को पुत्र बुलाता है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणीं मेरा आवाहन करते हैं। दानी यजमान (हव्यादि दाता यजमान) को मैं अन्नादि सम्पदा प्रदान करता हूँ॥१॥ |
| मैं (इन्द्र) ने (अथर्वण के पुत्र) आथर्वण दध्य ऋषि का शीश उतारा था (क्योंकि दध्य ने इन्द्र की अस्वीकृति पर भी गुप्त मधु विद्या को अश्विनीकुमारों को बताया) । सूखे कुएँ में पतित त्रित के संरक्षणार्थ बादलों से जलवृष्टि की थी । शत्रुओं की धन-सम्पदा को ग्रहण किया तथा मातरिश्वा के पुत्र दधीचि के निमित्त जल को अवरुद्ध किए हुए बादलों को तोड़कर जलवृष्टि की॥२॥ |
| त्वष्टा देव ने मेरे निमित्त ही लोहे का वज्रास्त्र निर्मित किया, देव शक्तियाँ भी मेरे लिए ही यज्ञकर्म करती हैं। मेरी सैन्यशक्ति सूर्य के समान ही जीतने में दुष्कर है । वृत्र के संहार के कारण मेरे समीप सभी आगमन करते हैं॥३॥ |
| जिस समय यजमान लोग सोमरस एवं स्तवन वाणियों से मुझ (इन्द्रदेव) को सन्तुष्ट करते हैं, उस समय मैं शत्रुओं के अश्व, गौ, हविर्द्रव्य तथा दुधारू पशुओं को आयुधों से जीतता हूँ। दानी यजमान के शत्रुओं के संहार के लिए अपने अनेक शस्त्रों को तीक्ष्ण करता हूँ॥४॥ |
| मैं इन्द्र ही सभी ऐश्वर्यों का स्वामी हूँ, मेरे ऐश्वर्यशाली प्रभुत्व को कोई प्रभावित नहीं कर सकता। मैं कभी भी मृत्यु के समक्ष पराजित नहीं होता (उनके साधक मृत्यु भय से मुक्त होते हैं), अतएव हे सोमाभिषव कर्ता यजमानो ! मनोवांछित तथा अभीष्टपूरक ऐश्वर्य की मुझसे कामना करो । हे मनुष्यो ! मेरे प्रति मित्र भावना को कभी क्षीण न होने दो॥५॥ |
| जो दीर्घश्वास युक्त दो-दो शत्रुओं के युग्म मुझ शस्त्रधारी इन्द्र के समक्ष युद्ध भावना से प्रेरित होकर प्रस्तुत हुए, जिन्होंने मुकाबले के लिए मुझे ललकारा, उन पर वाणी का कठोर प्रयोग करते हुए ऐसा प्रहार किया गया, जिससे वे परलोक सिधार गए। वे ही झुके, मैं किसी के समक्ष झुकने वाला नहीं हूँ॥६॥ |
| मैं (इन्द्र) एक शत्रु को परास्त करने में समर्थ हैं, दो असह्य शत्रुओं को भी परास्त करने के लिए समर्थ हैं। तथा तीन शत्रु भी मेरे मुकाबले कुछ नहीं हैं। जैसे कृषक धान मलने के समय सूखे पौधों को आसानी से मसल डालता है, वैसे ही मैं शत्रुओं को मसल डालता हूँ। मेरे विरोधी शत्रु मेरी (इन्द्र की निन्दा कैसे कर सकते हैं ?॥७॥ |
| मैंने गुंगुओं के देश के संरक्षणार्थ अतिथिग्व के पुत्र दिवोदास को प्रजाजनों के बीच अन्न के समान संरक्षण के लिए स्थापित किया था। मैं गुंगुओं के शत्रुओं के संहारक तथा विपत्ति- निवारणकर्ता हूँ । पर्णय और करञ्ज नामक शत्रुओं के विध्वंस से समर भूमि में मेरी ख्याति हुई थी॥८॥ |
| मेरे स्तोता सबके लिए आश्रयभूत, अन्नसम्पन्न और उपभोग दाता हैं। मेरे साधक स्तोताओं को लोग गोदाता और हितैषी मित्र के रूप में स्वीकार करते हैं। मैं अपने भक्त साधक की विजयश्री के लिए युद्धभूमि में आयुध धारण करता हूँ । स्तोताओं को मैं प्रसिद्धि प्रदान करता हूँ॥९॥ |
| दो स्तोताओं में एक सोमयाग करते हैं, संरक्षक, पराक्रमी इन्द्रदेव ने इस स्तोता के लिए वज्र को धारण किया । तीखे तेज से युक्त सोम यज्ञ-सम्पादन कर्ता के साथ संघर्ष करने को प्रेरित हुए, परन्तु अँधेरे के बीच आबद्ध हो गए॥१०॥ |
| आदित्यगण, वसु, मरुद्गण और देवताओं के स्थानों को इन्द्रदेव नष्ट नहीं करते, वेदेवताहमारा मंगल करें, शक्ति-सामर्थ्य प्रदान करने की कृपा करें । उन्होंने हमें अपराजेय, साहसी तथा सुदृढ़ बनाया है॥११॥ |
सूक्त - ४९
| मैं (इन्द्र) स्तोत्रकर्ता को सनातन वैभव और आश्रय प्रदान करता हूँ । यज्ञीय अनुष्ठान मेरे उत्कर्ष के लिए हैं। मेरे लिए हविष्यान्न समर्पित करने वाले यजमान के ऐश्वर्य को, मैं प्रेरित करता हूँ तथा यज्ञीय कर्मों से विहीन को पराभूत करता हूँ॥१॥ |
| द्युलोक, भूलोक तथा अन्तरिक्ष में उत्पन्न सभी प्राणधारी एवं देवगण मुझे उपास्य मानते हैं। संग्राम में जाने के लिए मैं हरिसंज्ञक, शक्तिशाली, विविधकर्मा तथा शीघ्रगामी, अश्वों को रथ के साथ नियोजित करता हूँ। पराक्रमी शत्रुओं को परास्त करने वाले वज्रास्त्र को शक्ति-साधन के रूप में धारण करता हूँ॥२॥ |
| मैं (इन्द्र) ने उशना ऋषि के संरक्षणार्थ अत्क नामक शत्रु को प्रताड़ित किया। अनेक संरक्षण व्यवस्थाएँ जुटाकर मैंने कुत्स को संरक्षित किया। मैंने शत्रु शुष्ण के संहार के लिए वज्रास्त्र धारण किया। दस्युओं को मैं आर्य नहीं कहता॥३॥ |
| मैंने पिता के समान वेतसु नामक जनपद को तथा तुम और स्मदिभ को भी ऋषिकुत्स के नियन्त्रण में किया था ।यजमान को मैं श्री-सम्पन्न करता हूँ पिता की तरह भक्तों को शत्रुओं से रक्षित करके उनका हित करता हूँ॥४॥ |
| मैंने उस समय श्रुतर्वा ऋषि के लिए मृगय राक्षस को नियन्त्रण में किया था, जब वे मेरी ओर आये तथा स्तुति प्रार्थना अर्पित की। मैंने ही आयु के अधीनस्थ वेश को तथा सव्य के अधीनस्थ पड्गृभि को किया था॥५॥ |
| मैंने वृत्रसंहार के समान ही नववास्त्व तथा बृहद्रथ का संहार किया। उस समय ये दोनों राक्षस उत्कर्षयुक्त और सुविख्यात थे। इन दोनों को मैंने कान्तिवान् विश्व से निष्कासित कर दिया॥६॥ |
| तीव गमनशील अश्वों द्वारा वहन किया जाकर मैं अपनी तेजस्विता से सूर्य के चारों ओर घूमता हूँ। जिस समय सोम का अभिषवकर्ता यजमान मेरा आवाहन करते हैं, उस समय हिंसक रिपुओं को तेज धार युक्त अस्त्रों से विनष्ट करता हूँ॥७॥ |
| मैं सात रिपु-नगरियों को विध्वंस करने वाला हूँ, महाबली मानकर तुर्दश और यदु को मैंने सुप्रसिद्ध किया। मैं ही अति विशाल (सर्वप्रथम) बन्धनकर्ता हैं। दूसरे स्तोताओं को भी मैंने शक्तिशाली बनाया तथा शत्रु की निन्यानवे नगरियों को विध्वंस किया॥८॥ |
| जलवर्षक मैं (इन्द्र) प्रवाहशील सात सरिताओं का धारणकर्ता हैं । पृथ्वी पर प्रवाहित तथा वेगवान् सरिताओं को मैं ही सुशोभित करता हूँ मैं मनुष्य को अभीष्ट फल देने के लिए युद्ध करके उनका मार्ग प्रशस्त करता हूँ॥९॥ |
| गौओं के स्तनों में प्रशंसनीय, उज्ज्वल और मधुर दूध धारण कराने वाला मैं ही हूँ। कोई अन्य देवता या त्वष्टा देव भी इस कार्य में सक्षम नहीं हैं। वे (स्तन) नदी जल के समान ही दूध को वहन करते हैं । सोम के साथ मिश्रित किये जाने पर दूध सबके लिये उपयोगी हो जाता है॥१०॥ |
| इस प्रकार अपनी प्रभावक्षमता से ऐश्वर्यवान् और सत्यधनीं मैं (इन्द्र) देवों और मनुष्यों को सौभाग्ययुक्त करती हैं। हे विविध कर्मकर्ता और अश्व-अधिपति इन्द्रदेव ! आपके कार्य स्वनियंत्रित हैं। अति प्रोत्साहित ऋत्विग्गण आपके उन क्रियाकलापों को प्रशंसित करते हैं॥११॥ |
सूक्त - ५०
| हे अंत्वजो ! सम्पूर्ण विश्व के उत्पादक, मनुष्यों के लिए अन्नदाता, महान् आनन्द प्रदायक, उन इन्द्रदेव की अर्चना करो, जिन इन्द्रदेव को द्यावा और पृथिवी भी उत्तम यज्ञ, संघर्षशक्ति, महान् यश और धन आदि पदार्थ प्रदान करके पूजते हैं॥१॥ |
| इन्द्रदेव मित्र के समान मनुष्यों के हितचिन्तक, सबके स्तुतियोग्य तथा सर्व अधिपति हैं। हमारे सदृश मनुष्यों के वही उपास्य देव हैं । हे सज्जनों के संरक्षक वीर इन्द्रदेव ! आप ही श्रेष्ठ कार्यो, पराक्रमों तथा बादलों से जल वृष्टि के लिए स्तुति करने योग्य हैं॥२॥ |
| है इन्द्रदेव ! आपसे अन्न, धन और सुख-सम्पत्ति उपलब्ध करने के सत्पात्र कौन हैं? वे कौन हैं, जो आपको असुरता की संहारक सामर्थ्य उपलब्ध करने के लिए सोमपान करने को प्रेरित करते हैं? वे सत्पत्र साधक कौन हैं, जो अपनी उपजाऊ भूमि में जलवृष्टि और पराक्रमी सामर्थ्य पाने के लिए सोमरस समर्पित करते हैं?॥३॥ |
| हे इन्द्र ! आप हमारे यज्ञीय सत्कर्मों से महिमामय हुए हैं। सभी यज्ञीय कार्यों में आप ही यजनयोग्य हैं। आप संग्रामों में प्रमुख शत्रुओं के संहारक रहे हैं । हे सर्वद्रष्टा इन्द्र ! आप सर्वोत्तम और सुयोग्य परामर्शदाता हैं॥४॥ |
| है इन्द्रदेव ! आप सर्वोत्तम होते हुए यज्ञ-सम्पादक यजमानों की शीघ्र सुरक्षा करें । सभी मनुष्य आपकी महती संरक्षण- शक्ति से परिचित हैं। आपका उत्कर्ष बढ़े तथा इस सोमयाग को आप शीघ्र सम्पन्न करें॥५॥ |
| हे शक्तिशाली इन्द्रदेव आप जिन सोमयज्ञों को धारण करते हैं, उन्हें शीघ्रतापूर्वक सम्पन्न करते हैं। आपको शत्रु- संहारक संरक्षण बल हमारी सुरक्षा करे । हमारे धन का सदुपयोग धर्म - जागरण के लिए हों। ये यज्ञ और मंत्र आपके लिए ही समर्पित हों तथा श्रेष्उ त्तम यह पावन वाणी आपके निमित्त ही उच्चारित हो॥६॥ |
| है मेधा सम्पन्न इन्द्रदेव ! जो स्तोता इकट्टे (संघबद्ध होकरं सोम अभिषव करते हैं तथा जो विविध प्रकार के ऐश्वर्य और लाभ की कामना से दान द्वारा आपकी अर्चना करते हैं, वे अभिषुत सोम से आनन्दित होते हैं, तब वे सुख- सौभाग्य पाने के लिए आन्तरिक रूप से आपके मार्गदर्शन में ही श्रेष्ठपद् प्राप्ति के अधिकारी हों॥७॥ |
सूक्त - ५१
| हे अग्निदेव ! आपका वह आच्छादन अति विशाल तथा स्थूल था, जिससे घिरे हुए होकर आप अपूतत्त्व (या जल) में स्थित थे । हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! आपके सभी अंगों को अनेक विधियों से एक देवता ने देखा॥१॥ |
| (अग्निदेव का कथन) वे देव कौन थे, जिन्होंने विविध प्रकार से मेरे (अग्नि के) रहस्यमय स्वरूप को देखा था? हे मित्र और वरुणदेवो ! अग्निदेव के वे सम्पूर्ण प्रज्वलित देवयान साधन रूप मार्ग कहाँ पर विद्यमान हैं ? इसे बताने की कृपा करें॥२॥ |
| (देवों का कथन) हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! जल और ओषधि तत्त्वों में अनेक प्रकार से आप सन्निहित हैं, उनमें हम आपको खोजते हैं। हे विलक्षण कान्ति से युक्त अग्निदेव ! इस प्रकार से विद्यमान आपका यमदेव ने परिचय प्राप्त किया । दस रहस्यमय गुह्य आश्रय स्थलों में विद्यमान आप अति तेजस्वी हैं॥३॥ |
| (अग्निदेव का कथन) हे वरुणदेव ! मैं (अग्नि) यजन कार्य से भयभीत होकर यहाँ आ गया हूँ । मुझे इस प्रकार के कार्य में देवगण उपयोग न करें, ऐसी मेरी अभिलाषा है । अतएव मैंने अपने स्वरूप को विभिन्न प्रकार से जल में छिपाया है। मैं इस कार्य का इच्छुक नहीं हूँ॥४॥ |
| (देवों का कथन है अरने ! देवपूजक, मनस्वी-साधक यज्ञ को सम्पादित करने के अभिलाषी हैं। अत: आप आएँ। आप स्वयं तेजोमय होकर भी तमस् (अन्धकार) को आश्रय दिये हुए हैं । आप यहाँ आकर देवों के प्रति हविष्य पदार्थ ले जाने वाले मार्गों को हमारे लिए सरल बनाएँ ।आप हर्षित होकर हमारे हविष्य को धारण करें॥५॥ |
| ( अग्निदेव का कथन ) हे देवगण ! जिस प्रकार रथी मार्ग से गमन करते हुए लक्ष्य तक पहुँचता है, वैसे ही हमारे तीन ज्येष्ठ भ्राता (भूपति, भुवनपति और भूतपति) इस यजन कार्य को करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए हैं । हे वरुणदेव ! इसी भय से चिन्तित होकर मैं (अग्नि) सुदूर चला आया हूँ । धनुर्धारी की प्रत्यञ्चा से जिस प्रकार हरिण भयभीत होता है, उसी प्रकार मैं भी इस यजन कार्य से भयभीत हूँ॥६॥ |
| ( देवों का कथन) हे अग्निदेव ! हम आपको अमरतापूर्ण (अविनाशी या जरारहित) आयुष्य प्रदान करते हैं । हे सर्वज्ञ ! आप इस आधार पर अनश्वर रहेंगे। हे सुजन्मा अग्ने ! अब आप प्रसन्नचित्त होकर देवों के पास हव्य पहुँचाएँ॥७॥ |
| ( अग्निदेव का कथन ) हे देवगण ! यज्ञ के प्रयाज (प्रथम हविर्भाग) और अनुयाज (शेष हविर्भाग) तथा हवि के परिपुष्ट विपुल भाग को मुझे प्रदान करें । जल का सारतत्त्व घृत, ओषधि से उत्पादित प्रमुख भाग तथा दीर्घायु मुझे प्रदान करें॥८॥ |
| (देवों का कथन) हे अग्ने ! प्रयाज, अनुयाज, विपुल तथा असाधारण हविष्य भाग आपको प्राप्त होंगे। यह यज्ञ भी आपके लिए ही समर्पित हो । चारों दिशाएँ आपके समक्ष नतमस्तक होकर आपका सम्मान करें॥९॥ |
सूक्त - ५२
| है देवो ! आपने हमें विवाक के रूप में धारण किया है, मनुष्यों के लिए देवों की प्रार्थना कर सकें, ऐसा मार्गदर्शन प्रदान करें । हमारे हिस्से कौन से हैं तथा आपके हिस्से कौन से हैं, यह हमें बताएँ । जिस मार्ग से आपके लिए यज्ञीय पदार्थ में लेकर जाना है, वह भी बताएँ, जिससे मैं (अग्नि) आपके कथनानुसार अनुगमन करू॥१॥ |
| श्रेष्ठ यज्ञ-सम्पादक होता रूप में यज्ञीय कार्य हेतु मैं यहाँ स्थित हैं, सम्पूर्ण देवता और मरुद्गण भी हवि वहन करने के लिए मुझे प्रेरित करते हैं । हे अश्विनीकुमारो ! आपको ऋत्विज् के कार्य प्रतिदिन वहन करने पड़ते हैं । कान्तिमान् सोम स्तोत्र स्वरूप है, वही हमारी सोम आहुति आपको समर्पित हो॥२॥ |
| यह जो होता है, उसका क्या कार्य है ? होता यजमान के जिस हविर्द्रव्य का यजन करते हैं, उसका भाग देवों को मिलता है । (सूर्यरूप से) प्रतिदिन उज्वल रूप में (चन्द्रमा रूप से) प्रतिमास जो प्रकट होते हैं, उन अग्निदेव को देवताओं ने हविवाहक रूप में धारण किया है॥३॥ |
| मैं (अग्नि) सम्पूर्ण जगत् से लुप्त हो गया था, अनेक तरह से कठिन व्रतों का पालन करने वाले देवों ने मुझे हविवाहक के रूप में नियुक्त किया है । ज्ञानवान् अग्निदेव हमारे यज्ञ को सम्पादित करते हैं, यह यज्ञ पाँच मार्गों से गमनीय हैं, उसमें तीन प्रकार से सोम का अभिषवण किया जाता है तथा सात छन्दों में स्तवन किये जाते हैं॥४॥ |
| हे देवगण ! मैं (अग्नि) आपकी हविरूप से सेवा करता हूँ, अतएव आपसे अमरता तथा वीर सन्तान के लिए प्रार्थना करता हूँ। मैं हीं इन्द्रदेव के दोनों हाथों में वज्रास्त्र सौंपता हैं, इससे ही वे इन सभी शत्रुसेनाओं पर विजय प्राप्त करते हैं ॥५॥ |
| तीन हजार तीन सौ उनचालीस देवशक्तियाँ अग्निदेव की ही सेवा-साधना करती हैं। अग्निदेव को घृताहुतियों से अभिषिक्त किया जाता है, उनके लिए कुशाओं के आसन बिछाए गये हैं तथा होता के रूप में उन्हें यज्ञ में प्रतिष्ठित किया गया है॥६॥ |
सूक्त - ५३
| मानसिक रूप से जिन अग्निदेव की हम कामना करते हैं, वे यज्ञ के अंग - उपांगों को जानने वाले ज्ञानवान् अग्निदेव पधार रहे हैं । वे अतिपूजनीय अग्निदेव देवताओं की प्राप्ति के निमित्त किये गये हमारे यज्ञ को यजन करें और यजन योग्य देवताओं के बीच हमसे पूर्व ही वेदी पर प्रतिष्ठित हों॥१॥ |
| यज्ञ को श्रेष्ठ रीति से सम्पादित करने वाले होता रूप अग्निदेव यज्ञस्थल में प्रतिष्ठित होकर हव्यवाहक हुए हैं, वे चरु, पुरोडाश आदि सामग्री का श्रेष्ठ रीति से निरीक्षण कर रहे हैं, जिससे यजनीय देवों को शीघ्रता से घृताहुति से संतुष्ट किया जा सके तथा स्तवनीय देवों का स्तोत्रवाणियों द्वारा स्तवन किया जा सके, यही उनकी कामना है॥२॥ |
| हमारे यज्ञ में देवों के आवाहन ( लाने वाला ) का जो प्रमुख अंग है, उसे अग्निदेव हीं सुसम्पन्न करें । अग्निरूप यज्ञ की गूढ़ जिह्वा ( अग्नि की ज्वाला) को हम उपलब्ध कर चुके हैं। वे अग्निदेव सुगन्धित रूप तथा दीर्घायुष्य धारण करके हमारे यहाँ उपस्थित हुए हैं। देवों के आवाहन रूप यज्ञ को अग्निदेव ने पूर्ण किया॥३॥ |
| हम आज उन सर्वश्रेष्ठ वचनों का उच्चारण करते हैं, जिनके उच्चारण से हम राक्षसों को पराभूत करने में सक्षम हों । हे अन्नभक्षक,यजनीय देव ! है मनुष्यादिपञ्चजनो ! आप सभी हमारे यज्ञको स्वीकार करें॥४॥ |
| जो पृथ्वी में उत्पादित अथवा हव्यादि के लिए उत्पन्न और यजन योग्य हैं, वे सभी पाँचों जन ( पाँचों वर्ण ) हमारे यज्ञ को ग्रहण करें । पृथ्वी हमारे पार्थिव पापों से हमें बचाए तथा अन्तरिक्ष आकाश से सम्बन्धित ( शब्दादि से प्रकट ) पाप कृत्यों से हमें संरक्षित करे॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! आप यज्ञ को विस्तृत (व्यापक) करते हुए लोक के प्रकाशक सूर्यदेव का अनुगमन करें । सत्कर्मों द्वारा ज्योतिर्मय देवमार्गों( देवयानों) को सुरक्षित करें तथा स्तोताओं को सुखदायी बनाएँ । हे अग्निदेव ! आष प्रशंसनीय बनकर मनुष्यों को देवोपासना की ओर प्रेरित करें अर्थात् देवों को यज्ञ की ओर प्रेरित करें॥६॥ |
| हे सोमेच्छुक देवगण ! आप रथ में योजित करने योग्य घोड़ों को उससे जोतें । उनकी लगामों को ठीक करें तथा घोड़ों को सुसज्जित करें । आठ सारथियों के बैठने योग्य सूर्यरथ के साथ आप यज्ञ में पधारें । इसी रथ से देवता हमें ले जायेंगे॥७॥ |
| अश्मन्वती नाम की नदी प्रवाहित हो रही है, (उद्देश्य प्राप्ति के लिए संगठित होकर उठे और उसे पार करें । हे मित्रगण ! जो हमारे लिए कष्टदायी हैं, उनका हम यहीं परित्याग करते हैं, नदी को पार करके हम सुखदायक अन्नों को उपलब्ध करेंगे॥८॥ |
| त्वष्टादेव ( देवों के शिल्पी ) पात्रों की निर्माण कला के विशेषज्ञ हैं, उन्हीं ने देवताओं के निमित्त कलापूर्ण सुन्दर ( सोम ) पान-पात्र तैयार किये हैं। अभी वे लोहे से विनिर्मित परशु (कुटार) को तेजधारा युक्त करते हैं, जिससे वे ब्रह्मणस्पति पात्र निर्माण योग्य काष्ठ को काटते हैं॥९॥ |
| हे क्रान्तदर्शियो ! जिन कुठारास्त्रों से अमृत-पान (अमरत्व की प्राप्ति के लिए पात्र विनिर्मित करते हो, उन्हें उचित रीति से तेज़ करो। है ज्ञानियो ! ऐसे रहस्यमय ( गोपनीय) वासस्थलों को निर्मित करो, जिससे । जहाँ से ) देवताओं ने अमरता को प्राप्त किया था॥१०॥ |
| नारी के गर्भ में वत्स की भाँति, मानसिक भावों को (परिपक्व करके) मुख में स्थित जिह्वा से ( वाणी के रूप में) व्यक्त करने वाला, श्रेष्ठ मन से प्रतिदिन देव समूह को स्तोत्र प्रदान करने वाला साधक (जीवन-संग्राम में) विजयी होता है॥११॥ |
सूक्त - ५४
| हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आपकी उस अलौकिक महिमायुक्त यशस्विता का हम भली प्रकार से गुणगान करते हैं। जिस समय राक्षसी भय से आतंकित द्यावा-पृथिवी ने आपको आवाहित किया, उस समय आपने यहाँ के निवासी देवताओं को संरक्षित किया । आपने असुरों का विनाश किया तथा यजमान स्वरूप प्रजाजनों को आश्वस्त किया, जिसका हम वर्णन करते हैं॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! यशस्वी स्तोत्रों से अपने स्वरूप को विस्तारित करके तथा अपने पराक्रमी प्रभुत्व को स्थापित करकै, जो आप विचरण करते हैं, वे आपकी कृतियाँ माया रूप ही हैं। पुरातन श्रेष आपके शत्रु-संहारक नानाविध संग्रामों का वर्णन करते हैं, वे भी मायावी ही हैं, क्योंकि न तो अभी (वर्तमान में) ही कोई आपका बैरी है, न प्राचीन समय में ऐसा था॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपकी सम्पूर्ण महिमा की सीमा हमसे पहले कौन-कौन से ऋषियों ने उपलब्ध की थी ? क्योंकि आप अपने माता-पिता (द्यावा-पृथिवी) को एक साथ ही ( संयुक्त रूप में) अपनी देह से उत्पन्न करते हैं॥३॥ |
| हे वैभवशाली इन्द्रदेव ! आपके अतिस्तुत्य ( पूजनीय ) चार शरीर (रूप) हैं, जो राक्षसों के संहारक और जरारहित हैं। हे मित्ररूप इन्द्रदेव ! आप उन स्वरूपों से परिचित हैं, जिनसे सभी महान् कार्यों ( पराक्रमों ) को आप सम्पादित करते हैं॥४॥ |
| हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आप सम्पूर्ण असाधारण और रहस्यमय ( छिपी हुई) दोनों प्रकार की सम्पदाओं को अपने में स्थापित करते हैं । अतएव आप हमारी शुभाकांक्षाओं को विनष्ट न करें । आप हमें अभीष्ट ऐश्वर्य प्रदान करें, क्योंकि आप स्वयमेव दातारूप हैं ॥५॥ |
| जिसने सूर्यादि ज्योतियों में ज्योति रूप तेज को स्थापित किया है, जिसने मधुर रसों से युक्त सोमादि रसों का सृजन किया है, इस प्रकार के उन इन्द्रदेव के निमित्त बृहदुक्थ ( मन्त्रों के निर्माणकर्ता ऋषि } ने अतिप्रिय बलवर्द्धक स्तोत्र कहा॥६॥ |
सूक्त - ५५
| जब भयभीत ( अस्तित्व में आने पर द्यावा-पृथिवी ने ) आप ( इन्द्र) को पुकारा, तब आपने पृथ्वी और आकाश को अधर में ही थाम लिया । हे ऐश्वर्य-सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप भरण-पोषण कर्ता ( पर्जन्य) के पुत्रों ( मेघ - जल आदि) को विद्युत् से प्रकाशित करते हैं। आपका यह नाम ( प्रभाव) आपसे विमुख रहने वालों के लिए छिपा ( अव्यक्त ) ही रहता है॥१॥ |
| आपका सभी स्थानों में संव्याप्त अतिगुप्त ( अन्यों से अनभिज्ञ) प्रशंसनीय, जो नाम ( प्रभाव या शरीर ) है, जिससे आप भूत और भविष्य को उत्पादित करते हैं, जिससे अति पुरातन और प्रिय लगने वाले ज्योति स्वरूप (सूर्यादि) प्रकट हुए। उस प्रिय ज्योति को प्राप्त करके पञ्चजन (चारों वर्ण और निषाद) हर्षित होते हैं॥२॥ |
| इन्द्रदेव अपने तेज से द्युलोक, पृथ्वी और अन्तरिक्ष को संव्याप्त करते हैं। उसी प्रकार वे समय-समय पर पञ्चदेवों (देव, मनुष्य, पितर, असुर और राक्षस) और सात तत्त्वों (साः, मरुद्गण, सात सूर्य किरणें, सात लोकादि) को प्रकाशित करते हैं। वे नानाविध कर्मों के निर्वाहक चौंतीस प्रकार के देवों (आठ वसु, बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, प्रजापति, वषट्कार और विराटादि) के समान रूप और तेज से विविध प्रकार से दृश्यमान होते हैं॥३॥ |
| हे देवि उषा ! आप प्रकाश के क्रम में सबसे पहले उदीयमान होतीं और तेजस्वियों में अति तेजस्वी (सूर्य) को प्रकाशित करती हैं। आप ऊर्ध्व लोकनिवासिनी हैं; किन्तु निम्नस्थ पृथ्वीलोक के निवासी मनुष्यों के साथ भी आपका मातृवत् सम्बन्ध है । इस प्रकार महान् (आप) से महान् बल का प्रादुर्भाव हुआ है॥४॥ |
| युद्ध में शौर्य प्रदर्शित करके शत्रुसेना को खदेड़ देने वाले बलशाली इन्द्रदेव के प्रभाव से श्वेतकेश (शक्तिहीन) वृद्ध भी स्फूर्तिवान् हो जाता है । हे स्तोताओ ! महान् इन्द्रदेव के पराक्रम का विवेचन करने वाले विचित्र काव्य को देखो, जो आज (उच्चारण के बाद) समाप्त हो जाने पर भी ( भविष्य में नवीन मंत्रों के रूप में) पुनः प्रकट होता है॥५॥ |
| सर्वशक्ति- सम्पन्न, अरुणाभ पक्षी के समान महान् पराक्रमी और सनातन, गतिशील इन्द्रदेव जिस कार्य को कर्तव्य के रूप में निश्चित कर लेते हैं, वहीं करते हैं, व्यर्थ कुछ नहीं। अभीष्ट वैभव को अपने पराक्रम से अर्जित करके वे स्तोताओं को सब प्रकार का ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं॥६॥ |
| वज्रधारी, वृत्रहन्ता इन्द्रदेव मरुद्गणों के साथ मिलकर (जल वृष्टि आदि) महान् पौरुष युक्त कर्म करते हैं। वृत्रादि शत्रुओं को मारने के लिए जल वृष्टि करते हैं । (ऐसे महान् कृत्यों में) मरुद्गण इन्द्रदेव के सहायक सिद्ध होते हैं ॥७॥ |
| मरुद्गणों के सहयोग से वृष्टि रूप कार्यों को इन्द्रदेव करते हैं । वे सभी प्रकार के शौर्यों के निर्वाहक, असुरों के संहारक, सर्वव्यापी, शीघ्रतापूर्वक शत्रुओं के पराभूतकर्ता हैं । वीर इन्द्रदेव ने द्युलोक से आकर , सोमपान से प्रोत्साहित होकर आयुधों से दुष्ट राक्षसों का संहार किया॥८॥ |
सूक्त - ५६
| (मृत पुत्र वाजी को लक्ष्य करके ऋषि कहते हैं-) हे मृत्यु के ग्रास ! तेरा एक अंश अग्नि है, दूसरा वायु है, तीसरा अंश ज्योति रूप (आत्म तत्व) है । उनसे संयुक्त होकर हे पुरुष ! तेजस्वी रूप प्राप्त कर । पावन स्थान में स्थित होकर देवशक्तियों का प्रिय एवं श्रेष्ठ बन॥१॥ |
| हे वाजी ! पृथ्वी तुम्हारे शरीर को धारण करती है, वह तुम्हें सुख प्रदान करने के साथ हमारे लिए भी ऐश्वर्यप्रद हो । तुम सत्यनिष्ठ होकर महान् देवताओं के धारणकर्ता परमेश्वर को उपलब्ध करने के लिए दिव्यलोक में प्रतिष्ठित सूर्यदेव में अपनी आत्मा (चेतना) को समाहित करो॥२॥ |
| हे पुत्र ! तुम सामर्थ्यवान्, शक्तिशाली और श्रेष्ठ कान्तिमान् हो । श्रेष्ठमार्ग से गमन करते हुए उत्तम स्तवनों का गान करके श्रेष्ठ पद प्राप्त करो, सुखप्रद मार्गगामी होकर स्वर्गलोक में जाओ, श्रेष्ठ आचरण द्वारा धर्मानुष्ठान करो और सर्वोत्तम सत्यफलों को प्राप्त करो । शुभ कर्मशील बनकर तुम देवों को प्राप्त करो तथा सन्मार्गगामी बनकर सूर्यदेव के साथ स्वयं को संयुक्त करो॥३॥ |
| हमारे पितरगण देवों के समान ही पूज्यास्पद (श्रद्धास्पद) हैं, देवत्वपद को प्राप्त करके उन्होंने देवों के साथ अपने कर्मों का एकीकरण किया है। जो प्रकाशमयी दीप्ति यहाँ लोग प्राप्त करते हैं, वे सभी उनके साथ संयुक्त हो गये हैं, वे पुनः उन शरीरों में प्रविष्ट होते हैं॥४॥ |
| हमारे पितगण अपनी सामर्थ्य-शक्ति से सम्पूर्ण विश्व - ब्रह्माण्ड का परिभ्रमण कर चुके हैं। जिन सभी पुरातन लोकों में जाने की सामर्थ्य भूवासियों की नहीं, वे वहाँ भी गये हैं। अपने सूक्ष्म शरीरों में रहकर उन्होंने सम्पूर्ण लोकों को नाप लिया है । प्रजाजनों के प्रति उन्होंने विभिन्न प्रकार से अपनी सामयों को विस्तृत किया हैं॥५॥ |
| सूर्य के पुत्ररूप देवताओं ने स्वर्गज्ञाता और सामर्थ्यवान् आदित्य को तृतीय कर्म (पुत्रोत्पादन) द्वारा दो प्रकार से (उदय और अस्त में) प्रतिष्ठित किया है। हमारे पितरगणों ने सन्तानोत्पादन द्वारा सन्तानों की देह (शरीर) में वंशानुगत संस्कार स्थापित किये हैं। वे अपना वंशानुगत चिरस्थायी संस्कार स्थापित कर गये हैं॥६॥ |
| जिस प्रकार मनुष्य नाव से जल को प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार कल्याण मार्ग से कष्टदायी विपत्तियों से मुक्ति मिलती है तथा पृथ्वी की विभिन्न दिशाओं तक पहुँचना होता है । उसी प्रकार बृहदुक्थ अषि ने अपनी प्रजा (पुत्र) को, अपनी महती सामर्थ्य से अग्नि और सूर्यदेव के साथ संयुक्त किया॥७॥ |
सूक्त - ५७
| हे इन्द्रदेव ! हम सन्मार्ग से विचलित होकर कुमार्गगामी न बनें। हम सोमयुक्त यज्ञीय सत्कर्मों से कभी विमुख न हों । हमारे मार्ग दुष्ट शत्रुओं से निष्कंटक हों॥१॥ |
| जो अग्निदेव यज्ञ को सम्पन्न करने के माध्यम हैं, जो पुत्र सदृश होकर देवों तक अपने स्वरूप से व्याप्त रहते हैं, उन यजनीय अग्निदेव को हम प्राप्त करें॥२॥ |
| हम श्रेष्ठ पुरुषों (पितरों) के द्वारा, प्रशंसित सोम के द्वारा तथा पितरों को तृप्त करने वाले स्तोत्रों से मन देवता का आवाहन करते हैं॥३॥ |
| सत्कर्म के लिए, कार्यों में दक्षता के लिए तथा चिरकाल तक सूर्यदेव का अवलोकन करने के लिए श्रेष्ठ मन (हमारे पास) आए॥४॥ |
| हमारे पितर हमारे मन को पुनः श्रेष्ठता के लिए प्रेरित करें, जिससे हम जीवन एवं प्राण को पुष्ट कर सकें॥५॥ |
| हे सोमदेव ! हम (याजक) आपके अनुरूप कर्मों - व्रतों में संलग्न रहते हुए शरीर में मन को लगाए हुए हैं, ताकि हम प्रजावान् होकर पोषण में समर्थ हों॥६॥ |
सूक्त - ५८
| हे बन्धु ! आपका जो मन विवस्वान् के पुत्र यमदेव के समीप चला गया है, उसे हम वहाँ से वापस लाते हैं, क्योंकि आप यहाँ इस संसार में रहने के लिए जीवन धारण किये हुए हैं॥१॥ |
| आपका मन जो सुदूर दिव्य लोक और भूलोक के समीप चला जाता है, उसे हम वापस यहीं लेकर आते हैं; क्योंकि आप इस संसार में निवास करने के लिए शरीर धारण किये हुए हैं॥२॥ |
| सभी ओर से अस्थिर जो आपका मन अति दूरवर्ती भूभाग में चला जाता है, आपके उस मन को हम वापस लेकर आते हैं, क्योंकि आप इस संसार में रहने के लिए जीवन धारण किए हुए हैं ॥३॥ |
| जो आपका मन दूरवर्ती प्रदेशों में अतिदूर चला गया है, उसे हम वहाँ से वापस लाते हैं, क्योंकि आप यहाँ वास करने हेतु जीवन धारण किए हुए हैं॥४॥ |
| जो आपका मन जल से परिपूर्ण समुद्र या अन्तरिक्ष के भीतर सुदूर तक चला गया है, आपके उस मन को हम वहाँ से लौटाते हैं, क्योंकि आप विश्व में वास करने के लिए जीवन धारण किये हुए हैं॥५॥ |
| जो आपका मन चारों ओर विस्तारित किरणों के समीप अतिदूर चला गया है, उस मन को वहाँ से हम लौटाते हैं, क्योंकि आप यहाँ वास करने के निमित्त जीवन धारण किए हुए हैं॥६॥ |
| जो आपका मन दूरस्थ जल के भीतर तथा बृक्ष-वनस्पतियों में गमन कर गया है, उसे हम वहाँ से लौटाते हैं; क्योंकि आप यहाँ इस जगत् में वास हेतु जीवित हैं॥७॥ |
| जो आपका मन सूर्यदेव अथवा देवी उषा के समीप सुदूर गमन कर गया हैं, आपके उस मन को हम वहाँ से वापस लौटाते हैं, क्योंकि आप यहाँ इस विश्व में रहने के लिए जीवित हैं॥८॥ |
| आपका जो मन दूरस्थ विशाल पर्वतीय श्रृंखलाओं के समीप गमन कर गया है, उसे हम वापस लेकर आते हैं, क्योंकि आप विश्व में वास करने के लिए जीवन धारण किए हैं॥९॥ |
| आपका जो मन इस अखिल विश्व में अति दूर चला गया है, उसे हम वापस लौटाते हैं, क्योंकि आप विश्व में निवास करने के लिए जीवित हैं॥१०॥ |
| आपका जो मन दूर से अति दूर तथा उससे भी अति दूरस्थ किन्हीं स्थानों पर भी चला गया है, उस मन को दुबारा हम वापस लाते हैं, क्योंकि आप इस संसार में वास करने के लिए यहाँ जीवित हैं॥११॥ |
| आपका जो मन भूत और भविष्यत् किसी अति दूरस्थ काल की ओर चला गया है, उसे हम पुनः वापस लाते हैं, क्योंकि संसार में रहने के लिए आपका जीवन है॥१२॥ |
सूक्त - ५९
| जिस प्रकार क्रियाकुशल सारथी के होने पर रथ पर चढ़े व्यक्ति सुख की अनुभूति करते हैं, वैसे ही सुबन्धु की आयु यौवनयुक्त और दीर्घ होकर संवर्द्धित हो । पतनशील भी, जीवन के उद्देश्य श्रेष्ठ रीति से प्राप्त करें, पाष के अधिष्ठाता देवता हमसे दूर हो जाएँ॥१॥ |
| सामगान प्रारम्भ रहते हुए सम्पदा प्राप्त करने के लिये हम श्रेष्ठ अन्न और विभिन्न प्रकार के श्रेष्ठतम विर्द्रव्य संगृहीत करते हैं। हम निति की वन्दना करते हैं। वे हमारे (उक्त) सभी पदार्थों का आस्वादन करें, (अपने बन्धनों को) जीर्ण करें और भलीप्रकार हमसे दूर चले जाएँ॥२॥ |
| हम अपनी पराक्रमी शक्ति द्वारा शत्रुओं को भली प्रकार पराभूत करें जैसे पृथ्वी के ऊपर आकाश स्थित है, वैसे ही हम शत्रुओं के ऊपर वर्चस्व स्थापित करें। जैसे मेघों का वेग पर्वतों द्वारा अवरुद्ध किया जाता है, वैसे ही हम शत्रुओं की गति को रोकने में सक्षम हों । हमारे सभी स्तोत्रों को निक्रति सुने तथा हमसे वे दूर चले जाएँ॥३॥ |
| हे सोमदेव ! हमें मृत्यु के अधीनस्थ न करें । हम सूर्यदेव को आकाशमार्ग में जाते हुए सदा देख सकें। हम दीर्घजीवी हों) । हमारी वृद्धावस्था भी नित्य सुखप्रद हो तथा नितिदेव हमसे दूर चले जाएँ॥४॥ |
| हे प्राणविद्या विशेषज्ञ ! आप हमारी ओर ध्यान दें तथा हमारे दीर्घजीवन के लिए हमारी आयु को भलीप्रकार बढ़ाएँ । जहाँ तक सूर्यदेव का प्रकाश हैं, वहाँ तक हमें संरक्षित करें, आप घृत से हमारे शरीर को परिपुष्ट करें॥५॥ |
| हे प्राणविद्या के ज्ञाता ! आप हमारे लिए पुनः नेत्रशक्ति, प्राणऊर्जा तथा उपभोग्य सामग्री प्रदान करें । हम चिरकाल तक सूर्य के दर्शन से लाभान्वित हों । हे अनुमते ! जिससे हम विनष्ट न हों, ऐसा हमारा कल्याण करे॥६॥ |
| पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक हमें पुन: प्राण शक्ति प्रदान करें, सोमदेव हमें पुन: शारीरिक सामर्थ्य प्रदान करें तथा सर्वपोषक पूषादेव हमें कल्याणकारी वाणी प्रदान करें, जिससे हमारा हर प्रकार से मंगल हो ॥७॥ |
| महिमायुक्त और यज्ञ की मातृस्वरूपा द्यावा-पृथिवी सुबन्धु का मंगल करें । जो भी हमारे पाप कर्म हों, उन्हें हमसे दूर करें । हे द्यावा-पृथिवि ! आप दोनों क्षमाशील हैं, तो पापकर्म किस प्रकार से होगा? हे सुबन्धु ! वे पापकर्म आपको पीड़ित किये बिना विनष्ट हो॥८॥ |
| स्वर्गलोक से पृथ्वी तक जो दो ( अश्विनीकुमारों के रूप में) और तीन (इड़ा, सरस्वती, भारती) रोग निवारक ओषधियाँ संचरित होती हैं, उनमें से एक ओषधि पृथ्वी पर विचरण करती है । हे द्यावा और पृथिवि ! जो भी हमारे पापकर्म हों, आप उन्हें दूर हटायें । हे सुबन्धु ! आपके किसी प्रकार के भी पापकर्म हमें पीड़ित न करें॥९॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जो बैल उशीनराणी नामक ओषधि वहन करके ले जाते हैं, ऐसे शकटवाही बैलों (अथवा किरण समूहों) को भली प्रकार प्रेरित करें । हे द्युलोक और पृथिवि ! जो हमारे पापकर्म हैं, उन्हें दूर करें । हे सुबन्धु ! आपके किसी प्रकार के दोष हमें कष्टपीड़ित न कर सकें॥१०॥ |
सूक्त - ६०
| महान् व्यक्तियों से प्रशंसित (असमाति नरेश) के प्रदेश में हम विनम्रभाव से प्रविष्ट हुए॥१॥ |
| शत्रु संहारक, तेजस्वी रथ के समान सर्वत्र गतिशील भजेरथ नरेश के वंशज तथा सज्जनों के संरक्षक असमाति (अतुलनीय सामर्थ्यवान्) नरेश की हम प्रार्थना करते हैं॥२॥ |
| जिस प्रकार सिंह - भैसों को गिराकर मार देता है, वैसे ही वे अपने पराक्रम बल से हाथ में खड्ग धारण करके शत्रुओं को मार गिराते हैं। खड्ग धारण किये बिना भी वे शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं॥३॥ |
| शत्रु संहारक और ऐश्वर्य सम्पन्न राजा इक्ष्वाकु शासन में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं, पाँचों वर्गों के लोग स्वर्गीय सुखों का उपभोग करें॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जैसे सूर्यदेव आकाश में दिखाई देते हैं, वैसे ही आप रथारूढ़ राजा असमाति को क्षात्रबल धारण करायें॥५॥ |
| हे राजन् ! आप ऋषि अगस्त्य के हर्षदायी बन्धु-बान्धवों के लिए अपने गतिशील दो लालवर्ण के अश्वों को रथ से नियोजित करें । जो व्यापारी अतिकजूस, श्रेष्ठ कार्यों में दानभाव से शून्य हैं, उन्हें आप पराजित करें॥६॥ |
| जो अग्निदेव पधारे हैं, वे माता, पिता तथा जीवनदाता रूप हैं । हे जीव ! यह शरीर आपके जीवन का आश्रय स्थान है, इसमें स्थापित हों॥७॥ |
| जिस प्रकार रथ को धारण करने के लिए रस्सी से दोनों जुओं को बाँधते हैं, वैसे ही आपके मन को जीवनीशक्ति तथा आरोग्यता के लिए धारण करते हैं, मृत्यु (विनाश) के लिए नहीं॥८॥ |
| जिस प्रकार यह विशाल धरती इन वृक्ष - वनस्पतियों को धारण करती है, उसी प्रकार अग्निदेव आपके मन को धारण किये हुए हैं, जिससे आप जीवनीशक्ति तथा कल्याण प्राप्त कर सकें और मृत्यु से संरक्षित रहें॥९॥ |
| विवस्वान् के पुत्र यमराज से हमने सुबन्धु के मन को विमुक्त किया है, जिससे वे कल्याण रूप जीवन को धारण करते हुए, मृत्यु से सुरक्षित रहें॥१०॥ |
| वायुदेव दिव्यलोक से नीचे के लोक में प्रवाहित होते हैं, सूर्यदेव ऊपर से नीचे की ओर ताप देते हैं, अहिंसक गौ नीचे की ओर दुही जाती है, उसी प्रकार है सुबन्धु ! आपके अमंगल भी अधोगामी हों॥११॥ |
| यह हमारा हाथ सौभाग्य युक्त है, अति सौभाग्यशाली यह हाथ सबके लिए सभी रोगों का निवारण कर्ता है । यह हाथ शुभ और कल्याणकारी है॥१२॥ |
सूक्त - ६१
| नाभानेदिष्ठ (श्रेष) के माता, पिता, भातादि कार्य विभाजन करते समय, नाभानेदिष्ठ को (भूल से) उनका भाग न देकर, रुद्रदेव की अर्चना करने लगे। इससे नाभानेदिष्ट भी रुद्र स्तोत्र के लिए तत्पर होकर अंगिराओं के यज्ञ में सम्मिलित हुए। यज्ञ के छठे दिन, जो उन लोगों की विस्मृति में था, उन्होंने (नाभानेदिष्ठ ने) उन सात होताओं से कहकर यज्ञसत्र को सम्पूर्ण किया॥१॥ |
| स्तोताओं को ऐश्वर्य प्रदान करने तथा शत्रुओं के संहार हेतु अस्त्रादि देते हुए रुद्रदेव (इस विशिष्ट) यज्ञ स्थल पर जाकरे विराजमान हुए। जल वृष्टि द्वारा जिस प्रकार बादल अपने प्रभाव या बल को प्रदर्शित करते हैं, वैसे ही रुद्रदेव यज्ञ में उपस्थित होकर अपनी क्षमता को सर्वत्र प्रकाशित करने लगे॥२॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! जो अत्विज् प्रचुर हविष्य पदार्थों से सम्पन्न होते हुए भी अपने हाथ में हमारी अँगुलियाँ पकड़कर आपका नामोच्चारण करते हुए यज्ञ सम्पादित करते हैं, आप मन के समान शीघ्र गति से उस स्तोता के यज्ञ में विवेकपूर्वक गमन करते हैं॥३॥ |
| हे दिव्यलोक के पुत्र अश्विनी कुमारो ! जब रात्रि का अन्धकार विनष्ट होता है और प्रात:कालीन सूर्य किरणों की लाल रंग की आभा प्रकट होती है, उस समय हम आपका आवाहन करते हैं। आप यज्ञ की इच्छा से प्रेरित होकर हमारे यज्ञ में पधारें तथा हविष्यान्न का सेवन करें। दो अश्वों के समान निरन्तर हवि का भक्षण करते हुए द्वेष भावना को विस्मृत करें॥४॥ |
| जिन प्रजापति ब्रह्मा का तेज प्रजा के उत्पादन में समर्थ है । वे मनुष्यों के हित में तेजस् को छोड़ते हैं । आवश्यकता के अनुसार उसे पुन: धारण करते हैं । उन्होंने अपनी सुन्दर कन्या उषा में उस उत्पादक तेज को स्थापित किया ॥५॥ |
| जिस समय सृष्टि- कामना से युक्त प्रजापति ने युवती कन्या (उषा) में तेजस् स्थापित किया, उस समय दोनों के बीच शक्तिरूप प्राण ऊर्जा का अभिषिंचन न्यूनरूप में हुआ; परन्तु यज्ञ के आधार स्वरूप उच्च उद्देश्य के लिए जब दोनों का संगम ( प्रचुर मात्रा में) हुआ, तो कल्याण के प्रतीक रुद्र (सूर्य) की उत्पत्ति हुई॥६॥ |
| जिस समय कन्या (उषा) के साथ प्रजापति के तेज का संयोजन हुआ, उस समय पृथ्वी के लिए उत्पादक तेज़ का अभिषेचन किया गया। उसी से सत्कर्मशील देवताओं ने (वतों के संरक्षक) ब्रह्मशक्ति का उत्पादन किया। वास्तोष्पति (यज्ञ के पालकों की उस व्रतशीलता से वास्तोष्यति( पदार्थों के उत्पादक देव) का सृजन हुआ॥७॥ |
| जिस प्रकार सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव नमुचि के वध काल में युद्ध में मुँह से झाग छोड़ते हुए वापस लौटे थे, वैसे ही हमारे समीप से वास्तोष्पति जिन पैरों से आए थे, उन्हीं से वापस लौटे। अंगिराओं ने दक्षिणा स्वरूप हमें जो गौएँ प्रदान की थीं, वे उन्हें दूर से ही त्यागते हुए आगे एक कदम भी नहीं बढ़े, आसानी से ग्रहण करने योग्य उन हमारी गौओं को मार्गदर्शक रुद्रदेव महण नहीं करते॥८॥ |
| प्रजाजनों के उत्पीड़क और अग्नि की तरह दाहक (जलाने वाले) असुर अचानक शीघ्रता से इस यज्ञ में उपस्थित नहीं हो सकते । रात्रि में भी वस्त्रहीन दुष्ट असुर अग्नि के समीप नहीं आ सकते; क्योंकि इस यज्ञ के संरक्षक रुद्रदेव हैं, यज्ञ के दूसरे संरक्षक यज्ञवाहक अग्निदेव, समिधाओं को ग्रहण करते हुए और हविष्यान्नरूपी सामर्थ्य को बाँटते हुए यज्ञवाहक अग्निदेव राक्षसों के साथ युद्ध में प्रवृत्त होते हैं॥९॥ |
| नौ मास तक यज्ञानुष्ठान करते हुए आङ्गिरसों ने गौओं को उपलब्ध किया। उन्होंने सुन्दर स्तुतियों के सहयोग से यज्ञीय वाणी का प्रयोग करते हुए उसे सम्पूर्ण किया। उन्होंने इहलौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार की उपलब्धियों को प्राप्त किया तथा इन्द्र के समीप पहुँच गए । दक्षिण रहित निष्काम भाव से सत्र नामक यज्ञ को उन्होंने सम्पन्न करके अक्षुण्ण फल को प्राप्त किया॥१०॥ |
| अङ्गिराओं ने जिस समय अमृततुल्य दुधारू गौओं के शुभ और पवित्र दूध को यज्ञ में समर्पित किया, उस समय उत्तम स्तोत्र वाणियों द्वारा नवीन सम्पत्ति के समान ही द्युलोक से अभिषिञ्चित वृष्टिरूप प्रवाह को उपलब्ध किया॥११॥ |
| जिस समय यजमान- स्तोता गोशाला को गोरहित देखते हैं, उस समय वे इस प्रकार कहते हैं, कि स्तोत्र में रमण करने वाले और ऐश्वर्यों से विशेष वैभवशाली, पापरहित (पवित्रतायुक्त) इन्द्रदेव सभी गोरूप धन को शीघ्र ही चारों ओर संगृहीत करके यजमान साधक को देने के लिये धारण करते हैं॥१२॥ |
| सुदृढ़ इन्द्रदेव जिस समय अनेक रूपों में विस्तार युक्त शुष्ण नामक राक्षस के गुप्त मर्म को ढूंढकर उसे विनष्ट करते हैं अथवा नृषद के पुत्र का संहार करते हैं, उस समय उनके सेवकगण विभिन्न तरह से उन्हें घेर कर उनके साथ जाते हैं॥१३॥ |
| जो देवगण स्वर्गीय स्थिति के अनुसार यज्ञ स्थल के कुश पर प्रतिष्ठित होते हैं, वे अग्नि की तेजस्विता को ‘भर्ग' इस नाम से सम्बोधित करते हैं। अग्निदेव के एक तेज का नाम 'जातवेदस्' भी है । हे यज्ञ निष्पादक अग्निदेव ! आप यज्ञ के होतारूप हैं, आप अनुकूल होकर हमारे आवाहन को स्नेह- भावना से ग्रहण करें॥१४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! वे दोनों प्रख्यात तेजस्वितायुक्त रुद्रपुत्र अश्विनीकुमार हमारे स्तोत्र को सुनकर यज्ञ - स्थल में पदार्पण करें । जिस प्रकार वे आदिपुरुष महाराज मनु के यज्ञ में प्रशंसित होते हैं, उसी प्रकार हमारे यज्ञ-स्थल में अति हर्षित हों । वे हमारे ऊपर अनुग्रह करते हुए श्रेष्ठ धन और अन्नदाता प्रजाओं के सुखार्थ यज्ञ को धारण करें॥१५॥ |
| सबके प्रेरक और सर्वस्तुत्य ओषधिराज सोमदेव की हम प्रार्थना करते हैं, शुद्ध और क्रियाकुशल सोम स्वयमेव सेतुरूप हैं। वे जल को प्रतिदिन पार करते हैं । जिस प्रकार शीघ्र गमनशील घोड़े चक्र की धुरी को कम्पित करते हैं, वैसे ही कक्षीवान और अग्नि को भी वे सोमदेव प्रकम्पित करते हैं॥१६॥ |
| अग्निदेव इस लोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणप्रद हैं । वे हवियों द्वारा तारणकर्ता तथा यज्ञ-सम्पादक हैं । जो गाय अमृततुल्य दुधारू होने पर दूधरहित है, उसे प्रसववती करके वे दुधारू बनाते हैं ।यज्ञ में मित्र, वरुण और अर्यमादेव को श्रेष्ठतम स्तवनों द्वारा भली प्रकार प्रशंसित किया जाता है॥१७॥ |
| हे द्युलोक में विद्यमान सूर्यदेव ! आपका वह परमबन्धु नाभानेदिष्ठ आपकी प्रार्थना करता है। कर्मशील नाभानेदिष्ठ अंगिरा द्वारा प्रदत्त एक हजार गौओं की कामना से स्तुति करता है । द्युलोक हमारा और सूर्य का श्रेष्ठ उत्पत्ति स्थल है । उसे सूर्य एवं मेरे जन्म में कितना अन्तर है?॥१८॥ |
| दिव्यलोक ही मेरा उत्पत्ति स्थल है, यही मेरा आश्रय हैं । सम्पूर्ण देवगण (अथवा प्रकाशमान किरणे) मेरे अपने हैं, मैं सबमें विद्यमान हूँ । द्विज ( दो बार जन्म लेने वाले ) सत्यस्वरूप ब्रह्मा से उत्पन्न हुए हैं । यज्ञ स्वरूप गौ ( माध्यमिका वाक् ) ने प्रकट होकर सभी प्रकार का सृजन किया॥१९॥ |
| अति आनन्दित होकर अग्निदेव चारों ओर अपना स्थान ग्रहण करते हैं । कान्तिमान् , काष्ठभक्षक दोनों लोकों में सहायक इस अग्नि की ज्वालाएँ ऊपर उठती हैं। अतिस्तुत्य, सुस्थिर सुखों के वर्द्धक, अग्नि की माता (अरणि अथवा द्यावा- पृथिवी) इसे यज्ञ में शीघ्र उत्पन्न करती हैं॥२०॥ |
| श्रेष्ठतम स्तोत्र वाणियों का उच्चारण नाभानेदिष्ठ को शान्ति प्रदान करता है, सभी के प्रशंसनीय इन्द्रदेव के समीप प्रार्थनाएँ जाती हैं। हे ऐश्वर्यवान् अग्निदेव ! आप हमारी स्तुति पर ध्यान दें । आप इन्द्रदेव के यज्ञ को सम्पन्न करें, आप अश्वमेध यज्ञ को सम्पन्न करने वाले मनु के पुत्र की प्रार्थना से समृद्ध होते हैं॥२१॥ |
| हे वज्रधर और नरेन्द्र इन्द्रदेव ! आप हमारी विपुल ऐश्वर्य की कामना के अभिप्राय को जाने-समझे । हम आपके निमित्त स्तुतिगान करते हुए हविष्यान्न समर्पित करते हैं । आप हमारा संरक्षण करें । हे अश्वों से सम्पन्न इन्द्रदेव ! आपकी अनुकम्पा से हम पापमुक्त हों॥२२॥ |
| हे दीप्तिमान् मित्रावरुण ! गोधन की कामना से प्रेरित होकर अंगिराजन यज्ञ को सम्पादित करते हैं, सर्वज्ञाता नाभानेदिष्ठ स्तोत्र की आकांक्षा से यज्ञ के समीप जाते हैं। नाभानेदिष्ठ ने स्तोत्र - गान करके यज्ञ को सम्पूर्ण किया, इसी से वे उनके अतिप्रिय ज्ञानी विप्र हुए हैं॥२३॥ |
| हम श्रद्धापूर्वक स्तुतिगान करने वाले, उन जयशील और प्रशंसनीय वरुणदेव की, अभीष्ट सिद्धि के लिये कामना करते हैं। ये शीघ्रगामी अश्व वरुणदेव के पुत्ररूप हैं। हे वरुणदेव ! आप शुद्ध स्वरूप हैं, हमें अन्न लाभ से लाभान्वित करने के लिये प्रेरित हों॥२४॥ |
| हे मित्र और वरुण देवो ! आपकी मैत्री- भावना को सुदृढ़ करने तथा बल- वृद्धि के लिये जब अन्न से युक्त ऋत्विज् विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करते हैं, तब आपका बन्धुत्वभाव प्राप्त कर लेने पर सम्पूर्ण विश्व में यज्ञ की महिमा का विस्तार होता है । जिस प्रकार चिरपरिचित मार्ग सुखद होता है, वैसे ही आपको मैत्रीभावना हम स्तोताओं को सुखकर हो॥२५॥ |
| हे परमबन्धु वरुणदेव ! आप देवताओं के सहयोग से नमस्कार और श्रेष्ठ स्तोत्रों से स्तुत होकर आनन्दपूर्वक समृद्ध हों । स्तोत्र वचनों से वे शीघ्र हमारे समीप आगमन करें । उन्हीं के निमित्त गोदुग्ध की धारा यज्ञ में प्रवाहित होती है॥२६॥ |
| हे यजन योग्य देवगण ! आप हमारे श्रेष्ठ संरक्षण के लिए संगठित हों । हे ज्ञानी अंगिराओ ! परिश्रमपूर्वक आपने हमें बल प्रदान किया, आपकी मोहदृष्टि समाप्त हो गई है, आप इस समय गोरूपी ऐश्वर्य- सम्पदा को प्राप्त करें॥२७॥ |
सूक्त - ६२
| हे मेधायुक्त अंगिराओ ! हवियोग्य पदार्थों तथा दक्षिणा से सम्पन्न यज्ञीय सत्कर्मो से आपने इन्द्रदेव के बन्धुत्व और अमृतत्त्व को उपलब्ध किया है। उनके निमित्त आप लोगों का कल्याण हो । आप मुझ नाभानेदिष्ठ (मनु- पुत्रों को भी (यज्ञार्थ) स्वीकार करें॥१॥ |
| हे अंगिराओ ! आप हमारे पितृतुल्य हैं। आपने पूरे वर्ष ऋत (सत्य या ज्ञान) द्वारा वल (राक्षस अथवा अवरोध) का उच्छेदन करके गौ (पृथ्वी) सहित वसु (धन या आवास उपलब्ध किया। आपको दीर्घायुष्य की प्राप्ति हो । हे मेधावी जनो ! आप मुझ मनु पुत्र को (यज्ञार्थ) स्वीकार करें॥२॥ |
| हे अंगिरागण ! आप लोगों ने सत्यरूप यज्ञीय तेज से दिव्य लोक में सर्व प्रेरक सूर्यदेव को प्रतिष्ठित किया और सबकी निर्मात्री पृथ्वी को यज्ञीय सत्कर्मों से समृद्ध तथा विख्यात किया है। आपकी श्रेष्ठ प्रजाप सन्ताने हों । हे श्रेष्ठ ज्ञाननिष्ठ ऋषियो ! आप मुझ मनु पुत्र को अपने साथ लें॥३॥ |
| हे देवपुत्र अंगिराओ ! यह नाभानेदिष्ठ आपके यज्ञ स्थल में कल्याणकारी वचनों का प्रयोग करता है, उसे आप आदर सहित सुनें । आप सभी शोभनीय ब्रह्मशक्ति को प्राप्त करें । हे मेधा- सम्पन्न श्रेष्ठ अंगिराओ ! आप मुझ मनु पुत्र को साथ में रखें॥४॥ |
| ये अंगिरा विविध रूप वाले हैं, गंभीर कर्म करने वाले ये अग्नि के पुत्र हैं। ये सभी ओर प्रकट हुए हैं॥५॥ |
| विविध रूपों वाले अंगिरागण दिव्यलोक में अग्निदेव के द्वारा चारों ओर उत्पन्न हुए। उनमें किसी ने नौ मास और किसी ने दस मास तक यज्ञ कर्म करके तेजस्विता प्राप्त की। देवों के साथ स्थित अग्निदेव हमें श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं॥६॥ |
| श्रेष्ठ रीति से यज्ञकर्मों के सम्पादक अंगिराओं ने इन्द्रदेव के सहयोग से अश्वों (शक्ति-कणों ) और गौओं (किरणों ) के समूहों को प्रकट किया। वे ऋषिगण यज्ञीय अवशिष्ट असंख्य धन हमें देकर इन्द्रादि देवताओं में अपनी यशस्विता को प्रख्यात करें॥७॥ |
| जो सैकड़ों अश्व और सहस्रों गौएँ शीघ्रता से ऋषिगणों को दान देने के लिए प्रेरित होते हैं, वे सावर्णि मनु जल से सिञ्चित बीज के समान कर्मफल से युक्त होकर सन्तान और धनादि से सम्पन्न हों॥८॥ |
| आकाश में उच्च स्थान पर तेजस्वी सूर्य सदृश स्थित उन सावर्णि मनु के समान दूसरे किसी में भी दान देने की सामर्थ्य नहीं । सावर्णि मनु का दान सर्वत्र प्रवहमान नदी के समान ही सर्वत्र प्रख्यात हैं अथवा विस्तृत है ॥९॥ |
| उत्तम कल्याणकारी, आज्ञाकारी प्रचुर गौओं से युक्त और सेवक के समान स्थित (विद्यमान) यदु और तुर्व नामक राजर्षि मनु के दुग्ध रूप भोजनार्थ गवादि पशु प्रदान करते हैं॥१०॥ |
| सहस्रों गौओं के दानकर्ता और मनुष्यों के नायक रूप मनु का अशुभ करने में कोई सक्षम नहीं । इस मनु द्वारा प्रदत्त दक्षिणा सूर्यदेव के सहयोग से तीनों लोकों में प्रख्यात हो । सावर्णि मनु के आयुष्य को इन्द्रादि देवगण समृद्ध करें । आलस्य रहित हम श्रेष्ठ अन्न उपलब्ध करें॥११॥ |
सूक्त - ६३
| जो इन्द्रादि देवगण सुदूर देश से आकर मनुष्यों के साथ मैत्री- भाव को सुदृढ़ करते हैं, जो देवगण यज्ञों से संतुष्ट होकर विवस्वान् के पुत्र मनु की मनुष्यादि सन्तानों को धारण करते हैं, जो देवगण नहुष पुत्र ययाति राजा (अथवा प्रयत्नरत मनुष्यों) के यज्ञ में आसनों पर विराजमान होते हैं, वे हमें ऐश्वर्य- सम्मदा प्रदान करके सम्माननीय बनाएँ और हमारी प्रगति करें॥१॥ |
| हे देवगण ! आपके सम्पूर्ण नाम नमनयोग्य-स्तुतियोग्य हैं तथा आपके सभी अंग यजनीय हैं । जो आप द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथिवी से प्रकट हुए हैं, वे आप यज्ञ में आकर हमारे आवाहन को सुनें॥२॥ |
| सभी की निर्मात्री पृथ्वी जिन देवताओं के निमित्त मधुर दूध (जल) प्रवाहित करती है । जिनके निमित्त अविनाशी और मेघों से आच्छादित अन्तरिक्ष अमृत को धारण करता है । स्तुत्य यज्ञीय कर्मों से अति सामर्थ्यवान् वृष्टि के आश्रय, उत्तम कर्मा उन अदिति के पुत्र देवों की स्तुति करें॥३॥ |
| कर्तव्यनिष्ठ मनुष्यों के निरीक्षण के लिए जो सदा जागरूक रहते हैं, वे तेजस्वी देवगण उपासना एवं स्तुतियों से सर्वत्र पूज्यास्पद होकर महिमामय अमृत पद को प्राप्त करते हैं । ज्योतिर्मय रथ से युक्त विघ्नरहित और पापरहित ये देवगण द्युलोक के उच्चस्थान पर लोगों के मंगल के लिए निवास करते हैं॥४॥ |
| अपनी तेजस्विता से प्रतिष्ठित और विकसित जो देवगण हविष्यान्न सेवन हेतु यज्ञ में उपस्थित होते हैं, और जो पराभवरहित होकर द्युलोक में निवास करते हैं; उन महिमामय देवों और उनकी जननी अदिति के मंगल के निमित्त श्रेष्ठ हविष्यान्न और विनम्र स्तुतियाँ समर्पित करें॥५॥ |
| हे देवशक्तियो ! हमारे अतिरिक्त कौंन साधक आपकी स्तुति करने में सक्षम हो सकता हैं, जिन पर आप स्नेहवश कृपा करते हैं ? हे ज्ञान- सम्पन्न देवों ! जो यज्ञीय सत्कर्म पाप से बचाकर हमारे लिये परम सुखकर और कल्याणमय हैं, उस यज्ञ को हमारे अतिरिक्त कौन स्तुतियों और आहुतियों से सुशोभित करते हैं?॥६॥ |
| वैवस्वत मनु ने अग्नि को प्रज्वलित करके श्रद्धायुक्त मन से सात ऋत्विग्गणों के साथ जिन देवताओं के निमित्त श्रेष्ठ हविर्द्रव्यों को समर्पित किया, वे अदिति पुत्र हमें अभय और सुख प्रदान करें तथा हमारे मंगल के निमित्त हमारे गन्तव्य मार्गों को सुगम बनाएँ॥७॥ |
| श्रेष्ठ ज्ञाननिष्ठ और मननीय देवगण स्थावर और जङ्गम सभी लोकों के अधीश्वर हैं । हे देवशक्तियो ! आप हमारे कल्याणमय सुख़ के लिये सभी प्रकार के ज्ञात और अज्ञात मानसिक पापकर्मों से हमे संरक्षित करें॥८॥ |
| पापों के मुक्तिदाता, सुखदायक इन्द्रदेव को हम संग्राम में शत्रुओं से संरक्षण के लिए आवाहित करते है । श्रेष्ठ कर्मशील, दैवी गुणों से युक्त मनुष्यों तथा अग्नि, वरुण और भगदेवों को सहयोग के लिए हम आमंत्रित करते हैं । द्युलोक, पृथिवी और मरुद्गणों को अन्न और कल्याण के लिए आवाहित करते हैं॥९॥ |
| भली प्रकार से रक्षा करने वाली, पर्याप्त विस्तार वाली, अत्यधिक विशाल, सुखदायक, श्रेल आश्रय देने वाली, निर्दोष, उत्तम पतवार वाली, बिना छिद्र वाली, मृत्यु भय से बचाने वाली, दिव्य और अखण्डत द्युलोक की यज्ञीय नौका पर हम आरूढ़ हों, जिससे हमारा कल्याण हो॥१०॥ |
| है यजनीय देवगण ! आप संरक्षण के लिये हमें आश्वासन प्रदान करें, सर्वविनाशक दुर्गति से हमें सुरक्षित करें । हे देवगण ! आप हमारी सत्यस्वरूप आदर- भाव युक्त प्रार्थनाओं को सुनते हुए हमारे संरक्षण और कल्याण के निमित्त आगमन करें॥११॥ |
| हे देवगण ! आप हमारे रोगों और उनके समान ही बाधक शत्रुओं का निवारण करें । सभी प्रकार की दानरहित बुद्धि और देवों के विरोधी शत्रुओं को दूर करें । आप धन लोलुप दुर्मति और देवों के प्रति हविष्यान्न से रहित शत्रुओं को दूर करें । हमसे सम्बन्धित शत्रुओं के बैर भाव का निवारण करें तथा हमारे कल्याण के लिए प्रचुर सुख-सम्पदा प्रदान करें॥१२॥ |
| हे आदित्यो ! आप जिसे सन्मार्ग दिखाकर और पापकर्मों से विमुक्त करके कल्याणपथ पर प्रेरित करते हैं, ऐसे मुनष्य सभी प्रकार के अनिष्टों से रहित होकर प्रगतिपथ पर अग्रसर होते हैं तथा सत्यधर्माचरण द्वारा सुसन्तति और पशु आदि से सम्पन्न बनते हैं॥१३॥ |
| हे देवगण ! अन्न सामग्री को प्राप्त करने के लिए आप जिस रथ को संरक्षित करते हैं; हे मरुद्गण ! वीरों के लिए उचित संग्राम में शत्रुओं की संचित सम्पदा की प्राप्ति के लिए आप जिस रथ को बचाते हैं, हे इन्द्रदेव ! संग्राम में गमन करते हुए उस रथ को प्रभात वेला में प्राप्त करने की कामना करें । ऐसे ध्वस्त न होने वाले रथ पर आरूढ़ होकर हम कल्याण पथ पर अग्रसर हों॥१४॥ |
| मार्ग, मरुस्थल, जल के बीच तथा युद्धक्षेत्र सभी हमारे लिए कल्याणप्रद हों । उस सेना के मध्य भी हमारा मंगल हो, जहाँ अस्त्रादि का प्रयोग हो रहा हो । संतान को उत्पन्न करने वाली स्त्रियों के गर्भस्थ शिशुओं तथा गृहों का भी मंगल हो । हे देवगण ! आप हमारे धनादि ऐश्वर्य लाभ के लिए मंगलमय हों॥१५॥ |
| जो पृथ्वी संग्रामगामी मनुष्यों के लिए मंगलकारिणी है तथा जो श्रेष्ठ ऐश्वर्यशालिनी होकर दूसरों के लिए सुख प्रदान करती है, ऐसी पृथ्वी हमारे घरों को भी संरक्षित करे । वही अरण्यप्रदेशों में सुरक्षा करे । हे देवों द्वारा संरक्षित पृथिवि ! आप हमारे लिए उत्तम आश्रययुक्त सिद्ध हों॥१६॥ |
| हे सम्पूर्ण देवगण एवं देवमाता अदिति ! ज्ञाननिष्ठ स्तोता प्लात ऋषि के पुत्र ‘गय'ने आप लोगों को स्तुति प्रार्थनाओं द्वारा भली प्रकार से समृद्ध किया है। अविनाशी देवों के अनुग्रह से मनुष्य ऐश्वर्य- सम्पदा के स्वामी होते हैं । दिव्य गय, आप देवजनों की स्तुति करते हैं । १७॥ |
सूक्त - ६४
| यज्ञ में हमारी प्रार्थना को स्वीकार करने वाले किन देवों के प्रति किस प्रकार के मननीय स्तोत्र को, किस ढंग से हम प्रस्तुत करें ? कौन देव हमारे ऊपर अनुग्रह करके हमारे लिए कल्याणकारी सुख प्रदान करेंगे ? कौन देव हमारे संरक्षणार्थ हमारे यज्ञ में उपस्थित होंगे ?॥१॥ |
| हमारी आन्तरिक विवेकबुद्धि में अग्निहोत्रादि कर्म करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं। तेजसम्पन्न लोग देवों की कामना करते हैं, हमारी अभिलाणएँ देवानुगामी होती हैं। उन देवों के अतिरिक्त अन्य कोई भी सुखदायक नहीं हैं, इन्द्रादि देवताओं में ही हमारी अभिलाषाएँ स्थित हैं॥२॥ |
| हे साधको ! मनुष्यों द्वारा स्तुत्य, अगम्य पूषादेव की प्रार्थना करो तथा देवों में प्रज्वलित अग्नि की स्तुति करो। आप सभी अपनी वाणी से सूर्य, चन्द्र, यम, तीनों लोकों में संव्याप्त वायु, उषा, रात्रि और अश्विनीकुमारों की स्तुति करो॥३॥ |
| क्रान्तदर्शी अग्निदेव किस प्रकार असंख्य स्तोताओं से युक्त होते हैं तथा किस वाणी से सम्माननीय होते है ? श्रेष्ठ स्तोत्र वाणियों से बृहस्पतिदेव हर्षित होकर बढ़ते हैं । अजएकपात् और अहिर्बुध्य देवता हमारे आवाहन काल में हमारे श्रेष्ठ मंत्रयुक्त स्तोत्रों का, हर्षित होकर श्रवण करे॥४॥ |
| हे अदिति (अखण्ड़ मातृ ऊर्जा-मदर फार्म आफ कास्मिक एनर्जी ) ! दक्ष (सृजन में कुशल आद्य शक्त प्रवाह) के जन्म के समय आप प्रकाशमान मित्रावरुण की सेवा करती हैं। विविध प्रकार के स्वरूपों में जन्म लेने वाले सप्तहोता (सप्त वर्णयुक्त) अर्यमा (प्रकाश कण-फोटांस या सूर्य) अविचलित मार्ग से चलने वाले सुख साधनों से युक्त रथ से सम्पन्न होते हैं॥५॥ |
| इन्द्रदेव के जो अश्व संग्राम काल में शत्रुओं के विशाल धन को स्वयमेव वहन करते हैं, जो यज्ञ काल में सदैव सहस्रों ऐश्वर्य प्रदान करते हैं और जो कुशल अश्वों के समान शीघ्र गति से पद-निक्षेप करते हैं, वे सभी हमारे आवाहन को सुनें । हमारे आमन्त्रण को वे कभी अस्वीकार नहीं करेंगे॥६॥ |
| हे स्तोतागण ! आप रथयोजक वायु, विपुल कर्मकर्ता इन्द्रदेव और पूषादेव की श्रेष्ठ स्तुति करके अपनी मैत्री के लिए उन्हें आमन्त्रित करो। वे सभी समान मनों से युक्त होकर सर्वप्रेरक सवितादेव के यज्ञ में, प्रभातवेला में आकर विराजमान होते हैं॥७॥ |
| तीन (द्यु, अन्तरिक्ष एवं भूलोक में) और सतत संचरित सात प्रवाह (अथवा २१ नदियाँ), सतत संचरित सात महासागर, वनस्पतियों, पर्वतों, अग्नि, कृशानु नामक सोमपालक गन्धर्व, वाण चालक अनुचर गन्धर्वो, पुष्य नक्षत्र, हविर्भाग योग्य रुद्र, रुद्रगणों में श्रेष्ठ रुद्र को हम यज्ञीय संरक्षण के लिए आवाहित करते हैं॥८॥ |
| महती, पूजनीय और तरंगशालिनी त्रिसप्त धाराएँ हमारे संरक्षण के लिए आगमन करें । मातृ सदृश और जल प्रेरक ये सभी देवियाँ घृतवत् पुष्टिप्रद और मधु के समान पय (दूध या पोषक प्रवाह) हमें प्रदान करें॥९॥ |
| तेजस्विनी देवमाता हमारे निवेदन को सुनें, देवपिता त्वष्टा अपने पुत्र देवों- देवपलियों के साथ हमारे वचनों के अभिप्राय को समझें । इन्द्र, वाज, रथपति भग एवं स्तुत्य मरुद्गण हम स्तोताओं का संरक्षण करें॥१०॥ |
| दर्शन में मनोहारी मरुद्गण अन्नादि से परिपूर्ण आवासगृह के समान हैं। रुद्रपुत्र मरुद्गणों की प्रशंसनीय प्रार्थना अतिकल्याणप्रद होती है, मनुष्यों में हम गवादि पशुधन से युक्त होकर यशस्वी बनें । हे देवगण ! इस प्रकार हम सदैव अन्न आदि से सम्पन्न बनें॥११॥ |
| हे मरुद्गण, इन्द्र, देववृन्द, वरुण और मित्रगण ! जैसे गाय दूध से परिपूर्ण रहती है, वैसे ही आप हम लोगों के सुकृत को अभीष्ट फलों से युक्त करें । स्तोत्र को सुनकर रथारूढ़ होकर आप लोग हमारे यज्ञ में पधारे हैं॥१२॥ |
| हे मरुद्गणो ! आपने इससे पूर्व अनेक बार हमारे बन्धुत्व को स्थापित किया है । जिस नाभिरूप यज्ञ स्थल पर सबसे पहले हम आपकी अर्चना करें, वहाँ देवमाता अदिति हमें मनुष्यों के साथ हमारे बन्धुत्व को प्रगाढ़ करें॥१३॥ |
| सम्पूर्ण विश्व के निर्माणकर्ता, महिमामय, दीप्तिमान् और यजन योग्य द्यावा- पृथिवी प्रकट होने के साथ ही इन्द्रादि देवों को प्राप्त करते हैं। दोनों द्युलोक और पृथिवीलोक अनेक प्रकार के भरण-पोषणयुक्त अन्न जल से देवों और मनुष्यों को पोषित करते हैं। पालक देवों के सहयोग से विपुल तेज का सिंचन होता है॥१४॥ |
| जो वाणी सभी को बुलाने का माध्यम हैं, वह सभी श्रेष्ठ ऐश्वर्यों को संव्याप्त करती हैं, जो महान् गुणों की पालक, स्तुतियुक्त होकर देवों के निमित्त स्तोत्र प्रकट करती है, जहाँ सोम का अभिषवण करने वाली शिला भी सुशोभित होती हैं, ऐसे स्तवनीय यज्ञ में स्तोता लोग अपनी प्रार्थनाओं से देवताओं को यज्ञोन्मुख बनाते हैं॥१५॥ |
| इस प्रकार क्रान्तदशी बहुस्तुति युक्त, यज्ञ-विशेषज्ञ, पशु आदि ऐश्वर्य की कामना करने वाले, ज्ञाननिष्ठ ऋषि ‘गय' ने श्रेष्ठ वचनों और स्तुतियों से दिव्य देवों का स्तवन किया॥१६॥ |
| हे देवगण एवं देवमाता अदिते ज्ञाननिष्ठ ऋतज्ञ स्तोता प्लात ऋषि के पुत्र गय ने स्तुतियों से आपको संवर्द्धित किया।देवों के अनुग्रह से मनुष्य ऐश्वर्य सम्पन्न बनते हैं। इसीलिए गय ने आप दिव्यजनों की स्तुति की॥१७॥ |
सूक्त - ६५
| अग्नि इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यमा, वायु, पूषा, सरस्वती, आदित्यगण, विष्णु, मरुद्गण, स्वर्ग, सोम, रुद्र, अदिति और ब्रह्मणस्पति ये सभी देव परस्पर संगठित होकर अपनी महिमा से इस महान् अन्तरिक्ष को समृद्ध करते हैं॥१॥ |
| इन्द्र और अग्निदेव सज्जनों के संरक्षक हैं । वे संग्रामकाल में संयुक्त होकर अपनी शारीरिक सामर्थ्य से शत्रुओं को विनष्ट करते हैं तथा व्यापक अन्तरिक्ष को अपने तेज से परिपूर्ण करते हैं। तेजस्वी सोम से उनका बल बढ़ता है॥२॥ |
| महानतम, अपराजेय और ऋत (सत्य या यज्ञ) के वर्द्धक उन देवताओं के निमित्त हम यज्ञवेत्ता स्तुतिवाणी का प्रयोग करते हैं। अति आश्चर्यप्रद, ऐश्वर्य- अधिपति जो देव जल बरसाते हैं, वे ही श्रेष्ठ मित्ररूप देवता हमें ऐश्वर्य प्रदान करके श्रेष्ठता प्रदान करें॥३॥ |
| सबके नायक सूर्य, आकाशस्थ ग्रहों, नक्षत्रों, तेज, द्युलोक, पृथिवीलोक और व्यापक पृथ्वी को उन्हीं देवों ने स्वकीय सामर्थ्य से यथास्थान स्थित किया है । धनदाताओं के समान हीं साधकों को श्रेष्ठदान द्वारा ये देव मनुष्यों में श्रेष्ठ बनाते हैं, इसीलिए इनकी प्रार्थना की जाती है॥४॥ |
| दानी मित्र और वरुण देव को हविष्यान्न समर्पित करें। ये दोनों सम्राट् मित्र और वरुणदेव कभी मानसिक त्रुटि नहीं करते, इनके धाम लोक कल्याणकारी सत्कर्मों से प्रकाशित हो रहे हैं। दोनों द्यावा-पृथिवी इनके समक्ष याचक के समान स्थित हैं॥५॥ |
| मार्ग स्वयं पार करने वाली यह दुधारूगौएँ स्तुतियों से प्रभावित होकर ( दूध देकर) हमारे यज्ञ को परिपूर्ण करती हैं। हमारे द्वारा प्रशंसित ये गोएँ, दाता वरुणदेव एवं इतरदेवगणों को यजनीय पदार्थ प्रदान करें तथा हम देवत्व संवर्द्धक लोकसेवियों को संरक्षण प्रदान करें॥६॥ |
| जो देव आत्म तेज से आकाश में संव्याप्त हैं, अग्निज्वाला रूपी जिह्वायुक्त एवं यज्ञ संवर्द्धक हैं, वे यज्ञस्थल में अपने-अपने निर्धारित स्थानों पर विराजमान होते हैं। वे अन्तरिक्ष को धारण करके अपने तेजस्वी बल से अप् (गति अथवा जल) चक्र को चलाते हैं और यजनीय हविष्यान्न से अपने शरीर को सुशोभित करते हैं ॥७॥ |
| सर्वव्यापी, सबके माता-पिता स्वरूप, सर्वप्रथम उत्पन्न, सहयोग भाव से रहने वाले द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों ही यज्ञस्थल में रहते हैं। दोनों ही समान मन से युक्त होकर अति वन्दनीय वरुणदेव की प्रसन्नता के लिए घृतवत् पय स्रवित करते हैं॥८॥ |
| मेघ और वायु ये दोनों अभीष्ट कामनाओं के वर्षक और जल के धारणकर्ता हैं । इन्द्र, वायु, वरुण, मित्र, अर्यमा, अदितिपुत्र तथा आदित्य देवों को हम आवाहित करते हैं, जो देवता पृथ्वी, द्युलोक और अन्तरिक्ष लोक में प्रकट हुए हैं, उनका भी हम आवाहन करते हैं॥९॥ |
| है ऋभुगण ! जो सोमदेव आपके कल्याण के लिए त्वष्टा, वायु आदि देवों को आमन्त्रित करने वाली देवी उषा के समीप जाते हैं तथा जो बृहस्पति, श्रेष्ठ ज्ञानवान् और वृत्रहन्ता इन्द्रदेव के समीप जाते हैं, उन इन्द्रदेव की तुष्टि के लिए सोमदेव से हम ऐश्वर्य की कामना करते हैं॥१०॥ |
| देवताओं ने अन्न, गौ, अश्व, ओषधि, वनस्पतियों, व्यापक धरती, पर्वतों और जल को उत्पन्न किया है । वे ही आकाश में सूर्यदेव को स्थापित करने वाले हैं। श्रेष्ठ दानदाता ये देवगण भूलोक में सभी स्थानों पर विद्यमान हैं। उनके द्वारा ही श्रेष्ठ हितकारी यज्ञादि सत्कर्मों का प्रसार हुआ है। उनसे हम धन की कामना करते हैं॥११॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने भुज्यु को (जो समुद्र में गिरे हुए थे) बचाकर विपत्ति का निवारण किया और वधिमती को श्याव नामक पुत्रदान दिया। आपने विमद अषि को कमद्यु नामक श्रेष्ठ भार्या प्रदान की तथा विश्वक ऋषि को विष्णाष्व नामक पुत्र प्रदान किया॥१२॥ |
| आयुध धारी, मधुरा माध्यमिक वाणी, आकाश धारणकर्ता अज़ एकपात् सिन्धु, आकाशस्थ जल, सम्पूर्ण देवता, विभिन्न कर्मों तथा ज्ञान से सम्पन्न सरस्वती हमारे स्तोत्रों को सुनें॥१३॥ |
| अनेक सत्कर्मों और सद्ज्ञान से सम्पन्न मनुपुत्रों के यज्ञ में यजनयोग्य, अमरस्वरूप, सत्यज्ञाता, हवि को धारण करने वाले, यज्ञ में संयुक्त रूप से विद्यमान रहने वाले तथा सर्वज्ञ इन्द्रादि सम्पूर्ण देव हमारी प्रार्थनाओं और मंत्रोच्चारण द्वारा समर्पित उत्तम अन्न को ग्रहण करें॥१४॥ |
| वसिष्ठ कुल में उत्पन्न श्रेषि ने अमरदेवों की अर्चना की। जो देवगण सभी लोकों में अपनी तेजस्विता से विद्यमान हैं, वे सभी देव हमें श्रेष्ठ यशस्वी अन्न दें । हे देवगण ! आप हमारे लिए कल्याणकारी होकर सदैव हमारा संरक्षण करें॥१५॥ |
सूक्त - ६६
| विपुल अन्न सम्पन्न, ज्योति के सृजेता, श्रेष्ठ ज्ञानवान् इन्द्रदेव को ज्येष्ठ मानने वाले, अमर और यज्ञ से संवर्द्धित होने वाले देवों को हम यज्ञ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए आवाहित करते हैं॥१॥ |
| इन्द्रदेव द्वारा कर्मप्रेरित और वरुणदेव द्वारा श्रेष्ठ रीति से अनुमोदन युक्त होकर जिन देवों ने तेजस्वी सूर्यदेव का पथ-प्रशस्त किया, उन शत्रु विनाशक इन्द्रदेव से युक्त मरुद्गणों के स्तोत्रों को हम बुद्धि में धारण करते हैं । ज्ञानीजन (उनके लिए) यज्ञायोजन सम्पन्न करें॥२॥ |
| वसुओं के सहयोग से इन्द्र हमारे घर को संरक्षित करें । आदित्य गणों के साथ देवमाता अदिति हमें सुख प्रदान करें । मरुद्गणों के साथ रुद्रदेव हमें सुखी करें । त्वष्टादेव देवपत्नियों के साथ हमें हर्ष प्रदान करें॥३॥ |
| देवमाता अदिति, द्यावा-पृथिवी, महिमामय सत्यरूप अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मरुद्गण, आदित्यदेव आदि सम्पूर्णदेवों को वसु, रुद्र, सुकर्मा तथा सविता देव को हम अपने संरक्षणार्थ बुलाते हैं॥४॥ |
| ज्ञानवान् समुद्र, कर्मनिष्ठ वरुण, पूषा, महिमायुक्त विष्णु, वायु, अश्विनीदेव, स्तोताओं के अन्न प्रदाता, ज्ञानी, पापकर्मियों के विध्वंसक और अविनाशी देवगण हमें तीन खण्ड़ों वाला दिव्य आश्रय (त्रितापों का नाश करने वाला, या आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक स्तर देने वाला या पृथ्वी, अन्तरिक्ष एवं द्युलोक में संरक्षण देने वाला) प्रदान करें॥५॥ |
| यज्ञ हमारे अभीष्ट फलों को पूर्ण करें । यजनीय देवगण सुखों के प्रदाता हैं। देवगण, हविष्यान्न संग्रहकर्ता, यज्ञ के अधिष्ठाता, द्युलोक और पृथ्वीलोक, पर्जन्य के अधिपति तथा स्तोतागण सभी हमारी कामनाओं की पूर्ति में सहायक हों॥६॥ |
| जलवर्षक, बहुस्तुत अग्निदेव और सोमदेव की हम अन्नादि प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। जो देव यज्ञीय कर्म में ऋत्विजों की अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने वाले (कहलाकर) प्रशंसित होते हैं; ऐसे देव हमें तीन स्तरों वाला आश्रय प्रदान करें॥७॥ |
| कर्तव्य धर्म के निर्वाह में संकल्पित, शक्तिशाली, यज्ञ को शोभायमान करने वाले, महान् दीप्तिमान् यज्ञीय कर्मों को श्रेय देने वाले, अग्नि के आवाहक, सत्यवती, द्रोहभाव से रहित ऐसे गुणों से सम्पन्न देवों ने वृत्रासुर संग्राम के समय अप् (जल अथवा तेज) का सृजन किया॥८॥ |
| देवताओं ने द्युलोक और भूलोक को लक्ष्य करके अपने शुभकर्मों द्वारा जल, ओषधि और यजनीय पलाशादि वृक्षों से परिपूर्ण वनों को प्रकट किया तथा अपने तेज से स्वर्गलोक और अन्तरिक्ष को संव्याप्त किया। उन देवताओं ने यज्ञ के साथ स्वयं को समाहित करके यज्ञ को शोभायमान किया॥९॥ |
| दिव्यलोक के धारक, श्रेष्ठ आयुधों से युक्त ऋभुदेव, विशाल शब्द ध्वनि करने वाले वायु और पर्जन्य, वनस्पति हमारी स्तुतियों को विकसित करें । धनदाता भगदेव और अर्यमादेव हमारे यज्ञ में पधारें॥१०॥ |
| जल से परिपूर्ण समुद्र, महानद, अन्तरिक्ष, रजयुक्त पृथ्वी, अजएकपात्, सागर, गर्जनशील मेघ तथा अहिर्बुध्य (अन्तरिक्षस्थ देव) और प्रज्ञावान् सभी देवगण हमारे स्तोत्रों (आवाहनों को सुनें॥११॥ |
| हे देवगण ! हम मनु की सन्तान मनुष्य आपके निमित्त यज्ञीय सत्कर्मों को समर्पित करें, प्राचीनकाल से प्रचलित हमारी यज्ञीय परम्परा को आप भली प्रकार सम्पादित करें । हे आदित्यो, रुद्रो और श्रेष्ठ दानी वसुदेवो ! इन उच्चारित स्तोत्रों से आप हर्षित हों॥१२॥ |
| अग्नि और आदित्य दोनों ही सर्वश्रेष्ठ पुरोहित रूप हैं, जो देवों के आवाहन कर्ता हैं, उनके निमित्त हम हविष्यान्न समर्पित करते हैं। यज्ञ के श्रेष्ठ कल्याणकारी पथ का हम अनुगमन करते हैं। हम अपने समीपस्थ क्षेत्रपति और अविनाशी एवं प्रमादरहित सम्पूर्ण देवों से धन की कामना करते हैं॥१३॥ |
| वसिष्ठ ऋषि के वंशजों ने ऋषि वसिष्ठ के समान ही मंगलकामना से देवों का पूजन- वन्दन किया । हे देवगण ! अपने प्रिय मित्रों के समान आप यहाँ आकर संतुष्ट होते हुए हमारी आकांक्षाओं को जानकर हमें गौ आदि धन प्रदान करें॥१४॥ |
| वसिष्ठ वंशियों ने अविनाशी देवों की प्रार्थना की । जो देवगण सम्पूर्ण लोकों में अपने ज्योतिर्मय स्वरूप से स्थित हैं, वे सभी हमें श्रेष्ठ अन्न दें । हे देवो ! आप हमारे लिए कल्याणकारी होकर सदैव हमारा संरक्षण करें॥१५॥ |
सूक्त - ६७
| हमारे पूर्वज अंगिरा ऋषियों ने सात छन्दों वाले विशाल स्तोत्र की रचना की, उनकी उत्पत्ति सत्य से हुई थी। संसार के कल्याणार्थ अयास्य ऋषि ने इन्द्रदेव को प्रशंसित करके एक पद के स्तोत्र की रचना की॥१॥ |
| अंगिरा ऋषियों ने यज्ञ के श्रेष्ठ स्थल में जाने का निश्चय किया । वे सत्यव्रती, मनोभावों से सरल, दिव्य पुत्र, महाबलवान् तथा ज्ञानियों के समान आचरणनिष्ठ हैं॥२॥ |
| बृहस्पतिदेव के मित्रों ने हंसों के समान स्वर निकाले । उनके सहयोग से बृहस्पतिदेव ने पत्थरों के बने द्वारों को खोल दिया। अन्दर अवरुद्ध गौएँ आवाज करने लगीं। वे ज्ञानी, देवजनों के प्रति श्रेष्ठ स्तोत्रों का उच्चस्वर से गान करने लगे॥३॥ |
| असत् (अव्यक्त) गुह्य क्षेत्र में गौएँ (प्रकाश किरणें-दिव्य वाणियाँ) छिपी हुई थीं। बृहस्पति (ज्ञान या वाणी के अधिपति) देव ने अन्धकार से प्रकाश (अज्ञान से ज्ञान) की कामना करते हुए नीचे के दो (अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी) तथा ऊपर का एक (द्युलोक), इस प्रकार तीनों द्वारों को खोलकर गौओं( किरणों या वाणियों) को प्रकट किया॥४॥ |
| गौओं के लिए अवरोधक बल के अधोमुख पुरों (संस्थानों ) का भेदन करके बृहस्पतिदेव ने एक साथ तीनों बन्धन काटकर जलाशय (मेघों या अप् प्रवाहों) से उषा, सूर्य एवं गौओं (किरणों) को एक साथ प्रकट किया। वे (बृहस्पतिदेव) विद्युत् की तरह गर्जना करने वाले अर्क (प्राण के स्रोत ) को जानते हैं॥५॥ |
| जिस 'वल' (राक्षस) ने गौओं को छिपाया था, उसे इन्द्रदेव ने हिंसक हथियार के समान अपनी तीव्र हुंकार से छिन्न-भिन्न कर दिया। मरुद्गणों की सहायता के इच्छुक उन्होंने पणि (वल के अनुचर) को नष्ट किया और उस असुर से चुराई गई गौओं को मुक्त किया॥६॥ |
| बृहस्पतिदेव ने सत्यस्वरूप, मित्ररूप, तेजस्वी और ऐश्वर्ययुक्त मरुद्गणों के सहयोग से गौओं के अवरोधक इस वल राक्षस को विनष्ट किया । वेदज्ञान के स्वामी ने वर्षणशील मेघों द्वारा प्रज्वलित एवं गतिशील मरुद्गणों के सहयोग से द्रव्यों को उपलब्ध किया॥७॥ |
| गौओं को उपलब्ध करके सत्यनिष्ठ मन से वे मरुद्गण अपने श्रेष्ठ कर्मों से बृहस्पतिदेव को गौओं के अधिपति बनाने के लिए प्रेरित हुए। बृहस्पतिदेव ने दुष्ट राक्षसों से गौओं के संरक्षणार्थ एकत्रित हुए मरुद्गणों के सहयोग से गौओं को विमुक्त किया॥८॥ |
| अन्तरिक्ष में सिंह के समान बार-बार गर्जनशील, कामनाओं के वर्षक और विजयशील उन बृहस्पतिदेव को प्रोत्साहित करने वाले हम, मरुत् वीरों के युद्ध में कल्याणकारी स्तुतियों से उनकी प्रार्थना करते हैं॥९॥ |
| जिस समय बृहस्पतिदेव सभी सांसारिक अन्नों का सेवन करते हैं तथा आकाश में ऊपर जाकर उत्तम लोकों में प्रतिष्ठित होते हैं, तब बलशाली बृहस्पतिदेव को देवगण मुख (वाणी) से प्रोत्साहित करते हैं, वे विभिन्न दिशाओं में रहते हुए उन्हें उन्नतिशील बनाते हैं॥१०॥ |
| हे देवगण ! अन्न प्राप्ति के निमित्त की गई हमारी प्रार्थनाओं को आप सफलता प्रदान करें। आप अपने आश्रय से हम साधकों को संरक्षण करें, तत्पश्चात् हमारी सभी प्रकार की विपदाओं का निवारण करें । हे सम्पूर्ण विश्व को हर्षित करने वाले द्यावा-पृथिवि ! आप दोनों हमारे निवेदन के अभिप्राय को समझें॥११॥ |
| सर्वसमर्थ बृहस्पतिदेव ने विशाल जल भण्डार रूप मेघों के सिर को छिन्न-भिन्न किया । जल के अवरोधक शत्रुओं को विनष्ट किया । सप्तधाराओं को प्रवाहित एवं संयुक्त किया । हे द्यावा-पृथिवि ! आप देवताओं के साथ आगमन करके हमारा संरक्षण करें॥१२॥ |
सूक्त - ६८
| जिस प्रकार धान्यक्षेत्र से पक्षियों को उड़ाते समय संरक्षक कृषक शब्द-ध्वनि करते हैं, जैसे मेघों का गर्जन बार-बार होता है, जैसे पर्वतों से झरने वाले झरने तथा मेघ से गिरने वाली जल धाराएँ शब्द करती हैं, उसी प्रकार ऋत्विज् लोग बृहस्पति देव की निरन्तर स्तुति करते हैं॥१॥ |
| अंगिरा पुत्र बृहस्पतिदेव ने गुप्त स्थान में रहने वाली गौओं (वाणियों अथवा किरणों) को प्रकाशित किया। भगदेव के समान ही वे अपनी तेजस्विती से संव्याप्त हुए। जिस प्रकार मित्र लोग, दम्पती (स्त्री और पुरुष) के पारस्परिक योग (मिलन) करने में सहायक होते हैं, वैसे ही उन्होंने गौओं को जन साधारण के लिए उपलब्ध करायो । हे बृहस्पतिदेव ! जिस प्रकार अश्वों (शक्ति कणों) को तेजगति में दौड़ाया जाता है, वैसे ही गौओं (पोषक किरणों या दिव्य वाणियों) को गतिशील बनाएँ॥२॥ |
| कल्याणकारी दूध देने वाली, निरन्तर गतिशील, काम्य स्पृहायुक्त, श्रेष्ठ वर्णयुक्त, निन्दारहित रूपवती गौओं को बृहस्पति देव उसी प्रकार पर्वतों (गुप्त स्थानों) से शीघ्रतापूर्वक बाहर निकालें, जिस प्रकार कृषक संगृहीत धान्य से जौ को बाहर निकाल कर बोते हैं॥३॥ |
| जैसे आकाश में उल्काएँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार पूज्य बृहस्पति देव ऋत (सत्य या यज्ञ) के योनि (उद्भव स्थलों में मधुर रसों को गिराते हैं। उन्होंने मेघों से गौओं ( किरणों ) को मुक्त किया तथा पृथ्वी की त्वचा को इस प्रकार भेदा जैसे वर्षा की बूंदें भेदती हैं॥४॥ |
| जिस प्रकार वायु जल की पीठ पर स्थित शैवाल (काई) को दूर हटाता है, जैसे वायुदेव ही मेघों को दूर हटाते हैं, उसी प्रकार बृहस्पतिदेव ने विचारपूर्वक वलासुर के आवरण को हटाकर गौओं को बाहर निकाला॥५॥ |
| बृहस्पतिदेव के अग्नितुल्य प्रतप्त और उज्ज्वल आयुध ने, जिस समय 'वल' के अस्त्र को छिन्न-भिन्न किया, उसी समय बृहस्पतिदेव ने उन गौओं को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया। जैसे दाँतों द्वारा चबाये गये अन्न को जीभ प्राप्त करती है, वैसे ही पणियों का वध करके बृहस्पतिदेव ने गौसमूह को प्राप्त किया॥६॥ |
| गुफा में छिपाकर रखी गई गौओं के रंभाने की आवाज को सुनकर बृहस्पतिदेव को गौओं की उपस्थिति का आभास हुआ। जिस प्रकार पक्षी के अण्डों को फोड़कर गर्भ रूप बच्चे बाहर आते हैं, वैसे ही बृहस्पतिदेव पर्वत (मेघों-अवरोधों) को तोड़कर गौओं (किरणों ) को बाहर निकाल लाये ॥७॥ |
| बृहस्पतिदेव ने पर्वतीय गुफा में बँधी हुई सुन्दर गौओं को उसी दयनीय अवस्था में देखा, जिस प्रकार न्यून जल की मात्रा में मछलियाँ व्यथित होती हैं। जैसे वृक्ष से सोमपात्र के निर्माण हेतु काष्ठ निकाला जाता है, वैसे ही बृहस्पतिदेव ने विभिन्न प्रकार के बन्धनों को तोड़कर गौओं को मुक्त किया॥८॥ |
| बृहस्पतिदेव ने गौओं की मुक्ति के लिए उषा को प्राप्त किया। उन्होंने सूर्य और अग्नि के माध्यम से अन्धकार को विनष्ट किया । जैसे अस्थि को भेदकर मज्जा प्राप्त की जाती है, वैसे ही असुर बल को भेदकर ( बृहस्पतिदेव ने) गौओं ( किरणों ) को बाहर निकाला॥९॥ |
| जिस प्रकार हिमपात पद्मपत्रों को हरण (नाश) करता है, उसी प्रकार गौओं का अपहरण किया गया। बृहस्पतिदेव के द्वारा वलासुर से उनको मुक्त कराया गया । ऐसा कार्य किसी दूसरे द्वारा किया जाना सम्भव नहीं। सूर्य और चन्द्र दोनों ही इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हैं॥१०॥ |
| जिस प्रकार कृष्णवर्ण घोड़े को स्वर्ण के आभूषणों से सुशोभित किया जाता है, वैसे ही देवताओं ने द्युलोक को नक्षत्रों से विभूषित किया है। उन्होंने रात्रिकाल में अन्धकार तथा दिवस में प्रकाश को स्थापित किया। उसी समय बृहस्पतिदेव ने पर्वत को तोड़कर गौओं को प्राप्त किया॥११॥ |
| आकाश में उत्पन्न हुए बृहस्पतिदेव के निमित्त ये स्तुतिगान किये गये हैं, हम सादर उन्हें प्रणाम करते हैं। जिन के लिए नानाविध चिरपुरातन ऋचाओं को बार-बार उच्चारित किया हैं, वे बृहस्पतिदेव हमें गौएँ, घोड़े, वीर सन्ताने तथा सेवकों सहित अन्नादि प्रदान करें॥१२॥ |
सूक्त - ६९
| प्रशंसा योग्य अग्निदेव का दर्शन वझ्यश्व के लिए कल्याणप्रद हो, उनका प्राकट्य कल्याणकारी हो तथा यज्ञ की ओर आगमन सुखद हो । जिस समय सुमित्र लोग अग्नि की यज्ञकुण्ड में स्थापना करते हैं, उस समय अग्निदेव घृताहुति से प्रज्वलित होते हैं तथा हम उनकी अर्चना करते हैं॥१॥ |
| वाझ्यश्व वंशज अग्निदेव घृताहुति से संवर्द्धित होते हैं, घृत ही अग्निदेव का आहार रूप है तथा वह ही उनको पोषक हैं । घृताहुति पाकर अग्निदेव तेजस्वी रूप में अति प्रज्वलित होते हैं तथा घृताहुति से ही अग्निदेव सूर्य सदृश प्रकाशमान होते हैं॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! जिस प्रकार आपकी ज्वालारूपी किरणों को 'मनु' प्रदीप्त करते हैं, उसी प्रकार 'सुमित्र' भी आपको प्रदीप्त करते हैं। यह तेजस्विता नवीन है । आप धन-सम्पन्न होकर सुशोभित हों । आप हमारी प्रार्थनाओं को प्रेमपूर्वक ग्रहण करें। आप शत्रु सेना का विध्वंस करें तथा हमें अन्न युक्त यशस्विता प्रदान करें॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! ऋत्विज् वध्यश्व ने आपको ही सर्वप्रथम हवियों से प्रज्वलित किया । आप हमारे स्तोत्रों को भी ग्रहण करें । आप हमारे निवास गृहों तथा देहों के संरक्षक बने तथा हमारी सन्तानों को सुरक्षित करें। आपने उदार हृदय से जो हमें प्रदान किया है, उसका संरक्षण भी करें॥४॥ |
| है वाझ्यश्च वंशज अग्निदेव ! आप यशस्वी बनकर हमारे संरक्षक बनें । हिंसक शक्तियाँ आपको पराभूत न कर सकें, क्योंकि आप स्वयं रिपुओं को पराजित करने वाले हैं। आप वीरों के समान धैर्यशाली, बलिष्ठ, शत्रुओं के पराभवकर्ता तथा शत्रुसंहारक हैं । वाझ्यश्व अग्नि के नामों (विशेषणों) की घोषणा मैं 'सुमित्र' करता हूँ॥५॥ |
| हे अग्निदेव !आप पर्वतीय धन-सम्पदा को दास असुरों से जीतकर आर्य श्रेष्ठों को प्रदान करते हैं। आप शूर-वीर योद्धाओं के समान ही धैर्यवान् तथा शत्रुओं के पराभवकर्ता हैं । आप युद्ध की इच्छा से आने वाले शत्रुओं को पराभूत करें॥६॥ |
| जो अग्निदेव विस्तृत तन्तुओं से युक्त (विस्तृत वंश वाले) प्रमुख दानी, सहस्र स्थानों के आच्छादन कर्ता, अनेक मार्गों से जाने वाले (विभिन्न रीतियों से स्थापित), महिमामय, तेजस्वियों में तेजस्विता युक्त हैं; वे देव प्रमुख ऋत्विजों द्वारा सुशोभित होते हैं । हे अग्निदेव ! आप देवसाधक सुमित्र वंशियों के घरों को प्रज्वलित करें॥७॥ |
| हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! आपके समीप श्रेष्ठ..: अति सहजता से दूध देने वाली गौ हैं, उसका दोहन करने में कोई कठिनाई नहीं । वहीं आदित्य के सहयोग से अमृत के समान दूध देने वाली है । देवसाधक सुमित्रवंशीय प्रमुख अत्विज दक्षिणा युक्त होकर आपको प्रदीप्त करते हैं॥८॥ |
| हे सर्वज्ञ वाध्यश्व अग्निदेव ! आपकी महिमा का गान अमर देवगण भी करते हैं। जिस समय मनस्वी प्रजाजनों ने देवों के सहयोग से असुरता के संहारक के सम्बन्ध में आपके समीप जाकर प्रश्न किया, तो आपने नायक बनकर अपने वृद्धिकर्ता देवों के साथ विघ्नकारी शत्रुओं को पराजित किया॥९॥ |
| हे अग्निदेव ! जिस प्रकार पिता, पुत्र का पालन-पोषण करते हैं, वैसे ही मेरे पिता वझ्यश्व ने अपने समीप रखकर हविष्यान्न समर्पित करके आपकी अर्चना की। हे तरुण रूप अग्निदेव ! आपने हमारे पिता वक्ष्यश्व से समिधा प्राप्त करके विघ्नकारी रिपुओं को विनष्ट किया॥१०॥ |
| अग्निदेव, सोम अभिषवण क्रिया करने वाले ऋत्विगुगणों के सहयोग से वध्यश्च के रिपुओं पर सदैव विजय प्राप्त कर रहे हैं । हे अद्भुत तेजस्वी अग्निदेव ! आप सावधानी से हिंसक शत्रु का दहन करते हैं । आप स्वयं तेजस्वी ज्वालाओं से युक्त होकर अनिष्टकारी शत्रुओं को नष्ट कर देते हैं॥११॥ |
| ये वक्ष्यश्व अग्निदेव शत्रुनाशक और प्राचीनकाल से अति तेजस्वी तथा प्रदीप्त रूप हैं । वे नमन योग्य वचनों से स्तुत्य हैं । हे वयश्च कुल में उत्पन्न अग्निदेव ! आप हमारे विद्रोही शत्रुओं और विजातीय हिंसकों को पराजित करें॥१२॥ |
सूक्त - ७०
| हे अग्निदेव ! आप उत्तर वेदी पर प्रदत्त हमारी इस समिधा को ग्रहण करें और घृत सिंचन की आकांक्षा करें । हे श्रेष्ठ ज्ञानी अग्निदेव ! आप पृथ्वी के ऊँचे स्थान पर हमारे दिनों को श्रेष्ठ, सुखकर एवं आनन्दमय बनाने के लिए देवयज्ञ द्वारा ज्वालाओं के साथ ऊर्ध्वगामी हों॥१॥ |
| देवों के अग्रणी और मनुष्यों द्वारा स्तुत्य अग्निदेव विभिन्न वर्गों से युक्त अश्वों के साथ इस यज्ञ में पदार्पण करें । अतिपूजनीय देवों में प्रमुख अग्निदेव यज्ञीय मार्ग से सम्मानित होकर स्तवनों के सहयोग से देवताओं के निमित्त आहुतियों को ग्रहण करें॥२॥ |
| हविदाता यजमान हविष्यान्न वहन करने के लिए शाश्वत अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं कि हे अग्निदेव ! आप श्रेष्ठ अश्वों और उत्तम, रथ से इन्द्रादि देवों को यज्ञ में लेकर आएँ और होता बनकर इस यज्ञ में प्रतिष्ठित हों॥३॥ |
| हे बर्हि नामक अग्निदेव ! देवों द्वारा सेवनीय बर्हि (यज्ञ) का विस्तार हो, इसकी कालावधि बढ़े तथा हमारे लिए श्रेष्ठ सुगन्धि उत्पन्न हो । हे देवस्वरूप अग्निदेव ! आप क्रोध भावना से रहित होकर प्रसन्नचित्त हो, आहुतियों के अभिलाषी इन्द्रादि देवों की अर्चना करें॥४॥ |
| हे दिव्य द्वार (यह सम्बोधन यज्ञ के लिए ही हैं) ! आप दिव्यलोक के ऊँचे स्थान को स्पर्श करें तथा उन्नतशील हों। आप पृथ्वी के समान उत्पाद्यशक्ति से सम्पन्न होकर विस्तारित हों । देवाकांक्षी और रथेच्छ बनकर आप अपनी महिमा से देवों द्वारा अधिष्ठित हों तथा विहार योग्य साधनभूत रथ को धारण करें॥५॥ |
| दिव्यलोक की सुन्दर और तेजस्वी पुत्री उषा तथा रात्रि यज्ञ वेदों में प्रतिष्ठित हों । हे अभिलाषिणी और श्रेष्ठ वैभव युक्त देवियो ! आपके विस्तृत और निकटस्थ स्थानों में हवि की अभिलाषा से प्रेरित देवता विराजमान हों॥६॥ |
| जिस समय सोमाभिषव के निमित्त पत्थर ऊपर उठाते हैं और जब महिमायुक्त अग्निदेव अति प्रदीप्त होते हैं तथा जिस समय देवों के लिए प्रीतिजनक धाम (हविर्धारक यज्ञ पात्र) यज्ञस्थल में उपस्थित किये जाते हैं, तब हे पुरोहित और ऋत्विक् - दोनों ज्ञानी पुरुषो ! इस सत्कर्मरूपी यज्ञ से आप हमें ऐश्वर्य- सम्पन्न बनाएँ॥७॥ |
| हे इडादि तीन देवियो ! आपके निमित्त ही ये सुखद आसन बिछाये गये हैं। आप इन श्रेष्ठ कुशा के आसनों पर स्थान ग्रहण करें । इडा, तेजस्विनी सरस्वती और दिव्य-स्वरूपा भारती ने जैसे मनु द्वारा सम्पादित यज्ञ में आहुतियों को ग्रहण किया था, वैसे हमारे इस यज्ञ में उत्तम रीति से, आदर भाव से प्रदत्त आहुतियों को ग्रहण करें ॥८॥ |
| है त्वष्टादेव ! आपने मंगलमय स्वरूप को धारण किया है। आप हम अङ्गिराओं के मित्रस्वरूप हैं। हे ऐश्वर्यदाता ! ऐसे गुणवान् आप श्रेष्ठ सम्पदाओं के स्वामी हैं। आप हविष्यान्न की अभिलाषा से देवभाग को जानते हुए देवों के निमित्त अन्न प्रदान करें॥९॥ |
| हे वनस्पतिदेव ! आप ज्ञानवान्-विद्वान् हैं। आप अग्नि की जिह्वा से संयुक्त होकर देवताओं के समीप हविष्यान्न पहुँचाने में सहयोग करें । अग्निदेव हव्य में सन्निहित रसों का सेवन करें तथा हमारे द्वारा प्रदत्त आहुतियों को देवों तक ले जाएँ। हमारे यज्ञ की सुरक्षा द्युलोक और पृथ्वी पर करें॥१०॥ |
| हे अग्निदेव ! आप द्युलोक(स्वर्ग) और अन्तरिक्ष (आकाश) लोक से इन्द्र, वरुण तथा मरुत् आदि देवताओं को हमारे यज्ञ के निमित्त लेकर आएँ । सभी यज्ञाभिलाषी देवता आने पर आसनों पर विराजमान हों । वे अविनाशी देवगण स्वाहा शब्द से प्रदत्त आहुतियों द्वारा आनन्दित हों॥११॥ |
सूक्त - ७१
| ऋषि बृहस्पति स्वगत (अपने मन में) कहते हैं - प्रारम्भिक स्थिति में पदार्थों का नाम रखकर जो अभिव्यक्ति की जाती है, वह ज्ञान का सर्वप्रथम सोपान हैं। इनका जो शुद्ध और दोषों से रहित ज्ञान ( पदार्थों को गुण धर्म आदि) है, वह गुफा ( अनुभूति) में छिपा हुआ है । वह अन्त: प्रेरणा से ही प्रादुर्भूत होता है॥१॥ |
| सूप से सत्तुओं को स्वच्छ करने के समान मेधावीजन जिस समय अपनी बुद्धि, ज्ञान की सामर्थ्य से भाषा को सुसंस्कृत करते हैं, तब मित्र, आत्मीयजन मित्रता के भावों को समझते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी वाणी में मंगलकारी लक्ष्मी ( समृद्धि बढ़ाने वाली शक्ति) का निवास होता है॥२॥ |
| ज्ञानी लोग श्रेष्ठ वाणी के अभिप्राय को यज्ञीय (परमार्थ परक) प्रवृत्तियों के माध्यम से ही प्राप्त (स्वीकार) करते हैं। उन्होंने तत्त्वज्ञानी अषयों के अन्त: करण प्रविष्ट हुई वाणी (भाषा) को उपलब्ध किया। तत्पश्चात् उस भाषा (ज्ञान) को उपलब्ध करके उन्होंने उसे प्रसारित किया, इस प्रकार की उस वाणी (भाषा) को उन्होंने ( गायत्र्यादि सात छन्दों में) स्तुतियों के रूप में प्रस्तुत किया॥३॥ |
| ( प्रकृति में अवस्थित ज्ञानगम्य गूढ़ तथ्यों को) कोई-कोई तो (स्थूल दृष्टि से देखकर भी उनका दर्शन नहीं कर पाते ( तत्त्वज्ञान नहीं जान पाते) । अन्य लोग (ऋषियों द्वारा प्रकट सूत्रों को सुनकर भी नहीं समझ पाते; परन्तु जैसे पति के सामने पत्नी अपना रूप नहीं छिपाती , उसी प्रकार यह वाग्देवी सुपात्र के सामने अपना स्वरूप खोल देती है॥४॥ |
| विद्वानों में किसी-किसी ज्ञानी को यह प्रतिष्ठा है कि वही श्रेष्ठ-शाब्दिक भावों को ग्रहण करने में सक्षम है, वाणी (वेद-ज्ञान) को प्रकट-फलित करने में उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। उनमें कुछ तो भाषा के फल (अर्थ) और फूल (अभिप्राय) से रहित, मात्र सुनने-अध्ययन तक उसे सीमित मान बैठते हैं, वे दूधरहित बाँझ गौ के समान ही वाणी (भाषा) से मात्र प्रपञ्च करते हैं॥५॥ |
| जो व्यक्ति दिव्यज्ञान की धारा के साथ मित्र भाव ( आत्मीय स्नेही त्याग देते हैं, उन्हें दिव्य वाणी में कोई उल्लेखनीय भागीदारी नहीं मिल पाती । वह जो कुछ भी सुनता है, उसके लिए सब निरर्थक होता है तथा उससे उसे सत्कर्म का मार्ग भी प्राप्त नहीं होता॥६॥ |
| दर्शनशक्ति-सम्पन्न, श्रोत्रशक्ति युक्त, समान ज्ञान से युक्त मित्र भी मन से अनुभव जन्य ज्ञान में उसी प्रकार एक समान नहीं होते, जिस प्रकार कुछ जलाशय मुख तक गहरे जल वाले, कुछ कटि तक जल वाले तथा कुछ स्नान करने के लिए उपयुक्त होते हैं॥७॥ |
| जब समान योग्यता युक्त वेदज्ञ विद्वान्, हृदय से जानने योग्य (अनुभव) निरूपण के लिए एकत्रित होते हैं, उस समय किसी व्यक्ति को तो ज्ञान में अल्पज्ञ जानकर छोड़ दिया जाता है तथा कुछ स्तोत्रविद् मर्मज्ञ विद्वान् बनकर विचरण करते हैं॥८॥ |
| जो विद्वत्ता से रहित अज्ञानी मनुष्य इस लोक में वेदज्ञ विद्वानों और परलोक में देवताओं के साथ यज्ञादि सत्कर्मों से रहित हैं, जो न तो ऋत्विज् (स्तोता) हैं, न सोम यज्ञकर्ता हैं, वे ज्ञाननिष्ठ नहीं हो सकते । अपितु वे पापबुद्धि से (अनुभूतिरहित ज्ञान अपनाकर) वाणी से प्रपञ्च रचते हैं अथवा हल आदि ( कृषि कर्म) द्वारा स्थूल श्रम के कार्यों का ताना-बाना बुनते हैं॥९॥ |
| सभी समान विचारधारा वाले मित्र, सभा में प्रमुखता प्रदान करने वाले यशस्वी सोम (दिव्य प्रवाह) से आनन्दित होते हैं । अत्रों को देने वाले तथा पापकर्मों को इनके बीच समाप्त करने वाले सोमदेव इन मनुष्यों को शक्ति प्रदान करने के लिए सक्षम हैं॥१०॥ |
| एक स्तोता वेदमन्त्रों के यज्ञीय अनुष्ठान में विधि-विधान के प्रयोग सहित विराजमान होता है । दूसरा शक्वरी, ऋचाओं में गायत्री आदि छन्दों का सामगान करता है , तीसरा ब्रह्मानामक विद्वान् प्रायश्चित्त आदि विधान की व्याख्या करता है तथा चौथा अध्वर्यु-पुरोहित यज्ञकर्म के नानाविध कार्यों का विशेष रूप से निर्वाह करता है॥११॥ |
सूक्त - ७२
| हम देवों के प्रादुर्भाव का वर्णन उत्तम वाणी से करते हैं। इन उक्थों (स्तोत्रों) के प्रकट होने से बाद में आने वाले युगों का दर्शन प्राप्त होगा॥१॥ |
| सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मणस्पति ( परब्रह्म अथवा आद्य सत्ता अदिति ) ने कर्मकार के समान ही इन्हें पकाया-परिपक्व किया। देवों के पूर्व अर्थात् आदि सृष्टि में अव्यक्त ब्रह्म से व्यक्त हुए नामरूपात्मक देवशक्तियों की उत्पत्ति हुई॥२॥ |
| देवों के युग से पूर्व (आदि काल में) असत् (अव्यक्त) से सत् (अस्तित्ववान्) की उत्पत्ति हुई। इसके बाद आशा (संकल्पशील मनस्तत्वों का विकास हुआ। तब ऊपर की ओर बढ़ने वाले अथवा अपने चरणों का विस्तार करने वाले (ऊर्जा कणों) का जन्म हुआ॥३॥ |
| भूः (आदि प्रवाह) से ऊर्ध्वगतिशील (सूक्ष्म ऊर्जाकणों) की संरचना हुई तथा भुव:( होने की) आशा (संकल्प शक्ति) का विकास हुआ । अदिति (अखण्ड आदि सत्ता) से दक्ष (सृजन की कुशलता युक्त प्रवाह) उत्पन्न हुए। पुनः दक्ष से अदिति (अखण्ड पृथ्वी या प्रकृति) का जन्म हुआ॥४॥ |
| हे दक्ष ! आपकी दुहिता (कन्या या दक्ष की क्षमता का दोहन करने वाली प्रकृति) उत्पन्न हुई, उसी प्रक्रिया से अमृत बन्धन से बँधे देवों या अन्य नक्षत्रादि का जन्म हुआ है॥५॥ |
| हे देवो ! जब आप इस विस्तृत सलिल (व्योम अथवा मूल अप्तत्व में प्रतिष्ठित हुए , तब वहाँ आपके नर्तन से तीव्र रेणु (पदार्थकण) प्रकट हुए॥६॥ |
| जब देवों ने गतिशील होकर भुवनों ( बने हुए पदार्थों या लोकों) को पुष्ट किया; तब इस समुद्र (सूक्ष्मकणों के समुद्र अथवा व्योम) में गुह्य सूर्य स्वाभाविक ढंग से धारण किया गया॥७॥ |
| अदित (अखण्ड आदि सत्ता) के शरीर से आठ पुत्र उत्पन्न हुए। वह अदिति मार्तण्ड (सूर्य) को परे (दूर आकाश में) स्थापित करके सात के साथ देवों के पास गयी॥८॥ |
| पूर्व (प्रारम्भिक) युग में अदिति सात पुत्रों के साथ आती हैं। हे अदिति (अखण्ड प्रकृति) ! प्रजा के सृजन तथा विनाश के क्रम में मार्तण्ड (सूर्य या महासूर्य) आपको ही परिपूर्ण करता रहता है॥९॥ |
सूक्त - ७३
| जब धारण करने वाली माता ने वीर इन्द्र को जन्म दिया, तब मरुतों ने भी उनकी प्रशंसा करते हुए कहा-आप वन्दनीय, ओजवान् तथा महास्वाभिमानी हैं। आप पराक्रम के लिए तथा शत्रु विनाश के लिए प्रचण्ड शक्ति-सम्पन्न होकर जन्मे हैं॥१॥ |
| शत्रु विध्वंसक इन्द्रदेव के समीप अनुशासित सैन्यदल बैठा हुआ है। गतिशील मरुद्गणों ने इन्द्रदेव को अनेक स्तोत्रों से उत्साहित किया। जिस प्रकार गोष्ठ में गौएँ घिरी रहती हैं और आच्छादन के हटते ही बाहर आ जाती हैं, उसी प्रकार गर्भ अर्थात् वृष्टि-जल, व्यापक बादलों के अधिकार के बीच से स्वयमेव बाहर आ गया॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपके दोनों चरण महिमामय हैं । जिस समय आप आगे जाते हैं, तो ऋभु लोग अति उत्साहित होते हैं तथा जो देवगण आपके साथ हैं, वे भी प्रोत्साहित होते हैं । है इन्द्रदेव ! आप सहस्रों वृकों को मुख में धारण करते हैं तथा अश्विनीकुमारों को भी स्फूर्तिवान् बनाते हैं॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! संग्राम क्षेत्र में पहुँचने की शीघ्रता की स्थिति में भी आप यज्ञ में पहुँचते हैं, उस समय आप अश्विनीकुमारों के साथ मैत्री करते हैं। हमारे लिए आप असंख्य सम्पदाओं को धारण करते हैं। हे पराक्रमी वीर ! आपके सेवक अश्विनीकुमार भी हमें धन-सम्पदा प्रदान करें॥४॥ |
| इन्द्रदेव यज्ञ में आनन्दित होकर गतिशील मित्रस्वरूप मरुद्गणों के साथ यजमान को ऐश्वर्य-सम्पदा प्रदान करते हैं। इन्द्रदेव ने यजमान के निमित्त दुष्ट दस्यु की छलपूर्ण माया को विनष्ट किया, उन्होंने जल वृष्टि की तथा अन्धकार को दूर किया॥५॥ |
| इन्द्रदेव सभी रिपुओं को समानरूप से विनष्ट करते हैं। जिस प्रकार उन्होंने उषा के शकट को विनष्ट किया, उसी प्रकार वृत्रासुर का वध किया । हे इन्द्रदेव ! आप अपने देदीप्यमान और पराक्रमी मरुद्गणों के सहयोग से वृत्र का संहार करते हैं । शत्रुओं के हृष्ट-पुष्ट शरीरों को भी अपने नष्ट किया॥६॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने अषियों के यज्ञ में विघ्न उत्पन्न करने वाले अथवा आपके धन को चाहने वाले नमुचि असुर को विनष्ट किया। ऋषियों के कल्याणार्थ आपने विध्वंसक नमुचि के छल-प्रपंचों को समाप्त किया। आपने देवों के मध्य जनसाधारण के लिए सुखदायी और सहज गमन योग्य पथ-प्रशस्त किया॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप इस संसार को जल अथवा तेज से संव्याप्त करते हैं। आप सम्पूर्ण विश्व के अधिपति हैं। आप अपने हाथ में वज्रास्त्र को धारण किये रहते हैं। सभी देवता आप शक्तिशाली देव की अर्चना करते हैं। आपने ही जल से भरपूर बादलों के मुख को ( बरसने के लिए) अधोगामी बनाया॥८॥ |
| अन्तरिक्ष में देदीप्यमान वज्रधारी इन्द्रदेव का वज्र उपासकों के लिए मधुर जल ( पोषकरस) प्रेरित करता है। पृथ्वी पर अवमान वहीं जल गौओं में दूध के रूप में और वनस्पतियों में पोषक रस के रूप में विद्यमान हैं॥९॥ |
| वसा मदन्त्युपरिब्याप्त करते हैं। आप सबकी अर्चना कर कुछ विद्वानों का कथन है कि इन्द्र की उत्पत्ति का कारण अश्व ( आदित्य) है, तथापि हम तो इन्हें शक्ति से उत्पादित ही मानते हैं अथवा ये क्रोधाग्नि से उत्पन्न हुए हैं, ऐसी मान्यता है । इसीलिए वे ( शत्रुओं से) संघर्ष करने के लिए तत्पर रहते हैं। इन्द्रदेव किससे उत्पन्न हुए, वस्तुत: इस तथ्य को तो वे ही जानते हैं॥१०॥ |
| संचरणशील सूर्य-किरणें बलशाली इन्द्रदेव के समीप जाती हैं। प्रियमेध अथवा यज्ञप्रेमी अषि ( इन्द्रदेव के प्रति ) याचनात हैं, ये देव बँधे हुओं को मुक्ति दें, अन्धकार को दूर करें तथा हमारी आँखों को दिव्य प्रकाशयुक्त बनाएँ॥११॥ |
सूक्त - ७४
| ऐश्वर्य दान के निमित्त इन्द्रदेव को यज्ञों द्वारा प्रेरित किया जाता है। वे द्युलोक और पृथ्वी निवासी देवताओं और मनुष्यों द्वारा आकर्षित किये जाते हैं। संग्राम क्षेत्र में धन को जीतने के लिए जो गतिशील ( अश्व सदृश) हैं, उनको आकृष्ट करते हैं तथा शत्रुओं के संहार में जो सुप्रसिद्ध हैं, वे भी इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं॥१॥ |
| इन अङ्गिराओं के आवाहन की पुकार ने आकाश को गुंजायमान कर दिया । इन्द्रदेव और अन्न के अभिलाषी देवताओं ने इच्छाशक्ति से पृथ्वी को प्राप्त किया। पृथ्वी पर पणियों द्वारा चुराई गई गौओं को देखते हुए देवताओं ने अपने कल्याणार्थ अन्तरिक्ष में सूर्य के समान ही अपने उत्तम तेज को प्रकाशित किया॥२॥ |
| जो देवगण सबके कल्याणार्थ यज्ञों में श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करते हैं, उन्हीं अविनाशी देवों की प्रार्थनाएँ की जाती हैं। वे देवगण हमारी प्रार्थनाओं और यज्ञ को सिद्ध करते हुए हमें प्रचुर मात्रा में विशिष्ट ऐश्वर्य-सम्पदा प्रदान करें॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जो शत्रुओं का गोधन जीत लेना चाहते हैं, वे आपकी वन्दना करते हैं । यह विस्तृत भूमि एक बार उत्पन्न हुई, किन्तु बार-बार (हरीतिमा-अन्नादि) उत्पन्न करती है । जो इस महान् भूमि को सहस्र धाराओं से दुहना चाहते हैं, वे भी इन्द्रदेव की अर्चना करते हैं॥४॥ |
| हे सत्कर्मनिष्ठ याजको ! किसी के समक्ष शीश को न झुकाने वाले, युद्धेच्छुक, शत्रुओं के पराभवकर्ता , महिमामय, ऐश्वर्यशाली, शोभन स्तुतियों से युक्त , विभिन्न युद्ध विद्याओं के ज्ञाता तथा मनुष्यों के कल्याणार्थ वज्रधारी इन्द्रदेव को अपने संरक्षणार्थ आवाहित करो॥५॥ |
| शत्रुओं की नगरियों के विध्वंसक इन्द्रदेव ने जिस समय अति सामर्थ्यशाली शत्रु का वध किया, उसी समय वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ने जल से पृथ्वी को परिपूर्ण किया, तब सभी लोग इस विचारधारा से युक्त हुए कि इन्द्रदेव ही अति सामर्थ्यवान् और सबके अधिपति हैं । वे हमारी सभी कामनाओं को पूर्ण करते हैं॥६॥ |
सूक्त - ७५
| हे जलदेव ! हम सेवाभावी यजमानों के घरों ( यज्ञों) में आपकी श्रेष्ठ महिमा का कथन करते हैं। ये सरिताएँ सात-सात करके तीन स्थानों ( पृथ्वी, आकाश, धुलोक) से प्रवाहित होती हैं। इन प्रवाहों में सिन्धु ही सबसे ओज- सम्पन्न है ॥१॥ |
| हे सिन्धु ! जब आप हरियाली से परिपूर्ण प्रदेश की ओर प्रवाहित हुईं, उस समय वरुणदेव ने आपके गमनार्थ मार्ग को विस्तारित किया । आप पृथ्वी के ऊपर श्रेष्ठ मार्ग से प्रवाहित होती हैं तथा आप ही इन जीवधारी प्राणियों के जीवन की प्रमुख आधाररूपा हैं॥२॥ |
| भूमि के ऊपर गर्जनशील आपके स्वर आकाश को गुंजायमान करते हैं। आप अपनी (प्रचण्ड) लहरों से प्रवाहित होती हैं। जिस समय सिन्धु महानदी वृषभ के समान प्रचण्ड शब्द करती हुई आगमन करती है, उस समय ऐसा आभास होता है कि मानो आकाश ( मेघ) से घनघोर गर्ज-तर्जन के साथ जल वर्षा हो रहीं हो॥३॥ |
| जिस प्रकार माताएँ अपने शिशु के पास जाती हैं और दुधारू गौएँ बछड़े के समीप जाती हैं। उसी प्रकार अन्य नदियाँ शब्द करती हुई सिन्धु की ओर गमन करती हैं। युद्धकर्ता राजा के समान ही आप सहगामिनी ( सिञ्चन करने वाली) दो धाराओं को लेकर अग्रगमन करती हैं॥४॥ |
| हे गंगा, यमुना, सरस्वतीं, शुतुद्री (सतलज), परुष्णी (राव), असिमी (चिनाव) के साथ मरुवृधा (चिनाव और झेलम के मध्य में अथवा चिनाव की पश्चिम दिशा वाली मरुवर्दवन नामक सहायक नदी), वितस्ता ( झेलम), सुषमा ( सोहान) और आर्जीकीया (व्यास) आदि नदियो ! आप सभी हमारे इन स्तोत्रों को सुनें॥५॥ |
| हे सिन्धु महानदी ! आप पहले तुष्टामा (सिन्धु की सहायक नदी) के साथ प्रवाहित हुई । पुनः सुस, रसा और येत्या ( ये तीनों सिन्धु की पश्चिमी सहायक नदियाँ हैं) से सम्मिलित हुईं । आप क्रमु (कुर्रम), गोमती को कुभा ( काबुल नदी) और मेहलु ( सिन्धु की पश्चिमी सहायक नदी) को अपने साथ सम्मिलित करती हैं। इन सभी नदियों के साथ एक ही रथ पर सवार होकर चलती हैं॥६॥ |
| सिन्धु महानदी सरलगामिनी, श्वेतवर्णा और प्रदीप्तमती हैं, जो अति तीव्रगति से जल के साथ प्रवाहित होती हैं। अगाध महानदी सिन्धु, नदियों में सबसे वेगवती हैं। यह अद्भुत वेगशील घोड़ी के सदृश हैं तथा सुन्दर स्त्री के समान देखने में सुन्दर हैं॥७॥ |
| सिन्धु महानदी श्रेष्ठ अश्वों, उत्तम रथ, सुन्दर वस्त्र ( परिधान), सुवर्णमय आभूषण, पुण्यवती, अन्नवती तथा पशुलोमवाली है। सिन्धु नित्य तरुणी और अनेक तन्तुओं वाली है । वह श्रेष्ठ ऐश्वर्यशालिनी (सौभाग्यवती) सिन्धु मधुवर्धक पुष्पों से आच्छादित है॥८॥ |
| सिन्धु महानदी सुखद और अश्वयुक्त रथ को जोतती हैं । उस रथ से वे हमें अन्नादि प्रदान करें । इस यज्ञ में सिन्धु के रथ की महान् महिमा का गान किया गया है । सिन्धु का रथ हिंसारहित, यशस्वी और महानता युक्त है ॥९॥ |
सूक्त - ७६
| हे मावा ! हम अन्नप्रदात्री उषा के आते ही आपको प्रयोगार्थ सज्जित करते हैं । आप सोम देकर इन्द्र, मरुद्गण और द्यावा-पृथिवी को अनुकूल बनाएँ। दोनों कालों (रात-दिन) में संयुक्त रहने वाली ये द्यावा-पृथिवीं प्रत्येक आवास में आतिथ्य स्वीकार कर सभी क्षेत्रों को श्रेष्ठ अन्न-धनादि से परिपूर्ण करें॥१॥ |
| हे ग्रावा ! आप सोम को शोधित करके प्रस्तुत करें । हे अद्रि (भेदनशील) ! आप हाथों से धारण किये जाने वाले (सधे हुए) घोड़े के समान अनुशासित हो जाते हैं। सोम अभिषव क्रिया में संलग्न यजमान शत्रु जय की सामर्थ्य उपलब्ध करते हैं। इस सोम से अश्व (शक्ति) एवं प्रचुर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है॥२॥ |
| जिस प्रकार पुरातन काल में 'ऋषि मनु' के यज्ञ में सोमरस प्रस्तुत किया गया था, उसी प्रकार इस सवन (यज्ञ) में अभिषुत सोम, जल अथवा कर्म में समाविष्ट हो । गौओं ( किरणों या शरीर के पोषक प्रवाहों) एवं अश्वों ( इन्द्रियों अथवा शक्ति संस्थानों ) को शुद्ध करने तथा त्वष्टा-पुत्रों (सृजन-सामथ्र्यों) के कार्य में इसी अविनाशी सोमरस का उपयोग किया जाता है॥३॥ |
| हे ग्रावा ! आप अनिष्टकारी असुरों का संहार करें । पाष देवता 'निति' का निवारण करें । दुर्मति को दूर हटाएँ। आप हमें सुसन्तति युक्त ऐश्वर्य प्रदान करें । देवों के लिए हर्ष प्रदायक यशस्विता से हमें सम्पन्न बनाएँ॥४॥ |
| जो दिव्यलोक से भी अधिक तेजस्वी, सुधन्वा के पुत्र विभु से भी अधिक क्रियाशील, वायु से भी अधिक सोमरस अभिषवण क्रिया में कुशल तथा अग्नि से भी अधिक अन्न (पोषण) प्रदाता हैं,( हे स्तोता !) देवताओं की तुष्टि के लिए, ऐसे मावा ( सोम अभिषवण तंत्र) की अर्चना करें॥५॥ |
| यज्ञ प्रयोग में ऋत्विग्गण सभी ओर से स्तोत्र ध्यान करते हुए शीघ्रतापूर्वक इच्छित सोमरस को निकालते हैं, उसमें यशस्वी झावा हमारे लिए सोम को उपलब्ध करायें। इस दिव्य कर्म में मंत्रों के माध्यम से हमें दिव्यता-सम्पन्न बनाएँ॥६॥ |
| ये अद्रि ( पाषाण, पर्वत या मेघ) सोमरस को क्षरित करते हैं। वे सोम के रस का दोहन करते हैं। वे स्तोत्र की कामना से प्रेरित होकर अग्नि-सेचन के लिए सोमरस को निकालते हैं। अभिषव कर्त्ता ऋत्विग्गण अपने मुख से अवशिष्ट सोम का पान करके पवित्रता धारण करते हैं॥७॥ |
| हे ऋत्विजो ! हे अद्रि ! आप श्रेष्ठ अभिषव क्रिया सम्पन्न करने वाले हैं। आप इन्द्रदेव के निमित्त सोम के रस को अभिषवित करते हैं। देवलोक की प्राप्ति के लिए आप हमें सर्वश्रेष्ठ विभूतियों को प्रदान करें। हर आवास तथा पार्थिव देहधारी के लिए योग्य सम्पदाएँ उत्पन्न करें॥८॥ |
सूक्त - ७७
| बादलों से झरने वाले जल के बिन्दुओं के समान ही स्तुतियों से प्रशंसित मरुद्गण धन-सम्पदा प्रदान करते हैं। हविष्यान्न युक्त यज्ञ के सदृश ही सृष्टि रचना के माध्यम मरुद्गण हैं। इन महान् शोभायुक्त मरुतों की अर्चना यथार्थ में हम नहीं कर पाये हैं, उनको शोभा देने वाले स्तोत्र भी हमें नहीं रच सके हैं॥१॥ |
| ये मरुत् मरणशील थे, इन्होंने श्रेयस्कर कार्यों द्वारा स्वयं को दिव्य विभूतियों से सज्जित किया । एकत्रित अनेक सी सेनाएँ भी मरुतों को पराभूत नहीं कर सकतीं । (मत्रों द्वारा प्रेरित न किये जाने के कारण) ये दिव्यलोक के गतिशील पुत्र, आगे नहीं बढ़ते । ये अदिति पुत्र आक्रामक क्षमता होने पर भी बढ़ते नहीं हैं॥२॥ |
| ये मरुद्गण अपनी महान् सामर्थ्य से घुलोक और पृथ्वी से भी अति सामर्थ्यशाली हैं। इसी प्रकार सूर्यदेव भी अन्तरिक्ष से महिमामय हैं, वे शक्तिशाली वीरों के समान स्तोत्रों की कामना करते हैं । दुष्टों के विनाशक मनुष्यों के समान ये पराक्रमी हैं॥३॥ |
| हे मरुद्गण ! आप जब आपसी प्रतिघात करने वाले जल के बहने के समान शीघ्रता से जाते हैं, तब पृथ्वी कम्पित ( व्यथित) नहीं होती और न ही क्षीण होती है। यह विश्वरूप यज्ञीय हविष्यान्न आपके निमित्त ही प्रस्तुत किया जाता हैं । आप अन्नदाता मनुष्यों के समान ही हमारे लिए सुखदायक बनकर, संगठित होकर आएँ॥४॥ |
| हे मरुद्गण ! आप सभी रश्मियों ( रस्सियों या किरणों) से योजित या गतिशील बने तथा सूर्यादि के आलोक के समान तेजस्वी, गरुड़ पक्षी के समान स्वयमेव अपनी यशस्विता को विस्तारित करने वाले, पराक्रम शाली और शत्रुओं के प्रति उग्र हों । पथिकों के समान आप सभी ओर गतिशील होकर जल वर्षा करते हैं॥५॥ |
| हे मरुद्गण ! जिस समय आप अतिदूरस्थ देश ( स्थान) से आते हैं, उस समय आप महिमामय, उत्तम, धारण-योग्य ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। हे वसुगण ! आप विद्रोही शत्रुओं को दूर से ही गुप्त रीति से विनष्ट करें॥६॥ |
| जो लोग अनुष्ठान सम्पन्न करके मरुद्गणों की भाँति सार्थक दान देते हैं, वे श्रेष्ठ धन, वीर सन्ताने, अन्न तथा आयुष्य प्राप्त करते हैं। ऐसे व्यक्ति वीरों के समान ही यज्ञ में स्थान पाते हैं॥७॥ |
| वे मरुद्गण यज्ञमय हैं और यज्ञों के संरक्षक हैं। वे सबके लिए कल्याणकारी भावनाओं से युक्त होकर आदित्य नाम से सम्बोधित हैं, वे हमें संरक्षण प्रदान करें । यज्ञ स्थल में रथ द्वारा शीघ्रता से गमन की इच्छा युक्त वे मरुद्गण हमारी स्तुतियों को संरक्षित करें। यज्ञ में वे अभीष्ट हविष्यान्न की अभिलाषा करते हैं॥८॥ |
सूक्त - ७८
| वे मरुद्गण, ज्ञानी स्तोताओं के समान स्तुतियों से प्रशंसित होकर हमारी प्रार्थना पर ध्यान दें। देवताओं को हर्षित करने वाले यज्ञीय कार्यों में रत रहें । वे मरुद्गण राजाओं के समान पूजनीय, दर्शनीय तथा गृहपति मनुष्यों के समान पापरहित और शोभायमान हैं॥१॥ |
| जो मरुद्गण अग्नि के समान तेजस्वितायुक्त, स्वर्णिम वक्ष वाले, वायु के सदृश, दूसरों के सहायक, शीघ्र गतिशील, श्रेष्ठ ज्ञाता, ज्ञानियों के समान वन्दनीय, शोभन नेत्रों से युक्त, श्रेष्ठ सुखों के सम्पादक तथा सोम के समान ही शोभायुक्त मुख वाले हैं, ऐसे गुणों से सम्पन्न वे देव मरुद्गण यज्ञ में उपस्थित हों॥२॥ |
| जो मरुदेव वायु के समान ही रिपुओं को प्रकम्पित करने वाले और वेगशील हैं, जो अग्नियों की ज्वालाओं के समान तेजस्वी और कान्तियुक्त हैं। कवचधारी शूरवीरों के समान शौर्य-सम्पन्न तथा पितरगणों (माता-पिता) की वाणियों के समान उदारदानी हैं, वे मरुद्गण हमारे यज्ञ में पधारें॥३॥ |
| मरुद्गण रथचक्र के अरों के समान एक नाभि (धुरी) में बँधे हुए हैं। वे विजयशील शूरों के समान तेजस्वितायुक्त हैं, जो दानी मनुष्यों के समान जल सेचक हैं तथा सुन्दर स्तोत्रों के गान कर्ताओं के समान श्रेष्ठ शब्दावली से युक्त हैं, वे मरुद्गण हमारे यज्ञ में पधारें॥४॥ |
| जो मरुद्गण अश्वों के समान श्रेष्ठ, वेगशील और ऐश्वर्यशालियों के समान रथों के स्वामी तथा उदार दान हैं, वे नदियों के जल के समान नीचे की ओर प्रवाहित होने वाले तथा नाना रूपों से युक्त हैं और अंगिराओं के समान सामगान कर्ता हैं । वे मरुद्गण हमारे यज्ञ में पदार्पण करें॥५॥ |
| वे मरुद्गण जल उत्पादनकर्ता मेघों के समान जल-प्रवाहों के निर्माता हैं, वे सभी प्रकार के शत्रुओं के विध्वंसक, शस्त्रों के सदृश सदैव आदरणीय हैं। वे मरुद्गण श्रेष्ठ स्नेहयुक्त माताओं के समान क्रीड़ा परायण हैं। तथा विशाल जनसमूह के समान गतिमान् एवं तेजस्वी हैं; वे मरुद्गण हमारे यज्ञों में पधारें॥६॥ |
| उषाकाल की रश्मियों के सदृश वे मरुद्गण यज्ञाश्रयी हैं, मंगलकामी, श्रेष्ठ जनों के समान वे अलंकृत हैं। नदियों के समान निरन्तर गतिशील, तेजस्वी आयुधों के धारणकर्ता तथा दूरगामी मार्गों के जाने वाले पथिकों के तुल्य वेगपूर्वक दूरस्थ देशों को लाँघते हुए जाते हैं। वे मरुद्गण हमारे यज्ञों में पधारें॥७॥ |
| हे देवस्वरूप मरुद्गण ! आप हमारी स्तुतियों से आनन्दित होकर हमें श्रेष्ठ ऐश्वर्य और श्रेष्ठ रत्नों के स्वामी बनायें । आप हमारे, मैत्रीभावनाओं से युक्त स्तोत्रपाठ को स्वीकार करें । आप सदैव रत्नों का दान करते रहे हैं॥८॥ |
सूक्त - ७९
| मरणधर्मा मनुष्यों में अविनाशी अग्नि की महान् सामर्थ्य को हम अनुभव करते हैं। देखते हैं) । इनके दोनों जबड़े-ज्वालाएँ नानारूपों में पूर्णता प्राप्त हैं । वे चर्वण क्रिया किये बिना ही काष्ठादि पदार्थों का सेवन करते हैं॥१॥ |
| इन अग्निदेव का शीर्ष गुप्त स्थानों में विद्यमान है । इनके नेत्र भिन्न-भिन्न स्थानों में हैं। वे चर्वण क्रिया किये बिना ज्वालाओं से समिधाओं का सेवन करते हैं । इनके निमित्त विभिन्न पदों-चरणों में हाथ उठाकर नमन करते हुए इन्हें तृप्त करते हैं॥२॥ |
| ये अग्निदेव बालक की भाँति पृथ्वी माता पर चलते हुए लताओं (के भक्षण या पोषण) की कामना करते हैं, वे उनकी जड़ों तक पहुँचते हैं । वे अग्निदेव स्वयं को पृथ्वी की भीतरी सतह में पक्वान्न के समान दीप्तिमान् काष्ठ का सेवन करने की विधि को जानते हैं॥३॥ |
| है द्युलोक और पृथिवीं लोक ! आपसे हम यथार्थ सम्मत बात कहते हैं कि अरणियों द्वारा उत्पादित यह गर्भस्थ शिशुरूप अग्निदेव अपने माता-पिता रूप दोनों अरणियों ( लकड़ियों ) का सेवन करते हैं। हम मनुष्य, देवस्वरूप अग्नि की विशेषताओं से अनभिज्ञ हैं। हे वैश्वानर ! आप नानाविध ज्ञान सम्पन्न, प्रकृष्ट ज्ञानयुक्त हैं॥४॥ |
| जो याज्ञिक इस अग्नि के निमित्त शीघ्रतापूर्वक हविष्यान्न समर्पित करते हैं, गोघृत अथवा सोमरस से अग्नि में यज्ञ करते हैं तथा समिधाओं से अग्नि को प्रज्वलित करते हैं। इसे अग्निदेव अपनी हजारों प्रकार की असीम ज्वालाओं से देखते हैं। हे अग्निदेव ! आप हमारे लिए सभी ओर से अनुकूल हों॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! क्या आपने कभी देवताओं के प्रति क्रोध किया है? जिस प्रकार चर्म अथवा लता को शस्त्र से खण्ड-खण्ड़ किया जाता है, उसी प्रकार कहीं क्रीड़ा करते हुए और कहीं न करते हुए हरणशील अग्निदेव खाद्य सामग्री का सेवन करते समय इनके खण्ड-खण्ड कर डालते हैं॥६॥ |
| जंगल में वर्द्धित ये अग्निदेव सर्वत्र गतिमान् , सरल मार्गगामी भोगाकांक्षी अश्वों ( इन्द्रियों अथवा गतिमानों ) को वश में करके सुनियोजित करते हैं। हमारे मित्ररूप अग्निदेव वसुओं ( प्राणों ) से प्रदीप्त होकर प्रस्फुटित होते हैं । वे पर्वो (दिनों, कालखण्डों अथवा काष्ठादि) से सम्पन्न होकर प्रवर्द्धित होते हैं॥७॥ |
सूक्त - ८०
| अग्निदेव वेगशील और संग्राम में शत्रुओं को जीतने वाले अन्नप्रदाता अश्व (शक्ति-प्रवाह) प्रदान करते हैं। वे शक्तिशाली, वेदज्ञ और यज्ञरूप सत्कर्म-प्रेमी पुत्र प्रदान करते हैं। अग्निदेव द्युलोक और भूलोक दोनों को प्रकाशित करते हुए संचरित होते हैं । ये अग्निदेव स्त्री को वीर सन्तानों की जन्मदात्री बनाते हैं॥१॥ |
| अग्नि प्रज्वलन क्रिया के लिए उपयोगी समिधा (काष्ठ) कल्याणकारी हो । अग्निदेव अपने तेज से द्युलोक और पृथ्वी में सभी जगह संव्याप्त हैं । अग्निदेव युद्ध-क्षेत्र में अपने साधक के सहायक बनकर उसे विजयी बनाते हैं तथा अनेक रिपुओं को विनष्ट करते हैं॥२॥ |
| अग्निदेव ने वास्तव में ही उन प्रख्यात ऋषि जरत्कर्ण की सुरक्षा की। उन्होंने उन्हें जल से बाहर करके जरूथ नामक राक्षस को भस्मीभूत किया था । अग्निदेव ने प्रतप्त कुण्ड में गिरे हुए ऋषि अत्रि को उबारा था। अग्निदेव ने ही नृमेध ऋषि को सन्तति प्रदान की थीं॥३॥ |
| अग्निदेव श्रेष्ठ, ज्योतिष्मान् ऐश्वर्य प्रदान करते हैं । अग्निदेव मन्त्रद्रष्टा ऋषि के लिए सहस्रों गौएँ देते हैं । यजमानों द्वारा प्रदत्त आहुतियों को अग्निदेव दिव्यलोक में ले जाते हैं, इससे उनका ज्वालारूपी शरीर अनेक लोकों में विस्तृत होता है॥४॥ |
| सर्वप्रथम श्रेषगण अग्निदेव की वेदमन्त्रों द्वारा प्रार्थना करते हैं। मनुष्यगण समरक्षेत्र में शत्रुओं से पीड़ित अवस्था में विजय पाने के लिए अग्निदेव का ही आवाहन करते हैं। आकाश में उड़ते हुए पक्षी रात्रि में अग्नि को देखते हैं । अग्निदेव हजारों गौओं ( किरणों) से युक्त होकर चतुर्दिक् विचरण करते हैं॥५॥ |
| मनुष्यों में जन साधारण भी अग्निदेव की अर्चना करते हैं। राजा नहुष के प्रजाजन अग्निदेव की अनेक तरह से प्रार्थना करते हैं। अग्निदेव यज्ञीय मार्ग के निमित्त कल्याणकारी वेदवाणी का श्रवण करते हैं। अग्नि का मार्ग घृत ( तेजस्) में सन्निहित है॥६॥ |
| ऋभुओं ( विद्वानों) ने अग्निदेव के निमित्त ही स्तो-रचना की । हम सभी महिमामय अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं । हे तरुण अग्ने ! आप स्तोताओं को संरक्षण प्रदान करें । हे अग्ने ! आप हमें महान् ऐश्वर्य प्रदान करें॥७॥ |
सूक्त - ८१
| ये ऋषि (द्रष्टा-विश्वकर्मा पिता की तरह स्थित रहकर समस्त लोकों के निमित्त (अथवा लोकों की) आहुतियाँ समर्पित करते हैं । वे संकल्प मात्र से विभिन्न सम्पदाओं को इच्छित रूप देते हुए प्रथम उत्पन्न जगत् को संव्याप्त करते हैं तथा अन्य ( नवसृजित लोकों) में भी प्रविष्ट होते हैं॥१॥ |
| सृष्टिनिर्माण के पूर्व परमात्मा किस आश्रय पर अधिष्ठित थे ? सृष्टि के निर्माण में प्रयुक्त होने वाला मूल द्रव्य क्या था? कैसा था? उन सर्वद्रष्टा विश्वकर्मा-परमात्मा ने इस सुविस्तृत पृथिवी और महान् द्युलोक का सृजन अपनी महान् सामर्थ्य से कहाँ रहकर किया ? (अगले मंत्र में इस प्रश्न का उत्तर हैं)॥२॥ |
| सर्वत्र आँख वाले, सब ओर मुख वाले, सब ओर भुजाओं वाले और सब ओर चरणों वाले उस अद्वितीय परमात्मा ने अपनी भुजाओं ( सामथ्र्यो) से गतिशील पृथिवी और द्युलोक को बिना आश्रय के निर्मित किया तथा उन्हें सम्यक् रूप से संचालित करने वाला वह अकेला ही है ॥३॥ |
| वह 'वन' कौन-सा है? वह वृक्ष कौन-सा है? जिससे (निर्माण सामग्री लेकर) विश्वकर्मा ईश्वर ने द्युलोक और पृथिवीलोक को सृजन किया । हे विवेकवान् पुरुषो ! अपनी मनः शक्ति से यह पूछो (जानने का प्रयास करो) कि समस्त भुवनों को धारण करते हुए वे विश्वकर्मा देव किस स्थान पर अधिष्ठित हैं ?॥४॥ |
| हे विश्व के रचयिता परमात्मा ! हे सबके धारक-पोषक ईश्वर ! जो आपके उच्चतम, मध्य वाले या नीचे वाले धाम (लोक या शरीर) हैं, उन सबके बारे में हमें आप मित्र भाव से शिक्षित करें । आप हम सब जीवों को वृद्धि प्रदान करते हुए स्वयं ही उत्तम हविष्यान्न द्वारा यजन करें॥५॥ |
| हे विश्व के कर्ता परमात्मा ! हमारे द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न द्वारा प्रसन्न होकर आप हमारे यज्ञ में पृथ्वी के सब आश्रितों के हितार्थ स्वयं यजन करें, आप सब शत्रुओं को अपने बल से मोहग्रस्त करें । इस (महान् प्रकृति) यज्ञ में ऐश्वर्य-सम्पन्न देव हमारे लिए श्रेष्ठ फल प्रदाता हों॥६॥ |
| आज हम जीवन यज्ञ में अपनी रक्षा के लिए ज्ञान के अधिपति सृष्टि के रचयिता परमेश्वर का आवाहन करते हैं। सत्कर्म की प्रेरणा देकर कल्याण करने वाले वे विश्वकर्मा हमारे द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न को हमारी रक्षा के निमित्त प्रेमपूर्वक ग्रहण करें॥७॥ |
सूक्त - ८२
| जब पूर्व समय में द्यावा-पृथिवी का विस्तार हुआ और उसके अन्दर-बाहर के भाग दृढ़ होकर प्रतिष्ठित हो गये, तब चक्षु-सम्पन्न ( सर्वद्रष्टा) पिता ( विश्वकर्मा प्रभु) ने नमनशील ( निर्देशों अथवा अनुशासनों को स्वीकार करने वाले) घृत ( मूलद्रव, प्राण अथवा ओजस्) को सृजन किया ॥१॥ |
| वे विश्वकर्मा देव विशिष्ट महाशक्ति सम्पन्न व्यापक विश्व के निर्माता, धारणकर्ता, महान् तथा सर्वद्रष्टा हैं । उन्हें सप्तऋषियों अथवा ( प्राण की सप्तधाराओं) से भी परे कहा गया है। उनके अभीष्ट की पूर्ति उन्हीं की पोषण शक्ति से होती है। वे एक ही - अद्वितीय हैं॥२॥ |
| जो परमेश्वर हम सबके पालन करने वाले और उत्पन्न करने वाले हैं, जो सबके धारणकर्ता हैं, जो सम्पूर्ण स्थानों और लोकों के ज्ञाता हैं, जो एक होकर भी विविध देवों के विविध नामों को धारण करते हैं। सभी लोकों के प्राणी अन्तत: उनको ही प्राप्त होते हैं॥३॥ |
| अन्तरिक्ष में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निवास करने वाले जिस परमेश्वर ने समस्त प्राणियों की रचना की है , उस स्रष्टा के लिए (हमारे) पूर्वज ऋषिगण स्तुति करते हुए यज्ञ में महान् वैभव समर्पित करते हैं॥४॥ |
| हृदयस्थ जो वह ईश्वरीय तत्त्व है, वह द्युलोक से दूर है, इस पृथ्वी से दूर है, देवों और असुरों से भी परे है। अप् तत्त्व (सृजन के मूल पदार्थ अथवा जल) ने सर्वप्रथम किस गर्भ को धारण किया ? वह गर्भ कैसा विलक्षण था ? जहाँ पूर्वकालीन देवगण ( ऋषिगण) उसे परमतत्त्व का सम्यक् दर्शन पाते एवं देवत्व के परमपद को प्राप्त करते हैं॥५॥ |
| सृष्टि के आदि से ही विद्यमान उस परमतत्त्व ने अप् तत्त्व के गर्भ को धारण किया है, जहाँ सम्पूर्ण देवशक्तियों का आश्रय स्थल है । इस अजन्मा ईश्वर के नाभिकेन्द्र में एक ही परमतत्त्व अधिष्ठित है, जिसमें समस्त भुवन आरक्षित होकर स्थिर हैं ॥६॥ |
| है मनुष्यो ! जिस परमेश्वर ने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की हैं, उसे आप लोग नहीं जानते हैं। वह परमतत्त्व सबसे भिन्न होकर भी सभी के भीतर प्रतिष्ठित हैं । अज्ञान के व्यापक अन्धकार से घिरे हुए, केवल वत या विवाद में लगे हुए मात्र प्राण रक्षा या पोषण की चिन्ता में संतप्त लोग उस परमेश्वर के सम्बन्ध में व्यर्थ विवाद करते हुए विचरण करते हैं । उसका साक्षात्कार नहीं कर पाते॥७॥ |
सूक्त - ८३
| हे वज्रवत् तीक्ष्ण बाण तुल्य और क्रोधाभिमानी देव मन्यु ! जो साधक आपको ग्रहण करते हैं, वे सभी प्रकार की शक्ति और सामर्थ्य को निरन्तर परिपुष्ट करते हैं । बलवर्द्धक और विजयदाता आपके सहयोग से हम (विरोधी) दासों और आर्यों को अपने आधिपत्य में करेंगे॥१॥ |
| मन्यु ही इन्द्र देव हैं, यज्ञसंचालक वरुण और जातवेदा अग्नि हैं । ( यह सभी देवता मन्युयुक्त हैं) सम्पूर्ण मानवी प्रजाएँ मन्यु की प्रशंसा करती हैं । हे मन्यु ! स्नेहयुक्त होकर आप तप से हमारा संरक्षण करें॥२॥ |
| हे मन्यु ! आप महान् सामर्थ्यशाली हैं, आप यहाँ पधारें। अपनी तप-सामर्थ्य से युक्त होकर शत्रुओं का विध्वंस करें। आप शत्रु विनाशक वृत्रहन्ता और दस्युओं के दलनकर्ता हैं। हमें सभी प्रकार का ऐश्वर्य प्रदान करें ॥३॥ |
| हे मन्यु ! आप विजयी शक्ति से सम्पन्न, स्व सामर्थ्य से बढ़ने वाले, तेजयुक्त, शत्रुओं के पराभवकर्ता, सबके निरीक्षण में सक्षम तथा बलशाली हैं । संग्राम क्षेत्र में आप हमारे अन्दर ओज की स्थापना करें॥४॥ |
| हे श्रेष्ठ ज्ञानसम्पन्न मन्यु ! आपके साथ भागीदार न हो पाने के कारण हम विलग होकर दूर चले गये हैं। महिमामय आपसे विमुख होकर हम कर्महीन हो गये हैं, संकल्पहीन होकर (लज्जित स्थिति में) आपके पास आएँ । हैं। हमारे शरीरों में बल का संचार करते हुए आप पधारें॥५॥ |
| हे मन्यु ! हम आपके समीप उपस्थित हुए हैं। आप अपनी अनुकूलतापूर्वक हमारे समीप आघातों को सहने तथा सबको धारण करने में समर्थ हैं । हे वज्रधारी मन्यु ! आप हमारे पास आएँ, हमें मित्र समझें, ताकि हम दुष्टों को मार सकें॥६॥ |
| है मन्यु ! आप हमारे समीप आएँ । हमारे दाहिने (हमारे अनुकूल) होकर रहें । हम दोनों मिलकर शत्रुओं का संहार करने में समर्थ होंगे । हम आपके लिए मधुर और श्रेष्ठ धारक (सोम) का हवन करते हैं। हम दोनों एकान्त में सर्वप्रथम इस रस का पान करें॥७॥ |
सूक्त - ८४
| हे मन्यु ! आपके सहयोग से रथारूढ़ होकर आनंदित और प्रसन्नचित्त होकर अपने आयुधों को तीक्ष्ण करके, अग्नि के सदृश तीक्ष्ण दाह उत्पन्न करने वाले मरुद्गण आदि युद्धनायक हमारी सहायतार्थ युद्ध क्षेत्र में गमन करें॥१॥ |
| हे मन्यु ! आप अग्नि सदृश प्रदीप्त होकर शत्रुओं को पराभूत करें । हे सहनशक्ति युक्त मन्यु ! आपका आवाहन किया गया है । आप हमारे संग्राम में नायक बने । शत्रुओं का संहार करके उनकी सम्पदा हमें दें । हमें बल प्रदान करके शत्रुओं को दूर भगाएँ॥२॥ |
| हे मन्यु ! हमारे विरुद्ध सक्रिय शत्रुओं को आप पराभूत करें । आप शत्रुओं को तोड़ते हुए और कुचलते हुए शत्रुओं पर आक्रमण करें। आपकी प्रभावपूर्ण क्षमताओं को रोकने में कौन सक्षम हो सकता है ? हे अद्वितीय मन्यु ! आप स्वयं संयमशील होकर शत्रुओं को नियन्त्रण में करते हैं॥३॥ |
| हे मन्यु ! आप अकेले ही अनेकों द्वारा सत्कार के योग्य हैं। आप युद्ध के निमित्त प्रत्येक मनुष्य को तीक्ष्ण (तेजस्वी) बनाएँ । हे अक्षय प्रकाशयुक्त ! आपकी मित्रता के सहयोग से हम हर्षित होकर विजय-प्राप्ति के लिए सिंहनाद करते हैं॥४॥ |
| हे मन्यु ! इन्द्र के सदृश विजेता, असन्तुलित न बोलने वाले आप हमारे अधिपति हों । हे सहिष्णु मन्यु ! आपके निमित्त प्रिय स्तोत्र का उच्चारण करते हैं । हम उस स्रोत (विधा) के ज्ञाता हैं, जिससे आप प्रकट होते हैं॥५॥ |
| हे वज्र सदृश शत्रुसंहारक मन्यु ! शत्रुओं को विनष्ट करना आपके सहज स्वभाव में है । हे रिपु पराभवकर्ता मन्यु ! आप श्रेष्ठ तेजस्विता को ग्रहण करते हैं। कर्मशक्ति के साथ युद्धक्षेत्र में आप हमारे लिए सहायक हों । आपका आवाहन असंख्य वीरों द्वारा किया जाता है॥६॥ |
| हे वरुण और मन्यु ( अथवा वरणीय मन्यु) ! आप उत्पादित और संगृहीत ऐश्वर्य हमें प्रदान करें । भयभीत हृदय वाले शत्रु पराभूत होकर दूर चले जाएँ॥७॥ |
सूक्त - ९२
| हे देवगण ! आप यज्ञ के नायक, मनुष्यों के संरक्षक, होतो, रात्रि के अतिथि और विविध ऐश्वर्यवान् अग्निदेव की अर्चना करें । सूखे काष्ठों को जलाने वाले और हरित काष्ठों में टेढ़े जाने वाले, सुखवर्षक यज्ञ के ध्वजरूप और 'यजनीय अग्निदेव आकाश में शयन करते हैं॥१॥ |
| देवताओं और मनुष्यों ने सर्वोपरि संरक्षक और धर्मधारक अग्निदेव को यज्ञ का साधक बनाया। वे तेजस् सम्पन्न वायु के पुत्र और महान् पुरोधा हैं । उषाएँ उन्हें सूर्यदेव के समान ही स्पर्श करती हैं॥२॥ |
| स्तुत्य अग्निदेव से सम्बन्धित हमारा ज्ञान सदैव सत्य हो, ऐसी हमारी अभिलाषा है । इस यज्ञाग्नि में प्रदत्त की गई हमारी आहतियाँ अग्निदेव सेवन करें, ऐसी हम कामना करते हैं । जिस समय यज्ञाग्नि की प्रचण्ड ज्वालाएँ देदीप्यमान होती हैं, तभी हम अग्निदेव के निमित्त आहुतियाँ समर्पित करते हैं॥३॥ |
| विस्तृत द्युलोक, व्यापक अन्तरिक्ष, अतिस्तुत्य और अनन्त पृथ्वी यज्ञाग्नि को प्रणाम करते हैं। इन्द्र, मित्र, वरुण, भग, सविता आदि पवित्र सामर्थ्ययुक्त देवगण उन्हीं को सम्मानित करते हैं॥४॥ |
| नदियाँ गतिशील मरुद्गणों का सहयोग प्राप्त करके तीव्रता से प्रवाहित होती हैं और असीम भृक्षेत्र को आच्छादित करती हैं। सभी जगह विचरणशील इन्द्रदेव चारों ओर जाकर मरुतों की सहायता से आकाश में गरजते हैं और महावेगशील होकर सम्पूर्ण विश्व में जल बरसाते हैं ॥५॥ |
| जिस समय मरुद्गण अपने कार्य को प्रारम्भ करते हैं, उस समय वे सभी मनुष्यों में संव्याप्त होते हैं। वे अन्तरिक्ष के श्येन पक्षी और मेघ के आश्रयभूत हैं । वरुण, मित्र, अर्यमा और अश्वारोही इन्द्रदेव वेगशील मरुद्गणों के साथ इन सभी प्रकरणों को देखते हैं॥६॥ |
| स्तोतागण इन्द्रदेव से संरक्षण एवं बल-पौरुष तथा सूर्यदेव से दृष्टि-सामर्थ्य प्राप्त करते हैं । जो स्तोता इन्द्रदेव की उचित रीति से स्तुति करते हैं, वे यज्ञकाल में इन्द्रदेव के वज्र को सहायक रूप में प्राप्त करते हैं॥७॥ |
| इन्द्रदेव के भय से सूर्य भी अपने अश्वों को प्रेरित करते और मार्ग में चलते हुए सबको प्रसन्न करते हैं। जो इन्द्रदेव भयानक और जलवर्षक हैं, उनसे कौन भयभीत नहीं होता ? वे आकाश में गर्जना करते हैं । शत्रुओं का पराभव करने वाली वज्रध्वनि उन्हीं के प्रभाव से नित्य उत्पन्न होती रहती है॥८॥ |
| अश्वारूढ़ और उत्साहप्रद मरुद्गणों के सहयोग को प्राप्त कर आत्मशक्ति सम्पन्न, अपनी सामर्थ्य से स्वयं कीर्तिवान्, सुखप्रद, जो देव दिव्यलोक से साधकों की आकांक्षा को पूर्ण करते हैं । हे ऋत्विजो आप निष्काम मरुद्गणों के साथ रहने वाले वीर शत्रुओं के हन्ता, सामर्थ्यशाली उन रुद्रदेव को नमन करें, स्तोत्र समर्पित करें॥९॥ |
| कामवर्षक बृहस्पति और सोमाभिलाषी देवों ने प्रजा के लिए अन्नादि का संग्रह किया ।सर्वप्रथम अथर्वा ऋषि ने यज्ञ द्वारा देवों को आनन्दित किया, देवगण और भृगुकुलोत्पन्न ऋषि यज्ञ में गये और उसे समझा॥१०॥ |
| नराशंस यज्ञ में चार प्रकार की अग्नियाँ स्थापित की गईं। अतिवर्षक द्यावा-पृथिवी, यम, अदिति, धनदाता अग्निदेव, ऋभुक्षण, रुद्रपत्नी, मरुद्गण और विष्णु आदि सभी देव, यज्ञ में स्तोत्रों से स्तवित होते हैं॥११॥ |
| श्रेष्ठ आकांक्षा से हम लोग जिन विस्तृत स्तोत्रों का पाठ करते हैं, यज्ञकाल में अन्तरिक्षवासी अहिर्बुध्न्य अग्निदेव इन सभी स्तोत्रों को सुनें । आकाश में भ्रमण करने वाले सूर्य और चन्द्र भी आकाश में स्थित होकर अन्त:करण से इन स्तोत्रों को श्रवण करें॥१२॥ |
| सम्पूर्ण देवताओं के कल्याणकारी और जल के वंशज पूषादेव, हमारे पशुओं आदि का संरक्षण करें । यज्ञ के निमित्त वायुदेव भी हमारे संरक्षक हो । आत्मरूप में स्थित वायुदेव की अन्न, धन के निमित्त इर्शना करें । हे। स्तुत्य अश्विनीकुमारो ! मार्ग में गमन करने के लिए आप इन स्तोत्रों का श्रवण करें॥१३॥ |
| अन्त:करण में जो प्रजाजनों के अभयदाता स्वामी हैं, जो अपनी यशस्वी कीर्ति स्वयं उत्पादित करते हैं , उनकी हम प्रार्थना करते हैं। देव पलियों के साथ स्वतन्त्र ( स्थिर) देवमाता अदिति और निशापति चन्द्रमा की हम प्रार्थना करते हैं। सभी मनुष्यों के अनुग्रहकर्ता आदित्य और सर्वजगत् पालक इद्रदेव की भी हम प्रार्थना करते हैं॥१४॥ |
| इस यज्ञ में सुजन्मा अंगिरा ऋषि देवताओं की प्रार्थना करते हैं । जो (सोमवल्ली) पीसने के लिए पत्थरों को ऊपर उठाते हैं, वे अभिषवकर्ता भी यज्ञीय सोम को देखते और प्राप्त करते हैं । सर्वद्रष्टा इन्द्रदेव जिस सोमरस को पीकर हर्षित हुए, उन इन्द्रदेव का वज्रास्त्र आकाशमार्ग से अन्न उत्पादक जल को प्रकट करे॥१५॥ |
सूक्त - ९३
| हे द्यावा-पृथिवि ! आप दोनों महान् विस्तार पाएँ । आप दोनों नारी ( स्त्री या नेतृत्व में सक्षम ) की भाँति हमारे लिए सदैव सहयोगी हों । इस प्रकार आप हमें शत्रुओं से बचाएँ । उनसे हमें हर प्रकार से संरक्षित करें॥१॥ |
| जो मनुष्य सम्पूर्ण यज्ञीय कार्यों में देवताओं की अर्चना करते हैं तथा जो विभिन्न शास्त्रों के श्रोता, सुखप्रद हवियों द्वारा देवों की अर्चना करते हैं। वे हीं सच्चे सेवक हैं)॥२॥ |
| हे सर्वेश्वर ! देवताओं का महिमामय धारण योग्य ऐश्वर्य हमें प्रदान करें । आप निश्चय ही सम्पूर्ण तेजस्विता के धारणकर्ता और यज्ञों में अपना भाग पाने वाले हैं॥३॥ |
| अर्यमा, मित्र, सर्वज्ञ वरुण, लोगों के स्तवनीय रुद्र, सर्वपोषक मरुद्गण और भगदेव ये सभी देवगण स्तुति योग्य हैं । ये मनुष्यों के सुखदाता तथा अमृत के समान हविर्द्रव्यों के अधिपति हैं॥४॥ |
| हे वृषण्वसू ( अश्विनीकुमारो) ! अहिर्बुध्य अग्निदेव जल ( मेघों ) के बीच उपस्थित रहते हैं । सूर्य और चन्द्र भी जल के संसाधन हैं। उनके साथ आप भी रात-दिन हमारे आवासों के लिए ( रसों का संचार करें॥५॥ |
| कल्याणकारी कर्मों के पालक अश्विनीकुमार , मित्र और वरुणदेव अपने शारीरिक तेज़ से हमारा संरक्षण करें । जिन यजमानों का ये देव संरक्षण करते हैं, वे महान् ऐश्वर्यों को प्राप्त करते हैं तथा वे मरुस्थल के समान (कष्टदायी स्थितियों से ) पार हो जाते हैं॥६॥ |
| रुद्रपुत्र मरुत्, अश्विनीकुमार, रथारूढ़ पूषा, ऋभु, अन्नवान् भग, सर्वगामी इन्द्र और सर्वज्ञ ऋभुक्षण आदि सभी देवगण हमें सुख प्रदान करें । हम सभी देवताओं की प्रार्थना करते हैं॥७॥ |
| महान् इन्द्रदेव यज्ञ द्वारा कान्तिमान होते हैं । हे इन्द्रदेव ! आपके सेवक यजमान भी यज्ञ द्वारा आनन्दित होते हैं । यज्ञ की ओर अतिशीघ्रता से आने वाले आपके रथ के घोड़े अति सामर्थ्यवान् हैं। उनके यज्ञानुष्ठान मनुष्य के लिए साध्य नहीं हैं, वे सभी दिव्यतायुक्त हैं 11८॥ |
| हे सवितादेव !आप हमें कभी लज्जित न होने दें ।आप स्तोतओं से स्तुत्य हैं । मरुतों के साथ निवास करने वाले इन्द्रदेव, रथचक्र और रश्मियों ( लगामों या किरणों) के समान इन लोकों को हमारे लिए नियंत्रित करते हैं॥९॥ |
| हे द्यावा-पृथिवि ! आप हमारे इन वीरपुत्रों को जीवनोपयोगी महान् यश प्रदान करें ।आप शक्ति को उपार्जित करने के लिए पौष्टिक अन्नादि प्रदान करें तथा शत्रु के संहार और विपत्तियों से परित्राण के लिए धन प्रदान करें॥१०॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हमारे समीप आगमन के लिए इच्छुक , आप कहीं भी स्थित स्तोताओं की अभीष्ट सिद्धि के लिए उनकी सदैव सुरक्षा करें। आपके प्रति जो स्तोता स्तुतिगान करते हैं, उनके अभिप्राय को आप सुनें॥११॥ |
| जिस प्रकार सूर्यदेव की तेजस्वी रश्मियाँ व्यापक दीप्तिमान् ज्योति को फैलाती हैं, उसी प्रकार हमारे ये स्तोत्रगान मनुष्यों की श्री-सम्पदा को बढ़ाएँ । जैसे शिल्पकार अक्षय, शीघ्र गतिशील अश्वों से वहन योग्य सुदृढ़ रथ को बनाते हैं, उसी प्रकार हमने इन स्तोत्रों की रचना की हैं॥१२॥ |
| जिनसे हम ऐश्वर्य की कामना करते हैं, उनके निमित्त हम अतिश्रेष्ठ स्तोत्रों का बार-बार उच्चारण करते हैं । जिस प्रकार युद्ध में क्रमबद्ध पराक्रम किये जाते हैं अथवा जैसे घटींचक्र क्रमबद्ध होकर आगे-पीछे चलता है, वैसे ही हमारे स्तोत्र भी हों॥१३॥ |
| जो देव पाँच सौ रथों में घोड़े जोतकर हमारे लिए यज्ञमार्ग में गमन करते हैं, उनके लिए प्रशंसनीय स्तोत्रों को उच्चारण हमने दुःशीम, पृथवान्, वेन और शक्तिशाली राम आदि ऐश्वर्यशाली नरेशों के समीप किया है॥१४॥ |
| उन नरेशों से तान्व, पार्थ्य और मायव आदि ऋषियों ने शीघ्र ही सतहत्तर गौओं की याचना ( कामना) कीं॥१५॥ |
सूक्त - ९४
| ये मावा ( पाषाण ) अभिषव क्रिया करें । हम याजक उन ध्वनि करने वाले पाषाणों की प्रार्थना करते हैं । हे ऋत्विग्गण ! आप स्तोत्र-पाठ करें । जिस समय आदरणीय और सुदृढ़ यात्रा, इन्द्रदेव के लिए सोमाभिषव की ध्वनि करते हैं, उस समय वे सोमपान करके सन्तुष्ट होते हैं॥१॥ |
| ये ग्रावा सैकड़ों और सहस्रों मनुष्यों के समान शब्दायमान, तेजस्वी मुखों से देवों को आवाहित करते हैं। उत्तमकर्मा ये पाषाण यज्ञ को प्राप्त करके देवों के आवाहक अग्निदेव से पहले ही सेवनीय हविष्यान्न को उपलब्ध करते हैं॥२॥ |
| लाल रंग की वृक्षशाखा का भक्षण करते हुए बैलों के समान ही ये ग्रीवा शब्द करते हैं। मांसाहारी जिस प्रकार मांस के पकने पर आनन्दप्रद शब्द करते हैं, वैसे ही ये सोमाभिषव करते हुएं ध्वनि करते हैं॥३॥ |
| आनन्दप्रद चूसे ( निचोड़े) जाते हुए सोम से इन्द्रदेव को आवाहित करते हुए ये प्रावा-भयंकर ध्वनि करते हैं। इन्होंने मुख से ( पान करने योग्य) आनन्दप्रद सोमरस को उपलब्ध किया। ये अभिषव कार्य में संलग्न और धीर-गम्भीर होकर अपनी शब्दं गर्जनाओं से पृथ्वी को परिपूर्ण करते हुए भगिनीस्वरूपा अँगुलियों के साथ हर्षित होकर नाचते हैं॥४॥ |
| पत्थरों की ध्वनि से लगता है कि अन्तरिक्ष में पक्षी कलरव कर रहे हैं। मृगभूमि में ये गतिशील कृष्णमृगों के समान गतिमान् होकर नाच रहे हैं। निष्पादित सुखदायी सोमरस को ये पत्थर नीचे गिराते हैं, मानों वे सूर्य के समान वेत वर्णरूप जल को ग्रहण करते हैं॥५॥ |
| जिस प्रकार बलिष्ठ अश्व पारस्परिक सहयोग से रथ के धुरे को धारण करके रथवहन करते हैं, वैसे ही ये कामनापूरक पाषाण यज्ञ के भार को धारण करके सोमरस को बरसाते हैं। जब ये सोम को ग्रहण करते हुए श्वास के साथ ध्वनि करते हैं - तभी अश्वों के समान इनके मुख से निकले हुए शब्दों को हम सुनते हैं॥६॥ |
| दस अँगुलियों से आबद्ध, दस प्रकार के कर्मों के प्रकाशक, दस अश्वों के तुल्य, सोम के साथ संयोजित, इस प्रकार के कर्मों के निर्वाहक, संचालनकर्ता, दस प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न होकर अभिषवण कार्य को वहन करने वाले पत्थरों की महिमा का गुणगान करें॥७॥ |
| ये पाषाण दस अँगुलियों को बन्धनरूप रस्सी के समान समझकर शीघ्रता से कार्य सम्पन्न करते हैं। इन पाषाणों का अभिषवण कार्य अत्यन्त प्रशंसनीय और गतिशील है । अभिस्रवित श्रेष्ठ सोमरस का भाग सबसे पहले इन्हें ही प्राप्त होता है॥८॥ |
| ये पाषाण सोम का सेवन करके इन्द्रदेव के दोनों अश्वों को चूमते ( सेह करते ) हैं। सोमरस अभिषवण क्रिया के समय वे शोधक यन्त्र के ऊपर विराजमान होते हैं। इन पाषाणों द्वारा सोमवल्ली से जिस मधुररस को निकाला जाता है, उसे पीकर इन्द्रदेव बढ़ते, विकसित होते और बलिष्ठ साँड़ के समान पराक्रम करते हैं॥९॥ |
| हे पाषाणो ! सोमरस आपको यज्ञ में अभिलषित सामर्थ्य प्रदान करेंगे । आप कभी निराश अथवा क्षीण न हों । अन्नादि से सम्पन्नों के समान आप सदैव भोजनादि से सन्तुष्ट रहते हैं । आप जिसके यज्ञ को ग्रहण करते हैं, वे ऐश्वर्यशाली मनुष्यों के समान उज्ज्वल कान्ति से युक्त और कल्याणकारी होकर रहते हैं॥१०॥ |
| हे पाषाणो ! आपको परिश्रम, शिथिलता, मृत्यु, रुग्णता, जीर्णता, तृष्णा और स्पृहा कभी नहीं घेरते । आप स्वयं निराशा रहित होकर दूसरों (दुष्टों) को निराश करने वाले हों । आप ( सार वस्तु को) समेटने तथा( अनुपयोगी को) फेंकने में कुशल हैं॥११॥ |
| हे पाषाणो ! आपके पूर्वज पर्वत चिरकाल से अटल, पूर्ण अभिलाषाओं से युक्त और किसी भी कारण अपने स्थान से हटने को तैयार नहीं हैं । वे.जीर्णता रहित, सोम वल्लियों से युक्त और हरिताभ होकर आकाश और पृथ्वी को अपने अभिषव शब्द से परिपूर्ण करते हैं॥१२॥ |
| ये पाषाण उस सोम अभिषव क्रिया-काल में वेगशील रथों के समान ही ध्वनि करते हैं। अभिषव करने वाले पत्थर, धान्य का वपन करने वाले कृषकों के समान ही सोम को फैलाते हैं। ये उसे खाकर विनष्ट नहीं करते॥१३॥ |
| पूजनीय पाषाण यज्ञ में सोम अभिषवण कार्य करते हुए उसी प्रकार ध्वनि करते हैं, जिस प्रकार क्रीड़ारत शिशु माता को हाथों से मारते हुए खुशी में किलकारी शब्द करते हैं। सोम के अभिषवण कार्य में प्रयुक्त पाषाणों की विभिन्न प्रकार से प्रार्थना करें। अब पाषाण अभिषवण कार्य को स्थगित करें॥१४॥ |
सूक्त - ९५
| ( पुरूरवा का कथन है ) हे निष्ठुर पनि ! आप भावनापूर्वक कुछ समय के लिए ठहरें । हम दोनों का मिलन शीघ्र ही उपयोगी वार्ता से युक्त हो । वर्तमान समय में हम दोनों द्वारा किये गये पारस्परिक विचार-विमर्श से क्या हमारा भविष्य सुखप्रद नहीं हो सकता ?॥१॥ |
| ( उर्वशी की उक्ति) मात्र निरर्थक वार्ता से हमारा क्या भला होगा ? उषा के समान आपके समीप से में चली आ रही हूँ ।अतः हे पुरूरवा ! आप दुबारा अपने घर वापस जाएँ ।मैं आपके लिए वायु के समान ही दुर्लभ॥२॥ |
| ( पुरूरवों की उक्ति ) आपके विरह से व्यथित होकर मेरे तरकस से विजयश्री हेतु वाण नहीं छोड़े जाते, शक्तिशाली होते हुए भी मैं असंख्य गौओं ( ऐश्वर्यों ) को प्राप्त नहीं कर सकता । वीरतारहित होने से हमारे कर्म धूमिल हो गये हैं । युद्ध (जीवन-समर) में शत्रुओं को कम्पायमान करने वाला मैं सिंह गर्जना नहीं कर पाता॥३॥ |
| उषाकाल ( सृष्टि उद्भव के समय में यदि यह ( उर्वशी ) श्वसुर ( अपने वीर पुरुष अथवा श्वसुर-परमेश्वर) के निमित्त वैभव तथा आयु धारण करतीं, तो अपने घर (देह) में प्रवेश पाती और दिन-रात कामना करती हुई सुखोपभोग प्राप्त करती॥४॥ |
| ( उर्वशी कहती हैं ) हे पुरूरवा ! दिन ( सृष्टि के प्रारम्भ ) के समय आपने मुझे तीन बन्धनों ( त्रिगुणों) से बाँधा है। किसी अन्य कान्तिहीन या अप्रजननशील के साथ मेरी प्रतिद्वंद्विता नहीं थी, उसी भाव से मैं आपकी काया के अनुरूप आश्रय प्राप्त करती थी। उस समय शरीर पर मेरा ही शासन चलता था॥५॥ |
| ( पुरूरवी कहते हैं - उर्वशी की सखियाँ) सुजूर्णि ( उत्तम गतियुक्त), श्रेणि ( पंक्तिबद्ध), सुमे आपि ( सुखप्रदायक ), हृदेचक्षु ( जलागार-आकाश चक्षु वाली), चरण्यु ( विचरणशील ) आदि तेजस्वी अरुणाभ अप्सराएँ तुम्हारे जाने के बाद सज्जित होकर नहीं आतीं । वे सब श्री-सम्पन्न, धारण शक्ति सम्पन्न तथा वाणी या किरण-प्रकाश सम्पन्न देवियाँ अब शब्द (उद्घोष) करती नहीं आती॥६॥ |
| ( उर्वशी की उक्ति) हे पुरूरवा ! जिस समय आपका जन्म हुआ, उस समय देवशक्तियाँ भी प्रादुर्भूत हुई । प्रवाहवती नदियों ने स्वयं उनका संवर्द्धन किया। आपको महासंग्राम ( जीवन-संग्राम) में रिपुओं के दलन के लिए देवताओं ने सामर्थ्य-शक्ति से सम्पन्न किया ॥७॥ |
| ( पुरूरवा का कथन) जब यह मनुष्य देहधारी अपने स्वरूप को छोड़कर ( भूलकर) अमानवी ( अप्सराओं-प्रकृति की शक्तियों) के उपयोग की लालसा से उनके पास जाता था, तो वे उसी प्रकार भाग ( विलुप्त ) जाती थीं, जैसे भयभीत हरिणी या रथयुक्त घोड़े॥८॥ |
| जब इन देवलोकवासिनी अप्सराओं के साथ मनुष्य देहधारी * पुरूरवा' अतिस्नेहपूर्ण सम्वाद और क्रिया-कलापों में सहयोग हेतु गये, तो वे अन्तर्धान हो गईं अर्थात् अपने ( शरीरों) को प्रकट नहीं किया । वे दाँतों से लगाम को काटते , क्रीड़ाशील अश्वों के समान भाग गईं॥९॥ |
| उस उर्वशी ने अन्तरिक्ष से पतनशील विद्युत् के सदृश शुभज्योति धारण की और मेरी सम्पूर्ण कामनाओं को पूरा किया। उनके गर्भ से क्रियाशील और मनुष्यों का कल्याणकारी सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। उर्वशी उसे दीर्घायुध्य प्रदान करती है॥१०॥ |
| ( उर्वशी का कथन) हे पुरूरवी ! पृथ्वी के संरक्षण हेतु आपने पुत्र को जन्म दिया, मुझमें गर्भ की स्थापना की । इस बात से परिचित होकर मैंने बार-बार आपसे ( मर्यादा पालन हेतु ) कहा था; परन्तु आपने मेरे कथन पर ध्यान नहीं दिया । आपने पारस्परिक स्नेह को भंग किया है, अब शोक करने से कोई लाभ नहीं॥११॥ |
| ( पुरूरवा कहते हैं। ऐसा कब होगा कि जन्म पाकर पुत्र ( जीव ) आँसू न बहाता हुआ ( भोगों में फंसकर दुःखी न होता हुआ } पिता परमेश्वर की इच्छा करेगा ? कौंन श्रेष्ठ समान मन वाले दम्पतियों को विलग करता हैं ? (हे उर्वशी) तुम्हारे जैसा अग्नि ( तेजस्वी पुत्र या चेतन जीव) कब श्वसुर गृह को प्रकाशित करेगा ?॥१२॥ |
| (उर्वशी का उत्तर ) हे पुरूरवा ! मैं आपके लिए बोलती हूँ; आप (या आपका पुत्र) अश्रु बहाते हुए न लौटें, ऐसी कल्याण कामना करती हैं। आपका चाहा हुआ मैं आपके पास प्रेरित ( या प्रेषित ) कर देंगी । आप अपने अन्दर जो ( आसक्ति) है, उसे निकाल दें। मूर्ख व्यक्ति मेरा ठिकाना प्राप्त नहीं कर पाते॥१३॥ |
| ( पुरूरवा की उक्ति) आपके साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करने वाला पति ' गुरूरवा' आज पृथ्वी पर गिर पड़े अथवा संरक्षणरहित होकर दूरस्थ जाने के लिए प्रस्थान करे अथवा यहीं पृथ्वी पर शयन करे अर्थात् दुर्गति में मृत्यु को प्राप्त हो जाए अथवा उसे बलिष्ठ जंगल के वृक् आदि भक्षित कर लें॥१४॥ |
| ( उर्वशी का कथन है ) हे पुरूरवा ! आप मृत्यु को प्राप्त न हों, न यहाँ पृथ्वी पर गिरें तथा अमंगल-सूचक भेड़ियादि भी आपको भक्षित न करें, आपका विनाश न करें । स्त्रियों की मैत्री और स्नेह स्थायी नहीं होते । स्त्रियों और वृकों के हृदय समान होते हैं॥१५॥ |
| उर्वशी का कथन ) मानवीय शरीरों को विभिन्न रूपों में धारण करके मनुष्यों के बीच मैंने भ्रमण किया । आपके साथ मैं चार वर्षों तक रही। घृतादि ( तेजस् ) का स्वाद दिन में अनेक बार प्राप्त किया। उसी से सन्तुष्ट होकर मैं विचरण कर रही हूँ॥१६॥ |
| (पुरूरवा का कथन) अन्तरिक्ष को परिपूर्ण करने वाली और तेजस् उत्पन्न करने वाली उर्वशी को मैं वसिष्ठ ( पुरूरवा) अपने नियन्त्रण में लेना चाहता हूँ । श्रेष्ठ कर्मयुक्त दाता (जीव) आपके समीप रहे अर्थात् आपको प्राप्त हो । मेरा हृदय आपके विरह में व्याकुल हो रहा है, इसलिये हे उर्वशी ! आप पुन: वापस लौटें॥१७॥ |
| ( उर्वशी ने कहा ) हे इळापुत्र पुरूरवा ! ये सम्पूर्ण देवगण आपके सम्बन्ध में कह रहे हैं कि आप मृत्यु पर विजय प्राप्त करेंगे, ( जीवन को बन्धन न मानें ) अर्चना ( प्राप्त सम्पदा का यज्ञीय उपयोग) करेंगे और स्वर्ग में जाकर सुख तथा आनन्द प्राप्त करेंगे॥१८॥ |
सूक्त - ९६
| हे इन्द्रदेव ! आपके दोनों घोड़ों कीं, इस महायज्ञ में हम अर्चना करते हैं। आपके सेवनीय, प्रशंसा-योग्य उत्साह की हम कामना करते हैं । जो इन्द्रदेव हरि ( हरणशील सूर्यादि) के माध्यम से घृत ( तेज अथवा जल) सिंचित करते हैं, ऐसे मनोहारी इन्द्रदेव के समीप हमारे स्तोत्र पहुँचें॥१॥ |
| हे ऋत्विग्गण ! जिस प्रकार अश्व द्रुतगति से इन्द्रदेव को दिव्य धामों में पहुँचाते हैं, उसी प्रकार स्तोत्रों से इन्द्रदेव के दोनों अश्वों को यज्ञस्थल की ओर प्रेरित करें। अश्वों सहित इन्द्रदेव की कल्याणप्रद सामर्थ्य की स्तुति करें । जैसे गौएँ दूध देती हैं, उसी प्रकार आप भी हरिताभ सोम एवं स्तुतियों से इन्द्रदेव को तृप्त करें॥२॥ |
| इन्द्रदेव का जो वज्र हरित ( हरणशील) और लौह धातु का है, उस शत्रुनाशक वज्र को देनों हाथों से धारण किया जाता है । इन्द्रदेव वैभवशाली, सुन्दर हुनुयुक्त हैं और क्रोधित होकर दुष्टजनों को बारों द्वारा विनष्ट करने वाले हैं। हरिताभ सोम द्वारा इन्द्रदेव को अभिषिंचित किया जा रहा है॥३॥ |
| अन्तरिक्ष में सूर्य के सदृश कान्तिमान् वज्र, प्रशंसनीय होकर सबको संव्याप्त करता है , मानो उसने अपनी गति से रथ के वहनकर्ता अश्वों के सदृश ही सम्पूर्ण दिशाओं को संव्याप्त किया है। सुन्दर हुनु से युक्त और सोमरस पानकर्ता इन्द्रदेव, लोहे से विनिर्मित वज्रास्त्र के द्वारा वृत्रासुर के हननकाल में असाधारण आभा युक्त हुए॥४॥ |
| हे हरिकेश इन्द्रदेव ! पुरातन कालीन श्रेषयों द्वारा आपकी ही यज्ञ में प्रार्थना की जाती थी तथा आप यज्ञ में उपस्थित होते थे । आप सबके स्पृहणीय और प्रशंसायोग्य हैं । हे इन्द्रदेव ! आपके सभी प्रकार के अन्न प्रशंसनीय हैं, आप कान्तिमान् और असाधारण विशेषताओं से सम्पन्न हैं॥५॥ |
| स्तुतियोग्य और वज्रधारी इन्द्रदेव जब सोमरस के पान हेतु हर्षित होकर सन्नद्ध होते हैं, तो उस समय दो सुन्दर हरितवर्ण घोड़े उनके रथ में जोते जाकर उनको वन करते हैं । वहाँ ( हमारे यज्ञस्थल में) इन कामना-योग्य इन्द्रदेव के निमित्त अनेक बार सोमरस का अभिषवण किया जाता हैं॥६॥ |
| इन्द्रदेव के निमित्त यथोचित मात्रा में सोमरस रखा गया है, उसी सोमरस द्वारा इन्द्रदेव के अविचल घोड़ों को यज्ञ की ओर वेगशील किया जाता है । गतिशील घोड़े जिस रथ को युद्ध- भूमि की ओर वहन करते हैं, वहीं रथ इन्द्रदेव को कमनीय और सोमरस-सम्पन्न यज्ञ में प्रतिष्ठित करता है॥७॥ |
| हरि ( किरणों ) को श्मश्रु ( दाढ़ी-मूंछ) एवं केशों के समान धारणकर्ता, लोहे के समान सुदृढ़ शरीरधारी इन्द्रदेव, तीव्रता से हर्षित करने वाले सोमरस का पान करके उत्साहित होते हैं। वे गतिशील अश्वों से यज्ञों तक पहुँचते हैं। दोनों अश्वों को जोतकर वे हमारे सभी प्रकार के विघ्नों का निवारण करें॥८॥ |
| इन्द्रदेव के दो हरितवर्ण अथवा दीप्तिमान् नेत्र यज्ञवेदी में दो सुवों के समान ही विशिष्ट ढंग से सोमरस पर केन्द्रित रहते हैं। उनके हरित वर्ण के दोनों जबड़े सोमपान हेतु कम्पायमान होते हैं। शोधित चमस-पात्र में जो अति सुखप्रद, उज्ज्वल सोमरस था, उसे पीकर वे अपने दोनों अश्वों के शरीरों को परिमार्जित करते हैं॥९॥ |
| कान्तिमान् इन्द्रदेव का आवास द्यावा-पृथिवी पर ही है। वे रथारूढ़ होकर घोड़े के समान ही अतिवेग से समर क्षेत्र में गमन करते हैं । है इन्द्रदेव ! उत्कृष्ट स्तोत्र आपको प्रशंसित करते हैं। आप अपनी सामर्थ्यानुसार विपुल अन्न को धारण करते हैं॥१०॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप अपनी महत्ता से द्यावा-पृथिवी को संव्याप्त करते हैं और नवीन प्रिय स्तोत्रों की कामना करते हैं । हे बल-सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप गो ( पृथ्वी) को हर्षित करने के लिए प्रेरक सूर्यदेव के लिए घर की तरह आकाश को प्रकट करते हैं॥११॥ |
| हे सुन्दर हनुयुक्त इन्द्रदेव ! आपके अश्व, रथ में जोते जाकर मनुष्यों द्वारा सम्पादित यज्ञ में आपको पहुँचाएँ। आपके निमित्त जो प्रेमपूर्वक तैयार किया गया, मधुर सोमरस प्रस्तुत है, उसे आप पिएँ । दस अँगुलियों से अभिषवित सोमरस, जो यज्ञ का साधनरूप हैं, आप युद्ध में विजय हेतु उसे पीने की कामना करें॥१२॥ |
| हे अश्वयुक्त इन्द्रदेव ! पहले प्रातः सवन में सोमरस दिया गया है, उसको आपने ग्रहण किया। इस समय (माध्यन्दिन सवन में) जो सोम प्रस्तुत हैं, वह मात्र आपके निमित्त ही हैं । आप इस मीठे सोमरस से आनन्द प्राप्त करें । हे विपुल वृष्टिकर्ता इन्द्रदेव ! आप अपने उदर को सोमरस से परिपूर्ण करें॥१३॥ |
सूक्त - ९७
| सृष्टि के प्रारम्भ में जो ओषधियाँ देवताओं द्वारा वसन्त, वर्ण, शरद इन तीन ऋतुओं में उत्पन्न हुई हैं, (पककर) पीत वर्ण हुईं उन ओषधियों के एक सौ सात स्थानों का ज्ञान हमें है । ॥१॥ |
| हे मातृवत् पोषणगुण-सम्पन्न ओषधियो ! आप सभी के सैकड़ों नाम हैं और सहस्रों अर्थात् असंख्य अङ्कुर हैं। सैकड़ों कर्मों को सिद्ध करने वाली हे ओषधियो ! आप सभी हमें आरोग्य प्रदान करें ॥२॥ |
| हे ओषधियो ! आप वेगवान् घोड़े के समान ही अनेक प्रकार की शत्रुवत् व्याधियों को तेजी से नष्ट करने वाली हों । पुष्पों से युक्त तथा फलोत्पादित गुणों से सम्पन्न आप हमारे लिए आनन्दप्रद सिद्ध हों ॥३॥ |
| हे औषधियो ! आप माता के समान पालनशक्ति से युक्त, दिव्य गुणों से सम्पन्न हैं, आपके ऐसे गुणों की हम प्रशंसा करते हैं, इसे आप स्वीकार करें । हे पुरुष (यज्ञदेव या चिकित्सक) ! गौ, घोड़े, वस्त्र और स्वयं को मैं आपके निमित्त अर्पित करता हूँ ॥४॥ |
| अश्वत्थ और पलाश वृक्ष पर निवास करने वाली हे ओषधियो ! आप यजमान को जीवनी-शक्ति प्रदान करके, उस पर अनुग्रह करती हैं, जिसके लिए आप विशिष्ट कृतज्ञता की पात्र हैं ॥५॥ |
| जैसे राजागण समर में एकत्रित हो जाते हैं, उसी प्रकार जिसके पास ओषधियाँ एकत्र होती हैं, वही ज्ञानवान् व्यक्ति चिकित्सक कहलाता है । वही पीड़ाओं और व्याधियों का निवारण कर पाता है ॥६॥ |
| इस (यजमान के) रोगों को दूर करने के लिये अश्ववती (शक्तिशाली), सोमवती (शान्तिदायक), ऊर्जवन्ती (ऊर्जा प्रदायक ), उदोजस् (ओजस्विता की पोषक) आदि समस्त ओषधियों के दिव्य गुणों से हम भलीप्रकार परिचित हैं ॥७॥ |
| जैसे गोशाला से गौएँ बाहर की ओर जाती हैं, वैसे ही (यज्ञ के प्रभाव से) ओषधियों की सामर्थ्य विस्तृत वायुमण्डल में फैल जाती है । हे पुरुष ! ये ओषधियाँ आपको स्वास्थ्य तथा सम्पदा प्रदान करेंगी । ॥८॥ |
| हे ओषधियो ! आप विकारों को दूर करने वाली माता की भाँति ‘निष्कृति' अर्थात् रोगों का निवारण करने वाली हैं। क्षुधाहरण करने वाले अन्न के समान ही आप मनुष्यों में स्थित रोगों को दूर करें ॥९॥ |
| चोर द्वारा गौओं के बाड़े पर आक्रमण करने के समान ही, अपने गुणों से सर्वत्र व्याप्त ओषधियाँ भी रोग समूह पर आक्रमण करती हैं तथा शरीर के समस्तविकारों को अपनी आरोग्यवर्द्धक सामर्थ्य से दूर करती हैं ॥१०॥ |
| विशेष शक्ति-सम्पन्न इन ओषधियों को सेवन करने के लिए जब हम हाथ में धारण करते हैं, तब राजयक्ष्मा (टी० बी० ) जैसे भयानक रोग अपने को उसीप्रकार नष्ट मानते हैं, जैसे वधगृह में पहुँचने से पूर्व ही वध हेतु ले जाया जा रहा प्राणी, अपने को मरा हुआ मानता है ॥११॥ |
| हे औषधियों ! आप रोगी मनुष्य के अंग-प्रत्यङ्ग में जब पूर्ण रूप से समाहित होती हैं, तब वीर पुरुष द्वारा शत्रु के मर्मस्थल को पीड़ित करने के समान यक्ष्मादि शारीरिक रोगों को समूल विनष्ट कर देती हैं ॥१२॥ |
| हे ( शरीराधिष्ठित ) यक्ष्म रोग ! तुम शीघ्रगामी चाष (नीलकण्ठ) पक्षी, किकिदीवि (मयूर) पक्षी तथा वायु के समान वेगपूर्वक यहाँ से गमन करो तथा गोधा (गोह-हिंस्र जन्तु) के साथ विनाश को प्राप्त करा ॥१३॥ |
| हे ओषधियो ! आप परस्पर एक दूसरे के प्रभाव में वृद्धि करो । प्रयोग की गई एक ओषधि दूसरी के निकट आए और वह अन्य ओषधि के साथ निकटता स्थापित करे । सभी ओषधियाँ पारस्परिक सहकार भावना का परिचय देती हुईं हमारे निवेदन को स्वीकार करें ॥१४॥ |
| फलों से युक्त, फलों से रहित, पुष्पयुक्त तथा पुष्परहित ऐसी ये सभी ओषधियाँ बृहस्पति (विशेषज्ञ वैद्य) द्वारा प्रयुक्त होकर हमें रोगों से मुक्ति दिलाएँ ॥१५॥ |
| हे ओषधियो ! आप कुपथ्य जनित रोगों अथवा निन्दित कुकृत्यों से उत्पन्न, वरुण के पास एवं यम के बन्धन रूप रोगों, पापकृत्यों तथा दैवी अनुशासन के न पालने से हुए सभी रोगों-विकारों से हमें विमुक्त करें ॥१६॥ |
| दिव्य लोक से प्राण रूप में धरती पर आने वाली ओषधियाँ आश्वासन देती हैं कि जिस प्राणी पर हमारा अनुग्रह होता है, वह आरोग्य लाभ से कृतार्थ होकर समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त नहीं होता ॥१७॥ |
| ओषधियों का अधिष्ठाता सोम है । वह सैकड़ों रोगों को नष्ट करने में सक्षम है । उन सबके बीच रहने वाली हे ओषधे !आप श्रेष्ठ गुणों से युक्त हैं । आप अभीष्ट सुख प्राप्ति एवं हृदय को शक्ति देने में पूर्ण सक्षम हैं ॥१८॥ |
| विभिन्न रूपों में धरती पर विद्यमान सोम सदृश विशिष्ट गुण-सम्पन्न विविध ओषधियाँ, बृहस्पति ( विशेषज्ञ वैद्य) द्वारा तैयार करके सेवनार्थ दिये जाने पर, इस पुरुष को ओजस्वी एवं वीर्यवान् बनाएँ ॥१९॥ |
| हे ओषधियो ! (रोगोपचार के लिए आपके मूलभाग को ग्रहण करने की आवश्यकता है अतएव) खदाई करने वाले पुरुष खनन दोष से सर्वथा वंचित रहें एवं जिस रोगी के उपचार हेतु आप का खनन किया जाता है, वह भी दोषमुक्त हो । हमारे स्त्री, पुत्रादि परिजन तथा गवादि पशु सभी आरोग्य-लाभ प्राप्त करें ॥२०॥ |
| जो ओषधियाँ सम्पर्क क्षेत्र में हैं या जो हमारे सम्पर्क क्षेत्र से दूरस्थ ( दुर्गम क्षेत्रों में) हैं। ऐसी वृक्ष-लतादि। विभिन्न रूपों में उगी हुईं सभी ओषधियाँ जो हमारी प्रार्थना सुनती हैं, पारस्परिक सहयोग से इस मनुष्य को शक्ति-ओज से परिपूर्ण करें ॥२१॥ |
| हे राजन् सोम ! चिकित्सा विशेषज्ञ जिस रोगी के रोग को दूर करने के लिए हमारे मूल, फल, पत्रादि को ग्रहण करते हैं, उसको हम आरोग्य प्रदान करती हैं, ऐसा अपने स्वामी सोम से ओषधियाँ कहती हैं ॥२२॥ |
| हे ओषधे (सोमवल्ली) ! आप उत्तम हैं। सभी वृक्ष आपसे कनिष्ठ हैं । जो हमारा विनाश करना चाहें, वे भी हमारे वशीभूत रहें ॥२३॥ |
सूक्त - ९८
| हे बृहस्पतिदेव ! आप हमारे निमित्त प्रत्येक देवता के समीप जाएँ । (उनसे कहें कि) आप मित्र हैं, वरुण हैं, पूषा हैं, वसुगणों एवं मरुद्गणों के साथ आप शन्तनु(राजा अथवा शान्ति के विस्तार) के निमित्त जलवृष्टि करें ॥१॥ |
| हे देवापि ! आपके समीप से कोई एक ज्ञानवान् और तीव्रगामी देवता दूत बनकर हमारे समीप आए । हे बृहस्पतिदेव ! आप सभी विषयों से विमुख होकर हमारी ओर आएँ । आपके सेवनार्थ हम तेजस्वी स्तोत्रों को समर्पित करते हैं ॥२॥ |
| हे बृहस्पतिदेव ! आप हमारे मुख में ऐसी तेजस्वी स्तोत्रयुक्त वाणी प्रदान करें, जो स्पष्ट एवं ओजस्वी हो। जिसके द्वारा हम शन्तनु (राजा या कल्याण के विस्तार हेतु ) जल वृष्टि को प्रेरित करें । आकाश से मधुररस युक्त वृष्टि प्रवेश करे ॥३॥ |
| हमें मधुरतायुक्त रस (वृष्टि) उपलब्ध हो । हे इन्द्रदेव ! आप रथ के ऊपर स्थापित प्रचुर ऐश्वर्य हमें प्रदान करें । हे देवापि (देवोन्मुख) ! आप इस यज्ञीय कार्य में आकर विराजमान हों। आप यथासमय देवों की अर्चना करें तथा हविष्यान्न देकर उन्हें सन्तुष्ट करें ॥४॥ |
| आर्टिषेण (जितेन्द्रिय) के पुत्र देवापि (देवों को पाने वाले ) जो स्तुतिज्ञाता हैं, वे यज्ञकृत्य हेतु विराजमान हैं। वे ऊपरी अन्तरिक्ष समुद्र से नीचे के भूलोक स्थित समुद्र में दिव्यतायुक्त वृष्टि जल प्रदान करें ॥५॥ |
| इस भमि स्थित समद्र पर अन्तरिक्षस्थ समद्र प्रदेश को देवों ने आवरण युक्त स्थापित किया है। राष्टिषण देवापि ने उस जल को गतिमान् किया। ऐसे में वे भूमि पर पर्जन्य रूप में बरसने लगते हैं ॥६॥ |
| जब शन्तनु के ऊपर कृपादृष्टि करके पुरोहित देवापि यज्ञकर्म के लिए समुद्यत हुए और वे देवप्रख्यात तथा जलोत्पादक (जल वर्षक) बृहस्पतिदेव की स्तुति करने लगे; उसी समय प्रशंसित होकर बृहस्पतिदेव ने उनके मन में स्तोत्रों (नये सूत्रों) को उदित किया ॥७॥ |
| हे अग्निदेव ! आष्टिषण के पुत्र देवापि नामक मानव ने पवित्रतायुक्त होकर स्तोत्रों से तथा उत्तम विधि से आपको प्रदीप्त किया है । सम्पूर्ण देवों का सहयोम प्राप्त करके आप जलवर्षक बादलों को प्रेरित करें ॥८॥ |
| हे अग्ने !पूर्वकालीन ऋषिगण स्तोत्रों के साथ आपके समीप प्रस्तुत हुए थे। हे असंख्यों द्वारा आवाहित अग्ने ! सभी यजमान अभी भी यज्ञों में स्तोत्रों द्वारा आपके समीप जाते हैं । रथों से सम्पन्न असंख्य ऐश्वर्य- सम्पदाएँ शन्तन् राजा ने भेंट स्वरूप प्रदान कीं । हे रोहित नामक अश्वयुक्त अग्ने ! आप हमारे यज्ञ में विराजमान हों ॥९॥ |
| वीर अग्निदेव ! रथों (संवाहकों ) सहित निन्यानवे हजार पदार्थ आहुतिरूप में आपको समर्पित हुए हैं। उनसे आप अपने विभिन्न स्वरूपों को संवर्धित करके प्रज्वलित करें । हमारे द्वारा प्रार्थित हुए आप दिव्य लोक से वृष्टि करें ॥१०॥ |
| " हे अग्निदेव ! नब्बे हजार आहुतियों में से जलवृष्टि करने वाले इन्द्रदेव की तुष्टि हेत उन्हें उनका भाग पा करें । देवयान मार्गों के ज्ञाता आप यथासमय याज्ञिक शन्तनु को देवताओं के बीच विराजमान करें ॥११॥ |
| हे अग्ने ! आप रिपुओं की दुर्गम नगरियों को विनष्ट करें तथा रोगों और राक्षसी शक्तियों का निवारण करें। इस विशाल अन्तरिक्षरूप सागर से और आकाश से इस पृथ्वी पर हमारे निमित्त अथाह जलराशि प्रदान करें ॥१२॥ |
सूक्त - ९९
| हे इन्द्रदेव ! आप ज्ञानसम्पन्न बनकर निरन्तर वर्द्धनशील, विलक्षण, प्रशंसनीय और कल्याणकारी सम्पदाएँ हमारी प्रगति के निमित्त देते हैं । इन्द्रदेव की पराक्रमी सामर्थ्य की वृद्धि के लिए हमें क्या करना पड़ेगा ? उनके लिए वृत्रसंहारक वज्रास्त्र की रचना की गयी है; उनके द्वारा संसार को जलवृष्टि से सिञ्चित किया जाता है ॥१॥ |
| वे इन्द्रदेव दीप्तिमान् विद्युत् नामक आयुध-सम्पन्न होकर यज्ञ में सामगान श्रवण हेतु आते हैं। वे बल-सम्पन्न होकर अनेक स्थानों पर अपना आधिपत्य स्थापित करते हैं । वे विमान में विराजमान मरुद्गणों के साथ शत्रुओं को पराजित करते हैं। आदित्यगणों के सप्तम भ्राता इन्द्रदेव का परित्याग करके कोई कार्य करना सम्भव नहीं ।॥२॥ |
| वे उत्तम वेग से जाकर समर भूमि में स्थित होते हैं । वे अविचलित रहकर सौ द्वारों से युक्त शत्रुपुरी में जो धन विद्यमान हैं, उसे अपनी सामर्थ्य से लेकर आते हैं तथा इन्द्रिय लिप्साओं में संलिप्त लोगों को विनष्ट करते हैं।॥३॥ |
| वे मेघों की ओर गतिमान् होकर और मेघों में भ्रमण करके उपजाऊ भूमि पर विपुल जलवृष्टि करते हैं। उन सभी जल सम्पन्न स्थानों पर अनेक लघुनदियाँ एकत्रित होकर घृत के समान जल को प्रवाहित करती हैं, जिनके न तो चरण हैं, न रथादि हैं और न ही द्रोणि (डोंगी) हैं ॥४॥ |
| वे इन्द्रदेव बिना प्रार्थना के मनोकामनाओं के पूरक, महिमामय और निन्दारहित हैं। वे स्वकीय स्थानों से रुद्रपुत्र मरुद्गणों के साथ यहाँ आगमन करें । ‘बम्र' के माता-पिता के कष्टों का निवारण हुआ; क्योंकि मैं (वम्र) ने शत्रुओं (विकारों) के ऐश्वर्य का हरण किया है तथा शत्रुओं को, कष्टपीड़ित किया । ॥५॥ |
| सर्वेश्वर इन्द्रदेव ने अति गर्जनशील दुष्ट दस्यओं का दमन किया था. उन्होंने छ: नेत्रों से यक्त और तीन सिरों से युक्त त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का हनन किया था। इन्द्रदेव की तेजस्विता से तेजस्वी होकर 'त्रित' नामक ग्रंष ने लोहे के समान तीक्ष्ण नाखूनों वाली अँगुलियों से वराह राक्षस का हनन किया था ॥६॥ |
| (अपने भक्तों पर आक्रमण होने पर) वे (इन्द्रदेव) अभिमान के साथ शरीर को विस्तारित करके शत्रु-संहार के लिए श्रेष्ठ मारक अस्त्र प्रदान करते हैं । वे मनुष्यों के सर्वोत्तम नायक हैं । दुष्टों के संहार के समय श्रेष्ठ कुलोत्पन्न इन्द्रदेव ने अनेक शत्रुनगरियों को ध्वस्त किया था ॥७॥ |
| वे मेघ समूह के समान अन्नादि की पुष्टि के निमित्त भूमि पर जल बरसाने वाले और हमारे गृहों का मार्ग प्रशस्त करने वाले हैं। वे अपने शरीर के सभी अंगों से सोम को गिराकर गरुड़ पक्षी की तरह, लोहे के समान तीक्ष्ण और सुदृढ़ अंगों से रिपुओं का संहार करते हैं ॥८॥ |
| वे इन्द्रदेव अपने पराक्रमशाली शस्त्रों से दुर्धर्ष शत्रुओं को दूर भगाते हैं। उन्होंने ‘कुत्स' के स्तोत्रों को सुनकर शुष्ण नामक राक्षस का संहार किया। उन्होंने स्तोता और क्रान्तदर्शी उशना के विद्रोहियों को वशीभूत किया था। वे उशना इन्द्रदेव के विस्तृत स्वरूप और इन्द्रदेव के अनुचर मरुद्गणों को जानते थे ॥९॥ |
| मनुष्यों के हितचिन्तक मरुद्गणों के साथ वास करने वाले इन्द्रदेव, स्तोतागणों के धनदाता हैं और सभी दुष्टों के संहारक हैं। वे वरुण के समान अपने तेज से सुन्दर और बलवान् हैं। ये कान्तिमान् और सदैव सबके संरक्षक रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने चार पदों से युक्त शत्रु का संहार किया ॥१०॥ |
| औशिज (उशिज के पुत्र अथवा सरलमार्ग से आगे बढ़ने वाले), ऋजिश्वा (इन्द्रियजयी), पिषु (गृहस्थ) के वृषभों के बाड़े (पारिवारिक मोह) को इस (प्रभु या इन्द्र) की स्तुतियों से विदीर्ण करता है । शत्रुओं के नगरों (विकार-समूहों) को नष्ट करता है ॥११॥ |
| हे इन्द्रदेव ! मैं वम्र इस प्रकार विपुल हवि देने की कामना से आपके पास आया हूँ । निकट आने वाले इस साधक का मंगल करें। इस उद्देश्य के लिए इस साधक को सभी प्रकार का अन्न, बल और आवास प्रदान करें ॥१२॥ |
सूक्त - १००
| हे वैभवशाली इन्द्रदेव ! आप अपने सदृश शक्तिशाली शत्रुसैनिकों का संहार करें । इस यज्ञ में स्तोत्र पाकर और सोमरस को पीकर आप हमारे संरक्षणार्थ सदैव प्रस्तुत रहें । देवों के साथ हमारे प्रख्यात यज्ञ की सवितादेव सुरक्षा करें । हम, सबकी उत्पादनकर्मी देवी अदिति की स्तुति करते हैं ॥१॥ |
| सबके पालन-पोषण कर्ता इन्द्रदेव को ऋतुओं के अनुसार यज्ञ भाग प्रदान करें । जो शुद्ध अन्न (जल) का उपभोग करते हैं और जिनके शीघ्रगमन के समय ध्वनि होती है, उन वायुदेव के निमित्त यज्ञीय भाग प्रदान करें, जो शुद्ध, पावन, पौष्टिक गौ के दूध का पान करते हैं। हम सर्वोत्पादनकर्वी अदिति की प्रार्थना करते हैं ॥२॥ |
| सर्वप्रेरक सवितादेवता हमारे सरल मार्ग के प्रेरणादायक और अभिषवकर्ता यजमान को परिपक्वतायुक्त अन्न प्रदान करें, जिससे हम देवताओं को संतुष्टि देकर उन्हें विभूषित कर सकें। सबकी कल्याणकर्नी देवी अदिति की हम स्तुति करते हैं । ॥३॥ |
| इन्द्रदेव हमसे नित्य ही प्रसन्न रहें । हमारे यज्ञ में राजा सोम हमारा स्तोत्रपाठ श्रवण करें, जिससे सबके मित्र स्वरूप इन्द्रदेव का प्रदत्त प्रियधन हमें उपलब्ध हो । सर्वप्रेरक देवी अदिति की हम प्रार्थना करते हैं ॥४॥ |
| इन्द्रदेव स्तुत्य सामर्थ्य से हमारे यज्ञरक्षक हैं। हे बृहस्पते !आप आयुष्य को बढ़ाने वाले हैं । वे श्रेष्ठ विचार शील, बुद्धिमान् यज्ञपालक हैं, वे हमें सुख प्रदान करें । उत्पादनक देवी अदिति की हम प्रार्थना करते हैं ॥५॥ |
| देवताओं की शक्ति को इन्द्रदेव ने ही विनिर्मित किया है । गृहों में विद्यमान अग्निदेव, देवताओं की प्रार्थना करते हैं और यज्ञ सम्पन्न करते हुए कार्यों को सम्पादित करते हैं। वे देवों के स्तुत्य, ज्ञानवान् , क्रान्तदशा और पूज्य हैं । वे यजनीय और रमणीय अग्निदेव हमारे अति समीप हैं । हम सर्वप्रेरक अदिति की प्रार्थना करते हैं ॥६॥ |
| हे वसुदेवगण ! आपकी परोक्ष दृष्टि में भी हमारे द्वारा कोई पाप नहीं बन पाया है । आपके समक्ष हमने कोई भी ऐसा दुष्कृत्य नहीं किया, जिससे हम देवताओं के क्रोध का भाजन बने । हे सर्वव्यापक देवगण ! हमें मरणधर्म देहों की प्राप्ति न हो । हम सर्वोत्पादक देवी अदिति की प्रार्थना करते हैं ॥७॥ |
| सबके प्रेरणादायक सवितादेव हमारे कष्टकारी रोगों का निवारण करें। उदार पर्वतों के अधिष्ठाता देव अतिविशाल पापरूपी अनर्थों का निवारण करें । जहाँ मधु के समान सोमरस प्रस्तुत करते हुए अभिषव-पाषाण की उचित रीति से स्तुति की जाती है, वहाँ हम सब कल्याणकारी देवी अदिति की प्रार्थना करते हैं ॥८॥ |
| हे वसुगण ! सोम के अभिषव में प्रयुक्त पाषाण ऊर्ध्वगामी हो । आप हमारे सभी अप्रकट शत्रुओं ( पापों) का निवारण करें । वे सवितादेव हमारे पालनकर्ता, नमनीय और स्तुति योग्य हैं। सबकी उत्पादनकत्री देवी अदिति की हम सभी स्तुति करते हैं ॥९॥ |
| हे गौओ ! आप गोचर भूक्षेत्र में विचरण करती हुईं घास द्वारा समृद्ध हों और पौष्टिक दूधरूपी इस प्रदान करें । जो यज्ञवेदी और गौशाला में घासादि स्थित है, उसका भी सेवन करें । आपका दूध सोमरस की ओषधियों के समान ही हमारे लिए पुष्टिप्रद हो । हम सभी सर्वप्रेरक देवी अदिति की प्रार्थना करते हैं ॥१०॥ |
| सम्पर्धा कर्मों के पर्तिकर्ता, सबके प्रशंसनीय और कालगति के अनुसार सबको जीर्ण-शीर्ण करने वाले इन्द्रदेव सोमरस अभिपवकर्ताओं के संरक्षक और अति प्रशंसनीय हैं। उनके पान के निमित्त ही सोम कलश पूर्ण (भरे) रहते हैं। हम सर्वप्रेरक देवी अदिति की प्रार्थना करते हैं ॥११॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपका प्रकाश विलक्षण है। आप हमारे कर्मों के पूर्तिकर्ता और सबके साध्य हैं। आपकी अभिलाषाएँ स्तोतः यजमानों की मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली और किसी भी दबाव से रहित हैं। जिस प्रकार दुवस्यु ऋषि अतिसरल रस्सी द्वारा गौ के अग्रिम भाग को शीघ्रतापूर्वक खींचते हैं, उसी प्रकार हम आपकी 'ओर आकर्षित होते हैं ॥१२॥ |
सूक्त - १०१
| हे मित्रो (ऋत्विजो) ! आप एकाग्रचित्त होकर, एक साथ मिलकर, एक स्थान पर निवास करते हुए अग्नि को । प्रदीप्त करें । हम इन्द्रदेव के साथ दधिक्रा, अग्नि और देवी उषा को आपकी सुरक्षा के लिए आवाहित करते हैं ॥१॥ |
| हे मित्रो (ऋत्जिो ) ! आप आनन्ददायी स्तोत्रों का उच्चारण करें । श्रेष्ठ कर्मों को विस्तृत करें । हलदण्ड रूपी नौका ही पार उतारने वाली है, उसकी रचना करें । अनेक अस्त्र-शस्त्रों को भलीप्रकार से प्रचुर मात्रा में विनिर्मित करें। इस प्रकार आप सत्कर्म रूपी यज्ञ का अनुष्ठान सम्पन्न करें ॥२॥ |
| हे ऋत्विजो (कृषक जनो) ! हल आदि कृषि उपकरणों को व्यवस्थित करके बैलों के कंधों पर जुओं को रखो तथा खेत की जुताई करो । तैयार किये गये खेत में बीजों का वपन करो और कृषि-विज्ञान के अन्तर्गत फसलों की अनेक प्रजातियाँ श्रेष्ठ विधि से तैयार करो, जिससे शीघ्र काटने योग्य पका हुआ अन्न उपलब्ध हो सके । ॥३॥ |
| द्रष्टा (क्रान्तदर्शी) हलों को योजित करते हैं । युगों (जुओं या काल-समय) को पृथक्-पृथक् (भिन्न-भिन्न प्रकार) तैयार करते हैं। बुद्धि-सम्पन्न व्यक्ति देवों के लिए श्रेष्ठ मन से स्तवन करते हैं ॥४॥ |
| हे मित्रो ! गौ आदि पशुओं के जल पीने के लिये पर्याप्त स्थलों का निर्माण करो । रस्सियों को परस्पर योजित करो। हम श्रेष्ठ जल स्रोतों से युक्त, उत्तम रीति से खेतों को सींचने में सक्षम, अजस्र स्रोत वाले कुएँ से जल लेकर सिंचाई करते हैं ॥५॥ |
| श्रेष्ठ पान करने योग्य जल-स्थान से सशोभित, उत्तम रज्जु से युक्त, श्रेष्ठ विधि से सेचन कार्य करने योग्य, अक्षय जल भण्डारयुक्त कुएँ से हम सिंचाई का कार्य सम्पन्न करते हैं ॥६॥ |
| हे कृषकगण ! अश्वों ( बैलों ) को घास-जलादि से संतुष्ट करो । खेतों में रखे गये हितकारी धान्य को उपलब्ध करो । सुगमता से धान्य ले जाने वाले उत्तम रथ को विनिर्मित करो। पशुओं का यह जल से परिपूर्ण जलपात्र एक द्रोण (३२ सेर) है । इसमें पत्थर से बनाया गया चक्र स्थित है । मनष्यों के योग्य जलपात्र कप की आकृति का बनेगा, इसे जल से पूर्ण करो ॥७॥ |
| हे मित्रो ! गोशालाओं को भलीप्रकार बनाओ । वह स्थान निश्चित ही मनुष्यों के लिये जलपान हेतु उपयोगी है। अनेक विशालकाय कवचों को तैयार करो । शत्रुओं से सुरक्षित, लोहे से बनी हुई, अस्त्रशस्त्रादि से सुसज्जित, सुदृढ़ नगरियों का निर्माण करो । तुम्हारे चमसपात्र छिद्ररहित हों, जिससे उनका जल अनावश्यक नष्ट न हो । ॥८॥ |
| हे देवो ! हम यज्ञ को धारण करने वाली बुद्धि को आपकी ओर प्रेरित करते हैं। यजनीय, तेजस्वी और सम्माननीय बुद्धि को आप यज्ञ स्थल में प्रतिष्ठित करें। वह हमारी अभिलाषाओं की पूर्ति में उसी प्रकार सहायक हो, जिस प्रकार घास खाकर गौएँ सहस्र धाराओं से युक्त दूध देती हैं ॥९॥ |
| हे अध्वर्युगण ! इस काष्ठ पात्र में स्थित हरितवर्ण सोम को सिञ्चित करो । पाषाणमय कुठारों से पात्र तैयार करो । दस अँगुलियों से पात्र को वेष्टन करके ग्रहण करो । रथ के दोनों धुरों में वाहक पशुओं को नियोजित करो॥१०॥ |
| रथ के दोनों धुरों को ध्वनि से गुंजित करके बैल रथ को ऐसे खींचते हैं, मानो सोम को पात्र में स्थापित करते हैं । हे ऋत्विजो ! शकट को आधार स्थल पर भलीप्रकार स्थित करो, जिससे शकट आश्रयरहित न हो सके ॥११॥ |
| हे कर्मशील मनष्यो ! इन्द्रदेव श्रेष्ठ सुखों के दाता हैं। उन सुखदायक इन्द्रदेव को अपने अन्तरंग में धारण करो और अन्न, बल, ऐश्वर्यादि लाभ के लिए उन्हें प्रेरित करो। उनकी प्रार्थना करो तथा उनसे शान्ति प्राप्त करो। इस भूलोक में संरक्षण कष्टों के निवारण के लिए तथा सोमपान के निमित्त अदिति पुत्र इन्द्र का आवाहन करो ॥१२॥ |
सूक्त - १०२
| हे ऋषि मुद्गल ! आपका रथ जिस समय युद्ध भूमि में आश्रयविहीन हो, उस समय पराक्रमी इन्द्रदेव उसका संरक्षण करें । अनेकों द्वारा आवाहित हे इन्द्रदेव ! इस प्रख्यात संग्राम भूमि में ऐश्वर्य प्राप्ति के समय आप भली प्रकार हमें संरक्षित करें ॥१॥ |
| जिस समय संग्राम क्षेत्र में रथारूढ़ होकर ऋषि मुद्गल की पत्नी ने हजारों गौओं पर विजय प्राप्त की, उस समय उनके वस्त्र को वायु ने ऊपर की ओर उड़ाया । गौओं पर विजय प्राप्ति के समय वे सारथी बनीं । इन्द्र सेना नाम वाली वह, संग्राम के समय शत्रुओं के अधिकार क्षेत्र से गौओं को छुड़वाकर ले आईं ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप अनिष्टकारी और विध्वंसक शत्रुओं के ऊपर वज्रप्रहार करें । हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आप दास अथवा आर्य शत्रुओं द्वारा परोक्ष रूप से किये गये शस्त्रादि प्रयोग को निरस्त करें ॥३॥ |
| यह वृषभ जल से परिपूर्ण जलाशय के जल को आनन्दमग्न होकर ग्रहण करता है । अपने सींगों से मिट्टी के ढेर को खोदकर शत्रुओं पर हमला करता है । ऐश्वर्य की कामना से प्रेरित होकर वह वेगपूर्वक दोनों तीक्ष्ण सींगों को हिलाते हुए आक्रमण हेतु आगे बढ़ता है ॥४॥ |
| मनुष्यों ने वृषभ के समीप जाकर उसे ध्वनि करने के लिए प्रेरित किया, उसे युद्धभूमि में ले जाकर खड़ा किया गया। इससे संग्राम में ऋषि मुद्गल ने परिपुष्ट और श्रेष्ठ आहारादि में निपुण सैकड़ों-हजारों गौओं पर विजय प्राप्त की ॥५॥ |
| शत्रुओं की हिंसा के लिए युद्ध भूमि में वृषभ को रथ के साथ जोता गया । उसकी रस्सी को नियन्त्रित करने में समर्थ मुद्गलानी (षि मुद्गल की पत्नी) गर्जना करके उसे प्रोत्साहित करने लगीं । रथ में योजित उस वृषभ को स्थिर नहीं रखा गया, वह रथ को लेकर दौड़ पड़ा। सुसज्जित सेनाएँ मुद्गलानी के पीछे-पीछे चल पड़ीं ॥६॥ |
| ज्ञानवान् ऋषि मुद्गल ने रथ चक्र को अपने नियंत्रण में लिया । बड़ी कुशलता से वृषभ को रथ में रस्सी से बाँधकर योजित किया। इस प्रकार से इन्द्रदेव ने गौओं के स्वामी उस वृषभ को संरक्षित किया । तदनन्तर वह श्रेष्ठ वृषभ अतिवेगपूर्वक मार्ग पर अग्रसर हुआ ॥७॥ |
| चाबुक और आभूषण से युक्त वह वृषभ, चर्मरज्जु द्वारा रथाङ्ग को बाँधे हुए सुखपूर्वक विचरण करने लगा। उसने असंख्य लोगों को वाञ्छित ऐश्वर्य प्रदान किया और गौओं को जीतकर महान् शक्ति को धारण किया ॥८॥ |
| युद्ध भूमि के मध्य में गिरे हुए, संग्राम में वृषभ का साथ देने वाले काष्ठ निर्मित शस्त्र को देखो। जिसके द्वारा ऋषि मुद्गल ने सैकड़ों और हजारों गौओं पर विजय प्राप्त की ॥९॥ |
| किसी ने दूरस्थ अथवा समीपस्थ देश में कभी ऐसा देखा होगा? जो रथ को खींचने के लिए योजित किये जाते हैं, वही उसके संचालन के निमित्त रथ पर बिठाये जाते हैं। उनके लिए घास और जलादि नहीं लाया जाता है, तो भी यह रथ धुरे के भार को वहन करता है और स्वामी को विजयी बनाता है ॥१०॥ |
| परित्यक्ता स्त्री के समान मुद्गलानी ने शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अपने पति के धन को ग्रहण किया, मानो उन्होंने मेघ सदृश बाणों की वर्षा की हो। ऐसे सारथी द्वारा हम विजयी हों, हमें प्रचुर अन्न और धन की प्राप्ति हो ।॥११॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप सम्पूर्ण विश्व के नेत्ररूप है; जो नेत्रों से युक्त हैं, उनकी भी ज्योति आप ही हैं। आप शक्तिमान और अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। आप संग्राम क्षेत्र में दो अश्वों को रज्जु द्वारा एक साथ बाँध करके प्रेरित करते हुए विजयश्री उपलब्ध करते हैं ॥१२॥ |
सूक्त - १०३
| स्फूर्तिवान्, विकराल, वृषभ की तरह शत्रु को भयभीत करने वाले, दुष्ट-नाशक, शत्रुओं को रुलाने वाले, द्वेष करने वालों को क्षुब्ध करने वाले, आलस्यहीन वीर इन्द्रदेव सैकड़ों शत्रुओं को पराजित करके विजयी होते हैं ॥१॥ |
| हे योद्धाओ ! शत्रुओं को रुलाने वाले, आलस्यरहित, विजयी, निपुण, अविचल, बाणधारी इन्द्रदेव की सहायता से युद्ध जीतकर शत्रुओं को भगाओ ॥२॥ |
| वे इन्द्रदेव बाण और तलवारधारी योद्धाओं के सहयोग से शत्रुओं को वश में करते हैं । वे युद्ध में अतिकुशल, विजेता, सोम पीने वाले, बाहु-बल सम्पन्न, धनुर्धारी तथा शत्रु-संहारक हैं ॥३॥ |
| हे सर्वपालक इन्द्रदेव ! राक्षसों को मारते हुए, शत्रुओं को त्रास देकर उनकी सेना का ध्वंस करते हुए आप रथ से यहाँ आएँ । युद्ध में विजयी होकर हमारे रथों की रक्षा करते हुए आप आगे बढ़े ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! सबके बलों के ज्ञाता, उत्तम वीर, शत्रु के आक्रमण को सहने वाले, बलवान्, शत्रु-विजेता, उग्र, महावीर, शक्तिशाली होकर ही जन्म लेने वाले, गौ-पालक आप विजयी रथ पर प्रतिष्ठित हों ॥५॥ |
| हे योद्धाओ ! आप सब शत्रु-किलों के भेदक, गौ-पालक, वज्र जैसी भुजा वाले, शत्रु का विनाश करने वाले, विजेता इन्द्र के नेतृत्व में रहकर पराक्रम दिखाओ । हे मित्रो ! इन्द्रदेव के क्रोध करने पर शत्रुओं पर क्रोध करो ॥६॥ |
| बल से शत्रु-किलों को भेदने वाले, पराक्रमी, शत्रु पर दया न करने वाले, वीर, अनीति के प्रति क्रोध करने वाले, अविचल, शत्रु-विजेता, अद्वितीय योद्धा इन्द्रदेव हमारी सेना को संरक्षण प्रदान करें ॥७॥ |
| हमारी सेनाओं के नेतृत्वकर्ता इन्द्रदेव हों । बृहस्पति देव सबसे आगे जाएँ। दक्षिणा-यज्ञ संचालक सोम । भी आगे जाएँ । शत्रु-नाशक मरुद्गण विजयी देवों की सेना के आगे रहें ॥८॥ |
| बलशाली इन्द्रदेव, राजा वरुण, आदित्यों और मरुतों के तीक्ष्ण बल हमारे सहायक हों । शत्रु-नगरों के विध्वंसक, विशालमना और विजयी देवों का जयघोष गुंजायमान हो ॥९॥ |
| हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! आप हमारे शस्त्रधारी योद्धाओं को हर्ष तथा अश्वों को वेग प्रदान करें । सैनिकों के मन में उत्साह भरें । हे वृत्रहन्ता इन्द्रदेव ! विजयी होकर आने वाले हमारे रथों के शब्द गुञ्जित हों ॥१०॥ |
| युद्ध में हमारी सेनाओं को इन्द्रदेव सुरक्षा प्रदान करें। हमारे बाण शत्रुओं पर विजय पाने वाले हों । हमारे वीर विजयी हों । हे देवो ! युद्ध में हमें सुरक्षा प्रदान करें ॥११॥ |
| हे पाप-वृत्तियो ! हमसे दूर रहो। शत्रुओं के चित्त को विमोहित करो। उनके अंगों को जकड़ लो । शत्रुओं पर आक्रमण कर उनके हृदय में शोक-ज्वाला प्रदीप्त करो। हमारे शत्रुओं को गहन अन्धकार में डालकर अचेत कर दो ॥१२॥ |
| हे वीरो ! शत्रओं पर आक्रमण करके विजयी बनो । इन्द्रदेव आपको सुख और शान्ति प्रदान करें। आपकी भुजाएँ उग्र सामर्थ्य से युक्त हों, जिससे शत्रु आपको अपने अधिकार में न ले सकें ॥१३॥ |
सूक्त - १०४
| हे असंख्यों द्वारा आवाहित इन्द्रदेव ! आपके निमित्त सोमरस अभिषवित किया गया है । आप दोनों अश्वों के साथ हमारे यज्ञ में शीघ्रता से उपस्थित हों । प्रमुख स्तोताओं ने आपके लिए उत्तम स्तोत्रों का गान करते हुए यह सोम तैयार किया है । हे इन्द्रदेव ! आप आकर इस सोमरस को ग्रहण करें ॥१॥ |
| अश्वों के अधिपति हे इन्द्रदेव ! आप कर्मशील अध्वर्युओं द्वारा अभिषवित, जल में शोधित, इस यज्ञ में जाये गये सोमरस का पान करें। इससे अपनी उदरपूर्ति करें । हे प्रशंसनीय इन्द्रदेव ! पाषाणों द्वारा जिसका अभिषवण किया गया है, आप उसे पीकर उत्साहित होकर हमारी स्तुतियों को ग्रहण करें ॥२॥ |
| हरितवर्ण के अश्वाधिपति हे इन्द्र ! आपके लिए सोम अभिषवित किया गया है । सुख-ऐश्वर्यों के वर्षक आप यज्ञ की ओर सुनिश्चित रूप से आएँगे, ऐसा जानते हुए आपके पानार्थ सोम प्रस्तुत करते हैं । हे देव ! आप श्रेष्ठतम स्तोत्रों को ग्रहण करके आनन्दित हों । आप अनेक सत्कर्म सम्पादित करें तथा नानाविध स्तोत्रों से परितृप्त हों ॥३॥ |
| हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! उशि वंशज यज्ञ कर्म के विशेषज्ञ हैं। वे आपके आश्रित होकर आपके प्रभाव से अन्न और सन्तति लाभ प्राप्त करके यजमान के यज्ञगृह में रहने लगे। वे सभी आनन्द विभोर होकर आपकी प्रार्थना करने लगे ॥४॥ |
| अश्वाधिपति हे इन्द्रदेव ! आपके स्तोत्र शोभायुक्त हैं। आपका ऐश्वर्य अद्भुत है और आपकी कान्ति अति उज्ज्वल है । आपसे अपार वैभव पाकर प्रसन्न होते हुए स्तोताओं ने आपकी प्रार्थना की। उन्होंने अपने संरक्षण के साथ दूसरों के संरक्षण में भी सहयोग प्रदान किया है । ॥५॥ |
| हे अश्वसम्पन्न इन्द्रदेव ! आप अभिषवित किये गये सोमरस का पान करने के लिए अपने दोनों अश्वों के साथ सभी यज्ञों में पधारते हैं । हे इन्द्रदेव ! आप क्षमाशील और शक्तिशाली हैं, आपको ही यज्ञ उपलब्ध होते हैं । यज्ञीय विषयों के उत्तम ज्ञाता आप अक्षुण्ण कर्मफल के दाता हैं ॥६॥ |
| असीम शक्तियों के अधिपति, शत्रुओं के पराभवकर्ता, सोमपान में रस लेने वाले, ऐश्वर्यवान्, श्रेष्ठ स्तुतियुक्त और संग्राम से विमुख न होने वाले इन्द्रदेव को स्तोत्र वाणियाँ सुशोभित करती हैं। स्तोतागणों की अर्चनाएँ उनको ही महिमामण्डित करती हैं ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! तीव्र गतिशील गंगादि सप्त सरिताओं के द्वारा आपने शत्रुनगरियों को विनष्ट करके सागर को संवर्द्धित किया। आपने देवों और मानवों के हित के लिए निन्यानवे प्रवहमान नदियों के मार्गों को खोल दिया है।॥८॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने जीवनदायी जल (रस) को असुरों के आक्रमण से मुक्त किया । जल को लाने के लिए आप स्वयं ही प्रस्तुत हुए थे । आपने वृत्रासुर के संहार के निमित्त जो कार्य किये हैं, उनके द्वारा ही सबके जीवनदाता होकर सम्पूर्ण विश्व के शरीरों का पारेपोषण करते हैं ॥९॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप महान् योद्धा, क्रिया कुशल और श्रेष्ठ स्तवनीय हैं । वाणी प्रकट होकर आपकी ही अभ्यर्थना करती है । आप वृत्रनाशक और प्रकाश के उत्पादनकर्ता हैं । सामर्थ्यशाली आपने आक्रमण करके शत्रु सेनाओं को पराभूत किया ॥१०॥ |
| हम विशालकाय और ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं । युद्धकाल में अन्नादि का जिस समय वितरण होगा, उस समय वे ही मुख्यरूप से नेतृत्व करेंगे। अपने पक्ष के संरक्षणार्थ वे समरक्षेत्र में उग्रता को धारण करते हैं, रिपुओं का संहार करते हैं, वृत्रों को विनष्ट करते हैं और ऐश्वर्य-सम्पदा पर विजय प्राप्त करते हैं ॥११॥ |
सूक्त - १०५
| स्तुतियों से प्रसन्न होने वाले हे इन्द्रदेव ! जैसे नहरें निकालने के लिए जल रोका जाता है, उसी प्रकार तैयार किया हुआ सोमरस प्रदान करने के लिए आपको कब रोकें? ॥१॥ |
| जिनके दोनों अश्व भली प्रकार प्रशिक्षित, अनेक कार्यों के निर्वाहक, कुशल, अतिबलिष्ठ और सूर्य-चन्द्र तथा द्यावा-पृथिवी के समान महिमामय तेजसम्पन्न तथा सबको सुशोभित करने वाले हैं, वे सबके स्वामी इन्द्रदेव सब कुछ देने में सक्षम हैं ॥२॥ |
| भयकारक इन्द्रदेव मनुष्यों के समान श्रमशील होते हैं। उन्होंने समर्थ साधनों से सम्पन्न बनकर शभ कार्यों को बढ़ाया, पापों को पराभूत किया ॥३॥ |
| मनुष्यों द्वारा पूज्य इन्द्रदेव ने सम्पूर्ण ऐश्वर्यों को संगृहीत कर लिया। वे विभिन्न कार्यों को सम्पन्न करते हैं। और ध्वनि करने वाले दो अश्वों को गतिमान करते हैं ॥४॥ |
| केशों से युक्त और विशालकाय दोनों घोड़ों पर आरूढ़ होकर जो इन्द्रदेव अपनी शारीरिक पुष्टि के निमित्त प्रतिष्ठित होते हैं, वही सुदृढ़ दाढ़ों से युक्त होकर शत्रुओं को विनष्ट करते हैं । ॥५॥ |
| शक्ति से सम्पन्न, अतीव सुन्दर मरुद्गणों के साथ इन्द्रदेव यजमान द्वारा श्रेष्ठ रीति से स्तुति योग्य हैं। वे अन्तरिक्ष में निवास करते हैं। जिस प्रकार ऋभुदेवों ने अपने कौशल से रथ आदि की रचना की है, वैसे ही शूरवीर इन्द्रदेव ने अपनी सामर्थ्य से विभिन्न वीरोचित कार्यों को सम्पन्न किया है ॥६॥ |
| जो इन्द्रदेव हरितवर्ण के लम्बे केश वाले अश्वों से युक्त और सुन्दर हुनु वाले हैं, उन्होंने दुष्ट दस्युओं के संहार के लिए वज्र की रचना की । वह वज्र विलक्षण तेज एवं शक्ति से सम्पन्न है ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हमारे सम्पूर्ण दुष्कर्म रूपी पापों को विनष्ट करें । हम स्तुतियों के प्रभाव से उपासना रहित नास्तिकों को पराजित कर सकें। स्तोत्रों से रहित यज्ञ कर्म कभी भी आपको आनन्दित नहीं करते ॥८॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जिस समय आपकी त्रेताग्नि (ज्वालाएँ यज्ञस्थल में ऋत्विजों द्वारा प्रदीप्त हुईं, उस समय आप यजमानों के साथ प्रसन्न होकर सबको प्रेरित करके यशस्वी नाव पर आरूढ़ होते हैं ॥९॥ |
| हे इन्द्रदेव ! दुधारू गौएँ आपके कल्याण के निमित्त हों । जिस पात्र द्वारा आप मधु ले जाते हैं, वह दर्वि (पात्र विशेष) आपके लिए शुद्ध और कल्याणप्रद हो ॥१०॥ |
| हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! आपके निमित्त इस प्रकार से सुमित्र ने सैकड़ों स्तोत्रों का पाठ किया। दुर्मित्र ने भी आपकी स्तुति की । दस्यु वध के समय आपने कुत्सपुत्र दुर्मित्र और सुमित्र को संरक्षण प्रदान किया था ॥११॥ |
सूक्त - १०६
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों निश्चित ही हमारी आहुतियों और स्तोत्रों के आकांक्षी हैं। जिस प्रकार तन्तुकार वस्त्रों को फैलाते हैं, उसी प्रकार आप दोनों हमारी स्तुतियों को विस्तारित करते हैं । यजमान भली प्रकार आपकी स्तति करते हैं, जिससे कि आप दोनों एक साथ मिलकर आगमन करें । सूर्य-चन्द्र के समान आप दोनों खाद्य पदार्थों को कल्याणकारी बनाते हैं ॥१॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार दो बैल गोचर भूमि में हल को वहन करते हुए विचरते हैं, उसी प्रकार आप दोनों यज्ञकर्ता यजमान के समीप पहुँचते हैं। रथ में जोते गये दो अश्वों वृषों) के समान धन-दान के निमित्त आप स्तोताओं के समीप जाते हैं। दूतों के समान ही आप लोगों में कीर्तिवान् बनें । जैसे भैंसे जलाशय से दूर नहीं जाते, वैसे ही आप कभी हमसे दूर न हों ॥२॥ |
| जिस प्रकार पक्षी के दोनों पंख आपस में जुड़े रहते हैं, उसी प्रकार से आप दोनों भी परस्पर आबद्ध हैं। दो विलक्षण पशुओं के समान आप दोनों हमारे इस यज्ञ में उपस्थित हुए हैं । देवों के आकांक्षी याजकों की यज्ञाग्नि के समान आप दोनों दीप्तियुक्त हैं । सर्वत्र विचरण करने वाले दो पुरोहितों के समान आप दोनों अनेक स्थानों पर सम्मानित किये जाते हैं ॥३॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! माता-पिता द्वारा पुत्र के प्रति स्नेह के समान ही आप हमारे प्रति प्रीतियुक्त हों। आप दोनों अग्नि और सूर्य के समान दीप्तिमान् हों । राजा के समान शीघ्रतापूर्वक कार्यों को करने वाले हों । साधन सम्पन्न व्यक्ति के समान पालन-पोषण करने वाले हों । अन्नादि उपभोग्य सामग्री के सम्पादन के लिए प्रकाश सदृश हो ।आप दोनों शीघ्र गतिशील अश्वों के समान सुखपूर्वक इस यज्ञ में पधारें ॥४॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों दो वृषभों के समान स्वस्थ, सुन्दर और सुखकारी हों । मित्र और वरुण के समान परस्पर यथार्थदर्शी, सैकड़ों प्रकार के धन से युक्त तथा श्रेष्ठ कार्यों को करने वाले हों । बलशाली दो अश्वों के समान आप दोनों ऊँचे और बल सम्पन्न हों। आप सूर्य-चन्द्र के समान तेजस्वी, भेड़ों के समान अन्नादि का सेवन करके सुगठित अङ्ग- प्रत्यङ्गों से सम्पन्न हों ॥५॥ |
| हे अश्विनीकमारो ! आप मदमत्त हाथी के अवरोधक, अंकुश के समान शत्रुहन्ता, दुष्टों के संहारकर्ता, राजपुरुषों के समान हिंसक और विदारक हों । आप प्रजाओं के भरण-पोषण कर्ता, जल में उत्पन्न रत्नों के समान स्वच्छ, विजयशील, अतिबलशाली तथा प्रशंसनीय हों । आप दोनों हमारी वृद्ध, जीर्ण और मरणशील देह को अजर और स्वस्थ बनाएँ ॥६॥ |
| हे पराक्रमी अश्विनीकुमारो ! जैसे पैरों वाले व्यक्ति दूसरों को जल से पार उतारने में सहायक होते हैं, वैसे ही आप दोनों हमारी मरणधर्मा देह को संकटों से निवृत्त करके अभीष्ट उद्देश्य की ओर अग्रसर करें । बल सम्पन्न ऋभुओं के समान ही आपने भी वेगवान् सुदृढ़ रथ को प्राप्त किया हैं । वायु के समान तीव्र गतिशील होकर सर्वत्र संचरित होते हुए आप शत्रुओं की सम्पदा को लेकर हमारे पास आएँ ॥७॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! महाबलियों के समान आप अपने उदर में मधुर घृत धारण करें । आप धन के संरक्षक, शत्रुओं के वधकर्ता और अतिश्रेष्ठ आयुधों के धारणकर्ता हैं । आप दोनों पक्षियों के समान सहजता से सर्वत्र संचरण करने वाले तथा चन्द्रमा के समान आहलादकारी हैं । स्तुति प्रिय आप दोनों मन की इच्छाओं से विभूषित होकर यज्ञ में उपस्थित होते हैं l ॥८॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! श्रेष्ठ पुरुषों के समान आप दोनों गम्भीर स्थानों पर भी गौरव प्राप्त करते हैं । तैरने वाले पैरों के समान आप जल की गहनता का अनुभव करने वाले हैं। कानों के सदृश ही स्तोता की प्रार्थनाओं को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। यज्ञ के दो अङ्गों के समान आप दोनों हमारे इन विलक्षण कर्मों का सेवन करें ॥९॥ |
| जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु का संचय करनी हैं। वैसे ही आप गौ के स्तनों में मधुतुल्य दूध को संचरित करते हैं । जिस प्रकार श्रमिक कृषक श्रम करके पसीना बहाते हैं, वैसे ही आप भी ओस बिन्दुओं के रूप में जल सेचन करें । जैसे कृशकाय गौएँ गोचर भूमि में जाकर अपना आहार उपलब्ध करती हैं, वैसे ही आप दोनों भी यज्ञ में पधारकर हविष्यान्न रूपी आहार ग्रहण करें ॥१०॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! आप हमारे प्रार्थनायुक्त स्तोत्रों को बढ़ाएँ और हविष्ययुक्त अन्न हमें प्रदान करें । आप एक ही रथ पर आरूढ़ होकर हमारे स्तवनों को सुनने के लिए आगमन करें । भूतांश ऋषि ने इन स्तोत्रों का पाठ करके अश्विनीकुमारों की अभिलाषा को परिपूर्ण किया ॥११॥ |
सूक्त - १०७
| इन यजमान साधकों की यज्ञ-सिद्धि के लिए इन्द्रदेव के विस्तृत तेज का सूर्यरूप में प्रादुर्भाव हुआ तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् अन्धकार से मुक्त हुआ । पितरगणों द्वारा प्रदत्त सूर्यरूपी महान् ज्योति विराजमान हुई । दक्षिणा प्रदान करने अर्थात् यज्ञ के स'गपन का समय उपस्थित हुआ ॥१॥ |
| दानी मनुष्य स्वर्ग के उच्च पदों पर विराजमान हैं। जो अश्व (पराक्रम-शौर्य) का दान करते हैं, वे सूर्य के साथ सुशोभित होते है। जो सुवर्ण (धन) दाता हैं, वे अमरपद को प्राप्त करते हैं। हे सोम ! वस्त्रों (काया रक्षक साधनों) के दानकर्ता आपको उपलब्ध करते हैं तथा सभी दीर्घायुष्य को प्राप्त करते हैं ॥२॥ |
| देवताओं को श्रद्धा भावना के साथ प्रदत्त द्रव्यादि का दान पुण्यकर्मों की वृद्धि करने वाला होता है, यह देवपूजा का एक विशिष्ट अङ्ग है । यज्ञीय भावना से रहित व्यक्तियों के लिए यह पुण्य प्राप्त नहीं होता; क्योंकि दुराचारी लोग प्रार्थनाओं और हविष्यान्नादि से देवों को संतुष्ट नहीं करते । जो यजमान पवित्र भावना से दक्षिणा देते हैं तथा पापकर्मों से भय खाते हैं, वे देवताओं को आनन्दित करते हैं ॥३॥ |
| सैकड़ों मागों से प्रवाहित वायु के लिए, स्वर्ग को प्राप्त कराने वाले आदित्यगण के लिए, अन्य सभी मनुष्यों के लिए तथा कल्याणकारी देवी को हविष्यान्न अर्पित करने के लिए वे यजमान तत्पर रहते है। जो लोग देवों को संतुष्ट करते तथा यज्ञादि में अन्न , द्रव्यादि का दान देते हैं, वे सात होताओं की दक्षिणा पाने के पात्र होते हैं ॥४॥ |
| दानदाताओं को सर्वप्रथम आमन्त्रित किया जाता है, वे ही प्रधान माने जाते हैं । दक्षिणादाता, दानी प्रामाध्यक्ष सबके आगे-आगे गतिमान होते हैं। जो सर्वप्रथम मनुष्यों के बीच दक्षिणा प्रदान करते हैं, उन्हें ही हम सबके पालक राजा की संज्ञा देते हैं ॥५॥ |
| सर्वप्रथम दक्षिणादाता को तत्त्वज्ञानी और ब्रह्मा की संज्ञा दी जाती है। वही यज्ञाध्यक्ष सामगान कर्ता और वेदमंत्रों का स्तोता कहा जाता है। ऐसे दानी ही दीप्तिमान् शुद्ध पावन अग्नि के तीनों स्वरूपों के ज्ञाता होते हैं, जो सर्वप्रथम अन्नादि की दक्षिणा देकर सबको संतुष्टि प्रदान करते हैं ॥६॥ |
| जो दक्षिणा के रूप में अश्व, गौ, स्वर्ण, रजत आदि मन को प्रसन्न करने वाला धन दान करते हैं, जो दक्षिणा के रूप में ही जीवन के लिए उपयोगी अन्न आदि का दान करते हैं, उनके लिए यह पुण्य फल सुरक्षा कवच के रूप में कष्ट कठिनाइयों से रक्षा करने वाला होता है ॥७॥ |
| उदारता पूर्वक दान देने वाले व्यक्ति कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते और न ही वे दुर्गति को प्राप्त करते हैं । वे दुःख-क्लेशों तथा पीड़ाओं से मुक्त रहते हैं। इस वसुन्धरा पर जो भी स्वर्गीय सुख है, वह सभी उनको दक्षिणा (दान-भावना) से ही प्राप्त होता है ॥८॥ |
| उदारदानी सर्वप्रथम दूध, घी प्रदान करने वाली श्रेष्ठ गौएँ प्राप्त करते हैं। वे सुन्दर वस्त्रों को धारण करने वाली नववधू को प्राप्त करते हैं । ओषधिरस प्राप्त करते हैं। धोखे से हमला करने वाले शत्रुओं पर भी दानदाता विजय प्राप्त करते हैं ॥९॥ |
| दक्षिणादाता को शीघ्र गतिवान् अश्व अलंकृत करके भेंट किये जाते हैं । वस्त्राभूषण से सुशोभित सेवक-सेविकाएँ उनको प्राप्त होते हैं । उनके आवास-गृह पुष्करिणी के समान निर्मल, फूलों से सुसज्जित और देवालयों के समान पवित्र होते हैं ॥१०॥ |
| उत्तम रीति से वहन करने वाले अश्व दाताओं को लेकर जाते हैं । दानियों के रथ भी श्रेष्ठ चक्रादि से विनिर्मित होते हैं । युद्धकाल में देवगण दाताओं का संरक्षण करते हैं । युद्धभूमि में दानदाता ही रिपुओं पर विजय प्राप्त करते हैं ॥११॥ |
सूक्त - १०८
| (पणियों का कथन) हे सरमा ! किस इच्छा से प्रेरित होकर तुम यहाँ उपस्थित हुई हो? यह मार्ग तो अति दुर्गम है। इस मार्ग से आते समय पीछे की ओर दृष्टि घुमाने पर आना सम्भव नहीं । हमारे पास ऐसी कौन सी वस्तु या शक्ति है, जिसके निमित्त तुम्हारा आना हुआ है ? ऐसी घनघोर रात्रि में किस प्रकार तुम्हारा आना हुआ? रस प्रवाहों (जल) को किस प्रकार पार किया ? ॥१॥ |
| (सरमा कहती है) हे पणियो ! मैं इन्द्रदेव की दूती बनकर यहाँ आई हैं । आप लोगों ने जिस महिमामय गोधन को एकत्रित किया है, उसे प्राप्त करने की मेरी अभिलाषा है । उन इन्द्रदेव के भय से जल ने मुझे आने दिया (उसे मैंने पार किया) इस प्रकार से रस प्रवाहों को पार करके मेरा आना हुआ है ॥२॥ |
| (पणियों का कथन है) हे सरमा ! तुम्हारे स्वामी इन्द्रदेव कैसे हैं? उनके पराक्रम किस प्रकार के हैं ? उनकी दृष्टि कैसी है? जिनकी दूती (संदेश वाहिका) बनकर तुम यहाँ पर इतनी दूर से चली आई हो? उन्हें हम मित्ररूप में स्वीकार करने को तैयार हैं। वहीं हमारी गौओं को लेकर उनके संरक्षक बने ॥३॥ |
| (सरमा कहती हैं) जिन इन्द्रदेव की संदेश वाहिका के रूप में मेरा अतिदूर से आगमन हुआ है, वे अपराजेय हैं। वे ही सबको पराभूत करने में सक्षम हैं। तीव्र प्रवाह वाली गहरी नदियाँ भी उनके वेग को रोकने में सक्षम नहीं । हे पणियो ! मेरे स्वामी इन्द्रदेव निश्चित ही आप को मारकर सुला देंगे ॥४॥ |
| ( पणि कहते हैं) हे सौभाग्यवती सरमा ! तुम द्युलोक की अन्तिम सीमा से यहाँ तक पहुँच कर इन गौओं की अभिलाषा करती हो । इन गौओं को कौन पराक्रमी युद्ध किए बिना छुड़ाकर ले जाने में समर्थ है? हमारे पास भी अनेक तीक्ष्ण आयुध हैं ॥५॥ |
| (सरमा कहती है) हे पणिओ ! आपकी बातें सैनिक गरिमा के अनुरूप नहीं हैं । आपके शरीर पापयुक्त होने से बाण चलाने में असक्षम, पराक्रमरहित हैं (पापवृत्ति देववृत्तियों के सामने निस्तेज हो जाती है), आप लोगों के गमन मार्ग देवताओं द्वारा अनुल्लंघनीय हों । हमें संदेह है कि बृहस्पतिदेव कहीं आगको पीड़ित न करें, यदि आप गौओं को देने के लिए तैयार नहीं हैं, तो संकट सामने है ॥६॥ |
| ( पणियों का कथन ) हे सरमा ! हमारी सम्पत्ति का यह कोष अद्रिबुध्ध (पर्वतों या जड़ बुद्धि) द्वारा संरक्षित है, जो गौओं और अन्य धन-सम्पदा से परिपूर्ण है । संरक्षण में समर्थ जो ये पणिगण है, वे इस निधि की सुरक्षा करते हैं । गौओं की ध्वनि को सुनकर तुम्हारा यहाँ पर आना निरर्थक ही हुआ है ॥७॥ |
| (सरमा कहती है) सोमपान से प्रोत्साहित होकर नवीन मार्गों से चलकर अङ्गिरस् और अयास्य ऋषि आपके यहाँ पहुँचेंगे और इन सभी गौओं के हिस्से करके ले जायेंगे । हे पणियो ! उस समय आपका अहंकार चूर-चूर हो जायेगा ॥८॥ |
| (पणियों का कथन) हे सरमा ! इस प्रकार देवों के बल से भयभीत होकर तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है, इसलिए हम भगिनी सदृश अपना परिजन ही मानते हैं। तुम यहाँ से सीधे इन्द्रदेव के पास नहीं लौटो। हे सौभाग्यवते ! हम तुमको ही गोधन का हिस्सा देने को तैयार हैं ॥९॥ |
| ( सरमा कहती हैं) हे पणिओ ! मैं भातृत्व भावना का सम्बन्ध नहीं मानती और न ही किसी की भगिनी बनना स्वीकार करती हैं। इन्द्रदेव और अति भयंकर अंगिरस् ही इस सम्बन्ध को जानते हैं। इस स्थान से जब मेरा पुनः इन्द्रादि के समीप जाना होगा, तब वे मेरी अभिलाषा के अनुरूप आपके ऊपर आक्रमण करेंगे। इसलिये हे पणिओ ! आप यहाँ से अतिदूर चले जाओ ॥१०॥ |
| हे पणिओ ! आप यहाँ से अतिदूर चले जाओ । गौएँ पीड़ित हैं। वे अपने तेज से अन्धकार का नाश करती दई इस पर्वत से ऊपर चली जाएँ । बृहस्पति, सोम, सोम अभिषवकर्ता, पाषाण, ऋषिगण और मेधावीजन गुप्तरात से छुपायी गईं इन गौओं के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त कर चुके हैं ॥११॥ |
सूक्त - १०९
| उन्होंने पहले ब्रह्म किल्बिष ( ब्रह्म विकार-प्रकृति अथवा रचना) को कहा - व्यक्त किया। उग्र तप से पहले दिव्य आप: (मूल सक्रिय तत्त्व) तथा सोम प्रकट हुए । दूर स्थित (सूर्य) जल तथा वायु तेज से युक्त हुए । ॥१॥ |
| संकोच का परित्याग करके राजा सोम ने पावन चरित्रवती वह ब्रह्मजाया, बृहस्पति को प्रदान की । मित्रावरुण देवों ने इस कार्य का अनुमोदन किया। तत्पश्चात् यज्ञ सम्पादक अग्निदेव हाथ से पकड़कर उसे आगे लेकर आएँ ।॥२॥ |
| हे बृहस्पतिदेव ! इसे हाथ से स्पर्श करना उचित ही है; क्योंकि यह ब्रह्मजाया है, ऐसा सभी देवों ने कहा। इन्हें तलाशने के लिए जो दूत भेजे गए थे, उनके प्रति इसका अनासक्ति भाव रहा (जुहू ब्रह्मनिष्ठों के अलावा अन्यों का साथ नहीं देती) । जैसे शक्तिशाली नरेश का राज्य सुरक्षित रहता है, वैसे ही इनकी चरित्रनिष्ठा अडिग रही ॥३॥ |
| जो सप्तर्षिगण तपश्चर्या में संलग्न थे, उनके द्वारा तथा चिरप्राचीन देवताओं ने इसके विषय में घोषणा की है। कि यह ब्राह्मण द्वारा ग्रहण की गई कन्या अति सामर्थ्यवान् है । परम व्योम में यह दुर्लभ शक्ति धारण करती है ॥४॥ |
| हे देवगण ! सर्वव्यापी बृहस्पतिदेव विरक्त होकर ब्रह्मचर्य नियम का निर्वाह करते हुए सर्वत्र विचरण करते हैं। वे देवताओं के साथ एकात्म होकर उनके अंग-अवयव रूप हैं । जिस प्रकार उन्होंने सर्वप्रथम सोम के हाथों जुहू को प्राप्त किया, वैसे ही इस समय भी बृहस्पतिदेव ने इसे प्राप्त किया ॥५॥ |
| देवताओं और मनुष्यों ने बार-बार बृहस्पतिदेव को उनकी पत्नी समर्पित की । सत्य स्वरूप राजाओं ने भी दुबारा शपथ पूर्वक (संकल्पपूर्वक) चरित्रनिष्ठ पत्नी को उन्हें प्रदान किया ॥६॥ |
| चरित्रनिष्ठ पत्नी को पुन: लाकर देवों ने बृहस्पतिदेव को दोष मुक्त किया। तत्पश्चात् पृथ्वी के सर्वोत्तम अन्न का विभाजन करके सभी सुखपूर्वक यज्ञीय उपासना करने लगे ॥७॥ |
सूक्त - ११०
| प्राणिमात्र के हितैषी हे मित्र अग्ने ! आप महान् गुण सम्पन्न होकर प्रज्वलित हों, कुशल याजकों द्वारा निर्धारित यज्ञ मंडप में देवगणों को आहूत करें तथा यजन करें। आप श्रेष्ठ चेतनायुक्त, विद्वान् तथा देवगणों के दूत हैं ॥१॥ |
| शरीर के रक्षक और श्रेष्ठ वाणी वाले हे अग्निदेव ! आप सत्यरूप यज्ञ के मार्गों को वाक्माधुर्य से सुसंगत करते हुए हवियों को ग्रहण करें । विचारपूर्वक ज्ञान और यज्ञ देवगणों के लिए ग्रहण कर उन तक पहुँचाएँ ॥२॥ |
| देवताओं को आहूत करने वाले हे अग्निदेव ! आप प्रार्थना करने योग्य वन्दनीय तथा वसुओं के समान प्रेम करने वाले हैं। आप देवताओं के होता के रूप में यहाँ पधार कर उनके लिए यज्ञ करें ॥३॥ |
| दिन के प्रारंभकाल में भूमि (या यज्ञभूमि) को ढकने वाली ये कुशाएँ बहुत ही उत्तम हैं । ये देवताओं तथा अदिति के निमित्त सुखपूर्वक आसीन होने के योग्य हैं। ये यज्ञवेदी को ढकने के लिए फैलायी जाती हैं ॥४॥ |
| जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पति का विकास करने वाली होती हैं, वैसे हो देवत्व सम्पन्न महान द्वार देविया (दिव्य द्वार ) रिक्त स्थान वाली, सबको आने-जाने के लिए मार्ग देने वाली तथा देवगणों को सगमता से प्राप्त होने वाली हों ॥५॥ |
| उषा और रात्रि देवियाँ मनुष्यों के लिए विभिन्न प्रकार के सुख प्रकट करें । वे यज्ञस्थल पर आकर प्रतिष्ठित हों; क्योंकि वे यज्ञभाग की अधिकारिणी ( स्वामिनी ) हैं । वे दोनों दिव्यलोक वासिनी अति गुणवती , श्रेष्ठ आभूषणादि से शोभायुक्त, उज्ज्वल, तेजस्वी स्वरूप वाली तथा सौन्दर्य को धारण करने वाली हैं ॥६॥ |
| दिव्य गुणों से युक्त होता, अग्निदेव और आदित्यगण सर्वश्रेष्ठ वेदमन्त्रों के ज्ञाता तथा मनुष्यों के लिए यज्ञ की रचना करने वाले हैं। वे देवपूजन के निमित्त यज्ञीय अनुष्ठानों के प्रेरक, कर्मकुशल, स्तुतिकर्ता तथा पूर्व दिशा के प्रकाश को भली प्रकार प्रकट करने वाले हैं ॥७॥ |
| देवी भारती का हमारे यज्ञ में शीघ्रता से आगमन हो। इस यज्ञ की वार्ता को स्मरण करके देवी इला मनुष्यों के समान यहाँ पदार्पण करें तथा देवी सरस्वती भी शीघ्र ही यहाँ पधारें । सत्कर्मशील ये तीनों देवियाँ इस यज्ञ में आकर सुखकारी आसन पर प्रतिष्ठित हों ॥८॥ |
| हे होताओ ! द्यावा-पृथिवी ( प्राणियों को ) जन्म देने वाली हैं। उन्हें त्वष्टादेव ने सुशोभित किया है । आप ज्ञानवान्, श्रेष्ठ कामनायुक्त तथा यज्ञशील हैं, अतएव आज इस यज्ञ में उन त्वष्टादेव की यथोचित अर्चना करें ॥९॥ |
| हे यप ( यज्ञ के स्तम्भ) ! आप स्वयं ही अपनी सामर्थ्य से देवों के निमित्त अन्नादि और अन्य यजनीय सामग्री श्रेष्ठ रीति से लाकर यथा समय प्रस्तुत करें । वनस्पतिदेव, शमितादेव और अग्निदेव मधुर घृतादि के साथ यजनीय हविष्यान्न का सेवन करें ॥१०॥ |
| प्रदीप्त होते ही अग्निदेव ने यज्ञीय भावना को प्रकट किया और देवताओं के अग्रणी दूत बने । इस यज्ञ के प्रमख स्थानों में होता की भावना के अनुरूप वेदमन्त्रों का उच्चारण हो । स्वाहा के साथ यज्ञाग्नि में समर्पित किये गये हविष्यान्न को देवगण ग्रहण करें ॥११॥ |
सूक्त - १११
| हे स्तोताओ ! जैसे-जैसे मनुष्यों की बुद्धियों का स्तर बढ़ता है, वैसे-वैसे आप लोग स्तुति पाठ करें। हम श्रेष्ठ स्तुतियों से इन्द्रदेव को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं । वे शूरवीर और ज्ञानवान् इन्द्रदेव स्तोत्रों के अभिप्राय को जानकर स्तोता साधकों से प्रीति करते हैं ॥१॥ |
| अन्तरिक्ष के धारणकर्ता इन्द्रदेव प्रकाशित होते हैं । तरुण गौ के गर्भ से उत्पन्न वृषभ जिस प्रकार गौओं के साथ संयुक्त होते हैं, वैसे ही इन्द्रदेव सर्वत्र व्याप्त होते हैं । गर्जना के साथ वे सबसे ऊपर विराजमान होते हैं और विस्तृत लोकों में भी संव्याप्त होते हैं ॥२॥ |
| इस स्तोत्र के लक्ष्य इन्द्रदेव ही हैं। वे ही विजयशील हैं और उन्होंने ही सूर्यदेव के मार्ग को प्रशस्त किया है । अविनाशी और विजयी इन्द्रदेव ने सेना को उत्पन्न किया तत्पश्चात् यज्ञ में प्रवेश किया। वे ही स्वर्ग के अधिपतिऔर गौओं के संरक्षक हैं । वे शाश्वत और सर्वाधिक सामर्थ्यशाली हैं ॥३॥ |
| अंगिराओं के द्वारा स्तुति किए जाने पर प्रसन्न होकर इन्द्र ने जल से पूर्ण मेघों को अपनी विस्तृत सामर्थ्य से विदीर्ण किया। उन्होंने जल राशि का निर्माण किया । द्युलोक में सबको धारण करने की शक्ति प्रदान की ॥४॥ |
| इन्द्रदेव द्युलोक और भूलोक दोनों के अधिपति हैं । वे समस्त यज्ञों के ज्ञाता हैं। वे जल प्रवाह में बाधक शुष्ण को विनष्ट करते हैं। वे सूर्यदेव के द्वारा व्यापक आकाश और धरती को आलोकित करते हैं। सर्वश्रेष्ठ धारक के रूप में मानों उन्होंने स्तम्भ द्वारा अन्तरिक्ष को ऊपर धारण किया हुआ है ॥५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप वृत्रहन्ता हैं, आपने ही वज्र के प्रहार से वृत्रासुर का संहार किया था । हे इन्द्रदेव ! जिस समय यज्ञ विरोधी वृत्रासुर आगे बढ़ रहा था, उस समय उसकी कुटिल माया को समर्थ वज्र द्वारा आपने ही विनष्ट किया। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! इसके पश्चात् आप अतिपराक्रम से सम्पन्न हुए ॥६॥ |
| जिस समय उषाएँ सूर्यदेव के साथ संयुक्त होती हैं, उस समय सूर्य किरणें विलक्षण वर्गों की शोभा प्राप्त करती हैं। पुन: जब आकाश में नक्षत्र दिखाई नहीं देते, तब सर्वत्रगामी सूर्यदेव की किरणों का मर्म कोई समझ नहीं पाते, यही सत्य है ॥७॥ |
| इन्द्रदेव के निर्देश से जो आप: तत्त्व या जल प्रवाहित हुआ था, वह प्रारम्भिक स्थिति में ही अतिदूर पहुंच गया था । हे आपः ! आपका प्रारम्भिक अगला भाग कहाँ है ? मुलभाग कहाँ पर है ? मध्यभाग कहाँ है ? तथाआपकी अन्तिम सीमा कहाँ पर है ? ॥८॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जिस समय वृत्रासुर द्वारा अवरुद्ध जल धाराओं को आपने विमुक्त किया। उस समय वे अति वेगपूर्वक सर्वत्र प्रवाहित हुई । जिस समय आपने अपनी अभिलाषा से जल को खोल दिया, उस समय वह स्वच्छ जल तीव वेग से प्रवाहित हुआ। एक स्थान पर स्थिर नहीं रह सका ॥९॥ |
| परस्पर साथ-साथ प्रवाहित होने वाली नदियाँ प्रेमासक्त स्त्रियों के समान समुद्र की ओर जाती हैं। शत्रुओं को परास्त करके उनकी नगरियों के विध्वंसक इन्द्रदेव ही इस सम्पूर्ण जलराशि के अधिपति हैं। हे इन्द्रदेव ! हमें पृथ्वी की नानाविध ऐश्वर्य-सम्पदा , मधुर स्तोत्र तथा उत्तम आवास उपलब्ध हों ॥१०॥ |
सूक्त - ११२
| हे इन्द्रदेव ! आप अभिषवित सोमरस का सेवन अपनी इच्छानुसार करें । जो सोम प्रभात वेला में प्रस्तत होता है, वह सर्वप्रथम आपके द्वारा ही ग्रहण करने योग्य है । हे शूरवीर इन्द्रदेव ! आप रिपुओं के संहार के लिए प्रोत्साहित हों । आपके पराक्रमी कर्मों का वर्णन हम वेद मन्त्रों से करते हैं ॥१॥ |
| हे इन्द्र ! आपका जो रथ मन की गति से भी अधिक तेज चलता है, उससे आप यहाँ सोमपान केला पधारें ।जिन अश्वों के सहयोग से आप आनन्दित होते हैं, वे हरित अश्व तीव्र वेग से हमारे यहाँ आगमन करें ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप स्वर्णिम सूर्य की तेजस्विता के समान श्रेष्ठतम स्वरूपों से अपने शरीर को सुशोभित करें । हम मित्रों के द्वारा आवाहन किए जाने पर आप देवताओं के साथ इस यज्ञ में प्रतिष्ठित हों तथा सोमपान से आनन्दित हों ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! सोमपान से प्रोत्साहित होने पर आपकी महिमा का जो गान होता है, उस महिमा ( सामर्थ्य ) को विस्तृत द्यावा-पृथिवी भी धारण करने में समर्थ नहीं । अपने प्रीतियुक्त अश्वों को रथ में जोतकर स्नेहयुक्त अन्नऔर सोमयुक्त यज्ञ सामग्री को लक्ष्य बना करके आप हमारे यज्ञ स्थल में पधारें ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जिनके सोमपान द्वारा आप आश्चर्यप्रद युद्धोपयोगी सामर्थ्य से हर्षित होकर बार-बार शत्रुओं का सहार करते हैं, वे यजमान ही आपके निमित्त अभीष्ट स्तोत्रों को प्रेरित करते हैं। आपके आनन्द के लिए ही सोमाभिषव किया गया है ॥५॥ |
| सैकड़ों यज्ञों के कर्ता हे इन्द्रदेव ! आपके चिरपुरातन जो सोमपात्र हैं, उनसे आप सोमपान करें । जिनकी सम्पूर्ण देवगण अभिलाषा करते हैं, वे पात्र प्रोत्साहक और मधुर सोमरस से परिपूर्ण हैं ॥६॥ |
| हे अभीष्ट वर्षक इन्द्रदेव ! हविष्यान्न समर्पित करते हुए यजमान विभिन्न प्रकार से आपकी स्तुतियाँ करते हैं तथा सोमपान के लिए आवाहित करते हैं। हमारे ये यज्ञकर्म आपके लिए ही मधुर सोमरस से युक्त हैं । इनसे आप भली प्रकार आनन्दित हों ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! चिरकाल से आपने जो पराक्रम पूर्ण प्रदर्शन किये, हम उनकी महिमा का वर्णन करते हैं । जल वर्षा के निमित्त आपने मेघों को वज्र से तोड़ा था तथा स्तोताओं के लिए गौओं ( किरणों या पोषक धाराओं) की प्राप्ति सुगम कर दी थी ॥८॥ |
| संघों के अधिपति हे इन्द्रदेव ! आप स्तोताओं के बीच में स्तोत्र श्रवण हेतु विराजमान हों । विद्वज्जन आपको सर्वोत्तम ज्ञानसम्पन्न मानते हैं। समीपस्थ अथवा दूरस्थ कोई भी अनुष्ठान आपके बिना करना सम्भव नहीं । है । वैभवशाली इन्द्रदेव ! आप हमारी स्तुतियों को विभिन्न रूपों में विस्तृत करें ॥९॥ |
| हे वैभवशाली इन्द्रदेव ! हम याचकों को आप तेजस्वी बनाएँ। धनाधिपति मित्र स्वरूप हे इन्द्रदेव ! आप मित्र भावना से युक्त हमारी स्तुतियों को समझें । युद्ध कौशल में प्रवीण हे इन्द्रदेव ! सत्य ही आपका बल है।आप हमें अप्राप्य ऐश्वर्य प्रदान करें ॥१०॥ |
सूक्त - ११३
| समस्त देवों के साथ चैतन्य द्यावा-पृथिवी भी इन्द्रदेव की सामर्थ्य की रक्षा करें । जब महान् कार्यों को सम्पन्न करके इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य से महिमा को प्राप्त करते हैं, तब वे सोमपान करके संवर्द्धित होते हैं ॥१॥ |
| विष्णुदेव ने मधुर (सोम) का अंश प्रेरित किया, इसके ओजस् से विकसित इन्द्रदेव की महिमा का अनेक प्रकार से स्तुतिगान किया गया। ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ने सहायक देवों के साथ एकत्रित होकर वृत्रासुर का संहारकरके सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त किया ॥२॥ |
| संग्राम के लिए आयुधों को धारण करने वाले इन्द्रदेव जब प्रतिरोध के लिए प्रस्तुत रिपु वृत्रासुर से युद्ध करते हैं, तब उनकी बढ़ी हुई ख्याति का सभी वर्णन करते हैं । हे पराक्रमी इन्द्रदेव ! इस समय आपकी महान सामर्थ्य और महिमा को सभी मरुद्गण बढ़ाते हैं ॥३॥ |
| जन्मकाल से ही रिपुओं को पीड़ित करने वाले वीर पराक्रमी इन्द्रदेव, संग्राम को दृष्टिगत रखकर अपने शौर्य को बढ़ाते हैं। उन्होंने मेघों को जल वृष्टि के लिए छिन्न-भिन्न किया तथा एक साथ प्रवाहित होने वाले जल को नीचे की ओर प्रवाहित किया। अपने श्रेष्ठ कर्मकौशल से व्यापक स्वर्ग को स्थिर किया ॥४॥ |
| इन्द्रदेव विशाल शत्रु-सेनाओं की ओर अचानक दौड़ पड़े। अपनी विशेष महत्ता से उन्होंने द्यलोक और भूलोक को नियन्त्रित किया । जो वज्रास्त्र दानशील मित्रावरुण को सुख प्रदान करने वाला है, उसी अस्त्र को इन्द्रदेव ने शत्रुओं के संहार के लिए विकराल रूप में धारण किया ॥५॥ |
| इन्द्रदेव विविध प्रकार से भयंकर गर्जना करते हुए शत्रुओं का संहार करते हैं। उनके पराक्रम का उद्घोष करते हुए जल प्रवाहित हुआ। बलशाली वृत्रासुर ने अन्धकार से घेरकर जल को रोक रखा था; परन्तु महान् तेजस्वी इन्द्रदेव ने अपनी सामर्थ्य से वृत्रासुर का संहार किया ॥६॥ |
| अपनी-अपनी सामर्थ्य एवं वीरता का प्रदर्शन करते हुए इन्द्रदेव और वृत्रासुर क्रोधित होकर परस्पर युद्ध करने लगे। वृत्रासुर के संहार के साथ ही अतिभयंकर अन्धकार विनष्ट हो गया । इन्द्रदेव की महत्ता इस प्रकार की है कि वीरों की गणना के समय सर्वप्रथम उनके ही नाम का उच्चारण किया जाता है ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! वृत्रहनन के पश्चात् सभी याज्ञिक एवं स्तोता, सोम सहित स्तुतियों से आपकी सामर्थ्य को संवर्धित करते हैं । इन्द्रदेव के वज्र प्रहार से प्रताड़ित दुर्द्धर्ष वृत्रासुर के विनष्ट हो जाने पर लोगों ने प्रसन्नतापूर्वक उसी प्रकार अन्न ग्रहण किया, जिस प्रकार अग्निदेव हविष्यान्न ग्रहण करते हैं ॥८॥ |
| हे स्तोताओ ! इन्द्रदेव ने मित्रभाव से श्रेष्ठ कार्य सम्पादित किये हैं , उनकी स्तुति श्रेष्ठतम वाक्यों और बन्धुत्व भाव से युक्त वेदमंत्रों द्वारा करो । इन्द्रदेव ने भीति नरेश के लिए धुनि और चुमुरि नामक राक्षसों का संहार किया है । वे श्रद्धायुक्त मन से श्रेष्ठ स्तुतियों को सुनते हैं ॥९॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हमने स्तोत्र पाठ के समय विपुल सम्पत्ति और श्रेष्ठ अश्वों से युक्त ऐश्वर्य की आकांक्षा की थी, वे सभी हमें प्रदान करें। उन श्रेष्ठ ऐश्वर्यो अथवा स्तोत्रों से हम सभी अनिष्टों का निवारण करें। आज हम जिन स्तोत्रों का निर्माण कर रहे हैं, उन्हें आप प्रीतिपूर्वक वीकार करें ॥१०॥ |
सूक्त - ११४
| अग्निदेव और आदित्यदेवों ने चारों ओर आलोकित होकर तीनों लोकों को संव्याप्त किया। अन्तरिक्ष स्थित वायुदेव ने उनकी प्रसन्नता प्राप्त की । जिस समय सम्पूर्ण तेज से युक्त स्तुत्य सूर्यदेव के तेज को देवों ने उपलब्ध किया, तब उन्होंने तीनों लोकों के संरक्षण के लिए अन्तरिक्षीय जल की रचना की ॥१॥ |
| साधकगण पृथ्वी, तरिक्ष और द्यलोक में स्थित अग्नि, वायु और सूर्यदेव को हविष्यान्न समर्पित करते हुए उनकी उपासना करते हैं । कीर्तिवान् अग्निदेव का परिचय देवताओं को होता है। विद्वान् साधक, अग्निदेव की मूल उत्पत्ति के ज्ञाता हैं । परम गुह्य व्रतों के मूलकारण को भी वे जानते हैं ॥२॥ |
| एक यज्ञवेदिका चतुष्कोणों से युक्त है। उसका स्वरूप श्रेष्ठ और घृतादि से स्नेहमय है । वह श्रेष्ठ यज्ञ सामग्री रूपी वस्त्रों को धारण करती है। जिस पर दो पक्षी (यजमान और पुरोहित) विराजमान होते हैं। उस यज्ञ वेदिका में अग्नि आदि सभी देवशक्तियाँ अपने-अपने हविर्भाग को ग्रहण करती हैं ॥३॥ |
| एक (सोम, अग्नि या प्राण रूप) पक्षी ब्रह्माण्ड रूपी समुद्र में संचार करते हुए प्रविष्ट होता है । वही इस समस्त विश्व को विशिष्ट रूप में देखता है । उस प्राण वायु को उपासनादि करते हुए प्रखर बुद्धि से हम समीप से देखते हैं। उसका और मातृरूपा वाणी का मिलन होने की स्थिति में, भाता ने प्रेम पूर्वक उसका आस्वादन कियाऔर निश्चित ही वह भी माता के स्नेह से युक्त हुआ ॥४॥ |
| मेधावीजन, श्रेष्ठ पालनकर्ता, अद्वितीय परमेश्वर के सम्बन्ध में विभिन्न दृष्टिकोणों से कल्पना करते हैं । वे यज्ञों में नानाविध छन्दों का उच्चारण करते और द्वादश(उपांशु, अन्तर्यामादि) सोम पात्रों का निर्माण करते हैं ॥५॥ |
| मेधावी लोग चालीस प्रकार के सोमपात्रों को, बारह प्रकार के छन्दों में आबद्ध मंत्रों का उच्चारण करते हुए स्थापित करते हैं। इस प्रकार से वे विचारपूर्वक यज्ञानुष्ठान करके ऋक् और साम द्वारा यज्ञीय रथ को गतिमान् करते हैं ॥६॥ |
| यज्ञरूप परमेश्वर की चौदह महिमाएँ (भुवन) हैं। सप्तहोता स्तोत्रोच्चारण द्वारा यज्ञीय कार्य का सम्पादन करते हैं। उस विश्वव्यापी पवित्र यज्ञ-मार्ग का वर्णन करने में इस लोक में कौन समर्थ हैं, जिस सुमार्ग से देवगण भी सोमपान करते हैं? ॥७॥ |
| पन्द्रह हजार उक्थ मंत्र हैं । द्यावा-पृथिवी के सदृश वे उक्थ मंत्र भी विस्तृत महिमामय हैं । हजारों प्रकार की उनकी महान् सामर्थ्य है । जैसे स्तोत्र अनन्त हैं, वैसे ही वाणी की महिमा भी अपार है ॥८॥ |
| कौन ऐसे ज्ञानी हैं, जो सम्पूर्ण छन्द विद्या के भलीप्रकार से ज्ञाता हैं? मूल वाक्य रचना को किस ज्ञानी ने समझा है? जो सात होताओं के ऊपर आठवें ब्रह्मा हो सकें, ऐसे प्रमुख पुरुष कौन हैं? इन्द्रदेव के दो घोड़ों को किसने भलीप्रकार देखा व समझा है ? ॥९॥ |
| कुछ अश्व भूलोक की सीमा से अन्तरिक्ष तक विचरण करते हैं और कुछ रथ के धुरे में जुते हुए रहते हैं। इनकी थकावट को दूर करने के लिए देवगण तब आहार देते हैं, जब सारथी सूर्य रथ में विराजमान होते हैं ॥१०॥ |
सूक्त - ११५
| शिशु अवस्था से सीधे ही युवक (प्रखर) हो जाने वाले अग्निदेव का क्रम वड़ा अद्भुत है । वे उत्पन्न होने के बाद अपनी स्तनहीन दोनों माताओं (अरणियों या द्यावा-पृथिवी) के पास दूध पीने नहीं जाते, वरन् श्रेष्ठ दूतों की भूमिका निभाते हुए देवताओं के पास हवि पहुँचाते हैं ॥१॥ |
| जो सर्वश्रेष्ठ कर्म करने वाले और दातारूप हैं, यजमानों ने उनका ‘अग्नि' नाम निर्धारित किया है । वे अग्निदेव ज्वालारूपी दाँतों से वनों का भलीप्रकार भक्षण करते हैं। वे जुहू नामक उच्च पात्र में समर्पित हवि को उसी प्रकार ग्रहण करते हैं, जिस प्रकार हृष्ट-पुष्ट और समर्थ वृष, घासादि खाते हैं ॥२॥ |
| हे स्तोताओ ! वृक्षों में आश्रय पाने वाले पक्षी के समान अरणियों के आश्रय में रहने वाले तेजस्वी, अन्नदाता, ध्वनि करते हुए वनों के दहनकर्ता. जलयुक्त, ज्वालारूपी मुख से हवि के वहनकर्ता, तेजस्विता से महान् , महत्त्वपूर्ण कर्मों के निर्वाहक तथा सूर्य के समान मार्गों के प्रकाशक अग्निदेव की प्रार्थना करो ॥३॥ |
| हे अविनाशी अग्निदेव ! जिस समय आप दहन क्रिया करते हैं, उस समय वायुदेव आपके चारों ओर सचरण करते हैं । त्विग्गण गतिशील योद्धाओं की तरह यज्ञ करते हुए आपका स्तुतिगान करते हैं तथा आपको घेरकर उपस्थित होते हैं । तीनों सवनों में या तीनों लोकों में व्याप्त, बल-सम्पन्न आपको वे प्राप्त करते हैं ॥४॥ |
| अग्निदेव ही सर्वाधिक ध्वनि करने वाले तथा दूरस्थ और समीपस्थ शत्रुओं के विनाशक हैं । जो शब्द के साथ स्तोत्र पाठ करते हैं, उनके लिए अग्निदेव मित्रस्वरूप और संरक्षक हैं। अग्निदेव हमें अन्न और सुरक्षा प्रदान करें ॥५॥ |
| श्रेष्ठ पितृभावयुक्त, प्रचुर अन्न के दाता, विपुल सामर्थ्ययुक्त, सर्वोत्तम ज्ञाता, हे अग्ने ! आपकी स्तुति के लिए हम शीघ्रता से तत्पर हुए हैं। संकटकालीन स्थिति में महापराक्रमी सामर्थ्य से धनुष-बाण धारण करके, आप संरक्षण प्रदान करते हैं। ऐसे पूजनीय सर्वश्रेष्ठ दाता अग्निदेव को हम श्रेष्ठ यज्ञ-सामग्री समर्पित करते हैं ॥६॥ |
| यज्ञादि कर्मों में संलग्न, ज्ञानी मनुष्य अग्निदेव को शक्ति का पुत्र और ऐश्वर्यशाली कहकर पुकारते हैं । यज्ञीय सत्कर्मों के निर्वाहक मित्र के समान ही अग्निदेव के सान्निध्य में सन्तुष्टि प्राप्त करते हैं। वे अपने दिव्यतायुक्त यशस्वी तेज से शत्रुओं को पराभूत करते हैं ॥७॥ |
| हे बलपुत्र, सामर्थ्यवान् अग्निदेव ! इस प्रकार हम उपस्तुत ऋषि आपके लिए तेजस्वी स्तोत्रों का गान करते हैं । हम आपकी प्रार्थना करते हैं। आपकी कृपा दृष्टि से हम सुसन्तति और दीर्घायु को प्राप्त करें ॥८॥ |
| हे अग्निदेव ! वृष्टिहव्य नामक ऋषि के पुत्र उपस्तुत आदि द्रष्टा ऋषियों ने आपकी स्तुति-अर्चना की । आप उनकी और स्तोता विद्वानों की सुरक्षा करें । “वषट्-वषट्” मन्त्रोच्चारण करते हुए हाथ ऊपर करके हवि समर्पित करने वाले तथा 'नम:-नम:' कहकर स्तुति करने वाले स्तोताओं को आप संरक्षण प्रदान करें ॥९॥ |
सूक्त - ११६
| बलशालियों में अग्रणी हे इन्द्रदेव ! आप प्रचुर सामर्थ्य की प्राप्ति और वृत्रासुर के वध के लिए सोमपान करें । आप स्तुति किये जाने पर हमें अन्न और ऐश्वर्य प्रदान करने के लिये सोमपान करें। आप मधुतुल्य सोमरस पान से संतुष्ट होकर हमारी कामनाओं को पूर्ण करें ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव !आप श्रेष्ठ रीति से प्रस्तुत, अभिषवित हविरूप सोमरस के श्रेष्ठ भाग का पान करें । कल्याणकारी मन से आप आनन्दित हों तथा ऐश्वर्य और सौभाग्य प्रदान करने के लिए अग्रसर हों ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपको दिव्य सोम प्रोत्साहित करे । पृथ्वी पर मनुष्यों द्वारा सम्पादित यज्ञों में जो अभिषवित किया जाता है, वह भी आपको प्रशंसित करे । जिससे आप श्रेष्ठ ऐश्वर्यों को धारण करते हैं, वह भी आनन्दितकरे । जिससे आप शत्रुओं को विनष्ट करते हैं, वह सोमरस भी आप को हर्षित करे ॥३॥ |
| दोनों लोकों में संव्याप्त,सर्वत्रगामीऔर कामना-पूरक इन्द्र, चारों ओर से अभिषिञ्चित सोमरूपी आहार के लिए दोनों अश्वों सहित यहाँ आएँ। हे इन्द्रदेव ! आपके लिए मधुसदृश सोम, वृषभचर्म के ऊपर परिशोधित करके पात्र में परिपूर्ण रखा हुआ है, उस सोम का पान करके वृषभों के समान यज्ञीय शत्रुओं को विनष्ट करें ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप तीक्ष्ण शस्त्रों को प्रकाशित करते हुए राक्षसों के सुदृढ़ शरीरों को धराशायी करें । आप . पराक्रमी को हम उत्साहवर्द्धक सोमरस प्रदान करते हैं। सोमपान से प्राप्त सामर्थ्य द्वारा युद्ध में शत्रुओं पर प्रहारकरके आप उन्हें विनष्ट कर डालें ॥५॥ |
| हे समर्थ इन्द्रदेव ! आप हमें अन्न-धन प्रदान करें । अहंकारी दुष्ट शत्रुओं पर अपने असाधारण पराक्रम और धनुष-बाण का प्रयोग करें । हमारे लिए अनुकूल होकर हमें संवर्द्धित करें । शत्रुओं से पराभूत न होकर अपनी सामर्थ्य से शरीर को बढ़ाएँ ॥६॥ |
| हे वैभवशाली इन्द्रदेव ! इस यज्ञीय सामग्री को हम आपके लिए समर्पित करते हैं। हे सम्राट् इन्द्रदेव ! क्रोध रहित होकर आप उसे ग्रहण करें । हे धनाधिपति इन्द्रदेव ! आपके लिए ही यह सोम अभिषवित किया गया है । आपके लिए ही यह पुरोडाशादि खाद्य-सामग्री पकायी गई है । स्नेहपूर्वक प्रस्तुत किये गये खाद्य-पदार्थों का सेवन करें तथा मधुर सोमरस का पान करें ॥७॥ |
| हे इन्द्रदेव ! ये यज्ञीय पदार्थ आपकी ओर प्रेषित किये जाते हैं। जो खाद्य-पदार्थ और जो सोमरस प्रस्तुत किया गया है, उनका सेवन करें । हम अन्नादि प्रस्तुत करते हुए आपको आमन्त्रित करते हैं। आपके द्वारा यज्ञकर्ता यजमानों के मनोरथ पूर्ण हों ॥८॥ |
| इन्द्रदेव और अग्निदेव के लिए श्रेष्ठ स्तुतियों को हम उत्तम रीति से समर्पित करते हैं । जिस प्रकार नदी में नाव भेजते हैं, वैसे ही पावन पूजनीय मंत्रों से हम आपको प्रोत्साहित करते हैं। हम उन देवगणों की सेवा-अर्चना करते हैं, जो हमारे लिए धनदाता तथा हमारे शत्रुओं के संहारकर्ता हैं ॥९॥ |
सूक्त - ११७
| देवताओं ने जो क्षुधा ( भूख या तृष्णा) की रचना की है, वह कष्टकारिणी है । अन्न भक्षण करने वाले को भी मृत्यु से मुक्ति नहीं मिलती। दूसरे के प्रति दान देने वालों के धन की कभी क्षति नहीं होती । दूसरों के प्रति दान न देने वालों को कोई सुखी नहीं कर सकता ॥१॥ |
| जिस समय कोई भूख से पीड़ित मनुष्य, भिक्षा के भाव से उपस्थित होकर अन्न-याचना करता है, उस समय जो अन्नवान् होकर भी हृदय से निष्ठुर बनकर याचक के सामने ही भोजन ग्रहण करते हैं, ऐसे संकीर्ण वत्ति केलोगों को कोई सुखदाता नहीं मिलते अर्थात् वे आत्मिक सुख-सन्तोष से सदैव वञ्चित रहते हैं ॥२॥ |
| अन्न की अभिलाषा से किसी गरीब व्यक्ति की भिक्षा याचना पर जो अन्नदान करते हैं, वे ही सचमच दाता हैं। उन्हें सम्पूर्ण यज्ञों के फलों की प्राप्ति होती है तथा वे शत्रुओं के बीच में भी मित्रभाव को प्राप्त करते हैं ॥३॥ |
| अपने साथी के समीप आने पर जो मित्र होकर भी उस मित्र व्यक्ति को अन्नदान नहीं करते, ऐसे कृपण मनुष्य का परित्याग करके दूर जाना ही उचित है । उसका गृह, निवास योग्य नहीं है। ऐसे समय किसी श्रेष्ठ स्वामी के पास जाना ही श्रेयस्कर है ॥४॥ |
| समर्थ मनुष्य को चाहिए कि याचना भाव से आने वाले को निश्चय ही धनादि दान द्वारा संतुष्ट करें । ऐसे दाता को स्वर्गीय सुपथ प्राप्त होते हैं। ऊपर-नीचे परिभ्रमण करने वाले रथचक्र के समान ही धन-सम्पदा कभी स्थिर नहीं होती, वह एक दूसरे के पास आती-जाती रहती है । ॥५॥ |
| जिनके हृदय उदारतारहित ( संकीर्ण) हैं, उनका अन्न-धन पाना निरर्थक ही है । उनका अन्न मृत्यु के समान ही विषैला है, यही सच्चाई है । जो न तो देवों को हविष्यान्न अर्पित करते हैं, न बन्धु-बान्धवों को देते हैं, जो मात्र स्वयमेव खाते हैं। वे केवल पापान्न को ही ग्रहण करते हैं ॥६॥ |
| कृषि कार्य करते हुए, जो हल से भूमि को गहराई से जोतते हैं, वही कृषक अन्न-उत्पादन करते हैं। वही अपने मार्ग से जाकर अपने कर्मों द्वारा अपने स्वामी के लिए अन्न प्राप्त करते हैं। जैसे वेदज्ञ ब्राह्मण अंज्ञानी मनुष्यों से उत्तम हैं, उसी प्रकार दानी मनुष्य दान रहितों से सदैव श्रेष्ठ होते हैं ॥७॥ |
| जिनके पास धन-सम्पदा का एक भाग है, वे दो भाग सम्पदा की कामना करते हैं। दो भाग वाले तीन भाग वाले धनाढ्यों के पास जाते हैं। तीन भाग वाले चार भाग वाले के पास तथा चार भाग सम्पदा वाले इससे भी अधिक सम्पदा वाले के समीप गमन करते हैं । इस प्रकार ये धन-सम्पदा वालों की श्रृंखला बनी हुई है । अल्प सम्पदायुक्त, अपने से अधिक धनवान् बनने की आकांक्षा करते हैं ॥८॥ |
| हमारे दोनों हाथ एक जैसे होते हुए भी धारण क्षमता से समान नहीं होते । एक माता से जन्म लेने वाला गौओं की दध की मात्रा समान नहीं होती । दो जुड़वाँ भाई भी बल से एक समान नहीं होते । एक कुलका सन्तान होकर भी दोनों की दानभावना समान नहीं होती ॥९॥ |
सूक्त - ११८
| श्रेष्ठ व्रतशील हे अग्निदेव ! आप याजक मनुष्यों के बीच अपने निर्धारित स्थल पर प्रदीप्त होकर अन्धकार रूपी शत्रु का विनाश करें ॥१॥ |
| सुक् नामक यज्ञीय घृतपात्र आपके लिए समीप लाया गया है । हे अग्निदेव ! आप उत्तम रीति से समर्पित आहुतियों को पाकर ऊपर उठे और प्रज्वलित हों । ये घृताहुतियाँ आपके लिए समर्पित हैं ॥२॥ |
| आदर सहित आवाहन किये गये और स्तुति मंत्रों से स्तुत्य , ये अग्निदेव प्रदीप्त होकर प्रकाशित होते हैं।सम्पूर्ण देवताओं से पहले उन्हें ही खुक्-पात्र से घृतयुक्त आहुतियाँ समर्पित करते हैं ॥३॥ |
| जिस समय ये अग्निदेव घृतादि हविष्यान्न से संयुक्त होते हैं, उस समय स्तुति और आहुतियों से तृप्त होकर प्रचुर प्रकाश से प्रदीप्त होते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आप देवों के हविवाहक हैं । स्तोत्रों से स्तुति किये जाने पर आप प्रदीप्त होते हैं। सभी याजक आपका भावनापूर्वक आवाहन करते हैं ॥५॥ |
| हे मरणधर्मा मनुष्यो ! अग्निदेव अविनाशी, पराक्रमी ( दबाव रहित ), गृहपति हैं। घृतादि आहुतियों से उनकी अर्चना करें ॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! आप अपनी प्रखर-तेजस्विता से राक्षसी वृत्तियों का दहन करें। यज्ञ के संरक्षक बनकर आप दीप्तिमान् हों ॥७॥ |
| हे अग्निदेव ! आप अपने स्वाभाविक तेज से प्रदीप्त होकर राक्षसी शक्तियों को भस्मीभूत करें। आप निर्धारित स्थानों पर रहकर तेजस्विता को धारण करें ॥८॥ |
| हे अग्निदेव ! आप हवियों के वहनकर्ता, मनुष्यों में सर्वोत्तम यज्ञकर्ता तथा विलक्षण निवास स्थलों से युक्त - हैं। आपको स्तोत्रों द्वारा ( मंत्रोच्चारण करते हुए) प्रदीप्त किया जाता है ॥९॥ |
सूक्त - ११९
| मेरी ( इन्द्र की) हार्दिक इच्छा है कि मैं गौ, अश्वादि ( पोषण और शक्ति प्रवाहों ) का दान करू; क्योंकि मैं कई बार सोमरस का सेवन कर चुका हूँ ॥१॥ |
| जिस प्रकार अति वेगवान् वायु वृक्षों को कम्पायमान करती और ऊपर उठाती है, उसी प्रकार पान किया गया सोमरस कॅपाता है और प्रोत्साहित करता है। मैंने कई बार सोमरस का सेवन किया है ॥२॥ |
| जिस प्रकार शीघ्रगामी अश्व, रथ को ऊपर उठाकर ले जाते हैं, उसी प्रकार पान किया गया सोमरस मुझे उत्कर्ष प्रदान करता है । मैंने अनेक बार सोमरस का पान किया है ॥३॥ |
| जैसे गौ " हम्बा " शब्द करती हुई प्रिय बछड़े के पास जाती है, वैसे ही स्तोतागणों की स्तुतियाँ मेरी ओर आगमन करती हैं। मैंने कई बार सोमरस का पान किया है ॥४॥ |
| जैसे त्वष्टादेव (शिल्पी) रथ के ऊपरी भाग ( सारथी स्थान) को बनाते हैं, वैसे ही मैं स्तोताओं के हृदय में श्रद्धा उत्पन्न करता हूँ। मैंने अनेक बार सोमरस का पान किया है ॥५॥ |
| पञ्चजन सृष्टि ( पंचवर्णात्मक सृष्टि) मेरी दृष्टि से क्षणभर के लिए भी विलुप्त नहीं हो सकती; मैंने अनेक बार सोमरस का पान किया है ॥६॥ |
| द्यावा-पृथिवी दोनों मेरे एक पार्श्व की समता करने में सक्षम नहीं । मैंने अनेक बार सोमपान किया है ॥७॥ |
| मैंने अपनी महत्ता से द्युलोक और विस्तृत पृथ्वी को स्ववश में किया है। मैंने अनेक बार सोमपान किया है।॥८॥ |
| मर अन्दर इतनी सामर्थ्य है कि इस पृथ्वी को कहीं भी दूसरे स्थान पर ले जा सकता हैं। मैंने अनेक बार। सोमरस का पान किया है ॥९॥ |
| मैं (इन्द्र) इस धरा को अथवा अपने तेज से तप्त करने वाले सूर्य को यहाँ अथवा द्युलोक में जहाँ चाहूँ वहाँ विनष्ट कर सकता हूँ। मैंने अनेक बार सोमरस का पान किया है ॥१०॥ |
| मेरा एक भाग द्युलोक में विद्यमान है और दूसरा भाग नीचे पृथ्वी पर है। मैंने अनेक बार सोमपान किया है।॥११॥ |
| अन्तरिक्ष में उदय होने वाले सूर्य के समान मैं ( इन्द्र) महान् से महानतम हूँ। मैंने अनेक बार अमृतस्वरूप सोमरस का पान किया है ॥१२॥ |
| देवों के लिए हवि वहन करने वाला मैं यजमानों द्वारा स्तुप्त होकर हवि ग्रहण करके चलां जाता हूँ। मैंने अनेक वार सोमरस का पान किया है ॥१३॥ |
सूक्त - १२०
| संसार का कारणभूत ब्रह्म स्वयं ही सब लोकों में प्रकाश रूप में संव्याप्त हुआ, जिससे प्रचण्ड तेजस्वी बल से युक्त सूर्य का प्राकट्य हुआ। जिसके उदय होने मात्र से ( अज्ञान-अन्धकार रूपी) शत्रु नष्ट हो जाते हैं। उसे देखकर सभी प्राणी हर्षित हो उठते हैं ॥१॥ |
| अपनी सामर्थ्य से वृद्धि को प्राप्त हुए अनन्त शक्तियुक्त, दुष्टों के शत्रु इन्द्रदेव शत्रुओं के अन्त:करण में भय उत्पन्न करते हैं। वे सभी चर-अचर प्राणियों को संचालित करते हैं । ( ऐसे ) इन्द्रदेव की हम ( याजकगण ) सम्मिलित रूप से, एक साथ स्तुति करके उन्हें तथा स्वयं को आनन्दित करते हैं ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! सब यजमान आपके लिए ही अनुष्ठान करते हैं । जब यजमान विवाहोपरान्त दो या एक सन्तान के बाद तीन होते हैं, तो प्रिय लगने वाले ( सन्तान) को प्रिय ( धन या गुणों) से युक्त करें । बाद में इसे प्रिय संतान को पौत्रादि की मधुरता से युक्त करें ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप जिस समय सोमपान से आनन्दित होकर धन-सम्पदा पर विजय प्राप्त करते हैं, उस समय ज्ञानी स्तोतागण आपकी ही स्तुति करते हैं। हे अपराजेय इन्द्रदेव ! आप हमें तेजस्विता प्रदान करें , दुस्साहसी असुर कभी आपको पराभूत न कर सकें ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपके सहयोग से हम रणभूमि में दुष्ट शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं । युद्ध की इच्छा से प्रेरित अनेक शत्रुओं से हम भेंट करते हैं । आपके वज्रादि आयुधों को हम स्तोत्रों द्वारा प्रोत्साहित करते हैं। स्तुति मंत्रों से हम आपकी तेजस्विता को तीक्ष्ण करते हैं ॥५॥ |
| स्तुत्य, विभिन्न स्वरूपों वाले, दीप्तिमान् , सर्वेश्वर और सर्वश्रेष्ठ आत्मीय इन्द्रदेव की हम स्तुति करते हैं। वे अपनी सामर्थ्य से वृत्र, नमुचि, कुयव आदि सात राक्षसों के विनाशकर्ता तथा अनेक असुरों के पराभवकर्ता हैं।॥६॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप जिस यजमान के घर में हविरूप अन्न से परितृप्त होते हैं, उसे दिव्य और भौतिक सम्पदा प्रदान करते हैं । सम्पूर्ण प्राणियों के निर्माता, गतिशील द्युलोक और पृथ्वीलोक को आप ही सुस्थिर करते हैं। उस समय आपको अनेक कार्यों का निर्वाह करना पड़ता है ॥७॥ |
| अषयों में श्रेष्ठ और स्वर्गलोक के आकांक्षी बृहद्दिव ऋषि इन्द्रदेव को सुख प्रदान करने के लिए ही इन वैदिक मंत्रों का पाठ करते हैं। वे तेजस्वी, दीप्तिमान् इन्द्रदेव विशाल पर्वत( अवरोध) को हटाते हैं तथा शत्रुपुरियों के सभी द्वारों के उद्घाटक हैं । ॥८॥ |
| अथर्वा त्रप्रषि के पुत्र महाप्राज्ञ बृहद्दिव ने इन्द्रदेव के लिए अपनी बृहद् स्तुतियों का उच्चारण किया । माता सदृश भूमि पर उत्पन्न पवित्र नदियाँ, पारस्परिक भगिनी तुल्य स्नेह से जल प्रवाहित करती हैं तथा अन्नबल से लोगों का कल्याण करती हैं ॥९॥ |
सूक्त - १२१
| पहले ( आदिकाल में ) हिरण्यगर्भ सम्यक रूप से अवस्थित था। सभी उत्पत्तिशील पदार्थों का एक ही स्वामी परमात्मा है। वहीं इस पृथ्वी और धुलोक को भी धारण किये हुए है । ( वह जो भी है ?) हम हवि के द्वारा उसी की अर्चना का विधान करे ॥१॥ |
| जो परमात्मा आत्मज्ञान के प्रेरक और बलदाता है, जिनकी आज्ञा का पालन सम्पूर्ण मनुष्य और देवसमुदाय करता है। जिनको छत्रछाया अमृत स्वरूपिणी है तथा मृत्यु भी उसी के अधीन है। उन परमात्मा की हम श्रेष्ठ रीति से उपासना करे ॥२॥ |
| जो अपनी महान् सामर्थ्य से प्राणयुक्त (गतिशत) और देखने वाले सम्पूर्ण प्राणिसमुदाय के एक मात्र अधिपति हैं, जो इन द्विपद ( मनुष्यों) और चतुष्पद ( गवादि पशुओं) के स्वामी हैं। उन् सुखस्वरूप अद्वितीय परमेश्वर को हम श्रेष्ठ रीति से अर्चना करते हैं ॥३॥ |
| जिनकी महिमा से ये सभी हिमाच्छादित पर्वत प्रकट हुए हैं। जिनको महान् सामर्थ्य को जलपूर्ण नदियाँ गतिशील पृथ्वी, समुद्र, आकाशादि व्यक्त कर रहे हैं। सभी मुख्य दिशाएँ भुजाओं के समान जिनकी सामर्थ्य का संकेत कर रही हैं। उन्हीं अद्वितीय परमात्मा को हम सभी अर्चना करते हैं ॥४॥ |
| जिन्होंने इन ऊँचे अन्तरिक्ष और पृथ्वी को अपने-अपने निर्धारित स्थानों पर कुशलता पूर्वक स्थापित किया। है। जिन्होंने स्वर्गलोक को स्थिर किया है और सूर्य को अन्तरिक्ष में केन्द्रित किया है । जो अन्तरिक्ष में तेजस्विता अथवा रज की तरह अनन्त पिण्डों के रचयिता हैं, उन अद्वितीय परमात्मा की हम सभी उपासना करते हैं ॥५॥ |
| द्युलोक और पृथ्वी शब्दायमान होकर, लोगों के संरक्षण के लिए स्थिर और अति प्रकाशित होकर, जिन्हें महिमामय रूप में देखते हैं। जिनके आश्रय से सूर्यदेव उदित होकर अन्तरिक्ष में प्रकाशित होते हैं । उन सर्वप्रकाशक परमेश्वर की हम सभी प्रकार से अर्चना करते हैं ॥६॥ |
| सृष्टि के प्रारम्भ में बृहत् आप: ( मूल क्रियाशील तत्त्व) सम्पूर्ण विश्व को आच्छादित किये हुए था। उसने गर्भ धारण करके महान् (विस्तृत) अग्नि व आकाशादि सबको उत्पन्न किया। जिससे देवों में अद्वितीय प्राण की उत्पत्ति हुई, उन एक मात्र परमात्मा की हम सभी प्रकार से प्रार्थना करते हैं ॥७॥ |
| जिन परमेश्वर ने आप:( मूल क्रियाशील तत्त्व) से सृष्टि संरचना में दक्षता धारण करने वाले विराट् यज्ञ को उत्पन्न होते देखा, उस समय देवरूप में वही एक देव अवस्थित थे । हम उन्हीं के निमित्त हवि युक्त अर्चना करें ॥८॥ |
| जो सृष्टि के रचयिता, सत्यधर्म के पालक , जगत् के धारणकर्ता और स्वर्गलोक के निर्माता हैं । जो आह्लादकारी और प्रचुर मात्रा में आप: तत्त्व के उत्पादनकर्ता हैं, वे हमें हिंसित न करें । उन सुखस्वरूप परमेश्वर की हम भली-भाँति उपासना करते हैं ॥९॥ |
| हे प्रजापति ! आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी इन वर्तमान, भूत और भविष्यत् के सभी उत्पन्न पदार्थों को संव्याप्त करने में समर्थ नहीं । जिन विभूतियों की आकांक्षा करते हुए हम आपके प्रति हविष्यान्न अर्पित करते हैं, वे हमें प्राप्त हों । हम सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के अधिपति हों ॥१०॥ |
सूक्त - १२२
| सूर्य के समान अद्भुत, तेजस्वी, रमणीय, सुखकर, अतिथि के समान पूजनीय, विद्वेष शून्य, अग्निदेव की हुम अर्चना करते हैं । जो अग्निदेव सर्वपोषक दूध द्वारा संसार के धारणकर्ता और दुःख निवारक हैं, वे गौ और श्रेष्ठ बल हमें प्रदान करें। वे देवों के आवाहनकर्ता और गृहपति हैं ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! आप हर्षित होकर हमारे स्तोत्रों की कामना करें । हे श्रेष्ठ कर्मशील अग्निदेव ! आप समस्त लोकों के ज्ञाता हैं । घृताहुति ग्रहण करके आप स्तोताओं को सामगान की प्रेरणा दें । आपका अनुकरण करते हुए देवगण भी यज्ञ में आते हैं अर्थात् यजमान को यज्ञीय फल देते हैं ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! पृथ्वी आदि सप्तलोकों में संव्याप्त, अविनाशी रूप होकर आप उन दानशील, सत्कर्मशील यजमानों की सभी प्रकार की अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करें, जो पुरोडाशादि हवि समर्पित करते हैं । जो समिधाएँ समर्पित करके आपको संवर्धित करते हैं, उन्हें वीर सन्तति और श्रेष्ठ विवेक सम्मत सम्पदा प्रदान करें ॥३॥ |
| जो अग्निदेव यज्ञ के ध्वजरूप, सर्वश्रेष्ठ, सम्मुख विराजमान, बलिष्ठ, समस्त स्तोत्रों के श्रोता, तेजस्वी, अभिलषित फलों के दाता ( अभीष्ट फलदाता ) हविदाता यजमानों को धनादि से हर्षित करने वाले हैं, ऐसे सामर्थ्ययुक्त दिव्यगुणों से सम्पन्न अग्निदेव की हविष्यान्नादि समर्पित करके सात ऋत्विग्गण अर्चना करते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! आप देवों में सर्वोत्तम और अग्रणी, पूजनीय दूतरूप हैं। अमरत्व प्राप्ति के लिए आवाहित किये जाने पर आप हर्षित हों । मरुद्गण आपको सुशोभित करते हैं। भृगुवंशज ऋषि आपको यजमान के गृह मेंस्तोत्रों द्वारा विशिष्ट रूप में प्रज्वलित करते हैं ॥५॥ |
| हे अद्भुत कर्मशील अग्ने ! जो यजमान यज्ञीय सत्कर्मों में संलग्न रहते हैं, उनके लिए आप यज्ञस्वरूपिणी यथेष्ट दुग्धदात्री और विश्व पालनकर्मी गौ के रूप में यज्ञ फल प्रदान करें। आप प्रदीप्त होकर तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं। यज्ञ स्थल में सर्वत्र विराजमान होकर आप स्वयमेव सत्कर्मरूपी यज्ञ को सम्पादित कर रहे हैं।॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! उषाकालीन प्रकाशित होने की वेला में यजमान साधक आपको ही दूतस्वरूप मानकर यज्ञ सम्पादित करते हैं। देवगण भी आपको ही यजनीय मानकर अर्चना करते हैं और यज्ञ में घृताहुति अर्पण करके आपको ही संवर्धित करते हैं ॥७॥ |
| हे अग्निदेव ! यज्ञों में अनुष्ठानकर्ता और स्तोत्रकर्ता वसिष्ठ(वंशीय) ऋषि आप अन्न सम्पन्न ( बलिष्ठ) का ही आवाहन करते हैं। आप दानशील यजमानों के गृहों में ऐश्वर्य स्थापित करें। आप हमें कल्याणकारी संसाधनों से सदैव संरक्षित करें ॥८॥ |
सूक्त - १२३
| यह वेन ज्योति के जरायु ( गर्भ या आवरण) में स्थित तेजस् को विशिष्ट संदर्भ में प्रेरित करते हैं । अप्तत्त्व या जल के साथ सूर्य के संगम के समय, विप्रगण शिशु की तरह स्तुतियाँ करते हैं ॥१॥ |
| वेनदेव अन्तरिक्ष से दिव्य लहरों को प्रेरित करते हैं। आकाश में उस कान्तिवान् की पृष्ठभूमि स्पष्ट प्रकट होती है । अत ( सत्य या सनातन आकाश ) के शिखर पर वह प्रकाशित होता है । उसी के समान ( एक ही ) उत्पत्ति केन्द्र से प्रादुर्भूत (वेद वाणियाँ) उस प्रक्रिया की स्तुति ( अनुशंसा ) करती हैं ॥२॥ |
| पूर्व में वर्णित ( वेन) वत्स ( उत्पन्न सृष्टि घटकों ) की माता ( उत्पादक मातृसत्ता ) के साथ एक ही नीड़ (आवास) में स्थित होकर, ऋत के शिखर (दिव्याकाश) में मधुर अमृत प्रवाह को संचालित करते हैं । वेद वाणियाँ उसका वर्णन करती हैं ॥३॥ |
| इस महान् मृग ( गतिशील) के घोष ( अभिव्यक्ति ) का बोध करने वाले विद्वान् उसके स्वरूप को जानकर उसे व्यक्त करते हैं। ऋत मार्ग से गमनशील वह सिन्धु ( अन्तरिक्ष ) के अधिपति होते हैं। वह गन्धर्व ( किरणोंके धारणकर्ता) अमृत रूप प्रवाहों के ज्ञाता हैं ॥४॥ |
| जिस प्रकार पत्नी मन्द मुस्कान के साथ अपने प्रेमी ( पति) को यथोचित स्थान पर विराजमान करती है, ये ही परम व्योम में अप्सरा ( अप से उत्पन्न सजक प्रकृति ) ने वेन को धारण किया। वह अपने प्रिय(स्वाम) वेन के गृहों में संचरित होती है । वेन उसके प्रियतम होकर प्रकाशित क्षेत्र ( या मेघ) में विराजित होते हैं ॥५॥ |
| पक्षी की तरह आकाश में गतिशील, सुनहले पंखवाले, सबको पोषण देने वाले वरुण (वरणीय) के दूत हे वेनदेव ! आपको लोग हृदय से चाहते हैं। अग्नि के उत्पत्ति स्थल अन्तरिक्ष में आपको पक्षी की तरह विचरण करते हुए ( द्रष्टागण) देखते हैं ॥६॥ |
| किरणों ( वेदवाणियों) के धारणकर्ता वेनदेव ऊपर अन्तरिक्ष में स्थित रहते हैं। वे अपने अद्भुत शस्त्रों (विद्युत् आदि) को धारणकर सुन्दर रूप में शोभायमान होते हैं। वे सूर्य की भाँति प्रिय नामों ( वस्तुओं ) को उत्पन्न करते हैं ॥७॥ |
| वे विकसित होते द्रप्स ( प्रादुर्भूत मूल तत्त्व) को गिद्ध जैसी ( दूर-भेदक) दृष्टि से देखते हैं । जब वह समुद्र ( विशाल अन्तरिक्ष ) में पहुँचते हैं, तब भानु के समान शुभ्र तेज से चमकते हुए प्रिय रज ( उत्पादक तेजयुक्त द्रव) को उत्पन्न करते हैं ॥८॥ |
सूक्त - १२४
| हे अग्निदेव ! हमारे इस यज्ञ के पाँच नियामक ( पंचभूत या चार ऋत्विज् और पाँचवें यजमान ), तीन प्रकार के अनुष्ठान ( तीन सवन के यज्ञ अथवा सृजन, पोषण एवं परिवर्तन) तथा सप्त होता हैं । आप हमारे यज्ञ की ओर आगमन करें। आप ही हमारे हविवाहक और अग्रगामी दूतरूप हैं। आप चिरकाल से अन्धकारपूर्ण गुफा को प्रकाशित करें ॥१॥ |
| ('अग्निदेव की उक्ति ) दीप्तिहीन अव्यक्त स्थिति में रहते हुए मैं देवों की प्रार्थना से प्रकट होकर स्वयं ज्योतिर्मान होता हैं । देवताओं द्वारा श्रेष्ठ रीति से स्तुतिपूर्वक प्रदत्त हविर्भाग प्राप्त कर अमर देवत्व पद को प्राप्त करता हैं । जिस समय यज्ञ सकुशल पूर्ण होता है, उस समय मैं अव्यक्त स्वरूप में चला जाता हैं। अभिन्न सखा रूप सनातन आवास में रहता हूँ ॥२॥ |
| पृथ्वी के अतिरिक्त आकाश के गमनमार्ग पर चलने वाले सूर्य की गति के अनुसार मैं वसन्तादि भिन्न-भिन्न त्रतुओं में यज्ञ के अनेक स्थानों को बनाता हैं । पितृरूप देवों की सुख प्राप्ति के लिए मैं ( अग्नि) स्तवनों का गान करता हूँ। यज्ञभाव से रहित और अपवित्र स्थल को छोड़कर मैं यज्ञोचित स्थल की ओर जाता हूँ ॥३॥ |
| इस यज्ञस्थल में मैंने अनेकों वर्ष व्यतीत किये हैं। यहाँ इन्द्रदेव को वरण करते हुए अपने उत्पत्ति स्थल का त्याग करता हूँ। जब अग्नि, सोम और वरुणादि का पतन होता है, तब मैं ही प्रकट होकर उनका संरक्षण करता हूँ।॥४॥ |
| मेरे आगमन से सभी असुर सामर्थ्य-विहीन हो गये। हे वरुणदेव ! आप भी हमारी प्रार्थना करें , हे राजन् (प्रकाशदान परमात्मन्) ! सत्य से असत्य को पृथक् करके मेरे राष्ट्र ( प्रकाशित क्षेत्र) का आधिपत्य स्वीकार करें।॥५॥ |
| हे सोमदेव ! यह जो सुन्दर स्वर्ग है, यह अतिरमणीय है, यह जो प्रकाश और व्यापक अन्तरिक्ष है; इन सबको आप देखें । वृत्रासुर का संहार करने के लिए हम दोनों प्रादुर्भूत हुए हैं। आप यजनीय हैं, आपके लिए हम यजनीय पदार्थ समर्पित करते हैं ॥६॥ |
| क्रान्तदर्शी मित्रदेव ने अपनी कर्तृत्व सामर्थ्य से दिव्यलोक में तेज को स्थापित किया। वरुणदेव अत्यल्प प्रयास करके मेघों से जल का सृजन करते हैं । जलवृष्टि से परिपूर्ण नदियाँ स्त्रियों के द्वारा पति की सेवा के समान ही विश्व के हित संरक्षण में संलग्न हैं । वे पवित्र होकर प्रवाहित होती हुई वरुणदेव के तेज को धारण करती हैं ॥७॥ |
| जल वरुणदेव की अत्यन्त श्रेष्ठ सामर्थ्य को प्राप्त करता है । वह जल हविष्यान्न प्राप्त कर सभी को संतुष्ट करके प्रसन्नचित्त होते हुए वरुणदेव के समीप पहुँचता है । जिस प्रकार भयभीत प्रजा राजा का आश्रय ग्रहण करती है, वैसे ही जल वृत्रासुर से भयभीत होकर उससे दूर भागते हुए वरुणदेव का आश्रय ग्रहण करता है ॥८॥ |
| भयभीत जल के मित्र इन्द्रदेव या सूर्यदेव कहे जाते हैं। वे दिव्य गुणों से युक्त जल की मित्रता में स्थित होकर स्तुति-योग्य हैं। इन गुणों से युक्त इन्द्रदेव की मेधावी ऋषिगण विवेकपूर्वक अर्चना करते है ॥९॥ |
सूक्त - १२५
| ( वाग्देवी का कथन ) मैं वाग्देवी रुद्रगण एवं वसुगणों के साथ भ्रमण करती हूँ। मैं ही आदित्यगणों और ' विश्वेदेवों के साथ रहती हूँ। मित्रावरुण, इन्द्र, अग्नि तथा दोनों अश्विनीकुमार सभी को मैं ही धारण करती हूँ ॥१॥ |
| पाषाणों द्वारा पीसे गये सोम, त्वष्टा, पूषा और भग सभी मेरा ही आश्रय ग्रहण करते हैं। मेरे द्वारा ही हविष्यान्नादि उत्तम हवियों से देवों को परितृप्त करने वाले और सोमरस के अभिषवणकर्ता यजमानों को यज्ञ का अभीष्ट फलरूप धन प्रदान किया जाता है ॥२॥ |
| मैं वाग्देवी जगदीश्वरी और धन प्रदात्री हूँ। मैं ज्ञानवती एवं यज्ञोपयोगी देवों ( वस्तुओं ) में सर्वोत्तम हूँ । मेरा स्वरूप विभिन्न रूपों में विद्यमान है तथा मेरा आश्रय स्थान विस्तृत है । सभी देव विभिन्न प्रकार से मेरा ही प्रतिपादन करते हैं ॥३॥ |
| प्राणियों में जो जीवनीशक्ति (प्राण) है, दर्शन क्षमता है, ज्ञान-श्रवण सामर्थ्य है, अन्न भोग करने की सामर्थ्य है, वह सभी मुझ वाग्देवी के सहयोग से ही प्राप्त होती है । जो मेरी सामर्थ्य को नहीं जानते, वे विनष्ट हो जाते हैं । हे बुद्धिमान् मित्रो ! आप ध्यान दें, जो भी मेरे द्वारा कहा जा रहा है, वह श्रद्धा का विषय है ॥४॥ |
| देवगण और मनुष्यगण श्रद्धापूर्वक जिसका मनन करते हैं, वे सभी विचार सन्देश मेरे द्वारा ही प्रसारित किये जाते हैं। जिसके ऊपर मेरी कृपा-दृष्टि होती है, वे बलशाली स्तोता ऋषि अथवा श्रेष्ठ बुद्धिमान होते हैं ॥५॥ |
| जिस समय रुद्रदेव ब्रह्मद्रोही शत्रुओं का विध्वंस करने के लिए सर्चष्ट होते हैं, उस समय दुष्टों को पीडित करने वाले रुद्र के धनुष बाण का सन्धान मैं ही करती हूँ । मनुष्यों के हित के लिए मैं ही संग्राम करती हैं। मैं ही द्युलोक और पृथ्वीलोक दोनों को संव्याप्त करती हूँ ॥६॥ |
| जगत् के सर्वोच्च स्थान पर स्थित दिव्यलोक को मैंने ही प्रकट किया है । मेरा उत्पत्ति स्थल विराट् आकाश में अप्( मूल सृष्टि तत्त्व) में है, उसी स्थान से सम्पूर्ण विश्व को संव्याप्त करती हूँ । महान् अन्तरिक्ष को मैं अपनी उन्नत देह से स्पर्श करती हूँ ॥७॥ |
| समस्त लोकों को विनिर्मित करती हुई मैं वायु के समान सभी जगह संचरित होती हूँ। मेरी महिमा स्वर्गलोक और पृथ्वी से भी महान् है ॥८॥ |
सूक्त - १२६
| हे देवो ! संयुक्त होकर अर्यमा, मित्र और वरुणदेव विद्वेषियों से बचाकर जिन मनुष्यों को आगे बढ़ाते हैं, वे पापरहित होकर सदैव दुर्गति से दूर रहते हैं ॥१॥ |
| हे वरुण, मित्र और अर्यमा देवो ! जिस उपाय से आप मनुष्यों को पाप कर्मों से बचाते हैं और शत्रुओं से रक्षा करते हैं, उसके लिए ही हम आपसे प्रार्थना करते हैं ॥२॥ |
| हे मित्र, वरुण और अर्यमा देवो ! आप सुनिश्चित ही हमारा संरक्षण करेंगे । आप हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें । हमें संकटों से पार करें और शत्रुओं की पीड़ा से सुरक्षित करें ॥३॥ |
| वरुण, मित्र और अर्यमादि सभी देवगण सम्पूर्ण विश्व की श्रेष्ठ रीति से सुरक्षा करते हैं । श्रेष्ठ सत्कार योग्य हे देवो ! हम आपके अत्यन्त प्रीतियुक्त, श्रेष्ठ सुखों की छाया में रहें और दुष्ट शत्रुओं से संरक्षित हों ॥४॥ |
| अदिति पुत्र वरुण, मित्र और अर्यमा ये सभी देव हमें दुष्ट शत्रुओं से बचाएँ । हम शत्रुओं से परित्राण पाने और कल्याण लाभ हेतु मरुतों के साथ तेजस्वी रुद्र, इन्द्र और अग्निदेव का आवाहन करते हैं ॥५॥ |
| नेतृत्व क्षमताओं से सम्पन्न वरुण, मित्र और अर्यमा देव हमारे पापकर्मों को दूर करके हमें सुखकारी माग की ओर प्रेरित करें । मनुष्यों के स्वामी ये देव हमें पाप फलों से मुक्त करें और विकाररूपी शत्रुओं से बचाए ॥६॥ |
| वरुण, मित्र और अर्यमादि देवगणों से जिस सुख की प्राप्ति और संरक्षण के लिए हम प्रार्थना करें, ये अदिति । पुत्र उन सुखों की ओर हमें प्रेरित करें । वे सभी प्रकार का शत्रुनाशक बल हमें प्रदान करें, शत्रुओं से हमें बचाएँ ॥७॥ |
| संरक्षक और यज्ञ भाग के अधिकारी हे देवो ! जिस समय शुभ्र वर्ण गौओं के पैरों को बाँधा गया था, तब आपने ही उन्हें बन्धन मुक्त किया था। उसी प्रकार हमें भी पाप कर्मों से विमुक्त करें । हे अग्निदेव ! आप हमें दीर्घायु प्रदान करें ॥८॥ |
सूक्त - १२७
| अनेक भागों में विस्तृत होने वाली आगमन करती हुई नक्षत्ररूप नेत्रों से जगत् का अवलोकन करने वाली रात्रिदेवी सभी प्रकार के सौन्दर्य को धारण करती हैं ॥१॥ |
| अविनाशी रात्रि देवी सर्वप्रथम अन्तरिक्ष को तत्पश्चात् नीचे और ऊँचे प्रदेशों को आच्छादित करती हैं। वे गृह-नक्षत्रादि रूप तेजस्विता से अन्धकार को निवृत्त करती हैं ॥२॥ |
| आगमन करने वाली रात्रिदेवी भगिनी उषा को प्रतिष्ठित करती हैं। वे (उषा) अन्धकार को विनष्ट करती हैं।॥३॥ |
| जैसे पक्षी वृक्षों पर रहते हैं, वैसे ही जिसके आगमन पर हम घर में विश्राम करते हैं, वे रात्रिदेवी हमारे लिए कल्याणप्रद हों ॥४॥ |
| रात्रि में समस्त ग्रामीण मनुष्य सुखपूर्वक सोते हैं, पादचारी, गौ, अश्वादि पशु-पक्षी और शीघ्रगामी श्येन आदि पक्षी शान्त होकर सोते हैं ॥५॥ |
| हे निशादेवि ! वृक और वृकी को हमसे पृथक् करें , चोरों को भी हमसे दूर ले जाएँ । हमारे लिए आप सभी प्रकार से कल्याणप्रद हों ॥६॥ |
| रात्रि का अन्धकार स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है । हे उषा देवि ! जिस प्रकार आप स्तोताओं के ऋण को धन प्रदान करके विनष्ट करती हैं, वैसे ही इस अन्धकार को भी नष्ट करें ॥७॥ |
| हे आकाश कन्या ( रात्रि ) ! हम आपको दुधारू गौ के समान स्तोत्रों का गान करते हुए प्राप्त करें । आप विनम्र होकर स्तोत्रों के समान ही हवि को भी ग्रहण करें ॥८॥ |
सूक्त - १२८
| हे अग्निदेव ! संग्रामों या यज्ञों के समय हममें तेजस्विता जाग्रत् हो । आपको समिधाओं से प्रज्वलित करते हुए हम अपनी देह को परिपुष्ट करते हैं। हमारे लिए चारों दिशाएँ अवनत हों । आपक़ो स्वामी रूप में प्राप्त करके हम शत्रु सेनाओं पर विजय प्राप्त करें ॥१॥ |
| इन्द्रदेव के साथ मरुद्गण, विष्णु और अग्नि आदि सभी युद्धकाल में हमारा सहयोग करें। अन्तरिक्ष के समान विस्तृत लोक हमारे लिए प्रकाशमान हों । हमारे इन अभिलषित कार्यों में वायु अनुकूल होकर प्रवाहित हों।॥२॥ |
| श्रेष्ठ यज्ञादि कार्यों से प्रसन्न होकर सभी देवगण हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । हम देव शक्तियों का आवाहन करें । प्राचीनकाल में जिन्होंने देवों को आहुति समर्पित किया है, वे होतागण अनुकूल होकर देवों की अर्चना करें । हम शारीरिक दृष्टि से सुदृढ़ होकर वीर सुसन्ततियों से युक्त हों ॥३॥ |
| ऋत्विग्गण हमारी चरु पुरोडाशादि यज्ञ सामग्री को आहुतियों के रूप में देवताओं को समर्पित करें। हमारे मन के संकल्प पूर्ण हों । हम किसी भी पाप में संलिप्त न हों । हे विश्वेदेवो ! आप हमें आशीर्वचनं प्रदान करें ॥४॥ |
| हे षट देवियो ! (षटसम्पत्तियो) आप हमें प्रचर धन और बल प्रदान करें । हे देवो ! आप धनादि प्राप्ति के लिए पराक्रम करें, जिससे हमें ऐश्वर्य प्राप्त हो । हमारी सन्तति और शरीरों का अनिष्ट न हो । हे प्रकाशवान् सोम ! हम विद्वेषी शत्रुओं से कभी परास्त न हों ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! आप हमारे शत्रुओं के क्रोधित स्वभाव को दबाते हुए दर्द्धर्ष होकर हमारी सभी प्रकार से सुरक्षा करें । वे भयभीत होकर निरर्थक बातें करने वाले शत्रु पराङ्मुख होकर लौट जाएँ। इन शत्रओं के मन-मस्तिष्क भ्रमित हो जाएँ ॥६॥ |
| जो निर्माता के भी स्रष्टा हैं, जो सम्पूर्ण विश्व के अधिपति हैं, उन सर्वप्रेरक, पालनकर्ता और अहंकारी शत्रुओं के विजेता इन्द्रदेव की हम प्रार्थना करते हैं। अश्विनीकुमार, बृहस्पति और सभी प्रमुख देव इस यज्ञ का संरक्षण करें तथा यजमान को पापों से बचाएँ. ॥७॥ |
| सर्वव्यापक, पूजनीय, अनेक यजमानों के द्वारा बुलाये जाने वाले, विभिन्न स्थानों में वास करने वाले इन्द्रदेव इस यज्ञ में पधारकर हमें सुख प्रदान करें । हे हरित अश्वों के स्वामी इन्द्रदेव ! आप हमारी सन्ततियों को सुखी करें । हमारे प्रतिकूल न होकर हमें अनिष्टों से बचाएँ ॥८॥ |
| जो हमारे शत्रु हैं, वे पराभूत हों । हम उन्हें इन्द्राग्नि की सामर्थ्य से विनष्ट करते हैं । वसुगण, रुद्रगण और आदित्यगण ये सभी हमें ऊँचे पदों पर आसीन करके पराक्रमी, ज्ञान सम्पन्न तथा सबके अधिपति बनाएँ । ॥९॥ |
सूक्त - १२९
| प्रलयकाल में पंचभूतादि सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और न अभावग्रस्त असत् सृष्टि का अस्तित्व था। उस समय भूलोक, आकाश तथा आकाशादि से परे अन्य लोक नहीं थे। सबको आच्छादित करने वाले ( बापट) भी नहीं थे। किसका स्थान कहाँ था? अगाध और गम्भीर जल का भी अस्तित्व उस समय कहाँ था ? ॥१॥ |
| उस समय न मृत्यु थी, न अमरता का अस्तित्व था, ( सूर्य-चन्द्र के अभाव से) दिन-रात्रि का ज्ञान भी नहीं था। प्राण वायु भी नहीं थी। एक मात्र ब्रह्म का अस्तित्व विद्यमान था। अन्य किसी भी वस्तु का अस्तित्व उस समय नहीं था ॥२॥ |
| सृष्टि से पूर्व प्रलयकाल में सम्पूर्ण विश्व मायावी अज्ञान ( अन्धकार ) से ग्रस्त था, सभी अव्यक्त और सर्वत्र एक ही प्रवाह था। उस समय जो कुछ था, वह चारों ओर से सत्-असत् तत्त्व से आच्छादित था । वही एकअविनाशी तत्त्व तपश्चर्या के प्रभाव से उत्पन्न हुआ ॥३॥ |
| सर्वप्रथम परब्रह्म-परमात्मा के मन में विराट् सृष्टि को उत्पन्न करने की इच्छा शक्ति प्रकट हुई। तत्पश्चात् उस मन से सबसे पहले उत्पत्ति का कारण ( बीज-सृजन सामर्थ्य) उत्पन्न हुआ। मेधावी ज्ञानीजनों ने विवेक, बुद्धि द्वारा हृदय में विचार करके व्यक्त न होने वाले असत् से व्यक्त होने वाले सत् तत्त्व के उत्पत्ति स्थान निरूपित किये ॥४॥ |
| इस प्रकार बीज ( सृजन सामर्थ्य) को धारण करने वाले देवों का प्रकाश तिरछा होकर नीचे और ऊपर की ओर विस्तीर्ण हुआ। अपनी महिमा से देवों ने जल को प्रेरित किया । स्वधा भोग्य का स्थान नीचे तथा प्रयति का स्थान ऊपर की ओर स्थिर हुआ । ॥५॥ |
| कौन मनुष्य जानता है और कौन यह कह सकता है कि यह सृष्टि कहाँ से और किस प्रकार (कारण) उत्पन्न हुई? क्योंकि विद्वान् लोग भी इस सृष्टि के उत्पन्न होने के बाद ही पैदा हुए । इसलिए यह जो सृष्टि उत्पन्न हुई, उसे ठीक-ठीक बताने में कौन समर्थ है? ॥६॥ |
| इस सृष्टि का उत्पादन कहाँ से हुआ, किसने रचना की और किसने नहीं की, ये सभी वही एक मात्र परमेश्वर ही जानते हैं? जो इस परमधाम में रहते हुए इस सृष्टि के अध्यक्ष हैं । सम्भव है, वे भी इस सम्बन्ध में पूर्णतया न जानते हों ॥७॥ |
सूक्त - १३०
| यह सृष्टि यज्ञमय है । इस सृष्टि यज्ञ में पंचभूत रूपी वस्त्रों को बुना जाता है । यह चिरकाल तक रहने वाली सृष्टि देवों के दिव्य कर्मों से स्थिर रहती है । इस सृष्टि यज्ञ में पितृगण कपड़े को बुनते हुए, अनेक प्रकार के उत्कृष्टं और निकृष्ट वस्त्रों या पदार्थों की रचना करते हैं ॥१॥ |
| प्रजापति परमेश्वर ही इस सृष्टि के उत्पादक और संहारक हैं । वे ही पुरुष अपनी सामर्थ्य से इस सृष्टि का विस्तार करते हैं। इस यज्ञस्थली में परमात्मा की किरण रूपी शक्तियाँ निवास करती हैं तथा अनेक प्रकार के सामरूपी सुखों को पैदा करती हैं ॥२॥ |
| जब सम्पूर्ण देव शक्तियों ने यज्ञ सम्पन्न किया, तब उसकी सीमा क्या थी ?प्रतिमा कौन सी थी ? उनके संकल्प क्या थे? प्रमाण क्या थे? छन्द और उक्थ क्या थे ? ॥३॥ |
| अग्निदेव गायत्री छन्द के सहायक हुए और उष्णिक् के सहायक सविता हुए। सोम अनुष्टुप् छन्द के तथा उक्थों के साथ तेजस्वी सूर्य जुड़े तथा बृहती छन्द ने बृहस्पति की वाणी का आश्रय ग्रहण किया ॥४॥ |
| विराट् छन्द मित्रावरुण देवों के आश्रित हुए और त्रिष्टुप् छन्द इस यज्ञ में इन्द्र और दिन के भाग बने । जगती छन्द ने अन्य देवों का आश्रय लिया । इस यज्ञ से सम्पूर्ण ऋषि और मनुष्य सामर्थ्यशाली बने । ॥५॥ |
| प्राचीन काल में इस सृष्टि यज्ञ के प्रकट होने पर हमारे पूर्वज ऋषियों और मनुष्यों ने उपरोक्त नियमानुसार यज्ञानुष्ठान का सम्पादन किया । जिन्होंने प्राचीन समय में यज्ञ सम्पन्न किया, हम अनुभव करते हैं कि उन्हें अपने मन: चक्षु से हम देख रहे हैं ॥६॥ |
| धैर्यवान् सात दिव्य ऋषियों ने स्तोत्रों और छन्दों का संग्रह करके बार-बार यज्ञानुष्ठान किये और यज्ञ की विद्या को स्थायित्व प्रदान किया। जिस प्रकार सारथी घोड़े की लगाम हाथ में थामते हैं, उसी प्रकार मेधावी. (तत्त्वदर्शी) ऋषियों ने पूर्वजों की परम्पराओं के प्रति प्रखर दृष्टि रखते हुए यज्ञानुष्ठान सम्पन्न किये ॥७॥ |
सूक्त - १३१
| शत्रुओं के पराभूतकर्ता हे इन्द्रदेव ! आप हमारे समक्ष आने वाले सभी शत्रुओं को दूर करें, पीछे से आने वाले, उत्तर तथा दक्षिण से आने वाले शत्रुओं को दूर हटाएँ। हम आपके समीप सुखपूर्वक निवास कर सकें ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जिस प्रकार जौ की खेती करने वाले कृषक जौ को बार-बार काटते हैं, उसी प्रकार देवताओं के प्रिय आप दुष्टों का दमन करके श्रेष्ठजनों को पोषण प्रदान कर उनकी रक्षा करें ॥२॥ |
| एक चक्रवाली गाड़ी कभी भी निर्धारित समय पर उपयुक्त स्थान पर नहीं पहुँचती । युद्धकाल में भी उससे अन्नलाभ नहीं हो सकता । अतएव हम गौ, वृषभ, अश्व, अन्न तथा बल की कामना करते हुए वृष्टिवर्षक इन्द्रदेव की मित्रता के लिए उनका भी आवाहन करते हैं ॥३॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! नमुचि नामक असुर के अधिकार में स्थित श्रेष्ठ मधुर सोमरस भली प्रकार प्राप्त करके उसका पान करते हुए, आप दोनों ने शुभ कर्मों के पालक इन्द्रदेव की रक्षा की ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! राक्षसों के संसर्ग से अशुद्ध सोम का पान कर ( स्वयं को संकट में डालकर) अश्विनीकुमारों ने आपकी रक्षा उसी प्रकार की, जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है। आपने नमुचि का बध करके जब प्रसन्नता प्रदान करने वाले सोम का पान किया, तब देवी सरस्वती भी आपके अनुकूल हुईं ॥५॥ |
| भली प्रकार से संरक्षण प्रदान करने वाले सामर्थ्य से युक्त वे इन्द्रदेव हमें संरक्षण प्रदान करें। वे सर्वज्ञ परमेश्वर हमारे शत्रुओं के संहारक हों । हममें निर्भीकता स्थापित करें, जिससे हम उत्तम बलों के स्वामी बनें ॥६॥ |
| यज्ञीय पुरुष की श्रेष्ठ बुद्धि में हम वास करें । कल्याणकारी श्रेष्ठ मन से भी हम सम्पन्न हों । श्रेष्ठ संरक्षक और ऐश्वर्यवान् वे इन्द्रदेव हमारे समीपस्थ और दूर छिपे हुए सभी शत्रुओं को सदा के लिए दूर करें ॥७॥ |
सूक्त - १३२
| जो स्तोता यज्ञादि कर्म सम्पन्न करते हैं, आकाश और पृथ्वी उन्हें ही श्रेष्ठ अलंकारादि से श्री सम्पन्न करते हैं। दोनों अश्विनीकुमार भी यज्ञकर्ता मनुष्यों को नाना प्रकार के सुख साधनों से परिपूर्ण करते हैं ॥१॥ |
| हे मित्र और वरुण देवो ! पृथ्वी के धारणकर्ता आप दोनों श्रेष्ठ सुख-साधनों के अधिकारी हैं। सुख-साधनों की प्राप्ति के लिए हम हविष्यान्न समर्पित करके आप दोनों की अर्चना करते हैं । यजमानों के कल्याण के लिए आप दोनों के सहयोग से आसुरी शक्तियों को पराभूत करें ॥२॥ |
| हे मित्र और वरुण देवो ! जिस समय हम यज्ञ सामग्री को स्तुति मंत्रों के साथ आपके निमित्त प्रस्तुत करते हैं । उस समय शीघ्र ही प्रिय धन को उपलब्ध करते हैं। हवि प्रदाता यजमान जिस धन को प्राप्त करते हैं, उसे कोई भी नष्ट करने में समर्थ नहीं है ॥३॥ |
| हे प्राणदाता मित्रदेव ! आकाश में प्रकाशित सूर्यदेव आपसे पृथक् नहीं हैं । हे वरुणदेव ! आप सम्पूर्ण विश्व के अधिपति हैं। आपके रथ का शिखर हमारे यज्ञ की ओर उन्मुख है । हिंसकों के संहारक इस यज्ञ का कोई अनिष्ट नहीं हो सकता ॥४॥ |
| मझ ( शकपत ) में विद्यमान पाप भी कल्याणकारी होकर तथा मित्रदेव की अनुकूलता पाकर आक्रांता दष्ट रिपुओं के विनाश के कारण ही बनते हैं । मित्रदेव आगमन करके हमारे शरीर को संरक्षण-प्रदान करें तथा यज्ञ में प्रयुक्त.संसाधनों को संरक्षित करें ॥५॥ |
| विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न हे मित्र और वरुणदेव ! आपकी जननी माता अदिति हैं । द्युलोक के तुल्य यह धरती भी अन्न-जल से परिष्कृत करने वाली है। आप हमें प्रीतियुक्त धन प्रदान करें तथा सूर्य की रश्मियों से सम्पूर्ण विश्व को परिपुष्ट करें ॥६॥ |
| हे मित्र और वरुणदेव ! आप अपने सत्कर्मों से प्रकाशमान होकर स्व स्थान पर प्रतिष्ठित होते हैं । उपद्रव करने वाले इन शत्रुओं को पराभूत करने के लिए आप दोनों वन में विहार करने वाले रथ पर प्रतिष्ठित हों। आपने प्रिय नृमेध और सुमेध ( नामक ऋषियों अथवा यज्ञों ) को विकारों से बचाया है ॥७॥ |
सूक्त - १३३
| हे स्तोताओ ! इन इन्द्रदेव के रथ के सम्मुख रहने वाले बल की उपासना करो । शत्रु-सेना के आक्रमण के अवसर पर ये लोकपालक और शत्रुनाशक इन्द्रदेव ही प्रेरणा के आधार हैं, यह निश्चित जाने । शत्रुओं के धनुष की प्रत्यंचा टूट जाए, यह कामना करते हैं ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप नदियों के प्रवाहों में आए अवरोधों को तोड़ते हैं एवं मेघों को फोड़ते हैं। शत्रु विहीन हुए आप सब वरणीय पदार्थों के पोषक हैं । हम आपको हविष्यान्न देकर हर्षित करते हैं । शत्रुओं के धनुष की प्रत्यञ्चा टूटे, ऐसी कामना करते हैं ॥२॥ |
| हम पर आक्रमण करने वाले शत्रु विनष्ट हो जाएँ । हे इन्द्रदेव हम पर घात करने वाले जघन्य दुष्टों को आप अपने शस्त्रों से मारते हैं। हमारी बुद्धि आपकी ओर प्रेरित हो । आपके धन आदि के दान हमें प्राप्त हों । हमारे शत्रुओं के धनुष की प्रत्यञ्चा टूट जाए ऐसी कामना करते हैं ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! भेड़ियों के समान हिंसक प्रवृत्ति के उन दुष्ट मनुष्यों को आप पददलित करें, जो शस्त्रादि से युक्त हमारे चारों ओर घूमते रहते हैं। दूसरे सभी शत्रुओं की प्रत्यञ्चाओं को आप छिन्न-भिन्न कर दें, ऐसी कामना है ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! निकृष्ट स्वभाव वाले अनिष्टकारी शत्रओं के पराक्रम को आप वैसे ही विनष्ट करें, जैसे महान् लोक समस्त पदार्थों को अपने से नीचे देखता है । शत्रुओं के धनुषों पर चढ़ाई गई प्रत्यञ्चाए विनष्ट हों॥५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हम आपके अनुगामी बनकर आपके प्रति मित्रभाव को परिपोषित करते हैं। आप हमें यज्ञीय सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए सभी पापों और उनके दु:खदायी दुष्परिणामों से पार करें। दूसरे शत्रुओं की धनुष की प्रत्यञ्चाएँ छिन्न-भिन्न हो जाएँ ॥६॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप हम स्तोताओं को ऐसी प्रेरणा प्रदान करें, जिससे हमारे सभी अभीष्ट मनोरथों की पूर्ति हो । पृथिवी स्वरूपा यह गौ विशाल स्तनयुक्त होकर सहस्र धाराओं से पोषक रस(दूध) देकर हमें परिपुष्ट करे ।॥७॥ |
सूक्त - १३४
| तेजस्विनी उषा के समान द्युलोक और पृथ्वी लोक को प्रकाश से पूर्ण करने वाले प्राणियों के स्वामी हे महान्इन्द्रदेव ! आपको कल्याण करने वाली देवमाता अदिति ने जन्म दिया है । ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जो हमें परतंत्र करने वाले हैं, उन दुष्कर्मी शत्रुओं को पैरों तले कुचल दें। आपको अदिति माता ने उत्पन्न किया है, कल्याण करने वाली वे माता श्रेष्ठ ॥२॥ |
| शत्रओं का हनन करने वाले, सामर्थ्यशाली हे इन्द्रदेव ! आप अपनी सामर्थ्य और कर्मों से सबको आह्लादित करने वाले हैं। आप विपुल अन्न भण्डार को हमारी ओर प्रेरित करें तथा सभी प्रकार से हमारा संरक्षण करें । कल्याणकारिणी श्रेष्ठ माता ने आपको जन्म दिया है ॥३॥ |
| हे शतक्रतु ! आप सभी प्रकार के अन्न-धन को लोक हित के लिए प्रस्तुत करते हैं। सोम अभिषवकर्ता यजमान को हजारों प्रकार की सम्पदा, सुसन्तति और संरक्षण प्रदान करते हैं। कल्याणकारिणी श्रेष्ठ माता ने आपको जन्म दिया है ॥४॥ |
| इन्द्रदेव के वज्रास्त्र स्वेदकणों के समान चारों ओर संरक्षण हेतु प्रस्तुत हों । दूर्वा के विस्तार के समान उनके आयुध सर्वव्यापी हों । दुर्बुद्धिग्रस्त शत्रु हमसे दूर हों । कल्याणकारी श्रेष्ठ माता ने आपको जन्म दिया है ॥५॥ |
| हे ज्ञानवान् इन्द्रदेव ! महान् अंकुश के समान आप शक्ति को धारण करते हैं। हे इन्द्रदेव ! अज (अव्यक्त) से उत्पन्न पूर्व पदों ( चरणों) की भाँति आप भी अपनी सामर्थ्य से सबको वश में करते हैं । आपको कल्याणमयी श्रेष्ठ माता अदिति ने उत्पन्न किया है ॥६॥ |
| हे देवो ! हम याजकगण कोई धर्म विहीन अमर्यादित कर्म नहीं करते हैं। हम किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाते हैं । हाथ में हवन सामग्री लेकर हम यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों को सम्पन्न करते हैं ॥७॥ |
सूक्त - १३५
| सुन्दर पत्रों से सुशोभित जिस वृक्ष पर देवताओं के साथ यमदेव सोमपान करते हैं। हमारे पिता प्रजापति की अभिलाषा है कि मैं भी उसी वृक्ष पर जाकर पूर्वजों का सहायक बनू ॥१॥ |
| जब प्रजापति पिता ने पूर्व पुरुषों का सहायक' बनने की इच्छा प्रकट की, तब मैंने निष्ठुरतापूर्वक उनकी इस अभिलाषा के प्रति विरक्ति प्रकट की, पुन: मेरे अन्दर उनके प्रति श्रद्धा-भाव जाग्रत् हुआ है ॥२॥ |
| ( यमदेव का कथन) हे कुमार नचिकेता ! आपने ऐसे अभिनव रथ की मुझसे इच्छा की थी, जो चक्ररहित हो, जिसकी ईषा (दण्ड) एक ही हो तथा जो सर्वत्र गमनशील हो. सोच-विचार किए बिना ही आप उस रथ पर आरूढ़ हो गए ॥३॥ |
| हे कुमार (नचिकेता) ! बुद्धिमान् सगे-सम्बन्धियों को त्यागकर जिस रथ को आप ले जा रहे हैं, वह आपके पिता के सान्त्वनापूर्ण ज्ञानोपदेश से चलने वाला है। वही उपदेश रथ के लिए नौकारूपी आश्रय है, उसी नौका पर आरूढ़ होकर इस रथ ने यहाँ से प्रस्थान किया ॥४॥ |
| इस बालक( नचिकेता) के जन्मदाता कौन हैं ? किसने इस रथ को भेजा है, जिससे यह बालक जीव-जगत् । से यहाँ पहुँचा है? इस बात को आज हमसे कौन कह सकेगा? ॥५॥ |
| जिससे यह बालक यम द्वारा भूलोक में पिता को सौंपा जायेगा, यह बात तो पहले ही बताई जा चुकी है। सर्वप्रथम पिता के कथन का मूल भाग कहा गया, तत्पश्चात् वापस लौटाने का उपाय बताया गया ॥६॥ |
| जो देवताओं द्वारा विनिर्मित हुआ है, लोगों का ऐसा कथन ( किम्वदन्ती ) है कि यही नियन्ता यमदेव का आश्रय स्थल (निवास स्थान) है । यह वेणु नामक वाद्य यमदेव की सन्तुष्टि के लिए बजाया जाता है । स्तुति मंत्रों से उन्हें सुशोभित किया जाता है ॥७॥ |
सूक्त - १३६
| रश्मियों से प्रकाशमान सूर्यदेव अग्नि, जल और द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं । सूर्य ही सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश दर्शन योग्य बनाते हैं। इस ( सूर्य) ज्योति को ही केशी नाम से पुकारा जाता है ॥१॥ |
| वातरसन के वंशज मनीषी लोग पीतवर्ण के वस्त्रों को धारण करते हुए तप करते हैं। देवत्व धारण करने की स्थिति में वे वायु की गति का अनुगमन करते हैं ॥२॥ |
| सभी सांसारिक व्यवहारों से निवृत्त होकर मुनिवृत्ति (परमहंस अवस्था) को धारण करके परम आनन्दमग्न होकर हम वायु भूत ( सूक्ष्मरूप) हो गये हैं। हे मनुष्यो ! हमारे स्थूल शरीर को ही आप देखने में समर्थ हैं ॥३॥ |
| मुनिगण अन्तरिक्ष मार्ग से आ जा सकते हैं। वे सभी पदार्थों को अपने तेज (दिव्य दृष्टि से देख सकते हैं। जहाँ जितनी भी देवशक्तियाँ हैं, वे आपस में मित्रभाव से युक्त हैं, वे सभी सत्कर्मों के लिए ही प्रतिष्ठित होती हैं ॥४॥ |
| मुनिगण वायु मार्ग में भ्रमण के लिए अश्वरूप ( शक्तिरूप) को धारण करते हैं। वे वायु के सखारूप हैं। देवगण उन्हें प्राप्त करने की कामना करते हैं। वे पूर्व और पश्चिम के दोनों समुद्रों में निवास करते हैं ॥५॥ |
| सूर्यदेव अप्सराओं, गंधर्वो और अन्य मृगादि के स्थानों में संचार करते हैं। तेजस्वी सूर्यदेव सभी ज्ञातव्य विषयों के ज्ञाता, रस के उत्पादक और आनन्ददाता हैं ॥६॥ |
| जिस समय केशी ( सूर्य) रुद्र के साथ जल पात्र से जल-पान करते हैं, उस समय वायुदेव उन्हें प्रकम्पित करते हैं तथा कठिन माध्यमिका वाणी को भंग कर देते हैं ॥७॥ |
सूक्त - १३७
| हे देवगण ! हम पतितों को बार-बार ऊपर उठाएँ । हे देवो ! हम अपराधियों के अपराध-कर्मों का निवारण करें । हे देवो ! हमारा संरक्षण करते हुए आप हमें दीर्घायु बनाएँ ॥१॥ |
| ये दो वायु, एक समुद्र पर्यन्त और दूसरे समुद्र से दूरस्थ प्रवाहित होते हैं। उन दोनों में से एक तो आपको (स्तोता को) बल प्रदान करें और दूसरे आपके पापों को विनष्ट करें ॥२॥ |
| हे वायुदेव ! आप व्याधियों का निवारण करने वाली कल्याणकारी ओषधि को लेकर आएँ। जो अहितकर पाप ( मल) है, उन्हें यहाँ से बहाकर ले जाएँ। आप संसार के लिए ओषधिरूप, कल्याणकारी, देवदूत बनकर सर्वत्र संचार करते हैं ॥३॥ |
| हे स्तोताओ ! आपके लिए सुखशान्ति प्रदायक और अहिंसक संरक्षण साधनों के साथ हमारा आगमन हुआआपके लिए मंगलमय शक्तियों को भी हमने धारण किया है । अस्तु , इस समय तुम्हारे सम्पूर्ण रागा की निवारण करता हूँ ॥४॥ |
| इस लोक में समस्त देवगण हमें संरक्षण प्रदान करें । मरुद्गण और समस्त प्राणी हमारी रक्षा करें । वे हमारे शरीर के रोगों और पापों का निवारण करें ॥५॥ |
| जल सम्पूर्ण रोगों का निवारक है । जल ही रोगों के कारण (मूल) का नाश करने वाला है । जल ही सबके लिए हितकारी ओषधिरूप है, वह ही आपके निमित्त रोगनाशक है ॥६॥ |
| मन्त्रोच्चारण करते समय जैसे वाणी के साथ जिह्वा गति करती है, वैसे ही दस अँगुलियों वाले दोनों हाथों से आपका स्पर्श करते हुए रोगों से मुक्त करते हैं ॥७॥ |
सूक्त - १३८
| हे इन्द्रदेव ! आपकी मित्रता में रहने वाले यज्ञकर्ताओं ने हवन सामग्री समर्पित करते हुए यज्ञ सम्पन्न करके बल नामक असुर का संहार किया। उस समय आपके लिए स्तोत्रों का गान किया गया । तब आपने कुत्स ऋषि को प्रभातकालीन आलोक का दर्शन कराया। आपने जल को विमुक्त किया और वृत्रासुर के समस्त कर्मों को विनष्ट किया ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने जल का निर्माण किया और पर्वतों ( मेघों) को विचलित करके उसे प्रवाहित किया। आपने बलासूर के द्वारा अपहृत गौओं को मुक्त किया। आपने मधुर सोमरस का पान करके वन के वृक्षों को वष्टि द्वारा सम्वर्द्धित किया। यज्ञ में उत्तम मंत्रों द्वारा आपकी स्तुति की गई । हे इन्द्रदेव ! आपके श्रेष्ठकर्मों के प्रभाव से सूर्यदेव ने तेजस्विता को धारण किया ॥२॥ |
| द्युलोक में सूर्यदेव ने अपने रथ को आगे बढ़ाया । श्रेष्ठ इन्द्रदेव ने दासों को पराभूत किया। इन्द्रदेव ने ऋजिश्वा के साथ मित्रता करके पिपु नामक मायावी असुरों के पराक्रम को विनष्ट किया ॥३॥ |
| पराक्रमी इन्द्रदेव ने अपराजेय शत्रु सैनिकों का विनाश कर डाला । अयास्य ऋषि द्वारा स्तुत इन्द्रदेव ने शक्तिशाली देव विद्रोही राक्षसों को विनष्ट किया । जैसे सूर्यदेव भूमि से रस (जल) प्राप्त करते हैं, वैसे ही इन्द्रदेव शत्रुओं की नगरियों से धन को ग्रहण करते हैं। स्तुतियों को ग्रहण करते हुए उन्होंने तेजस्वी वज्र से शत्रुओं का विध्वंश किया ॥४॥ |
| इन्द्रदेव की सेना के साथ कोई भी युद्ध करने में समर्थ नहीं है । वे सर्वज्ञ गतिशील और शत्रुओं को विदीर्ण करने वाले वज्र से वृत्र का संहार करते हैं। विदारक वज्र से जब शत्रुपक्ष भयभीत होता है, तब सूर्यदेव विश्व को प्रकाशित करते हैं और देवी उषा अपने रथ को आगे बढ़ाती हैं ॥५॥ |
| हे इन्द्रदेव ! ये पराक्रमी कार्य आपके द्वारा ही सम्पन्न हुए हैं। यज्ञ विरोधी असुरों का आपने अकेले ही संहार किया था। महीनों के निर्धारणकर्ता सूर्यदेव को आपने ही द्युलोक में प्रतिष्ठित किया है । वृत्रासुर द्वारा भंग किये गए रथचक्र को सबके पिता सूर्यदेव आपकी शक्ति द्वारा ही धारण करते हैं ॥६॥ |
सूक्त - १३९
| हरितवर्ण वाली वनस्पतियों और इस पर आश्रित सभी जीवों का पोषण करने वाले परम ज्योतिर्वान् सूर्यदेव अपनी रश्मियों को पूर्वदिशा से प्रकट करते हैं । जितेन्द्रिय, विद्वान् और पोषणकर्ता सूर्यदेव उत्पन्न हुएसम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करते हैं और सतत गतिशील रहते हैं ॥१॥ |
| सभी को उत्पन्न करने वाले सवितादेव द्युलोक के मध्य में अवस्थित हैं। ये द्युलोक, पृथ्वीलोक और अन्तरिक्ष तीनों को अपने तेज से दीप्तिमान् करते हैं। ये सम्पूर्ण विश्व को अपने आश्रय में लेने वाले, जल को धारण करने वाले तथा सभी को स्पष्ट देखने वाले हैं। इस लोक, परलोक और मध्यलोक में स्थित प्राणियों के सूक्ष्म भावोंको सवितादेव भली-भाँति जानते हैं ॥२॥ |
| ऐश्वर्यों के मूल, वैभव प्रदाता, सत्यधर्म के प्रेरक सवितादेव अपनी दीप्तियों से समस्त विश्व को आलोकित करते हैं। सवितादेव इन्द्रदेव के समान ही सम्पदा प्राप्त करने के लिए संग्राम क्षेत्र में स्थिर रहते हैं ॥३॥ |
| हे सोमदेव ! विश्वावसु गंधर्व को देखकर जल, यज्ञकर्म के पुण्य प्रभाव से विलक्षणतापूर्वक प्रवाहित हुआ। जलप्रेरक इन्द्रदेव ने इस प्रवाह को जानकर यह यज्ञकार्य कहाँ चल रहा है? यह देखने के लिए चारों ओर से सूर्य मण्डल का निरीक्षण किया ॥४॥ |
| दिव्यलोक वासी और जल के निर्माता गन्धर्व विश्वावसु हमें इस विषय में वह सम्पूर्ण जानकारी दें, जो यथार्थ में सत्य है तथा जिसे हम नहीं जानते हैं । हे विश्वावसो ! हमारी स्तुतियों को प्रेरित करते हुए आप विचारपूर्वक किए गए कर्मों को संरक्षण प्रदान करें ॥५॥ |
| इन्द्रदेव ने नदियों के अन्तिम भाग अन्तरिक्ष में मेघों को देखा। उन्होंने मेघों में संचरित होने वाले जल के द्वारों को उद्घाटित किया। उन्होंने इनको जलमय स्वरूप प्रदान किया। वे इन्द्रदेव मेघों की शक्ति को भली-भाँति जानते हैं ॥६॥ |
सूक्त - १४०
| हे अग्निदेव ! आपका हविष्यान्न प्रशंसनीय है । हे तेजस्वी अग्निदेव ! आपकी ज्वालाएँ अति सशोभित होती हैं। तेजस्वी, ज्ञानी हे देव ! आप अपनी सामर्थ्य से हविदाता को उत्तम अन्न-धन प्रदान करने वाले हैं ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! पवित्र किरणों और निर्मल तेज से युक्त आप सूर्यदेव के तुल्य उदित होते हैं और बाद में पूर्ण तेजस्विता को प्राप्त करते हैं। मातारूपी दो अरणियों से प्रकट होने पर आप यजमानों के समीप रहकर उनके रक्षक रहते हैं । हविष्यान्न से द्युलोक को और वृष्टि से पृथ्वी को सुसम्पन्न बनाते हैं ॥२॥ |
| सर्वज्ञाता, शक्तिवान् हे अग्निदेव ! आप हमारी उत्तम स्तुतियों से हर्षोल्लास को प्राप्त हों, हमारे यज्ञादि कर्मों द्वारा आप सन्तुष्ट हों । अनेक रूपों वाले विलक्षण द्रष्टा आप यजमानों द्वारा प्रदत्त हविष्यान्न को ग्रहण करें ॥३॥ |
| हे अविनाशी अग्निदेव ! आप अपने तेज से प्रदीप्त होकर हमारे धन में वृद्धि करें। आप हमारे यजन कर्म में अपने तेजस्वी रूप से सुशोभित होते हैं और हमें यज्ञादि कर्मों का फल प्रदान करते हैं ॥४॥ |
| यज्ञ को संस्कारित, सुशोभित करने वाले सर्वज्ञ, असंख्य धन के अधिपति, धन प्रदाता हे अग्निदेव ! हम आपकी आराधना करते हैं। आप हमें श्रेष्ठ धन और सौभाग्य युक्त प्रचुर अन्न प्रदान करें ॥५॥ |
| याजकगण यज्ञ के महान् आधार, सामर्थ्यवान् , सर्वज्ञ दर्शनीय अग्निदेव को सुख की आकांक्षा से अपने समक्ष स्थापित करते हैं। हमारी स्तुति श्रवण करने वाले,सर्वत्र विख्यात, दिव्यगुण सम्पन्न हे अग्निदेव ! यजमान दम्पति अपनी वाणी से आपकी स्तुति करते हैं ॥६॥ |
सूक्त - १४१
| हे अग्निदेव ! आप हमारे प्रति श्रेष्ठ मनोभावों को रखकर इस यज्ञ में उपस्थित हों तथा हमारे लिए हितकारी उपदेश करें । हे प्रजापालक अग्निदेव ! आप ऐश्वर्यदाता हैं, इसलिए हमें भी धन-धान्य से परिपूर्ण करें ॥१॥ |
| अर्यमा, भग और बृहस्पतिदेव हमें ऐश्वर्य से परिपूर्ण करें । समस्त देव और वाणी की अधिष्ठात्री, सत्यप्रिय । देवी सरस्वती हमें भरपूर धनादि सम्पदाएँ प्रदान करें ॥२॥ |
| हम अपने संरक्षण एवं पालन के लिए राजा सोम, अग्निदेव, आदित्यगण, विष्णुदेव, सूर्यदेव, प्रजापति ब्रह्मा और बृहस्पतिदेव को स्तोत्रों द्वारा आमंत्रित करते हैं ॥३॥ |
| शंसनीय इन्द्रदेव, वायुदेव और बृहस्पतिदेव को हम इस यज्ञीय कार्य में आदरपूर्वक आमंत्रित करते है ये सभी देव हमारे प्रति अनुकूल विचार रखते हुए हर्षित हों ॥४॥ |
| हे स्तोताओ ! आप सब अर्यमा, बृहस्पति, इन्द्र, वाय, विष्णु, सरस्वती, अन्न तथा बलदायक सवितादव का आवाहन करें। सभी देव हमें ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए पधारें ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! आप अन्य सभी अग्नियों के साथ पधारकर हमारे स्तोत्रों एवं यज्ञ की अभिवृद्धि करें। आप धन-वैभव प्रदान करने के निमित्त दाताओं ( देवों) को भी प्रेरित करें ॥६॥ |
सूक्त - १४२
| हे अग्निदेव ! स्तोतागण स्तोत्रों द्वारा आपकी ही प्रार्थना करते हैं । हे बलपुत्र अग्ने ! हमारे लिए आपके अतिरिक्त कोई दूसरा लक्ष्य नहीं है । आपके द्वारा प्रदत्त कल्याणकारी सुख, निश्चित ही तीनों प्रकार के दु:खों से संरक्षण प्रदान करने वाला है । हम आपकी प्रतप्त ज्वालाओं से पीड़ित न हों, अत: उन्हें हमसे दूर ही रखें ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! अन्न की अभिलाषा करते हुए आपकी उत्पत्ति अति मनोहर होती है । बन्धु के समान आप सम्पूर्ण लोकों को सुशोभित करते हैं । इधर-उधर गमन करने वाली ज्वालाओं को देखकर हमारे स्तोत्रों का उदय हुआ है । ये ज्वालाएँ पशुपालक के समान आगे-आगे बढ़ती हैं ॥२॥ |
| हे दीप्तिमान् अग्ने ! तृण ( वनस्पतियों ) का भक्षण ( दहन ) करते समय आप उन्हें समाप्त करने के उपजाऊ भूमि को आप अपने प्रभाव से ऊसर बना देते हैं । हम आपकी प्रचण्ड ज्वालाओं के क्रोध भाजन न बनें॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! जिस समय आप ऊपर से नीचे तक वृक्षों को जलाते हुए गमन करते हैं, उस समय विजयाकांक्षी सेना के समान अलग-अलग दलों (दिशाओं) में आगे बढ़ते हैं । जब वायुदेव आपकी ज्वालाओं के लिए अनुकूल दिशा में बहते हैं, उस समय दाढ़ी-मूंछ के बालों को काटने वाले नाई के समान ही आप विस्तृत भूखण्ड को वृक्ष-वनस्पतियों से रहित ( उसको साफ) कर देते हैं ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! जब आप अपनी ज्वालाओं को बार-बार विस्तृत करते हुए समस्त वन क्षेत्र को भस्म करते हैं, उस समय कभी नीचे, तो कभी ऊपरी भू-भाग की ओर चढ़ते हैं। आपके शरीर की ज्वालाएँ श्रृंखलाबद्ध होकर उसी प्रकार बढ़ती हैं, जैसे सेना के एक रथ के पीछे अनेकों रथ चल पड़ते हैं ॥५॥ |
| हे अग्निदेव ! आपकी ज्वालाएँ ऊपर की ओर उत्थान करें। आपके तेज और बल पराक्रम की वृद्धि हो । आज सभी वसुगण भली प्रकार विनम्र होकर आपकी वन्दना करते हैं ॥६॥ |
| हे अग्निदेव ! यह स्थान जल का आधार है तथा इस स्थान पर विशाल समुद्र विद्यमान है । आप हमारे इस स्थान के अतिरिक्त अन्य मार्ग को अपनाएँ, जिससे आप स्वेच्छानुसार वनस्पतियों की ओर आगे बढ़ सकें ॥७॥ |
| हे अग्निदेव ! आपके आगमन और प्रत्यागमन पर हमारे निवास स्थानों पर पुष्पवती लताएँ और दूर्वा संवर्द्धित हो । जलाशयों में अनेक प्रकार के कमल खिल उठे । समुद्र के जल प्रदेश में हमारे ये निवास स्थल हो, जहाँ हम आपके ताप से सुरक्षित रह सकें ॥८॥ |
सूक्त - १४३
| हे अश्विनीकुमारो ! यज्ञादि कर्म करते हुए अत्रि ऋषि वृद्ध हो गये थे। आपने उन्हें ऐसा ( बलवान्) बनाया, जिससे वे अश्व के समान गन्तव्य स्थल पर पहुँचने में समर्थ हुए। अंष कक्षीवान् को आपने वैसे ही नवयौवन प्रदान किया, जिस प्रकार पुराने रथ का जीर्णोद्धार करते हैं ॥१॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! शीघ्रगामी अश्व के समान जिन अत्रि ऋषि को अति पराक्रमी असुरों ने बॉधा था, आपन सुदृढ़ गाँठ को खोलने के समान उन्हें मुक्ति प्रदान की। वे युवा पुरुष के समान इस लोक में आएँ ॥२॥ |
| शप्रवर्ण और सुन्दर नायक हे अश्विनीकमारो ! आप दोनों अत्रि ऋषि को क्रिया कुशलता प्राप्त करने का बुद्धि प्रदान करें। इसके लिए हम दिव्य स्तोत्रों से आपकी प्रार्थना करते हैं ॥३॥ |
| श्रेष्ठ.अन्नदाता हे अश्विनीकुमारो ! हमारे यज्ञगृह में उपस्थित होकर आपने महान् यज्ञ की रक्षा की । इससे हम अनुभव करते हैं कि आप हमारी दान-भावना और स्तोत्रों के अभिप्राय से परिचित हैं, यह सुनिश्चित है ॥४॥ |
| हे अश्विनीकुमारो ! समुद्र की तरंगों में इधर-उधर गोते खाते हुए “ भुज्यु ” को उबारने के लिए आप दोनों श्रेष्ठ पतवारों से युक्त नाव लेकर पहुँचे । आपने उसे बचाकर पुन: यज्ञानुष्ठान करने के लिए समर्थ बनाया ॥५॥ |
| सर्वज्ञ नायक स्वरूप हे अश्विनीकुमारो ! आप राजा के समान सुखी और श्रेष्ठ पूजनीय हैं। हमारे समीप आप धनैश्वर्य के साथ आएँ । जैसे गौ के स्तनों को दूध भर देता है, वैसे ही आप हमें धनादि से परिपूर्ण करें ॥६॥ |
सूक्त - १४४
| हे इन्द्रदेव ! आप सृष्टि निर्माता हैं । अमृत-स्वरूप, बलवर्द्धक और जीवनाधार यह सोमरस अश्व के समान ही आपके समीप पहुँचता है ॥१॥ |
| दाता इन्द्रदेव का तेजस्वी वज्र हमारे स्तोत्रों से वर्णन करने योग्य है । उन्होंने इसी से ऊर्ध्वकृशन नामक ऋषि अथवा ऊध्वरेता साधक की रक्षा की थी। जैसे त्रभुदेव यज्ञकर्ताओं के पोषक हैं. वैसे ही इन्द्रदेव भी या को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें पोषण प्रदान करते हैं ॥२॥ |
| तेजस्वी इन्द्रदेव अपनी यजमान रूपी प्रजा के लिए अति प्रशंसनीय हैं ।वे कर्मशील श्येन ऋषि के निमित्त उनकी सन्तानों को तेजस्विता प्रदान करें ॥३॥ |
| श्येन (प्रशंसनीय) तार्क्ष्य (गतिशील) के पुत्र सुपर्ण (उत्तम पालनकर्ता) जिस ऐश्वर्यदाता सोमदेव को अति दूरस्थ स्थान से लेकर आए हैं, वह सोम वृत्र वध के लिए इन्द्रदेव को) प्रोत्साहित करता है ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! सुन्दर रक्तवर्ण अन्न के उत्पादक और सुखप्रद सोम को श्येन अपने चरणों से (निर्धारित क्रम पूरे करके) लेकर आए हैं। इससे आप हमारे लिए अन्न एवं आयुष्य प्रदान करें तथा सोम द्वारा हमारी मैत्री भावना को जाग्रत् करें ॥५॥ |
| सोमरस का पान करके इन्द्रदेव महान् बल और दुःख निवारक संरक्षण सामर्थ्य द्वारा हमारी रक्षा करते हैं। हे शुभकर्मशील इन्द्रदेव ! हमारे यज्ञादि कर्मों से आनन्दित होकर आप हमें अन्न और दीर्घायुष्य प्रदान करें। यह सोमरस आपके निमित्त ही अभिषवित किया गया है ॥६॥ |
सूक्त - १४५
| इस लता रूपिणी बलवती ओषधि को हम खोदकर निकालते हैं, इससे सपत्नी ( सौत) को पीड़ित किया जाता है और स्वामी (पति) की असाधारण प्रीति उपलब्ध की जाती है॥१॥ |
| हे ओषधे ! आपके पत्ते ऊपर की ओर फैलने वाले हैं। आप स्वामी के लिए उत्तम सौभाग्ययुक्त हैं। आप देवों द्वारा निर्मित हैं। आपका तेज अत्यन्त प्रखर है । आप मेरी सपत्नी को दूर करें । मेरे स्वामी को मात्र मेरे लिए प्रीतियुक्त करें ॥२॥ |
| हे अत्युत्तम ओषधे ! हम उत्कृष्ट बने, श्रेष्ठों में अति श्रेष्ठता को उपलब्ध करें । हमारी सपत्नी निकृष्टों में भी अति निकृष्ट स्थिति को प्राप्त करें ॥३॥ |
| मैं इन्द्राणी सपत्नी का नाम तक लेना उचित नहीं समझती हैं । सपत्नी सभी के लिए अप्रिय होती है । सपत्नी को मैं दूर से भी अति दूर देश में भेज देना चाहती हूँ ॥४॥ |
| हे ओषधे ! मैं आपके सहयोग से सपत्नी को पराजित करने वाली हैं। आप भी इस कार्य में समर्थ हैं । हम दोनों शक्ति सम्पन्न बनकर सपत्नी को शक्तिहीन करें ॥५॥ |
| हे पतिदेव ! मैं आपके सिर के स्थान सिरहाने के समीप सपत्नी को पराभूत करने वाली इस ओषधि को स्थापित करती हूँ । पराभवकर्ता ओषधि-प्रभाव से आपका मन हमारी ओर उसी प्रकार आकर्षित हो, जैसे गौ बछड़े की ओर दौड़ती है तथा जल नीचे की ओर प्रवाहित होता है ॥६॥ |
सूक्त - १४६
| हे वनदेवि ! आप जंगल में देखते-देखते विलुप्त हो जाती हैं। आप ग्रामों में जाने के मार्गों को क्यों नहीं पूछती ? निर्जन वन में ही क्यों जाती हैं ? अकेले रहने में क्या आपको भय नहीं लगता ? ॥१॥ |
| कोई प्राणी वृष के समान आवाज करता है और कोई चींची करके मानो उसका प्रत्युत्तर देता है। उस समय वे वीणा के स्वरों के समान शब्दोच्चारण करके अरण्य देवी का गुणगान करते हैं ॥२॥ |
| ज्ञात होता है कि इस अरण्य में कहीं गौएँ चरती हैं और कहीं लता गुल्मादि की तरह गृह दिखाई देते हैं। सायंकाल अनेकों गाड़ियाँ घास, लकड़ी आदि लेकर निकलती हैं, जैसे अरण्य देवी उन्हें अपने घर भेज रही हों ।॥३॥ |
| हे अरण्यदेवि ! एक पुरुष गौओं को बुला रहा है और दूसरा काष्ठ काट रहा है । अरण्य में निवास करने वाले मनुष्य रात्रि में विभिन्न शब्दों को सुनकर भयभीत होते हैं ॥४॥ |
| अरण्यानी (अरण्य की अधिष्ठात्री देवी) किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करतीं । दूसरे व्याघ्रादि भी उस पर आक्रमण नहीं करते । वन में मधुर स्वादिष्ट फल-फूल का आहार लेकर स्वेच्छानुसार सुखपूर्वक निवास किया जा सकता है ॥५॥ |
| मृग नाभि (कस्तूरी ) आदि उत्तम सुगन्ध से युक्त,प्रचुर फलमूलादि भक्ष्य पदार्थों से परिपूर्ण कृषि कार्यों से रहित और हरिणों की मातृस्वरूपा अरण्यानी देवी की हम स्तुति करते हैं ॥६॥ |
सूक्त - १४७
| हे वज्रपाणि इन्द्रदेव ! दुष्ट संहारक प्राणियों के लिए हितकारी, जल प्रवाहित करने वाले, द्युलोक एवं पृथ्वीलोक को अपनी इच्छा से गतिशील करने वाले, आपके उस तीव्र मन्यु ( अनीति निवारक क्रोध) के प्रति हम याजकगण श्रद्धा व्यक्त करते हैं ॥१॥ |
| हे प्रशंसनीय इन्द्रदेव ! आप अन्न को उत्पन्न करने की इच्छा से बुद्धि की कुशलता से मायावी वृत्रासुर को पीड़ित करते हैं। सभी लोग गौओं को उपलब्ध करने के लिए आपको ही प्रार्थना करते हैं। हवि समर्पित करने योग्य सभी यज्ञों में आपको ही सभी लोग आवाहित करते हैं ॥२॥ |
| अनेकों स्तोताओं के द्वारा आवाहन किये जाने वाले, ऐश्वर्यशाली हे इन्द्रदेव ! याजकगण आपकी कृपा से वांछित धन पाकर वृद्धि को प्राप्त करते हैं। शक्तिशाली अन्नदाता हे इन्द्रदेव ! वे पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न उत्तम हितकारी वैभव पाने के लिए आपकी ही पूजा उपासना करते हैं ॥३॥ |
| सोमरस, तेजस्वी इन्द्रदेव की सक्रियता एवं आनन्द को बढ़ाने वाला है, जो इस बात को जानते हैं, वे ही उनसे वाछित ऐश्वर्य की प्रार्थना करते हैं। हे ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ! आप यज्ञादि कर्म सम्पन्न करने वाले जिन यजमानों की ऐश्वर्य वृद्धि करते हैं, वे शीघ्र ही धन-धान्य एवं सेवकों से परिपूर्ण वैभव प्राप्त करते हैं ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! महिमामय स्तवनों से प्रार्थना किये जाने पर आप हमें विशाल बल सम्पन्न बनाएँ । हे ऐश्वर्यपति टर्शनीय इन्द्रदेव ! आप हमें विविध प्रकार का ऐश्वर्य प्रदान करें। आप मित्र और वरुणदेव के समान सर्वश्रेष्ठ ज्ञान से सम्पन्न हैं । आप हमें धन-धान्य प्रदान करें ॥५॥ |
सूक्त - १४८
| हे इन्द्रदेव ! हम सोम और अन्नादि हव्य समर्पित करते हुए आपकी प्रार्थना करते हैं । जो सम्पदा आपको इच्छा के अनुकूल हो, उसे हमें प्रदान करें । आपकी कृपा से हम अपने परिश्रम से श्रेष्ठ सम्पदा के अधिकारी बने॥॥१॥ |
| दर्शनीय और शूरवीर हे इन्द्रदेव ! सूर्य के रूप में आप असुरों की प्रजाओं को उत्पन्न होते ही पराजित करते हैं । जो शत्रु गुफा में छिपकर बैठे हैं अथवा जल में गुप्तरीति से विद्यमान हैं, उन्हें भी आप पराभूत करते हैं । जल वृष्टि होने पर हम आपके लिए सोमयाग सम्पन्न करेंगे ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप मंत्रद्रष्टा ऋषियों के श्रेष्ठ स्तोत्रों के अभिलाषी ज्ञाता और सर्वेश्वर होकर स्तुतियों को स्वीकार करें । सोमरस समर्पित करके हमने आपकी स्नेह भावना को अर्चित किया है, अतएव हम आपके आत्मीय हैं । हे रथारूढ़ इन्द्रदेव ! श्रेष्ठ हव्य पदार्थों के साथ इन स्तोत्रों को भी हम आपके निमित्त ही समर्पित करते हैं ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! ये सभी श्रेष्ठ स्तोत्र आपके लिए ही प्रस्तुत किये गये हैं । हे वीर इन्द्रदेव ! जो मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं, उन्हें आप शक्ति प्रदान करें । जो स्तोता आपसे प्रीति की कामना करते हैं, वे आपके निमित्त यज्ञादि कर्म सम्पन्न करते हैं । जो संगठित होकर स्तोत्र पाठ करते हैं, आप उन्हें संरक्षण प्रदान करें ॥४॥ |
| हे शूरवीर इन्द्रदेव ! आप पृथु के आवाहन पर ध्यान दें । वेनपुत्र पृथु द्वारा वेदमंत्रों से आपकी अर्चना की जाती है । जो स्तोता घृत रूप हव्य से युक्त होकर यज्ञानुष्ठान करते हुए आपका स्तुतिगान करते हैं, उन्हें स्वीकार करें । वे सभी ढाल की ओर बढ़ने वाले जल प्रवाह के समान आपकी ओर शीघ्रता से पहँच रहे हैं ॥५॥ |
सूक्त - १४९
| सृष्टि उत्पादक सवितादेव अपने नियन्त्रण साधनों से पृथ्वी को सुस्थिर करते हैं। विना आधार स्तम्भ के द्युलोक को सुदृढ़ रूप से अन्तरिक्ष में स्थापित करते हैं। वे सवितादेव आधार रहित अन्तरिक्ष में स्थित जल राशि के रूप में बँधे हुए, अश्व की भाँति कम्पायमान शरीर वाले मेघों से जल वृष्टि करते हैं ॥१॥ |
| जल के धारक हे अग्निदेव ! जिस अन्तरिक्ष पर विद्यमान रहते हुए मेघ पृथिवी को अभिषिंचित करते हैं, उस स्थान से सवितादेव परिचित हैं। सवितादेव से ही पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक विस्तृत हुए हैं ॥२॥ |
| अविनाशी-अमर सोम द्वारा जिन देवों के निमित्त यज्ञ सम्पन्न किया जाता है, वे सभी सवितादेव के पश्चात् ही उत्पन्न हुए हैं। सुपर्ण ( श्रेष्ठ पंखों या किरणों से युक्त सूर्य ) सवितादेव द्वारा सबसे प्रथम उत्पन्न हुए हैं। सवितादेव की धारण क्षमता के आधार पर ही वे प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए ॥३॥ |
| जिस प्रकार वन में चरने वाली गौएँ शीघ्रता से गाँव की ओर, योद्धाजन युद्धवेला में अश्वों की ओर, नवप्रसूता गौ प्रसन्न होकर दूध पिलाने के लिए बछड़े की ओर तथा पति अपनी पत्नी की ओर स्वाभाविक रीति से जाते हैं, उसी प्रकार स्वर्ग के धारणकर्ता, सबके द्वारा प्रार्थना योग्य सवितादेव हम याजकों के पास पहुँचते हैं ॥४॥ |
| हे सवितादेव ! हमारे पिता अंगिरा पुत्र हिरण्यस्तूप अन्न प्राप्ति के लिए किये गये यज्ञ में जिस प्रकार आपका आवाहन करते थे, उसी प्रकार हम आपकी वन्दना करते हुए सेवाएँ समर्पित करते हैं। जैसे सोमलता के संरक्षणार्थ यजमान यज्ञ की समाप्ति तक उत्साहपूर्वक संलग्न रहते हैं। वैसे ही हम भी आपकी परिचर्या में संलग्न हैं ॥५॥ |
सूक्त - १५०
| हे हव्यवाहक अग्निदेव ! देवताओं के निमित्त आपको प्रज्वलित प्रदीप्त किया गया है। आप हमारे यज्ञानुष्ठान में आदित्यगण, रुद्रगण और वसुगणों के साथ पधारें, हमारे कल्याणार्थ आप आएँ । ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! आप इस यज्ञ ( समर्पित हविष्य) का प्रेमपर्वक सेवन करते हुए हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार करें और यहाँ ( यज्ञवेदी पर ) प्रतिष्ठित हों । हे तेजस्वी अग्निदेव ! हम सभी मनुष्य यज्ञ की सफलता और अपने सुख संवर्द्धनार्थ आपका आवाहन करते हैं ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! आप सबको धारण करने वाले तथा सभी उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता हैं । हम श्रेष्ठ स्तोत्रों द्वारा आपकी प्रार्थना करते हैं । आप हमारे सुख के लिए श्रेष्ठ व्रतों के निर्वाहक देवों को इस यज्ञ में लेकर पधारें ॥३॥ |
| दिव्य गुणों से सम्पन्न हे अग्निदेव ! आप देवताओं के पुरोहितरूप हैं। सभी मनस्वी जनों और तत्त्वद्रष्टा ऋषियों ने आपको प्रदीप्त किया है । प्रचुर ऐश्वर्य सम्पदा की प्राप्ति के लिए हम आपका आवाहन करते हैं। कल्याणकारी सुख प्राप्ति के लिए हम आपकी ही प्रार्थना करते हैं ॥४॥ |
| संग्राम काल में अग्निदेव ने अत्रि, भरद्वाज, गविष्ठिर, कण्व और त्रसदस्यु आदि ऋषियों को भली-प्रकार संरक्षित किया । पुरोहित वसिष्ठ अग्निदेव का ही आवाहन करते हैं। अग्रणी पुरुष भी सुख प्राप्ति के लिए अग्निदेव की ही उपासना करते हैं । ॥५॥ |
सूक्त - १५१
| श्रद्धा से ही यज्ञाग्नि को प्रज्वलित किया जा सकता है और श्रद्धा से ही हविष्यान्न की आहुति समर्पित की जाती है। श्रद्धा को विभूतियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह बात स्पष्ट रूप से कही जाती है ॥१॥ |
| हे श्रद्धे ! आप दाता को अभीष्ट फल प्रदान करें । जो दान देने की अभिलाषा करते हैं; आप उन्हें भी अभीष्ट फल प्रदान करें । हे श्रद्धे ! आप याजकों को हमारे इन वचनों के अनुसार वांछित फल प्रदान करें।॥२॥ |
| हे श्रद्धे ! जिस प्रकार इन्द्रादि देवों ने बलवान् असुरों के विनाश का विचार किया और उन्हें विनष्ट कर दिया, उसी प्रकार हमारे याजकों को आप अभीष्ट फल प्रदान करें ॥३॥ |
| देवगण और याजक मनुष्य वायुदेव के संरक्षण में श्रद्धा की उपासना करते हैं। अन्त:करण में किसी संकल्प के जाग्रत् होने पर वे श्रद्धा का ही आश्रय लेते हैं। श्रद्धा से ही मनुष्य धन-वैभव अर्जित करते हैं ॥४॥ |
| हम प्रात:काल श्रद्धा का आवाहन करते हैं। मध्याह्नकाल में श्रद्धा का आवाहन करते हैं । सूर्यास्तकाल में भी श्रद्धा की ही उपासना करते हैं । हे श्रद्धे ! आप हम सबको श्रद्धा से परिपूर्ण करें ॥५॥ |
सूक्त - १५२
| हे महान् इन्द्रदेव ! आपकी शत्रुओं को मारने की क्षमता महान् और अद्भुत है । आपके मित्र कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते और न कभी शत्रुओं से पराभूत होते हैं। शास ऋषि इस प्रकार से आपकी श्रेष्ठ स्तोत्रों से प्रार्थना करते है ॥१॥ |
| इन्द्रदेव सबका कल्याण करने वाले, प्रजाजनों का पालन करने वाले, वृत्र असुर का विनाश करने वाले, युद्धकर्ता शत्रुओं को वशीभूत करने वाले, साधकों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले, सोमपान करने वाले और अभयदाता हैं । वे हमारे समक्ष पधारें ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप राक्षसों का विनाश करें । हिंसक दुष्टों को नष्ट करें । वृत्रासुर का जबड़ा तोड़ दें । हे। शत्रुनाशक इन्द्रदेव ! आप हमारे संहारक शत्रुओं के क्रोध एवं दर्प को नष्ट करें ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप हमारे शत्रुओं का विनाश करें हमारी सेनाओं द्वारा पराजित शत्रुओं को मुँह लटकाये भागने दें । हमें वश में करने के अभीच्छे शत्रुओं को गर्त में डालें ॥४॥ |
| हे इन्द्रदेव ! शत्रुओं के दुष्टमनों (दुर्बुद्धि) को विनष्ट करें । हमारा संहार करने के अभिलाषी शत्रुओं को नष्ट करें । शत्रुओं के क्रोध से हमारी रक्षा करते हुए हमें श्रेष्ठ सुख प्रदान करें । शत्रु से प्राप्त मृत्यु का निवारण कर ॥५॥ |
सूक्त - १५३
| इन्द्रदेव के समीप जाकर उनकी सेवा करने वाली, यज्ञादि सत्कर्म करने में संलग्न माताएँ उनकी ही उपासना-अर्चना करती हैं। उनसे सुखकारी श्रेष्ठ धन को उपलब्ध करती हैं ॥१॥ |
| हे बलवर्धक इन्द्रदेव ! आप शत्रुओं को पराजित करने वाली सामर्थ्य और धैर्य से प्रख्यात हुए हैं। आप सर्वाधिक सामर्थ्यशाली और साधकों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आप वृत्रहन्ता और अन्तरिक्ष का विस्तार करने वाले हैं। आपने अपनी सामर्थ्य से द्युलोक (स्वर्गलोक) को स्थायित्व प्रदान किया है ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! अपने कार्यों में सहयोगी ( सखा ) सूर्य को अपने दोनों हाथों से अन्तरिक्ष में स्थापित किया है। आप अपनी सामर्थ्य से वज्रास्त्र को तीक्ष्णता प्रदान करते हैं ॥४॥ |
| हे इन्द्र ! आप अपनी शक्ति से सभी प्राणियों को वशीभूत करते हैं । समस्त स्थानों पर आपका प्रभुत्व है ॥५॥ |
सूक्त - १५४
| किन्हीं पितरजनों के निमित्त सोमरस उपलब्ध रहता है और कोई घृताहुति का सेवन करते हैं । हे प्रेतात्मा ! जिनके लिए मधुर रस की धारा प्रवाहित होती है, आप उन्हीं के समीप पहुँचें ॥१॥ |
| जो तपश्चर्या के प्रभाव से किसी भी प्रकार पराभूत नहीं हो सकते, जो तपश्चर्या के कारण स्वर्ग को प्राप्त हए हैं तथा जिन्होंने कठिन तप साधना सम्पन्न की है । हे प्रेतात्मा ! आप उन्हीं के समीप जाएँ ॥२॥ |
| हे प्रेत ! जो शूरवीर संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देकर वीरगति को प्राप्त हुए हैं अथवा जो लोग अनेकों प्रकार के दान देकर अपनी कीर्ति से इस संसार में अमर हो गये हैं। आप उन लोगों के समीप पहुँचे ॥३॥ |
| हे प्रेत ! हमारे जिन पूर्वजों ने सदैव सत्य की रक्षा की तथा जो नियमित रूप से यज्ञादि सत्कर्मों में ही निरत रहे, ऐसे तपोबल के धनी पितरों के समीप आप पहुँचे ॥४॥ |
| जिन पूर्वज मनीषियों ने जीवन की हजारों श्रेष्ठ विधाओं को विकसित किया । जो सूर्य की शक्तियों के संरक्षक हैं और तप से उत्पन्न जिन पितरों ने तपस्वी जीवन जिया; हे मृतात्मा ! आप उन्हीं के समीप पहुँचें ॥५॥ |
सूक्त - १५५
| हे अलक्ष्मी ! आप सदैव दान का विरोध करते हुए कुत्सित शब्दोच्चारण करने वाली हैं। विकृत आकृतियुक्त और सदा आक्रोश करने वाली हैं। आप निर्जन प्रदेश की ओर जाएँ । अन्तरिक्ष का भेदन करने वाले मेघों के बल से आपको विनष्ट करेंगे ॥१॥ |
| अलक्ष्मी वृक्ष, लता, शस्यादि के अंकुरों को विनष्ट करके दुर्भिक्ष पैदा करती है, उसे इस लोक और उस लोक से हम दूर करते हैं। हे तेजस्वी ब्रह्मणस्पति ! दान विरोधिनी उस धननाशक देवी को आप यहाँ से दूर करें ॥२॥ |
| विकृत आकृतिवाली हे अलक्ष्मी ! आप उस काष्ठ के ऊपर बैठकर समुद्र के दूसरी ओर चली जाएँ, जो संरक्षक (स्वामी ) के बिना समुद्र के किनारे तैर रहा है ॥३॥ |
| हिंसक और कुत्सित शब्द बोलने वाली हे अलक्ष्मी ! जिस समय आप यहाँ से गमन करती हैं, उस समय वीर इन्द्रदेव के सभी शत्रु, जल के बुद्बुदों के समान विनष्ट हो जाते हैं ॥४॥ |
| सभी देवताओं ने गौओं का उद्धार किया। इन्होंने अग्निदेव को विभिन्न स्थानों में प्रतिष्ठित किया और देवां के प्रति हविष्यान्न प्रदान किया । इन पर आक्रमण करने की किसकी सामर्थ्य हैं? ॥५॥ |
सूक्त - १५६
| हमारी स्तुतियाँ अग्निदेव को यज्ञ हेतु उसी प्रकार प्रेरणा दें, जिस प्रकार युद्ध में शीघ्र चलने वाले घोड़ का प्रेरित किया जाता है। जीवन संग्राम में हम सभी ऐश्वर्यों के विजेता हों ॥१॥ |
| हे अग्निदेव ! आपकी विघ्न निवारण करने वाली एवं संरक्षण प्रदान करने वाली शक्ति (क़िरणों) से जैसे हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है, वैसे ही हमारे लिए उत्तम धनादि प्रदान करें ॥२॥ |
| हे अग्निदेव ! स्वस्थ और महान् गौओं और अश्वों से युक्त प्रचुर धन हमें प्रदान करें । आकाश आपके तेज से ही प्रकाशित है। आप व्यापारियों का मार्गदर्शन करें ॥३॥ |
| हे अग्निदेव ! सब वस्तुओं को प्रकाश देते हुए जर्जर न होने वाले और निरन्तर गतिशील सूर्यदेव को आपने ही अन्तरिक्ष में स्थापित किया है ॥४॥ |
| हे अग्निदेव ! पताका की भाँति आप प्रजाओं को ज्ञान देने वाले, प्रिय और सर्वश्रेष्ठ हैं। यज्ञशाला में स्थित आप हमारे स्तुतिगान को स्वीकार करते हुए हमें श्रेष्ठ पोषण प्रदान करें ॥५॥ |
सूक्त - १५७
| इन समस्त लोकों को शीघ्र ही हम प्राप्त करें । इन्द्रदेव और सभी देवगण हमारे लिए सुख-शान्ति की प्राप्ति में सहायक हों ॥१॥ |
| इन्द्रदेव और आदित्यगण हमारे यज्ञ को सफल बनाएँ, शरीर को निरोग बनाएँ और हमारी सन्तानों के सद्व्यवहार के लिए प्रेरित करें ॥२॥ |
| इन्द्रदेव आदित्यों और मरुद्गणों के साथ पधार कर हमारे शरीरों को सुरक्षा प्रदान करें ॥३॥ |
| जिस समय देवगण वृत्रादि असुरों का संहार करके अपने स्थान की ओर लौटे , उस समय अमर देवत्व की सुरक्षा हो सकी ॥४॥ |
| स्तोताओं ने इन्द्रादि देवों के निमित्त श्रेष्ठ यज्ञादि कर्मों से युक्त स्तुतियों को प्रस्तुत किया। उसके पश्चात् सभी ने अन्तरिक्ष से बरसते हुए जल को देखा ॥५॥ |
सूक्त - १५८
| सर्वप्रेरक सूर्यदेव द्युलोक के अनिष्टों से हमारी रक्षा करें । अन्तरिक्ष के अनिष्टों से हमें बचाएँ तथा अग्निदेव हमें पृथ्वी के ऊपर स्थित शत्रुओं (अनिष्टों) से संरक्षित करें ॥१॥ |
| जिनका तेज सैकड़ों तरह से यजनीय है, वे सवितादेव हमारी स्तुतियाँ स्वीकार करें और हम पर गिरने वाले १ शत्रु के) चमकदार आयुधों से हमारी रक्षा करें ॥२॥ |
| सबके प्रेरक सवितादेव हमें श्रेष्ठ नेत्र ज्योति प्रदान करें, पर्वत हमें तेजस्वी नेत्र प्रदान करें तथा विधाता हमें ज्योतिमान नेत्र प्रदान करें ॥३॥ |
| हे सूर्यदेव ! हमारे नेत्रों में ऐसी ज्योति प्रदान करें, जिससे हम सम्पूर्ण पदार्थों का भली-भाँति अवलोकन कर सकें। हम आपके तेज से इस जगत् को विविध प्रकार से भलीभाँति देख सकें ॥४॥ |
| हे सूर्यदेव ! आपका हम दर्शन कर सकें । मनुष्य जिसे देखने में समर्थ हैं, उसे हम विशिष्ट रूप में देखें ॥५॥ |
सूक्त - १५९
| द्युलोक में स्थित सूर्यदेव का उदय ही मेरे लिए सौभाग्योदय के समान है। उनकी शक्ति से मैंने अपने स्वामी को वश में करके सपत्नियों को पराजित कर दिया है ॥१॥ |
| मैं ही ध्वजा के समान ज्ञानवती और सिर के समान प्रधान हूँ । उग्र होते हुए भी अपने स्वामी को मधुर वचन बोलने के लिये सहमत करती हूँ। मुझे सर्वोत्तम जानकर स्वामी मेरे कार्यों का सदैव अनुमोदन करते हैं ॥२॥ |
| मेरे पुत्र शत्रुओं का नाश करने में समर्थ और मेरी ही कन्या सर्वश्रेष्ठ रंगरूप से सुशोभित हैं । मैं सबके ऊपर विजय प्राप्त करती हैं। स्वामी भी मेरे यश की चर्चा करते हैं ॥३॥ |
| जिस यज्ञ से मेरे स्वामी इन्द्रदेव समर्थ और जगत में विख्यात हुए हैं. देवों के निमित्त वही यज्ञ अनुष्ठान मन भी सम्पन्न किया है। अब मेरी सभी शत्रुरूप सपत्नियाँ समाप्त हो गई हैं ॥४॥ |
| मैं सपत्नियों का विनाश करके उन पर विजय प्राप्त करने वाली हैं। अस्रि व्यक्तियों के तेज और ऐश्वर्य की भाँति मैं सभी सपत्नियों के तेज और धन को विनष्ट करती हूँ ॥५॥ |
| सबको पराजित करने में समर्थ मैं सभी इन सपत्नियों पर विजय प्राप्त करती हूँ। मैं अपने स्वामी वीर (इन्द्रदेव) और उनके कुटुम्बियों को भी अपने अधिकार में रखती हूँ ॥६॥ |
सूक्त - १६०
| हे इन्द्रदेव ! आप तीव्र प्रभाव वाले इस सोमरस का सेवन करें । गतिशील रथ से योजित किये गये अश्वों को लेकर यहाँ आएँ । अन्य यजमान आपको हर्षित नहीं कर सकते, हम ही आपको सन्तुष्ट करेंगे। आपके निमित्त ही यह सोमाभिषव किया गया है ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपके निमित्त ही सोमरस तैयार किया गया है, आगे भी आपके लिए ही प्रस्तुत होगा। ये सभी स्तुतियाँ आपका ही आवाहन करती हैं । हे सर्वज्ञ इन्द्रदेव ! शीघ्र ही उपस्थित होकर आप हमारे इस यज्ञ में सोमपान करें ॥२॥ |
| जो साधक निश्छल भावनापूर्वक स्नेह और श्रद्धाभक्ति के साथ इन्द्रदेव के लिए सोमरस अभिषत करने के इन्द्रदेव उनकी गौओं को भी क्षीण नहीं करते। उन्हें श्रेष्ठ और प्रशंसनीय ऐश्वर्य प्रदान करते हैं ॥३॥ |
| जो धनवान् लोग इन्द्रदेव के निमित्त सोमरस प्रस्तुत करते हैं, उन्हें वे प्रत्यक्ष लाभ प्रदान करते हैं। वैभवशाली इन्द्रदेव उनकी भुजाओं को थामकर भयमुक्त करके संरक्षण प्रदान करते हैं । उत्तम कर्मो से विद्वेष करने वालों को इन्द्रदेव तुरन्त नष्ट कर देते हैं ॥४॥ |
| सुखदाता हे इन्द्रदेव ! अश्वों, गौओं और ऐश्वर्य की अभिलाषा से प्रेरित होकर हम आपके आगमन की प्रार्थना करते हैं। आपके निमित्त नवीन और श्रेष्ठ स्तोत्रों की रचना करके आपका आवाहन करते हैं ॥५॥ |
सूक्त - १६१
| हे रोगी ! यज्ञ के हविर्द्रव्य से हम आपको अज्ञात रोगों और राजयक्ष्मा से मुक्त करते हैं। यदि इस समय किसी पापग्रह ने इस रोगी को घेर लिया हो, तो उससे भी इन्द्रदेव और अग्निदेव मुक्ति प्रदान करें ॥१॥ |
| यदि रोगी की आयु क्षीण हो गई है, यदि वह इस लोक से जाने वाला है तथा यदि वह मृत्यु के समीप गया हुआ है, तो भी हम उसे मृत्युदेव निति के समीप से वापस ला सकते हैं। मैंने उसका स्पर्श किया है, जिससे वह सौ वर्ष तक जीवित रहेगा ॥२॥ |
| हमने जो आहुतियाँ प्रदान की हैं, ये अपने सहस्र नेत्रों से सौ वर्ष का जीवन और दीर्घायुष्य प्रदान करने वाली हैं। इन्हीं आहुतियों द्वारा रोगी के जीवन को सुरक्षित किया है । सम्पूर्ण दुःखों का निवारण करके इन्द्रदेव इन्हें सौ वर्ष की आयु प्रदान करें ॥३॥ |
| हे रोगमुक्त मनुष्य ! नित्यमेव वृद्धिशील होते हुए आप एक सौ शरद् , एक सौ हेमन्त और एक सौ वसन्त तक सुखपूर्वक जीवित रहें । इन्द्रदेव , अग्निदेव, सवितादेव और बृहस्पतिदेव हविष्यान्न द्वारा परितृप्त होकरआपको सौ वर्ष तक के लिए जीवनी शक्ति प्रदान करें ॥४॥ |
| हे रोगी मनुष्य ! हम आपको मृत्यु के पाश से लौटाकर लाए हैं । पुनः नवजीवन धारण करने वाले हे मनुष्य ! आप हमारे समीप पुन: आए हैं। हे सर्वाङ्ग स्वस्थ ! आपके लिए सम्पूर्ण विश्व को देखने में समर्थ नेत्रों और आयुष्य को हमने उपलब्ध किया ॥५॥ |
सूक्त - १६२
| हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर अग्निदेव शरीर की सभी बाधाओं (रोगों ) का निवारण करें । हे नारी ! आपके शरीर में जो भी विकार (रोग) प्रत्यक्ष या गोपनीयरूप से विद्यमान हैं, उन सबको अग्निदेव दूर करें ॥१॥ |
| हे नारी ! जिन आसुरी प्रवृत्तियों (रोगों) ने आपको पीडित किया है तथा आपकी सृजन एवं धारण करने की क्षमता को विनष्ट किया है; अग्निदेव उन सबको समाप्त करें, हम उनकी स्तुति करते हैं ॥२॥ |
| हे स्त्री ! विभिन्न रोगों के रूप में जो भी पैशाचिक शक्तियाँ आपके गर्भ को पीड़ित करना चाहती हैं, जो आपकी सन्तानों को पीड़ा पहुँचाती हैं, उन सबको आपके पास से दूर करके नष्ट करते हैं ॥३॥ |
| हे नारी ! जो भी विकार (रोग) जाने-अनजाने तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर गये हैं तथा जो तुम्हारी सन्तानों को नष्ट करना चाहते हैं, अग्निदेव की सहायता से हम उन सबका विनाश करते हैं ॥४॥ |
| हे स्त्री ! जो रोग आपके पास छलपूर्वक भ्रातारूप से , पतिरूप से अथवा उपपति बनकर आता है और आपकी सन्तति को विनष्ट करने की कामना करता है, उसे हम यहाँ से दूर भगाते हैं ॥५॥ |
| हे नारी ! जो रोग स्वप्नवेला और निद्रावस्था में आपको मोहमुग्ध करके समीप आता है और जो आपकी सन्तति को विनष्ट करने की कामना करता है, उसे हम यहाँ से दूर करते हैं ॥६॥ |
सूक्त - १६३
| हे रोगी ! आपके दोनों नेत्रों, दोनों कानों, दोनों नासिका रन्धों, ठोढ़ी, सिर, मस्तिष्क और जिह्वा से हम यक्ष्मा रोग को दूर करते हैं ॥१॥ |
| हे रोगी ! आपकी गर्दन की नाड़ियों, ऊपरी स्नायुओं, अस्थियों के संधिभागों, कन्धों, भुजाओं और अन्तर्भाग से यक्ष्मा रोग का निवारण करते हैं ॥२॥ |
| आपकी आँतों, गुदा, नाड़ियों, हृदयस्थान, मूत्राशय, यकृत और अन्यान्य पाचन तंत्र के अवयवों से हम रोगों का निवारण करते हैं ॥३॥ |
| हे रोगी ! आपकी दोनों जंघाओं, जानुओं, एड़ियों, पंजों, नितम्बभागों, कटिभागों और गुदा द्वार से हम यक्ष्मा रोग का निवारण करते हैं ॥४॥ |
| आपके नखों से, लोमों से, प्रजनन अंगों से तथा समस्त शरीर से हम रोगों का निवारण करते हैं ॥५॥ |
| प्रत्येक अंग, प्रत्येक लोम और शरीर के प्रत्येक संधि भाग में जहाँ कहीं भी रोगों का निवास है, वहाँ से हम उन्हें दूर करते हैं ॥६॥ |
सूक्त - १६४
| हे दु:स्वप्न ! आपने हमारे मन को अपने अधीन कर लिया है । आप यहाँ से दूर भाग जाएँ, दूर देश में जाकर इच्छानुसार विचरण करें । निति देवता जो यहाँ से दूर रहते हैं, उनसे जाकर कहें कि जीवित व्यक्तियों के मनोरथ विस्तृत होते हैं, अतएव वे मनोरथों के विनाशक दुःस्वपदर्शन को विनष्ट करें ॥१॥ |
| सभी लोग श्रेष्ठ फलों की कामना करते हैं। वे उत्तम काम्य वस्तुओं के अभिलाषी हैं। विवस्वत पुत्र यम से शुभदृष्टि की हम प्रार्थना करते हैं। हमारे मन विविध श्रेष्ठ विषयों में रमण करने वाले हों ॥२॥ |
| निराशा के समय, आशा को सफल बनाते समय, जाग्रत् अवस्था और निद्रावस्था में जो भी हमसे पापकर्म होते हैं, उन सभी कष्टकारी पापकर्मों के फल को अग्निदेव हमसे दूर करें ॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव और ब्रह्मणस्पति देव ! हमसे स्वप्नावस्था में आपके प्रति जो पापकर्म हो गए हों, उन्हें क्षमा करें । अंगिरा के पुत्र प्रचेता पापजन्य अमंगल से हमारी रक्षा करें ॥४॥ |
| आज हम विजयी हुए हैं, प्राप्त करने योग्य वैभव को उपलब्ध कर लिया है और हम निरपराध हो गए हैं । जाग्रत् अवस्था और निद्रावस्था अथवा संकल्प से सम्बन्धित जो भी पाप किए गए हैं, वे सभी द्वेषी शत्रुओं को प्राप्त हों । जिनसे हम विद्वेष करते हैं, सभी पाप उनके समीप जाएँ । ॥५॥ |
सूक्त - १६५
| हे देवगण ! निर्ऋतदेव का दूत यह कपोत कष्ट देने की अभिलाषा से हमारे घर में पहुँचा है, उस बाधा के निवारणार्थ हम देवों की हवि द्वारा अर्चना करते हैं। उन पापों को हम हविष्यान्न द्वारा दूर करते हैं। हमारे पुत्र-पौत्रादिऔर गौ, अश्वादि को सुख-शान्ति प्राप्त हो ॥१॥ |
| हे देवगण ! हमारे घर में आया हुआ कपोत हमारे लिए कल्याणकारी और निष्पाप हो । ज्ञानवान और हमारे आत्मीय अग्निदेव हमारी हवि का सेवन करें। आपकी कृपादृष्टि से यह पंखों वाला पक्षी (तीक्ष्ण आयध) हमसे दूर ही रहे ॥२॥ |
| तीक्ष्ण पंखों वाला कपोत (आयुध) हमें विनष्ट न करे । जिस विस्तृत स्थान पर अग्निदेव प्रतिष्ठित हुए हैं। उसी स्थान पर यह विराजमान हो । गौओं और मनुष्यों के लिए यह सुखदायी हो । हे देवगण ! यह कपोत यहाँ हमारा वध न करे ॥३॥ |
| यह उलूक जो अमङ्गलध्वनि करता है, उसका प्रभाव निष्फल हो । कपोत अग्नि गृह में बैठता है, वह भी निष्प्रभावी हो । जिस स्वामी से प्रेरित होकर यह कपोत आया है, उस मृत्युरूप यम को प्रणाम है ॥४॥ |
| हे देवगण ! श्रेष्ठ मन्त्रों से स्तुति किए जाने पर आप त्याज्य कपोत को हमारे घर से दूर करें । आहुतियों से प्रसन्न और सभी पापों के नाशक, आप हमें गौएँ उपलब्ध कराएँ । तीव्रगामी उड़ने वाले ये कपोत हमारे अन्न का परित्याग करके दूसरे स्थान पर उड़कर गमन करें ॥५॥ |
सूक्त - १६६
| हे इन्द्रदेव ! समकक्ष व्यक्तियों में हमें श्रेष्ठता प्रदान करें । शत्रुओं का पराभव करने में हम विशेष रूप से समर्थ बने । शत्रुओं का संहार करके विशेष शोभायमान होकर हम गौओं के अधिकारी बनें ॥१॥ |
| मैं शत्रु विध्वंसक हूँ । इन्द्रदेव के सदृश ही मुझे कोई हिंसित और आहत करने में सक्षम नहीं । सभी शत्रुओं को हम पैरों से कुचल दें, अर्थात् उन्हें अपमानित करें ॥२॥ |
| हे रिपुओ ! जैसे धनुष के दोनों किनारों को प्रत्यञ्चा से बाँधते हैं, वैसे ही मैं तुम्हें इस स्थान से बाँधता हूँ। हे वाचस्पति देव ! हमारी वार्ता में अवरोध डालने से इन्हें रोकें ॥३॥ |
| सबको पराजित करने वाला मैं सर्वसमर्थ तेज से सम्पन्न होकर आया हूँ । हे शत्रुओ ! मैं आपकी बुद्धि को, आपके कर्मों को और आपके संगठन को अस्त-व्यस्त करता हूँ ॥४॥ |
| अप्राप्त को प्राप्त करने (योग) एवं उसकी सुरक्षा (क्षेम) करने की योग्यता प्राप्त करके मैं आपकी अपेक्षा श्रेष्ठ बन गया हूँ । इस प्रकार शीर्ष भाग के समान आपके बीच श्रेष्ठ पद को प्राप्त कर चुका हूँ । जल में रहने वाले मेढक की भाँति तुम लोग मेरे पैरों के नीचे रहकर चीत्कार करते रहो ॥५॥ |
सूक्त - १६७
| हे इन्द्रदेव ! यह मधुर सोमरस आपके लिए तैयार किया गया है। आप ही इस अभिषुत कलश में रखे गये योमरस के अधिपति हैं। हमारे लिए प्रचुर ऐश्वर्य और वीर सन्ताने प्रदान करें । तपश्चर्या करके अपने स्वर्ग पर विजय प्राप्त की है ॥१॥ |
| जिन इन्द्रदेव ने स्वर्गलोक पर विजय प्राप्त की है और जो सोमरूप आहार से तृप्त होते हैं, उन्हीं की हम समीप बुलाते हैं । हे इन्द्रदेव ! आप हमारी यज्ञीय भावनाओं को समझकर यहाँ पधारें । ईष्र्यालु शत्रुसेना पर विजयी होने वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव से हम वांछित धन की कामना करते हैं ॥२॥ |
| मैं राजा सोम और वरुणदेव के समीप तथा बृहस्पति और अनुमति की शरण में (यज्ञस्थल पर) रहता हूँ । हे इन्द्रदेव ! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। हे धारणकर्ता और विधाता ! आपके निर्देश से मैंने यज्ञ से अवशिष्ट कलशस्थ सोमरस का सेवन किया है ॥३॥ |
| हे बलशाली इन्द्रदेव ! आपके द्वारा प्रेरित होकर हमने यज्ञ में चरु के साथ अन्य हवनीय द्रव्य तैयार किये हैं। सर्वप्रमुख स्तोता होकर मैं इस स्तोत्र का आपके निमित्त उच्चारण करता हूँ। (इन्द्रदेव का कथन) हे विश्वामित्र और जमदग्नि ! यज्ञगृह में सोमाभिषव होने पर जब मैं धन लेकर आगमन करता हूँ , तब आपश्रेष्ठ रीति से स्तोत्रोच्चारण करें ॥४॥ |
सूक्त - १६८
| तीव्र वेग से प्रवाहित वायुदेव की महत्ता का हम गुणगान करते हैं। वे विविध प्रकार की ध्वनि उत्पन्न हुए और वृक्ष वनस्पतियों को छिन्न-भिन्न करते हुए चलते हैं। वे आकाश को व्याप्त करते हुए और चारों ओर रक्तवर्ण उत्पन्न करते हुए गमन करते हैं तथा पृथ्वी के धूलिकणों को इधर-उधर फैला देते हैं ॥१॥ |
| वायु के तीव्र वेग से पर्वतादि भी कम्पायमान हो जाते हैं । युद्ध स्थल की ओर जाते हुए अश्वों की भाँति वृक्षादि वायु के आश्रित होते हैं। वायुदेव वृक्षों रूपी रथ पर आरूढ़ होकर सम्पूर्ण भुवन के राजा (अधिपति) के समान गमन करते हैं ॥२॥ |
| अन्तरिक्ष में विभिन्न मार्गों से चलने वाले वायुदेव किसी भी दिन स्थिर होकर नहीं बैठते । जल के मित्र सभी प्राणियों से प्रथम उत्पन्न होने वाले और सत्यधर्म के अधिपति वायुदेव कहाँ उत्पन्न हुए हैं ? कहाँ से आए हैं? ॥३॥ |
| वायुदेव समस्त देवों की आत्मा और भुवनों के गर्भरूप हैं। ये स्वेच्छा से विचरण करते हैं। इनके शब्द ही विभिन्न रूपों में सुनाई पड़ते हैं। इनका स्वरूप प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। उन वायुदेव की हम हवि समर्पित करते हुए अर्चना करते हैं ॥४॥ |
सूक्त - १६९
| सबको सुख प्रदान करने वाले वायुदेव गौओं की ओर बहें । गौएँ बल प्रदान करने वाली ओषधियों का सेवन करें । वे श्रेष्ठ और प्राणों को तृप्ति प्रदान करने वाले जल का सेवन करें । हे रुद्रदेव ! दुग्धरूप पोषक, रस देने वाली गौओं को सुख प्रदान करें ॥१॥ |
| जो गौएँ समान रूप वाली, विभिन्न वर्गों वाली और एक आकृति वाली हैं, उन्हें अग्निदेव जानते हैं । जिन्हें अंगिराओं ने तप साधना द्वारा पैदा किया है , हे पर्जन्यदेव ! आप उन सभी गौओं को सुख प्रदान करें ॥२॥ |
| जो गौएँ देवयज्ञ के लिए अपने शरीर से दुग्ध प्रदान करती हैं । सोमदेव जिनके दुग्धादि रसों के ज्ञाता हैं। हे इन्द्र ! अपने दूध से पोषण प्रदान करने वाली गौओं को श्रेष्ठ सन्तानयुक्त बनाकर हमारे गोष्ठ में भिजवाएँ ॥३॥ |
| देवगणों और पितरगणों से परामर्श करके प्रजापति ने इन उत्तम गौओं को हमारे लिए प्रदान किया है । इन सभी गौओं को कल्याणकारी बनाकर वे हमारी गौशाला में भिजवाएँ । उनसे सन्तान और दुग्ध पाकर हम वैभवशाली बन सकें ॥४॥ |
सूक्त - १७०
| अत्यन्त तेजस्वी सूर्यदेव प्रचुर मात्रा में सोमपान करें । याजकों को बाधारहित लम्बी आयु प्रदान करें । ये सर्यदेव वायु से प्रेरित रश्मियों के माध्यम से सम्पूर्ण जगत् का पोषण करते हैं और उन्हें आभा आदि से पुष्ट करके विविध रूपों में प्रकाशित करते हैं ॥१॥ |
| विशेष तेजयुक्त, महान्,उत्तम पोषक, अन्न और बल प्रदायक, धर्म से आकाश को धारण करने वाले, शत्रुनाशक वृत्र (अन्धकार) संहारक, दुष्टों और राक्षसों के विनाशक सूर्यदेव अपना प्रकाश चारों ओर विस्तृत करते हैं ॥२॥ |
| प्रकाशपुंज, ज्योतियों में सर्वश्रेष्ठ सूर्यदेव विश्व को जीतने वाले हैं। प्रकाशमान सूर्यदेव धन के विजेता, महान् जगत् के प्रकाशक, अविनाशी और ओज को प्रसारित करने वाले हैं ॥३॥ |
| हे दिव्यलोक गामी सूर्यदेव ! आप अपनी ज्योति से सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करते हैं। विश्व संरक्षक और कल्याणकारी अपने तेज से आप इन सभी लोकों को पोषण प्रदान करते हैं ॥४॥ |
सूक्त - १७१
| हे इन्द्रदेव ! जिस समय इट ( तीव्र गतियुक्त) क्रषि ने अभिषुत सोम समर्पित किया, उस समय आपने उनको दिव्य संरक्षण प्रदान किया । सोमयुक्त उनके स्तोत्रों के अभिप्राय को आपने श्रवण किया ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने देवों के समीप से पलायन करने वाले, यज्ञ में बाधा डालने वाले (नास्तिक) के मन को शरीर से पृथक किया और सोमयुक्त हमारे (इट ऋषि के) गृह में प्रवेश किया ॥२॥ |
| हे इन्द्र ! अस्त्रबुध्न-पुत्र ने बार-बार आपकी प्रार्थना की, अत: आपने वेन-पुत्र पृथु को उनके अधीनस्थ किया ।॥३॥ |
| हे इन्द्रदेव ! जिस समय सायंकाल सूर्यदेव पश्चिम में अस्त होते हैं, उस समय देवगण भी नहीं जानते कि वे कहाँ गये ?तत्पश्चात् आप सूर्यदेव को प्रात:काल पूर्व की ओर प्रकट करते हैं ॥४॥ |
सूक्त - १७२
| हे उषादेवि ! अभीष्ट प्रकाश के साथ आप पृथ्वी पर आएँ । दूध से भरे थनों वाली गौएँ (अथवा पोषण सामर्थ्य से युक्त किरणें) मार्ग में रहती हैं ॥१॥ |
| हे उषादेवि ! श्रेष्ठ स्तोत्रों को ग्रहण करने के लिए आप आएँ । याज्ञिक जन उत्तम दान सामग्री लेकर श्रेष्ठ भावना से यज्ञ सम्पन्न करते हैं ॥२॥ |
| अन्न संग्रह करके हम श्रेष्ठतम द्रव्यों का दान करने के लिए प्रस्तुत हैं। सूत्र के समान हम यज्ञ को विस्तीर्ण करते हैं और यज्ञ द्वारा उषादेवी की स्तुति करते हैं ॥३॥ |
| यह उषा अपनी बहिनरूपी रात्रि के अन्धकार को अपनी रश्मियों से दूर करती हैं और उत्तम प्रकाश से अपने मार्ग को भी प्रकाशित करती हैं ॥४॥ |
सूक्त - १७३
| हे राजन् ! आपको इस (राष्ट्र या क्षेत्र) का अधिपति नियुक्त किया गया है। आप इसके स्वामी हैं, आप नित्य अविचल और स्थिर होकर रहें । प्रजाजन आपकी अभिलाषा करें । आपके माध्यम से राष्ट्र का गौरव क्षीण न हो ।॥१॥ |
| आप इस में ही अविचल होकर रहें । कभी पद से वञ्चित न हों । पर्वत के समान आप निश्चल होकर रहें । ये स्वर्ग में इन्द्रदेव हैं, वैसे ही आप पृथ्वी पर स्थिर होकर शासन करें और राष्ट्र का नेतृत्व कर ॥२॥ |
| इन्द्रदेव इस (अधिपति) को अक्षय यजनीय सामग्री उपलब्ध करके स्थिरता प्रदान करें। सोम उन्हें अपना आत्मीय मानें । ब्रह्मणस्पति भी उन्हें आत्मीय ही समझें ॥३॥ |
| जिस प्रकार आकाश, पृथ्वी, सम्पूर्ण पर्वत और समस्त विश्व अविचल है, उसी प्रकार ये प्रजाजनों के स्वामी राजा भी स्थिर रहें ॥४॥ |
| या'नश्च राष्ट्र धारयतां धस, हे राजन् ! आपके राष्ट्र को वरुणदेव स्थायित्व प्रदान करें । दिव्यगुणों से युक्त बृहस्पतिदेव स्थिरता प्रदान करें । इन्द्रदेव और अग्निदेव भी आपके राष्ट्र को स्थिर रूप से धारण करें ॥५॥ |
| धुव (टिकाऊ) हवि से हम सोमदेव को तुष्ट करते हैं, वे हमें स्थिरता प्रदान करें । हे राजन् ! इन्द्रदेव प्रजा को केवल आपके लिए बलि (अंश या कर) देने वाली बनाएँ ॥६॥ |
सूक्त - १७४
| हे ब्रह्मणस्पति ! हवि आदि यज्ञ साधनों से युक्त होकर हम इन्द्रदेव के समीप जाते हैं। उन्हीं यज्ञ साधनों से आप हमें राष्ट्र के लिए (राष्ट्रहित के लिए प्रोत्साहित करें ॥१॥ |
| हे राजन् ! हमारे विरोधी हिंसक शत्रु सेनाओं को, जो हमसे युद्ध करने के इच्छुक हैं, जो हमसे द्वेष करते हैं। आप उन्हें घेर कर पराभूत करें ॥२॥ |
| हे राजन् ! सवितादेव, सोमदेव और समस्त प्राणिसमुदाय आपको शासनाधिरूढ़ करने में सहयोग इन सबकी अनुकूलता से आप भलीभाँति शासन करें ॥३॥ |
| हे देवगण ! जिन हवि आदि साधनों से इन्द्रदेव क्रियाशील, अन्नवान् और श्रेष्ठ बनते हैं, उन्हीं को हमने तैयार किया है । इसीकारण हम भी शत्रुविहीन बन सके हैं ॥४॥ |
| शत्रुओं का हनन करके मैने स्वयं को अजातशत्रु सिद्ध किया है । शासनारूढ़ होकर शत्रुओं का पराभव करने में समर्थ हुआ हूँ। मैंने सभी प्राणियों और अधिकारियों को अपने अधीन कर लिया है ॥५॥ |
सूक्त - १७५
| हे मावा (सोम निष्पादक यंत्र) सवितादेव स्वसामर्थ्य से आपको सोमरस के अभिषव कार्य में प्रेरित करें । आप अभिषव के स्थान पर अपने कर्म में नियुक्त हों और सोमरस तैयार करें ॥१॥ |
| हे (मावा) ! आप दुःखकारिणी प्रजा को हमसे दूर करें । दुर्मति को दूर करें । सुखदायक ओषधियों को हमारे लिए रस प्रदायक बनाएँ। ॥२॥ |
| परस्पर मिलकर पाषाण एक विस्तृत पाषाण को चारों ओर से सुशोभित करते हैं। रसवर्षक (सोम) के प्रति वे अपने बल का प्रयोग करते हैं ॥३॥ |
| हे पाषाणो ! सवितादेव अपनी सामर्थ्य से आपको यजमानों के निमित्त सोम अभिषवण के लिए प्रेरित करें ।॥४॥ |
सूक्त - १७६
| ऋभुगण यश प्राप्ति हेतु संग्राम में प्रवृत्त हो गए। जिस प्रकार बछड़े अपनी माता गौओं को घेरकर खड़े होते हैं, वैसे ही वे विश्वाधार ऋभुगण पृथ्वी के चारों ओर संव्याप्त हो गए ॥१॥ |
| हे स्तोताओ ! आप दिव्यगुण सम्पन्न सम्पूर्ण विश्व के ज्ञाता अग्निदेव की उपासना करें । वे अपनी दिव्यबुद्धि से हमारे हव्य को विधिपूर्वक देवताओं के समीप तक पहुँचाएँ ॥२॥ |
| ये देव-आह्वाता वही अग्निदेव हैं, जो देवताओं के समीप जाते हैं और यज्ञों के लिए विशेषरूप से ले जाए जाते हैं। जो रथ के समान दीप्तिमान् होते हैं। याज्ञिकों से घिरे हुए सम्यक्रूप से यज्ञ सम्पन्न करना जानते हैं ॥३॥ |
| अग्निदेव अमृत के सदृश ही सांसारिक भय से हमारा संरक्षण करते हैं। वे बलवानों में भी अति बलशाला हैं। विधाता ने जीवों की आयुष्यवृद्धि के लिए उन्हें उत्पन्न किया है ॥४॥ |
सूक्त - १७७
| मेधावी जनों ने विचारपूर्वक एक पतंग (जीवात्मा या सूर्य) को देखा, जिसे बलशाली माया संव्याप्त किए हुए थी । कवि(द्रष्टा-विद्वान्) आकाश के मध्य (माया प्रवाह) कोजानते हैं, वे साधक प्रकाशयुक्त (सूर्य या परमात्मा) का पद पाने की कामना करते हैं ॥१॥ |
| पतंग (प्रकाशमान) दिव्यवाणी को विवेकी मन से धारण करते हैं । गर्भावस्था में ही गन्धर्व अर्थात् देवता उसके मन में ज्ञान बीज को बो देते हैं। यह वाणी दिव्यतायुक्त अलौकिक सुख और बुद्धि की अधिष्ठात्री है । सत्यमार्ग के साधक इस वाणी की रक्षा करते हैं ॥२॥ |
| गो पति (जीवात्मा या किरणों के स्वामी) का पतन नहीं होता, ऐसा हमारा अनुभव है । वे कभी समीप और कभी दूर विभिन्न मार्गों में भ्रमण करते हैं । वे कभी अनेक वस्त्र (गुणों) को एक साथ धारण करते हैं और कभी पृथक्-पृथक् को वे महान् दिशाओं को अपनी ज्योति से प्रकाशित करते हुए लोकों में बारम्बार भ्रमण करते हैं ॥३॥ |
सूक्त - १७८
| हम अपने कल्याण के लिए, देवताओं से सेवित, शक्तिशाली, संग्राम में, उद्धार करने में समर्थ, शत्र सेना पर विजय प्राप्त करने वाले, जिसकी गति रुकती नहीं, तीव्र गति से उड़ने वाले तार्क्स (गरुड़-सूर्य अथवा इन्द्र) देव का आवाहन करते हैं ॥१॥ |
| इन्द्रदेव के समान ही ताक्ष्य (गतिशील) की दानशक्ति को हम बार-बार आवाहित करते हैं। हम अपने कल्याण के लिए दानशक्ति का उसी प्रकार आश्रय लेते हैं, जिस प्रकार दुर्गम समुद्र को पार करने के लिए का अवलम्बन लेते हैं । हे द्यावापृथिवि ! आप विशाल, विस्तृत, गम्भीर और प्रख्यात हैं। तार्क्स के आते और जाते समय हम मृत्यु को प्राप्त न हों ॥२॥ |
| जिस प्रकार सूर्यदेव अपने तेज से जलवृष्टि करते हैं, उसी प्रकार तार्क्स ने भी अपने बल से पंचजनों को (चार वर्गों और निषाद) ऐश्वर्य से परिपूर्ण किया है । उन ताक्ष्य का वेग असंख्य प्रकार के धन को प्रदान करने वाला है । धनुष से छूटे हुए बाण के समान ही इनके वेग को रोकने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं ॥३॥ |
सूक्त - १७९
| हे स्तोतागण ! उठकर इन्द्रदेव के लिए उपयुक्त यज्ञ भाग को तैयार करें। यदि यजनीय भाग पकाया जा चुका है, तो उनके (इन्द्रदेव के) निमित्त यजन करें। यदि अभी अपक्व है, तो पाककर्म को शीघ्रतापूर्वक पूर्ण करें ॥१॥ |
| हे इन्द्रदेव ! हविभाग तैयार हो गया है । आप शीघ्र ही समीप आएँ । सूर्यदेव मार्ग के मध्य में आ गये हैं। जिस प्रकार कुल संरक्षक पुत्र इधर-उधर विचरण करने वाले गृहपति की प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार सखारूप ऋत्विज् विविध प्रकार की सोमादि यज्ञ सामग्री सहित आपकी प्रतीक्षा करते हैं ॥२॥ |
| गौ के स्तन में दुग्धरूप हवि का सर्वप्रथम पाक होता है । तत्पश्चात् वह दुग्ध अग्नि में पकाया जाता है। इस प्रकार वह अत्युत्तम पाक की स्थिति को प्राप्त होकर अतिपावन और नवीन रूप को धारण करता है। पराक्रमशील, वृत्रहन्ता एवं वज्रधारी हे इन्द्रदेव ! आप मध्याह्नकालीन यज्ञ में समर्पित किये गये सोमरस का हर्षित होकर पान करें ॥३॥ |
सूक्त - १८०
| हे बहुस्तुत इन्द्रदेव ! आप शत्रुपक्ष को पराजित करने में समर्थ हैं। आपकी तेजस्विता सर्वोत्तम है । आपके अनुदान हमें उपलब्ध हों । आप दाहिने हाथ से ही विभिन्न प्रकार के ऐश्वर्य हमें प्रदान करें । आप ही ऐश्वर्यों के स्रोत एवं अधिपति हैं ॥१॥ |
| दे इन्द्रदेव ! आप पर्वतीय हिंसक सिंह के समान भयंकर हैं। आप दूरस्थ प्रदेश से यहाँ आकर दूर मार करने वाले वज्र को तीक्ष्ण कर शत्रुओं का विनाश करें । संग्राम की इच्छा वाले शत्रुओं को दूर करें ॥२॥ |
| हे इन्द्रदेव ! आपने जन्मजात तेजस्विता को प्राप्त किया है, इसी सामर्थ्य से आप विरोधियों,अत्याचारियों का सामना करते हैं । हे कामना पूरक इन्द्रदेव ! हम मनुष्यों के साथ शत्रुता करने वाले दुष्टों को आप दूर करते हैं । आपने ही देवों के निमित्त विस्तृत स्वर्ग की रचना की है ॥३॥ |
सूक्त - १८१
| प्रथ (विस्तृत) तथा सप्रथ (सुविख्यात) जिनके नाम हैं, ऐसे वशिष्ठ ने अनुष्टुप् छन्द से हविष्यार्पण किया तथा धारणकर्ता, तेजस्वी, सविता एवं विष्णु से रथान्तर साम को प्राप्त किया ॥१॥ |
| जो यज्ञ का परम आधार और निगूढ़ था, उस तेजस्वी ‘बृहत् साम को सविता आदि देवों ने प्राप्त किया। धातादेव, तेजस्वी सवितादेव, विष्णुदेव और अग्निदेव के समीप से भरद्वाज ऋषि इस बृहत् साम को लेकर आएँ ॥२॥ |
| अभिषेकादि क्रियाओं को पूर्ण करने वाले ‘घर्म' (यजुर्वेदीय मंत्र) की यज्ञीय कायों में अति महत्वपूर्ण भूमिका होती है । धाता आदि देवों ने उनको मनन द्वारा प्राप्त किया। प्रत्वज् लोग धाता, विष्णु, सूर्य और तेजस्वी सविता के समीप से ‘घर्म' को लेकर आए। ॥३॥ |
सूक्त - १८२
| बृहस्पति देव हमारे द:खों का निवारण करें। वे हमारे प्रति दुर्भावना रखने वाले मनुष्यों को दूर करने के लिए तेजस्वी शस्त्र का प्रयोग करें। वे अमंगल और दुर्बुद्धि का विनाश करें । वे यजमान के रोगों का निवारणकरें और उसे निर्भयता प्रदान करें ॥१॥ |
| यज्ञ के प्रयाज में नराशंस अग्नि हमारा संरक्षण करें । अनुयाज के समय भी अग्निदेव हमें शान्ति प्रदान करें । वे अनिष्टों का निवारण करें और दुर्बुद्धि को विनष्ट करें । यजमानों को शान्ति प्रदान कर, निर्भयता प्रदान करें।॥२॥ |
| ब्रह्मद्वेषी असुरों को बृहस्पति दग्ध करें तथा हिंसक रिपुओं का विनाश करें । वे अनिष्टों का निवारण करते हुए दुर्मति और दुर्भावनाओं का विनाश करें । यजमान को निर्भयता प्रदान करते हुए सुख-शान्ति का अनुदान दें ।॥३॥ |
सूक्त - १८३
| हे यजमान ! आप विवेकपूर्वक कर्मों के ज्ञाता, सुकृतों से उत्पन्न और तपश्चर्या द्वारा सर्वत्र विख्यात हैं । पुत्रादि की इच्छा करने वाले हे यजमान ! आप इस लोक में धन और सुसंतति को प्राप्त कर प्रसन्नचित्त रहें ॥१॥ |
| हे अर्धाङ्गिणी (या प्रकृति) आप को विवेक की दृष्टि से मैंने जाना है। आप सुन्दर रूपवती हैं। आपमें गर्भ धारण करने की सामर्थ्य को हम देखते हैं। हे पुत्र की अभिलाषा से युक्त भायें ! आपकी कामना पूर्ण हो, आप मातृत्व के सुख को प्राप्त करें ॥२॥ |
| मैं होता के रूप में ओषधियों में गर्भाधान करता हूँ। मैं ही प्राणियों को प्रजनन क्षमता प्रदान करता हूँ । पृथ्वी पर प्रजाजनों का उत्पादन में ही करता हूँ। यज्ञादि क्रियाओं द्वारा मैं ही सभी स्त्रियों को प्रजनन योग्य बनाता हूँ ॥३॥ |
सूक्त - १८४
| विष्णुदेव ( नारी या प्रकृति को ) गर्भाधान की क्षमता से युक्त करें। त्वष्टादेव उसके विभिन्न अवयवों का eण करें । प्रजापति सेचन प्रक्रिया में सहायक हों और धाता गर्भधारण में सहयोग करें ॥१॥ |
| हे सिनीवाली ! आप गर्भ को संरक्षण प्रदान करें । हे सरस्वति देवि ! आप गर्भ धारण में सहायक हो । हे । स्वर्णिम कमल के आभूषणों के धारणकर्ता अश्विनीकुमार आप में गर्भ को स्थिरता प्रदान करे ॥२॥ |
| गर्भस्थ सन्तति की रक्षा के लिये अश्विनीकुमार स्वर्णिम अरणियों का घर्षण करते हैं, उस गर्भस्थ संतान को हम दसवें मास में प्रसव होने के लिए बुलाते हैं ॥३॥ |
सूक्त - १८५
| मित्र, वरुण और अर्यमा तीनों देवों का तेजस्वी, महान् संयुक्त संरक्षण हमें प्राप्त हो; जिससे हम दूसरों को। पराजित करने में समर्थ. हों ॥१॥ |
| जो इन देवों के आश्रय में रहते हैं, अनिष्टकारी आसुरी शक्तियाँ उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकती । देवों की कृपा से उनके आवास और यात्राएँ भी सुरक्षित होती हैं ॥२॥ |
| अदिति देवी के तीनों पुत्र ( मित्र, अर्यमा और वरुण) जिस मनुष्य की सुरक्षा के लिए तेजस्विता प्रदान करते हैं, उसे दुष्ट शत्रु कोई हानि नहीं पहुँचा सकते । शत्रुओं के सभी प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं ॥३॥ |
सूक्त - १८६
| हमारे हृदय के लिए शान्तिदायक तथा सुखदायी ओषधियों को वायुदेव हमारे पास पहुँचाएँ । ये ओषधियाँ हमें दीर्घजीवी बनाएँ ॥१॥ |
| हे वायो ! आप हमारे पिता के तुल्य उत्पत्तिकर्ता, बन्धु के तुल्य प्रिय और मित्र के तुल्य हितकारी हैं। आपर जीवन की रक्षा के लिए कल्याणकारी ओषधियाँ पहुँचाएँ ॥२॥ |
| हे सर्वत्र गमनशील वायुदेव ! आपके पास प्राणरूप जीवन तत्त्व ( अमृत ) का जो भण्डार है, उसे हमारे कल्याण के लिए यहाँ पहुंचाएँ ॥३॥ |
सूक्त - १८७
| हे स्तोताओ ! मनुष्यों की अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने वाले अग्निदेव की स्तुति करें । वे हमें शत्रुओं की दुष्टता से संरक्षित करें ॥१॥ |
| जो अग्निदेव बहुत दूर से ( द्युलोक से ) अन्तरिक्षको पार करके यज्ञ वेदी पर प्रकाशित होते हैं। वे सभी प्रकार के शत्रुओं से हमारी रक्षा करें ॥२॥ |
| जल की वर्षा करने वाले अग्निदेव अपनी कान्तिमान ज्वालाओं से यज्ञों के ध्वंसक असुरों का संहार करते हैं । वे अग्निदेव विद्वेषी शत्रुओं से हमारी रक्षा करें ॥३॥ |
| जो अग्निदेव समस्त लोकों को पृथक्-पृथक् रूप में देखते हैं और सम्मिलित भाव से पर्यवेक्षण करते हैं। वे शत्रुओं की दुष्टता से हमारी रक्षा करें ॥४॥ |
| जो अग्निदेव अन्तरिक्ष से पार ऊपर के दिव्यलोक में तेजस्वी प्रकाश के रूप में प्रकट होते हैं । वे हमें सभी कष्टों से बचाएँ ॥५॥ |
सूक्त - १८८
| हे यजमानो ! सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और अन्नवान् अग्निदेव को प्रदीप्त करें । वे हमारे द्वारा बिछाये गए आसन पर विराजमान हों ॥१॥ |
| विद्वान् याजक अग्निदेव को पुत्र के समान प्रकट करते हैं । अग्निदेव ही जल की वर्षा करते हैं। श्रेष्ठ स्तोत्रों का गान करते हुए, हम उनकी वन्दना करते हैं ॥२॥ |
| सर्वज्ञ अग्निदेव अपनी काली-कराली आदि सात जिवाओं ( ज्वालाओं) द्वारा देवों के पास हवियों को ले जाते हैं। उन ज्वालाओं के साथ वे हमारे यज्ञ में उपस्थित हों ॥३॥ |
सूक्त - १८९
| गतिमान तेजस्वी सूर्यदेव प्रकट हो गए हैं। सबसे पहले वह माता पृथ्वी को और फिर पिता स्वर्ग और अन्तरिक्ष को प्राप्त होते हैं ॥१॥ |
| इन ( सूर्यदेव) का प्रकाश आकाश में संचरित होता है । ये ( रश्मियाँ) प्राण से अपान प्रक्रिया सम्पन्न करती हैं। ये महान् सूर्यदेव द्युलोक को विशेष रूप से प्रकाशित करते हैं ॥२॥ |
| सर्वप्रेरक सूर्यदेव दिन की तीस घटियों तक अपनी रश्मियों से प्रकाशित होते हैं । इन प्रकाशित सूर्यदेव की प्रार्थना की जाती है ॥३॥ |
सूक्त - १९०
| महान् प्रकाशमान तप से ऋत एवं सत्य ( मूल तत्त्व तथा भासित होने वाले प्रकृति पदार्थों) की अधिकृत उत्पत्ति हुई । (सृष्टि काल पूरा होने पर) तब रात्रि (प्रलय की स्थिति) उत्पन्न हुई । (उसके समापन पर) फिर अर्णव समुद्र (गतिमान् मूल द्रव्य का अथाह प्रवाह) उत्पन्न हुआ ॥१॥ |
| अर्णव समुद्र के माध्यम से संवत्सर (समय-कालचक्र) का प्रादुर्भाव हुआ। विश्व को वश में रखने वाले (परमात्मा) ने पलक झपकने की तरह दिनों एवं रात्रियों को स्वरूप दिया ॥२॥ |
| धाता (विधाता-परमात्मा) ने सूर्य एवं चन्द्रमा को, आकाश एवं पृथ्वी को, अन्तरिक्ष एवं स्वः (स्वर्गलोक अथवा आत्मतत्व) को पहले की ही तरह विनिर्मित किया ॥३॥ |
सूक्त - १९१
| हे सुखवर्षक अग्निदेव ! आप सम्पूर्ण विश्व के स्वामी हैं। समस्त तत्वों में आप ही विद्यमान हैं । यज्ञवेदी अथवा पृथ्वी पर आप ही प्रकाशित होते हैं । आप हमें विभिन्न प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करें ॥१॥ |
| हे स्तोताओ ! आप परस्पर मिल-जुलकर चलें, परस्पर मिलकर स्नेहपूर्वक वार्तालाप करें। आपके मन समान विचारधारा वाले होकर ज्ञानार्जन करें । जिस प्रकार पूर्वकाल में सज्जनों ने एक साथ मिलकर यज्ञादि कार्यो को करते हुए देवों की उपासना की थी, उसी प्रकार आप सभी एकमत हो जाओ ॥२॥ |
| हे स्तोताओ ! आप सभी की प्रार्थना एक समान हो, ‘पारस्परिक मिलन' (भेदभावना से रहित) एक जैसा हो । आपका विचार तन्त्र (मन, बुद्धि, चित्त आदि) समान रूप हो । हे स्तोताओ ! मैं आपके जीवन को एक ही मन्त्र से अभिमन्त्रित (सुसंस्कृत) करता है और एक समान आहुति प्रदान करके यज्ञमय करता हूँ ॥३॥ |
| हे स्तोताओ (मनुष्यो) ! तुम्हारे हृदय ( भावनाएँ) एक समान हों, तुम्हारे मन (विचार) एक जैसे हों, संकल्प (कार्य) एक जैसे हों, ताकि तुम संगठित होकर अपने सभी कार्य पूर्ण कर सको ॥४॥ |

